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मै बहुत थकी हुई थी| घर पहुचते ही मै पलंग पर जा बैठी और अपनी आखें बंद कर ली| थकान के कारण मुझे जल्दी ही नीद आ गई और मै सपनों में खो गई| मैंने सपने में सुन्दर सुन्दर पर्वत देखे, पर्वत से निकलती हुई एक छोटी सी नदी देखी| चारो ओर हरियाली ही हरियाली थी| वातावरण शांत था| शोर का दूर दूर तक कोई नामोनिशान नही था| हवा में सुगंध और महक थी| सामने एक कुटिया थी| मैने कुटिया के अंदर प्रवेश किया| वहां मेरी एक प्रतिकृति थी जो शांतचित्त से ध्यान कर रही थी| उसके चहरे में तेज और मीठी मुस्कान थी| जैसे ही उसने अपने नेत्र खोले, मै चौंक गई और मेरी नीद खुल गई| सामने की दीवार पर नजर गई तो वहां पर मैंने वही चित्र पाया जिसे मैंने कल ही बनाया था और जिसको मैंने अपने सपने में हुबहू देखा| मैने फिर कभी ऐसा सपना नही देखा जो मेरे इस चित्र जैसा जीवंत हो| अब यह चित्र मेरा सबसे पसंदीदा चित्र है|
कनक
उम्र - ०७ वर्ष