लोहड़ी उत्तर भारत का एक प्रमुख लोक पर्व है, जो प्रकृति, कृषि और जीवन चक्र से गहराई से जुड़ा हुआ है। लोहड़ी 2026 विशेष रूप से किसानों, नवविवाहित दंपतियों और नवजात शिशु वाले परिवारों के लिए शुभ मानी जाती है। यह पर्व सूर्य के उत्तरायण होने की प्रक्रिया की शुरुआत का संकेत देता है और ऋतु परिवर्तन का सांस्कृतिक प्रतीक है।
लोहड़ी 2026 में 13 जनवरी 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी। हर वर्ष यह पर्व मकर संक्रांति से एक दिन पहले मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देव के प्रति कृतज्ञता प्रकट की जाती है, क्योंकि सूर्य की स्थिति फसल चक्र और जलवायु पर सीधा प्रभाव डालती है।
लोहड़ी केवल एक लोक उत्सव नहीं है, बल्कि इसका गहरा ज्योतिषीय महत्व भी है। इस समय सूर्य धनु राशि में होता है और मकर राशि में प्रवेश की तैयारी करता है। यह परिवर्तन ऊर्जा, स्थिरता और नए आरंभ का संकेत देता है।
ज्योतिष के अनुसार:
सूर्य की स्थिति जीवन में स्पष्टता और अनुशासन लाती है
उत्तरायण की शुरुआत सकारात्मक परिणामों का संकेत देती है
कृषि आधारित समाज में यह समय समृद्धि से जुड़ा होता है
इसी कारण लोहड़ी का महत्व केवल परंपरा तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह आध्यात्मिक और खगोलीय संतुलन से भी जुड़ा है।
लोहड़ी की शाम को सामूहिक रूप से अलाव जलाया जाता है। लोग अग्नि की परिक्रमा कर तिल, गुड़, मूंगफली और रेवड़ी अर्पित करते हैं। यह अग्नि पूजा नकारात्मक ऊर्जा को समाप्त करने और सकारात्मकता को आमंत्रित करने का प्रतीक मानी जाती है।
मुख्य परंपराएं इस प्रकार हैं:
अलाव जलाकर सूर्य और अग्नि देव को अर्पण
लोक गीतों के साथ परिक्रमा
बच्चों द्वारा लोहड़ी मांगने की परंपरा
नवविवाहितों और नवजात शिशु के लिए विशेष आयोजन
ये सभी क्रियाएं लोहड़ी समारोह को सामूहिक आनंद और सामाजिक एकता का पर्व बनाती हैं।
लोहड़ी समारोह/ Lohri Celebration विशेष रूप से पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर भारत के अन्य हिस्सों में धूमधाम से मनाए जाते हैं। ढोल की थाप पर भांगड़ा और गिद्धा इस पर्व को जीवंत बनाते हैं।
आज के समय में लोहड़ी केवल ग्रामीण पर्व नहीं रहा। शहरी क्षेत्रों में भी यह पर्व पारिवारिक और सामुदायिक आयोजनों के माध्यम से मनाया जाता है। इससे सामाजिक संबंध मजबूत होते हैं और पारंपरिक मूल्यों का संरक्षण होता है।
लोहड़ी का सीधा संबंध रबी फसल से है। यह पर्व किसानों के लिए राहत और आशा का प्रतीक माना जाता है। नई फसल की तैयारी और पुराने श्रम के परिणाम का उत्सव इसी समय होता है।
कृषि दृष्टि से लोहड़ी का महत्व:
मेहनत के प्रति कृतज्ञता
प्राकृतिक चक्र के प्रति सम्मान
सामूहिक सहयोग की भावना
इसी कारण लोहड़ी का महत्व पीढ़ियों से कायम है।
प्रसिद्ध वैदिक ज्योतिषाचार्य डॉ. विनय बजरंगी के अनुसार, लोहड़ी जैसे पर्व हमें ग्रहों की चाल और प्रकृति के नियमों से सामंजस्य सिखाते हैं। सूर्य की स्थिति जीवन ऊर्जा का आधार है और लोहड़ी उसी ऊर्जा को संतुलित करने का अवसर देती है।
उनके अनुसार, इस दिन सकारात्मक संकल्प और पारिवारिक एकता भविष्य के लिए शुभ संकेत देती है। यहाँ देखें: पोंगल पूजा मुहूर्त
आज लोहड़ी 2026 डिजिटल युग में भी उतनी ही प्रासंगिक है। लोग ऑनलाइन शुभकामनाएं साझा करते हैं, लेकिन पारंपरिक मूल भावना अब भी बनी हुई है।
आधुनिक लोहड़ी समारोह में शामिल हैं:
सामुदायिक कार्यक्रम
सांस्कृतिक प्रस्तुतियां
पारिवारिक पूजा और भोजन
इससे यह पर्व परंपरा और आधुनिकता का संतुलन बनाता है। यहां पढ़ें: मकर संक्रांति कब है
प्रश्न 1: लोहड़ी 2026 कब मनाई जाएगी?
उत्तर: लोहड़ी 2026 में 13 जनवरी 2026, मंगलवार को मनाई जाएगी।
प्रश्न 2: लोहड़ी का महत्व क्या है?
उत्तर: लोहड़ी का महत्व सूर्य की स्थिति, ऋतु परिवर्तन और कृषि चक्र से जुड़ा है। यह समृद्धि और सकारात्मक ऊर्जा का प्रतीक है।
प्रश्न 3: लोहड़ी किन राज्यों में मनाई जाती है?
उत्तर: यह पर्व मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और उत्तर भारत के अन्य क्षेत्रों में मनाया जाता है।
प्रश्न 4: लोहड़ी पर अलाव क्यों जलाया जाता है?
उत्तर: अलाव अग्नि देव का प्रतीक है, जो नकारात्मकता को दूर कर सकारात्मक ऊर्जा प्रदान करता है।
प्रश्न 5: क्या लोहड़ी का ज्योतिष से संबंध है?
उत्तर: हां, सूर्य की स्थिति और उत्तरायण की शुरुआत के कारण लोहड़ी का गहरा ज्योतिषीय संबंध है।
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Source: https://kundlihindi.com/blog/lohri-2026-kab-hai-date-time/