Philosophy in Ashtaadhyaayi

व्याकरण के मूल-ग्रन्थ अष्टाध्यायी में व्याकरण से अलग भी विषय

 

    सामान्यत: हम समझते हैं कि अष्टाध्यायी व्याकरण-ग्रन्थ है जिसमें संस्कृत के नियमों को निबद्ध किया गया है । यह तो सही भी है । परन्तु पाणिनि महान वैयाकरण होने के साथ-साथ एक ऋषि भी थे । सदा ही हम देखते हैं कि कोई भी विद्वान जब अपने विषय को बहुत गहराई से जानने लगता है तो वह परमात्मा के दर्शन अनायास ही करने लगता है । आइनस्टाइन ने कहा था - "To know that which is impenetrable to us really exists, manifesting itself as the highest wisdom and the most radiant beauty which our dull faculties can comprehend only in their primitive forms - this knowledge, this feeling is at the center of true religiousness." - जबकि उसका विषय केवल भौतिकी था । तो फिर पाणिनि से हम कैसे यह अपेक्षा रख सकते हैं कि वे अपने ग्रन्थ में परमात्म-विषय पर कुछ भी न लिखेंगे ? अगर हम अष्टाध्यायी का इस दृष्टि से अध्ययन करते हैं तो पाते हैं कि पाणिनि मुनि ने व्याकरण के सूत्रों में कई स्थानों पर अध्यात्म पिरो दिया है ! आगे मैंने कुछ ऐसे ही सूत्र दिए हैं । यदि आप में ये कौतुहल जगाएं, तो आप भी ग्रन्थ को पुन: इस दृष्टि से पढ़ कर अन्य स्थलों पर इस विषय को पा सकते हैं ।

 

    अष्टध्यायी का पहला सूत्र है - "वृद्धिरादैच् ॥ १।१।१ ॥" जिसका व्याकरण-परक अर्थ है - इस शास्त्र में ’आ’, ’ऐ’ और ’औ’ की ’वृद्धि’ संज्ञा है । परन्तु पतञ्जलि ने महाभाष्य में बताया है कि यहां "वृद्धि" शब्द से शास्त्र का प्रारम्भ करने का एक विशेष प्रयोजन है । यह एक मंगल-वचन है जिसके द्वारा पाणिनि ने अष्टाध्यायी के पढ़ने वाले अपने वर्तमान और भावी शिष्यों को आशीर्वाद दिया है - "तुम वृद्धि को प्राप्त हो ! यह शास्त्र वृद्धि को प्राप्त हो !"

 

    पाणिनि का इस प्रकार एक ऊपरी और एक गम्भीर अर्थ का कहना, ग्रन्थ में अनेकों स्थलों पर दृष्टिगोचर होता है ।

 

    अष्टध्यायी का सह-ग्रन्थ है - धातुपाठ । वहां सबसे पहली धातु है - "भू सत्तायाम्" अर्थात् सत्ता (existence) अर्थ वाली ’भू’ धातु होती है । माधवीया धातुवृत्ति में इसपर कहा गया है - "वर्तत इति शेष: । सत्तेहात्मभरणम् । यदाह (भर्तृ-)हरि: - "आत्मानमात्मना बिभ्रदस्तीति व्यपदिशते"(वा०प० ३।३।४७)।" अर्थात् "होता है" यह सारी क्रियाओं का ’शेष’ है - सभी में लागू होता है । कोई ऐसी क्रिया नहीं है जो उस क्रिया की सत्ता को न कह रही हो । ’गा रही है’ से हम ’गाने’ की क्रिया को तो समझते ही हैं, पर साथ-साथ वह क्रिया वर्तमान है, यह भी समझते हैं । यही उसकी सत्ता है । सत्ता क अर्थ यहां पर ’आत्मभरणम्’ = आत्मधारण = अस्तित्व या ’होना’ है । भर्तृहरि तो यहां तक कहते हैं कि यहां यह उपदेश किया जा रहा है कि अपने द्वारा ही अपने को धारण = जाना जाता है ।" इस प्रकार पूर्व के विद्वानों ने स्पष्टतया माना है कि पाणिनि के ग्रन्थों में कोरी व्याकरण नहीं है ।

 

    "उच्चैस्तरां वा वषट्कार: (अष्टाध्यायी १।२।३५)" के भाष्य में प० ब्रह्मदत्त जिज्ञासु जी कहते हैं - "वषट्कारशब्देनात्र वौषट् शब्दो गृह्यते । यद्येवं वौषट्ग्रहणमेव कस्मान्न कृतम् ? वैचित्र्यार्थम् । विचित्रा हि सूत्रस्य कृति: पाणिने: ।" अर्थात् इस सूत्र में ’वषट्’ से ’वौषट्’ शब्द का ग्रहण है । प्रश्न उठता है कि यदि ऐसा है तो ’वौषट्’ ही क्यों नहीं कह दिया ? तो उत्तर है कि विचित्रता के लिए । क्योंकि पाणिनि के सूत्रों की कृति विचित्र ही है ! इस प्रकार ब्रह्मदत्त जी जैसे आधुनिक महान वैयाकरण ने भी पाणिनि के सूत्रों में ’विचित्रता’ पाई है । वस्तुत:, कोई भी अष्टाध्यायी का गहन अध्येता धीरे-धीरे स्वयं इन छुपे अर्थों को पाने लगता है ।

 

    अब मैं अपने कुछ खोजे हुए ऐसे ही तथ्यों का उल्लेख करती हूं ।

 

    कारक-प्रकरण में सूत्र हैं -

        स्वतन्त्र: कर्ता । तत्प्रयोजको हेतुश्च ॥ १।४।५४-५५ ॥

यहां ’कारके’ की अनुवृत्ति है, जिसका अर्थ है - ’करने वाले के होने पर’ अर्थात् क्रिया के होने पर । इसी से आगे बताए सूत्रों की विभिन्न सञ्ज्ञाओं को जाति-रूप में ’कारक’ कहने की प्रथा पड़ी । पहले सूत्र का व्याकरण में अर्थ है - जो क्रिया के करने में मुख्य है, जिसके अनुसार अन्य कारक और स्वयं क्रिया-पद होंगे, परन्तु जो स्वयं वाक्य के किसी अन्य पद पर निर्भर नहीं है, अर्थात् स्वतन्त्र है, वह कर्ता (कारक) कहाता है । दूसरा सूत्र कह रहा है कि जो प्रेरित करता है, वह भी कर्ता होता है और उसे इस व्याकरण-शास्त्र में ’हेतु’ भी कहा जाएगा । व्याकरण पढ़ने वाले जानते ही होंगे कि इन सूत्रों से - "यानं चलति" और "मेधा यानं चालयति" वाक्य निष्पन्न होते हैं ।

 

    अब हम इनका दार्शनिक अर्थ देखते हैं । "कर्ता अपना कर्म करने में स्वतन्त्र है ।" अर्थात् हम यह न समझें कि परमात्मा हमसे कर्म करवा रहा है । नहीं, कर्म सदैव हम ही करते है, फल भोगने में भले ही हम परमात्मा के अधीन हों । और चाहे हम कितना ही अपने को अन्य लोगों या परिस्थितियों से बन्धा पाएं, हमारा कर्म केवल हम पर निर्भर है । इसीलिए हम उसका फल भोगते हैं, परमात्मा नहीं ! इसमें केवल एक विशेष बात है, जो कि अगले सूत्र में दी गई है - जो किसी और को कोई कर्म करने को प्रेरित करेगा, वह भी कर्ता होगा, और हेतु - कारण - होने से, कर्म का फल दोनों को प्राप्त होगा । इस विषय में धर्म के आदि-प्रवक्ता मनु कहते हैं -

        अनुमन्ता विशसिता निहन्ता क्रयविक्रयी ।

        संस्कर्ता चोपहर्ता च खादकश्चेति घातका: ॥ मनुस्मृति: ५।५१ ॥

अर्थात् - (मांस खाने के प्रकरण में) पशु को मारने की आज्ञा देने वाला, मांस काटने वाल, पशु-हत्या करने वाला, मांस बेचने और खरीदने वाला, पकाने वाला, और उसको खाने वाला - ये सभी हत्यारे के तुल्य पापी हैं । मनु का यह धर्म-निर्देश ही दूसरे सूत्र में दिया गया है ।

 

    प्राय:, सूत्र की रचना स्वयं पाणिनि के दार्शनिक प्रयोजन को इंगित कर देती है । यहां "स्वतन्त्र: कर्ता" की तुलना में, व्याकरण की दृष्टि से, "वाक्ये प्रधान: कर्ता" - यह कहना अधिक उपयुक्त होता ।

 

    दूसरा एक सूत्र देखिए -

        कर्तुरीप्सिततमं कर्म ॥ १।४।४९ ॥

यहां पुन: ’कारके’ की अनुवृत्ति है । सो व्याकरण में अर्थ है - क्रिया के करते समय, कर्ता की जो सबसे इच्छित वस्तु है - क्रिया का जो लक्ष्य है- वह कर्म (कारक) कहाता है । इससे वाक्य बने - "उषा भोजनं खादति । विनोद: गीतं गायति ।" यहां उषा को खाना-क्रिया में ’भोजन’ सबसे इच्छित है, और विनोद को गाना-क्रिया में ’गीत’ सबसे इच्छित है । इसलिए ये पद ’कर्म’ कहलाए ।

 

    दार्शनिक अर्थ इस प्रकार है - जिस वस्तु/लक्ष्य की सबसे अधिक इच्छा करते हुए हम कोई क्रिया करते हैं, वही कर्म-फल देने में बलवती होती है । जैसे - यदि हम किसी का अच्छा करने निकलें, परन्तु बुरा हो जाए, तब भी फल हमें अच्छा ही मिलेगा । जो क्रिया का अन्त बुरे परिणाम में हुआ, वह परमात्मा के हाथों में था, क्योंकि वह उस दूसरे व्यक्ति के लिए फल था !

 

    इस सूत्र में भी ’सबसे अधिक इच्छित’ बहुत ही अस्पष्ट-सा शब्द है । इसलिए व्याकरण-पुस्तकें लिखने वालों को अन्य शब्दों में बताना पड़ता है - "जिस पदार्थ पर क्रिया का मुख्य रूप से प्रभाव पड़ता है", इत्यादि । पाणिनि ने तो अपनी सूत्र-रचना से जैसे पूरा क्षेत्र हमारे लिए खुला छोड़ दिया है - जो भी हम सबसे इच्छित पदार्थ मान कर क्रिया करें या वाक्य द्वारा बताना चाहें, वह ही ’कर्म’ हो जायेगा । इस परिभाषा से तो "बाल: मातरं धावति" भी साधु प्रयोग है, और "बाला मातरं रोदिति" भी, क्योंकि बालक माता की इच्छा से उसकी ओर दौड़ता है, और बालिका माता को पास बुलाने के लिए रोती है । लेकिन ये प्रयोग साधु नहीं हैं क्योंकि ये क्रियाएं अकर्मक हैं - यह हम सभी जानते हैं । इन सब बातों में न फंसकर, जैसे पाणिनि दार्शनिक अर्थ को ही कहना चाहते थे !

 

    इसी प्रकार अन्य कारकों की परिभाषाएं व्याकरण-परक अर्थ कम और दार्शनिक अर्थ अधिक कहती प्रतीत होती हैं । पाठकगण उनका भी अवलोकन करके उनके दार्शनिक अर्थ जानने का प्रयास अवश्य करें ।

 

    संज्ञा-प्रकरण में दो सूत्र आते हैं - "ह्रस्वं लघु । संयोगे गुरु ॥ १।४।१०-११ ॥" जिनका व्याकरण-परक अर्थ है - ह्रस्व स्वर इस ग्रन्थ में ’लघु’ कहलायेगा, और ह्रस्व स्वर के बाद यदि कोई बिना स्वर का व्यञ्जन आया, तो वह ’लघु’ न होकर, ’गुरु’ कहलायेगा । अब यदि हम जीवन-सम्बन्धी अर्थ निकालें तो पाणिनि कह रहे हैं - "जो ह्रस्व = छोटा होता है, बालक होता है, उसका ज्ञान लघु = कम होता है । परन्तु गुरु के संयोग से वह ज्ञान भी गुरु = बड़ा हो जाता है"। है न सही बात ?!

 

    "अदर्शनं लोप: ॥ १।१।५९ ॥" अर्थात् जिस प्रत्यय आदि का ’अदर्शन’ = जुड़ने के बाद गायब हो जाना है, उसको इस ग्रन्थ में - "लोप हो गया" - ऐसा कहेंगे । दूसरे शब्दों में, अदर्शन की ’लोप’ संज्ञा है । अब दार्शनिक अर्थ - जो लुप्त हो जाए (मिट जाए/नष्ट हो जाए), उसका केवल अदर्शन ही होता है, उसकी सत्ता नहीं समाप्त होती (वैसे, व्याकरण में भी यह अर्थ घटता है, और इस विषय पर अनेकों ग्रन्थों में चर्चा भी है) । तुलना कीजिए साङ्ख्यदर्शन के इस वाक्य से - "नाश: कारणलय: (१।८६)" अर्थात् नष्ट वस्तु की सत्ता रहती है, केवल वह अपने कारण में लय हो जाती है । क्या दोनों एक ही बात नहीं कह रहे?

 

    कई स्थलों पर तो हंसी ही आ जाती है ! "तदधीते तद्वेद ॥ ४।२।५८ ॥" इसका व्याकरणपरक अर्थ है - "अध्ययन करता है, जानता है" - इन अर्थों में प्रातिपदिकों से विहित अण् तद्धित-प्रत्यय लगता है । जीवनपरक अर्थ - "जिसको पढ़ता है, उसीको जानता है।" यहां जैसे आधी अष्टाध्यायी को जैसे-तैसे पढ़ लेने वाले, परन्तु अब हताश होते हुए शिष्य को प्रोत्साहन देते हुए पाणिनि कह रहे हैं - पढ़ना मत छोड़ो - उसी से व्याकरण जानोगे, नहीं तो सब पढ़ा-पढ़ाया व्यर्थ हो जायेगा !

 

    "नक्षत्रेण युक्त: काल: ॥ ४।२।३ ॥" - अर्थात् नक्षत्र से बताए काल में तद्धित अण् प्रत्यय लगता है । दूसरा अर्थ - काल की गणना नक्षत्र से भी की जाती है । यह ज्योतिष का भी उपदेश हो गया !

 

    अन्त में, मैं अपने सबसे प्रिय दो सूत्र देती हूं - "पति: समास एव ॥ १।४।८ ॥" - अर्थात् ’पति’ शब्द की समास में ही ’घि’ संज्ञा हो । दूसरा अर्थ - ’पति:’=परमेश्वर ’समासे’=साथ ही में बैठा हुआ है । इस जगत् में कोई भी अकेला नहीं है, परमात्मा सर्वदा सबके निकट ही रहता है । दूसरा सूत्र - "अनुदात्तं पदमेकवर्जम् ॥ ६।१।१५२ ॥" जिसका व्याकरण में अर्थ है - पद में एक वर्ण को छोड़कर अन्य सभी अनुदात्त स्वर-वाले हों, अर्थात् जब पद में किसी एक स्वर को उदात्त या स्वरित विधान किया जाय तो अन्य सब स्वर अनुदात्त हो जाएं । सूत्र की बनावट से ही हम देख सकते हैं कि व्याकरण का अर्थ समझने के लिए किञ्चित् प्रयास करना पड़ता है । लेकिन यदि हम दार्शनिक अर्थ घटाएं तो तुरन्त निकल आता है - एक ’पद’ = लक्ष्य को छोड़कर, सारे अन्य पद अनुदात्त हैं - नीचे हैं । एक मोक्ष-पद ही जीवन का सर्वोत्तम लक्ष्य है, उसके सामने अन्य सभी लक्ष्य बहुत नीचे हैं !

 

    भारतीय संस्कृति में हर पढ़ने-योग्य विषय को अध्यात्म-विषय ही माना गया है । इसीलिए सारे दर्शनशास्त्रों ने अपने को मोक्ष-ग्रन्थ बताया है, जबकि उनमें से कुछ भौतिकी, वाद-विवाद, आदि विषयों से सम्बद्ध हैं । रामायण और महाभारत जैसे ऐतिहासिक ग्रन्थों ने भी मोक्ष-परक होने का डंका बजाया है । किसी न किसी प्रकार से, भारत के सभी प्राचीन ग्रन्थों में परमात्म-विचार आ ही जाता था । पाणिनि जैसे ऋषि को तो प्रभु प्रत्यक्ष ही होंगे । तो कैसे उनका ग्रन्थ उसके उपदेशों से ओत-प्रोत न होगा ?!

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