टर्मिनैलिया चेंबुला TERMINALIA CHEMBULA
टर्मिनैलिया चेंबुला TERMINALIA CHEMBULA
टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि को हरीतकी नामक पौधे से तैयार की जाती है। टर्मिनैलिया चेबुंला औषधि का प्रयोग अनेक प्रकार के रोग सम्बंधी लक्षणों को ठीक करने के लिए किया जाता है। खूनी बवासीर, दस्त रोग, जीर्ण पेचिश (दस्त के साथ खून आना), दस्त का बंद हो जाना, पेट दर्द, सिर दर्द, चक्कर आना, पेट में पानी का भरना तथा विभिन्न प्रकार के त्वचा रोगों को समाप्त करने के लिए टर्मिनैलिया चेबुला औषधि का प्रयोग किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के स्वभाव में बदलाव आना तथा बात-बात पर गुस्सा करना। अधिक बोलना तथा अधिक जम्भाई लेना आदि मानसिक लक्षणों में रोगी को टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि देनी चाहिए।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर का बार-बार चकराना तथा सूर्य की रोशनी के साथ दर्द व चक्कर आना और बढ़ जाना। हिलने-डुलने तथा सिर को दबाने से अधिक चक्कर आना तथा ठण्डे पानी से नहाने पर, शाम के समय, सूखी ठण्डी हवा में, सोने से तथा खाना खाने से रोग में आराम मिलना। ऐसे सिर से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि देने से रोग ठीक होते हैं।
मुंह से सम्बंधित लक्षण :- मुंह से अधिक मात्रा में लार का आना तथा ठण्डा पानी पीने की अधिक इच्छा करना। ऊपरी जबड़े में रूखापन महसूस होना। मसूढ़ों का सूजकर कठोर हो जाना तथा मुंह से बदबूदार डकारें आना आदि मुंह से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि का सेवन करना चाहिए।
जीभ से सम्बंधित लक्षण :- जीभ मोटी हो जाना, जीभ का सूख जाना तथा जीभ के नोक पर कत्थई रंग की परते जम जाना और साथ ही जीभ में दर्द व कच्चापन महसूस होना आदि लक्षणों में टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि का प्रयोग विशेष रूप लाभकारी होता है।
सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण:- सांस लेने में परेशानी जिसके कारण रोगी को गहरी सांस लेनी पड़ती है तथा सांस अधिक गर्म रहता है। ऐसे सांस सम्बंधी लक्षणों में टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- आमाशय के अंदर पूर्णता की अनुभूति होने पर टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि का सेवन करना चाहिए।
विभिन्न अंगों में उत्पन्न होने वाले दर्द :- यदि रोगी के कमर में ऐसा दर्द हो जो बैठने से बढ़ता है और बिस्तर पर लेटने से कम होता है तो ऐसे लक्षण वाले दर्द में टर्मिनैलिया चेबुला औषधि लेनी चाहिए। इसके अतिरिक्त गर्दन के पिछले भाग में दर्द होना, दाईं छाती में दर्द होना तथा हृदय के आस-पास दबाव वाले दर्द होना आदि लक्षणों में टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
मलाशय से सम्बंधित लक्षण :- रोगी को दस्त बार-बार लगता रहता है परन्तु जब रोगी मलत्याग के लिए जाता है तो मल तेजी के साथ कम मात्रा में या बिल्कुल ही नहीं आता। मलत्याग करते समय पसीना आता है तथा मलाशय में दबाव युक्त दर्द होता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को टर्मिनैलिया चेबुला औषधि देनी चाहिए। मलाशय में खुजली व पूर्णता महसूस होना है तथा दस्त करते समय दस्त कम मात्रा में आना तथा दस्त के साथ आंव (सफेद रंग का चिकना पदार्थ) आना। पेट फूलने के साथ आमाशय में जलन होती रहती है। मलत्याग के समय कम मात्रा में कठोर मल आता है। ऐसे मल से सम्बंधित लक्षणों में टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि का प्रयोग करें। यह औषधि मल सम्बंधी लक्षणों में तेजी से क्रिया करके रोगों को समाप्त करती है।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण:- पेशाब कम मात्रा में आना तथा रात के समय बार-बार पेशाब आना आदि लक्षणों में रोगी को टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि देने से रोग ठीक होता है।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण:- कंधे के ऊपर की पेशियों (डेल्टोईड मस्कल) में दर्द होना तथा शरीर पर होने वाली खुजली जो खुजाने से कम होती है। ऐसे लक्षणों में रोगी को टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि देने से रोग ठीक होता है।
नाड़ी से सम्बंधित लक्षण:- नाड़ी की गति तेज होना। नाड़ी की गति कभी धीरे तथा कभी तेज होने के साथ नाड़ी का कठोर व कमजोर हो जाना आदि लक्षणों में टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि का सेवन करना चाहिए।
मात्रा :-
टर्मिनैलिया चेंबुला औषधि के मूलार्क या 3X, 6X या 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
ट्यूक्रियम मेरम वेरम TEUCRIUM MARUM VERUM
ट्यूक्रियम मेरम वेरम औषधि का प्रयोग विभिन्न अंगों में होने वाले मांसार्बुद (पोलीपस) को ठीक करने के लिए लाभकारी माना गया है। इस औषधि को नाक तथा स्त्रियों के गुप्तांग के अंदर मांसार्बुद (मांस बढ़ कर मस्से की तरह हो जाना) आदि होने पर प्रयोग करने से लाभ होता है। भूख कम लगने पर इस औषधि का प्रयोग करने से भूख बढ़ती है तथा बार-बार उत्पन्न होने वाले हिचकी रोग समाप्त होती है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ट्यूक्रियम मेरम वेरम औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- यदि रोगी को अधिक आलस्य आता हो, किसी काम को करने की इच्छा न हो तथा हमेशा गाना गुनगुनाने की इच्छा करता है तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को ट्यूक्रियम मेरम वेरम औषधि देने से रोग ठीक होता है और मानसिक शक्ति बढ़ती है।
नाक से सम्बंधित लक्षण :- नाक में झुनझुनी महसूस होता रहता है जिसके कारण बच्चा बार-बार अपनी नाक को रगड़ता रहता है। नाक बंद होने पर नाक झाड़ने या छींकने से नाक का खुल जाना। नाक का बंद हो जाना। नाक के अंदर फोड़े होना। जुकाम होना। नाक के श्लैष्मिक झिल्ली से उत्पन्न नोकदार सूजन। जुकाम के कारण नाक के पिछले भाग में बलगम के कठोर व छोटे-छोटे गुटके बन जाना। नाक के फोड़े के पास काटने-चिरने जैसा दर्द होना। अधिक छींके आना। जुकाम न होने पर भी नाक में सुरसुराहट व कुछ रेंगने जैसा महसूस होना। इस तरह के नाक से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों में से कोई भी लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को ट्यूक्रियम मेरम वेरम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण :- पेट में कीड़े होने पर ट्यूक्रियम मेरम वेरम औषधि का प्रयोग करें। पेट में गोल, चुन्ना या फीताक्रमी होने पर जब गुदा में तेज खुजली होती हो तब इस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
गुर्दे से सम्बंधित लक्षण :- यदि रोगी को शाम के समय या बिस्तर पर बैठने से गुदा में कुछ रेंगने या चुनचुनाहट महसूस होता है तो रोगी को ट्यूक्रियम मेरम वेरम औषधि लेनी चाहिए।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- पैरों की अंगुलियों पर गांठें पड़ जाना, पैर के अंगूठें के नाखून का अधिक बढ़ना, हाथ-पैरों में तेज दर्द होना तथा पैरों की कमजोरी के कारण लड़खड़ाकर चलना, दोपहर के समय पूरे शरीर में कमजोरी महसूस होना, पूरे शरीर में कंपकंपी होना आदि बाहरी अंगों के लक्षणों में ट्यूक्रियम मेरम वेरम औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :- गर्भाशय या जरायु में फोड़े होना तथा श्लैष्मिक झिल्ली सी उत्पन्न होने वाली नोकदार सूजन आदि स्त्री रोग के लक्षणों में ट्यूक्रियम मेरम वेरम औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है। बच्चे को दूध पिलाने के बाद झटकेदार हिचकियां आने पर इस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि :-
शाम के समय, रात को, बिस्तर की गर्मी से, शारीरिक हलचल से तथा बच्चे को दूध पिलाने के बाद रोग के लक्षण बढ़ते हैं।
शमन :-
खुली हवा में तथा शांत रहने से रोग में आराम मिलता है।
तुलना :-
ट्यूक्रियम मेरम वेरम औषधि की तुलना कैल्क-कार्ब, कास्टि, सिना, लाइको, साइली, स्टैफ और सल्फ औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
ट्यूक्रियम मेरम वेरम औषधि के 1 से 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
टाबैकम TABACUM
टाबैकम औषधि के प्रयोग से रोगों से संबन्धित अनेक प्रकार के ऐसे लक्षण उत्पन्न होते हैं जो आमतौर पर रोग के समय रोगी में उत्पन्न नहीं होते हैं। यह औषधि पहले रोग से सम्बंधित सभी छोटे-छोटे लक्षणों को उत्पन्न करती है और फिर उसे समाप्त करती है। यह औषधि मुख्य रूप से मितली, चक्कर आना, पीलिया रोग, उल्टी, अधिक ठण्ड लगने, पसीना आने तथा नाड़ी की गति तेज होना आदि पर क्रिया करती है। यह औषधि विसूचिका (हैजा) रोग में उत्पन्न होने वाले जीवाणुओं को समाप्त करती है और रोगों को गम्भीर होने से रोकती है। इसके अतिरिक्त सभी पेशी संस्थानों में उत्पन्न सुन्नता, निपात, पाचनतंत्र में दर्द होना, आंतों में दर्द होना, समुद्र के पास रहने वाले व्यक्तियों के रोग, बच्चों का हैजा रोग, आंतों की अत्यंत सक्रिय गति व दस्त रोग आदि को ठीक करने के लिए टाबैकम औषधि का प्रयोग किया जाता है। पेट में ठण्डापन महसूस होने के बाद भी पेट को नंगा रखने वाले लक्षण को यह औषधि ठीक करता है। इस औषधि के प्रयोग से हृदय की कठोरता और उच्च रक्तचाप आदि रोग ठीक होते हैं।
हृच्छूल के साथ-साथ हृदय की सूजन और उच्च रक्तचाप (हाई ब्लडप्रेशर) के रोगी ठीक करने के लिए टाबैकम औषधि का प्रयोग किया जाता है। गले, छाती, मूत्राशय व मलाशय की सिकुड़न, पीलिमा, दम फूलना तथा रस्सी की तरह नाड़ी का कठोर हो जाना आदि लक्षणों को दूर करने के लिए टाबैकम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टाबैकम औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- मानसिक रूप से पीड़ित रोगी को हमेशा ऐसा लगता रहता है जैसे वह बिना किसी मकसद के ही अपना जीवन जी रहा है। वह हताश व परेशान रहता है तथा उसकी याददास्त कमजोर हो जाती है तथा रोगी में हमेशा किसी चीज को पाने की लालसा बनी रहती है। इस तरह के मानसिक लक्षणों में रोगी को टाबैकम औषधि देनी चाहिए।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर से सम्बंधित विभिन्न लक्षण जैसे- आंख बंद करके खोलने पर चक्कर आना, उल्टी के साथ सिरदर्द होना तथा प्रतिदिन मिचली उत्पन्न होना। सिर पर कुछ बांधा हुआ महसूस होना। अचानक सिर दर्द होना तथा ऐसा महसूस होना जैसे सिर पर हथौड़ा मार रहा है। स्नायविक बहरापन तथा आंख, नाक और मुंह से अधिक स्राव होना। सिर के ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए टाबैकम औषधि का सेवन कराए। यह औषधि मानसिक लक्षणों में तेजी से क्रिया करती है और रोग को समाप्त करती है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण :- आंखों के विभिन्न लक्षणों जैसे- आंखों से साफ दिखाई न देना, तिर्यक दृष्टि (भेंगापन)। कम दिखाई देना तथा काले-काले धब्बे दिखाई देना। किसी वस्तु को देखते समय आंखों के बीच में काला धब्बा दिखाई देना। बिना किसी कारण के ही आंखों की रोशनी समाप्त हो जाना और साथ ही शिराओं में खून का जमा होना आदि आंखों से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टाबैकम औषधि का सेवन कराना चाहिए।
चेहरे से संबन्धित लक्षण :- रोगी का चेहरा फीका, नीला, नोचा हुआ, अंदर की ओर धंसा हुआ होना तथा दिन-प्रतिदिन चेहरा कमजोर होते जाना। चेहरे से अधिक पसीना आना तथा चेहरे पर चकत्ते होना आदि चेहरे पर उत्पन्न लक्षणों में रोगी को टाबैकम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
गले से सम्बंधित लक्षण :- नासा-ग्रसनी का सूज जाना, गले की नली का सूज जाना, बलगम वाली खांसी आना तथा उल्टी के बलगम का आना। अधिक बोलने या गाना गाने वाले व्यक्ति के गले में खराश होना आदि गले से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टाबैकम औषधि देनी चाहिए।
हृदय से सम्बंधित लक्षण :- बाईं करवट लेटने से धड़कन का बढ़ जाना। नाड़ी का रुक-रुककर चलना, नाड़ी का कमजोर होना तथा नाड़ी की गति इतनी धीमी हो जाना कि उसके गति का पता न चलना। हृच्छूल तथा हृदय के आस-पास दर्द होना। उरोस्थि के बीच दर्द होना तथा धीरे-धीरे दर्द का पूरे छाती में फैल जाना। अधिक तेजी से हृदय का कांपना। अचानक नाड़ी की गति धीमी हो जाना। किसी घटना, मानसिक आघातों या अधिक शारीरिक काम के कारण हृदय का फैल जाना। इस तरह के हृदय से सम्बंधित लक्षणों में टाबैकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इस औषधि के प्रयोग से हृदय के सभी रोग समाप्त होते हैं।
सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- छाती में दर्द होने के साथ सिकुड़न महसूस होना। पूरे हृदय पर दबाव महसूस होने के साथ हृदय में कंपन होना तथा कन्धों के बीच दर्द होना। खांसी के बाद हिचकी आना। परेशान कर देने वाली सूखी खांसी तथा खांसी के कारण घूंट-घूंटकर पानी पीना। सांस लेने में परेशानी के साथ बाईं करवट लेटने पर बाईं हाथों में चुनचुनाहट महसूस होना। इस तरह के सांस संस्थान के लक्षणों से पीड़ित रोगी को टाबैकम औषधि का सेवन करना चाहिए।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- लगातार जी मिचलाना तथा तम्बाकू के धुंए से जी मिचलना और तेज हो जाना। जी मिचलाना तथा कुछ देर चलने पर उल्टी हो जाना। कभी-कभी मल पदार्थ का आना। गर्भकाल में अधिक थूकने की आदत। समुद्र के किनारे रहने वाले व्यक्ति में उत्पन्न लक्षण। पेट की परतों में बेहोशी उत्पन्न होना तथा ऐसा महसूस होना जैसे पेट अंदर की ओर धंस रहा है। पाकाशयिक शिथिलता की अनुभूति के साथ जी मिचलाना। पाचनतंत्र व हृदय के अंदर से दर्द शुरू होकर दर्द का धीरे-धीरे बाईं हाथ तक फैल जाना। इस तरह के लक्षणों में रोगी को टाबैकम औषधि देनी चाहिए।
पेट से सम्बंधित लक्षण :- पेट से सम्बंधित ऐसे लक्षण जिसमें रोगी को पेट में ठण्डा महसूस होता है तथा पेट को नंगा रखने की इच्छा होती है जिसके कारण जी मिचलने के बाद उल्टी आती है जिससे आराम मिलता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को टाबैकम औषधि देनी चाहिए। पेट का फूल जाना तथा हार्निया रोग में टाबैकम औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
मलाशय से सम्बंधित लक्षण :- अधिक कब्ज का बनना, मलाशय में लकवा के लक्षण। मलाशय का चिर जाना। दस्त का बार-बार आना, अचानक दस्त का लग जाना, पानी की तरह पतले दस्त आना, दस्त के साथ जी मिचलाना, उल्टी आना, रोगी में निराशा उत्पन्न होना, शरीर से अधिक मात्रा में ठण्डा पसीना आना, फटे दूध की तरह फटा हुआ मल का आना तथा मलाशय की कूथन आदि पेट से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टाबैकम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
हैजा के लक्षण :- हैजा रोग में अचानक औषधि के प्रयोग करने से पतले दस्त का आना बंद जाता है। ऐसे में दस्त बंद होने के साथ यदि अन्य लक्षण उत्पन्न होते है जैसे- जी मिचलाना, उबकाई आना, चेहरा पीला पड़ जाना, पूरे शरीर में पसीना आना, पेट के अतिरिक्त पूरे शरीर में ठण्ड महसूस होना, नाड़ी (नब्ज) कमजोर हो जाना तथा नाड़ी रूक-रूककर चलना आदि हैजा के बाद उत्पन्न लक्षणों में टाबैकम औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण :- गुर्दे में दर्द होना तथा मूत्रनली में तेज दर्द होने के साथ दर्द विशेष रूप से बाईं ओर होना आदि लक्षणों में रोगी को टाबैकम औषधि का सेवन करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :- गर्भकाल में अधिक उल्टियां आना। गर्भकाल में पूरे शरीर पर तेज खुजली, मुंह में पानी भरना, हृदय में जलन होना तथा पाचन क्रिया का खराब होना आदि लक्षणों में टाबैकम औषधि के प्रयोग करने से रोग ठीक होता है।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- हाथ-पैर बर्फ की तरह ठण्डा होना तथा शरीर का कांपना। सन्यास के बाद लकवा मार जाना। चलते समय पैर को घसीटने की आदत तथा चलने पर लड़खड़ाना। हाथों की कमजोरी आदि बाहरी अंगों के लक्षणों में टाबैकम औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण :- नींद न आने के कारण हृदय में दर्द होने के साथ शरीर से ठण्डा व चिपचिपा पसीना आना तथा छोटी-छोटी बातों से जल्दी घबरा जाने की आदत होना आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी को टाबैकम औषधि लेनी चाहिए।
मिचली के साथ सिर दर्द व चक्कर आना :- मितली के साथ सिरदर्द व चक्कर आना तथा और सूर्योदय के साथ-साथ सिर दर्द को दोपहर तक और तेज हो जाना। ऐसे लक्षण उत्पन्न होने पर दर्द कभी-कभी दो दिनों तक रहता है तथा ऐसे दर्द बंद कमरे में बढ़ता है और खुली हवा तथा आंखें खोलने व बंद करने से कम होता है। सिर की दांई ओर एकाएक तेज दर्द होने लगता है। मिचली के साथ उत्पन्न होने वाले ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को टाबैकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यदि रोगी में मितली से सम्बंधित लक्षणों में तेज सिर दर्द बाईं ओर उत्पन्न होता है तो ऐसे लक्षणों में रोगी को टाबैकम औषधि के स्थान पर स्पाइजीलिया औषधि देनी चाहिए। यदि रोगी में मिचली में सिर दर्द के साथ आंखों से कम दिखाई देता है तो ऐसे लक्षणों में रोगी को टाबैकम औषधि के स्थान पर नेट्रम-म्यूर देनी चाहिए।
बुखार के लक्षण :- बुखार के साथ अधिक ठण्ड लगना तथा शरीर से ठण्डा पसीना आना आदि लक्षणों में टाबैकम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
वृद्धि :-
आंखें खोलने पर, शाम के समय, अत्यधिक गर्मी या ठण्ड से रोग बढ़ता है।
शमन :-
खुली व ताजी हवा में रहने से तथा अनावृत होने पर रोग में आराम मिलता है।
तुलना :-
टाबैकम औषधि की तुलना हाइड्रोब्रोमिक एसिड, कैम्फर, वेराट्र, आर्से औषधि से की जाती है।
प्रतिविष :-
कैम्फर, आर्से, इग्ने, सीपिया, लाइको, नक्स, कैलैडियम और प्लाण्टेगो औषधि का उपयोग टाबैकम औषधि के हानिकारक हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा :-
बैकम औषधि के 3 से 30 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
विशेष :-
रोगी में उत्पन्न कुछ विशेष लक्षणों में रोगी को टाबैकम औषधि के स्थान पर निकोटीनम औषधि भी दिया जा सकता है जैसे- बेहोशी तथा उसके बाद सभी अंगों की शिथिलता और कम्पन, जी मिचलाना, ठण्डा पसीना आना, सिर पीछे की ओर खिंचा हुआ महसूस होना। पलकों और चर्वण पेशियों की सिकुड़न, गर्दन और पीठ की पेशियों अकड़ी हुई, स्वरयंत्र एवं सांस और सांसनली की पेशियों की उत्तेजना आदि।
टैनैसेटम वल्गैरी TANACETUM VULGARE
टैनैसेटम वल्गैरी औषधि का प्रयोग रोगी में अधिक आलस्य के लक्षण उत्पन्न होने पर की जाती है। टैनैसेटम वल्गैरी औषधि का प्रयोग शरीर में उत्पन्न ऐसे लक्षण में किया जाता है जिसमें रोगी को अपना पूरा शरीर अर्द्धजीवित महसूस होता है अर्थात रोगी को ऐसा लगता है कि उसके शरीर का आधा भाग काम नहीं कर रहा है। स्नायविक और शान्त महसूस होने, लास्य तथा प्रतिवर्त आक्षेप होने पर इस औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टैनैसेटम वल्गैरी औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- मानसिक रूप से पीड़ित रोगी में उत्पन्न विभिन्न लक्षण जैसे- रोगी में चिड़चिड़ापन आ जाना तथा अधिक शोर आदि से जल्द परेशान हो जाना। मानसिक रूप से पागलपन, मिचली तथा चक्कर आना आदि लक्षण। ऐसे लक्षणों में रोगी को टैनैसेटम वल्गैरी औषधि का सेवन करना चाहिए।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर भारी लगना, मस्तिष्क का ठीक से काम न करना, भ्रम उत्पन्न होना तथा हल्का काम करने पर भी सिरदर्द होने लगना। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को टैनैसेटम वल्गैरी औषधि देनी चाहिए।
सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- सांस संस्थान कमजोर होना, श्रमसाध्य तथा खर्राटेदार सांस। झागदार बलगम से सांस नली का बंद हो जाना आदि सांस सम्बंधित लक्षणों में टैनैसेटम वल्गैरी औषधि का सेवन करें। इस औषधि के सेवन से रोग में जल्द आराम मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण :- कान से सम्बंधित लक्षणों में कान में तेज आवाज सुनाई देना और घंटी की तरह टनटन की आवाज सुनाई देना। अजीब-अजीब आवाज सुनाई देना तथा ऐसा महसूस होना मानो सुनाई देना बंद हो गया है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए टैनैसेटम वल्गैरी औषधि का प्रयोग किया जाता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण :- आंतों में दर्द होना तथा मलत्याग करने के बाद दर्द में आराम मिलना। खाना खाने के तुरन्त बाद ही मलत्याग करने की इच्छा होना तथा साधारण दस्त रोग के लक्षणों में रोगी को टैनैसेटम वल्गैरी औषधि का सेवन कराना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण:- मासिकधर्म कष्ट से आना तथा मासिकधर्म के साथ नीचे की ओर दबावयुक्त दर्द होना। स्पर्शकातरता और ऊरुओं में खिंचाव महसूस होना। मासिकधर्म का रुक जाना और उसके बाद अधिक मात्रा में मासिकस्राव होना आदि स्त्री रोग के लक्षणों में टैनैसेटम वल्गैरी औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
तुलना :-
टैनैसेटम वल्गैरी औषधि की तुलना सिमिसी, सीना, एब्सिन्थि से की जाती है।
मात्रा :-
टैनैसेटम वल्गैरी औषधि के मूलार्क या 3 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
टैनिक एसिड TANNIC ACID
श्लैष्मिक झिल्लियों से अत्यधिक स्राव होने पर टैनिक एसिड औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह औषधि अधिक रक्तस्राव (खून के बहाव) को रोकने तथा ऊतकों में सिकुड़न को रोकने में अत्यधिक लाभकारी होती है।
बदबूदार पसीना आना, पुरानी खांसी, खून की खराबी, पुराना कब्ज, पेट का दर्द तथा दबाव को बिल्कुल सहन न कर पाना आदि लक्षणों में टैनिक एसिड औषधि का प्रयोग किया जाता है।
आंतें फूल जाने पर इस औषधि का घोल आधा प्रतिशत की मात्रा में रोगी को देने से रोग ठीक होता है।
तुलना :-
टैनिक एसिड औषधि की तुलना गैलिक एसिड से की जाती है।
मात्रा :-
टैनिक एसिड औषधि का घोल 1/2 प्रतिशत की मात्रा में रोगी को लेनी चाहिए।
टारैक्सैकम TARAXACUM
टारैक्सैकम औषधि का प्रयोग पाकाशयिक सिर दर्द, आनुवंशिक रोग जिनके साथ नक्शानुमा जीभ और पीलिया रोग के कारण त्वचा का पीला पड़ जाता है। मूत्राशय का कर्कट। पेट का फूलना। हिस्टीरिया रोग के साथ पेट के फूल जाना आदि लक्षणों में किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टारैक्सैकम औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण :- रोगी में उत्पन्न ऐसे लक्षण जिसमें रोगी को कपाल के ऊपरी भाग में गर्मी महसूस होती है और सिर दर्द होता है। ऐसे में सिर को हल्का छूने से भी दर्द ओर तेज हो जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को टारैक्सैकम औषधि देनी चाहिए। उरोस्थि-चर्वणपेशियां छूने से अधिक दर्द होता है। रोगी को नींद में धुंधले सपने आते हैं जो सुबह उठने पर याद नहीं रहता तथा कपाल में तेज दर्द होता रहता है। सिर से सम्बंधित ऐसे लक्षणों में रोगी को टारैक्सैकम औषधि देनी चाहिए।
मुंह से सम्बंधित लक्षण :- होंठ के दाहिने कोन में छाले होना, जीभ पर टेढ़ी-मेढ़ी दरारे पड़ जाना। जीभ सफेद रंग का हो जाना तथा जीभ कच्ची महसूस होना। जीभ की परत पर चकत्तें उत्पन्न होना तथा चकत्तें वाले स्थान पर लाल व स्पर्शासहिष्णु धब्बे बन जाना। जीभ से सम्बंधित ऐसे लक्षणों में रोगी को टारैक्सैकम औषधि का सेवन करना चाहिए।
दांतों से सम्बंधित लक्षण :- दांतों में दर्द होना तथा बाईं ओर के दांतों से खटास लिए खून का निकलना तथा मुंह में अधिक पानी आना आदि लक्षणों में रोगी को टारैक्सैकम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
जिगर से सम्बंधित लक्षण:- जिगर का बढ़ जाना, रोगी में उत्पन्न पीलिया रोग के लक्षण तथा जिगर में दर्द होने के साथ जिगर कठोर और कट-फट जाना। जिगर के बाएं भाग में तेज चुभन जैसा दर्द होना आदि जिगर से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टारैक्सैकम औषधि देने से लाभ होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण :- आंतों में बुलबुले फटने जैसा महसूस होना। पेट का फूल जाना तथा मलत्याग के समय दर्द होना आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी को टारैक्सैकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह औषधि पेट सम्बंधी लक्षणों में तेजी से क्रिया करके रोग को समाप्त करती है।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- हाथ-पैरों में कंपकंपी होता है। घुटने के स्नायुओं में दर्द होता है जो दबाव देने से कम होता है और बाहरी अंगों को छूने से दर्द बढ़ जाता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को टारैक्सैकम औषधि का सेवन करना चाहिए। शरीर के सभी अंगों में ऐंठन सा दर्द होना तथा पूरे शरीर में कमजोरी महसूस होने पर इस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण:- बुखार में खाना खाने के बाद अधिक ठण्ड लगना, पानी पीने से ठण्ड लगना तथा अंगुलियों की नोक पर ठण्ड महसूस होना। मुंह का स्वाद कड़वा होना। बुखार में प्यास का न लगना तथा चेहरे, पैरों की अंगुलियो तथा पूरे शरीर में गर्मी महसूस होना। नींद में पसीना अधिक आना विशेष रूप से सिर पर अधिक पसीना आना। इस तरह बुखार के साथ उत्पन्न लक्षणों में रोगी को टारैक्सैकम औषधि का सेवन कराना चाहिए। यदि रात के समय उत्पन्न बुखार रोग में रोगी को अधिक पसीना आता है और रोगी को कमजोरी महसूस होती है तो ऐसे बुखार के लक्षणों में रोगी को टारैक्सैकम औषधि का सेवन कराना चाहिए। टाइफाइड बुखार के ऐसे लक्षण जिसमें अधिक शारीरिक कमजोरी रहती है, भूख नहीं लगती है तथा रात के समय अधिक पसीना आता रहता है। ऐसे लक्षणों में टारैक्सैकम औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। इसके अतिरिक्त रुक-रुककर आने वाले बुखार और मलेरिया में जांघों व हाथ-पैरों में तेज पीड़ा होना पर टारैक्सैकम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
त्वचा (Skin) :-
रात के समय अधिक पसीना आना आदि लक्षणों में रोगी को टारैक्सैकम औषधि देने से लाभ होता है।
वृद्धि :-
रोगग्रस्त स्थान को छूने से रोग बढ़ता है।
शमन :-
आराम करने से तथा लेटने से रोग में आराम मिलता है।
प्रतिविष :-
टारैक्सैकम औषधि के हानिकारक प्रभाव को रोकने के लिए कैम्फर औषधि का प्रयोग किया जाता है।
तुलना :-
टारैक्सैकम औषधि की तुलना पल्स, सीपि, सल्फ, थूजा, वेरेट्रम, कोलीन, ब्रायो, चेलि, हाइड्रैस और नक्स-वोम से की जाती है।
मात्रा :-
टारैक्सैकम औषधि के मूलार्क या 3 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
टेलूरियम TELLURIUM
टेलूरियम औषधि को टेलूरियम नामक धातु से बनाई जाती है। यह औषधि रोगी में उत्पन्न विभिन्न प्रकार के लक्षणों को ठीक करती है। यह औषधि त्वचा रोग के विभिन्न लक्षणों, रीढ़ की हड्डी तथा आंख-कान सम्बंधी रोगों में विशेष रूप से क्रिया करती है और उससे सम्बंधित रोगों को समाप्त करती है। इस औषधि का प्रयोग पीठ दर्द तथा पूरे शरीर के दर्द को ठीक करने के लिए किया जाता है। इसके अतिरिक्त शरीर से बदबूदार पसीना अधिक मात्रा में आने पर, त्रिकास्थि (रीढ़ की हड्डी के नीचे का भाग) तथा गृध्रसी (साइटिका) का दर्द आदि को ठीक करने के लिए टेलूरियम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
रोगों में टेलूरियम औषधि की क्रिया धीरे होती है। इसलिए इस औषधि के प्रयोग के कुछ दिन बाद रोगी में रोग के दबे हुए लक्षण उत्पन्न होते हैं और फिर उससे सम्बंधित रोग ठीक होते हैं।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टेलूरियम औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर के बाएं भाग में और बाएं आंख के ऊपर कपाल में दर्द होना। बाएं चेहरे की पेशियां फैली हुई और स्फुरणशील तथा बाते करते समय मुख का बाएं कोना में ऊपर की ओर व बाईं ओर खिंचाव महसूस करना। दर्द वाले स्थान पर छूने से तेज दर्द होना तथा हमेशा ऐसा डर बना रहना जैसे कोई उसके दर्द वाले अंग को छू देगा। सिर के पिछले भाग में खून का संचार होना जिसके कारण शरीर में कमजोरी व पाकाशय में बेहोशी जैसा महसूस होना। सिर में खुजली होना तथा लाल धब्बे होना। इस तरह के सिर से सम्बंधित लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए टेलूरियम औषधि देनी चाहिए।
मुंह से सम्बंधित लक्षण :- मुंह से सड़े हुए लहसुन की बदबू आने पर रोगी को टेलूरियम औषधि देनी चाहिए। इससे मुंह की बदबू दूर होती है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण :- पलकें मोटी हो जाना तथा पलकों में खुजली होने के साथ जलन होना। आंखों के पास तीन कोणों वाले मांसल का उत्पन्न होना। आंखों की सूजन। ऐसे आंखों से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टेलूरियम औषधि देने से रोग ठीक होता है। यदि आंखों में सफेद कण उत्पन्न हो जो पुतली के भीतरी भाग पर दिखाई पड़ती है तो ऐसे लक्षण में रोगी को टेलूरियम औषधि का सेवन करना चाहिए। आंखों से मवाद वाले आंसू का आना। पलकों पर खुजलीयुक्त फोड़े-फुंसी होना। आंखों की भीतर नसें उभर आती है। उपतारा के किनारों पर छोटे-छोटे छालें उत्पन्न होते हैं तथा खाना चबाने या बोलने से दर्द होता है। ऐसे आंखों से सम्बंधित लक्षणों से पीड़ित रोगी को टेलूरियम औषधि देनी चाहिए।
कान से सम्बंधित लक्षण :- कान के पीछे अकौता (फोड़े होना)। कान के बीच ठण्ड लगने के साथ कान से तीखा व मछली के गंध वाली पीब का स्राव होना। कान की खुजली, कान की सूजन तथा कान में कंपन जैसी अनुभूति होना। बहरापन आदि कान से सम्बंधित लक्षणों में टेलूरियम औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षणा :- ठण्ड लगने के कारण नाक से पानी का स्राव होना। आंखों से पानी गिरना तथा आवाज का खराब होना। नाक के बायें छिद्र से नमकीन बलगम का आना। खुली हवा में जाने से लक्षणों में आराम मिलना। इस तरह नाक से सम्बंधित लक्षणों से ग्रस्त रोगी को टेलूरियम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- आमाशय में खराबी के कारण रोगी को सेब खाने की अधिक इच्छा होती है। भोजन करने के बाद भी पेट खाली-खाली महसूस होता रहता है। रोगी कमजोर हो जाता है और हृदय में जलन होती रहती है। ऐसे लक्षण रोगी में उत्पन्न होने पर रोगी को टेलूरियम औषधि का सेवन कराना चाहिए।
मलाशय से सम्बंधित लक्षण :- मलत्याग करने के बाद मलद्वार व लिंग के आस-पास खुजली होना आदि लक्षणों में रोगी को टेलूरियम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण :- रीढ़ की हड्डी के निचले भाग में दर्द होना। सप्तम ग्रीवा कशेरुका से लेकर पंचम पृष्ठ कशेरुका तक दर्द होता है जहां अधिक तेज दर्द होने के साथ छूने से दर्द और बढ़ जाता है। गृध्रसी (साइटिका) रोग के दर्द होने पर दाहिनी ओर घूमने पर, खांसने पर, जोर लगाने से तथा रात के समय दर्द बढ़ता है। घुटनों के मोड़ों में कण्डराओं की सिकुड़न होना आदि लक्षणों में टेलूरियम औषधि देनी चाहिए।
त्वचा रोग से सम्बंधित लक्षण :- हाथ-पैरों में खुजली होना। त्वचा पर दाद के धब्बे व गोल दाद होना। छल्लेदार घाव तथा घाव से बदबू आना। उत्तेजनायुक्त खुजली। त्वचा में डंक मारने जैसा दर्द होना। त्वचा से बदबूदार वाष्पों का निकलना। पैरों में बदबूदार पसीना आना। कान के पीछे या कनपटी पर फोड़े होना तथा त्वचा पर फोड़े के गोलाकार धब्बे होना आदि लक्षणों में रोगी को टेलूरियम औषधि देने से रोग ठीक होता है और त्वचा पर बनने वाले निशान आदि समाप्त होते हैं।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :- पुरुषों में संभोग की इच्छा बढ़ जाती है। अण्डकोष और उसके नीचे फोड़े हो जाते हैं तथा जनेन्द्रियों पर दाद की तरह फुंसियां हो जाती हैं। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को टेलूरियम औषधि का सेवन करना चाहिए।
वृद्धि :-
रात को आराम करते समय, ठण्डी हवा में, घर्षण करने से, खांसने व हंसने से तथा रोगग्रस्त अंगों को छूने या उस करवट लेटने से रोग में वृद्धि होता है।
शमन :-
खुली हवा में रहने से रोग में आराम मिलता है।
तुलना :-
टेलूरियम औषधि की तुलना आर्स, रस-टाक्स और जैन्थाक्स औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
टेलूरियम औषधि के 6 से उच्च शक्तियों का प्रयोग किया जाता है।
टारेण्टुला हिस्पानिया TARENTULA HISPANIA
सभी होमियोपैथिक औषधियां किसी न किसी पेड़-पौधे या जीवों से बनाई जाती हैं। टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि भी मकड़े के विश से तैयार की जाती है। इस औषधि को होमियोपैथिक चिकित्सकों ने विभिन्न प्रकार के शारीरिक लक्षणों में प्रयोग करने के बाद ही इसका प्रयोग करने को कहा है। यह औषधि विशेष रूप से स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण जैसे हिस्टीरिया, मासिकधर्म, गर्भाशय तथा जननेन्द्रिय में उत्पन्न विकार आदि को ठीक करती है। टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि का प्रयोग ऐसे स्नायविक बीमारी में की जाती है जिसके लक्षण रोगी में आसानी से उत्पन्न नहीं होते हैं परन्तु इस औषधि के प्रयोग से रोग के छोटे-से-छोटे लक्षण भी उत्पन्न होकर रोग जड़ से समाप्त होता है। यह औषधि हिस्टीरिया के साथ उत्पन्न पीलिया रोग को ठीक करती है। नाचने वाले व्यक्ति में उत्पन्न स्नायविक रोग, मासिकधर्म कष्ट के साथ आना तथा रीढ़ की हड्डी के ऊपरी भाग में जलन होना आदि लक्षणों में टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। पेशाब करते समय कूथन, मूत्राशय में सिकुड़न महसूस होना तथा मूत्राशय में चींटी रेंगने जैसी सुरसुराहट महसूस होना आदि लक्षणों को ठीक करने के लिए टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि का प्रयोग किया जाता है। रोगी में अधिक बेचैनी उत्पन्न होना तथा न चाहते हुए भी रोगी चलता रहता है तथा चलने से रोग और बढ़ जाता है। अधिक उत्तेजना के कारण मिर्गी का दौरा पड़ना तथा अत्याधिक सम्भोग क्रिया की इच्छा होना आदि लक्षण उत्पन्न होने पर टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- रोगी का स्वभाव अचानक बदलने लगता है। रोगी में दूसरे को धोखा देने की प्रवृति आ जाती है। अधिक गुस्सा आने के कारण रोगी अपने व दूसरे को हानि पहुंचाता है। ऐसे मानसिक लक्षण जिसमें रोगी स्वयं को हमेशा व्यस्त रखना चाहता है। संगीत सुनना अच्छा लगता है। रोगी तोड़-फोड़ करने की इच्छा करता रहता है। रोगी को चोरी करने की इच्छा होती है। लोगों के बीच रहना व लोगों से मिलना अच्छा नहीं लगता है परन्तु अकेलेपन से डरता रहता है। रोगी किसी के एहसान को नहीं मानता है तथा रोगी अपने सोचे हुए इच्छाओं को पूरा नहीं कर पाता है। ऐसे मानसिक लक्षणों से पीड़ित रोगी को टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि देने से रोग ठीक होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर में ऐसा दर्द होना मानो कोई सिर में सुई चुभो रही हो। सिर चकराना तथा बालों में कंघी करने या सिर दबाने की अधिक इच्छा होना तथा स्नायविक सिर दर्द होने के साथ जारा सी आवाज होने, छूने या तेज प्रकाश से दर्द का तेज हो जाना आदि लक्षणों में टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि का प्रयोग किया जाता है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :- रोगी में यौनोत्तेजना का बढ़ जाना। सम्भोग क्रिया (सेक्स) की इच्छा बढ़ने के साथ रोगी में पागलपन का दौड़ा पड़ना। वीर्यपात होना। ऐसे पुरुष सम्बंधी लक्षणों में रोगी को टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि देने से रोग ठीक होता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :- योनि सूखी और गर्म होने के साथ योनि में तेज खुजली होना। अधिक मात्रा में मासिकस्राव होने के साथ सम्भोग क्रिया की इच्छा कम होना। योनि में तेज खुजली होना तथा सम्भोग क्रिया की तेज इच्छा होना तथा कामुक (सेक्स) इच्छा अधिक होने के साथ स्त्री में चरित्रहीनता आ जाना। मासिकधर्म कष्ट के साथ आना तथा डिम्बग्रन्थियों की अधिक संवेदनशीलता जिसमें योनि से कुछ भी छू जाने से दर्द होने लगता है। ऐसे स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि देने से रोग ठीक होता है। मासिकधर्म के समय गला, जीभ, मुख आदि सूख जाता है तथा सोते समय अधिक कष्ट होता है। ऐसे लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। गर्भाशय में दर्द होने के साथ स्त्री में निराशा व दुख का भाव पैदा होना तथा गर्भाशय में आक्षेप (बेहोशी) आदि लक्षणों में रोगी को टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि देनी चाहिए।
हृदय से सम्बंधित लक्षण :- हृदय में कंपन होना। हृदय में बेचैनी महसूस होना तथा ऐसा महसूस होना मानो किसी ने हृदय को निचोड़ दिया है या घुमा दिया है। ऐसे हृदय रोग के लक्षणों में रोगी को टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि देने से रोग ठीक होता है।
घाव से सम्बंधित लक्षण :- विभिन्न प्रकार के घाव जैसे- कारबंकल, गैंग्रिन, छिलौरी आदि। ऐसे घावों के होने पर रोगी पूरी तरह परेशान रहता है तथा रात को दर्द के कारण रोगी चलता रहता है तथा घाव वाले स्थान पर जलन होती रहती है। ऐसे लक्षणों वाले घाव को ठीक करने के लिए टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी माना गया है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- पैरों का कमजोर व पतला होना विशेष रूप से नाचने वाले व्यक्ति के पैरों में कमजोरी आने पर टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। पैर का सुन्न हो जाना। मेरुमज्जा कठोर होना व अधिक फैल जाना साथ ही उसमें कंपन, स्फुरण व झटके महसूस होना। मांस पेशियों में अकड़न व फड़कन होना। जम्भाई के साथ पैरों में कंपन उत्पन्न होना तथा पैरों को हिलाते रहने को मजबूर होना। अंगों में अस्वाभाविक सिकुड़ने और गतियां। बाहरी अंगों में उत्पन्न ऐसे लक्षणों में रोगी को टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि देने से रोग ठीक होता है।
वृद्धि :-
गति करने, छूने, शोर में, मासिकस्राव के बाद पीठ पर सहलाने से, शाम के समय तथा मौसम परिवर्तन आदि में रोग बढ़ता है। दूसरे की हानि या दुख-दर्द को देखने से रोग बढ़ता है।
शमन:-
खुली हवा, संगीत सुनने, सफेद रंगों से तथा रोगग्रस्त अंगों के मालिश करने, घोड़ सवारी करने तथा धूम्रपान करने से रोग में आराम मिलता है।
तुलना :-
टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि की तुलना एगारि, आर्से, क्यूप्रम, मैग्नी-फा औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
टारेण्टुला हिस्पानिया औषधि के 6 से 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
टारेण्टुला क्यूबेन्सिस TARENTULA VIBENSIS
टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि शरीर में दूषित खून को साफ करती है। इस औषधि का प्रयोग खून की खराबी से होने वाले रोग को समाप्त करने में विशेष रूप से किया जाता है। डिफ्थीरिया रोग, तेज जलन, दर्द, तीव्र और स्थायी अवसन्नता जैसी अवस्थाओं में टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि का प्रयोग किया जाता है। रोगग्रस्त स्थान बैंगनी रंग का हो जाना, वहां जलन व डंक मारने जैसा दर्द होना तथा बाघी घाव होना आदि में टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है। मरते समय उत्पन्न होने वाले दर्द को समाप्त करने में इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। तेज खुजली होना विशेष रूप से जननेन्द्रियों के आस-पास अधिक खुजली होने पर। पैर में कंपन होने पर। खून की खराबी तथा सविराम शीतावस्थायें में टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि का प्रयोग किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग प्लेग रोग के कारण उत्पन्न बाघी को दूर करने तथा प्लेग रोग के फैलने पर बचाव के लिए किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर में ताप और गर्मी महसूस होना तथा चक्कर आना। कपाल के ऊपरी भाग पर हल्का-लल्का दर्द होना तथा बाईं आंख से ललाट तक तेजी से घुमता हुआ दर्द होना। ऐसे लक्षणों में रोगी को टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि देने से रोग ठीक होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- आमाशय कठोर होना तथा घाव बनने जैसा महसूस होना। सुबह के अतिरिक्त पूरे दिन में दुबारा कभी भूख नहीं लगती। ऐसे लक्षणों में रोगी को टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि देनी चाहिए।
पीठ से सम्बंधित लक्षण :- गुर्दे के पास आर-पार खुजली होने पर टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि का सेवन कराना चाहिए।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- हाथ कांपता रहता है तथा हाथों में खून का संचार ठीक से नहीं होता। अंगुलबेड़ा जिसमें तेज दर्द के कारण रोगी को नींद नहीं आती तथा रोगी परेशान होकर इधर-उधर टहलता रहता है। ऐसे हाथ-पैरों के लक्षणों में रोगी को टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि देने से अत्यंत लाभ होता है।
मूत्र रोग सम्बंधित लक्षण :- पेशाब का रुक जाना तथा खांसने पर पेशाब का आना आदि मूत्र सम्बंधी लक्षणों में टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- त्वचा पर लाल-लाल धब्बे हो जाते हैं तथा त्वचा पर फुंसियां हो जाती हैं। पूरा शरीर फूला हुआ महसूस होता है। गहरे घाव होने के साथ घाव में जलन व डंक मारने जैसा दर्द होता रहता है। त्वचा बैंगनी रंग का हो जाता है। त्वचा का सड़ जाना। जख्म वाले स्थान पर दर्द व जलन सी रहती है। स्तनों का कैंसर। बुढ़ापे के समय उत्पन्न घाव। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बंधित लक्षण :- नींद का अधिक आना, नींद का ठीक से न आना तथा खांसी के कारण बार-बार नींद का खुलना आदि नींद के लक्षणों में रोगी को टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि देने से लाभ होता है।
वृद्धि :- रात में, परिश्रम करने से और ठंडे पेय के प्रयोग रोग में वृद्धि होती है।
शमनः- धूम्रपान करने से रोग के लक्षणों में कमी होती है।
तुलना :-
टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि की तुलना आर्से, पाइरो, कोटेल, एकिने, ऐन्थ्रासी, बेला या एपिस औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
टारेण्टुला क्यूबेन्सिस औषधि के 6 से 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
ट्रिनाइट्रोटोलिन TRINITROTOLUENE
ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि मुख्य रूप से रक्त के लालकणों पर क्रिया करती है जिसके परिणामस्वरूप शरीर में खून की कमी तथा पीलिया रोग के ऐसे लक्षण भी उत्पन्न होते हैं जो लक्षण आमतौर पर आसानी से रोगी में उत्पन्न नहीं होते। इस औषधि के प्रयोग से खून की कमी और पीलिया के छोटे-छोटे लक्षण भी उत्पन्न होकर समाप्त हो जाते हैं। अधिक कार्बन डाइऑक्साइड वाले स्थान पर काम करने से होने वाले शारीरिक हानि पर खून में मौजूद लालरक्तकणों रंजक पदार्थ बदल जाता है और प्राणवायु का संचार पूरे शरीर में ठीक से नहीं हो पाता जिसके कारण अनेक प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते हैं, जैसे- दम फूलना, सिर चकराना, सिर दर्द होना, बेहोशी आना, हृदय में कंपन होना तथा बिना किसी कारण थकान महसूस होना, पेशियों में ऐंठन सा दर्द होना, शरीर का नीला पड़ जाना और साथ ही नींद का अधिक आना, निराशा व अनिद्रा आदि। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि का सेवन कराना चाहिए।
टी.एन.टी विशाक्तता के कारण उत्पन्न होने वाले मुख्य रोग है- खून दूषित होने से उत्पन्न पीलिया के लक्षण और शरीर में खून की कमी से उत्पन्न होने वाले विभिन्न लक्षण। खून में कोशिकायें नष्ट होने के कारण पीलिया रोग उत्पन्न होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण :- रोगी में हर समय एक प्रकार की हताशा व निराशा बनी रहती है और उसके ललाट पर दर्द रहता है। रोगी को गाना सुनने का मन नहीं करता, अकेला रहना पसन्द करता है तथा बिना किसी कारण के ही रोने लगता है। सिर चकराने के साथ बेहोशी जैसी स्थिति उत्पन्न होना, मस्तिष्क का ठीक से काम न करना, रोने की प्रवृति तथा चेहरा काला पड़ जाना आदि लक्षणों में ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- नाक सूख जाने के कारण रोगी को ऐसा महसूस होता है कि नाक बंद हो गया है। छींके अधिक आना, नाक से बलगम निकलना, गले में जलन होना तथा छाती में घुटन महसूस होने के साथ अधिक दबाव महसूस होना। सूखी खांसी होने के ऐसे लक्षण जिसमें खांसते-खांसते बेहोशी जैसे लक्षण उत्पन्न हो जाती है तथा खंखारने पर बलगम थक्के के रूप में एक साथ बाहर निकलता है। ऐसे सांस से सम्बंधित लक्षणों में ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि का सेवन करना चाहिए।
हृदय से सम्बंधित लक्षण :- हृदय में कंपन होना, हृदयक्षिप्रता, हृदय की गति कम हो जाना तथा नाड़ी का रुक-रुककर चलना आदि लक्षणों में ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण :- मूत्र से सम्बंधित ऐसे लक्षण जिसमें मैले रंग का पेशाब आता है, पेशाब करते समय मूत्रनली में जलन होती है, अचानक पेशाब लग जाता है, कभी-कभी अपने आप पेशाब आ जाता है तथा पेशाब रुक जाता है। ऐसे लक्षणों में ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण :- पेट से सम्बंधित विभिन्न लक्षण जैसे- मुंह का स्वाद कड़वा हो जाना, अधिक प्यास लगना, खट्टी पदार्थो का पुनरुदगीरण, खड्गाकार भाग के पीछे तेज जलन होना, जी मिचलाना, उल्टी होना, कब्ज का बनना तथा दस्त के साथ बांयटे पड़ना आदि लक्षणों में ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि का प्रयोग किया जाता है।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- हाथों का रंग पीला हो जाना। त्वचा पर गांठे पड़ना, लाल रंग के दाने पड़ना, त्वचा पर फफोले पड़ना तथा त्वचा पर खुजली व जलन के साथ त्वचा का फूल जाना आदि लक्षणों में ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि का सेवन करें। त्वचा के नीचे तथा नाक से खून का आना, त्वचा का सूज जाना तथा घुटने के पीछे थकावट व दर्द महसूस होना आदि लक्षणों में ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि का प्रयोग किया जाता है।
वृद्धि :-
शराब पीने से तथा चाय पीने से रोग बढ़ता है।
तुलना :-
ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि की तुलना जिंकम, फास्फो, सीना, आर्से या प्लम्ब औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
ट्रिनाइट्रोटोलिन औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
ट्रिओस्टियम पर्फोलिएटम TRIOSTEUM PERFOLIATUM
ट्रिओस्टियम पर्फोलिएटम औषधि का प्रयोग विभिन्न प्रकार के लक्षणों को समाप्त करने के लिए किया जाता है। यह औषधि अतिसार (दस्त रोग) के ऐसे लक्षणों में विशेष रूप से क्रियाशील होती है जिसमें दस्त के साथ दर्द, मिचली तथा दस्त के बाद नीचे के अंग सुन्न पड़ जाता है और पेशाब अधिक मात्रा में आता है। यह औषधि परागज ज्वर में भी लाभकारी होता है। यह औषधि स्नायविक लक्षणों को शान्त करती है, पैतिकता तथा पित्त के कारण उत्पन्न दर्द आदि को दूर करती है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ट्रिओस्टियम पर्फोलिएटम औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के कपाल के पिछले भाग में होने वाले सिरदर्द के साथ जी मिचलाना और फिर उल्टी करना आदि लक्षणों में रोगी को ट्रिओस्टियम पर्फोलिएटम औषधि लेनी चाहिए। सर्दी के कारण होने वाले बुखार के साथ पूरे शरीर में लगातार दर्द होना और अंगों में जलन महसूस होना। पुराने जुकाम के साथ होने वाला सिर दर्द आदि लक्षणों में ट्रिओस्टियम पर्फोलिएटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- भोजन करने की इच्छा न करना, बैठने के बाद उठने पर मिचली आना तथा मिचली के बाद उल्टी और बांयटे आना। दस्त का बार-बार आना तथा दस्त पानी की तरह पतला व फेन की तरह होना आदि लक्षणों में रोगी को ट्रिओस्टियम पर्फोलिएटम औषधि देने से रोग समाप्त होता है।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- यदि शरीर के सभी जोड़ों में कठोरता आ गई हो तथा गैस (गुल्म) के कारण पेशियों सुन्न पड़ गई हो और हड्डियों में दर्द हो तो ऐसे लक्षणों ट्रिओस्टियम पर्फोलिएटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। पीठ के आमवाती दर्द तथा अंगों में दर्द होना आदि लक्षणों में ट्रिओस्टियम पर्फोलिएटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- त्वचा पर खुजली के साथ उत्पन्न बड़े चकत्ते तथा पाकाशय में खराबी के कारण उत्पन्न छपाकी आदि लक्षणों में ट्रिओस्टियम पर्फोलिएटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा :-
ट्रिओस्टियम पर्फोलिएटम औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
ट्रिटिकम-ऐग्रोपाइरन रेपेन्स TRITICUM-AGROPYRON REPENA
ट्रिटिकम ऐग्रोपाइरन रेपेन्स औषधि का प्रयोग अनेक प्रकार के शारीरिक लक्षणों को दूर करने के लिए किया जाता है परन्तु इस औषधि की विशेष क्रिया मूत्राशय पर होती है। यह औषधि मूत्राशय की जलन, पेशाब करने में कठिनाई होना (मूत्रकृच्छ), मूत्राशय की सूजन तथा सुजाक आदि मूत्राशय से सम्बंधित लक्षणों को ठीक करने के लिए किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ट्रिटिकम ऐग्रोपाइरन रेपेन्स औषधि का उपयोग :-
नाक से सम्बंधित लक्षण :- नाक में गुदगुदी होना या ऐसा महसूस होना जैसे नाक में कुछ भरा हुआ है जिसके कारण बार-बार नाक को साफ करना पड़ता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को ट्रिटिकम ऐग्रोपाइरन रेपेन्स औषधि देने से लाभ होता है।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण :- पेशाब का बार-बार आना तथा पेशाब करते समय तेज दर्द होना। पेशाब के साथ रेत के कण आना। पेशाब के साथ सफेद पदार्थ व पीब का आना। पेशाब करने में कठिनाई होना, गुर्दे में जलन होना तथा पुर:स्थग्रंथि का बढ़ जाना। मूत्राशय में जलन होना जो लम्बे समय से चला आ रहा है। पेशाब का अपने आप निकल जाना तथा बार-बार पेशाब करने के बाद भी ऐसा महसूस होना जैसे अभी कुछ पेशाब बाकी रह गया है। पेशाब करने पर घना और श्लैष्मिक झिल्लियों में जलन होना। ऐसे मूत्र सम्बंधी लक्षणों में ट्रिटिकम ऐग्रोपाइरन रेपेन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
तुलना :-
ट्रिटिकम ऐग्रोपाइरन रेपेन्स औषधि की तुलना ट्रेडिस्कैसिया, चिमाफि, सेनेशि, पौप्यूल-टे, बूचू तथा यूवा औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
ट्रिटिकम ऐग्रोपाइरन रेपेन्स औषधि के मूलार्क या 2x लेनी चाहिए।
विशेष :-
ट्रेडिस्कैसिया औषधि को रोगी में उत्पन्न होने वाले कुछ विशेष लक्षणों में दी जाती है जैसे- कान के ऊपरी भाग से खून का निकलना, पेशाब करते समय दर्द होना, पेशाब से खून या पीव आना तथा अण्डकोष में जलन होना आदि।
पौलिट्रिकम जूनिपेरिनम औषधि का प्रयोग ग्राउण्डमांस अर्थात बुढ़ापे के समय पेशाब करने में दर्द होना, गुर्दे में पानी का भरना तथा पेशाब का रुक जाना आदि में किया जाता है।
ट्रौम्बीडियम TROMBIDIUM
ट्रौम्बीडियम औषधि की विशेष क्रिया दस्त से सम्बंधित लक्षणों में होती है। इस औषधि का प्रयोग ऐसे लक्षणो में होता है जिसमें खाने-पीने से रोग बढ़ता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ट्रौम्बीडियम औषधि का उपयोग :-
मलाशय से सम्बंधित लक्षण:- पेट में मरोड़ पड़ना। पेट में उत्पन्न ऐसा दर्द जो मलत्याग करने के बाद भी समाप्त नहीं होता। मलत्याग से पहले और बाद में तेज दर्द होना तथा भोजन करने के बाद दस्त का आना। जिगर में खून एकत्रित होने के साथ बैठने के बाद उठने पर अचानक तरल मल का आ जाना। कत्थई, पतला तथा खून मिला हुआ मल आने के साथ ऐंठन होना। मलत्याग करने के दौरान बाईं ओर तेज दर्द होना जो नीचे की ओर दौड़ता हुआ महसूस होता है। मलद्वार में जलन होना। इस तरह के मल से सम्बंधित लक्षणों में ट्रौम्बीडियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा :-
ट्रौम्बीडियम औषधि की 6 से 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
टिस्सलैगो पेटासिटीज TUSSILAGO PETASITES
टिस्सलैगो पेटासिटीज औषधि मुख्य रूप से मूत्राशय से सम्बंधित लक्षणों पर क्रिया करती है जिसके फलस्वरूप सूजाक व अन्य मूत्र रोग समाप्त होते हैं। यह औषधि जठरनिर्गम (पीलोरस) से सम्बंधित लक्षण को दूर करती है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टिस्सलैगो पेटासिटीज औषधि का उपयोग :-
मूत्र से सम्बंधित लक्षण :- रोगी को मूत्रनली में ऐसा महसूस होता है जैसे कोई चीज रेंग रही है तो टिस्सलैगो पेटासिटीज औषधि का प्रयोग करना चाहिए। पेशाब करते समय दर्द या जलन होने पर इस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :- सुजाक, पीला गाढ़ा स्राव होना। लिंग का अधिक उत्तेजित होना और साथ ही मूत्रनली में रेंगने जैसा महसूस होना आदि में टिस्सलैगो पेटासिटीज औषधि का प्रयोग करना चाहिए। शुक्र नलिकाओं में दर्द होने पर रोगी को टिस्सलैगो पेटासिटीज औषधि का सेवन कराना चाहिए।
तुलना :-
टिस्सलैगो पेटासिटीज औषधि की तुलना टिस्सलैगो फ्रैग्रैन्स तथा टिस्सलैगो फारफारा औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
टिस्सलैगो पेटासिटीज औषधि का मूलार्क प्रयोग करना चाहिए।
टैक्सस बैकाटा TAXUS BACCATA
टैक्सस बैकाटा औषधि का प्रयोग विभिन्न प्रकार के लक्षणों को समाप्त करने के लिए किया जाता है। त्वचा के सड़ने तथा उससे पीब निकलने के साथ रात के समय त्वचा से अधिक पसीना आना आदि लक्षणों में रोगी को यह औषधि देने से रोग ठीक होता है। इस औषधि का प्रयोग गठिया (जोड़ों का दर्द) तथा पुराने गठिया रोगों में करना लाभकारी होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टैक्सस बैकाटा औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण:- आंखों के अंदर के भागों तथा कनपटी में दाहिनी और दर्द होने के साथ अधिक आंसू का आना आदि लक्षणों में रोगी को टैक्सस बैकाटा औषधि देनी चाहिए। पुतलियां फैली हुई तथा चेहरा फूला हुआ और चेहरे का रंग फीका होना आदि लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण:- आमाशय लाल, गर्म व तीखा होना। जी मिचलाना। पेट की परतें व नाभि के पास दर्द होना, खाने के बाद खांसी आना, पेट की परतों में सुई के चुभने जैसा दर्द होना तथा खाना खाने के बाद भी पेट खाली महसूस होना। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को टैक्सस बैकाटा औषधि का सेवन कराना चाहिए।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण:- त्वचा पर बड़ी, चपटी व खुजलीदार फुंसियां होना। रात के समय त्वचा से बदबूदार पसीना आना। त्वचा पर विषैले फोड़े होना। पैरों का गठिया रोग आदि। ऐसे त्वचा से सम्बंधित लक्षणों में टैक्सस बैकाटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह औषधि त्वचा सम्बंधी लक्षणों में तेजी से क्रिया करती है और उससे सम्बंधित रोगों को समाप्त करती है।
मात्रा :-
टैक्सस बैकाटा औषधि के मूलार्क या 3 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
टार्टैरिकम एसिडम TARTARICUM ACIDUM
टार्टैरिकम एसिडम औषधि के कुछ अंश अंगूर, अनन्नास, खट्ठे साग (सोर्रल) तथा अन्य फलों में पायी जाती है। टार्टैरिकम एसिडम औषधि ठण्ड को समाप्त करती है और खून को साफ करती है। यह औषधि नाक से होने वाले श्लैष्मिक स्रावों को रोकती है व लालास्राव को उत्तेजित करती है। काम करने की इच्छा न करना तथा अधिक आलस्य आना, अधिक कमजोरी के साथ दस्त का बार-बार आना तथा जीभ का सूखकर कत्थई रंग की हो जाना आदि लक्षणों में टार्टैरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग किया जाता है। एड़ियों में दर्द होने पर इस औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टार्टैरिकम एसिडम औषधि का उपयोग :-
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- रोगी को अधिक प्यास लगना, बार-बार उल्टी आना, गले व पाकाशय में जलन होना, भोजन का पाचन ठीक से न होना तथा अधिक मात्रा में श्लैष्मिक स्राव होना आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए टार्टैरिकम एसिडम औषधि का सेवन कराना चाहिए।
पेट से सम्बंधित लक्षण:- नाभि के चारों ओर और नितम्ब (हिप्स) के पास दर्द होना। कॉफी के रंग की तरह दस्त का आना, जीभ कत्थई व सूखी हुई होना तथा गहरे हरे रंग की उल्टी होना आदि लक्षणों में टार्टैरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
मात्रा :-
टार्टैरिकम एसिडम औषधि के 3 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। विशुद्ध एसिड के लगभग 2 ग्राम की मात्रा पानी में मिलाकर दी जा सकती है।
टेरीबिन्थिना TEREBINTHINA
टेरीबिन्थिना औषधि खून को प्रवाहित करने वाली श्लैष्मिक झिल्लियों पर तेजी से क्रिया करती है जिससे श्लैष्मिक झिल्लियों में उत्पन्न होने वाले सभी रोग समाप्त होते हैं। यह औषधि शरीर के किसी भी अंग से होने वाले रक्तस्राव को रोकती है विशेषकर मूत्र से होने वाले रक्तस्राव को। इस औषधि के प्रयोग से पेट फूलना तथा मूत्राशय सम्बंधी बीमारियां समाप्त होती है। गुर्दे में जलन होने के साथ गुर्दे से खून का निकलना, गुर्दे का ठीक से काम न करना (निष्क्रिय), गुर्दे से बदबूदार स्राव होना, गुर्दे में पानी का भरना तथा गुर्दे में जलन होना आदि लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। अधिक नींद आना तथा पेशाब करते समय मूत्राशय में दर्द होना आदि में यह औषधि देने से लाभ होता है। कोमा की अवस्था में तथा अटूट शीतदंश रोग में भी इसका प्रयोग लाभकारी है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टेरीबिन्थिना औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण :- यदि सिरदर्द होने के साथ रोगी को सिर पर दबाव व भारीपन महसूस होता है। सिर दर्द होने के साथ सिर के चारो ओर कुछ बांधने जैसा महसूस होता है। चक्कर आना व अचानक आंखों के आगे अंधेरा छा जाना। रोगी को हमेशा थकावट रहती है और उसका मन स्थिर नहीं रहता है। नाक में जख्म होना एवं नाक से खून आने के साथ होने वाला सिर दर्द। इस तरह के सिर से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टेरीबिन्थिना औषधि देनी चाहिए।
आंखों से सम्बंधित लक्षण:- यदि रोगी के दाईं आंख के ऊपरी पलकों के स्नायुओं में दर्द होता है। आंखों का ऐसे दर्द जो एक आंख व सिर के एक ओर ही उत्पन्न होता है। शराब का अधिक सेवन करने से आंखों का कमजोर होना और ठीक से दिखाई न देना आदि लक्षणों में टेरीबिन्थिना औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण :- रोगी में ऐसे लक्षण दिखाई देते हैं जिसमें उसे अपनी ही आवाज अपने कानों में गूंजती महसूस होती है। उसको कानों में शंख की आवाज सुनाई देती रहती और जब कोई उसके पास अधिक जोर से बोलता है या कोई अन्य प्रकार की आवाज होती है तो उसके कानों में दर्द होने लगता है। ऐसे लक्षणों में टेरीबिन्थिना औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। इस औषधि का प्रयोग कान में दर्द होने पर भी करना लाभकारी होता है।
सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- सांस लेने में परेशानी होना तथा फेफड़े फूले हुए महसूस होना, खांसने पर खांसी के साथ खून के छींटे निकलना तथा बलगम के साथ खून आना। थूकने पर थूक के साथ खून आना, सांस जल्दी-जल्दी चलना या दम फूलना तथा वायु नली में जलन होना। वायुनली में किसी प्रकार का रोग होना तथा दमा रोग आदि लक्षणों में रोगी को टेरीबिन्थिना औषधि देनी चाहिए।
हृदय से सम्बंधित लक्षण :- यदि रोगी की नाड़ी की गति तेज हो गई हो और धड़कन की गति बढ़ गई हो, नाड़ी कमजोर, पतली व रुक-रुककर चलती हो। ऐसे लक्षणों में रोगी को टेरीबिन्थिना औषधि देने से रोग ठीक होता है। इस औषधि के प्रयोग से नाड़ी की कमजोरी दूर होती है और नाड़ी की गति सामान्य बनती है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण:- जीभ सूखी, लाल, चमकदार होना तथा जीभ पर दाने होना। जीभ के नोक पर जलन होने के साथ जीभ पर दाने होना। सांस ठण्डी व बदबूदार होना तथा बदबूदार डकारें आना, सांस का रुक-रुककर चलना, सांस लेने में परेशानी, मुंह में छाले होना तथा दान्तों में उत्पन्न रोग आदि मुंह से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टेरीबिन्थिना औषधि देने से रोग ठीक होता है।
गुर्दे से सम्बंधित लक्षण :- गुर्दे में जलन व दर्द होना तथा दाहिने गुर्दे में खिंचाव महसूस होने के साथ खिंचाव नितंब तक फैल जाना आदि लक्षणों में रोगी को टेरीबिन्थिना औषधि का सेवन कराना चाहिए।
पेट से सम्बंधित लक्षण :- पेट में ऐंठन भरा तेज दर्द होना, पेट को ढकने वाली झिल्ली में जलन होना, पेट में तेज दर्द होने के कारण पेट को छूना भी सहन नहीं होता। ऐसे लक्षणों में टेरीबिन्थिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- जी मिचलाना, उल्टी होना तथा अधिजठर में गर्मी महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को टेरीबिन्थिना औषधि देनी चाहिए जिससे उल्टी व मिचलन के साथ पेट की गर्मी दूर होती है।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- चेहरे पर मुंहासे होना। त्वचा की लाल रंग की खुजली वाली फुंसियां व रसबटियों से भरे उदभेद। त्वचा पर लाल रंग के चकत्ते होना तथा बाद में चकत्ते का रंग बैंगनी हो जाना। छपाकी, त्वचा पर नीले रंग के दाग होना तथा त्वचा का सूज जाना। खून की खराबी से उत्पन्न बुखार। एड़ियां फटने के साथ अधिक खुजली और दर्द होना। पेशियों में हल्का-हल्का दर्द होना। ऐसे त्वचा रोगों से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टेरीबिन्थिना औषधि देनी चाहिए।
मल से सम्बंधित लक्षण :- पानी की तरह पतले व हरे रंग का बदबूदार दस्त का बार-बार आना। दस्त के साथ खून का आना। मलत्याग से पहले दर्द होना तथा मल के साथ वायु (गैस) का निकलना तथा वायु निकलने के बाद आराम महसूस करना। दस्त के बाद कमजोरी महसूस होना आदि मल से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टेरीबिन्थिना औषधि देने से रोग ठीक होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण :- बुखार में प्यास का अधिक लगना, जीभ का सूख जाना तथा शरीर से ठण्डा व चिपचिपा पसीना आना आदि बुखार के लक्षणों में टेरीबिन्थिना औषधि का प्रयोग करें। सन्निपात बुखार के साथ पेट का फूल जाना तथा बुखार के साथ जड़िमा, प्रलाप (रोना-धोना) व उदासी उत्पन्न होना आदि बुखार रोग के लक्षणों में रोगी को टेरीबिन्थिना औषधि देनी चाहिए।
आंतों से सम्बंधित लक्षण :- आंतों से खून का आना। पेट में साधारण कीड़े या गोल कीड़े का होना। पेट में पानी का भरना तथा पेट व मलद्वार के बीच भाग में सूजन होना। मलत्याग करने के बाद रोगी में बेहोशी उत्पन्न होना। आन्त में जलन होना तथा आंतों से खून आने के साथ आंतों में घाव का बनना आदि लक्षणों में टेरीबिन्थिना औषधि का प्रयोग करें। यह औषधि इन लक्षणों में तेजी से क्रिया करके रोगों को समाप्त करती है।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण :- पेशाब करने में कष्ट होने के साथ पेशाब के साथ खून का आना। पेशाब का रुक-रुक कर आना। मूत्रनली में जलन होना। पेशाब कॉफी की तरह गंदा आना। पेशाब का बूंद-बूंद कर टपकना। पेशाब का कम मात्रा में आना, पेशाब का रुक जाना तथा पेशाब से बनफ्शे के फूल की तरह गंध आना आदि मूत्र रोग के लक्षणों में रोगी को टेरीबिन्थिना औषधि देने से रोग ठीक होता है। मूत्रनली में सूजन व दर्द होना। पेशाब करते समय ऐंठन सा दर्द होना तथा पेशाब का अधिक मात्रा में आना। लिंग का उत्तेजित होना तथा किसी भी बड़े रोग के बाद गुर्दे में जलन होना व लगातार ऐंठन होना आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी को टेरीबिन्थिना औषधि देनी चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण:- प्रसव के समय गर्भाशय के पास तेज जलन होना। जरायु में जलन महसूस होना, बच्चे जन्म देने के बाद पेट की सूजन। प्रसव के बाद योनि से तरल या क्षारीय बदबूदार स्राव होना। मासिकस्राव समाप्त होने के बाद योनि से खून का आना तथा गर्भाशय में जलन महसूस होना आदि स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षणों में टेरीबिन्थिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इस औषधि के प्रयोग मासिकधर्म सम्बंधी सभी परेशानियां दूर होती हैं।
तुलना :-
टेरीबिन्थिना औषधि की तुलना ऐलूमेन, आर्नि, आर्स, कैन्थ, लैक और नाइट्रि-एसिड से की जाती है।
मात्रा :-
टेरीबिन्थिना औषधि की 1 से 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
टर्मिनैलिसर अर्जुना TERMINALIA ARJUNA
टर्मिनैलिया अर्जुना औषधि अनेक प्रकार के रोगों को समाप्त करती है। हृदय रोग, हृच्छूल (एंजिना पेक्टोरीस), घुटन महसूस होना व चक्कर आना, शारीरिक व मानसिक रोगों तथा चोट लगने या ऊपर से गिरने के कारण हड्डी टूट जाना आदि रोगों में टर्मिनैलिया अर्जुना औषधि का प्रयोग किया जाता है। गिर जाने के कारण पूरे शरीर पर दर्द में यह औषधि उपयोग की जाती है। यह औषधि शुक्रमेह (वीर्य पाता) तथा सूजाक जैसे रोग में भी लाभकारी होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टर्मिनैलिया अर्जुना औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- मानसिक रूप से रोगी का स्वभाव बदल जाना तथा स्नायविक लक्षणों में रोगी को टर्मिनैलिया अर्जुना औषधि देने से रोग ठीक होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिरदर्द व चक्कर आना आदि लक्षणों में रोगी को टर्मिनैलिया अर्जुना औषधि देने से रोग ठीक होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण :- यदि रोगी के कान में घण्टी की तरह आवाज सुनाई देता हो तो टर्मिनैलिया अर्जुना औषधि का सेवन करें।
मुंह से सम्बंधित लक्षण :- मुंह का स्वाद कड़ुवा होने पर टर्मिनैलिया अर्जुना औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
मूत्र रोग से सम्बंधित लक्षण :- यदि रोगी को पेशाब कम मात्रा में आने पर रोगी को टर्मिनैलिया अर्जुना औषधि लेनी चाहिए।
हृदय से सम्बंधित लक्षण :- हृदय की धड़कन तेज हो जाने, हृच्छूल, हृदय में कमजोरी व दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को टर्मिनैलिया अर्जुना औषधि लेनी चाहिए।
मात्रा :-
टर्मिनैलिया अर्जुना औषधि का मूलार्क या 3X शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
टियूक्रियम मैरम TEUCRIUM MARUM
टियूक्रियम मैरम औषधि अनेक प्रकार के रोग को दूर करती है परन्तु इस औषधि की क्रिया विशेष रूप से नाक और मलाशय से सम्बंधित लक्षणों में होती है। बच्चों की बीमारियों में टियूक्रियम मैरम औषधि का सेवन दूसरी औषधि के सेवन के बाद करने से अधिक लाभ होता है। रोगी के रोगग्रस्त स्थान के पास हल्का सा छू जाने से भी तेज दर्द होता है। रोगी हमेशा अपने अंगों को फैलाने की इच्छा करता रहता है। ऐसे लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
इस औषधि को नाक की पुरानी सर्दी-जुकाम के साथ उत्पन्न शीर्णता तथा नाक में दुर्गन्धित पपड़ियां और झांवें जम जाने पर किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टियूक्रियम मैरम औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण:- यदि रोगी के सिर में उत्तेजना पैदा होने के साथ सिर में कंपन महसूस होती है। ऐसा सिरदर्द जो झुकने से और तेज होता है। इस तरह के सिर दर्द के लक्षणों में टियूक्रियम मैरम औषधि लेनी चाहिए। यह औषधि सकम्प प्रलाप के बाद मस्तिष्क को शक्तिशाली बनाती है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण:- आंखों के कोनों (कैन्थी) में चसचसाहट महसूस होना। पलकें लाल व सूज जाना तथा पलकों में गांठें पड़ जाना आदि लक्षणों में रोगी को टियूक्रियम मैरम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण:- यदि रोगी के कानों में हिस-हिस और घंटी की आवाज सुनाई देने के साथ कानों में दर्द होता हो तो ऐसे लक्षणों में रोगी को टियूक्रियम मैरम औषधि का सेवन करना चाहिए।
नाक से सम्बंधित लक्षण :- नाक से स्राव होना तथा नाक से बलगम निकलने के साथ नाक में फोड़े होना। पुराने सर्दी-जुकाम, सांसों से बदबू आना, नाक के नथूनों में कुछ रेंगने जैसा महसूस होना, अधिक छींकें आना, आंखों से पानी आना तथा अधिक सर्दी लगने के कारण नाक का बन्द हो जाना आदि नाक से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टियूक्रियम मैरम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- अधिक मात्रा में काले व हरे रंग की उल्टी होना। हमेशा हिचकी आने के कारण पीठ में दर्द होना। भूख का अधिक लगना तथा स्तनपान कराने के बाद खाते समय स्त्रियों को हिचकीयां आना आदि लक्षणों में टियूक्रियम मैरम औषधि का सेवन करना चाहिए।
सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- सूखी खांसी आने के साथ रोगी की सांस नली में गुदगुदी होना। खांसी के साथ बलगम आना तथा खखारकर बलगम को निकालते समय गले में उबसने जैसा स्वाद होना। खखार के साथ अधिक मात्रा में बलगम का आना आदि सांस सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टियूक्रियम मैरम औषधि देनी चाहिए।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- हाथों की अंगुलियों की नोकों और पैर की अंगुलियों के जोड़ों में फुंसियां होना। हाथ और पैरों में फाड़ता हुआ दर्द होना। पैर की अंगुलियों के नाखूनों में दर्द होता रहता है तथा रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसके नाखून मांस में गड़ गए हो। ऐसे लक्षणों में रोगी को टियूक्रियम मैरम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
मलाशय से सम्बंधित लक्षण :- मलद्वार में खुजली होना तथा रात के समय बिस्तर पर लेटने पर मलद्वार में जलन होना। मलाशय में कीड़े होने के कारण रोगी में बेचैनी उत्पन्न होना तथा मलत्याग करने के बाद मलद्वार में कुछ रेंगने जैसा महसूस होना। इस तरह के मलाशय से सम्बंधी लक्षणों में रोगी को टियूक्रियम मैरम औषधि देनी चाहिए। यह औषधि मलाशय सम्बंधी लक्षणों में तीव्र क्रिया करके रोगों को समाप्त करती है।
नींद से सम्बंधित लक्षण:- नींद न आने के साथ ही कंपन होना तथा रात को सोने पर घुटन महसूस होने के कारण डर जाना तथा चौंककर नींद से उठना आदि लक्षणों में रोगी को टियूक्रियम मैरम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- त्वचा पर खुजली होना तथा खुजली होने के कारण रात भर खुजाना और बार-बार करवटें बदलते रहना आदि लक्षणों में रोगी को टियूक्रियम मैरम औषधि देनी चाहिए। इसके अतिरिक्त त्वचा का सूख जाना, नाखूनों में सड़ जाना और उसमें पीब का बनना (सुप्युरेटींग ग्रोवेज) आदि लक्षणों में रोगी को टियूक्रियम मैरम औषधि देने से लाभ होता है।
तुलना :-
टियूक्रियम मैरम औषधि की तुलना टियूक्रियम स्कोरोडोनिया, सीना, इग्ने , सैग्वी तथा सिलीका औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
टियूक्रियम मैरम औषधि के 1 से 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। नाक पर फोड़ें होने पर इस औषधि के सूखे पॉउडर का प्रयोग करना अधिक लाभकारी होता है।
विशेष :-
टियूक्रियम स्कोरोडोनिया वूडसेज औषधि का प्रयोग रोगी में उत्पन्न कुछ विशेष लक्षणों किया जाता है जैसे- टी.बी. रोग में पीब वाले बलगम का बनना। पेट का फुलना। अण्डकोष में जलन होना तथा टी.बी. रोग से ग्रस्त रोगी के आधे अण्डकोष की सूजन विशेषकर युवकों में तथा ऐसे व्यक्तियों में जो फेफड़ों या गिल्टियों की टी.बी से पीड़ित रहता है। मूत्र सम्बंधी रोगों में टियूक्रियम मैरम औषधि के 3X का प्रयोग किया जाता है।
थैलियम THALLIUM
थैलियम औषधि को होमियोपैथि चिकित्सा शास्त्रों की विधि से थैलियम धातु से बनाई जाती है। यह औषधि शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों में तेजी से क्रिया करके उससे सम्बंधित रोग को समाप्त करती हैं। यह औषधि अन्त:स्त्रावी ग्रंथियों में विशेष रूप से अवटु (थाइरोईड) और अधिवृक्क ग्रिन्थ पर प्रभाव डालती है जिसके परिणाम स्वरूप तेज स्नायुओं का दर्द, ऐंठन सा दर्द तथा गोली लगने जैसा दर्द आदि दूर होता है। इस औषधि के प्रयोग से पेशी की सूजन, शारीरिक कंपन तथा प्रेरणज गतिभंग में होने वाले तेज दर्द को ठीक करती है। इसके अतिरिक्त नीचे के अंगों में लकवा मार जाना, आमाशय व आंतों में झटकेदार दर्द होना, तेज पागलपन वाले रोग के बाद बालों का झड़ना तथा रात को अधिक पसीना आना आदि रोगों को ठीक करने के लिए थैलियम औषधि का प्रयोग किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग बहुतंत्रिका की सूजन तथा रस द्वारा पोषण आदि की हानि को दूर करने के लिए किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थैलियम औषधि का उपयोग :-
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के हाथ-पैर तथा पूरे शरीर में कंपकंपी होती रहती है तथा उसे ऐसा महसूस होता है कि उसके पूरे शरीर में लकवा मार गया है। अंगों में काटता हुआ दर्द होने के साथ झटके जैसा महसूस होना। रोगी को अत्यधिक शारीरिक थकान रहती है। लम्बे समय से चले आ रहे मेरुमज्जा की सूजन। हाथ और पैरों की अंगुलियों की ऐसी सूजन जो ऊपर से फैलते हुए धीरे-धीरे नीचे की ओर नाभि तक पहुंच जाता है। नीचे के अंगों में लकवा मार जाना। बाहरी अंगों के नीला पाण्डु (साइनोसिस) रोग। हाथों की अंगुलियों में कुछ रेंगने जैसा महसूस होता है जो धीरे-धीरे फैलते हुए नाभि, मलद्वार तथा जांघों से होते हुए पैरों तक पहुंच जाती है। इस तरह के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए थैलियम औषधि का सेवन करना चाहिए।
तुलना :-
थैलियम औषधि की तुलना लैथीरस, कास्टि, आर्जेन्ट-ना और प्लम्बमा औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
थैलियम औषधि के निम्न शक्ति का चूर्ण या 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
थैस्पियम औरियम-जिजिया THASPIUM AUREUM-ZIZIA
थैस्पियम औरियम-जिजिया औषधि का प्रयोग विभिन्न प्रकार के लक्षणों को समाप्त करने के लिए किया जाता है। यह औषधि स्त्री में उत्पन्न हिस्टीरिया रोग तथा मिर्गी के दौरे आदि को ठीक करती है। लास्य (नाचना) तथा मन में उत्पन्न ऐसे भ्रम रोग जिसमें रोगी को ऐसा लगता है कि उसे कोई रोग हो गया है। ऐसे लक्षण वाले रोगों को ठीक करने के लिए थैस्पियम औरियम-जिजिया औषधि का प्रयोग किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थैस्पियम औरियम- जिजिया औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- जब किसी रोगी का मस्तिष्क असन्तुलित हो जाता है तो उसमें कई प्रकार के बुरे सोच उत्पन्न हो जाने लगते हैं जैसे- रोगी को कभी-कभी आत्महत्या करने का मन करता रहता है तथा वह अपने जीवन से बिल्कुल निराश रहता है। रोगी को कभी हंसने व कभी रोने का मन करता रहता है। ऐसे मानसिक रोग से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए थैस्पियम औरियम-जिजिया औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- कपाल के ऊपरी भाग में दर्द होना, दाईं कनपटी में दबाव महसूस होना तथा पीठ में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को थैस्पियम औरियम-जिजिया औषधि देने से रोग समाप्त होता है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :- सम्भोग क्रिया (सेक्स) के बाद अधिक आलस्य आना। सम्भोग क्रिया की अधिक इच्छा होना आदि लक्षणों में रोगी को थैस्पियम औरियम-जिजिया औषधि देनी चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :- यदि बाएं डिम्बकोष में रुक-रुककर दर्द होता हो। अधिक मात्रा में तीखा प्रदर-स्राव होता है और मासिकधर्म समय से नहीं आता है। इस तरह के स्त्री रोग के लक्षणों में थैस्पियम औरियम-जिजिया औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- सूखी खांसी के साथ छाती में सुई चुभने जैसा दर्द होना तथा सांस लेने में परेशानी आदि सांस सम्बंधित लक्षणों में थैस्पियम औरियम-जिजिया औषधि का सेवन करना चाहिए।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- हाथ-पैरों या पूरे शरीर में थकावट महसूस होती रहती है। पैरों को चलाने का मन करता है तथा रोगी नींद में भी पैर को चलाता रहता है। बांहों में सुन्नता के साथ कंपन होना। इस तरह के लक्षणों में रोगी को थैस्पियम औरियम-जिजिया औषधि देने से रोग समाप्त होता है।
वृद्धि :-
नींद में रोग बढ़ता है।
तुलना :-
थैस्पियम औरियम-जिजिया औषधि की तुलना एगारि, स्ट्रामो, टारेन्टु, सिक्यूटा या एथूजा औषधि की जाती है।
मात्रा :-
थैस्पियम औरियम-जिजिया औषधि के मूलार्क या 3 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
थीआ THEA
थीआ औषधि का प्रयोग स्नायविक अनिद्रा (नींद का न आना), हृदय की धड़कन की गति बढ़ जाना तथा अधिक चाय पीने के कारण होने वाले पुराने रोगो को दूर करने के लिए किया जाता है। रोगी को अधिक मात्रा में उल्टी होने के साथ तेज सिर दर्द होने पर जल्दी लाभ के लिए इस औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी माना गया है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थीआ औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के ऐसे मानसिक लक्षण जिसमें रोगी अपने-आप में ही खुश रहता है तथा वह मानसिक रूप से बदमिजाज हो जाता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को थीआ औषधि देने से रोग ठीक होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- यदि उल्टी होने के साथ सिर दर्द होता हो तथा दर्द सिर के एक स्थान पर शुरू होकर धीरे-धीरे पूरे सिर में फैल जाता है। ऐसे लक्षणों में थीआ औषधि का प्रयोग करना चाहिए। सिर के पिछले भाग में ठण्ड व भीगा हुआ महसूस होने पर इस औषधि का प्रयोग करें।
नींद से सम्बंधित लक्षण:- नींद ठीक से न आती हो तथा नींद में डरावने सपने आने के कारण अचानक डरकर उठ जाता हो तो ऐसे लक्षणों में रोगी को थीआ औषधि देने से लाभ होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण :- रोगी की कानों में अनेक प्रकार के अजीब-अजीब आवाज सुनाई देने पर थीआ औषधि का सेवन करें।
हृदय से सम्बंधित लक्षण:- हृदय में दबाव महसूस होना। पूरे हृदय में दर्द होना। हृदय में कंपन होने के कारण बाईं करवट सोने में कठिनाई होना। छातीं में फड़फड़ाहट महसूस होना। नाड़ी की गति तेज होना तथा नाड़ी का रुक-रुककर चलना आदि हृदय से सम्बंधित लक्षणों में थीआ औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि पाकाशय के ऊपर का भाग अन्दर की ओर धंस गया हो। आमाशय में बेहोशी व खालीपन जैसा महसूस होता रहता है। खट्टा पदार्थ खाने की अधिक इच्छा करती है तथा अधिक मात्रा में मलद्वार से वायु निकलता है। ऐसे आमाशय से सम्बंधित लक्षणों से पीड़ित रोगी को थीआ औषधि का सेवन कराना चाहिए।
पेट से सम्बंधित लक्षण:- पेट में गड़गड़ाहट होना तथा आंतों के अपने स्थान से हटने आदि लक्षणों में रोगी को थीआ औषधि देने से रोग ठीक होता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण:- डिम्बकोषों में घाव, दर्द व छूने से दर्द होना आदि लक्षणों में थीआ औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बंधित लक्षण:- नींद का अधिक आना साथ ही खून का संचार करने वाली नाड़ियों में उत्तेजना और अस्थिरता पैदा होना तथा त्वचा का सूख जाना आदि लक्षण वाले नींद रोग में रोगी को थीआ औषधि देने से नींद का अधिक आना कम होता है। नींद के ऐसे लक्षण जिसमें रोगी एक बार यदि सो जाए तो भयंकर सपने आने पर भी वे अपने नींद से नहीं उठता है। ऐसे में रोगी को यह औषधि उपयोग करनी चाहिए।
वृद्धि :-
रात के समय, खुली हवा में रहने से तथा भोजन करने के बाद रोग बढ़ता है।
शमन :-
गर्म कमरे में रहने से तथा गर्म पानी से नहाने पर रोग में आराम मिलता है।
तुलना :-
थीआ औषधि की तुलना थूजा, फेरम तथा काली-हाइड्र औषधि से की जाती है।
प्रतिविष :-
टाबैकम औषधि का उपयोग थीआ औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा :-
थीआ औषधि की 3, 30 से 200 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
थीआ THEA
थीआ औषधि का प्रयोग स्नायविक अनिद्रा (नींद का न आना), हृदय की धड़कन की गति बढ़ जाना तथा अधिक चाय पीने के कारण होने वाले पुराने रोगो को दूर करने के लिए किया जाता है। रोगी को अधिक मात्रा में उल्टी होने के साथ तेज सिर दर्द होने पर जल्दी लाभ के लिए इस औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी माना गया है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थीआ औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के ऐसे मानसिक लक्षण जिसमें रोगी अपने-आप में ही खुश रहता है तथा वह मानसिक रूप से बदमिजाज हो जाता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को थीआ औषधि देने से रोग ठीक होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- यदि उल्टी होने के साथ सिर दर्द होता हो तथा दर्द सिर के एक स्थान पर शुरू होकर धीरे-धीरे पूरे सिर में फैल जाता है। ऐसे लक्षणों में थीआ औषधि का प्रयोग करना चाहिए। सिर के पिछले भाग में ठण्ड व भीगा हुआ महसूस होने पर इस औषधि का प्रयोग करें।
नींद से सम्बंधित लक्षण:- नींद ठीक से न आती हो तथा नींद में डरावने सपने आने के कारण अचानक डरकर उठ जाता हो तो ऐसे लक्षणों में रोगी को थीआ औषधि देने से लाभ होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण :- रोगी की कानों में अनेक प्रकार के अजीब-अजीब आवाज सुनाई देने पर थीआ औषधि का सेवन करें।
हृदय से सम्बंधित लक्षण:- हृदय में दबाव महसूस होना। पूरे हृदय में दर्द होना। हृदय में कंपन होने के कारण बाईं करवट सोने में कठिनाई होना। छातीं में फड़फड़ाहट महसूस होना। नाड़ी की गति तेज होना तथा नाड़ी का रुक-रुककर चलना आदि हृदय से सम्बंधित लक्षणों में थीआ औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि पाकाशय के ऊपर का भाग अन्दर की ओर धंस गया हो। आमाशय में बेहोशी व खालीपन जैसा महसूस होता रहता है। खट्टा पदार्थ खाने की अधिक इच्छा करती है तथा अधिक मात्रा में मलद्वार से वायु निकलता है। ऐसे आमाशय से सम्बंधित लक्षणों से पीड़ित रोगी को थीआ औषधि का सेवन कराना चाहिए।
पेट से सम्बंधित लक्षण:- पेट में गड़गड़ाहट होना तथा आंतों के अपने स्थान से हटने आदि लक्षणों में रोगी को थीआ औषधि देने से रोग ठीक होता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण:- डिम्बकोषों में घाव, दर्द व छूने से दर्द होना आदि लक्षणों में थीआ औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बंधित लक्षण:- नींद का अधिक आना साथ ही खून का संचार करने वाली नाड़ियों में उत्तेजना और अस्थिरता पैदा होना तथा त्वचा का सूख जाना आदि लक्षण वाले नींद रोग में रोगी को थीआ औषधि देने से नींद का अधिक आना कम होता है। नींद के ऐसे लक्षण जिसमें रोगी एक बार यदि सो जाए तो भयंकर सपने आने पर भी वे अपने नींद से नहीं उठता है। ऐसे में रोगी को यह औषधि उपयोग करनी चाहिए।
वृद्धि :-
रात के समय, खुली हवा में रहने से तथा भोजन करने के बाद रोग बढ़ता है।
शमन :-
गर्म कमरे में रहने से तथा गर्म पानी से नहाने पर रोग में आराम मिलता है।
तुलना :-
थीआ औषधि की तुलना थूजा, फेरम तथा काली-हाइड्र औषधि से की जाती है।
प्रतिविष :-
टाबैकम औषधि का उपयोग थीआ औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा :-
थीआ औषधि की 3, 30 से 200 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
थेरीडियम THERIDION
थेरीडियम औषधि को स्नायविक चेतना बनाए रखने के लिए लाभकारी माना गया है। इस औषधि के लक्षण और टी.बी. रोग से सम्बंधित लक्षण दोनों ही समान होते हैं। अत: इस औषधि का प्रयोग टी.बी. रोग में करने से यह औषधि टी.बी. से सम्बंधित लक्षणों में तेजी से क्रिया करके रोग को समाप्त करती है। यह औषधि चक्कर आना, उल्टी आने के साथ सिरदर्द होना तथा हृदय के चारों ओर दर्द होना आदि को ठीक करती है। यह औषधि खून जमा होने के साथ उत्पन्न टी.बी. रोग तथा गण्डमाला रोग को ठीक करती है। इसके अतिरिक्त शोर-शराबे को सहन न कर पाना तथा शोर-शराबे में जाने पर ऐसा महसूस होना मानो आवाज की एक तेज तरंग शरीर में घुस गई हो विशेषकर दांतों में यह महसूस अधिक होता। शोर-शराबे से रोगग्रस्त अंग अधिक प्रभावित होते हैं। अत: ऐसे लक्षणों में थेरीडियम औषधि का प्रयोग किया जाता है। हडि्डयों के विकार, हड्डी के टी.बी. रोग, हडि्डयों का गलना। टी.बी. रोग के साथ बाएं फेफड़े के ऊपरी भाग में सुई चुभने जैसा दर्द होना आदि लक्षणों में इसका प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थेरीडियम औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- रोगी का मन असन्तुलित होने के कारण रोगी का स्वभाव बदलने लगता है। वह हमेशा अशांत रहता है तथा छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाता है। रोगी को किसी भी चीज से आनन्द नहीं मिलता तथा उसे ऐसा लगता रहता है जैसे कि समय बहुत तेजी से बीत रहा है। ऐसे मानिसक लक्षणों से पीड़ित रोगी को थेरीडियम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द होता रहता है तथा दर्द इतना संवेदनशील होता है कि फर्श पर भी चले तो दर्द बढ़ जाता है। सिर चकराने के कारण थोड़ी दूर भी चला नहीं जाता तथा चलने की कोशिश करने पर जी मिचलाने लगता है और उल्टी शुरू हो जाती है। आंखों को बंद करने पर चक्कर व उल्टी के लक्षण अधिक दिखाई पड़ते हैं। ऐसे लक्षणों में रोगी को थेरीडियम औषधि का सेवन करना चाहिए।
आंखों से सम्बंधित लक्षण :- आंखों के सामने सफेद रंग का प्रकाश तरंग दिखाई देना तथा तेज प्रकाश में देखने से परेशानी होना। आंखों के गोलक के पीछे दबाव महसूस होना। बाईं आंखों के ऊपर कंपन होना। इस तरह के आंखों से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को थेरीडियम औषधि देने से रोग समाप्त होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण :- यदि रोगी के नाक से पीले रंग का बदबूदार बलगम अधिक मात्रा में निकलता हो तो थेरीडियम औषधि का सेवन करें। नाक के उपरोक्त लक्षणों मे इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- समुद्र के किनारे रहने वाले लोग जब समुद्री पानी का प्रयोग करते हैं तो समुद्री पानी के कारण आमाशय रोगग्रस्त हो जाता है जिससे रोगी को उल्टी आने लगती है। ऐसे लक्षणों को दूर करने के लिए थेरीडियम औषधि लेनी चाहिए। यदि रोगी को आंख बंद करने पर चक्कर व उल्टी आती है। बाईं ओर प्लीहा के सामने ऊपर की ओर डंक मारने जैसा दर्द होता है तथा जिगर में जलन होता है तो ऐसे आमाशय के लक्षणों में रोगी को थेरीडियम औषधि देने से रोग समाप्त होता है।
सांस संस्थान सम्बंधित लक्षण :- बाईं छाती में दर्द होना। हृदय में उत्तेजना व दर्द होना। बाईं छाती के पेशी में दर्द होने के साथ ऐसा महसूस होना जैसे छाती की पेशी को कोई नोच रहा है। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लिए थेरीडियम औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण :- कशेरुकाओं के बीच उत्पन्न दर्द या दबाव को सहन न कर पाने की शक्ति। रीढ़ की हड्डी में दबाव सहन न कर पाने की शक्ति तथा किसी जीव के काटने के कारण विष फैलने से उत्पन्न पीड़ा आदि को दूर करने के लिए थेरीडियम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- त्वचा पर डंक मारने व चुभनयुक्त दर्द होना। त्वचा पर खुजली महसूस होना तथा जांघों की शक्ति कम होना आदि लक्षणों में रोगी को थेरीडियम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
वृद्धि :-
रोगग्रस्त अंगों को छूने से, दबाव देने से, जहाज पर, गाड़ी में सवारी करने से, आंखों को बंद करने से, धक्का लगने से, शोर-शराबे से तथा बाईं ओर घूमने से रोग बढ़ता है।
शमन :-
गर्मी से तथा लू लगने से सिर दर्द में आराम मिलता है।
तुलना :-
थेरीडियम औषधि की तुलना कैल्केरिया और लाइको औषधि से की जाती है। इन औषधियों का प्रयोग थेरीडियम औषधि से पहले करने से रोग में जल्द लाभ होता है।
मात्रा :-
थेरीडियम औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
थिओसिनामीनम-रोडैलिन THIOSINAMINUM-RHODALLIN
तिल के तेल से निकलने वाली एक विशेष प्रकार के रसायनों को होम्योपैथिक तरीके से थिओसिनामीनम-रोडैलिन औषधि तैयार की जाती है। इस औषधि का प्रयोग विभिन्न प्रकार के रोगों में उत्पन्न लक्षणों को समाप्त करने के लिए किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग दोनों प्रकार से की जा सकती है- बाहरी प्रयोग (लगाना) और सेवन करना। यह औषधि घाव या जख्म के निशान पड़ने, फोड़े होने तथा ग्रंथियों के फैल जाने पर उपयोग में लाई जाती है। पलकों का बाहर की ओर उलट जाना या कनीनिका के आर-पार दिखाई देना, मोतियाबिन्द, जोड़ों में खिंचाव, सूत्रार्बूद (फोड़े से सूत की तरह कीड़े निकलना), त्वचा में खिंचाव होना आदि लक्षणों को ठीक करने के लिए थिओसिनामीनम-रोडैलिन औषधि का प्रयोग किया जाता है। कान में आवाज गूंजना आदि लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। कशेरुका मज्जाक्षय (कशेरुका मज्जा का टी.बी. रोग) में झटके की तरह दर्द होने पर इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह औषधि पाकाशय, मूत्राशय तथा मलाशय से सम्बंधित रोगों की अंतिम अवस्था में रोग को ठीक करने के लिए थिओसिनामीनम-रोडैलिन औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह औषधि 120 ग्राम की मात्रा में लेनी चाहिए।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थिओसिनामीनम- रोडैलिन औषधि का उपयोग :-
कान से सम्बंधित लक्षण:- इस औषधि का प्रयोग धमनी में खिंचावयुक्त चक्कर आना। कान में आवाज गूंजना। प्रतिश्यायी बहरापन के साथ घाव या जख्म की तरह कान का मोटा हो जाना। कान की परते मोटी होना। स्नायु में किसी सौत्रिक परिवर्तन के कारण बधिरता। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को थिओसिनामीनम-रोडैलिन औषधि का सेवन कराना चाहिए।
मात्रा :-
ग्लिसरीन और पानी मिला हुआ 10% द्रव्य को 15 से 30 बूंदों की मात्रा में सप्ताह में 2 बार देनी चाहिए। कठिन धमनीकाठिन्य उपसर्गों में 65 या 120 ग्राम की मात्रा में प्रतिदिन 3 बार प्रयोग करें। चक्कर आने और जोड़ों में जलन होने पर 2X मात्रा का प्रयोग करें।
थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला THLASPI BURSA PASTORIS-CAPSELLA
थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि स्त्री रोग से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों में तीव्र क्रिया करती है और रोग को समाप्त करती है। यह औषधि विशेष रूप से रक्तस्राव (खून के बहाव) को रोकती है और पेशाब में यूरिक एसिड की मात्रा को नष्ट करती है। इस औषधि का प्रयोग गर्भकाल के समय योनि से सफेद पदार्थ का निकलना तथा लम्बे समय से चले आ रहे स्नायुओं के दर्द को समाप्त करने में किया जाता है। गुर्दे और मूत्राशय की जलन। जरायु-सूत्रार्बुद से खून निकलने के साथ पीठ में कुचलन की तरह दर्द होना। स्कन्धफलको के बीच दर्द होना। गर्भाशय से खून स्राव होने के साथ बांयटे पड़ने तथा खून के थक्के निकलना आदि लक्षणों को दूर करने के लिए इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। रोगी में छाछ पीने की तीव्र इच्छा करने तथा दबे हुए जरायु रोगों के कारण हुए हानि आदि को दूर करने के लिए थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का प्रयोग किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का उपयोग :-
सिर व आंखों से सम्बंधित लक्षण :- आंख और चेहरा सूजा हुआ। बार-बार नाक से खून का आना (नकसीर)। चक्कर आने के साथ सिर दर्द होना। कपाल में दर्द होना जो दोपहर के बाद और तेज हो जाता है। कानों के पीछे पपड़ीदार फोड़े-फुंसियां होना। जीभ सफेद व लेपावृत होना। मुंह और होंठ कटे-फटे होना तथा दाहिनी आंख के ऊपर तेज दर्द होने के कारण आंख में ऊपर की ओर खिंचाव महसूस होना। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का प्रयोग कराना चाहिए।
नाक से सम्बंधित लक्षण:- नाक का ऑपरेशन करने से यदि नाक से खून आता हो विशेषकर खराब खून आता हो तो ऐसे लक्षणों में थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस- कैप्सेला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :- चलने या सवारी करने के फलस्वरूप लिंग उत्तेजना के कारण वीर्य का आपने-आप निकल जाना आदि पुरुष रोग के लक्षणों में रोगी को थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि लेनी चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :- स्त्री रोग से सम्बंधित ऐसे लक्षण जिसमें स्त्री को रक्तप्रदर (प्रदर के समय योनि से खून आना) आता है तथा बार-बार अधिक मात्रा में मासिकस्राव होता रहता है। मासिकस्राव के समय गर्भाशय में तेज दर्द होता रहता है। एक मासिकस्राव समाप्त होने के बाद जब दूसरा मासिकस्राव शुरू होता है तो मासिकस्राव के शुरुआती अवस्था में अधिक मात्रा में मासिकस्राव आता है। ऐसे स्त्री रोग सम्बंधित लक्षणों में थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। मासिकधर्म समय से पहले आना तथा मासिकस्राव के बाद प्रदर-स्राव होना, प्रदरस्राव के समय खून का आना, प्रदरस्राव के साथ काला-काला खून के थक्के आने के साथ स्राव से तेज बदबू आना। गर्भाशय में सख्त ऐंठन सा दर्द होना। उठते समय गर्भाशय में दर्द होना। योनि के पास तेज दर्द होना। बच्चे को जन्म देने के समय गर्भाशय में दर्द होना। कभी-कभी मासिकधर्म समाप्त होते ही पुन: मासिकधर्म शुरू हो जाना। इस तरह के मासिकधर्म सम्बंधी सभी परेशानियों में थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का प्रयोग करने से रोग जल्द ठीक होता है। इसके अतिरिक्त मासिकधर्म के कुछ दिन पहले और बाद को स्याह बदबूदार प्रदरस्राव होना आदि लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह औषधि कैंसर रोग के दर्द को ठीक करने में भी प्रयोग होता है।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण :- मूत्र सम्बंधी विभिन्न लक्षण जैसे- पेशाब का बार-बार आना तथा पेशाब भारी व फास्फेट मिला हुआ होना। मूत्राशय की पुरानी सूजन। पेशाब करने में परेशानी तथा पेशाब करते समय दर्द के कारण बेहोशी जैसी अवस्था बन जाना आदि मूत्राशय के लक्षणों में रोगी को थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि लेनी चाहिए। पेशाब के साथ खून का आना, मूत्राशय में पथरी बनना, हल्के झटके लगने पर ही पेशाब का अपने आप निकल जाना, गुर्दे में दर्द होना तथा पेशाब के साथ लाल रेत का कण आना आदि लक्षणों में रोगी को थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का सेवन करना चाहिए। मूत्रनली में जलन होना तथा पेशाब करते समय पेशाब की धार कई भागों में बंटी हुई होना आदि ऐसे लक्षणों में थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
वृद्धि :-
मासिकधर्म के समय, गर्भाकाल में गर्भस्त्राव के बाद, प्रसवकाल में उठने पर, चलने तथा सवारी करने से रोग बढ़ता है।
शमन:-
दबाने से, गर्म चीजो के प्रयोग से, गर्म कमरे में जाने से तथा गर्म सेंक से रोग में आराम मिलता है।
तुलना :-
थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि की तुलना , क्राकस, ट्रिलिय या मिलिफो औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
थ्लास्पी बुर्सा पैस्टोरिस-कैप्सेला औषधि के मूलार्क या 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
थूजा आक्सिडेण्टैलिस THUJA OCCIDETALIS
थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि विभिन्न रोग के लक्षणों को समाप्त करके रोगों को ठीक करती है। इस औषधि की क्रिया विशेष रूप से त्वचा रोग, जठरान्त्रपथ, गुर्दे और मस्तिष्क पर होती है। यह औषधि रोग के कारण उत्पन्न फोड़े-फुंसी, मांसाकुंरों तथा मस्सों जैसे फुंसियों आदि को ठीक करती है। ठण्ड लगने के कारण बलगम के थक्के बनने पर रोगी को यह औषधि लेनी चाहिए। खून निकलने पर कवकगुल्म (फंगस ग्रोव्थस) तथा जतूक व शिराओं के अत्यधिक सूजन आदि में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि की क्रिया त्वचा के अतिरिक्त जननेन्द्रिय पर भी विशेष रूप से होती है। इस औषधि के प्रयोग से जननेन्द्रिय के ऐसे विकृत दशायें उत्पन्न होती है जैसे रक्तदूषित होने के समय होती है। यह औषधि श्लैष्मा तथा त्वचा की परतों पर मस्से जैसे विवर्द्धनों को उत्पन्न हुए गुलर जैसे मस्से और अर्बूदों आदि को ठीक करती है।
थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि में प्रमेह और गोबीज टीका के जीवाणुओं को नष्ट करने वाले लक्षण पाए जाते हैं। इसलिए सूजाक की दबी हुई अवस्था, डिम्बवाहिनियों की सूजन। टीका लगाने के कारण उत्पन्न रोग। प्रमेह-दोष के कारण पेशियों और संधियों में होने वाला दर्द तथा ऐसे लक्षण जिसमें आराम करने पर, सूखे मौसम में, नमी वाले मौसम तथा तर वातावरण में रोग बढ़ता है। ऐसे लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
लंगड़ापन तथा शरीर की ऐसी प्रकृति जिसमें रक्त अस्वाभाविक रूप से अत्यधिक जलयुक्त होता है। अत: भीगी हवा और पानी से उन्हें अत्यधिक कष्ट होता है। तेज थकावट और शीतप्रधान आदि स्थितियों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। चेचक व फुंसियों को जल्दी ठीक करने के लिए, पूतिज्वर को रोकने के लिए, टीकाजनित धातुदोश जैसे कठिन त्वचा रोग तथा स्नायु का दर्द आदि को दूर करने के लिए इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- रोगी का मन हमेशा स्थिर और शांत रहता है। वह किसी से बात करना या मिलना पसन्द नहीं करता। रोगी अपने-आप में ही खोया रहता है तथा उसे अपने आस-पास का कुछ भी ज्ञात नहीं रहता। रोगी को देखने से ऐसा महसूस होता है जैसे उसकी आत्मा और शरीर अलग-अलग है। रोगी को अपने पेट में ऐसा महसूस होता है कि कोई जीवित जीव पेट के अन्दर चल रहा है। रोगी अधिक गुस्सैल होता है तथा छोटी-छोटी बातों पर लड़ने लगता है। वह गाना सुनना बिल्कुल पसन्द नहीं करता तथा गाने की आवाज सुनते ही गुस्से के मारे पूरे शरीर में कम्पन होने लगता है। ऐसे मानसिक लक्षणों से पीड़ित रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर में दर्द होने के साथ रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कोई कील सिर में ठोक दिया हो। चाय पीने से स्नायुओं में दर्द होना। सिर के बाईं ओर दर्द होना। सिर में सफेद पपड़ीदार रूसी होना, बाल सूखना तथा बाल का झड़ना आदि सिर से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह औषधि चेहरे के चिपचिपापन को भी समाप्त करती है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण :- आंखों की पलकों के स्नायुओं में दर्द होना तथा परितारिका की सूजन। रात के समय पलकों का आपस में चिपक जाना, पलकों का सूख जाना तथा पलकों पर परतदार पपड़ियां बनना। अंजनियां और पलकों पर फोड़े होना। श्वेतपटल (आंखों का सफेद भाग) पर कम या अधिक जलन होना। श्वेतपटल धब्बों में उभरा हुआ और नीलाभ लाल होना। बड़े-बड़े चपटे छाले होने के साथ आंखों का ठीक से काम न करना। बार-बार होने वाला उपशुक्लमण्डल की जलन। पुराने श्वेतपटल की सूजन। इस तरह के आंखों से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों में से कोई भी लक्षण हो तो रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देनी चाहिए।
कान से सम्बंधित लक्षण :- कान की पुरानी सूजन तथा कान से पीब का निकलना। खाने-पीने की चीज निगलते समय कान में कड़कड़ाहट की आवाज सुनाई देना। कान के फोड़े होना आदि कान से सम्बंधित लक्षणों को ठीक करने के लिए थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण :- पुरानी सर्दी-जुकाम होना तथा नाक से गाढ़े व हरे रंग का बलगम निकलना। बलगम के साथ खून एवं पीब आना। नाक को साफ करते समय दांत में दर्द होना। नथूनों के अन्दर घाव होना। नाक के अन्दर खुश्की होना तथा नाक के जड़ में दर्द व दबाव महसूस होना आदि नाक रोग के लक्षणों से पीड़ित रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देनी चाहिए।
मुंह से सम्बंधित लक्षण :- जीभ के नोक पर तेज दर्द होना। जड़ के पास किनारों पर सफेद फफोले पड़ना तथा जीभ में घाव होने के साथ दर्द होना। मसूढ़ों तक दांतों का खराब हो जाना, दांतों व मसूढ़ों का अत्यन्त स्पर्शकातर (छूने से तेज दर्द होना) तथा मसूढ़ों का पीछे हट जाना। जीभ के नीचे फोड़े होना, जीभ व मुंह के अन्दर की शिरायें फूली हुई। ऐसे मुंह से सम्बंधित लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग अत्यन्त लाभकारी होता है।
दांत से सम्बंधित लक्षण :- दांत में उत्पन्न ऐसे लक्षण जिसमें दांतों के जड़ खोखले हो जाते हैं परन्तु ऊपरी भाग ठीक ही रहता है। दांत पर पीले रंग का मैल जम जाता है और दांत टूटता रहता है। चाय पीने के बाद दांत में दर्द होता है तथा नाक छिड़कने से भी खोखले दांत के अन्दर या किनारे पर दर्द होता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को ठीक करने के लिए थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- सांस संस्थान से सम्बंधित ऐसे लक्षण जिसमें रोगी को दोपहर के बाद लगातार खांसी आती है और साथ ही पेट के अन्दरूनी भाग में दर्द होता है। बच्चों का दमा रोग। स्वरनली में दानेदार फुंसियां होना तथा आवाज नली में लम्बे समय से चले आ रहे जलन। सांस से सम्बंधित ऐसे लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण:- आमाशय से सम्बंधित विभिन्न लक्षण जैसे- भूख का न लगना। ताजे मांस व आलू खाने की इच्छा न करना। चिकने या तेल वाले पदार्थ खाने के बाद बदबूदार या खट्टी डकारें आना। पाकाशय के ऊपरी भाग में काटता हुए दर्द होना। प्याज खाने की इच्छा न करना। पेट का फूल जाना, खाना खाने से पहले पाकाशय में धंसने जैसा महसूस होना, खाना खाने के बाद पेट में दर्द होना तथा प्यास कम या अधिक लगना आदि लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग चाय पीने के कारण अजीर्णता को दूर करने के लिए भी किया जाता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण :- पेट का फूल जाना। पेट में खिंचाव महसूस होना। पुराने दस्त रोग का बासी भोजन करने के बाद बढ़ जाना। दस्त का तेजी से आने तथा दस्त करते समय गड़गड़ की आवाज आना। कत्थई रंग के धब्बे बनना। पेट का फूल जाने के साथ पेट का फैल जाना। पेट में गड़गड़ की आवाज के साथ पेट का दर्द आदि लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मलाशय से सम्बंधित लक्षण :- कब्ज बनने के कारण मलाशय में तेज दर्द होना तथा दर्द के कारण दस्त करते समय मल का मलद्वार से वापस मलाशय में चले जाना। बैठने पर अधिक वेदना साथ ही मलद्वार के पास सुई के चुभने की तरह दर्द व जलन होना। मलद्वार में घाव होना, मलद्वार पर मस्से का उत्पन्न होना तथा मलद्वार में कीड़े होने जैसा महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। सुबह के समय पतले दस्त का आना या खाना खाने के बाद बिना दर्द या दर्द के साथ दस्त का आना। पीले रंग के पतले दस्त का आना तथा दस्त के समय पहले हवा का निकलना उसके बाद तेजी से मल का आना। पेट में गड़गड़ाहट होना आदि लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से रोग ठीक होता है। बवासीर के मस्सों में सूजन और जलन होने पर उस स्थान को छूने या बैठने से दर्द अधिक होता है। मलद्वार में खुजली होती है। सीवन (लिंग की सुपारी) पर गुमड़ी हो जाती है और उसमें मवाद आ जाती है जिसके कारण चलने-फिरने से दर्द होता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि लेनी चाहिए।
मूत्राशय से सम्बंधित लक्षण :- मूत्रनली का सूज जाना व जलन होना। पेशाब करते समय पेशाब की धार कई भाग में बंटी हुई होने के साथ धार कम होना। पेशाब करने के बाद बूंद-बूंद कर पेशाब का टपकना। पेशाब करने के बाद तेज काटता हुआ दर्द होना। बार-बार पेशाब लगना तथा पेशाब करते समय मूत्राशय में दर्द होना। अचानक पेशाब का इतने तेजी से लग जाना कि उसे कुछ क्षण के लिए भी रोका नहीं जा सकता। मूत्राशय की संकोचक पेशी में चुन्नता आ जाना आदि लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से रोग ठीक होता है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :- लिंग के अगले भाग की त्वचा व लिंगमुण्ड (लिंग के अगले भाग) में जलन होना तथा लिंग में दर्द होना। लिंग के अगले भाग में जलन होना। प्रमेहजनित आमवात। अण्डकोषों में लम्बे समय से चला आ रहा खिंचाव। मूत्राशय के मुख के पास दर्द और जलन होना तथा पेशाब का बार-बार व तीव्रवेग से आना। पुर:स्थग्रंथि का बढ़ जाना। इस तरह के मूत्राशय से सम्बंधित लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। सूजाक रोग में पहले मवाद पतला आता है और फिर बाद में गाढ़ा पीले रंग का मवाद आने लगता है। मूत्रनली का मुख मवाद के कारण बंद होने लगता है। सुजाक पुराना होने पर पतला चिपचिपा रस निकलता है। सूजाक की बीमारी शुरू होते ही कैनाबिस सैटाइवा के प्रयोग करने से 2 सप्ताह के अन्दर सूजाक रोग ठीक होता है उसके बाद थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से सूजाक रोग पूर्ण रूप से अच्छा हो जाता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :- स्त्री के योनि और मूलाधार के पास मस्से उत्पन्न होना। अधिक मात्रा में प्रदर-स्राव होना तथा प्रदर गाढ़ा व हरे रंग का आना। बाएं डिम्बाशय और बाएं वंक्षणप्रदेश (इंग्युनियल रिजन) में अत्यधिक तेज दर्द होना। मासिकस्राव देर से आने के साथ स्राव बहुत कम मात्रा में आना। मासिकस्राव के समय डिम्बकोष में जलन होना विशेषकर बाईं डिम्बकोष में। मासिकस्राव से पहले अधिक मात्रा में पसीना आना आदि लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- चलते समय रोगी को ऐसा महसूस होता रहता है जैसे उसके शरीर के सभी अंग टूट रहे हैं। अंगुलियों की नोक सूजी हुई, लाल तथा सुन्न पड़ जाना। पेशियों की कमजोरी व कंपन। जोड़ों से कड़कड़ाहट की आवाज आना। एड़ियों व पाश्र्णिकाओं में दर्द होना। नख भंगुर। पैर के नाखूनों में नख का बढ़ना आदि लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- त्वचा अधिक कोमल होना, त्वचा पर फोड़े होना, त्वचा पर गुटिकायें होना, मस्से होना, तथा त्वचा पर जख्म होना विशेष रूप से मलद्वार एवं जननेन्द्रिय पर जख्म होने पर थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है। त्वचा पर छाले व चकत्ते होना। त्वचा पर मीठा पसीना आने के साथ तेज बदबू आना। त्वचा का सूख जाना तथा त्वचा पर कत्थई रंग के धब्बे बनना। कमर में दर्द तथा दाद होना। ग्रंथियों में फाड़ता हुआ दर्द होना। ग्रंथि का बढ़ जाना। नख का खराब हो जाना तथा नख का टूट जाना व कोमल होना। आवृत पेशियों में उदभेद उत्पन्न होना जो खुजलाने पर और बढ़ता है। रोगग्रस्त अंगों को छूने से तेज दर्द होना। शरीर के एक भाग में ठण्ड महसूस होना। हाथों व बांहों पर कत्थई रंग के धब्बे होना आदि लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से रोग ठीक होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण :- नींद का न आना या नींद का किसी कारण से टूटते रहना आदि लक्षणों में थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से लाभ होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण :- बुखार ऐसे लक्षण जिसमें बुखार के समय ठण्ड जांघों से शुरू होकर पूरे शरीर में फैलता है। बुखार में सिर को छोड़कर पूरे शरीर पर पसीना आना। नींद में रोगी के शरीर से तेज खट्टा शहद की गंध की तरह पसीना आना आदि लक्षणों में रोगी को थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि देने से रोग ठीक होता है।
वृद्धि :-
रात के समय, बिस्तर की गर्मी से, रात के 3 बजे, दोपहर 3 बजे, ठण्डी हवा में, जुकाम के बाद, तेल वाले भोजन करने पर तथा टीका लगाने पर रोग बढ़ता है।
शमन :-
बाईं ओर के किसी अंग को भीतर की ओर खींचने पर रोग में आराम मिलता है।
तुलना :-
थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि की तुलना मेडो, सैबा, साइली, कैना-सैटा, कैन्था, कोपे और स्टैफि औषधियों से की जाती है।
मात्रा :-
थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि के मूलार्क या 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। कुछ विशेष स्थितियों में जैसे- पूरे शरीर पर मस्से उत्पन्न होने पर मस्से को हटाने के लिए थूजा आक्सिडेण्टैलिस औषधि की 1000 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
टुबरकुलीनम TUBERCULINUM
टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग मुख्य रूप से गुर्दे से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों को दूर करने के लिए किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग गुर्दे सम्बंधी लक्षणों में सावधानी से करना चाहिए क्योंकि जहां त्वचा और आंतें ठीक से काम नहीं करती हैं वहां इस औषधि की उच्च शक्ति हानि पहुंचाती है। यह औषधि पुराने मूत्राशय की सूजन को ठीक करती है।
यह औषधि क्षय (टी.बी.) रोग के विभिन्न लक्षणों मे अत्यंत लाभकारी होता है विशेष रूप से हल्के घाव तथा संकीर्ण छाती वाले रोगियों के लिए। शिथिल तन्तुओं के दुबारा ठीक होने के कारण शारीरिक शक्ति का क्षीण होना और जलवायु में होने वाले परिवर्तन के प्रति अत्यंत संवेदनशीलता अर्थात हल्का सा मौसम परिवर्तन होने पर रोग हो जाता है। रोगी को हमेशा थकान महसूस होना, गति करने से भारी थकान उत्पन्न होना, कामकाज करने का मन न करना तथा रोगी को हमेशा कुछ नया करने की चाहत। रोगी में उत्पन्न ऐसे लक्षण जो निरंतर बदलता रहता है तथा हवा के हल्के बहाव से ठण्ड लगने लगती है तो ऐसे लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
मिर्गी का दौरा, स्नायविक अवसन्नता तथा स्नायविक बच्चों के लिए यह औषधि बहुमूल्य है। बच्चों में कई सप्ताहों तक गतिशील रहने वाला अतिसार, अत्यधिक कमजोरी, शरीर का नीला पड़ जाना, मानसिक रूप से कमजोर बच्चे, बढ़ी हुई गलतुण्डिकायें, त्वचा के रोग, जोड़ों का तेज दर्द, अधिक संवेदनशील, शारीरिक व मानसिक रूप से कमजोर होना, सर्वांगीण अवसन्नता, स्नायविक कमजोरी, कंपन तथा जोड़ों की सूजन आदि में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टुबरकुलीनम औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- टुबरकुलीनम औषधि में मन से सम्बंधित लक्षण मौजूद होते हैं जिसके कारण यह मन से सम्बंधित विभिन्न प्रकार के लक्षणों को समाप्त करती है। यह औषधि रोगी में पागलपन का दौरा पड़ने, विषाद, नींद का न आना आदि को दूर करती है। नींद के ऐसे लक्षण जिसमें रोगी बेहोश व्यक्ति की तरह सोता रहता है। रोगी में अधिक चिड़चिड़ापन उत्पन्न होना तथा छोटी-छोटी बातों में गुस्सा हो जाना, विशेषकर सोकर उठने पर। व्यक्ति में हताशा या निराशा उत्पन्न होना। रोगी व्यक्ति हमेशा कुत्ते से डरता रहता है। स्वभाव बदलने लगता है तथा अपशब्द का अधिक प्रयोग करता है तथा रोगी में दूसरे को कोसने तथा कसम खाने की स्वभाविक प्रवृति आ जाती है। इस तरह के मानसिक लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- मस्तिष्क की गहराई में दर्द और स्नायुशुल होना। रोगी को अजीब-अजीब दिखाई देना। सिर में तेज दर्द होना जैसे कोई पट्टी सिर के चारों ओर बंधी हो। मस्तिष्क को ढकने वाली झिल्ली में जलन होना। शरीर से पानी की हानि होना विशेषकर पसीना और पेशाब के द्वारा। दस्त का लगना, रिसावदार उद्भेद आदि लक्षणों में रोगी को टुबरकुलीनम औषधि देनी चाहिए। रात के समय नींद में डरावने सपने आना व भ्रम उत्पन्न होना जिसके कारण रोगी अचानक नींद से जाग उठना। जीवाणुओं के कारण बालों को आपस में चिपक जाना। छोटे-छोटे फोड़ों के गुच्छे उत्पन्न होना, अधिक दर्द होना तथा नाक में फोड़े हो जाना। नाक से बदबूदार पीब का आना आदि। इस तरह के नाक से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टुबरकुलीनम औषधि देने से रोग समाप्त होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण :- कान से लगातार पीब का निकलते रहना तथा पीब से बदबू आना। कान के पटल में छेद होने की तरह टेढ़े-मेढ़े किनारे रहना आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- यदि रोगी मांस खाने की इच्छा नहीं करता है और मांस खाते ही जी मिचलाने व उल्टी होने लगता है तो ऐसे लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। भोजन करने के बाद पेट में खालीपन महसूस होना तथा भूख लगने जैसा महसूस होना आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है। ठण्डा दूध पीने की इच्छा होने पर यह औषधि देने से लाभ होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण :- सुबह के समय अचानक दस्त का लगना। मल गाढ़े कत्थई रंग के आने के साथ मल से तेज बदबू आना। आन्त्रयोजन यक्ष्मा (टी.बी.) आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :- स्तनों के फोड़े। मासिकस्राव नियमित समय से बहुत पहले तथा अधिक मात्रा में कष्ट के साथ आना। मासिकस्राव अधिक मात्रा में आने के साथ अधिक दर्द होना। इस तरह के स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- गलतुण्डिकाएं का बढ़ जाना। रात को नींद में कठोर तथा सूखी खांसी आना। खांसी के साथ गाढ़ा बलगम आना तथा वायुनलियों से अधिक मात्रा में स्राव होना। दम फुलना। गले में घुटन महसूस होना तथा ताजी हवा आने पर घुटन महसूस होते रहना। ठण्डी हवा की अधिक इच्छा करना। बच्चों में सांस नली में सूजन होना। दौरे के रूप से प्रकट होने वाली कठोर खांसी, अधिक पसीना आना तथा शारीरिक वजन कम होना। पूरे छाती से कर्कश ध्वनि निकलना। गुटिकासंचय फुस्फुसशिखर में आरम्भ होता है। इस तरह के सांस से सम्बंधित लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। ध्यान रखें कि इस औषधि का प्रयोग बार-बार करना हानिकारक होता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण :- गर्दन की पीछे की हड्डियों में और नीचे रीढ़ की हड्डी में तनाव महसूस होना तथा कन्धों के बीच या पीठ के ऊपरी भाग में ठण्ड लगना आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण:- त्वचा पर उत्पन्न पुराना दाद तथा त्वचा पर उत्पन्न ऐसी तेज खुजली जो रात को और तेज हो जाता है। क्षय (टी.बी.) रोग से ग्रस्त बच्चों के चेहरे पर मुंहासे होना। विचर्चिका आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बंधित लक्षण:- मानसिक परेशानी या अन्य कारणों से नींद का ठीक से न आना तथा रात को देर से सोना व सुबह जल्द उठना आदि कारणों से नींद का पूरा न होना जिसके कारण दिन में सिर या बदन में तेज दर्द होना। रात को नींद में धुंधला, बेचैन व डरावने सपने आना। इस तरह के लक्षणों में रोगी को टुबरकुलीनम औषधि देनी चाहिए।
बुखार से सम्बंधित लक्षण :- धीरे-धीरे आने वाला बुखार तथा पूर्ण रूप से बुखार उत्पन्न होने के बाद लगातार बना रहता है। ऐसे लक्षण वाले बुखार में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग हर दूसरे घंटे बाद करना चाहिए। शरीर से अधिक पसीना आना तथा अधिक ठण्ड महसूस होना आदि लक्षणों में टुबरकुलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि :-
गति करने से, संगीत से, आंधी के पहले, खड़े रहने पर, ठण्डी हवा के झोंके से, सुबह के समय और नींद में रोग बढ़ता है।
शमन :-
खुली हवा में घूमने या रहने से रोग में आराम मिलता है।
तुलना :-
टुबरकुलीनम औषधि की तुलना कल्के-का, काली-स, सोरि, पल्स, सीपि और सल्फ औषधि से की जाती है।
पूरक :-
कल्के, चायना तथा ब्रायो औषधि टुबरकुलीनम औषधि के पूरके है।
मात्रा :-
टुबरकुलीनम औषधि की 30 से उच्च शक्ति का प्रयोग किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग किसी रोग में करने के बाद दुबारा प्रयोग करते समय लम्बे समय का अन्तर दें। बच्चों के रोग में इस औषधि के बीच वाली शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
थाइमोल THYMOL
थाइमोल औषधि विशेष रूप से जननेन्द्रियों से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों पर क्रिया करती है और जननेन्द्रियों से सम्बंधित रोग समाप्त करती है। इस औषधि का प्रयोग वीर्यपात, लिंग में उत्तेजना के साथ दर्द होना और पुर:स्थस्रावों में किया जाता है। इस औषधि के प्रयोग से जननेन्द्रिय अधिक प्रभावित होती है जिससे कभी-कभी लैंगिक अवसाद उत्पन्न हो जाते हैं। थाइमोल औषधि अंकुश कीड़े को समाप्त करने में अधिक लाभकारी है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थाइमोल औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण : मानसिक असन्तुलन के कारण रोगी व्यक्ति में कई प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते है जैसे- रोगी व्यक्ति अधिक चिड़चिड़ा हो जाता है तथा वह किसी प्रकार के शासन या दबाव को सहन नहीं कर पाता है। वह अपने इच्छा के अनुसार ही काम करना चाहता है और अपनी इच्छा के अनुसार ही जीना चाहता है। रोगी किसी की बातों को नहीं मानता तथा हर समय अपनी मनमानी ही करता रहता है। रोगी व्यक्ति में सोचने व समझने की शक्ति कम हो जाती है। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए थाइमोल औषधि देने से रोग ठीक होता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण :- यदि रोगी को पीठ में थकान महसूस होती है और पूरे कमर में दर्द होता है तो रोगी को थाइमोल औषधि लेनी चाहिए। रोगी में उत्पन्न ऐसे लक्षण जिसमें रोगी को कोई भी काम शारीरिक या मानसिक करने में परेशानी होती है। ऐसे लक्षणों में रोगी को थाइमोल औषधि देने से रोग ठीक होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण :- सुबह सोकर उठने पर थकान महसूस होना। रात के समय कामोत्तेजक सपने देखने के कारण ठीक से नींद न आना आदि लक्षणों में रोगी को थाइमोल औषधि का सेवन करना चाहिए।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :- रात के समय अधिक मात्रा में वीर्यपात होना और साथ ही उत्तेजना वाले सपने आना जिसके कारण अपने आप लिंग उत्तेजित हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को थाइमोल औषधि लेनी चाहिए। मूत्रनली में जलन होना तथा बूंद-बूंद करके पेशाब का टपकना। बार-बार पेशाब का आना। यूरेट्स बढ़े हुए तथा फौस्फेट्स कम निकलना आदि लक्षणों में रोगी को थाइमोल औषधि देने से रोग ठीक होता है।
वृद्धि :-
मानसिक और शारीरिक काम करने से रोग बढ़ता है।
मात्रा :-
थाइमोल औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
थाइमस सर्पाइलस THYMUS SERPYLLUM
थाइमस सर्पाइलस औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोग के लक्षणों को समाप्त करने के लिए किया जाता है परन्तु यह औषधि बच्चों के श्वासयन्त्रों के संक्रमण, शुष्क, स्नायविक दमा आदि में विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। यह औषधि काली खांसी, बेहोशी तथा बलगम आदि को दूर करती है।
कानों में घंटे की तरह तेज आवाज सुनाई देने के साथ सिर में दबाव महसूस होना। ग्रासनली में जलन होना, गले में जलन होना जो पानी या खाना निगलने पर बढ़ता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को थाइमस सर्पाइलस औषधि देने से रोग ठीक होता है। रक्तवाहिनियां फूली हुई तथा कालिमायुक्त आदि लक्षणों में थाइमस सर्पाइलस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा :-
थाइमस सर्पाइलस औषधि के मूलार्क का सेवन करना चाहिए।
थाइरायडीनम THYRODINUM
थाइरायडीनम औषधि का प्रयोग थाइरायड ग्रंथि में खून की कमी को दूर करने के लिए विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। यह औषधि शरीर के अन्दर मौजूद सूक्ष्म कणों को बढ़ाने (शीर्णता), पेशी की कमजोरी को दूर करने, पसीना को लाने तथा सिरदर्द आदि को दूर करती है। यह औषधि चेहरे व अंगों की स्नायविक कंपन तथा लकवा आदि रोग के लक्षणों को उत्पन्न करके रोग को जड़ से समाप्त करती है। हृदय में कंपन, आकार का बढ़ जाना, नेत्रोत्सेध (एक्सोफ्टेल्मस) और पुतलियों का फैल जाना। श्लैष्मिक शोथ और मन्दबुद्धि एवं गलगण्ड में इसका प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है। जोड़ों का दर्द एवं सूजन तथा बच्चों का क्षय रोग आदि लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग ऐसी स्थिति में विशेष रूप से लाभकारी होता है जब किसी बच्चे का अण्ड थैली में नहीं उतरता है, ऐसी स्थिति में थाइरायडीनम औषधि आधा ग्राम की मात्रा में दिन में 2 बार बच्चे को देने से लाभ होता है। परिपोषण सम्बंधी यन्त्रों के नियमन, विवर्द्धन और विकास के लिए थाइरायडीनम औषधि सभी अंगों पर नियंत्रित रूप से प्रभाव डालती है जिसके फलस्वरूप उन अंगों का विकास सही रूप से होता है। थाइरायडीनम औषधि के सेवन से शरीर में थाइरायड की कमजोरी के कारण रोगी को मिठाई खाने की अधिक इच्छा होती रहती है।
थाइरायडीनम औषधि का प्रयोग विचर्चिका में उत्पन्न लक्षणों को समाप्त करने के लिए की जाती है। इस औषधि का प्रयोग बच्चे के शारीरिक व मानसिक विकास के साथ याददास्त को बढ़ाने के लिए किया जाता है। यह औषधि गलगण्ड, मोटापा, कमजोरी, पतले रोगी विशेष रूप से खून की कमी के कारण आई दुर्बलता को दूर करती है। आंखों से धुंधला दिखाई देना, स्तनों में फोड़ा होना, गर्भाशय के कीड़े, अधिक कमजोरी तथा अधिक खाने पर भी शरीर पतला रहना, रात को बिस्तर पर पेशाब करने की आदत, स्तनों में दूध का न बनना आदि लक्षणों में थाइरायडीनम औषधि का प्रयोग करना अत्यंत लाभकारी होता है।
इसके अतिरिक्त बेहोशी, जी मिचलाना, ठण्ड अधिक महसूस होना, रोग के कारण कमजोरी, थकावट उत्पन्न होना, नाड़ी का कमजोर होना, बार-बार बेहोशी उत्पन्न होना, हृदय में कंपन होना, पैर-हाथ ठण्डे पड़ जाना, निम्न रक्तचाप (लो ब्लडप्रेशर) तथा ठण्ड के प्रति अधिक संवेदनशीलता आदि लक्षणों में थाइरायडीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह औषधि का प्रयोग श्लैष्मिक शोफ और विभिन्न प्रकार के सूजनों में तेज क्रिया करती है और उसके लक्षणों को समाप्त करती है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर थाइरायडीनम औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- मानसिक रूप से असन्तुलन के कारण रोगी में अधिक चिड़चिड़ापन आ जाता है तथा रोगी की बातों को न मानने या बातों को काटने पर गुस्सा हो जाता है। छोटी-छोटी बातों पर लड़ने व गुस्सा करने लगता है। ऐसे मानसिक लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए थाइरायडीनम औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसका सिर हल्का हो गया है। हमेशा सिरदर्द रहता है। आंखों के गोलक बाहर फैल जाते हैं। चेहरे की पेशियों में खून की कमी तथा होंठों पर जलन महसूस होती रहती है। जीभ पर गाढ़ा लेप जैसा महसूस होता है। सिर में पूर्णता व गर्मी महसूस होती है तथा चेहरा लाल हो जाता मानो रोगी बहुत गुस्से में हो। मुंह का स्वाद खराब होना आदि सिर से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को थाइरायडीनम औषधि देने से रोग समाप्त होता है।
हृदय से सम्बंधित लक्षण :- हृदय की कमजोरी तथा नाड़ी की गति तेज होने के साथ लेटने में कष्ट होना। हृदय की धड़कन तेज होना (हाई ब्लडप्रेशर)। छाती के आस-पास घुटन महसूस होने के साथ ऐसा लगना जैसे छाती सिकुड़ गई है। हल्के काम करने पर ही हृदय में कंपन होने लगना। हृदय में तेज दर्द होना। हृदय में अपने-आप उत्पन्न होने वाली उत्तेजना तथा हृदय कमजोर होने के साथ अंगुलियों का सुन्न पड़ जाना आदि हृदय से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को थाइरायडीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बंधित लक्षण :- नाक से सम्बंधित लक्षण जिसमें नाक सूखी रहती है परन्तु खुली हवा में जाने से नाक से नजला आने लगता है। ऐसे लक्षणों में थाइरायडीनम औषधि लेनी चाहिए।
आंखों से सम्बंधित लक्षण :- आंखों की रोशनी समाप्त होने के साथ स्नायुपटल केन्द्र में काली बिन्दियां बनना आदि लक्षणों में थाइरायडीनम औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
गले से सम्बंधित लक्षण :- गले का सूख जाना, गले की नाड़ी में खून का जमा हो जाना, गले में कच्चापन महसूस होना, गले का घेंघा रोग होना, गलगण्ड तथा गले में जलन होना विशेष रूप से बाईं ओर। गले से सम्बंधी ऐसे लक्षणों में रोगी को थाइरायडीनम औषधि लेनी चाहिए।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- किसी कारण से आमाशय रोगग्रस्त होने पर रोगी में विभिन्न लक्षण उत्पन्न होते है जैसे- मिठाई खाने की अधिक इच्छा करना तथा ठण्डा पानी पीने की अधिक इच्छा करना। पेट में गड़गड़हट महसूस होना। जी मिचलना विशेषकर गाड़ी आदि से सफर करते समय। पेट फूल जाने के साथ पेट में वायुगैस का बनना आदि आमाशय के लक्षणों में थाइरायडीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बंधिक लक्षण :- पेशाब का अधिक मात्रा में आना, पेशाब का बार-बार आना तथा पेशाब के साथ सफेद रंग का या शर्करा की मात्रा आना। पेशाब से बनफ्शे की तरह गंध आना, मूत्रनली में जलन होना तथा पेशाब के साथ यूरिक एसिड अधिक मात्रा में आना आदि मूत्र से सम्बंधित लक्षणों में थाइरायडीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। कमजोर बच्चे के बिस्तर पर पेशाब करने की आदतें विशेषकर स्नायविक व चिड़चिड़े बच्चे में ऐसी आदते उत्पन्न होने पर थाइरायडीनम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- सूखी दर्द वाली खांसी के साथ हल्का कष्टकारी बलगम आना और ग्रासनली में जलन होना आदि लक्षणों में थाइरायडीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- जोड़ों में जलन होने के साथ मोटापा बढ़ने की प्रकृति तथा हाथ-पैरों में ठण्ड। कमर से नीचे की त्वचा में पपड़ियां बनना। हाथ-पैर ठण्डे पड़ जाना। अंगों में हल्का दर्द रहना। ठण्डी हवा से बंद कमरे में आने पर खांसी होना। पैरों में पानी भरना तथा पूरे शरीर में कंपन होना आदि बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को थाइरायडीनम औषधि देने से रोग ठीक होता है। इस औषधि का प्रयोग बच्चों का सूखा रोग आदि को दूर करता है।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- त्वचा सूखी व अपुष्ट। हाथ-पैर ठण्डा होना। त्वचा पर दाद होना। गर्भाशय के सौत्रिक फोड़े। त्वचा पर कत्थई रंग की सूजन होना। ग्रंथियों की पत्थर की तरह कठोर सूजन। त्वचा का सुन्न पड़ जाना। त्वचा पर मटमैला पसीना आना। कामला के साथ तेज खुजली। मछली की तरह त्वचा से पपड़ियां बनना तथा टी.बी. रोग के लक्षण वाले सूजन। सूखी खुजली होना जो रात को अधिक हो जाता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को थाइरायडीनम औषधि देने से रोग ठीक होता है।
वृद्धि :-
हिलने-डुलने या किसी भी प्रकार के शारीरिक हलचल होने पर, ठण्डी हवा में घूमने के बाद कमरे में आने पर तथा अधिक बोलने से रोग बढ़ता है।
शमन :-
पेट के बल लेटने से तथा आराम करने से रोग में आराम मिलता है।
तुलना :-
थाइरायडीनम औषधि की तुलना स्पांजिया, कल्के, फ्यूकस, लाइकोपस, नक्स-वो, ओपि, फास, मर्क, नैट्र-म्यू, लायको, काली-फा, जेल्स, कल्के-फा, बैरा-का, औरम, सीपि, साइ, वेरेट्रम, जिंक, ओपि तथा आयोडो थाइरीन औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
थाइरायडीनम औषधि की 6 से 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
सावधानी :-
थाइरायडीनम औषधि डेढ़ से 2 ग्राम की मात्रा में देनी चाहिए। रोगी को यह औषधि अधिक मात्रा में भी दी जा सकती है परन्तु अधिक मात्रा देने से नाड़ी की गति तेज हो जाती है। अत: ऐसे में औषधि का प्रयोग सावधानी से करें। हृदय की कमजोरी के साथ उच्च रक्तचाप होने पर तथा क्षयरोगियों के लिए औषधि की सामान्य मात्रा ही प्रयोग करना चाहिए।
विशेष:-
आयोडो थाइरीन औषधि एक प्रकार के थाइरायड ग्रंथि से निकला हुआ एक सक्रिय तत्व है जिसमें आयोडीन और नाइट्रोजन की अधिकता होती है। इसलिए इस औषधि के प्रयोग करने से पोषणक्रिया की रोगग्रस्तता दूर होती है, वजन घटता है तथा मधुमेह (डाइबिटीज) उत्पन्न कर सकता है। इस औषधि का प्रयोग मोटापे में सावधानीपूर्वक करना चाहिए।
टिलिया यूरोपा TILIA EUROPA
टिलिया यूरोपा औषधि अक्षि-पेशी की कमजोरी को दूर करने में लाभकारी होती है। यह औषधि शरीर से पतले व फीके रंग के खून का स्राव को रोकने के लिए प्रयोग की जाती है। प्रसव के बाद गर्भाशय की सूजन तथा अस्थिगन्हरों के रोग को ठीक करने के लिए इस औषधि को महत्वपूर्ण माना गया है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टिलिया यूरोपा औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर के स्नायुओं में उत्पन्न ऐसा दर्द जो पहले सिर के दाईं ओर से शुरू होता है और फिर बाईं ओर होता है। आंखों के सामने पर्दा सा पड़ा दिखाई देता है। रोगी में हमेशा एक प्रकार का भ्रम बना रहता है और आंखों से कम दिखाई देता है। इस तरह के सिर से सम्बंधित लक्षणों में टिलिया यूरोपा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बंधित लक्षण:- यदि अधिक छींके आती हो और नाक से पानी का स्राव होता हो तो इस औषधि का प्रयोग करना अत्यंत लाभकारी होता है। नाक से खून आने पर टिलिया यूरोपा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बंधित लक्षण:- आंखों से सम्बंधित ऐसे लक्षण जिसमें आंखों के सामने कोई जाली पड़ा हुआ महसूस होता है तथा दोनों आंखों की मिली हुई नज़रें होती है। इस तरह के लक्षणों में टिलिया यूरोपा औषधि लेनी चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :- गर्भाशय के आस-पास तेज दर्द होना या प्रसव के समय होने वाले दर्द की तरह दर्द महसूस होना। शरीर से गर्म पसीना आना। चलने पर अधिक मात्रा में चिपचिपा प्रदर-स्राव होना। योनि के मुख पर घाव होने से योनि का लाल होना। मलद्वार में जलन होना और वायु गैस का बनना। इस तरह के स्त्री से सम्बंधित लक्षणों में टिलिया यूरोपा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- त्वचा पर दाद होना तथा त्वचा पर होने वाली तेज खुजली जिसे खुजाने से आग की तरह जलन होती है। ऐसे लक्षणों में टिलिया यूरोपा औषधि का प्रयोग करें। त्वचा पर छोटी-छोटी व लाल-लाल फुंसियां उत्पन्न होना। नींद आने पर शरीर से गर्म पसीना अधिक मात्रा में आना तथा गठिया दर्द के साथ पसीना अधिक आना आदि लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग करें।
वृद्धि :-
दोपहर और शाम के समय, गर्म कमरे में तथा बिस्तर की गर्मी से रोग बढ़ता है।
शमन :-
ठण्डे कमरे में तथा गति करने से रोग में आराम मिलता है।
तुलना :-
टिलिया यूरोपा औषधि की तुलना लिलियम तथा बेला औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
टिलिया यूरोपा औषधि का मूलार्क या 6 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया TINOSPORA CORDIFOLIA
टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया औषधि का प्रयोग करने से वीर्य की दुर्बलता खत्म होकर वीर्य पुष्ट होता है। यह बुखार को ठीक करती है विशेष रूप से सविरामी बुखार को। यह औषधि पीलिया, प्लीहा (तिल्ली) के घाव (स्प्लेनिक अफैक्शन), कुष्ठ रोग, आमवाती गठिया (जोड़ों का दर्द) तथा त्वचा के रोग आदि को ठीक करती है। गौण उपदंश (सकैन्ड्री साइफील्स), प्रदर-स्राव, मूत्र रोग, पेशाब करने में कठिनाई तथा सूजाक रोग आदि को दूर करने के लिए इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया औषधि का उपयोग :-
बुखार से सम्बंधित लक्षण :- पुराने या नए मलेरिया का बुखार होना तथा दोपहर के बाद ठण्ड लगना और कंपकंपी होना। पित्त की उल्टी होना और अधिक प्यास लगने के साथ सिरदर्द होना। पुराने बुखार के रोग के साथ पुराना सुजाक रोग तथा वीर्यपात के कारण उत्पन्न शारीरिक कमजोरी। कुनीन औषधि के सेवन से उत्पन्न हानि जिसके कारण बुखार होता तथा हाथों व चेहरे पर जलन होती रहती है। पीलिया रोग होना आदि। इस तरह के लक्षणों में रोगी को टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया औषधि देने से बुखार के साथ उत्पन्न होने वाले सभी लक्षण समाप्त होते हैं।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण:- मूत्राशय से सम्बंधित ऐसे लक्षण जिसमें पेशाब बार-बार आता है परन्तु पेशाब करने पर कम मात्रा में पेशाब आता है। पेशाब करते समय मूत्रनली में जलन होती है। सूजाक रोग के कारण पेशाब के साथ पीब का आना आदि मूत्र रोग के लक्षणों में रोगी को टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया औषधि लेनी चाहिए।
मात्रा :-
टिनोस्पोरा कॉर्डिफोलिया औषधि के मूलार्क, 1x, 3x या 6 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
टिटैनियम TITANIUM
टिटैनियम औषधि का प्रयोग विभिन्न प्रकार के लक्षणों में किया जाता है। इस औषधि के लक्षण हड्डियों और मांसपेशियों में उत्पन्न लक्षणों से मिलते जुलते हैं जिसके कारण हड्डियों और मांसपेशियों से सम्बंधित लक्षणों में यह औषधि तेज क्रिया करके लक्षण को समाप्त करती है। त्वचा के टी.बी. रोग होने पर इस औषधि का बाहरी प्रयोग करना चाहिए। त्वचा रोग व जुकाम आदि में भी इस औषधि का बाहरी प्रयोग किया जा सकता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टिटैनियम औषधि का उपयोग :-
आंखों से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के आंखों में उत्पन्न ऐसे लक्षण जिसमें व्यक्ति एक बार में किसी वस्तु का आधा भाग ही देख पाता है। ऐसे लक्षण में टिटैनियम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण:- रोगी में उत्पन्न ऐसे लक्षण जिसमें सिर चकराने के साथ किसी वस्तु का लम्बाकार आधा ही दिखाई देता है। ऐसे लक्षणों में टिटैनियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। गुर्दे की जलन, फोड़े, शोष और नाक की सूजन आदि को समाप्त करने के लिए टिटैनियम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :- यौनदुर्बलता तथा सम्भोग के समय जल्दी वीर्यपात हो जाना आदि लक्षणों में टिटैनियम औषधि का प्रयोग करें।
विशेष :-
सेब में 0.11 प्रतिशत टिटैनियम होती है।
टोंगों-डिप्ट्रिक्स ओडोरैटा TONGO-DIPTRIX ODORATA
टोंगों-डिप्ट्रिक्स ओडोरैटा औषधि का प्रयोग शरीर में उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के लक्षणों को दूर करने में लाभकारी होता है परन्तु इस औषधि का प्रयोग करने से इसकी क्रिया विशेष रूप से स्नायुओं के दर्द और काली खांसी पर होती है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टोंगों-डिप्ट्रिक्स ओडोरैटा औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण:- सिर के स्नायुओं में फाड़ता हुआ दर्द होना, सिर में गर्मी व कंपन वाला दर्द होना तथा आंखों से अधिक आंसू आना। रोगी में उत्पन्न ऐसे मानसिक लक्षण जिसमें रोगी भ्रमित रहता है विशेषकर सिर के पिछले भाग के प्रति तथा रोगी में नींद की स्थिति बराबर बनी रहती है। इस तरह के लक्षणों में टोंगों-डिप्ट्रिक्स ओडोरैटा औषधि का प्रयोग किया जाता है। दाईं ओर की पलक मे कंपन होना आदि लक्षण में इस औषधि का प्रयोग करें।
नाक से सम्बंधित लक्षण:- नाक का बंद हो जाना तथा नाक से पानी की तरह पतला नजला निकलने पर टोंगों-डिप्ट्रिक्स ओडोरैटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण:- जांघों के जोड़ों और घुटनों में फाड़ता हुआ दर्द होने पर विशेष रूप से बाईं ओर अधिक दर्द होने पर टोंगों-डिप्ट्रिक्स ओडोरैटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
तुलना :-
टोंगों-डिप्ट्रिक्स ओडोरैटा औषधि की तुलना मेलीलोटस, ऐन्यौजैन्थस, ऐस्पेरूप और कौमारिन, ट्रि
टोरूला सेरेविसी TORULA CEREVISIAE
टोरुला सेरेविसी औषधि के परिक्षण करने के बाद इसके कुछ ही लक्षणों के बारे में पता चल पाया है। इस औषधि का प्रयोग प्रमेह रोग, आमिष (विजातीय) द्रव्यों और पाचक रसों से उत्पन्न होने वाली अत्यधिक संवेदनशीलता आदि को दूर करने के लिए किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर टोरूला सेरेविसी औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर और गर्दन के पीछे दर्द होना। तेज सिर दर्द के साथ पूरे शरीर में दर्द होना तथा कब्ज के कारण दर्द और बढ़ जाना। व्यक्ति का स्वभाव चिड़चिड़ा होना तथा स्नायविक पीड़ा आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी को टोरूला सेरेविसी औषधि देने से रोग समाप्त होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण:- यदि अधिक छींकें आती हो और नाक से सांय-सांय की आवाज आती हो तो टोरूला सेरेविसी औषधि का सेवन करें। नाक के पिछले भाग से नजला होने पर टोरूला सेरेविसी औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण:- आमाशय में गड़बड़ी के कारण मुंह का स्वाद खराब होना। जी मिचलाना। पाचनशक्ति का कमजोर होना। आमाशय और पेट में गैस बनने के साथ अधिक डकारें आना। पूरे पेट में दर्द होना। पूर्णता की अनुभूति। पेट में गड़गड़ाहट होना तथा ऐसा दर्द जो बराबर अपना स्थान बदलता रहता है। पेट का फूल जाना। कब्ज का बनना। दस्त से खट्टी बदबू आना, खमीरी तथा उबसन जैसी गंध आना आदि आमाशय से सम्बंधित लक्षणों को समाप्त करने के लिए टोरूला सेरेविसी औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- पीठ में दर्द होने के साथ कोहनियां थकी और कमजोर होना और घुटनों के चारों ओर थकावट व कमजोरी महसूस होना। हाथ-पैर बर्फ की तरह ठण्डे और सुन्न हो जाना आदि लक्षणों में टोरूला सेरेविसी औषधि का सेवन करने से रोग समाप्त होता है।
नींद से संबंधित लक्षण :- रोगी को ठीक से नींद न आना। रोगी को रोग होने के कारण या नींद में डरावने सपने के कारण बार-बार नींद टूट जाना जिसके कारण वह बेचैन रहता है। इस तरह के लक्षणों को दूर करने के लिए टोरूला सेरेविसी औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण :- त्वचा पर उत्पन्न ऐसे फोड़े जो बार-बार होते रहते हैं। टखनों के चारों ओर खुजलीयुक्त फोड़ा। त्वचा पर कत्थई रंग के धब्बे वाले चर्मरोग। इस तरह के त्वचा से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को टोरूला सेरेविसी औषधि देने से रोग समाप्त होता है।
मात्रा :-
टोरूला सेरेविसी औषधि की 3 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। त्वचा रोगों में फोड़ों और सूजन में खमीर की पट्टी बांधना अधिक लाभकारी होता है। रोग में विशुद्ध खमीरी केक का भी सेवन किया जा सकता है।
ट्रिब्यूलस टेरेस्ट्रिस TRIBULUS TERRESTRIS
ट्रिब्यलस टेरेस्ट्रिस औषधि का प्रयोग कई प्रकार के लक्षणों को समाप्त करने के लिए किया जाता है जिसके फलस्वरूप यह औषधि उससे सम्बंधित लक्षणों को समाप्त करती है। इस औषधि की विशेष क्रिया मूत्र से सम्बंधित लक्षण जैसे- पेशाब करने में कष्ट होना, जननेन्द्रिय की कमजोरी, वीर्य का पतला होना, वीर्यपात होना तथा वीर्य की अपुष्टता आदि को दूर करती है। इस औषधि को पुर:स्थग्रंथिय की सूजन, मूत्राशय में पथरी बनना और लिंग में उत्तेजना पैदा होना आदि में प्रयोग किया जाता है। इस औषधि के प्रयोग से हस्तमैथुन से होने वाले रोग आदि दूर होने के साथ वीर्यपात व स्वप्नदोष आदि भी दूर होता है। अधिक सम्भोग के कारण उत्पन्न नपुंसकता, पेशाब न रोक पाने के साथ कारण पेशाब करते समय दर्द होना आदि लक्षणों में ट्रिब्यलस टेरेस्ट्रिस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
मात्रा :-
ट्रिब्यलस टेरेस्ट्रिस औषधि के मूलार्क की 10 से 20 बूंद प्रतिदिन 3 बार लेनी चाहिए।
ट्रिफोलियम प्रैटेन्स TRIFOLIUM PRATENES
ट्रिफोलियस प्रैटेन्स औषधि का प्रयोग विभिन्न प्रकार के लक्षणों को समाप्त करने के लिए किया जाता है। इस औषधि में लालास्राव उत्पन्न करने की एक विशेष गुण मौजूद होता है। अत: लालाग्रंथियों में खून एकत्रित हो जाने पर इस औषधि का प्रयोग करने से अधिक मात्रा में लालास्राव होने के साथ ग्रंथियों में जमा हुआ खून निकल जाता है। इस औषधि का प्रयोग कान की जड़ की ग्रंथि में जलन होना, बदबूदार स्राव होना, सूखी खुरण्ड बनकर उतरने वाली पपड़ियां आदि में प्रयोग किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ट्रिफोलियस प्रैटेन्स औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण :- रोगी जब सुबह सोकर उठता है तो उसका मन भ्रमित रहता है और उसके सिर में दर्द रहता है। रोगी को ऐसा लगता है जैसे उसके सिर का अगला भाग ठीक से काम नहीं कर रहा है। मानसिक काम करने की इच्छा नहीं होती है तथा याददाश्त कमजोर होने लगती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को ट्रिफोलियस प्रैटेन्स औषधि देने से रोग समाप्त होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण :- मुंह से अधिक मात्रा में लालास्राव (लार का गिरना) होना तथा गले में जलन होने के साथ खराश होना आदि मुंह से सम्बंधित लक्षणों में ट्रिफोलियस प्रैटेन्स औषधि का सेवन कराने से रोग ठीक होता है।
सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- नाक से नजला आना तथा पतले पानी की तरह श्लेष्मा निकलने के साथ सांस संस्थानों में अधिक जलन होना। आवाज का खराब होना तथा गले में घुटन महसूस होना। रात के समय ठण्ड लगने के साथ ही खांसी आना विशेषकर खुली हवा में खांसी का और तेज हो जाना। परागज बुखार के समय होने वाले जुकाम। खांसी के ऐसे लक्षणों जिसमें खांसते-खांसते रोगी को बेहोशी जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। काली खांसी का दौरा पड़ना तथा रात को खांसी के दौरा और बढ़ जाना। इस तरह के सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षणों में ट्रिफोलियस प्रैटेन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पीठ से सम्बंधित लक्षण:- पीठ से सम्बंधित ऐसे लक्षण जिसमें गर्दन अकड़ जाती है और मस्तिष्क को क्रियाशील करने वाली पेशियों में बांयटे पड़ जाती है। पीठ से सम्बंधित ऐसे लक्षण गर्मी से व मालिश करने से शान्त रहता है। इस तरह के लक्षणों में ट्रिफोलियस प्रैटेन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- यदि हथेलियों में चुनचुनाहट होती हो। हाथ-पैर ठण्डे पड़ गए हो तथा जांघों के अन्दर घाव हो गया हो तो ऐसे लक्षणों में ट्रिफोलियस प्रैटेन्स औषधि का सेवन करना चाहिए।
तुलना :-
ट्रिफोलियस प्रैटेन्स औषधि की तुलना ट्रिफोलियम रेपेन्स से की जाती है।
मात्रा :-
ट्रिफोलियस प्रैटेन्स औषधि के मूलार्क का प्रयोग किया जाता है।
विशेष :-
ट्रिफोलियस प्रैटेन्स औषधि के स्थान पर ट्रिफोलियम रेपेन्स औषधि का प्रयोग विशेष लक्षणों के आधार पर किया जाता है जैसे- कान के जड़ में सूजन होना। लालाग्रंथियों में खून जमा होने जैसा महसूस होना। दर्द व कठोरता उत्पन्न होना विशेषकर निम्नहनुग्रंथियों में तथा लेटने पर रोग का बढ़ जाना। मुंह में पानी की तरह लार का आना तथा लेटने पर लार का और अधिक आना। मुंह और गले में खून जैसा स्वाद महसूस होना। ऐसा महसूस होना जैसे हृदय बंद हो गया है, रोगी में डर उत्पन्न होना साथ ही उठकर बैठने तथा टहलने पर आराम मिलना। चेहरे पर अधिक पसीना आना आदि।
ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ TRICHOASANTHES DIOIUM
ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि का प्रयोग मुख्य रूप से पुराना मलेरिया का बुखार, काला-ज्वर (कालाजार) तथा जी मिचलाना व उल्टी को ठीक करने के लिए किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि का उपयोग :-
मन से सम्बंधित लक्षण :- रोगी की मानसिक हालत बिगड़ने के कारण उसमें अधिक निराशा उत्पन्न होता है और उसे ऐसा महसूस होने लगता है जैसे कि वह किसी भी काम को कर नहीं सकता है। ऐसे मानसिक लक्षण वाले रोगी को ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि देनी चाहिए।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर चकराना विशेषकर बिस्तर पर लेटते समय तथा बुखार के साथ तेज सिर दर्द होना आदि सिर से सम्बंधित लक्षणों में ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि का सेवन करना चाहिए।
आंखों से सम्बंधित लक्षण :- आंखों का पीला होना तथा पुतलियों का फैल जाना आदि लक्षणों में रोगी को ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि देने से लक्षण समाप्त होते हैं।
मुंह से सम्बंधित लक्षण :- प्यास का अधिक लगने के साथ गले में सूखापन महसूस होना। मुंह से लार का अधिक आना तथा मुंह का स्वाद खराब होना। मुंह के अन्दर पानी का भरना तथा मुंह का स्वाद कड़वा होना आदि मुंह से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि देने से रोग ठीक होता है।
गले से सम्बंधित लक्षण :- गले में जलन होने पर ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि का सेवन करने से जलन आदि दूर होती है।
उल्टी, डकारें व हिचकी से सम्बंधित लक्षण :- जी मिचलाना व साथ पेट का फूल जाना। उल्टी करने से मुंह से रेशेदार बलगम का आना तथा कभी-कभी खून मिला हुआ बलगम आना। पानी पीने के बाद डकार व उल्टी होना आदि लक्षणों में रोगी को ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि का सेवन कराना चाहिए।
भूख से सम्बंधित लक्षण :- अधिक भूख लगना तथा ठण्डी चीजे खाने की अधिक इच्छा होना आदि लक्षणों में ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- बाहरी अंगों से सम्बंधित ऐसे लक्षण जिसमें पूरे शरीर पर जलन होने के साथ अधिक प्यास लगती है। ऐसे लक्षणों में ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि लेनी चाहिए। निम्नागों में सूजन आने पर भी इस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण :- पेट से सम्बंधित ऐसे लक्षण जिसमें भोजन करने के बाद भी पेट खाली-खाली सा लगता रहता है तथा बेचैनी के साथ पेट में गर्मी महसूस होती रहती है। जिगर और प्लीहा बढ़ जाने के कारण उन अंगों में दर्द होता रहता है जो छींकने, खांसने या चलने से और बढ़ जाता है। इस तरह के लक्षणों में ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
दस्त से सम्बंधित लक्षण :- हरे-पीले रंग के दस्त आने के साथ अधिक मात्रा में दस्त आना तथा दस्त के साथ पित्त, श्लेष्मा तथा खून का आना। दस्त बार-बार आने के कारण अधिक थकान महसूस होना तथा मलद्वार में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि देनी चाहिए।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण :- पेशाब का कम मात्रा में तथा लाल रंग का आना। पेशाब रुकने के साथ दस्त व उल्टी का आना आदि मूत्र से सम्बंधित लक्षणों में ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि का सेवन करें।
बुखार से सम्बंधित लक्षण :- बुखार के ऐसे लक्षण जिसमें रोगी को 11 से 12 बजे सर्दी लगने के साथ बुखार उत्पन्न होता है, पूरे शरीर में जलन रहती है, शरीर का तापमान बढ़ जाता है, सिरदर्द रहता है तथा अधिक प्यास लगती है। ऐसे लक्षणों वाले बुखार में ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि का सेवन कराने से बुखार जल्दी ठीक होता है। तेज बुखार के साथ उल्टी, जी मिचलाना, मुंह में अधिक पानी आना तथा अगले दिन बुखार का और तेज हो जाना। पुराने बुखार में जिसके कारण जिगर एवं प्लीहा बढ़ जाना। ऐसे लक्षणों में ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि का सेवन कराना चाहिए।
मात्रा :-
ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि के मूलार्क, 3x, 6x या 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
विशेष :-
ऐसे सभी बुखार जिनमें पित्त की प्रमुखता होती है, उनमें आंखों से किसी वस्तु का आधा भाग दिखाई देने वाले लक्षण उत्पन्न होते हैं। ऐसे लक्षणों वाले बुखारों को ठीक करने के लिए पित्त की प्रमुखता होती है। ऐसे लक्षणों में ट्रिकोसैन्थेस डाइयोआ औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी माना गया है। इस औषधि में सिर दर्द, मुंह में पानी का आना, मिचली व उल्टी आदि को समाप्त करने की शक्ति होती है।
ट्रिलियम पेण्डूलम TRILLIUM PENDULUM
ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि शरीर के विभिन्न अंगों से होने वाले रक्तस्राव (खून का बहाव) को रोकने में लाभकारी होता है। पुराने दस्त रोग के ऐसे लक्षण जिसमें दस्त के साथ खून व श्लेष्मा (बलगम) आता है। ऐसे लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
यह औषधि गर्भाशय से खून का निकलना, अधिक रक्तस्राव (खून बहने) के कारण गर्भपात होने की आशंका, मलद्वार का शिथिलता तथा ऐंठन वाले दर्द आदि को दूर करती है। टी.बी. के लक्षणों के साथ अधिक मात्रा में पीब मिला हुआ बलगम आना, थूक के साथ खून आना आदि लक्षणों में ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
इस औषधि के प्रयोग से रोगी में उत्पन्न हो सकने वाले लक्षण जैसे- रोगी में बेहोशी या चक्कर जैसी स्थिति उत्पन्न होना।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि का उपयोग :-
सिर से सम्बंधित लक्षण :- सिर में ऐसा दर्द होता है जो शोर-शराबे से और तेज भी हो जाता है। रोगी का मस्तिष्क हमेशा भ्रमित रहता है तथा उसे अपनी आंखें बड़ी महसूस होती रहती है। इस तरह के लक्षणों में ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बंधित लक्षण :- आंखों से साफ दिखाई न देना तथा सभी वस्तुएं नीली दिखाई देने जैसे लक्षणों में ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि लेनी चाहिए।
नाक से सम्बंधित लक्षण :- नाक से खून आने पर ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि का प्रयोग करने से नाक से खून आना बंद होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण :- मसूढ़ों से खून आना या दांत निकलवाने के बाद मसूढ़ों से खून आने पर ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :- रोगी को ग्रासनली में ताप व जलन महसूस होती है और जलन व ताप धीरे-धीरे बढ़ते हुए आमाशय तक पहुंच जाती है। ऐसे लक्षणों में रोगी को खून की उल्टी होता है। इस तरह के लक्षणों में ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि लेने से लाभ होता है।
मलाशय से सम्बंधित लक्षण :- पुराने दस्त रोग के लक्षणों में दस्त के साथ खून का आना या दस्त के साथ साफ खून का आना आदि दस्त रोग के लक्षणों में ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित :- गर्भाशय से खून आने के साथ ऐसा महसूस होना जैसे नितम्ब व कमर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएगें तथा कमर पर कस कर पट्टी बांधने से आराम मिलता है। ऐसे लक्षणों में ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि देने से आराम मिलता है। हर 2 सप्ताह में मासिकस्राव होना तथा मासिकस्राव 1 सप्ताह या उससे अधिक समय तक बना रहना और साथ ही स्राव के साथ खून आना। ऐसे लक्षणों में ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। चलने-फिरने से चमकता हुआ खून आना। गर्भाशय के चिर जाने के साथ नीचे की ओर दबाव महसूस होना। अधिक मात्रा में पीले व रेशेदार प्रदरस्राव होना। मासिकधर्म समाप्त होने के साथ गर्भाशय से खून का आना। प्रसव के बाद मूत्र का बूंद-बूंद करके टपकना तथा बच्चे के जन्म देने के बाद गर्भाशय से खून आना आदि स्त्री रोग के लक्षणों में ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गर्भाशय से सम्बंधित लक्षण :- गर्भाशय से अधिक मात्रा में खून आना तथा हल्की सी हरकत करने से भी खून निकलने लगना। मासिकस्राव के साधारण अवस्था के बाद हर दूसरे सप्ताह में स्राव के साथ स्याह रंग का जमा हुआ खून आना। गर्भाशय के अपने स्थान से हट जाने के कारण खून का निकलना आदि गर्भाशय से सम्बंधित लक्षणों में ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सांस से सम्बंधित लक्षण:- खांसी के साथ खून मिला हुआ बलगम आना। खंखारने पर अधिक मात्रा में पीब मिला हुआ बलगम आना। खांसने पर खून के छींटे आना। उरोस्थि के अंत में दर्द होना। सांस क्रिया अनियमित होने के साथ सांस रुक-रुककर चलना तथा छींके अधिक आना आदि लक्षणों में ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि का प्रयोग करने से रोग समाप्त होते हैं। इस औषधि का प्रयोग छाती में तेज चुभन युक्त दर्द होने पर भी किया जाता है।
वृद्धि :-
अधिक काम करने से, लम्बी दूरी तक घुड़सवारी करने से, हल्की सी शारीरिक हलचल से, शाम के समय, भोजन करने के बाद तथा सीधा तन कर बैठने से रोग बढ़ता है।
शमन :-
सामने की ओर झुकने से, खुली हवा में व्यायाम करने से तथा कसकर पट्टी बांधने से आराम मिलता है।
तुलना :-
ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि की तुलना ट्रिलियम सेर्नम, फाइकस, सैंगुदसुगा जोंक, इपिका, सैंबाइ, लैके और हैमामे औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
ट्रिलियम पेण्डूलम औषधि के मूलार्क या निम्न शक्तियों का प्रयोग किया जाता है।
टर्नेरा TURNERA
टर्नेरा औषधि जननेन्द्रियों से सम्बंधित लक्षणों, स्नायविक कमजोरी तथा नपुंसकता आदि को दूर करती है। स्नायविक कमजोरी से उत्पन्न यौन कमजोरी। बुढ़ापे के कारण बार-बार पेशाब का आना। लम्बे समय तक पुर:स्थग्रंथि स्राव। गुर्दे और मूत्राशय का प्रतिश्याय आदि को दूर करने के लिए इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
महिलाओं में कामोत्तेजना का अभाव तथा युवतियों में स्वाभाविक मासिकस्राव की स्थापना करने के लिए टर्नेरा औषधि का प्रयोग किया जाता है।
मात्रा :-
टर्नेरा औषधि के मूलार्क 10 से 30 बूंद की मात्रा में लगभग 30 ग्राम पानी में मिलाकर दिन में 2 बार लेनी चाहिए।