डियुबांयसिया (DUBOISIA)
डियुबांयसिया (DUBOISIA)
आमतौर पर यह औषधि स्नायुतन्त्र, आंख और श्वसन तन्त्र के ऊपरी भाग पर अधिक प्रभाव डालती है। कभी-कभी स्नायुतन्त्र के क्रियाशील होने के कारण रोगी को प्रतीत होता है कि उसके शरीर के किसी भी अंग में ताकत नहीं है, चलते-चलते व्यक्ति ठोकर खाकर गिर पड़ता है। पैरों में शून्यता आ जाती है तथा हाथ पैरों में कंपन होती है। रोगी आंख बन्द करके खडे़ होने पर गिर पड़ता है आदि लक्षणों के होने पर डियुबांयसिया औषधि का उपयोग किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों के लक्षणों के आधार पर डियुबांयसिया औषधि का उपयोग :
मन से सम्बंधित लक्षण: स्मरणशक्ति कमजोर होने पर डियुबांयसिया औषधि का उपयोग लाभकारी होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण : आंखें बन्द करके खड़े न हो पाना, पीछे की ओर गिरने का अहसास होना आदि लक्षणों में डियुबांयसिया औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बंधित लक्षण : आंख आना (कांजक्टीविटिज), आंख के सामने अंधेरा छाना, तरुण आंख की पुतली का फैल जाना, समंजन का पक्षाघात (पैरालाइसिस ऑफ अक्कोम्मोडेशन), स्वच्छपटल की अतिरक्तसंकुलता (हाइपेरीमिया ऑफ रैटिना), समंजनदुर्बलता (वीकनेस ऑफ अक्कोम्मोडेशन),रक्तवाहिनियां पूर्ण और आड़ी तिरछी, नेत्रपटल फैले होने के कारण आंखों की दृष्टि का कमजोर होना। आंख के ऊपर, आंख और भौंह के बीच वाले भाग में दर्द आदि आंखों के विकार होने पर डियुबांयसिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वसन संस्थान के रोग से सम्बंधित लक्षण : सूखी खांसी के कारण सांस लेने में परेशानी, आवाज में तीखापन, बोलने में कठिनाई तथा गले में भारीपन आदि अनेक रोग होने पर डियुबांयसिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी के अंगों के विभिन्न लक्षण : शरीर के बाहरी अंग कमजोर होना, शरीर का लड़खड़ाना, चलते समय ऐसा प्रतीत होना कि जैसे खाली स्थान पर पैर रख रहा हो तथा कमजोरी आदि होने पर डियुबांयसिया औषधि का उपयोग लाभकारी होता है।
बुखार :
बुखार से पीड़ित रोगी को डियुबांयसिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे रोगी को बुखार से छुटकारा मिल जाता है।
सम्बंध :
डियुबांयसिया औषधि, मस्केरिन औषधि की विपरीत गुणों वाली औषधि है।
प्रतिविष :
मार्फिया, पिलोकार्प औषधि का उपयोग डियुबांयसिया औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
तुलना :
डियुबांयसिया औषधि की तुलना बेला, स्ट्रामों, हायोसा आदि औषधियों के गुणों से की जा सकती है।
मात्रा :
तीसरी से बारहवीं शक्ति।
डाफ्ने इंडिका (DAPHNE INDICA)
यह औषधि निम्न ऊतकों, मांसपेशियों, हडि्डयों और त्वचा पर अपनी क्रिया करती है तथा उपदंश के विष में उपयोगी होती है। इसकी कमी से शरीर के विभिन्न अंगों में स्पार्किंग के समान झटके महसूस होते हैं।
रोगी में तम्बाकू पीने की तीव्र इच्छा होती है तथा पेट में होने वाली जलन इस प्रकार महसूस होती है कि जैसे शरीर के सभी अंग शरीर से अलग हो गये हो और सांस, पेशाब और पसीने से दुर्गंध आती है। उपरोक्त लक्षणों में डाफ्ने इंडिका औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
डाफ्ने इंडिका औषधि का विभिन्न रोगों के लक्षणों उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण : जब सिर में इस प्रकार की जलन महसूस हो रही है कि सिर फट जाएगा या ऐसा प्रतीत होता है कि सिर को धड़ से अलग किया जा रहा है। ऐसी स्थिति में डाफ्ने इंडिका औषधि का प्रयोग करना उपयोगी होता है।
पेशाब का रंग से सम्बंधित लक्षण : यदि पेशाब गाढ़ा, पीले रंग का होता है तथा पेशाब की गंध सड़े हुए अण्डे के गंध के समान हो तो डाफ्ने इंडिका औषधि का सेवन करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण : दांये पैर का अंगूठा सूजन लिए हुए, दर्दनाक, दर्द ऊपर की ओर बढ़ता हुआ पेट तथा हृदय तक पहुंच जाता हो, जांघों के बगल में और घुटनों में दर्द होता हो नितम्बों (हिप) में ठण्डक महसूस हो रही हो तो, गोली लगने के समान दर्द प्रतीत हो रहा हो तथा उपरोक्त दर्द ठण्ड के साथ बढ़ते हो तो डाफ्ने इंडिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बंधित लक्षण : जब किसी व्यक्ति को बिल्कुल ही नींद न आती हो, इस प्रकार की अवस्था कई बार हडि्डयों के दर्द के कारण प्रकट होती है। डरावने सपने आते हों, नींद में चौक जाने के बाद सर्दी लगती हो तथा शरीर की त्वचा चिपचिपी हो जाती है तो इस दशा में डाफ्ने इंडिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
प्रतिविष :
ब्रायो, रस-टा औषधियों का उपयोग डाफ्ने इंडिका औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
तुलना :
फ्लोरिक एसिड, औरम, मेजीरियम, स्टैफिर्स।
डाफ्ने इंडिका औषधि के उपयोग की मात्रा :
पहले से छठी शक्ति तक।
डेस्मोडियम (DESMODIUM)
डेस्मोडियम औषधि, ब्रायोनिया और जेलसीमियम औषधि के समान एक भारतीय औषधि है।
शरीर के विभिन्न लक्षणों के आधार पर डेस्मोडियम औषधि का उपयोग :
हाथ-पैरों में जलन, नींद न आना, शरीर का दर्द, वात का दर्द, स्नायुशूल अथवा हल्का-हल्का दर्द होना, पीठ में दर्द होने के कारण रोगी ठीक से बैठ नहीं पाता, आंख, मुंह और हाथ-पैरों में जलन, चेहरे से ऐसा प्रतीत होता हो कि जैसे कि आग निकल रही हो, पैर में दर्द होना, पिण्डलियों में दर्द का होना, पाचनसंस्थान में दर्द होना, सिर डोरी से बंधा हुआ प्रतीत होना आदि शरीर के विभिन्न लक्षणों में डेस्मोडियम औषधि लाभकारी होती है।
तुलनाः
सम्बंध ब्राय, कैप्सि , डल्का, जेल्स, रस-टा और सल्फर
डेस्मोडियम गैंजेटिकम Desmodium Gangeticum
सिर दर्द से सम्बंधित लक्षण : जब किसी व्यक्ति को सिर दर्द में ऐसा महसूस होता हो कि उसके सिर को चारो ओर से कसकर बांध दिया गया हो तो ऐसी स्थिति में डेस्मोडियम गैंजेटिकम औषधि का उपयोग किया जाता है।
शारीरिक दर्द से सम्बंधित लक्षण: पूरे शरीर में नाड़ी दर्द के समान दर्द, रीढ़ की हड्डी में दर्द के कारण सीधे न बैठ पाना, हाथों तथा पैरों में जलन की अनुभूति तथा चेहरे से गर्मी का असर आदि होने पर डेस्मोडियम गैंजेटिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
ज्ञानेन्द्रियां : अनिद्रा, जड़िमायुक्त नींद।
बुखार से सम्बंधित लक्षण : सविरामी तथा अल्पविरामी बुखार जो सुबह के समय हल्की ठण्ड लेकर आता है और लगभग 2-3 घंटे तक रहता है, के साथ अनिद्रा और मानसिक अवसाद तथा ठण्ड महसूस होने पर डेस्मोडियम गैंजेटिकम औषधि का उपयोग लाभकारी होता है।
मात्रा :
डेस्मोडियम गैंजेटिकम का मूलार्क, 3X, 6X तथा डेस्मोडियम गैंजेटिकम 30वीं शक्ति का प्रयोग करें।
डिजिटैलिस DIGITALIS
उन सभी रोगों में प्रभावशाली कार्य करती है जहां प्रमुख रूप से हृदय रोग ग्रसित हो, जहां नाड़ी दुर्बल, अनियिमित, सविरामी और असाधारण रूप से शिथिल हो तथा बाहरी और आन्तरिक अंगों पर सूजन हो। हृदय की पेशियों में दुर्बलता और फैलाव पर इस औषधि की क्रिया सर्वोत्तम होती है। इस औषधि का उपयोग हृदय के नष्ट होने (विशेषकर जब अलिन्द विकम्पन (औरीक्युलर फीब्रिलेशन) आरम्भ हो जाता है) में किया जाता है। झुकी हुई अवस्था में लेटने से नाड़ी चलने की गति सामान्य से कम हो जाती है तथा बैठने पर नाड़ी की गति अनियमित और दोहरी चलती हुई प्रतीत होती है। इसका उपयोग हृदय रोग के अन्य लक्षणों जैसे अधिक शारीरिक दुर्बलता तथा शारीरिक शक्ति में कमी होना, बेहोशी, त्वचा का ठण्डापन और अनियमित श्वास, तम्बाकू के सेवन से होने वाले आंखों के विकार, यकृत की कठोरता, और यकृत की वृद्धि के फलस्वरूप होने वाले पीलिया आदि लक्षणों में किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों के लक्षणों के आधार पर डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का उपयोग :
मन से सम्बंधित लक्षण : मन में निराशा छाना, भय होना, भविष्य के बारे में चिन्तित होना, ज्ञानेन्द्रियों का कमजोर होना, मानसिक चिड़चिड़ापन तथा नाड़ी की गति बिल्कुल ही सुस्त होना आदि मानसिक विकारों में डिजिटैलिस औषधि का उपयोग किया जाता है।
सिर : चलते समय तथा उठते समय, हृदय रोगों में और यकृत के रोगों के साथ सिर में चक्कर आना, सिर में तेज दर्द जो नाक तक होता है, सिर में भारीपन के साथ ऐसा प्रतीत होना कि वह अभी नीचे की ओर गिर पड़ेगा, चेहरा नीले रंग का होना, भ्रम होना, नींद लगते ही तेज आवाज सुनाई देना, जीभ और होंठों का रंग नीला होना सिर से सम्बंधित विकारों में डिजिटैलिस औषधि का उपयोग करना लाभकारी होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों की पलकों में नीलापन, आंखों के आगे गहरे रंग की मक्खियां उड़ते हुए दिखाई पड़ना, हरा रंग पहचानने में भ्रम होना, सभी वस्तुएं हरे और पीली रंग की दिखाई पड़ना, आंखों की पुतलियों का अस्वाभाविक रूप से फैलना, आंखों की पलकों के सिरे का लाल होना तथा दृष्टि कमजोर होना आदि आंखों के रोगों में डिजिटैलिस औषधि का उपयोग किया जाता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : मुंह का स्वाद मीठा और मुंह में हमेशा लार भरा रहना, जी का अधिक मिचलाना, अधिक दुर्बलता, आमाशय में सुन्नता व जलन, ठण्डी वस्तुएं खाने से नाक तक होने वाला तेज सिर दर्द, चलने-फिरने से बेहोशी और उल्टी होना, थोड़ा सा ही भोजन कर लेने के बाद अथवा भोजन की सुगंध से असहज महसूस होना, पाचनशक्ति का कमजोर होना तथा आमाशय का स्नायु का दर्द जिसका भोजन करने से कोई सम्बंध नहीं रहता आदि आमाशय से सम्बंधित विकारों में डिजिटैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण : पेट के बांये हिस्से में नीचे से ऊपर की होने वाला दर्द, पेट का तेज दर्द, औदरिक महाधमनी (एब्डोमिनल अर्टो) में जलन, पेट का खाली लगना, यकृत की वृद्धि, जलन और दर्द आदि पेट के विकारों में डिजिटैलिस औषधि का सेवन किया जाता है।
मल से सम्बंधित लक्षण : राख के समान सफेद रंग का मल होना, मल का चिकना होना तथा पीलिया से पीड़ित रोगी को दस्त होना आदि विकारों में डिजिटैलिस औषधि लेना लाभकारी होता है।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण : पेशाब करते समय पेशाब का बूंद-बूंद होना, गहरे रंग का गर्म पेशाब होना, मूत्राशय में जलन के साथ तेज दर्द का होना, अमोनिया के समान दुर्गंध महसूस होना, मूत्रमार्ग की जलन, पेशाब कर चुकने के बाद ऐसा महसूस होना कि मूत्राशय अभी खाली नहीं हुआ है, लिंग में सिकुड़न और जलन, पेशाब में ईंट के बारीक चूर्ण के समान तलछट जमा होना आदि मूत्र सम्बंधी रोगों में डिजिटैलिस औषधि उपयोगी होती है।
स्त्रियों के रोगों से सम्बंधित लक्षण: स्त्रियों में मासिक स्राव से पहले पेट और पीठ में प्रसव के दर्द के समान दर्द महसूस होना तथा गर्भाशय के बाहरी झिल्ली से रक्तस्राव होने पर डिजिटैलिस औषधि दी जाती है।
पुरुषों के रोग : स्वप्नदोष, सेक्स क्रिया के बाद जननांगों में अधिक दुर्बलता, अण्डकोश का बढ़ जाना, लिंग की सुपारी में सूजन तथा जननांगों के सूजन आदि विकारों में डिजिटैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
श्वसन संस्थान से सम्बंधित लक्षण : गहरी सांस लेने की इच्छा, सांस लेने की क्रिया का अनियमित होना, गहरी आहे भरना, खांसी के साथ सीने में कच्चेपन और दु:ख का अनुभव, मीठा-मीठा बलगम, वृद्धावस्था के समय का निमोनिया, सीने में दुर्बलता, सांस लेने में कष्ट, निरन्तर सांस लेने की इच्छा होना, फेफड़ों का तंग महसूस होना, श्वासनली की सूजन, फेफड़ों की निष्क्रिय, रक्तसंकुलता, जिसमें हृदय की अनुचित मांसपेशियों के कारण थूक में खून आता हो तथा रक्तनिष्ठीवन (हिमोप्टाइसिस) के साथ हृदय कमजोर होना आदि विकारों में डिजिटैलिस औषधि का उपयोग में लायी जाती है।
हृदय से सम्बंधित लक्षण : थोड़ी ही दूर तक चलने से शरीर में बहुत तेज धड़कन होने लगती है और ऐसा महसूस होता है कि कुछ देर और दूरी तक चलने से हृदय की धड़कन बन्द हो जाएगी, हृदय में हमेशा सूईयों के चुभने जैसा दर्द, हृदय की धड़कन अनियमित होना, नाड़ी की गति अधिक मन्द होना, हृदय का रंग नीला होकर उसके आकार में परिवर्तन होना, नाड़ी की गति बदलते रहना तथा कभी-कभी ऐसा प्रतीत होना कि हृदय की धड़कन रुक गई हो आदि हृदय सम्बंधी रोगों में डिजिटैलिस औषधि लेते हैं।
फेफड़ों के रोग : वृद्ध व्यक्तियों में फेफड़ों में जलन होना, न्यूमोनिया जिसमें आलूबुखारा के समान शरीर से कफ निकलता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण : पैरों की सूजन, हाथ-पैरों का ठण्डा होना, गठिया का दर्द, जोड़ों पर सफेद चमकदार सूजन, मांसपेशियों की दुर्बलता, रात को उंगलियों की सूजन तथा टांगों में बिजली के करंट के समान महसूस होना आदि विकारों में डिजिटैलिस औषधि का उपयोग किया जाता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण : नींद में चौंककर जागना और नींद में ही ऐसा प्रतीत होना जैसे कि वह काफी ऊंचाई से नीचे फेंक दिया गया हो आदि लक्षणों में डिजिटैलिस औषधि का उपयोग किया जाता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण : तेज बुखार के साथ शरीर में अचानक होने वाली जलन और उसके बाद भारी स्नायविक दुर्बलता आदि में डिजिटैलिस औषधि का उपयोग किया जाता है।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण: शरीर की त्वचा पर गहरे रंग के लाल चकत्ते जोकि पीठ पर अधिक होते हैं और चेचक के दानों के समान होते है तथा आंखों की पलकें, कान, होंठ और जीभ की नाड़ियां नीली रंग की होकर फैल जाती हैं।
वृद्धि : तनकर बैठने, खाना खाने के बाद संगीत सुनने से, कठिन परिश्रम से, बांयी करवट लेटने से तथा संभोग अधिक करने से रोग में वृद्धि होती है।
सम्बंध : एण्टि-क्रू, एपिस, आर्स, बेल, ब्राय, कोन, फेरम-फा, हेल, इपी, काली-फा, लैके, लोबे लायको, मर्क, नक्स-वो, ओपि, पल्स, रस-टा, सीपि, स्पाइ, सल्फ, टबे, वेरेट्रम और जिंक से तुलना की जा सकती है।
मात्रा :
मूलार्क से तीसवीं शक्ति।
डायोस्कोरिया विल्लोसा DIOSCOREA VILLOSA
इस औषधि का उपयोग हमारे शरीर के विभिन्न प्रकार के दर्दों विशेषकर पेट दर्द एवं शरीर के आन्तरिक अंगों के दर्द में अत्यंत लाभकारी होता है। डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का नाम होमियोपैथिक की उन औषधियों के साथ लिया जाता है जिसका उपयोग एक से अधिक रोगों के इलाज के लिए किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग करने से पाचनशक्ति ठीक होती है।
शरीर के विभिन्न लक्षणों के आधार पर डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का उपयोग :
मन से सम्बंधित लक्षण : जब कोई व्यक्ति अपने मित्र का अथवा किसी परिचित का सही नाम भूल जाता है, उसे गलत नामों से पुकारता है तथा उसके मन में उत्तेजना और घबराहट रहती है तो डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इसके अलावा उपरोक्त लक्षणों में आर्स तथा फास औषधि का भी प्रयोग कर सकते हैं।
सिर से सम्बंधित लक्षण : सिर के दोनों ओर कनपटियों में हल्का-हल्का दर्द जो धीरे-धीरे करके घटता-बढ़ता रहता है तो डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : सुबह के समय मुंह सूखा और कड़वा लगना, जीभ परतदार हो, प्यास न लगती हो, दुर्गंधयुक्त गैस की अधिक मात्रा में डकार आना, आमाशय का स्नायुशूल (न्युरेल्गिया ऑफ स्टोमेक), हृदय की जलन, उरोस्थि (स्टेरनम) के साथ बांहों तक दर्द होता हो, कड़वी तथा खट्टी डकारों के साथ-साथ हिचकी आती हो तथा पाचनतन्त्र का ऐसा दर्द जो खडे़ हो जाने पर ठीक हो जाता हो आदि विभिन्न आमाशयों के लक्षणों में डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का सेवन करने से बहुत अधिक लाभ मिलता है।
पेट का दर्द से सम्बंधित लक्षण : पेट में इस प्रकार का दर्द होना जो पेट से दूर शरीर के अन्य अंगों जैसे हाथ और पैरों की अंगुलियों में प्रकट होता हो, पेट में गड़गड़ाहट के साथ गैस का बनना, पाचन संस्थान में ऐंठन तथा जलन होना, पेट दर्द जिसमें धीरे-धीरे टहलने से दर्द कम होता है यह दर्द पेट से घूमता हुआ सीने से हाथों आदि अंगों तक हो जाता है, आगे की ओर झुकने तथा लेटने पर कष्ट बढ़ जाता हो, यकृत का तेज दर्द जो तेजी से गोली के समान ऊपर की ओर बढ़ता हुआ दांयें स्तन तक फैल जाता है, पित्ताशय (गाल ब्लेड्डर) से छाती, पीठ तथा बांहों का दर्द, वृक्कशूल (रेनल कोलिक) के साथ शरीर के बाहरी अंगों में दर्द होना तथा खाना खाने के तुरंत बाद मल त्यागने की इच्छा होना आदि लक्षणों के होने पर डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हृदय सम्बंधी रोग से सम्बंधित लक्षण : हृदय का दर्द, उरोस्थि के पिछले हिस्से से हाथों तक का दर्द, सांस लेने में कठिनाई होना, हृदय की धड़कन कम होना तथा विशेष रूप से पेट के फूलने पर होने वाला दर्द जो सीने तक होता है आदि लक्षणों में डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
खूनी बवासीर से सम्बंधित लक्षण : रोगी व्यक्ति में शरीर के साथ यकृत तथा किसी धारदार हथियार लगने के समान दर्द का होना, बवासीर के मस्से अंगूर के गुच्छे के समान बढ़कर बाहर की ओर फैल जाते हैं जिसके कारण मलद्वार में दर्द उत्पन्न होता है, पीले रंग का दस्त आना जिसमें सुबह के समय दर्द में वृद्धि होती है, उसके बाद शरीर में अधिक दुर्बलता आती हो तथा ऐसा प्रतीत होता हो कि पेट की गैस और मल दोनों ही बहुत अधिक गर्म हैं। ऐसी स्थिति में डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पुरुषों के गुप्त रोग से सम्बंधित लक्षण : पुरुष के अन्दर सेक्स पावर में कमी, लिंग में उत्तेजना की कमी, पुरुषों के अण्डकोष तथा स्त्रियों के स्तनों में निकलने वाले पसीने से होने वाली गंध, स्वप्नदोष या अन्य कारणों से वीर्यपात होने के कारण होने वाली घुटनों की दुर्बलता आदि विभिन्न धातु सम्बंधी रोगों में डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का प्रयोग करते हैं।
स्वप्नदोष से सम्बंधित लक्षण : स्वप्नदोष की बीमारी में डायस्कोरिया औषधि लाभकारी होती है। इस रोग से पीड़ित व्यक्ति रातभर स्वप्न में स्त्रियों को देखता है जिसके परिणामस्वरूप रोगी को एक रात में दो-तीन बार स्वप्नदोष हो जाता है जिसके परिणामस्वरूप रोगी को सुबह जागने के बाद बहुत अधिक कमजोरी महसूस होती है तथा रोगी के घुटने इतने अधिक कमजोर हो जाते हैं कि उन्हें खडे़ होने में ही बहुत अधिक कष्ट होता है। स्वप्नदोष के कारण रोगी के घुटने में बहुत अधिक दर्द होता है जिसके कारण उन्हें खडे़ होने में अधिक परेशानी महसूस होती है। स्वप्नदोष के रोग में डायस्कोरिया औषधि के अतिरिक्त अन्य औषधि का भी प्रयोग किया जा सकता है. जैसे- नक्सवोमिका, लाइकोपोडियम, सेलेनियम, कोनायम, कैलेडियम, जेल्सेमियम, एसिड-फास, डिजिटैलिस, नेट्रम-फास, फास्फोरस आदि।
स्त्रियों के रोग से सम्बंधित लक्षण : गर्भावस्था के दौरान स्त्रियों के गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली में दर्द के होने पर डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
श्वसन संस्थान से सम्बंधित लक्षण : सांस लेते समय ऐसा प्रतीत होता है जैसे कि छाती में सांस लेने के लिए जगह नहीं मिल पा रही है तथा दुर्गंधित वायु की बड़ी-बड़ी डकारें आदि आने पर डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण : पीठ में लंगड़ापन (LAMENESS) की अनुभूति जो झुकने से बढ़ जाती है, जोड़ों में हल्का-हल्का दर्द और अकड़न का होना, गठिया का दर्द का तेजी के साथ जांघों के नीचे फैल जाना तथा जांघ के निचले हिस्से में दर्द का अधिक होना, पूरी तरह से शान्त बैठे रहने या लेटे रहने पर हल्का पड़ जाता है। नाखून के घावों की प्राराम्भिक अवस्था में जब पहले चुभन महसूस होती है तथा हाथ-पैरों की उंगलियों में संकुचन के साथ-साथ मांसपेशियों में ऐंठन होना आदि शारीरिक लक्षणों में डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
रूपात्मकताएं :
शाम को तथा रात को, लेटे रहने से तथा दोहरा होने से इस औषधि के रोगी में वृद्धि, तथा सीधे होकर खड़ा रहने से, खुली हवा में टहलने से तथा दबाव देने से इस औषधि के रोगी में रोग के लक्षणों में कमी होती है।
दोषों को दूर करने वाला :
डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का अधिक मात्रा में उपयोग करने से होने वाले दोषों को दूर करने के लिए कमो तथा कैम्फ औषधि का प्रयोग करें।
सम्बंध :
कोलोसिन्थ, फास, पाडो, रस-टाक्स और साइली।
तुलना :
डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि की तुलना कोलो, नक्स, कमो, ब्रायो आदि औषधियों से की जा सकती है।
ह्यस (एमेलिओरेशन):
इस औषधी से पीड़ित रोगी को टहलने या चलने-फिरने से थकान आने लगती है लेकिन इसके बावजूद भी रोगी टहलना और चलना-फिरना जारी रखता हो तो उसका स्वास्थ्य धीरे-धीरे करके ठीक होने लगता है।
डायोस्मा लिंकैरिस (DIOSMA LINCARIS)
डायोस्मा लिंकैरिस औषधि जिन रोगजन्य लक्षणों को उत्पन्न करती है वे हैं आलस्य, स्नायु के कारण उत्पन्न अनिद्रा का रोग तथा रात्रि के समय आने वाला पसीना, चिड़चिड़ापन, रोने की इच्छा होना और रोगी होने का डर होना, तेज चक्कर आना, मस्तिष्क का दर्द जो प्रमुख रूप से सिर में होता है। आंखें चमकदार होने के साथ आंखों में आंसू आना और खुजली होना, कम सुनाई देना, कानों पर दबाव देने से कानों के अन्दर तेज शोर सुनायी पड़ना, जी मिचलाना, दुर्गंध युक्त सांस, साथ ही खालीपन की अनुभूति होना, उदरस्फार (मेटीओरिज्म) के साथ प्लीहा में दर्द होना, पेट के अन्दर दर्द के साथ जांघों में दबाव का अनुभव होना, गहरे खूनी रंग का पेशाब होना, बार-बार पीले रंग का दस्त होना जोकि रात के समय अधिक बढ़ जाते हैं, मासिक स्राव का अधिक मात्रा में होना जिसे स्त्रियों को पहले से ही महसूस होता है तथा कभी-कभी मासिक स्राव बढ़कर रक्तप्रदर के रूप में बदल जाता है, पेट में खाना खाने के बाद ऐंठन के साथ दर्द का होना, हाथों में गर्म या ठण्ड अहसास होने के साथ उंगलियों की आक्षेपी गतियां आरम्भ हो जाती हैं, टांगों की दुर्बलता, जो नीचे बैठने से और अधिक बढ़ जाती है।
इस औषधि का उपयोग प्लीहा की सूजन (स्प्लेनिटीजै), स्नायविक अथवा साधु-सन्तों को होने वाले विकारों में जब मृत्यु हमेशा बना रहता है अथवा मिरगी या पागलपन के दौरे पड़ते हैं, जठरशूल (गैस्ट्रैल्गिया), आकिस्मक भय के साथ टांगों में कमजोरी और कम्पन होना आदि लक्षणों में उपयोगी होता है।
डिफ्थेरीनम (DIOSMA LINCARIS)
डिफ्थेरीनम औषधि विशेषरूप से श्वसन सम्बंधी रोगों से पीड़ित रहने वाले रोगियों तथा कंठमाला प्रकृति के रोगियों के लिए आवश्यक है।
डिफ्थेरिनम औषधि के प्रधान लक्षण : रोग के प्रारम्भ होते ही नाक से खून निकलता है और बहुत अधिक कमजोरी आ जाती है, शरीर का तापमान पहले की अपेक्षा घट जाता है। नाड़ी तेज और क्षीण हो जाती है। रोगी बेहोशी की अवस्था में पड़ा रहता है। बीमारी आरम्भ होते ही खतरनाक रूप धारण कर लेती है। गले की ग्रन्थि और जीभ फूल जाती है, जीभ लाल हो जाती है और अधिक मैली नहीं रहती है। नाक-मुंह और थूक बलगम आदि सभी अंगों में स्राव का होना तथा सांस में अधिक तेज बदबू आती है। तालुमूल और उसके आस-पास के स्थान पर सूजन हो जाता है और तालु काले रंग की हो जाती है। झिल्ली मोटी और काली हो जाती है। व्यक्ति कोई भी पीने वाली वस्तु आसानी से पी तो लेता है परन्तु पीने के बाद या तो उल्टी हो जाती है या नाक के द्वारा बाहर निकल जाती है।
डिफ्थीरिया और लैरेज्जियल डिफ्थीरियल और डिफ्थीरिया आरोग्य हो जाने के बाद लकवा हो जाए, तो इस औषधि से लाभ होगा।
सम्बंध :
आर्स, बैप्टी, ब्रोम, कार्बो-ए, काष्टि, क्लोर, जेल्स, लैके, म्यूरे-ए, फास, जेल्स।
मात्रा :
तीसवीं से 200 से उच्चशक्ति। इस औषधि को बार-बार नहीं देना चाहिए।
डौलीकौस प्यूरियन्स-म्यूक्यूना DOLICHOS PURIENS-MUCUNA
इस औषधि में यकृत एवं त्वचा से सम्बंधित रोगों के लक्षणों की अधिकता पायी जाती है। वृद्धावस्था के समय होने वाली बवासीर, स्नायविक चेतना (नर्वस सेंसीबीलिटी), पूरे शरीर की खुजली आदि विकारों में तीव्र खुजली होती है।
शरीर के विभिन्न अंगों के लक्षणों के आधार पर डौलीकौस प्यूरियन्स-औषधि का उपयोग :
गले से सम्बंधित लक्षण : गले में दर्द, जबड़े के दांयें कोण के नीचे की ओर बढ़ा हुआ जैसे वहां लम्ब रूप में कोई कांटा अड़ गया हो, मसू़ढ़ों में दर्द के कारण नींद न आती हो आदि लक्षणों में डौलीकौस प्यूरियन्स-म्यूक्यूना औषधि का उपयोग किया जाता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण : सफेद रंग का मल, यकृत की सूजन, खूनी बवासीर, पैर भीग जाने के कारण होने वाला पेट का दर्द, कब्ज, खुजली तथा पेट का फूलना आदि लक्षणों में डौलीकौस प्यूरियन्स-म्यूक्यूना औषधि का प्रयोग किया जाता है।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण : डौलीकौस प्यूरियन्स-म्यूक्यूना औषधि का उपयोग बिना सूजन और दाना वाली तेज खुजली, कोहनी और घुटने के आस-पास तथा बालों वाले भागों में अधिक खुजली, पीलिया, धब्बों में पीलापन, रात के समय अधिक खुजली का होना तथा दाद-खाज-खुजली आदि लक्षणों में इसका अधिक उपयोग किया जाता है।
दांत :
दांत निकलने के समय बच्चों के मसूढ़ों में संवेदनशीलता होना, मसूढ़ों में दर्द अधिक होना तथा मसूढ़ों का फूलना आदि लक्षणों में डौलीकौस प्यूरियन्स-म्यूक्यूना औषधि का उपयोग किया जाता है।
रूपात्मकताएं :
रात के समय, खुजली होने पर दांई ओर वृद्धि।
सम्बंध :
रस-टा, बेला, हीपर, नाइट्रिक एसिड, फैगोपाइ।
मात्रा :
इस औषधि की छठी शक्ति का उपयोग किया जाता है। खूनी बवासीर में इसके मूलार्क की मात्राएं बून्दों में।
नोट : पीलिया का रोग जिसमें सफेद मल निकलता है। पीलिया का रोग ठीक होने के बाद भी त्वचा में बिना किसी प्रकार विकार हुए खुजली होती रहती है और त्वचा का रंग कालापन लिए हुए होता है।
डलकैमेरा DULCAMARA
बरसात या नमी के सीजन में ठण्ड लगने के कारण जुकाम, वात रोग या चर्मरोग हो, तो डलकैमेरा औषधि लाभकारी होती है। गर्मी के मौसम में अचानक ही वायु में नमी आ जाने से यदि किसी भी प्रकार का कष्ट हो तो इस औषधि का उपयोग किया जा सकता है। एकोनाइट की पीड़ा भी ठण्ड लगने के कारण होती है परन्तु यह ऐसी ठण्डी हवा से होती है जिसमें कि नमी न हो और डलकैमेरा की पीड़ा ठण्ड लगने से तो होती है, परन्तु उस ठण्ड में नमी भी रहती है।
शरीर के विभिन्न लक्षणों के आधार पर डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का उपयोग:
सिर से सम्बंधित लक्षण: मानसिक विकार, सिर के पिछले भाग का दर्द जो गर्दन के जोड़ों से आरम्भ होकर ऊपर की ओर बढ़ता जाता है। बातचीत करने से सिरदर्द में राहत मिलती है। मांगी हुई चीजें लेने से मना कर देता है। ठण्डे मौसम के दौरान सिर का पिछला भाग ठण्डा, भारी और दर्दनाक। सिर की त्वचा का दाद, बच्चों के सिर का गंजापन जिस पर मोटी और कत्थई रंग की पपड़ियां बनती हैं जिसे खुजलाने से खून बहने लगता है सिर के अन्दर सरासराहट होती है। उपरोक्त लक्षणों में डलकैमेरा औषधि उपयोग में लायी जाती है।
नाक से सम्बंधित लक्षण : सूखा नजला होना, नाक पूरी तरह से बन्द होना (सर्दी के मौसम में नाक बारिस होने के बाद जुकाम के कारण नाक बन्द हो जाती है), गाढे़ पीले रंग की खूनी पपड़ियां, नाक का अधिक बहना, नाक को गर्म करने की इच्छा होना, नवजात शिशु का नजला-जुकाम तथा हल्की सी भी ठण्ड लगने से नाक का बन्द हो जाना आदि लक्षणों में डलकैमेरा औषधि का उपयोग कर सकते हैं।
आंखों से सम्बंधित लक्षण : जब भी सर्दी-जुकाम होता है तो वह सबसे पहले आंखों को प्रभावित करता है। इसमें गाढे़ रंग का पीला स्राव, कणीय पलकें (ग्रेनुलर लीड्स), परागज ज्वर (हे-फीवर), खुली हवा में घूमने से आंखों से पानी का अधिक मात्रा में निकलना आदि आंखों से सम्बंधित विकारों में डलकैमेरा औषधि का उपयोग किया जाता है।
कानों से सम्बंधित लक्षण : कानों में दर्द होना, मच्छरों के समान भिनभिनाहट होना, सुई के समान चुभन महसूस होना, कर्णमूल ग्रन्थियों की सूजन, कान का बहना आदि विभिन्न कानों के लक्षणों में डलकैमेरा औषधि का उपयोग किया जाता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण : गालों का तेज दर्द जोकि बढ़ते हुए जबडे़ तक फैल जाना तथा गाल सहित पूरा चेहरा ठण्डा होना आदि लक्षणों में डलकैमेरा औषधि प्रयोग की जाती है।
मुख से सम्बंधित लक्षण : मुंह का लार चिपचिपे साबुन के समान होना, नमीदार मौसम में सर्दी लगने के कारण जीभ का खुरदरा और सूखा होना तथा गले के अन्दर मांस में खुरदापन और छिल जाने का अहसास, सर्दी के कारण होंठों के फोड़े तथा चेहरे के स्नायु का दर्द जो हल्की ठण्ड लगने के साथ ही बढ़ जाता हो आदि लक्षणों में डलकैमेरा औषधि का उपयोग किया जाता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : सफेद चिपचिपा कफयुक्त उल्टी, भोजन में अरुचि, ठण्डे पेय पदार्थों के सेवन से न बुझने वाली प्यास, हृदय की जलन, जी मिचलाने के साथ मलत्याग की इच्छा होना, उल्टी होने के दौरान ठण्ड लगना आदि विकारों में डलकैमेरा औषधि उपयोग की जाती है।
पेट से सम्बंधित लक्षण : ठण्ड लगने के कारण होने वाला पेट दर्द, नाभि के आस-पास होने वाला दर्द तथा वंक्षण ग्रन्थियों की सूजन आदि में इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
मल से सम्बंधित लक्षण : मल हरे रंग का होना, पतला एवं चिपचिपा होना, खूनी श्लेष्मा, विशेषकर गर्मियों में जब मौसम अचानक ठण्डा हो जाता है में यह औषधि लाभकारी होती है।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण: ठण्ड लगते ही मूत्रत्याग करना पड़ता है, मूत्रकृच्छ, पेशाब त्याग के समय दर्द होना, ठण्ड लगने से मूत्राशय का प्रतिश्याय, पेशाब में पीले गाढे़ रंग का पस आना तथा ठण्डे पानी में नंगे पैर चलने से उत्पन्न मूत्रकृच्छ में डलकैमेरा औषधि लाभकारी होती है।
स्त्रियों के रोग से सम्बंधित लक्षण: ठण्ड या नमी के कारण मासिक स्राव में अवरोध होना, मासिक स्राव के पहले दाना निकलना, मासिक स्राव का कष्ट के साथ होना, पूरे शरीर में धब्बे के समान होना, स्तन भारी तथा दर्दयुक्त होना आदि में डलकैमेरा औषधि उपयोग की जाती है।
श्वसन संस्थान से सम्बंधित लक्षण: खांसी होना जो ठण्ड तथा भीगे मौसम में बढ़ जाती हो, अधिक मात्रा में कफ निकलता हो, गले में गुदगुदेपन का अहसास होना, काली खांसी के काफी मात्रा में बलगम आना, सर्दियों के समय की होने वाली दर्दयुक्त खांसी, दमा के साथ श्वांस लेने की परेशानी तथा शारीरिक परिश्रम करने के बाद होने वाली परेशानी आदि में डलकैमेरा औषधि का उपयोग करते हैं।
पीठ से सम्बंधित लक्षण : गर्दन में अकड़न होना, कमर में दर्द ऐसा प्रतीत होना मानो कि वह लम्बे समय झुका रहा हो, ठण्ड लगने तथा भीग जाने के बाद गर्दन तथा कंधों के आर-पार अकड़न आदि में डलकैमेरा औषधि विशेष रूप से प्रयोग की जाती है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण : लकवा से पीड़ित अंग, बर्फ के समान ठण्डे पैर होना, हाथों पर मस्से तथा हथेलियों पर पसीना आना, जांघों में दर्द, आमवात और अतिसार की अवस्था आदि शरीर के बाहरी अंगों के लक्षणों में इस औषधि का उपयोग किया जाता है।
त्वचा सम्बंधी रोगों से सम्बंधित लक्षण : यदि ठण्ड लगने के कारण एक्जिमा हुआ हो या पित्ती उछलना (युटीकेरिया) आये, शरीर के विभिन्न अंगों जैसे चेहरे, जननांगों, हाथों आदि के दाने, चेहरे तथा हथेलियों आदि पर बडे़-बड़े कोमल मस्से आदि हो तो डलकैमेरा औषधि का उपयोग लाभकारी होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण : पूरे शरीर में जलन उत्पन्न करने वाली खुजली, शाम के समय अधिकतर पीठ में ठण्ड का अहसास होना, बर्फ के समान ठण्ड के साथ दर्द होना, त्वचा की सूखी गर्मी और जलन तथा ठण्ड के साथ प्यास लगना आदि लक्षणों में यह औषधि प्रयोग की जाती है।
वात रोग से सम्बंधित लक्षण : यदि ठण्ड लगकर हाथ-पैर और कमर में दर्द हो तथा इससे उत्पन्न वात रोग धीरे-धीरे पक्षाघात (PARALYSIS, LAKVA) में बदल जाए तो डलकैमेरा औषधि विशेष रूप से लाभकारी होती है।
विरोधी सम्बन्ध :
ऐसेटिक एसिड, बेल और लैके औषधियों के सेवन के पहले या बाद में डलकैमेरा औषधि का उपयोग नहीं करना चाहिए।
जबकि कैल्क, ब्रायो, लाइको, रस-टाक्स और सिपि के बाद डलकैमेरा औषधि का प्रयोग करने से इसके गुण बढ़ जाते हैं।
वृद्धि :
साधारणतया ठण्ड से, ठण्डी हवा से, ठण्डे नम मौसम में, मासिक धर्म, फोड़े-फुंसियों और पसीने के दब जाने से इस औषधि के रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
पूरक :
बैराइटा-कार्बोनिका,
ह्मस (ऐगग्रेवेशन) :
हरकत करने से इस औषधि के रोगी के रोग के लक्षणों में कमी आती है।
मात्रा :
डलकैमेरा औषधि की 2 से 30वीं शक्ति की मात्रा उपयोग में लायी जाती है।
डोरीफोरा (DORYPHORA)
इस औषधि का उपयोग मूत्रांगों (युरिनरी ओरगेंस) से सम्बंधित विकारों पर अधिक होता है, जिस कारण इसे सूजाक (गिनोरिया) तथा ग्लीट (गीट) में किया जाता है। स्थानिक क्षोभ तथा ग्लीट के कारण बच्चों के पेशाब के मार्ग में होने वाला जलन, शरीर के बाहरी अंगों में भारी कंपन, शरीर में शून्यता का अनुभव होना, शरीर में सूजन तथा जलन आदि में डोरीफोरा औषधि लाभकारी होती है।
पेशाब सम्बंधी रोग से सम्बंधित लक्षण : पेशाब करने में कठिनाई महसूस होना, पेशाब मार्ग में जलन तथा तेज दर्द, पीठ तथा उरुओं (लोइंस) में दर्द तथा अंगों में तेज कंपन आदि लक्षण होने पर डोरी फोरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
प्रतिविष :
स्ट्रामों औषधि का उपयोग डोरी फोरा औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
तुलना :
डोरीफोरा औषधि की तुलना एगारिक, एपिस, कैथ, लैके, काक्सि आदि औषधियों से की जा सकती है।
मात्रा :
छठी से तीसवीं शक्ति।
ड्रासेरा (ड्रासेरा रोटिन्डफोलिया) (DORYPHORA)
यह औषधि प्रमुख रूप से श्वसन अंगों को प्रभावित करती है। ड्रासेरा औषधि आमतौर पर काली खांसी के लिए बहुत अधिक उपयोगी होता है। इसीलिए होमियोपैथिक आविष्कारक हैनीमैन ने काली खांसी (हूपींग कफ) के लिए इसे प्रमुख औषधि माना है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का उपयोग :
सिर से सम्बंधित लक्षण : खुली हवा में सैर करते समय सिर में चक्कर आने के साथ बांई ओर गिरने का अहसास होना। चेहरे का बांया हिस्सा ठण्डा होने के साथ डंक लगने के समान दर्द का होना तथा दांई ओर आधे चेहरे पर सूखी गर्मी महसूस होने पर ड्रासेरा औषधि का सेवन करना चाहिए।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : जी मिचलाना, खट्टे आदि पदार्थों से अरुचि तथा उनके दुष्प्रभावों को नष्ट करने के लिए ड्रासेरा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
श्वसन संस्थान से सम्बंधित लक्षण : सूखी खांसी, काली खांसी होना, रोगी को ऐसा प्रतीत होता है कि खांसी का एक दौरा जैसे ही आता है वैसे ही दूसरा खांसी का दौरा आरम्भ हो जाता है, रोगी को सांस लेने में कठिनाई होना, घुटन होना, पीले रंग का कफ निकलना, नाक और मुंह से रक्त का निकलना, ऊब लगना, गहरी कर्कश आवाज निकलना, गले में खराश का होना, स्वरयन्त्र की सूजन तथा तालु में खुरदरापन आदि होने पर ड्रासेरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण : नितम्ब-ऊर्विका संधि (कोक्सो फीमोरल जोइंट) तथा जांघों में पक्षाघात के समान दर्द का होना, पैरों के जोड़ों में अकड़न, पैरों से चलने में परेशानी होना तथा लेटने पर बिस्तर का कठोर होना आदि लक्षणों में ड्रासेरा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
बुखार से सम्बंधित लक्षण : आन्तरिक शीत, शीत कम्प के साथ गरम चेहरा, ठण्डे हाथ, प्यास न लगना तथा हमेशा ठण्ड लगना चाहे हाथ बिस्तर पर हो आदि लक्षणों के साथ उत्पन्न बुखार में ड्रासेरा औषधि का सेवन करना चाहिए।
क्षययुक्त खांसी से सम्बंधित लक्षण : टी.बी. से पीड़ित रोगी को लगातार खांसी होने पर ड्रासेरा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
रूपात्मकताएं :
आधी रात बीतने के बाद, लेटने पर, बिस्तर की गर्मी से, पीने, गाने, हंसने से वृद्धि।
प्रतिविष :
कैम्फ औषधि का उपयोग ड्रासेरा औषधि के हानिकारक प्रभाव को दूर करने के लिए किया जाता है।
तुलना :
फ्लुओरोफार्म, चेलिडो, कोरेलि, क्यूप्रम, कैस्टेनिया, मेन्यान्थेस आदि औषधियों से ड्रासेरा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मात्रा :
पहली से बारहवीं शक्ति।rasera dracera draceraa
डोलीकस Dolisos
डालीकस की मुख्य क्रिया यकृत पर होती है। डालीकस औषधि इस प्रकार के उपसर्ग उत्पन्न करता है, जिसके कारण पीलिया का रोग हो जाता है। इससे कब्ज ठीक होकर मल सफेद रंग का होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों के लक्षणों के आधार पर डायोस्कोरिया विल्लोसा औषधि का उपयोग-
आंखों से सम्बंधित लक्षण : आंखों में पीलापन आदि होने पर चेली, सिन्चे, आयो, प्लाम्ब आदि औषधियों के साथ डालीकस औषधि का भी उपयोग किया जा सकता है।
गले से सम्बंधित लक्षण : गले की नली में दाहिनी ओर तेज चुभन भरा दर्द होता है जिस कारण उसे कुछ भी निगलने में कठिनाई होने पर डालीकस औषधि उपयोगी होती है।
खांसी से सम्बंधित लक्षण : रात को सो जाने के बाद सूखी खांसी आने पर डालीकस औषधि उपयोग की जाती है।
खुजली से सम्बंधित लक्षण : पूरे शरीर में अधिक तेज खुजली होती है लेकिन इसके बावजूद एक भी दाना आदि नहीं होता है। पीलिया का रोग ठीक हो जाने के बाद भी ऐसी ही खुजली होती है। इसके उपचार हेतु डालीकस औषधि का उपयोग किया जाता है।
त्वचा से सम्बंधित लक्षण : यदि शरीर के किसी अंग की त्वचा में कालिमा आ जाए तो डालीकस औषधि का प्रयोग करते हैं।
दाद से सम्बंधित लक्षण : यदि सूखी दाद का असर त्वचा पर आ जाता है जो हाथ-पैरों पर अधिक प्रभाव दिखाते हैं तथा पीव वाली फुंसियों के समान हो जाते हैं। ऐसे लक्षणों में डालीकस औषधि लाभकारी होती है।
सम्बंध :
कल्के-का, चेली, हिपर, रैन, पोडो, रस-टा, सल्फर।