सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर (शिंगर) Cinnabaris-Mercuruis Sulphuratus ruber (Mercuric Sulphide)
सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर (शिंगर) Cinnabaris-Mercuruis Sulphuratus ruber (Mercuric Sulphide)
सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि आंखों के तन्त्रिकाशूल की कठिन अवस्थाओं तथा गर्मी के कारण होने वाले जख्मों के लिए बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में खून जमा हो जाने के कारण दर्द का होना, सिर का दर्द इतना तेज होता है कि रोगी का चेहरा तक लाल हो जाता है। इस तरह के सिरदर्द के लक्षणों में रोगी को सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि का उपयोग बहुत लाभकारी रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों का दर्द आंसुओं की नली से होकर आंख के चारों ओर कनपटी तक फैल जाता है तथा आंखों के अंदर के कोने से शुरू होकर भौहों और कान तक पहुंच जाता है। हडि्डयों अथवा आंखों में कोटरों में बहुत तेजी से दर्द खासकर अंदर चक्षु कोण से शुरू होकर बाहर के कोने तक। रोगी की पूरी आंख का बिल्कुल लाल हो जाना, आंखों की पलकें कणांकुरित (ग्रानुलेस्टेड), आंखों के कोने और पलकों का लाल होना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि देने से लाभ मिलता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी नाक पर बहुत ज्यादा दबाव महसूस होना जैसे कि कोई नाक को दबा रहा हो, नाक की जड़ पर दबाव सा पड़ना जो नाक की दोनो हडि्डयों तक फैल जाता है। नाक के रोग के इन लक्षणों में रोगी को सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- नाक के अंदर के पीछे के हिस्से से गले के अंदर बलगम गिरता रहता है, मुंह और गले का बिल्कुल सूख जाना, रोगी के गले और मुंह में आग के जैसे लाल-लाल जख्म से होना जैसे लक्षणों में रोगी को सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण- लिंग के अगले भाग पर सूजन आना, लिंग के आगे के भाग पर मस्से से होना जिनमें से अपने आप ही खून आने लगता है, रोगी के अण्डकोशों का बढ़ जाना, अण्डकोशों में गिल्टियां (बुबोज) सी होना, आतशक के जख्म होना, जननेन्द्रियों में गर्मी के कारण गांठे और छाले होना आदि लक्षणों में रोगी को सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण- स्त्रियों को होने वाला प्रदर रोग (योनि में से सफेद पानी आना), स्त्री को अपनी योनि में दबाव सा पड़ता हुआ सा महसूस होना जैसे कि कोई योनि को दबा रहा हो, इस तरह के लक्षणों में रोगी को सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि देना लाभकारी रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की पूरे शरीर की त्वचा पर आग के जैसे लाल-लाल जख्म से होना, जांघ के आगे के भाग पर गांठों का निकल आना, रोगी के शरीर में गिल्टियां (बुबोज) होना, मासगुल्म (कोन्डीलोमा), जिसमें से अपने आप ही खून बहने लगता है। इस तरह के चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि का सेवन कराना बहुत उपयोगी साबित होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की कोहनी से लेकर बाजू में नीचे तक दर्द का होना, सर्दी के मौसम में दीर्घास्थ्यों (लेंग बोंज) में बहुत तेजी से होने वाला दर्द, शरीर के जोड़ों में दर्द होना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि देनी बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
प्रतिविष-
हीपर-सल्फ औषधि को उपयोग सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि के हानिकारक प्रभाव को दूर करने के लिए किया जाता है।
वृद्धि-
दाईं करवट लेटने से रोग के लक्षण बढ़ जाते हैं।
तुलना-
सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि की तुलना हीपर, नाइट्रि-एसिड, थूजा, सीपिया से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सिन्नाबैरिस-मर्क्यूरिस सल्फ्यूरेटस रूबर औषधि का 1 से 3 शक्ति तक का विचूर्ण देने से लाभ होता है।
सिइक्यूटा विरोसा Cicuta Virosa
सिइक्यूटा विरोसा औषधि को बच्चों के दांत निकलने के समय या कीड़ों के कारण बच्चे के शरीर में अकड़न आ जाने पर उपयोग करने से लाभ मिलता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सिइक्यूटा विरोसा औषधि से होने वाले लाभ-
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के चेहरे, सिर और शरीर के दूसरे भागों में पीले रंग के, पीब भरे दानों का निकल जाना, त्वचा पर एक्जिमा हो जाना आदि लक्षणों में सिइक्यूटा विरोसा औषधि का उपयोग लाभकारी रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की रीढ़ की हड्डी में किसी तरह की चोट या रगड़ लग जाने के कारण परेशानी होना, रोगी के शरीर के अंगों में टेढ़ापन आ जाना जिसके कारण रोगी को शरीर को बार-बार हिलाना पड़ता है, रोगी के शरीर के अंगों में बहुत ज्यादा उत्तेजना हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को सिइक्यूटा विरोसा औषधि देने से लाभ मिलता है।
कौलोफाइलम Caulophyllum
कौलोफाइलम औषधि को स्त्री के सारे रोगों के लिए एक बहुत ही लाभकारी औषधि माना जाता है जैसे बच्चेदानी का कमजोर होना, बच्चे को जन्म देने के दौरान जब दर्द (लेबर पैन) होता है, तब स्त्री बहुत थकी हुई और डरी हुई सी रहती है। इसके अलावा मुंह के अंदर होने वाले छालों में भी ये औषधि लगाने और खिलाने के काम आती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों में कौलोफाइलम औषधि का उपयोग-
स्त्री से सम्बंधित लक्षण : गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली के मुंह पर बहुत ज्यादा कठोरता आ जाना, शीतकंप, बच्चे के जन्म के समय बहुत तेज दर्द होने पर भी बच्चे का जन्म नहीं हो पाता, तब ये औषधि दुबारा दर्द को पैदा करती है, बच्चेदानी के कमजोर हो जाने के कारण बार-बार गर्भपात हो जाना, बच्चे के जन्म के बाद स्त्री के चेहरे पर दाग-धब्बे निकल जाना, मासिकधर्म के समय होने वाला दर्द तथा स्राव का ज्यादा आना, जिसके कारण स्त्री का गर्भ नहीं ठहर पाना, हिस्टीरिया रोग, आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में कौलोफाइलम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण : मासिकस्राव तथा गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली में हो जाने वाले रोगों के कारण स्त्रियों की त्वचा का रंग खराब हो जाने पर कौलोफाइलम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण : हाथ-पैरों की उंगलियों और घुटनों में खिंचावपूर्ण और भ्रमणकारी दर्द, कलाइयों में हल्का-हल्का दर्द होना, मुट्ठी बंद होने पर बहुत तेज दर्द होना, शरीर में किसी भी जगह घूम-घूमकर होने वाला दर्द आदि में कौलोफाइलम औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
प्रतिकूल-
तुलना-
कौलोफाइलम औषधि की तुलना ऐक्टि-स्पाइ, सिमिस, पल्स, सैबैड, सिके, वायला ओडोरेटा से की जा सकती है।
मात्रा-
मूलार्क से तीसरी शक्ति तक।
सेंक्रिस कण्टोट्रिक्स-आंसिस्ट्रोडन Cenchris Contortris-Ancistrodon
सेंक्रिस कण्टोट्रिक्स-आंसिस्ट्रोडन औषधि को सांप के जहर से तैयार किया जाता है। ये औषधि बहुत ही गर्म प्रकृति की होती है इसी कारण से इसके असर से रोगी को सांस लेने में परेशानी होती है, बैचेनी बढ़ जाती है, प्यास ज्यादा लगने लगती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सेंक्रिस कण्टोट्रिक्स-आंसिस्ट्रोडन का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- किसी भी बात को तुरन्त ही भूल जाना, स्वभाव का अपने आप ही किसी भी समय पर बदल जाना जैसे कि कभी अपने आप हंसने लगना और कभी बिल्कुल उदास हो जाना, माथे की हड्डी के बाएं उभार पर और बाईं तरफ की दांतों में बहुत तेज दर्द हो जाना, आंखों के आसपास के भाग में सूजन, दर्द और खुजली होना आदि लक्षणों में रोगी को सेंक्रिस कण्टोट्रिक्स-आंसिस्ट्रोडन औषधि देने से लाभ मिलता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण - लेटने पर भी काफी समय तक नीन्द न आना, रात को सोते समय डरावने से सपने आना, सैक्स से सम्बंधित सपने आना आदि लक्षणों में रोगी को सेंक्रिस कण्टोट्रिक्स-आंसिस्ट्रोडन औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - दाईं तरफ के डिम्ब में दर्द होने के साथ पीला सा प्रदर स्राव होना, गर्भाशय के मुंह पर फोड़ा निकलना, यौन उत्तेजना का तेज होना, मासिकधर्म के दौरान स्राव का बहुत ज्यादा मात्रा में और काले रंग का आना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सेंक्रिस कण्टोट्रिक्स-आंसिस्ट्रोडन औषधि देने से लाभ मिलता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण - दिल में बहुत तेजी से जलन का होना, रोगी को ऐसा महसूस होना जैसे कि दिल में हवा भर गई हो, नाड़ी का धीरे-धीरे से चलना, बाईं स्कंधास्थि के नीचे शाम के समय फड़फड़ाहट और जलन होना आदि लक्षणों में रोगी को सेंक्रिस कण्टोट्रिक्स-आंसिस्ट्रोडन औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
वृद्धि-
दबाने से, लेट जाने पर, दोपहर के बाद और रात को रोग बढ़ जाता है।
तुलना-
सेंक्रिस कण्टोट्रिक्स-आंसिस्ट्रोडन औषधि की तुलना आर्से, लैकेसिस, क्लोथो अरिक्टेन्स से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को किसी भी रोग के लक्षण के आधार पर सेंक्रिस कण्टोट्रिक्स-आंसिस्ट्रोडन औषधि की छठी शक्ति तक देने से लाभ होता है।
कैस्कारिल्ला Cascarilla
कैस्कारिल्ला औषधि पाचनसंस्थान को मजबूत बनाती है और कब्ज जैसे रोग को दूर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कैस्कारिल्ला औषधि का उपयोग-
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : आमाशय रोग के लक्षणों में रोगी चाहे जितना भी खाना खा ले कुछ देर बाद उसे दुबारा भूख लग जाती है, रोगी का मन करता है कि वह गर्म-गर्म पीने वाले पदार्थों का सेवन करें, रोगी को जी मिचलाने के साथ उल्टी होती है, आमाशय में इस तरह का दर्द होता है जैसे कि किसी ने धक्का मारा हो, रोगी के दबाव के साथ पेट में दर्द होता है, इस तरह के लक्षणों में अगर रोगी को कैस्कारिल्ला औषधि दी जाए तो यह उसके लिए काफी लाभदायक साबित होती है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण : रोगी के पेट में कब्ज बनना, मल सख्त और आंव के साथ आना, मल के साथ खून का आना, मलक्रिया से पहले पेट में मरोड़े उठना, रोगी को सख्त दस्त के साथ कमर में दर्द होना और सुस्ती छाना, मलान्त्र के किसी ऊंचे भाग में किसी चीज के कुतरने जैसा दर्द होना जैसे लक्षणों में रोगी को कैस्कारिल्ला औषधि देने से लाभ मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण : रोगी को कान में ऐसा महसूस होना जैसे कि कान के अन्दर और बाहर कोई आग सी जल रही हो, इस तरह के लक्षणो में अगर रोगी को कैस्कारिल्ला औषधि दी जाए तो उसके लिए काफी लाभकारी साबित होती है।
वृद्धि-
डकार आने से और ठण्ड से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्म पीने वाले पदार्थों को पीने से तथा दबाने से रोग कम हो जाता है।
कल्केरिया फास्फोरिका Calcarea Phosphorica
कल्केरिया फास्फोरिका औषधि नवजात बच्चों के दांतों का देर से निकलना, दांत निकलते समय बहुत से रोग पैदा हो जाना आदि में बहुत लाभकारी है। इसके अलावा हडि्डयों के रोग, टूटी हड्डी का न जुड़ना, काफी लंबे रोगों के बाद शरीर में खून की कमी हो जाना, बच्चों के शरीर में खून की कमी होती है आदि में भी ये औषधि अच्छा असर करती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कल्केरिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण : हर समय चिड़चिड़ा सा रहना, किसी से ढंग से बात न करना, याददाश्त कमजोर हो जाना, उदास बैठे रहना, किसी की बात न मानना जैसे मानसिक रोग के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया फास्फोरिका औषधि देने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण : - सिर की हडि्डयों के जोड़ों के आसपास हमेशा दर्द रहना जो मौसम के बदलते ही ओर बढ़ जाता है, सुनने की शक्ति कमजोर हो जाना, सिरदर्द के साथ पेट का फूलना, सिर का गर्म लगना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में कल्केरिया फास्फोरिका औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण : - किसी व्यक्ति की आंखों में जख्म हो जाने के साथ ही जाला सा छा जाने जैसे लक्षणों में रोगी को कल्केरिया फास्फोरिका औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : - आमाशय रोगों के लक्षणों में रोगी बच्चा हर समय मां का दूध पीना चाहता है और दूध पीते ही उल्टी भी कर देता है, रोगी को अजीब-अजीब सी चीजें जैसे सूअर का मांस, आग पर भुना हुआ मांस खाने का मन करता है, बहुत तेज भूख और प्यास लगना, कलेजे में जलन होना आदि में रोगी को नियमित रूप से कल्केरिया फास्फोरिका औषधि का सेवन कराया जाए तो ये उसके लिए काफी लाभकारी रहता है।
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण : - भोजन करते ही पेट में जोर का दर्द होना, पेट अन्दर घुसा हुआ महसूस होना, नाभि के आसपास के हिस्से में जलन और दर्द होना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में कल्केरिया फास्फोरिका औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण : - पेशाब बार-बार आने के कारण शरीर में कमजोरी महसूस होना, किसी तरह का वजन उठाते समय या नाक को साफ करते समय गुर्दों के आसपास के भाग में दर्द होना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को कल्केरिया फास्फोरिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण : - मासिक-धर्म का समय से बहुत पहले तथा स्राव का बहुत ज्यादा मात्रा में आना, इसके साथ ही स्राव का रंग काला होना, कमर में दर्द होना, बच्चे को दूध पिलाते समय यौन उत्तेजना का तेज होना और साथ में गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली में हल्का-हल्का सा दर्द होना, योनि में से सफेद पानी आना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में रोगी स्त्री को कल्केरिया फास्फोरिका औषधि देने से आराम पड़ जाता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण : - हर समय अंगड़ाई सी आना, छाती में दर्द होना, सांस को रोक देने वाली खांसी जो लेटने पर कम हो जाती है, गले में दर्द होना, बाईं तरफ के नीचे के हिस्से में दर्द होना आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया फास्फोरिका औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
गर्दन और पीठ से सम्बंधित लक्षण : - ठण्डी हवा लगने के कारण गठिया का दर्द होना, सिर का अकड़ जाना, त्रिकास्थि में बहुत ज्यादा तेज दर्द होना आदि लक्षणों में कल्केरिया फास्फोरिका औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण : - शरीर के अंगों के अकड़ जाने के साथ ही दर्द और ठण्डापन लगना, जो मौसम में बदलाव के साथ ही और तेज हो जाता है, कूल्हे, पीठ और हाथ-पैरों का सुन्न हो जाना, जोड़ों और हडि्डयों में दर्द होना, सीढ़ियों में चढ़ते समय थकान महसूस होना आदि लक्षणों मे कल्केरिया फास्फोरिका औषधि देनी चाहिए।
वृद्धि-
नमीदार, ठण्डे मौसम में, हवा लगने से, बर्फ पिघलने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्मियों में, गर्म, सूखे मौसम में रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
पहली से तीसरी शक्ति के विचूर्ण। अक्सर इसकी ऊंची शक्तियां भी लाभकारी होती है।
कैल्केरिया आयोडेटा Calcarea iodata
कैल्केरिया आयोडेटा औषधि कण्ठमाला धातुओं के रोगी जिनकी ग्रन्थि फूल जाती है, टांसिल में सूजन आ जाती है आदि रोगों में काफी लाभकारी होती है। इसके अलावा नाक से जुकाम के कारण पानी का आना, मोटे-ताजे बच्चों को भी थोड़ी सी सर्दी में ठण्ड लग जाना, कान या नाक में गर्म फोड़े में भी ये औषधि बहुत लाभकारी होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का उपयोग-
सर्दी-खांसी से सम्बंधित लक्षण : - पुरानी खांसी होना, छाती में दर्द होना, खांसी होने पर हरे रंग के पीब के साथ बलगम का आना, सांस लेने में परेशानी होना, सवारी करते समय ठण्डी हवा के कारण सिर में दर्द होना, नाक की जड़ पर ज्यादा दर्द होना आदि लक्षणों में कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण : ग्रंथियों में सूजन आ जाना, चमड़ी फटी हुई, बालों का झड़ना, त्वचा के ऊपर तांबे के रंग के छोटे-छोटे दाने होना आदि चर्म रोगों के लक्षणों में कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
टांसिलाइटिस से सम्बंधित लक्षण : मुंह के तालु में सूजन के साथ दर्द होना, टांसिल के बीच में जख्म और दर्द हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
तुलना-
कैल्केरिया आयोडेटा की तुलना एग्राफिस, कैल्केरिया-फ्लो, साइलीशिया, मर्क्यू-आयोडेटम से की जा सकती है।
मात्रा-
2 और 3 शक्ति के विचूर्ण।
कैल्केरिया हाइपोफॉस्फोरिका Calcarea Hypophosphorica
कैल्केरिया हाइपोफॉस्फोरिका औषधि को खांसी और टी.बी.जैसे रोगों की एक बहुत ही लाभकारी औषधि माना जाता है। इसके अलावा खून की कमी होना, बहुत ज्यादा मात्रा में पसीना आना, शरीर में कमजोरी आना, हाथ-पैरों का ठण्डा हो जाना आदि लक्षणों में भी ये औषधि अच्छा असर करती है। टी.बी. के रोग में रोगी को पतले दस्त होना, खांसी होना, छाती में दर्द होना, फेफड़ों से खून का आना जैसे लक्षणों के आधार पर भी इस औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
किसी व्यक्ति के शरीर में बड़े-बड़े फोड़े पैदा होना जो हडि्डयों तक फैल जाते हैं और रोगी कमजोर होकर बिस्तर से लग जाता है, ऐसे रोगों में कुछ दिनों तक लगातार इस औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
वृद्धि :
सर्दी के मौसम में और बारिश के मौसम में रोग बढ़ जाता है तथा गर्मी के मौसम में रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
कैल्केरिया हाइपोफॉस्फोरिका औषधि की 1 से 3 शक्ति का विचूर्ण देने से लाभ होता है।
कल्केरिया फ्लोरिका Calcarea Fluorica-Fluor Spar
क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का इस्तेमाल हडि्डयों पर और गिल्टियों पर खास तरह से होता है। इस औषधि से गले के अन्दर तक की गिल्टियां ठीक हो जाती हैं। इसके अलावा घुटने के नीचे का वह फोड़ा जिसमें रेशे भरे होते हैं, के सही हो जाने के बाद टांग टेढ़ी होने पर भी इससे सीधी हो जाती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में अजीब-अजीब सी आवाजें गूंजना, खोपड़ी पर सख्त मांस का बढ़ना, खोपड़ी पर सख्त किनारों वाले जख्म बन जाना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
आंखें से सम्बंधित लक्षण : -आंखों के आगे अजीब-अजीब सी चीजें नाचना, पलको मे जलन, मोतियाबिन्द, आंख की श्लैष्मिक झिल्लियों की रसौलियां होना आदि आंख के रोगों के लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण : - कान के छिद्र में मैल भर जाना, कम सुनाई देना, कानों में घंटियों के बजने जैसी आवाज होना, कान के बीच के हिस्से में मवाद का बहना आदि कान रोग के लक्षणों के आधार पर क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण : - सूखा जुकाम होना, नाक से बहुत ज्यादा मात्रा में बदबूदार, गाढ़ा सा, हरे और पीले रंग का स्राव होना, नाक में पपड़ी सी जमने के कारण नाक में जलन होना आदि नाक के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से लाभ होता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण : गाल पर दर्द के साथ सूजन आना, दान्त में दर्द होना, जबड़े की हड्डी में सूजन आना आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण : -मसूड़े में फोड़ा होने के साथ-साथ जबड़े का सूज जाना, जीभ का कटना-फटना, जीभ में जलन के बाद सख्ती आ जाना, दान्तों का ढीला पड़ जाना, किसी चीज को खाते ही दान्त में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका का सेवन कराने से लाभ होता है।
कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण : गले में दर्द और जलन होना जिसमे ठण्डी चीजे पीने से परेशानी होती है और गर्म चीजों के सेवन से आराम मिलता है, आवाज की नली में गुदगुदाहट होना, काकलक ढीला होना आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
मल और मलद्वार से सम्बंधित लक्षण : गठिया के रोगियों को दस्त लगने पर, मलद्वार में खुजली होना, खूनी बवासीर, भीतरी बवासीर या वादी बवासीर के साथ कमर में दर्द होना जो अक्सर त्रिकास्थि तक पहुंच जाता है, कब्ज होना, नीचे की आंतों में बहुत ज्यादा गैस जमा होना आदि लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का प्रयोग करने से आराम मिलता है।
मन से सम्बंधित लक्षण : हर समय किसी गहरी सोच में डूबे हुए रहना, किसी से बातें न करना, किसी न किसी अनिष्ट का डर लगे रहना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से लाभ होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण : अण्डकोषों में पानी भरना, अण्डकोषों का सख्त हो जाना आदि पुरुष रोगों के लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण : गले में जलन होना, खांसी के साथ पीले रंग का बलगम छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में आना, लगातार होने वाली खांसी आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से आराम पड़ जाता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण : कमर में पुराना दर्द होना, जो चलते-फिरते समय और बढ़ जाता है, बच्चों में हडि्डयों के रोग होने के साथ-साथ जांघ की हड्डी का बढ़ जाना, पीठ के नीचे के हिस्से में दर्द और जलन होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरीय अंगों से सम्बंधित लक्षण : हाथ की कलाई के पीछे के हिस्से में अन्दर की ओर फोड़ा होना, हाथ की उंगलियों के जोड़ों में गठिया जैसी वृद्धि, हाथ की उंगलियों की हड्डी में फोड़ा होना, घुटनों के जोड़ों की श्लेषक कला की पुरानी जलन आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराना काफी अच्छा रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण : साफ तौर पर सपने आना जिसमें किसी भंयकर संकट आने की संभावना होती है, नींद पूरी होने के बाद भी शरीर का टूटा-टूटा सा लगना आदि लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा का सफेद हो जाना, हथेलियों पर दरारे पड़ना, त्वचा का सख्त होना, पुराने नासूर जिनमें से गाढ़ी, पीले रंग की पीब निकलती रहती है, जख्म के किनारे सख्त और उठे हुए लगना, स्त्रियों के स्तनों में गांठें होना, ग्रन्थियों का कठोर हो जाना, मांस का बढ़ना आदि लक्षणों में रोगी को नियमित रूप से क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
वृद्धि-
आराम करते समय, मौसम के बदलने पर रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्मी तथा गर्म सिकाई करने से रोग कम होता है।
तुलना-
क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि की तुलना कोनियम, लैपिस, बैराइटा,-म्यूरि, हेक्ला, रस, काकोडाइलेट आफ साडा आदि से की जा सकती है।
मात्रा-
तीसरी शक्ति से बारहवीं शक्ति तक के विचूर्ण।
जानकारी-
क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि को पुराने रोगों की औषधि माना जाता है, इसको सेवन करने से इसका असर होने में थोड़ा समय लगता है, इसलिए इसे जल्दी-जल्दी नहीं देना चाहिए।
कैल्केरिया आयोडेटा Calcarea iodata
कैल्केरिया आयोडेटा औषधि कण्ठमाला धातुओं के रोगी जिनकी ग्रन्थि फूल जाती है, टांसिल में सूजन आ जाती है आदि रोगों में काफी लाभकारी होती है। इसके अलावा नाक से जुकाम के कारण पानी का आना, मोटे-ताजे बच्चों को भी थोड़ी सी सर्दी में ठण्ड लग जाना, कान या नाक में गर्म फोड़े में भी ये औषधि बहुत लाभकारी होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का उपयोग-
सर्दी-खांसी से सम्बंधित लक्षण : - पुरानी खांसी होना, छाती में दर्द होना, खांसी होने पर हरे रंग के पीब के साथ बलगम का आना, सांस लेने में परेशानी होना, सवारी करते समय ठण्डी हवा के कारण सिर में दर्द होना, नाक की जड़ पर ज्यादा दर्द होना आदि लक्षणों में कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण : ग्रंथियों में सूजन आ जाना, चमड़ी फटी हुई, बालों का झड़ना, त्वचा के ऊपर तांबे के रंग के छोटे-छोटे दाने होना आदि चर्म रोगों के लक्षणों में कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
टांसिलाइटिस से सम्बंधित लक्षण : मुंह के तालु में सूजन के साथ दर्द होना, टांसिल के बीच में जख्म और दर्द हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
तुलना-
कैल्केरिया आयोडेटा की तुलना एग्राफिस, कैल्केरिया-फ्लो, साइलीशिया, मर्क्यू-आयोडेटम से की जा सकती है।
मात्रा-
2 और 3 शक्ति के विचूर्ण।
कैल्केरिया हाइपोफॉस्फोरिका Calcarea Hypophosphorica
कैल्केरिया हाइपोफॉस्फोरिका औषधि को खांसी और टी.बी.जैसे रोगों की एक बहुत ही लाभकारी औषधि माना जाता है। इसके अलावा खून की कमी होना, बहुत ज्यादा मात्रा में पसीना आना, शरीर में कमजोरी आना, हाथ-पैरों का ठण्डा हो जाना आदि लक्षणों में भी ये औषधि अच्छा असर करती है। टी.बी. के रोग में रोगी को पतले दस्त होना, खांसी होना, छाती में दर्द होना, फेफड़ों से खून का आना जैसे लक्षणों के आधार पर भी इस औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
किसी व्यक्ति के शरीर में बड़े-बड़े फोड़े पैदा होना जो हडि्डयों तक फैल जाते हैं और रोगी कमजोर होकर बिस्तर से लग जाता है, ऐसे रोगों में कुछ दिनों तक लगातार इस औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
वृद्धि :
सर्दी के मौसम में और बारिश के मौसम में रोग बढ़ जाता है तथा गर्मी के मौसम में रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
कैल्केरिया हाइपोफॉस्फोरिका औषधि की 1 से 3 शक्ति का विचूर्ण देने से लाभ होता है।
कल्केरिया फ्लोरिका Calcarea Fluorica-Fluor Spar
क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का इस्तेमाल हडि्डयों पर और गिल्टियों पर खास तरह से होता है। इस औषधि से गले के अन्दर तक की गिल्टियां ठीक हो जाती हैं। इसके अलावा घुटने के नीचे का वह फोड़ा जिसमें रेशे भरे होते हैं, के सही हो जाने के बाद टांग टेढ़ी होने पर भी इससे सीधी हो जाती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में अजीब-अजीब सी आवाजें गूंजना, खोपड़ी पर सख्त मांस का बढ़ना, खोपड़ी पर सख्त किनारों वाले जख्म बन जाना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
आंखें से सम्बंधित लक्षण : -आंखों के आगे अजीब-अजीब सी चीजें नाचना, पलको मे जलन, मोतियाबिन्द, आंख की श्लैष्मिक झिल्लियों की रसौलियां होना आदि आंख के रोगों के लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण : - कान के छिद्र में मैल भर जाना, कम सुनाई देना, कानों में घंटियों के बजने जैसी आवाज होना, कान के बीच के हिस्से में मवाद का बहना आदि कान रोग के लक्षणों के आधार पर क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण : - सूखा जुकाम होना, नाक से बहुत ज्यादा मात्रा में बदबूदार, गाढ़ा सा, हरे और पीले रंग का स्राव होना, नाक में पपड़ी सी जमने के कारण नाक में जलन होना आदि नाक के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से लाभ होता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण : गाल पर दर्द के साथ सूजन आना, दान्त में दर्द होना, जबड़े की हड्डी में सूजन आना आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण : -मसूड़े में फोड़ा होने के साथ-साथ जबड़े का सूज जाना, जीभ का कटना-फटना, जीभ में जलन के बाद सख्ती आ जाना, दान्तों का ढीला पड़ जाना, किसी चीज को खाते ही दान्त में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका का सेवन कराने से लाभ होता है।
कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण : गले में दर्द और जलन होना जिसमे ठण्डी चीजे पीने से परेशानी होती है और गर्म चीजों के सेवन से आराम मिलता है, आवाज की नली में गुदगुदाहट होना, काकलक ढीला होना आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
मल और मलद्वार से सम्बंधित लक्षण : गठिया के रोगियों को दस्त लगने पर, मलद्वार में खुजली होना, खूनी बवासीर, भीतरी बवासीर या वादी बवासीर के साथ कमर में दर्द होना जो अक्सर त्रिकास्थि तक पहुंच जाता है, कब्ज होना, नीचे की आंतों में बहुत ज्यादा गैस जमा होना आदि लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का प्रयोग करने से आराम मिलता है।
मन से सम्बंधित लक्षण : हर समय किसी गहरी सोच में डूबे हुए रहना, किसी से बातें न करना, किसी न किसी अनिष्ट का डर लगे रहना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से लाभ होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण : अण्डकोषों में पानी भरना, अण्डकोषों का सख्त हो जाना आदि पुरुष रोगों के लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण : गले में जलन होना, खांसी के साथ पीले रंग का बलगम छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में आना, लगातार होने वाली खांसी आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से आराम पड़ जाता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण : कमर में पुराना दर्द होना, जो चलते-फिरते समय और बढ़ जाता है, बच्चों में हडि्डयों के रोग होने के साथ-साथ जांघ की हड्डी का बढ़ जाना, पीठ के नीचे के हिस्से में दर्द और जलन होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरीय अंगों से सम्बंधित लक्षण : हाथ की कलाई के पीछे के हिस्से में अन्दर की ओर फोड़ा होना, हाथ की उंगलियों के जोड़ों में गठिया जैसी वृद्धि, हाथ की उंगलियों की हड्डी में फोड़ा होना, घुटनों के जोड़ों की श्लेषक कला की पुरानी जलन आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराना काफी अच्छा रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण : साफ तौर पर सपने आना जिसमें किसी भंयकर संकट आने की संभावना होती है, नींद पूरी होने के बाद भी शरीर का टूटा-टूटा सा लगना आदि लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा का सफेद हो जाना, हथेलियों पर दरारे पड़ना, त्वचा का सख्त होना, पुराने नासूर जिनमें से गाढ़ी, पीले रंग की पीब निकलती रहती है, जख्म के किनारे सख्त और उठे हुए लगना, स्त्रियों के स्तनों में गांठें होना, ग्रन्थियों का कठोर हो जाना, मांस का बढ़ना आदि लक्षणों में रोगी को नियमित रूप से क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
वृद्धि-
आराम करते समय, मौसम के बदलने पर रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्मी तथा गर्म सिकाई करने से रोग कम होता है।
तुलना-
क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि की तुलना कोनियम, लैपिस, बैराइटा,-म्यूरि, हेक्ला, रस, काकोडाइलेट आफ साडा आदि से की जा सकती है।
मात्रा-
तीसरी शक्ति से बारहवीं शक्ति तक के विचूर्ण।
जानकारी-
क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि को पुराने रोगों की औषधि माना जाता है, इसको सेवन करने से इसका असर होने में थोड़ा समय लगता है, इसलिए इसे जल्दी-जल्दी नहीं देना चाहिए।
कैल्केरिया आयोडेटा Calcarea iodata
कैल्केरिया आयोडेटा औषधि कण्ठमाला धातुओं के रोगी जिनकी ग्रन्थि फूल जाती है, टांसिल में सूजन आ जाती है आदि रोगों में काफी लाभकारी होती है। इसके अलावा नाक से जुकाम के कारण पानी का आना, मोटे-ताजे बच्चों को भी थोड़ी सी सर्दी में ठण्ड लग जाना, कान या नाक में गर्म फोड़े में भी ये औषधि बहुत लाभकारी होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का उपयोग-
सर्दी-खांसी से सम्बंधित लक्षण : - पुरानी खांसी होना, छाती में दर्द होना, खांसी होने पर हरे रंग के पीब के साथ बलगम का आना, सांस लेने में परेशानी होना, सवारी करते समय ठण्डी हवा के कारण सिर में दर्द होना, नाक की जड़ पर ज्यादा दर्द होना आदि लक्षणों में कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण : ग्रंथियों में सूजन आ जाना, चमड़ी फटी हुई, बालों का झड़ना, त्वचा के ऊपर तांबे के रंग के छोटे-छोटे दाने होना आदि चर्म रोगों के लक्षणों में कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
टांसिलाइटिस से सम्बंधित लक्षण : मुंह के तालु में सूजन के साथ दर्द होना, टांसिल के बीच में जख्म और दर्द हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को कैल्केरिया आयोडेटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
तुलना-
कैल्केरिया आयोडेटा की तुलना एग्राफिस, कैल्केरिया-फ्लो, साइलीशिया, मर्क्यू-आयोडेटम से की जा सकती है।
मात्रा-
2 और 3 शक्ति के विचूर्ण।
कैल्केरिया हाइपोफॉस्फोरिका Calcarea Hypophosphorica
कैल्केरिया हाइपोफॉस्फोरिका औषधि को खांसी और टी.बी.जैसे रोगों की एक बहुत ही लाभकारी औषधि माना जाता है। इसके अलावा खून की कमी होना, बहुत ज्यादा मात्रा में पसीना आना, शरीर में कमजोरी आना, हाथ-पैरों का ठण्डा हो जाना आदि लक्षणों में भी ये औषधि अच्छा असर करती है। टी.बी. के रोग में रोगी को पतले दस्त होना, खांसी होना, छाती में दर्द होना, फेफड़ों से खून का आना जैसे लक्षणों के आधार पर भी इस औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
किसी व्यक्ति के शरीर में बड़े-बड़े फोड़े पैदा होना जो हडि्डयों तक फैल जाते हैं और रोगी कमजोर होकर बिस्तर से लग जाता है, ऐसे रोगों में कुछ दिनों तक लगातार इस औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
वृद्धि :
सर्दी के मौसम में और बारिश के मौसम में रोग बढ़ जाता है तथा गर्मी के मौसम में रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
कैल्केरिया हाइपोफॉस्फोरिका औषधि की 1 से 3 शक्ति का विचूर्ण देने से लाभ होता है।
कल्केरिया फ्लोरिका Calcarea Fluorica-Fluor Spar
क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का इस्तेमाल हडि्डयों पर और गिल्टियों पर खास तरह से होता है। इस औषधि से गले के अन्दर तक की गिल्टियां ठीक हो जाती हैं। इसके अलावा घुटने के नीचे का वह फोड़ा जिसमें रेशे भरे होते हैं, के सही हो जाने के बाद टांग टेढ़ी होने पर भी इससे सीधी हो जाती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में अजीब-अजीब सी आवाजें गूंजना, खोपड़ी पर सख्त मांस का बढ़ना, खोपड़ी पर सख्त किनारों वाले जख्म बन जाना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
आंखें से सम्बंधित लक्षण : -आंखों के आगे अजीब-अजीब सी चीजें नाचना, पलको मे जलन, मोतियाबिन्द, आंख की श्लैष्मिक झिल्लियों की रसौलियां होना आदि आंख के रोगों के लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण : - कान के छिद्र में मैल भर जाना, कम सुनाई देना, कानों में घंटियों के बजने जैसी आवाज होना, कान के बीच के हिस्से में मवाद का बहना आदि कान रोग के लक्षणों के आधार पर क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण : - सूखा जुकाम होना, नाक से बहुत ज्यादा मात्रा में बदबूदार, गाढ़ा सा, हरे और पीले रंग का स्राव होना, नाक में पपड़ी सी जमने के कारण नाक में जलन होना आदि नाक के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से लाभ होता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण : गाल पर दर्द के साथ सूजन आना, दान्त में दर्द होना, जबड़े की हड्डी में सूजन आना आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण : -मसूड़े में फोड़ा होने के साथ-साथ जबड़े का सूज जाना, जीभ का कटना-फटना, जीभ में जलन के बाद सख्ती आ जाना, दान्तों का ढीला पड़ जाना, किसी चीज को खाते ही दान्त में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका का सेवन कराने से लाभ होता है।
कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण : गले में दर्द और जलन होना जिसमे ठण्डी चीजे पीने से परेशानी होती है और गर्म चीजों के सेवन से आराम मिलता है, आवाज की नली में गुदगुदाहट होना, काकलक ढीला होना आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
मल और मलद्वार से सम्बंधित लक्षण : गठिया के रोगियों को दस्त लगने पर, मलद्वार में खुजली होना, खूनी बवासीर, भीतरी बवासीर या वादी बवासीर के साथ कमर में दर्द होना जो अक्सर त्रिकास्थि तक पहुंच जाता है, कब्ज होना, नीचे की आंतों में बहुत ज्यादा गैस जमा होना आदि लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का प्रयोग करने से आराम मिलता है।
मन से सम्बंधित लक्षण : हर समय किसी गहरी सोच में डूबे हुए रहना, किसी से बातें न करना, किसी न किसी अनिष्ट का डर लगे रहना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से लाभ होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण : अण्डकोषों में पानी भरना, अण्डकोषों का सख्त हो जाना आदि पुरुष रोगों के लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण : गले में जलन होना, खांसी के साथ पीले रंग का बलगम छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में आना, लगातार होने वाली खांसी आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि देने से आराम पड़ जाता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण : कमर में पुराना दर्द होना, जो चलते-फिरते समय और बढ़ जाता है, बच्चों में हडि्डयों के रोग होने के साथ-साथ जांघ की हड्डी का बढ़ जाना, पीठ के नीचे के हिस्से में दर्द और जलन होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरीय अंगों से सम्बंधित लक्षण : हाथ की कलाई के पीछे के हिस्से में अन्दर की ओर फोड़ा होना, हाथ की उंगलियों के जोड़ों में गठिया जैसी वृद्धि, हाथ की उंगलियों की हड्डी में फोड़ा होना, घुटनों के जोड़ों की श्लेषक कला की पुरानी जलन आदि लक्षणों में रोगी को क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराना काफी अच्छा रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण : साफ तौर पर सपने आना जिसमें किसी भंयकर संकट आने की संभावना होती है, नींद पूरी होने के बाद भी शरीर का टूटा-टूटा सा लगना आदि लक्षणों में क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा का सफेद हो जाना, हथेलियों पर दरारे पड़ना, त्वचा का सख्त होना, पुराने नासूर जिनमें से गाढ़ी, पीले रंग की पीब निकलती रहती है, जख्म के किनारे सख्त और उठे हुए लगना, स्त्रियों के स्तनों में गांठें होना, ग्रन्थियों का कठोर हो जाना, मांस का बढ़ना आदि लक्षणों में रोगी को नियमित रूप से क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
वृद्धि-
आराम करते समय, मौसम के बदलने पर रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्मी तथा गर्म सिकाई करने से रोग कम होता है।
तुलना-
क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि की तुलना कोनियम, लैपिस, बैराइटा,-म्यूरि, हेक्ला, रस, काकोडाइलेट आफ साडा आदि से की जा सकती है।
मात्रा-
तीसरी शक्ति से बारहवीं शक्ति तक के विचूर्ण।
जानकारी-
क्लेकेरिया फ्लोरिका औषधि को पुराने रोगों की औषधि माना जाता है, इसको सेवन करने से इसका असर होने में थोड़ा समय लगता है, इसलिए इसे जल्दी-जल्दी नहीं देना चाहिए।
कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम Calcarea Carbonica-Ostrearum
कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि खांसी, छाती में जगह बदल-बदल होने वाला दर्द, जी मिचलाना, अम्लपित्त और चर्बीदार चीजों को देखकर भूख समाप्त होने वाले रोगों के लिए खासतौर पर लाभदायक है। इसके अलावा ये औषधि हडि्डयों को मजबूत बनाती है, खून को बहने से रोकती है, गले में गांठ के रोगी, जिनको मौसम के जरा सा बदलते ही सर्दी-जुकाम का रोग घेर लेता है, बच्चों का मोटापा बढ़ते जाना, आदि रोगों में भी ये औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
विभिन्न लक्षणों में कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का उपयोग-
स्त्री से सम्बंधित लक्षण : मासिकस्राव का समय से पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में आना, 1-2 दिन स्राव बन्द रहने के बाद फिर से आ जाना, शरीर में या दिमाग में जरा सी भी उत्तेजना होते ही मासिकस्राव का आ जाना, योनि में पेशाब की नली में जलन होना, छोटी बच्चियों को होने वाला प्रदरस्राव, योनि के मुंह पर सूजन और जलन होने के साथ मवाद भरा स्राव होना जैसे लक्षणों के आधार पर कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम का सेवन करना लाभकारी रहता है।
बच्चों से सम्बंधित लक्षण : बच्चों के दांत देरी से निकलना और दांत निकलते समय परेशानी होना, रात को सोते समय दांतों का पीसना, बच्चों की हडि्डयों का टेढ़ा-मेढ़ा हो जाना, हडि्डयों के कमजोर हो जाने के कारण देरी से चलना बच्चों को दूध हजम न होना, आदि बच्चों के रोगों के लक्षणों में कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : भोजन पचाने की क्रिया में अम्लता आना, खट्टी डकारें आना, उल्टी होना, दस्त आना, मन में खड़िया, मिट्टी, चूना, स्लेटी, पेंसिल आदि खाने का मन करना, मांस और दूध को देखते ही जी का खराब हो जाना आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
शरीर बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण : पूरे शरीर में से खट्टी सी गंध आना, शरीर के अंगों के किसी एक भाग जैसे गर्दन, सिर, छाती, जननेन्द्रिय, हाथ-पैर, घुटने आदि पर पसीना आना, ठण्डा पसीना आना, पैरों के तलवों में दरार पड़ जाना, पैरों के पंजों का बिल्कुल गीला रहना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि देने से आराम मिलता है।
मल से सम्बंधित लक्षण : मलक्रिया के दौरान परेशानी होना, मल का सख्त होना, पानी जैसे पतले, हरे रंग के, बदबूदार दस्त होना, पुराना दस्त का रोग, मिट्टी जैसे दस्त होना आदि लक्षणों के किसी व्यक्ति में नज़र आने पर उसे तुरन्त ही कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण : आंखों की पुतलियों का फैल जाना, आंखों में से हर समय आंसू से निकलते रहना, रोशनी में आते ही आंखों का बन्द हो जाना, आंखों से धुंधला सा दिखाई देना, आंखों में जख्म सा होना, पलकों में सूजन आना, आंखों के सफेद भाग मे कंठमाला धातु के कारण जलन होना जिसमे पीब भरे दाने हो जाते है आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण : सिर को उठाने या घुमाने से चक्कर आना, सिर के अलग-अलग भागों में बाहरी अथवा अन्दर के भाग में ठण्डक सी महसूस होना, सिर में खुजली होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
मन से सम्बंधित लक्षण : दिमाग में हर समय अजीब सा डर लगा रहना, शाम के समय बैचेनी सी बढ़ने लगना, घबराहट सी महसूस होना, हाथ-पैरों का कांपना, हर समय अकेले में उदास सा बैठे रहना, रात को सोते समय धड़कन का तेज हो जाना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि देने से लाभ मिलता है।
गुर्दा से सम्बंधित लक्षण : बचपन से जवानी में कदम रखने वाले व्यक्तियों को होने वाले गुर्दे के रोग, गुर्दे के आधे हिस्से में किसी रोग का हो जाना, गुर्दे के ऊपर के एक तिहाई भाग में किसी तरह का रोग हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि प्रयोग कराने से आराम आता है।
वृद्धि-
सुबह के समय जागने पर, दिमागी मेहनत करने से, भीग जाने से, सिर के गीले होने से, भोजन करने के बाद, व्रत रखने पर, शाम के समय, आधी रात के बाद, ठण्डे पसीने से, पूर्णमासी के समय रोग बढ़ जाता है।
शमन-
, हाथ-पैरों को खींचने से, पीठ के बल लेटने से, अंधेरे में, सूखे मौसम में रोग कम हो जाता है।
तुलना-
कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम की तुलना बेल, कल्के-स, चायना, डलक, फेरम, ग्रेफा, हिपर, काली-का, लायको, नैट्र-स, सीपि और थूजा से की जा सकती है।
मात्रा-
लक्षणों के आधार पर कल्केरिया-कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि की तीसरी शक्ति का विचूर्ण देने से लाभ मिलता है।
कल्केरिया आर्सेनिका Calcarea Arsenica
कल्केरिया आर्सेनिका औषधि को मिर्गी के दौरे वाले रोगियों के लिए बहुत लाभदायक मानी जाती है। इसके अलावा जिन स्त्रियों का शरीर भारी होता है उनकी मासिकधर्म के समय परेशानियों में भी ये औषधि काफी अच्छा असर करती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कल्केरिया आर्सेनिका औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण : - छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा आना, अकेलापन महसूस होना, मन में किसी चीज का वहम होना, किसी की बात का न सुनना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया आर्सेनिका औषधि देने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण : - सिर में खून का बहाव ज्यादा हो जाने के कारण सिर में चक्कर आना, सिर में दर्द होना, कानों के आसपास सुन्न कर देने वाला दर्द, हर 8वें दिन होने वाला सिर का दर्द आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया आर्सेनिका औषधि का प्रयोग करने से आराम आता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : - रोगी के आमाशय में सूजन आना, बच्चों को जिगर और तिल्ली के रोग, क्लोमग्रंथि के रोग, डकार के साथ मुंह में लार का ज्यादा बनना, दिल की धड़कन का तेज होना आदि लक्षणों के आधार पर कल्केरिया आर्सेनिका औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
मिर्गी से सम्बंधित लक्षण : - मिर्गी का दौरा पड़ना, मिर्गी का दौरा पड़ने से पहले शरीर के ऊपर के अंगों में दर्द होना तथा सिर में खून का जमा होना, हत्कपाटों के रोगों के कारण मिर्गी का दौरा आना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया आर्सेनिका औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण : - गुर्दे में दर्द बर्दाश्त नहीं होता, पेशाब के साथ वीर्य आता है, पेशाब बार-बार आता है आदि मूत्र रोगों में रोगी को कल्केरिया आर्सेनिका औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण : - दिल का सिकुड़ा हुआ सा महसूस होना, दम सा घुटता हुआ महसूस होना, पीठ में दर्द जो पूरी बांहों तक फैल जाता है आदि दिल के रोगों के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया आर्सेनिका औषधि देने से आराम आता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण : - मासिकधर्म के समय स्राव का खून और दुर्गंध के साथ आना, गर्भाशय की ऊपर की झिल्ली का कैंसर, गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली और योनि में जलन होना आदि लक्षणों में रोगी स्त्री को कल्केरिया आर्सेनिका औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण : - गर्दन के जोड़ के पास दर्द और कमर में बहुत तेज दर्द होना, सुबह बिस्तर छोड़ने के लिए मजबूर हो जाना, तपकन आदि लक्षणों में कल्केरिया आर्सेनिका औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
बाहरीय अंग से सम्बंधित लक्षण : - पैरों की शिराओं में जलन होना, लंगड़ापन आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कल्केरिया आर्सेनिका औषधि का प्रयोग करने से आराम मिलता है।
तुलना-
कोन, ग्लोन, लिथ-कार्ब, पल्स और नक्स-वम के साथ कल्केरिया आर्सेनिका, जिंक, सल्फ, सीपि, मास्क, लायको, ग्लोन, फेरम-फा, की तुलना की जा सकती है।
वृद्धि-
थोड़ी सी मेहनत करते ही रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्मी में आते ही रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
तीसरी शक्ति का विचूर्ण।
कैलोडियम सेग्वीनम Valadium Seguinum
कैलोडियम सेग्वीनम औषधि जननेन्द्रियों और उनमें होने वाली खुजली आदि को दूर करने के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में कैलोडियम सेग्वीनम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण : जो लोग बीड़ी-सिगरेट आदि का सेवन करते है उनको होने वाला सिर का दर्द, दिमागी परेशानियां, याददाश्त का कमजोर हो जाना, वहम पैदा करने वाला सिर का दर्द, आंखों और माथे में दबाव महसूस होना, जरा सा भी शोर होते ही रोगी के सिर में दर्द का चालू हो जाना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में कैलोडियम सेग्वीनम औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण : शरीर पर मीठा सा पसीना आना जिसके कारण मक्खियां आदि ज्यादा लगती है, किसी कीड़े के काटे हुए स्थान पर ज्यादा जलन और खुजली होना, खुजली वाले दाने होना आदि त्वचारोगों के लक्षणों में रोगी को कैलोडियम सेग्वीनम औषधि नियमित रूप से खिलाने से लाभ मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : आमाशय के छेदों में जैसे किसी ने दांतों से कुतर दिया हो इस तरह का दर्द होना, जिसके कारण सांस लेने और डकार आने में परेशानी होना, आमाशय का ऐसा लगना जैसे की उसमें सूखा भोजन भरा हुआ हो, उल्टी होना, प्यास न लगना आदि आमाशय रोग के लक्षणों के आधार पर रोगी को कैलोडियम सेग्वीनम औषधि खिलाने से आराम पड़ जाता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण : लिंग पर खुजली होना, लिंग का मुंह बहुत ज्यादा लाल लगना, ऐसा महसूस होना जैसे कि लिंग बड़ा हो गया हो, सूज गया हो, ढीला पड़ गया हो, अण्डकोषों की त्वचा मोटी सी होना, आधी नींद की हालत में वीर्य निकलता रहता है, नपुसंकता आ जाना आदि पुरुष रोगों के लक्षणों में रोगी को नियमित रूप से कैलोडियम सेग्वीनम औषधि देने से लाभ मिल जाता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण : गर्भावस्था के दौरान स्त्री की योनि में खुजली होना, रात को गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली के ऊपर ऐंठन के साथ दर्द होना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में स्त्री को कैलोडियम सेग्वीनम औषधि देने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण : आवाज की नली का सिकुड़ जाना, सांस लेने में परेशानी होना, श्लेष्मा का आसानी से ना निकल पाना, रात को सोते समय ज्यादा परेशानी होना आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को कैलोडियम सेग्वीनम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
तुलना-
कैलोडियम सेग्वीनम औषधि की तुलना ऐग्नस, फास, ऐसिड, पल्स और सल्फर के साथ की जा सकती है।
वृद्धि-
गर्म कमरे के अन्दर, शाम के 3 बजे से आधी रात तक रोग बढ़ जाता है।
शमन-
खुली हवा में, पसीने से, दिन के समय थोड़ी देर सोने से रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
रोगी को कैलोडियम सेग्वीनम औषधि की तीसरी से छठी शक्ति तक देने से लाभ होता है।
प्रतिविष-
पूरक-
जानकारी-
अगर कोई व्यक्ति बहुत ज्यादा तम्बाकू खाता है या पीता है और वो इस आदत को छोड़ना चाहता है लेकिन छोड़ नहीं पाता तो उसे ये कैलोडियम सेग्वीनम औषधि नियमित रूप से सेवन करनी चाहिए। इसके प्रयोग से व्यक्ति की तंबाकू सेवन की आदत कुछ दिनों में छूट जाएगी।
कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला Caesalpinia Bonducella
कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला औषधि का उपयोग बुखार, सिर में दर्द, पेट के रोग आदि में किया जाता है।
कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला औषधि का इस्तेमाल विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर-
मन से सम्बंधित लक्षण : किसी व्यक्ति को जब दिमाग में किसी तरह की परेशानी पैदा हो जाती है, उसका शरीर टूटा-टूटा सा रहता है और किसी तरह के काम में भी उसका मन नहीं लगता है तब इस कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला औषधि का इस्तेमाल करने से रोगी को लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण : किसी व्यक्ति के सिर में बहुत तेज दर्द होने पर अगर उसे कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला औषधि का सेवन कराया जाए और साथ में उसके सिर को दबाया भी जाए तो कुछ ही देर में रोगी का सिरदर्द दूर हो जाता है।
आंख से सम्बंधित लक्षण : रोगी की आंखों में बहुत तेज जलन होने पर या बुखार आने पर आंखों को खोलते ही पूरी तरह से न खोल पाने पर कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला औषधि का उपयोग काफी लाभकारी होता है।
उदर और आमाशय से सम्बंधित लक्षण : रोगी का जिगर और तिल्ली का बढ़ना, पेट में से अजीब-अजीब सी आवाजें आना, पेट को छूने से दर्द होना, भोजन करने का मन न करना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला औषधि रोगी को नियमित रूप से सेवन कराने से आराम आता है।
चमड़ी (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण : व्यक्ति के पूरे शरीर पर छोटे-छोटे से दाने निकल आना, त्वचा पूरी तरह से सूख जाना आदि चर्म रोगों के लक्षण नज़र आने पर कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला औषधि का सेवन कराने से रोगी को लाभ मिलता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण : किसी व्यक्ति के शरीर मे अचानक ठण्डे पानी से नहाने के बाद पीठ में दर्द होना आदि पीठ के रोगों के लक्षणों में कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला का इस्तेमाल करने से लाभ होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण : बुखार आने से पहले रोगी को ठण्ड सी लगती है और उसका पूरा शरीर कांपने लगता है। रोगी को बुखार अक्सर सुबह 8 बजे के बाद आता है और इस समय आने वाले बुखार में रोगी को प्यास भी काफी लगती है। अगर बुखार दोपहर के बाद आता है तो उसमे रोगी को प्यास नही लगती। इसके अलावा बुखार आने पर रोगी की सांस तेजी से चलने लगती है, रोगी का शरीर किसी भी काम को करने के लायक नहीं रहता उसे लगता है कि वह हर समय सोता ही रहे। इस तरह के बुखार के लक्षण प्रकट होने पर रोगी को अगर कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला औषधि का सेवन कराया जाए तो वो कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।
जीभ से सम्बंधित लक्षण : रोगी की जीभ पूरी तरह से सफेद सी हो जाना जैसे कि उसमें खून ही न हो, उसे बार-बार पानी पीने की इच्छा करने आदि जीभ के रोगों के लक्षणों में कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
मात्रा-
कीसाल्पीनिया बोण्डूसेल्ला की जड़ का रस रोगी को 2x 3x शक्तियां देनी चाहिए।
कैडमियम सल्फ Cadmium Sulph
किसी व्यक्ति के हैजा, पीत ज्वर, उल्टी-दस्त होने के कारण शरीर के बिल्कुल कमजोर हो जाने में अगर कैडमियम सल्फ औषधि को नियमित रूप से सेवन कराया जाए तो ये रोगी के लिए बहुत लाभकारी साबित होती है। इसके साथ ही ये औषधि मुंह का लकवा, आंखों का पूरी तरह से न बन्द हो पाना, मुंह और होठ एक ही तरफ हो जाना, पेट का कैंसर आदि रोगों में भी असरदार सिद्ध होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में कैडमियम सल्फ औषधि का उपयोग-
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : जिगर में दर्द होना, पेट को ऊपर से दबाने पर बड़ी जोर से दर्द होना, मल पीला, हरा या काले रंग का बदबूदार और खून के साथ आना, पीले या काले रंग की उल्टी होना, जी मिचलाना, खून की उल्टी, सुस्ती, पेशाब का न आना, गर्भावस्था के दौरान उल्टी-दस्त होना आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों में रोगी को नियमित रूप से कैडमियम सल्फ औषधि देने से लाभ मिलता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण : बुखार में रोगी का शरीर बिल्कुल ठण्डा हो जाना, बहुत ज्यादा सर्दी लगना, बहुत सारे कंबल रजाई ओढ़ने पर भी शरीर में कंपकंपी लगना आदि लक्षणों में रोगी को कैडमियम सल्फ औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण : चेहरे पर नाक और गाल के ऊपर पीले सा निशान पड़ना, जो धूप या हवा लगने के कारण और भी ज्यादा बढ़ते रहते हैं, पैरों की एड़ियों का फट जाना, त्वचा पर खुजली होना आदि चर्मरोगों के लक्षणो में कैडमियम सल्फऔषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण : रोगी को नींद आते ही सांस का चलना बन्द होना सा महसूस होना, दम घुटता हुआ सा लगना, रात को डर के मारे नींद न आना, खुली आंखों से जागते रहना आदि लक्षणों के नज़र आने पर रोगी को कैडमियम सल्फ औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण : किसी भी चीज को गले के अन्दर निगलने में परेशानी होना, आहार नली का सिकुड़ा हुआ सा लगना, जी-मिचलाने के साथ दर्द और ठण्ड लगना, मुंह का स्वाद नमकीन सा होना आदि लक्षणों में रोगी को कैडमियम सल्फ औषधि प्रयोग करने से आराम आता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण : मुंह का टेढ़ा-मेढ़ा होना, जबड़ों का कांपना, चेहरे का लकवा आदि लक्षणों के आधार पर कैडमियम सल्फ औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण : चक्कर आकर रोगी का बेहोश हो जाना, सिर घूमने के साथ ही पूरा कमरा घूमता हुआ सा लगना, सिर में गर्मी बढ़ जाना, सिर में ऐसा महसूस होना जैसे कि कोई ठोंक रहा हो आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को कैडमियम सल्फ औषधि का प्रयोग कराना लाभकारी रहता है।
मल से सम्बंधित लक्षण : मलक्रिया के समय मलद्वार में दर्द होना, मल काला, पीला, हरा, बदबू के साथ, चिपचिपा आना आदि लक्षणों में रोगी को कैडमियम सल्फ औषधि देने से लाभ मिलता है।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण : पेशाब की नली में दर्द होना, पेशाब के साथ पीब और कभी-कभी खून भी आ जाना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को कैडमियम सल्फ औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण : पुराना जुकाम होना, नाक की जड़ का कसा हुआ सा महसूस होना, नाक का बन्द होना, नाक पर फोड़ा होना, नाक के नथुनों में जख्म होना आदि नाक के रोगों के लक्षणों में रोगी को कैडमियम सल्फ औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
आंखें से सम्बंधित लक्षण : खों से साफ तरह दिखाई न देना, आंखों के चारों तरफ काले घेरे होना, आंख की एक पुतली का फैला हुआ सा महसूस होना, रात को दिखाई न देना आदि आंख के रोगों के लक्षणों में रोगी को कैडमियम सल्फ औषधि देने से आराम मिलता है।
वृद्धि-
वजन उठाने से या चलने-फिरने से, सोने के बाद, खुली हवा में, उत्तेजक पदार्थो से रोग बढ़ता है।
शमन-
भोजन करने से तथा आराम करने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
कैडमियम सल्फ औषधि की तुलना कैडमियम आक्साइड, कैड आयोडेट, आर्से, कार्बो, वेरेट्र से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी के रोग के लक्षणों को जानकर कैडमियम सल्फ औषधि की 3 से 30 शक्ति तक देने से लाभ है।
कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस CACTUS GRANDIDLORUS
कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि को दिल के रोगों की एक बहुत ही लाभकारी औषधि माना जाता है। किसी व्यक्ति का दिल मानो ऐसा महसूस होता हो जैसे कि दिल सिकुड़ गया हो तो वह अपने दिल को दोनों हाथों से कसकर पकड़ लेता है, ये सिकुड़न के लक्षण शरीर के दूसरे भागों जैसे आहारनली, मूत्राशय आदि में भी पाई जाती है, इस तरह के रोगों के लक्षणों में कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि काफी अच्छा असर करती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण : - रोगी हर समय चिड़चिड़ा सा रहना, किसी से तमीज से बात न करना, हर वक्त लगता रहना जैसे कि कोई खुद को मारने आ रहा हो, हर समय उदास बैठे रहना, अचानक ही चीखने-चिल्लाने लगना, अपने आपको दूसरों के सामने कमजोर महसूस करना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण : -सिर पर ऐसा महसूस होना जैसे कि उस पर कोई भारी वजन रखा हो, सिर की दाएं तरफ के भाग में जलन के साथ दर्द होना, सिर की खून की नसों का फैल जाना, कानों में जलन होना, नज़रों का कमजोर हो जाना, आधे सिर में दर्द होना, सिर में सिकुड़न के साथ दर्द होना जो रोजाना एक खास समय पर लौट आता है आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण : - नाक से बहुत ज्यादा मात्रा में खून का आना, नजला होने पर नाक से स्राव का ज्यादा मात्रा में आना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि देने से लाभ मिलता है।
कण्ठ (गले) से सम्बंधित लक्षण : - आहारनली का सिकुड़ जाना, जीभ का सूख जाना, भोजन को खाते समय निगलने के लिए ज्यादा से ज्यादा तरल पदार्थों की जरूरत पड़ती है, कंठ में दम घोट देने वाली सिकुड़न के साथ होने वाला सिर का दर्द आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : - आमाशय के अन्दर जलन या भारीपन सा महसूस होना, खून की उल्टी होना आदि आमाशय रोग के लक्षणों में रोगी को कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि का प्रयोग कराना लाभकारी रहता है।
मल से सम्बंधित लक्षण : - मल का सख्त, काले रंग में आना, सुबह के समय दस्त होना, बवासीर के मस्सों में सूजन आना और दर्द होना, मलद्वार में बहुत ज्यादा वजन रखा हुआ सा महसूस होना, मलेरिया ज्वर के साथ आंतोँ से खून का आना, आदि लक्षणो में रोगी को कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि देने से लाभ मिलता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण : - पेशाब के रास्ते से खून के थक्के आना, बार-बार पेशाब का आना, पेशाब की नली से खून का आना, मूत्राशय ग्रीवा के सिकुड़ने के कारण पेशाब का रुक जाना आदि लक्षणों के किसी व्यक्ति में होने पर कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि नियमित रूप से सेवन करने से आराम मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण : - मासिकधर्म का दर्द के साथ आना, बच्चेदानी तथा डिम्बग्रन्थियों में सिकुड़न आना, योनि में जलन होना, मासिकधर्म का समय से पहले आ जाना, मासिकधर्म के दौरान स्राव काले रंग का, गाढ़ा आना, लेटने पर स्राव के साथ खून का आना बन्द हो जाने के साथ ह्रद्वविकार प्रकट हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि का उपयोग कराना लाभदायक रहता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण : - प्रतिदिन एक ही समय पर बुखार का आ जाना, पीठ में ठण्ड सी लगना, दोनों हाथों का बर्फ जैसा ठण्डा हो जाना, सविराम बुखार, जो दोपहर को 11 बजे से पहले आता है, ठण्डा सा पसीना आना, तापमान हमेशा सामान्य से कम रहता है, हर समय ठण्ड सी लगती रहती है आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण : - शरीर के अलग-अलग हिस्सों में जलन होने के कारण पूरी रात नीन्द का न आना, रात को आंखें बन्द करते ही भयानक दृश्य आंखों के सामने नज़र आना आदि लक्षणों के आधार पर कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि का प्रयोग लाभप्रद रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण : - हाथ-पैरों का शोफ (पानी भरना), हाथों का बिल्कुल नर्म पड़ जाना, बाईं तरफ की बाजू का सुन्न हो जाना, हाथ बिल्कुल बर्फ की तरह ठण्डे पड़ जाते हैं, लेटने पर टांगों में बैचनी रहती है आदि लक्षणों के नज़र आने पर रोगी को कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि का प्रयोग कराने से आराम मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण : - छाती पर बहुत भारी वजन सा रखा हुआ महसूस होना, दम सा घुटना, सांस लेने में परेशानी होना, छाती में सिकुड़न होना, ऐंठन के साथ खांसी होना, दिल में बहुत तेज दर्द जो बाईं तरफ की बाजू तक फैल जाता है आदि लक्षणों के नज़र आने पर रोगी को कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि खिलाने से लाभ होता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण : - दिल की धड़कन का सामान्य से तेज हो जाना, दिल का कमजोर हो जाना, धूम्रपान करने के कारण होने वाले दिल के रोग, बाईं ओर लेटने पर या मासिकस्राव शुरू होने पर धड़कन का तेज हो जाना, ठण्डा पसीना आना, सांस लेने में परेशानी आना, नाड़ी का कमजोर होना, सही तरीके से ना चलना, लो ब्लडप्रेशर होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि देने से लाभ होता है।
वृद्धि-
दोपहर होने से कुछ देर पहले, बाईं तरफ की करवट लेटने से, चलने से, सीढ़ियां चढ़ने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
खुली हवा में घूमने से रोग कम हो जाता है।
प्रतिविष-
ऐकोना, कैम्फर, चायना औषधि का उपयोग कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
तुलना-
कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि की तुलना डिजिटैलिस, स्पाइजी, कन्वैलेरिया, काल्मिया, नैजा, मैग्नोलिया से की जा सकती है।
मात्रा-
मूलार्क से 3 शक्ति तक।
जानकारी-
स्नायविक धड़कन में कैक्टस ग्रैण्डीफ्लोरस-सेलेनिसेरियस स्पाइनुलोसस औषधि की ऊंची शक्ति दे सकते हैं।
कल्केरिया सल्फ्यूरिका Calcarea Sulphurica
किसी व्यक्ति के शरीर पर किसी तरह का फोड़ा होकर उसके फूटने के बाद मवाद को बहने और बनने से रोकने के लिए कैल्केरिया सल्फ्यूरिका बहुत ही लाभकारी औषधि मानी जाती है। इसके अलावा गुर्दे के रोगों में पेशाब के साथ मवाद आने आदि लक्षणों में भी अगर इस औषधि को नियमित रूप से रोगी को सेवन कराया जाए तो रोगी पर कुछ ही समय में बहुत अच्छा असर होता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में कल्केरिया सल्फ्यूरिका का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण : बच्चों के सिर पर बालों का न उगना, जब मवाद बहती है अथवा पीली मवाद की पपड़ी जमने के बाद उतरती रहती है आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
आंख से सम्बंधित लक्षण : आंखों में जलन होना, आंखों के अन्दर से पीले रंग का गाढ़ा कीचड़ सा निकलना, किसी भी चीज का सिर्फ आधा ही नज़र आना, सबकुछ धुंधला सा नज़र आना, पैदा हुए बच्चों का मोतियाबिन्द आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि का प्रयोग लाभदायक सिद्ध होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण : कान से कम सुनाई देना, कान के बीच के हिस्से में स्राव होना जिसके साथ कभी-कभी खून भी आ जाता है, कान के चारों तरफ फुंसियां होना आदि कान के रोगों के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि देने से आराम मिलता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण : सिर में ठण्ड लग जाने के कारण नाक से गाढ़ा, पीले रंग का स्राव होना, नाक के एक तरफ के नथुने से हर समय स्राव होता रहता है, नाक के नथुनों के किनारों पर बहुत तेज दर्द होना आदि नाक के रोग के लक्षणों में कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि का सेवन लाभदायक सिद्ध होता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण : चेहरे पर छोटी-छोटी कीलें और फुंसियां निकलना, दाद सा होना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण : जिगर में और गोणिका में दाईं ओर दर्द होना, उसके बाद कमजोरी, जी मिचलाना और आमाशय में दर्द होना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण : जीभ मोटी सी और उस पर पीली रंग की परत जमना, मुंह का स्वाद खट्टा, साबुन जैसा होना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
गले से सम्बंधित लक्षण : गले के अन्दर जख्म के बढ़ जाने के कारण पीला सा स्राव निकलना, गले की गांठों में से मवाद का निकलना आदि गले के रोगों के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
मल से सम्बंधित लक्षण : मल के साथ खून का आना, मौसम के बदलने से होने वाले दस्त, आन्तों में से मवाद जैसा चिपचिपा स्राव होना, मलद्वार के आसपास फोड़ा होना आदि लक्षणों में कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि का सेवन लाभकारी रहता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण : मासिक-धर्म निश्चित समय से बाद में आना तथा काफी समय तक आया हुआ रहना, सिरदर्द होना, मासिक-धर्म के कारण बहुत ज्यादा कमजोरी आ जाना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि देने से लाभ मिल जाता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण : खांसी के साथ पीब जैसा और पतला सा बलगम आना, फेफड़ों में मवाद पड़ जाना, सर्दी-जुकाम के कारण नाक से गाढ़ा, सफेद पीला सा पीब जैसा स्राव होना आदि सांस के रोग के लक्षणों में कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि का सेवन कराना लाभदायक होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण : पैरों के तलुवों में जलन होने के साथ बहुत ज्यादा खुजली होने पर रोगी को कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण : त्वचा पर किसी चीज के कटने के कारण जख्म होना, हर समय जख्म में से मवाद का बहते रहना, पीली, पीबदार पपड़ियों सा स्राव होना, त्वचा पर पीले रंग की छोटी-छोटी फुंसियां निकलना, सिर की त्वचा पर दाने निकलना, बच्चों में सूखा छाजन आदि चर्मरोगों के लक्षणों मे रोगी को कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि का प्रयोग लाभ करता है।
तुलना-
कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि की तुलना हीपर, सिलीका से की जा सकती है।
मात्रा-
कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि की दूसरी और तीसरी शक्ति का विचूर्ण रोगी को देने से लाभ मिलता है।
जानकारी-
चेहरे की त्वचा पर जख्म होने पर कल्केरिया सल्फ्यूरिका औषधि की 12वीं शक्ति असरदार होती है।
मात्रा-
2 से 3 शक्ति का विचूर्ण।
कल्केरिया आस्ट्रियम Calcariya Austriyam
कल्केरिया आस्ट्रियम औषधि को वैसे तो किसी भी रोग के लक्षणों में उपयोग करने से लाभ ही मिलता है लेकिन फिर भी ये औषधि हडि्डयों के रोग में बहुत ही जल्दी असर करती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कल्केरिया आस्ट्रियम औषधि का उपयोग-
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बिल्कुल भूख न लगना जिसके कारण रोगी का शरीर बिल्कुल कमजोर सा हो जाता है, रोगी को बिल्कुल पतले पानी की तरह के दस्त आना जो दोपहर के समय ज्यादा हो जाते हैं। इस तरह के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया आस्ट्रियम औषधि का सेवन कराना उपयोगी रहता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्री का मासिकस्राव समय से पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में आना, स्त्री के पैरों का अक्सर घुटनों तक ठण्डा रहना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया आस्ट्रियम औषधि देना उपयोगी साबित होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी के फेफड़ों में टी.बी होना, फेफड़ों के बीच में और ऊपर के भाग में रोग का असर, छाती पर हल्का सा हाथ लगाने से या सांस लेने से या दर्द होना, सीढ़ियों पर चढ़ने से सांस का फूलना जैसे लक्षणों में रोगी को कल्केरिया आस्ट्रियम औषधि देने से लाभ मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपने आमाशय में खट्टापन सा महसूस होना, रोगी को पूरे दिन खट्टी-खट्टी डकारें आती रहती है, खट्टी उल्टी आती है और उल्टी के साथ दूध के टुकड़े निकलते है, रोगी को पतले दस्त आते है, रोगी के पूरे शरीर से खट्टी-खट्टी बदबू आती रहती है जैसे लक्षणों में रोगी को कल्केरिया आस्ट्रियम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
बाहरीय अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी के शरीर में रीढ़ की हड्डी और लंबी हडि्डयों में टेढ़ापन सा आ जाना, रोगी के हाथ-पैर टेढ़े-मेढ़े और बहुत ही ज्यादा बुरे हो जाना, रोगी के शरीर की हडि्डयों का बहुत ज्यादा नाजुक हो जाना, तालु-रंधु्र का बहुत दिनों तक खुला रहना, रोगी की खोपड़ी का बहुत ज्यादा बढ़ जाना जैसे लक्षणों में रोगी को कल्केरिया आस्ट्रियम औषधि देने से लाभ मिलता है।
पैरों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पैर बिल्कुल ठण्डे हो जाना, रोगी को अपने पैर इतने ठण्डे और नम लगते है जैसे कि उसने पैरों में गीले मोजे पहन रखे हो, रोगी को रात में पसीना आने के साथ पैरों में ठण्डक महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया आस्ट्रियम औषधि का प्रयोग कराना उचित रहता है।
पसीने से सम्बंधित लक्षण- रोगी की गर्दन के पीछे के भाग में, लिंग के उत्तेजित होने पर, छाती में, बगल में, हाथों में, घुटने में और पैरों में पसीना आने पर कल्केरिया आस्ट्रियम औषधि रोगी को देने से रोगी कुछ ही समय में स्वस्थ हो जाता है।
वृद्धि-
ठण्डी हवा में, सीढ़ियां चढ़ते समय, ज्यादा मेहनत करने से, भारी वजन उठाते समय शरीर पर जोर पड़ने से रोगी का रोग बढ़ जाता है।
कल्केरिया सिलिकेटा Calcarea Silicata
अपने पूरे जीवन में एक व्यक्ति को बहुत से रोगों का सामना करना पड़ता है, इसमें से कुछ रोग तो ऐसे होते हैं जो तुरन्त ही प्रकट हो जाते हैं लेकिन कुछ रोग ऐसे होते हैं जो बहुत धीरे-धीरे अपना असर दिखाते हैं, ऐसे रोगों के लक्षण एक-एक करके शरीर में प्रकट होते हैं और रोगी को रोग का पता तब चलता है जब वह रोग पूरी तरह से शरीर में प्रवेश कर चुका होता है। ऐसे रोगों में कल्केरिया सिलिकेटा औषधि का सेवन अगर सही तरीके से किया जाए तो ये रोगी को बहुत लाभ पहुंचाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में कल्केरिया सिलिकेटा औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण : रोगी का हर समय उदास रहना, किसी से सही तरह से बात न करना, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाना, अपने आप ही डर जाना, उसको महसूस होना कि वह किसी काम के लायक नहीं है आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया सिलिकेटा औषधि देने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण : चक्कर आना, सिर बिल्कुल ठण्डा लगना, नजले में स्राव गाढ़ा, पीले रंग का आना और नाक में पपड़ी सी जमना, आंख के सफेद भाग से पानी आना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया सिलिकेटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : पेट के खाली रहने पर ठण्डक महसूस होना, पाचन शक्ति का कमजोर होना, बहुत ज्यादा प्यास लगना, खाना खाने के बाद पेट में अफारा होना, पेट का फूल जाना, उल्टी और डकारें आना आदि आमाशय रोग के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया सिलिकेटा औषधि का प्रयोग कराने से आराम मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण : गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली का भारी होना, मासिकधर्म का समय से न आना और दर्द के साथ आना, एक मासिकधर्म समाप्त होने के बाद और दूसरा मासिकधर्म आने से पहले के समय में स्राव का खून के साथ आना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में कल्केरिया सिलिकेटा औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण : सांस लेने में परेशानी होना, ज्यादा ठण्डी हवा बर्दाश्त न हो पाना, बलगम का बहुत ज्यादा मात्रा में हरा या पीले रंग का आना, खांसी, कमजोरी, चिड़चिड़ापन आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया सिलिकेटा
औषधि देने से आराम आता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण : त्वचा में खुजली होना, जलन होना, त्वचा का ठण्डा महसूस होना, रंग नीला पड़ना, त्वचा पर छोटी-छोटी फुंसियां आदि निकलना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में कल्केरिया सिलिकेटा औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
तुलना-
कल्केरिया सिलिकेटा की तुलना आर्सेनिक, टुबरकुलीनम, बैराइटा, कार्बो, आयोडम से की जा सकती है।
मात्रा-
निम्नतम से उच्च सारी शक्तियां।
कार्बोलिकम एसिडम Carbolicum Acidum
किसी व्यक्ति में शारीरिक और मानसिक मेहनत करने का मन न करना, सिर में दर्द होना, आमाशय में किसी तरह का रोग हो जाना आदि रोगों में कार्बोलिकम एसिडम औषधि बहुत लाभकारी असर करती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कार्बोलिकम एसिडम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण :
बिल्कुल भी दिमागी काम करने का मन न करना, सिर में ऐसा महसूस होना जैसे कि किसी ने सिर को बहुत कस रखा हो, दाईं आंख के गोले में स्नायु का दर्द, धूम्रपान करने से सिर का दर्द कम हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कार्बोलिकम एसिडम औषधि देने से लाभ मिलता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण -
नाक से स्राव के रूप में मवाद का आना, पुराना जुकाम हो जाने के कारण नाक से बदबू आना और जख्म होना, सूंघने की शक्ति का तेज हो जाना, इन्फ्लुएंजा रोग होने के कारण शरीर में आई हुई कमजोरी आदि लक्षणों में रोगी को कार्बोलिकम एसिडम औषधि का प्रयोग कराने से आराम मिलता है।
गले से सम्बंधित लक्षण -
गालों और होठों के अंदर के भाग में जख्म से बन जाना, मुंह से लेकर आमाशय तक जलन होना, काग का सिकुड़ जाना, बदबूदार स्राव आना, किसी भी चीज को खाते या पीते समय निगलना मुश्किल हो जाना, नाक और मुंह के आसपास के हिस्से का सफेद हो जाना, चेहरे का मैला सा लगना आदि लक्षणों में रोगी को कार्बोलिकम एसिडम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
आमाशय-
भूख का बिल्कुल समाप्त हो जाना, मन में तेज पदार्थ और धूम्रपान करने की इच्छा होना, लगातार उबकाई का आते रहना, जी मिचलाना और उल्टी होना, आहारनली में गर्मी होना, आमाशय और पेट का फूल जाना, आन्तों के एक न एक हिस्से में हर समय अफारा और दर्द का होते रहना, मुंह का स्वाद खराब होना, सांस में से बदबू का आना आदि आमाशय रोग के लक्षणों में रोगी को कार्बोलिकम एसिडम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
मल-
पेट में कब्ज होने के साथ-साथ मलद्वार से गंदी-गंदी हवा निकलना, मल में खून का आना, पानी जैसे, काले रंग के और बदबूदार दस्त का आना आदि लक्षणों में रोगी को कार्बोलिकम एसिडम औषधि देने से लाभ होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण -
पेशाब का रंग काला होना, पेशाब मीठा आना, बूढ़ों के मसानों में सूजन आना, रात को बार-बार पेशाब का आना जैसे लक्षणों में रोगी को कार्बोलिकम एसिडम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण -
योनि के आसपास के हिस्से में फुंसियां सी निकल आना, जिनके अंदर खून के साथ पीब भी भरी हुई होती है, बाएं डिम्बाशय में दर्द होना, जरायु (गर्भाशय) पर खरोंच पड़ जाना, छोटी लड़कियों की योनि में से प्रदर आना, बच्चे को जन्म देने के बाद होने वाले बुखार के साथ बदबूदार स्राव का आना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में कार्बोलिकम एसिडम औषधि का सेवन लाभकारी रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण -
चलते समय टांग के आगे के हिस्से में और पिण्डली की बड़ी हड्डी के आसपास के भाग में ऐंठन सी होना, जोड़ों में दर्द होना, जांघ की आगे की हड्डी में किसी चीज के काट लिए जाने जैसा दर्द होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कार्बोलिकम एसिडम औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण-
त्वचा पर मोटे-मोटे छाले निकलना जिनमें खुजली और जलन सी होती है, शरीर में किसी स्थान पर जख्म सा बन जाना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को कार्बोलिकम एसिडम औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
वृद्धि-
पैदल चलने से, अंग तानने से, झटकों से, धक्कों से, दिमागी और शारीरिक मेहनत करने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
धूम्रपान करने से, कड़क चाय पीने से, बांधने से और रगड़ने से रोग कम हो जाता है।
प्रतिविष-
नशीले पदार्थ, सिरका, चाक, आयोडीन, सेंधानमक का घोल।
प्रतिकूल-
ग्लिसरीन और वनस्पतियों से निकलने वाले तेल।
तुलना-
क्राइसैरोबिन, आसेनिक, क्रियोजोट, कार्बो, ग्वानो से कार्बोलिकम एसिडम औषधि की तुलना कर सकते है।
मात्रा-
रोगी को उसके लक्षणों के आधार पर कार्बोलिकम एसिडम औषधि की 3 से 30 शक्ति तक देने से लाभ होता है।
कैलेण्डुला आफिसिनैलिस Calendula Officinalis
कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि शरीर के किसी भी तरह के जख्म को ठीक करने में बड़ी असरदार साबित होती है। यह औषधि बहते हुए घावों को बन्द करके बहुत जल्दी भर देती है। इसके अलावा कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि दांत उखाड़ने के बाद बहते हुए खून को रोकती हैं।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि का उपयोग-
सिर से संबंधित लक्षण - सिर में तेज दर्द होना, दिमाग पर ऐसा लगना जैसे कि किसी ने बहुत वजन रखा हुआ है, गर्दन में दाईं ओर दर्द होना, खोपड़ी के ऊपर कटे हुए जैसे जख्म आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
आंखों से संबंधित लक्षण- आंखों का किसी तरह का आप्रेशन करवाने के बाद आंसुओं की नली में से पीब जैसा स्राव आना, आंखों में चोट लगने जैसा दर्द होना आदि आंखों के लक्षणों के आधार पर रोगी को कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि देने से लाभ होता है।
नाक से संबंधित लक्षण - नाक के एक नथुने में नजला होना जिसमें से हर समय हरे रंग का स्राव बहुत ज्यादा मात्रा में निकलता रहता है जैसे नाक के रोगों के लक्षण नज़र आने पर रोगी को कुछ दिन तक कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि का सेवन कराया जाए तो रोगी कुछ ही दिन में ठीक हो जाता है।
आमाशय से संबंधित लक्षण - बच्चे को मां का दूध पीते ही तुरन्त भूख लग जाती है, सीने में बेचैनी होना, उल्टी होना आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों में रोगी को कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि देने से आराम मिलता है।
सांस से संबंधित लक्षण :- खांसी के साथ बहुत ज्यादा बलगम आना, गले में खराश होना आदि लक्षणों के आधार पर कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
स्त्री से संबंधित लक्षण :- स्त्री के योनिद्वार पर मस्से से पैदा होना, मासिकधर्म दब जाने के साथ खांसी होना, गर्भाशय की झिल्ली का बढ़ना, उरुसंधि का फैलना आदि स्त्री के रोगों के लक्षणों में कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
चर्म (त्वचा) से संबंधित लक्षण - त्वचा का रंग पीला होना और उस पर झुर्रियां सी पड़ना, केंचुलीदार जख्म होना, मांस तना हुआ, त्वचा के ऊपर भाप के कारण जलन होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को अगर कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि का उपयोग किया जाए तो यह चर्मरोगों के लिए बहुत लाभकारी रहता है।
ज्वर (बुखार) से संबंधित लक्षण - सर्दी लगना, खुली हवा में जाते ही ठण्ड महसूस होना, छूने पर त्वचा का गर्म सा महसूस होना, पीठ में कंपकंपी लगना, शाम के समय गर्मी लगना आदि बुखार के लक्षणों में रोगी को कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि का उपयोग कराया जाए तो ये उसके लिए लाभकारी रहता है।
वृद्धि-
नम, भारी, बारिश के मौसम में रोग बढ़ सकता है।
प्रतिविष-
तुलना-
कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि की तुलना हैमामे, हाइपेरिक, सिम्फाइट, आर्नि, फेर-पिक्रि, काली आयोडेट, मैग्नी-कार्बो, ग्रेफा से की जा सकती है।
मात्रा-
कैलेण्डुला आफिसिनैलिस औषधि का मूलार्क या 3 शक्ति तक देने से लाभ होता है।
कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम Calcarea Carbonica- Ostrearum
कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि को सिर के किसी भी रोग को दूर करने में बहुत ही चमत्कारिक औषधि माना जाता है, इस औषधि को अगर नियमित रूप से सेवन किया जाए तो किसी भी कारण से सिरदर्द बिल्कुल ठीक हो जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण : सिर में दर्द होना, सिर का भारी होना जैसे किसी ने सिर में भारी वजन रखा हो, हाथ-पैरों का ठण्डा होना, ऊपर की ओर चढ़ते समय चक्कर से आना, भारी वजन उठाने या ज्यादा दिमागी मेहनत करने से सिर में दर्द होने के साथ-साथ जी का मिचलाना, सिर का भारी और गर्म होने के साथ चेहरे का पीला पड़ जाना, सिर के ऊपर दाईं ओर बर्फ जैसी ठण्डक महसूस होना, सिर में बहुत ज्यादा पसीना आना, सिर में खुजली होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
आंख से सम्बंधित लक्षण : आंखों में जरा सी भी रोशनी पड़ते ही आंखों का बन्द हो जाना, खुली हवा में और सुबह के समय आंखों में से आंसुओं का आना, ठण्ड के कारण आंसुओं की नलियों का बन्द हो जाना, थोड़ा सा भी आंखों का काम करने से आंखों का थक जाना, दूर की चीजें साफ नज़र आना, लेकिन पास की चीजें साफ नज़र न आना, पलकों में खुजली होना, पलकें सूज जाना, मोतियाबिंद हो जाना, आंखों से धुंधला दिखाई देना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि देने से लाभ होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण : कानों में जलन होना, कानों में अजीब-अजीब सी आवाजें गूंजना, कान में पानी भरने के कारण आने वाला बहरापन, कान के ऊपर और पीछे की ओर फुंसियां होना, कान और गर्दन के पास के हिस्से में ठण्ड बर्दाश्त न होना, आदि लक्षणों के आधार पर कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण : नाक के नथुने में दर्द होना, नाक में जख्म होना, नाक के बन्द होने के साथ नाक में से पीले रंग का बदबूदार स्राव होना, नाक से बदबू आना, नाक की जड़ में सूजन आना, नाक से खून का आना, मौसम के बदलते ही सर्दी-जुकाम का रोग हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण : चेहरे का रंग पीला पड़ जाना, ऊपर के होठ में सूजन आ जाना, आंखों का अन्दर की ओर धंस जाना, चेहरे को धोने के बाद चेहरे पर खुजली और जलन महसूस होना, चेहरे पर मूछों वाले भाग पर फुंसियों के साथ खुजली होना, दर्द ‘शुरू होकर दिमाग के दाएं भाग से जबड़े के साथ-साथ चलते हुए कानों में पहुंच जाता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण : मुंह का स्वाद खट्टा सा महसूस होना, रात को सोते समय जीभ का सूखता हुआ लगना, मसूढ़ों से खून का आना, बच्चों के दांत निकलते समय देरी होना और साथ में कई रोगों का बच्चे को घेर लेना, मुंह के अन्दर किसी भी तरह की गर्म या ठण्डी चीज रखने से दांत में दर्द तेज हो जाना, मुंह से बदबू का आना, पेट में किसी तरह की गर्म चीज पहुंच जाने से जीभ की नोक में जलन होना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण : किसी भी चीज को निगलते समय गले के अन्दर किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना, खखारने पर बलगम निकल जाता है, कान की जड़ की ग्रंथियों का नासूर होना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन नियमित रूप से कराने से लाभ मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : मांस और उबली हुई चीजों को देखते ही भूख का मर जाना, जो चीजें हजम होने में परेशानी होती है उनको खाने का मन करना जैसे खड़िया, कोयला, पेंसिल आदि, खट्टी डकारों का आना, ज्यादा मेहनत करने से भूख का समाप्त हो जाना, कलेजे में जलन होना, बहुत तेज भूख लगना, भोजन करते समय रोग का बढ़ जाना, पेट को छूते ही दर्द होना आदि आमाशय रोग के लक्षणों में रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण : पेट पर थोड़ा सा भी दबाव पड़ते ही दर्द होना, झुकने पर जिगर में दर्द होना, पेट में सूजन आना, कमर पर टाईट कपड़ा पहनने पर परेशानी महसूस होना, पेट में चिकनाई वाले पदार्थो का बढ़ना, कमजोरी महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन करने से आराम मिलता है।
मल से सम्बंधित लक्षण : मलान्त्र में किसी चीज के रेंगने जैसा महसूस होना और उसका सिकुड़ जाना, मल का सफेद रंग का पानी के रूप में आना, गुदाद्वार में जलन होना, खूनी बवासीर, मल का बदबू के साथ आना, बच्चों को होने वाले दस्त, कब्ज होना, मल पहले सख्त रूप में आना फिर चिकना आना और बाद में बिल्कुल पतला आना आदि लक्षणों में कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण : -पेशाब का बहुत ज्यादा मात्रा में, कत्थई रंग का और बदबू के साथ आना, पेशाब के साथ खून का आना, पेशाब की नली में उत्तेजना होना, पेशाब का अपने आप ही निकल जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि देने से लाभ मिलता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण : वीर्य का बार-बार अपने आप ही निकल जाना, यौन उत्तेजना का तेज हो जाना, संभोगक्रिया के समय वीर्य का जल्दी निकल जाना, संभोग करने के बाद शरीर में कमजोरी और चिड़चिड़ापन लगना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण : मासिकधर्म आने से पहले सिर में दर्द होना, पेट में दर्द होना और योनि से पानी का आना, मासिकस्राव के दौरान गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली में बहुत तेज दर्द होना, मासिकधर्म के समय स्राव पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में काफी दिनो तक रहने के साथ चक्कर आना, दांत में दर्द और पैर ठण्डे महसूस होना, योनि में से दूध के रंग का स्राव होना, मासिकस्राव के समय और बाद में जनेन्द्रियों में जलन और खुजली महसूस होना, कम उम्र की लड़कियों में यौन उत्तेजना का तेज हो जाना, स्तनों में सूजन आ जाना, स्तनों में दूध का ज्यादा आना, जनेन्द्रियों के बाहरी भागों पर पसीना ज्यादा आना, बांझपन और स्राव का ज्यादा मात्रा मे आना आदि लक्षणों के आधार पर कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन काफी लाभकारी रहता है।
चर्म (चमड़ी) से सम्बंधित लक्षण : त्वचा पर झुर्रियां पड़ जाना, त्वचा में अपने आप ही जख्म बन जाना, छोटे-छोटे जख्मों को भरने में देर लगना, ग्रंथियों में सूजन आना, चेहरे और हाथों पर मस्से से होना, त्वचा पर बारीक-बारीक से दाने निकलना, फोड़े होना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण : दोपहर 2 बजे के बाद पेट के अन्दर से सर्दी लगना शुरू होना, बुखार के साथ पसीना आना, रात को सोते समय गर्दन और छाती में बहुत ज्यादा पसीना आना, मासिकस्राव के दौरान रात को गर्मी लगने के साथ बेचैनी होना, बच्चों के सिर पर बहुत ज्यादा पसीना आना आदि लक्षणों में कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण : मन में हर समय कोई न कोई बात चलते रहने के कारण नींद न आना, आंखों को खोलते ही आंखों के सामने डरावनी चीजें नज़र आना, रात को बार-बार जाग जाना, रात को सोते समय डरावने सपने आना आदि लक्षणों में रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण : जोड़ों में दर्द होना, किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना, पैरों का ठण्डा होना, पिण्डलियों में ऐंठन आना, हाथ-पैरों का कमजोर होना, घुटनों के जोड़ों में सूजन आ जाना, पैरों के तलुओं में जलन होना, हाथों में पसीना आना, जोड़ों पर गांठे निकलना, पेशियों में बहुत तेज दर्द महसूस होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि देने से आराम मिलता है।
कमर से सम्बंधित लक्षण : कमर में इस तरह का दर्द होना जैसे कि उसमे मोच आ गई हो, खड़े होने में परेशानी होना, ज्यादा वजन उठाने के कारण कमर में होने वाला दर्द, कमर में गठिया का दर्द होना, कमर के नीचे के हिस्से में कमजोरी आना, गर्दन के पीछे का हिस्सा अकड़ जाना और सख्त हो जाना, गुर्दों में दर्द होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण : रात को भोजन करने के बाद दिल की धड़कन का तेज होना, छाती में बेचैनी और दम का घुटता हुआ सा महसूस होना जो अक्सर दानों के या फुंसियों के दब जाने के कारण होता है आदि लक्षणों में कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का सेवन काफी अच्छा रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण : -रात को सोते समय बढ़ने वाली खांसी, सुबह के समय सूखी खांसी होने के साथ बहुत ज्यादा बलगम का आना, सांस लेने में परेशानी होना, बलगम के साथ खून का आना, खांसी के ऐसे दौरे जिसमे दम घुटने लगता है, सीढ़ियां चढ़ते समय खांसी का तेज हो जाना, छाती में गहराई से पैदा होने वाला दर्द, हर समय खुली हवा में बैठे रहने का मन करना आदि लक्षणों के आधार पर कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि का प्रयोग अच्छा रहता है।
प्रतिविष-
कैम्फर, इपिका, नाइट्रि-एसिड, नक्स-वोमिका औषधियां का प्रयोग कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
पूरक-
वृद्धि-
ठण्डी हवा से, बारिश के मौसम में, ठण्डे पानी से, धोने से, सुबह के समय, पूर्णिमा के समय रोग बढ़ जाता है।
शमन-
सूखे मौसम में, जिस तरफ दर्द हो उसी करवट लेटने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
एकुआ कैल्कार, कास्टि, कल्केरिया ब्रोमै से कल्केरिया कार्बोनिका-ओस्टरियेरम औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
6 शक्ति का विचूर्ण। तीसवीं और इससे भी ऊंची शक्तियां।
कैल्मिया लैटिफालिया Calmiya Laitfaliya
कैल्मिया लैटिफालिया औषधि दिल के रोगों में बहुत अच्छा असर करती है। दिल के रोगों के किसी भी तरह के लक्षणों में अगर रोगी को कैल्मिया लौटिफालिया औषधि दी जाए तो रोगी को बहुत जल्द आराम आता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कैल्मिया लौटिफालिया औषधि का उपयोग-
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- रोगी के चेहरे पर दाईं तरफ स्नायु का दर्द होना जैसे लक्षणों में रोगी को कैल्मिया लौटिफालिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों में तेज दर्द होना जो आंखों को घुमाने पर तेज हो जाता है, रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसके चक्षु गन्हर (आंखों के गोले) बहुत बड़े हो गए हो और वह आंखों से बाहर निकल पड़ेंगे। इस तरह के लक्षणों में रोगी को कैल्मिया लौटिफालिया औषधि देने से रोगी कुछ ही समय में स्वस्थ हो जाता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण- रोगी की धड़कन अनियमित हो जाना जैसे दिल की धड़कन कभी तो तेजी से चलने लगती है और कभी अपने आप ही कम हो जाती है, नाड़ी का अचानक धीरे-धीरे से चलने लगना आदि लक्षणों में रोगी को कैल्मिया लौटिफालिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
कैलोट्रापिस Calotropis
कैलोट्रापिस औषधि फीलपांव, कोढ़, पेचिश (खूनी दस्त) आदि के लक्षणों में काफी लाभकारी साबित होती है। इसके अलावा कैलोट्रापिस औषधि त्वचा में खून को सही मात्रा में पहुंचाती है और पसीना लाकर त्वचा को साफ करती है। टी.बी. और दमा रोग में भी ये औषधि काफी असरदार साबित होती है।
तुलना-
कैलोट्रापिस औषधि की तुलना मर्क्यू, पोटाशियम, आयोडेट, बर्बेरिस-एक्वि, सर्सापै, इपिका से की जा सकती है।
मात्रा-
मूलार्क दिन में 3 बार 1 बूंद से लेकर 5 बूंदों तक।
कैलोट्रोपिस जिंगैटिया Calotropis Jingotiya
कैलोट्रोपिस जिंगैटिया औषधि दमा, पेट में पानी भरना, खांसी, नजला, पुराना गठिया रोग, दस्त, गुर्दों की टी.बी, कोढ़ चमड़ी के रोग आदि में काफी लाभकारी होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कैलोट्रोपिस जिंगैटिया औषधि का प्रयोग -
मन से संबंधित लक्षण- किसी व्यक्ति को हर समय दिमाग में चिन्ता, तनाव रहना, शरीर में थकावट रहना, हर समय बैचेनी रहना आदि होने पर कैलोट्रोपिस जिंगैटिया औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
मुंह से संबंधित लक्षण- मुंह के अन्दर से गंदी बदबू आना, मुंह में दर्द होना, जबड़ों में दर्द होना आदि मुंह के रोगों में कैलोट्रोपिस जिंगैटिया औषधि का नियमित रूप से सेवन करने से लाभ होता है।
मूत्र (पेशाब) से संबंधित लक्षण - जिस व्यक्ति को बार-बार पेशाब आता हो, पेशाब का रंग लाल हो या उसमें से तेज बदबू आती हो तो ये मूत्ररोग के लक्षण होते हैं इसको दूर करने के लिए कैलोट्रोपिस जिंगैटिया औषधि का इस्तेमाल बहुत ही लाभकारी सिद्ध होती है।
सांस से संबंधित लक्षण - किसी व्यक्ति को छाती में जलन होने पर, सांस के रुक-रुककर चलने पर उसे अगर कैलोट्रोपिस जिंगैटिया औषधि का सेवन कराया जाए तो रोगी कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।
नाड़ी (नब्ज) से संबंधित लक्षण - किसी व्यक्ति की नब्ज अगर सामान्य से तेज गति से चलती हो तो उसे कैलोट्रोपिस जिंगैटिया औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
निम्नांग (शरीर के नीचे के अंग) से संबंधित लक्षण - किसी व्यक्ति की दाईं जांघ में उरुसंधि के नीचे दर्द होना, सूजन आना, चलते समय बाएं पैर में दर्द होना आदि होने की वजह से रोगी को हर समय लेटा ही रहना पड़ता है। ये दर्द लेटे रहने से ज्यादा भी हो जाता है और रोगी व्यक्ति की आंखों में दर्द होने लगता है। इन लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को कैलोट्रोपिस जिंगैटिया औषधि का नियमित रूप से सेवन कराया जाए तो रोगी कुछ ही दिन में ठीक हो जाता है।
बुखार से संबंधित लक्षण - किसी व्यक्ति को बुखार आने पर अचानक ठण्ड लगने लगती है, रोगी का सिर गर्म रहता है, शरीर ठण्डा पड़ जाता है। बुखार आने पर रोगी को रात में सोते समय बहुत ज्यादा ठण्ड लगती है। इन सारे लक्षणों में अगर रोगी को कैलोट्रोपिस जिंगैटिया औषधि दी जाए तो काफी लाभ होता है।
आमाशय से संबंधित लक्षण - किसी व्यक्ति को आमाशय में किसी तरह का रोग होने पर उसको लगातार न रुकने वाली डकारें आती रहती हैं। इस रोग में रोगी को अगर कैलोट्रोपिस जिंगैटिया औषधि का सेवन कराया जाए तो उसके आमाशय के रोग दूर हो जाते हैं।
सिर से संबंधित लक्षण - किसी व्यक्ति के सिर में अगर किसी तरह का कोई भी रोग होता है तो उसके सिर के पीछे के हिस्से में सुबह लगभग 11 बजे के करीब हल्का सा दर्द होता है, सिर गर्म रहता है, रोगी को चक्कर आने लगते हैं और इसी के साथ उसको उल्टी आने का मन करता है। इस तरह के सिर के रोगों के लक्षण नज़र आने पर रोगी को अगर कैलोट्रोपिस जिंगैटिया औषधि का सेवन कराया जाए तो रोगी कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।
मात्रा-
कैलोट्रोपिस जिंगैटिया की जड़ का रस 2x, 3x, 6 शक्तियां।
कैलोट्रोपिस लैक्टम Calotropis Lactum
कैलोट्रोपिस लैक्टम औषधि आक (मदार) के पेड़ की गोंद या दूध से बनाया जाता है। दस्त, उल्टी, दांत में दर्द, तिल्ली का बढ़ना, आंखों के रोग तथा चमड़ी आदि के रोगों में इस औषधि का इस्तेमाल बहुत लाभकारी होता है।
मात्रा-
3X, 6X शक्तियां।
जानकारी-
जिन रोगों में कैलोट्रोपिस जिंगोटिया नाम की औषधि से किसी तरह का लाभ नही होता उन रोगों में अगर कैलोट्रोपिस लैक्टम औषधि का इस्तेमाल करने से लाभ होता है।
काल्था पालुस्ट्रिस Caltha Palustris
काल्था पालुस्ट्रिस औषधि को पेट में दर्द, उल्टी, सिर में दर्द, कानों के अन्दर अजीब-अजीब सी आवाजें सुनाई देना, पेशाब में जलन होना, दस्त आदि रोगों के लक्षणों के आधार पर सेवन करने से लाभ मिलता है।
विभिन्न लक्षणों में काल्था पालुस्ट्रिस औषधि का उपयोग-
चर्म (त्वचा) से संबंधित लक्षण - त्वचा पर बहुत ज्यादा खुजली होना, चेहरे पर सूजन आना, खासकर आंखों के चारो ओर, जांघों के नीचे छोटे-छोटे खुजली वाले दाने, फुंसियां, गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली में कैंसर आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को काल्था पालुस्ट्रिस का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
मात्रा -
काल्था पालुस्ट्रिस औषधि का मूलार्क रोगी को देना चाहिए।
कैम्फोरा Camphora
कैम्फर को हैजा रोग को दूर करने के लिए बहुत ही उपयोगी औषधि समझा जाता है। अगर हैजा के रोगी के लक्षणों को देखकर जैसे बहुत ज्यादा पतले दस्त आना, पुट्ठों में ऐंठन, सीने में मरोड़ उठने जैसा दर्द होना, शरीर का नीला और बिल्कुल ठण्डा पड़ जाना, कमजोरी आना में यह औषधि सेवन कराई जाए तो रोगी को बहुत लाभ होता है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों में कैम्फोरा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर घूमता हुआ सा महसूस होना, बेहोशी सी छाना, सिर के दर्द के साथ ही जुकाम के लक्षण प्रकट होना, बार-बार छींके आना, ठण्डा सा पसीना आना, जीभ का ठण्डा होना, सिर के पीछे के हिस्से में जलन जिसमें नाड़ी की चाल के साथ ही फड़कन सी होना। ऐसे आदि लक्षणों में रोगी को कैम्फोरा औषधि का प्रयोग कराना लाभकारी रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों का बिल्कुल एक जगह जम सा जाना, नज़रों का कमजोर हो जाना, आंखों की पलकों का फैल जाना, आंखों से हर चीज का चमकता हुआ सा महसूस होना आदि लक्षणों में कैम्फोरा औषधि काफी अच्छा असर दिखाती है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- नाक का बंद हो जाना, बार-बार छींके आना, मौसम के बदलते ही नाक बहना चालू हो जाती है, बार-बार नाक से खून आता रहता है आदि नाक के रोग के लक्षणों के आधार पर कैम्फोरा औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण - चेहरे का रंग बिल्कुल मुरझाया हुआ और पीला सा पड़ना, ठण्डा सा पसीना आना, चेहरे का भयानक होना आदि लक्षणों में रोगी को कैम्फोरा औषधि देने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - पेट में दबाव के साथ दर्द होना, आमाशय में ठण्डक महसूस होना, जलन होना आदि आमाशय रोगों के लक्षणों में कैम्फोरा औषधि का प्रयोग लाभप्रद रहता है।
मल से सम्बंधित लक्षण - मल का काले रंग में आना, मल का लगातार आते रहना, गर्मी के कारण हैजे का रोग फैलना, पिण्डलियों में ऐंठन होना, शरीर का बिल्कुल ठण्डा पड़ना, बेचैनी होना, शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी आना, जीभ और मुंह का ठण्डा हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कैम्फोरा औषधि का सेवन कराने से आराम पड़ जाता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब में जलन होना, पेशाब का बार-बार आना, पेशाब का रुक जाना लेकिन महसूस ऐसे होना जैसे मूत्राशय पूरा भरा हुआ हो आदि लक्षणों में रोगी को कैम्फोरा औषधि देने से आराम मिलता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - यौन उत्तेजना का बहुत बढ़ना, रात को सोते समय वीर्य का निकल जाना (स्वप्नदोश), सूजाक रोग के कारण बांझपन आना आदि रोगों के लक्षणों में रोगी को कैम्फोरा औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण : दिल के हिस्से में बेचैनी होना, सांस लेने में परेशानी होना, दम सा घुटता हुआ महसूस होना, दमे का दौरा पड़ना, बहुत तेज होने वाली खांसी, रुक-रुककर होने वाली खांसी, धड़कन का तेज होना, सांस का उखड़ना आदि लक्षणों में रोगी को कैम्फोरा औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण : नींद न आना, शरीर के अंगों का ठण्डा हो जाना, पुट्ठों में झटके लगना तथा बहुत ज्यादा बैचेनी होना आदि लक्षणों के आधार पर कैम्फोरा औषधि का सेवन कराना लाभप्रद रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - कंधों के बीच के हिस्से में गठिया का दर्द, हिलना, डुलना बहुत मुश्किल हो जाता है, सुन्नपन आ जाना, जोड़ों में कड़कड़ाहट सी होना, पिण्डलियों में ऐंठन आना, पैरों का बर्फ जैसा ठण्डा हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर कैम्फोरा औषधि का सेवन बहुत ज्यादा लाभकारी रहता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- नाड़ी का कमजोर हो जाना, पूरा शरीर बर्फ की तरह ठण्डा हो जाना, ठण्डा पसीना आना, जीभ का ठण्डा, थुलथुला और कांपता हुआ सा होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कैम्फोरा औषधि का सेवन कराना लाभप्रद रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा का बिल्कुल ठण्डा तथा नीले से रंग का हो जाना, कपड़े पहनने में परेशानी होना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में अगर रोगी को नियमित रूप से कैम्फोरा औषधि का प्रयोग कराया जाए तो अच्छा रहता है।
वृद्धि-
गति करने से, रात के समय, किसी के द्वारा छूने से, ठण्डी हवा से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्मी से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
कैम्फोरा औषधि की तुलना लाफा एक्यूटेंगला, कैम्फोरिक एसिड से की जा सकती है।
प्रतिकूल-
पूरक-
प्रतिविष-
ओपियम, नाइट्रि-स्पिरिट-डिस्सस, फास्फो औषधियों का प्रयोग कैम्फोरा औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा-
मूलार्क को बूंद-बूंद मात्राओं में बार-बार दोहराते चले जाइये।
कैमोमिला मैट्रिकेरिया Cemomila Metrikiya
कैमोमिला मैट्रिकेरिया औषधि रोगी को बहुत ज्यादा गुस्सा आने पर तथा गुस्से के कारण उत्पन्न लक्षणों में इस्तेमाल किया जाता है। इसके अलावा इस औषधि को बहुत ज्यादा पसीना आने पर, बुखार आने पर, बुखार में प्यास न लगने पर, एक गाल गर्म और दूसरा गाल ठण्डा रहना, चेहरा पीला पड़ जाना जैसे लक्षणों में बहुत ही उपयोगी माना जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कैमोमिला मैट्रिकेरिया औषधि का उपयोग-
सांस से सम्बंधित लक्षण - रोगी को सूखी खांसी होती है जो रात को सोते समय अचानक उठ जाती है, लेकिन खांसी होने पर भी रोगी जागता नहीं है, रोगी के गले में अचानक ऐसा महसूस होना जैसे कि कोई चीज अटक रही है, होकर खांसी उठना, रोगी को होने वाली पुरानी खांसी जो सर्दी के मौसम में बढ़ जाती है, रोगी का पूरा शरीर ठण्डा रहना लेकिन उसके चेहरे और सांस में एक तरह की गर्मी सी रहती है, रोगी को एक ही साथ गर्मी और सर्दी महसूस होती है, रोगी की त्वचा नम रहती है लेकिन उसमें ऐसी गर्मी पैदा हो जाती है जैसे कि त्वचा जल रही हो आदि लक्षणों में रोगी को कैमोमिला मैट्रिकेरिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण - रोगी स्त्री को मासिकस्राव के समय स्राव का रुक-रुक कर आना तथा स्राव में खून काले रंग का और गाढ़ा सा आना, रोगी स्त्री को किसी तरह का गुस्सा आने के बाद मासिकस्राव का दर्द होना, प्रसव का दर्द ऊपर की ओर दबाव पड़ने के साथ या पीठ से शुरु होकर जांघ के अन्दर की ओर नीचे की तरफ उतरता है, रोगी स्त्री का गर्भाशय का मुख सख्त होने के कारण होने वाला दर्द जो स्त्री सहन भी नहीं कर पाती। इस तरह के लक्षणों में रोगी स्त्री को अगर कैमोमिला मैट्रिकेरिया औषधि दी जाए तो उसे बहुत जल्दी आराम पड़ता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - रोगी के कानों में इतनी तेजी से दर्द होना कि रोगी दर्द के मारे चिल्लाने लगता है, रोगी को कानों में थोड़ी-थोड़ी देर के बाद दबाव सा महसूस होता है, कानों में जरा सी भी ठण्डी हवा लगती है तो रोगी के कानों में दर्द होने लगता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को कैमोमिला मैट्रिकेरिया औषधि देने से आराम आता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण - पेट में गैस भर जाने के कारण रोगी का पेट फूल जाता है और बहुत तेज दर्द होता है, थोड़ी-थोड़ी देर के बाद गुदाद्वार से गैस निकलती रहती है लेकिन फिर भी रोगी को पेट दर्द में आराम नहीं मिलता, काफी पीने वाले लोगों को होने वाला पेट का दर्द, रोगी का पेट बहुत ज्यादा सख्त हो जाना जैसे कि पेट में कोई बहुत भारी पत्थर रखा हो, रोगी को पतला सा बिल्कुल पानी की तरह हरे रंग का बदबूदार दस्त आना जैसे लक्षणों में रोगी को कैमोमिला मैट्रिकेरिया औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण - रोगी जैसे ही कोई बहुत गर्म-गर्म चीज खाता है तो उसके दांतों में बहुत तेज दर्द होने लगता है, रोगी अगर गर्म कमरे में जाता है तो उसके दांतों में दर्द होने लगता है, रोगी को अपने दांतं मुंह से बाहर आते हुए महसूस होते हैं, बच्चों के दांतं लते समय बच्चों को दस्त हो जाना जो हरे रंग के और बहुत ज्यादा बदबू के साथ आते हैं। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को कैमोमिला मैट्रिकेरिया औषधि दी जाए तो रोगी के लिए ये औषधि बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
बेचैनी से सम्बंधित लक्षण - रोगी को रात के समय नींद न आना और पूरे शरीर में एक अजीब सी बेचैनी सी रहना, रोगी को वात का दर्द होने के कारण रात के समय बिस्तर पर लेटा नहीं जाता और इधर-उधर टहलना पड़ता है, रोगी के पेट में इस तरह का दर्द होना जैसे कि किसी ने छेद कर दिया हो जिसके कारण रोगी जमीन पर लोटने लगता है, बच्चे को जब बाहर घुमाने के लिए ले जाया जाता है तो वो हर चीज को देखकर मांगने लगता है चीज नहीं दिलाने से वह रोने लगता है लेकिन बच्चे को अगर वह चीज दिला भी दी जाए तो वह उसे थोड़ी देर में ही फेंक देता है आदि लक्षणों में रोगी को कैमोमिला मैट्रिकेरिया औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
मन से सम्बंधित लक्षण - रोगी का स्वभाव बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाना, छोटी-छोटी बातों पर रोगी गुस्सा करने लगता है, रोगी दूसरे लोगों से सही तरह से बात नहीं करता, रोगी से अगर कोई गलती हो जाती है तो वह अपनी गलती मान लेता है लेकिन फिर भी वो गलती करता ही रहता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को कैमोमिला मैट्रिकेरिया औषधि देना उपयोगी साबित होता है।
मात्रा -
रोगी के लक्षणों को अच्छी तरह से जानकर अगर उसे कैमोमिला मैट्रिकेरिया औषधि की 200 शक्ति दी जाए तो रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
कैम्फोरा मोनो-ब्रोमैटा Camphora mono
कैम्फोरा मोनो-ब्रोमैटा औषधि स्त्री के स्तनों में से दूध न आने की रुकावट को समाप्त करने में बहुत लाभकारी समझी जाती है। इसके अलावा रात को सोते समय स्वप्नदोष हो जाना, लिंग के उत्तेजित होने पर दर्द होने में, बच्चों के दस्तों में भी ये औषधि काफी अच्छा असर करती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कैम्फोरा मोनो-ब्रोमैटा औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - रोगी को दिशाओं के बारे में भ्रम हो जाना कि उसे लगता है कि उत्तर दिशा तो दक्षिण दिशा है और पूर्व दिशा तो पिश्चम दिशा है, स्त्री को हिस्टीरिया रोग हो जाना, अपने आप ही जोर से हंसने लगना और अपने आप ही रोने लगना, ऐसे बैठे रहना जैसे कि किसी ने सम्मोहित कर लिया हो आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को कैम्फोरा मोनो-ब्रोमैटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
मात्रा-
कैम्फोरा मोनो-ब्रोमैटा औषधि की दूसरी शक्ति का विचूर्ण रोगी को देने से लाभ होता है।
कैंचालागुआ CANCHALAGUA
कैंचालागुआ नाम की औषधि सेवन करने में बहुत ही कड़वी होती है। यह बुखार, मलेरिया, संक्रमण आदि रोगों में काफी लाभकारी साबित होता है। यह औषधि शरीर में ताकत को भी बढ़ाती है। गर्म प्रदेशों में इस औषधि का इस्तेमाल पुराने रुके हुए बुखार को दूर करने में किया जाता हैं।
कैंचालागुआ औषधि का विभिन्न प्रकार के लक्षणों में उपयोग -
सिर से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति को जब अपना सिर भारी-भारी सा लगता हो, सिर पर कोई भारी वजन सा रखा हुआ महसूस हो, रोगी की आंखों में जलन हो तो इस औषधि का इस्तेमाल लाभकारी होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण - बुखार आने पर रोगी के पूरे शरीर में बहुत जोर की ठण्ड लगने लगती है, उसका पूरा बदन टूटने लगता है, रोगी को कुछ भी खाने पर ऐसा लगता है कि जैसे उसे उल्टी आने वाली हो तो इन रोगों में इस औषधि का इस्तेमाल करने से रोगी को आराम आता है।
चर्मरोग से सम्बंधित लक्षण - चर्मरोग (चमड़ी के रोग) में रोगी की पूरे शरीर की त्वचा बिल्कुल सूख सी जाती है और रोगी का सिर बिल्कुल भारी सा लगता है जैसे कि किसी ने सिर पर कुछ बांध रखा हो तब इस औषधि का नियमित रूप से सेवन करने से लाभ होता है।
मात्रा-
कैंचालगुआ की जड़ का रस रोगी को बूंद-बूंद करके औषधि के रूप में देना चाहिए।
सावधानी-
कैंचालगुआ के ताजे पौधे से ही इसकी औषधि को तैयार करनी चाहिए, एक बात का ध्यान रखना जरूरी है कि इसका पौधा सूखने न पाए क्योंकि इसके पौधे के सूखने पर इस औषधि में पाये जाने वाले सभी औषधीय गुण समाप्त हो जाते हैं।
कैनाबिस इण्डिका Cannabis Indica
कैनाबिस इण्डिका औषधि किसी रोगी के ऐसे भावों को जिसमे उसे लगता है कि वह दुनिया का सबसे महान व्यक्ति है, वह कोई भी काम कर सकता है, उसकी कल्पनाएं आसमान को छूती हुई सी महसूस होती है आदि को काबू में करती हैं।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों में कैनाबिस इण्डिका औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - हर समय कुछ न कुछ बोलते रहना, हर समय किसी न किसी विचार में खोए रहना, कितना भी कुछ कर लो समय फिर भी बीतता हुआ महसूस नहीं होता, हर किसी बात को तुरन्त भूल जाना, स्वभाव को तुरन्त ही बदल लेना, हंसते समय हंसते ही चला जाना, उदासी में खोए रहना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कैनाबिस इण्डिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - रोगी को सिर के रोगों के लक्षणों में ऐसा महसूस होना जैसे कि कोई सिर पर बैठकर सिर के ऊपर के भाग को खोल रहा हो या बंद कर रहा हो, दिमाग में झटके से लगते हुए महसूस होना, सिर में भारी वजन रखा हुआ सा महसूस होना, आधे सिर का दर्द शुरू होने से पहले ही अस्वाभविक उत्तेजना होना आदि होता है तो रोगी को तुरन्त ही कैनाबिस इण्डिका औषधि देने से लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों के इस तरह के लक्षण जैसे आंखों के सामने भयानक चीजें नज़र आती हो, आंखें एक ही जगह जम जाती है, किसी भी चीज को पढ़ते समय शब्द साथ-साथ भागते हुए चले जाते है आदि महसूस होने पर रोगी को कैनाबिस इण्डिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - कानों के अन्दर जलन सी महसूस होना, जरा सा भी शोर होते ही कानों में दर्द चालू हो जाना, कानों के अन्दर अजीब-अजीब सी आवाजें सुनाई देना आदि कान के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को कैनाबिस इण्डिका औषधि देने से लाभ होता है।
चेहरा से सम्बंधित लक्षण - चेहरे को अजीब-अजीब तरह का बनाना, दोनों होंठों का आपस में चिपक जाना, सोते समय दांतों को पीसते रहना, मुंह और होंठों का सूखता हुआ सा लगना, लार का गाढ़ा, झाग के रूप में और चिपचिपा सा आना आदि लक्षणों में कैनाबिस इण्डिका औषधि का प्रयोग करना लाभप्रद रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- भूख का बहुत तेज लगना, हृदय में बहुत तेज दर्द होना, पेट का फूल जाना, पेट की नसों में तनाव बढ़ जाता हुआ महसूस होने लगता है कि सारी नसें कुछ ही देर में फट जाएंगी आदि लक्षणों के नज़र आने पर कैनाबिस इण्डिका औषधि का इस्तेमाल करने से लाभ मिलता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण - रोगी को ऐसा महसूस होना जैसे कि उसे किसी ने गेंद के ऊपर बैठा दिया है जैसे लक्षण प्रकट होने पर रोगी को कैनाबिस इण्डिका औषधि देने से लाभ होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब के साथ चिपचिपा सा स्राव का आना, पेशाब का बूंद-बूंद करके टपकते रहना, पेशाब करते समय कुछ देर के बाद आता है, पेशाब की नली में इस तरह की महसूस होना जैसे कि कोई कुछ चुभा रहा हो, दाईं तरफ के गुर्दे में हल्का-हल्का सा दर्द होना आदि लक्षणों के आधार पर कैनाबिस इण्डिका औषधि का सेवन लाभकारी रहता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - स्त्री के साथ संभोग क्रिया करने के बाद कमर में दर्द होना, लिंग में से सफेद रंग का चिपचिपा सा स्राव निकलते रहना, उत्तेजना का तेज होना, नाभि या गुदा के पास के भाग में सूजन सी महसूस होना आदि लक्षण के किसी पुरुष में नज़र आने पर उसे तुरन्त ही कैनाबिस इण्डिका औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिकधर्म के समय स्राव का बहुत ज्यादा मात्रा में, गहरे रंग का, दर्द के साथ आना, मासिकस्राव के दौरान कमर में दर्द होना, गर्भाशय में दर्द के साथ भारी स्नायविक संघर्ष और नींद न आना, बांझपन, मासिकस्राव के साथ ही संभोग करने की इच्छा का तेज होना आदि लक्षणों के आधार पर कैनाबिस इण्डिका औषधि का प्रयोग करना लाभप्रद रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - बलगम के साथ दमे का दौरा पड़ना, सांस लेने और छोड़ने के समय परेशानी होना, छाती में घुटन सी महसूस होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कैनाबिस इण्डिका औषधि देने से आराम मिलता है।
कैनाबिस सैटाइवा Cannabis sativa
कैनाबिस सैटाइवा औषधि सबसे ज्यादा असर मूत्र-संस्थान खासकर पेशाब करने की नली पर होता है। सूजाक रोग में ये औषधि बाकी सारी औषधियों से ज्यादा और जल्दी असर करने वाली साबित होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कैनाबिस सैटाइवा औषधि का उपयोग-
आंखों से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति को ज्यादा शराब या सिगरेट आदि पीने के कारण होने वाला मोतियाबिंद, आंखों की रोशनी कम होना, आंखों के अन्दर के गोलों में हल्का-हल्का सा दर्द होना, रोगी को हर समय ऐसा महसूस होना कि वह अंधा होता जा रहा है आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में रोगी को कैनाबिस सैटाइवा औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में दर्द होना, चक्कर आना, रोगी को ऐसा महसूस होना कि उसके सिर पर पानी की बूंदें टपक रही हो, नाक की जड़ पर दबाव सा महसूस होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को कैनाबिस सैटाइवा औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता हैं।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब का रुक जाना, पेशाब करने के साथ दर्द होना, पेशाब की धार का कट-फट कर आना, पेशाब करते समय जलन होना, चलते समय टांगों को चौड़ा करके चलना, अण्डकोषों में खिंचाव, यौन उत्तेजना का बढ़ना, श्लेष्मा और पीब के कारण पेशाब करने का रास्ता बन्द हो जाना आदि मूत्ररोगों में रोगी को कैनाबिस सैटाइवा औषधि देना बहुत उपयोगी होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - सांस का रुक-रुककर आना, छाती का बहुत भारी सा लगना जैसे कि किसी ने बहुत वजन रखा हो, छाती में से अजीब-अजीब सी आवाजें आना, बहुत तेज खांसी के साथ चिपचिपा सा खून वाला बलगम आना आदि सांस के रोगों के लक्षणों में कैनाबिस सैटाइवा औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण - दिल में बहुत तेज झटके लगना और तनाव सा महसूस होना, दिल में सूजन आना, रोगी को हर समय ऐसा महसूस होना जैसे कि दिल में से पानी की बून्दें टपक रही हो आदि दिल के रोगों के लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को कैनाबिस सैटाइवा औषधि नियमित रूप से सेवन कराई जाए तो ये उसके लिए बहुत लाभदायक सिद्ध होती है।
नींद से सम्बंधित लक्षण - रात को डरावने सपने आना, सुबह उठने का मन न करना, ऐसा महसूस होना जैसे कि पूरा शरीर टूटा हुआ सा हो, दिन में नींद आना आदि लक्षणों में रोगी को कैनाबिस सैटाइवा औषधि देने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - मोच आने के बाद हाथ की उंगलियों का सिकुड़ जाना, सीढ़ियों में ऊपर की ओर चढ़ते हुए पैरों का भारी हो जाना, पैर की उंगलियों के नीचे के हिस्से में पैदा होने वाले रोग आदि के लक्षणों में कैनाबिस सैटाइवा औषधि का सेवन करना लाभकारी रहता है।
कमजोरी से सम्बंधित लक्षण - शारीरिक मेहनत या व्यायाम करने के बाद शरीर में बहुत ज्यादा थकान महसूस होना, रात को भोजन करने के बाद शरीर में कमजोरी महसूस होना, पैदल चलते समय जल्दी थक जाना आदि लक्षणों में रोगी को कैनाबिस सैटाइवा औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - शरीर में बहुत ज्यादा उत्तेजना महसूस होना, खड़े होने पर अण्डकोषों में खिंचाव के साथ दर्द होना, ज्यादा संभोगक्रिया में लगे रहने के कारण नपुसंकता आ जाना आदि लक्षणों में रोगी को कैनाबिस सैटाइवा औषधि देने से लाभ होता है।
तुलना-
कैनाबिस सैटाइवा औषधि की तुलना एपिस, कैन-इण्ड, कैन्थ, कोपेवा, नक्स-वोम और टेरेब के साथ की जा सकती है।
प्रतिविष-
मात्रा-
मूलार्क या तीसरी शक्ति।
वृद्धि-
दोपहर से पहले, पेशाब करते समय बूंद-बूंद आते समय, चलने के बाद, लेटने से, खड़े रहने पर, सीढ़ियां चढ़ने पर, रात को भोजन करने के बाद रोग बढ़ जाता है।
शमन-
खड़े रहने पर, सांस में जलन कम होने पर, शांत रहने से तथा स्राव होने से रोग कम हो जाता है।
जानकारी-
रोगी को हकलाहट के लक्षण नज़र आने पर इसकी शक्ति बढ़ाकर 30वीं भी करके दे सकते हैं।
कैथरिस Cantharis
गुर्दे, मूत्राशय और त्वचा के ऊपर किसी तरह के रोग के लक्षण नज़र आने पर कैथरिस औषधि बहुत अच्छा असर करती है, शरीर में किसी स्थान का जल जाना, पेशाब में जलन होना, पेशाब के साथ खून आना, गले और पेट में जलन आदि जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को कैथरिस औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
विभिन्न लक्षणों में कैथरिस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - रोगी का बहुत जोर से चिल्लाना, अधीरता के साथ बैचेनी होना जो गुस्से पर आकर समाप्त हो जाती है, पागलपन के दौरे पड़ना, यौन उत्तेजना तेज होना, कुछ न कुछ करते रहना लेकिन फिर भी कुछ न कर पाना, याददाश्त कमजोर होने के साथ चेहरा लाल होना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को कैथरिस औषधि देने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में दर्द होना, दिमाग में जलन होना, चक्कर आना, खुली हवा में सिर का दर्द बढ़ जाना, आदि सिर के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को कैथरिस औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
आंखें से सम्बंधित लक्षण - आंखों के अन्दर पीलापन छा जाना, आंखों की रोशनी का कम होना, आंखों में जलन होना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में रोगी को कैथरिस औषधि देने से लाभ मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - रोगी को कानों में ऐसा महसूस होना जैसे कि उसके कानों में से गर्म सी हवा निकल रही हो, कान के आसपास की हडि्डयों में बहुत तेज दर्द होना आदि कान के रोगों के लक्षणों के आधार पर कैथरिस औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण - चेहरे का रंग पीला पड़ जाना, चेहरे पर छोटी-छोटी मवाद भरी फुंसियां निकल आना, चेहरे का विसर्प के साथ ही जलन, मूत्ररोगों के साथ ही बहुत ज्यादा गर्मी महसूस होना आदि लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को कैथरिस औषधि का सेवन कराया जाए तो यह उसके लिए लाभकारी रहता है।
कंठ (गले) से सम्बंधित लक्षण - पूरी जीभ पर पीब वाले छाले हो जाना, मुंह, आहार नली और गले में जलन होना, मुंह के अन्दर छाले होना, तरल पदार्थों को निगलने में परेशानी होना, मुंह से चिपचिपा बलगम निकलना, गले के अन्दर ऐसा महसूस होना जैसे गर्म खाना खाने के कारण गला जल गया हो आदि लक्षणों के आधार पर कैथरिस औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
वक्ष (छाती) से सम्बंधित लक्षण - फेफड़ों में सूजन आ जाना, सांस लेने में परेशानी होना, बार-बार उठने वाली सूखी खांसी उठना, बेहोशी सी छा जाना, बलगम के साथ खून आना, छाती में जलन होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कैथरिस औषधि का सेवन कराना लाभदायक होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - आहार नली और आमाशय में जलन होना, न तो कुछ खाने का मन करना, न तो पीने का मन करना, बार-बार प्यास लगना लेकिन पीने वाले पदार्थों से मन हट जाना, उल्टी आना और उबकाई आना, कॉफी पीने से परेशानी बढ़ जाना, थोड़ा सा कुछ भी पीते ही पेशाब की नली में दर्द उठ जाना आदि लक्षणों में रोगी को कैथरिस औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
मल से सम्बंधित लक्षण - मल के साथ खून आना और बाद में जलन महसूस होना, खूनी दस्त होना, मल के साथ बलगम आना, कंपकपी होने के साथ मलद्वार में जलन होना आदि लक्षणों में कैथरिस औषधि रोगी को देने से लाभ मिलता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - बार-बार पेशाब आना जैसा महसूस होना, अंडकोष में सूजन आना और पेशाब के साथ खून आना, पूरे अंडकोष में बहुत तेज जलन होना, पेशाब का बूंद-बूंद करके आना, पेशाब करते समय और पेशाब करने के बाद पेशाब की नली में बहुत तेज जलन होना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में कैथरिस औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - व्यक्ति में यौन उत्तेजना बढ़ना, लिंग में बहुत तेज दर्द होना, लिंग के आगे के भाग में दर्द होना, सूजाक रोग में लिंग में बहुत तेज दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को कैथरिस औषधि देने से लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - स्त्रियों में यौन उत्तेजना तेज होना, बच्चे को जन्म देने के बाद गर्भाशय की पेशियों में सूजन आना और पेशाब करने की नली में सूजन आना, मासिकस्राव समय से काफी पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में आना, योनिप्रदेश में काली सूजन आना, गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली से लगातार स्राव होना, डिम्बग्रन्थियों में जलन के साथ दर्द होना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में रोगी स्त्री को कैथरिस औषधि देने से आराम मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - छाती में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना, कमजोरी महसूस होना, धड़कन का धीरे-धीरे चलना आदि सांस के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को कैथरिस औषधि का सेवन कराना बहुत लाभदायक रहता है।
हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण - नाड़ी का कमजोर होना, बेहोशी छा जाना, दिल में सूजन आ जाना, धड़कन का सामान्य तौर पर न चलना आदि लक्षणों में रोगी को अगर कैथरिस औषधि का नियमित रूप से सेवन कराया जाए तो ये उसके लिए काफी लाभकारी रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - शरीर के अंगों में बहुत तेज दर्द होना, पैरों के तलवों में जख्म हो जाना, चलने-फिरने में परेशानी होना जैसे लक्षणों में कैथरिस औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
चर्म (चमड़ी) से सम्बंधित लक्षण - अंडकोष और जननांगों के आसपास के भाग में छाजन जिसके कारण बहुत ज्यादा पसीना निकलता है, गंदगी के कारण होने वाली त्वचा में सूजन जिसमे छाले पैदा हो जाते हैं, फफोलों की तरह दाने निकलना जिनमें हर समय खुजली और जलन होती रहती है, धूप में घूमने से बनने वाले जख्म, रात को सोते समय पैरों के तलुवों में जलन होना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में कैथरिस औषधि का प्रयोग बहुत अच्छा रहता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण - हाथ-पैरों का बिल्कुल ठण्डा पड़ जाना, पसीना भी ठण्डा आना, पैरों के तलुवों में जलन होना, शीतकंप जैसे किसी ने उसके ऊपर पानी डाल दिया हो आदि बुखार के आने के लक्षण पैदा होने पर रोगी को कैथरिस औषधि देने से आराम पड़ जाता है।
वृद्धि-
किसी के भी छूने से, पेशाब करने से, ठण्डा पानी या काफी पीने से रोग तेज हो जाता है।
शमन-
रगड़ने से रोग कम हो जाता है।
प्रतिविष-
पूरक-
कैम्फ।
तुलना-
कैथरिस औषधि की तुलना एपिस, आर्स, इक्किस और मर्क साथ की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को रोग के लक्षणों के अनुसार छठी से लेकर तीसवीं शक्ति तक देने से लाभ होता है।
जानकारी-
शरीर में जले हुए जख्मों और छाजन वाले हिस्सों पर 1x तथा 2x शक्ति का तनुकरण लगाने से लाभ होता है।
कैन्थरिस वेसिकेटोरिया Cantharis Vesicatoria
किसी व्यक्ति को बार-बार पेशाब आना, पेशाब करते समय जलन और दर्द होना, पेशाब का रुक-रुककर आना, पेशाब का रंग खून की तरह का आना आदि लक्षणों में कैन्थरिस वेसिकेटोरिया औषधि बहुत ज्यादा अच्छा असर करती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कैन्थरिस वेसिकेटोरिया औषधि का उपयोग-
आमाशय से सम्बंधित लक्षण-
किसी व्यक्ति को आमाशय के नीचे के भाग में बहुत तेज जलन के साथ दर्द होना, मल के साथ खून का आना, मलद्वार में जलन होना, पूरी आंत-प्रणाली में बहुत तेज जलन और दर्द होना, डिम्बाशय में जलन होना आदि लक्षणों में रोगी को कैन्थरिस वेसिकेटोरिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
कानवैलेरिया मैजेलिस
कानवैलेरिया मैजेलिस को `लिलि ऑफ दि वैली´ के नाम से भी जाना जाता है। ये एक बहुत ही लाभकारी और कीमती औषधि है। जब स्त्री की गर्भाशय की झिल्ली को छूने से ही बहुत तेज दर्द हो जाना और साथ में उसकी धड़कन तेज हो जाना आदि लक्षण होने पर स्त्री को कानवैलेरिया मैजेलिस औषधि का सेवन कराने से बहुत लाभ होता है। दिल के रोगों के कारण पैदा हुई सूजन को दूर करने में भी ये औषधि बहुत ही लाभकारी साबित होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों में कुछ खास तरह की औषधियों का इस्तेमाल-
बोविस्टा-
जिन स्त्रियों को मासिकधर्म के समय ज्यादा स्राव आने की शिकायत होती है उन स्त्रियों के लिए बोविस्टा औषधि का इस्तेमाल बहुत लाभकारी होता है। ऐसी स्त्रियों को स्राव रात के समय ज्यादा होता है और कई बार तो ये मासिकस्राव रात को सोते समय बिस्तर में ही हो जाता है।
एम्बाग्रीसिया रोग की ही तरह इसमे भी रोगी स्त्री को पहला मासिकधर्म समाप्त होने के बाद और दूसरे आने वाले मासिकधर्म के बीच के समय भी मासिकस्राव शुरू हो जाता है। लेकिन एक बात का ध्यान रखना जरूरी है एम्बाग्रीसिया रोग में अक्सर स्त्री को हिस्टीरिया रोग या स्नायविक रोग के लक्षण पहले सामने आते हैं।
अस्टिलेगो मेडिस-
स्त्री को अगर मासिक धर्म के समय बहुत ज्यादा रक्तस्राव होता है तब इस रोग में रोगी स्त्री को अस्टिलेगो मेडिस का सेवन कराना काफी लाभकारी होता है। लेकिन इस रोग की रोगी स्त्री को ये स्राव गर्भाशय की झिल्ली के कमजोर हो जाने के कारण या नसों में खून जमा हो जाने की वजह से होता है। इस रोग में रोगी स्त्री को स्राव के साथ डिम्बाशयों में थोड़ी बहुत उत्तेजना और दर्द भी होता है। अगर स्त्री को रक्तस्राव बंद होने के बाद भी ये लक्षण नज़र आए तो ये औषधि और भी ज्यादा असर करती है।
क्रैटगस-आक्जेन्था CRATAEGUS OXYACANTHA
क्रैटगस-आक्जेन्था औषधि को वैसे तो कई रोगों में लाभकारी माना जाता है लेकिन दिल के रोगों में ये औषधि बहुत जल्दी और अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर क्रैटगस-आक्जेन्था औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में खून का जमा हो जाना, सिर के पीछे के हिस्से और गर्दन में दर्द होना, सिर का घूमना, आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्रैटगस-आक्जेन्था औषधि देने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- हाथ-पैरों का ठण्डा हो जाना, पूरे शरीर में सूजन आना, शरीर में ऐसे महसूस होना जैसे कि शरीर बहुत ज्यादा कमजोर हो गया हो आदि लक्षणों में क्रैटगस-आक्जेन्था औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- थोड़ी सी भी शारीरिक मेहनत करते ही सांस का फूलने लगना, सांस लेने में परेशानी होना, दम सा घुटता हुआ महसूस होना, सांस लेने और सांस को छोड़ने में परेशानी आना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्रैटगस-आक्जेन्था औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण- दिल में बहुत तेजी से होने वाला दर्द, शरीर में खून की कमी हो जाने के कारण दिल को ढकने वाली झिल्ली में दर्द सा महसूस होना, नाड़ी का बहुत धीरे-धीरे से चलना आदि दिल के रोगों के लक्षणों मे रोगी को क्रैटगस-आक्जेन्था औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
वृद्धि-
गर्म कमरे के अंदर, थोड़ी सी मेहनत करते ही, रात के समय, वातरोग के होने के कारण रोग बढ़ जाता है।
शमन-
ताजी हवा में, चुपचाप रहने से तथा आराम करने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
क्रैटगस-आक्जेन्था औषधि की तुलना एपिस, आर्स, ब्राय, कन्वेलेरिया, डेजी, फेरम-फा, जल्स, इपी,, काली-का लैके, लायको, मर्क-सल्फ, नैट्र-सल्फ, फास, रस-टा, वेरेट्रम-वि से की जा सकती है।
क्राक्कस सैटाइवा Crocus Sativa
क्राक्कस सैटाइवा औषधि शरीर में इस तरह के खून को जिसमें खून का रंग काला हो जाता है और उसमे रेशे काफी मात्रा में रहते हैं, इन पदार्थों को बहने से रोकने में यह खास भूमिका निभाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में क्राक्कस सैटाइवा औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- किसी व्यक्ति का अपने आप में ही बातें करते रहना, बैठे-बैठे हंस पड़ना, अकेले में गाते रहना, हंसते-हंसते अचानक दुखी हो जाना, गुस्सा करने लगना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में क्राक्कस सैटाइवा औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों के सामने अजीब-अजीब सी चीजें नज़र आना, आंखों का ऐसा महसूस होना जैसे कि उनमें से पानी निकल रहा हो और उन्हें बार-बार साफ करना, पलकों का भारी होना, आंखों में ठण्डी हवा लगती हुई सी महसूस होना, पलकों के स्नायु मे दर्द होना जो आंखों से सिर तक पहुंच जाता है आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्राक्कस सैटाइवा औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- नकसीर फूटना (नाक से खून बहना), खून गाढ़े रंग का आना, नाक में से रस्सी जैसा लंबा, रेशेदार, गहरे रंग का खून निकलना आदि में क्राक्कस सैटाइवा औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण- पेट में सूजन आना, जिगर की खून पहुंचाने वाली नसों में खून रुक जाने की वजह से कब्ज का रोग हो जाना, मलद्वार में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना, पेट या आमाशय में कोई जीव सा महसूस होना आदि पेट के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को क्राक्कस सैटाइवा औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण- स्त्री के गर्भवती होने से तीसरे महीने तक ऐसा डर लगना कि गर्भपात न हो जाए, खास करके उस हालत में जब खून गहरा और रेशेदार हो, जनेन्द्रियों की तरफ खून का ज्यादा बहाव होना, मासिकधर्म में स्राव बदबूदार, गहरे रंग का और ज्यादा मात्रा में आना, गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली में खून थक्केदार, लंबा रेशेदार आना, दाईं तरफ के स्तन में किसी जीवित वस्तु की मौजूदगी महसूस होना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में क्राक्कस सैटाइवा औषधि का सेवन काफी लाभदायक रहता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- हाथ-पैरों का बर्फ के जैसे ठण्डा सा होना, कमर में बहुत ज्यादा ठण्डक महसूस होना जैसे वहां पर कोई ठण्डा पानी गिर रहा हो आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्राक्कस सैटाइवा औषधि देने से आराम मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- शरीर के ऊपर के अंगों का सुन्न हो जाना, नितंबों के जोड़ों और घुटनों में कड़कड़ाहट होना, टांगों और घुटनों में कमजोरी होना, पैरों के तलुवों और घुटनों में दर्द आदि लक्षणों में क्राक्कस सैटाइवा औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
वृद्धि-
लेटने से, गर्म मौसम में, गर्म कमरे में, सुबह के समय, उपवास करने से, जलपान करने से पहले, किसी चीज की ओर लगातार देखते रहने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
खुली हवा में रोग कम हो जाता है।
तुलना-
क्राक्कस सैटाइवा औषधि की तुलना इपिका, ट्रिल्लियम, प्लैटीनम, चाइना, सैबाइना, एको, बेल, कल्के-का, चायना, हैमा, इग्ने, काली-बा, मर्क, नैट्रम्यु, फास, सैबी, सीपि,से की जा सकती है।
मात्रा-
क्राक्कस सैटाइवा औषधि का मूलार्क या तीसवीं शक्ति तक रोगी को देने से लाभ मिलता है।
क्रियानाशक-
एको, बेल, ओपि।
क्रोटेलस होराइडस Crotalus Horridus
शरीर में किसी भी तरह के भयानक रोग के जैसे टाईफाइड बुखार, पीलिया रोग, डिफ्थीरिया (गले का रोग), सेप्टिक (जहर फैलना) आदि काफी पुराने हो जाने के कारण शरीर में किसी तरह का जख्म होने पर शरीर में से खून निकलने पर क्रोटेलस होराइडस औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणो के आधार पर क्रोटेलस होराइडस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- हर समय चेहरे को रोता हुआ सा बनाकर रखना, किसी भी बात को याद रखने की शक्ति कमजोर हो जाना, बोलना चालू करने पर बोलते ही रहना, अकेले में उदास बैठे रहना, ऐसा महसूस होना जैसे कि दिमाग खराब हो गया हो जैसे मानसिक रोगों के लक्षणों में क्रोटेलस होराइडस औषधि का प्रयोग काफी लाभप्रद रहता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में तेज दर्द होना, सिर का घूमता हुआ सा महसूस होना, शरीर का कमजोर हो जाने के कारण कांपते रहना, सिर के पीछे के हिस्से में भारीपन लगना और हल्का-हल्का दर्द होना खास करके सिर के दाएं भाग और दाईं आंख में दर्द आदि लक्षणों में रोगी को क्रोटेलस होराइडस औषधि का सेवन करना लाभकारी रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों में किसी भी तरह की रोशनी पड़ते ही आंखों का बंद हो जाना, आंखों के अंदर के भाग का पीला पड़ जाना, पलकों के अंदर स्नायु का दर्द होना, हर चीज का दो रूपों में नज़र आना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्रोटेलस होराइडस औषधि देने से लाभ मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- कान में किसी तरह के रोग के हो जाने सिर में चक्कर आना, कानों के अंदर से खून का आना, दाएं कान का बंद सा महसूस होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्रोटेलस होराइडस औषधि का प्रयोग कराने से आराम पड़ जाता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- नाक से अचानक खून का आ जाना (नकसीर आना) जो काले रंग का और रेशेदार रूप में आता है, पुराना जुकाम, आदि नाक के रोगों के लक्षणों में क्रोटेलस होराइडस का सेवन करना लाभप्रद रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- चेहरे पर मुहांसे निकलना, होठों में सूजन आना, चेहरे का रंग नीला पड़ना, जबड़े का अटक जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्रोटेलस होराइडस औषधि खिलाने से आराम होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- जीभ का रंग बिल्कुल लाल सा होना और सूजन आना, सांस से बदबू का आना, मुंह में लार का बहुत ज्यादा बनना, जीभ को बाहर निकलते ही दाईं तरफ मुड़ जाना, रात को सोते समय दांतों का पीसना, जीभ में कैंसर ओर खून का आना आदि लक्षण किसी भी रोगी में नज़र आने पर उसे क्रोटेलस होराइडस औषधि दी जाए तो उसके लिए लाभकारी होता है।
कण्ठ (गला) से सम्बंधित लक्षण- गले का सूखना, गले में सूजन आना, आहारनली में रुकावट होना, किसी भी ठोस पदार्थ को खाते समय निगलते समय परेशानी होना आदि गले के रोगों के लक्षणो में क्रोटेलस होराइडस औषधि का सेवन करना लाभदायक रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- किसी भी खाने वाली चीज को खाते ही उल्टी हो जाना, गर्मी के कारण उल्टी होना, खून की उल्टी होना, आमाशय में किसी भी पदार्थ का न टिक पाना, मासिकस्राव आने के बाद हर बार जी मिचलाना और उल्टी होना, दाईं तरफ की करवट लेटते ही हरे रंग के स्राव के साथ उल्टी शुरू हो जाना, आमाशय में कैंसर होना और उसी के साथ खून का या चिकने बलगम की उल्टी होना, तेज पदार्थ और मीठा खाने का मन करना, मांस को देखते ही जी खराब हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को क्रोटेलस होराइडस औषधि देने से लाभ होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- पेट का फूल जाना, जिगर में दर्द होना, पेट का गर्म सा महसूस होना और पेट को छूते ही दर्द सा होना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्रोटेलस होराइडस औषधि नियमित रूप से सेवन कराने से आराम आता है।
मल से सम्बंधित लक्षण- मल का काले रंग का बिल्कुल पतला और बदबूदार आना, आंतों में से काला, पतला और न जमने वाला खून आना, चलते समय या खड़े-खड़े ही मलान्त्र से खून आना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्रोटेलस होराइडस औषधि देने से लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण- मासिकधर्म के दौरान स्राव का बहुत दिनों तक दर्द के साथ आते रहना, ऐसा दर्द जो जांघों तक फैल जाता है और इसके साथ ही दिल में लगातार दर्द होता रहता है, गर्भाशय से खून आने के साथ आमाशय में भारीपन महसूस होना, गर्भवती स्त्री को बुखार आना, बच्चे को जन्म देने के बाद जांघों की नसों में खिंचाव आना, टांगों का जमीन पर टिक न पाना आदि लक्षण नज़र आने पर स्त्री को तुरन्त ही क्रोटेलस होराइडस औषधि का सेवन कराने से आराम पड़ जाता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- पेशाब के साथ खून का आना, गुर्दे में सूजन आ जाना, पेशाब के साथ गहरे रंग का अन्नसार का जाना, पेशाब का कम मात्रा में आना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्रोटेलस होराइडस औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण- दिल की धड़कन का कमजोर हो जाना, नाड़ी का कांपता हुआ सा महसूस होना, दिल कांपता हुआ सा लगना, मासिकस्राव के दौरान दिल की धड़कन का तेज होना आदि लक्षणों के आधार पर क्रोटेलस होराइडस औषधि का सेवन करना लाभदायक रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- खांसी होने के साथ-साथ बलगम में खून का आना, आवाज की नली में से अजीब-अजीब सी आवाज का आना आदि लक्षणों में क्रोटेलस होराइडस का सेवन अच्छा रहता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- पूरे शरीर में ठण्डा सा पसीना आना, गर्दन को तोड़ देने वाला बुखार होना, रुक-रुककर आने वाला बुखार, खून के रंग का पसीना निकलना आदि बुखार के लक्षणों में क्रोटेलस होराइडस औषधि का प्रयोग नियमित रूप से करने से रोगी को आराम मिलता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रात को सोते समय सपने में भयानक-भयानक चीजें नज़र आना, सोते हुए से अचानक चौंक कर उठ जाना, हर समय नींद सी आते रहना, सुबह उठने पर घुटन सी महसूस होना, इस तरह महसूस होना जैसे कि सांस के साथ हवा अंदर नहीं जा रही है आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्रोटेलस होराइडस औषधि खिलाने से आराम पड़ता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- त्वचा का रंग पीला पड़ जाना, छाले निकलना, सूजन आना, शरीर के दाएं तरफ के हिस्से का बहुत ज्यादा नाजुक हो जाना जिसे छूते ही रोगी को परेशानी हो जाती है, शरीर के हर भाग से खून का आना, खून के रंग का पसीना निकलना, हाथों की उंगलियों के नाखूनों की जड़ में फोड़ा निकलने के कारण दर्द होना, त्वचा पर पीब के साथ निकलने वाली फुंसिया, चेचक का टीका लगाने पर उल्टा असर करना, लसीका ग्रंथियों में जलन होना आदि लक्षण किसी भी व्यक्ति में नज़र आने पर उस व्यक्ति को तुरन्त ही क्रोटेलस होराइडस औषधि देने से लाभ मिलता है।
तुलना-
क्रोटेलस होराइडस औषधि की तुलना बोथरोप्स, इलैप्स, लैक, नैजा, लैकेसिस और पाइरो के साथ की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी के अंदर किसी भी तरह के रोग के लक्षण नज़र आने पर उसे क्रोटेलस होराइडस औषधि की तीसरी से छठी शक्ति तक देने से आराम पड़ जाता है।
वृद्धि-
दाईं करवट लेटने से, नींद आते ही, गर्म मौसम में, बसंत के मौसम में, शराब का सेवन करने से, जागने पर, किसी तरह का धक्का या झटका लगने से रोग तेज हो जाता है।
शमन-
किसी तरह की हरकत करने से रोग में कमी आ जाती है।
प्रतिविष-
लैकेसिस, सुरासर।
क्रोटन टिगलियम Croton Tiglium
क्रोटन टिगलियम औषधि दस्तों, गर्मी में होने वाले रोगों और त्वचा के रोगों में इस्तेमाल करने से लाभ होता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में क्रोटन टिगलियम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में बहुत तेज दर्द होना, खासकर के आंखों के अंदर के गोलों में दबाव के साथ दर्द होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में क्रोटन टिगलियम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों का बिल्कुल लाल होना, आंखों में ऐसा महसूस होना जैसे आंखें पीछे की ओर खींची जा रही हो, आंखों के आसपास के भाग में फुंसियां होना, दाईं आंख के घेरे के ऊपर तनाव के साथ दर्द होना आदि आंख के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्रोटन टिगलियम औषधि देने से लाभ मिलता है।
मल से सम्बंधित लक्षण - मल का पानी के जैसा बिल्कुल पतला और बार-बार आना, मलक्रिया के दौरान ज्यादा जोर लगाना, आंतों में गड़गड़ाहट होना, थोड़ा सा पानी पीते ही या भोजन करते समय परेशानी बढ़ जाती है आदि मलरोगों के लक्षणों में क्रोटन टिगलियम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
गुप्त रोग से सम्बंधित लक्षण- स्त्री और पुरुष दोनों की ही जनेन्द्रियों पर बहुत तेज खुजली होना, अंडकोषों के ऊपर के भाग में बहुत ही नाजुक फफोले उठना, जो खुजलाने की इच्छा होते हुए भी खुजलाए नहीं जा सकते आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्रोटन टिगलियम औषधि देने से लाभ होता है।
पेशाब से सम्बंधित लक्षण- रात को सोते समय पेशाब का आना, पेशाब के साथ झाग आना, पेशाब का रंग गहरा होना, पेशाब के ऊपर चिकनाई सी नज़र आना, दिन में पेशाब का रंग पीला होना आदि रोगों में रोगी को क्रोटन टिगलियम औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
छाती से सम्बंधित लक्षण- छाती के बाएं हिस्से से कमर तक खिंचाव के साथ दर्द होना, छाती का फुला नहीं पाना, बच्चों को दूध पिलाने वाली स्त्रियों को बच्चे को दूध पिलाते समय स्तन के पीछे पीठ तक दर्द होना, स्तनों में जलन होना, लेटते ही खांसी शुरू हो जाना, गहरी सांस लेने में परेशानी होना आदि लक्षणों में रोगी को क्रोटन टिगलियम औषधि देने से लाभ मिलता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- त्वचा में बहुत तेज खुजली होना, मवाद भरी फुंसिया खासकर चेहरे और जनेन्द्रियों पर और उसके बाद दर्द के साथ जलन होना, छालेदार फुंसियां जिसमें बहुत ज्यादा खुजली होती है, छालों में अचानक बहुत तेज दर्द होना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को क्रोटन टिगलियम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
वृद्धि-
भोजन या पानी के कम मात्रा में लेने से, गर्मी के मौसम में, छूने से, रात को और सुबह उठने पर, हाथ-पैरों को धोने से रोग बढ़ जाता है।
प्रतिविष-
तुलना-
क्रोटन टिगलियम औषधि की तुलना एलो, अर्ज-ना, चायना, फेरम, काली-ब्रा, रस-टा, एनागैलिस, एनाकार्डियम, सीपिया, मोमोडिका , फास और सल्फ के साथ की जाती है।
मात्रा-
इस औषधि की छठी से तीसवीं शक्ति तक रोगी को उसके रोग के लक्षण देखकर देने से लाभ होता है।
साइप्रिपेडियम Cypripedium
साइप्रिपेडियम औषधि त्वचा में फैले हुए किसी भी तरह के जहरीले प्रभाव को दूर करने में काफी लाभकारी मानी जाती है। इसके अलावा बच्चों की स्नायविकता जो दांतों के निकलने के कारण या आंतों के रोग के कारण पैदा होती है, गठिया के रोग के कारण आने वाली कमजोरी, नींद न आना आदि में भी ये औषधि अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर साइप्रिपेडियम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- बच्चे का रात को चीखें मारकर उठ जाना, काफी समय तक जगे रहना, अचानक हंसने लगना, बड़ी उम्र के लोगों को होने वाला सिर का दर्द, मासिकधर्म बंद होने के बाद होने वाला सिर का दर्द आदि लक्षणों में साइप्रिपेडियम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
तुलना-
साइप्रिपेडियम औषधि की तुलना अम्बरा, काली-ब्रोमै, स्कुटिलेरिया, वैलेरियाना, इग्नेशिया से की जा सकती है।
मात्रा-
मूलार्क से छठी शक्ति तक।
क्यूबेबा Cubeba
पेशाब की नली की श्लैष्मिका झिल्लियों पर क्यूबेबा औषधि का बहुत अच्छा असर पड़ता है। इसके साथ ही पेशाब की नली में जलन होना, अंडकोष में सूजन आना, सूजाक, पेशाब में खून आना, मसाने में जलन, छोटी बच्चियों को होने वाला प्रदर रोग आदि रोगों के लक्षणों में ये औषधि अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में क्यूबेबा औषधि का इस्तेमाल-
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- पेशाब करने के रास्ते में बहुत जलन होने के साथ ज्यादा मात्रा में श्लेष्मा आना, खास करके स्त्रियों में पेशाब करने के बाद बहुत तेज दर्द होना और पेशाब करने के रास्ते में सिकुड़न आना, पेशाब के साथ खून आना, पेशाब की नली में जलन होना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को क्यूबेबा औषधि देने से आराम मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- नाक और गले में जलन होना, इसके साथ ही बलगम का बदबू के साथ आना, नाक के अंदर से हर समय स्राव होते रहना, आवाज साफ न निकलना आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्यूबेबा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
तुलना-
कुकुरबिटा, कोपेवा, पाइपर-मेथिस्टिकम, सण्दल से क्यूबेबा की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
क्यूबेबा औषधि की दूसरी और तीसरी ,शक्ति रोगी को देने से लाभ होता है।
कूकरबिटा साइट्रूल्लस Cucurbita Citrullus
किसी व्यक्ति को पेशाब करते समय पेशाब की नली में दर्द होने पर, कमर के दर्द में, दम सा घुटता हुआ महसूस होने में कूकरबिटा साइट्रूल्लस औषधि देने से लाभ होता है।
कूकरबिटा पेपो Cucurbita Pepo
जिन व्यक्तियों को भोजन करने के तुरंत बाद ही जी मिचलाने का रोग होता है उनके लिए कूकरबिटा पेपो औषधि बहुत लाभदायक साबित होती है। इसके अलावा गर्भवती स्त्री को गर्भकाल के दौरान होने वाली उल्टी में, समुद्र की यात्रा करने के समय होने वाले रोगो मे भी ये औषधि लाभकारी असर करती है।
तुलना-
कूकरबिटा पेपो औषधि की तुलना फिलिक्स, क्यूप्रम से की जा सकती है।
मात्रा-
मूलार्क।
जानकारी-
कूकरबिटा पेपो के बीज पेट के अंदर के लंबे-लंबे कीड़ों को समाप्त करने में बहुत लाभदायक सिद्ध होती है। इन बीजों को पानी में डालकर उबाल लेना चाहिए और फिर इनका छिलका उतार लेना चाहिए, इसके अंदर से हरे रंग का गूदा सा निकलता है, इस गूदे को क्रीम में मिलाकर खीर की तरह खा सकते है। इस खीर को लगभग 12 घंटे के उपवास के बाद सुबह के समय खाली पेट खाना चाहिए और इसके 2 घंटों के बाद रोगी को एरण्ड का तेल पिलाना चाहिए।
साइक्लामेन Cyclamen
जिन स्त्रियों को मासिकधर्म आने के समय खून ज्यादा जाने के कारण शरीर में खून की कमी हो जाती है और उनको चक्कर आना, आंखों से धुंधला दिखाई देना, चिड़चिड़ापन आ जाना, हमेशा अकेले बैठे रहना आदि लक्षण प्रकट होते हैं तो उनके लिए ये साइक्लामेन औषधि बहुत लाभदायक रहती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में साइक्लामेल औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में बहुत तेज दर्द होना, अकेले में बैठकर रोते रहना, सुबह उठने पर सिर में हल्का-हल्का सा दर्द होना, आंखों के सामने अजीब-अजीब सी चीजें उड़ती हुई दिखाई देना, चक्कर आना, खुली हवा में सिर के दर्द का बढ़ जाना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को साइक्लामेल औषधि देने से लाभ मिलता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों से कम दिखाई देना, आंखों के सामने अलग-अलग रंगों की अजीब-अजीब चीजें उड़ती हुई नज़र आना, भेंगापन, देखने पर एक ही चीज का दो-दो दिखाई देना जिसका सम्बंध पेट की खराबियों से जुड़ा होता है आदि आंख के रोगों के लक्षणों में साइक्लामेल औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- मुंह का स्वाद नमकीन होना, लगातार डकार का आना, कॉफी पीते ही दस्त लग जाना, मांस को देखकर ही भूख मर जाना, पूरे दिन प्यास न लगना आदि आमाशय रोगों के लक्षणों में रोगी को साइक्लामेल औषधि देने से लाभ मिलता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण- चलते समय या बैठते समय मलद्वार और मूलाधार (नाभि का भाग) के आसपास दर्द होना, ऐसा महसूस होना जैसे वहां पर पीब भर गई हो आदि लक्षणों में साइक्लामेल औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण- मासिकधर्म समय से बहुत पहले आना जिसमें बहुत ज्यादा मात्रा में मासिकस्राव काले रंग का, झिल्लीदार, थक्केदार आता है, इसके साथ ही कमर से जांघों तक बच्चे को जन्म देने के जैसा दर्द होता है, घूमते हुए मासिकस्राव कम हो जाता है, गर्भकाल के दौरान हिचकियां आना, मासिकस्राव के बाद स्तनों में सूजन आने के साथ दूध का बहते रहना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में साइक्लामेल औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - शरीर के उन अंगों में दर्द होना जहां हड्डी के ऊपर मांस कम रहता है, एड़ियों में दर्द और जलन होना, दाएं हाथ के अंगूठे और उसके साथ वाली उंगली में खिंचाव के साथ दर्द होना, हडि्डयों के आवरणों में दर्द, शीतदंश आदि लक्षणों में रोगी को साइक्लामेल औषधि देने से आराम मिलता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - जवान होती लड़कियों के चेहरे पर मुहांसे होना, त्वचा पर खुजली होना जो खुजली करने से और बढ़ती है और मासिकस्राव आने पर कम हो जाती है आदि चर्मरोगों के लक्षणों में साइक्लामेल औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
वृद्धि-
खुली हवा में, शाम के समय, बैठने पर, खड़ा होने पर, ठण्डे पानी से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
मासिकधर्म से पहले, इधर-उधर घूमने से, दर्द वाले अंग को खुजलाने से, गर्म कमरे में, शिकंजी पीने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
साइक्लामेल औषधि की तुलना पल्सा, चाइना, फेरम साइटरस एट चाइना आदि से की जा सकती है।
मात्रा-
साइक्लामेल औषधि तीसरी शक्ति रोगी को देने से लाभ होता है।
साइक्लेमेन-येरोपियम Cyclamen Europaeum
साइक्लेमेन-येरोपियम औषधि को वैसे तो बहुत से रोगों के लक्षणों में लाभकारी होती है लेकिन फिर भी जुकाम से सम्बंधित लक्षणों में ये औषधि असरकारक साबित होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर साइक्लेमेन-येरोपियम औषधि से होने वाले लाभ-
नाक से सम्बंधित लक्षण - रोगी को नाक से गाढ़ा सा स्राव आना, रोगी की नाक जुकाम के कारण बंद होने से रोगी को किसी भी तरह की खुशबू या बदबू का सूंघकर पता नहीं लगता, रोगी को बार-बार छींके आना, रोगी के सिर में रोजाना एक ही समय पर सिर में दर्द होने के साथ चक्कर आना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को साइक्लेमेन-येरोपियम औषधि देना काफी लाभकारी साबित होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - रोगी को आंखों से कम दिखाई देना, आंखों से हर चीज धुंधली सी दिखाई पड़ना, रोगी को अपनी आंखों के सामने कभी तारे से टिमटिमाते हुए नज़र आना और कभी चिंगारियां सी उड़ती हुई नज़र आना जैसे लक्षणों में रोगी को साइक्लेमेन-येरोपियम औषधि देना काफी लाभकारी रहता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण - स्त्री का मासिकस्राव समय से काफी पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में आना, मासिकस्राव में खून का काले रंग का आना, बच्चे को जन्म देने के बाद होने वाले रक्तस्राव होने के साथ बहुत तेज दर्द जो नीचे की ओर उतरता है और एक बार बहुत तेज रक्तस्राव होने के बाद शांत हो जाता है, लड़कियों के कुंवारेपन में ही स्तनों में दूध आना, स्त्री को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसके पेट में कोई ज़िंदा जीव घूम रहा हो आदि लक्षणों में रोगी को साइक्लेमेन-येरोपियम औषधि देने से लाभ होता है।
मन से सम्बंधित लक्षण - रोगी का बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाना, किसी से ढंग से बात न करना, हर समय दुखी सा रहना, रोगी का छोटी-छोटी बातों पर ही रोने लगना, रोगी को हर समय लगना कि उसने कोई गलत काम कर दिया है, रोगी हर समय अकेले ही बैठा रहता है जैसे लक्षणों में रोगी को साइक्लेमेन-येरोपियम औषधि का प्रयोग कराना उचित रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- आमाशय रोग से सम्बंधित लक्षणों में रोगी जो कुछ भी खाता है उसको उसका स्वाद नमकीन सा ही लगता है, रोगी को बिल्कुल प्यास नहीं लगती, रोगी जैसे ही भोजन करने बैठता है उसकी भूख समाप्त हो जाती है और जैसे ही रोगी भोजन कर लेता है उसके तुरंत बाद ही रोगी को उल्टी आने आती है और जी मिचलाने लगता है, स्त्री को गर्भाकाल के दौरान हिचकी आती रहती है, रोगी का मन करता है जैसे कि उसे नींबू का रस पिलाया जाए। इस तरह के लक्षणों में रोगी को साइक्लेमेन-येरोपियम औषधि देने से आराम मिलता है।
वृद्धि-
शाम को, खुली हवा में, आराम करने से, ठण्डे पानी से, ठण्डे पानी से, नहाने पर, महावारी से, बैठे रहने से, खड़े होने पर रोग कम हो जाता है।
शमन-
चलते रहने से, मासिकस्राव होने से, गर्म कमरे में, टहलने से रोग कम हो जाता है।
कैप्सिकम Capsicum
कैप्सिकम औषधि उन कमजोर व्यक्तियों के लिए उपयोगी है जिनकी मांसपेशियां ढीली होती हैं और उनमें जैवी ताप की कमी रहती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कैप्सिकम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा होना, हर समय अकेले और अपने आप में खोए रहना, किसी से ढंग से बात न करना, मन में हमेशा सुसाइड (आत्महत्या) करने जैसे ख्याल आना जैसे मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को कैप्सिकम औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।
अजीर्ण से सम्बंधित लक्षण - अजीर्ण (पाचन शक्ति का कमजोर हो जाना) रोग के लक्षण जैसे- कुछ भी खाकर हजम न होना, भोजन करने के बाद सीने में जलन होना, खट्टी डकारें आना, जी मिचलाना, सिर में दर्द आना में कैप्सिकम औषधि का सेवन करने से बहुत लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में बहुत तेज दर्द होना, खांसी होने से सिर का दर्द तेज होना, चेहरा बिल्कुल लाल सा लगना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में कैप्सिकम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - कानों में बहुत तेज जलन होना, कानों के पीछे सूजन और दर्द होना, कान की जड़ की ग्रंथि की जलन होना, कान में से स्राव होना आदि कान के रोगों के लक्षणों में कैप्सिकम औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
मल से सम्बंधित लक्षण - मलक्रिया के दौरान खूनी श्लेष्मा आना और जलन होना, मलत्याग के बाद कमर में खिंचाव के साथ दर्द होना और साथ ही प्यास और कंपकंपी महसूस होना, खूनी बवासीर, मलद्वार में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को कैप्सिकम औषधि देने से रोगी को आराम पड़ जाता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब में जलन होना, बार-बार पेशाब का आना, पेशाब करने के छिद्र में जलन, पेशाब का बूंद-बूंद करके आना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में कैप्सिकम औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - अंडकोषों का सिकुड़ जाना, अंडकोषों में ठण्डक के साथ नपुंसकता आना, सूजाक रोग होना, पुर:स्ग्रन्थियों में जलन होना आदि पुरुष रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को कैप्सिकम औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिकधर्म बंद होने के बाद होने वाले रोग, जीभ की नोक में जलन होना, गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली से खून आने के साथ ही जी का मिचलाना, बाईं तरफ के डिम्ब के भाग में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को कैप्सिकम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - छाती का सिकुड़ जाना, सांस का रुक जाना, सूखी, परेशान करने वाली खांसी, जिसमें फेफड़ों से भारी बदबूदार सांस निकलती है, सांस लेने में परेशानी होना, खांसते समय मूत्राशय, टांगों, कान आदि में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को कैप्सिकम औषधि का नियमित रूप से सेवन कराने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - कूल्हे से पैरों तक दर्द। यह दर्द पीछे की ओर मुड़ने से और खांसने से बढ़ जाता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण - ठण्ड लगना, चिड़चिड़ा होना, पानी पीने के बाद शीतकम्प, ठण्ड पीठ से शुरू होती है, गर्माई से आराम मिलता है, शीत प्रकोप से पहले प्यास आदि बुखार के लक्षणों में रोगी को कैप्सिकम औषधि का सेवन कराने से आराम मिलता है।
वृद्धि-
खुली हवा में, कपड़े न पहनने से, हवा के झोंके से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
भोजन करते समय, गर्मी से रोग कम हो जाता है।
प्रतिविष-
सीना, कैलेडियम औषधियां का उपयोग कैप्सिकम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
तुलना-
कैप्सिकम औषधि की तुलना आर्ज-नाइट्र, आर्स, बेल, कैलेड, कैन्थ, चायना, क्रोट, इग्ने, लाइको, मर्क-कार, पलूस, रस-टाक्स पल्साटि, सेंटौरिय से की जा सकती है।
मात्रा-
कैप्सिकम औषधि की तीसरी से छठी शक्ति तक रोगी को देने से लाभ मिलता है।
कार्बो ऐनिमैलिस Carbo Animalis
कार्बोऐनिमैलिस औषधि गले की गांठों, धातु की कमी वाले व्यक्तियों, बू़ढ़े व्यक्ति तथा किसी खतरनाक बीमारी के बाद शरीर में आई हुई कमजोरी को दूर करने के लिए बहुत लाभकारी होती है। इसके अलावा शरीर में खून की गति का कम हो जाने के कारण जीवनी-शक्ति का कमजोर हो जाना, ग्रंथियों का सख्त हो जाना, नसों का फूल जाना, त्वचा का नीला पड़ना, फेफड़ों की झिल्ली में जलन होना, जरा सा वजन उठाते ही सांस फूल जाना आदि रोगों में भी ये औषधि लाभकारी होती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कार्बोऐनिमैलिस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- किसी व्यक्ति का हमेशा अकेले बैठे रहना, हर समय किसी चिंता में डूबे रहना, किसी से बात करने से कतराना, बात-बात पर गुस्सा आना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्बोऐनिमैलिस औषधि देने से लाभ होता है।
आंख से सम्बंधित लक्षण- आंखों के रोग के लक्षणों में जैसे- बाहर घूमते समय पास की चीज भी काफी दूर नज़र आना, पढ़ाई करते समय आंखों के आगे धुंधलापन सा लगना, आंखों को मलने से आराम सा महसूस होना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्बोऐनिमैलिस औषधि का नियमित रूप से सेवन कराने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में दर्द होना, सिर के अंदर खून का ज्यादा बहाव होने के साथ भ्रम में पड़ना, आंखों का भारी होना जिससे ऊपर की ओर देखने में परेशानी होती है, होंठ और गालों का रंग नीला पड़ना, चक्कर आने के बाद नाक से खून आना, नाक में सूजन आना, कानों से आवाज साफ तरह से न सुनाई देना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में कार्बोऐनिमैलिस औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- आमाशय के रोगों के लक्षणों जैसे- रोगी खाते-खाते थक जाता है लेकिन उसे फिर भी भूख लगती रहती है, आमाशय में जलन और ऐंठन होना, पाचनशक्ति का कमजोर होना, पेट का अफारा जाना, मुंह से खट्टा पानी जैसा पदार्थ आना आदि में रोगी को नियमित रूप से कार्बोऐनिमैलिस औषधि का सेवन कराने से वह कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण- गर्भवती स्त्री को उल्टी आने का जी करना जो रात को ज्यादा बढ़ जाता है, मासिकधर्म समय से काफी पहले आ जाना, स्राव बदबू के साथ आना और ज्यादा मात्रा में आना, योनि में जलन होना, स्तनों में किसी नुकीली चीज के चुभने जैसा दर्द होना, दाएं स्तन का सख्त हो जाना, जांघों के नीचे जलन के साथ दर्द होना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी स्त्री को कार्बोऐनिमैलिस औषधि का सेवन कराने से आराम पड़ जाता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- फेफड़ों में सूजन आना, टाइफाइड बुखार आया हुआ हो ऐसा महसूस होना, फेफड़ों में जख्म होना, खांसी के साथ बलगम के रूप में हरी-हरी पीब आना आदि लक्षणों में रोगी को कार्बोऐनिमैलिस औषधि देने से लाभ मिलता है।
दांत से सम्बंधित लक्षण- दांतों में दर्द होना, दांतों में नमकीन चीजें खाने से जलन होना, जरा सी भी ठण्डी हवा दांतों में लगते ही दांतों में दर्द शुरू हो जाना आदि दांत के रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्बोऐनिमैलिस औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- त्वचा पर तांबे के रंग के छोटे-छोटे दाने निकलना, पैरों की एड़ियों का फट जाना, शरीर के बाहर के अंगों का नीला पड़ जाना, ग्रंथियों का कठोर और सूजन आ जाना, बगल में, ऊरु संधि में, स्तनों में बहुत तेज दर्द होना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को कार्बोऐनिमैलिस औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- घुटनों का अपने आप ही मुड़ जाना, किसी भारी चीज को उठाने से शरीर में कमजोरी महसूस होना, रात को सोते समय बहुत ज्यादा बदबू के साथ पसीना आना, कलाई में दर्द होना आदि लक्षणों में कार्बोऐनिमैलिस औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
तुलना-
कैल्के-फास, बैड, ब्रोम, कार्बो-वेज, फास, सिपि और सल्फ के साथ कार्बोऐनिमैलिस औषधि की तुलना की जा सकती है।
वृद्धि-
दाढ़ी बनवाने के बाद, थोड़ा सा छू जाने से, आधी रात के बाद रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्मी से, खाने से रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
कार्बोऐनिमैलिस औषधि की 3 से 30 शक्ति तक।
कार्बो वेजिटैबिलस Carbo Vegetabilis
कार्बो वेजिटैबिलस औषधि को हैजे के रोग को दूर करने के लिए बहुत ही लाभकारी औषधि माना जाता है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कार्बो वेजिटैबिलस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- अंधेरे में आते ही डर सा लगना, अचानक सब कुछ भूल जाना, आंखें बंद करते ही आंखों के आगे भूत से नाचते रहना आदि लक्षणों में रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में तेज दर्द होना, बालों का अपने आप ही झड़ने लगना, सिर पर ऐसा महसूस होना जैसे कि किसी ने सिर पर बहुत सारा वजन रखा हो, सिर के चकराने के साथ-साथ सिकुड़न जैसा महसूस होना, सिर में चक्कर आने के साथ ही जी मिचलाना और कानों में आवाज सी गूंजना, चेहरे और माथे पर छोटी-छोटी सी फुंसियां निकलना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
चेहरे सम्बंधित लक्षण- चेहरे पर सूजन आना, चेहरे का रंग नीला पड़ जाना, पसीने से चेहरे का भीग जाना, गाल अंदर की ओर धंसे हुए और नाक बिल्कुल लाल जैसे लक्षण अगर किसी व्यक्ति के अंदर नज़र आते हैं तो उसे तुरन्त ही कार्बो वेजिटैबिलस औषधि का सेवन करने से आराम मिलता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों के सामने हर समय अजीब-अजीब सी चीजें उड़ती हुई सी नज़र आना, आंखों की रोशनी का कम होना, आंखों में जलन होना, आंखों की पेशियों में दर्द होना आदि लक्षणों में अगर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि का सेवन कराया जाए तो काफी लाभदायक होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- कान के अंदर मैल का जमा होना, कान के छेद में किसी तरह का जख्म होना, कान में खुश्की पैदा होना, त्वचा पर चेचक के दाने निकलने के बाद कान का बहना आदि लक्षणों में अगर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि का सेवन कराया जाए तो काफी लाभ होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- किसी भी समय नाक से खून आने लगना, चेहरे का पीला पड़ जाना, नाक की नोक का लाल होना और उस पर पपड़ी सी जमना, नाक के नथुनों के आसपास खुजली सी होना, नाक की नाड़ियों का उभरकर आना, छींक आती हुई सी महसूस होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि का सेवन करने से आराम आता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- जीभ पर सफेद या पीले रंग की परत का जमना, जीभ पर छाले होना, किसी भी चीज को चबाते समय दांतों में दर्द सा होना, मसूढ़ों से खून और पीब का आना जैसे लक्षणों में रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि का सेवन करने से आराम आता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- आमाशय का बहुत ज्यादा भारी होना, भोजन करने के बाद या पानी पीने के बाद डकारें आना, मुंह के अंदर पानी भरा हुआ सा महसूस होना, पेट में अफारा होने के कारण सांस का फूलना, सांस लेने में परेशानी होना, आमाशय में जलन जो पीठ तक फैल जाता है, आमाशय में कमजोरी आना और बेहोशी सी छाना, मरोड़ के साथ दर्द का उठना, भोजन करने के कुछ देर बाद परेशानी महसूस होना, जो स्त्रियां बच्चों को अपना दूध पिलाती है उन्हें पेट में दर्द होने के साथ अफारा होना, दूध, मांस और चिकनाई वाले पदार्थों को देखते ही जी का खराब हो जाना, पेट के ऊपर का भाग बहुत ही नाजुक हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को अगर कार्बो वेजिटैबिलस औषधि का सेवन नियमित रूप से कराया जाए तो ये उसके लिए काफी लाभकारी साबित होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण - पेट में भारी वजन उठाने जैसा दर्द होना, किसी चीज की सवारी करते समय पेट में दर्द होना, बदबूदार हवा का बाहर निकलना, टाईट कपड़ों को पहनने पर परेशानी महसूस होना, आंतों में भयानक जख्म होने के साथ-साथ भगंदर होना, पेट का फूल जाना, जिगर में दर्द होना आदि लक्षणों के नज़र आने पर अगर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि खिलाई जाए तो लाभकारी होती है।
मलांत्र और मल से सम्बंधित लक्षण - मलांत्र में खुजली, मलद्वार से गर्म, बदबूदार हवा का बाहर निकलना, मलांत्र से तीखा सा स्राव आना, रात को सोते समय मूलाधार (नाभि) पर खुजली के साथ स्राव होना, मलान्त्र से खून का आना, मलद्वार में जलन, बूढ़ों को परेशान करने वाले दस्त, मल का अपने आप ही बार-बार निकल जाना, बवासीर के नीले रंग के जलन के साथ मस्से होना आदि लक्षणों के नज़र आने पर अगर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि दी जाए तो रोगी को काफी लाभ होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - मलक्रिया के दौरान पु:रस्थ ग्रंथि में से द्रव सा टपकते रहना, अंडकोष में पास के हिस्से जांघ में खुजली और नमी आदि लक्षण नज़र आने पर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि देने से लाभ होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिकस्राव समय से पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में आना, खून का रंग पीला होना, योनि पर सूजन सी आ जाना और छाले पड़ना, योनि के बाहर के हिस्से पर दाने से निकलना, मासिकस्राव आने से पहले प्रदर स्राव, गाढ़ा, हरा, दूधिया और तीखा सा आना, मासिकधर्म के दौरान हाथों और पैरों के तलुवों में जलन होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि सेवन कराने से फायदा होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण -सांस लेने की नली में खुजली होने के साथ खांसी सी होना, दम सा घोट देने वाली खांसी होना, आवाज का बहुत ज्यादा खराब होना जो थोड़ा सा ऊंचा बोलते ही और खराब हो जाती है, शाम के समय दम सा घुटता हुआ महसूस होना, खांसी का काफी देर तक होते रहना, खांसी के साथ छाती में जलन सी महसूस होना, शाम के समय, भोजन करने के बाद और बोलने से खांसी बढ़ जाती है, बदबूदार बलगम का आना, फेफड़ों से खून का आना आदि लक्षणों में अगर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि खिलाई जाए तो ये उसके लिए काफी असरदार साबित होती है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - हाथ-पैरों का सुन्न हो जाना, पेशियों का कमजोर हो जाना, शरीर के सारे जोड़ ढीले पड़ जाना, जांघों के आगे के हिस्से की हडि्डयों में दर्द होना, पैरों के तलुओं में ऐंठन आना, पैरों के अंगूठों का सूजकर लाल हो जाना, हाथ-पैरों और हडि्डयों में जलन के साथ दर्द होना आदि लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि दी जाए तो रोगी को काफी लाभ पहुंचता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण - बाजुओं से शुरू होकर ठण्ड का पूरे शरीर में पहुंच जाना, शरीर के अलग-अलग हिस्सों में जलन सी महसूस होना, भोजन करते समय पसीने का बहुत ज्यादा आना, कमजोरी लाने वाला पसीना आना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि का प्रयोग कराना काफी लाभप्रद रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा का नीला पड़ जाना, नसों का फूल जाना, शाम के समय और रात को सोते समय खुजली का होना, त्वचा पर बहुत ज्यादा पसीना आना, बिस्तर पर पड़े-पड़े होने वाले जख्म, त्वचा में से बदबूदार स्राव सा आना, शरीर के ऊपर नीले या बैंगनी रंग के दाने निकलना आदि लक्षणों के नज़र आने पर अगर रोगी को कार्बो वेजिटैबिलस औषधि का सेवन नियमित रूप से कराया जाए तो रोगी को फायदा मिलता है।
वृद्धि -
शाम के समय, रात को और खुली हवा में, सर्दी से, पकवान खाने से, मक्खन से, कॉफी पीने से, दूध पीने से, गर्म नमीदार मौसम में, शराब पीने से रोग बढ़ जाता है।
शमन -
डकार आने से, पंखा करने से और ठण्डक से रोग कम हो जाता है।
पूरक-
तुलना-
कार्बो वेजिटैबिलस औषधि की तुलना कार्बोनियम, लाइकोपोडियम, आर्सेनिक और चायना से की जा सकती है।
मात्रा-
कार्बो वेजिटैबिलस औषधि की 1 से 3 शक्ति का विचूर्ण रोगी को देने से लाभ होता है।
कार्बोनियम हाइड्रोजेनिसेटम Carboneum Hydrogenisatum
कार्बोनियम हाइड्रोजेनिसेटम औषधि शरीर में आई हुई किसी प्रकार की ऐंठन को दूर करने के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है। इसके अलावा मेरुदण्ड का टेढ़ा होना, टट्टी-पेशाब का कहीं पर भी अपने आप ही निकल जाना जैसे लक्षणों में भी ये औषधि लाभ करती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कार्बोनियम हाइड्रोजेनिसेटम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - मन को कहीं भी चैन न मिलना, मन में अजीब-अजीब से विचार आना, बेहोशी सी छाए हुए रहना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कार्बोनियम हाइड्रोजेनिसेटम औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों का ऐसा महसूस होना जैसे कि वो आधी खुली है और आधी बंद है, आंखों के गोलों में कमजोरी आना, आंखों पर किसी तरह की रोशनी पड़ते ही आंखें बंद हो जाना आदि लक्षणों में कार्बोनियम हाइड्रोजेनिसेटम औषधि का प्रयोग करना बहुत लाभकारी होता है।
कार्सिनोसिन Carcunosin
शरीर में कैंसर के किसी भी तरह के लक्षण नज़र आने पर रोगी को अगर कार्सिनोसिन औषधि का सेवन कराया जाए तो ये उसके लिए काफी लाभकारी सिद्ध होती है। स्त्रियों में स्तनों में कैंसर हो जाना जिसमें ये ग्रंथियां बहुत सख्त हो जाती है और उनमे बहुत दर्द होता है कार्सिनोसिन औषधि का सेवन करने से लाभ होता है। गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली के कैंसर में बदबू के साथ स्राव आना, खून आना और दर्द होना आदि के लक्षणों में भी इस औषधि के प्रयोग से लाभ मिलता है। इसके अलावा भोजन का न पचना, आमाशय और आंतों में अफारा, गठिया, कैंसर के कारण आने वाली कमजोरी को भी ये औषधि दूर करती है।
तुलना-
कार्सिनोसिन औषधि की तुलना ब्यूफो, कोनियम, फाइटो, आस्टेरियम से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को कार्सिनोसिन औषधि की 30 शक्ति से 200 शक्ति तक देने से लाभ होता है।
जानकारी-
रोजाना रात को इस औषधि की एक मात्रा रोगी को दे सकते है।
कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम Corboneum Sulphuratum
कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि आंखों के रोगों के लिए बहुत ही असरकारक मानी जाती है। इसके अलावा कमजोर व्यक्ति को बार-बार दस्त हो जाना, नपुसंकता आदि रोग भी इस औषधि के असर से दूर हो जाते हैं।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों में कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि का उपयोग-
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों की रोशनी कम हो जाना, दूर की वस्तु का साफ दिखाई न पड़ना, आंखों के सामने जाला सा आ जाना, रंगों को सही तरीके से पहचान न कर पाना, आंखों के आगे अजीब-अजीब सी चीजें नाचती हुई नज़र आना आदि आंख के रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - हर समय सिर में दर्द होना, चक्कर आना, अजीब-अजीब सी आवाजें सुनाई देना, सिर पर ऐसा महसूस होना जैसे कि सिर पर किसी ने भारी वजन रखा हो, मुंह और जीभ का सुन्न पड़ जाना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि देने से आराम आता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - कानों में हर समय अजीब-अजीब सी आवाजें सुनाई देना, कम सुनाई देना, कानों की खराबी होने के कारण सिर में चक्कर आना आदि लक्षणों में कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - रोगी का चिड़चिड़ा होना, पेट में दर्द के साथ सारे में घूमती हुई सूजन, पुरुषों के अंदर सैक्स की इच्छा न होना, लिंग का सिकुड़ जाना, बार-बार अपने आप वीर्य निकल जाना आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि खिलाने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - हाथ और पैरों में बहुत दर्द होना, शरीर के अंगों का ऐंठना, बाजू सुन्न होना, चलते समय लड़खड़ाना, हाथों की उंगलियां सूजी हुई महसूस होना, शरीर में छोटे-छोटे जख्म होना जो कुछ दिनो बाद फैल जाते हैं, खुजली और फोड़े-फुंसी औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
तुलना-
कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि की तुलना पोटास एक्सेन्टट, दुबर कुलीनय, रेडियम, कार्बो, सल्फर, कास्टिकम, सैलोसिलिक, सिनकोना आदि से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि 1 शक्ति देने से लाभ होता है।
जानकारी-
कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि कैंसर रोग को रोकने के लिए भी बहुत उपयोगी मानी जाती है।
कार्बोनियम औसीजेनिसेटम Carboneum Oxygenisatum
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कार्बोनियम औसीजेनिसेटम का उपयोग-
आंखों से सम्बंधित लक्षण : आंख के अंदर लकवा सा मार जाना, कोई वस्तु देखने पर आधी ही दिखाई देती है, आंखों की तंत्रिका में सूजन आना, आंखों के सफेद भाग में खून उतर आना आदि आंख के रोगों के लक्षणों में कार्बोनियम औसीजेनिसेटम का प्रयोग लाभकारी होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में खून के जमने के कारण होने वाला दर्द, जबड़े मजबूती के साथ बंद हो जाना, सिर में भारीपन महसूस होना, कानों में बहुत तेज आवाजें आना, कनपटियों में बहुत तेज दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को कार्बोनियम औसीजेनिसेटम का प्रयोग करना लाभदायक रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण : त्वचा का बिल्कुल सुन्न हो जाना, त्वचा पर छाले पड़ जाना, त्वचा में छोटे-छोटे दानों के साथ-साथ खुजली सी होना हाथों का बर्फ जैसा ठण्डा हो जाना आदि चर्म रोगों के लक्षणों में कार्बोनियम औसीजेनिसेटम औषधि का सेवन लाभकारी रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- बहुत ज्यादा नींद आना, हर समय नींद आते रहना, सुबह उठने का मन न करना आदि लक्षणों में कार्बोनियम औसीजेनिसेटम औषधि का सेवन करना अच्छा रहता है।
मात्रा-
रोगी को कार्बोनियम औसीजेनिसेटम औषधि की पहली शक्ति देने से लाभ होता है।
सावधानी-
कार्बोनियम औसीजेनिसेटम औषधि शरीर में परिसर्पी छाजन, छाले और हनुस्तम्भ, नींद, याददाश्त का कमजोर होना पैदा करती है, इसलिए इसको सेवन करते समय सावधानी बरतना भी जरूरी है।
कस्करा सैगराडा Cascara Sagrada
कस्करा सैगराडा-रैमनस पर्शियाना औषधि को कब्ज के रोग की एक बहुत ही असरकारक औषधि माना जाता है। किसी व्यक्ति को पेट में कब्ज होने पर अगर इस औषधि की 15 बूंदों को एक मात्रा के रूप में दिया जाए तो ये मलान्त्र को अपनी सही अवस्था में पहुंचा देती है। इसके अलावा पुराना भोजन न पचने का रोग, पीलिया होना, खूनी बवासीर, पाचनशक्ति खराब होने पर होने वाला सिरदर्द, जीभ का चौड़ी और थुलथुली होना, सांस में से बदबू आना आदि लक्षणों के आधार पर भी अगर ये औषधि सावधानी से रोगी को सेवन कराई जाए तो काफी अच्छा असर होता है।
विभिन्न लक्षणों में कस्करा सैगराडा-रैमनस पर्शियाना औषधि का उपयोग-
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- मूत्र रोग के ऐसे लक्षण जैसे कि रोगी को महसूस होता है कि उसे पेशाब आ रहा है लेकिन जब वह पेशाब करने के लिए जाता है तो उसे काफी देर होने के बाद भी पेशाब नहीं आता और जब आता भी है तो बूंद-बूंद करके, ऐसे में अगर रोगी को कस्करा सैगराडा-रैमनस पर्शियाना औषधि दी जाए तो ये काफी लाभकारी होती है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- पेशियों और जोड़ों में गठिया का रोग होना, इसके साथ ही रोगी को कब्ज भी हो जाना आदि लक्षणों में कस्करा सैगराडा-रैमनस पर्शियाना औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
तुलना-
कस्करा सैगराडा-रैमनस पर्शियाना औषधि की तुलना हाइड्रैस्टिस, नक्स, रैमनस कैलीफोर्निका से की जा सकती है।
मात्रा-
कस्करा सैगराडा-रैमनस पर्शियाना औषधि की मात्रा रोगी को मूलार्क से छठी शक्ति तक देनी चाहिए।
कार्ल्सबाड CARLSBAD
कार्ल्सबाड औषधि शरीर में जिगर के ऊपर बहुत अच्छा असर डालती है। इसके अलावा मोटापा बढ़ना, डायबिटीज (मधुमेह), गठिया, शरीर के अंगों का कमजोर हो जाना, कब्ज आदि रोगों के लक्षणों के आधार पर इस औषधि का सेवन रोगी को कराने से लाभ होता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कार्ल्सबाड औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - हर समय किसी चिंता में डूबे रहना, किसी की बात न मानना, चिड़चिड़ा होना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्ल्सबाड औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक रहता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में दर्द होना और उसी के साथ ही कनपटियों की नसे सूजी हुई सी महसूस होना, हिलने-डुलने तथा खुली हवा में सिर का दर्द कम हो जाता है आदि सिर के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को नियमित रूप से कार्ल्सबाड औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण - चेहरे का रंग पीला सा लगना, मुरझाया सा लगना, गाल की हड्डी में दर्द होना, चेहरे का लाल और गर्म होना आदि लक्षणों में कार्ल्सबाड औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - मुंह में जीभ के ऊपर सफेद सी परत जम जाना, मुंह से बदबू आना, मुंह का स्वाद खट्टा या नमकीन होना, हिचकी और जम्हाई का बहुत ज्यादा आना, सीने में जलन होना आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों में कार्ल्सबाड औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब का रुक-रुककर आना, पेट की पेशियों पर दबाव दिये बिना पेशाब नहीं उतरना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को कार्ल्सबाड औषधि देने से लाभ मिलता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण - मल का अन्दर ही जमा हो जाना, मलक्रिया के समय पेट की पेशियों पर दबाव के साथ मल नीचे उतरता है, मलान्त्र और मलद्वार में जलन होना, खूनी बवासीर आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कार्ल्सबाड औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
तुलना-
कार्ल्सबाड औषधि की तुलना नेट्र-सल्फ्यू, नक्स से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को उसके लक्षणों के आधार पर कार्ल्सबाड औषधि की निम्न शक्तियां देने से आराम आ जाता है।
जानकारी-
सर्दी-जुकाम के रोगों में भी अगर कार्ल्सबाड औषधि का प्रयोग नियमित रूप से किया जाए तो ये रोगी के लिए बहुत लाभकारी रहती है।
सावधानी-
कार्ल्सबाड औषधि का प्रयोग करने से समाप्त हुए रोगों के लक्षण 2 से 4 सप्ताह बाद फिर से प्रकट हो जाते हैं लेकिन रोगी को इससे डरना नहीं चाहिए।
केरिका पपाया Carica Papaya
स्त्री का गर्भपात होना, भूख न लगना, आंखों की पलकों में जलन होना, जिगर में खराबी, तिल्ली का रोग, गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली में किसी तरह का रोग होना आदि में केरिका पपाया औषधि बहुत लाभकारी असर करती है।
विभिन्न लक्षणों में केरिका पपाया औषधि का उपयोग-
आंखों से सम्बंधित लक्षण : आंखों के अंदर के भाग का पीला हो जाने के रोग में रोगी को केरिका पपाया औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
पाचनशक्ति से सम्बंधित लक्षण: जिगर और प्लीहा में खराबी होने के साथ बुखार का आना, पाचनशक्ति का कमजोर होना, बार-बार मलक्रिया के लिए जाना, जीभ पर सफेद सी परत का जमना, दूध का न पचना, आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को केरिका पपाया औषधि देने से लाभ होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण : जिन स्त्रियों का मासिकधर्म सही समय पर नहीं आता जैसे किसी का समय से काफी पहले आ जाता है और किसी का समय बीत जाने पर भी नहीं आता आदि लक्षणों में केरिका पपाया औषधि स्त्री को नियमित रूप से सेवन कराने से उसकी मासिकधर्म की परेशानिया दूर हो जाती है, इसके अलावा ये गर्भाशय को सिकोड़ने में भी मदद करती है।
सावधानी :
केरिका पपाया औषधि का लेप बच्चेदानी के मुंह पर नहीं करना चाहिए क्योंकि इससे स्त्री का गर्भपात हो जाता है।
मात्रा :
मूलार्क , 1x, 3x शक्तियों के विचूर्ण।
जानकारी :
केरिका पपाया औषधि उन व्यक्तियों की पाचन शक्ति को तेज करती है जिनको मांस और दूध का सेवन करने से परेशानी हो जाती है क्योंकि उनको ये चीजें पचती नहीं है।
कैस्टोरियम Castoreum
किसी व्यक्ति को अगर रात में नहीं दिखाई देता, रोशनी में आते ही उसकी आंखें बंद हो जाती हैं, स्त्रियों में किसी रोग के कारण चिड़चिड़ापन आ जाना, बहुत ज्यादा पसीना आना, हर समय जम्हाइयां आना, नींद में भयानक सपने आना, रोगी का रात को उठकर बार-बार चौंकना आदि लक्षणों में कैस्टोरियम औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में कैस्टोरियम औषधि का उपयोग-
जीभ से सम्बंधित लक्षण - जीभ में सूजन आना, जीभ के बीच में गोल से दाने निकलना आदि जीभ के रोगों के लक्षणों में रोगी को कैस्टोरियम औषधि देने से आराम आता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिकधर्म में किसी तरह की परेशानी होने के कारण योनि में से खून का आना, मासिकधर्म के दौरान पेशाब बार-बार आना, जांघों के बीच के हिस्सें में दर्द शुरू होना, पेट में गैस बनना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में कैस्टोरियम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
दस्त से सम्बंधित लक्षण - गर्मी के मौसम में दस्त होना, हरे रंग के दस्त आना, कमजोरी महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को कैस्टोरियम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण - पेट में बहुत तेज दर्द होना जो दबाने से कुछ कम हो जाता है, पेट गैस के कारण फूल जाना, नाभि के आसपास के हिस्से में बहुत तेज दर्द होना जैसे लक्षण उत्पन्न होने पर कैस्टोरियम औषधि लेने से बहुत लाभ होता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण - ठण्ड के साथ कंपकंपी होना, ठण्डी हवाओं के साथ पीठ बर्फ जैसी ठण्डी होना आदि बुखार के लक्षणों में रोगी को कैस्टोरियम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
प्रतिक्रिया -
हीनता।
तुलना -
कैस्टोरियम औषधि की तुलना अम्बरा, मास्कस, म्यूरि-एसिड, बैलेरियाना से की जा सकती है।
प्रतिविष -
काल्चिकम औषधि का प्रयोग कैस्टोरियम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
वृद्धि-
मासिकधर्म के दौरान, पीठ के बल और दाईं करवट लेटने से, गर्मी के मौसम में रोग बढ़ जाता है।
शमन -
बाईं करवट लेटने से, दबाने से, दोहरा होने से, घुटने मोड़कर पेट में लगाने से रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
मूलार्क या निम्न शक्तियां।
कैस्टर एक्वी Castor Equi
कैस्टर एक्वी औषधि मोटी त्वचा और उपकला पर बहुत अच्छा असर डालती है। ये औषधि स्तनों के कटे-फटे निप्पल और उनके जख्मों के लिए भी ये औषधि काफी लाभकारी है। ये औषधि स्त्री की जनेन्द्रियों को मुख्य रूप से प्रभावित करती है। नाखूनों और हडि्डयों पर किसी तरह के रोग के लक्षण नज़र आने पर भी काफी प्रभावशाली होती है।
तुलना-
कैस्टर एक्वी औषधि की तुलना ग्रैफाइटिस, हिप्पोमैन्स से की जा सकती है।
कैस्टेनिया वेस्का Castanea Vesca
कैस्टेनिया वेस्का औषधि काली खांसी को दूर करने के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है। इसके अलावा, रोगी को गर्म पीने वाले पदार्थों को पीने की इच्छा होना, बार-बार प्यास लगना, भूख न लगना, पतले दस्त आना, कमर में दर्द होना, सीधे खड़े होने में परेशानी होना आदि लक्षणों में भी ये औषधि बहुत लाभकारी होती है।
तुलना-
कैस्टेनिया वेस्का औषधि की तुलना पर्टूसिन, ड्रासेरा, मेफाइटिस, नैफ्थालिन, अमोनि-ब्रोमे से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को कैस्टेनिया वेस्का औषधि का मूलार्क देने से लाभ होता है।
कार्डूअस मेरियेनस Carduus Marianus
जिगर के किसी भी रोग जैसे जिगर में जलन होना, दर्द होना, खून की उल्टी होना, पेट में जलन होना, कब्ज आदि में कार्डूअस मेरियेनस औषधि बहुत जल्दी असर करती है। इसके साथ ही ये औषधि पीलिया के रोग को भी कुछ ही समय में बिल्कुल खत्म कर देती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर कार्डूअस मेरियेनस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - हर समय उदास सा बैठे रहना, याददाश्त का कमजोर हो जाना, जरा-जरा सी बात पर गुस्सा हो जाना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्डूअस मेरियेनस औषधि देने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - आंखों की भौंहों के ऊपर खिंचाव सा महसूस होना, सिर का कभी हल्का महसूस होना या कभी भारी महसूस होना, जीभ का मैला सा लगना, सिर में चक्कर आना, आंखों में जलन होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्डूअस मेरियेनस औषधि का सेवन करने से आराम मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- मुंह का स्वाद हमेशा कड़वा सा लगना, भूख का कम लगना, जीभ का मैला सा लगना, जी मिचलाना, उबकाई आना, उल्टी होना, प्लीहा के पास के हिस्से में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना, पित्त की थैली में पथरी के साथ जिगर का बढ़ना आदि आमाशय के रोगों के लक्षणो में रोगी को कार्डूअस मेरियेनस औषधि देने से लाभ होता है।
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण - जिगर में दर्द होना, कब्ज, मलक्रिया के दौरान परेशानी होना, गांठदार मल आना, मल का रंग चमकीला, पीला सा होना, पित्ताशय में सूजन और दर्द होना, पीलिया रोग आदि के लक्षणों में रोगी को कार्डूअस मेरियेनस औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण - खूनी बवासीर, मलद्वार और मलान्त्र में जलन होना, मल मटियाले रंग का गांठ के रूप में आना, मलान्त्र के कैंसर होने के कारण पतले दस्त होना आदि लक्षणों में रोगी को कार्डूअस मेरियेनस औषधि देने से लाभ मिलता है।
वक्ष (छाती) से सम्बंधित लक्षण - स्तनों की दायीं पसलियों में नीचे की ओर किसी चीज के चुभने के जैसा दर्द होना, जो ज्यादा चलने-फिरने से बढ़ जाता है, सांस का तेज-तेज चलना, छाती में दर्द होना जो कंधों, पीठ, जांघों और पेट तक पहुंच जाता है, बार-बार पेशाब आना आदि लक्षणों में रोगी को कार्डूअस मेरियेनस औषधि खिलाने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - रात को सोते समय त्वचा पर बहुत ज्यादा खुजली होना, त्वचा पर सफेद-सफेद से दाने निकलना, उरोस्थि के नीचे के भाग पर फुंसियां होना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को कार्डूअस मेरियेनस औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब का रंग सुनहरा सा, गंदा सा लगना, पेशाब का बार-बार आना, पेशाब में जलन होना, पेशाब का बार-बार आना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को कार्डूअस मेरियेनस औषधि का नियमित रूप से सेवन कराने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - नितंब के जोड़ में दर्द होना, जो नितंब से होकर नीचे जांघों तक फैल जाता है, झुकने से दर्द तेज हो जाता है, खड़े होने में परेशानी होना, पैरों में कमजोरी आना, किसी स्थान पर बैठने के बाद उठने में परेशानी होना आदि लक्षणों में कार्डूअस मेरियेनस औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
तुलना -
चेल, चायना, आयोड, मर्क और पाडों के साथ कार्डूअस मेरियेनस की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को कार्डूअस मेरियेनस औषधि की मूलार्क और निम्न शक्तियां देने से लाभ होता है
सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया Cedron-Simaruba Ferroginea
सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया औषधि मलेरिया के कारण उत्पन्न होने वाले तंत्रिकाशूल के लिए बहुत ज्यादा लाभकारी है। इसके अलावा जिन लोगों के मन में हमेशा उत्तेजना सी छायी रहती है और जो हर समय जोश में ही रहते हैं उनके लिए भी ये औषधि काफी लाभकारी सिद्ध होती है। सांप के डंक और कीड़ो-मकोड़ों के द्वारा काटे जाने पर फैल जाने वाले जहर को भी ये औषधि दूर करती है।
विभिन्न लक्षणों में सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - रोजाना सुबह के 9 बजते ही चेहरे के दायें भाग में दर्द होना, सिर के आर-पार बेहोशी लाने वाला सिर का दर्द, सिर में दर्द होने के साथ पूरा शरीर सुन्न सा हो जाना, कुनीन का बहुत ज्यादा सेवन करने से कानों में अजीब-अजीब सी आवाजे आना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया औषधि का प्रयोग कराने से आराम आता है।
आंख से सम्बंधित लक्षण - बाईं आंख में बहुत ज्यादा दर्द होना, आंखों के गोलों में तेज दर्द होना, आंखों से गर्म-गर्म आंसुओं का निकलना, आंख के ऊपर के पपोटे में रोजाना एक ही समय पर होने वाला स्नायु का दर्द, परितारिकाशोथ (इरिटीसद्धए) रंजितपटलशोथ (कोरोइडीटीसद्ध) आदि लक्षणों के किसी भी रोगी में नज़र आने पर रोगी को तुरन्त सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - स्त्री के पुरुष के साथ संभोग क्रिया करने के बाद स्नायवीय कमजोरी आ जाना, हर महीने मासिकधर्म आने के कुछ दिन पहले ही योनि में से पानी का आना, मासिकधर्म के समय हाथ-पैरों का ऐंठ जाना आदि लक्षणों में रोगी को सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - हाथ और पैरों के जोड़ों में तेज दर्द होना, दायें हाथ के अंगूठे के आधे हिस्से में अचानक दर्द उठकर बाजू से होकर ऊपर कंधे तक फैल जाता है, दाएं पैर में दर्द जो घुटने और जांघ तक फैल जाता है, घुटने के जोड़ में पानी भरना आदि लक्षणों के आधार पर सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया औषधि का सेवन करना काफी लाभकारी रहता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण - रोगी को शाम के समय अचानक ठण्ड लगने लगती है तथा इसके साथ ही माथे में दर्द शुरू हो जाता है जो पूरे सिर में फैल जाता है, आंखें लाल हो जाती है, आंखों में खुजली होती है, शरीर के अंग सुन्न हो जाते हैं, हाथ-पैरों में बहुत तेज दर्द होता है आदि लक्षणों में रोगी को सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया औषधि का प्रयोग कराने से आराम आता है।
जानकारी-
सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया औषधि की शुद्ध फलियों का मूलार्क को जख्मों पर लगाया जाता है।
प्रतिविष-
लैकेसिस औषधि का उपयोग सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
वृद्धि-
आंधी आने से पहले, हरकत करने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्म पानी से तथा गर्म कमरे के अंदर रोग कम हो जाता है।
तुलना -
सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया औषधि की तुलना आर्नि, आर्स, चायना, जेल्स और लैक के साथ कर सकते हैं।
मात्रा -
किसी भी रोग के लक्षणों के आधार पर रोगी को सेड्रान-सिमारुबा फेरोजीनिया औषधि की मूलार्क से 3 शक्तियां तक देने से लाभ होता है।
सियानोथस Ceanothus
सियोनोथस औषधि को प्लीहा (तिल्ली) के रोगों में सबसे लाभकारी औषधि माना जाता है। किसी व्यक्ति को मलेरिया रोग होने के कारण प्लीहा (तिल्ली) का रोग होने की वजह से जिगर खराब होने में, पुरानी सांस की नली में सूजन जिसमें बलगम ज्यादा आता हो में अदभुत असर दिखाती है। इसके अलावा ये औषधि खून को रोकने, जमने और थक्के बनने से भी रोकती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सियानोथस औषधि का उपयोग-
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति का प्लीहा (तिल्ली) का बढ़ जाना, प्लीहा में सूजन आना, बाईं तरफ के अवजठर में बहुत ज्यादा दर्द होना, सांस लेने में परेशानी होना, मासिकस्राव बहुत ज्यादा और पीले रंग का आना, स्त्रियों में कमजोरी लाने वाला प्रदर (योनि में पानी आना), जिगर और पीठ में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सियोनोथस औषधि का नियमित रूप से सेवन कराने से लाभ होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - रोगी को ऐसा लगना कि जैसे उसे बार-बार पेशाब आ रहा है, पेशाब का रंग हरा होना, पेशाब में चीनी और पित्त आना आदि पेशाब के रोगों के लक्षणों में रोगी को सियोनोथस औषधि देने से आराम आता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण - बहुत पतले पानी जैसे दस्त आना, मलान्त्र (मलत्याग का स्थान) में नीचे की ओर दर्द होना आदि लक्षणों में सियोनोथस औषधि का सेवन करने से आराम आता है।
वृद्धि-
हिलने-डुलने से और बाईं करवट लेटने से रोग बढ़ जाता है।
तुलना-
सियोनोथस की तुलना बर्बेरिस माइरिका, सेड्रान, एगारिकस से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को उसके रोग के लक्षणों के आधार पर सियोनोथस औषधि की पहली शक्ति तक देने से लाभ होता है।
जानकारी-
सियोनोथस औषधि को बालों में भी लगाने से बाल सुन्दर और मजबूत बनते हैं।
कास्टिकम Causticum
कास्टिकम औषधि पुराना गठिया का रोग, जोड़ों का रोग तथा लकवा के रोगों में काफी लाभ पहुंचाती है, इन रोगों के लक्षण तब पता चलते हैं जब मांसपेशियों और तंतु-ऊतकों में बहुत तेज खिंचाव के साथ दर्द होता है तथा जोड़ों का स्वाभाविक आकार बिगड़ जाता है, इन्हीं लक्षणों के आधार पर अगर इस औषधि का सेवन किया जाए तो रोगी को बहुत जल्दी आराम पड़ जाता है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर कास्टिकम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - अकेले रहने में या सोने में डर लगना, किसी भी बात पर चीखने-चिल्लाने लगना, हर समय उदास बैठे रहना, किसी से ढंग से बात न करना आदि लक्षणों के आधार पर कास्टिकम औषधि का इस्तेमाल करने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर और दिमाग के बीच का हिस्सा ऐसा महसूस होना जैसे कि वह बिल्कुल खाली हो, माथे के दाएं भाग में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को कास्टिकम औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण - चेहरे के दाएं हिस्से में लकवा मार जाना, चेहरे की हडि्डयों में दर्द होना, दांतों का नासूर होना, जबड़ों में दर्द होना जिसके कारण मुंह को खोलने में परेशानी होती है, आदि लक्षणों में रोगी को कास्टिकम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - मोतियाबिन्द के संचालक तंतुओं की खराबी, पलकों में जलन होना, आंखों के सामने चिंगारियां और काले धब्बे, पलकों का नीचे की ओर लटकना, आंखों का कमजोर होना, आंखों के आगे जाला सा छा जाना, ठण्ड लगने के साथ आंख की पेशियों में लकवा मार जाना आदि लक्षणों में कास्टिकम औषधि का इस्तेमाल अच्छा असर करता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - कानों के अंदर घंटी के बजने जैसी आवाज होना, कानों से कम सुनाई देना, एक ही आवाज का कानों में बार-बार गूंजना, कान के बीच के भाग में पुराना स्राव, कानों के अंदर मैल का ज्यादा जमा होना आदि कान के रोगों के लक्षणों में कास्टिकम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण - जुकाम के साथ गले की आवाज खराब होना, नाक के अंदर के भाग पर पपड़ी सी जम जाना, नाक के नथुनों कें अंदर जख्म होना, चेहरे पर फुंसियां और दाने निकलना आदि लक्षणों के आधार पर कास्टिकम औषधि का प्रयोग काफी लाभकारी रहता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण - किसी भी चीज को खाते या चबाते समय दांतों से गालों के अंदर का हिस्सा कट जाना, जीभ में लकवा मार जाना, जबड़े के नीचे के हिस्से में जोड़ों की गठिया, मसूढ़ों से अपने आप ही खून आने लगना आदि लक्षणों में कास्टिकम औषधि का सेवन अच्छा रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - मुंह के अंदर चिकनापन महसूस होना, किसी भी मीठी चीज को देखते ही मन खराब हो जाना, आमाशय के अंदर चूना सा जलता हुआ महसूस होना, ताजा मांस खाने से रोग का बढ़ जाना, भुना हुआ मांस खाने का मन करना, आदि लक्षणों में कास्टिकम औषधि का सेवन करना अच्छा रहता है।
मल से सम्बंधित लक्षण - मल का सख्त और आंव के साथ आना, मल का चर्बी की तरह चमकता हुआ महसूस होना, मलान्त्र मे दर्द और जलन होना, भगन्दर और बवासीर के बड़े-बड़े मस्से होना आदि लक्षणों में रोगी को कास्टिकम औषधि देने से आराम मिलता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - किसी भी व्यक्ति का पेशाब खांसते या छींकते समय अपने आप ही कपड़ों में निकल जाना, पेशाब का रुक-रुककर आना या कभी बिल्कुल भी न आना, रात को सोते समय पेशाब का अपने आप ही निकल जाना, पेशाब निकल जाने पर भी व्यक्ति को महसूस न होना कि उसका पेशाब निकल गया है आदि लक्षणों में कास्टिकम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - बच्चे को जन्म देने के दौरान बच्चेदानी का कमजोर पड़ जाना, मासिकस्राव का सिर्फ दिन में आना रात को बंद हो जाना, रात को सोते समय योनि में से पानी आने के साथ शरीर में कमजोरी महसूस होना, मासिकस्राव का समय पर ना आकर देर से आना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में रोगी को कास्टिकम औषधि देने से लाभ मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - गले में खराबी होने के साथ-साथ सीने में दर्द होना, आवाज का बंद हो जाना, आवाज की नली में दर्द होना, खांसी होने के साथ ही नितंबों में भी दर्द होना खासकर बाईं ओर, सांस की नली में दर्द होना, अपनी ही आवाज का कानों में दुबारा गूंजना, कानों में अजीब-अजीब सी आवाजें गूंजना आदि लक्षणों में कास्टिकम औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण - गर्दन में हल्का-हल्का सा दर्द होना, कंधों के बीच में अकड़न महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को कास्टिकम औषधि का सेवन कराने से आराम मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - शरीर के बाईं तरफ के हिस्से में गठिया रोग हो जाना और सुन्न पड़ जाना, हाथों और बाजुओं में बहुत तेज दर्द होना, हाथ-पैरों का भारी हो जाना और कमजोरी महसूस होना, घुटने कमजोर पड़ जाना, चलते समय पैरों में दर्द होना, रात को सोते समय टांगों में बैचेनी महसूस होना, पैर की हड्डी के नीचे के हिस्से में खुजली होना आदि लक्षणों में रोगी को कास्टिकम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा के ऊपर झुर्रियां सी पड़ना, कानों के पीछे तथा जांघों के बीच के हिस्से में दर्द होना, उंगलियों के जोड़ों और नाक में मस्से होना, जलने के कारण होने वाले जख्म, त्वचा पर बड़े-बड़े दाने निकलना जिसमें से अपने आप ही खून आने लगता है, पुराने जख्मों का फिर से ताजा हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को कास्टिकम औषधि देने से लाभ होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण - हर समय नींद आते रहना, सुबह उठने में परेशानी होना, रात को नींद न आने के साथ खुश्की महसूस होना, गर्मी और बेचैनी ज्यादा होना आदि लक्षणों में कास्टिकम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
वृद्धि-
मासिकधर्म में, पीठ के बल लेटने से, दाईं करवट लेटने से, गर्मी के मौसम में रोग बढ़ जाता है और बाईं करवट लेटने से, दबाने से, घुटनों को सिकोड़कर पेट में लगाने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
कास्टिकम औषधि की तुलना एम्ब्रा, इग्ने, मास्क, म्यूरे-ए, पल्स, सीपि, वैलेरियाना और जिंक से कर सकते है।
प्रतिविष-
सीसक, विषजनित, लकवा।
पूरक-
कार्बो, पेट्रोसेलीनम।
मात्रा-
कास्टिकम औषधि की 3 से 30 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
जानकारी-
पुराने रोगों खासकर लकवे के रोग में हफ्ते में 1-2 बार कास्टिकम औषधि की 200 शक्तियां देने से लाभ होता है।
कटारिया नेपिटा Cataria Nepeta
कटारिया नेपिटा औषधि बच्चों के पेट दर्द में, स्नायविक सिर के दर्द, दिमाग में गर्मी बढ़ जाने के कारण पागलपन आना, जांघों का लचीलापन, बैठे-बैठे चिल्ला पड़ना आदि लक्षणों में लाभ करती है।
मात्रा-
मूलार्क, 3 बूंदों से लेकर 10 बूंदों तक।
सेफालैण्ड्रा इण्डिका Cephalandra Indica
हिंदी नाम – कंदूरी है ( यह वायु और पित्त नाशक है। ) अत्यधिक वायु या पित्त बढ़कर यदि सिर गर्म हो जाए, सिर दर्द करे या रात को अच्छी नींद न हो अथवा अत्यधिक धूप में सिर दर्द होने पर कंदूरी के पत्तों का रस ललाट में लगाने या तेल के साथ मिलाकर सिर में लगाने से उक्त सभी उपसर्ग घट जाते हैं। पित्त बढ़ने के कारण हाथ-पैर में जलन होने पर होने पर इसका रस मालिश करने पर जलन घटती है। खून-शुदा आँव व सफेद आँव में इसके पत्तों का रस चीनी के साथ खिलाने पर बहुत बार फायदा होता है।
सफेद व खून-शुदा आँव में इसके Q, 3x शक्ति से फायदा होता है। आँव व पित्त मिला हरे रंग का मल, रक्त मिला अथवा रक्तशून्य, पेट दर्द होना व कूथना प्रभृति आँव के लक्षणों में यह उपयोगी होता है।
बहुमूत्र रोग में – इस औषधि से विशेष फायदा होता है। सेफालैण्ड्रा इण्डिका Q या 2x शक्ति की 2-3 बून्द की मात्रा में थोड़े जल के साथ दिन भर में 3-4 बार सेवन करना चाहिए। हाथ-पैर, आँख, मुँह में जलन के साथ पुराने ज्वर में भी यह लाभदायक है।
रोगी को डर सताना, किसी काम को करने में मन नहीं लगना, याददाश्त कमजोर हो जाना इत्यादि कई मानसिक लक्षणों में सेफालैण्ड्रा इण्डिका लाभ करता है। नाड़ी का कमजोर को जाना, नाड़ी बहुत धीमी या मंद हो जाने पर सेफालैण्ड्रा इण्डिका का सेवन अच्छा फायदा करता है।
क्रम – Q, 2x, 3x और 30 शक्ति।
चपारो ऐमारगोसो Chaparro Amargoso
चपारो ऐमारगोसो औषधि पुराने दस्त, जिगर में दर्द, मलक्रिया के समय मल के साथ आंव (सफेद चिकना पदार्थ) आना आदि लक्षणों के आधार पर सेवन करने से बहुत लाभ होता है। इसके अलावा आमाशय में श्लेष्मा का बढ़ना, कमजोर होना आदि लक्षणों को भी ये चपारो ऐमारगोसो औषधि दूर कर देती है।
तुलना-
चपारो ऐमारगोसो औषधि की तुलना काली-कार्बो, क्यूप्रम, आर्से, कैप्सि से की जा सकती है।
मात्रा-
5 बूंद से 10 टिंचर, 3 शक्ति भी लाभकारी होती है।
कैमोमिला Chamomilaa
होम्योपैथिक चिकित्सा के अनुसार कैमोमिला को अनिद्रा (नींद न आना) रोग की सबसे असरदार औषधि माना जाता है। इसके सेवन से व्यक्ति को काफी गहरी नींद आने लगती है। इसके अलावा जिन स्त्रियों में उत्तेजना ज्यादा होती है, बच्चों के दांत निकलते समय होने वाली परेशानियों, किसी भी तरह का दर्द होना, खुली हवा में जाने पर परेशानी होना आदि रोगों के लक्षणों में ये औषधि काफी प्रभावशाली काम करती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर कार्बोनियम औसीजेनिसेटम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर के आधे हिस्से में जलन के साथ दर्द होना, सिर को पीछे की तरफ झुकाने की आदत, माथे और खोपड़ी पर गर्म, चिपचिपा सा पसीना आना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को कैमोमिला औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - कान में घंटियों के बजने जैसी आवाज होना, कान में दर्द होना, सूजन आना, दिमाग में गर्मी बढ़ जाने के कारण व्यक्ति का अजीब-अजीब सी हरकते करना, कान बंद हो जाना आदि कान के रोगों के लक्षणों में रोगी को नियमित रूप से कैमोमिला औषधि का सेवन कराना लाभकारी होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों के अंदर का सफेद भाग पीला पड़ जाना, पलकों में अचानक डंक लगने जैसा दर्द महसूस होना, पलकें अकड़कर बंद हो जाना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में कैमोमिला औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण - जुकाम हो जाने के कारण रोगी को रात में नींद न आना, किसी प्रकार की खुशबू या बदबू का पता न लगना आदि नाक के रोगों के लक्षणो में कैमोमिला औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति का एक गाल गर्म सा और दूसरा पीला और ठण्डा होना, जबड़ों में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना जो कानों के बाहर के भाग और दांतों तक फैल जाता है, किसी गर्म चीज को पीने के बाद दांत में दर्द होना, चेहरे और जीभ की पेशियों में झटके से लगना आदि लक्षणों में रोगी को कैमोमिला औषधि देने से लाभ मिलता है।
कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण - गले की ग्रन्थियों में सूजन आ जाना, गले में घुटन और दर्द होना आदि लक्षणों में कैमोमिला औषधि का सेवन लाभकारी रहता है।
मुख (मुंह) से सम्बंधित लक्षण - मुंह में कोई गर्म चीज रखने से, कॉफी पीने से, रात को मुंह से लार टपकना, गर्भावस्था के दौरान दांतों में दर्द होना आदि लक्षणों में कैमोमिला औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - हर समय गंदी-गंदी सी डकारें आना, कॉफी पीने से जी मिचलाना, खाने-पीने की किसी भी चीज को खाने के बाद पसीना आना, गर्म पीने वाली चीजों को देखते ही मन खराब हो जाना, जीभ पीली पड़ना, मुंह का स्वाद कड़वा होना, गर्मी के कारण उल्टी होना, कुछ भी खाने पर तुरन्त ही उल्टी हो जाना, पेट में भारीपन के साथ दर्द होना आदि आमाशय रोगों के लक्षणों में कैमोमिला औषधि का सेवन लाभकारी रहता है।
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण - पेट का फूल जाना, नाभि के हिस्से में मरोड़े से उठना, कमर के नीचे के हिस्से में दर्द होना, जिगर में खराबी आने के कारण पेट में दर्द होना आदि पेट के रोगों के लक्षणों मे कैमोमिला औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
मल से सम्बंधित लक्षण - मल का गर्म, बिल्कुल पतला, हरे रंग का, बदबूदार आना, मलक्रिया के दौरान पेट में दर्द होना, मल के साथ पीले रंग के आंव का आना, बच्चों को दांत निकलने के समय होने वाला दस्त, खूनी बवासीर आदि लक्षणों में कैमोमिला औषधि का प्रयोग लाभदायक होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली से खून का आना, बच्चे के जन्म के समय स्त्री का दर्द को सहन न कर पाना, स्तनों के निप्पलों में जलन होना, योनि से पीले रंग का प्रदर (स्राव) आना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में कैमोमिला औषधि का सेवन करना अच्छा रहता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण - रोगी की जांघों और कूल्हों में बहुत तेज दर्द होना, कमर में दर्द होना, गर्दन की पेशियों का अकड़ जाना आदि लक्षणों में कैमोमिला औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - रोगी के तलुवों में रात को सोते समय जलन होना, चलते समय घुटनों में बहुत तेज दर्द होना, रात को सोते समय पैरों की ऐसी हालत होना जैसे कि उनमें लकवा मार गया हो आदि लक्षणों में कैमोमिला औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।
खांसी से सम्बंधित लक्षण - सूखी खांसी होना, रात को सोते समय खांसी का तेज होना, सांस की नलियों में बलगम का जमा हुआ महसूस होना आदि लक्षणों में कैमोमिला औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
दांत से सम्बंधित लक्षण - ठण्ड के कारण दान्तों में बहुत तेज दर्द होना, गर्म चीज पीने से दान्तों में टीस होना, रात के समय दांत में दर्द होना, कुछ भी चीज खाने से दांत में दर्द शुरू हो जाना आदि दांत के रोगों के लक्षणों में कैमोमिला औषधि का सेवन लाभदायक होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण - हर समय नींद सी आना, रात को सोते समय चिल्लाना, डरावने सपने दिखाई देना आदि लक्षणों में यह औषधि विशेष रूप से लाभकारी होती है।
वृद्धि-
गर्मी से, गुस्से से, खुली हवा में, तूफानी हवा में, रात के समय रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गोद में उठाकर घुमाने से, गर्मी और बारिश के मौसम में रोग कम होता है।
तुलना-
साइप्रिपोडियम, आन्येमिस, ऐकोनाइट, पल्सा, कॉफि, बेला, स्टैफिसै से कैमोमिला औषधि की तुलना की जाती है।
प्रतिविष-
कैम्फर, नक्स, पल्सा औषधियों का उपयोग कैमोमिला औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
पूरक-
बेला, मैग्नी-कार्बो।
मात्रा-
रोगी को उसके रोग के लक्षणों के आधार पर कैमोमिला औषधि की तीसरी से तीसवीं शक्ति तक देने से लाभ होता है।
सीरियम आक्सेलिकम Cerium Oxalicum
सीरियम आक्सेलिकम औषधि को किसी भी रोग के कारण होने वाली उल्टी जैसे काली खांसी के साथ उल्टी होना और खून आना, बंद करने के लिए काफी लाभकारी माना जाती है, गर्भावस्था के दौरान होने वाली उल्टी में इस औषधि के इस्तेमाल से ज्यादा आराम आता है। इसके अलावा अच्छी सेहत वाली स्त्रियों को दर्द के साथ होने वाला मासिकस्राव में भी इस औषधि को इस्तेमाल करने से लाभ होता है।
तुलना-
सीरियम आक्सेलिकम की तुलना एमिग्डेलस, लैक्टिक एसिड, इपिका से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सीरियम आक्सेलिकम औषधि की पहली शक्ति का विचूर्ण देने से रोग में आराम मिलता है।
सीरियस बॉनप्लाण्डिआइ Cereus Bonplandii
विभिन्न लक्षणों के आधार पर सीरियस बॉनप्लाण्डिआइ का उपयोग-
मस्तिष्क (दिमाग) से सम्बंधित लक्षण- हर समय दिमाग में ऐसा लगना कि कोई काम करना है, कभी खाली न बैठ पाना, कुछ न कुछ करते रहना आदि दिमागी रोग के लक्षणों में रोगी को सीरियस बॉनप्लाण्डिआइ का सेवन कराने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर के पीछे के हिस्से में तथा आंखों के गोले और आंखों के कोटर के आर-पार दर्द होना, दिमाग के दाईं और को फैलता हुआ ऐसा दर्द जो गाल की हड्डी के साथ-साथ चलता हुआ कनपटी तक फैल जाता है आदि सिर के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को सीरियस बॉनप्लाण्डिआइ औषधि देने से आराम होता है।
वक्ष (स्तन) से सम्बंधित लक्षण - दिल में ऐंठन के साथ दर्द होना, छाती में दर्द होना जो दिल से प्लीहा की ओर बढ़ता है, छाती की पेशियों और बाईं ओर के नीचे की पसलियों की उपास्थियों में ऐसा दर्द होना जैसे कि छाती पर कोई भारी वजन रखा हो आदि लक्षणों में रोगी को सीरियस बॉनप्लाण्डिआइ औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा पर छोटे-छोटे से दाने निकलना जिनमें हर समय खुजली सी होती रहती है आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को नियमित रूप से सीरियस बॉनप्लाण्डिआइ औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति के गर्दन, कमर, कंधों, बाजुओं, हाथों की उंगलियों में दर्द होना, घुटनों और पैरों के सारे जोड़ों में दर्द होना आदि लक्षणों में सीरियस बॉनप्लाण्डिआइ औषधि लेने से रोगी को आराम मिल जाता है।
तुलना-
कैक्टस, स्पाइजी, काल्मिया, सीरियस सरपेन्टाइनस से सीरियस बॉनप्लाण्डिआइ की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
तीसरी से छठी शक्ति तक।
चेलिडोनियम मेजस Chelidonium Majus
जिगर के सभी तरह के रोगों को दूर करने के लिए चेलिडोनियम मेजस औषधि बहुत ही लाभकारी होती है। ये औषधि शरीर के दाएं तरफ के हिस्से को ठीक करने में बहुत ही जल्दी असर दिखाती है लेकिन बाईं तरफ ये सही तरीके से काम नहीं कर पाती जैसे दाएं तरफ के कंधे की हड्डी के नीचे तथा अंदर के कोने के नीचे अगर किसी तरह का दर्द होता है तो ये औषधि सेवन करने से दर्द तुरन्त ही दूर हो जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर चेलिडोनियम मेजस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण : सिर का बहुत ज्यादा भारी सा महसूस होना, गर्दन की जड़ से लेकर सिर के पीछे के पूरे भाग में बहुत ज्यादा ठण्डक महसूस होना, पूरे दिन सुस्ती और नींद सी आना, चक्कर आना, सिर में दाईं तरफ दर्द का होना जो कानों के पीछे और कंधे के जोड़ तक फैल जाता है, दाईं आंख के ऊपर, दाएं गाल की हड्डी में और दाएं कान में स्नायु का दर्द होना, आंसुओं का बहुत ज्यादा मात्रा में गिरना, जिगर में दर्द होना आदि लक्षणों के किसी व्यक्ति में नज़र आने पर उसे चेलिडोनियम मेजस औषधि देने से लाभ मिलता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण : नाक के नथुनों के लगातार फड़कने पर रोगी को चेलिडोनियम मेजस औषधि का प्रयोग कराने से बहुत आराम मिलता है।
आंख से सम्बंधित लक्षण : आंख के अंदर का सफेद भाग पीला पड़ जाना, आंखों से ऊपर की ओर देखने पर दर्द सा होना, आंखों से बार-बार आंसुओं का आना, आंखों की पलकों का सिकुड़ जाना, आदि आंख के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को चेलिडोनियम मेजस औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक रहता है।
पीलिया से सम्बंधित लक्षण : किसी व्यक्ति के शरीर में अगर पीलिया रोग के ऐसे लक्षण नज़र आते है जैसे- आंखे पीली हो जाना, नाखूनों का रंग पीला पड़ जाना, चेहरे का रंग पीला पड़ जाना, पेशाब पीला आना, भूख न लगना आदि हो तो उस व्यक्ति को चेलिडोनियम मेजस औषधि देने से लाभ होता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण : चेहरे की त्वचा का सिकुड़ सा जाना (झुर्रियां पड़ना), चेहरा, नाक और गालों की त्वचा का रंग बिल्कुल पीला हो जाना आदि लक्षणों के किसी भी व्यक्ति में नज़र आने पर उसे तुरन्त ही चेलिडोनियम मेजस औषधि देनी चाहिए।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण : मुंह का स्वाद खराब होना, मुंह से बदबू आना, जीभ का पीला सा हो जाना, जीभ पर दांतों के निशान पड़ जाना, जीभ का लंबी और थुलथुली सी होना, मन ऐसा करना जैसे कि गर्मागर्म चीजे खा लें, जी मिचलाना, उल्टी होना आदि लक्षणों में रोगी को चेलिडोनियम मेजस औषधि देने से लाभ मिलता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण : जिगर और पित्ताशय में किसी तरह की रुकावट आ जाने के कारण होने वाला पीलिया रोग, पेट का फूलना, जिगर का बढ़ना, पित्त की थैली में पथरी होना, आंतों का ढीला पड़ जाना आदि पेट के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को चेलिडोनियम मेजस औषधि खिलाने से लाभ होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण : बार-बार पेशाब का आना, पेशाब में झाग सा आना, पेशाब के रंग का पीला और गहरे रंग में आना आदि लक्षणों में चेलिडोनियम मेजस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक रहता है।
मल से सम्बंधित लक्षण : पेट मे कब्ज का होना, मल सख्त रूप में, पीले रंग का, चिपचिपा सा आना, पानी जैसे पतले दस्त आना, मलद्वार में जलन और खुजली होना आदि लक्षणों में रोगी को चेलिडोनियम मेजस औषधि का सेवन कराने से रोगी को आराम मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण : मासिकधर्म में स्राव का समय से बहुत दिनों के बाद आना और ज्यादा मात्रा में आना लक्षणों में चेलिडोनियम मेजस औषधि का सेवन करना अच्छा रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण : सांस का बहुत तेजी से चलना, सांस का उखड़ना, गहरी सांस लेने पर दर्द होना, सांस लेने में परेशानी होना, थोड़ी-थोड़ी देर बाद उठने वाली खांसी, छाती में धूल सी भरती हुई महसूस होना, काली खांसी होना, पतला लेकिन बड़ी ही मुश्किल से निकलने वाला बलगम, छाती के दाएं तरफ के भाग में कंधे में दर्द होने के साथ सांस लेने में परेशानी होना, दोपहर के बाद खराश सी होना आदि लक्षणों में रोगी को चेलिडोनियम मेजस औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण : गर्दन की जोड़ में दर्द होना, गर्दन का अकड़ना, सिर का बाईं तरफ खिंच जाना, दाएं कंधे के अंदर की ओर नीचे की तरफ दर्द होना, बाएं कंधे के नीचे के भाग में दर्द होना आदि लक्षणों के आधार पर चेलिडोनियम मेजस औषधि का प्रयोग काफी लाभदायक रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण : बाजुओं, कंधों, हाथों की उंगलियों के सिरे बिल्कुल ठण्डे से लगना, कलाइयों में दर्द होना, नितंबों और जांघों में गठिया का दर्द होना, एड़ियों में बहुत तेज दर्द, शरीर के दाईं तरफ ऐसा महसूस होना जैसे कि लकवा मार गया है, पेशियों का कठोर हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को चेलिडोनियम मेजस औषधि खिलाने से आराम मिलता है।
चर्म (चमड़ी) से सम्बंधित लक्षण : त्वचा का रंग पीला पड़ जाना, त्वचा का रूखा-सूखा होना, त्वचा के ऊपर छोटी-छोटी लाल रंग की फुंसियां निकलना, पुराने फैलने वाले जख्म होना, त्वचा का गंदा, ठण्डा और चिपचिपा सा होना आदि लक्षणों में रोगी को चेलिडोनियम मेजस औषधि नियमित रूप से सेवन कराने से आराम मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण : कानों से सुनाई न देना, खांसी होते समय कानों से सुनने की शक्ति बिल्कुल समाप्त हो जाना आदि लक्षणों में चेलिडोनियम मेजस औषधि का प्रयोग लाभप्रद रहता है।
रूपात्मकतायें :
मौसम के बदलने से, किसी तरह की हरकत करने से, किसी के द्वारा छूने से, दाहिनी करवट लेटने से, सुबह के समय 4 बजे और शाम को 4 बजे रोग बढ़ जाता है ओर रात को भोजन के बाद, गर्म, पेय, दबाव, गर्म भोजन से, पीछे की ओर झुकने पर रोग कम हो जाता है।
पूरक-
प्रतिविष-
कमोमिला औषधि का उपयोग चेलिडोनियम मेजस औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
तुलना-
नक्स, सल्फर, ब्रायो, लाइको, ओपियम, पोडो, सैम्बीनेरिया, आर्से से चेलिडोनियम मेजस औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को किसी भी रोग के लक्षण के आधार पर चेलिडोनियम मेजस औषधि की मूलार्क और कम शक्तियां देने से लाभ मिलता है।
चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस China- Cinchona Officinals
चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि शरीर में से किसी प्रकार का तरल पदार्थ निकल जाने के कारण कमजोरी आ जाना जैसे मवाद, खून, दूध, वीर्य, राल आदि। खून की कमी, चेहरा पीला पड़ना, आंखें अंदर की ओर घुसी हुई, आंखों के चारो ओर काले घेरे होना, बहुत ज्यादा पसीना आना, सिर में दर्द होना, कानों के अंदर भनभनाहट होना, थोड़ा सा छूने से रोगी को तकलीफ होना आदि लक्षणों में काफी लाभकारी होती है। इस औषधि की शिकायतें एक दिन के बाद हुआ करती हैं।
विभिन्न लक्षणों में चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि का उपयोग-
खून का बहना - शरीर में किसी भी स्थान से खून का बहना जैसे मुंह से, नाक से, आंतों में से, गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली में से आदि लक्षणों के आधार पर चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि का सेवन लाभदायक रहता है। इसी के साथ खून के बहने के कारण कमजोरी आ जाना, चेहरा फीका पड़ जाना, आंखों के चारों ओर काले घेरे से पड़ना, बेहोशी छा जाना आदि खून बहने के कारण प्रकट होने वाले लक्षणों में भी ये औषधि देने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में बहुत तेज दर्द होना, सिर के पीछे की ओर दर्द होना, उठने या लेटने से सिर का दर्द तेज हो जाना, सिर की त्वचा को छूने से दर्द बढ़ जाना, जुकाम के दब जाने से सिर का दर्द हो जाना, खून बहना, संभोग क्रिया ज्यादा करने से सिर में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि देने से लाभ मिलता है।
आंख से सम्बंधित लक्षण - आंख के अंदर के सफेद भाग का पीला हो जाना, रात को नज़र नहीं आना, सबकुछ धुंधला सा दिखाई पड़ना, आंखों के अंदर किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना, जरा सी तेज रोशनी आंख में पड़ते ही आंखों में जलन होना, ठण्डी हवा आंखों में लगने से आंखों की नसों में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - कानों में घंटी के बजने जैसी आवाजें सुनाई देना, कान से कम सुनाई देना, ज्यादा खून बहने के कारण कान में भिनभिनाने जैसी आवाजें होना आदि लक्षणों में चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण - सुबह के समय उठने पर नाक से खून का आना, बेहोशी छा जाना, नाक की जड़ में दर्द होना, लगातार छींके आना, जुकाम होने पर नाक से स्राव का आना, जुकाम के रुक जाने से सिर में दर्द होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि देने से आराम मिलता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण - मुंह के अंदर दांतों का हिलना, कुछ भी चबाने के समय दांत में दर्द होना, मुंह का स्वाद खराब हो जाना, हर चीज खाने में कड़वी महसूस होना, नवजात बच्चे को दूध पिलाते समय स्त्री के दांत में दर्द होना, या योनिद्वार से खून का आना आदि लक्षणों में रोगी को चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस देने से लाभ मिलता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण - खाने-पीने की चीजों को देखते ही भूख समाप्त हो जाना लेकिन भोजन करना शुरू करते ही भूख और मुंह का स्वाद लौट आना, खट्टे फल और शराब पीने का मन करना, डकारें आना, पेट और अंतड़ियों में हवा का भर जाना, कुछ भी खाने पर पेट का फूल जाना, सांस लेने में परेशानी होना आदि लक्षण नज़र आने पर रोगी को नियमित रूप से चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।
दस्त से सम्बंधित लक्षण - फलों के खाने से पतले दस्त हो जाना, बिना पेट में दर्द के दस्त आना, मल के साथ हवा ज्यादा आना, दस्तों के या हैजा होने के बाद शरीर में कमजोरी आना आदि लक्षणों में रोगी को चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक रहता है।
जिगर से सम्बंधित लक्षण - जिगर में बहुत तेज दर्द होना जो छूने से बढ़ जाता है, जिगर में सूजन आना, तिल्ली में सूजन आना और दर्द होना आदि लक्षणों के आधार पर चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति को अगर काफी समय से स्वप्नदोष जैसे लक्षण नज़र आते हैं जैसे सोते समय अपने आप ही वीर्य का निकल जाना तो उसके लिए चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि बहुत अच्छा असर करती है। इसके अलावा मन में हर समय यौन सम्बंधी विचार रखने या हस्तमैथुन करने से वीर्य दोष जैसे वीर्य का पतला हो जाना, नपुसंकता आ जाना आदि लक्षणों में भी ये औषधि लाभकारी होती है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिकधर्म के समय स्राव के साथ खून का ज्यादा आना, मासिकस्राव समाप्त होने के बाद भी बहुत ज्यादा खून का आना, कमजोरी आना, बच्चे को जन्म देने के बाद भी काफी समय तक गंदा पानी आते रहना, ज्यादा संभोग क्रिया करने के बाद डिम्बाशय में जलन होना, गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली को छूने से दर्द होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी स्त्री को चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- आवाज का बैठ जाना, गले में सरसराहट के साथ खांसी आना, दिन में या शाम को खांसी के साथ दानेदार बलगम निकलना जो रात को या सुबह बिल्कुल भी नहीं निकलता, भोजन करने के बाद जरा सा भी हंसने से, बात करने से, हवा लगने से खांसी तेज हो जाती है आदि लक्षणों में रोगी को चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि देने से आराम मिलता है।
कमर से सम्बंधित लक्षण - कमर में ऐसा महसूस होना जैसे कि किसी ने कमर में बहुत सारा वजन बांध रखा हो, जरा सा भी झुकने पर कमर में दर्द बढ़ जाता है, किसी भी हरकत को करने से दर्द का बढ़ जाना आदि लक्षणों में रोगी को चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण - रोगी को सोने पर गहरी नींद नहीं आती लेकिन वह हमेशा ही ऊंघता रहता है, रात को 3 बजे के आसपास उसके शरीर में बैचेनी बढ़ने लगती है, रोगी सुबह-सुबह ही जागकर बैठ जाता है जैसे लक्षण नज़र आने पर चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि का सेवन करना लाभदायक रहता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण - इस तरह का बुखार जो आने से 2-3 घंटे पहले अपने लक्षण प्रकट कर देता है, हर सातवें या चौदह दिन के बाद आने वाला बुखार आदि लक्षणों में रोगी को चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
तुलना -
चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि की तुलना आर्नि, आर्स, कल्के-का, कार्बो-वे, सिड्रान, काफि, फेरम, ग्रेफा, लायको, मर्क, नैट्र-म्यू, नक्स वोमिका, फास्पो-ए, फास, सिकेल, सीपि, सल्फ और वेरेट्रम से की जा सकती है।
पूरक-
फेरम।
वृद्धि-
थोड़ा सा छूने से, हवा लगने से, एक दिन छोड़कर, सुबह और रात के समय, खाने-पीने के बाद, दूध से, चलने से, हरकत करने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्मी से, आराम करने से, जोर से दबाने से, टांगों को मोड़कर लेटने से रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
रोगी को उसके रोग के लक्षणों को देखकर चायना-सिनकोना आफिसिनैलिस औषधि का मूलार्क या 30वीं शक्ति तक देने से लाभ मिलता है।
कोकेना Cocaina
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर कोकेना औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- हर समय दिमाग में कुछ न कुछ सोचते रहना, आंखों के सामने अजीब-अजीब सी चीजों का नज़र आने का वहम होना, हर किसी को गुस्से से घूरते हुए रहना, नींद न आना, अकेले बैठे रहने का मन करना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को कोकेना औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में ऐसा महसूस होना जैसे कि सिर में बहुत तेज जलन हो रही है या सिर फट रहा हो, आंखों की पुतलियों का फैल जाना, सिर में अजीब-अजीब सी चीजें रखी हुई महसूस होना आदि लक्षणों में कोकेना औषधि का सेवन अच्छा रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों से कम दिखाई देना, तनाव का बढ़ जाना, अनिमेष आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कोकेना औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण - गले का सूखा हुआ महसूस होना, गले में जलन होना, दम सा घुटना, बोलने में परेशानी होना आदि लक्षणों में कोकेना औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - आमाशय का सख्त सा होना, भूख न लगना, मन में मीठा खाने की इच्छा होना, आंतों और आमाशय से खून का आना आदि लक्षणों में कोकेना औषधि का प्रयोग करना लाभकारी रहता है।
स्नायु प्रणाली से सम्बंधित लक्षण - पेशियों में खिंचाव आना, शराब का सेवन ज्यादा करने से शरीर में झटके लगना, बुढ़ापे में शरीर का कांपना, कंपकंपी के साथ शरीर के किसी अंग में लकवा मारना, हाथ और बाजुओं का सुन्न होना आदि लक्षणों में कोकेना औषधि नियमित रूप से लेने से लाभ होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण - लेटने के कई घंटों के बाद भी नींद न आना, हर समय बैचेनी सी महसूस होना, आदि लक्षणों के आधार पर कोकेना औषधि का सेवन अच्छा रहता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण - शरीर का बिल्कुल ठण्डा हो जाना, त्वचा का रंग बहुत ज्यादा पीला हो जाना आदि लक्षण नज़र आने पर रोगी को कोकेना औषधि देने से लाभ मिलता है।
तुलना-
कोकेना औषधि की तुलना स्टोवेन से की जा सकती है।
मात्रा-
निम्न शक्तियां।
जानकारी-
कोकेना औषधि त्वचा या मसूढ़ों के किसी तरह के रोग होने पर दिए जाने वाले हानिकारक परिणामों को दूर करती है।
काक्सिनेल्ला सेप्टेम्पंक्टैटा Coccinella Seprempunctata
काक्सिनेल्ला सेप्टेम्पंक्टैटा औषधि अलग-अलग प्रकार के दर्दों जैसे दांत का दर्द, मूसड़ों में दर्द होना, मुंह का दर्द आदि में असरदार होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर काक्सिनेल्ला सेप्टेम्पंक्टैटा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- माथे पर दाईं आंख के ऊपर के हिस्से में दर्द होना, मुंह के अंदर ऊपर की दाढ़ से शुरू होकर सिर तक दर्द होना, कनपटी और सिर के पीछे के हिस्से में दर्द होना, दांतों मे ठण्डापन लगना, दर्द होने पर आंखे न खोल पाना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को तुरन्त ही काक्सिनेल्ला सेप्टेम्पंक्टैटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - रोगी को लगातार हिचकी आना, आमाशय में जलन होना आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों में काक्सिनेल्ला सेप्टेम्पंक्टैटा औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण - हाथ-पैरों का बिल्कुल ठण्डा हो जाना, गुर्दों और कमर में दर्द होना आदि लक्षण नज़र आते ही रोगी को तुरन्त काक्सिनेल्ला सेप्टेम्पंक्टैटा औषधि का सेवन कराना चाहिए।
तुलना-
काक्सिनेल्ला सेप्टेम्पंक्टैटा की तुलना आर्से, केमो, नैफ्थ लाइन से की जा सकती है।
मात्रा -
काक्सिनेल्ला सेप्टेम्पंक्टैटा औषधि की तीसरी शक्ति तक रोगी को उसके रोग के लक्षणों के आधार पर देने से आराम आता है।
काक्कूलस Cocculus
जिन व्यक्तियों को आधे शरीर में लकवा मार जाने का रोग हो जाता है उनके लिए काक्कूलस औषधि बहुत ज्यादा लाभदायक होती है।
विभिन्न प्रकार रोगों के लक्षणों में काक्कूलस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- हर समय किसी चिंता में डूबे रहना, हर समय कुछ न कुछ गाते या बोलते रहना, किसी बात को समझने में काफी समय लगाना, दिमाग का सुन्न होना, दुखी रहना आदि मानसिक रोग के लक्षणों में रोगी को काक्कूलस औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- चक्कर आना, जी खराब होना, सिर के पीछे के हिस्से में और गर्दन में दर्द होना, यात्रा करते समय होने वाला पुराने सिर के दर्द का रोग, पुतलियों का सिकुड़ना, सिर का कांपना, आंखों में दर्द होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को काक्कूलस औषधि का सेवन कराने से आराम आ जाता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- चेहरे की नाड़ियों में लकवा मार जाना, जिस पेशी के द्वारा भोजन को खाते समय चबाया जाता है उसमे ऐंठन जैसा दर्द होना जो मुंह खोलने से बढ़ जाता है, दोपहर होने के बाद स्नायु में दर्द होना जो एक केंद्र से चारों ओर फैलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- किसी लंबे सफर के दौरान यात्रा करते समय जी का खराब होना, सर्दी लगने से जी ज्यादा खराब हो जाता है, जी खराब होने के साथ-साथ उल्टी होना और चक्कर आना, खाने-पीने की चीजों तथा तम्बाकू को देखते ही भूख का मर जाना, मुंह का स्वाद कड़वा होना, पेशियों में लकवा मार जाने के कारण भोजन को निगलने में परेशानी होना, ग्रासनली की खुश्की, आमाशय के अंदर भोजन करते समय और भोजन करने के बाद में ऐंठन होना, हिचकियां आना, भूख न लगना, ठण्डे पीने वाले पदार्थों का सेवन करने का मन करना आदि आमाशय से सम्बंधित लक्षणों में रोगी को काक्कूलस औषधि देने से लाभ मिलता है।
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण- गैस भरने के कारण पेट का फूलना, चलते-फिरते समय ऐसा महसूस होना जैसे कि पेट में कोई पत्थर भर रखे हो, पेट के अंदर बहुत तेज दर्द होना, पेट की पेशियों का कमजोर हो जाना आदि पेट के रोग वाले लक्षणों में रोगी को काक्कूलस औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिकधर्म के समय काले से रंग के खून का बहुत ज्यादा मात्रा में आना, मासिकधर्म समय से पहले आ जाना, गर्भाशय के ऊपर की झिल्ली में दबाव पड़ने के साथ दर्द होना, बवासीर, मासिकधर्म समाप्त होने और दूसरा मासिकधर्म आने से पहले के समय में स्त्री की योनि मे से पीब जैसा प्रदरस्राव होना, मासिकस्राव के दौरान स्त्री को बहुत ज्यादा कमजोरी आ जाना जितनी कि वह खड़ी भी नही हो सकती आदि लक्षणों में काक्कूलस औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - छाती का खाली सा महसूस होना, ऐंठन आना, सांस लेने में परेशानी होना, ग्रासनली के ऊपर के हिस्से में घुटन होने के कारण सांस लेने में परेशानी होना और खांसी आना आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को काक्कूलस औषधि देने से लाभ मिलता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण - कमर के नीचे के हिस्से में लकवा मार जाने के जैसा दर्द होना, सिर के हिलाने के कारण गर्दन की कशेरुकाओं में आवाज होती है, कंधों और बाजुओं में बहुत तेज दर्द होना, कंधों के जोड़ और गर्दन पर दबाव पड़ना, कंधों को हिलाने-डुलाने पर अकड़न सी लगना आदि लक्षणों में रोगी को काक्कूलस औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- शरीर के अंगों का कांपना और दर्द होना, दोनों हाथ एक-एक करके गर्म और ठण्डे से हो जाना, चलते-फिरते समय घुटनों में आवाज होना, शरीर के नीचे के हिस्सों में कमजोरी आना, घुटनों में जलन और सूजन आना, हाथ-पैरों का सीधा तन हो जाना जो मोड़ने या फैलाने पर दर्द करते है आदि लक्षणों में काक्कूलस औषधि देने से लाभ मिलता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण - हर समय जम्हाई सी आना, नींद की अवस्था जिसमें आंखें खुली हुई रहती है, नींद न आना, नींद न आने के कारण होने वाली परेशानी होना आदि लक्षणों में काक्कूलस औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण - शरीर में ठण्ड के साथ कंपकंपी महसूस होना, जी खराब होना, चक्कर आना, नीचे के अंगों में ठण्डक आना और सिर में गर्मी चढ़ना, पूरे शरीर में पसीना आना आदि बुखार के लक्षणो में रोगी को काक्कूलस औषधि देने से लाभ मिलता है।
तुलना-
पिकरोटॉक्सिन, सिम्फोरीकार्पस, पेट्रोलि, पल्सा, इग्नेशिया आदि से काक्कूलस औषधि की तुलना की जा सकती है।
वृद्धि-
खाने से, नींद पूरी न होने से, खुली हवा में, बीड़ी-सिगरेट पीने से, गाड़ी में यात्रा करने से, तैरने से, घूमने से, ज्यादा शोर होने से, झटका लगने से, दोपहर के बाद, मासिकधर्म के दौरान रोग बढ़ जाता है।
विषक्रिया नाशक -
कैम्फ, कैमों, क्यूप्रम, इग्ने, नक्स आदि औषधियों का उपयोग काक्कूलस औषधि के हानिकारक प्रभाव को दूर करने के लिए नष्ट किया जाता है।
मात्रा-
रोगी को काक्कूलस औषधि की तीसरी से तीसवीं शक्ति तक देना काफी लाभकारी होता है।
कोकस कैक्टाइ Coccus Cacti
कोकस कैक्टाइ नाम की औषधि का प्रयोग अक्सर सांस की नली में किसी तरह की परेशानी आने के रोग में, जुकाम, काली खांसी आदि में बहुत लाभकारी होता है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर कोकस कैक्टाइ औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - अचानक बैठे-बैठे रोने लगना, हर समय उदास रहना, कुछ न कुछ सोचते रहना, अपने आप से ही बातें करना आदि किसी व्यक्ति के मानसिक रोग के इस तरह के लक्षण नज़र आने पर अगर उसे कोकस कैक्टाइ औषधि का सेवन कराया जाए तो वो कुछ ही समय में साधारण अवस्था में आ सकता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर का दर्द होना, सिर में ऐसा लगना कि कुछ रखा हुआ है, पीठ के बल लेटने से सिर में दर्द बढ़ जाना आदि सिर के रोग के लक्षण प्रतीत होने पर रोगी को तुरन्त ही कोकस कैक्टाइ का सेवन कराना चाहिए।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब करते समय परेशानी होना, पेशाब का रुक-रुककर आना, बिल्कुल लाल रंग का आना, पेशाब के साथ पथरी आना जैसे मूत्ररोग के लक्षणों में कोकस कैक्टाइ का सेवन बहुत ही ज्यादा असरदार होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - स्त्री का मासिकधर्म समय से पहले ही आ जाना, स्राव का रंग काला होना, मासिकस्राव ज्यादा आना या बिल्कुल ही कम आना, योनि में जलन होना जैसे स्त्री रोगों के लक्षणों में स्त्री को अगर नियमित रूप से कोकस कैक्टाइ का सेवन कराए तो कुछ ही समय में उसके सारे रोग समाप्त हो जाते हैं।
हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण - दिल में अचानक दर्द उठना, ऐसा लगना कि दिल को कोई अंदर से दबा रहा है आदि दिल के रोगों के लक्षणों में कोकस कैक्टाइ का सेवन बहुत असरदार साबित होता है।
गुर्दे से सम्बंधित लक्षण - गुर्दे में दर्द होना, पेशाब कम या जरूरत से ज्यादा आना, पेशाब में खून आना जैसे गुर्दे के रोगों के लक्षणों में कोकस कैक्टाइ का सेवन बहुत ही लाभकारी सिद्ध होता है। गुर्दे के रोग के किसी भी लक्षण के नज़र आने पर ये सबसे अच्छी औषधि मानी जाती है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - सांस की नली में बलगम का जम जाना, रात को सोते समय बहुत ज्यादा खांसी होना, गले से आवाज साफ न निकल पाना, खांसते समय बलगम बहुत ज्यादा आना, सांस लेने में परेशानी होना आदि सांस के रोग के लक्षणों में कोकस कैक्टाइ एक ही बहुत ही अच्छी औषधि है इसको अगर नियमित रूप से सेवन किया जाए तो सांस के रोगी के सारे लक्षण समाप्त हो जाते हैं।
तुलना-
कोकस कैक्टाइ की तुलना कैन्थारिस, कैक्टस, सर्सापैरिल्ला आदि से की जाती है।
मात्रा-
कोकस कैक्टाइ की थोड़ी सी शक्तियां।
काक्लिएरिया अमोरेसिया COCHLEARIA ARMORACIA
किसी व्यक्ति के अगर मसूढ़ों से खून आता है या गले में जलन होती है तो उसके लिए काक्लिएरिया अमोरेसिया औषधि बहुत लाभकारी रहती है। इसके अलावा इसे भूख को बढ़ाने के लिए भोजन में मसाले की जगह इस्तेमाल किया जाता है। इसकी जड़ का काढ़ा जलशोफ (पानी भरना) के रोग में इस्तेमाल किया जाता है इससे पेशाब खुलकर आता है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के लिए काक्लिएरिया अमोरेसिया औषधि का उपयोग-
पीठ से सम्बंधित लक्षण - कमर में दर्द होना, जैसे पेट में हवा रुक जाने से हुआ हो, दर्द पेट से शुरू होकर पीछे कमर तक और नीचे त्रिकास्थि तक फैल जाता है आदि लक्षणों में रोगी को काक्लिएरिया अमोरेसिया औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों की रोशनी का कम होना, मोतियाबिंद होना, आंखों से हर समय आंसू निकलना, आंखों में जलन होना आदि आंख के रोगों के लक्षणों में रोगी को काक्लिएरिया अमोरेसिया औषधि देने से बहुत ज्यादा लाभ मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - सूखी खांसी, इनफ्लुएंजा के बाद होने वाली खांसी, सोते समय तेज होने वाली खांसी, जुकाम के साथ गले में खराश होना, फेफड़ों में पानी भरना, आवाज का खराब होना आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को काक्लिएरिया अमोरेसिया औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - रोगी के लिंग में हर समय दर्द और जलन होना जैसे पेशाब करने से पहले, पेशाब करते समय तथा पेशाब करने के बाद, बार-बार पेशाब का आना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को काक्लिएरिया अमोरेसिया औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
वृद्धि-
शाम को और रात को सोते समय रोग बढ़ जाता है।
तुलना-
काक्लिएरिया अमोरेसिया औषधि की तुलना कैनाबिस, सिनापिस, कैप्सिकम से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को काक्लिएरिया अमोरेसिया औषधि की पहली से तीसरी शक्ति तक देने से लाभ होता है।
कोडीनम Codeinum
किसी व्यक्ति में अगर इस तरह के लक्षण नज़र आते है जैसे व्यक्ति का पूरा शरीर कांपना, हाथों और धड़ के नीचे की पेशियों का फड़कना, खुजली होना, डकारें आना, बार-बार प्यास लगना, आदि तो उस व्यक्ति के इन सारे लक्षणों के आधार पर अगर उसे कोडिनम औषधि का नियमित रूप से सेवन कराया जाए तो उसको कुछ ही समय में अच्छा लाभ प्राप्त होता है।
विभिन्न लक्षणों में कोडिनम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर के पीछे के हिस्से और गर्दन में दर्द होना, स्नायुशूल के बाद चेहरे और सिर की चमड़ी में जलन होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में कोडिनम औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण -किसी व्यक्ति की आंखों की पलकें अगर अपने आप फड़कती है तो उस व्यक्ति को कोडिनम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - रात को सोते समय उठने वाली खांसी, जो सोते समय ओर तेज हो जाती है, बहुत ज्यादा मात्रा में पीब जैसा बलगम निकलना, बार-बार उठने वाली खांसी आदि लक्षणों में रोगी को कोडिनम औषधि देने से लाभ मिलता है।
तुलना-
कोडिनम औषधि की तुलना ओपियम, एगारि, हायोसाय, अमोनि-ब्रोमे से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को कोडिनम औषधि की तीसरी शक्ति देने से लाभ होता है।
काफिया क्रूड़ा Coffea Cruda
काफिया क्रूड़ा औषधि शरीर के सारे अंगों की काम करने की ताकत को बढ़ाती है। ये औषधि उन लोगों के लिए भी बहुत लाभकारी साबित होती है जिनका शरीर दुबला-पतला होता है, जो झुककर चलते हैं, जिनका रंग सांवला होता है, जिन्हें हैजा जैसे रोग बहुत जल्दी घेर लेते हैं और जिनकी त्वचा भी बहुत नाजुक होती है।
विभिन्न प्रकार लक्षणों के आधार पर काफिया क्रूड़ा औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - मन का हमेशा खुश सा रहना, हर समय उत्तेजित सा रहना, ज्ञानेन्द्रियों की काम करने की ताकत बढ़ जाना, मन में हमेशा कोई न कोई बात चलते हुए रहना, किसी परेशानी के मारे रात भर करवटे सी बदलते हुए रहना आदि मानसिक रोगों के लक्षणो में रोगी को काफिया क्रूड़ा औषधि का उपयोग कराना काफी लाभकारी रहता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में दर्द होना जो किसी तरह की महक से, ज्यादा शोर-शराबे से, नशीले पदार्थों के सेवन से और तेज हो जाता है, खुली हवा में जाते ही सिर का दर्द बढ़ जाना, जरा सा भी शोर बर्दाश्त नहीं होता आदि लक्षणों के आघार पर रोगी को काफिया क्रूड़ा औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- सूखी गर्मी के साथ गालों का रंग बिल्कुल लाल होना, चेहरे में स्नायु का दर्द होना जो कान, दाढ़ी, माथे और खोपड़ी के हिस्सों में फैल जाता है आदि लक्षणों में रोगी को काफिया क्रूड़ा औषधि नियमित रूप से खिलाने से आराम मिलता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- दांत में दर्द होना, मुंह का स्वाद बहुत ज्यादा खराब हो जाना, भोजन करते समय बहुत ज्यादा जल्दबाजी करना आदि मुंह के रोग के लक्षण में रोगी को काफिया क्रूड़ा औषधि का प्रयोग कराना काफी लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - बहुत तेज भूख का लगना, पहने हुए कपडों का टाईट महसूस होना, शराब पीने से आमाशय में बहुत तेज जलन होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को काफिया क्रूड़ा औषधि देने से लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिकधर्म का समय से काफी पहले ही आ जाना और काफी दिनों तक स्राव का जारी रहना, मासिकधर्म दर्द के साथ आना, योनि का बहुत ही नाजुक हो जाना, उत्तेजना बढ़ाने वाली खुजली होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को काफिया क्रूड़ा औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण - रात को सोते समय नींद का न आना, पूरी रात करवटें बदल-बदलकर काट देना, अचानक चौंककर जाग जाना, रात को 3 बजे के बाद नींद आने पर भी कई बार नींद का टूटना, मलद्वार में खुजली होने के कारण रात भर नींद का न आना, मन में किसी तरह के विचारों की उथल-पुथल के कारण सो न पाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को काफिया क्रूड़ा औषधि प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - खसरे का रोग होने के बाद स्नायुविक प्रकृति और बहुत ही नाजुक मिजाज वाले बच्चों को थोड़ी-थोड़ी देर के बाद उठने वाली खांसी के लक्षणों के आधार पर रोगी को काफिया क्रूड़ा औषधि खिलाने से आराम आता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण - किसी तरह की खुशी मिलने पर या कोई शोक लगने पर दिल की धड़कन का बहुत ज्यादा तेज होना, नाड़ी की गति तेज और ज्यादा तनावपूर्ण होने के साथ पेशाब में रूकावट आना आदि लक्षणों में रोगी को काफिया क्रूड़ा औषधि देने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरीय अंगों से सम्बंधित लक्षण- टांग में स्नायु का दर्द होना जो किसी तरह की हरकत करने से, दोपहर के बाद और रात के समय तेज हो जाता है और दबाने से कम होता है आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को काफिया क्रूड़ा औषधि का प्रयोग कराने से आराम मिलता है।
प्रतिकूल-
पूरक-
वृद्धि-
बहुत ज्यादा खुशी मिलने से, खुली और ठण्डी हवा में, नशीली चीजों के सेवन से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्मी से, आराम करने से, शाम से आधी रात तक रोग कम हो जाता है।
तुलना-
काफिया क्रूड़ा औषधि की तुलना ऐकोन, कैमो, इग्ने और सल्फर के साथ की जा सकती है।
मात्रा-
काफिया क्रूड़ा औषधि की 3x से 200 शक्ति तक रोगी को किसी भी रोग के लक्षण के आधार पर देने से लाभ होता है।
सावधानी-
काफिया क्रूड़ा औषधि का उपयोग बूढ़े लोगों को बहुत कम करना चाहिए क्योंकि ये औषधि शरीर में यूरिक एसिड की मात्रा को बढ़ा सकती है, पेशियों और जोड़ों में दर्द लाती है और गुर्दों में सूजन लाती है।
काल्चिकम Colchicum
काल्चिकम औषधि को गठिया रोग के किसी भी दर्द को दूर करने में बहुत उपयोगी माना जाता है। इसके अलावा इस औषधि का पेशी-ऊतकों, अस्थि-आवरणों और जोड़ों की स्निग्ध झिल्लियों पर भी बहुत अच्छा असर पड़ता है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों में काल्चिकम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में दर्द होना, खासकर माथे और कनपटियों में, सिर के पीछे के हिस्से और गर्दन में दोपहर और शाम के समय बढ़ने वाला दर्द आदि लक्षणों में काल्चिकम औषधि का प्रयोग काफी अच्छा रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों में दर्द होना, आंखों की बाईं तरफ की पुतली का सिकुड़ जाना, दोनों आंखों से नज़र आने की शक्ति अलग-अलग होना, खुली हवा के अंदर आंखों से पानी बहुत ज्यादा मात्रा में आना, किसी बारीक काम को करते समय या पढ़ाई करने के बाद आंखों से धुंधला दिखाई देना, आंखों के सामने हर समय अजीब-अजीब सी चीजे नाचती हुई नज़र आना आदि लक्षणों में रोगी को अगर काल्चिकम औषधि सेवन कराई जाए तो काफी लाभकारी रहती है।
कान से सम्बंधित लक्षण - दोनों कानों में खुजली सी मचना, कान के त्रिकोणक उभार के नीचे बहुत ही तेज दर्द महसूस होना आदि लक्षणों में काल्चिकम औषधि का सेवन करना काफी अच्छा रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण - चेहरे की पेशियों में बहुत तेज दर्द सा होना, कानों के अंदर अजीब सी सरसराहट सी होना, गाल बिल्कुल लाल से, गर्म और पसीने में भीगे हुए से होना, जबड़े के दाएं तरफ के हिस्से के नीचे दर्द होना आदि लक्षण नज़र आने पर रोगी को अगर काल्चिकम औषधि सेवन कराई जाए तो लाभकारी होती है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - मुंह का हर समय सूखा हुआ सा लगना, जीभ में जलन होना, दांतों और मसूढ़ों में दर्द होना, बार-बार प्यास लगना, आमाशय में दर्द होना, भोजन की खुशबू से ही जी का खराब हो जाना, मुंह के अंदर लार का ज्यादा बनना, जो भी भोजन खाया जाए उसकी तुरन्त ही उल्टी हो जाना, आमाशय का बहुत ज्यादा ठण्डा महसूस होना, भूख बहुत तेज लगना लेकिन भोजन की खुशबू आते ही भूख मर जाती है।
कोलियस ऐरोमैटिकस Coleus Aromaticus
कोलियस ऐरोमैटिकस औषधि पुरुषों के सूजाक रोग, पेशाब के रोग में लाभकारी असर करती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों में कोलियस ऐरोमैटिकस औषधि का उपयोग-
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब का रुक-रुककर आना, पेशाब की नली में सूजन आना, सूजाक रोग के साथ ही पेशाब करते समय और पेशाब करने के बाद पेशाब की नली में जलन होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कोलियस ऐरोमैटिकस औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
मात्रा-
मूलार्क, 2x शक्ति।
कोरेल्लार्हिजा Coralaaorhiza
रोगी को टी.बी रोग में आने वाला बुखार जो सुबह के 9 से 10 बजे के बीच में आता है और आधी रात तक रहता है इस तरह के बुखार में कोरेल्लार्हिजा औषधि बहुत लाभकारी असर करती है। इसके अलावा हाथों की हथेलियों और तलुवों में जलन होना, प्यास का न लगना, ठण्ड का बहुत ज्यादा लगना, पसीना आना आदि में भी कोरेल्लार्हिजा औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
कार्बो वेजिटेबिलिस
कार्बो वेजिटेबिलिस औषधि को शरीर में किसी भी स्थान के बहते हुए खून को रोकने में सबसे लाभकारी औषधि माना जाता है। आमाशय, नाक, फेफड़े, आंतें, मूत्राशय अथवा शरीर की किसी भी श्लैष्मिक झिल्ली से खून बहने पर इस औषधि का इस्तेमाल करना लाभकारी होता है। इसी के साथ रोगी के घुटनों के नीचे का हिस्सा बिल्कुल ठण्डा पड़ जाना, रोगी को बिल्कुल अचेत अवस्था में पड़े रहना, नाड़ी का धीरे-धीरे चलना, हाथ-पैरों में पसीना आना, रोगी को महसूस होना कि उसके जीवन की आखिरी घड़ी आ गई है आदि लक्षण नज़र आने पर अगर कार्बो वेजिटेबिलिस औषधि का प्रयोग सही तरीके से किया जाए तो रोगी के लिए बहुत लाभकारी रहता है। इसके अलावा खून का दौरा करने वाली पतली नाड़ियों में खून का बहाव बंद हो जाने के कारण शरीर का बिल्कुल नीला और ठण्डा पड़ जाना आदि लक्षणों के आधार पर भी अगर कार्बो वेजिटेबिलिस औषधि का इस्तेमाल किया जाए तो अच्छा रहता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कार्बो वेजिटेबिलिस का उपयोग-
रक्त प्रवाह से सम्बंधित लक्षण- खून की कोशिकाओं में खून का बहाव रुक जाना, नसों में सूजन आ जाना, शरीर का बिल्कुल नीला और ठण्डा पड़ जाना आदि लक्षणों में रोगी को कार्बो वेजिटेबिलिस औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- पेट में गैस भरने के कारण सीने में गैस चढ़ जाने के कारण दर्द होना, रोगी को शरीर में गर्मी महसूस होना, ऑक्सीजन की जरूरत पड़ जाना, खून की कमी हो जाना, रोगी को बहुत से रोग लग जाना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्बो वेजिटेबिलिस औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
दांत से सम्बंधित लक्षण- दांतों में से खून का निकलना, दांतों का हिलना, रोगी को ठण्डा पसीना आना, जीभ का बिल्कुल ठण्डा पड़ जाना आदि लक्षणों में कार्बो वेजिटेबिलिस औषधि का सेवन करना लाभकारी रहता है।
पाचनशक्ति से सम्बंधित लक्षण- टी.बी रोगियों का रोग पूरी तरह से ठीक हो जाने के बाद भी किसी व्यक्ति के शरीर में कोई न कोई परेशान करने वाला रोग होना, पाचन शक्ति का कमजोर हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को कार्बो वेजिटेबिलिस औषधि देने से लाभ मिलता है।
श्लैष्मिक झिल्ली- श्लैष्मिक झिल्लियों में कोई जख्म हो जाने के कारण खून बहना, सड़न पैदा हो जाना, खून ज्यादा बह जाने के कारण श्लैष्मिक झिल्लियों के बहुत से दूसरे रोग लग जाना आदि में रोग को कार्बो वेजिटेबिलिस औषधि देने से लाभ होता है।
कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम Carconeum Sulphuratum
किसी व्यक्ति के ज्यादा नशा करने के कारण उसका शरीर खराब होने में, मांसपेशियों के कमजोर हो जाने पर, ठण्ड न बर्दाश्त कर पाना, त्वचा और श्लैष्मिका झिल्लियों का सुन्न पड़ जाना आदि रोगों के लक्षणों के आधार पर कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम बहुत ही असरदार तरीके से काम करती है। इसके अलावा थोड़े-थोड़े समय के बाद दस्त हो जाना, टी.बी. रोग, शरीर के अंग सुन्न हो जाना आदि में भी ये औषधि लाभकारी होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- ज्यादा नींद आना या नींद न आना, रोगी का चिड़चिड़ा हो जाना, याददाश्त का कमजोर हो जाना, पागलपन आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में दर्द होना, चक्कर आना, सिर का भारी होना आदि सिर के रोग के लक्षण नज़र आने पर कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि का सेवन करने से आराम आता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों के सामने अंधेरा छा जाना, दूर ही चीज साफ न दिखाई पड़ना, किसी रंग की सही तरह से पहचान न कर पाना, आंखों के सामने अजीब-अजीब सी चीजें नज़र आना आदि आंखों के रोग के लक्षण प्रकट होते ही रोगी को तुंरत कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि का सेवन कराना चाहिए, इससे कुछ ही समय में आंखों की हर तरह की परेशानी से छुटकारा मिल जाता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- कानों से कम सुनाई देना, साफ तरह से न सुन पाना, कानों में अजीब-अजीब सी आवाजें आना आदि कान के रोगों के लक्षणों में रोगी को कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- पेट में अलग सी तरह का दर्द होना, सूजन आना, पेट का फूलना, पेट में से अजीब सी आवाजें आना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि बहुत ही लाभ करती है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण- किसी व्यक्ति का संभोग क्रिया करने का बिल्कुल मन न करना, लिंग का सिकुड़कर छोटा हो जाना, अपने आप ही वीर्य निकल जाना आदि पुरुष रोगों के लक्षण नज़र आते ही रोगी को कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि का सेवन कराना चाहिए। इससे कुछ ही समय में पुरुष रोग के सारे लक्षण समाप्त हो जाते हैं।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- त्वचा का एकदम सुन्न पड़ जाना, जलन होना, खुजली मचना, त्वचा पर छोटे-छोटे से दाने होना जो कुछ समय के बाद फैलकर जख्म बन जाना आदि चर्मरोगों में कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि बहुत लाभ करती है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- हाथ-पैरों में बहुत तेज दर्द होना, शरीर के अंगों का ऐंठना, हाथ और बाजू का सुन्न हो जाना, उंगलियों का सूज जाना, चलने-फिरने में परेशानी होना आदि लक्षणों में रोगी को कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि का सेवन कराने से जल्द ही आराम आ जाता है।
वृद्धि-
खुली हवा में कमी, सुबह के समय नाश्ता करने के बाद, स्नान करने के बाद बढ़ना, गर्म, तर मौसम के प्रति संवेदनशील।
तुलना-
पोटास एक्सेन्टेट (पोरस एक्सर्नेर) क्रिया में बराबर। याददाश्त का कमजोर हो जाना, नपुंसकता और बुढ़ापा में कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम की तुलना टुबरकुलीनम, रेडियम, कार्बो, सल्फर, कॉस्टिकम, सैलीसिलिक एसिड, सिनकोना से की जा सकती है। आंखों के रोगों में कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम की तुलना वेनजिन डिनिट्रिक, थायरायडीन से की जाती है।
मात्रा-
कार्बोनियम सल्फ्यूरेटम औषधि की पहली शक्ति रोगी को देने से उसका रोग ठीक हो जाता है।
कोर्नस सर्सीनाटा Cornus Circinata
कोर्नस सर्सीनाटा औषधि का पुराना मलेरिया का रोग, पीलिया, जिगर की सूजन, सुबह उठने के बाद शरीर में कमजोरी महसूस होना, छालेदार फुंसियां, मुंह में जख्म, आमाशय, मुंह और गले में जलन, मल पतला तथा हवा के साथ आना, खाना खाते ही मलद्वार में खुजली होना आदि लक्षणों के आधार पर सेवन कराने से लाभ होता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कोर्नस सर्सीनाटा औषधि का उपयोग-
मुंह से सम्बंधित लक्षण- मुंह, जीभ और मसूढ़ों में जख्म होना, छाले निकलना, मुंह, आमाशय, गले और मुंह में जलन होना आदि लक्षणों में रोगी को कोर्नस सर्सीनाटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
मल से सम्बंधित लक्षण- मल, पतला पानी के रूप मे आना हवा के साथ निकलना, मल का रंग गहरा होना, खाना खाते ही मलद्वार में जलन होना, मल गहरे रंग का, बदबू के साथ आना, चेहरे का रंग पीला पड़ जाना आदि लक्षणों में रोगी को कोर्नस सर्सीनाटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- बच्चों के चेहरे पर छालेदार छाजन होना, मां का दूध पीने वाले बच्चों के मुंह में छाले होना आदि लक्षणों में रोगी को कोर्नस सर्सीनाटा औषधि देने से लाभ मिलता है।
तुलना-
कोर्नस सर्सीनाटा औषधि की तुलना कार्नस आस्टर, नोफोलिया, कार्नस फ्लोरिडा से की जा सकती है।
मात्रा-
कोर्नस सर्सीनाटा औषधि का मूलार्क और 6 शक्ति तक रोगी को देने से लाभ होता है।
कोरिडेलिस (डाइसेण्ट्र कैनाडेन्सिस) Corydalis (Dicentra)
गर्मी के कारण होने वाले रोग, मुंह और गले के अंदर के छाले, कैंसर का रोग बढ़ जाने के कारण आने वाली कमजोरी, आतशक के जख्म, जीभ साफ, चौड़ी और भरी हुई, आमाशयिक नजला आदि रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को कोरिडेलिस औषधि देने से लाभ होता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में कोरिडेलिस औषधि का उपयोग-
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- बूढ़े व्यक्तियों के चेहरे पर झुर्रियां, छोटी-छोटी फुंसियां निकलना, लसीकाग्रंथि में सूजन आना आदि चमड़ी के रोगों के लक्षणों में रोगी को कोरिडेलिस औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
तुलना-
नाइट्रि-एसिड, काली-आयोड, फ्लोरिक-एसिड आदि से कोरिडेलिस औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
मूलार्क लगभग 20 बूंदों की मात्रा के रूप में दिन में 3 बार सेवन करना चाहिए।
कोटिलिडन Cotyledon
कोटिलिडन औषधि दिल के लिए सबसे ज्यादा असरकारक मानी जाती है। व्यक्ति की पेशियों और तंतु-ऊतक (फाइब्रोस) के अचानक सुन्न होने के साथ लगातार दर्द होना, वक्ष (स्तन) रोध (ऑप्रेशन ऑफ चेस्ट), गला भरा हुआ सा लगना, मिर्गी आना, स्त्री के स्तनों में से दर्द शुरू होकर कंधे के जोड़ों तक चले जाना आदि लक्षणों में भी ये औषधि बहुत ज्यादा लाभ करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कोटिलिडन औषधि का इस्तेमाल-
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में अचानक तेज दर्द होना, रोगी का हर समय किसी परेशानी में खोए रहना, सुबह उठने के बाद आवाज का साफ-साफ न निकल पाना, शरीर के किसी भी एक भाग का ऐसा लगना कि वह नहीं है आदि सिर के रोगों के लक्षणों में कोटिलिडन औषधि का इस्तेमाल करने से कुछ ही समय में लाभ हो जाता है।
वक्ष (स्तन) से सम्बंधित लक्षण- स्त्री के कंधे के कोणों के नीचे दर्द होना, दाएं स्तन में हर समय दर्द रहना, स्तनों के निप्पलों में दर्द होना, दिल में अचानक भारीपन लगना, दम घुटना आदि स्तन रोगों के लक्षणों में कोटिलिडन औषधि बहुत ज्यादा लाभ करती है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- त्वचा पर छोटे-छोटे से बारीक दाने निकल आना, कमर तथा शरीर के हर जोड़ में दर्द होना, टांगों में तथा बाजुओं में दर्द सा होना आदि लक्षण प्रकट होने पर रोगी को तुरंत ही कोटिलिडन औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
तुलना-
कोटिलिडन औषधि की तुलना अम्बरा, एसाफीटिडा, टेपाटिका, इग्ने, लैकेसिस से की जाती है।
मात्रा-
कोटिलिडन औषधि का मूलार्क या 3 शक्ति तक रोगी को देने से लाभ होता है।
क्रैटिगिस Craraegus
सिर का घूमना, नाड़ी का रुक-रुककर चलना, खून का दबाव कम होना आदि लक्षणों में क्रैटिगिस औषधि बहुत लाभकारी होती है। इसके अलावा, दिल की पेशियों की जलन, दिल का सही तरीके से काम न करना, नींद न आना, खून की कमी होना, त्वचा का ठण्डा होना आदि लक्षणों में भी यह औषधि अच्छा काम करती है।
दिल के पुराने रोग जिसमें रोगी बहुत ज्यादा कमजोर हो जाता है, दिल का रुक-रुककर धड़कना, सिर के पीछे के हिस्से में दर्द होना, आंतों से खून आना, हाथ-पैर ठण्डे होना, शरीर का पीला होना, सांस और नाड़ी का सामान्य तरीके से न चलना, कंधे के नीचे, छाती के बायें हिस्से में दर्द होना आदि के लक्षणों में ये औषधि सही तरीके से काम करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में क्रैटिगिस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर के पीछे के हिस्से और गर्दन में दर्द होना, याददाश्त का कमजोर होना, बहुत ज्यादा स्नायविक और चिड़चिड़ा होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्रैटिगिस औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- बच्चों को होने वाले मधुमेह, पसीना ज्यादा आना आदि लक्षणों में क्रैटिगिस औषधि का नियमित रूप से सेवन कराने से बच्चों का मधुमेह रोग ठीक हो जाता है।
हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण- दिल में पानी भरना, महाधमनी के रोग, थोड़ा सा दूर चलते ही या थोड़ा सा वजन उठाते ही सांस का फूल जाना, खांसी होना, दिल का फैला हुआ लगना, नाड़ी का तेज चलना, कमजोरी, त्वचा ठण्डी होना, हाथ-पैरों की उंगलियों का रंग पीला पड़ जाना आदि लक्षणों में रोगी को क्रैटिगिस औषधि देने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- त्वचा पर पसीना ज्यादा आना, छोटे-छोटे से दाने होना आदि चर्मरोगों में रोगी को क्रैटिगिस औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
वृद्धि-
गर्म घर में रहने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
ताजी हवा में, शांति में, आराम करने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
क्रैटिगिस औषधि की तुलना स्ट्रोफैन्थस, डिजिटै, आइबेरिस, नैजा, कैक्टस आदि से की जाती है।
मात्रा-
मूलार्क 1 से 15 बूंद।
जानकारी-
अगर अच्छा परिणाम पाना हो तो कुछ समय तक लगातार इस औषधि को लेते रहना चाहिए।
क्यूफिया Cuphea
शरीर के अंदर भोजन के पचने के कारण उल्टी होना, बच्चों के बार-बार हरे रंग के पतले और अम्ल गंध वाले दस्त, मरोड होने के साथ भारी दर्द, तेज बुखार, बैचैनी, नींद न आना, मुश्किल कब्ज आदि रोगों के लक्षणों में क्यूफिया औषधि काफी लाभकारी साबित सिद्ध होती है।
तुलना-
क्यूफिया की तुलना एथूजा, कोटो, टिफा लैटिफोलिया आदि से की जाती है।
मात्रा-
मूलार्क या पहली शक्ति।
क्यूप्रम असेटिकम CUPRUM ACETICUM
किसी रोगी को परागज बुखार आने पर शरीर की खाल उतरना, जिसमें जलन भी होती है, तेज खांसी के साथ चिपचिपा सा बलगम आना, दम सा घुटना, प्रसव वेदना (लेबर पैन) का काफी समय तक होना, चमड़ी के रोग कोढ़ आदि लक्षणों में क्यूप्रम असेटिकम औषधि बहुत ज्यादा लाभकारी साबित होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर क्यूप्रम असेटिकम औषधि का इस्तेमाल-
सिर से सम्बंधित लक्षण- किसी व्यक्ति में अगर सिर के रोग के ये लक्षण जैसे- माथे का बहुत तेज गर्म होना, सिर में सुई के चुभने जैसा दर्द होना, बाईं भौं के ऊपर दर्द होना, दिमाग का खाली लगना, बेहोशी छा जाना, स्नायुशूल के साथ सिर का भारी लगना, जलन होना आदि लक्षणों में रोगी को क्यूप्रम असेटिकम औषधि देने से लाभ होता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- चेहरे पर बिल्कुल चमक न होना, चेहरे का पीला और मुरझाया हुआ सा लगना, गाल की हड्डी के ऊपर और दाएं कान के पीछे स्नायूशूल आदि लक्षणों में क्यूप्रम असेटिकम औषधि का सेवन करने से आराम आता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - रोगी को आमाशय और पेट में बहुत तेज दर्द उठना, उल्टी होना, चिकने, भूरे रंग का दस्त होना, हैजा आदि लक्षण नज़र आते ही क्यूप्रम असेटिकम औषधि देने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - शरीर में उत्तेजना बढ़ने पर दिल में दर्द होना, बलगम के साथ तेज खांसी होना, दम सा घुटना, सांस लेने में परेशानी आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्यूप्रम असेटिकम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - शरीर पर कोढ़ के जैसे जख्म पैदा होना जिनके अंदर खुजली नहीं होती आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को क्यूप्रम असेटिकम औषधि देने से आराम आता है।
वृद्धि-
भावप्रवणता से, छूने से बढ़ना, चबाने, दबाने, रात को दर्द वाले भाग का सहारा लेकर लेटने से रोग बढ़ता है।
शमन-
गरमाई से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
क्यूप्रम असेटिकम औषधि क्यूप्रम मेटालिकम की तरह ही काम करती है, लेकिन इसका असर बहुत ज्यादा होता है।
मात्रा-
रोगी को क्यूप्रम असेटिकम औषधि की तीसरी से छठी शक्ति तक देने से लाभ होता है।
कूप्रम आर्सेनिकम
विभिन्न रोगों के लक्षणों में कूप्रम आर्सेनिकम औषधि का उपयोग-
पेट से सम्बंधित लक्षण- पेट में ऐंठन होना, मरोड़ उठने के साथ पूरे शरीर का ठण्डा पड़ जाना, चेहरे का बिल्कुल सूख जाना, बिल्कुल पतले दस्त और उल्टी आना आदि लक्षणों में रोगी को कूप्रम आर्सेनिकम औषधि देने से लाभ मिलता है।
गुर्दे से सम्बंधित लक्षण- गुर्दों का कमजोर हो जाना, पेशाब के रोग होना, गर्भावस्था के दौरान स्त्री के गुर्दों में जलन होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कूप्रम आर्सेनिकम औषधि देने से लाभ मिलता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- भोजन की नली से लेकर पेट और मुंह तक जलन होना, बहुत तेज प्यास लगना, हिचकियों का बार-बार आना, आमाशय में बहुत तेज जलन होना आदि लक्षणों में रोगी को कूप्रम आर्सेनिकम औषधि का प्रयोग कराने से आराम मिलता है।
वृद्धि-
भोजन करने के बाद, रोजाना एक ही समय पर रोग बढ़ जाता है तथा जोर से दबाने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
कूप्रम आर्सेनिकम की तुलना एको, आर्स, बेल, कैम्फ, कूप्रम, डायस्को, काली-फा, लैके, लायको, मर्क-का, नक्स-वोमिका, ओपिसफास, प्लम्ब, सिके, सल्फ और वेरेट्रम से तुलना की जा सकती है।
क्यूप्रम आर्सेनिटम Cuprum Arsenitum
क्यूप्रम आर्सेनिटम औषधि आंतों के रोग, साधारण दस्त, बच्चों को होने वाले दस्त, खूनी दस्त आदि रोगों में काफी जल्दी असर करती है। इसके अलावा इन्फ्लुएंजा और टायफाइड जैसे रोग जो गुर्दों और मसानों में उनके सही तरह से काम न कर पाने के कारण या खून में जहर फैल जाने से पैदा होते है, में भी ये औषधि काफी लाभकारी सिद्ध होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में क्यूप्रम आर्सेनिटम का उपयोग-
मुंह से सम्बंधित लक्षण- जीभ पर परत के रूप में मैल का जम जाना, मुंह का स्वाद कड़वा होना, बार-बार प्यास लगना, मुंह का सूख जाना आदि लक्षणों के आधार पर क्यूप्रम आर्सेनिटम औषधि का उपयोग करना लाभकारी रहता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण- अंडकोषों पर बहुत ज्यादा पसीना आना जिसके कारण अंडकोषों हर समय गीले से लगते है, अंडकोषों पर फोड़े निकलना, पेशाब के रास्ते से सफेद रंग का स्राव सा होना, पेशाब की नली में जलन होना, पु:रस्थग्रंथि, में दर्द होना, लिंग में बहुत तेज दर्द सा होना आदि लक्षणों में रोगी को क्यूप्रम आर्सेनिटम औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- त्वचा का बिल्कुल ठण्डा हो जाना, त्वचा के सूखने पर भी पसीना निकलना, रुक-रुककर आने वाला ठण्डा पसीना, चेहरे पर मुहांसे निकलना, जांघों और जननेन्द्रियों पर फुंसियां निकलना आदि लक्षणों के आधार पर क्यूप्रम आर्सेनिटम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - रोजाना आधी रात के बाद पिंडलियों में ऐंठन का बढ़ जाना, जब तक बिस्तर पर पड़े रहे तब तक बिल्कुल आराम नहीं मिलता और बिस्तर पर से उठते ही आराम आ जाना, चेहरे पर मुहांसे, जांघों तथा जननेन्द्रियों पर फुंसिया हो जाने जैसे लक्षणों में रोगी को क्यूप्रम आर्सेनिटम औषधि देने से आराम मिलता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- गुर्दों का कमजोर हो जाना, पेशाब के साथ धातु का आना, पेशाब करते समय बहुत तेज बदबू मारना, पेशाब में शक्कर का आना, पेशाब में एसिटोन और डायासेटिक एसिड की मात्रा का बढ़ जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्यूप्रम आर्सेनिटम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- छाती का भारी सा लगना, चलने में परेशानी होना, कमर और बाएं कंधे के जोड़ के नीचे के हिस्से में दर्द सा महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को क्यूप्रम आर्सेनिटम औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- पेट में बहुत तेज दर्द होना, फेफड़ों में टी.बी होने के साथ दस्त लगना, हैजा होना, पानी जैसे और गहरे रंग के दस्त आना जैसे लक्षणों के किसी व्यक्ति में नज़र आने पर तुरंत ही क्यूप्रम आर्सेनिटम औषधि का सेवन कराना लाभकारी होता है।
तुलना-
क्यूप्रम आर्सेनिटम औषधि की तुलना एको, आर्स, बेल, कैम्फ, कूप्रम, डायस्को, काली-फा, लैके, लायको, मर्क-का, नक्स-वोमिका, ओपिसफास, प्लम्ब, सिके, सल्फ और वेरेट्रम से तुलना की जा सकती है।
वृद्धि-
किसी भी चीज को खाने या पीने के बाद, रोजाना एक ही समय पर, दस्त के समय रोग बढ़ जाता है
शमन-
जोर से दबाने से रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
क्यूप्रम आर्सेनिटम औषधि की 3 शक्ति से 6 शक्ति तक रोगी को लक्षणों के आधार पर देने से लाभ होता है।
चिमाफिला अम्बेलाटा Chimaphila Umbellata
चिमाफिला अम्बेलाटा औषधि गुर्दों, पेशाब करने की जगह और जननेन्द्रियों, लसीका ग्रंथियों पर बहुत अच्छा असर डालती है। जिन स्त्रियों को बड़े स्तन होने की परेशानी होती है उनके लिए ये औषधि अच्छा असर करती है। जिगर और गुर्दों में पानी भरना, मोतियाबिंद आदि रोगों में लाभकारी होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर चिमाफिला अम्बेलाटा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर के बाएं हिस्से में दर्द होना, चक्कर आना, पलकों में खुजली होना, हर समय आंखों में से आंसू निकलते रहना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को चिमाफिला अम्बेलाटा औषधि देने से लाभ होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण - भोजन करने के बाद दांतों में बहुत तेज दर्द होना, ठण्डे पानी के असर से दर्द का कम होना, दांतों के निकलने जैसा दर्द महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को चिमाफिला अम्बेलाटा औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब का कम आना लेकिन बार-बार पेशाब आना, पेशाब के साथ, गंदा, बदबूदार, खून मिला हुआ स्राव आना, पेशाब करते समय बहुत तेज जलन होना, पेशाब करते समय ज्यादा जोर लगाना, पेशाब के साथ चीनी आना जैसे मूत्ररोग के लक्षणों में रोगी को चिमाफिला अम्बेलाटा औषधि देने से आराम आता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - योनि में जलन, दर्द, सूजन आना, स्तनों में फोड़ा होना, बदबूदार स्राव आना, स्तनों का बड़ा होना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में चिमाफिला अम्बेलाटा औषधि का सेवन नियमित रूप से करने से लाभ होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - पेशाब करने के रास्ते में जलन होना, पुराना सुजाक रोग, पु:रस्थ ग्रंथि का बढ़ जाना आदि पुरुष रोगों के लक्षणों में चिमाफिला अम्बेलाटा औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - घुटने पर इस तरह का दर्द होना जैसे कि किसी ने बहुत कसकर घुटने को बांध रखा हो आदि लक्षणों में रोगी को चिमाफिला अम्बेलाटा औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
वृद्धि-
सर्दियों के मौसम में, ठण्डे पत्थर पर या ठण्डी जगह पर बैठने से, शरीर के बाएं भाग में बढ़ना।
तुलना-
चिमाफिला अम्बेलाटा की तुलना चिमाफिला मैक्यूलेटा, ऊवाउर्सी, लीडम, इपीजिया से की जाती है।
मात्रा-
चिमाफिला अम्बेलाटा Q और चिमाफिला अम्बेलाटा X का प्रयोग किया जा सकता है।
चेनोपोडियम अन्थेलमिण्टिकम Chenopodium Anthelmainticum
चेनोपोडियम अन्थेलमिण्टिकम औषधि कंधे के दर्द के लिए बहुत ही लाभकारी औषधि मानी जाती है। इसके अलावा सिर का घूमना, शरीर के आधे हिस्से में लकवा मारना, आवाज खराब होना, गला घड़घड़ाना, कान की खराबी के कारण आने वाला चक्कर आदि लक्षणों मे भी ये औषधि अच्छा असर दिखाती है।
विभिन्न प्रकार के ल़क्षणों में चेनोपोडियम अन्थेलमिण्टिकम औषधि का उपयोग-
पीठ से सम्बंधित लक्षण - रीढ़ की हड्डी के पास दाएं कंधे के जोड़ में बहुत तेज दर्द जो छाती के पार चला जाता है जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को चेनोपोडियम अन्थेलमिण्टिकम औषधि देने से आराम पड़ जाता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब का बहुत ज्यादा मात्रा में आना, पेशाब पीला, झागदार आना, पेशाब की नली में जलन होना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को चेनोपोडियम अन्थेलमिण्टिकम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - सामने वाले व्यक्ति की आवाज साफ तरह से न सुनाई देना, बहुत तेज आवाज होने पर सुनाई पड़ना, कान के सुनने की नाड़ी का कमजोर होना, हल्की आवाज से शरीर में कंपकंपी होना, कान में किसी तरह की खराबी होने के कारण सिर में चक्कर आना आदि कान के रोगों के लक्षणों में रोगी को चेनोपोडियम अन्थेलमिण्टिकम औषधि नियमित रूप सेवन कराने से लाभ होता है।
तुलना-
चेनोपोडियम अन्थेलमिण्टिकम औषधि की तुलना ओपियम, चाइना, चेलिडो से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को उसके रोग के लक्षणो के आधार पर चेनोपोडियम अन्थेलमिण्टिकम औषधि की 3 शक्ति तक देना बहुत उपयोगी होता है।
जानकारी-
रोगी को अंकुश कृमि (कीड़ों) के लिए चेनोपोडियम के तेल की 10 बूंदों की एक मात्रा बनाकर हर 2-2 घंटों के बाद रोजाना 3 बार देनी चाहिए।
चेनोपोडी ग्लौसी एफिस Chenopodi Glauci aphis
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर चेनोपोडी ग्लौसी एफिस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - धीरे-धीरे होने वाला सिरदर्द जो जरा सा भी हिलने-डुलने से बढ़ता रहता है, जुकाम के साथ नाक के नथुनों में जलन या दर्द होना, कानों के अंदर बहुत तेज आवाजें सुनाई देना, चेहरा पीला पड़ जाना, दांत में दर्द जो कानों, कनपटियों और गाल की हडि्डयों में फैल जाता है आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को चेनोपोडी ग्लौसी एफिस औषधि देने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - रोटी और मांस को देखकर ही भूख समाप्त हो जाना, जीभ की नोक पर छाले निकलना, पेट में दर्द के साथ अजीब-अजीब सी आवाजें आना आदि आमाशय रोग के लक्षणों में चेनोपोडी ग्लौसी एफिस औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
मल से सम्बंधित लक्षण - मल सख्त और गांठदार आना, सुबह मलत्याग की क्रिया के समय बहुत तेज दर्द होना, मलद्वार में जलन होना तथा मलान्त्र और पेशाब की नली में दबाव पड़ना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को चेनोपोडी ग्लौसी एफिस औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - लिंग के मुंह पर बहुत ज्यादा उत्तेजना होना, पेशाब की नली में जलन होना, पेशाब का बार-बार आना तथा झाग के साथ आना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को चेनोपोडी ग्लौसी एफिस औषधि देने से लाभ मिलता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण - कंधे के दाएं तरफ के जोड़ के अंदर बहुत तेज दर्द जो कुछ समय के बाद छाती में पहुंच जाता है जैसे लक्षणों में चेनोपोडी ग्लौसी एफिस औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण - पूरे शरीर में कंपकंपी के साथ ठण्ड लगना, हथेलियों में जलन होना, बिस्तर में सोने पर गर्म पसीना आदि बुखार के लक्षणों में रोगी को चेनोपोडी ग्लौसी एफिस औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक रहता है।
तुलना-
चेनोपोडी ग्लौसी एफिस की तुलना नेट्रम-सल्फ्यू, नक्स से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को चेनोपोडी ग्लौसी एफिस औषधि की छठी से तीसवीं शक्ति तक देने से लाभ होता है।
चेलोन Chelon
चेलोन जिगर के रोगों के लिए एक बहुत ही लाभकारी औषधि है। जिगर के बाएं भाग में दर्द होना, मलेरिया, बाहरीय अंगों में दर्द होना, कमजोरी, बुखार आने के बाद की कमजोरी, जिगर के कमजोर होने के कारण भूख न लगना, पीलिया आदि लक्षणों में भी ये औषधि बहुत असरदार काम करती है।
मात्रा-
मूलार्क 1 बूंद से 5 बूंद तक।
चियोनैंथस Chinanthus
चियोनैथस औषधि हर प्रकार के सिर के दर्दों जैसे स्नायविक, नियतकालिक, मासिकधर्म सम्बंधी, पैत्तिक आदि में काम आती है। अगर कुछ सप्ताह तक इस औषधि को नियमित रूप से बूंदों के रूप में रोगी को दिया जाए तो रोजाना परेशान करने वाला सिर का दर्द दूर हो जाता है। इसके अलावा जिगर के रोग जैसे- पीलिया, प्लीहा (तिल्ली) का बढ़ जाना और जिगर के बहुत से रोगों के लक्षणों में ये औषधि बहुत लाभकारी साबित होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर चियोनैथस औषधि का उपयोग-
जीभ से सम्बंधित लक्षण - जीभ का फैल जाना, जीभ पर पीले रंग की परत सी जम जाना आदि जीभ के रोगों के लक्षणों में रोगी को चियोनैथस औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण - मुंह का बिल्कुल सूखा हुआ सा लगना, बार-बार पानी पीने के बाद भी मुंह का सूखना, बहुत ज्यादा मात्रा में लार का गिरना आदि मुंह के रोगों के लक्षणों में चियोनैथस औषधि का सेवन अच्छा असर करता है।
पेट और जिगर से सम्बंधित लक्षण - नाभि के आसपास के भाग में हल्का-हल्का दर्द होना और मरोड़े उठना, कब्ज और पीलिया का रोग होना, मल का चिकना और मैले से रंग का आना, भूख न लगना, क्लोमग्रंथि और दूसरी ग्रंथियों के रोग आदि पेट और जिगर के रोगों के लक्षणों में रोगी को चियोनैथस औषधि नियमित रूप से देने से आराम आता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब का बार-बार आना, पेशाब का रंग गाढ़ा सा होना, पेशाब के साथ चीनी और पित्त आना आदि पेशाब के रोगों के लक्षण नज़र आते ही रोगी को चियोनैथस औषधि देने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा का रंग पीला होना, त्वचा पर खुजली होना, त्वचा मैली सी लगना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को चियोनैथस औषधि खिलाने से लाभ होता है।
तुलना-
चियोनैथस औषधि की तुलना सिनकोना, सियानौथ, चेलिडो, कार्डूअस, पोडो, लेण्टैण्ड्रा से की जा सकती है।
मात्रा-
मूलार्क और प्रथम शक्ति का विचूर्ण।
चिनिनम आर्सेनिक Chininum Arsenic
चिनिनम आर्सेनिक औषधि को होम्योपैथिक चिकित्सा के मुताबिक एक प्रकार का टॉनिक या ताकत बढ़ाने की औषधि माना गया है। अगर किसी व्यक्ति को पुराने मलेरिया के बुखार के लक्षण, दमा और खांसी के लक्षण आदि अपने शरीर में नज़र आते हैं जिसके कारण वह कमजोर हो जाता है तो उस व्यक्ति को नियमित रूप से चिनिनम आर्सेनिक का सेवन कराने से बहुत लाभ होता है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर चिनिनम आर्सेनिक औषधि के लाभ-
आंखों से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति के अचानक रोशनी में पहुंचने पर आंखों में दर्द हो जाना, आंखों के गोलकों में ऐंठन होना, आंखों के आगे अंधेरा सा लगना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में चिनिनम आर्सेनिक औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति की जीभ पर पीली मोटी सी चिपचिपी सी परत जम जाना, मुंह का स्वाद एकदम खराब हो जाना, भूख न लगना आदि लक्षणों में रोगी व्यक्ति को चिनिनम आर्सेनिक औषधि का सेवन कराने से आराम आता है और भूख भी खुलकर लगने लगती है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - अचानक सिर पर बहुत वजन सा महसूस होना, चक्कर आना, माथे और सिर के पीछे के हिस्से में हल्का-हल्का सा दर्द होना, सूर्य की ओर देखने से होने वाला सिर का दर्द आदि सिर के रोगों के लक्षण सामने आने पर रोगी को तुरन्त ही चिनिनम आर्सेनिक औषधि का सेवन कराने से कुछ ही समय में सिर के सारे रोग दूर हो जाते हैं।
हृदय से सम्बंधित लक्षण - अचानक महसूस होना जैसे कि दिल की धड़कन रुक गई है, दम सा घुटना, खून का बहाव एकदम से कम हो जाना, थोड़ी दूर चलते ही सांस फूलने लगना आदि हृदय (दिल) रोगों के लक्षणों में रोगी को चिनिनम आर्सेनिक औषधि का सेवन कराने से कुछ ही समय में आराम पड़ जाता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - आमाशय रोग के इस तरह के लक्षण नज़र आने पर जैसे पेट में महसूस हो कि कभी तो गैस बहुत ज्यादा बढ़ गई है और कभी अचानक पेट हल्का सा लगे, प्यास बार-बार लगे, भूख न लगे आदि में रोगी को चिनिनम आर्सेनिक औषधि का सेवन नियमित रूप से कराना चाहिए। इस औषधि से कुछ ही दिनों में आमाशय के सारे रोग समाप्त हो जाते हैं।
बुखार से सम्बंधित लक्षण - बुखार के लक्षण जैसे ठण्ड सी लगना, हाथ-पैरों में तेज दर्द होना, कमजोरी महसूस होना, किसी काम को करने का मन न करना आदि में रोगी को चिनिनम आर्सेनिक औषधि का सेवन कराना चाहिए।
तुलना-
चिनिनम की तुलना फेरम साइट्रिकम से की जा सकती है।
मात्रा-
चिनिनम औषधि की 2 या 3 शक्ति तक रोगी को देनी चाहिए।
चिनिनम आर्सेनिकोसम Chininum Arsenicosum
चिनिनम आसेनिकोसम औषधि को होम्योपैथी चिकित्सा के मुताबिक शरीर में ताकत बढ़ाने वाली औषधि माना जाता है। ये किसी भी रोग के कारण आई हुई कमजोरी को कुछ ही समय में दूर कर देती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों में चिनिनम आसेनिकोसम औषधि का उपयोग-
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों में जलन होना, जरा सी भी तेज रोशनी होते ही आंखें अपने आप बंद हो जाना, आंखों से गर्म-गर्म से आंसू निकलना, आंखों के आसपास हमेशा अजीब-अजीब सी चीजें नाचती हुई महसूस होना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में रोगी को चिनिनम आसेनिकोसम औषधि देने से लाभ मिलता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण - जीभ के ऊपर मोटी, चिपचिपी, पीली सी परत जमना, मुंह का स्वाद कड़वा होना, भूख न लगना आदि लक्षणों में चिनिनम आसेनिकोसम औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - रोगी को ऐसा महसूस होना जैसे कि उसके पेट में कभी तो गैस बिल्कुल ही नहीं है और कभी बहुत ज्यादा बढ़ गई है, बार-बार प्यास लगना, लेकिन पानी पीते ही परेशानी हो जाना, भूख का बिल्कुल न लगना, अण्डे खाने के बाद पतले दस्त चालू हो जाना आदि आमाशय रोग के लक्षणों में रोगी को चिनिनम आसेनिकोसम औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण - ऐसा महसूस होना जैसे कि दिल की धड़कन ने चलना बंद कर दिया हो, दम सा घुटना, सीढ़ियों पर चढ़ते समय सांस फूल जाना, दिल में किसी तरह के रोग के कारण सांस लेने में परेशानी होना, हर समय खुली हवा में बैठे रहने का मन करना आदि दिल के रोगों के लक्षणों में चिनिनम आसेनिकोसम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - शरीर के अंगों का कमजोर हो जाना, हाथ-पैर, घुटने और बाकी अंग ठण्डे हो, शरीर के अंगों में बहुत तेज दर्द हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को चिनिनम आसेनिकोसम औषधि देने से लाभ मिलता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण - हर समय शरीर में रहने वाला बुखार और उसके साथ ही शरीर में कमजोरी आना, शरीर का हमेशा टूटा-टूटा सा रहना, शरीर के सारे अंग ऐसे महसूस होना जैसे कि किसी काम के न हो आदि बुखार के लक्षणों में चिनिनम आसेनिकोसम औषधि का सेवन लाभकारी रहता है।
मन से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति का हर समय अकेले बैठे रहना, याददाश्त का कमजोर हो जाना, कभी चुपचाप और कभी बहुत ज्यादा उत्तेजित होना आदि लक्षणों में रोगी को चिनिनम आसेनिकोसम औषधि देने से लाभ मिलता है।
वृद्धि-
दोपहर से पहले, ऊपर देखने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
खुली हवा में, बिल्कुल तनकर बैठने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
चिनिनम आसेनिकोसम औषधि की तुलना एपिस, आर्स, चायना, लैके, लायको, नैट्र, फा, पल्स, सीपि और सल्फर से की जा सकती है।
मात्रा-
चिनिनम आसेनिकोसम औषधि रोगी को दूसरी तथा तीसरी शक्ति का विचूर्ण।
चिनिनम सल्फ्यूरिकम Chininum Sulphuricum
चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि मलेरिया के बुखार को दूर करने में बहुत ही प्रभावशाली मानी जाती है। किसी-किसी मामले में इस औषधि की एक ही मात्रा शरीर में पुराने से पुराने दबे हुए मलेरिया को बाहर निकाल देती है। इसके अलावा रीढ़ की हड्डी का कमजोर हो जाना, जोड़ों में नया-नया होने वाला गठिया, मलान्त्र की खुजली आदि रोगों में भी ये औषधि काफी असर करती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि का उपयोग-
रक्त से सम्बंधित लक्षण - रोगी के शरीर के अंदर खून में मौजूद लाल कणों का एकदम से ही कम हो जाना, खून में हीमोग्लोबिन की मात्रा का घट जाना, खून में से क्लोराइड पदार्थो का ज्यादा मात्रा में निकल जाना, खून के अंदर सफेद कणों का बढ़ जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि देने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - रोजाना दोपहर को माथे और कनपटियों में बहुत तेज दर्द शुरू हो जाना, मलेरिया रोग के कारण सिर में दर्द होना और चक्कर आना, कुछ देर खड़े रहने पर चक्कर आ जाना, आंखों से साफ दिखाई न देना आदि लक्षणों में रोगी को चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - कानों के अंदर अजीब-अजीब सी आवाजें होना, कानों से कम सुनाई देना, कानों में भिनभिनाहट होने के साथ कानों से सुनने की शक्ति का कम हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि देने से लाभ होता है।
मन से सम्बंधित लक्षण - रोगी का अपने आप ही हंसने लगना, कभी अकेले में बिल्कुल उदास सा बैठे रहना, अपने मन में अपने लिए बुरी-बुरी बातों का सोचना, बैठे-बैठे ही डर जाना, किसी भी बात को हमेशा दो तरह से सोचना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि देने से आराम मिलता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण - स्नायु का दर्द जो आंख के नीचे से शुरू होकर पूरी आंख में और उसके चारों ओर फैल जाता है, रोजाना एक ही समय पर दर्द शुरू होना, दबाने से आराम आ जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि का प्रयोग कराना लाभकारी रहता है।
रीढ़ की हड्डी से सम्बंधित लक्षण - रीढ़ की हड्डी के पीछे की पेशियां कमजोर हो जाना जिन पर दबाव पड़ने से दर्द शुरू हो जाता है, आखिरी गर्दन की पेशियों का बहुत मुलायम हो जाना, सिर और गर्दन तक दर्द का फैल जाना आदि लक्षणों में चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि का सेवन अच्छा रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब के साथ खून का आना, पेशाब का रंग गंदा, चिकना होना, बार-बार पेशाब का आना, पेशाब के साथ अन्न का आना, पेशाब में यूरिया की मात्रा का कम होना और फास्फोरिक एसिड के साथ ज्यादा मात्रा में पेशाब के साथ धातु और क्लोराइड का आना, शरीर के तापमान का साधारण से भी कम हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - रोशनी में आते ही आंखों का बंद हो जाना, आंखों से हर समय आंसू से निकलते रहना, आंखों के सामने हर वक्त अजीब-अजीब सी चीजें नाचते रहना आदि आंखों के रोगों के लक्षणो में रोगी को चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि देने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा पर झुर्रियां सी पड़ जाना, खुजली होना, त्वचा पर छोटी-छोटी नीले से रंग की फुंसियां या छाले निकलना, त्वचा का सुन्न हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि देने से आराम मिलता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण - भूख का न लगना, मुंह का स्वाद कड़वा होना, किसी भी तरह के अच्छे से अच्छे भोजन को देखते ही भूख का समाप्त हो जाना, मुंह से लार का ज्यादा गिरना, जी मिचलाना, हिचकी आना, सीने में जलन होना आदि लक्षणों के किसी भी रोगी में नज़र आने पर चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोजाना दोपहर के बाद अचानक रोगी को ठण्ड सी लगने लगना, ठण्ड के मौसम में शरीर की अलग-अलग नसों में दर्द के साथ सूजन आना, रोगी को गर्म कमरे में बैठने पर भी ठण्ड सी महसूस होना, शरीर के तापमान का सामान्य से नीचे गिर जाना, बार-बार प्यास का लगना, पूरे शरीर में काफी पसीना आना आदि लक्षणों के किसी व्यक्ति में नज़र आने पर चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
तुलना -
चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि की तुलना चिनिनम सैलीसिल, आर्से, यूपाटोरियम, मेथिलीन ब्लू, कैम्फर-मोनो, ब्रोमाइड से की जा सकती है।
प्रतिविष -
पार्थोनम, नेट्रम म्यूरि, लैके, आर्निका, पल्सा आदि होम्योपैथिक औषधियों का उपयोग चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
मात्रा -
चिनिनम सल्फ्यूरिकम औषधि की 1 से 3 शक्ति का विचूर्ण, 30 शक्ति का विचूर्ण तथा ऊंची शक्तियां भी।
वृद्धि -
छूने से, ओढ़ने से बहुत ज्यादा पसीना निकलता है।
चियोनैन्थस वर्जिनिका Chionanthus Virginica
चियोनैन्थस वर्जिनिका औषधि जिगर के रोगों के लिए बहुत ही ज्यादा प्रभावशाली मानी जाती है। जिगर और जिगर की शिराओं पर इसकी मुख्य क्रिया होती है। किसी व्यक्ति को जिगर बढ़ने का रोग होने पर उसके लक्षणों के रूप में उसे कब्ज, गंदा, गर्म, पीले रंग का मल, पेशाब ज्यादा पीला आना, गर्मी के दिनों में प्लीहा रोग हो जाना आदि में ये औषधि बहुत लाभकारी होती है। इसके अलावा जिगर में दर्द, खाने-पीने की चीजों से अरुचि हो जाना, पित्त की थैली में पथरी हो जाना में भी ये असरदार होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में चियोनैन्थस वर्जिनिका औषधि का इस्तेमाल-
पेट से सम्बंधित लक्षण - पेट में ऐसा लगना जैसे की कोई चीज उथल-पुथल कर रही है, आमाशय सख्त और कसी हुई सी लगना, बार-बार दस्त होना, जी मिचलाना, उबकाई आना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में रोगी को चियोनैन्थस वर्जिनिका औषधि देने से आराम आता है।
पेशाब से सम्बंधित लक्षण - पेशाब का रंग गाढ़ा सा और लाल होना, बार-बार ऐसा महसूस होना कि पेशाब आ रहा है, पेशाब के साथ चीनी आना आदि पेशाब के रोगों के लक्षणों में रोगी को नियमित रूप से चियोनैन्थस वर्जिनिका औषधि देने से लाभ होता है।
तुलना-
सिनकोना, सियानौथ, चेलिडो, कार्डुअ, पोडो, लेप्टैण्ड्रा से चियोनैन्थस वर्जिनिका की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
चियोनैन्थस वर्जिनिका की और 2x शक्ति तक रोगी को नियमित रूप से देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
क्लोरेलम Chloralum
क्लोरेलम औषधि दिल के रोगों में जैसे हाईब्लडप्रेशर में काफी लाभ करती है ये औषधि दिल की तेज गति को सामान्य बनाती है। कभी-कभी इस औषधि के प्रयोग से त्वचा पर लाल या नीले रंग के दाग-धब्बे भी पड़ जाते हैं लेकिन इससे ये नहीं समझना चाहिए कि ये औषधि नुकसानदायक है, बल्कि इन्हीं लक्षणों के आधार पर होम्योपैथिक सिद्धान्तों के अनुसार शीतपित्त में इसकी सफल चिकित्सा की जाती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर क्लोरेलम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सुबह के समय सिर में दर्द होना, खासकर माथे और सिर के पीछे के हिस्से में दर्द होना जो हिलने-डुलने से बढ़ता है और खुली हवा में कम हो जाता है, कानों में अजीब-अजीब सी आवाजें सुनाई देती है आदि लक्षणों में रोगी को क्लोरेलम औषधि देने से लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों की रोशनी का कम होना, आंखों और पलकों में जलन होना, आंखों के सामने अजीब-अजीब सी चीजें दिखाई देना, हर चीज सफेद नज़र आना आदि आंख के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लोरेलम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा पर चेचक के जैसे लाल-लाल दाने से निकलना, त्वचा में बहुत ज्यादा खुजली होना, शरीर पर बैंगनी रंग के निशान पड़ना, त्वचा बिल्कुल सख्त सी होना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में क्लोरेलम औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - रोगी की छाती पर वजन महसूस होना, तेज खांसी होना, नींद न आना आदि दिल के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लोरेलम औषधि देने से लाभ होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण - नींद न आना, सोते समय डरावने सपने आना, नींद में चलना, अजीब-अजीब सी चीजें दिखाई देना आदि लक्षणों में रोगी को क्लोरेलम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
वृद्धि :-
गर्म पीने वाले पदार्थो को पीने के बाद, तेज पदार्थो को खाने से, खाने के बाद, रात के समय रोग बढ़ जाता है।
तुलना-
बेला, ओपियम, एपिस, वेरोनल से क्लोरेलम की तुलना की जा सकती है।
प्रतिविष-
अमोनियम, एट्रोपियम, डिजिटै, मास्कस औषधियों का उपयोग क्लोरेलम औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
मात्रा-
शीतपित्त में पहली शक्ति का विचूर्ण, नहीं तो ज्यादा शक्तियां।
जानकारी-
पैरों में बदबूदार पसीना आने के समय इस औषधि का इस्तेमाल किया जाता है, जिसमें 1 प्रतिशत शक्ति के घोल से पैरों को धोया जाता है।
कलोरैलम हाइड्रेटम Chloralum Hydratum
कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि दिमागी और चमड़ी के रोगों के लिए बहुत ही लाभकारी औषधि मानी जाती है। ये औषधि दिमाग पर क्रिया करके व्यक्ति को अच्छी नींद लाने में मदद करती है और त्वचा पर क्रिया करके पूरे शरीर में लाल रंग की छोटी-छोटी फुंसिया और दाने पैदा करती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - हर समय सिर में दर्द रहना, माथे, कनपटी में दर्द रहना जो थोड़ा सा हिलाते ही बढ़ जाता है आदि सिर के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि का सेवन कराने से तुरन्त ही लाभ मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - सांस लेने में परेशानी होना, जरा सा दूर चलते ही सांस फूलना, दम घुटना आदि सांस के रोगों के लक्षणों में अगर रोगी को कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि दी जाए तो उसको बहुत लाभ मिलता है।
आमवात (गठिया) से सम्बंधित लक्षण - सर्दी के मौसम में शरीर पर जरा सी ठण्डी हवा लगते ही खुजली सी मचना, जिन लोगों को नशा करने की आदत होती है उनको किसी भी रोग होने पर दूसरे औषधियों से ज्यादा कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि ज्यादा लाभ करती है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - शरीर पर लाल रंग के छोटे-छोटे दाने से निकलना खुजली के साथ जैसे खसरा निकलने पर होते हैं आदि चर्मरोगों के लक्षण नज़र आने पर रोगी को कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि देने से आराम आता है।
डर से सम्बंधित लक्षण - छोटे बच्चों का नींद से उठकर अचानक रोने लगना जैसे की उसे डर लग गया हो या छोटी माता (चिकन पोक्स) के लक्षण नज़र आने पर बच्चे को कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि देने से लाभ होता है।
तुलना-
कलोरैलम हाइड्रेटम की तुलना अमोनियम, एट्रोपियम, डिजिटै, मास्कस आदि से की जाती है।
मात्रा-
पहली शक्ति का विचूर्ण या ऊंची शक्तियां।
कलोरैलम हाइड्रेटम Chloralum Hydratum
कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि दिमागी और चमड़ी के रोगों के लिए बहुत ही लाभकारी औषधि मानी जाती है। ये औषधि दिमाग पर क्रिया करके व्यक्ति को अच्छी नींद लाने में मदद करती है और त्वचा पर क्रिया करके पूरे शरीर में लाल रंग की छोटी-छोटी फुंसिया और दाने पैदा करती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - हर समय सिर में दर्द रहना, माथे, कनपटी में दर्द रहना जो थोड़ा सा हिलाते ही बढ़ जाता है आदि सिर के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि का सेवन कराने से तुरन्त ही लाभ मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - सांस लेने में परेशानी होना, जरा सा दूर चलते ही सांस फूलना, दम घुटना आदि सांस के रोगों के लक्षणों में अगर रोगी को कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि दी जाए तो उसको बहुत लाभ मिलता है।
आमवात (गठिया) से सम्बंधित लक्षण - सर्दी के मौसम में शरीर पर जरा सी ठण्डी हवा लगते ही खुजली सी मचना, जिन लोगों को नशा करने की आदत होती है उनको किसी भी रोग होने पर दूसरे औषधियों से ज्यादा कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि ज्यादा लाभ करती है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - शरीर पर लाल रंग के छोटे-छोटे दाने से निकलना खुजली के साथ जैसे खसरा निकलने पर होते हैं आदि चर्मरोगों के लक्षण नज़र आने पर रोगी को कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि देने से आराम आता है।
डर से सम्बंधित लक्षण - छोटे बच्चों का नींद से उठकर अचानक रोने लगना जैसे की उसे डर लग गया हो या छोटी माता (चिकन पोक्स) के लक्षण नज़र आने पर बच्चे को कलोरैलम हाइड्रेटम औषधि देने से लाभ होता है।
तुलना-
कलोरैलम हाइड्रेटम की तुलना अमोनियम, एट्रोपियम, डिजिटै, मास्कस आदि से की जाती है।
मात्रा-
पहली शक्ति का विचूर्ण या ऊंची शक्तियां।
क्लोरोफार्मम Chloroformum
यह औषधि शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी आने, घुटने के नीचे के अंगों में बहुत ज्यादा थके हुए लगना, पूरे चेहरे पर छाती पर बहुत ज्यादा पसीना आना, नींद न आना, होठों और गले का सूख जाना, रात को सोते समय सूखी खांसी उठना, पेट में गैस भरना, आमाशय के अंदर दर्द होना, थोड़ी सी मेहनत करते ही सांस का फूल जाना आदि लक्षणों में क्लोरोफार्मम औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर क्लोरोफार्मम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में बहुत तेज उत्तेजना पैदा होना, सिर का ऐसा महसूस होना जैसे वह कंधों पर आ गया हो, आंखों का तेजी से बंद होना और खुलना, चेहरे, पेशियों और बाहरी अंगों पर लकवा सा मार जाना आदि लक्षणों के आधार पर क्लोरोफार्मम औषधि का प्रयोग करना काफी लाभकारी रहता है।
तुलना-
क्लोरोफार्मम औषधि की तुलना ईथर, स्पिरिटस, ऐथेरिस कम्पोजिटस से की जा सकती है।
मात्रा-
छठी से लेकर 200 शक्ति तक इस औषधि का इस्तेमाल किया जा सकता है।
क्लोरम Chlorum
गले में किसी तरह की परेशानी, सांस का रुक-रुककर आना, सूजन आदि सांस के रोगों के लक्षणों में अगर क्लोरम औषधि रोगी को दी जाए तो ये बहुत जल्दी असर करती है। कोथ (गैन्ड्रेन) में अगर क्लोरोम का बाहरी और भीतरी इस्तेमाल किया जाए तो लाभदायक होता है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर क्लोरोम औषधि का उपयोग-
मस्तिष्क से सम्बंधित लक्षण - याददाश्त खो जाना, मन में हमेशा डर सा लगा रहना, कोई भी बात याद न रख पाना आदि दिमागी रोग के लक्षणों में रोगी को क्लोरोम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - नाक से बहुत ज्यादा स्राव होना, नाक के अंदर तथा नथुनों में दर्द होना, दम सा घुटना, गला, सांस की नली, आवाज की नली का बंद सा होना, चेहरा नीला पड़ना, ठण्डा पसीना आना, नाड़ी का धीरे-धीरे चलना आदि सांस के रोगों के लक्षण दिखते ही रोगी को क्लोरोम औषधि देने से आराम आता है।
मात्रा-
रोगी को क्लोरोम औषधि की चौथी से लेकर छठी शक्ति तक देने से उसका रोग ठीक हो जाता है।
कोलेस्टेरीनम Cholesterinum
कोलेस्टेरीनम औषधि को जिगर के रोगों के लिए बहुत ही उपयोगी औषधि माना जाता है। इसके अलावा पीठ में जलन के साथ दर्द होना, चलते समय हाथों को एक ही तरफ कर देना, पीलिया रोग, पित्त की थैली में पथरी और नींद न आना जैसे रोगों में भी ये औषधि काफी लाभकारी होती है।
तुलना-
कोलेस्टेरीनम औषधि की तुलना टौरोकोलेट आफ सोड़ा से की जा सकती है।
क्रोमिकम एसिडम CHROMICUM ACIDUM
डिफ्थीरिया, नाक के पीछे के हिस्से में रसौली और जीभ के ऊपर कलाबुर्द (एपीथेलियोमा) आदि के लक्षणों में क्रोमिकम एसिडम बहुत ज्यादा लाभकारी साबित होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर क्रोमिकम एसिडम औषधि का इस्तेमाल-
नाक से सम्बंधित लक्षण - नाक के अंदर जख्म होना, बदबू वाला स्राव आना आदि नाक के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्रोमिकम एसिडम औषधि देने से लाभ होता है।
कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण - डिफ्थीरिया, गले में जलन होना, बलगम आना आदि गले के रोगों में रोगी को क्रोमिकम एसिडम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
शरीर से सम्बंधित बाहरी लक्षण - शरीर के सारे अंगों में बैचेनी होना, स्कंध-फलकों और गर्दन में दर्द, पैरों और घुटनों में दर्द होना आदि लक्षणों में क्रोमिकम एसिडम औषधि का सेवन करने से आराम आता है।
मल से सम्बंधित लक्षण - रोगी को बार-बार पतले दस्त होना, दस्तों के साथ जी का मिचलाना और चक्कर आना, बवासीर, कमर के नीचे के हिस्से में कमजोरी आना आदि लक्षणों में रोगी को अगर नियमित रूप से क्रोमिकम एसिडम औषधि सेवन कराई जाए तो उसके लिए लाभकारी होता है।
तुलना-
क्रोमिकम एसिडम औषधि की तुलना कालीबाई, रस, क्रोमियम सल्फेट आदि से की जाती है।
मात्रा-
रोगी को क्रोमिकम एसिडम औषधि की तीसरी से छठी शक्ति तक देने से उसका रोग ठीक हो जाता है।
क्राइसैरोबिनम Chrysarobinum
त्वचा पर किसी तरह के दाग-धब्बे होना, पैरों के दाद, मुहांसों आदि चर्म रोगों में क्राइसैरोबिनम औषधि बहुत ज्यादा लाभकारी होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर क्राइसैरोबिनम औषधि का उपयोग-
आंखों से सम्बंधित लक्षण - तेज रोशनी में आते ही आंखों का बंद हो जाना, पलकों में सूजन आना, आंखों से गीढ़ आना, नज़र कमजोर हो जाना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्राइसैरोबिनम औषधि देने से तुरन्त लाभ होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - कान के पीछे के हिस्से में दर्द होना, कान के अंदर मैल जमा होना, कम सुनाई देना आदि कान के रोग के लक्षण पता चलते ही रोगी को क्राइसैरोबिनम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
तुलना -
क्राइसैरोबिनम में क्राइसोफैन मिला हुआ होता है, जो बहुत तेजी से ऑक्सीजनीकृत होकर क्राइसोफैनिक एसिड में बदल जाता है। ये रुबार्ब और सेन्ना में भी पाया जाता है।
मात्रा-
क्राइसैरोबिनम औषधि रोगी को खिलाने के लिए तीसरी शक्ति से छठी शक्ति तक प्रयोग की जाती है।
जानकारी-
क्राइसैरोबिनम औषधि का प्रयोग बाहरी प्रयोग के लिए लगभग 0.26 से 0.52 ग्राम तक लगभग 28 मिलीलीटर वैसलीन में मिलाकर किया जाता है।
सावधानी-
क्राइसैरोबिनम औषधि का बाहरीय प्रयोग करते समय सावधानी बरतना जरूरी है क्योंकि ये त्वचा में जलन पैदा करती है।
सिक्यूटा विरोसा Cicuta Virosa
सिक्यूटा विरोसा शरीर में किसी भी प्रकार की ऐंठन को दूर करने के लिए बहुत ही लाभदायक औषधि मानी जाती है जैसे किसी व्यक्ति को मिर्गी, हिस्टीरिया, अजीर्णता, दांत निकलते समय रोग के कारण ऐंठन आने में लाभदायक होता है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर सिक्यूटा विरोसा का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - रोगी अजीब-अजीब सी हरकते करता है जैसे कभी हंसता है, कभी रोता है, अपने आप ही नाचने, गाने लगता है, खुली आंखों से सपने देखने लगता है, हर किसी को देखकर डरने लगता है, छोटी-छोटी बातों पर सबसे लड़ने लगना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों के नज़र आने पर रोगी को तुरन्त ही सिक्यूटा विरोसा औषधि का सेवन कराना चाहिए।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर के रोग के लक्षण जैसे सिर का एक ही तरफ झुक जाना, गर्दन में बुरी तरह दर्द करने वाला बुखार, गर्दन की पेशियों में खिंचाव आना, चक्कर आने के साथ ही पेट में दर्द और पेशियों में ऐंठन आना, किसी चीज को लगातार घूरते ही रहना, दिमाग पर नज़र न आने वाली चोट लगने से रोगी को लकवा मार जाना आदि लक्षणों में रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि खिलाने से आराम पड़ता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - किसी भी अखबार या किताब को पढ़ते समय उसके अक्षर साफ-साफ नज़र न आना, आंखों की पुतलियों का फैल जाना, आंखों से एक ही चीज का 2-2 दिखाई देना, आंखों का पथरा जाना, सामने रखी हुई चीज का एकदम से नज़र न आना आदि लक्षण अगर किसी रोगी में हो तो उसे तुरन्त ही सिक्यूटा विरोसा औषधि देनी चाहिए।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण - चेहरे पर बहुत छोटे-छोटे लेकिन काफी सारी फुंसिया और दाने निकलना और कुछ दिनों के बाद उनके ऊपर मोटी, पीली सी पपड़ी जम जाना, चेहरा का बिल्कुल लाल होना, जबड़े का अटक जाना, हर समय दान्तों को चबाते रहना आदि लक्षणों के किसी भी व्यक्ति में नज़र आने पर उसे तुरन्त ही सिक्यूटा विरोसा औषधि देने से आराम पड़ता है।
कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण - गले का बिल्कुल सूख सा जाना, किसी भी खाने या पीने की चीज को निगलते समय परेशानी होना, आहारनली में हड्डी अटक जाने के कारण होने वाले रोगों के लक्षणों में रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - रोगी को बहुत तेज प्यास लगना, आमाशय में जलन होने के साथ दबाव पड़ना, बार-बार हिचकी आना, पेट में जलन होना, मन का ऐसा करना जैसे कि कोयले आदि चीजे खा लें, भूख कम लगने के साथ बेहोशी छाना और मुंह में झाग आना आदि लक्षणों में रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण - बैचेनी और चिड़चिड़ेपन के साथ अफारा होना, पेट में गड़गड़ाहट होना, पेट का फूलना और बहुत तेज दर्द होना, पेट में दर्द के साथ लकवा मार जाना आदि लक्षणों के किसी रोगी में नज़र आने पर उसे तुरन्त ही सिक्यूटा विरोसा औषधि का सेवन कराना चाहिए।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण - सुबह के समय पतले से दस्त आना, बार-बार पेशाब आना, मलान्त्र में बहुत ज्यादा खुजली होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि का सेवन कराने से आराम मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - सांस लेने में परेशानी होना, छाती का कसा हुआ सा महसूस होना, दिल की पेशियों में ऐंठन आना, छाती में गर्मी सी महसूस होना आदि लक्षणों के आधार रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि देने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - गर्दन की पेशियों में खिंचाव आना और ऐंठन सी महसूस होना, सिर में पीछे की ओर खिंचाव सा होना, पीठ का पीछे की ओर झुक जाना, शरीर के किसी भी अंग को मोड़ने में दर्द होना, मासिकधर्म के दौरान पुच्छास्थि (रीढ़ की हड्डी के नीचे का भाग) में बहुत तेज दर्द सा महसूस होना आदि लक्षणों में अगर रोगी को सिक्यूटा विरोसा औषधि नियमित रूप से सेवन कराई जाए तो काफी लाभकारी होती है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा पर पीले रंग की बहुत सारी फुंसियां निकलना, त्वचा के ऊपर बिना खुजली के होने वाली छाजन, जिसमे स्राव सूखकर सख्त सा हो जाता है और उसका रंग नींबू के छिलके जैसा पीला हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर सिक्यूटा विरोसा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक रहता है।
वृद्धि-
किसी के द्वारा छूने से, हवा लगने से, चोट लग जाने से, तंबाकू का सेवन करने से रोग बढ़ जाता है
शमन-
गर्मी से रोग कम हो जाता है।
प्रतिविष-
तुलना -
सिक्यूटा विरोसा औषधि की तुलना सिक्यूटा मैक्यूलेटा, हाइड्रोस्यानिक एसिड, कोनियम, ईनैन्थिस, स्ट्रिकनिया, बेला से कर सकते हैं।
मात्रा -
सिक्यूटा विरोसा औषधि की 6 से लेकर 200 शक्ति तक रोगी को देने से लाभ होता है।
साइमेक्स लेक्टुलैरिअस Cimex Lectularius
किसी व्यक्ति को बुखार या पारी से आने वाले बुखार जिसमें रोगी को पूरे दिन थकान सी रहती है, हर समय नींद सी आती रहती है, रोगी को पैर पूरे फैलाने में परेशानी होती है और उसे पैरों को मोड़कर ही सोना पड़ता है जैसे लक्षणों के आधार पर साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि बहुत अच्छी मानी जाती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि का उपयोग-
बुखार से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति को अचानक पूरे शरीर में ठण्ड के साथ कंपकपी आना, बुखार के बढ़ने के साथ प्यास का कम होना, गले में इस तरह का दर्द होना जैसे कि किसी ने गला दबा रखा हो, पानी पीने से गले में दर्द होना आदि बुखार के लक्षणों में रोगी को साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि का नियमित रूप से सेवन कराना लाभकारी होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में बहुत ज्यादा तेजी से होने वाला दर्द, ज्यादा गुस्सा आना, शीतावस्था की शुरुआत में उत्तेजना होना, माथे की दाईं हड्डी के नीचे दर्द होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
कब्ज से सम्बंधित लक्षण -
गला सूखना जैसे कि बहुत समय से पानी न मिला हो, मलक्रिया करते समय परेशानी होना, मल का सख्त गुठलियों के रूप में आना, मलद्वार में जख्म होना, स्त्रियों की योनि में बाएं डिम्ब तक बहुत तेज दर्द होना आदि कब्ज रोग के लक्षणों में रोगी को साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि देने से लाभ होता है।
तुलना-
साइमेक्स लेक्टुलैरिअस औषधि की तुलना ऐमाने म्यूर, कास्टि, एपिस, युपेट पर्फो से की जा सकती है।
मात्रा-
3x शक्ति से 200 शक्ति तक।
साइमेक्स CIMEX-CANTHIA
जिस बुखार के अंदर शरीर टूटा-टूटा सा रहता है, किसी काम को करने का मन नहीं करता, नींद सी आती रहती है ऐसे लक्षण नज़र आते हो तो साइमेक्स औषधि बहुत लाभ करती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर साइमेक्स औषधि का इस्तेमाल-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में बहुत तेज दर्द होना, बहुत तेज गुस्सा आना, माथे की दाईं ओर की हड्डी के नीचे दर्द होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को साइमेक्स औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - स्त्री की योनि से लेकर बाएं डिम्ब तक बहुत तेज दर्द होना जैसे की किसी ने कुछ चीज घुसा दी हो आदि स्त्री रोग के लक्षणों में स्त्री को साइमेक्स औषधि देने से आराम आता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण - शरीर में बहुत तेज ठण्ड लगने के साथ कंपकंपी होना, शरीर के सारे जोड़ों में दर्द होना, बदबू के साथ पसीना आना, बुखार के बढ़ने के साथ-साथ प्यास का कम होना आदि बुखार के लक्षणों में रोगी को साइमेक्स औषधि का सेवन नियमित रूप से कराने से लाभ होता है।
कब्ज से सम्बंधित लक्षण -
पेट में कब्ज बनना, आंतों में सूखा मल जमा होना, मलान्त्र में जख्म होना आदि आंतों के रोग के लक्षणों में रोगी को साइमेक्स औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।
मात्रा-
रोगी को उसके रोग के लक्षणों के आधार पर साइमेक्स औषधि की छठी से 200 वीं शक्ति तक देने से आराम आता है।
सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा (एक्टिया रेसमोसा) Cimicifuga Racemosa, Actaea Racemosa
सिमिसिफ्यूगा औषधि स्त्री रोगों के लिए एक बहुत ही लाभकारी औषधि मानी जाती है। मासिकधर्म आने पर स्त्रियों को कई तरह की परेशानी होती है उनमे ये औषधि उनके दर्दों को कम करती है। इसके अलावा हिस्टीरिया रोग में, गैस के कारण हाथ-पैरों का सुन्न हो जाना आदि लक्षणों के नज़र आने पर भी ये औषधि बहुत लाभकारी साबित होती है। लेकिन सिर्फ शारीरिक लक्षणों के आधार पर ही सिमिसिफ्यूगा का इस्तेमाल नहीं होना चाहिए।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- दिमाग में ऐसा लगना कि जैसे किसी ने बहुत ही भारी काम दे रखा हो सोचने वाला, गाड़ी में घूमने पर डर लगना, अपने आप से ही बाते करना, अजीब-अजीब सी चीजें दिखाई देना आदि मानसिक रोग के लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराने से बहुत लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में अजीब सा दर्द होना, अलग-अलग तरह के विचार आना, अजीब-अजीब सी आवाजें आना, जरा सा शोर होते ही सिर दर्द होना आदि लक्षण नज़र आते ही रोगी को तुरन्त सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से आराम आता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों की रोशनी कम होने के साथ गोणिका रोग (पेल्वीक ट्रौबल्स), आंखों में जलन होना, आंख से लेकर सिर तक दर्द आदि लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराने से तुरन्त ही आराम आ जाता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - गले पर किसी तरह का जोर पड़ने के कारण जी ऐसा होना जैसे कि उल्टी होने वाली हो, किसी चीज ने काटा हो इस प्रकार का दर्द आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों में सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिकधर्म का समय पर न आना, डिम्ब प्रदेश में दर्द जो जांघों के आगे के हिस्से पर ऊपर-नीचे की ओर होता रहता है, मासिकधर्म आने से पहले दर्द होना, मासिकस्राव ज्यादा मात्रा में, गाढ़ा, बदबू के साथ आना, कमर में दर्द होना, स्तनों के नीचे दर्द होना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
जिन स्त्रियों के अंदर वात धातु के कारण हिस्टीरिया रोग होता है उन्हें कई प्रकार के मासिकधर्म के रोग भी घेर लेते हैं, ऐसी स्त्रियों का मासिकधर्म के दौरान स्राव या तो बहुत कम आता है या कभी बहुत ज्यादा मात्रा में आता है, कभी-कभी तो ये स्राव बिल्कुल ही नहीं आता है। कई मामलों मे स्त्रियों का मासिकधर्म आने से पहले बहुत ज्यादा दर्द होता है लेकिन जैसे ही मासिकधर्म आता है यह दर्द कम होने लगता है। इन लक्षणों के आधार पर अगर स्त्री को नियमित रूप से सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि दी जाए तो कुछ ही समय में उसके ये लक्षण नज़र आना बंद हो जाते हैं।
गर्भावस्था की बहुत सारी परेशानियां जैसे उल्टी आने का मन करना, सिर में दर्द होना, गैस बनने के कारण दर्द होना आदि में सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि बहुत ही चमत्कारिक तरीके से काम करती है। हिस्टीरिया रोग से ग्रस्त लड़की जब गर्भवती होती है तो उस समय हिस्टीरिया रोग के कारण स्त्री को बहुत सारी परेशानियां घेर लेती है। बहुत से लोगों का मानना है कि गर्भवती स्त्री को बच्चे के जन्म से करीब 15-20 दिन पहले अगर सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराया जाए तो उसको बच्चे के जन्म के समय किसी तरह की परेशानी नहीं होती और बच्चा आसानी से पैदा हो जाता है, लेकिन यह किसी-किसी मामले में ही होता है क्योंकि हर गर्भवती स्त्री की प्रकृति एक ही तरह की नहीं होती, सभी के ल़क्षण अलग-अलग प्रकार के होते हैं और जब तक हर स्त्री के सारे लक्षण न मिले तो सिर्फ रोग या रोग के नाम पर 1 या 2 लक्षणों के आधार पर ही इस औषधि का इस्तेमाल करना सही नहीं कहा जा सकता, इसलिए इसे इतना लाभकारी नहीं कह सकते।
गर्भवती स्त्री के बच्चे के जन्म लेने के दर्द के शुरू होते ही (लेबर पैन) कंपकपी होना महसूस होना, हिस्टीरिया के लक्षण नज़र आते ही, बच्चे के जन्म लेने के दर्द के रुकते ही, गर्भाशय का मुंह न खुलना आदि लक्षण प्रकट होते ही उसे सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से लाभ होता है।
मासिकधर्म के दौरान स्त्रियों की स्नायुमण्डली (नर्वस सिस्टम) कमजोर हो जाती है इस हालत में अगर स्त्री को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि दी जाए तो थोड़ी सावधानी बरतने की जरूरत है, क्योंकि सब ऐन्टिसोरिक औषधियों का असर बहुत ही गम्भीर और चिरस्थाई होता है और अगर वो समलक्ष्ण विशिष्ट और उच्चशक्ति संपन्न हो तो बहुत ही प्रबल क्रिया के साथ रोग बढ़ सकता है। इसलिए एक बहुत ही महान व्यक्ति न पहले नक्सवोमिका का इस्तेमाल करके औषधि की शक्ति सहिश्णुता प्राप्त कर लेने के उपदेश दिये है, अगर ऐसा न किया जाए तो इस औषधि से पूरी तरह लाभ प्राप्त नहीं होगा। मासिकधर्म के दिनों में अगर स्त्री को कोई भयानक रोग घेर लेता है तो उसे ज्यादा ताकत वाली औषधियों का बार-बार सेवन नहीं करना चाहिए। इस हालत में स्त्री को नक्सवोमिका की एक खुराक देकर लक्षणों के आधार पर ही कुछ घंटों के बाद दूसरी औषधि दे देनी चाहिए।
सांस से सम्बंधित लक्षण - रोगी के गले में ऐसे लगना जैसे कि कुछ अटक रहा हो, सांस का रुक-रुककर चलना, सूखी खांसी होना जो रात को सोते समय ज्यादा चलती है आदि सांस के रोग के लक्षणो में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से लाभ होता है।
हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण- नाड़ी का धीरे-धीरे चलना, बाजू सुन्न होना, ऐसा महसूस होना कि दिल की धड़कन बंद हो रही हो और दम सा घुट रहा है, बाएं स्तन के नीचे के हिस्से में दर्द होना आदि दिल के रोग के लक्षण प्रकट होने पर रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का सेवन कराने से कुछ ही समय में लाभ हो जाता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- रीढ़ की हड्डी के ऊपर के हिस्से में छूने पर दर्द होना, गर्दन और कमर में खिंचाव सा आना, पसलियों के बीच के हिस्से में गठिया होना, कमर की पेशियों का ऐंठना आदि पीठ के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि का नियमित रूप से सेवन कराने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- हाथ-पैरों में धीरे-धीरे बढ़ने वाला दर्द होना, शरीर में बैचेनी सी महसूस होना, पेट की पेशियों में गठिया होना, जनेन्द्रियों में खिंचाव के साथ हल्का-हल्का दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि देने से आराम पड़ जाता है।
वृद्धि-
सुबह के समय, सर्दी से, मासिकधर्म के दौरान, मासिकस्राव जितना ज्यादा होगा दर्द भी उतना ही ज्यादा होगा आदि मे रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गरमाई से, खाना खाने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि की तुलना रैमनस कैलिफोर्निका (रैम्नुस कैलीफोरनिका) डेरिस पिन्नाटा (डेरीस पिंनटा), आरिस्टोलोचिया मिलहोमेन्स (ऐरीस्टोलीकिक मील्गोमेंस) कौलोफाइलम, पल्सा, एगारिकस, मैकरोटिन आदि से की जाती है।
मात्रा -
सिमिसिफ्यूगा रेसमोसा औषधि की पहली से तीसवीं शक्ति तक रोगी को देने से लाभ मिलता है।
सिना Cina
सिना औषधि को बच्चों के रोगों के लिए एक बहुत ही असरदार औषधि माना जाता है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर सिना औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- बच्चे का बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाना, किसी भी व्यक्ति के द्वारा छूने या गोद में लेने पर बच्चा रोने लगता है, बाहर ले जाते समय बच्चे का हर चीज लेने के लिए जिद्द करना, मन में हमेशा अपने ही आप को लेकर शर्म सी महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को सिना औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में बहुत तेज दर्द होना, अगर आगे की ओर झुका जाए तो सिर का दर्द कम हो जाता है, कोई भी नज़र का काम करते समय सिर में दर्द शुरू हो जाना आदि लक्षणों में सिना औषधि का सेवन काफी लाभप्रद रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों की पुतलियों का फैल जाना, आंखों से हर चीज का पीला नज़र आना, ज्यादा हस्तमैथुन करने के कारण नज़रों का कमजोर हो जाना, आंखों का थका हुआ सा महसूस होना, आंखों के ऊपर की पेशियों में जलन होना आदि लक्षणों में सिना औषधि का प्रयोग करना काफी अच्छा रहता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- कानों में ऐसा महसूस होना जैसे कि कोई कानों को खरोंच रहा हो या खोद रहा हो आदि लक्षणों में रोगी को सिना औषधि का सेवन कराना अच्छा रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- नाक में हर समय खुजली सी होते रहना, नाक को बार-बार हाथों से रगड़ते रहना, नाक के नथुनों को उंगलियों से खुरेचते हुए खून निकाल देना आदि लक्षणों के आधार पर सिना औषधि का प्रयोग कराना अच्छा रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- गालों का बिल्कुल लाल हो जाना, चेहरे का रंग पीला पड़ जाना, आंखों के चारों ओर काले घेरे से पड़ जाना, चेहरे पर ठण्डा सा पसीना आना, सोते समय दांतों का पीसना, चेहरे और हाथों की पेशियों का सही तरीके से काम न करना आदि लक्षणों में सिना औषधि का सेवन करना लाभप्रद रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- भोजन करने के कुछ देर बाद ही दुबारा भूख लग जाना, भोजन करने या पानी पीते ही तुरन्त उल्टी और दस्त हो जाना, उल्टी होने के साथ जीभ का साफ होना, बार-बार मीठी चीज खाने का मन करना आदि आमाशय रोग के लक्षणों में सिना औषधि का प्रयोग काफी असरदार साबित होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- नाभि के आसपास के भाग में मरोड़े उठने के साथ दर्द होना, पेट का फूल जाना और सख्त हो जाना आदि पेट के रोगों के लक्षण नज़र आने पर सिना औषधि का रोगी को सेवन कराना अच्छा रहता है।
मल से सम्बंधित लक्षण- मल के साथ सफेद आंव (सफेद पदार्थ) का आना, आंव (सफेद पदार्थ) आने से पहले पेट में दर्द होना, मलद्वार में खुजली होना, पेट में कीड़े होना आदि लक्षणों में सिना औषधि का प्रयोग काफी अच्छा रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रात को सोते समय पेशाब निकल जाना, पेशाब का गन्दे से रंग का आना जो कुछ देर बाद सफेद हो जाता है आदि लक्षणों में सिना औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण- लड़की के जवानी की ओर कदम रखने से पहले ही योनि में से खून आना जैसे लक्षण नज़र आने पर सिना औषधि का प्रयोग लाभप्रद रहता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को हल्की-हल्की सी ठण्ड लगते रहना, काफी तेज बुखार आना, भूख का ज्यादा लगना, पेट में दर्द होना, ठण्ड लगने के साथ प्यास का बढ़ जाना, माथे, नाक और हाथों पर ठण्डा सा पसीना आना आदि लक्षणों में सिना औषधि लेने से आराम मिलता है।
नीन्द से सम्बंधित लक्षण- बच्चे का पेट के बल सोना, रात को सोते-सोते अचानक चौंक पड़ना, बार-बार चिल्लाना, जम्हाई लगते समय परेशानी होना, सोते समय दांतों को पीसते रहना आदि लक्षणों में सिना औषधि रोगी को खिलाने से आराम मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - शरीर के अंगों में झटके लगने के साथ टेढ़ापन सा आ जाना और कांपते रहना, रोगी को सोते-सोते बिस्तर पर से एकदम उछल पड़ना, बच्चे का हाथ-पैरों का पटकते रहना, रात को सोते समय बेहोशी के दौरे पड़ना, बच्चे का बाएं पैर को हर समय हिलाते रहना और उसमे ऐंठन आना आदि लक्षणों में सिना औषधि का प्रयोग करना काफी लाभकारी रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - सुबह उठने पर दम सा घोट देने वाली खांसी होना, बार-बार खांसी उठना, रोगी के खांसते-खांसते आंखों में से आंसू आ जाना और सीने में दर्द हो जाना, खांसते समय बाहर निकलने वाले बलगम का वापस अंदर निकल जाना, खांसी होने के बाद गले से लेकर आमाशय तक गड़गड़ाहट होना, खांसी के बाद चेहरे का पीला पड़ जाना, कमजोरी महसूस होना आदि लक्षणों के आधार पर सिना औषधि का सेवन लाभकारी रहता है।
वृद्धि-
किसी चीज की ओर लगातार देखते रहने से, कीड़ों से, रात को, धूप में, गर्मियों में रोग बढ़ जाता है।
शमन-
हरकत करने से, पेट के बल लेटने से और आंखों को मलने से रोग कम हो जाता है।
प्रतिविष-
कैम्फर, कैप्सिकम आदि औषधियों का उपयोग सिना औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
तुलना-
सिना औषधि की तुलना ऐन्ट-क्रूड, ऐन्ट-टार्ट, ब्रायो, कैमो, क्रियोज, साइली और स्टैफ के साथ की जा सकती है।
मात्रा-
सिना औषधि की 3 शक्ति तक रोगी को सेवन कराने से लाभ होता है।
जानकारी-
जो बच्चे बहुत चिड़चिड़े स्वभाव के होते हैं उन्हें सिना औषधि की 30 से 200 शक्ति तक देनी चाहिए।
सिनाबेरिस Cinabaris
सिनाबेरिस औषधि किसी व्यक्ति की पलकों में स्नायूशूल के दर्द और गर्मी के कारण शरीर में पैदा हुए जख्मों को भरने में बहुत लाभकारी होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर सिनाबेरिस औषधि का उपयोग-
रक्त से सम्बंधित लक्षण- किसी व्यक्ति के अगर नाक से खून निकलता हो, आमाशय से खून बहता हो, बवासीर रोग के कारण खून ज्यादा बहता हो ऐसे लक्षणों में रोगी को सिनाबेरिस औषधि का सेवन कराना काफी लाभप्रद रहता है।
उपदंश, प्रमेह से सम्बंधित लक्षण- लिंग के मुंह का सूज कर फूल जाना, मस्से होना, खून निकलना, अण्डकोषों का बढ़ जाना आदि लक्षणों में अगर रोगी को सिनाबेरिस औषधि का सेवन कराया जाए तो लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों में आंसुओं की नली से शुरू होकर दर्द का आंखों के चारो ओर की कनपटी तक फैल जाना, आंखों में किसी चीज का चुभना सा महसूस होना, आंख के अंदर के सफेद भाग का लाल हो जाना, आंखों से कम दिखाई देना, पलकों का सूज जाना, पुतलियों में निशान से पड़ जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सिनाबेरिस औषधि दी जाए तो आराम मिलता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- नाक की जड़ का भारी सा महसूस होना, नाक की जड़ पर दबाव पड़ना, पुराना सर्दी-जुकाम होने पर नाक से गोन्द की तरह लेसदार सा स्राव होना जो नाक के द्वारा गले में पहुंच जाता है आदि लक्षणों के आधार पर सिनाबेरिस औषधि का सेवन काफी लाभप्रद रहता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में खून जमा हो जाने के कारण होने वाला सिर का दर्द, रात को और दिन में हाथ-पैरों का ठण्डा हो जाना, जोड़ों में ठण्डापन महसूस होना, जोड़ों के आसपास खुजली सी महसूस होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिनाबेरिस औषधि का प्रयोग कराने से आराम आता है।
प्रतिविष-
हिपर, सल्फ औषधि का उपयोग सिनाबेरिस औषधि के दोषों को दूर करने में किया जाता है।
पूरक-
थूजा।
वृद्धि-
शाम को, रात के समय, सोने के बाद, दाईं करवट लेटने से, छूने से, रोशनी से, सीलन से रोग बढ़ता है।
शमन-
खुली हवा में, रात को भोजन के बाद, सूरज की रोशनी से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
हिपर, नाइट्रि-एसिड, थूजा, सीपिया से सिनाबेरिस औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
1, 3x, 30 और 200 शक्ति तक।
सिनकोना आफिसिनैलिस Cinchona Officinalis
सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि शरीर को कमजोर बनाने वाले स्रावों, जैवी द्रव्यों, खून और वीर्य आदि की कमी के कारण पैदा होने वाली कमजोरी के साथ होने वाली स्नायविक उत्तेजना में ये औषधि खासतौर से लाभदायक साबित होती है। इसके अलावा पुराना गठिया रोग, गुर्दे की श्लैष्मिक झिल्लियों की जलन में, कब्ज होने के रोग में भी ये औषधि असरदार साबित होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का उपयोग-
मस्तिष्क से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति का हमेशा उदास सा रहना, किसी से बात न करना, चिड़चिड़ा होना, नींद न आना, किसी की बात न मानना आदि दिमागी रोग के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि देने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - अचानक सिर का भारी हो जाना, ऐसा लगना कि जैसे किसी ने बहुत ज्यादा वजन सिर पर रखा हो, सिर में दर्द होना, चक्कर आना, जरा सा शोर होते ही सिर में बहुत तेज दर्द हो जाना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में अगर नियमित रूप से सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन किया जाए तो कुछ ही समय में रोगी को सिर के रोगों से छुटकारा मिल जाता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों के आसपास काले घेरे होना, आंखों का अंदर की तरफ धंस जाना, आंखों का पीला हो जाना, साफ नज़र न आना, आंखों के आगे ऐसे लगना कि जैसे अजीब-अजीब सी चीजें नाच रही हो, आंखों की रोशनी कम होना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों के रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - कानों में हर समय घंटी जैसी आवाजें गूंजना, ज्यादा तेज आवाज न सुन पाना, कम सुनाई देना आदि कान के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि देने से लाभ होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण - अचानक नाक से खून आ जाना, पुराना जुकाम, छींकों के साथ जुकाम होना और नाक से स्राव होना, नाक के आसपास ठण्डा पसीना आना आदि नाक के रोगों के लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को नियमित रूप से सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि सेवन कराई जाए तो उसके लिए ये बहुत लाभकारी सिद्ध होती है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण - मुंह के अंदर जीभ पर बहुत ज्यादा मैल जम जाना, जीभ की नोक में जलन होना और मुंह से लार का गिरना, मुंह का स्वाद कड़वा होना, दांतों में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि देने से आराम आता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- पेट में पूरी तरह से न पचे हुए भोजन का उल्टी के रूप में निकलना, भोजन का धीरे-धीरे पचना, भोजन करने के बाद पेट का भारी होना, तेज भूख लगने पर भी भोजन करने का मन न करना, पाचनतंत्र में दर्द होना, गैस बनना, उबकाई आना आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण- पेट में गैस जमा हो जाने के कारण दर्द होना, पेट के नीचे के हिस्से में दर्द होना, पित्त की थैली में पथरी होने का दर्द, जिगर और तिल्ली का सूजना और बड़ा होना, पीलिया, आमाशय और पेट का अंदर से ठण्डा होना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन कराने से पेट के सारे रोग समाप्त हो जाते हैं।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - अण्डकोश का बढ़ना, कामवासना का बहुत ज्यादा बढ़ जाना, स्वप्नदोश होने के कारण शरीर में कमजोरी महसूस होना आदि पुरुष रोगों में सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण- मासिकधर्म समय से काफी पहले आ जाना, पेट का फूलना, मासिकस्राव ज्यादा मात्रा में आना और दर्द होना, कामवासना का बढ़ जाना, रक्तप्रदर आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में स्त्री को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का नियमित रूप से सेवन कराने से लाभ मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- इन्फ्लुएंजा के साथ कमजोरी आना, सिर नीचा करने से सांस न आना, सांस का रुक-रुककर चलना, दम सा घुटना, छाती में से आवाज होना, भोजन करने के बाद बहुत जोरदार खांसी होना, फेफड़ों से खून आना, सांस लेने में परेशानी होना, दमा आदि सांस के रोगों के लक्षणों में सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि लेने से लाभ होता है।
हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण- दिल का कमजोर होना, दिल का बहुत तेजी से धड़कना, दम सा घुटना, खून की कमी होना, बेहोशी छाना आदि दिल के रोगों के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन कराने से आराम मिलता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- एक गुर्दे से लेकर दूसरे गुर्दे तक बहुत तेज दर्द होना जो हिलने से और तेज हो जाता है, कमर के आसपास के हिस्से में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि देने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा का बहुत ज्यादा संवेदनशील हो जाना, शरीर में ज्यादा पसीना आना, एक हाथ बिल्कुल ठण्डा तथा दूसरा हाथ बिल्कुल गर्म लगना, ग्रंथियों का कठोर हो जाना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन नियमित रूप से कराने से कुछ ही समय में उसे लाभ मिल जाता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - शरीर के अंगों और जोड़ों में दर्द होना जो छूने से और ज्यादा बढ़ जाता है, जोड़ों का सूज जाना, कमजोरी, कंपन, शरीर का टूटा-टूटा सा लगना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का सेवन नियमित रूप से कराने से लाभ होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत ज्यादा नींद आना, सुबह उठने पर शरीर का टूटा-टूटा सा लगना, हर समय जम्हाई आना, रात को अजीब-अजीब से सपने देखना, खर्राटे लेना आदि लक्षणों में रोगी को सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि देनी चाहिए।
वृद्धि-
थोड़ा सा छूने से, ठण्डी हवा लगने से, हर दूसरे-तीसरे दिन रसरक्तादि धातुओं के निकलने से, भोजन करने के बाद, झुकने से रोग बढ़ता है।
शमन-
दोहरा होने से, जोर से दबाव देने से, खुली हवा में रहने से, गरमाई देने से रोग कम होता है।
तुलना-
सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि की तुलना आर्निका, क्विनीडिन, अलिन्द विकंपन, कैफालेन्थस आर्से, सेड्रा, नेट्रम-सल्फ्यु, सीडोनिया वुल्गैरिस, नक्स, इपिका से की जाती है।
मात्रा-
सिनकोना आथिसिनैलिस औषधि का मूलार्क या तीसवीं शक्ति तक रोगी को देने से लाभ मिलता है।
सिनेरेरिया Cineraria
सिनेरेरिया औषधि आंखों के मोतियाबिंद के लिए एक बहुत ही लाभकारी औषधि मानी जाती है। मोतियाबिंद को दूर करने के लिए इस औषधि की सिर्फ 1-1 बूंद ही रोजाना दिन में लगातार कई महीने तक 4-5 बार आंख में डालने से आराम आ जाता है। किसी तरह की चोट लगने पर भी ये औषधि अच्छा असर करती है।
तुलना-
मोतियाबिंद के रोग के लिए सिनरेरिया की तुलना फास्फी, नेट्रमम्यूरि, प्लाटेनस, कैनाबिस, कास्टिकम, नैफ्थालिन, लीडम, सिलीका आदि से की जाती है।
सिनामोनम Cinnamonum
शरीर में कैंसर का जख्म होने के कारण शरीर के अलग-अलग स्थानों से बहते हुए खून, बदबू और दर्द को समाप्त करने में सिनामोनम औषधि बहुत असरदार साबित होती है। इसके अलावा स्त्री के रोगों में भी ये औषधि बहुत असरदार साबित होती है जैसे नाक से खून आना, आंतों से खून बहना, फेफड़ों से खून आना, घूमते समय पैरों के ऊपर नीचे रखने से लाल रंग का खून ज्यादा मात्रा में निकलना, बच्चे को जन्म देने के बाद ज्यादा खून आना, मासिकस्राव समय से पहले, ज्यादा मात्रा में आना, हाथों की उंगलियां सूजी हुई लगना, बच्चे के जन्म के समय जरायु से खून, आदि इसी तरह के बहुत से प्रकार के बहते हुए खून को रोकने के लिए इस औषधि का प्रयोग बहुत लाभकारी होता है। सिनामोनम औषधि पेट में गैस बनना या दस्त आना, शरीर में कमजोरी आना, शरीर में रक्तप्रवाह का सही तरह से न होना आदि में भी लाभकारी होती है।
तुलना-
सिनामोनम औषधि की तुलना इपिकाक, एको, बेल, कार्बो-वे, चायना, फेरम, हैमा, इपी, लैके, मर्क-का, नाइ-ए फास, सेबी, सिकेल, सीपि, सल्फ, ट्रिलि, अस्टिलैगो साइली और ट्रिलियम से की जाती है।
मात्रा-
मूलार्क या 6 शक्ति।
वृद्धि-
बच्चे के जन्म के बाद ज्यादा वजन उठाने से, चलते समय उल्टे सीधे पांव पड़ने से रोग बढ़ता है।
शमन-
आराम करने से रोग कम होता है।
प्रतिविष-
जानकारी-
कैंसर का रोग होने पर रोगी को रोजाना दालचीनी का काढ़ा लगभग 600 ग्राम तक पिलाना चाहिए।
हिचकी का रोग होने पर सिनामोनम औषधि की 3 बूंदों को थोड़ी सी चीनी के साथ मिलाकर रोगी को देने से हिचकी बंद हो जाती है।
सिस्टस कैनाडेंसिस Cistus Canadensis
जिन लोगों के गले में गांठें होने के लक्षण जैसे रोगी की आंखों में से मवाद आना, आदि लक्षण नज़र आते है तो उन लोगों को अगर सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि दी जाए तो ये उसके लिए बहुत लाभकारी होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों में सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि का उपयोग-
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- चेहरे की त्वचा पर जख्म होना, कैंसर का फोड़ा फट जाने पर उसमें से खून बहना, नाक की नोक में दर्द होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि का प्रयोग कराना अच्छा रहता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- मसूढ़ों में सूजन और खून आना, मुंह का स्वाद बहुत ज्यादा खराब होना, मुंह में ठण्डक महसूस होना, सांस में से बदबू आना, दांतों में पीब पड़ना और खून बहना, जीभ को बाहर निकालने में परेशानी होना आदि लक्षणों में रोगी को सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि खिलाने से आराम मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- कान में से पानी जैसा स्राव होते रहना, बदबूदार पीब निकलना, कानों के ऊपर या उनके आसपास के भाग में छोटे-छोटे दाने निकलना आदि कान के रोगों के लक्षणों में सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि का उपयोग लाभदायक रहता है।
कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण- जीभ और गले का ठण्डा महसूस होना, गले का बहुत नाजुक महसूस होना, जरा सी भी हवा गले में लगते ही दर्द शुरू हो जाना, गले की ग्रन्थियों में सूजन आना और पीब बन जाना, गर्दन में सूजन आ जाना, गले में गर्मी और खुजली सी महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को सिस्टस कैनाडेंसिस का सेवन कराने से आराम मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- भोजन करने से पहले और भोजन करने के बाद में आमाशय के अंदर ठण्डक सी महसूस होना, मन में बार-बार पनीर खाने की इच्छा करना जैसे लक्षण नज़र आने पर रोगी को सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
मल से सम्बंधित लक्षण- फलों को खाने से या कॉफी पीने से होने वाले दस्त, पानी जैसे पतले दस्त आना, बार-बार मलक्रिया के लिए भागना आदि लक्षणों के आधार पर सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि का सेवन लाभप्रद रहता है।
वक्ष (छाती) से सम्बंधित लक्षण - छाती में ठण्ड सी लगती हुई महसूस होना, गर्दन के ऊपर गांठे निकल आना, स्तनों का सख्त हो जाना, फेफड़ों में से खून आते रहना आदि लक्षणों में रोगी को सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि खिलाने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- कलाई में तेज दर्द होना, हाथों पर दाद से निकलना, पैरों का ठण्डा पड़ जाना, जनेन्द्रियों पर जख्म और उसके आसपास के हिस्सों में सख्त सी सूजन आ जाना आदि लक्षण नज़र आने पर रोगी को सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- गलें में ठण्डक सी लगने के कारण पूरी रात नींद न आ पाने जैसे लक्षणों में सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि काफी अच्छा असर करती है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - स्त्री के स्तन सख्त से हो जाना और उनमें जलन होना, ठण्डी हवा लगते ही परेशानी हो जाना, योनि में से बदबूदार पानी आना जैसे स्त्री रोगों के लक्षणों मे रोगी को सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि का सेवन नियमित रूप से कराने से लाभ मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रात को सोने के लिए जाने पर दमे के दौरे का अचानक उठ जाना, सांस की नली में ऐसा महसूस होना जैसे कि कुछ अटक गया हो, दमे का दौरा पड़ने से पहले अजीब सी सरसराहट महसूस होना आदि लक्षणों में सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि का सेवन काफी लाभप्रद रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- पूरे शरीर की त्वचा पर खुजली सी महसूस होना, त्वचा के ऊपर छोटी-छोटी दर्द वाली फुंसियां होना, ग्रन्थियों का सख्त हो जाना और उनमे जलन सी होना, हाथों की त्वचा सख्त, मोटी, झुर्रीयुक्त हो जाना, रात को सोते समय पूरे शरीर में खुजली होने के कारण नींद न आना, आधे सिर में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को अगर सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि दी जाए तो ये उसके लिए काफी लाभकारी होती है।
तुलना-
सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि की तुलना बेल, कल्क-कार्ब, ग्रैफ, हिपरसल्फ, कैलि-बाइ, नाइट्रऐसिड, फास और सल्फ के साथ कर सकते हैं।
वृद्धि-
हल्की सी ठण्डी हवा लगते ही, ज्यादा दिमाग वाला काम करने से, उत्तेजना से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
भोजन करने के बाद रोग कम हो जाता है।
प्रतिविष-
रस-टा, सीपिया आदि औषधियों का उपयोग सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
मात्रा-
किसी भी रोग के लक्षणों के आधार पर रोगी को सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि की 1 से 3 शक्ति दी जा सकती है।
जानकारी-
शरीर के जिस अंग से बदबूदार स्राव होता है उस स्थान को सिस्टस कैनाडेंसिस औषधि का घोल बनाकर धोने से स्राव रुक जाता है।
सिटरस वुल्गैरिस CITRUS VULGARIS
किसी व्यक्ति को सिरदर्द होने के साथ ही उल्टी आना, जी खराब होना, चक्कर आना, चेहरे का स्नायुशूल खासकर दाईं ओर, दम घुटना, बार-बार जम्हाइयां, नींद न आना आदि लक्षणों मे रोगी को सिटरस वुल्गैरिस औषधि बहुत ही लाभ करती है।
तुलना-
सिटरस वुल्गैरिस की तुलना सिटरस डिक्यूमाना (सीट्रस डीक्युमना) सिटरस लिमोनम (सीट्रस लीमोनम) सिटरिक एसिड, औरेशियम (ऑरैन्टियम) आदि से की जाती है।
क्लिमैटिस इरेक्टा Clematis Erecta
क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि गले की गांठों, गठिया, सूजाक रोग के रोगियों के लिए काफी लाभदायक है। इसके अलावा त्वचा, ग्रंथियों, जनेन्द्रियों तथा मूत्रांगों पर इसकी खास क्रिया होती है और उनमें भी ये अण्डकोशों पर अच्छा असर डालती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- कनपटियों में बहुत तेज दर्द होना, सिर में मवाद भरी हुई, खुजली वाली छोटी-छोटी फुंसियां निकलना, सिर चकराना जो खुली हवा में सही हो जाता है आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि का सेवन कराने से आराम पड़ जाता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों में जरा सी भी हवा लगने पर उनमें जलन होना, पलकों की पुरानी जलन, मीमोबों ग्रंथियों में सूजन और दर्द, आंखों के आगे अजीब-अजीब सी चीजे नज़र आना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि का सेवन कराना रोगी के लिए अच्छा रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण - चेहरे और नाक पर सफेद रंग के दाने से निकलना, चेहरा झुलसा हुआ सा लगना, नीचे वाले जबड़े की ग्रंथियों में सूजन वाली सख्त गांठें निकलना, चेहरे के दाएं तरफ के हिस्से आंखों, कानों और कनपटियों में दर्द महसूस होना आदि लक्षणों में क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि का प्रयोग लाभकारी सिद्ध होता है।
दांतों से सम्बंधित लक्षण- दांतों में बहुत तेज दर्द होना, दांतों का साधारण से ज्यादा बड़ा महसूस होना आदि दान्त रोग के लक्षणों में रोगी को क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि खिलाने से आराम आता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- दिन में किसी भी समय भोजन करने के बाद शरीर के सारे अंगों में कमजोरी सी महसूस होना, धमनियों में तपकन सा लगना आदि लक्षणों में क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि देने से लाभ होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण- अण्डकोषों का बिल्कुल सख्त हो जाना और उनमें बहुत तेज दर्द होना, सूजन आना, भारी होकर लटक जाना, लिंग में तेज दर्द होना, पेशाब के रास्ते में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना आदि पुरुष रोगों के लक्षणों में क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि का प्रयोग करना रोगी के लिए लाभकारी होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- पेशाब का बार-बार आना लेकिन बहुत ही कम मात्रा में, पेशाब करने की नली में जलन होना, पेशाब की नली का सिकुड़ जाना, पेशाब का बूंद-बूंद करके टपकते रहना आदि मूत्ररोगों में रोगी को क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- चमड़ी पर लाल रंग के छोटे-छोटे, खुजली वाले दाने निकलना, चेहरे, हाथों, खोपड़ी और सिर के पीछे के हिस्से में बहुत ज्यादा खुजली होना, ग्रंथियों गर्म, दर्द वाली सूजी हुई लगना, स्त्रियों के स्तनों की ग्रंथियों में कठोरता आ जाना और फोड़ा निकलना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि का प्रयोग कराना काफी लाभदायक सिद्ध होता है।
वृद्धि-
खुली हवा में रोग का बढ़ जाना। रात को, बिस्तर में, ठण्डे पानी से नहाने से, हर महीने अमावस के आने के पास के दिनों में रोग बढ़ जाता है।
तुलना-
क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि की तुलना क्लिमैटिस विटाल्बा, साईली, स्टैफिसे, पेट्रोलियम, ओलिएण्डर, सर्साप, कैन्थ, फास्फो-एसिड, पल्सा से की जा सकती है।
प्रतिविष-
ब्रायों, कैम्फर औषधि का उपयोग क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
मात्रा-
रोगी को क्लिमैटिस इरेक्टा औषधि की तीसरी से तीसवीं शक्ति तक देने से लाभ होता है।
क्लेरोडेण्ड्रेन इन्फोर्चुनेटम Clerodendron Infortunatum
क्लेरोडेण्ड्रेन इन्फोर्चुनेटम औषधि पाचनतंत्र में आई हुई किसी भी तरह की खराबी को दूर करने में बहुत असरदार साबित होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर क्लेरोडेण्ड्रेन इन्फोर्चुनेटम औषधि का उपयोग-
पेट से सम्बंधित लक्षण- बार-बार दस्त आना, जी मिचलाना, पेट में कीड़े होने के कारण दर्द होना, मल का पानी की तरह पतला, पीला, झाग के रूप में आना, लार का ज्यादा मात्रा में आना आदि लक्षणों में रोगी को क्लेरोडेण्ड्रेन इन्फोर्चुनेटम औषधि खिलाने से आराम आता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण - जिगर और तिल्ली में किसी तरह की खराबी आने के कारण होने वाला बुखार, दोपहर के बाद होने वाला बुखार, चेहरे और आंखें जलती हुई सी महसूस होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को क्लेरोडेण्ड्रेन इन्फोर्चुनेटम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
मात्रा-
मूलार्क, 3x, 6x, 30 शक्तियां।
कोबाल्टम Cobaltum
कोबाल्ट औषधि का सेवन मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) की स्नायविक कमजोरी का लक्षण नज़र आने पर काफी लाभकारी साबित होता है। इसके अलावा किसी भी तरह की मानसिक परेशानी के कारण शरीर में किसी प्रकार का दर्द उभर आना, सिर में हल्का-हल्का दर्द होना, जीभ के आसपास की त्वचा का फट सा जाना, जीभ पर सफेद सा मैल जम जाना, दांतों में दर्द, जिगर में दर्द, मलद्वार से खून आना, लेकिन मल के साथ खून का न आना, वीर्य का निकल जाना, नपुंसकता होना, कमर में दर्द होना, पेशाब की नली के पीछे के हिस्से में दर्द, अंगों का कांपना, पैरों पर पसीना आदि लक्षणों के आधार कोबाल्ट औषधि का सेवन कराने से रोगी को बहुत लाभ होता है।
विभिन्न प्रकार के रोगों के लक्षणों के आधार पर कोबाल्ट औषधि के उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- दिमाग में हर समय किसी प्रकार का तनाव रहना जिसके कारण शरीर में रोग पैदा हो जाना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में कोबाल्ट औषधि का सेवन बहुत लाभकारी होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में हल्का-हल्का सा दर्द होना, सिर को आगे की ओर झुकाने से ज्यादा दर्द होना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में कोबाल्ट औषधि का सेवन करने से बहुत लाभ होता है।
दांत से सम्बंधित लक्षण - दांत में दर्द होना, जीभ के आसपास की त्वचा का फट जाना, जीभ पर सफेद रंग की परत सी छा जाना आदि लक्षणों में कोबाल्ट औषधि बहुत ज्यादा लाभकारी साबित होती है।
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण - पेट में बहुत तेज दर्द होना, तिल्ली में भयंकर दर्द उठना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में कोबाल्ट औषधि का सेवन करने से कुछ ही समय में पेट के रोग के सारे लक्षण समाप्त हो जाते हैं।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण - अगर किसी व्यक्ति के मलद्वार से हर समय खून टपकता रहे लेकिन मलक्रिया के दौरान उसमे खून न आए इस तरह के लक्षणों में रोगी को कोबाल्ट औषधि का सेवन कराने से बहुत लाभ होता है।
पुरुषों से सम्बंधित लक्षण - दांएं अण्डकोश में दर्द होना, लिंग में से वीर्य निकलते रहना, नपुसंकता, कमर में दर्द होना, टांगों का कमजोर पड़ना, पेशाब की नली के पीछे के हिस्से में दर्द होना, जनेन्द्रियों और पेट पर भूरे रंग के निशान पड़ना आदि पुरुष रोग के लक्षणों में रोगी को कोबाल्ट औषधि का नियमित रूप से सेवन कराने से लाभ होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण - रात को नींद न आना, शरीर का बिल्कुल ढीला पड़ जाना, गंदे-गंदे सपने आना आदि ल़क्षणों में कोबाल्ट औषधि का सेवन बहुत लाभकारी साबित होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - हाथ की कलाई में हल्का दर्द उठना, जिगर की तरफ से जांघों में बहुत तेज दर्द होना, घुटने कमजोर पड़ जाना, अंगों का कांपना, पैरों में पसीना आना आदि लक्षणों में रोगी को कोबाल्ट औषधि देने से बहुत लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा एकदम रूखी सी होना, नितंब, ठोड़ी और सिर पर छोटी-छोटी नुकीली फुंसियों जैसे चर्म रोगों के लक्षणों में रोगी को कोबाल्ट औषधि का सेवन बहुत लाभ करता है।
तुलना-
कोबाल्ट की तुलना कैना इण्डिका, सीपिया, जिंकम, ऐंग्नस, सेलीनियम आदि से की जाती है।
मात्रा-
कोबाल्ट औषधि की छठी से तीसवीं शक्ति तक रोगी को देने से लाभ होता है।
कोका का उनखार (Alkaloid from Erythroxylon Coca)-कोकैना (cocaina)
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर कोकेना औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- हर समय दिमाग में कुछ न कुछ सोचते रहना, आंखों के सामने अजीब-अजीब सी चीजों का नज़र आने का वहम होना, हर किसी को गुस्से से घूरते हुए रहना, नींद न आना, अकेले बैठे रहने का मन करना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को कोकेना औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में ऐसा महसूस होना जैसे कि सिर में बहुत तेज जलन हो रही है या सिर फट रहा हो, आंखों की पुतलियों का फैल जाना, सिर में अजीब-अजीब सी चीजें रखी हुई महसूस होना आदि लक्षणों में कोकेना औषधि का सेवन अच्छा रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों से कम दिखाई देना, तनाव का बढ़ जाना, अनिमेष आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कोकेना औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
कंठ (गला) से सम्बंधित लक्षण - गले का सूखा हुआ महसूस होना, गले में जलन होना, दम सा घुटना, बोलने में परेशानी होना आदि लक्षणों में कोकेना औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - आमाशय का सख्त सा होना, भूख न लगना, मन में मीठा खाने की इच्छा होना, आंतों और आमाशय से खून का आना आदि लक्षणों में कोकेना औषधि का प्रयोग करना लाभकारी रहता है।
स्नायु प्रणाली से सम्बंधित लक्षण - पेशियों में खिंचाव आना, शराब का सेवन ज्यादा करने से शरीर में झटके लगना, बुढ़ापे में शरीर का कांपना, कंपकंपी के साथ शरीर के किसी अंग में लकवा मारना, हाथ और बाजुओं का सुन्न होना आदि लक्षणों में कोकेना औषधि नियमित रूप से लेने से लाभ होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण - लेटने के कई घंटों के बाद भी नींद न आना, हर समय बैचेनी सी महसूस होना, आदि लक्षणों के आधार पर कोकेना औषधि का सेवन अच्छा रहता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण - शरीर का बिल्कुल ठण्डा हो जाना, त्वचा का रंग बहुत ज्यादा पीला हो जाना आदि लक्षण नज़र आने पर रोगी को कोकेना औषधि देने से लाभ मिलता है।
तुलना-
कोकेना औषधि की तुलना स्टोवेन से की जा सकती है।
मात्रा-
निम्न शक्तियां।
जानकारी-
कोकेना औषधि त्वचा या मसूढ़ों के किसी तरह के रोग होने पर दिए जाने वाले हानिकारक परिणामों को दूर करती है।
कोलिन्सोनिया कैनाडेन्सिस Collinsonia Canadensis
कोलिन्सोनिया कैनाडेन्सिस औषधि दिल के रोगों और बवासीर के रोगों को दूर करने में बहुत ही उपयोगी मानी जाती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर कोलिन्सोनिया कैनाडेन्सिस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में हल्का-हल्का सा दर्द होना जो अक्सर खूनी बवासीर रोग के दब जाने के कारण होता है, बहुत समय पुराना नजला, जीभ पर पीले रंग की परत सी जम जाना, मुंह का स्वाद बहुत ज्यादा खराब हो जाना आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को कोलिन्सोनिया कैनाडेन्सिस औषधि देने से लाभ मिलता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण - मलान्त्र रोग के लक्षणो में रोगी को ऐसा लगता है जैसे उसके मलान्त्र में बड़ी नुकीली चीजें भरी पड़ी हो, मलान्त्र का सिकुड़ा हुआ सा महसूस होना, मलान्त्र में खून का बहुत ज्यादा जमा हो जाना, मल का सख्त रूप में आना, मुश्किल कब्ज के साथ-साथ खूनी बवासीर जो मलद्वार से बाहर फैल जाती है, मलद्वार और अवजठर, में हल्का-हल्का सा दर्द होना, स्त्रियों में गर्भावस्था के दौरान कब्ज होना, मासिक धर्म का कष्ट के साथ आना, पेट में बहुत ज्यादा हवा का भर जाना, कभी कब्ज और कभी दस्त हो जाना, मलद्वार में खुजली होना आदि लक्षणों के आधार पर कोलिन्सोनिया कैनाडेन्सिस औषधि का प्रयोग करना अच्छा रहता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिक धर्म का कष्ट के साथ, योनि में खुजली सी होना, गुप्तांगों में सूजन आना और उसका लाल होना, बैठने पर गुप्तांगों में परेशानी होना, झिल्लीदार कष्टार्तव के साथ-साथ कब्ज का रोग होना, योनि में खुजली होना, मासिकधर्म के दौरान स्राव आने के बाद जांघों में ठण्डक महसूस होना, योनि पर सूजन आना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कोलिन्सोनिया कैनाडेन्सिस औषधि देने से आराम आता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - ज्यादा तेज बोलने से या तेज आवाज में गाना गाने से खांसी उठना, आवाज की नली में बहुत तेज दर्द होना, गले में खराश सी होना, सूखी खांसी जो बहुंत परेशान कर देती है आदि लक्षणों के किसी भी व्यक्ति में नज़र आने पर रोगी को कोलिन्सोनिया कैनाडेन्सिस औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण - दिल की धड़कन का बहुत तेज होना, दिल में पानी भरना, दिल के रोग के लक्षणों के समाप्त होते ही बवासीर का रोग हो जाना या मासिकस्राव आना, दम सा घुटता हुआ महसूस होना, सांस लेने में परेशानी होना, बेहोशी छाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कोलिन्सोनिया कैनाडेन्सिस औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।
प्रतिविष-
नक्स वोमिका औषधि का उपयोग कोलिन्सोनिया कैनाडेन्सिस औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
तुलना-
कोलिन्सोनिया कैनाडेन्सिस औषधि की तुलना एस्कुलस, एलोज, हैमामे, लाइकोपस, नेगुण्डो, सल्फ, नक्स आदि से की जा सकती है।
वृद्धि-
भावुकता के कारण, मानसिक उत्तेजना बढ़ने से, ठण्ड से, आधी रात को, गर्भावस्था के दौरान रोग तेज हो जाता है।
शमन-
गर्मी से रोग कम हो जाता है।
मात्रा- कोलिन्सोनिया कैनाडेन्सिस औषधि का मूलार्क से तीसरी शक्ति तक।
कोलोसिन्थिस COLOCYNTHIS
कोलोसिन्थिस औषधि मोटे लोगों के लिए काफी लाभकारी सिद्ध होती है। इसके अलावा जो व्यक्ति बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा होता है, जिन स्त्रियों का मासिकस्राव बहुत ज्यादा मात्रा में आता है उनके लिए भी ये औषधि लाभकारी होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर कोलोसिन्थिस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - व्यक्ति का बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाना, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा हो जाना, दूसरों से नफरत करना आदि लक्षणों में रोगी को कोलोसिन्थिस औषधि देने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर को बाईं तरफ घुमाने पर चक्कर आना, सिर के दोनों तरफ दर्द के साथ उल्टी और जी मिचलाना, माथे में दर्द जो झुकने से, पीठ के बल सोने से या पलकें घुमाने से तेज हो जाता है। इन सिर के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को कोलोसिन्थिस औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों में इस तरह का दर्द होना जैसे आंखों में कुछ चुभ रहा हो, जो दबाव देने से कम हो जाता है, आंखों के गठिया के रोग के कारण होने वाली परेशानी, अधिमंथ विकसित होने से पहले आंखों के गोलों में बहुत तेज दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को कोलोसिन्थिस औषधि खिलाने से लाभ मिलता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण - चेहरे के बाईं तरफ सूजन और दर्द होना, स्नायु में दर्द के साथ ठण्ड सी महसूस होना, दांतों का लंबा महसूस होना, आमाशय का दर्द जो हमेशा दांत में या सिर में दर्द के साथ आता है आदि लक्षणों में कोलोसिन्थिस औषधि का प्रयोग करने से आराम आता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - मुंह का स्वाद बहुत ज्यादा कड़वा होना, जीभ का खुरदरा होना, भूख का ज्यादा लगना, आमाशय में कोई बहुत सख्त चीज पड़ी हुई मालूम होना आदि आमाशय रोग के लक्षणों में रोगी को कोलोसिन्थिस औषधि देने से लाभ होता है।
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण - पेट में बहुत तेज दर्द होना, जिसकी वजह से रोगी को पेट हाथों से पेट को दबाना पड़ता है, पेट में दर्द के साथ पिण्डलियों में ऐंठन आना, नाभि के नीचे के भाग में दर्द होना, कुछ भी खाने पर दस्त हो जाना, मल के साथ बदबू का आना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में रोगी को कोलोसिन्थिस औषधि का प्रयोग कराने से आराम मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - स्त्री के डिम्बाशय के अंदर किसी चीज के चुभा देने जैसा बहुत तेज दर्द महसूस होना, डिम्बग्रन्थियों में छोटी-छोटी गोल-गोल गांठें होना, नीचे की ओर दबाव के साथ ऐंठन आना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में रोगी स्त्री को कोलोसिन्थिस औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब का बार-बार आना, बदबू के साथ आना, लिंग के छेद में खुजली होना, लिंग में ऐंठन आना, पेशाब करने के दौरान पूरे पेट में दर्द होना, मलत्याग के समय पेशाब करने की नली में जलन होना, पेशाब के साथ सफेद रंग का स्राव आना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को कोलोसिन्थिस औषधि देने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - शरीर में सारे अंगों में एकसाथ खिंचाव पैदा हो जाना, दायें कंधे की त्रिकोणिका पेशी में दर्द होना, नितंब में ऐंठन के साथ दर्द होना, नितंबों से घुटनों तक दर्द होना, नितंबों के जोड़ अपनी जगह से हट जाना, जांघ की दाईं ओर नीचे की तरफ दर्द होना, पुट्ठे और कण्डुराओं का सिकुड़ जाना, सुन्नपन और उसके साथ दर्द होना, बाएं घुटनें के जोड़ में दर्द होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कोलोसिन्थिस औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
वृद्धि-
शाम को, गुस्सा करने से, भोजन करने के बाद, आराम करते समय, हरकत करने से, रोग बढ़ जाता है।
शमन -
मुड़कर, दोहरा हो जाने से, जोर से दबाने से, कॉफी पीने से, गर्म प्रयोगों से, हवा भरने में, पेट के बल लेटने से रोग कम हो जाता है।
प्रतिविष -
काफि, स्टैफिसै (रायल), कमो, औषधियों का उपयोग कोलोसिन्थ औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
तुलना -
लोबोलिया , डिपोडियम पैकटेटम, डायोस्कोरिया, कमोमि, काक्कूलस, मर्क्यू, प्लम्बम, मैग्नी-फा से कोलोसिन्थिस की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को उसके लक्षणों के आधार पर कोलोसिन्थिस औषधि की छठी से तीसवीं शक्ति तक देने से आराम आता है।
कोमोक्लैडिया डेंटाटा Comocladia Dentata
कोमोक्लैडिया डेंटाटा औषधि आंखों और त्वचा के रोगों में लाभदायक रहती है। इसके अलावा कमर के नीचे के हिस्से में, पेट में, जोड़ों और घुटनों में दर्द होना आदि लक्षणों में बहुत लाभकारी रहती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों में कोमोक्लैडिया डेंटाटा औषधि का उपयोग-
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों की रोशनी का कमजोर हो जाना, दांई तरफ की आंख से सिर्फ हल्की सी रोशनी ही दिखाई पड़ना, आंखों की पलकों का स्नायुशूल होने के साथ ऐसा महसूस होना जैसे कि आंखें काफी बड़ी हो गई हैं और बाहर निकल रही हैं ये परेशानी आग के पास बैठने से ज्यादा बढ़ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों में कोमोक्लैडिया डेंटाटा औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
वक्ष (छाती) से सम्बंधित लक्षण - स्त्री के बाएं तरफ के स्तन की गांठ का फूल जाना और उसमें दर्द होना, खांसी के समय छाती में बाईं ओर दर्द होना और वह दर्द कंधे के जोड़ तक पहुंच जाना आदि लक्षणों में रोगी को कोमोक्लैडिया डेंटाटा औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा पर खुजली के साथ लाल रंग की छोटी-छोटी फुंसियां निकलना, पूरी त्वचा का लाल हो जाना, कोढ़ होना, त्वचा पर लाल लकीरे सी पड़ जाना, छालों या फुंसियों जैसा छाजन होना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को कोमोक्लैडिया डेंटाटा औषधि देने से लाभ मिलता है।
वृद्धि-
छूने से, गर्मी से, आराम करते समय, रात को रोग बढ़ जाता है।
शमन -
खुली हवा में, खुजली करने से, घूमने-फिरने से रोग कम होता है।
तुलना-
कोमोक्लैडिया डेंटाटा औषधि की तुलना ऐनाकार्डि, यूफोर्बिय, रस से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को उसके रोग के लक्षणों के आधार पर कोमोक्लैडिया डेंटाटा औषधि की पहली से 30 शक्ति तक देने से लाभ मिलता है।
काण्डियुरैंगो Condurango
काण्डियुरैंगो औषधि का सेवन करने से भोजन पचाने की क्रिया तेज होती है तथा आमाशय की जिन ग्रंथियों से पाचक रस निकलकर मांस, दाल इत्यादि प्रोटिड-खाद्यों को पचाता है उन सभी ग्लैण्डों पर इस औषधि का सबसे ज्यादा असर पड़ता है। ये औषधि आमाशय के कैंसर के कारण पैदा हुए पेट के दर्द को भी समाप्त करती है। रीढ़ की हड्डी में टी.बी. होने के कारण व्यक्ति के चलने-फिरने की समाप्त हुई शक्ति को भी ये औषधि दुबारा लौटा देती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर काण्डियुरैंगो औषधि का उपयोग-
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - आमाशय की श्लैष्मिका झिल्ली में पुरानी जलन होना, आमाशय के अंदर जख्म के कारण जलन और दर्द होना, भोजन की नली के सिकुड़ जाने के कारण दर्द होना, भोजन करते ही उल्टी हो जाना आदि आमाशय के रोगों के लक्षणों में काण्डियुरैंगो औषधि का सेवन करने से बहुत जल्दी लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - मलद्वार की त्वचा का फट जाना, मलद्वार या होठों का कैंसर आदि लक्षणों में काण्डियुरैंगो औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
तुलना-
काण्डियुरैंगो औषधि की तुलना आस्टेरियस, कोनियम, हाइड्रे, आर्से आदि से की जाती है।
मात्रा-
काण्डियुरैंगो की मूलार्क या छाल, भोजन करने से पहले 0.32 ग्राम की मात्रा में पानी के साथ, अर्बुदों में तीसवीं शक्ति।
कोनियम मैकुलेटम Conium Maculatum
होम्योपैथिक चिकित्सकों के अनुसार होम्योपैथिक चिकित्सा किसी भी रोग के लक्षणों पर आधारित होती है। इसलिए इस चिकित्सा के शुरू करने से पहले रोगी और रोग के लक्षणों के बारे में अच्छी तरह से जानना बहुत जरूरी है इसी के बाद चिकित्सक को दवा देने में आसानी होती है जैसे कोनियम औषधि सिर के रोगों के इन लक्षणों के आधार पर दी जाती है-
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कोनियम मेकुलेटम औषधि का उपयोग-
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- ग्रंथियों में सूजन आना या उनका बढ़ जाना, ग्रंथियों में बहुत तेज दर्द होना, त्वचा पर किसी तरह की खरोंच आ जाने के बाद उसमें सूजन या पपड़ी जम जाने पर आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को कोनियम मेकुलेटम औषधि देने से लाभ मिलता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों की रोशनी कम हो जाना, आंखों के आगे धुंधलापन छा जाना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में रोगी को कोनियम मेकुलेटम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
खांसी से सम्बंधित लक्षण- बिना बलगम की खांसी आना, रात को सोते समय खांसी का ज्यादा तेज होना, गर्भावस्था में खांसी होना, बलगम का बाहर ना निकलना आदि खांसी के लक्षणों में रोगी को कोनियम मेकुलेटम औषधि नियमित रूप से देने से तुरन्त ही लाभ होता है।
कमजोरी से सम्बंधित लक्षण- सुबह सोने के बाद उठने पर शरीर का टूटा-टूटा सा रहना, उठने का मन न करना आदि लक्षणों में रोगी को कोनियम मेकुलेटम औषधि दी जाए तो लाभकारी होती है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर का घूमना, चक्कर आना, बहुत तेज दर्द होना, लेटने से चक्कर आ जाना आदि सिर के रोगों के लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को कोनियम मेकुलेटम औषधि दी जाए तो ये बहुत लाभ करती है।
वृद्धावस्था से सम्बंधित लक्षण - बूढ़े व्यक्तियों के शरीर के किसी अंग का काम करना बंद कर देना, लकवा मार जाना, मिर्गी के दौरे पड़ना आदि लक्षणों में कोनियम मेकुलेटम औषधि देने से लाभ होता है।
मस्तिष्क से सम्बंधित लक्षण- हर समय मन में कामुक विचारों के कारण दिमागी सन्तुलन बिगड़ना, अजीब-अजीब सी बातें करना, किसी की बात न सुनना, हर समय अकेले बैठे रहना, छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा होना, आदि दिमागी रोग के लक्षणों में अगर रोगी को कोनियम मेकुलेटम औषधि नियमित रूप से दी जाए तो ये उसके लिए बहुत लाभकारी होती है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- हर समय खट्टी-खट्टी डकारें आना, पेट का फूलना, पसीना ज्यादा आना, उल्टी के साथ काला सा पदार्थ निकलना आदि आमाशय रोगों के लक्षणों में रोगी को कोनियम मेकुलेटम औषधि देने से लाभ होता है।
मूत्ररोगों से सम्बंधित लक्षण- पेशाब करने में परेशानी होना, पेशाब का रुक-रुककर आना, पेशाब का कभी ज्यादा आना कभी अचानक कम हो जाना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को कोनियम मेकुलेटम औषधि देने से जल्द ही लाभ होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण- मन में कामुक विचारों के आने पर या स्त्री के छूते ही वीर्य निकल जाना, संभोग क्रिया के समय लिंग का उत्तेजित न हो पाना, हस्तमैथुन के कारण लिंग का कमजोर हो जाना, अंडकोषों का बढ़ जाना, संभोग क्रिया में सफल न हो पाना आदि पुरुष रोगों में अगर रोगी को कोनियम मेकुलेटम औषधि दी जाए तो उसको बहुत लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण- जनेन्द्रियों में जलन के साथ आने वाला प्रदर स्राव (योनि से पानी आना), मासिकस्राव के लगभग 10 दिन बाद प्रदरस्राव (योनि से पानी आना), डिम्बों का बढ़ जाना या सूजन आना, मासिकस्राव आने के साथ स्त्री के स्तनों में दर्द और सूजन आना, स्तनों का बिल्कुल कठोर हो जाना, सीने में जलन होना, गर्भाशय में सख्त फोड़ा होना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में कोनियम मेकुलेटम औषधि नियमित रूप से देने से बहुत लाभ होता है।
मल से सम्बंधित लक्षण- बार-बार मलत्यागने की इच्छा होना, मल का साफ न आना, पेट में कब्ज आना, ज्यादा दस्त होने के बाद दिल का कमजोर सा लगना आदि लक्षणों में रोगी को कोनियम मेकुलेटम औषधि का सेवन कराना बहुत उपयोगी होता है।
वृद्धि-
रात को, भोजन करने के समय, रोशनी से, दूध पीने से, सर्दियों के मौसम में ज्यादा ठण्डी हवा लगने से, लेटने पर, ज्यादा संभोग क्रिया करने से, हस्तमैथुन से, बिस्तर पर करवट बदलने से रोग बढ़ता है।
शमन-
उपवास करने से, अंधेरे में, हाथ-पैरों को नीचे लटकाकर बैठने से, दबाने से, नीचे बैठने से रोग कम होता है।
कोनियम Conium
कोनियम पुराने जमाने की एक बहुत ही प्रसिद्ध औषधि है, जिसकी एक दार्शनिक ने बहुत ही खूबसूरत व्याख्या की है। टांगों का कांपना, चलने-फिरने में परेशानी होना, कुछ दूर चलते ही शरीर का जवाब दे देना, कमजोरी, खून की कमी आदि लक्षण जो ज्यादा बुढ़ापे के लक्षण होते हैं इस समय कोनियम औषधि बहुत ही असरदार काम करती है। इसके अलावा मूत्ररोग, याददाश्त का कमजोर हो जाना, जनेन्द्रियों का कमजोर पड़ जाना, मासिकधर्म बंद होने की अवधि में बहुत परेशानी होना, स्त्री और पुरुषों को शादी से पहले होने वाली परेशानियां, सुबह-सुबह बिस्तर छोड़ने का मन न करना, शरीर का टूटा-टूटा सा लगना, नींद न आना आदि लक्षणों में भी ये औषधि अच्छा काम करती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर कोनियम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण - किसी भी चीज को रखकर कुछ ही समय में भूल जाना की कहां रखी है, किसी काम में मन न लगना, किसी से बात करने का मन न करना, दिमाग पर जरा सा जोर पड़ते ही सिरदर्द होना आदि लक्षणों में कोनियम औषधि बहुत अच्छा लाभ करती है और याददाश्त को भी तेज करती है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर का अचानक ऐसा लगना कि वह घूम रहा हो, जरा सा भी शोर होते ही सिर में दर्द होना, चक्कर के साथ एकदम बेहोश हो जाना, उल्टी आना, धूप में निकलते ही सिर का ऐसा लगना कि वह जल रहा हो, सिर पर कोई भारी सा वजन रखा हुआ महसूस होना आदि सिर के रोगों के लक्षण नज़र आने पर कोनियम औषधि के सेवन से लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - आंखों की पलकों पर छोटी-छोटी सी फुंसियां निकलना, आंखों की रोशनी का कम होना, आंखों से आंसुओं का बहना, आंख की पेशियों में लकवा मार जाना, मोतियाबिंद हो जाना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में नियमित रूप से कोनियम औषधि का सेवन करने से बहुत लाभ होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण - कानों से सुनाई न देना, कानों में से खून जैसा स्राव होना आदि कान के रोगों के लक्षणों में कोनियम औषधि का सेवन करने से कान के सारे रोग ठीक हो जाते हैं।
नाक से सम्बंधित लक्षण - अचानक नाक से नकसीर (नाक से खून आना) आ जाना, नाक में दर्द होना आदि नाक के रोग के लक्षणों में कोनियम औषधि बहुत लाभ करती है।
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण - जिगर में और उसके आसपास के हिस्से में बहुत तेज दर्द होना, पुराना पीलिया रोग, दाएं अवजठर में दर्द होना, सूजन आना, किसी चीज के पेट में घुसा देने जैसा दर्दनाक दर्द होना आदि पेट के रोगों के लक्षणों में कोनियम औषधि का नियमित सेवन बहुत अच्छा असर करता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - जीभ की जड़ में दर्द होना, दर्द के साथ उल्टी आना, कलेजे में जलन होना, लगातार डकारें आना, रात को सोते समय पेट में जलन होना, आमाशय में अम्लपित्त और कलेजे में जलन आदि आमाशय के रोगों के लक्षण प्रकट होने पर कोमानिया औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
मल से सम्बंधित लक्षण - हर थोड़ी-थोड़ी देर बाद मलत्याग के लिए जाने की इच्छा होना, मलत्याग के समय मलातन्त्र में जलन और परेशानी होना, मलत्याग के बाद हर बार शरीर के कांपने के साथ कमजोरी आना आदि लक्षणों के नज़र आने पर तुरन्त ही कोनियम औषधि देने से लाभ होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब करते समय परेशानी होना, पेशाब का रुक-रुककर आना, पेशाब का अपने आप ही बूंदों के रूप में हर समय टपकते रहना आदि मूत्ररोग के लक्षणों में कोनियम औषधि का नियमित रूप से सेवन करने से लाभ होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - पुरुष के अंदर संभोग की इच्छा तेज होने पर भी संभोग क्रिया में सफल न हो पाना, लिंग का कमजोर पड़ जाना, अण्डकोश का सख्त और बढ़ जाना आदि पुरुष रोगों के लक्षणों मे कोनियम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - मासिकधर्म का दर्द के साथ आना, स्तनों का ढीला पड़ना और सिकुड़ना, स्तनों के निप्पलों में सुई चुभने जैसा दर्द होना, उत्तेजना का बढ़ना, मासिकस्राव समय के बाद में आना और कम मात्रा में आना, योनि के बाहर के हिस्से में खुजली हो जाना, गर्भ का अपने आप ठहर जाना, पेशाब करने के बाद सफेद पानी आना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में स्त्री को नियमित रूप से कोनियम औषधि का सेवन कराने से कुछ समय में उसके सारे रोग दूर हो जाते हैं।
खांसी से सम्बंधित लक्षण - रात को सोते समय बहुत तेज-तेज सूखी खांसी होना, गले में एक जगह पर खराश बढ़ने पर अचानक खांसी हो जाना आदि खांसी के लक्षणों में कोनियम एक बहुत ही लाभकारी औषधि साबित होती है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- दोनों कंधों के बीच पीठ में दर्द होना, रीढ़ की हड्डी में दर्द होना, कमर और कमर के नीचे के हिस्से में दर्द होना आदि लक्षणों के नज़र आने पर रोगी को तुरन्त ही कोनियम औषधि का सेवन कराने से पीठ का हर तरह का दर्द कुछ ही समय में चला जाता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण - हाथ-पैरों की उंगलियों का सुन्न हो जाना, शरीर का कांपना, जनेन्द्रियों का कमजोर पड़ जाना, हाथों में पसीना आना आदि लक्षणों के प्रकट होते ही रोगी को कोनियम औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - अचानक बहुत तेज सूखी खांसी उठना, खांसते समय गले में दर्द होना, रात को सोते समय बहुत तेज खांसी का चलना, सांस अटक-अटककर आना, छाती में दर्द होना, थोड़ा सा चलते ही सांस तेजी से चलने लगना आदि लक्षणों में कोनियम औषधि रोगी को देने से कुछ ही समय में लाभ हो जाता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - बगल की ग्रंथियों में दर्द के साथ पूरे बाजू का सुन्न हो जाना, त्वचा और नाखूनों का पीला पड़ जाना, ग्रंथियों में सुई के चुभने जैसा दर्द होना, रात को सोते समय पसीना ज्यादा आना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में कोनियम औषधि बहुत ही लाभकारी साबित होती है।
वृद्धि-
सोने से, सोते समय करवट बदलने से, ब्रह्मचर्य का पालन करने से, मासिकधर्म आने के दिनों या उससे पहले, ठण्ड लग जाने से, शारीरिक या मानसिक परिश्रम करने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
भूखा रहने पर, अंधेरे में, अंगों को नीचे की ओर लटकाने से, हिलने-डुलने से, दबाव देने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
कोनियम औषधि की तुलना किसी तरह की चोट लगने पर आर्निका और रस-टाक्स के साथ, कैंसर के रोग मे आर्स के तथा ऐस्टेर के साथ और गिल्टियों में सूजन आने पर कैल्क और सोरि के साथ की जाती है।
मात्रा-
रोगी को कोनियम औषधि की छठी से तीसवीं शक्ति तक देने से लाभ मिलता है।
जानकारी-
ग्रंथियों के बढ़ जाने की हालत में और आंशिक लकवा मार जाने की हालत में रोगी को कोनियम औषधि ज्यादा मात्रा में भी दे सकते हैं।
कन्वैल्लैरिया मैजालिस Convallaria Majalis
कन्वैल्लैरिया मैजालिस औषधि दिल के रोगों में बहुत ही लाभकारी होती है। ये औषधि दिल को सही तरह से काम करने के लायक बनाती है। दिल के रोगों के लक्षणों जैसे दिल का कमजोर पड़ जाना, दिल में खून सही मात्रा में न पहुंच पाना, सांस लेने में परेशानी होना, दिल में पानी भरना, स्नायुतंत्र का कमजोर हो जाना आदि लक्षणों में ये औषधि लाभकारी होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कन्वैल्लैरिया मैजालिस का उपयोग-
दिल से सम्बंधित लक्षण - दिल के रोग के लक्षण जैसे- दिल में जलन होना, सांस लेने में परेशानी होना, दिल का बहुत तेज धड़कना, थोड़ा सा भारी काम करते ही दिल का कांपने लगना, नशे के कारण होने वाले दिल के रोग में रोगी को कन्वैल्लैरिया मैजालिस औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बंधित लक्षण - कमर और रीढ़ की हड्डी में ठण्ड लगने के साथ आने वाला बुखार, ठण्ड के समय बार-बार प्यास लगना और दर्द होना, बुखार के दौरान सांस लेने में परेशानी होना आदि बुखार के लक्षणों में रोगी को कन्वैल्लैरिया मैजालिस औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- कमर के नीचे के हिस्से में दर्द होना, टांग और पैर के अंगूठें में दर्द होना, हाथों का कांपना, घुटनों और कलाईयों में दर्द होते रहना आदि लक्षणों में रोगी को कन्वैल्लैरिया मैजालिस औषधि देने से कुछ ही समय में रोगी को आराम आ जाता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को पेशाब कम मात्रा में आना लेकिन बार-बार आना, पेशाब करने की जगह पर हल्का-हल्का सा दर्द होना, ऐसा महसूस होना जैसे कि मूत्राशय फूल गया हो, पेशाब में बदबू आना, शरीर पर सूजन आ जाना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को नियमित रूप सें कन्वैल्लैरिया मैजालिस औषधि देने से लाभ होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - स्त्री की योनि और पेशाब करने की नली में जलन या खुजली सी होना, गर्भाशय में दर्द होना, कमर के नीचे के हिस्सों के जोड़ों में दर्द होना, जो टांगों में भी पहुंच जाता है आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में स्त्री को कन्वैल्लैरिया मैजालिस औषधि सेवन कराने से लाभ होता है।
तुलना-
कन्वैल्लैरिया मैजालिस औषधि की तुलना डिजिटेलिस, क्रैटिगस और लिलियम से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को कन्वैल्लैरिया मैजालिस औषधि की तीसरी शक्ति देने से लाभ होता है।
जानकारी-
दिल की धड़कन बंद होने के लक्षणों में मूलार्क की 1 से 15 बूंदों की मात्रा रोगी को देने से लाभ होता है।
कोपेवा Copaiva
कोपेवा औषधि की साधारणत: पेशाब करने का यंत्र, पेशाब करने की नली, सांस लेने के यंत्र की श्लैष्मिक झिल्ली के यंत्र की श्लैष्मिक झिल्ली के ऊपर खास क्रिया होती है। पेशाब करने के यंत्र और पेशाब करने की नली में इसकी क्रिया होने के कारण ही रोगी के शरीर में सूजाक रोग की जलन के लक्षण पैदा हो जाते हैं, इसीलिए प्रमेह रोग की शुरुआती अवस्था में जब पेशाब करते समय जलन हो, बार-बार पेशाब आए, पेशाब बूंद-बूंद करके दर्द के साथ आए, पेशाब के साथ सफेद रंग का पतला मवाद के आने जैसे लक्षण नज़र आए तब ये जलन धीरे-धीरे पेशाब करने की नली तक जाकर पेशाब के साथ गोंद के जैसा लेसदार श्लैष्मा और खून निकलता है और पेशाब गंदा नज़र आता है, इस समय भी अगर कोपेवा औषधि का प्रयोग नियमित रूप से किया जाए तो लाभकारी होता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में कोपेवा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में दर्द होना, माथे के ऊपर हल्का-हल्का सा दर्द जो के सिर के पीछे के हिस्से में फैलकर फिर दुबारा माथे पर आ जाता है इसके साथ ही सिर में जलन भी हो जाती है, ज्यादा तेज आवाज होते ही रोगी के सिर में दर्द शुरू हो जाता है आदि सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को कोपेवा औषधि देने से लाभ होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण - नाक से बहुत ज्यादा गाढ़ा, बदबूदार बलगम सा निकलना जो रात को सोते समय गले के अंदर तक चला जाता है, नाक में जलन और खुश्की, नाक की हडि्डयों पर पपड़ी सी जम जाना आदि लक्षणों में कोपेवा औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण - भोजन करते समय भोजन का स्वाद ऐसा लगना जैसे कि उसमें बहुत ज्यादा नमक भरा हो, मासिकधर्म के दौरान या शीतपित्त निकलने के बाद पेट में बहुत से रोग होना, आंतों में हवा भर जाना, बार-बार मलत्याग के लिए जाना, मलक्रिया के समय बहुत ज्यादा परेशानी होना और दर्द होना आदि आमाशय रोगों के लक्षणों मे रोगी को कोपेवा औषधि देने से आराम मिलता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण - पेशाब का जलन के साथ और जोर लगाकर आना, पेशाब एक बार में न आकर बूंद-बूंद के रूप में आना, पेशाब रुक जाने के कारण मसाने में, मलान्त्र में और मलद्वार में दर्द होना, पेशाब करने की नली के मुंह पर सूजन आ जाना, पेशाब का रंग हरा गंदा सा होना आदि लक्षणों के आधार पर अगर नियमित रूप से कोपेवा औषधि का प्रयोग किया जाए तो मूत्ररोगी कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण - मल के साथ आंव का आना, पेट में दर्द होना, मलद्वार में बवासीर का रोग होने के कारण खुजली और जलन होना आदि लक्षणों में कोपेवा औषधि रोगी को खिलाने से लाभ होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - रोगी के अंडकोषों में सूजन आना और उनका मुलायम होना आदि लक्षणों में रोगी को कोपेवा औषधि देने से लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - स्त्री के योनि और मलद्वार में खुजली होने के साथ पीब के साथ खून आना, मासिकधर्म में स्राव ज्यादा और बदबू के साथ आना, इसके साथ ही चारों ओर भ्रमण करने वाला दर्द जो कूल्हों की हडि्डयों तक फैल जाता है, जी का मिचलाना आदि लक्षणों में रोगी को कोपेवा औषधि देने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - रोगी को खांसी के साथ बहुत ज्यादा मात्रा में मिट्टी के रंग का पीब जैसा बलबम आना, सांस की नलियों का नजला होना जिसके साथ हरे रंग का बदबूदार स्राव निकलता रहता है, आवाज की नली, सांस की नलियों आदि में खराबी होना आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को कोपेवा औषधि देने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा पर गुलाबी से रंग के छोटे-छोटे दाने निकलना, त्वचा पर जलन होना खासकर पेट के आसपास की त्वचा में, शीतपित्त के साथ बुखार और कब्ज होना आदि चर्मरोगों के लक्षणों में रोगी को कोपेवा औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
तुलना -
सैंटालम, कैनाबिस, कैथ, बैरोस्मा, क्यूबेबा, एपिस, वेस्पा, इरिजरोन, सेनेशियों, सीपिया से कोपेवा की तुलना की जाती है।
प्रतिविष -
बेला, मर्क्यू।
मात्रा-
कोपेवा औषधि की पहली से तीसरी शक्ति तक रोगी को देने पर अगर रोगी को लाभ न पहुंचे तो इस शक्ति को बढ़ाकर पहली से छठी शक्ति तक भी कर सकते हैं।
कोरेलियम Corallium
विभिन्न रोगों के लक्षणों में कोरेलियम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण - सिर में दर्द होना, सिर का भारी होना, दर्द जो आगे की ओर झुकने से तेज होता है, आंखें गर्म और बहुत तेज दर्द होना, माथे में दर्द जो बहुत गहराई में होता है, इसके साथ ही आंखों में गोलों के पीछे के हिस्से में दर्द होना, नाक से ठण्डी हवा में सांस लेने से दर्द तेज हो जाता है आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को कोरेलियम औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण - नाक में अजीब सी गंध महसूस होना, नाक के नथुनों में जख्म होना, बलगम का बहुत ज्यादा गले के अंदर जाना, शरीर में ठण्डी हवा सी लगती हुई महसूस करना, सूखा जुकाम, नाक बंद होना और उसमें जख्म होना, नाक से खून बहना आदि लक्षणों के आधार पर कोरेलियम औषधि लेने से आराम मिलता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण - मुंह का स्वाद बहुत ज्यादा खराब होना, बीयर का स्वाद अजीब सा लगना, बाएं जबड़े के नीचे के हिस्से में दर्द होना, हर समय नमक खाने का मन करना जैसे लक्षणों में रोगी को नियमित रूप से कोरेलियम औषधि खिलाने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण - खंखारने पर गले से बहुत ज्यादा बलगम निकलता है, गला बहुत ज्यादा नाजुक अवस्था में पहुंच जाता है और उससे जरा सी भी हवा बर्दाश्त नहीं होती, नाक से बहुत ज्यादा मात्रा में स्राव होता है, सांस के साथ अंदर जाती हुई हवा ठण्डी महसूस होती है, दम सा घोट देने वाली खांसी होना, बार-बार खांसी उठती रहती है, खांसी के साथ सांस लेने वाले जगहों का बहुत ज्यादा नाजुक होना, काली खांसी होने के बाद दम सा घुट जाना और थकान महसूस होना आदि लक्षणों में कोरेलियम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण - लिंग के मुंह और उसकी त्वचा पर जख्म होना, जिसके अंदर से पीला सा स्राव होता रहता है, रात को सोते समय वीर्य का निकल जाना, नपुसकता, जनेन्द्रियों पर बहुत ज्यादा पसीना आना आदि लक्षणों मे कोरेलियम औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा पर बड़े-बड़े लाल रंग के जख्म होना, हथेलियों और तलुओं में जलन होना, त्वचा पर लाल रंग के दाने होना जिसका रंग बाद में तांबे के जैसा होता है आदि लक्षणों में रोगी को कोरेलियम औषधि देने से लाभ मिलता है।
तुलना-
कोरेलियम औषधि की तुलना ड्रासेरा, बेला, मेफाई, कास्टि से की जा सकती है।
वृद्धि-
खुली हवा में, गर्म कमरे में, कमरा ठण्डा होने से रोग बढ़ जाता है और ओढ़ने या ढकने से रोग कम हो जाता है।
पूरक-
मात्रा-
कोरेलियम औषधि की तीसरी से तीसवीं शक्ति तक रोगी को देने से लाभ मिलता है।
साइनोडिन डैक्टिलोन Cynodin Dactylon
साइनोडिन डैक्टिलोन औषधि खून का बहना, खूनी दस्त, जलोदर, योनि में से पानी आना आदि रोगों में काफी लाभकारी साबित होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर साइनोडिन डैक्टिलोन का उपयोग-
रक्तस्राव (खून का बहाव)- उल्टी में खून आना, नाक से खून आना, किसी नुकीली चीज के कट जाने के कारण जख्म बनने के कारण खून बहना, खूनी बवासीर आदि के लक्षणों में साइनोडिन डैक्टिलोन औषधि बहुत लाभकारी होती है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- पेशाब का रुक-रुककर आना, कभी कम या कभी ज्यादा पेशाब आना, मूत्राशय की पथरी आदि मूत्ररोगों में साइनोडिन डैक्टिलोन औषधि नियमित रूप से सेवन कराने से बहुत लाभ होता है।
आंख से सम्बंधित लक्षण- आंखों से कम दिखाई देना, आंखों के आगे धुंधलापन छा जाना, मोतियाबिंद हो जाना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में रोगी को साइनोडिन डैक्टिलोन औषधि देने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- पुराने दस्त, सभी प्रकार के जलोदर, गर्मी के कारण उल्टी होना आदि लक्षणों में रोगी को साइनोडिन डैक्टिलोन औषधि का सेवन कराने से बहुत लाभ होता है।
मात्रा-
मूलार्क या 3x शक्ति।
साइप्रिपेडियम Cypripedium
गठिया रोग के कारण आई हुई कमजोरी, बच्चों के दांत निकलने के रोग या आंतों के रोग के कारण पैदा हुई स्नायविकता, स्त्रियों का मासिकधर्म बंद होने के बाद होने वाला सिरदर्द आदि लक्षणों के आधार पर साइप्रिपेडियम औषधि का इस्तेमाल करने से लाभ होता है।
तुलना-
अम्बरा, काली-ब्रोमें, वैलेरियाना, इग्नेशिया आदि से साइप्रिपेडियम की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
साइप्रिपेडियम औषधि का मूलार्क या 30 शक्ति तक रोगी को देना चाहिए।
कोका- एरिथ्रोक्सीलन कोका Coca Erythroxylon Coca
कोका- एरिथ्रोक्सीलन कोका औषधि उन लोगों के लिए लाभकारी होती है जिन लोगों को ज्यादा ऊंचाई पर जाने की आदत होती है जैसे पहाड़ पर चढ़ना। ज्यादा ऊंचाई पर चढ़ने में व्यक्ति को दिल का तेज धड़कना, सांस लेने में परेशानी होना, कमजोरी और नींद न आने जैसे लक्षण नज़र आने पर अगर ये औषधि दी जाए तो ये उस व्यक्ति के लिए बहुत लाभकारी साबित होती है।
विभिन्न प्रकार के लक्षणों के आधार पर कोका- एरिथ्रोक्सीलन कोका औषधि का उपयोग-
मस्तिष्क से सम्बंधित लक्षण-
किसी व्यक्ति का हमेशा अकेले बैठे रहना, किसी अजीब सी उलझन में घिरे रहना, चिड़चिड़ा होना, किसी से ढंग से बात न करना आदि लक्षणों में अगर रोगी को कोका- एरिथ्रोक्सीलन कोका औषधि दी जाए तो ये उसके दिमाग पर बहुत अच्छा असर करती है।
सिर से सम्बंधित लक्षण-
सिर के पीछे के हिस्से में दर्द होना, सिर का घूमना, सिरदर्द के साथ चक्कर आना और आंखों के आगे बिजली सी चमक आना, कानों में अजीब-अजीब सी आवाजें सुनाई देना, आंखों से एक ही चीज का दो-दो दिखाई देना, जीभ पर बहुत ज्यादा मैल जम जाना, ज्यादा ऊंचाई पर जाने से सिर में दर्द होना आदि सिर के रोगों के लक्षणो में रोगी को कोका- एरिथ्रोक्सीलन कोका औषधि का सेवन कराने से आराम पड़ता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण-
मुंह में बहुत तेज जलन होना जैसे कि कोई मिर्ची खा ली हो, शराब और तंबाकू का नशा करने का मन करना, पेट का फूलना, हर समय सिर्फ मीठा खाने का मन करना बाकी सब चीजों से अरुचि हो जाना आदि आमाशय रोग के लक्षणों में रोगी को कोका-एरिथ्रोक्सीलन कोका औषधि देने से लाभ होता है।
हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण-
दिल का अचानक बहुत तेज धड़कना, दिल का कमजोर होना, सांस लेने में परेशानी होना आदि दिल के रोगों के लक्षणों में अगर रोगी को नियमित रूप से कोका-एरिथ्रोक्सीलन कोका औषधि दी जाए तो कुछ ही समय में उसके दिल के रोग के सारे लक्षण समाप्त होकर वह व्यक्ति बिल्कुल स्वस्थ हो जाएगा।
अनिद्रा-
किसी व्यक्ति को नींद आने पर भी आराम न मिल पाना, शरीर का पूरे दिन थका हुआ सा रहना आदि लक्षणों में कोका-एरिथ्रोक्सीलन कोका औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
दांतों से सम्बंधित लक्षण-
दांतों में किसी तरह की सड़न होने में, दर्द होने पर आदि लक्षणों में रोगी को कोका-एरिथ्रोक्सीलन कोका औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
पुरुष-
किसी व्यक्ति को मधुमेह (डायबिटीज) होना और उसी के कारण नपुसंकता भी आ जाना आदि पुरुष रोगों के लक्षणों में कोका-एरिथ्रोक्सीलन कोका औषधि अच्छा असर करती है।
मूत्ररोग से सम्बंधित लक्षण-
बार-बार पेशाब करने की इच्छा करना, रात को सोते समय बिस्तर पर पेशाब निकल जाना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को कोका- एरिथ्रोक्सीलन कोका औषधि का सेवन कुछ दिन तक नियमित रूप से कराने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण-
रोगी व्यक्ति के गले से छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में बलगम का निकलना, आवाज का सही तरह से न निकलना, ज्यादा बोलने से गले में दर्द होना, सांस का फूलना, सांस लेने में परेशानी होना आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को रोजाना कोका- एरिथ्रोक्सीलन कोका औषधि देने से कुछ ही समय में उसके ये सारे सांस रोग के लक्षण समाप्त हो जाएंगे।
वृद्धि-
सीढ़ियां चढ़ने से, पहाड़ पर चढ़ने आदि से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
शराब पीने से, घुड़सवारी कराने से, खुली हवा में रोग कम हो जाता है।
तुलना-
आर्से, पौलिन, सिप्रिपीडियम, कमो आदि से कोका- एरिथ्रोक्सीलन कोका की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
मूलार्क या तीसरी शक्ति तक।
प्रतिविष-
क्यूप्रम मेटालिकम Cuprum Metallicum
विभिन्न रोगों के लक्षणों में क्यूप्रम मेटालिकम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- हर समय अपने आप से ही बाते करते रहना, दूसरों से सही तरह से बात न करना, डरते हुए से रहना, किसी चिंता में डूबे रहना, सिर में चक्कर आना, दिमाग में तथा आंखों को घुमाने पर बहुत तेज दर्द होना, दिमाग में सूजन आना आदि सिर के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को क्यूप्रम मेटालिकम औषधि देने से आराम मिल जाता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों में दर्द सा रहना, आंखें अंदर की ओर धंसी हुई, बिल्कुल लाल सुर्ख लगना, आंखों के अंदर के गोलों का तेज घूमना, आंखों का बंद होना आदि आंखों के रोगों के लक्षणों में क्यूप्रम मेटालिकम औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- चेहरा बिगड़ा हुआ सा लगना, होंठ नीले होना, होंठों के सिकुड़ने के साथ मुंह से झाग आना आदि लक्षणों में क्यूप्रम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- नाक में ऐसा लगना जैसे कि उसमें बहुत ज्यादा खून जमा हो गया हो जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को क्यूप्रम मेटालिकम औषधि खिलाने से आराम पड़ जाता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- मुंह का स्वाद बहुत ज्यादा कड़वा होना, बोलते समय बीच-बीच में हकलाना, लार का अधिक मात्रा में गिरना, जीभ का बाहर की तरफ निकलना, जीभ में लकवा मार जाना आदि मुंह के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्यूप्रम मेटालिकम औषधि का सेवन कराने से लाभ मिल जाता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- बहुत ज्यादा हिचकियां आना, जी मिचलाना, उल्टी आना, पेट में दर्द होना, दस्त होना, मुंह का स्वाद कड़वा होना, मन में ऐसा महसूस होना जैसे कि ठण्डा पानी पीना है आदि आमाशय रोगों के लक्षणों में क्यूप्रम मेटालिकम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
उदर (पेट) से सम्बंधित लक्षण- पेट में दर्द कभी कम और कभी तेज होना, पेट का सख्त सा होना, सिकुड़ जाना, शरीर के अंदर के अंगों के स्नायु में दर्द आदि पेट के रोगों के लक्षणों में रोगी को क्यूप्रम मेटालिकम औषधि देने से लाभ होता है।
मल से सम्बंधित लक्षण- मल का काले रंग का आना, मलक्रिया के दौरान मल के साथ खून आना, दर्द होना, कमजोरी महसूस होना, हैजा होने के साथ ही पेट और पिण्डलियों में मरोड़े उठना आदि लक्षणों के आधार पर क्यूप्रम मेटालिकम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण- मासिकधर्म में स्राव का समय के काफी बाद में आना और काफी दिनों तक रहना, मासिकस्राव से पहले या उसके दौरान ही मासिकस्राव दब जाने के बाद ऐंठन जो छाती तक फैल जाती है, पैरों का पसीना दब जाने के बाद पैदा होने वाले रोग, बच्चे को जन्म देते समय होने वाला दर्द आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में क्यूप्रम मेटालिकम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
हृदय (दिल) से सम्बंधित लक्षण- दिल में दर्द होना, नाड़ी का धीरे-धीरे चलना, दिल की धड़कन तेज अनियमित होना आदि दिल के रोगों के लक्षणों के आधार पर रोगी को क्यूप्रम मेटालिकम औषधि खिलाने से आराम मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को ऐसा महसूस होना जैसे कि दम घुट रहा हो जो आधी रात के बाद ज्यादा हो जाता है, छाती में आक्षेप और सिकुड़न होना, काली खांसी होना जिसमें पानी पीने से आराम मिलता है, इसके साथ ही उल्टी और चेहरा नीला सा पड़ना, गले में परेशानी होना, सांस लेने में परेशानी होने के साथ ही आमाशय में खराबी होना, मासिकस्राव से पहले आक्षेपयुक्त सांस लेने में परेशानी होना, दिल में दर्द होने के साथ दमे के लक्षण तथा ऐंठन आना आदि लक्षणों के आधार पर क्यूप्रम मेटालिकम औषधि का सेवन नियमित रूप से करने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- हाथ ठण्डे होना, हथेलियों में ऐंठन, पेशियों में फड़कन और फैलना, शरीर के अंगों में कमजोरी होना, पैरों की पिण्डलियों में तलुवों में ऐंठन, मिर्गी का दौरा पड़ना जो घुटनों से शुरू होता है, पेशियों का अनियमित सुकड़ाव जो उंगलियों से शुरू होता है जैसे लक्षणों के आधार पर क्यूप्रम मेटालिकम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- त्वचा का रंग नीला होना, त्वचा का बिल्कुल ठण्डा पड़ना, त्वचा पर जख्म होना, खुजली वाले चकते पड़ना, जोड़ों पर फुंसियां होना, कोढ़ आदि चर्मरोगों के लक्षणो में क्यूप्रम मेटालिकम औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- बहुत गहरी नींद आने के साथ शरीर में झटके लगना, नींद के दौरान पेट में लगातार गड़गड़ाहट होना आदि लक्षणों के आधार पर क्यूप्रम मेटालिकम औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
प्रतिविष-
बेला, हीपर, कैम्फर, डलकामारा, स्टैफिसै, कोनियम आदि औषधियों का उपयोग क्यूप्रम मेटालिकम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
पूरक-
कल्केरिया।
तुलना-
क्यूप्रम मेटालिकम औषधि की तुलना आर्स, बेल, कैम्फ, कैन्थ, कार्बो-वे, डेजी, इपी, कालीपा, लैके, लैरों, नाजा, ओपि, फास, सिके, स्ट्रेम, टेरा, और वैरेट्रम से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी के लक्षणों को जानकर अगर उसे क्यूप्रम मेटालिकम औषधि की छठी से तीसवीं शक्ति तक दी जाए तो लाभ होता है।
वृद्धि-
मासिकधर्म के दौरान, उल्टी करने से, छूने से रोग बढ़ता है।
शमन-
ठण्डा पानी पीने रोग कम हो जाता है।
कुरारी-वूरारी Curare- Woorari
अगर किसी भी व्यक्ति के निम्नलिखित लक्षण नज़र आते है जैसे- पैरों की मांसपेशियों में लकवा मार जाना, चल-फिर न पाना, सांस की मांसपेशियों में लकवा मार जाना, शरीर के किसी भी अंग के मुड़ने में परेशानी होना, स्नायु तंञ में कमजोरी आ जाना, किसी काम में मन न लगना, सिर में तेज दर्द होना, आंखों के आसपास काले धब्बे होना, कानों में बहुत तेज दर्द होना, जीभ और मुंह दायीं ओर मुड़ जाना, स्त्रियों का मासिकधर्म समय से पहले आना, मासिकधर्म के दौरान सिर और गुर्दों में दर्द होना, खांसते-खांसते उल्टी होना। इस तरह के लक्षणों में कूरारी-वुरारी बहुत ही लाभकारी औषधि साबित होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर कुरारी-वुरारी औषधि का उपयोग-
दिमाग से सम्बंधित लक्षण - मन में हर समय अजीब सी हलचल मचते रहना, अपने फैसले को बार-बार बदलते रहना, हर समय सोचते रहना आदि दिमागी रोग के लक्षण प्रकट होने पर कुरारी-वुरारी औषधि बहुत ही लाभ करती है।
सिर से सम्बंधित लक्षण - पूरे सिर में इस तरह का दर्द होना जैसे की बहुत सारी सुईंया एक साथ चुभ रही हो, सिर में किसी तरह का तरल पदार्थ भरा होना लगना आदि सिर के रोग के लक्षणों में कुरारी-वूरारी औषधि बहुत ही लाभ करती है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण - किसी व्यक्ति की आंखों में कोई रोग हो जाने पर किसी तरह के लक्षण प्रकट होने पर जैसे, आंखों में कुछ चुभने जैसा दर्द होना, आंखों के आगे अंधेरा छा जाना, दाईं आंख की पलक का गिर जाना आदि में कुरारी-वूरारी औषधि बहुत लाभकारी साबित होती है।
कान से सम्बंधित लक्षण - कान में बहुत तेज दर्द होना, कान के खण्डकों का सूज जाना, उनमें अजीब-अजीब सी आवाजें आना आदि कान के रोगों के लक्षण पैदा होने पर रोगी को कुरारी-वूरारी औषधि नियमित रूप से सेवन कराई जाए तो रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण - नाक से बहुत ज्यादा बलगम आना, नाक के ऊपर गांठें पैदा हो जाना, नाक से बदबू आना आदि नाक के रोगों के लक्षणों में कुरारी-वूरारी औषधि बहुत लाभदायक है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण - चेहरे और मुंह पर लकवा मार जाना, जीभ और मुंह दोनों दाईं तरफ हो जाना, चेहरा बिल्कुल लाल पड़ जाना आदि लक्षणों के नज़र आने पर रोगी को तुरंत ही कुरारी-वूरारी औषधि का सेवन कराना चाहिए।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण - स्त्रियों का मासिकधर्म समय से पहले आना और बहुत दर्द के साथ आना, मासिकधर्म के दौरान पेट, गुर्दों और सिर में दर्द होना, गाढ़ा सा बदबू के साथ स्राव आना जैसे मासिकधर्म के रोग के लक्षणों के नज़र आने पर स्त्री को तुरंत ही कुरारी-वूरारी औषधि का सेवन कराना चाहिए।
सांस से सम्बंधित लक्षण - सांस लेने में परेशानी होना, सूखी खांसी होना, खांसते-खांसते उल्टी होना जाना, कमजोरी आना आदि लक्षणों के प्रकट होते ही रोगी को कुरारी-वूरारी औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
चमड़ी (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण - त्वचा पर कोढ़ निकल आना, फोड़े निकलना, खुजली होना, त्वचा पर भूरे रंग के दाग-धब्बे हो जाना आदि चर्मरोग के लक्षणों में रोगी को कुरारी-वूरारी औषधि का सेवन कराने से आराम आता है।
वृद्धि-
नमी से सदिर्यों के मौसम में, ठण्डी हवा में, आधी रात के बाद 2 बजे, शरीर के दाएं भाग का बढ़ना।
तुलना-
सिस्टिसिन, कोनियम, कास्टिकम, क्रोटेलस, नक्स आदि से कुरारी-वूरारी की तुलना की जाती है।
मात्रा-
कुरारी-वूरारी औषधि की छठी से तीसवी शक्ति तक रोगी को देने से आराम आता है।