मेडोराइनम (Medorrhinum)
मेडोराइनम (Medorrhinum)
मेडोराइनम औषधि सूजाक रोग को ठीक करने के लिए एक रामबाण औषधि है। इस औषधि का प्रयोग पुराने वात रोगों को ठीक करने में लाभदायक है।
ऐसे छोटे बच्चे जो अधिक दुबले तथा पतले होते हैं जो बहुत कुछ खाने पीने के बावजूद भी पतले के पतले ही रहते हैं तथा सूखे रोग से पीड़ित होते हैं। दमा के रोग से पीड़ित व्यक्ति, जिसे सदैव जुकाम होता रहता है। आंख आ गई हो, सिर पर या चेहरे पर दाद हो या चर्म रोग हो गया हो गया हो। स्त्री के डिम्बाशय में दर्द हो रहा हो, मासिकधर्म के समय में अनियमित स्राव हो रहा हो। पुरुष से संभोग क्रिया करने की इच्छा न हो, दिन पर दिन पतली होती जाती हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगियों का कई प्रकार की औषधि से इलाज करने के बाद भी कोई फल नहीं मिल रहा हो तो ऐसे रोगी का इलाज मेडोराइनम औषधि से करने पर रोग जल्दी ही ठीक होने लगता है और कुछ ही दिनों में रोगी आरोग्य हो जाता है।
कुछ स्त्रियों को शादी होने के बाद से ही डिम्बाशय में दर्द होने लगता है, मासिकधर्म का समय अनियमित हो जाता है, प्रदर रोग हो जाता है, इस प्रकार के लक्षण को ध्यान से देखने पर पता चलता है कि उसे सूजाक रोग के जैसा ही रोग हो गया है। ऐसी अवस्था में स्त्री के इस रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि विशेष रूप से उपयोगी है।
ऐसे पुरुष जो वात या गठिया रोग से पीड़ित हैं, उनके रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
अधिक खतरनाक कैंसर (स्कीरसए करिनोमा ओर कैंसर) रोग, चाहे रोग नया हो या पुराना सभी प्रकार के कैंसर के रोग को ठीक करने के लिए तथा साइकोसिस औषधि के दुष्प्रभाव को खत्म करने के लिए मेडोराइनम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
मेडोराइनम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- ऐसे रोगी जिन्हें सूजाक रोग हो या वात या गठिया के रोग से पीड़ित हो तथा उनकी स्मरणशक्ति अधिक कमजोर हो गई हो, किसी से बातचीत करते समय बातचीत के सिलसिले को भूल जाता हो, किसी भी बात को बिना रोए कह नहीं सकता हो, ऐसा महसूस हो रहा हो कि समय बहुत धीमा चल रहा है जिसके कारण वह बहुत जल्दी में रहता है, उसे आरोग्य होने की आशा नहीं रहती है, मन को एक जगह पर लगाना मुश्किल हो जाता है, पागल हो जाने का भय रहता है, अधिक बेचैनी रहती है और अंधेरे से डर लगता है और हर वक्त ऐसा महसूस होता है कि मेरे पीछे कोई है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित व्यक्ति कभी-कभी तो आत्महत्या करने की सोचता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मस्तिष्क में जलन होने के साथ ही दर्द हो रहा हो तथा दर्द का असर सिर के पिछले भाग में अधिक हो रहा हो, सिर भारी और पीछे की ओर खिंचा सा लग रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब गाड़ियों में सफर करता है तो उसके सिर में दर्द और भी तेज होने लगता है या फिर कोई कठिन कार्य को करता है तो सिर में दर्द होने लगता है, सिर के ऊपरी भाग में दबाव तथा भारीपन महसूस होता है, खोपड़ी में खुजली तथा रूसी हो जाती है। ऐसे लक्षणों के होने पर मेडोराइनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंख से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी सूजाक रोग से पीड़ित हो या उसे कोई वात या फिर गठिया का रोग हो गया है तथा इसके साथ ही वह हरेक चीज को एकटक से देखता हो, उसकी आंखों में दर्द हो रहा हो और ऐसा महसूस हो रहा हो कि आंखों में कोई तिनका चला गया है, पलकें उत्तेजित तथा जलनयुक्त हो जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी सूजाक रोग से पीड़ित हो या उसे कोई वात या फिर गठिया का रोग हो गया है तथा इसके साथ ही उसके कानों में कंपन हो रही हो तथा कान से ठीक तरह से सुनाई न दे रहा हो, दाएं कान में तेज दर्द हो रहा हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी रोगी को सूजाक या वात या फिर गठिया रोग हो गया हो तथा इसके साथ ही उसके नाक में तेज खुजली हो रही हो, नाक के नोक पर ठण्ड महसूस हो रही हो, नाक के अन्दरूनी भाग में रुकावट उत्पन्न हो रही हो, नाक से अधिक मात्रा में कफ जैसा पदार्थ बह रहा हो तथा ग्रसनी (भोजननली) से भी कफ जैसा पदार्थ निकल रहा हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का सारा शरीर पीला पड़ गया हो, चेहरे पर मुहासें हो या फिर लाल रंग के धब्बे हो और स्त्रियों का मासिकधर्म शुरु होने के समय में चेहरे पर छोटे-छोटे फोड़े निकल आएं हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का उपयोग फायदेमंद है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- गठिया या वात या फिर सूजाक रोग से पीड़ित रोगी की जीभ मोटी और कत्थई लेप से युक्त हो या मुंह पर फफोलेदार घाव या गले-सड़े घाव हो गये हो, होंठ व गले के भीतरी भागों में छाले पड़ गये हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी के जीभ का स्वाद तांबे जैसा हो गया हो, बदबूदार डकारें आ रही हो, भोजन करने के बाद भी तेज भूख लग रही हो, अधिक प्यास लग रही हो, नमक, शराब, मिठाइयां आदि का सेवन करने की इच्छा अधिक हो रही हो, गर्म पेय-पदार्थ पीने की अधिक इच्छा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी तथा गर्भकाल के समय में इस प्रकार के लक्षण स्त्री रोग में है तो मेडोराइनम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी के यकृत और प्लीहा में तेज दर्द हो तथा पेट के बल लेटने पर कुछ आराम मिल रहा हो तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी जब पीछे की ओर झुकता है तो उसे मलत्याग करने की इच्छा होती है, रोगी के गुदाद्वार की पिछली सतह पर दर्दनाक गोला रखी हुई महसूस हो रही हो, जब रोगी मलत्याग करता है तो उसके मल से अधिक बदबू आती है तथा मलद्वार में अधिक तेज खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पेशाब करते समय तेज दर्द होता है तथा इसके साथ ही मूत्राशय में दबाव महसूस होता है, रात के समय में पेशाब अधिक लगता है, अण्डाशय में दर्द महसूस होता है, पेशाब करने पर पेशाब की धार बहुत धीमी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्री रोगी के योनि में तेज खुजली होती है तथा मासिकधर्म के समय में तेज बदबू के साथ ही स्राव अधिक होता है, स्राव अधिक मात्रा में गहरे रंग के थक्केदार (जम हुआ) रूप में होता है, लेकिन जब ये कपड़े पर पड़ता है तो दाग नहीं छोड़ता है, बार-बार पेशाब करने का मन करता है। स्त्री के गर्भाशय के पास छूने पर दबाव महसूस होता है। प्रदर रोग होने के साथ ही ऐसा स्राव होता है कि वह त्वचा को छील देने वाला होता है, स्राव से मछली की तरह बदबू आती है। स्त्री रोगी को सेक्स से सम्बन्धित रोग हो गया हो तथा जननेन्द्रियों पर मस्से हो तथा इसके साथ ही डिम्बशूल (गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली में दर्द) हो और बाईं ओर या एक डिम्बग्रन्थि से दूसरी डिम्बग्रन्थि तक अधिक दर्द हो रहा हो। स्त्री को बांझपन का रोग हो गया हो। मासिकधर्म के समय में योनि से अधिक मात्रा में खून बह रहा हो जिसके कारण अधिक कमजोरी आ गई हो। स्तन अधिक ठण्डे हो गए हो तथा उसमें दर्द हो रहा हो, छूने पर दर्द महसूस हो रहा हो। इस प्रकार स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी स्त्री को है तो उसे मेडोराइनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पुरुष से सम्बन्धित लक्षण:- स्वप्नदोष का रोग हो गया हो तथा इसके साथ ही शरीर में अधिक कमजोरी आ गई हो। नपुंसकता रोग हो गया हो। मूत्राशय मार्ग में पीब जैसा पदार्थ बन गया हो तथा इसके साथ ही मूत्रमार्ग में तेज दर्द हो रहा हो। मूत्रमार्ग में जलन हो रही हो। पुर:स्थग्रन्थि में तेज दर्द हो रहा हो तथा घाव हो गया हो और साथ ही बार-बार पेशाब बरने की इच्छा हो रही हो और मूत्राशय में दर्द हो रहा है। इस प्रकार के पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का सेवन करना चाहिए।
श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को भारी घुटन महसूस हो रही हो, पढ़ते समय खराश हो रही हो। छाती तथा स्तनों में दर्द हो रहा हो। रात के समय में खांसी अधिक होती है। दमा रोग हो गया है। टी.बी. (यक्ष्म रोग) की शुरुआती अवस्था, स्वरयंत्र में तेज दर्द हो रहा हो। सांस लेने में कष्ट हो रहा हो। तेज खांसी हो और यदि रोगी को आमाशय के बल लेटने से कुछ आराम मिल रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का प्रयोग करना लाभकारी है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी को पीठ में दर्द होने के साथ ही जलन तथा गर्मी महसूस हो रही हो। पैर में भारीपन महसूस हो रहा हो तथा रात के समय में दर्द हो रहा हो। चलते समय टखने अपने आप मुड़ जाते हैं तथा हाथ-पैरों में जलन होती है। उंगुलियों के जोड़ों में दर्द तथा उनमें आस-पास के भागों में सूजन आ गई हो या गठिया का रोग हो गया हो। हडि्डयों के जोड़ों में दर्द हो तथा एड़ियां और अंगूठों के ऊपरी सिरे को छूने पर दर्द महसूस हो रहा हो, तलुवों में दर्द हो, मुट्ठी को भींचने पर आराम मिल रहा हो आदि लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
त्वचा से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर की त्वचा पीली पड़ गई हो तथा इसके साथ ही त्वचा पर तेज खुजली मच रही हो, रात के समय में और उसके बारे में सोचने से खुजली और भी तेज हो जाती है। मलद्वार के आस-पास अंगारे जैसा लाल दाना हो गया हो तथा उसमें तेज दर्द हो रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार होने के साथ ही ऐसा मन करता है कि पंखा चलाकर आराम करता रहूं। पीठ के ऊपर तथा नीचे ठण्ड, हाथ-पैर और भुजा के अगले भाग पर ठण्ड महसूस होती है, चेहरे और गर्दन में गर्मी महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को रात के समय में शरीर से पसीना निकलता है और टी.बी. रोग के लक्षण भी दिखाई देने लगते हैं। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए मेडोराइनम औषधि का सेवन करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी को सूजाक, गठिया या वात रोग हो गया हो तथा इसके साथ ही रोगी को सपने अधिक आते हैं तथा सपने में यह देखता है कि वह पानी पी रहा है, ऐसे रोगी घुटने से छाती को लगा कर सोता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सूखा रोग (रीकेटस) से सम्बन्धित लक्षण :- ऐसे लड़के या लड़कियां जिनकी त्वचा का रंग पीला हो गया हो तथा जिनका विकास रुक गया हो तथा अधिक कमजोरी हो गई हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
लिम्फैटिक गिलटि्टयों (लीम्पेथिक गलाइण्डस) से सम्बन्धित लक्षण :- लिम्फैटिक गिलटियों के बढ़ने के साथ ही सारे शरीर में गर्मी महसूस हो रही हो तथा दर्द हो रहा हो या फिर बच्चों का सिर बड़ा हो गया हो और कूबड़ निकल गया हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
दर्द से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का सूजाक रोग दब जाने के कारण उत्पन्न गठिया या वात रोग में दर्द, खिंचाव होने के कारण दर्द और भी तेज हो जाता हो, ऐसा महसूस होता है कि सारा शरीर कसा हुआ है, सारे शरीर में दर्द हो रहा हो और ऐसा महसूस हो रहा हो कि किसी ने कुचल दिया हो, सारा शरीर कांपता रहता है, अधिक कमजोरी आ जाती है, शरीर ठण्डा पड़ जाता है तथा रोगी को हर समय ठण्डी हवा में रहने का मन करता है, खुली हवा अच्छी लगती है, शरीर ठण्डा रहने पर भी रोगी ओढने को फेंक देता है, ठण्डा पसीना भी आता है, शराब पीना अच्छा लगता है, नमक, मिठाई, बियर, बर्फ, खटाई, सन्तरा का सेवन अच्छा लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेडोराइनम औषधि का सेवन करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
रोगी जब रोग के विषय में सोचता है तब, सूर्योदय से लेकर सूर्यास्त के समय तक, गर्मी से उसके रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
समुद्र के किनारे पर रहने, आमाशय के बल लेटने से, आर्द मौसम (बारिस का मौसम) में रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
स्तन का वह रोग जिसमें अपने आप दूध बहने लगता है, उस रोग को ठीक करने के लिए गैलेगा तथा लैक्टुका औषधियों से मेडोराइनम औषधि की तुलना कर सकते हैं।
सल्फ, जिंक तथा सिफिली औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मेडोराइनम औषधि से की जा सकती है।
मात्रा (डोज) :-
मेडोराइनम औषधि की उच्चतम शक्तियों का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इस औषधि के प्रयोग को बार-बार नहीं दोहराना चाहिए।
मैग्नीशिया कार्बोनिका (Magnesia carbonica)
रोगी का शरीर सुस्त सा रहता है, खुली हवा में रहने की इच्छा होती है, लेकिन हवा से परेशानी भी होती है, बुखार होने के साथ रोगी को चादर ओढ़ने का मन करता है, प्रतिदिन शाम के समय में रोगी को बुखार चढ़ता है और बुखार के एक्कीसवीं दिन कोई खास लक्षण उत्पन्न होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब गर्म चीजें तथा गर्म पानी का सेवन करता है तो उसे शरीर में गर्मी महसूस होती है और शरीर से पसीना आता है तथा शाम के समय में प्यास लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
यदि बच्चे के पूरे शरीर से खट्टी बदबू आ रही हो तथा उन्हें फोड़े-फुंसियों की शिकायत रहती हो तो ऐसे बच्चे का उपचार करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
अधिक दुबली-पतली स्त्रियां जो जरायु (गर्भाशय के रोग) रोग से पीड़ित होती है, उन्हें मासिकधर्म के समय में और भी अधिक परेशानी होती है तथा इसके साथ ही शरीर के कई अंग सुन्न पड़ जाते हैं, मानसिक तनाव अधिक रहता है, स्त्री को अधिक शोरगुल माहौल अच्छा नहीं लगता है, नाड़ियां कमजोर हो जाती है, कब्ज की समस्या बनी रहती है, रोगी स्त्री कभी-कभी चौंक पड़ती है या ठण्डे मौसम या अत्यधिक दर्द महसूस करती है।
मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जिस अंग का सहारा लेकर लेटता है, सिर के उसी भाग की ओर चुभन सी दर्द होती है, ऐसा महसूस होता है कि जैसे बाल उखाड़े जा रहे हो, मानसिक परेशानी भी अधिक हो जाती है, सिर में खुजली मचने लगती है और नमीदार मौसम में खुजली और भी तेज होने लगती है। खुजली रोगी को अक्सर दायें नेत्रकोटर के कोण के ऊपरी भाग में होता है तथा इस भाग में दर्द भी होता है, आंखों के सामने काले धब्बे पड़ जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की सुनने की शक्ति कम हो जाती है। रोगी बहरेपन के रोग से पीड़ित होता है तथा उसके सुनने की शक्ति में उतार-चढ़ाव होता रहता है, कान में सुन्नपन महसूस होता है, कान के बीच के भाग में सुजन आ जाती है तथा कान पर दबाव महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरे के एक ओर फाड़ता हुआ दर्द महसूस होता है, रोगी जब शान्त रहता है तो उसे अधिक दर्द होता है, रोगी इधर-उधर टहलते रहने का बाध्य रहता है। रोगी स्त्री को गर्भकाल के समय में दान्त में दर्द हो रहा हो तथा ठण्ड के समय, रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, रोगी स्त्री ऐसा महसूस करती है कि दान्त लम्बे हो गए है,। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का उपयोग करना चाहिए तथा इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के गले पर फोड़े तथा फुंसियां हो जाती है जिसके कारण रोग ग्रस्त भाग में भी दर्द होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रात के समय में मुंह खुश्क रहता है तथा जीभ का स्वाद खट्टा हो जाता है, मुंह में छाले पड़ जाते हैं तथा जीभ से कभी-कभी खून भी निकलता है, गले में खोदने जैसा दर्द होता है, खंखारने पर बदबूदार मटर के रंग के टुकड़े निकलते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को फल, खट्टे पदार्थ और शाक-सब्जियां खाने की इच्छा होती है, खट्टी डकारें और कड़वे जल की उल्टियां होती है तथा मांस खाने की इच्छा होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का उपयोग लाभदायक है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में गड़गड़ाहट जैसी आवाजें होती है तथा गुदगुदी मचने लगती है तथा छाती की ओर खिंचाव होता है, कमर में अकड़न तथा चुटकी काट दिये जाने जैसा दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का उपयोग लाभकारी है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- मलत्याग करने से पहले रोगी को पेट में दर्द तथा मरोड़ होता है, मल हरा तथा मिट्टी की तरह और पानी जैसा होता है, कभी-कभी तो मल के साथ खून भी आने लगता है। स्तनपान करने वाले बच्चे को दूध हजम नहीं होता है तथा बच्चे के मल में अनपचा दूध निकलता है। रोगी के मल से खट्टी बदबू आती है, साथ ही पेट में मरोड़ होती है तथा रोगी को कब्ज की शिकायत भी रहती है। इस प्रकार के मल से सम्बन्धित लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्री रोगी के मासिकधर्म शुरू होने के दिनों में गले में जलन होती है, स्राव होने से पहले जुकाम हो जाता है तथा नाक बंद हो जाता है, मासिकधर्म नियमित समय के बहुत देर बाद और थोड़ी मात्रा में होता है, स्राव गाढ़ा गहरे रंग का तरकोल जैसा कफ के समान होता है। स्त्री को स्राव केवल नींद में, रात को अधिक, लेटे रहने पर और चलते समय बंद हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- खांसी से पीड़ित रोगी के बलगम का स्वाद नमकीन हो तथा उसमें खून भी आ रहा हो तथा नाक में गुदगुदी मच रही हो, छाती में दबाव के साथ दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ ही सांस लेने में परेशानी हो रही हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब चलने फिरने का कार्य करता है तो उसके छाती में और भी तेज दर्द होता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का उपयोग फायदेमंद है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कंधे में तेज दर्द होता है, बायें कंधे में इतना तेज दर्द होता है कि रोगी उससे कोई चीज उठा नहीं पता है। रोगी का शरीर थका-थका सा रहता है और पूरे शरीर में दर्द होता है विशेषकर टांगे और पैरों में। रोगी जब घुटने को मोड़ता है तो उसमें सूजन आ जाती है। इस प्रकार के शरीर की बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की त्वचा मटमैली, मुरझाई और झुलसी जैसी हो जाती है, हाथों व उंगलियों में खुजली मच रही हो, त्वचा के नीचे गांठें पड़ गई हो तथा शरीर के कई अंगों में दर्द हो रहा हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को शाम के समय में सर्दी लगती है और रात के समय में बुखार हो जाता है और शरीर से खट्टा तैलीय पसीना आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि उपयोग लाभदायक है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का शरीर सुस्त रहता है वह कोई भी कार्य करने में आलस्य करता है, सोते समय की तुलना में जागने पर अधिक थकान महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि लाभदायक है।
नसों में दर्द से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी के नसों में तेज दर्द होता है, दर्द इतना तेज हो रहा हो कि रोगी व्यक्ति स्थिर नहीं रह सकता हो और न ही चल पा रहा हो क्योंकि उसे ऐसा करने से आराम मिलता है, रात के समय में वह बिस्तर को छोड़कर टहलता रहता है। जैसे ही रोगी स्थिर खड़ा हो जाता है, वैसे ही दर्द तेज हो जाता है, दर्द काटता, फाड़ता और टीस मारता हुआ महसूस होता है। इस दर्द का असर रोग के चेहरे के बायीं तरफ होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
क्षय (टी.बी.) से सम्बंधित लक्षण :- क्षय रोग से पीड़ित बच्चे को मांस खाने की अधिक इच्छा होना तथा वह बहुत अधिक पतला हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
मौसम के तापमान में उतार-चढ़ाव आने से, बिस्तरे की गर्मी से, ठण्डी हवा से, हर तीसरे सप्ताह तथा आराम करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
गर्म हवा से तथा खुली हवा में टहलने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कियोजो, एलोज, कीरैन्थस तथा रियूम औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष :-
आर्से तथा मर्क्यू औषधि का उपयोग मैग्नीशिया औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
पूरक:-
कमो।
मात्रा (डोज) :-
मैग्नीशिया कार्बोनिका औषधि की तीसरी से तीसवीं शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मैग्नीशिया म्यूरिएटिक (Magnesia Muriatica)
मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि यकृत (जिगर) के रोग को ठीक करने के साथ-साथ ही कब्ज को भी दूर करती है। यकृत में किसी प्रकार का रोग होने पर तथा इसके साथ ही पेट में दर्द हो रहा हो और दर्द का असर मेरुदण्ड से लेकर पाचनतंत्र तक फैल रहा हो और खाना खाने के बाद दर्द और बढ़ जाता हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नाक के नथुने पर घाव हो जाता है। सर्दी-जुकाम हो जाता है। नाक बंद हो जाता है तथा इसके साथ ही नाक से पानी जैसा तरल पदार्थ बहता है और यह तरल पदार्थ स्वादहीन तथा गंधहीन होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी लेट नहीं पाता है और रोगी मुंह से सांस लेने को मजबूर हो जाता है। ऐसे रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
स्त्रियों के रोगों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोगी है, स्त्रियों के वे रोग जिसमें उन्हें भूख नहीं लगती तथा इसके साथ गर्भाशय का रोग हो तो उनके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोग लाभकारी है। रोगी के होठों पर छाले पड़ जाते हैं और मसूढ़ों में सूजन आ जाती है और उनमें से खून भी बहने लगता है, जीभ जली हुई लगती है तथा गला सूखा रहता है तथा इन लक्षणों के होने के साथ ही रोगी का गला बैठ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के नाक के नथुने पर घाव हो तथा इसके साथ ही सर्दी तथा जुकाम हो गया हो, कभी-कभी नाक बंद हो जाती है, नाक से पानी निकल रहा हो, गंध (खुश्बू) की पहचान नहीं हो पा रही हो तथा स्वाद की पहचान नहीं हो पा रही हो, जुकाम होने के कारण रोगी सो नहीं पा रहा हो, श्वास लेने में परेशानी होने के कारण मुंह से सांस ले रहा हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के होंठों पर छाले पड़ गया हो, मसूढ़ें सूजे हुए हो, उनसे खून निकल रहा हो, जीभ जली हुई तथा झुलसी हुई महसूस हो रही हो तथा इन लक्षणों के साथ-साथ गला सूखा हो तथा गला बैठ गया हो जिसके कारण रोगी को बोलने में परेशानी हो रही हो आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोग करे।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- भूख कम लगती हो, जीभ का स्वाद भद्दा लग रहा हो, सड़े हुए अण्डें जैसी डकारें आ रही हो तथा मुंह से लगातार सफेद झाग बन रहा हो, दूध हजम नहीं हो रहा हो तथा पेट में दबाव महसूस होने के साथ पेशाब हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जिगर में दबाव होने के साथ ही दर्द होता है और कभी-कभी तो जिगर बढ़ जाता है जिसके कारण पेट फूल जाता है और जीभ पीली हो जाती है। अण्डकोष में हार्निया रोग होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पेशाब करने में परेशानी होती है और इसके साथ ही मूत्राशय में दबाव तथा दर्द महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोग लाभकारी है।
आंतों से सम्बन्धित लक्षण :- छोटे बच्चों को दान्त जिस समय निकलते हैं उस समय में होने वाली कब्ज की बीमारी, दस्त तथा कभी-कभी बच्चा गांठदार तथा भेंड़ की मेंगनी जैसा मलत्याग करता है, कभी-कभी बच्चा जब मलत्याग करता है तो मल-मलद्वार पर आकर टूटकर निकलता है तथा इसके साथ ही बच्चे को दर्द तथा जलन होती है, कभी-कभी तो मलद्वार से खून भी बहने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित बच्चे के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
स्त्री से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म के समय में रोगी स्त्री के योनि से काला जमा हुआ थक्केदार के समान खून बहता है, कमर तथा कंधे पर जोर से दर्द होता रहता है और रात के समय में योनि से अधिक खून बहता है। मासिकधर्म के समय में स्त्री रोगी जब मलत्याग करती है या कोई कठिन कार्य करती है तो योनि में से खून बहने लगता है। मासिकधर्म के समय में पलकों पर दाद होना, चेहरे व माथे पर सिकुड़न होना तथा मासिकधर्म शुरू होने से पहले ऐसा अधिक होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी स्त्री को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब बैठा रहता है तो उसके हृदय में दर्द होता है तथा हृदय की गति अनियमित हो जाती है, जब रोग व्यक्ति हिलता-डुलता है तो उसे कुछ आराम मिलता है, हृदय में इस प्रकार के रोग होने के कारण यकृत (जिगर) बढ़ने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोग फायदेमंद है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सूखी खांसी हो जाती है, रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है तथा इसके साथ ही जलन तथा छाती में दर्द भी होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोग लाभकारी है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पीठ और नितम्बों में दर्द होता है और इसके साथ ही बाहों तथा पैरों में भी दर्द होता है, जब रोगी रात के एक बजे जागता है तो उसके पैर सुन्न हो जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोग लाभदायक है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के सिर से अधिक पसीना आता है, चेहरे की नाड़ियों में दर्द होता है, ठण्ड के मौसम में हल्का-हल्का दर्द होता है और तेज वायु के मौसम में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, रोग ग्रस्त भाग की सिकाई करने पर रोगी को आराम मिलता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को दिन में अधिक नींद आती है तथा रात के समय में भी अधिक नींद आती है तथा डरावने सपने भी देखता है तथा इस प्रकार के लक्षण के होने के साथ ही रोगी को यकृत से सम्बन्धित रोग या स्त्रियों में गर्भाशय से सम्बन्धित कोई रोग भी हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का प्रयोग करना चाहिए। रोगी के होठों पर छाले पड़ जाते हैं और मसूढ़ों में सूजन आ जाती है और उनमें से खून भी बहने लगता है, जीभी जली हुई लगती है तथा गला सूखा रहता है तथा इन लक्षणों के होने के साथ ही रोगी को गला बैठ जाता है और नींद अधिक आती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
प्रदर रोग से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी स्त्री का मासिकधर्म शुरु होने के दो सप्ताह बाद तीन या चार दिन के लिए योनि से सफेद पानी बह रहा हो या मलत्याग करते समय योनि से सफेद पानी निकल रहा हो तो ऐसी स्त्री रोगी का उपचार करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
कब्ज से सम्बन्धित लक्षण :- कब्ज के रोग से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोग लाभदायक है लेकिन ऐसे रोगी में कुछ इस प्रकार के लक्षण भी होने चाहिए जो इस प्रकार हैं- रोगी जब जब मलत्याग करता है तो मल सख्त गांठ की तरह होता है और रोगी को मलत्याग करने में बहुत अधिक परेशानी होती है, मल एक बार में पूरा नहीं होता है, वह टूट-टूटकर होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
बच्चों की बीमारी में कैमोमिला औषधि के साथ मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि का उपयोग कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
दाहिनी तरफ लेटने से, मानसिक परिश्रम करने से तथा गर्म कमरे में और बैठे रहने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
रोग ग्रस्त भाग को जोर से दबाने तथा खुली हवा में रहने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मैग्नीशिया म्यूरिएटिक औषधि की मूलार्क, 30 से 200 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मैग्नेशिया फास्फोरिका (Magnesia Phosphorica)
मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग नसों के हर प्रकार के दर्द को ठीक करने के लिए लाभकारी है। शरीर के दाहिनी भाग में इस औषधि का असर बहुत अधिक लाभदायक है, लेकिन इसका असर सिर्फ दाहिने तरफ ही नहीं बल्कि शरीर के किसी भी भाग पर नसों के दर्द होने पर इस औषधि का आश्चर्यजनक फल मिलता है। इस औषधि का उपयोग उन रोगियों पर विशेष लाभकारी है जिन रोगी के शरीर में दर्द इस कदर तेज होता है जैसे टीस तथा सुई की चुभन होती है, ऐसा महसूस होता है कि दर्द वाले स्थान को काटा जा रहा है, दर्द रोगी को बेचैन कर देता है। कभी-कभी तो दर्द अचानक ही उठता है और बिजली की करंट की तरह पूरे शरीर में फैल जाता है और कभी तो दर्द तुरन्त ही बंद हो जाता है, दर्द का असर एक स्थान से दूसरे स्थान पर चला जाता है, पेट तथा कोख में तेज ऐंठन और मरोड़ होती है।
छाती, कान, सिर मुंह, डिम्भाशय (ओवरी), सायेटिक नस अर्थात कूल्हे या कमर का गठिया रोग। इस प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मूत्र नली में कैथिटर चलाने के बाद नसों में उत्तेजना अधिक हो जाती है जिसके कारण रात के समय में बिस्तर पर अपने आप पेशाब हो जाने पर मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
यदि किसी रोगी को बेहोशी की समस्या हो तथा इसके साथ ही शरीर में तनाव तथा पेट में मरोड़ हो, नाड़ियों में दर्द हो तथा इसके साथ ही शरीर के कई अंगों में ऐंठन, तनाव तथा दर्द हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
वायुशूल (पेट में वायु बनने) से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में हवा भर जाने के कारण या किसी भी कारण से पेट में दर्द हो रहा हो तथा जब रोगी पेट में सिकाई करता है या टांगों को पेट की ओर सिकोड़ लेता है तो उसे कुछ आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि उपयोगी लाभदायक है। ऐसे रोगी में और भी कई प्रकार के लक्षण होते हैं जो इस प्रकार हैं-रोगी कपड़े उतारना, हाथ-पैर धोना, खेलना-कूदना तथा ठंडी हवा पसन्द नहीं करता, दर्द के स्थान पर छू जाने से दर्द बढ़ जाने के भय से किसी को भी अपने दर्द वाले स्थान को छूने नहीं देता है।
सिर में दर्द से सम्बन्धित लक्षण :-मानसिक परिश्रम करने और अधिक पढ़ने के कारण सिर में दर्द होने लगता है तो इस प्रकार के दर्द को दूर करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। इस प्रकार के दर्द से पीड़ित रोगी में और भी लक्षण होते हैं जो इस प्रकार हैं- दर्द का असर सिर के ऊपर की ओर फैलता है, दोपहर से पहले 10 और 11 बजे के अन्दर या शाम के 4 से 5 बजे के अन्दर दर्द में वृद्धि होती है, जब रोगी के सिर पर दबाव देते हैं या सिकाई करते हैं तो उसे दर्द से कुछ आराम मिलता है।
मन से सम्बन्धित लक्षण :-शरीर के कई अंगों में दर्द के कारण रोगी सोचने में असमर्थ रहता है तथा भूख भी नहीं लगती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
दांत का दर्द (टूथेक) से सम्बन्धित लक्षण :- दांत का दर्द अधिक परेशान करता है, दांत के दर्द के कारण रोगी की हालत पागलों की तरह हो जाती है, किसी भी तरह से दर्द से रोगी को चैन नहीं मिलता है, दर्द का असर एक स्थान से दूसरे स्थान को चला जाता है, खाने, पीने तथा ठंडी चीजों के इस्तेमाल करने से दांत में दर्द बढ़ जाता है, लेकिन जब दांत के दर्द वाले भाग में सिंकाई करते हैं तो कुछ आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
कान में दर्द से सम्बन्धित लक्षण :- कान में दर्द हो तथा दर्द का असर दायें कान के पीछे हो, ठंडी हवा लगने से दर्द कम हो और चेहरे तथा गर्दन को गर्म पानी से धोने से दर्द बढ़ रहा हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग लाभकारी है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- दांत में दर्द होने के साथ ही चेहरे, गाल तथा गर्दन में सूजन हो तथा जीभ में सूजन हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले में दर्द तथा अकड़न हो, विशेषकर गले के दायें भाग में, गले में सूजन हो और सारे शरीर में दर्द हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को हिचकी आने के साथ ही रात तथा दिन में उबकाई आ रही हो तथा इसके साथ ही आमाशय में दर्द हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग फायदेमन्द है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के छाती में दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ ही सूखी खांसी हो गई हो तथा लेटने पर परेशानी कम हो या काली खांसी हो या गला बैठ गया हो तथा स्वरयंत्र में दर्द हो रहा हो या अन्त:पर्शुकाओं की स्नायु में दर्द हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण:- हृदय में दर्द होना, नाड़ियों का ठीक प्रकार से न धड़कना, हृदय पिण्ड के चारों ओर सिकुड़न के साथ दर्द होना। ऐसे लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण:- भोजन करने के बाद बुखार हो जाता हो या शाम के समय में सर्दी लगकर बुखार हो जाता हो और रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि पीठ के ऊपर से नीचे की ओर ठंडी लहरे चल रही हैं तथा इसके साथ ही कंपकंपी हो और इसके बाद सांस लेने में रुकावट हो रही हो तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग करने से लाभ मिलता है।
मासिकधर्म से सम्बन्धित लक्षण:- मासिकधर्म शुरु होने के कुछ दिन पहले ही पेट के नीचे के भाग में दर्द होने लगता है, नाभि के पास तेज दर्द होता है और जब मासिकधर्म शुरु हो जाता है तो दर्द और भी तेज बढ़ जाता है, इसके साथ ही दाहिनी तरफ़ डिम्बाशय (ओवरी) और गर्भाशय के ऊपरी की झिल्ली में बिजली की तरह टीस मारता हुआ दर्द होता है, जब रोगी स्त्री दर्द वाले भाग पर सिकाई करती है तो उसे कुछ आराम मिलता है या टांगों को आगे की ओर सिकोड़ लेने से आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
दांत निकलते समय ऐंठन (स्पेसम ड्युरिंग डेंटिनेशन) से सम्बन्धित लक्षण :- जब बच्चे में दांत निकलता है तो उस समय यदि उस बच्चे में बुखार न रहे और हाथ पांव ऐंठने लगे तो बच्चे के इस तरह की समस्या को दूर करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप बच्चे का यह रोग ठीक हो जाता है। यदि इस लक्षण के रहने के साथ ही बच्चे के सिर और बदन गर्म रहे और बुखार रहे तो उसका उपचार करने के लिए बेलाडोना औषधि उपयोगी होती है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- गर्भावस्था के समय में स्त्रियों की उंगुलियों में ऐंठन होने पर मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का प्रयोग करने से उंगुलियों की ऐंठन ठीक हो जाती है।
आक्षेप से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को यदि बेहोशी की समस्या हो तथा बुखार न हो, शरीर के कई भागों में दर्द हो, कुकर खांसी हो तथा तलुवों में ऐंठन हो तो ऐसे लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि उपयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन):- लैक-कैन, कालो और पल्स औषधियों के साथ मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि की तुलना कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
ठण्डे पानी से नहाने, हाथ-पैर धोने तथा ठंडी हवा से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
पैरों को सिकोड़ लेने से, रोग ग्रस्त भाग पर सिकाई करने से या दबाव देने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि की 1 से 12 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। उच्चतम शक्तियां का प्रयोग भी लाभदायक होता है।
नोट :-
यदि रोगी के शरीर के किसी भाग में जलन के साथ दर्द हो और उस स्थान पर गर्मी करने से दर्द कम हो तो आर्सेनिक औषधि का उपयोग लाभदायक होता है तथा बाकी सभी प्रकार के दर्दो में जब जलन के साथ दर्द न हो, लेकिन गर्मी पहुंचाने से घटता हो तो मैग्नेशिया फास्फोरिका औषधि का उपयोग लाभदायक होता है।
मैग्नीशिया सल्फ्यूरिका (Magnesia sulphurica)
त्वचा के रोग, मूत्रयंत्र से सम्बन्धित रोग तथा स्त्रियों के रोगों को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि का उपयोग लाभदायक है। इस औषधि के प्रभाव से कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि में विरेचक क्रिया की औषधि का कोई गुण नहीं है बल्कि भौतिक स्थिति ही इसका गुण है जो इसका अवशोषण असम्भव कर देती है। केवल शक्तिकृत तनूकरणों के द्वारा ही इसके सुप्त गुणों का पता चलता है।
मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री को चक्कर आता है तथा मासिकधर्म के समय में सिर भारी-भारी लगता है और आंखों में जलन होती है तथा कान से अजीब-अजीब आवाजें सुनाई देती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बार-बार डकारें आती हैं और डकार आने पर सड़े अण्डों की तरह का स्वाद लगता है तथा मुंह में पानी भर जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- जब रोगी पेशाब करता है तो उसके बाद मूत्रमार्ग के मुंह पर सुई जैसी चुभन और जलन होती है, पेशाब बूंद-बूंद करके टपकता है, सुबह के समय में अधिक मात्रा में पेशाब होता है और पेशाब गंदा तथा तलछट होता है, जब पेशाब निकलता है तो उस समय उसका रंग साफ हरा होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
स्त्री से सम्बन्धित लक्षण :- प्रदर रोग से पीड़ित स्त्री की योनि से अधिक मात्रा में सफेद पानी जैसा पदार्थ बहता है तथा इसके साथ ही कमर के निचले भाग में तथा जांघों में चिपचिपा पदार्थ लग जाता है, इधर-उधर घूमने पर थकान लगने जैसा दर्द होता है। वैसे तो मासिकधर्म में स्त्रियों की योनि से कुछ न कुछ खून तो बहता ही है लेकिन रोग होने की अवस्था में अधिक मात्रा में खून बहता है, जो खून रोग के अवस्था में स्त्रियों की योनि में से निकलता है वह काला गाढ़ा तथा अधिक मात्रा में होता है, मासिकधर्म नियमित समय से पहले ही होने लगता है तथा रुक-रुककर होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि का उपयोग लाभकारी है।
गर्दन तथा पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के कंधों के बीचों-बीचों कुचले जाने और घाव बन जाने जैसा दर्द होता है तथा इसके साथ ही मुट्ठी के आकार का गोला होने जैसी अनुभूति होती है जिसके कारण रोगी स्त्री पीठ के बल या किसी भी करवट लेकर नहीं लेट सकती है, जब पीठ को किसी चीज से रगड़ते हैं तो कुछ आराम मिलता है, कमर के निचले भाग में तेज दर्द होता है और ऐसा महसूस होता है कि जैसे वह भाग कुचल गया है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- बिस्तर पर लेटने से बाईं भुजा और पैर का सुन्न पड़ जाना तथा सोकर सुबह के समय में जागने पर ऐसा ही प्रतीत होना आदि शरीर के बाहय लक्षणों में मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि उपयोगी होती है।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण:- शरीर की त्वचा पर छोटी-छोटी फुंसियां हो जाती है जो बुरी तरह से खुजलाती है। दबी हुई खुजली, बायें हाथ की उंगुलियों की नोक में रेंगने जैसा महसूस होता है जिसे रगड़ने पर राहत मिलती है, मस्से, विसर्प में (घुले हुए द्रव का बाहय प्रयोग, त्वचा के किसी भाग में जल जम जाने के कारण सूजन आदि त्वचा से सम्बंधित विभिन्न लक्षणों में मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि का उपयोग किया जाता है।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण:- सुबह 9 बजे से 10 बजे तक सर्दी का अहसास होना, पीठ में कंपन होना, एक अंग में गर्मी तथा दूसरे अंग में सर्दी महसूस होना आदि बुखार से सम्बन्धित लक्षणों में मैग्नीशिया सल्फ्यूरिका औषधि विशेष रूप से उपयोगी होती ह।
सम्बन्ध (रिलेशन):-
मार्फिन के इंजेक्शन में थोड़ी मैग्नीसल्फ्यू मिलाकर देने पर मार्फिन इंजेक्शन का प्रभाव 50 से 100 प्रतिशत तक बढ़ जाता है।
स्थूल मात्राएं :
पित्त की पथरी के दर्द में मैग्नीशिया सल्फ्यूरिका औषधि को 2 से 4 चाय के चम्मच के बराबर मात्रा को एक गिलास गर्म पानी में मिलाकर पीने से दर्द धीरे-धीरे करके पूर्ण रूप ठीक हो जाता है। दस्त होने के साथ दर्द हो रहा हो तथा जी मिचला रहा हो और आन्त्रिक पुर:सरण (इंसटेटिनल परिटेलिस) पर इसकी हल्की क्रिया होती है। इसके फलस्वरूप आंतों में रिसाव बढ़ जाता है, आंते फूल जाती हैं और अतिसार की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। यह आंतों में थोड़ी सी मात्रा में जलन उत्पन्न करती है या बिल्कुल भी नहीं करती है। अन्य लवणों के समान ही यह भी दस्त लाने वाली औषधि है। इसका उपयोग पारद उपसर्गों में पेट के कीड़ें मारने वाली औषधियों के साथ मिलाकर किया जाता है और विष पदार्थो की अवस्थाओं में दिया जाता है, एप्सम साल्ट साधारणत: एक से दो घंटे के अन्दर किया करती है तथा गर्म पानी में लेने से यह ठीक प्रकार से क्रिया करती है और सुबह के समय में इसे लेने पर यह द्रुत किया करती है। कोशिकाओं में किसी प्रकार से सूजन आ जाने के स्थिति में इस औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
मात्रा (डोज) :-
मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि की शुद्ध लवण से तीसरी शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। रक्तविषण्ण अवस्थाओं, विसर्प, अण्डकोष में सूजन होना तथा फोड़ों में 1:4 के अनुपात में पानी के साथ मिलाकर मैग्नीशिया सल्फ्लूरिका औषधि का स्थानिक प्रयोग करना चाहिए।
मैग्नोलिया ग्रैंडिफ्लोरा (Magnolia Grandiflora)
जोड़ों का दर्द (आमावात) और हृदय के पिण्ड से सम्बन्धित बीमारियों को ठीक करने के लक्षणों से पीड़ित रोगी में बीमारी का असर शरीर के बांये अंश पर ही अधिक होता है तथा इसके साथ ही रोग में और भी लक्षण देखने को मिलते हैं जैसे- थकावट होना तथा अकड़न होना, प्लीहा और हृदय में दर्द होना तथा शान्त रहने पर और भी तेज दर्द होना।
मैग्नोलिया ग्रैंडिफ्लोरा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
हृदय से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी के हृदय पिण्ड में ऐंठन तथा दर्द होता है, जब रोगी सांस लेता है, तेज चलने के समय या बांई करवट लेटने पर दम घुटने की अनुभूति होती है, ऐसा महसूस हो रहा हो जैसे आमाशय के अन्दर भोजन का कोई बड़ा ढेला रखा हो जिसके कारण रोगी को और भी परेशानी होती है। रोगी को ऐसा महसूस होता है कि हृदय की गति बंद हो गई है, हृदय के अन्दरुनी भाग में सूजन हो गई है तथा दर्द हो रहा है। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैग्नोलिया ग्रैंडिफ्लोरा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण:- गले की हडि्डयों के जोड़ों में दर्द, पैरों में खुजली, बायें बाजू में सुन्नपन, अकड़न और तेज दर्द हो, स्त्रियों के बीमारी में बायें डिम्बकोष में खून जमा होना और इसके साथ दर्द होना या फिर रोगी स्त्री को प्रदर रोग होने के साथ ही सफेद रंग का पेशाब आ रहा हो या दिन में सूखी खांसी हो आदि प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नोलिया ग्रैंडिफ्लोरा औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
गर्दन और पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गर्दन तथा पीठ में दर्द हो रहा हो, जिसका असर त्रिकास्थि तक फैल जाता है। हाथ तथा पैरों की मांसपेशियों में भी दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैग्नोलिया ग्रैंडिफ्लोरा औषधि का उपयोग लाभदायक है।
छाती से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी को छाती में चुभन तथा दर्द महसूस होता है और दर्द का असर एक स्थान से दूसरे स्थान पर बदलता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैग्नोलिया ग्रैंडिफ्लोरा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
डल्का, रस-टाक्स तथा औरम औषधियों की तुलना मैग्नोलिया ग्रैंडिफ्लोरा औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन):-
नम हवा से, बायीं करवट लेटने से, सुबह के समय उठने पर रोगी के रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन):-
गति करने से, सूखे मौसम में रहने से और स्त्रियों को एक मासिकधर्म शुरु होने से दूसरे मासिकधर्म शुरु होने के बीच के समय में रोग के लक्षण घटने लगते हैं।
मात्रा (डोज):-
मैग्नोलिया ग्रैंडिफ्लोरा औषधि की मूलार्क से 3 शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मैलैंड्रीनम (Malandrinum)
मैलैंड्रीनम औषधि एक प्रकार की अधिक प्रभावशाली औषधि है तथा यह चेचक के रोग को ठीक करने में अधिक लाभकारी औषधि है। टीका के दोष को दूर करने के लिए मैलैंड्रीनम औषधि का उपयोग करना चाहिए। कर्कटीय-संचयों के अवशिष्ट दोषों को नष्ट करने के लिए मैलैंड्रीनम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
मैलैंड्रीनम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
चर्म से सम्बन्धित लक्षण:- होंठ के ऊपरी भाग में पपड़ी जमने तथा उसे हटाने पर डंक लगने जैसा दर्द होता है तथा हल्का-हल्का सिर में दर्द हो रहा हो। सूखी, पपड़ीदार, खुजली हो जाती है तथा ठण्डे मौसम में तथा नहाने-धोने से हाथ-पैर फट रहे है। पैर की उंगलियां झुलसी हुई महसूस होती है और बुरी तरह खुजली हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैलैंड्रीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
मात्रा (डोज):-
मैलैंड्रीनम औषधि की तीसवीं शक्ति और उच्चतम शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को नष्ट करने के लिए करना चाहिए।
मैंसीनेला (Mancinella)
चर्म रोगों को ठीक करने के लिए मैंसीनेला औषधि का उपयोग करना लाभकारी है जिसके फलस्वरूप चर्म रोग ठीक हो जाता है। त्वचा में सूजन होना तथा इन सूजन वाले स्थान से चिपचिपा रिसाव होता है और पपड़ियां जमना आदि इस प्रकार के लक्षाणों को ठीक करने लिए मैंसीनेला औषधि का उपयोग करना चाहिए।
लड़कियों में किशोरावस्था शुरू होते ही मासिकधर्म भी शुरू हो जाता है और लड़कियों की कामवासना बढ़ जाती है तो ऐसी अवस्था में मैंसीनेला औषधि का उपयोग करने से लड़कियों को अधिक लाभ मिलता है।
एथूजा सिनापियाम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी को चर्म रोग से संबन्धित कोई रोग हो या मासिकधर्म के समय में स्त्रियों में उत्तेजना अधिक हो तथा इसके साथ ही रोगी चुपचाप ही रहता हो, उदासी अधिक हो, भ्रम अधिक पैदा हो रहा हो, विचार करने में असमर्थ हो, लज्जा अधिक आ रही हो तथा पागल हो जाने का भय हो तो ऐसे रोगी के रोगों को ठीक करने के लिए मैंसीनेला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी को चक्कर आ रहा हो, सिर में दर्द हो रहा हो तथा सिर में खालीपन महसूस हो रहा हो, खोपड़ी में खुजली हो रही हो तथा सिर के बाल झड़ रहे हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैंसीनेला औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण:- नाक से बारूद तथा गोबर की बदबू आ रही हो तथा नाक की जड़ में दबाव महसूस हो रहा हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैंसीनेला औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण:- मुंह में मिर्च जैसी जलन हो रही हो, अधिक मात्रा में बदबूदार लार आ रही हो तथा लार का स्वाद खून जैसा हो, गले में जलन तथा सिकुड़न होने के कारण अधिक परेशानी हो रही हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैंसीनेला औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण:- आमाशय के अन्दर लगातार कोई चीज गड़ने जैसी अनुभूति हो जिसके कारण सांस लेने में परेशानी हो रही हो, खाए हुए पदार्थो की उल्टी हो तथा इसके बाद पेट में मरोड़ हो तथा अधिक मात्रा में मलत्याग हो। पेट में तेज जलन के साथ दर्द तथा उल्टी हो। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैंसीनेला औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- हाथों और पैरों में बर्फ जैसी ठण्ड महसूस हो रही हो तथा अंगूठें में दर्द हो तो रोग को ठीक करने के लिए मैंसीनेला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म से सम्बन्धित लक्षण:- शरीर पर छोटी-छोटी फुंसियां हो गई हो जो लाल रंग की होती है और इसके साथ दर्द भी होता है या बड़े-बड़े फफोलें हो जाते हैं या शरीर पर भारी, कत्थई रंग की पपड़ियां और परतें जम जाती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैंसीनेला औषधि उपयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन):-
कैन्थ, ऐनाक, कोटन, जैट्रोफा औषधि की तुलना मैंसीनेला औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज):-
मैंसीनेला औषधि की छठी से तीसवीं शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मैंगानम असेटिकम (Manganum aceticum)
मैंगानम असेटिकम औषधि शरीर के लाल खून के कणों को नष्ट कर शरीर में खून की कमी उत्पन्न करती है। यह पीलिया रोग तथा अण्डाशयों में सूजन उत्पन्न करती है, यकृत भी इसके कारण बढ़ जाता है (डिजेनरेट) तथा लकवा जैसी समस्या उत्पन्न करती है और कोशिकओं में सूजन उत्पन्न करती है। अत: इस औषधि का प्रयोग कुछ विशेष लक्षणों पर ही करना चाहिए तब इस औषधि का लाभ होगा और रोग ठीक होगा।
हडि्डयों तथा हडि्डयों के जोड़ों में जलन होना, रात के समय में हडि्डयों में खोदने जैसा दर्द होना, दमा रोग तथा दमा से पीड़ित व्यक्ति किसी रुई के तकिए पर सो नहीं सकता हो, घाव से पीड़ित रोगी तथा हरित्पाण्डु रोग से पीड़ित रोगी में यदि लकवा रोग के कुछ लक्षण देखने को मिलते हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गठिया तथा जीर्ण रोग होने के साथ ही हडि्डयों में सूजन होना, गला खराब होना, छाती में अधिक कफ जमना, शरीर के कई भागों में दर्द होना तथा टखना कमजोर हो जाना, शरीर के दर्द वाले भागों को छूने से दर्द बढ़ जाना, क्षय रोगी की प्रारिम्भक अवस्था। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ऐसा रोगी जिसको जीर्ण रोग हो गया हो तथा उसमें कुछ ऐसे लक्षण हो जैसे- अनैच्छिक हंसना (बिना किसी बात के हंसना) और अनैच्छिक रोना (बिना किसी बात के रोना) तथा पीछे की ओर चलना, शरीर के कई अंग रोग ग्रस्त होना, रोगी की चाल भी लड़खड़ा रही हो, शरीर में अधिक कमजोरी होना तथा टी. बी. के कुछ लक्षण। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
यदि रोगी को अधिक कमजोरी आ गई हो तथा टी.बी. रोग होने की आशंका हो, पेट में दर्द हो रहा हो, पेट चैक करने पर पता चलता हो कि पेट पर छोटी-छोटी चने की तरह गिल्टियां है, दिन प्रतिदिन शरीर का स्वास्थ्य गिरता चला जाता हो, शरीर में खून बनता ही नहीं हो, भूख नहीं लगती हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मैंगानम असेटिकम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी मानसिक रूप से कमजोर हो जाता है तथा उसे भय लगता है जब वह लेटता है तो रोग के लक्षण कुछ कम हो जाते हैं, रोगी को ऐसा महसूस होता है कि सिर बड़ा और भारी हो गया है तथा इसके साथ ही शरीर में खून की कमी हो जाती है, शरीर में दर्द का असर ऊपर से नीचे की ओर होता है, आंखों के आस-पास का भाग सिकुड़ जाता है। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी बहुत अधिक गंभीर स्वभाव का हो जाता है। ऐसे लक्षणों में मैंगानम असेटिकम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण:- मुंह के अन्दर के तलुवों में गुटिकायें हो जाती हैं, दांत में दर्द होता है तथा ठण्डे पदार्थों के सेवन करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी हर समय खंखारता रहता है, आवाज हल्की हो जाती है। ऐसे लक्षणों को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि उपयोग करे।
नाक से सम्बन्धित लक्षण:- नाक के अन्दरूनी भागों में सूखापन हो जाता है तथा सांस लेने में रुकावट होती है, जुकाम होने के साथ ही नाक से खून के कण मिला हुआ कफ जैसा पदार्थ बहता है। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण रोगी को है तथा इसके साथ ही ठण्ड के मौसम में रोग के लक्षणों में वृद्धि हो रही हो तो रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कान बंद हो गया हो तथा नाक को साफ करते समय कड़कड़ाहट सी आवाज आती हो, शरीर के कई अंगों में होने वाले दर्द का असर कानों तक फैल जाता है, ठण्ड के मौसम में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, रोगी को सीटी बजने जैसी आवाज सुनाई देती रहती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसे मैंगानम असेटिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
पाचननली से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जीभ पर दर्द होता है और जीभ में जलन होती है, उस पर घाव हो जाता है, इन लक्षणों के साथ ही पेट फूलने लगता है, यकृत से सम्बन्धित जीर्ण रोग भी हो जाता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- जीर्ण रोग हो जाता है तथा इसके साथ ही आवाज बैठ जाती है, स्वरयंत्र में सूखापन उत्पन्न हो जाता है, स्वरयंत्र में सिकुड़न होने लगती है, स्वरयंत्र में लकवा जैसी अवस्था उत्पन्न हो जाती है, खांसी हो जाती है तथा शाम के समय में अधिक होती है और लेटने पर कम, नमीदार मौसम में और भी तेज खांसी होती है, कफ जमा हुआ निकलता है, स्वरयंत्र में सुई की चुभन के समान दर्द होता है, जिसका असर कान तक फैल जाता है, छाती में गर्मी महसूस होती है, शरीर में रक्त की कमी हो जाती है, ठण्ड लगने से श्वासनली में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म के समय में स्राव से सम्बन्धित गड़बड़ियां उत्पन्न हो जाती है, अनार्तव (ऐमेनोरिया), मासिकस्राव नियमित समय से बहुत पहले और कम मात्रा में होना, विशेषकर उन स्त्रियों में जिन में खून की कमी हो, मासिकधर्म के समय में रात को अधिक गर्मी महसूस हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के पेशियों में अकड़न होना, पिण्डलियों में ऐंठन होना, टांग की पेशियों में अकड़न होना, हडि्डयों तथा हडि्डयों के जोड़ों में जलन होना तथा इसके साथ ही रात के समय में हडि्डयों में खोदने जैसा दर्द होना, शरीर के सभी अंगों को छूने पर दर्द का बढ़ना, बिना गिरे पीछे की ओर नहीं चल पाना, सामने की ओर गिरना, सामने की ओर झुककर चलना, टांगों का सुन्न हो जाना, विल्सन रोग (विलसंस डीजिज) अर्थात पपड़ीदार चर्म रोग के साथ सूजन होना, अंगों में कंपन होना, एड़ियों में दर्द होना, हडि्डयों को छूने पर दर्द का बढ़ना, पैरों के जोड़ों में दर्द होना, हडि्डयों में जलन होना, हडि्डयों के आस-पास ज्वलनशील धब्बे पड़ना, हडि्डयों के आस-पास वाली चमड़ी में पीब बनना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी आलसी स्वभाव का हो तथा नींद अधिक आती हो, सपने अधिक आते हो, शाम के समय में बड़ी जल्दी ही नींद आने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण:- हडि्डयों के चारों ओर की चमड़ी में पीब बनना, लाल तथा उभरे हुए धब्बे हो जाना, खुजली मचना तथा खुजलाने पर कुछ आराम मिलना, कोहनी के मोड़ व अन्य मोड़ों पर गहरी दरारें पड़ना, रूसी उत्पन्न होना, घावों के चारों ओर जलन होना, जीर्ण छाजन रोग होने के साथ ही मासिकधर्म से सम्बन्धित स्त्रियों को समस्या होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
खांसी से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी को सूखी खांसी आती हो, लेकिन कफ कुछ भी नहीं निकलता हो, लेटने से खांसी बंद हो जाती हो आदि लक्षणों में मैंगानम असेटिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
ठण्डे मौसम में भीगने से तथा मौसम में परिवर्तन होने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन):-खांसी होने पर यदि रोगी को लिटाया जाए तो उसके रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
फोड़े व अन्य स्टैफिलोकॉक्कस रोग को ठीक करने के लिए कोलॉयडल मैंगानीज औषधि का उपयोग किया जाता है। लेकिन रोगी के कुछ ऐसे लक्षणों को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का भी उपयोग किया जाता है। अत: कोलॉयडल मैंगानीज औषधि के कुछ गुणों की तुलना मैंगानम असेटिकम औषधि से कर सकते हैं।
शरीर की हडि्डयों में दर्द होना तथा टखने में दर्द होने पर रोग को ठीक करने के लिए मैंगान-म्यूरि औषधि का उपयोग किया जाता है, लेकिन ऐसे ही रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का उपयोग किया जाता है। अत: मैंगान-म्यूरि औषधि के कुछ गुणों की तुलना मैंगानम असेटिकम औषधि से कर सकते हैं।
जांघ के अन्दरूनी भाग में जलन होना, पेट में दर्द होना, अतिसार होना तथा मासिकधर्म के समय में अधिक कष्ट होना, इन रोगों के होने के साथ ही रोगी को अधिक थकावट महसूस हो रही हो, नींद आती हो, अधिक गंभीर स्वभाव का हो, कम से कम शब्दों में बोलने वाला हो, मांसपेशियों में ऐंठन हो रही हो, टांग की पेशियां अकड़ी हुई हो, बिना बात का हंसने वाला हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैगान-ऑक्सिडे औषधि का उपयोग करते हैं लेकिन ऐसे ही कुछ रोगों को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का उपयोग करते हैं। अत: मैंगान-ऑक्सिडे औषधि के कुछ गुणों की तुलना मैंगानम असेटिकम औषधि से कर सकते हैं।
यकृत में घाव होना, पित्त का अधिक बनना, इस प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए मैंगान-सल्फ्यू औषधि का उपयोग करते हैं तथा यकृत को शक्तिशाली बनाने के लिए मैंगान-सल्फ्यू औषधि का उपयोग लाभदायक है, ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मैंगानम असेटिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए। अत: मैंगान-सल्फ्यू औषधि के कुछ गुणों की तुलना मैंगानम असेटिकम औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष :-
काफिया, मर्क्यू औषधि का उपयोग मैंगानम असेटिकम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
मैंगानम असेटिकम औषधि की 3 से 30 शक्ति तक का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मैंगीफेरा इंडिका (MANGIFERA INDICA)
गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली, गुर्दे, आंत तथा मलद्वार से बहने वाले निष्क्रिय खून (रक्त) को रोकने के लिए मैंगीफेरा इंडिका औषधि का उपयोग लाभकारी है।
कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए मैंगीफेरा इंडिका औषधि उपयोगी है जैसे- नाक में जलन होना, छींके आना, गले में सूजन तथा अन्य गले का रोग, सांस में रुकावट, भोजन नलियों की श्लैष्मिक झिल्लियों का ढीलापन होना, आंतें कमजोर होना, रक्त संचारण करने वाली वाहिनियों में कमजोरी आना और पेशियां ठण्डी पड़ जाना।
एथूजा सिनापियाम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण:- हथेलियों में खुजली होना, त्वचा धूप से जल गई हो ऐसा दिखाई देना, त्वचा पर सूजन, सफेद दाग के धब्बे, तेज खुजली, कान तथा होंठ पर सूजन आदि रोगों को ठीक करने के लिए मैंगीफेरा इंडिका औषधि का उपयेग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन):- एपिलोबियम तथा एरिजारोन औषधियों की तुलना इस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज):- मैंगीफेरा इंडिका औषधि की मूलार्क का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मेनिस्पर्नम (Manisparnum)
मासिकधर्म के समय में स्त्रियों को कई प्रकार की परेशानियां होती हैं और इन परेशानियों को दूर करने के लिए मेनिस्पर्नम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
मेनिस्पर्नम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म से सम्बन्धित रोग से पीड़ित स्त्रियों का मन निराशा युक्त होती है। रोगी के ऐसे लक्षणों को ठीक करने के लिए मेनिस्पर्नम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण:- मासिकधर्म से सम्बन्धित रोगों से पीड़ित स्त्रियों के सिर में चक्कर आने के साथ कानों में घंटी बजने जैसी आवाजें सुनाई पड़ती हैं। ऐसी स्त्री रोगी के रोग ठीक करने के लिए मेनिस्पर्नम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
रक्तस्राव से सम्बन्धित लक्षण:- मासिकधर्म के समय में योनि से अधिक मात्रा में खून बहने लगता है वैसे देखा जाए तो मासिकधर्म के समय में कुछ न कुछ तो खून अवश्य ही बहता है लेकिन जब यह ज्यादा बहने लगता है तो स्त्रियों में बहुत अधिक कमजोरी आ जाती है, गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली से भी खून बहने लगता है, जब इन लक्षणों से पीड़ित स्त्री अधिक कार्य करती है तो उसके रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। जब खून बहता है तो वह चमकता हुआ लाल और थक्केदार होता है और अधिक मात्रा में स्राव होता है, पेट के निचले भाग में दर्द होता है या बच्चे को जन्म दे चुकी स्त्री को अधिक मात्रा में रक्तस्राव होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी स्त्री को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेनिस्पर्नम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
मात्रा (डोज) :- मेनिस्पर्नम औषधि की मूलार्क, 3X, 6X शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मेडुसा (Medusa)
मुंह में सूजन, आंखों के ऊपर तथा नीचे के भाग में सूजन, नाक में सूजन, कान में सूजन तथा होंठों पर सूजन आदि प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए मेडुसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
बच्चे को जन्म देने से पहले स्तन में दूध न बन रहा हो तो मेडुसा औषधि का उपयोग करने से स्तन में दूध उत्पन्न हो जाता है।
एथूजा सिनापियाम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंगों पर जलन तथा सुन्नपन होना, गर्मी के साथ जलन होना, त्वचा पर फफोले निकलना, चेहरे, बाहों तथा कंधों पर सूजन और जुलपित्ती रोग होना आदि प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेडुसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण:- दूध की ग्रन्थियों से सम्बन्धित रोगों को ठीक करने के लिए मेडुसा औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन):-
फीजैलिया, अर्निका, पाइरारारा, होमार, सीपि औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मेडुसा औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज):-
मेडुसा औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मेजेरियम mezereum
शरीर के कई भागों में दर्द होना, त्वचा पर कई प्रकार के दाग, छीलन तथा चकत्ते की तरह दाग और कई प्रकार के चर्म रोगों को ठीक करने के लिए मेजेरिया औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मेजेरिया औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण:- शरीर की बड़ी हडि्डयों में दर्द होना, जांघ की हड्डी में दर्द होना लेकिन गर्मी तथा ताप होने पर दर्द से आराम मिलता हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेजेरिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
दांत से सम्बन्धित लक्षण:- दांत में दर्द हो रहा हो और गर्म सिंकाई करने से दर्द से कुछ आराम मिलता हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेजेरिया औषधि का उपयोग लाभदायक है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण:- चेहरे की नाड़ियों में दर्द (स्नायुशूल), खाने या जबड़ा हिलाने पर दर्द महसूस होना। गर्मी तथा ताप होने पर दर्द कम होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजेरिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण:- नाक में दाने निकलना तथा खाल छिल जाना, नाक के अन्दर पपड़ी जमना तथा चकत्ते की तरह दाद हो जाना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजेरिया औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मेल कम सेल (Mel Cum Sale)
स्त्रियों के गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली में छिलन और इसके साथ ही इस अंग में जलन होना तथा गर्भाशय के मुंह पर जलन होना आदि प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेल कम सेल औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मेल कम सेल औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
पाचनतंत्र के आस-पास दर्द होना।
जरायुप्रदाह (गर्भाशय के ऊपरी भाग पर जलन होना)।
मूत्राशय में पेशाब जमा हो जाना, त्रिकास्थि से जघनास्थि की ओर दर्द होना और इसके साथ ही दर्द का असर मूत्रनलियों तक होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेल कम सेल औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज):- मेल कम सेल औषधि की तीसरी से छठी शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। मलद्वार पर खुजली और कीड़े होने पर शहद के साथ मेल कम सेल औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मेलीलोटस एल्ब Melilotus alba
बार-बार नकसीर का रोग हो जाना तथा अधिक मात्रा में नाक से खून बहना और इसके साथ ही तेज सिर दर्द होने पर मेलीलोटस एल्ब औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मेलीलोटस एल्बा औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के काम आता है जो इस प्रकार हैं- सिर में दर्द, पेट में दर्द, पेट में ऐंठन, बेहोशी तथा नकसीर रोग।
मेलीलोटस एल्ब औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी के सिर में दर्द होता रहता है तथा इसके साथ ही उसे नकसीर का रोग भी हो जाता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस एल्ब औषधि का उपयोग लाभदायक है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी के चेहरे का रंग लाल हो जाता है और गले की धमनी में से खून का स्राव होने लगता है, जब नाक से खून निकलने लगता है तो लक्षण कुछ दब जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस एल्ब औषधि का सेवन करना चाहिए।
टायफायड-ज्वर से सम्बन्धित लक्षण:- टायफायड-ज्वर से पीड़ित रोगी के नाक से यदि खून बह रहा हो, नाक से खून निकलने का दौरा रुक-रुककर आ रहा हो, कम से कम 24 घण्टे में तीन बार नाक से खून बह रहा हो और खून इतना अधिक निकल रहा हो कि रोगी परेशान हो जाता हो। इन लक्षणों के कारण रोगी को डिप्थीरिया रोग हो गया हो तथा खून नाक के नथुनों के बाहर चमकीली बून्दों के रूप में टपक रहा हो तो इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस एल्ब औषधि का उपयोग करना चाहिए।
न्यूमोनिया रोग से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी न्यूमोनिया रोग से पीड़ित है तथा इसके साथ ही चेहरा लाल हो गया हो और नाक से बार-बार खून बहने लगता है तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस एल्ब औषधि का उपयोग लाभकारी है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बन्धित लक्षण :-चेहरे पर गर्मी महसूस होने के साथ ही लाली पड़ना तथा चेहरे पर चमक होने के साथ ही सिर में दर्द होना, कनपटियों में जलन के साथ ही सिर में दर्द होना, बेहोशी होना, शरीर के किसी भाग से खून का बहना या शरीर के किसी भाग में खून जमा होना, रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि सिर अब फट जायेगा और तेज दर्द होना, मलत्याग करने में रुकावट होना, मलद्वार पर दर्द होना तथा मलत्याग करने में अधिक परेशानी होना, स्त्रियों को मासिकधर्म के समय में अधिक मात्रा में स्राव होना तथा दर्द होना, तेज चलने पर चक्कर आना, स्मरण करने पर मस्तिष्क में धुंधलापन सा महसूस होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी रोगी को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस एल्ब औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन):- आंधी या तूफान आने से पहले बरसाती मौसम में, एकाएक मौसम परिवर्तन होने पर, बचपन से जवानी की ओर बढ़ने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
मासिकधर्म के समय में रक्तस्राव होने से, खुलकर पेशाब करने से, टहलने से, स्थिति बदलने से तथा खुली हवा में रहने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन):-
बेल, बैप्ट, फेरम, फेम-फा, लैके, नट्र-म्यू, ओपि, सैगु और सल्फर तथा एमेला-ना औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मेलीलोटस एल्ब औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मेलीलोटस एल्ब औषधि की छठीं पोटेंसी का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मायोसोटिस (Myosotis)
पुरानी सांस की बीमारी को ठीक करने के लिए तथा टी.बी. (यक्ष्मा) रोग को ठीक करने के लिए मायोसोटिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को खांसी हो जाती है तथा इसके साथ ही बलगम भी अधिक आता है तथा खांसते समय सांस लेने में रुकावट होती है और कभी-कभी तो उल्टियां भी हो जाती हैं, जब रोगी खाना खाता है तो उस समय अधिक खांसी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मायोसोटिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। रोगी के निचले बायें फेफडे़ में दर्द होता है तथा खांसते समय दर्द और भी तेज हो जाता है तथा सांस लेने में परेशानियां होती है। इस प्रकार के रोगों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मायोसोटिस औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मात्रा (डोज) :-
मायोसोटिस औषधि के मूलार्क से 2 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मायर्टस कम्यूनिस (Myrtus communis)
मायर्टस कम्यूनिस औषधि दूषित रक्त के दोषों को दूर करने वाला होती है। यह छाती के दर्द को ठीक करता है। टी.बी. रोग से पीड़ित रोगी के रोग की प्रारिम्भक अवस्था में इसका प्रयोग लाभदायक होता है।
यह नाड़ियों (स्नायु) की उत्तेजना को नष्ट करती है तथा श्वासनली की सूजन को भी ठीक कर देती है। मूत्राशय में जलन होना, गोणिकाशोथ के रोग को ठीक करने के लिए मायर्टस कम्यूनिस औषधि का उपयोग लाभदायक है। यह श्लैष्मिक झिल्लियों में शक्ति प्रदान करता है।
मायर्टस कम्यूनिस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के बायें स्तन में सुई जैसी चुभन के साथ दर्द हो रहा हो, दर्द का असर स्कन्ध-फलक तक फैल जाता हो, खांसी हो गई हो तथा यह खांसी सूखी तथा सुरसुरी हो, सुबह के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती हो, बाईं छाती में जलन महसूस होती हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मायर्टस कम्यूनिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
फेफड़ें से सम्बन्धित लक्षण :- बायीं ओर के फेफड़े के नीचे वाले भाग में सुई गड़ने जैसा दर्द होता है तथा इसके साथ ही स्तन में भी दर्द होता है और सूखी खांसी होती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मायर्टस कम्यूनिस औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
पुरानी श्वासनलिका के सूजन होने के साथ ही पीले रंग का बलगम निकलना तथा इसके साथ अधिक परेशानी होना और खांसी भी हो जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मायर्टस चेकन औषधि का उपयोग करते हैं, लेकिन ठीक ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मायर्टस कम्यूनिस औषधि का उपयोग किया जाता है। अत: मायर्टस चेकान औषधि के कुछ गुणों की तुलना मायर्टस कम्यूनिस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मायर्टस कम्यूनिस औषधि की 3 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मेलीलोटस (Melilotus)
चेहरे पर खून की अधिकता के कारण चेहरा सुर्ख पड़ जाता है, कनपटियों पर गर्माहट महसूस होती है, सिर भारी हो जाता है और दर्द होता है, लेकिन जब रोगी के नाक से अधिक खून निकल जाता है तो सिर की परेशानी कुछ कम हो जाती है। सिर का दर्द अक्सर सुबह 9 बजे से दोपहर के 12 बजे तक रहता है या रोगी को पेशाब अधिक आता है तो रोग के लक्षण कम हो जाते हैं। रोगी के सिर में दर्द खून की गति सिर की तरफ अधिक होने के कारण से होता है इसलिए चेहरा और आंखें सुर्ख पड़ जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मेलीलोटस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द होने के कारण वे अपने मन को एकाग्र नहीं कर पाता है, याददाश्त धोखा दे देती है, नींद अधिक आने लगती है, रोगी का मन ऐसा करता है कि कहीं भाग कर छिप जाऊं, कभी-कभी तो वह यह सोचता है कि हर कोई व्यक्ति उसकी ओर देख रहा है इसलिए वह जोर से बोलने से डरता है और भाग जाना चाहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द होने लगता है तथा इसके साथ ही उबकाई भी आती है, नेत्रकोटरों के ऊपर दबाव महसूस होता है, आंखों का सफेद भाग पीला हो जाता है, हाथ-पैर ठण्डे पड़ जाते हैं, आंखों के सामने काले धब्बे पड़ जाते हैं, सिर भारी भारी सा लगता है, मस्तिष्क में तैरने जैसी अनुभूति होती है, कभी-कभी रोगी के नाक से खून भी निकलने लगता है या स्त्री रोगी को मासिकधर्म के समय में अधिक स्राव होने लगता है जिसके बाद रोगी को कुछ आराम महसूस होता है। रोगी के सिर में दर्द होता है तथा इसके साथ ही आंखें भारी, धुंधली हो जाती है और कमजोरी दृष्टि हो जाती है, रोगी आराम पाने के लिए आंखों को जोर से बंद कर लेता है। रोगी के सिर के दायें भाग और गर्दन पर और उनके चारों ओर की स्नायु (नाड़ियों) में दर्द होता है। रोगी की खोपड़ी पर तेज दर्द होता है तथा जब वह अपने दर्द वाले भाग को छूता है तो और भी तेज दर्द होता है। इस प्रकार सिर के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण:- नाक बंद हो जाता है तथा नाक के अन्दर सूखापन महसूस होता है, रोगी मुंह से श्वास लेने के लिए मजबूर हो जाता है, नाक के अन्दर पपड़ियां जम जाती है और कभी-कभी तो रोगी के नाक से अधिक मात्रा में खून बहने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस औषधि का सेवन करना लाभदायक होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का चेहरा लाल और गर्म हो जाता है तथा इसके साथ ही चेहरे से सम्बन्धित खून की वाहिनियों में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस औषधि का उपयोग करे।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब मलत्याग करता है तो उसके मलद्वार पर दर्द होता है क्योंकि ऐसे रोगी को कब्ज की शिकायत होती है जिसके कारण मल कठोर और कष्ट के साथ आता है। जब तक रोगी के मलाशय में ढेर सारा मल जमा नहीं हो जाता, तब तक मलत्याग की इच्छा ही नहीं होती है जिसके कारण रोगी को कब्ज की समस्या हो जाती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री को मासिकधर्म शुरू होने के समय में स्राव कम मात्रा में होता है तथा रुक-रुककर होता है तथा इसके साथ ही स्त्री को जी मिचलाती है और बाहरी जननेन्द्रियों में चुभन के समान दर्द होता है तथा उसका मासिकधर्म कष्ट के साथ आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसका दम घुट रहा है, तेज चलने पर और भी अधिक दम घुटता है, छाती पर भार महसूस होता है, गले के अन्दर गुदगुदी होने के साथ खांसी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण:- घुटने में दर्द होता है जिसके कारण रोगी अपनी टांगों को फैलाना चाहता है और जब पैरों को फैला लेता है तो भी आराम नहीं मिलता है, हडि्डयों के जोड़ों में दर्द होना, त्वचा का ठण्डा होना, घुटने की हडि्डयां सुन्न पड़ जाना और उसमें दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मिर्गी के दौरे से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी के सिर में चोट लगने के कारण मिर्गी की समस्या हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेलीलोटस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
बेल, कैक्टस, ग्लोन, फेर, सैंग्वि तथा ऐमिल-नाइट्र औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मेलीलोटस औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
आंधी तथा तूफान आने पर, वर्षा होने पर तथा मौसम में परिवर्त्तन होने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
चलने फिरने से तथा खुली हवा में चलने फिरने से तथा स्थान बदलने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
सूंघने के लिए मेलीलोटस औषधि के मूलार्क तथा निम्न शक्तियों का उपयोग करना चाहिए।
मेनिस्पर्मम (Menispermum)
सिर के आधे भाग में दर्द होना तथा इसके साथ ही बेचैनी होना और सपने आना, रीढ़ की हडि्डयों में दर्द होना, सारे शरीर में खुजली तथा खुश्की होना और मुंह तथा गले में खुश्की होना आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेनिस्पर्मम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मेनिस्पर्मम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी के सिर में चक्कर आने लगते हैं तथा इसके साथ ही कानों में घंटी बजने जैसी आवाजें सुनाई देती हैं तथा इसके साथ-साथ ही रोगी को अंगड़ाई और जम्हाई आती है और पीठ के नीचे की ओर दर्द होता है, कभी-कभी सिर में दर्द होने के साथ उल्टियां भी हो जाती हैं, दर्द का असर सिर के पिछले भाग तक चला जाता है, जीभ में सूजन आ जाती है तथा लार अधिक मात्रा में आती है। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेनिस्पर्मम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी की पीठ, कोहनियों, कंधों तथा जांघों में दर्द होता है, टांगों में दर्द होता है तथा ऐसा महसूस होता है कि टांगें किसी चीज से कुचल गई हैं। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेनिस्पर्मम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- ब्रायो तथा काक्कू औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मेनिस्पर्मम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मेनिस्पर्मम औषधि की तीसरी शक्ति का उपयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए या फिर मूलार्क, 3X, 6X शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए।
मेनिस्पर्मम (Menispermum)
सिर के आधे भाग में दर्द होना तथा इसके साथ ही बेचैनी होना और सपने आना, रीढ़ की हडि्डयों में दर्द होना, सारे शरीर में खुजली तथा खुश्की होना और मुंह तथा गले में खुश्की होना आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेनिस्पर्मम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मेनिस्पर्मम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी के सिर में चक्कर आने लगते हैं तथा इसके साथ ही कानों में घंटी बजने जैसी आवाजें सुनाई देती हैं तथा इसके साथ-साथ ही रोगी को अंगड़ाई और जम्हाई आती है और पीठ के नीचे की ओर दर्द होता है, कभी-कभी सिर में दर्द होने के साथ उल्टियां भी हो जाती हैं, दर्द का असर सिर के पिछले भाग तक चला जाता है, जीभ में सूजन आ जाती है तथा लार अधिक मात्रा में आती है। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेनिस्पर्मम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी की पीठ, कोहनियों, कंधों तथा जांघों में दर्द होता है, टांगों में दर्द होता है तथा ऐसा महसूस होता है कि टांगें किसी चीज से कुचल गई हैं। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेनिस्पर्मम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- ब्रायो तथा काक्कू औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मेनिस्पर्मम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मेनिस्पर्मम औषधि की तीसरी शक्ति का उपयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए या फिर मूलार्क, 3X, 6X शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए।
मेन्था पाइपरीटा (Mentha piperita)
मेन्था पाइपरीटा औषधियों का प्रयोग शीतग्राही स्नायुओं को उत्तेजित करने के लिए किया जाता है। इस औषधि का सेवन करते ही सामान्य तापमान में चलती हुई हवा की लहर भी ठण्डी महसूस होती है। इस औषधि की प्रमुख क्रिया श्वसन अंगों और त्वचा पर होती है। पांचनतंत्रों से सम्बन्धित दर्द होने पर इस औषधि का लाभदायक प्रभाव होता है जिसके फलस्वरूप पांचनतंत्रों का कार्य सही हो जाता है और दर्द ठीक हो जाता है।
मेन्था पाइपरीटा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
पेट से सम्बन्धित लक्षण:- पेट फूल रहा हो, जिसके कारण रोगी को नीन्द नहीं आती हो या छोटे बच्चे के पेट में दर्द हो रहा हो या पित्त में दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ ही पेट में वायु बन रहा हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेन्था पाइपरीटा औषधि का उपयोग लाभदायक है।
श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षण:- आवाज बैठ गई हो, नाक की नोक को छूने पर दर्द महसूस हो रहा हो, गला शुष्क तथा दर्दनाक हो और ऐसा महसूस हो रहा हो कि गले के आर-पार कोई पिन चुभ गई हो। सूखी खांसी हो गई हो तथा स्वरयंत्र में हवा जाने पर ठण्ड महसूस हो रही हो। श्वास लेने वाले अंगों को छूने से दर्द हो रहा हो। इस प्रकार श्वास से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेन्था पाइपरीटा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी की त्वचा पर खरोंच लगने से खरोंच वाला भाग घाव बन गया हो। लिखते समय बांहों और हाथों में खुजलाहट होती है। स्त्री रोगी के योनि में खुजली हो रही हो। छाजन रोग हो गया हो। इस प्रकार चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेन्था पाइपरीटा औषधि का सेवन करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन):-
माथे और कई प्रकार के हडि्डयों के दर्द को ठीक करने के लिए रुमेक्स, लैके, मेन्था प्यूलेजियम तथा यूरोपियन पेनी रायल औषधि का प्रयोग करते हैं लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेन्था पाइपरीटा औषधि का उपयोग कर सकते हैं। अत: इन औषधियों के इस गुण की तुलना मेन्था पाइपरीटा औषधि से कर सकते हैं।
रोगी को कम पेशाब आता हो तथा इसके साथ ही बार-बार पेशाब करने की इच्छा हो रही हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेन्थ विरिडिस तथा स्पियरमिंट औषधियों का प्रयोग करते हैं लेकिन ऐसे ही कुछ लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को मेन्था पाइपरीटा औषधि के द्वारा भी ठीक कर सकते हैं। अत: इन औषधियों के इस गुण की तुलना मेन्था पाइपरीटा औषधि से किया जा सकता है।
मात्रा (डोज) :-
मेन्था पाइपरीटा औषधि की मूलार्क की 1 से 20 बूंदों से लेकर तीसवीं शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। योनि में खुजली होने पर इसका स्थानिक प्रयोग करना चाहिए।
मेंथाल (Menthol)
मेंथाल औषधि मेन्था के तेल से बनाई जाती है, नासाग्रसनी (नाक की नलियों) की श्लैष्मिक झिल्लियां और मेरु-स्नायु जालिका पर इसकी क्रिया होती है जिसके फलस्वरूप स्नायविक दर्द (नाड़ियों में दर्द) तथा अपसंवेदन जैसी अवस्थाएं ठीक हो जाती है। मेंथाल औषधि तेज जुकाम, कान के नलियों से बहने वाले पीब, गले में सूजन, स्वरयंत्र में सूजन, तंत्रिकाशूल आदि रोगों को ठीक करने में लाभकारी औषधि है। यह खुजली के रोग को ठीक करने में भी लाभदायक औषधि है।
मेंथाल औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के माथे पर दर्द होता है तथा दर्द का असर पूरे सिर में फैल जाता है और नीचे के नेत्रगोलकों तक दर्द होता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को मानसिक परेशानियां होने लगती है, बाईं आंख के ऊपर दर्द होता है, चेहरे पर दर्द के साथ सुन्नपन उत्पन्न हो जाता है, कभी-कभी तो रोगी को सर्दी-जुकाम भी हो जाता है तथा इसके साथ ही नाक के पिछले भाग से रेशा (श्लेष्मा) टपकता रहता है, नाक पर ठण्ड महसूस होती है, कान से अजीबों-गरीब आवाजें सुनाई देती हैं तथा बहरेपन की शिकायत उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेंथाल औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले में गुदगुदाहट महसूस होती है, हृदय में दर्द होता है तथा दर्द ऐसा महसूस होता है कि जैसे इस भाग में किसी ने छूरा भोंक दिया हो, दर्द का असर धीरे-धीरे पूरे छाती में फैल जाता है। रोगी को रुक-रुककर खांसी होती है तथा धूम्रपान करने से खांसी अधिक बढ़ जाती है। रोगी का श्वास दमा रोग से पीड़ित रोगी जैसा होता है तथा इसके साथ ही सिर में खून का संचालन अधिक होता है जिसके कारण सिर में दर्द होता है। इस प्रकार श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेंथाल औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गर्दन की पेशियों में दर्द होता है तथा इसके साथ ही कमर की पेशियों में भी दर्द होता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेंथाल औषधि का उपयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
काली-बाई तथा स्पाइजी औषधि के कुछ गुणों की तुलना मेंथाल औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मेंथाल औषधि की छठी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। खुजली के रोग को ठीक करने के लिए इसकी 10 प्रतिशत घोल या मलहम के रूप में बाह्य प्रयोग करना चाहिए।
मेन्यान्थेस (Menyanthes)
मेन्यान्थेस औषधि का प्रयोग कई प्रकार के सिरदर्दों तथा सविराम ज्वर (बुखार) को ठीक करने के लिए किया जाता है। इसका उपयोग उन रोगियों के रोगों को ठीक करने के लिए उपयोग किया जाता है जिन्हें बहुत से रोग होने से पहले या रोग के साथ दिल में ऐसी बेचैनी होती है कि मानो कोई दुर्घटना होने वाली है।
सिक्ड़कोना और कुइनैन के उपयोग करने के कारण उत्पन्न रोग की अवस्था को ठीक करने के लिए मेन्यान्थेस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
मेन्यान्थेस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर में दर्द से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसके सिर पर कोई बोझ रखा हुआ है तथा इसके साथ ही दबाव महसूस होता है, सिर में दर्द ऊपर से नीचे की ओर जाता है, जब सिर पर हाथ से दबाव देते है तो आराम महसूस होता है, चलने से हर एक कदम पर सिर पर बोझ और दबाव महसूस होता है। रोगी को इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही हाथ तथा पैर बर्फ की तरह ठण्डे हो जाते हैं। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेन्यान्थेस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को हर चौथे रोज(क्युर्टन फीवर) बुखार हो जाता है इसको ठीक करने के लिए मेन्यान्थेस औषधि उपयोगी है। ऐसे रोगी में एक प्रकार का और भी लक्षण होता है जैसे-ठण्ड लगना। रोगी के हाथ तथा पैर बर्फ की तरह ठण्डे रहते हैं, शरीर का बाकी भाग गर्म रहता है, नाक के आगे के भाग में और पेट पर ठण्ड महसूस होती है। रोगी को मांस खाने की इच्छा होती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेन्यान्थेस औषधि उपयोग लाभदायक है।
मलेरिया या जड़ौनी बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- मलेरिया या जड़ौनी बुखार में गड़बड़ी होने पर मेन्यान्थेस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिससे रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है तथा ऐसे रोगी को ठण्ड अधिक लगती है।
कमजोरी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कंपकंपी लगने के साथ शरीर में अधिक कमजोरी महसूस होती है, कंपकंपी के साथ ही हाथ-पांव बर्फ की तरह ठण्डे हो जाते हैं। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेन्यान्थेस औषधि उपयोग लाभकारी है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट फूल जाता है, पेट में ठण्ड महसूस होती है तथा इसके साथ सविराम ज्वर हो जाता है, हाथ-पैर ठण्डे और चेहरा गर्म हो जाता है, जब रोगी को बुखार हो जाता है तो प्यास नहीं लगती है, रोगी अंगडाइयां लेता रहता है और कंपकंपी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेन्यान्थेस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कभी-कभी प्यास नहीं लगती है, भूख तेज लगती है, थोड़ा सा खा लेने पर ही भूख मिट जाती है, मांस खाने की इच्छा होती है, ठण्ड महसूस होती है, जिसका असर ऊपर की ओर से भोजननली तक फैल जाता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेन्यान्थेस औषधि उपयोग फायदेमन्द है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- कैल्क, जेल्स, सिपि, मैग्ने-म्यूर, कैक्टस तथा पेरिस औषधि के कुछ गुणों की तुलना मेन्यान्थेस औषधि से कर सकते हैं। लैक, लाइको, पल्स, रस, कैप्स तथा वेरेट्रमा के प्रयोग करने के बाद मेन्यान्थेस औषधि का प्रयोग करने से रोगी को अधिक आराम मिलता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :- आराम करने से, शाम के समय में, सीढ़ियों से उतरने से, तम्बाकू का सेवन करने से, लेटने से तथा स्थिर रहने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :- खेलने-कूदने से, झुकने से तथा दर्द वाले भाग पर दबाव देने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :- मेन्यान्थेस औषधि की तीन से तीसवीं शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मेफाइटिस (Mephitis)
काली खांसी को ठीक करने के लिए मेफाइटिस औषधि का उपयोग लाभदायक है। काली खांसी को ठीक करने के लिए इस औषधि की 1X से 3X तनुकरणों का उपयोग करना चाहिए।
रोगी को दम घुटने का अहसास होता है, दमा के दौरे पड़ने लगते हैं, तेज खांसी हो जाती है और इतनी तेज खांसी होती है जैसे इससे मृत्यु हो जायेगी। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेफाइटिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
बच्चे का चेहरा नीला या लाल पड़ जाता है, बच्चे को श्वास लेने व छोड़ने में परेशानी होती है, छाती के ऊपरी भाग से श्लेष्मिक रालें निकलती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी बच्चे के रोग को ठीक करने के लिए मेफाइटिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
मेफाइटिस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी का मन उत्तेजित होता है, रोग के कारण न रोगी सो पाता है और न ही काम कर पाता है तथा इसके साथ ही रोगी को काली खांसी हो जाती है, चेहरा लाल और नीला पड़ जाता है या दमा का रोग हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेफाइटिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण:- अधिक काम करने के कारण आंखों में दर्द होता है, आंखों की रोशनी धुंधली हो जाती है तथा अक्षर को समझने में परेशानी होती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेफाइटिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के दांत में दर्द होता है तथा दांत में झटका लगता है, जीभ का स्वाद ऐसा हो जाता है जैसे प्याज खाने के बाद होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेफाइटिस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी को काली खांसी हो जाती है, दिन में दौरे कम तथा रात को अधिक होता है, भोजन के बाद उल्टी होती है, बातचीत करने से खांसी अधिक होती है तथा इसके साथ कच्चापन महसूस होता है, छाती में दर्द होता है, रात को खांसी अधिक होती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेफाइटिस औषधि उपयोग लाभकारी है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी को रात के समय में नींद खुल जाती है तथा इसके साथ ही काली खांसी हो जाती है और रात के समय में अधिक खांसी उत्पन्न होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेफाइटिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कोरेलि, स्टिकटा तथा ड्रासेरा औषधि के कुछ गुणों की तुलना मेफाइटिस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मेफाइटिस औषधि की पहली से तीसरी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इसकी क्रियावधि कम रहती है।
मेरम वेरम टियुक्रियम Merum Verum Teucrium
पेट में कीड़े होने पर कीड़ों को मारकर पेट से बाहर निकालने के लिए मेरम वेरम टियुक्रिम औषधि लाभकारी है। जिन रोगियों को कई प्रकार की दवाओं के सेवन करने से भी कोई लाभ न मिल रहा हो, उनके पेट के कीड़े को मारने के लिए मेरम वेरम टियुक्रिम औषधि का उपयोग करने से निश्चय ही लाभ मिलेगा।
जिन रोगियों के पेट में कीड़ें रहते हैं उनकी नाक में सुरसुरी और खुजली होती रहती है और इसीलिए वह बार-बार नाक रगड़ते रहता है, छोटे बच्चे के पेट में कीड़े होने पर ये लक्षण उनमें अधिक देखने को मिलते हैं, ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेरम वेरम टियुक्रिम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
नाकड़ा रोग को ठीक करने के लिए मेरम वेरम टियुक्रिम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
मर्क्यूरियेलिस पेरेनिस (Mercurialis perennis)
ऐसे रोगी जिन्हें अधिक नींद आती है तथा आलस्यपन होता है तथा इस प्रकार के लक्षणों के साथ ही रोगी की पीठ पर फुंसिया हो तथा अत्यधिक संवेदनशील आमाशय, आंतों और मूत्राशय की पेशी-तन्तुओं से सम्बन्धित कोई रोग भी हो गया हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियेलिस पेरेनिस औषधि उपयोग लाभदायक है।
मर्क्यूरियेलिस पेरेनिस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी के माथे पर दर्द होता है तथा जब वह सीढ़ियों से नीचे की ओर उतरता है तो उसे चक्कर आते हैं और ऐसा महसूस होता है कि माथे पर कसकर पट्टी बंधी है जिसके कारण दर्द हो रहा है, नाक के अन्दर दर्द होता है और कभी-कभी रोगी को ऐसा महसूस होता है कि जैसे उसके दो नाक हो गये हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियेलिस पेरेनिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण:- मुंह और गला शुष्क हो जाता है तथा जीभ भारी और सूखी लगती है, जीभ, होंठ और गालों में जलन के साथ छालें हो जाते हैं, गाल के अन्दरुनी भाग तथा भोजननली के पिछले भाग में घाव हो जाता है और गले में रूखापन महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियेलिस पेरेनिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण:- जब रोगी स्त्री को माहवारी का समय आता है तो स्राव अधिक कष्ट के साथ होता है, कम मात्रा में स्राव होता है तथा इसके साथ ही रोगी स्त्री को संभोग करने की इच्छा होती है, स्तनों में सूजन और दर्द होता है आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियेलिस पेरेनिस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कोटन, यूफोर्बि तथा बोरेक्स औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियेलिस पेरेनिस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मर्क्यूरियेलिस पेरेनिस औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मर्क्यूरियस-हाइड्रोर्जाइरस (Mercurius-Hydrargyrum)
इस शक्तिशाली मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि के प्रयोग से शरीर के प्रत्येक अंग तथा प्रत्येक ऊतक कुछ-न कुछ जरूर प्रभावित होते हैं। यह स्वस्थ कोशिकाओं को कमजोर तथा ज्वलनकारी कर देती है तथा हडि्डयों को गलाकर नष्ट कर देती है। यह खून को जमने से रोक देती है, जिसके कारण कभी-कभी रोगी में गंभीर अवस्था उत्पन्न हो जाती है लेकिन यह घातक औषधि शक्तियों के अनरूप यदि होम्योपैथिक पद्वति के अनुसार प्रयोग में लिया जाए या फिर लक्षणों के आधार पर प्रयोग किया जाए तो यह जीवन रक्षक का भी काम करती है और रोगों को ठीक करने में लाभदायक सिद्ध हो सकती है।
लसीका ग्रन्थि रोग से प्रभावित हो तथा जिसके साथ ही झिल्लियां, ग्रन्थियां तथा शरीर के अन्दरूनी हडि्डयां रोग ग्रस्त हो चुकी हो तो रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि लाभदायक हो सकती है।
पारा के उपयोग से उत्पन्न रोग की अवस्था या किसी जहर के कारण उत्पन्न शरीर में गर्मी की अवस्था को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग लाभदायक होता है।
खून की कमी के कारण उत्पन्न पीलिया रोग तथा इसके साथ ही उरोस्थि भाग में और जोड़ों के आस-पास दर्द तथा गठिया के साथ दर्द होना, मुंह तथा गले के अन्दर घाव तथा छाले पड़ना और सिर के बाल झड़ते रहना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। इस प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि की 2x शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के कई भागों में फफोलेदार घाव या फोड़ा होना (अबसेस), नाक के अन्दर अधिक श्लेष्मा का जमा (कफ जैसा पदार्थ जमना) होना, सुखण्डी (इस रोग में रोगी का शरीर सूखता ही चलता है) रोग हो गया हो, मुंह में छाले हो गए हो तथा जलन हो रही हो, शरीर में कंपन महसूस होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के कई अंगों में सूजन हो गई हो तथा इसके साथ ही कच्चेपन का अहसास हो और शरीर से अधिक मात्रा में तैलीययुक्त पसीना आ रहा हो तथा इसके बाद कुछ आराम मिल रहा हो, सांस लेने तथा खून बहने पर शरीर से अधिक बदबू आ रही हो, शरीर के घाव तथा फोड़े में पीब बन रहा हो, पीब का रंग हरा होता है तथा यह पतली, बदबूदार और रक्त युक्त होता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की स्मरण शक्ति बहुत अधिक कमजोर हो जाती है तथा इसके साथ ही इच्छा शक्ति में भी कमी आ जाती है, रोगी को अपना जीवन ऊबा-ऊबा (जीवन से निराश हो जाना) सा लगता है, अविश्वास अधिक होता है और ऐसा महसूस होता है कि मानसिक शक्ति नष्ट होती जा रही है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी से कोई प्रश्न करने पर वह प्रश्न का उत्तर देने में अधिक देर लगाता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस- हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब पीठ के बल लेटता है तो चक्कर आने लगता है, ऐसा महसूस होता है कि सिर पर कपड़े की पट्टी बंधी हुई है, सिर के एक भाग में फाड़ने जैसा दर्द होता है, माथे के आस-पास तनाव जैसे पट्टी बन जाती है, सिर में अधिक गर्मी महसूस होती है, सिर के ऊपरी भाग में घांव हो जाता है जिनमें से बदबू आती है, बाल झड़ने लगते हैं तथा सिर पर से तैलीय पसीना निकलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- पलकें लाल, मोटी होकर सूज जाती है, आंखों में जलन होती है तथा पानी जैसा तेज ज्वलनकारी द्रव बहने लगता है, आंखों के सामने काले धब्बे बन जाते हैं। कारखानों में काम करने वाले लोगों द्वारा आग की लपट देखने के बाद उत्पन्न रोग की अवस्था जिसमें आंखों में जलन के साथ दर्द होता है। इस प्रकार के आंखों से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का सेवन करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कान से गंदा पीबदार, बदबूदार कफ जैसा पदार्थ निकलने लगता है तथा इस पीबदार पदार्थ में खून भी कुछ मात्रा में होता है। इन लक्षणों के साथ-साथ रोगी के कानों में दर्द भी होता है, बिस्तर की गर्मी से तथा रात के समय में कान को खोदने से दर्द और भी तेज होने लगता है या फिर कान के बाहरी भाग में फोड़ा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को छीकें अधिक आती हैं, धूप में छींके और भी अधिक आती है, नाक के अन्दरूनी भाग में फुंसियां हो जाती हैं, नाक की हडि्डयों में सूजन आ जाती है, नाक से पीला-हरा बदबूदार पीब जैसा स्राव होता है। सर्दी-जुकाम के रोग होने के साथ ही नाक से ज्वलनकारी तरल पदार्थ बहता है जिसके कारण होंठ पर घाव हो जाता है। नाक की हडि्डयों में दर्द होता रहता है तथा नाक पर सूजन आ जाती है तथा साथ ही बदबू भी आती है, कभी-कभी तो नाक से खून बहने लगता है। नाक के पास की त्वचा छिल जाती है तथा अधिक मात्रा में कफ जैसा पदार्थ नाक से बहता रहता है। सर्दी-जुकाम होने के साथ ही नाक में दर्द होता है तथा कच्चेपन का अहसास होता है, नमीदार मौसम में नाक से अधिक पानी निकलता है। इस प्रकार के नाक से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का चेहरा पीला तथा मटमैला और गंदा हो जाता है, चेहरे पर सूजन आ जाती है, चेहरे की हडि्डयों में हल्का-हल्का दर्द तथा चेहरे पर फुंसियां हो जाती है तथा उसमें पीब बन जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह का स्वाद मीठा हो जाता है, मुंह से अधिक मात्रा में लाल रंग का स्राव निकलता है तथा लार से खून जैसा पदार्थ निकलता है, बोलना कठिन हो जाता है, मसूढ़ों से खून निकलने लगता है, किसी चीज को चबाने से दर्द होता है, दांत हिलने लगता है, दांत ढीले हो जाते हैं, दांत को छूने में दर्द होता है, जीभ के ऊपरी सतह पर लम्बी दरार पड़ जाती है, जीभ भारी हो जाती है, मुंह में जलन होने लगती है, साथ ही घाव हो जाता है, मुंह से बदबू आती है, यह बदबू इतनी गंदी होती है जो कमरे तक फैल जाती है, तेज प्यास होने लगती है तथा मुंह हर वक्त भीगा रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का सेवन करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले में नीली तथा लाल रंग की सूजन आ जाती है, लगातार किसी चीज को निगलने की इच्छा होती है, गले में जलन होती है, किसी चीज को निगलते समय कान में सुई चुभने जैसा दर्द होता है, तरल पदार्थ नाक के रास्ते वापस लौट आते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को गंदी-गंदी डकारें आती है, प्यास अधिक लगती है तथा ठण्डी चीजों का सेवन करने की इच्छा होती है, पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है, लगातार भूख लगती है, हिचकी आती रहती है, पेट भरा-भरा सा लगता है और सिकुड़ा हुआ लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पेट में इतना तेज दर्द होता है कि ऐसा लगता है कि पेट में किसी ने छूरा घोप दिया है, पेट फूलने लगता है तथा यकृत के आस-पास दर्द होता रहता है, पेट को छूने से दर्द और भी तेज होता है तथा रोगी को पीलिया भी हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब मलत्याग करता है तो उसका मल हरे रंग का होता है तथा मल से रक्त भी निकलता है, मल में लसलसा पदार्थ भी आता है, मलत्याग करते समय पेट में ऐंठन सी होती है, कभी-भी पूरा मल साफ तरीके से नहीं होता है, पेट में दर्द होता रहता है, कभी-कभी तो सफेद रंग का मल भी आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का सेवन करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बार-बार पेशाब आता है तथा पेशाब के साथ ही मूत्रमार्ग में जलन तथा दर्द भी होता है, पेशाब का रंग गहरा होता है तथा खून के साथ कुछ मात्रा में पेशाब भी आता है, अन्न जैसा पदार्थ भी पेशाब से आने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस- हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पुरुष से सम्बन्धित लक्षण :- पुरुषों के जननेन्द्रियों के आस-पास घाव हो जाता है तथा जननेन्द्रियां ठण्डी हो जाती है, लिंग पर खुजली भी होने लगती है, स्वप्नदोष हो जाता है रात के समय में अचानक वीर्यपात हो जाता है तथा जिसमें वीर्य के साथ खून की मात्रा भी होती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म के समय में स्राव होने के साथ ही पेट में तेज दर्द होता है। प्रदर रोग होने के साथ ही स्राव हरा और रक्तयुक्त होता है तथा स्राव ऐसा होता है जिससे त्वचा छिल जाती है, जननेन्द्रियों में कच्चेपन की अनुभूति होती है। स्त्रियों की डिम्बग्रन्थियों में डंक लगने जैसा दर्द होता है। प्रजनन अंग में खुजली और जलन होती है, पेशाब करने के बाद ठण्डे जल से धोने से आराम मिलता है। स्त्री रोगी को सुबह के समय में उल्टी आती है, साथ ही लाल रंग का स्राव भी होता है। स्तन में दर्द होता है तथा मासिकधर्म के समय में दूध अधिक बनने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के छाती में दर्द होता रहता है, रोगी दाईं करवट लेकर लेट नहीं पाता है, खांसी के साथ बलगम निकलता है, रात के समय खांसी अधिक होती है, जुकाम होने के साथ ही ठण्ड अधिक लगती है, हवा से डर लगता है, दाहिने फेफड़े के निचले खण्ड से लेकर पीठ तक सुई चुभने जैसा दर्द होता है। काली खांसी होने के साथ में रोगी के नाक से खून आने लगता है और यदि रोगी तम्बाकू, सिगरेट आदि का सेवन करता है तो रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कमर के निचले भाग में कुचले जाने जैसा दर्द होता है, बैठे रहने पर तेज दर्द होता है, पेट में दबाव जैसा दर्द होता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि उपयोग लाभदायक है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के कई अंगों में कमजोरी आ जाती है तथा हडि्डयों और अंगों में दर्द होता है तथा रात को अधिक मात्रा में कमजोरी महसूस होती है, शरीर के कई अंगों से पसीना निकलता है, कई अंगों में कंपन महसूस होती है, जोड़ों में फाड़ने जैसा दर्द होता है, रात के समय में पैरों में ठण्ड महसूस होती है, रात के समय में अधिक ठण्ड लगती है तथा पैरों तथा टांगों में सूजन आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को लगातार ठण्ड लगती है, त्वचा से अधिक मात्रा में बदबू आती है, चिपचिपा पसीना निकलता है तथा रात के समय में अधिक, छालेदार और पीबदार फुंसियां त्वचा पर हो जाती है, घाव आकार में अनियमित अर्थात टेढ़े-मेढ़े होते हैं, खुजली होती है तथा ग्रन्थियों में सूजन आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों में मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार हो जाता है तथा अधिक मात्रा में पसीना आता है तथा कमजोरी भी अधिक आ जाती है, कंपकंपी होती है तथा पसीने का रंग पीला होता है, शाम के समय में तथा रात के समय में अंगों में अधिक गर्मी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
रात के समय में, ठण्डी हवा के मौसम में रहने से तथा दाहिनी करवट लेटने से, पसीना अधिक आने से, गर्म कमरे में और बिस्तरे की गर्मी से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
रोगी को अधिक मात्रा में पेशाब आता है तथा ग्रन्थियों में रोग उत्पन्न हो जाता है तथा अतिसार हो जाता है और मल में कफ जैसा पदार्थ आता है, इंफ्लुएंजा बुखार हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए कैपेरिस-कोरियैसिया औषधि का उपयोग करते हैं लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी को मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से ठीक कर सकते हैं। अत: कैपेरिस-कोरियैसिया के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से किया जा सकता है।
जीर्ण अतिसार से पीड़ित रोगी को पेट में ऐंठन हो रही हो तथा मल के साथ ही रक्त और कफ जैसा पदार्थ निकल रहा हो और इसके साथ ही किसी चीज निगलने से कष्ट हो और टी.बी. जैसे लक्षण भी हो गया हो और इसके साथ ही अधिक कमजोरी आ गई हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिलोबियम औषधि का उपयोग करते हैं, लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग करना चाहिए। अत: एपिलोंबियम औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से कर सकते हैं।
जहरीली घाव को ठीक करने के लिए काली-हाइड्रो औषधि का उपयोग करते है, लेकिन ऐसे ही घाव को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का भी प्रयोग करते हैं। अत: काली-हाइड्रो के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से किया जा सकता है।
यदि रोगी के शरीर के किसी भाग में रक्त जमा होने के साथ ही अकड़न तथा खुश्की और अंशों में गर्मी होती है। आंखों में जलन होती है तथा खुजली होती है, नम हवा से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, गला-सूखने लगता है, बोलने में कष्ट होता है। छाती में दबाव महसूस होता है, मूत्रमार्ग में घाव हो जाता है, अंगों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियअसेटि औषधि का उपयोग करते हैं, लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग करते है। अत: मर्क्यूरिअसेटि औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग करते हैं।
मस्तिष्क के घाव, नाक और हडि्डयों के घाव, खुजली होने के साथ ही पानी जैसा पदार्थ निकलना, पुराना जुकाम तथा अण्डकोष की सूजन को ठीक करने के लिए मर्क्यूरिऔरेटस औषधि का उपयोग करते हैं लेकिन ऐसे ही रोगों को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग करते हैं। अत: मर्क्यूरिऔरेटस औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से करते हैं।
घाव को ठीक करने के लिए मर्क्यूरि-ब्रौमैटस औषधि का उपयोग करते है, लेकिन ऐसे ही घाव को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग करते हैं। अत: मर्क्यूरि-ब्रौमैटस औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से कर सकते हैं।
आंखों के सफेद भाग में सूजन, पलकों की सूजन। प्रमेह रोग। गर्मी के कारण उत्पन्न फोड़ें-फुंसियों को ठीक करने के लिए मर्क्यूकी-नाइट्रोसस औषधि का उपयोग करते हैं। अत: मर्क्यूकी-नाइट्रोसस औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से किया जा सकता है।
शरीर में गर्मी के कारण उत्पन्न स्नायुविक रोग तथा हडि्डयों का बढ़ जाना। इस प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यू-फोस्फोरिकस औषधि का उपयोग करते हैं, लेकिन ऐसे ही रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि उपयोग कर सकते हैं। अत: मर्क्यू-फोस्फोरिकस औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से कर सकते हैं।
रोगी जैसे ही रात के समय में लेटता है वैसे ही उसे नींद आने लगती है और दम घुटने लगता है और वह अचानक उछलकर खड़ा हो जाता है, जिससे कुछ राहत मिलती है, सूजाक रोग हो जाता है, रोगी को अपना लिंग ढीला महसूस होता है, लिंग में गिल्टियां हो जाती है, शरीर के कई अंगों पर दरारें पड़ जाती है, दाढ़ी पर दाद हो जाता है, पलकों पर जलन होती है, आंख के अन्दरूनी तथा बाहरी भाग में जलन होता है, सिर के पिछले भाग में भारीपन महसूस होता है तथा इसके साथ ही कान बहने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस प्रिसिपिटेट्स रूबर औषधि का उपयोग करते है लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि करते हैं। अत: मर्क्यूरियस प्रिसिपिटेट्स रूबर औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से करते हैं।
पाचनतंत्र से सम्बन्धित रोगों को ठीक करने के लिए तथा चर्म रोग के साथ घाव होने पर रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूटैनिकस औषधि का उपयोग करते हैं लेकिन कुछ ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि उपयोग कर सकते हैं। अत: मर्क्यूटैनिकस औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से कर सकते हैं।
सारे शरीर में लाली जैसे फोड़ें-फुंसियां हो जाती हैं, छाती पर लाल-लाल फुंसियां हो जाती हैं। ऐसे रोग को ठीक करने के लिए एरिथि्रनस-साउथ अमेरिकन रेड मुलेटफिश औषधि का उपयोग करते हैं, लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि ठीक कर सकते हैं। अत: एरिथि्रनस-साउथ अमेरिकन रेड मुलेटफिश औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से कर सकते हैं।
हाथ-पैरों में कंपन को ठीक करने के लिए लोलियम टेमुलेटस औषधि का उपयोग करते हैं, लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से करते हैं। अत: लोलियम टेमुलेटस औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से कर सकते हैं।
पाचनतंत्र सूजन, जी मिचलाना, पित्त रोग, फेन के समान उल्टी होना, मल पानी जैसा पतला होना, अधिक मात्रा में होना, लसीला होना, पित्त युक्त होना, मलत्याग करने की इच्छा न होना तथा पेट में ऐंठन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए हेंचेरा एलमरूट औषधि के मूलार्क की 2 से 10 बूंदों का उपयोग करते है, लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि का उपयोग करते हैं। अत: हेंचेरा एलमरूट औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से कर सकते हैं।
मेजीरि, फास्फो, एथियोप्स औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि से कर सकते हैं।
पूरक :-
बादियागा।
मात्रा (डोज) :-
मर्क्यूरियस-हाइड्रार्जाइरस औषधि की दूसरी से तीसवी शक्ति तक का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है।
मर्क्यूरियस (Mercurius)
रोगों की चिकित्सा करने में मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग अधिक लाभदायक होता है जिसके फलस्वरूप कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं। रोगों को ठीक करने के लिए इस औषधि का प्रयोग चिकित्सक को प्रतिदिन करना चाहिए।
यदि किसी रोगी के शरीर में कंपकंपी हो रही हो तथा कमजोरी भी अधिक महसूस हो रही हो, शरीर से पसीना अधिक आ रहा हो, त्वचा पर कई जगह घाव हो गया हो तथा इसके साथ ही घाव से बदबू आ रही हो, नम मौसम में, गर्मी और ठण्ड के मौसम में तथा रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मर्क्यूरियस औषधि का असर शरीर की सभी ‘लैिश्मक-झिल्लियों पर भी पड़ता है। इनसे निकलने वाले स्राव का रूप पहले पतला होता है और उसको छूने से त्वचा उघड़ने लगती है। दस्त और नजला में इसका अंश मौजूद रहता है। बाद में यह स्राव अधिक गाढ़ा हो जाता है। रात को इसमें और भी अधिक तेजी आ जाती है। ऐसे लक्षणों को दूर करने में मर्क्यूरियस औषधि का लाभदायक प्रभाव होता है।
ग्रन्थियों में सूजन आ जाने, सर्दी लगना, फोड़े-फुंसी में मवाद जमा होना तथा जख्मों में मोम जैसा चिकनापन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
मर्क्यूरियस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी हर बात में जल्दी करता है, बहुत जल्द बात करना, घबराहट होना, बेचैनी होना, स्मरण शक्ति कमजोर होना, प्रश्नों का उत्तर ठीक प्रकार से न दे पाना, किसी के भी मुंह की तरफ ताकना, किसी बात को देर से समझना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर को छूने से उसे दर्द महसूस होता है, जब रोगी सिर का खुजलाता है तो दर्द और भी बढ़ जाता है, सिर से खून निकलने लगता है, खोपड़ी की त्वचा में दिन रात खुजली होती है, उसमें छोटी-छोटी फुंसियां हो जाती है जिनमें तरल पदार्थ भरा रहता है, सिर में पपड़ियां जम जाती है, बाल झड़ने लगते हैं, सिर की हडि्डयों में सूजन आ जाती है, सिर पर कहीं-कहीं गांठें पड़ जाती है, गर्मी के मौसम में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
पारा के सेवन करने से उत्पन्न रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द होता रहता है, जुकाम हो जाता है, सिर में गर्मी महसूस होती है, सिर भारी-भारी सा लगता है और रोगी को ऐसा महसूस होता है कि जैसे सिर में पट्टी बंधी हुई है, दर्द इतना तेज होता है कि ऐसा लगता है जैसे सिर फटा जा रहा है, हवा लगने पर सिर के दर्द में और भी तेजी होती है, कमरे के अन्दर रहने पर कुछ आराम मिलता है, लेकिन ठण्ड तथा गर्म कमरे में रोगी को अधिक परेशानी होती है, हवा के झोंक लगने से और भी अधिक परेशानी होती है, रोगी कुछ ओढ़ना चाहता है, लेकिन गर्मी के कारण तकलीफ होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को मौसम परिवर्तन होने के समय में और भी परेशानी होती है, पुराना जुकाम ठण्ड के कारण पतला हो जाता है और तेजी से बहने लगता है और सिर में दर्द भी तेज हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
खसरा (मिसलस) से सम्बन्धित लक्षण :- यदि कोई व्यक्ति खसरा रोग से पीड़ित है तथा जब वह अपने सिर को इधर-उधर घुमाता है तो उसके सिर में दर्द होता है, उसके सिर में पानी जम जाता है, सिर से पसीना निकलता रहता है, रोगी कराहने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- मर्क्यूरियस औषधि कई प्रकार के आंखों के रोगों को ठीक करने के लिए अधिक उपयोगी है। ठण्ड लगने के कारण आंख आ गई हो, आंखों में सूजन हो, आंखों में जलन तथा सुर्खी हो, आंखों से गर्म पानी बहना, सुबह के समय में आंखों से कीचड़ के जैसा पदार्थ निकलना जिसके कारण आंखों का चिपक जाना, आंखें अच्छी तरह से नहीं खुलती है, आंखों से धुंधलापन नज़र आने लगता है, ऐसा महसूस होता है कि आंखों के सामने कोहरा छा जाता है, रोशनी तथा आग की गर्मी बर्दाश्त नहीं होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कान से गाढ़ा हरे रंग का मवाद निकलता है जिसमें से बदबू आती है, कान पर सूजन आ जाती है तथा कान में टीस मारता हुआ दर्द होता है, ऐसा महसूस होता है जैसे कि कान का पर्दा फट गया है, कभी-कभी कान रुक-रुककर बंद हो जाता है, निगलने या नाक झिड़कने से कान खुल जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि उपयोग करना चाहिए। कानफेड रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि बहुत उपयोगी है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक से पीले रंग का मवाद जैसा पदार्थ बहता रहता है तथा उसमें से बदबू आती है। नाक की हड्डी में सूजन आ जाती है तथा उसे छूने से दर्द महसूस होता है। रोगी का जुकाम पककर गाढ़ा और पीला हो जाता है तथा रोगी को प्यास लगती है, नाक पर किसी प्रकार की जलन तथा दर्द नहीं होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के चेहरे पर गर्मी के कारण घाव हो जाता है तथा स्नायुशूल (नाड़ियों में दर्द) होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- दांत से सम्बन्धित कई प्रकार के रोग। गठिया तथा पारे का उपयोग करने के कारण उत्पन्न मसूढ़ें में तकलीफ। दांत हिलते रहते हैं, जल्दी गिर जाते हैं, काले पड़ जाते हैं, टूटने लगते हैं, जीभ से दांतों को छूने पर दर्द होता है, मसूढ़े घिसते जाते हैं, टीस मारता सा दर्द, दर्द का असर कान और सिर तक फैल जाता है, रात के समय में तथा बिस्तरे पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। मसूढ़ें में सूजन, छूने और चबाने से दर्द होता है, मसूढ़ें को जरा सा दबाने पर ही खून निकल आता है, मुंह से बदबू आती है। मसूढ़ें पक जाते हैं, मवाद आने लगता है। इस प्रकार के मुंह से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है लेकिन यह ध्यान देना चाहिए कि रोगी को प्यास अधिक लगती हो।
जीभ से सम्बन्धित लक्षण :- जीभ फूली हुई, पिलपिली तथा लबलबी रहती है तथा जीभ पर सफेद मैल जम जाते हैं, जीभ के किनारे सुर्ख गीली रहती है तथा रोगी को प्यास अधिक लगती है, जीभ पर दान्तों के निशान बन जाते हैं, जबान हिलाई नहीं जाती है, जीभ कंपकंपाती रहती है, रोगी को बोलने में तकलीफ होती है और तुतलाता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले में सूजन आ जाती है, मुंह और गले में गर्मी के कारण घाव हो जाता है, मुंह में राल भरी रहती है, टॉन्सिल पक जाने के कारण निगलने में अटकता हुआ दर्द होता है, हलक की गिल्टियों में सूजन आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी मांस, शराब, कॉफी और चर्बीदार खाना पसन्द नहीं करता है। दूध तथा मिठाई हजम नहीं होती है, पाचन शक्ति कमजोरी हो जाती है, लीवर की क्रिया गड़बड़ा जाती है, खट्टी डकारें आती हैं, लीवर में दर्द होता रहता है, दाहिनी करवट लेकर लेटने से पेट की तकलीफें और भी बढ़ जाती है, कभी-कभी तो रोगी को पीलिया रोग भी हो जाता है। लीवर बढ़ जाता है तथा उसे छूने से दर्द और भी बढ़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
जांघ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जांघ की गिल्टियों में सूजन आ जाती है या पककर मवाद पड़ जाता है या फिर बाघी (बुबो) रोग हो जाता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की मूत्रनली में जलन होना, बार-बार पेशाब आना, थोड़ा-थोड़ा पेशाब आना तथा रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होना। पेशाब स्याही के रंग की तरह कुछ धुंधलापन जैसा होता है तथा उसमें कुछ खून मिला हुआ होता है। सूजाक रोग होने के साथ ही रोगी के पेशाब का रंग सब्जी के रंग के जैसा हो जाता है तथा पीब जैसा पदार्थ पेशाब में आता है, रात के समय में परेशानी अधिक होती है। रोगी के लिंग की ऊपरी त्वचा खुलती नहीं है जिसके कारण रोगी को सैक्स क्रिया करने में अधिक परेशानी होती है। इस प्रकार के मूत्र से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
गर्मी से सम्बन्धित लक्षण :- गर्मी के कारण इन्द्रिय के सुपारी (लिंग के सुपारी) पर घाव हो गया हो तथा इसके साथ ही सूजन आ गई हो तो रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सिफिलिस रोग से सम्बन्धित लक्षण :- सिफिलिस गर्मी के कारण उत्पन्न होने वाला रोग है जो मनुष्य की कुक्रिया का फल होता है, यह रोग व्यक्ति को तब होता है जब वह रोग से पीड़ित स्त्री के साथ संभोग करता है। यह रोग गनोरिया की तरह ही होता है लेकिन फर्क यह है कि गनोरिया रोग में लिंग के अन्दर मूत्रनली ओर उसकी जड़ में जलन और घाव हो जाता है जबकि सिफिलिस रोग में लिंग के सिरे अर्थात सुपारी पर जलन होती है तथा घाव हो जाता है। यह दोनों ही रोग कुक्रिया करने के कारण होता है। इस रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मासिकधर्म से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों को मासिकधर्म के समय में अधिक मात्रा में खून का स्राव होता है तथा खून का रंग सुर्ख पीले रंग का होता है। मासिकधर्म कई महीनों तक रुक जाता है। प्रदर रोग होने के साथ ही सब्जी के रंग का स्राव होता है और योनि में खुजली तथा जलन होती है, रात के समय में स्त्री रोगी को अधिक परेशानी होती है। योनिद्वार में सूजन होना, खुजली मचना, पेशाब छू जाने से खुजली अधिक हो जाना। प्रत्येक बार मासिकधर्म शुरू होने पर स्तन में दर्द होना और सख्त हो जाना, कभी-कभी तो स्त्री रोगी यह भी सोचती है कि मेरे स्तन पक तो नहीं गए हैं। मासिकधर्म के समय में स्तनों में दर्द होना, सख्ती होना तथा जलन होना। गर्भावस्था के समय में जननेन्द्रिय में सूजन तथा दर्द होना, चलने पर तकलीफ बढ़ जाती है, बच्चे को जन्म देने के बाद बहुत दिनों तक मैले रंग का पानी बहता रहता है। इस प्रकार के मासिकधर्म से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
जरायु (युटेरस) तथा स्तन से सम्बन्धित लक्षण :- गर्भाशय तथा स्तन में कैंसर होने पर रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को जुकाम हो जाता है तथा जुकाम में गाढ़ा पीले रंग का कफ जैसा पदार्थ नाक से बहता रहता है, बहुत दिनों तक नाक बहता रहता है, जब रोगी दाहिनी करवट करके लेटता है तो उसे खांसी अधिक होती है, शरीर से पसीना अधिक निकलता है, अधिक गर्मी तथा ठण्ड से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। सीने की दाहिनी तरफ सुई चुभता हुआ दर्द होता है, छींकने और खांसने से पीठ में दर्द होता है। टी.बी. (क्षय) का रोग हो जाता है तथा थूक के साथ खून निकलता है। न्यूमोनिया रोग होने के बाद फेफड़ा पक जाता है और उसमें मवाद पड़ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गर्दन और पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की गर्दन की गिल्टियों में सख्ती और सूजन आ जाती है तथा सांस लेने से कमर में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
वात रोग से सम्बन्धित लक्षण :- जोड़ों में दर्द और सूजन होना, हाथ-पैर में लकवा रोग जैसा प्रभाव होना। इस प्रकार के लक्षणों के साथ ही रोगी को बिस्तर की गर्मी से और ओढ़ना हटा देने से, पसीने और रात में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सारे शरीर में खुजली होती है, बिस्तर की गर्मी से और रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। शरीर की त्वचा पर घाव हो जाता है तथा घाव में से दूषित खून बाहर निकलने लगता है। शरीर की त्वचा पर गोल सुर्ख चकते पड़ जाते हैं जो जल्द नहीं पकते, ये सख्त हो जाते है और उनमें दर्द होता है। इस प्रकार के चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार होने के साथ ही पसीना अधिक निकलता है, लेकिन फिर भी बुखार में कमी न होकर शरीर में तकलीफे और बढ़ जाती हैं। गाल, गर्दन, जांघ आदि शरीर के किसी भी स्थान की गिल्टियों में सूजन हो जाने से बुखार आने पर और उसके साथ बहुत ज्यादा पसीना आता है। ठण्ड लगकर बुखार हो जाता है तथा जुकाम भी रहता है। इस प्रकार के ज्वर से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
मरोड़ तथा ऐंठन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पेचिश होने के साथ ही पेट में ऐंठन होने लगती है तथा इसके साथ ही आंव के साथ खून मिला हुआ मल आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- हिपर, लैक, बेल और सल्फर औषधि के प्रयोग के बाद यह अच्छा काम करता है, लेकिन साइलीशिया के पहले और बाद मर्क्यूरियस औषधि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
विषनाशक औषधियां :-
हिपर, आरम, लैक, मेज़, सल्फर तथा ऐसिड औषधियों का उपयोग मर्क्यूरियस औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :- रात के समय में, बिस्तर की गर्मी से, पसीना आने से, शाम की ठण्डी हवा से, नम मौसम में, दिन की गर्मी और रात की नमी और ठण्ड से, अधिक परिश्रम करने से और दाहिनी तरफ लेटने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
मात्रा (डोज) :- मर्क्यूरियस औषधि की 2 से 30 शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मर्क्यूरियस कौरोसाइवस (Mercurius Corrosivus)
मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि का असर बहुत तेज होता है, यह जलन तथा जहरीला गुण युक्त होता है। मलद्वार पर जलन के साथ सिकुड़न को ठीक करने में इस औषधि का प्रभाव अन्य औषधियों से काफी लाभदायक है। अण्डकोष में सूजन तथा सूजाक रोग के साथ लगातार मरोड़ होने पर रोग को ठीक करने के लिए इस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक उदासीपन महसूस होता है तथा ठण्ड लगती है, सिर में दर्द होता रहता है, सिर में खून जमा होने लगता है तथा गालों में जलन होती है, खोपड़ी के ऊपरी भाग में खिंचावदार दर्द होता है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि का प्रयोग करना चाहिए ।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के आंखों के नेत्रगोलकों के पीछे दर्द होता है और ऐसा महसूस होता है कि नेत्रगोलक बाहर की ओर ढकेले जा रहे हैं, पलकों पर घाव हो जाता है, प्रकाश को देखने पर आंखों में जलन होती है और आंखों से आंसू निकलने लगता है, रात के समय में आंखों में अधिक जलन होती है तथा आंखों में दर्द होता है, आंख का तारामण्डल (इरिस) मटमैली, मोटी हो जाती है तथा वह न सिकुड़ती है और न ही फैलती है। छोटे बच्चों को आंख आना। पलकों में सूजन होना तथा ऊपरी त्वचा लाल हो जाना तथा तेज जलन होना और आंखों में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि का सेवन करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को जुकाम हो जाता है तथा नाक से कफ जैसा पदार्थ बहता रहता है। रोगी को नाक के अन्दर कच्चेपन का अहसास होता है तथा चीस मचने लगती है, नाक के अन्दरूनी भाग में सूजन आ जाती है, श्लैष्मिक झिल्ली सूखी, लाल और रक्तयुक्त होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कान के अन्दर दर्द होता है तथा कान के अन्दर से पीब निकलने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरे पर सूजन आ जाती है तथा लाली पड़ जाती हैं, होंठ काला पड़ जाता है, दांत में दर्द होता है, चेहरे की हडि्डयों में दर्द होता है, नाड़ियों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि का सेवन करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- दांत ढीले पड़ जाते हैं, मसूड़ों में सूजन आ जाती है तथा सूजन वाली जगह बैंगनी रंग की हो जाती ही और उसमें जलन होती है, मसूढ़ों से खून बहता रहता है, जीभ का स्वाद नमकीन तथा कड़वा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले पर सूजन हो जाती है तथा सूजन वाली जगह लाल पड़ जाती है और उसमें दर्द होने लगता है। दर्द का असर नाक से लेकर कान तक होता है और जलन भी होती है, छाती के आस-पास के भागों में भी सूजन आ जाती है और ग्रन्थियां सूज जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
आमाशय :- रोगी को लगातार हरे रंग की पित्त की उल्टियां होती है तथा पाचनतंत्र में दर्द होता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि उपयोग लाभदायक है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- अन्धान्त्रप्रदेश और अनुप्रस्थ बृहदांत्र (ट्रांसवर्स क्लोन) में दर्द होता है तथा पेट में कुचले जाने जैसी अनुभूति होती है। पेट फूलने लगता है तथा पेट को छूने पर दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पेट में मरोड़ उत्पन्न होती है तथा मलत्याग करने के बाद भी यह नहीं घटती है, पेचिश जैसी समस्या हो जाती है, मल गर्म, रक्तयुक्त, चिपचिपा तथा बदबूदार होता है तथा इसके साथ ही पेट में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि उपयोग करे।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के स्वरयंत्र में दर्द होता है तथा ऐसा महसूस होता है कि जैसे छूरी से काट दिया गया है, गला बैठ जाता है, खांसी हो जाती है तथा बलगम में खून भी आता है, नाड़ी की गति तेज हो जाती है, छाती में एक ओर सुई चुभने के जैसा दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मूत्रमार्ग में तेज जलन होती है, पेशाब गर्म, ज्वलनशील, रक्तयुक्त तथा हरे रंग का होता है तथा बहुत कम मात्रा में होता है, पेशाब में अन्न जैसा पदार्थ भी आने लगता है, मूत्राशय में मरोड़ होती है, मूत्रमार्ग से लेकर मूत्राशय तक छूरा भोंक देने जैसा दर्द होता है तथा पेशाब करने के बाद पसीना आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि का सेवन करना चाहिए।
पुरुष से सम्बन्धित लक्षण :- लिंग तथा अण्डकोष में सूजन आ जाती है, लिंग तथा अण्डकोष के ऊपरी भाग पर घाव होना, सूजाक रोग होना, मूत्रमार्ग में सूजन तथा लाली पड़ जाना, लिंग के सुपारी पर दर्द होना। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि उपयोग लाभदायक है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार होने के साथ ही ठण्ड लगने लगती है तथा बहुत अधिक पसीना आता है और त्वचा ठण्डी हो जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि उपयोग लाभकारी है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :- शाम के समय में, रात में तथा अम्ल-पदार्थों के सेवन करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :- अधिक आराम करने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- आर्से, लैके, लियोंनुरस, मौन्सोनिया औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष :- कैल्शियम सल्फाइड बाइक्लोराइड विषण्णता की प्रतिविष है। 7½ औंस उबले पानी में 7½ ग्रेन कैल्शियम सल्फाइड मिलाकर इंजेक्शन दें।
मात्रा (डोज) :- मर्क्यूरियस कौरोसाइवस औषधि की 6 शक्ति 1:1000 के अनुपात के घोल का इंजेक्शन श्वेतपटल के नीचे तब दिया जाता है जब रंजित पटल में सूजन के साथ निकट-दृष्टि दोष का रोग हो। नेत्रगोलकों के पीछे होने वाले तेजदर्द को तुरन्त रोक देती है।
मर्क्यूरियस स्यानैटस (Mercurius cyanatus)
डिप्थीरिया नामक रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि का उपयोग लाभदायक है जिसके प्रभाव से यह रोग ठीक हो जाता है, यह एक प्रकार का ऐसा रोग है जिसके कारण रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।
अण्डकोष में जलन, तेज संक्रमक रोग, न्यूमोनिया आदि रोगों को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
ऐसा रोग जिसे अधिक उदासी हो तथा शरीर के कई अंगों से खून बह रहा हो और खून का रंग काला, नीला हो, हृदय की गति तेज हो गई हो, श्वास लेने में परेशानी हो रही हो तथा पेशाब से अन्न जैसा पदार्थ आ रहा हो और पेशियों में ऐंठन हो रही हो तथा झटकें लग रहे हो और इन लक्षणों के साथ ही अन्दरूनी बुखार भी हो तो रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि का उपयोग करना चाहिए। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब अधिक परिश्रम करता है तो उसके श्वास में रुकावट अधिक होती है तथा उसके फुफ्फुस धमनी में लकवा का प्रभाव होता है और शरीर से अधिक पसीना आता है।
मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि उन व्यक्ति के लिए अधिक लाभदायक है जो अधिक बोलते हैं या गाना गाते हैं और उन्हें इस कारण से गले का रोग हो जाता है।
मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक उत्तेजना होती है, क्रोध (गुस्सा) आता है, अधिक बोलने लगता है, सिर में दर्द होने लगता है, आंखें अन्दर की ओर धंस जाती हैं तथा चेहरा पीला पड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह के आंतरिक भाग में घाव हो जाता है, जीभ पर पीली परत जम जाती है, अधिक मात्रा में लार निकलने लगती है, सांस से बदबू आती है, लालग्रन्थियों में सूजन आ जाती है तथा दर्द होता है, स्तम्भक स्वाद (अस्ट्रीजेन्ट टेस्ट), रोगी के मुंह के अन्दर होने वाले घावों के साथ ही भूरे रंग की झिल्लियां (छाले) पड़ जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले के अन्दर तेज दर्द होता है और साथ ही कच्चेपन का अहसास होता है। श्लैष्मिक झिल्लियां ठण्डी पड़ जाती हैं तथा उसमें घाव हो जाता है, गले के अन्दर कच्चे धब्बे नज़र आने लगते हैं, खराश उत्पन्न हो जाता है, बातचीत करने से रोगी को और भी परेशानी होने लगती है। गले की तालु तथा गले के अन्दरूनी भाग में घाव हो जाता है, बोलने में परेशानी होती है तथा किसी चीज को निगलने में परेशानी होती है। रोगी के नाक से काला-काला खून बहने लगता है, स्वरयन्त्र तथा नाक में डिफ्थीरिया रोग उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार के गले से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि का सेवन करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को उल्टियां होने लगती है, जी मिचलाना, हिचकी आना, पेट में दर्द तथा दबाव होने लगता है और पित्त गर्म हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी है।
मलद्वार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मलद्वार में तेज दर्द होता है इसके साथ ही मलद्वार के चारों ओर लाली पड़ जाती है तथा सूजन आ जाती है, मलद्वार से बराबर खून बहता रहता है, मलद्वार के पास ऐंठन होने लगती है, बहुत अधिक बदबू आती है, मल काले रंग का होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- लिंग के आस-पास घाव हो जाता है तथा दर्द होता है, पेशाब में अन्न जैसा पदार्थ आने लगता है, अण्डकोष में जलन होती है। इन लक्षणों के होने के साथ ही रोगी के शरीर में अधिक कमजोरी भी आ जाती है, पेशाब रुक-रुककर होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- शुष्क मौसम में रोगी के शरीर की त्वचा बर्फ जैसी ठण्डी हो जाती है, गले से सम्बन्धित डिप्थीरिया रोग हो जाता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
काली खांसी से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह में श्लैष्मिक झिल्ली बनने के कारण रोगी को काली खांसी हो जाती है। इस रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
किसी चीज को निगलने से, बात करने से तथा बोलने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
गर्म प्रयोग से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कार्बो-वे, काली-फा, लैके, म्यूरे-ए, आर्स तथा फास औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि से करते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मर्क्यूरियस स्यानैटस औषधि की छठी से तीसवी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
सावधानी :-
6 से निम्न शक्तियों के प्रयोग से रोग के लक्षणों में वृद्धि होने की संभावना रहती है।
माइरिका (Myrica)
माइरिका औषधि का उपयोग करने से यकृत की क्रिया में सुधार होता है, कामला रोग (जोण्डिस.पीलिया रोग) को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का उपयोग किया जा सकता है तथा इसके प्रयोग से श्लैष्मिक झिल्लियों की क्रिया में सुधार होता है।
माइरिका औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को यदि यकृत से सम्बन्धित कोई रोग हो या पीलिया रोग से पीड़ित हो तथा इसके साथ ही यदि वह अधिक निराश रहता हो तथा चिड़चिडा़ स्वभाव का हो गया हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसका सिर किसी पट्टी से बंधा हुआ है। सिर में दर्द होने के साथ ही रोगी को नींद आती रहती है, आंख का सफेद भाग पीला हो जाता है तथा आंखों में दर्द होता है। खोपड़ी तथा माथे पर दबाव महसूस होता है। सुबह के समय में जागने पर कनपटियों और माथे में भारीपन महसूस होना, गर्दन के जोड़ों पर दर्द होना तथा अकड़न होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का चेहरा पीला हो जाता है तथा इसके साथ ही शरीर की त्वचा तथा चेहरे पर दर्द तथा जलन होती है और चलने का मन करता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- जीभ पर परत जमने के साथ ही मुंह का स्वाद भद्दा हो जाता है और बेचैनी होती है, उल्टियां होती है, मुंह को छूने पर दर्द होता है, मसूढ़ें मुलायम हो जाते हैं तथा उनमें से खून भी निकलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक हो होने लगता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पीलिया या यकृत से सम्बन्धित रोग होने के साथ ही गले में सिकुड़न और खुरदरेपन का अहसास होता है तथा कुछ निगलने की आदत पड़ जाती है, कफ भी निकलता है जिसमें डोरी के समान कफ निकलता है और कठिनाई से बाहर निकलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जीभ का स्वाद कड़वा हो जाता है और ऐसा लगता है कि उल्टी हो जायेगी, इसके साथ ही सांस लेने पर बदबू आती है, आमाशय के अन्दर कुछ भरा-भरा सा लगता है, पाचनतंत्र में कमजोरी आ जाती है तथा ऐसा लगता है कि पाचनतंत्र अन्दर की ओर धंसा जा रहा है जिसके कारण जी मिचलाने लगता है, भोजन करने के बार अधिक परेशानी होती है तथा तेज चलने पर कम परेशानी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- जिगर में दर्द होता है। पीलिया रोग होने के साथ ही त्वचा पीला हो जाता है तथा भूख नहीं लगती है। आमाशय तथा पेट के अन्दर भारीपन महसूस होता है तथा पेशाब फेनिला आता है। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब चलता है तो उसके मलद्वार से वायु निकलती है, मलत्याग करने की बार-बार इच्छा होती है लेकिन अधिक वायु निकलने के अलावा मलत्याग कुछ नहीं होता है और कभी होता है भी तो मल पतला, हल्के रंग का या राख के रंग का। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- यकृत से सम्बन्धित रोग या पीलिया रोग हो गया है तथा इसके साथ ही पेशाब गहरे रंग का, फेनिला, कम मात्रा में तथा पित्तयुक्त हो रहा हो तो रोग को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का सेवन करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- यकृत से सम्बन्धित रोग या पीलिया रोग से पीड़ित रोगी को नींद ठीक तरह से न आ रहा हो तथा बुरे सपने देख रहा हो तथा बार-बार नींद खुल जाती हो तो उसके इस रोग का उपचार करने के लिए माइरिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की चाल लड़खड़ा रही हो, कंधों के नीचे, गर्दन के पीछे तथा सभी मांसपेशियों में दर्द हो और दायें पैर के तलुवों के बीच के भाग में दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ ही यकृत या पीलिया से सम्बन्धित रोग हो गया हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का उपयोग लाभदायक है।
त्वचा से सम्बन्धित लक्षण :- त्वचा का रंग पीला हो गया हो तथा शरीर के सभी अंगों की त्वचा पर खुजली मच रही हो या पीलिया रोग हो गया हो और ऐसा महसूस हो रहा हो कि शरीर की त्वचा पर कीड़ें रेंग रहे हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
इस ग्रुप का
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कौर्नस-सर्सी, चेलिडो, लैप्टैड्रा तथा टीलिया औषधियों के कुछ गुणों की तुलना माइरिका औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष :-
डिजिटैलिस औषधि का उपयोग माइरिका औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
माइरिका औषधि की मूलार्क से 3 शक्ति तक का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
म्यूरेक्स (म्यूरेक्स पप्र्ययूरिया) (Murex)
म्यूरेक्स औषधि स्त्रियों के जननेन्द्रियों को अधिक प्रभावित करने वाली औषधि है। चिकित्सा के क्षेत्र में यह प्रमाणित हो चुका है कि यह स्नायविक, तत्पर व स्नेहवत्सल स्त्रियों के लिए विशेष उपयोगी है और रोगी के कमजोरी को दूर करके स्वस्थ्य करती है।
म्यूरेक्स औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- यदि तेज भूख लग रही हो तथा इसके साथ ही डर अधिक लग रहा हो और अधीरता हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरेक्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को आमाशय के अन्दर खालीपन की अनुभूति हो तथा इसके साथ ही भूख भी तेज हो और खाना खाने को मजबूर हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरेक्स औषधि का उपयोग लाभदायक है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री को गर्भाशय में कंपन महसूस हो रही हो, और उत्तेजना हो रही हो तथा गोणिका के किसी एक दर्दनाक स्थान पर कोई चीज दबाव डाल रही हो ऐसा महसूस होता है, जब रोगी स्त्री बैठती है तो अधिक दर्द होता है। रोगी स्त्री के जरायु (गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली) के दायें भाग से दायें या बायें स्तन तक दर्द हो और उत्तेजना अधिक हो। जननांगों को छूने से अधिक उत्तेजना उत्पन्न हो रही हो तथा इसके साथ ही गर्भाशय में जलन हो। रोगी स्त्री को मासिकधर्म के समय में स्राव अनियमित समय से होता है, अधिक मात्रा में स्राव हो तथा बार-बार स्राव हो और खून का थक्का जैसा स्राव हो रहा हो। गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली का फैल जाना। गर्भाशय का अपने स्थान से हट जाना, छाती में दर्द होना तथा दर्द का असर दोनों स्तनों की ओर होना तथा लेटने पर दर्द अधिक होना। मासिकधर्म कष्ट के साथ में आना तथा गर्भाशय के अन्दरुनी भाग में सूजन आना तथा इसके साथ ही गर्भाश्य आपने स्थान से हट जाना। इस प्रकार के लक्षण के बार-बार होने के कारण रोगी स्त्री अपनी टांगों को एक-दूसरे के ऊपर आड़ा-तिरछा रखती है। प्रदर रोग हो जाता है तथा इसके साथ ही स्राव पीब की तरह का होता है तथा उसका रंग हरा या रक्त जैसा होता है और इसके साथ ही रोगी स्त्री को मानसिक परेशानियां अधिक होती है तथा त्रिकास्थि-पीड़ा के साथ प्रकट होती है, स्तनों में घाव हो जाता है। मासिकधर्म के समय में स्राव होने के साथ अधिक तेज दर्द होता है। इस प्रकार स्त्री रोग के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए म्यूरेक्स औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बार-बार पेशाब आता है तथा पेशाब से बिलाईकन्द की तरह खुश्बू आती है और लगातार पेशाब करने की इच्छा होती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरेक्स औषधि उपयोग करे।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :- रोग ग्रस्त भागों को छूने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
सम्बन्ध (एमेलिओरेशन) :- प्लैटीना, लिलि, सीपि औषधियों के कुछ गुणों की तुलना म्यूरेक्स औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :- म्यूरेक्स औषधि 3 से 30 शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
म्यूरिएटिकम एसिडम (Muriaticum acidum)
म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का प्रभाव खून पर अधिक होता है। ऐसे रोगी जिसे बहुत अधिक कमजोरी हो तथा बैठते ही उसकी आंखें बंद होने लगती हैं तथा रोगी का निचला जबड़ा ढीला पड़ा गया हो, रोगी जब बिस्तर पर सोता है तो वह इधर-उधर सरकता रहता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का उपयोग करना चाहिए। यह टाइफायड ज्वर को ठीक करने के लिए एक विशेष औषधि है।
यदि रोगी स्त्री बहुत अधिक कमजोर हो गई हो तथा बिस्तर पर इधर-उधर सरकने की आदत हो, जब वह पेशाब करती है तो उसे अचानक ही दस्त भी हो जाता है, मलद्वार से रक्त का स्राव होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री के रोगों को दूर करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मूत्राशय बहुत अधिक कमजोर हो गया हो, पेशाब बहुत धीरे-धीरे होता हो तथा पेशाब करने के लिए जोर लगाने पर मलत्याग हो जा रहा हो, जननेन्द्रियों पर मामूली सा स्पर्श (छूना) सहन नहीं हो रहा हो, यहां तक की चादर की रगड़ भी सहन नहीं हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ा हो तथा बदमिजाज हो और क्रोधी हो और जोर-जोर से कराहता हो और अधिक बेचैनी भी हो और अपने कष्टों को किसी को बताता नहीं है तथा कष्ट को चुपचाप भोगता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में चक्कर आ रहा हो, लेटने पर सिर के दायां भाग में चक्कर आ रहा हो, सिर के पीछे के भाग में भारीपन महसूस हो रहा हो और ऐसा महसूस हो रहा हो कि सिर के पीछे के भाग में सीसा भरा है। किसी की भी आवाज अच्छी नहीं लगती है तथा कभी-कभी ऐसा भी महसूस होता है कि सिर कुचल गया है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक से अधिक मात्रा में कफ जैसा ढीला पदार्थ का स्राव (निकलता रहता है) होता है तथा इसके साथ ही छींके भी आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का सेवन करना फायदेमंद होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का जबड़ा नीचे की ओर लटक जाता है तथा शरीर में बहुत अधिक कमजोरी आ जाती है, चेहरे पर फुंसियां और चकत्ते हो जाते हैं, होंठ कच्चे और शुष्क हो जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जीभ का स्वाद फीका सा लगता है तथा जीभ में सूजन आ जाती है और इसके साथ ही मुंह पर लकवा का प्रभाव भी देखने को मिलता है। रोगी के जीभ पर जहरीला घाव हो जाता है। रोगी के जीभ पर कठोर गांठें पड़ जाती हैं। रोगी के मुंह के अन्दर छाले पड़ जाते हैं। रोगी के मसूढ़ें और ग्रन्थियां सूजी हुई रहती है तथा सांस से बदबू आती है तथा दांतों पर मैल जम जाता है। इस प्रकार मुंह से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
अतिसार से सम्बन्धित लक्षण :- अतिसार रोग से पीड़ित होने के साथ ही यदि रोगी को पेशाब आता है और पेशाब करने के साथ ही उसे मलत्याग करने की इच्छा भी हो रही हो और जब-जब रोगी पेशाब को जाता है, तब-तब अपने आप ही मलत्याग हो जाता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले में सूजन आना, गले में घाव होना, हर समय कुछ निगलने का मन करना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को हर समय मांस देखना या उसके बारे में सोचने का मन करता रहता है और रोगी को भूख इतनी तेज होती है जैसेकि राक्षस की भूख हो, लगातार पानी पीने की इच्छा होती है, खाना ठीक से नहीं पचता है जिसके कारण कब्ज की समस्या हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का सेवन करना चाहिए।
मलान्त्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब पेशाब करता है तो उस समय मलत्याग करने की इच्छा होती है, मलद्वार से कभी-कभी खून भी निकलता है, मलद्वार को छूने से दर्द सहन नहीं होता है, मलद्वार में खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की नाड़ी की गति ठीक प्रकार से नहीं चलती है, नाड़ी में कमजोरी उत्पन्न होने के साथ ही उसके संचार की गति गड़बड़ा जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पेशाब करने के साथ ही मलत्याग करने की इच्छा होती है तथा शरीर में कमजोरी आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री का मासिकधर्म नियमित समय से बहुत पहले आरम्भ हो जाता है। मासिकधर्म के समय में मलद्वार में दर्द होना। जननेन्द्रियों में घाव होना। जननेन्द्रियों को जरा सा भी छूने से दर्द महसूस होना यहां तक की कपड़ा भी छू जाने से तकलीफ होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंगों में कमजोरी आ जाती है तथा दर्द होता है और भारीपन महसूस होता है, चाल लड़खड़ाती है, एड़ी की कंडरापेशी में दर्द होता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के त्वचा पर फफोलेदार घाव हो जाते हैं तथा इसके साथ ही तेज खुजली भी होती है, घाव ऐसा होता है कि वह जल्दी ठीक नहीं होता है, शरीर के निचले अंगों में बदबूदार घाव हो जाता है। रोगी को आरक्त-ज्वर हो जाता है तथा इसके साथ ही शरीर के अंगों में नीले रंग के चकत्ते हो जाते हैं। हाथ में औकता रोग हो गया हो। इस प्रकार त्वचा से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का सेवन करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के बाहरी अंग ठण्डे पड़ जाते हैं, गर्मी के कारण अधिक प्यास लगती है। आंत्रिक-ज्वर होना जो जल्दी ठीक नहीं होता है, रोगी को अधिक बेचैनी भी होती है। रोगी स्त्री को रक्तस्राव होने के साथ ही बेचैनी होती है। नाड़ी की गति ठीक प्रकार से नहीं चलती है, पागलपन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। रोगी को टायफाइड ज्वर हो गया हो तथा वह किसी भी औषधि से ठीक नहीं हो रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी रोगी को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
बवासीर से सम्बन्धित लक्षण :- बवासीर से पीड़ित रोगी के बवासीर के मस्सें फूलकर नीले पड़ गये हो और उसे छूने से तेज दर्द महसूस हो रहा हो, यहां तक की कोई कपड़ा भी उससे छू जाये तो तकलीफ अधिक होती हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
माहवारी के समय में, पेशाब करने के समय, रोगी ग्रस्त भाग जरा सा भी किसी चीज से छू जाने पर, आर्द (तर) मौसम में, नहाने से तथा आधी रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
रोगी जब बाईं करवट करके लेटता है, या गर्मी होती है या गतिशील रहता है तो उसके रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
फास्फो-ए, आर्से तथा बैप्टी औषधियों के कुछ गुणों की तुलना म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि से कर सकते हैं।
ब्रायों, मर्क तथा रस-टाक्स औषधियों के बाद म्यूरियेटिक-ऐसिड औषधि अच्छा काम करती है।
म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि अफ़ीम और तम्बाकू का बहुत ज्यादा इस्तेमाल करने से उत्पन्न रोग की अवस्था जिसमें रोगी बहुत अधिक कमजोर हो जाता है, ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने में उपयोगी है।
मात्रा (डोज) :- म्यूरिएटिकम एसिडम औषधि की 1 से 3 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
माइगेल लैसियोडोरा (Mygale lasiodora)
माइगेल लैसियोडोरा औषधि कई प्रकार के कीड़े-मकोड़े के जहर से बनाई जाती है। यह नर्तन रोग (ऐसा रोग जिसमें रोगी पागल होकर नाचने लगता है) को ठीक करने के लिए अधिक उपयोगी औषधि है। नर्तन रोग जब बहुत अधिक खतरनाक रूप धारण कर लेता है तो चेहरे की पेशियों में फड़कन होने के लक्षण दिखाई देने लगते हैं। ऐसी अवस्था में रोगी का उपचार करने के लिए माइगेल लैसियोडोरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
माइगेल लैसियोडोरा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- जब रोगी को नर्तन रोग हो जाता है तो उस समय में रोगी की हालत पागलों जैसी हो जाती है और उसे बेचैनी होती है, मृत्यु का डर लगने लगता है तथा अधिक निराशा भी होती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइगेल लैसियोडोरा औषधि का उपयोग लाभदायक है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर की मांस-पेशियों में खिंचाव तथा ऐंठन होने लगती है, मुंह तथा आंखें कम खुलती और बन्द होती हैं, चेहरा गर्म और तमतमाया हुआ लगता है, जीभ सूखी और झुलसी हुई लगती है तथा कठिनाई के साथ बाहर निकलती है, इसके साथ ही सिर के एक तरफ के हिस्से में झटके के साथ दर्द होता है और रोगी रात के समय में अपने दांत को पीसता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइगेल लैसियोडोरा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का जी मिचलाता है तथा आंखों की देखने की शक्ति भी कम हो जाती है, भूख नहीं लगती है तथा अधिक प्यास लगती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइगेल लैसियोडोरा औषधि का उपयोग लाभकारी है।
पुरुष से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के लिंग में अधिक उत्तेजना होना तथा इसके साथ ही लिंग में दर्द होता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइगेल लैसियोडोरा औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
शरीर का बाहरी अंग :- शरीर के कई अंगों की चाल धीमी हो जाती है, अंगों में कंपन होने लगता है, अंगों में फड़कन होने लगती है, बांहों तथा पैरों की गति सुस्त हो जाती है, कभी-कभी तो रोगी अपने पैर को घसीटकर चलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइगेल लैसियोडोरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
टारेन्टु, क्यूप्र, जिजिया तथा एगारि औषधियों के कुछ गुणों की तुलना माइगेल लैसियोडोरा औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
सुबह के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
नींद के समय में कुछ लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
माइगेल लैसियोडोरा औषधि की 3 से 30 शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मर्क्यूरियस डलसिस (Mercurius dulcis)
कान से पीब आना तथा इसके साथ ही कान में जलन और दर्द होने पर मर्क्यूरियस डलसिस औषधि का उपयोग करने से रोगी को लाभ मिलता है।
अतिसार होने के साथ में मलद्वार पर दर्द होना, पुर:स्थग्रन्थि में सूजन होना, रुक-रुककर बुखार आना, विवर्णता, पेट में वायु बनने के कारण पेट में सूजन आना आदि लक्षणों को ठीक करने के लिए मर्क्यूरिय डलसिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पित्त ज्वर से पीड़ित रोगियों के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस डलसिस औषधि लाभकारी है तथा ऐसे रोगियों में और भी कई प्रकार के लक्षण होते है जैसे- पेट फूलना, मस्तिष्क के झिल्लि्यों में जलन होना।
हृदय तथा गुर्दे में रोग होने के साथ ही जल भरना जिसके कारण इन भागों में सूजन हो जाना तथा ऐसे रोगियों को पीलिया का रोग भी हो जाता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरिय डलसिस औषधि उपयोग लाभदायक है।
यकृत के सूत्रण रोग (सिरोशिश ऑफ लिवर) को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस डलसिस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
मर्क्यूरियस डलसिस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है->
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कान के बीच के भाग में जलन होती है, कान से पीब भी बहता रहता है, इसके कारण रोगी ठीक से आवाजें भी सुन नहीं पाता है, कनपटी में पीछे की ओर खिंचाव महसूस होता है तथा कनपटी मोटा और न हिलने वाला लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस डलसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह से बदबू आती है, मसूढ़ों में दर्द होता है, मुंह के अन्दर घाव हो जाता है जिसके कारण मुंह से दूषित खून भी बहता है, जीभ काली हो जाती है, काली-काली पीब जैसी लार लगातार आती रहती है, जिनमें से अधिक बदबू आती है, गले में कई रोग हो जाते हैं तथा गले में सूजन आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो मर्क्यूरियस डलसिस औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का जी मिचलाता रहता है तथा इसके साथ ही उल्टी भी हो जाती है या छोटे बच्चे को एक के बाद एक उल्टी हो रही हो तो मर्क्यूरियस डलसिस औषधि का उपयोग करने से रोग ठीक हो होने लगता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी जब मलत्याग करता है तो मल बहुत कम होता है तथा उसमें खून भी आता है, पित्त भी आता है, मल का वेग लगातार बना रहता है, लेकिन पेट में सिकुड़न नहीं होती है। मल का रंग हरा, पनीला हो तथा इसके साथ ही पेट में मरोड़ हो रही हो। मलद्वार में दर्द होता तथा इसके साथ ही जलन भी होती, रोगी के मल में पेचिश के लक्षण दिखाई देते हैं तथा मल के साथ खून भी आता और मल में पित्त भी आता है। इस प्रकार मल से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसे मर्क्यूरियस डलसिस औषधि का सेवन करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की त्वचा कुपोषित हो जाती है तथा त्वचा मोटी हो जाती है, त्वचा की ग्रन्थियां सूज जाती हैं, त्वचा पर फुंसियां हो जाती है तथा फुंसियां तांबे के रंग की होती है। इस प्रकार के लक्षणों के लिए मर्क्यूरियस डलसिस औषधि अधिक उपयोगी है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
काली-म्यूरि औषधि के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस डलसिस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मर्क्यूरियस डलसिस औषधि की 3 से 6 शक्ति तक के विचूर्ण का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। जलन को नष्ट करने तथा मलनि:सारक क्रिया के लिए मर्क्यूरियस डलसिस औषधि की पहली दशमिक शक्ति का विचूर्ण दो से तीन ग्रेन की मात्रा में हर घण्टे बाद कई बार देना चाहिए।
मर्क्यूरियस आयोडेटस फ्लैवस (Mercurius iodatus flavus)
गले के रोगों के साथ ग्रन्थियों की अत्यधिक सूजन तथा जीभ पर मैल की परत जम जाती है, शरीर का दायां भाग रोग से अधिक प्रभावित होता है, शरीर पर घाव हो जाता है तथा शरीर की कठोरता लम्बे समय तक बनी रहती है, छाती पर सूजन हो जाती है और छाती कठोर हो जाती है, स्तन में घाव हो जाता है, अत्यधिक गरम पसीना निकलता है और मलद्वार रोग ग्रस्त हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस आयोडेटस फ्लैवस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मर्क्यूरियस आयोडेटस फ्लैवस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
जीभ से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी के जीभ पर मोटी परत जम जाती है, जीभ पीली हो जाती है, जीभ की नोक अर्थात किनारा पीला हो जाता है तथा उन पर दांतों के निशान पड़ जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस आयोडेटस फ्लैवस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण:- गले की ग्रन्थि में सूजन आ जाती है जिसके कारण वह ऊपर की ओर उठ जाता है इससे पानी की तरह तरल पदार्थ बहता है जिससे बदबू आती है, सूजन गले के दाईं भाग पर होती है, गले के ऊपरी भाग पर छोटे-छोटे घाव हो जाते हैं और उस पर जलन के साथ दर्द होता है, इसके अलावा गले पर चकत्ते के निशान भी पड़ जाते हैं, अधिक कठोर कफ के समान पदार्थ बहता रहता है और रोगी को ऐसा महसूस होता है कि गले के अन्दर कोई गोला फंसा हुआ है जिसके कारण वह उसे निगलने की बार-बार कोशिश करता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस आयोडेटस फ्लैवस औषधि का सेवन करना उचित होता है।
पारा के उपयोग से उत्पन रोग (र्थोट अफेक्शन):- पारा का उपयोग करने के कारण डिफ्थीरिया में सूजन तथा दर्द होना और दर्द अधिकतर दाहिनी तरफ होता है। इसके बाद दर्द का असर बाईं तरफ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस आयोडेटस फ्लैवस औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोगी का रोग ठीक हो जाता है। ऐसे रोग में एक प्रकार का और भी लक्षण देखने को मिलता है जो इस प्रकार हैं- गर्म वस्तु पीने से और थूक निगलने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है तथा रोगी के शरीर की दाहिनी तरफ अधिक परेशानी होती है।
सम्बन्ध (रिलेशन):-
प्लम्ब-आयोण्डे स्तन के घावों को ठीक करने में उपयोगी है, इस प्रकर के लक्षण को मर्क्यूरियस आयोडेटस फ्लैवस औषधि भी ठीक कर सकते हैं। अत: इस प्रकार के गुण में इस औषधि की मर्क्यूरियस आयोडेटस फ्लैवस औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन):-
रात के समय में बिस्तर पर, दाहिनी तरफ स्थिर लेटने से तथा हल्का-हल्का हिलने तथा डूलने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
दिन के समय में तथा खुली हवा में रहने से और तेज हाथ-पैर हिलाने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज):-
मर्क्यूरियस आयोडेटस फ्लैवस औषधि की दूसरी शक्ति की विचूर्ण का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मर्क्यूरियस आयोडेटस रुबर (Mercurius iodatus rubber)
डिफ्थीरिया रोग होना तथा शरीर के कई भागों में घाव होना और घावों पर तेज दर्द होना, शरीर के बाईं भाग में अधिक घाव होना तथा दर्द होना इसके साथ ही ग्रन्थियों में सूजन आ जाना, त्वचा के कई भागों पर गिल्टियां भी पड़ जाती है, सख्त फोड़ा तथा फुंसियां होना, गले के कई प्रकार के रोग तथा इन रोगों में से कोई भी लक्षण व्यक्ति को होने तथा इसके साथ ही रोग की प्रारिम्भक अवस्था में ठण्ड लगती हो तथा यह विशेषकर बच्चे को हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस आयोडेटस रुबर औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मर्क्यूरियस आयोडेटस रुबर औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
गले से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी के गले का अन्दरूनी भाग लाल हो जाता है, खाना को निगलना कठिन हो जाता है तथा दर्द होता है, नाक तथा गले के अन्दर कफ जम जाता है, रोगी हर वक्त खंखारता रहता है तथा इसके साथ ही रोगी को ऐसा महसूस होता है कि गले के अन्दर कोई गोला फंसा हुआ है तथा गले और गर्दन की पेशियों में अकड़न होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस आयोडेटस रुबर औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी को जुकाम हो जाता है तथा इसके साथ ही कुछ भी सुनाई नहीं देता है, नाक का दायां भाग गर्म हो जाता है, खंखारने पर कफ के समान पदार्थ निकलता है, नाक की ऊपरी तीन हडि्डयां सूज जाती है, नाक और गले की श्लैष्मिक झिल्लियां दलदली हो जाती है, कान की नली बंद हो जाती है और जब कान को पट करते हैं तो आवाजें कुछ सुनाई देती हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस आयोडेटस रुबर औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मसूढ़ों में सूजन आ जाती है, दान्त में दर्द होता है, ग्रन्थियां सूज जाती हैं, जीभ का ऊपरी भाग झुलस जाता है, जीभ पर छाले पड़ जाते हैं तथा अधिक मात्रा में लार निकलता रहता है, जीभ की जड़ में अकड़न और हिलाने पर दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस आयोडेटस रुबर औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- डिफ्थीरिया रोग हो गया हो और कई ग्रन्थियों में दर्द हो रहा हो, दर्द के कारण रक्त दर्द वाले भाग के आस-पास जमा हो जाता है, गाल के अन्दर का भाग लाल हो जाता है, बाईं गलतुण्डिका रोग से अधिक प्रभावित होती है। रोगी के गलतुण्डिका में सूजन आ जाती है तथा दर्द होता रहता है। गले का काक बढ़ जाता है, जिसके कारण खांसी होती है तथा इसके साथ ही गले में जलन भी होती है और रोगी का गला बैठ जाता है। इस प्रकार गले से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस आयोडेटस रुबर औषधि का उपयोग करना चाहिए।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर की त्वचा पर छोटी-छोटी दरारें पड़ जाती हैं जिसके कारण कई स्थान की त्वचा फट जाती है, कई प्रकार के फोड़ें तथा फुंसियां हो जाती हैं। रोगी बाघी घाव से पीड़ित हो या अण्डकोष के पास की मांसपेशियों में अधिक वृद्धि हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस आयोडेटस रुबर औषधि का प्रयोग करे।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
मर्क, नाइट्र-ऐसिड, कैलि-बाई, बेल, लैक, मेज़ औषधियों के कुछ गणों की तुलना कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मर्क्यूरियस आयोडेटस रुबर औषधि की 3 शक्ति के विचूर्ण का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। मर्क्यूरियस आयोडेटस रुबर औषधि के प्रयोग करने से कई प्रकार के रोग को उत्पन्न करने वाले जीवाणु नष्ट हो जाते हैं।
मर्क्यूरियस प्रोटियोडाइड Mercurius Protoiodatus
जीभ का अगला भाग या नोक लाल या पीली हो गई हो तथा पिछले भाग पर गहरे पीले रंग की परत जम गई हो और जीभ पर दान्त के निशान पड़ गये हो तथा इसके साथ ही गले में सूजन आ गई हो और यह सूजन दाहिनी गले के तरफ हो और बाईं ओर भी सूजन का असर दिख रहा हो या इस अवस्था में घाव हो गया हो तो रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस प्रोटियोडाइड औषधि 1000 वी शक्ति का उपयोग करना चाहिए। रोगी के इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए काली बाई क्रोम, नेट्रम फास तथा चेलिडोनियम औषधि का भी प्रयोग कर सकते हैं लेकिन इन सभी औषधि की तुलना में मर्क्यूरियस प्रोटियोडाइड औषधि अधिक लाभदायक है।
मर्क्यूरियस प्रोटियोडाइड औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
डिप्थीरिया रोग से सम्बन्धित लक्षण:- डिप्थीरिया रोग हो जाने के साथ यदि रोगी के गले के अन्दर सूजन आ गई हो, गले के दायीं ओर नकली झिल्ली बननी शुरू हो रही हो गई हो और साथ ही सांस से बदबू आ रही हो, जीभ पर दान्त के निशान हो, जीभ आगे की ओर बढ़कर लटकी हुई हो तथा जीभ पर पीले रंग की परत जमी हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस प्रोटियोडाइड औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस प्रोटियोडाइड औषधि की उच्च शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
पेट तथा यकृत के रोग से सम्बन्धित लक्षण:- यदि रोगी को पेट या यकृत का कोई रोग हो गया हो तथा इसके साथ ही रोगी के जीभ पर पीली परत जमी हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस प्रोटियोडाइड औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मात्रा :-
मर्क्यूरियस प्रोटियोडाइड औषधि की उच्च शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
मर्क्यूरियस सल्फ्यूरिकस (Mercurius Sulphuricus)
रोगी को पानी जैसा पतला मल आ रहा हो तथा इसके साथ ही मलद्वार में जलन हो रही हो, जीभ की नोक पर दर्द हो रहा हो, टांगों में सूजन आ गई हो, सूर्य की रोशनी में रहने से छींके आ रही हो, सुबह के समय में दस्त हो गया हो और मल पीले रंग का गर्म आ रहा हो जो जोर से छीटें के साथ आता हो और मल अधिक मात्रा में हो रहा हो, सांस लेने में कष्ट हो रहा हो, छाती में जलन हो तथा हृदय में अधिक कमजोरी महसूस हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस सल्फ्यूरिकस औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
मर्क्यूरियस सल्फ्यूरिकस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
दिल या लीवर की बीमारी के कारण प्लूरा होने से सम्बन्धित लक्षण:- दिल या लीवर की बीमारी के कारण प्लूरा की सूजन होने से रोगी को परेशानी होती है जिसके कारण वह ठीक से लेटकर आराम भी नहीं कर पाता है, सांस लेने में परेशानी होती है, बैठे रहना पड़ता है, पैर में सूजन आ जाती है तथा सीने में जलन होती। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस सल्फ्यूरिकस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है लेकिन जब औषधि का असर शुरू होता है तो रोगी को पतले दस्त होने लगते हैं और रोगी अपने आप को स्वस्थ महसूस करता है।
वक्षोदक रोग से सम्बन्धित लक्षण:- यदि कोई व्यक्ति वक्षोदक रोग से पीड़ित है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मर्क्यूरियस सल्फ्यूरिकस औषधि का प्रयोग करते हैं और जब औषधि का प्रभाव शुरू होता है तो रोगी को पतले दस्त होने लगते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :- सुबह के समय में तथा रात को लेटने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :- सीधा उठकर बैठने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- एसेटि-ए, ब्लाटा, लायको, सिनाथ, आर्स, डिजि और सल्फ़ औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मर्क्यूरियस सल्फ्यूरिकस औषधि से कर सकते हैं।
मेथिलिन ब्लू (Methylene blue)
मेथिलिन ब्लू औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
स्नायुशूल (नाड़ियों में दर्द होना) के रोग को ठीक करने के लिए मेथिलिन ब्लू औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नाड़ियों में किसी प्रकार की कमजोरी महसूस होने पर मेथिलिन ब्लू औषधि से उपचार करना चाहिए जिससे रोगी को अधिक आराम मिलता है।
मलेरिया रोग को ठीक करने के लिए मेथिलिन ब्लू औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आंत्रिक ज्वर (टाइफाईड) से पीड़ित रोगी में और भी कई प्रकार के लक्षण हो जैसे- पेट का फूलना, अधिक उदास होना तथा प्रलाप (रोना धोना) तथा इसके साथ बुखार भी हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेथिलिन ब्लू औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मिर्गी के रोग से पीड़ित रोगी में और भी कई प्रकार के लक्षण हो जैसे- शरीर का कंपकपाना तथा अधिक आलस्य होना। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेथिलिन ब्लू औषधि का उपयोग लाभदायक है।
गुर्दे में जलन हो रही हो तथा इसके साथ ही आरक्त ज्वर भी हो गया हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेथिलिन ब्लू औषधि का उपयोग लाभकारी है।
शल्य-वृक्क (सर्जीकल किडनी) अर्थात गुर्दे का ऑपरेशन करने के साथ ही यदि रोगी के मूत्र से अत्यधिक पीब निकल रहा हो तथा जोड़ों में सूजन आ गई हो और मूत्राशय में जलन हो रही हो तो मेथिलिन ब्लू औषधि का उपयोग करने से रोगी को अधिक लाभ मिलता है।
रोगी को पीठ में दर्द होने के साथ ही साइटिका हो गया हो तो मेथिलिन ब्लू औषधि के उपयोग से रोगी का लाभ मिलता है।
शरीर में खून की खराबी के कारण उत्पन्न समस्या को दूर करने के लिए मेथिलिन ब्लू औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप कई प्रकार के रोग जो खून की खराबी के कारण होता है वह ठीक हो सकता है।
प्रतिविष :-
मेथिलिन ब्लू औषधि की उपयोग से उत्पन्न मूत्राशय में उत्तेजना को ठीक करने के लिए थोड़ी मात्रा में जायफल का उपयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
मेथिलिन ब्लू औषधि की 3x शक्ति का प्रयोग करना चाहिए। कान के अन्दर छीलन होने के कारण उत्पन्न जलन और साथ ही कान से बदबूदार पीब बहने पर इस औषधि की 2 प्रतिशत घोल का स्थानिक प्रयोग करना चाहिए। कनीनिका के घावों तथा फोड़ों को ठीक करने के लिए इस औषधि की एक प्रतिशत घोल को जल में मिलाकर स्थानिक प्रयोग करना चाहिए।
मेजीरियम (Mezereum)
चर्म रोग के लक्षणों से पीड़ित रोगी, हडि्डयों से सम्बन्धित रोग से पीड़ित रोगी, स्नायुशूल (नाड़ियों में दर्द) से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का उपयोग करना चाहिए। दांत और चेहरे के आस-पास के रोग ग्रस्त भाग को ठीक करने में मेजीरियम औषधि उपयोगी है।
रोगी की हडि्डयों में कुचलने जैसा दर्द हो रहा हो तथा थकावट महसूस हो रही हो और पूरे शरीर में खिंचाव तथा अकड़न हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के कई अंगों में दर्द होने के साथ ही अधिक ठण्ड लग रही हो तथा ठण्ड के प्रति रोगी अधिक संवेदनशील हो तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
हडि्डयों में दर्द, टीका लगाने से उत्पन्न रोग, मांसपेशियों में जलन और तीर लगने जैसा दर्द हो, मांसपेशियों में खिंचाव हो रहा हो, शरीर में अचानक से झटके लग रहे हों, दर्द का असर गोली की तरह ऊपर से नीचे की ओर दौड़ता है और रोगी बिस्तर छोड़ने के लिए मजबूर हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मेजीरियम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर तथा दांत से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में तेज दर्द होता है तथा दर्द के कारण रोगी को किसी से बात करना कठिन हो जाता है और जब रोगी किसी से बात करता है तो दर्द और भी तेज होने लगता है, सिर के दाईं ओर अधिक दर्द होता है। सिर के बाहरी भाग पर घाव हो गया हो तथा पपड़ी जम गई हो और पपड़ी का रंग सफेद हो, सिर मोटी-मोटी चमड़ी जैसी पपड़ियों से ढका हुआ हो तथा इन पपड़ियों के नीचे पीब जमती है जिसके कारण सिर में तेज दर्द होता है। चेहरे और दांत के आस-पास की नाड़ियों में तेज दर्द होता है और दर्द का असर रात के समय में कान की ओर दौड़ता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब खाना खाता है तो और भी तेज दर्द होता है और जब चूल्हे के पास बैठता है तो उसे कुछ आराम मिलता है। दान्तों के जड़ों में घाव होना तथा पीब बनना और दांत में तेज दर्द होना और रोगी को ऐसा महसूस होना जैसे कि दांत अधिक लम्बे हो गए हैं। इस प्रकार के सिर और दांत से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक छींके आती है, सर्दी होने के साथ ही नाक की अन्दरूनी सतह छिल जाती है और नाक की पश्चनासा ग्रन्थियां बढ़ जाती हैं। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि जैसे हवा तेज चल रही हो, कनपटी पर हवा लग रही हो और हवा कान से अन्दर की ओर बह रही हो और इसके साथ ही कान में उंगली से कुरेदते रहने की इच्छा होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आंख से सम्बन्धित लक्षण :- आंख की रोमक पेशियों की नाड़ियों में दर्द होता है, विशेषकर नेत्रगोलक निकाल दिए जाने के बाद अधिक होता है, दर्द आंखों के चारों ओर फैल जाता है तथा नीचे की ओर दर्द दौड़ती हुई महसूस होती है तथा इसके साथ ही ठण्ड महसूस होती है और हडि्डयां अकड़ जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का उपयोग फायदेमंद है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का चेहरा लाल हो जाता है, मुंह के चारों ओर घाव हो जाता है तथा इसके साथ ही जुकाम भी हो जाता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का सेवन करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जीभ में जलन होती है जो आमाशय तक फैल जाती है, मुंह में पानी भरा रहता है, गले में जी मिचलाता है जो खाना खाने के बाद ठीक हो जाता है इन लक्षणों के होने के साथ ही रोगी को सूअर की चर्बी खाने की इच्छा होती है। पाचनतंत्र में सूजन होना तथा जलन होने के साथ ही दर्द होना, उल्टियां होना और जी मिचलाना। पेट में घाव होना तथा इसके साथ ही जलन होना। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि किसी व्यक्ति को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के बच्चों की ग्रन्थियां सूज जाती है तथा पेट बड़ा सा महसूस होता है, छाती पर दबाव महसूस होता है, पेट में दर्द भी होता है और सांस लेने में परेशानी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
मलद्वार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कब्ज की शिकायत रहती है तथा मलद्वार में चुभन सी महसूस होती है। अतिसार (दस्त) होने के साथ ही मल के साथ छोटे-छोटे सफेद कण भी आते हैं, हरे रंग का पदार्थ भी आने लगता है। कब्ज की समस्या रहने के साथ ही यकृत और गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली निष्क्रिय (अपना कार्य ठीक प्रकार से न करना) हो जाती है। मलद्वार में सिकुड़न होती है तथा सुई गड़ने जैसा दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का सेवन करना उचित होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण:- जब रोगी पेशाब करता है तो पेशाब के सतह पर लाल पपड़ियां तैरती हैं, पेशाब गर्म तथा रक्तयुक्त (पेशाब में खून भी कुछ मात्रा मिला हुआ) होता है, जब पेशाब करते समय पेशाब की अन्तिम बून्द निकलती है तो दर्द तथा जलन होता है, मूत्राशय में ऐंठन होने लगती है, कई बार तो खून की बून्दें भी गिरती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का प्रयोग करना लाभकारी है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण:- स्त्री रोगी को मासिकधर्म के समय में बार-बार अधिक मात्रा में स्राव होने लगता है तथा स्राव में अन्न जैसा पदार्थ भी आता है, स्राव इतना तेज होता है कि उससे त्वचा छील जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- अण्डकोष में वृद्धि हो जाती है तथा इसके साथ ही रोगी को संभोग के प्रति अधिक उत्तेजना होती है। सूजाक रोग होने के साथ ही रक्तमेह हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सांस से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की छाती में दर्द होता है तथा जलन भी होती है, छाती के आर-पार सिकुड़न होती है। खांसी हो जाती है, जब रोगी खाना खाता है तो खांसी अधिक बढ़ जाती है तथा गर्म पेय पदार्थ पीने से कुछ आराम मिलता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गर्दन और पीठ में दर्द होता है, हिलने-डुलने पर व रात को अधिक दर्द होता है तथा दर्द वाले भाग को छूने पर दर्द होता है। अन्तर्जंघिका (टिबिया) और दीर्घांस्थियों में जलन होती है तथा दर्द भी होता है। पैर सो जाते हैं, ऐसा महसूस होता है कि नितम्ब और घुटने में दर्द भी होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- अकौता रोग होने के साथ ही खुजली होती है तथा ठण्ड लगने के साथ ही खुजली तेज होती है, बिस्तर में रहने से खुजली और भी तेज हो जाती है। त्वचा पर घाव होने के साथ ही खुजली होती है और जलन भी होती है, घाव के चारों ओर छाले पड़ जाते हैं और घाव आग जैसी लाल रहती है। दाद होने के साथ ही जलन और दर्द होता है। शरीर की कई हडि्डयां लम्बी महसूस होती है तथा उनमें जलन भी महसूस होती है, सूजन आ जाती है, जल्दी ठीक नहीं होता है, रात के समय में तथा घाव को छूने पर अधिक परेशानी होती है और घावों के आस-पास मोटी पपड़ियां जम जाती है जिनके नीचे से पीब जैसा पदार्थ बहता रहता है। इस प्रकार के चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
खांसी से सम्बन्धित लक्षण :- खांसी हो जाती है तथा जब रोगी खाना खाता है उसके बाद रोगी को तब तक खांसी होती रहती है जब तक कि खाया हुआ खाना उल्टी के साथ बाहर न आ जाए। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मेजीरियम औषधि का सेवन करना चाहिए।
टीका (वेकिनेशन) से सम्बन्धित लक्षण:- टीका लगने के बाद एक्जिमा (Eczema) रोग होना या फुंसियां होने पर मेजीरियम औषधि से उपचार करना चाहिए, लेकिन इस प्रकार के एक्जिमा रोग से पीड़ित रोगी के रोग ग्रस्त भाग से चिपचिपा पदार्थ बहता रहता है और तेज खुजली होती है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन):- ठण्डी हवा से, रात के समय में, शाम से लेकर आधी रात तक और गर्म पदार्थों के सेवन से तथा छूने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :- खुली हवा में रहने से रोग के लक्षण नश्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन):- कास्टि, गुआइकम, रस तथा फाइटो औधियों के कुछ गुणों की तुलना मेजीरियम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज):- मेजीरियम औषधि की 6 से 30 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
माइकोमेरिया (Micromeria)
माइकोमेरिया कैलीफोर्निया का पुदीना जैसा एक पौधा है। इस औषधि का प्रभाव आमाशय तथा आंतों पर होता है। पेट के दर्द को ठीक करने तथा पेट फूलने पर इसे चाय की तरह पीने से रोग ठीक हो जाता है। माइकोमेरिया औषधि आनन्ददायक पेय पदार्थ है जो बुखार को खत्म करता है, खून को साफ करता है तथा शक्ति को बढ़ाने वाली औषधि है।
यदि किसी रोगी के आमाशय तथा आंतों में दर्द है तथा इसके साथ ही पेट फूल रहा हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए माइकोमेरिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
माइकोमेरिया औषधि की मूलार्क का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मिलिफोलियम (Millefolium)
शरीर के अंगों से खून बहने पर खून को बहने से रोकने के लिए मिलिफोलयम औषधि का उपयोग करना चाहिए। हार्निया रोग, चेचक का रोग तथा साथ ही पेट में दर्द हो रहा हो तो मिलिफोलयम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। पथरी रोग को ठीक करने के लिए मिलिफोलयम औषधि का उपयोग करते हैं।
ऊंचाई से गिरने के कारण कई प्रकार से शरीर को हानि होने या किसी प्रकार से बोझ उठाने से कई प्रकार की हानि होने पर रोगी के शरीर की अवस्था गड़बड़ा जाती है जिसको ठीक करने के लिए मिलिफोलयम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर में लगातार रहने वाला उच्चताप तथा मुंह में थूक के साथ खून आना। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मिलिफोलयम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
फेफड़ों तथा स्त्रियों की जननेन्द्रियों से खून निकलने पर मिलिफोलयम औषधि का प्रयोग करने से खून का बहना रुक जाता है।
अधिक कमजोरी होने के कारण छोटे बच्चियों को प्रदर रोग हो गया हो तो रोग को ठीक करने के लिए मिलिफोलयम औषधि का सेवन करना चाहिए।
खून की उल्टी होना, कठिन परिश्रम करने के कारण या किसी अन्य प्रकार से शरीर के किसी भी अंग से खून बहने पर मिलिफोलयम औषधि से उपचार करने से रोग ठीक हो जाता है।
मिलिफोलयम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण:- सिर में धीरे-धीरे चक्कर आता है, ऐसा महसूस होता है कि जैसे कुछ भूल गया हूं। सिर में रक्त की मात्रा अनियमित हो जाती है। स्त्रियों को मासिकधर्म के समय में बेहोशी तथा मिर्गी की समस्या हो जाती है। सिर में चुभता हुआ तेज दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मिलिफोलयम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नकसीर रोग होना (इस रोग के होने पर रोगी की नाक से खून बहने लगता है) तथा इसके साथ ही आंखों से नाक की जड़ तक चुभता हुआ तेज दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मिलिफोलयम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण:- आंतों में से खून निकल रहा हो या बवासीर के रोग के साथ मलद्वार से खून बह रहा हो या पेशाब के साथ खून आ रहा हो तो रोग को ठीक करने के लिए मिलिफोलयम औषधि का सेवन करना उचित होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण:- मासिकधर्म के समय में स्राव नियमित समय से पहले ही होना, अधिक मात्रा में खून आना तथा लम्बे समय तक स्राव होना। गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली से खून बहना तथा जो खून गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली से बहता है उसका रंग चमकता हुआ लाल होता है। गर्भवती स्त्रियों की स्फीत-शिराओं में दर्द होना। इस प्रकार स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी स्त्री को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मिलिफोलयम औषधि का उपयोग करना लाभकारी है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- टी.बी. (यक्ष्मा रोग) रोग से पीड़ित रोगी को खांसी के साथ अधिक खून आ रहा हो तथा बलगम भी निकल रहा हो तथा धड़कन तेज हो रही हो तो रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मिलिफोलयम औषधि का उपयोग करते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन):-
आंतों व फेफड़ों से खून बहने पर फाइकस वेनोसा औषधि से उपचार करते हैं लेकिन इस प्रकर के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मिलिफोलयम औषधि का भी प्रयोग कर सकते हैं। इसलिए फाइकस वेनोसा औषधि के इस गुण की तुलना मिलिफोलयम औषधि से कर सकते हैं।
स्तन से सम्बन्धित रोग या थूक के साथ खून निकलना या टी.बी. के रोग को ठीक करने के लिए एकैलिफा और हेलिक्स टोस्टा औषधि का उपयोग करते हैं, लेकिन इस प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए मिलिफोलयम औषधि का भी उपयोग कर सकते हैं। अत: एकैलिफा और हेलिक्स टोस्टा औषधियों के इस गुण की तुलना मिलिफोलयम औषधि से किया जा सकता है।
इपिका, इरेक्था, हैमामे, जेरेनि तथा सीकेल औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मिलिफोलयम औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन):- शाम के चार बजे, नियमित स्राव रुक जाने, कठोर परिश्रम करने से, शरीर का कोई अंग दब जाने, धीमी गति से चलने तथा रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
मात्रा (डोज):- मिलिफोलयम औषधि की मूलार्क से 3 शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मिचेला रिपेन्स (Mitchella Repens)
मिचेला रिपेन्स औषधि की प्रभावी क्रिया स्त्रियों के जननेन्द्रियों पर और मूत्रयंत्र पर अधिक होती है।
मिचेला रिपेन्स औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता हैं जैसे - मासिकधर्म में अधिक रक्तस्राव होना, बहुत थोड़ा रक्तस्राव होना, मासिकधर्म देर से होना, गर्भाशय की ऊपरी (जरायु) झिल्ली का रोग ग्रस्त होना तथा इसके साथ ही पेशाब करने में कष्ट होना आदि।
मिचेला रिपेन्स औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण:- मूत्राशय के मुंह पर उत्तेजना होना तथा इसके साथ ही पेशाब करने की इच्छा होना, पेशाब करने में कष्ट होना या मूत्राशय से कफ की तरह का पदार्थ का आना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मिचेला रिपेन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों के गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली में सूजन आ जाती है, मासिकधर्म अधिक कष्ट से आना और गर्भाशय से खून बहना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मिचेला रिपेन्स औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
यूवा, जेरेनि, गोसीपि, सेनेशि तथा चिमाफि औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मिचेला रिपेन्स औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :- मिचेला रिपेन्स औषधि की मूलार्क का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मोमोर्डिका बालसैमिना (Momordica balsamina)
मोमोर्डिका बालसैमिना औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता हैं जो इस प्रकार हैं- पेट में मरोड़ होना, पेट का दर्द, पीठ का दर्द, पाचन संस्थान में दर्द, स्त्रियों के मासिकधर्म के समय में अधिक मात्रा में स्राव होना, पेट में हवा भर जाना तथा जलोदर रोग।
मोमोर्डिका बालसैमिना औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी के सिर में चक्कर आने लगता है, सिर के अन्दरूनी भाग में हल्कापन महसूस होता है, आंखों के सामने धुंधलापन महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मोमोर्डिका बालसैमिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी के पेट में मरोड़ होने के साथ ही दर्द होता है तथा पेट में गड़गड़हाट होती है, पीठ में दर्द होता है और इस दर्द का असर पीठ से शुरू होकर पेट के ऊपर तक फैल जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मोमोर्डिका बालसैमिना औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री को मासिकधर्म के समय में अधिक स्राव होने के साथ दर्द भी हो रहा हो, बच्चे को जन्म देने के समय में जिस प्रकार का दर्द होता है उस प्रकार का दर्द हो रहा हो तथा इसके तुरन्त बाद अधिक मात्रा में योनि से खून का स्राव हो रहा हो, दर्द कमर के निचले भाग से शुरू होकर गोणिका के आगे भाग तक फैलता हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री रोगी को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मोमोर्डिका बालसैमिना औषधि का सेवन करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
आंतें पीली पड़ गई हो, पतले पदार्थ से भरा हो तो ऐसे रोग को ठीक करने के लिए मोमोर्डिका तथा कैरैन्टिया औषधियों का प्रयोग करते हैं, लेकिन इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को मोमोर्डिका बालसैमिना औषधि से भी ठीक कर सकते हैं। अत: मोमोर्डिका तथा कैरैन्टिया औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मोमोर्डिका बालसैमिना औषधि से कर सकते हैं।
कोटन, इलैटेरियम औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मोमोर्डिका बालसैमिना औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :- मोमोर्डिका बालसैमिना औषधि की मूलार्क का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करनें के लिए करना चाहिए। जल जाने या हाथों की चमड़ी फट जाने पर मोमोर्डिका बालसैमिना औषधि का उपयोग मालिश और पुल्टिस के रूप में करना चाहिए।
मॉर्फिनम (Morphinum)
अफीम के साथ मॉर्फिनम औषधि का वैसा ही सम्बन्ध है जैसा कि बेलेडोना के साथ ऐट्रोपिन का सम्बन्ध है अर्थात मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग स्नायुविक (नाड़ियों से सम्बन्धित) लक्षणों से सम्बन्धित रोग से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है।
किसी भी तरह का दर्द या दर्द के कारण रोगी को अधिक परेशानी हो रही हो और वह छटपटा रहा हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐलोपैथी चिकित्सक उसे मॉर्फिनम औषधि या हाइपोडर्मिक औषधि का इंजेक्शन का प्रयोग करते हैं, जिससे रोगी 10 से 15 मिनट के बाद सो जाता है। होमियोपैथी चिकित्सा में भी इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग करते हैं।
यदि किसी रोगी को बहुत ज्यादा सोने की आदत हो या अधिक नींद आती हो लेकिन पूरी तरह से नींद नहीं आ रही हो, सोते-सोते अचानक चौंक पड़ता हो, एकाएक बेहोश हो जाता हो, ऐसा महसूस होता हो कि अब मृत्यु हो जायेगी तथा हाथ पैर कांपने होने लगती है और शरीर में अकड़न होने लगती है तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मॉर्फिनम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बहुत अधिक निराशा होती है, चिड़चिड़ा स्वभाव हो जाता है, वह हर समय दूसरे के दोष को खोजता है, वातोन्मादी (हिस्ट्रीकल) की अवस्था हो जाती है, मानसिक परेशानी अधिक होती है तथा स्वप्नदोष की अवस्था हो जाती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी जब थोड़ा सा सिर को हिलाता है तो उसे चक्कर आने लगते हैं, सिर में दर्द होने के साथ ही ऐसा महसूस होता है कि सिर किसी कपड़े की पट्टी से बंधा हुआ है, सिर के पीछे की ओर खिंचाव होता है तथा तेज दर्द होता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण:- आंखों के आस-पास का भाग नीला पड़ जाना तथा पलकें पलट जाना। आंखों में खुजली होना। आंखें बन्द करने पर भ्रम पैदा होना तथा खों की दृष्टि कमजोर हो जाना। आंखों के सफेद भाग में खून जमा हो जाना, एक वस्तु कई भागों में दिखाई देना तथा इसके साथ ही नेत्रपटलों में सुकड़न होना। आंखों की दृष्टि अस्थिर हो जाना। आंखों की पलक लटक जाना। आंखों के भीतरी अंगों में लकवा का प्रभाव होना। इस प्रकार आंखों से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के बायें कान में तेज जलन के साथ दर्द होता है, लेकिन कान की सिंकाई करने से कुछ आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी को कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि उसके सारे शरीर पर होने वाला रक्तसंचार कंपन के साथ हो रहा है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरे के चारों ओर की त्वचा पीली तथा लाल पड़ जाती है, होंठ, जीभ और मुंह के अन्दर घाव हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का सेवन करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बार-बार छींकें आती रहती हैं, नाक के नथुने के आस-पास के भाग में खुजली तथा सुरसुराहट होती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि उपयोग लाभदायक है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का मुंह सूख जाता है तथा इसके साथ ही जीभ भी सूख जाती है और जीभ के बीच का भाग कत्थई बैंगनी रंग का हो जाता है, प्यास अधिक लगती है, भूख नहीं लगती है तथा मांस खाने की इच्छा नहीं होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का गला सूखा हुआ तथा सिकुड़ा हुआ हो जाता है, भोजननली (ग्रसनी) में लकवे रोग जैसा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है, किसी चीज को निगलना मुश्किल हो जाता है, गर्म पेय पदार्थों का सेवन करने से रोग के लक्षण नश्ट होने लगते हैं तथा ठोस पदार्थो का सेवन करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का उपयोग फायदेमंद है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को हरे रंग के तरल पदार्थ की उल्टियां होने लगती है तथा इसके साथ ही लगातार जी मिचलता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का पेट फूला रहता है तथा पेट और मेरुदण्ड भाग में तेज दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मलान्त्र से सम्बन्धित लक्षण :- अतिसार रोग से पीड़ित रोगी का मल पानी, कत्थई या काला रंग का होता है तथा इसके साथ ही पेट में मरोड़ भी उत्पन्न होती है। कब्ज की शिकायत होने के साथ ही मल सूखा, गांठदार हो रहा हो तथा इसके साथ ही मलद्वार पर दरारें पड़ गई हो और मलद्वार पर कुचलने जैसा दर्द होता है। इस प्रकार मल से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मूत्राशय के भाग में लकवा जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है। पेशाब करते समय तेज दर्द महसूस होना। पुर:स्थ-ग्रन्थि बढ़ जाने के कारण पेशाब करने में रुकावट होना। इस प्रकार मूत्र से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- नपुंसकता रोग (रोगी में संभोग करने की शक्ति खत्म हो जाती है)। दांई वार्यनलिकाओं में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय की गति ठीक प्रकार से न होना, हृदय की धड़कन कम गति से धड़कना, यदि रोगी अधिक शान्त रहता है तो भी उसकी हृदय की पेशियां चोट ग्रस्त नहीं होती है, नाड़ियों में कमजोरी उत्पन्न होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बेहोशी की समस्या होती है तथा सांस लेने में परेशानियां होती है, जिसके कारण रोगी छटपटाने लगता है, छाती पर लकवे जैसा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है, हिचकी आती है, दमा रोग की तरह की अवस्था उत्पन्न हो जाती है, सांस लेने की क्रिया अनियमित हो जाती है, छाती पर भारीपन महसूस होता है, छाती के बीच के भाग में दर्द होता है, कभी-कभी खांसी भी उत्पन्न हो जाती है, थक्केदार जमा हुआ बलगम निकलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) में दर्द होता है, कमर में कमजोरी उत्पन्न हो जाती है, त्रिकप्रदेश के आर-पार दर्द होता है, जिसके कारण रोगी तनकर नहीं चल सकता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की चाल लड़खड़ाती रहती है तथा इसके साथ ही शरीर के कई अंगों में दर्द भी होता है तथा सुन्नपन हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण से :- रोगी की त्वचा पर नीली और बैंगनी रंग के धब्बे पड़ जाते हैं और इस रोग ग्रस्त भाग पर दर्द होता है, शरीर के कई अंगों में खुजली होती है, त्वचा में लचीलापन महसूस होता है, स्त्रियों को मासिकधर्म के समय में छपाकी रोग हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
नाड़ियों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई नाड़ियों में कंपन, झटके लगते रहते हैं, रोगी को इस कारण से बेहोशी की भी समस्या हो जाती है, शरीर के कई भागों में दर्द होता है, अंगों में झटके लगते हैं। नाड़ियों में दर्द होने लगता है, अचानक बेहोश पड़ जाना, नाड़ियों में सूजन आना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को जम्भाई अधिक आती है, तेज नींद आती है या फिर ठीक प्रकार से नींद न आना, बेचैनी होना, बार-बार शौच जाना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- ठण्ड लगकर बुखार आना, शरीर के कई अंगों में जलन होना तथा अधिक मात्रा में पसीना आना। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मॉर्फिनम औषधि उपयोगी है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कैमो, ओपि, काफि तथा मॉस्कस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मॉर्फिनम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
मॉर्फिनम औषधि की 3 से 6 शक्ति तक के विचूर्ण का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
मास्कस (Moschus) कस्तूरी (Musk)-मास्क-Mosch
मास्कस औषधि को हिन्दी में मृगानाभि कहते हैं। यह उन लड़कियों के लिए विशेष उपयोगी है जो अधिक जिद्दी, स्वार्थी और मनमानी करने वाली होती है या फिर हिस्टीरिया रोग से पीड़ित होती है। हिस्टीरिया रोग से ग्रस्त लड़कियों के लक्षणों को समझना बहुत कठिन है। हिस्टीरिया रोग से पीड़ित लड़कियों में ऐसे लक्षण होते हैं जिन्हें देखने से आश्चर्य होता है, कभी-कभी तो वह सबको डरा देती हैं, वह इस तरह की हरकतें करती है कि बड़ी ही भयानक मालूम होती हैं। वह अपने अन्दर ऐसे-ऐसे लक्षण बताती है कि चिकित्सक उनमें कौन-सा साधारण और कौन सा असाधारण लक्षण हैं, विचार करने पर हैरान हो जाता है। वे ऐसे लक्षणों को बताती है कि उस पर विश्वास नहीं हो पाता है, ऐसा लगता है कि दुनियां की सारी परेशानियां उसके अन्दर हैं। इस प्रकार के हिस्टीरियाग्रस्त लड़की को यदि कोई छोटा सा भी रोग हो जाता है तो भी वह इस रोग को बड़ा कठिन रोग बताती है। यह सच है कि उसे परेशानी है पर इतना नहीं जितना वह बताती है। यह याद रखना चाहिए कि हिस्टीरिया रोग से पीड़ित लड़की को ठीक करना बहुत कठिन होता है, यदि रोगी लड़की को यह पता चल जाए कि डॉक्टर उसके रोग को ठीक करने में ठीक से ध्यान नहीं दे रहा है तो वह दुबारा उपचार के लिए उस डॉक्टर को नहीं बुलाएगी।
हिस्टीरिया रोग से पीड़ित लड़की की छाती के बीच में एक गोला-सा रखा हुआ महसूस होता है तथा गोला ऊपरी की ओर चढ़ता हुआ महसूस होता है, सर्दी तथा गर्मी जरा सी होते ही महसूस होती है, पुट्ठे कांपते हैं, नींद नहीं आती है, दिल में धड़कन होती है और मूर्छा आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित लड़की के रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पागलपन की अवस्था होने के साथ ही बेहोशी के दौरे पड़ रहें हो, ठण्ड के मौसम में लक्षणों में वृद्धि होती है, हवा बर्दाश्त नहीं हो रही हो, हाथ-पैर में कंपकपी हो रही हो तथा बार-बार बेहोशी की समस्या हो जाती हो, पेट फूल रहा हो, मानसिक तनाव अधिक हो जाता है तथा पेशियों में ठण्ड लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मास्कस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पागलपन की स्थिति हो जाती है तथा दिमाग ठीक से काम नहीं करता है, बिना बात पर हंसी आती है, रोगी गाली-गलौज करना पंसद करता है, धड़कन की गति अनियमित हो जाती है, कभी-कभी वह अचानक चौंक पड़ता है तथा डर जाता है और सैक्स सम्बन्धित रोग (Sexual Hypochondrisis) का भ्रम हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के नाक की जड़ के ऊपर दबाव महसूस होने के साथ ही दर्द होता है, सिर के ऊपरी भाग में दबाव महसूस होता है, जरा-सा भी चलने-फिरने से सिर में चक्कर आने लगता है और ऐसा महसूस होता है कि बहुत ऊंचाई से गिर रहा हूं, कान में तोप छूटने जैसी आवाज होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कॉफी तथा उत्तेजक पदार्थों के सेवन करने की इच्छा होती है, भूख नहीं लगती है, किसी भी चीजों के स्वाद की पहचान नहीं हो पाती है, छाती में दर्द भी होता है, आमाशय फूल जाता है, खाते समय बेहोशी होती है, पेट अत्यधिक फूल जाता है, हिचकी आती है। इन लक्षणों के होने के साथ ही रोगी का दिमाग ठीक से कार्य नहीं करता है, ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- संभोग करने की इच्छा अधिक होती है तथा उत्तेजना भी अधिक होती है, अपने आप वीर्य स्खलन हो जाता है। नपुंसकता रोग होने के साथ ही रोगी को यदि मधुमेह रोग भी हो गया हो या फिर अधिक मात्रा में पेशाब आता हो। जवानी में ही वृद्धों जैसा नज़र आना। संभोग करने के बाद जी मिचलाना तथा उल्टियां आना। इस प्रकार के पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों को मासिकधर्म के समय में स्राव नियमित समय से बहुत पहले तथा अधिक मात्रा में हो और साथ ही बेहोशी होने की समस्या हो तो रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का उपयोग करना चाहिए। संभोग करने की इच्छा होने के साथ ही जननेन्द्रियों में सुरसुरी हो रही हो, जननेन्द्रियों की ओर खिंचाव और दबाव लगता है जैसे मासिकस्राव होने वाला है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मधुमेह रोग से पीड़ित रोगी जब पेशाब करता है तो अधिक मात्रा में पेशाब होता है तथा उसे बेहोशी की समस्या भी हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का उपयोग करना फायदेमंद है।
सांस से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के छाती में दबाव महसूस हो रहा हो तथा सांस लेने में परेशानी होती है। स्वरयन्त्र और श्वास-प्रणाली में अपने आप सिकुड़न हो रही हो तथा सांस लेने में अधिक परेशानी हो रही हो और साथ ही छाती में दबाव महसूस हो रहा हो और दमा रोग के तरह का लक्षण हो। फेफड़ों में लकवा जैसा प्रभाव देखने को मिलता है। दमा रोग होने के साथ ही अधिक डर तथा घुटन हो रही हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का प्रयोग करना चाहिए है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पागलपन की स्थिति हो जाती है तथा उसके हृदय की धड़कन अनियमित रूप से धड़कने लगती है, हृदयपिण्ड के चारों ओर कंपन होता है नाड़िया कमजोर हो जाती है तथा बेहोशी की समस्या उत्पन्न हो जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
त्वचा से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी को ठण्ड लग रही हो तथा एक हाथ गर्म और पीला हो गया हो तथा दूसरा हाथ ठण्डा और सुर्ख हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए मास्कस औषधि का सेवन करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :- खुली हवा में ठण्ड अधिक लगती है तथा ठण्ड लगने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :- खुली हवा में रहने से तथा शरीर पर घर्षण करने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- नक्स-मास्केटा, वैलेरि, सुम्बुल, इग्ने, असाफी तथा कैस्टोरि औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मास्कस औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष :-
कैम्फर, काफिया औषधि का प्रयोग मास्कस औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
मास्कस औषधि की 1 से 3 शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
माइरिका सेरिफेरा (Myrica cerifera)
माइरिका सेरिफेरा औषधि का प्रयोग होम्योपैथी चिकित्सा में दो से तीन बीमारियों को ठीक करने लिए किया जाता है, जैसे- पीलिया और उसके साथ ही सुबह के समय में सिर दर्द होना। सभी प्रकार के श्लेष्मा से सम्बन्धित रोग अर्थात रोगी को सर्दी हो गई हो और नाक से अधिक मात्रा में कफ जैसा पदार्थ निकल रहा हो तथा बीमारी अधिक पुरानी हो।
जिगर से सम्बन्धित रोग होने के कारण पित्त ठीक से पैदा नहीं हो पाता है, जिसके कारण अनेकों रोग शरीर में पैदा हो जाते हैं और यदि पित्त ठीक प्रकार से बनता है तो रोग नहीं होता है।
यदि किसी रोगी के हाथ-पैरों में ऐंठन हो रही हो, पेशाब गंदा आ रहा हो, जीभ पर पीले रंग की मैल जमी हो, जी मिचला रहा हो, आंखें पीली पड़ गई हो तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए माइरिका सेरिफेरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
डिजिटैलिस औषधि के कुछ गुणों की तुलना माइरिका सेरिफेरा औषधि से कर सकते हैं लेकिन यह ध्यान रखना चाहिए कि डिजिटैलिस औषधि का उपयोग उन रोगियों के रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है जो पीलिया रोग से ग्रस्त होते हैं तथा उन्हें यांत्रिक रोग होता है।
मात्रा (डोज) :- माइरिका सेरिफेरा औषधि के मूलार्क से 3 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए किया जाता है।
माइरिका सेमीफेरा Myrica Cemifera
माइरिका सेमीफेरा औषधि की प्रभावी क्रिया पाचन संस्थान की श्लेष्म कलाओं पर होती है, लेकिन कभी-कभी इस औषधि के उपयोग से पीलिया रोग भी हो जाता है। यह पित्त के स्राव को भी रोकता है।
माइरिका सेमीफेरा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है, निराशा हर वक्त रहती है और वह किसी विषय पर एकाग्रता से सोच नहीं पता है, रोगी अंगड़ाइयां लेता रहता है तथा चक्कर भी आता है, उबकाई भी आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी के सिर के ऊपरी भाग पर तथा गर्दन पर तेज दर्द होता है तथा रात के समय में दर्द और भी बढ़ जाता है जिसके कारण रोगी को नींद नहीं आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का उपयोग लाभदायक है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के आंखों पर हल्का भारीपन महसूस होता है, आंखें भारी लगती हैं और उनमें पीलापन आ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब पढ़ने का कार्य करता है तो उसके आंखों में जलन होती है और थकान भर जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का चेहरा पीला पड़ जाता है तथा उसे पीलिया रोग हो जाता है, खुली हवा में जाने पर चेहरे और मस्तिष्क में भारीपन महसूस होता है और तेज दर्द होता है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
जीभ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पीलिया का रोग हो जाता है तथा इसके साथ ही रोगी में और भी कई प्रकार के लक्षण होते हैं जो इस प्रकार हैं- जीभ पर पीले रंग का मैल जम जाता है, जीभ सूखी खुरण्डों से भरी होती है और इतनी भारी लगती है कि जीभ को चलाना कठिन हो जाता है, जीभ का स्वाद गंदा, सड़ा सा और बुरा लगता है जिसके कारण कुछ भी खाया नहीं जाता है, स्वाद कड़वा सा लगता है, मुंह के नालियों में चिपचिपा, लसलसा कफ भरा रहता है, जीभ के तलुवे खुरदरी हो जाती है जो पानी पीने पर भी मुश्किल से हटती है, मुंह सूखा रहता है और प्यास लगती है, लेकिन प्यास नहीं लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का प्रयोग करे।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले के अन्दर चिपकने वाला तार के समान खिंचने वाला कफ भरा रहता है जो खंखारने से भी मुश्किल से निकलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का सेवन करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले तथा नाक में चिपचिपा कफ भरा रहता है तथा उसे निकलने में कठिनाई होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का उपयोग फायदेमंद होता है।
स्वरयंत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के स्वरयंत्र में सूखापन महसूस होता है तथा स्वरयंत्र में कफ भरा रहता है, जो गरारा करने पर भी बड़ी मुश्किलों से निलता है, कफ अधिक जमने के कारण सांस लेना तथा भोजन करना भी कठिन हो जाता है और सांस लेने में परेशानी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को भूख तेज लगती है, लेकिन पेट भरा सा रहता है, रोगी भोजन जल्दी-जल्दी करता है, कभी-कभी तो भूख भी नहीं लगती है, उबकाई आती है, पेट में दबाव महसूस होता है तथा साथ ही पेट खाली-खाली सा लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए। पेट में मरोड़ और दर्द होता है तथा साथ ही पीलिया रोग हो जाता है, पेट में गड़गड़ाहट होती है तथा इसके साथ ही मल त्यागने की इच्छा होती है, कभी-कभी रोगी बेहोश भी हो जाता है और रोगी को ऐसा लगता है कि जैसे दस्त हो जायेगा, मलद्वार से बदबूदार हवा निकलती है, रोगी का मल पतला पीले रंग का होता है और आंतों में मरोड़ भी होती है तथा दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
यकृत से सम्बन्धित लक्षण :- यकृत में हल्की-हल्की चुभन हो रही हो तथा पतले दस्त हो रहे हो और शरीर में अधिक कमजोरी आ गई हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पीलिया रोग से पीड़ित रोगी का पेशाब का रंग हल्का पीला या वियर या शराब सा लगता है या फिर हल्का भूरा, बैंगनी रंग का होता है, पेशाब करने की मात्रा भी घट जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय का स्पंदन बढ़ जाता है, लेकिन नाड़ी की गति साठ प्रति मिनट होती है और नाड़ी कमजोर अनियमित होती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गर्दन से सम्बन्धित लक्षण :- गर्दन में दर्द होता है तथा इसके साथ ही सिर में हल्का-हल्का दर्द होता है, शरीर में कमजोरी आ जाती है तथा स्नायु में उत्तेजना और बेचैनी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का सेवन करना फायदेमंद होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मांसपेशियों में दर्द होता है, शरीर की शक्ति कम हो जाती है, थकान अधिक होता है तथा अधिक निराशा होती है, चक्कर आता है, बेचैनी भी होती है तथा कभी-कभी गहरी नींद आती है लेकिन जागने पर रोग की अवस्था और भी बिगड़ जाती है, घर से बाहर निकलने पर कंपकंपी रहती है, कमर के आस-पास के भाग में दर्द होता रहता है, उत्तेजना अधिक होती है, कभी-कभी बुखार भी हो जाता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
रीढ़ की हड्डी से सम्बन्धित लक्षण :- रीढ़ की हड्डी में गर्मी महसूस होती है तथा इस लक्षण के साथ ही सर्दी लगती है, पसीना आता रहता है तथा चेहरा गर्म और भरभराया हुआ महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पीलिया से सम्बन्धित लक्षण :- पीलिया रोग से पीड़ित रोगी को कफ की समस्या अधिक हो तथा सांस में रुकावट हो रही हो तथा पित्त की नलियों में रोग उत्पन्न होने माइरिका सेमीफेरा औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की त्वचा पीली पड़ जाती है तथा खुजली भी होती है तथा ऐसा महसूस होता है कि जैसे मक्खियों ने काट लिया हो। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिका सेमीफेरा औषधि का उपयोग करना लाभदायक है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
रात के समय में तथा बिस्तर की गर्मी से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
नाश्ता करने के बाद तथा खुली हवा में रहने से रोग के लक्षणों में कमी होती है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
डेजी, पोडो, चेली औषधियों के कुछ गुणों की तुलना माइरिका सेमीफेरा औषधि से कर सकते हैं।a
माइरिस्टिका सेबीफेरा (Myristica sebifera)
माइरिस्टिका सेबीफेरा औषधि का प्रयोग उन फोड़े-फुंसियों को ठीक करने के लिए किया जाता है जिनमें मवाद भरी होती है। यह विशिष्ट एण्टीसेप्टिक दवाई माना जा सकता है।
माइरिस्टिका सेबीफेरा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- जब शरीर के कई अंगों में फोड़ें तथा फुंसियां होकर मवाद जमने लगता है और उस स्थान पर सूजन आ जाती है तो मवाद को सुखाने के लिए माइरिस्टिका सेबीफेरा औषधि का उपयोग करना चाहिए। इसके साथ ही हाथी पांव रोग को ठीक करने के लिए माइरिस्टिका सेबीफेरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर तथा जीभ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में चक्कर आता रहता है तथा सिर में भारीपन के साथ दर्द होता है, जीभ फटी-फटी सी लगती है तथा जीभ पर सफेद मैल जम जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए माइरिस्टिका सेबीफेरा औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।