पीओनिया (Paeonia)
पीओनिया (Paeonia)
मलांत्र तथा मलद्वार से सम्बन्धित रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पीओनिया औषधि का उपयोग अधिक होता है। शरीर के निचले भागों टांगों और पैरों, पैर की उंगलियों आदि तथा स्तनों व मलांत्र में किसी प्रकार के घाव होना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए पीओनिया औषधि का उपयोग किया जाता है।
विभिन्न लक्षणों में पीओनिया औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर व चेहरे में खून का बहाव तेज हो जाता है। सिर की नाड़ियों में दर्द होता है तथा चक्कर आता है। आंखों में जलन और कान में आवाज महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पीओनिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मलांत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मलद्वार पर दर्द होने के साथ ही खुजली होती है, मलद्वार सूजा रहता है। मलत्याग करने के बाद मलद्वार में जलन होती है और उसके बाद अन्दरूनी भाग में ठण्ड महसूस होती है। भगन्दर रोग होने के साथ ही अतिसार हो जाता है और इसके साथ ही मलद्वार में जलन होती है और मलद्वार के अन्दरूनी भाग में ठण्ड महसूस होती है। मलद्वार पर घाव हो जाता है तथा दर्द भी होता है, मलद्वार से बदबूदार खून बहता रहता है, मलद्वार के आस-पास के भाग पर बैंगनी रंग की पपड़ियां जम जाती हैं। मलत्याग करते समय तथा मलत्याग करने के बाद तेज दर्द होता है। अचानक दस्त हो जाता है, मल में लेई के समान का पदार्थ आता रहता है तथा इसके साथ ही पेट में दर्द होता है और बेहोशी जैसी अनुभूति होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पीओनिया औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- बायें छाती में खोदने जैसा दर्द होता है। छाती में गर्मी महसूस होती है। सामने से पीछे तक हृदय के पास से होता हुआ हल्का-हल्का दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पीओनिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- कलाई और हाथ की उंगलियों, घुटनों व पैरों की उंगलियों में दर्द होता है, टांगों में कमजोरी महसूस होती है जिसके कारण चलने में परेशानी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पीओनिया औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कई प्रकार के रोग होने के साथ ही डरावने सपने आते हैं तथा दु:ख में होने के सपने भी आते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पीओनिया औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- त्वचा के कई भागों में दर्द होता है, पुच्छास्थि के नीचे, त्रिकास्थि के चारों ओर घाव हो जाता है, स्फीत शिराओं में भी घाव हो जाता है। बिस्तर पर सोने से पीठ के आस-पास की त्वचा पर घाव हो जाता है तथा इन भागों पर दबाव भी महसूस होता है और दर्द होता है। शरीर के कई त्वचा पर खुजली मचती है, जलन होती है और त्वचा पर छपाकी रोग भी हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पीओनिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
ग्लेकोमा, हैमामे, एस्कुला, रटानि तथा सिलीका औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पीओनिया औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष:-
एलोज तथा रटानिया औषधि का उपयोग पीओनिया औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
पीओनिया औषधि की 3 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पैलेडियम (Palladium)
यह स्त्री रोगों को ठीक करने की प्रमुख औषधि है। डिम्बाशय के सभी प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए पैलेडियम औषधि का उपयोग लाभदायक होता है। यह जीर्ण डिम्बाशय रोग के लक्षणों को भी ठीक कर सकता है। यह उन अवस्थाओं में भी उपयोगी है जहां ग्रन्थिसार ऊतक पूर्णतया नष्ट न हुआ हो। पैलेडियम औषधि मन तथा त्वचा से सम्बन्धित रोग के लक्षण को ठीक करती है। शरीर में अधिक कमजोरी को भी यह दूर करती है।
पैलेडियम औषधि का प्रयोग उन रोगियों के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है जिसमें कई प्रकार के लक्षण होते हैं जो इस प्रकार हैं- रोगी का मिजाज गर्म होता है, वह कड़वी बातें करता हैं, अत्यधिक घमण्डी स्वभाव का हो जाता है, अपनी प्रशंसा सुनकर रोगी अधिक खुश होता है, यदि रोगी से कोई उसके बारे में बुरी बात करता है तो वह एकदम गुस्सें में आ जाता है, जरा सी बात पर रोने लगता है।
विभिन्न लक्षणों में पैलेडियम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण:- पैलेडियम औषधि का प्रयोग उन रोगियों के रोगों को ठीक करने के लिए उपयोग किया जाता है जिनमें इस प्रकार के लक्षण होते हैं- रोने का मन करना, रोगी को चापलूसी करने का मन करता है, घमण्डी स्वभाव हो जाता है, बुरा बरताव करने का मन करता है, तीखी भाषा बोलने का मन करता है। इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही रोगी को अधिक थकावट भी महसूस होती है और शरीर के कई अंगों में दर्द भी होता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि सिर आगे तथा पीछे की ओर झूल रहा है तथा इसके साथ ही कनपटी और सिर के पीछे के भाग में दर्द होता है रहता है, सिर के नाड़ियों में भी दर्द होता है। सिर में दर्द होने के साथ ही ऐसा महसूस होता है कि दर्द एक कान से दूसरे कान तक जा रहा है, शाम के समय में तथा मनोरंजन करने के बाद दर्द अधिक होता है तथा इसके साथ ही चिड़चिड़ापन महसूस होता है और खट्टी-खट्टी डकारें आती है। इस प्रकार के सिर से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तथा इसके साथ ही चेहरा धूमिल सा लग रहा हो तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैलेडियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- नाभि से छाती के आस-पास ऐसा दर्द होता है जैसे कि इस भाग में गोली लग गई हो। ऐसा लगता है कि आंतों को दांतों से काट लिया गया हो। आंतें अवरूद्ध प्रतीत होती है। पेट में दर्द होता है तथा इसके साथ ही दाहिने जांघ में सूजन भी आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैलेडियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- गर्भाशय का भाग चिर जाता है और उसमें दर्द भी होता रहता है। छाती के आस-पास दर्द होता है तथा पेट में जलन महसूस होती है तथा इसके साथ ही पेट के दाईं ओर दर्द होता है और पीठ में भी दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षण मासिकधर्म के समय में अधिक होता है तथा स्राव अधिक होता है। छाती में तीर चुभने जैसा दर्द होता है तथा इसके साथ ही इस भाग में जलन होने के साथ ही दर्द होता है और कमर से नीचे के भागों में दबाव महसूस होता है। जब कमर से नीचे के भागों से कुछ रगड़तें हैं तो आराम मिलता है। दाहिने डिम्बाशय में दर्द होने के साथ ही सूजन आ जाती है। गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली में दर्द होता है तथा मलत्याग करने के बाद आराम मिलता है। प्रदर रोग होने के साथ ही सफेद रंग का स्राव अधिक होता है। इस प्रकार के लक्षण के साथ ही दाहिने नितम्ब में सूजन आ जाती है, कंधे पर दर्द होता है, पेट में दर्द होता है तथा दाहिने स्तन व चूचक के पास सुई चुभन जैसी दर्द महसूस होती है। नाभि से स्तन तक दर्द होता है और गोली लगने जैसा दर्द महसूस होता है और दर्द इतना तेज होता है कि वह असहनीय हो जाता है। स्तनपान कराते समय मासिकस्राव शुरू हो जाता है। दाहिने स्तन के चूचक के पास सुई की चुभन जैसा दर्द होता है। यह स्त्री रोगों की उस दशा में निर्दिष्ट करती है जब रोग दायें डिम्बकोष से आरम्भ हआ हो तथा गर्भाशय का ऊपरी भाग छील गया हो या गर्भाशय अपने स्थान से हट गया हो तथा छाती व पेट के आस-पास दर्द के साथ जलन हो। इस प्रकार के स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैलेडियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए उचित होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंगों पर घाव होने के साथ ही खुजली भी होती है। पीठ के पिछले भाग में थकान महसूस होती है। कई अंगों की नाड़ियों में दर्द होता है। अंगों में भारीपन व थकान महसूस होती है। पैर की उंगलियों से नितम्बों तक तेज चुभती हुई दर्द महसूस होती है। दायें कंधे व दायें नितम्ब के जोड़ों पर दर्द होता है। गृध्रसी रोगी हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैलेडियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
आर्जेन्टम, हेलोनि, एपिस तथा हेलोनि के कुछ गुणों की तुलना पैलेडियम औषधि से कर सकते हैं।
पूरक :-
मात्रा (डोज) :-
पैलेडियम औषधि की छटी से तीसवीं शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पैराफीन (Paraffine)
गर्भाशय से सम्बन्धित रोगों को ठीक करने के लिए पैराफीन औषधि का उपयोग लाभदायक है। यह कब्ज की समस्या को भी दूर करता है। पेट में छुरी भोंक दिये जाने जैसा दर्द होता है और दर्द एक अंश से दूसरे अंश तक फैलता हुआ महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैराफीन औषधि का उपयोग किया जाता है। आमाशय में दर्द होता है तथा दर्द का असर गले से रीढ़ की हड्डी तक होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैराफीन औषधि का उपयोग लाभदायक होता है।
विभिन्न लक्षणों में पैराफीन औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर के बायां भाग व चेहरे पर दर्द होता है तथा दर्द का असर डंक लगने जैसा और मरोड़ होता है, रोगी को दर्द ऐसा महसूस होता है कि सिर के ऊपरी भाग के बाई ओर कोई कील ठोकी जा रही हो। बायें कान में ऐंठन महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैराफीन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों की दृष्टि धुंधली पड़ जाती है और काले धब्बे दिखाई पड़ते हैं, पलकें लाल पड़ जाती है, ऐसा लगता है जैसे कि आंखों पर चर्बी छा गई हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैराफीन औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- दांतों में तथा निचले चबड़े पर दर्द होता है, जबड़ा लार से चिटचिटा हो जाता है और जीभ का स्वाद कड़वा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैराफीन औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- हर समय भूख लगा रहता है, आमाशय के आरपार दर्द होता है, दर्द गले और रीढ़ की हड्डी पर होता है जिसका असर छाती तक फैल जाता है तथा इसके साथ ही डकारें भी आती है। बायें अध:पर्शुक प्रदेश में दर्द होता है जो स्थिर रहता है जिस भाग में दर्द होता है उस भाग में ऐंठन भी होती है, आमाशय में दर्द होने के साथ ही धड़कन की गति भी अनियमित हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैराफीन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पेट के निचले भाग में दर्द होता है और दर्द का असर जननेन्द्रियों, मलांत्र तथा पुच्छास्थि तक फैल जाता है। बैठने पर दर्द में वृद्धि होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैराफीन औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मलांत्र से सम्बन्धित लक्षण :- बार-बार मलत्याग करने की इच्छा होती है। बच्चों को कब्ज की शिकायत होना। पुराने कब्ज की समस्या होने के साथ ही मलद्वार से खुन की कुछ मात्रा का स्राव होता है तथा लगातार मलद्वार पर दबाव होता है पर मल का त्याग नहीं होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैराफीन औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकस्राव देर से शुरू होता है तथा स्राव काला होता है, कभी-कभी दूध जैसा प्रदर स्राव भी होता है, चूचक को छूने पर दर्द महसूस होता है और ऐसा महसूस होता है कि चूचक के अन्दर घाव हो। स्त्री के जघन-शैल में छुरी भोंकने जैसा दर्द होता है। अत्यधिक गरम पेशाब होने के साथ ही योनि में जलन होने के साथ ही दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैराफीन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- सीढ़ियां चढ़ते समय रीढ़ की हड्डी में दर्द होता है जिसका असर जांघों वा दानों नितम्बों तक फैल जाता है। शरीर की सभी हडि्डयों में बिजली जैसे झटके लगते हैं। पिण्डलियों में मरोड़ पड़ने जैसा दर्द होता है जिसका असर उंगलियों व हडि्डयों के जोड़ों तक फैल जाता है। पैर में सूजन आ जाती है तथा इसके साथ ही ऐड़ियों व तलुवों में फाड़ता हुआ दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैराफीन औषधि का प्रयोग करना चाहिए उचित होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- यदि शरीर का कोई भाग जल जाए और जले हुए भाग सड़कर टुकड़ें के रूप में गिर रहा हो तथा इसके साथ ही शरीर का खून भी दूषित हो गया हो। ऐसे घाव को ठीक करने के लिए सबसे पहले घाव को धोकर उस पर पैराफीन औषधि छिड़क दें और फिर इसे पतली रुई की परत से ढक दें। जिसके फलस्वरूप इस प्रकार का घाव ठीक हो जाते हैं। ठण्ड के समय में होने वाले घाव को भी पैराफीन औषधि ठीक कर सकता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
क्रियो, यूपियन, पेट्रोलि तथा नैफ्थालि औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पैराफीन औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पैराफीन औषधि निम्न शक्ति के विचूर्ण और तीसवीं शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पेराइरा ब्रोवा (Pareira Brava)
पेराइरा ब्रोवा औषधि का असर मूत्रयंत्र के ऊपर अधिक होता है। गुर्दे में दर्द, पुर:स्थग्रन्थि से सम्बन्धित रोग और मूत्राशय से सम्बन्धित रोग को ठीक करने के लिए इस औषधि का उपयोग किया जाता है।
विभिन्न लक्षणों में पेराइरा ब्रोवा औषधि का उपयोग-
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी का पेशाब गाढ़ा, कफ युक्त और खून मिला हुआ आता है।
पेशाब करने के लिए अधिक जोर लगाना पड़ता है और पेशाब करते समय दर्द का असर जांघों में होकर नीचे की ओर होता है।
घुटनों के बल बैठकर सिर को फर्श पर जोर से दबाने पर ही मूत्रत्याग हो पाता है।
मूत्राशय फूल जाता है और जांघों के अगले भाग की नाड़ियों में दर्द होता है, मूत्रत्याग करने के बाद पेशाब टपकता रहता है।
लिंग की सुपारी में तेज दर्द होता है तथा लिंग पर खुजली होती है, मूत्रमार्ग में जलन होती है तथा इसके साथ ही पुर:स्थग्रन्थि से सम्बन्धित रोग हो जाता है।
मूत्रमार्ग में जलन होती है और इसके साथ ही दर्द भी होता है।
इस प्रकार के मूत्र से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेराइरा ब्रोवा औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
गुर्दे में पथरी होना, दु:ख के सपने देखना, रोगी ऐसे सपने देखता है जैसे कि वह अपने आप को जिन्दा ही जमीन में गाड़ रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए पैरिएटैरिया औषधि का प्रयोग करते हैं। ऐसी ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए पेराइरा ब्रोवा औषधि का उपयोग कर सकते हैं। अत: पैरिएटैरिया औषधि के कुछ गुणों की तुलना पेराइरा ब्रोवा औषधि से कर सकते हैं।
पेशाब करने में रुकावट महसूस हो रही हो तथा इसके साथ ही पु:रस्थग्रन्थि में जलन होता है, बैठते समय नाभि के नीचे के भाग में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए चिमाफिला औषधि का प्रयोग करते हैं। ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए पेराइरा ब्रोवा औषधि का उपयोग करते हैं। अत: चिमाफिला औषधि के कुछ गुणों की तुलना पेराइरा ब्रोवा औषधि से कर सकते हैं।
पेशाब करने में कष्ट होना, लिंग पर घाव होना, पथरी रोग होना। इस प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए फैबियाना-पिची औषधि का उपयोग करते हैं। ऐसे ही रोगों को ठीक करने के लिए पेराइरा ब्रोवा औषधि का भी प्रयोग करते हैं। अत: फैबियाना-पिची औषधि के कुछ गुणों की तुलना पेराइरा ब्रोवा औषधि से कर सकते हैं।
हिडियोमा, ओसीमम, बर्बे, हाइड्रैजि तथा यूवा औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पेराइरा ब्रोवा औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पेराइरा ब्रोवा औषधि की मूलार्क से तीसरी शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पैरिस क्वाड्रिफोलिया (Paris Quadrifolia)
पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि का प्रयोग सिर की नसों के दर्द को ठीक करने के लिए किया जाता है। इस प्रकार के दर्द के साथ ही रोगी को ऐसा महसूस होता है कि मानों आंखें बाहर निकली जा रही है और दर्द ऐसा लगता है जैसे कि मानों आंख का ढेला किसी डोरी से पीछे की ओर दिमाग के साथ खींचा जा रहा है।
विभिन्न लक्षणों में पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि का प्रयोग ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है जो काल्पनिक बदबू महसूस करता है। सिर बहुत बड़ा महसूस होता है। ऐसे रोगी कुछ न कुछ बड़बड़ाता रहता है और बकवास करता रहता है और फुर्तीला होता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि सिर की त्वचा सिकुड़ गई है और हडि्डयां खुरच गई हैं। सिर के ऊपरी भाग में दर्द होता है और इसके कारण रोगी कंघी भी नहीं कर पाता है। सिर में हल्का-हल्का दर्द होने के साथ ही ऐसा महसूस होता है कि आंखें धागे से बंधकर सिर के पीछे के भाग की तरफ खींची जा रही हैं। सिर के पिछले भाग में दर्द होने के साथ ही दबाव महससू होता है तथा सिर बहुत बड़ा महसूस होता है और फैला हुआ महसूस होता है। माथे और कनपटियां कसी हुई महसूस होती हैं, दिमाग, आंखें और खाल तनी हुई महसूस होती है और खोपड़ी की हड्डी में ऐसा दर्द महसूस होता है कि मानों छिल गया है, हाथ-पैर चलाने से, उत्तेजित होने से, आंखों से काम लेने से और शाम के समय में इस प्रकार के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के सिर से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तथा इसके साथ ही रोगी को अपना सिर छूने पर दर्द अधिक महसूस हो रहा हो और सिर के बायें भाग में सुन्नपन महसूस हो तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- शाम के समय में हृदय की धड़कनों की गति बढ़ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- भौंहों के ऊपर घाव होना, आंखें भारी महसूस होना, आंखें सामने की ओर उभरी हो, आंखें ऐसी महसूस हो रही हो कि वे किसी धागे से बंधकर सिर के पीछे के भाग की ओर खींच रही हैं, आंखें फैली हुई हो और ऐसा महसूस हो रहा हो कि वे पलकें को ढक नहीं पातीं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरे की नाड़ियों में दर्द होता है तथा बाईं गण्डास्थि में गरम सुई चभने जैसी अनुभूति होती है, गण्डास्थि पर अधिक दर्द होता है तथा इसके साथ ही आंखों में जलन भी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब जागता है तो उसका जीभ सूखा रहता है और उस पर सफेद लेप जम जाता है, जीभ का स्वाद कड़वा हो जाता है तथा जीभ का स्वाद फीका हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों के साथ ही रोगी को प्यास नहीं लगती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि उपयोग लाभदायक है। मुंह में पानी भरा रहता है और ऐसा महसूस होता है कि गले में कुछ गेन्द की तरह का चीज अटका हुआ है। मुंह में कठोर सूजन आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- हरे रंग का जमा हुआ कफ निकलता है। छाती में चुभन होती है। गला बैठ जाता है और दर्द होता है। नाक की जड़ पर पपड़ियां जम जाती है जिसके कारण सांस लेने में रुकावट होती है। गले में खराश उत्पन्न होने के साथ ही दर्द भी होता है। रोगी को खांसी भी हो जाती है और ऐसा लगता है कि खांसी वायुनली में गंधक की भाप के कारण हो रही है। स्वरयन्त्र या वायुनली में थक्केदार, हरा, श्लेष्मा रहने के कारण रोगी लगातार खखारता रहता है। गले और स्वरयन्त्र में चिपचिपा तथा लसलसा हरे रंग का कफ फंसा रहता है जिसके कारण रोगी हर वक्त खखारता रहता है। सुबह के समय में खांसी होने के साथ ही कफ भी निकलता है। शाम को सूखी खांसी हो जाती है। छाती में दबाव महसूस होता है, सांस लेने में पेरशानी होती है, नाक बन्द हो जाता है और नाक की जड़ में भरा-भरा सा दबाव महसूस होता है और रोगी को बदबू नहीं आती है। इस प्रकार के ‘वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- गर्दन के हडि्डयों के जोड़ों और कंधों पर बोझ रखा हुआ महसूस होता है और इसके साथ ही थकान भी महसूस होती है। शरीर की नाड़ियों में दर्द होता है जो बायें अन्त:पर्शुक प्रदेश से शुरू होकर बाईं बाह तक फैल जाता है। नाड़ियां कठोर हो जाती है, उंगलियां मुड़ जाती हैं, रीढ़ की हड्डी के सबसे नीचे भाग की नाड़ियों में दर्द होता है, बैठते समय शरीर में कंपन महसूस होती है और चुभन सी महसूस होती है। उंगलियां सुन्न हो जाती है और शरीर के ऊपरी अंग भी सुन्न हो जाते हैं। हर चीज खुरदरी महसूस होती है। शरीर के कई अंगों में डंक मारने जैसा दर्द होता है, सारे शरीर में भारीपन महसूस होता है। शरीर में एकतरफा ठण्डा और दूसरी तरफ गर्म महसूस होती है। इस प्रकार के शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- आमाशय में भारीपन महसूस होता है और ऐसा लगता है कि आमाशय पर पत्थर रखा हुआ है। जब डकारें आती है तो कुछ आराम मिलता है। पाचन क्रिया भी कम हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
सोचने से, मानसिक परिश्रम करने से या उत्तेजित होने से, आंखों को अधिक काम में लाने से, हाथ-पैर चलाने से तथा तम्बाकू का सेवन करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
रोग ग्रस्त भाग को दबाने और डकारें आने पर रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
बकवास करना, पागलपन की स्थिति होना, इधर-उधर देखते रहना दूध का न पचना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैस्टिनैका पार्सनिप औषधि का प्रयोग करते हैं तथा इसकी जड़ें पथ्य के रूप में उपयोगकारी होती है, पानी में इसको उबालकर या काढ़ा बनाकर या सलाद के रूप में इसे क्षय रोगियों व गुर्दे के पथरी रोगियों को ठीक करने के लिए उपयोग में लाया जाता है। ऐसे ही रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि भी उपयोग कर सकते हैं। अत: पैस्टिनैका औषधि के कुछ गुणों की तुलना पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि से कर सकते हैं।
अर्ज-ना, ब्राय, बैप्टी, काकु, हायो, लैके, सिलीका, नक्स, रस तथा सिलीका औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिकूल :-
फर-फा।
प्रतिविष :-
काफिया औषधि का उपयोग पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
पैरिस क्वाड्रिफोलिया औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पार्थेनियम-एस्कोबा अमार्गो (Parthenium-Escoba Amargo)
पार्थेनियम-एस्कोबा अमार्गो औषधि का उपयोग बुखार और विशेषकर मलेरिया बुखार को ठीक करने के लिए किया जाता है। मासिकधर्म में परेशानी होने के साथ ही शरीर में अधिक कमजोरी महसूस होना, सांस लेने की गति अनियमित होना। इस प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए पार्थेनियम-एस्कोबा अमार्गो औषधि का प्रयोग कर सकते हैं।
विभिन्न लक्षणों में पार्थेनियम-एस्कोबा अमार्गो औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द इतना तेज होता है कि उसका असर नाक तक फैल जाता है, नाक पर सूजन आ जाती है, माथे पर भी दर्द होता है। आंखों में भारीपन महसूस होता है और अक्षिगोलक में दर्द होता है तथा इसके साथ ही सिर में भी दर्द होता है। सिर में दर्द होने के साथ ही कानों में आवाजें सुनाई देती है। सिर में दर्द होने के साथ ही नाक की जड़ में दर्द होता है और नाक का भाग सूज जाता है। सिर में दर्द होता है, दांतों में हल्का-हल्का दर्द होता है, दांत बहुत खट्टे व बहुत लम्बे महसूस होते हैं। दृष्टि दोष उत्पन्न हो जाता है। कान में दर्द होता है तथा कानों में अजीब-अजीब सी आवाजें सुनाई देना और सिर में दर्द होना। इस प्रकार के सिर से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पार्थेनियम-एस्कोबा अमार्गो औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- बायें पर्शुका-प्रदेश में दर्द होता है। प्लीहा में घाव हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पार्थेनियम-एस्कोबा अमार्गो औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
सियानौथस, हेलिएन्थ तथा चायना औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पार्थेनियम-एस्कोबा अमार्गो औषधि से कर सकते हैं।
पैसीफ्लोरा passiflora
पैसीफ्लोरा औषधि का प्रयोग अधिक मात्रा में करने से बेहोशी उत्पन्न होती है और लकवा रोग जैसे लक्षण भी उत्पन्न हो जाते हैं। बच्चों के नाड़ियों में अधिक उत्तेजना होने और मांसपेशियों में अकड़न होने पर, इस औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
विभिन्न लक्षणों में पैसीफ्लोरा औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- पागलपन की तेज अवस्था होने पर पैसीफ्लोरा औषधि से उपचार करने से रोगी को लाभ मिलता है। धनुषटंकार रोग को भी यह ठीक कर सकता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- सारे शरीर में विकार उत्पन्न करने वाला रोग जिससे शरीर कमान की तरह अकड़ जाता है, पीठ के तरफ अधिक अकड़न महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बेहोशी से सम्बन्धित लक्षण :- प्रसव के समय में बेहोशी की समस्या अधिक होने पर इसके प्रयोग से रोगी स्त्री को अधिक लाभ मिलता है। पूरे शरीर में कंपन होने के साथ ही पागलपन की स्थिति उत्पन्न होने पर रोग को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा औषधि का उपयोग करना चाहिए। बेहोशी की अवस्था को दूर करने के लिए पैसीफ्लोरा औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में तेज दर्द होता है और ऐसा लगता है कि खोपड़ी उड़ जाएगी। ऐसा महसूस होता है कि आंखों को बाहर की ओर खींचा जा रहा है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- स्नायुविक विकार उत्पन्न होना, मानसिक परेशानियां अधिक होना, थकना महसूस होना, शरीर का एकदम ठण्डा पड़ जाना तथा ठीक प्रकार से नींद न आना, बच्चों को ठीक प्रकार से नींद न आना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में कीड़े होने के कारण बुखार आना, पेट में वायु बनना तथा इसके साथ ही डकारें आना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को दस्त होने लगता है तथा इसके साथ ही पेट में दर्द भी होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- दमा रोग होना, कुकुर खांसी होना तथा रात के समय में खांसी तेज होना। इस प्रकार के लक्षणों के साथ ही स्नायुविक पीड़ा होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
अधिक परिश्रम करने से, मानसिक परेशानियों से, अधिक थक जाने से, मानसिक उत्तेजना होने से, स्नायविकता से तथा भोजन करने के बाद रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
चुप रहने से रोग के लक्षण नष्ट होते हैं।
पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा (Passiflora Incarnata)
पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि बेहोशी को दूर करने वाली लाभदायक औषधि है। काली-खांसी को भी यह औषधि ठीक कर देता है। इसकी क्रिया स्नायु केन्द्र पर होती है जिसके फलस्वरूप यह कई प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं, जो इस प्रकार हैं- बेहोश होना, धनुष के आकार की तरह शरीर का अकड़ना, प्रसव के बाद बेहोश होना, पेट में कीड़ें होने के कारण बुखार होना, ठण्ड लगकर बेहोशी होना, बच्चे को दांत निकलते समय में होने वाले रोग और बेहोशी, हैजा, बेचैनी तथा ऐंठन आदि।
अधिक परेशान करने वाले दमा रोग को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए लेकिन इस रोग को ठीक करने के लिए इस औषधि की मूलार्क की दस से पन्द्रह बूंद पन्द्रह मिनट के अन्दर से कई मात्रा में शीघ्र ही रोगी आरोग्य हो जाता है।
पेट फूलना, सिर में तेज दर्द होना, आंखों में दर्द होना तथा खट्टी डकारें आना आदि लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बच्चों और वृद्धों को नींद न आने वाली बीमारी को दूर करने के लिए पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण:- सिर में तेज दर्द होता है और ऐसा महसूस होता है कि सिर का ऊपरी भाग उड़ जाएगा और आंखें बाहर की ओर धकेल दी गई हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- पेट फूलने लगता है और खट्टी डकारें आती हैं, आमाशय शीशा जैसा भारी महसूस होता है और खाना खाने के बाद ऐसा अधिक महसूस होता है। बच्चों के स्नायु में उत्तेजना अधिक होती है और मांसपेशियों में अकड़न होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बेचैनी अधिक होती है और इसके कारण शरीर में थकावट अधिक होती है, ऐसा कमजोर व्यक्ति को अधिक महसूस होता है, बच्चों और वृद्धों में इस प्रकार के लक्षण अधिक दिखाई देते हैं, इसके साथ ही रोगी को अनिद्रा (नींद न आना) भी हो जाता है। रात के समय में खांसी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को बेहोशीपन महसूस होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि उपयोग लाभदायक है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण:- शरीर के कई अंगों में रोग पैदा करने वाले लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं, सारा शरीर कमान की तरह अकड़ जाता है, पेट में वायु बनने लगती है, इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही बेहोशी की समस्या भी होने लगती है, शरीर में थकान भी महसूस होती है, बच्चों को ठीक प्रकार से नींद नहीं आती है, अतिसार भी हो जाता है जिसके साथ ही पेट में दर्द भी होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- दमा रोग हो जाता है जिसके कारण सांस लेने में परेशानी होती है, कुकुर खांसी हो जाती हैं, रात के समय में अधिक खांसी होती है, नाड़ियों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
मानसिक परेशानियां होने के समय में, अधिक परिश्रम करने के समय में, पूरी तरह थक जाने से, मानसिक उत्तेजना अधिक होने से, भोजन के बाद तथा नाड़ियों में दोष उत्पन्न होने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
चुप रहने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
बेल, कैमो, ड्रासेरा, फेरम-फा, हायपेरिकम, इग्न, काली-का, लैके, मर्क, नक्स-वो, ओपि, पल्स, सल्फ, वेरेटम, जिंक तथा एको औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पैसीफ्लोरा इन्कार्नैटा औषधि की मूलार्क की बड़ी मात्राओं का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इसकी 30 से 60 बूंदों का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए कई बार करना चाहिए।
पौलीनिया सोर्बिलिस (Paullinia Sorbilis)
पौलीनिया सोर्बिलिस औषधि में कैफीन की बहुत अधिक मात्रा पाई जाती है, जो उल्टी और सिरदर्द को ठीक करने में बहुत ही उपयोगी होती है।
विभिन्न लक्षणों में पौलीनिया सोर्बिलिस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द होने के साथ ही दिमाग में अधिक उत्तेजना होती है। अत्यधिक चाय व कॉफी पीने के कारण उल्टी तथा सिर दर्द होना। शराब का सेवन करने के बाद सिर में कंपन के होने के साथ ही दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए पौलीनिया सोर्बिलिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आंतों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मल में अधिक मात्रा में खून आता है तथा खून अधिक चमकीला, हरा और थक्का जमा हुआ होता है तथा उसमें से बदबू नहीं आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पौलीनिया सोर्बिलिस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- कनपटियों व बाहों पर पीले तथा बादामी रंग के धब्बें पड़ जाते हैं। छपाकी रोग। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पौलीनिया सोर्बिलिस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- ठीक प्रकार से नींद न आना और इसके साथ ही सिर में भारीपन महसूस होना और खाना खाने के बाद चेहरा तमतमाया हुआ लगना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पौलीनिया सोर्बिलिस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मात्रा (डोज) :-
पौलीनिया सोर्बिलिस औषधि की स्थूल मात्राएं रोगों को ठीक करने के लिए प्रयोग में लाना चाहिए। इसकी चूर्ण की पन्द्रह से लेकर साठ ग्रेन तक की मात्रा का उपयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पेन्थोरम (Penthorum)
पेन्थोरम औषधि एक प्रकार की ऐसी सर्दी तथा जुकाम की औषधि है जिसमें नाक के अन्दर कच्चापन और ठण्ड महसूस होती है।
गले में कच्चापन महसूस होता है, श्लैष्मिक झिल्लियों की दीर्घस्थायी विश्रृंखलाओं के साथ उत्तेजना होना, गले में सूजन होने का पुराना रोग तथा इसके साथ ही श्लैष्मिक झिल्लियां बैंगनी और ठण्डी पड़ जाती हैं, नाक और कान भरे हुए लगते हैं, गला बैठ जाता है और गले में खराश भी होती है तथा इसके साथ ही गले का स्वरयन्त्र ठण्डा हो जाता है, श्लैष्मिक झिल्लियों से अधिक स्राव होता है, मलद्वार पर खुजली होती है और मलांत्र में जलन होती है, भोजन नली और कम्बुकर्णी नली में घाव हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेन्थोरम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में पेन्थोरम औषधि का उपयोग-
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक के अन्दर लगातार गीलापन महसूस होता है जो किसी भी परिमाण में नाक को छिड़कने पर भी कम नहीं होती है। नाक से गाढ़ा पीब जैसा खून मिला हुआ कफ का स्राव होता है। यौवनारम्भकाल में पश्चनासाररन्ध्रों से स्राव होता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेन्थोरम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
पल्सा, हाइड्रै तथा सैंग्वी औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पेन्थोरम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पेन्थोरम औषधि अधिक सक्रिय नहीं है और जीर्ण रोगों में अधिक उपकारी होती है, कुछ दिनों तक इसका व्यवहार करते जाना चाहिए। पेन्थोरम औषधि की निम्न शक्तियों का प्रयोग भी रोगों को ठीक करने के लिए कर सकते हैं।
पर्टूसिन (Pertussin)
पर्टूसिन औषधि अण्डे की सफेद जर्दी तथा रेशेदार श्लेष्मा से तैयार की जाती हैं। इस औषधि में काली खांसी का संक्रामक जहर (विष) मिला होता है। यह औषधि काली खांसी और अन्य उद्वेष्टकारी खांसी को ठीक करने में लाभकरी है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
क्यूप्रम, ड्रास, मेफाई, मैग्रीका तथा कोरेलि औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पर्टूसिन औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पर्टूसिन औषधि 30 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पेट्रोलियम (Petroleum)
इस औषधि की महत्वपूर्ण क्रिया त्वचा पर होती है जिसके कारण अकौता, त्वचा का फटना और फुंसियां उत्पन्न होती हैं। ग्रन्थियों का क्षेत्र और पाचन प्रणाली पर भी इसकी क्रिया का प्रभाव होता है।
कई प्रकार के चर्म रोगों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग होता है, विशेष करके एक्जिमा और छोटी-छोटी फुन्सियों के झुण्ड में (ऐक्जीमा एण्ड हरपेज) जो कि शरीर के किसी भी स्थान में क्यों न हो यह सभी प्रकार के ऐसे चर्म रोगों को ठीक कर देता है।
फुंसियां ज्यादातर कान के अन्दर और कान के चारों ओर या गद्दी और हाथों पर होती है तो इन फुंसियों को ठीक करने के लिए इस औषधि का उपयोग अधिक किया जाता है।
यदि किसी रोगी को नींद के समय में तथा बेहोशी के समय में ऐसा लगता है कि मेरी एक टांग दो टांग हो गई हैं, मेरे बिछौने पर कोई एक दूसरा आदमी लेटा हुआ है, ऐसा लगता है कि मेरे पास दो बच्चे लेटे हुए हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री को ऐसा लगता है कि वह दो बच्चों की परवरिश कैसे करेगी, इस प्रकार के लक्षण उसे परेशान करते रहते हैं। इस प्रकार के लक्षण अधिकतर प्रसूत ज्वर (पेरपेरल फीवर), टाइफाइड ज्वर (टाइफाइड फीवर) तथा दस्त की बीमारी और अनेकों प्रकार के रोगों में होता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि उपयोग लाभदायक है।
अधिक दवा के सेवन करने के कारण उत्पन्न रोग या क्विनाइन के प्रयोग से उत्पन्न बुखार को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
सल्फार-ग्रैफाइटिस, लाइकोपोडियम तथा कास्टिकम औषधियों की तरह पेट्रोलियम औषधि भी एक ऐन्टिसेरिस औषधि है। शीशे के जहर को खत्म करने के लिए पेट्रोलियम औषधि एक लाभदायक औषधि है।
ठण्ड के मौसम में चर्म रोगी के लक्षणों में वृद्धि, गर्मी के मौसम में अच्छा रहता है, चर्म रोग के लुप्त हो जाने के बाद दस्त की समस्या होने पर पेट्रोलियम औषधि का उपयोग करने से लाभ मिलता है।
विभिन्न लक्षणों में पेट्रोलियम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- कई प्रकार के चर्म रोगों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों में मानसिक कारणों से वृद्धि होती है, रोगी गलियों में अपना रास्ता भूल जाता है, कभी-कभी रोगी सोचता है कि वह दो है या उसके बगल में कोई दूसरा लेटा हुआ है, उसे लगता है कि उसकी मृत्यु होने वाली है जिसके कारण वह कोई भी कार्य जल्दी-जल्दी करने लगता है और अपने कार्य को जल्दी से जल्दी निपटाना चाहता है, रोगी चिड़चिड़ा स्वभाव का हो जाता है और वह सहज ही चिढ़ जाता है और हर विषय के बारे में असन्तुष्ट रहता है, उत्साहहीनता के साथ ही उसकी दृष्टि कमजोर हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सिर में दर्द होता रहता है और ऐसा महसूस होता है कि ठण्डी हवा बह रही हो। सिर में सुन्नपन महसूस होता है और ऐसा लगता है कि सिर कठोर बन जाता है, सिर के पीछे भारीपन महसूस होता है, रोगी को ऐसा लगता है कि नशा हो गया है। अक्सर सिर के पीछे के भाग में दर्द होता है, दर्द जल्दी ठीक नहीं होता है, यह दर्द सिर के ऊपर से माथा और आंखों तक फैल जाती है, दर्द की तेजी के कारण थोड़ी देर तक कुछ दिखाई नहीं देता, शरीर कड़ा पड़ जाता है और बेहोशी आ जाती है, सिर शीशे की तरह भारी महसूस होती है। सिर पर घाव हो जाता है सिर के पीछे कानों पर अधिक। सिर को छूने पर अधिक दर्द महसूस होता है उसके बाद सिर सुन्न पड़ जाता है। सिर में दर्द होता है, सिर दर्द से कुछ आराम पाने के लिए रोगी अपनी कनपटियों को दबाता है, खांसतें समय झटका लगने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के सिर से सम्बन्धित लक्षणों में पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों की दृष्टि धुंधली पड़ जाती है, दूरदृष्टि दोष उत्पन्न हो जाता है, बारीक अक्षरों को बिना ऐनक नहीं पढ़ सकता, आंखों से आंसू बहने लगता है, पलकों के किनारों पर जलन होती है तथा आंखों के कोनों में दरारें पड़ जाती हैं। आंखों के चारों ओर की त्वचा सूखी और पपड़ीदार हो जाती है। बरौनिया का झड़ना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कानों में कई प्रकार की आवाजें सुनाई पड़ती है और ऐसा लगता है कि शोर मच रहा है, विशेषकर जहां लोग बातें कर रहे हो उस जगह पर। कान के अन्दर और पीछे अकौता, परतदार घाव तथा इसके साथ ही तेज खुजली होना। घाव को छूने पर दर्द होता है। कान के आस-पास की त्वचा पर दरारें पड़ जाती हैं, ठण्ड के मौसम में कान में कई प्रकार की आवाजें सुनाई पड़ती हैं। कानों के अन्दर आवाजें सुनाई पड़ती है। कान से पीब जैसा स्राव होने लगता है तथा कम सुनाई पड़ती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक के नथुने पर घाव हो जाता है तथा नथुना फट जाता है, नाक के अन्दर जलन होती है और खुजली भी होती है। नाक से खून बहना, नाक से पानी गिरने के साथ ही पपड़ियां और कफ के समान स्राव होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरा सूख जाता है और सिकुड़ा हुआ रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय में जलन होने के साथ ही गर्माहट महसूस होती है और खट्टी-खट्टी डकारें आती है और पेट फूलने लगता है। पेट के अन्दर खालीपन महसूस होता है, वसायुक्तपदार्थ और मांस खाने का मन नहीं करता है तथा बन्द गोभी खाने से परेशानी होती है। मलत्याग करते ही तुरन्त भूख लग जाती है। जी मिचलाने के साथ ही मुंह में पानी भर जाता है। पाचनतन्त्र में दर्द होता है और जब आमाशय खाली होता है तो लगतार खाते रहने पर आराम मिलता है। भूख तेज लगती है। रात के समय में उठकर कुछ न कुछ खाना पड़ता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तथा इसके साथ ही रोगी को लहसुन की बदबू भी आती है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को दिन के समय में दस्त हो जाता है और मल पानी की तरह और तेज गति से निकलता है तथा इसके साथ ही मलद्वार पर खुजली भी होती है। बन्दगोभी खाने के बाद दस्त की अवस्था और भी गम्भीर हो जाती है तथा इसके साथ ही आमाशय में खालीपन महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। पेट खाली रहने पर दर्द होता है, लगातार कुछ न कुछ खाने से आराम मिलता है। गर्भावस्था के समय में पेट में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की नाभि के नीचे और जननेन्द्रिय के ऊपर के भाग में दाद जैसा घाव हो जाता है। पुर:स्थग्रन्थि में जलन होती है और वह सूजी हुई रहती है। मूत्रमार्ग में खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकस्राव आने से पहले सिर में कंपन होती है तथा जननेन्द्रियों पर खुजली होती है। प्रदर स्राव अधिक मात्रा में होता है और स्राव में अन्न जैसा पदार्थ भी आता रहता है। जननेन्द्रियों पर घाव हो जाता है तथा इन भागों पर गीलापन महसूस होता है। चूचक पर खुजली होती है और उस पर आटे जैसा लेप लगा हुआ महसूस होता है। प्रतिदिन दिन के समय में प्रदर स्राव आता है और रात को संभोग करने के सपने आते हैं और योनि में खुजली होती है और पसीना आता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- गले में खराश महसूस होती है। रात के समय में सूखी खांसी और घुटन महसूस होती है। खांसी इतनी तेज होती है कि उसके कारण सिर में दर्द भी होने लगता है। छाती में घुटन महसूस होती है तथा ठण्डी हवा अधिक महसूस होती है। रात के समय में सूखी खांसी होती है और खांसी छाती की गहराई से उठती है। स्वरयन्त्र में खराश उत्पन्न होता है और इसके साथ ही डिफ्थीरिया भी हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय पर ठण्डक महसूस होती है और इसके साथ ही बेहोशी होने लगती है और हृदय की धड़कन भी अनियमित हो जाती है तथा हृदय में अधिक उत्तेजना होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- गर्दन के पिछले जोड़ पर दर्द होता है तथा पीठ अकड़ जाती है और उसमें दर्द होता है। कमर के आस-पास कमजोरी महसूस होने के साथ ही दर्द होता है। रीढ़ की हड्डी के निचले भाग में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के किसी भी अंग में पुरानी मोच का रोग। कांख से अधिक मात्रा में बदबूदार पसीना आना। घुटनों में अकड़न होना तथा घुटने पर जलने जैसा दर्द होना। उंगलियों की नोक खुरदरी, फटी हुई तथा ठण्डी महसूस होती है तथा उस पर दरारें पड़ जाती है। शरीर के किसी भी हडि्डयों के जोड़ों पर कड़कड़ाहट होना। इस प्रकार के शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो तो उसे पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रात के समय में शरीर के कई अंगों में खुजली होना। शरीर के कई अंगों में ठण्ड के कारण उत्पन्न घाव और उसमें जलन होना। ठण्ड के मौसम में उंगलियों का चटकना और उन पर बिवाई रोग होना तथा उसमें दर्द होना। चोट लगने के कारण उत्पन्न जख्म जो बाद में पककर पीब से भर जाता है। बिस्तर पर सोने के कारण उत्पन्न पीठ पर घाव। शरीर की त्वचा सूखी होना और सिकुड़ी हुई रहना, त्वचा खुरदरी और फटी हुई होना तथा कई प्रकार के घाव होना। शरीर की त्वचा पर हल्की सी खरोंच लगने से वह स्थान पककर घाव हो गया हो। त्वचा पर पपड़ीदार घाव होना और हाथ पर फुंसियां होना। त्वचा पर मोटी, हरी रंग की पपड़ियां होना तथा इनमें जलन होना और खुजली होना, त्वचा लाल फटी हुई लगना और घाव में से खून का स्राव होना। अकौता रोग होना। हाथ-पैरों पर लाल, नमकीन स्राव भरा तथा जलन युक्त घाव हो जाता है। त्वचा पर दरार युक्त घाव होना और ठण्ड के समय में इस प्रकार के लक्षणों में वृद्धि होना। त्वचा पर छाजन अर्थात एक्जिमा रोग होने से पहले छोटी-छोटी फुंसियां होती है फिर फूटकर एक हो जाती हैं और उनके ऊपर मोटी सी पपड़ी जम जाती है और उस में से मवाद आता रहता है। पुराने सुज़ाक रोग से पीड़ित रोगी की मूत्रनली में इस कदर खुजली होती है कि रोगी रात भर सो नहीं सकता है। मूत्रद्वार और मलद्वार के बीच के स्थान अर्थात सीवन में (चमतपदमनउ) और पोते में झुण्ड के झुण्ड फुंसिया हो जाती है जिसमें अधिक तेज खुजली होती है और जलन होती है, इन फुंसियों के फुटने से अधिक पानी जैसा दूषित तरल पदार्थ निकलता है। दानें हाथ और पैरों में, जांघ में खोपड़ी पर दोनों कोनों के पीछे, मलद्वार तथा अण्डकोष में एक्जिमा हो जाता है। रोगी के हाथ एक्जिमा के विकार से फट जाते हैं और उनसे खून बहता है। ठण्ड के समय इन रोगों में वृद्धि हो जाती है। रोगी की इस प्रकार के चर्म रोग अक्सर ऐसे स्थान में निकलती हैं जहां की खाल खुश्क, खुरखुरी और चिटकी रहती हैं विशेष करके अंगुलियों के आगे के भाग पर। इस प्रकार के चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- दस्त रोग से पीड़ित रोगी के पेट में दर्द होता है। बन्दगोभी, खट्टी कमरख खाने से, गर्भावस्था या तूफानी मौसम में दस्त हो जाता है। पुराना अतिसार (दस्त) तथा केवल दिन के समय में दस्त आना और रात के समय में आराम मिलता है। मल पीला, पतला और तेज गति से निकलता है। आंतों में दर्द होने के साथ ही दस्त आता है तथा गुदा और गुदानली में डंक लगने जैसी पीड़ा होती है। उघड़ी हुई बवासीर तथा गुदा में घाव की पर्ते बनती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब करने की अधिक इच्छा होती है और इसके साथ ही मूत्रनली में खुजली भी होती है। पुराना सूजाक रोग होने के साथ ही मूत्रमार्ग पर खुजली होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का सेवन करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- ठण्ड से शरीर में कंपकंपी होकर बुखार आना तथा इसके बाद पसीना आना, सिर और चेहरे पर गर्मी महसूस होना और रात के समय में इस प्रकार के लक्षणों में वृद्धि होना तथा पैरों व कांखों से पसीना आता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
शीत से सम्बन्धित लक्षण :- शाम के 6 बजे ठण्ड महसूस होती है और नाखून नीले पड़ जाते हैं, खुली हवा में ठण्ड अधिक महसूस होती है और सारे शरीर में खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
उत्ताप (गर्म) से सम्बन्धित लक्षण :- सिर गर्म, चेहरा सुर्ख, बुखार की झलक सारे शरीर में महसूस होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि उपयोग लाभदायक है।
पसीना से सम्बन्धित लक्षण :- भिन्न-भिन्न समय पर शरीर के कई भागों से पसीना आता है ओर पसीना अधिकतर ठण्ड के बाद आता है और गर्मी महसूस नहीं होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोलियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
आंधी तूफान आने के समय में या उससे पहले, बन्दगोभी तथा कमरख खाने से, गर्भावस्था के समय में रोग ग्रस्त भाग को छूने से, नमी से, यात्रा करने से, निष्क्रिय गति करने से, ठण्ड के समय में, भोजन करने से और मानसिक दशाओं से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन. ह्रास) :-
सिर को ऊंचा उठाकर लेटने से, गरम हवा से तथा शुष्क प्रदेश में घूमने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कार्बो, सल्फ, फास्फो तथा ग्रैफा औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पेट्रोलियम औषधि से कर सकते हैं।
पूरक :-
प्रतिविष :-
नक्स, काक्कूलस औषधि का उपयोग पेट्रोलियम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
पेट्रोलियम औषधि की तीसरी से तीसवीं और उच्चतर शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। स्थूल मात्रायें कभी-कभी रोग के लक्षणों को ठीक करने में अधिक लाभदायक होती है।
पेट्रोसेलीनम (Petroselinum)
पेट्रोसेलिनम औषधि का प्रभाव विशेष रूप से मूत्र-यन्त्र पर होता है। यह मूत्रयन्त्र से सम्बन्धित कई प्रकार के लक्षणों को दूर करने में उपयोगी है। बवासीर के रोग होने के साथ ही मलद्वार पर अधिक खुजली होना। इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए पेट्रोसेलिनम औषधि का उपयोग किया जाता है।
विभिन्न लक्षणों में पेट्रोसेलिनम औषधि का उपयोग-
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब करने के बाद मूत्र-द्वार में पहले चुभन होती है इसके बाद काटने जैसा दर्द होता है। छोटे बच्चे को एकाएक पेशाब हो जाता है और इसके बाद पेशाब करने पर दर्द होता है जिसके कारण से बच्चा उछलता और कूदता रहता है। मूत्रनली के ऊपरी की सीवन (पेरिनियम) से लेकर सारे मूत्रद्वार में जलन और झनझनाहट होती है और मूत्रद्वार के गड्ढे में अक्सर गुदगुदी महसूस होती है। सूजाक रोग होना जिसमें रोगी को एकाएक पेशाब निकल जाता है और रोगी पेशाब को रोक नहीं पाता है, मूत्रद्वार के गहरे हिस्से में खुजली होती है, खुजलाहट को दूर करने के लिए रोगी अपने लिंग को किसी सख्त चीज से रगड़ता है। लिंग की जड़ में या मूत्राशय के मुंह पर दर्द होता है। मूत्रमार्ग की गहराई में दर्द और खुजली होने के साथ ही दूध जैसा स्राव होता है तथा संभोग की उत्तेजना भी होती है। इस प्रकार के मूत्र से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोसेलिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को प्यास और भूख अधिक लगती है और खाना-पीना शुरू करते ही खाने और पीने की इच्छा खत्म हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पेट्रोसेलिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
एकाएक ही पेशाब हो जाने के लक्षण को ठीक करने के लिए सैटा, कैन्था, मर्क तथा कैन औषधियों का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए पेट्रोसेलिनम औषधि का भी प्रयोग करते है। अत: इन औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पेट्रोसेलिनम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पेट्रोसेलिनम औषधि की पहली से तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
फेसियोलस (Phaseolus)
फेसियोलस औषधि हृदय की बीमारियों को ठीक करने के लिए अधिक लाभकारी औषधि है, इसके अलावा यह मूत्राशय तथा वक्षस्थल से सम्बन्धित बीमारियों को भी ठीक करता है।
विभिन्न लक्षणों में फेसियोलस औषधि हृदय का उपयोग-
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का हृदय बहुत जोर-जोर से धड़कता है तथा हृदय रोगी की अन्तिम अवस्था में नाड़ी का न मिलना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेसियोलस औषधि का उपयोग किया जाता है।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- वक्षावरक झिल्ली और पेरिकार्डियम में पानी इक्ट्ठा हो जाना, नाड़ी का तेज चलना, श्वास लम्बी होना, हृत्पिण्ड के चारों ओर दर्द होना, सांस लेने की क्रिया धीमी पड़ना और आहें भरना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेसियोलस औषधि हृदय का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों की पुतलियां फैल जाती है, आंखों में दर्द होता है और प्रकाश में प्रतिक्रिया अधिक होती है तथा चुक्षुगोल्फ का स्पर्श करने से दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेसियोलस औषधि हृदय का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- कनपटी के सामने, माथे पर या अक्षिगह्वरों में दर्द होता है, हिलने से या किसी मानसिक चिन्ता से दर्द बढ़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेसियोलस औषधि हृदय का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मधुमेह रोग की तरह ही मूत्र बार-बार तथा अधिक मात्रा में होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेसियोलस औषधि हृदय का प्रयोग करना उचित होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
क्रैटिगस तथा लैकेसिस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना फेसियोलस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
फेसियोलस औषधि की मूलार्क से 12 शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए किया जाता है। रोगों को ठीक करने के लिए इसकी उच्चतर शक्तियों का भी प्रयोग कर सकते हैं। मधुमेह रोग को ठीक करने के लिए इसके छिलके का काढ़ा बनाकर पिलाना चाहिए लेकिन ध्यान रहें कि कहीं तेज सिर दर्द न हो। पेशाब का अधिक मात्रा में आने पर इसका पेय पदार्थ के रूप में देते हैं लेकिन भयानक सिरदर्द उत्पन्न होने की ओर ध्यान रखें।
प्रूनस स्पाइनोसा (Prunus spinosa)
प्रूनस स्पाइनोसा औषधि की क्रिया सिर तथा मूत्रांगों पर अधिक होती है। नाड़ियों में तेज दर्द होता है, शरीर के सभी अंगों का जलोदर और विशेषकर पैर में सूजन हो जाता है। टखनें और पैरों पर मोच आ जाती है। पलकों की नाड़ियों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्रूनस स्पाइनोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में प्रूनस स्पाइनोसा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- करोटि को नीचे दबाकर टुकड़े कर दिऐ जाने जैसा दर्द होता है, माथे की हड्डी में मस्तिष्क से लेकर सिर के पीछे के भाग तक गोली लगने जैसा तेज दर्द होता है, दाहिने अक्षिगोलक में दर्द होता है और ऐसा महसूस होता है कि वह फट जायेगा। दांत में तेज चुभता हुआ दर्द होता है तथा मानों दांत उखाड़ें जा रहे हो, मुंह में कोई गरम चीज लेने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्रूनस स्पाइनोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- पलकों की नाड़ियों में सूजन आ जाती है, दाहिने अक्षिगोलक में फट पड़ने जैसा दर्द होता है जो बिजली की तरह मस्तिष्क में होता हुआ सिर के पीछे के भाग तक तेजी से दौड़ता है। बाई आंखों में अचानक दर्द होता है और ऐसा महसूस होता है जैसे वह फट पडे़ंगीं, आंखों से आंसू निकलता रहता है। पटल में सूजन आ जाती है। ऐसा महसूस होता है जैसे आंखें फट पड़ेगीं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्रूनस स्पाइनोसा औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में जल जमा होने के कारण जलोदर रोग हो जाता है। मूत्राशय में ऐंठन होने के साथ ही दर्द होता है और चलने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्रूनस स्पाइनोसा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मलांत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मलद्वार में दर्द होने के साथ ही कठोर और गांठदार मल होता है। लसीले मल का दस्त होता है तथा इसके बाद मलद्वार में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्रूनस स्पाइनोसा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
दांत से सम्बन्धित लक्षण :- दांतों में तेज चुभता हुआ दर्द होता है, ऐसा लगता है जैसे उन्हें कोई उखाड़ रहा हो, गरम चीज मुंह में लेते ही परेशानियां बढ़ने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्रूनस स्पाइनोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को मूत्रत्याग करने की अधिक इच्छा होती है लेकिन मूत्रत्याग नहीं हो पाता और इसके साथ ही मूत्राशय में ऐंठन होती है। मूत्रत्याग करने से पहले बहुत देर तक जोर लगाना पड़ता है और मूत्रनली में दर्द होता है। पेशाब की हाजत होते ही पेशाब जाना, लेकिन पेशाब के लिए बैठते ही ऐसा महसूस होता है कि पेशाब मूत्रनली में मुंह तक आकर फिर पीछे वापस चला गया है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्रूनस स्पाइनोसा औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मात्रा (डोज) :-
प्रूनस स्पाइनोसा औषधि की 3 से 6 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
सोरिनम (Psorinum)
सोरिनम औषधि खाज या खुजली के रस से बनाई जाती है। यह एक गम्भीर क्रिया करने वाली उत्तम एन्टि-सोरिक औषधि है। सोरिनम औषधि सल्फर औषधि से कुछ मिलती-जुलती है।
जब किसी पुराना रोग किसी सुनिश्चित औषधि से ठीक नहीं होता है या सल्फर के उपयोग करने पर भी रोग ठीक नहीं होता है तो सोरिनम औषधि का उपयोग करने से रोग निश्चित ही ठीक हो जाता है।
किसी कठिन नई बीमारी के बाद, कोई विशेष कारण न होते हुए भी यदि रोगी का शरीर न सुधरता हो तो ऐसी स्थिति में सोरिनम औषधि की एक खुराक रोगी को देने से अधिक लाभ मितला है और रोगी का रोग ठीक हो जाता है।
ऐसा रोगी जो बहुत अधिक मैला होता है, सफाई की तरफ जरा भी ध्यान नहीं देता है, उसके हाथ, पैर और शरीर के त्वचा पर मैल जमा रहता है, देखने से मालूम होता है कि उसकी त्वचा मैली पड़ी हुई है। रोगी को देखने से घृणा होती है, रोगी अपने शरीर को धोने से डरता है। रोगी का चर्म रोग धोने से और बिछौने के गर्मी से बढ़ जाती है। गर्म कपड़े पहनने से खाज में अधिक खुजली होती है, जब रोगी खुजलाता है तो खून निकल आता है लेकिन खुजलाहट नहीं मिटती, नहाने पर भी शरीर से बदबू आती है, सारे शरीर में दर्द होता रहता है, जरा सी मोच आते ही चोट लग जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि उपयोग लाभदायक है।
जब रोगी को ठण्डी हवा या मौसम के परिवर्तन होने पर अधिक परेशानी होती है। सख्त गर्मी के मौसम में भी सिर को गर्म कपड़े से ढंककर रखना पसन्द करता है, बाल कटवाने से परेशानी अधिक होती है। आंधी के आने पर या बिजली की कड़क से रोगी को बड़ी बेचैनी महसूस होती है, खुष्क छिलकेदार फुन्सियां हर जाड़े के मौसम में निकल आती है और गर्मी के मौसम में गायब हो जाती हैं।
खाज या अन्य किसी प्रकार के चर्म रोग के लक्षण गायब हो जाने पर कई प्रकार की परेशानियां होती हैं और इस प्रकार के चर्म रोग को ठीक करने के लिए सल्फर औषधि से लाभ न मिले तो सोरिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जायेगा।
रोगी को ऐसी आंशका होती है कि भविष्य में किसी प्रकार की दुर्घटना या विपत्ति होगी, इस प्रकार के विषय में बहुत अधिक चिन्ता होती है, बहुत ही उदास रहता है, आत्महत्या की चिन्ता करता है, ख्याल करता है कि मेरी मुक्ति नहीं होगी, रोगी दूर नहीं होगा, मृत्यु अवश्य होगी, रोजगार में सफलता नहीं होगी। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
छोटा बच्चा बीमारी की अवस्था में दिन या रात किसी भी समय में सोता नहीं है और सबको परेशान करता है या बच्चा दिन भर खूब मजे में खेलता है लेकिन रात भर बेचैन रहता है और सोता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
विभिन्न लक्षणों में सोरिनम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी अधिक निराश रहता है तथा वह आरोग्य होने की आशा नहीं रखता है। वह विषाद, गहन और स्थायी, धर्मान्ध प्रकृति वाला होता है। उसे आत्महत्या करने का मन करता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द होने के साथ ही आंखों के सामने गोल काली-काली चित्तियां दिखाई पड़ती है, आंखें तिलमिलाती हैं और धुंधलापन दिखाई पड़ता है। सिर में दर्द होने के समय में भूख बहुत लगती है, खाने से आराम मिलता है। किसी प्रकार के चर्म रोग या मासिकधर्म के बन्द होने पर सिर में दर्द शुरू हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
खोपड़ी (Scalp) से सम्बन्धित लक्षण :- खोपड़ी की त्वचा पर झुण्ड के झुण्ड फुंसियां होती हैं, उनमें मवाद होता है, इन फुंसियों के फुटकर एक हो जाने पर सिर के बाल आपस में चिपक जाते हैं, फुंसियों में से बदबूदार चिपचिपा पीब आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कान के चारों ओर फुंसियां हो जाती हैं, उनमें चिपचिपा पानी निकलता है, सड़े हुए मांस की तरह बदबूदार पीब कान से निकलता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि उपयोग लाभदायक है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरे पर कई प्रकार की फुंसियां हो जाती हैं। मासिकधर्म के समय में स्त्रियों के चेहरे पर फुंसियां निकलती हैं। इस प्रकार के लक्षणों के साथ ही रोगी को आधी रात के समय भूख लगती है, रोगी को उठकर कुछ न कुछ खाना पड़ता है, रोगी को सड़े हुए अण्डे की तरह डकारें आती हैं। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि उपयोग करे।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले में जलन होती है, दोनों टान्सिलों में सूजन आ जाती है और दर्द तथा जलन होती है। कुछ भी निगलने में परेशानी होती है और निगलते समय कान में दर्द होता है। टान्सिलों में हर समय परेशानी होती है। हलक से बड़ा ही बदबूदार खखार आता है जिसके कारण रोगी को बहुत बुरा सा लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
दस्त से सम्बन्धित लक्षण :- पुरानी पतले दस्त की बीमारी से पीड़ित रोगी को दिन रात बार-बार मल आता है, मल से बदबू आती है, रात के 1 से 4 बजे के अन्दर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। बच्चों को हैजा रोग होना तथा मल से बहुत अधिक बदबू आना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
कब्ज से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कब्ज की समस्या रहती है और इसके साथ ही उसे मलत्याग करने पर अधिक जोर लगाना पड़ता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
सूजाक से सम्बन्धित लक्षण :- सूजाक रोग जो न तो दबता ही है और न ही आराम आता है तथा कपड़ों में पीब के धब्बे लगते रहते हैं, विशेष करके यदि जननेन्द्रिय से पसीना आता है तो उसमें से अधिक बदबू आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- गर्भाशय से बहुत दिनों तक रक्त का स्राव होता रहता है। गर्भपात हो जाने के बाद और खेढ़ी (Placenta) निकल जाने के बाद कुछ दिनों या कुछ हफ्तों तक लाल सुर्ख खून का स्राव होने से और जब कभी रोगी स्त्री जरा चलने फिरने लगती है तो रक्तस्राव ज्यादा होने लगता है, सारा गर्भाशय ठण्डा और ढीला पड़ जाता है। प्रदर रोग होने पर स्राव से अधिक बदबू आना। मासिकधर्म लम्बे समय तक बना रहता है। गर्भावस्था के समय में उल्टी का किसी भी तरह से बन्द न होना और गर्भ का जोर से हरकत होना। गर्भावस्था के समय में कई प्रकार के रोग होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
दमा से सम्बन्धित लक्षण :- दमा रोग से पीड़ित रोगी यदि लेटता है या दोनों हाथों को दूर फैलाता है तो आराम मिलता है। हाथों को शरीर के पास लाने से और खुली हवा में रहने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। सांस लेने में परेशानी होती है, उठकर बैठने तथा लेटने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। उरोस्थि के नीचे घाव हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करे।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सांस लेने में परेशानी होती है बैठने, लेटने तथा बांहों को दूर-दूर फैलाकर रखने से आराम मिलता है। सूखी, कठोर खांसी होने के साथ ही छाती में दर्द होता है तथा कमजोरी महसूस होती है। उरोस्थि के नीचे घाव हो जाता है। छाती में दर्द होता है पर लेटने से आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
खांसी से सम्बन्धित लक्षण :- हर साल ठण्ड के मौसम में खांसी हो जाती है। वर्षा की खांसी जो कि खाज या एक्जिमा के दब जाने से हुई हो, सुबह के समय जागने पर और शाम के समय लेटने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, खखार को बाहर निकालने के लिए बहुत देर तक खांसना पड़ता है, खंखार सब्जी या पीले रंग का होता है, उसका स्वाद नमकीन होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- कई प्रकार के चर्म रोग होना जैसे- खुजली, खाज, एक्जिमा से अधिक बदबू आना, जिंक मलहम से दबाये जाने के बुरे फल से उत्पन्न चर्म रोग। हाथ की उंगलियों के नाखूनों के चारों ओर फुंसियां हो जाती है। इस प्रकार के चर्म रोगों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- हडि्डयों के जोड़ों में कमजोरी आ जाती है और रोगी को ऐसा महसूस होता है कि वे आपस में जुड़ नहीं पायेंगी। हाथ की उंगलियों के नाखूनों के चारों ओर घाव हो जाता है। पैरों से बदबूदार पसीना आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- कफ मिला हुआ, खून मिला हुआ, अधिक बदबूदार, गाढ़े रंग का द्रव्य मिला हुआ, कठोर मल होता है, मलत्याग करने में परेशानी होती है तथा इसके साथ ही मलांत से खून का स्राव होता है ओर जलन युक्त बवासीर हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर में खुजली होने के कारण रात के समय में नींद नहीं आती है, चोर तथा डाकू आदि के सपने दिखाई पड़ते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- सभी प्रकार के बुखार होना विशेषकर टाइफाइड ज्वर होना। पुराना बुखार होना जोकि बहुत दिनों तक चलता रहता है, किसी तरह से आराम नहीं होता और यदि एक्जिमा या फुंसियां दब जाने के कारण उत्पन्न बुखार, टाइफायड से पीड़ित रोगी कहता है कि मेरा बुखार अब ठीक नहीं होगा। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
शीत से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब ठण्डा पानी पीता है तो उसे खांसी आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
उत्ताप (heat) से सम्बन्धित लक्षण :- गाड़ी की सवारी करने से बुखार आ जाता है, शाम के समय में बुखार आ जाता है तथा इसके साथ ही रोगी का होशो-हवास खोने लगता है और उसे प्यास अधिक लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
पसीने से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब अधिक चलता है तो उसे पसीना अधिक आता है जिसके कारण शरीर में अधिक कमजोरी महसूस होती है, पसीना आने के बाद शरीर की तकलीफें घट जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए सोरिनम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
सोरिनम औषधि के बाद ऐलूम, हिपर, बोरैक्स, सल्फ और टयूब अच्छा काम देते हैं।
गर्भावस्था के समय में जी की मिचलाहट को दूर करने के लिए लैक्टिक ऐसिट के बाद सोरिनम औषधि अच्छा काम करता है।
डिम्भाशय में चोअ लगने से किसी प्रकार की बीमारी को ठीक करने में आर्निका औषधि के बाद सोरिनम औषधि का उपयोग लाभदायक होता है।
स्तन के कैंसर को ठीक करने में सोरिनम औषधि के बाद सल्फर का उपयोग लाभदायक होता है।
पूरक औषधि :-
सल्फर और टयूबरक्यूलिनम।
विरोधी औषधि :-
क्रोटेलस, लैके, एपिस तथा सर्प विष।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
शाम के समय में और आधी रात के पहले खुली हवा में रहने से, आंधी के दिनों में, बिजली की कड़कने से, बैठने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
कमरे के अन्दर रहने से, लेटने से, हरकत करने से, पसीना आने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
सोरिनम औषधि की 200 से उच्चतर शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। बार-बार इस औषधि का उपयोग नहीं करना चाहिए। इस औषधि का अपना कार्य करने में नो दिन लगते हैं। केवल एक मात्रा कई सप्ताहों तक काफी होती है।
पाइरोजीनियम (Pyrogenium)
पाइरोजीनियम औषधि सांड के सड़े हुए चर्बीहीन मांस से बनाई जाती है। यह औषधि बनाने के लिए इस मांस को दो सप्ताहों तक धूप में रखकर शक्तिकृत किया जाता है। इस औषधि को सड़े हुए पीब को शक्तिकृत करके भी बनाया जा सकता है।
चिकित्सा के क्षेत्र में इस औषधि का उपयोग विशेषकर उस रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है, जब प्रसूत के ज्वर में एक के बाद दूसरी कोई सुनिश्चित औषधि का उपयोग करने के बाद भी रोग ठीक नहीं होता है, ऐसी अवस्था में पाइरोजीनियम औषधि की एक खुराक 200 शक्ति देने से रोगी स्त्री को लाभ मिलता है और ज्वर ठीक हो जाता है।
प्रसव अथवा ऑपे्रशन के बाद या किसी प्रकार की सड़ी हुई बदबू सूंघने से सारे शरीर का खून दूषित हो तब पाइरोजीनियम औषधि का उपयोग करने से रोगी को अधिक लाभ मिलता है।
दूषित गन्दगी या नालियों की गन्दगी लगने के कारण उत्पन्न रोगों को ठीक करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का उपयोग किया जाता है।
पाइरोजीनियम औषधि का उपयोग ऐसी बीमारियों को ठीक करने के लिए भी किया जाता है जो दूषित वायु, गैस या रक्त के दूषित होने के कारण उत्पन्न होते हैं।
यदि किसी रोगी को अपना बिस्तर कड़ा महसूस होता है और रोगी जिस अंग पर अपना भार देकर सोता है उस अंग पर कुचलने या जख्म होने की तरह दर्द होता है, हिलने-डुलने पर यह दर्द कुछ कम हो जाता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
इस औषधि का उपयोग शल्य चिकित्सा में भी किया जा सकता है जब शल्यकर्म करने के बाद की अवस्था जिनमें खून दूषित हो जाता है तथा मवाद आना शुरू हो जाता है।
विभिन्न लक्षणों में पाइरोजीनियम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के स्वभाव में उतावलापन तथा मानसिक असन्तुलन होता है। रोगी अधिक बोलता है। रोगी ऐसा सोचता है कि उसके पास बहुत अधिक धन है। बेचैन रहता है और ऐसा लगता है जैसे उसके बहुत सारे हाथ-पैर निकल आये हैं। कोई भी यह नहीं कह सकता है कि वह जाग रहा है या नींद की अवस्था में है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द होने के साथ ही कंपन होता है। नथुनों में पंखें जैसी फड़फड़ाहट होती है। रोगी को बेचैनी होने के साथ ही सिर में फाड़ देने जैसा दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की जीभ लाल और सूखी रहती है, जीभ साफ, फटी हुई तथा चिकनी दिखाई पड़ती है। गला सूखकर ऐसा लगता है कि वह बेलनाकार हो गया है, जी मिचलाने के साथ ही उल्टी आती है, जीभ का स्वाद सड़ा हुआ लगता है, सांस से तेज बदबू आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
जीभ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को जीभ बड़ी मुलायम, साफ और चिकनी महसूस होती है तथा जीभ आग की तरह सुर्ख और चिटकी हुई रहती है, बात करने में परेशानी होती है। जीभ का स्वाद मीठा या मवाद की तरह बदबूदार होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी कॉफी के तलछट जैसा उल्टी करता है, ऐसा लगता है जैसे आमाशय में पानी गर्म हो रहा है और वैसे ही उल्टी आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- मूत्राशय तथा मलांत दोनों में असहनीय ऐंठन होती है और पेट फूला हुआ जलन युक्त होता है तथा इसके साथ ही पेट में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित का उपचार करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- दस्त हो जाता है तथा मल से अधिक बदबू आती है, मल कत्थई-काला होता है, पेट में दर्द होता रहता है। कब्ज की शिकायत रहती है तथा मल मलाशय में जमने लगता है जिसके कारण मलत्याग करने में परेशानी होती है, मल से काला सड़े हुए मुर्दे जैसा या छोटी-छोटी काली-काली गोलियों की तरह होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित का उपचार करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय में कंपन होता है। हृदय का भाग अत्यधिक भरा हुआ महसूस होता है, रोगी हृदय की गति को साफ-साफ सुन सकता है। नाड़ी अस्वाभाविक रूप से तेज, शरीर के ताप के अनुपात में बहुत अधिक हो जाता है, बायें चूचक के चारों और दर्द होता है। सेप्टिक बुखार से पीड़ित रोगी की दिल की धड़कन कम धड़कती है, ऐसा महसूस होता है जैसे दिल बैठा जा रहा हो, नब्ज की गति अनियमित हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- प्रसव होने के बाद पेट में सूजन आ जाती है तथा अधिक बदबू भी आती है, गर्भपात होने के साथ ही विषैला खून भी निकलता है। मासिकस्राव बदबूदार होती है। गर्भाशय से खून बहने लगता है। गुप्त वस्तिगन्हरीय में जलन होने के कारण मासिकस्राव के समय में हर बार बुखार आ जाता है। प्रसव होने के बाद दूषितरक्त का संक्रमण होता है। वस्तिगन्हरी में पथरी हो जाती है तथा इसके साथ ही जलन भी होती है। जलन की अवस्था के साथ ही स्राव होता है तथा शल्योत्तर अवस्थायें फैल जाती है और साथ ही गम्भीर विषैला खून शरीर में फैलने लगता है। गर्भाशय में यदि भ्रूण मर कर बहुत दिनों तक न निकले और सड़ता रहे तो उसे निकाल देने के लिए पाइरोजीनियम औषधि लाभदायक है। प्रसव या गर्भपात के बाद यदि खेड़ी का कुछ भाग गर्भाशय के अन्दर रह कर सड़े और सेप्टिक बुखार हो जाता है तब भी इसका उपयोग कर सकते हैं। प्रसव होने के बाद गर्भाशय से मैला पानी बहना, इसको ल्यूकोरिया कहते हैं उसमें बड़ी ही दुर्गन्ध रहती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- ठण्ड अधिक लगती है तथा इसके साथ ही विषरक्तक बुखार उत्पन्न हो जाता है। गुप्त पूयजनक अवस्था उत्पन्न हो जाती है। पीठ से ठण्ड लगना शुरू होता है और शरीर का तापमान तेजी से बढ़ता है। उच्च ज्वर के साथ अधिक मात्रा में गर्म पसीना आता है लेकिन उससे भी ज्वर नहीं घटता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- गर्दन की रक्तवाहिकाओं में कंपन होता है। हाथों, बांहों और पैरों में सुन्नपन होने लगता है। शरीर के सभी अंगों और हडि्डयों में दर्द होता है। सोने पर बिस्तर अधिक कठोर मालूम पड़ता है, सुबह के समय में अधिक कमजोरी महसूस होती है। शरीर में दर्द होता है और गति करने से दर्द कम होता है। शरीर में दूषित खून फैलने लगता है जिसके कारण तेजी से उत्पन्न होने वाला पीठ में घाव जो बिस्तर पर सोने के कारण होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित का उपचार करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- थोड़ा-सा कट जाने या चोट लग जाने पर त्वचा बुरी तरह से सूज जाती है, त्वचा पर जलन होती है, घाव हो जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी ऐसा लगता है जैसे आधी नींद में है और सारी रात सपने देखता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित का उपचार करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
उल्टी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को उल्टी आती है और उल्टी में पित्त, खून तथा सड़ी हुई चीजें या काफी के बुरादे जैसे पदार्थ निकलते हैं। पीया हुआ पानी पेट में गर्म होने पर उल्टी हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कब्ज से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का मल बड़ा, काला और सड़े हुए मांस की तरह बदबूदार, जैतून के फल की तरह गोल-गोल मेंगनी की तरह होता है, इसके साथ ही कब्ज की समस्या भी हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
ठण्ड से सम्बन्धित लक्षण :- ठण्ड के मौसम में कंधों के बीच से ठण्ड लगती है और ठण्डी रजाई छूते ही जाड़ा मालूम होने लगता है, बिछोना कड़ा महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करे।
उत्ताप से सम्बन्धित लक्षण :- जब ठण्ड लगना शुरू होता है उसी समय से बार-बार पेशाब आता है, गाल सुर्ख हो जाता है, शरीर का टेम्प्रेचर (टेम्परेंचर) 103 से 106 तक होता है, नब्ज कमजोर और उसकी चाल बहुत तेज 140 से 170 होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पसीना से सम्बन्धित लक्षण :- पसीना बहुत ज्यादा आता है, कमजोरी महसूस होने लगती है तथा पसीने से बदबू आती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए पाइरोजीनियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
आंखों को चलाने से, गर्म कमरे के अन्दर, लेटकर उठने या बैठने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
गर्मी से, गर्म पानी से नहाने या पानी से, आक्रान्त स्थान को कसकर बांधने से, हाथ-पांव को तानकर फैलाने से, चलने फिरने से, करवट बदलने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कार्बो-वेज, का्र्बोल-ऐसिड, ओपि, सोरि, रस-टाक्स, सिकेल, वेरेट्र तथा आर्स औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पाइरोजीनियम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पाइरोजीनियम औषधि की 6 से 30 शक्ति तक और उच्चतर शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इस औषधि का बार-बार दोहराना नहीं चाहिए।
फेलाण्ड्रीयम (Phellandrium)
श्वास से सम्बन्धित रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेलाण्ड्रीयम औषधि का उपयोग किया जाता है। टी.बी. रोग होने के साथ ही बदबूदार बलगम आना और सांस लेने में रुकावट महसूस होना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेलाण्ड्रीयम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह टी.बी. (क्षयरोग) को ठीक करता है जिसमें फेफड़ों के बीच के खण्ड अधिकाधिक रोग ग्रस्त होते हैं, रोगी को प्रत्येक वस्तु मीठी लगती है और बलगम के साथ खून की कुछ मात्रा भी आती है और इसके साथ ही दिमाग ठीक प्रकार से कार्य नहीं करता है और दस्त भी हो जाता है।
विभिन्न लक्षणों में फेलाण्ड्रीयम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर के ऊपरी भाग में भारीपन महसूस होता है, कनपटियों में और आंखों के ऊपर दर्द होता है और जलन होती है। सिर के ऊपरी भाग में कुचलने जैसा दर्द होता है। चक्कर आते रहते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेलाण्ड्रीयम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों की पलकों में दर्द होता है और आंखों से किसी भी चीज को देखने से परेशानी होती है और आंखों में जलन होती है और आंखों से पानी बहता रहता है। रोशनी देखना अच्छा नहीं लगता है। सिर में दर्द होता है जिसका असर आंख में जाने वाली नाड़ियों तक होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेलाण्ड्रीयम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के स्तन के दुग्धनलियों में दर्द होता है और स्तनपान कराते समय असहनीय दर्द होता है तथा चूचकों में भी दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेलाण्ड्रीयम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- उरोस्थि के पास दायें स्तन के आर-पार चुभन होने के साथ ही दर्द होता है जिसका असर कंधों के पास पीठ तक होता है, सांस लेने में परेशानी होती है और रुक-रुककर खांसी होती है। खांसी होने के साथ ही अधिक मात्रा में बदबूदार बलगम भी निकलता है और रोगी को बैठने के लिए बाध्य कर देती है तथा गले में खराश भी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेलाण्ड्रीयम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- टी.बी. (क्षयरोग) से पीड़ित रोगी को शरीर हल्का-हल्का गर्म रहता है और अधिक मात्रा में शरीर से पसीना आता है और रुक-रुककर बुखार आने के साथ ही बांहों में दर्द होता है और खट्टी चीजें खाने की इच्छा होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेलाण्ड्रीयम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- चलते समय रोगी को थकान महसूस होती है तथा इसके साथ ही श्वास से सम्बन्धित रोग भी ठीक होते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेलाण्ड्रीयम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
खांसी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को रुक-रुककर खांसी होती है और सांस लेने में परेशानी भी होती है तथा खांसी के साथ ही बदबूदार बलगम भी आता है और रोगी बैठने के लिए मजबूर हो जाता है। रोगी के इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए फेलाण्ड्रीयम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
फाइटो, सिली, एण्टिम-आयो, कोनिय, मायोसौटिस आर्वेन्सिस तथा कैन्थ औषधियों के कुछ गुणों की तुलना फेलाण्ड्रीयम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
फेलाण्ड्रीयम औषधि की मूलार्क से 6 शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। टी.बी. रोग को ठीक करने के लिए इसकी 6 शक्ति से नीचे की शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए।
फास्फोरिकम एसिडम (Phosphoricum Acidum)
फास्फोरिकम एसिडम औषधि स्नायविक तनाव, पेशियों की कमजोरी, शारीरिक कमजोरी, वायु के कारण आंतों में परेशानी होना और हडि्डयों से सम्बन्धित रोगों को ठीक करने के लिए उपयोगी है।
यह औषधि ऐसे रोगियों के रोगों को ठीक करने के लिए उपयोगी है जो पहले बहुत तन्दुरुस्त (स्वास्थ्य) हो लेकिन बाद में स्वप्नदोष, हस्तमैथुन, स्त्री प्रसंग, अनुचित बुरे कार्य करने के कारण अपने वीर्य को नष्ट करते हैं जिसके कारण उनका शरीर ठण्डा पड़ जाता है और कमजोरी अधिक हो जाती हैं। ऐसे रोगियों को मानसिक कमजोरी अधिक हो जाती है, किसी भी कार्य को करने में मन नहीं लगता है, शारीरिक और मानसिक थकावट अधिक होती है, घबराहट होती है, अकेले चुप-चाप रहना पसन्द करते हैं, नामर्दी, धातु क्षीणता, हाथ-पैर कांपना, धड़कना, याददास्त कमजोर होना, थोड़ी मेहनत से थक जाना, जवानी में बूढ़े जैसे दिखना आदि लक्षणों से पीड़ित होते हैं।
फास्फोरिकम एसिडम औषधि उन स्त्री तथा पुरुषों के लिए उपयोगी है जो जल्दी ही बढ़ते हैं और जो अत्यधिक मानसिक व शारीरिक परिश्रम करने के कारण थक जाते हैं।
विभिन्न लक्षणों में फास्फोरिकम एसिडम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर में बहुत अधिक कमजोरी आ जाती है और स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है और रोगी निर्जीव सा लगता है। रोगी का मन किसी भी कार्य में नहीं लगता है और किसी भी शब्द की पहचान करने में परेशानी होती है। किसी भी विषय के बारे में समझने में परेशानी होती है, अधिक शोक होता है और मानसिक आघात होता है जिसके कारण कई प्रकार के रोग हो जाते हैं। अधिक रोना-धोना और बड़बड़ाना, इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही रोगी को ठण्ड भी लगती है और अधिक निराशा होती है। इस प्रकार के मन से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द होने के साथ ही भारीपन महसूस होता है और रोगी भम्र में पड़ा रहता है। रोगी के सिर में दर्द होता है और ऐसा महसूस होता है कि दोनों कनपटियां एक साथ पीसी जा रही हों, सिर को झटकने या शोर मचने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। सिर में ऐसा दर्द होता है जैसे कि सिर को कुचला जा रहा हो। सिर के पिछले भाग में दर्द होने के साथ ही दबाव महसूस होता है। रोगी के बाल समय से पहले ही पकने लगते हैं और झड़ने लगते हैं। संभोग क्रिया करने के बाद आंखों पर अधिक दबाव महसूस होता है और हल्का-हल्का सिर में दर्द होता है। दोपहर के समय में खड़े रहने पर या टहलने पर चक्कर आते हैं। इस प्रकार के सिर से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों के चारों ओर काले दाग पड़ जाते हैं, पलकों में जलन होती है, पुतलियां फैल जाती हैं और ऐसा लगता है कि आंखों में शीशे के टुकड़े चले गए हैं जिसके कारण दर्द हो रहा है, सूर्य के किरणों को देखने का मन नहीं करता है और जब सूर्य के किरणें को देखते हैं तो किरणें इन्द्रधनुष के रंग में दिखाई देते हैं और आंखें बहुत बड़ी महसूस होती है। हस्तमैथुन करने वालों को धुंधलापन दिखाई देता है और आंखों से सम्बन्धित कई प्रकार के रोग हो जाते हैं, दृष्टि-तन्त्रिकाऐं निष्क्रय महसूस होती हैं। रोगी को ऐसा महसूस होता है कि दोनों नेत्रगोलकों को एक साथ और सिर में अन्दर की ओर दबाया जा रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कानों में गर्जने जैसी आवाजें सुनाई देती हैं और सुनने में परेशानी होती है, शोरगुल माहौल में रहना मुश्किल हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नकसीर रोग होना अर्थात नाक से खून बहना तथा इसके साथ ही रोगी अपने नाक को खोदता रहता है और नाक के अन्दर खुजली मचती रहती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के होंठ सूख जाते हैं और फटे रहते हैं, मसूढ़ों से खून निकलता रहता है और मसूढ़ें दांतों से अलग हो जाते हैं, जीभ सूजी हुई रहती है तथा जीभ पर सूखापन होने के साथ ही चिपचिपी परत जीभ पर जम जाती है तथा झागदार कफ भी निकलता रहता है। दांत ठण्डे महसूस होते हैं, रात को अपने आप दांत से जीभ कट जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरा मटमैला और फीका दिखाई पड़ता है और ऐसा तनाव महसूस होता है कि चेहरे पर कुछ लेप पुता हुआ है। चेहरे के एक ओर ठण्ड महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को रसीले पदार्थों का सेवन करने की इच्छा होती है, खट्टी डकारें आती है, जी मिचलाने लगता है, खट्टी चीजें खाने के बाद इस प्रकार लक्षणों में वृद्धि होती है। आमाशय में दबाव महसूस होता है और भोजन करने के बाद ठीक प्रकार से नींद नहीं आती है, ठण्डा दूध पीने का मन करता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के आंतों में फैलाव होता है और खमीकरण। प्लीहा बढ़ जाती है और नाभि प्रदेश में हल्का-हल्का दर्द होता है और पेट में जोरों की गड़गड़ाहट होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- दस्त रोग से पीड़ित रोगी का मल सफेद पानी की तरह होता है तथा इसके साथ ही पेट में दर्द भी होता है तथा साथ ही मलत्याग करते समय मलद्वार से वायु भी निकलती है। रोगी को कमजोरी अधिक हो जाती है। अधिक कमजोर बच्चों को इस प्रकार का दस्त हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बार-बार पेशाब आता है तथा इसके साथ ही पेशाब में दूध जैसा सफेद पदार्थ भी आता है। मधुमेह रोग हो जाता है। पेशाब करने के बाद जलन होती है। रात के समय में बार-बार पेशाब आता है। पेशाब में अधिक मात्रा में फॉस्फेट पदार्थ आता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
पुरुष से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को रात के समय में मलत्याग करते समय वीर्यपात हो जाता है। वीर्यपात होते ही रोगी को जलन भी होती है। संभोग करने की शक्ति घट जाती है, अण्डकोष को छूने पर दर्द होता है तथा अण्डकोष सूजा रहता है, आलिंगन करने के समय में लिंग ठण्डा (शिथिल) पड़ जाता है। मलत्याग करने के समय में भी लिंग शिथिल पड़ा रहता है। अण्डकोष में अकौता रोग हो जाता है। लिंग की त्वचा पर सूजन आ जाती है तथा लिंग की सुपारी पर भी सूजन आ जाती है, लिंग पर घाव हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकस्राव नियमित समय से बहुत पहले और अधिक मात्रा में होता है और इसके साथ ही यकृत में दर्द भी होता है। रोगी स्त्री के योनि के आस-पास खुजली होती है और इसके बाद मासिकस्राव होता है और स्राव पीले रंग का होता है। रोगी स्त्री के स्तन में दूध नहीं बनता है और स्तनपान कराने के कारण शरीर का स्वास्थ नष्ट होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को मानसिक तनाव अधिक होता है और गले में खराश उत्पन्न हो जाती है। छाती में सुरसुराहट होने के कारण सूखी खांसी होती है और नमकीन बलगम निकलता है। सांस लेने मे परेशानी होती है। बोलने से छाती में कमजोरी महसूस होती है। उरोस्थि के पीछे दबाव महसूस होता है और जिसके कारण सांस लेने में परेशानी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- तेजी से बढ़ने वाले बच्चों, अनुचित कार्य करने वाले या हस्तमैथुन करने के कारण उत्पन्न रोग और इसके साथ ही हृदय की धड़कन अनियमित रूप से गति करती है। नाड़ी अनियमित रूप से चलती है या रुक-रुककर चलती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- स्कंध फलकों के बीच में बरमें द्वारा छेद किए जाने जैसा दर्द होता है और कमर व हाथ-पैरों में पिटाई किए जाने जैसा दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर में अधिक कमजोरी महसूस होती है और शरीर के हडि्डयों के जोड़ों पर दर्द होता है और अस्थि-आवरकों में फाड़ता हुआ दर्द होता है। ऊपरी बांहों के ऊपर और कलाइयों में ऐंठन होती हैं। शरीर में अधिक कमजोरी महसूस होती है। रात के समय में शरीर के कई अंगों में अधिक दर्द होता है और हडि्डयों में ऐसा दर्द होता है जैसे खुरचा जा रहा हो। चलने पर अपने-आप ठोकर लग जाती है और गलत कदम पड़ते रहते हैं। उंगलियों के बीच व हडि्डयों के मोड़ों पर खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- फुंसियां, मुंहासे तथा खूनी फोड़ा हो जाता है। ऐसा घाव हो जाता है जिनसे अधिक बदबूदार पीब निकलती रहती है। ऐसा घाव हो जाता है जिसमें जलन होती रहती है। शरीर के अनेकों त्वचा पर ऐसा महसूस होता है कि कुछ चल रहा हैं। बुखार होने के साथ ही त्वचा पर फोड़े तथा फुंसियां भी हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का सेवन करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक नींद आती है। रोगी को संभोग करने के सपने आते हैं और वीर्यपात हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ठण्ड लगती है तथा इसके साथ ही बुखार भी हो जाता है, रात के समय में और सुबह के समय में पसीना अधिक आता है तथा इसके साथ ही रोगी का दिमाग भी ठीक प्रकार से काम नहीं करता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
बेहोशी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर में आलस्य हो जाता है तथा मन उदास रहता है, नींद आती रहती है। टाइफाइड या टाइफस रोग होने के साथ ही रोगी बेहोशी में बड़बड़ाता रहता है जोकि समझ में नहीं आता। रोगी एक तरफ बेहोश पड़ा रहता है और उसके चारों तरफ जो कुछ होता है, वह कुछ भी उसे समझ में नहीं आता है, लेकिन जागने पर वह पूरे होश के साथ बात करता है। धीरे-धीरे प्रश्न का उत्तर देता है और फिर से बेहोश हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शीत से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सारे शरीर में कंपन होती है और अंगुलियां बर्फ की तरह ठण्डी हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
ताप से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक गर्मी लगती है और वह बेहोश पड़ा रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
पसीना से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पसीना बहुत ज्यादा आता है और शरीर में कमजोरी महसूस होती है तथा प्यास केवल पसीने की अवस्था में रहती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
परिश्रम करने से, किसी से बातें करने पर, जैवीद्रव्यों के नष्ट होने से तथा अत्यधिक संभोग करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। रोग के लक्षणों में ऐसी प्रत्येक वस्तु से वृद्धि होती है जो रक्तसंचार में बाधा उत्पन्न करती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
हाथ-पैर चलाने से, नम मौसम में, शरीर को गरम रखने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
स्नायविक अवसाद उत्पन्न होने के कारण उत्पन्न अतिसार (दस्त)। मस्तिक में सूजन होने की शुरुआती लक्षण। काली खांसी और इसके साथ दमा रोग। इस प्रकार के रोग के लक्षणों को नष्ट करने के लिए ईनोथेरा विएनिस औषधि का उपयोग करते हैं लेकिन इसी प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करते है। अत: ईनोथेरा विएनिस औषधि के कुछ गुणों की तुलना फास्फोरिकम एसिडम औषधि से कर सकते हैं।
दस्त हो जाता है और पानी की तरह का मल होता है, जीभ सूखा रहता है, पेट में दर्द होता है, आंखें अन्दर की ओर धंस जाती है और इसके आगे नीले घेरे पड़ जाते हैं, नींद ठीक प्रकार की नहीं आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए नेक्ट्रैण्डा अमारा औषधि का उपयोग करते हैं लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए फास्फोरिकम एसिडम औषधि का उपयोग करते हैं। अत: नेक्ट्रैण्डा अमारा के कुछ गुणों की तुलना फास्फोरिकम एसिडम औषधि से कर सकते हैं।
नक्स, पिक्रि-ए, लैक्टि-ए, चायना तथा फास्फों औषधियों के कुछ गुणों की तुलना फास्फोरिकम एसिडम औषधि से कर सकते हैं।
शरीर में कमजोरी लाने वाली पसीना आता है और पतले दस्त में चायना के पहले या बाद फास्फोरिकम एसिडम औषधि का उपयोग लाभदायक होता है।
प्रतिविष :-
काफिया औषधि का उपयोग फास्फोरिकम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
फास्फोरिकम एसिडम औषधि की पहली शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
फास्फोरस (Phosphorus)
फास्फोरस औषधि श्लैष्मिक झिल्लियों को उत्तेजित करती है, जलन लाती है व उनका अपजनन करती हैं, सीरमी झिल्लियों को भी इसी तरह उत्तेजित करती है, मेरुमज्जु व स्नायु (नाड़ी) में जलन उत्पन्न करती है, जिसके कारण लकवा रोग के लक्षण पैदा होता हैं। यह हडि्डयों विशेषकर निचले जबड़े और पैर की लम्बी हड्डी को नष्ट करती है और खून को दूषित करती है, जिससे रक्तवाहिकाओं तथा शरीर के प्रत्येक यन्त्र व तन्तु का मदजनक अपकर्श उत्पन्न होता है और इस प्रकार रक्तस्राव तथा शरीर में दूषित खून उत्पन्न होना और पीलिया रोग को उत्पन्न करती है।
यह शरीर के पोषण अर्थात चयापचय क्रिया को नष्ट करती है, यकृत में सूजन उत्पन्न करने का कारण बनती है। लम्बे, पतले व्यक्ति जिनकी छाती सिकुड़ी हुई होती है और त्वचा पतली व स्वच्छ रहती है, जैवी रसों के नष्ट के कारण उत्पन्न कमजोरी तथा अत्यधिक नाड़ियों में कमजोरी, शरीर का टेड़ा-मेड़ा अंग और रसिक प्रकृति वाले व्यक्तियों में फोस्फोरस औषधि रोग उत्पन्न करती है।
बाहरी प्रभावों, प्रकाश, ध्वनि, बदबू, छूने से, जलवायु में वैद्युतिक परिवर्तनों, आंधी-तूफानों आदि के प्रति अत्यधिक असहिष्णुता। लक्षण अचानक उत्पन्न होते हैं तथा बेहोशी की समस्या भी उत्पन्न होती है, शरीर से पसीना आता है और शरीर में गोली लगने जैसा दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
शरीर के खून में लौह कणों का अधिक होना, खून कम होना, हडि्डयों का नष्ट होना, मांस का बढ़ना और सिरोसिस होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर की मांसपेशियों पर घाव होने के साथ ही नाड़ियों में जलन होना तथा दर्द होना। श्वासनलियों में जलन होना, लकवा के लक्षण होना। आयोडीन और नमक का अत्यधिक उपयोग करने से उत्पन्न रोग के लक्षण तथा बाईं करवट लेटने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
उपदंश की तीसरी अवस्था, चर्म रोग और स्नयाविक अवसाद। ठण्ड के कारण उत्पन्न रोग। हडि्डयों के मज्जा में जलन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
लम्बे तथा तगड़े व्यक्तियों को होने वाला टी.बी. रोग। इस प्रकार के टी.बी. रोग को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि की निम्न शक्तियों का प्रयोग न करें और न ही इसका बार-बार उपयोग करें अन्यथा यक्ष्मा पिण्डों को तेजी से क्षय और विनाश होगा।
किसी भी कारण से शरीर से अधिक खून निकल जाने के कारण शरीर में खून की कमी हो जाना, जिसके कारण चेहरा फूल जाता है, चेहरा चारों ओर से फूला-फूला सा लगता है, आंख की ऊपर की पलकों में सूजन आ जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि उपयोग लाभदायक है।
विभिन्न लक्षणों में फोस्फोरस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का उत्साह कम होता है, रोगी का मन चिड़चिड़ा हो जाता है, डर लगता है और रोगी को ऐसा लगता है कि हर कोने से कोई चीज रंगती हुई बाहर निकल रही हो तथा दिव्यदृष्टि जैसी दशा उत्पन्न हो जाती है, अचानक रोगी चौंक पड़ता है, रोगी को बाहरी प्रभावों के प्रति अधिक असहिष्णुता होती है, रोगी की सोचने की शक्ति कम हो जाती है, रोगी पागलों की तरह का व्यवहार करता है और कुछ लकवा रोग जैसे लक्षण भी दिखाई देते हैं, आनन्द की अनुभूति नहीं होती है, अकेले रहने पर मृत्यु का भय लगा रहता है, दिमाग थका-थका सा रहता है, रोगी को पागलपन की समस्या रहने के साथ ही वह अपने प्रति अधिक उच्च धारणा रखता है, शरीर में उत्तेजना अधिक होती है, सारा शरीर गरम रहता है, रोगी अस्थिर रहता है और उसे चारों ओर अशान्ति होती है। इस प्रकार के मन से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- वृद्ध व्यक्तियों को चक्कर आता है तथा उठने के बाद अधिक चक्कर आता है, रीढ़ की हड्डी पर गर्मी महसूस होती है, शरीर की नाड़ियों में दर्द होता है, जलन भी होती है, सिर के रक्तवाहिनियों में खून जमने लगता है, मस्तिष्क शान्त रहने के साथ ही सिर के पिछले भाग में ठण्डापन महसूस होता है, चक्कर आने के साथ ही बेहोशी भी आने लगती है, माथे की त्वचा बहुत कसी हुई महसूस होती है, खोपड़ी पर खुजली होती है, बालों में रूसी हो जाती है तथा बाल झुण्डों में झड़ते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरस औषधि का सेवन करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- मोतियाबिन्द होने के साथ ही ऐसा लगता है कि प्रत्येक वस्तु कुहरे या पर्दे से ढकी हुई हैं या आंखों के सामने धूल कण तैर रहे हैं जिसके कारण से साफ दिखाई नहीं दे रहा है तथा कोई चीज जोर से आंखों के ऊपर खींची जा रही है, आंखों के सामने काली बिन्दु उड़ती हुई दिखाई देती है, आंखों के ऊपर हाथ की छाया करने से ठीक तरह से दिखाई देने लगता है, आंखों को देखने में अधिक उपयोग किए बिना ही आंखों व मस्तिष्क में थकान महसूस होती है, बत्ती को देखने पर बत्ती की चारों ओर हरे रंग की प्रकाश की गोलेकार घेरा दिखाई देने लगता है, नाड़ियां कमजोर हो जाती है, पलकों और आंखों के आस-पास सूजन हो जाती है, शुक्लमण्डल (पुतली का सफेद भाग) मोती जैसी सफेद दिखाई देती है और बरौनियां लम्बी मुड़ी ही महसूस होती है। तम्बाकू के प्रयोग करने से आंखों की देखने की शक्ति कम हो जाती है और कोटरा हडि्डयों में दर्द होता है, आंखों की दृष्टिकेन्द्र अपने स्थान से हट जाता है। शरीर की बाहरी पेशियों पर लकवा रोग के लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं, एक वस्तु दो दिखाई देती है। अधिक संभोग करने के कारण उत्पन्न आंखों से सम्बन्धित रोग के लक्षण। अधिमन्थ रोग (ग्लोकोमा), कनीनिका-वाहिकाओं की घनस्त्रता (र्थोम्बोसिस) तथा कनीनिका-कोशिकाओं में अपजननात्मक परिवर्तन हो जाता है। बुढ़ापा आने के समय में आंखों के रोग से सम्बन्धित लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं तथा आंखों के आस-पास काली तिरछी रेखाएं पड़ने लगती है, आंखों की रोशनी ठीक प्रकार की नहीं रहती है और आंखों की कनीनिका में रोग उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार के आंखों से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सुनने में परेशानी होती है विशेषकर दूसरे मनुष्य की आवाजें। एक शब्द कान में बार-बार गुंजता रहता है। आन्त्रिक ज्वर होने के साथ ही कान से कम सुनाई देता है। इस प्रकार के कान से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक के नथुनों में पंखें जैसी गति हो जाती है। नाक से खून बहने लगता है तथा रोगी स्त्री को मासिकस्राव आने के बदले नाक से खून बहने लगता है। यह स्राव अत्यन्त तीखी और बदबूदार होती है। नाक की हडि्डयों की झिल्लियों में जलन होती है, जो बदबूदार नहीं होता है सिर्फ उसकी कल्पना होती है। पुराना जुकाम होने के साथ ही हल्का-हल्का नाक से खून बहने लगता है, रोगी के रूमाल में हमेशा खून लगा रहता है। इस प्रकार के नाक से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का चेहरा पीला पड़ जाता है और रोग के कई प्रकार के लक्षण प्रकट होने लगते हैं, गाल अन्दर की ओर धंस जाता है, मुंह की हडि्डयों में तेज फाड़ने जैसा दर्द होता है, एक या दोनों गालों पर लाल और गोल धब्बें पड़ जाते हैं तथा निचले जबड़े में सूजन आ जाती है और जबड़ें का मांस गलने लगता है। इस प्रकार के चेहरे से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह फूला हुआ लगता है और मसूढ़ों से खून बहने लगता है और मसूढ़ों पर घाव हो जाता है। कपड़े धोने के बाद दांत में दर्द होता है। जीभ सूखी, चिकनी, लाल या सफेद हो जाती है लेकिन जीभ पर मोटी परत नहीं जमती है। दांत निकलवाने के बाद मसूढ़ों में से खून निकलने लगता है। स्तनपान करते समय छोटे बच्चों के मुंह में घाव हो जाता है। मुंह के भोजननली में जलन होती है। रोगी को अधिक ठण्डे पानी की प्यास लगती है और इसके साथ ही भोजननली में सिकुड़न होती है। इस प्रकार के मुंह से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- खाना खाते ही रोगी को तुरन्त भूख लग जाती है, भोजन करने के बाद हर बार खट्टा स्वाद और खट्टी डकारें आती है, डकार आने के साथ ही खाना खाया हुआ भोजन तुरन्त वापस मुंह में आ जाता है, जैसे ही आमाशय के अन्दर पानी गरम होता है वैसे ही उसकी उल्टी हो जाती है, हृदय नली में सिकुड़न होती है और तंगी (कसा हुआ) महसूस होती है, भोजन को निगलने में परेशानी होती है, खाना-खाते ही मुंह के अन्दर खाना वापस लौट आता है, आमाशय में दर्द होता है, ठण्डे खाद्य-पदार्थो व बर्फीली चीजों का सेवन करने से रोगी को कुछ आराम मिलता है। आमाशय के अन्दर जलन होती है और इसके साथ ही गले में भी जलन होती है और यह जलन आंतों तक फैल जाती है। अत्यधिक नमक का सेवन करने से उत्पन्न रोग। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट के अन्दर ठण्डापन महसूस होता है, पेट में तीखा और काटता हुआ दर्द होता है, सारे आमाशय में कमजोरी महसूस होती है और खालीपन महसूस होता है और अन्दर की ओर धंसता हुआ नज़र आता है। यकृत में रक्त जमने लगता है तथा इसके साथ ही उसमें जलन भी होती है। पीलिया रोग हो जाता है। क्लोमग्रन्थि से सम्बन्धित बीमारियां हो जाती है। पेट में बड़े-बड़े पीले धब्बें पड़ जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब मलत्याग करता है तो उसके मल से अधिक बदबू आती है तथा मलद्वार से वायु भी निकलती है। मल लम्बा, संकरा और कुत्ते के मल जैसा होता है। मल को बाहर निकालने में परेशानी होती है। बाईं करवट करके लेटने पर मल करने की अधिक इच्छा होती है। अतिसार (दस्त) हो जाता है और इसके साथ ही शरीर मे कमजोरी महसूस होती है और मल अधिक मात्रा में होता है, मल में कफ जैसा पदार्थ और साबूदाने जैसे पदार्थ दिखाई पड़ते हैं। रोगी को ऐसा लगता है कि मलद्वार अपने आप खुला हुआ है। मलत्याग करने के बाद शरीर में अधिक कमजोरी महसूस होती है। मलत्याग करने के समय में मलांत्र से खून भी बहने लगता है, मल सफेद और कठोर होता है। खूनी बवासीर का रोग हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- गुर्दे में सूजन होने के साथ ही पेशाब से खून की कुछ मात्रा भी आती है, पेशाब गन्दा और कत्थई रंग और लाल तलछट युक्त होता है। इस प्रकार के मूत्र से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी में संभोग करने की शक्ति नहीं रहती है, रोगी को संभोग क्रिया करने के लिए अधिक इच्छा होती है लेकिन उसका अपने आप ही वीर्यपात हो जाता है। रोगी को संभोग करने के सपने आते हैं और अपने आप ही वीर्यपात हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्री रोगी के गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली पर जलन होने लगती है। हरित्पाण्डु रोग होना। गर्भाशय में से हल्का-हल्का खून बहने लगता है। मासिकस्राव नियत समय से बहुत पहले और कुछ मात्रा में होता है, अधिक मात्रा में नहीं पर अधिक दिनों तक होता रहता है। रोगी स्त्री मासिकस्राव आने से पहले रोती रहती है, स्तनों में सुई जैसी चुभन होती है। प्रदर स्राव अधिक मात्रा में होता है, स्राव अधिक चीस पैदा करने वाला होता है और यह मासिकस्राव से पहले होता है। रोगी स्त्री के जरायु से खून बहने के बदले नाक, मुंह, कान आदि अंगों से खून बहने लगता है। स्तन में पीबदार घाव हो जाता है तथा उसमें जलन भी होती है और उसमें से पानी जैसा बदबूदार पीब का स्राव होता है। रोगी स्त्री को संभोग करने की उत्तेजना अधिक होती है। इस प्रकार के स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले में खराश होती है तथा शाम के समय में यह अधिक महसूस होती है तथा स्वरयन्त्र में दर्द होता है। जो लोग अधिक बोलते हैं, उनके गले में सुरसुराहट होना। गला बैठना और शाम के समय में अत्यधिक कच्चेपन का अहसास होना। स्वरयन्त्र में दर्द होना जिसके कारण बोलने में परेशानी होना, गले में सुरसुराहट होना और इसके साथ ही खांसी होना। ठण्डी हवा, हंसने, बातचीत करने, गरम जगह से ठण्डी हवा में जाने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। कठोर सूखी खांसी हो जाती है तथा इसके साथ ही रोगी को दबाव महससू होता है और अधिक परेशानी होती है, फेफड़ों में खून जमा होने लगता है। छाती में जलन होने के साथ ही दर्द होता है तथा छाती पर गर्माहट और दबाव महसूस होता है और ऐसा लगता है कि जैसे छाती पर बोझ रखा हुआ है। छाती में सुई चुभने जैसा दर्द होता है और इसके साथ ही श्वास लेने की क्रिया तेज हो जाती है, छाती पर घुटन महसूस होती है तथा ऐसा लगता है कि छाती पर बोझ रखा हुआ है तथा इसके साथ ही छाती पर गर्माहट महसूस होती है। फेफड़ों की धमनियों में जलन होती है और इसके साथ ही श्वास लेने में रुकावट होती है, बाईं करवट करके लेटने पर अधिक परेशानी होती है तथा इसके साथ ही खांसी भी हो जाती है और खांसते समय शरीर कांपने लगता है, रोगी जब थूकता है तो उसका थूक जंग और खून जैसा पीबदार होता है। बार-बार होने वाली खांसी तथा इसके साथ ही गले में दर्द होना, स्नयाविक खांसी होना जो बदबू सूंघने से और भी बढ़ जाती है, अपरिचित व्यक्ति के घर में घुसने तथा अपरिचित व्यक्तियों के बीच में रहने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, बाईं ओर लेटने पर तथा ठण्डी जगह में अधिक रहने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब बाईं करवट करके लेटता है तो उसके हृदय में बहुत तेज दर्द होता है, नाड़ियों की गति तेज हो जाती है और उसमें रुकावट पैदा होती है तथा इसके साथ ही वह मुलायम हो जाती है। हृत्पाण्डु रोग हो जाता है और इसके साथ ही दाहिना अंश फैला हुआ रहता है, हृदय में गर्माहट महसूस होती है। इस प्रकार के हृदय से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पीठ पर जलन होने के साथ ही दर्द होता है और ऐसा लगता है जैसे कमर टूट गई हो, दोनों कंधों के बीच में गर्माहट महसूस होती है तथा रीढ़ की हड्डी कमजोर पड़ जाती है। इस प्रकार के पेट से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- हाथ-पैरों की उंगलियों की नोकों से ऊपर की ओर बढ़ता हुआ दर्द और इन अंगों पर लकवा रोग की तरह के लक्षण दिखाई देते हैं। कोहनी और कंधों की हडि्डयों के जोड़ों में सुई जैसी चुभन होती है। तलुवों में जलन होती है। अधिक परिश्रम करने पर शरीर में अधिक कमजोरी होती है और शरीर में कंपन होता है। हाथों से किसी वस्तु को पकड़ने में परेशानी होती है। जांघों में आस-पास जलन होती है तथा ऐसा लगता है कि यहां की मांसपेशियां गल रही हैं तथा हाथ और बांहें सुन्न पड़ जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी रोग के कारण केवल दाईं करवट ही लेट पाता है। रोगी के शरीर पर लकवा रोग के लक्षण दिखाई देने लगते हैं और इसके साथ ही हाथों व पैरों पर चींटी रेंगने की अनुभूति होती है, शरीर की कई हडि्डयां अचानक ही मुड़ जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी को ठीक प्रकार से नींद नहीं आती है विशेषकर भोजन करने के बाद। रोगी की आंखें खुली रहती हैं तथा इसके साथ ही रोगी को अधिक उदासीपन होता है। वृद्ध व्यक्तियों को नींद न आने की शिकायत होती। रोगी को नींद में आग तथा खून बहने के सपने आते हैं तथा संभोग करने के सपने भी आते हैं। रोगी रात के समय में देर से सोता है और जागने पर कमजोरी महसूस होती है, रोगी को झपकियां आती रहती हैं और बार-बार नींद टूट जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को प्रतिदिन शाम के समय में ठण्ड लगती है तथा रात के समय में घुटने में ठण्ड लगता है, शरीर में जैवीशक्ति की कमी हो जाती है तथा इसके साथ ही प्यास कम लगती है लेकिन अस्वभाविक भूख लगती है। क्षय रोग होने के साथ ही रोगी की नाड़ियां अनियमित गति से तथा रुक-रुककर चलती है, रात के समय में रोगी के शरीर से चिपचिपा पसीना आता है। रोगी हर समय कुछ न कुछ बड़बड़ाता रहता है तथा रोता और चिल्लाता रहता है। शरीर से अधिक मात्रा में पसीना भी आता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के त्वचा पर छोटे-छोटे घाव हो जाते हैं और उनमें से अधिक मात्रा में खून बहने लगता है तथा वे कुछ समय के लिए ठीक हो जाते हैं और फिर से खुल जाते हैं। पीलिया रोग हो जाता है। रोगी के शरीर की त्वचा पर बड़े-बड़े घाव हो जाते हैं तथा इसके बीच में छोटे-छोटे घाव हो जाते हैं। चमड़ी के नीचे काले धब्बे पड़ जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
यकृत (जिगर) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का जिगर बढ़ा हुआ हो और जख्म हो गया हो तथा उसमें दर्द हो रहा हो। दाहिनी तरफ लेटने पर तथा जिगर को छूने पर दर्द महसूस होता है, पेट में वायु भर जाती है जिसके कारण पेट फूल जाता है, पेट में गड़गड़ाहट होती है, मलद्वार से हवा निकलती रहती है और सारे शरीर में ठण्ड महसूस होती है, सारा पेट खाली और अन्दर की ओर धंसता हुआ महसूस होता है। इस प्रकार के यकृत से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
कब्ज से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कब्ज की समस्या हो जाती है तथा इसके साथ ही जब वह मलत्याग करता है तो उसका मल कुत्ते की मल की तरह खुश्क, लम्बा, कड़ा होता है तथा मल मुश्किल से त्याग होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फोस्फोरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कैंसर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के गर्भाशय से खून बहने लगता है और मासिकधर्म समाप्त होने पर इसके बदले नाक, पेट, मलद्वार तथा मूत्रनली से खून बहने लगता है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए फास्फोरस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गर्भावस्था से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री पानी पी नहीं पाती और पानी को देखने से ही उल्टी आ जाती है और नहाने के समय में वे अपनी आंखों को बन्द कर लेती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी का उपचार करने के लिए फास्फोरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
छाती रोग से सम्बन्धित लक्षण :- प्लूराइटिस, न्यूमोनिया, ब्रोकाइटिस तथा तपेदिक आदि रोगों में या साधारण खांसी होने पर फास्फोरस औषधि का प्रयोग करने से रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। ऐसे रोगियों के जीभ का स्वाद खून मिला हुआ मीठा या नमकीन लगता है, बाई तरफ या रोग ग्रस्त भाग की तरफ लेटने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
किसी के छूने से, शारीरिक या मानसिक श्रम करने से, सुबह के समय में, गरम उष्ण भोजन करने से और गरम पेय पदार्थ पीने से, मौसम परिवर्तन के समय में, गर्मी के मौसम में भीगने पर, शाम को बाई करवट लेटने पर दर्द होता है, आंधी-तूफान के दौरान तथा सीढ़ियां चढ़ते समय रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
अंधेरे में रहने से, दाईं करवट लेटने पर, ठण्डे भोजन से, ठण्ड से, खुली हवा में, ठण्डे पानी से धोने पर तथा सोने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सिर और चेहरे की तकलीफों को ठण्डी हवा से आराम पहुंचता है लेकिन छाती, हलक और गर्दन की तकलीफ ठण्डी हवा से बढ़ जाती है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
आर्सेनिक के साथ इसका पूरक संबन्ध होने के बाद भी कुछ भिन्नता है, एलि-सी के सादृश्य है।
विरोधी औषधि (इनकम्पेटिबल):-
कास्टिकम औषधि के पहले या बाद फोस्फोरस औषधि का प्रयोग नहीं करना चाहिए।
पश्चादुपयोगी औषधि (फ्लोव्ज वेज):-
फास्फोरस औषधि के बाद चायना औषधि या कैल्केरिया औषधि अच्छा काम करते हैं।
आयोडीन औषधि के सेवन करने और अधिक नमक खाने के बुरे फल को फास्फोरस औषधि दूर करता है।
पुराने दस्त से पीड़ित जिसको हमेशा पतला दस्त होता रहता है, ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फास्फोरस औषधि उपयोग लाभदायक है।
मात्रा (डोज) :-
फोस्फोरस औषधि की तीसरी से तीसवीं शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इस औषधि की अति निम्न शक्तियों का प्रयोग नहीं करना चाहिए और न ही इसे लगातार उपयोग में लेना चाहिए, वह भी विशेषकर क्षयरोग (टी.बी.) की अवस्थाओं में अन्यथा रोगी की मृत्यु भी हो सकती है।
फाइसैलिस-सोलेनम वेसिकेरियम (Physalis-Solanum vesicarium)
फाइसैलिस-सोलेनम वेसिकेरियम औषधि मूत्राशय से सम्बन्धित रोग तथा पथरी रोग से सम्बन्धित रोगों को ठीक करने के लिए उपयोग में लाई जाती है। इन रोगों के अलावा भी इसका उपयोग अन्य रोगों को ठीक करने के लिए भी उपयोग में लाया जाता है और इसका लाभ भी बहुत अधिक होता है।
विभिन्न लक्षणों में फाइसैलिस-सोलेनम वेसिकेरियम औषधि का उपयोग -
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में चक्कर आना, स्मरण शक्ति कमजोर होना, रोगी को लगातार बातें करने की इच्छा होना, सिर में ऐसा महसूस होना कि कुछ टपक रहा है और दर्द जिसके कारण हो रहा है, चेहरे पर लकवा रोग की तरह के लक्षण दिखाई देना, आंखों के ऊपरी भागों में भारीपन महसूस होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसैलिस-सोलेनम वेसिकेरियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
खांसी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का गला बैठ जाता है और सांस लेने में रुकावट होती है और जिसके कारण नींद नहीं आती है। गला बैठ जाता है, छाती में कुछ दबाव होने के साथ ही दर्द होता है तथा दर्द ऐसा महसूस होता है कि छाती में छूरा घोंपा जा रहा है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसैलिस-सोलेनम वेसिकेरियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- खुली हवा में ठण्ड लगती है और बुखार भी हो जाता है। शाम के समय में बुखार महसूस होता है। मलत्याग करने के समय में पसीना अधिक आता है तथा इसके साथ ही शरीर की त्वचा पर कुछ रेंगने जैसी अनुभूति होती है अधिक मात्रा में पेशाब आता है तथा यकृत में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसैलिस-सोलेनम वेसिकेरियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मूत्राशय से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब बदबूदार अधिक मात्रा में आता है या बन्द हो जाता है, रात के समय में पेशाब अधिक मात्रा में आता है, स्त्रियों में पेशाब आने पर उसके वेग को न रोक पाना। अनजाने में पेशाब निकल पड़ना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसैलिस-सोलेनम वेसिकेरियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- हाथ-पैरों की अंगुलियों के बीच की खाल उतर जाना, शाम के समय में व शरीर गरम होने पर रोगी के लक्षणों में वृद्धि होती है। हाथ-पैरों में अकड़न होती है तथा लकवा रोग जैसे लक्षण दिखाई देते है, चलते समय हर झटका सिर में दर्द को तेज कर देता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसैलिस-सोलेनम वेसिकेरियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
ठण्डी नम मौसम में शाम के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
मात्रा (डोज) :-
फाइसैलिस-सोलेनम वेसिकेरियम औषधि की मूलार्क से तीसरी शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इसके फलों का रस सूजन और मूत्राशय की क्षोभमयी अवस्थाओं में किया जाता है।
फाइसस्टिग्मा (Physostigma)
फाइसस्टिग्मा औषधि का सक्रिय तत्व ईजरीन होता है। यह औषधि हृदय-तन्त्र को उत्तेजित करती है, रक्तचाप और आंतों की पुर:सरण क्रिया को बढ़ाती है। यह नेत्रपटलों तथा रोमक पेशियों को संकुचित करती है तथा निकट-दृष्टि जैसी अवस्था को उत्पन्न करती है।
विभिन्न लक्षणों में फाइसस्टिग्मा औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का मन बेचैन रहता है और वह तरह-तरह के ख्यालों को रोक नहीं सकता है, चित्त को एकाग्र नहीं कर सकता। उसके लिए मानों मकान पर कोई चीज़ बाकायदा नहीं है, उन्हें बार-बार गिनता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसस्टिग्मा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर के ऊपरी भाग में लगातार दर्द होता रहता है, चक्कर आता है तथा इसके साथ ही सिर में सिकुड़न महसूस होती है। चक्षुगन्हरों के ऊपर दर्द होता है, पलकों को उठाने पर असहनीय दर्द होता है। मस्तिष्क से मेरूदण्डावरक की झिल्ली में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसस्टिग्मा औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रतौंधी रोग हो जाता है तथा इसके साथ ही रोगी रोशनी से डरता रहता है, पुतलियों में सिकुड़न होती है, चक्षुपेशियां फैलने लगती है, आंखें बन्द करने पर कमजोरी का अहसास होता है, आंखों के सामने मक्खियां चलती हुई नज़र आती हैं और काले-काले धब्बें उड़ते हुए दिखाई देते हैं, रोशनी चमचमाहट युक्त दिखाई देती है। आंखों के चारों ओर अंधेरा दिखाई देता है, आंखों से सम्बन्धित कई प्रकार के रोग हो जाते हैं, आंख से अधिक मात्रा में पानी गिरता रहता है। बेहोशी आने के साथ ही पलकें बन्द होने लगती है और इसके साथ ही आंखों से काम लेने के बाद बेचैनी सी महसूस होती है। रोगी को निकट दृष्टि दोष हो जाता है। डिफ्थीरिया रोग होने के बाद आंख तथा इसके पेशियों में लकवा रोग के लक्षण दिखाई देता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसस्टिग्मा औषधि का सेवन करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक से पानी बहता रहता है, नथुनों में जलन होती है और सुरसुराहट होती रहती है, नाक बन्द हो जाती है और नाक के अन्दर गर्मी का अहसास होता है। नथुनों के चारों ओर ज्वर-स्फोट होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसस्टिग्मा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- जीभ की नोक पर घाव हो जाता है और गले में एक गेन्द चढ़ जाने जैसी अनुभूति होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसस्टिग्मा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले में तेज हृदय की कंपन महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षण होने पर इस औषधि से उपचार करें।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- भोजन करने के बाद आमाशय में दर्द होता है। पाचनतन्त्र में दबाव के प्रति असहिष्णु। दर्द छाती और नीचे बांहों तक फैल जाता है। पाचनतन्त्र में दर्द होता है और इसके साथ ही कब्ज की समस्या होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसस्टिग्मा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों को मासिकस्राव अनियमित हो जाता है और इसके साथ ही हृदय में कंपन होता है। आंखों की रक्तसंकुलता। मांसपेशियां कठोर हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसस्टिग्मा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय की नाड़ियां सुस्त हो जाती है तथा इसके साथ ही सारे शरीर में कंपन होता है। हृत्स्पन्दन स्पष्ट रूप से छाती व सिर में महसूस होता है। कंपन गले के अन्दर तक महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसस्टिग्मा औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- दाएं घुटने के पीछे वाले गड्ढे में दर्द होता है तथा सिर के पिछले भाग में जलन और सुरसुराहट महसूस होती है, हाथ और पैरों में सुन्नपन महसूस होता है। रोगी को नींद आते ही अचानक झटकें महसूस होते हैं। शरीर की गति शक्ति कम हो जाती है। शरीर के कई अंगों में लकवा रोग जैसा प्रभाव देखने को मिलता है और कई अंगों में झटके लगने जैसा महसूस होता है तथा दर्द होता है। रोगी के शरीर में ऐंठन होती है और शरीर में धनुष या कमान की तरह टेढ़ा पड़ जाता है, तान्डव रोग (ऐसा रोग जिसमें रोगी नाचने लगते हैं) होना और शरीर का कोई अंग अपना काम ठीक से नहीं करता। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसस्टिग्मा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पैर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के घुटनों तथा घुटनों के नीचे अधिक कमजोरी महसूस होती है और चलने में रोगी का पैर डगमगाता रहता है, रोगी ठीक से चल नहीं पाता है और अपनी आंखों को बन्द कर देता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसस्टिग्मा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- बवासीर के मस्से कठोर, अतिशय संवेदनशील होता है और मस्से बाहर निकल आते हैं, उनको छूने पर दर्द होता है और यह दर्द अहसनीय होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइसस्टिग्मा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
एग, कल्के-फा, चायना, कोन, डेफेन, यूफ्रे, फरम, हायो, इग्ने, कालीफा, लायको, मर्क, नैट्र-म्यू, ओपि, पल्स, रूटा, सीपि, स्ट्रिक, सल्फ, वेरेट्रम और जिंक औषधियों के कुछ गुणों की तुलना फाइसस्टिग्मा औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष :-
एट्रोपिया। इस औषधि की पूर्ण मात्रायें फाइसस्टिग्माइन के अधिकांश विष-लक्षणों को नष्ट करती है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
सुबह के समय में, परिश्रम करने से तथा मानसिक परिश्रम करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन.ह्रास) :-
खुली हवा में और घूमने से, आंखें बन्द रखने से, खामोशी से, गर्म कमरे में और कपूर सूंघने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
फाइसस्टिग्मा औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। समक्षाराम्ल ईजरीन सल्फेट की ) से 4 ग्रेन तक की मात्रा का 1 औंस जल में मिलाकर आंखों के निम्नलिखित उपसर्गो में स्थानिक प्रयोग किया जाता है। तारा-संकोच करने के लिए पुतलियों के अस्वाभाविक फैलाव में, आंख में चोट लग जाने पर, आंखों की पुतलियों की सूजन में, कनीनिका के घाव आदि में।
फाइटोलेक्का (Phytolacca)
रोगी के पूरे शरीर में हल्का-हल्का दर्द हो तथा इसके साथ ही बेचैनी हो तो ऐसे लक्षणों को दूर करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग लाभदायक होता है जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं। इस औषधि का प्रभाव अधिकतर ग्रन्थियों पर पड़ता है। ग्रन्थियों में सूजन होने तथा इसके साथ ही गर्माहट महसूस होने कि स्थिति में इसका प्रभाव लाभदायक होता है। हडि्डयों के ऊतकों, प्रावरणियों तथा पेशी आवारणों पर इस औषधि की शक्तिशाली क्रिया होती है।
शरीर के कई हडि्डयों में दर्द होना, हडि्डयों के जोड़ों पर दर्द होना, गले में जलन होना, पूयजनक, तालुओं में जलन और डिफ्थीरिया, शरीर का धनुष के आकार में अकड़न जाना, शरीर का वजन कम होना, बच्चों को दांत निकलने के समय परेशानी होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं।
विभिन्न लक्षणों में फाइटोलेक्का औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- चारों ओर की चीजों के प्रति त्यागने की भावना होती है और व्यक्तिगत स्पर्धाओं में हिस्सा लेने का मन नहीं करता है। जीवन में उदासीपन हो जाता है और जीने की इच्छा नहीं होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को चक्कर आने लगता है और सिर पर घाव हो जाता है और इसके साथ ही दर्द होता है। माथे के पीछे के भाग में दर्द होता है। कनपटियों में व आंखों के ऊपर दर्द होता है, खोपड़ी के हडि्डयों के जोड़ों में दर्द होता है व हर बार वर्षा होने पर दर्द होने लगता है। खोपड़ी पर पपड़ीदार घाव हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों के आस-पास की त्वचा पर चिड़चिड़ापन महसूस होता है तथा पलकों के नीचे रेत होने जैसी अनुभूति होती है और पलकों के किनारे गर्म महसूस होते हैं, अश्रुग्रन्थि का नालव्रण हो जाता है तथा अधिक मात्रा में आंसू बहने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक के अन्दर से अधिक मात्रा में पानी जैसा पदार्थ बहता रहता है और सर्दी तथा जुकाम हो जाता है और एक नथुने और पश्चनासारन्ध्रों से श्लैष्मिक स्राव होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- बच्चों के दांत निकलते समय दांत पीसने की इच्छा होती है, दांत अपने आप में भिंच जाते हैं, निचला होंठ नीचे की ओर खिंचा हुआ रहता है तथा होंठ बाहर की ओर मुड़े हुए रहते हैं, जबड़ें आपस में जोरों से सटे हुए रहते हैं, ठोढ़ी नीचे की ओर उरोस्थि तक खिंची हुई रहती है। जीभ की नोक लाल, खुरदरी और झुलसी हुई प्रतीत होती है, मुंह से खून बहने लगता है और मुंह के किनारों पर फफोलें पड़ जाते हैं। जीभ पर नक्शे जैसी आकृति तथा दांत के चिंह पड़ जाते हैं तथा जीभ पर दरारयुक्त निशान भी होते हैं तथा इसके साथ ही बीच में नीचे की ओर पीला धब्बा पड़ा रहता हैं और लार अत्यन्त चिपचिपी होती है। इस प्रकार के मुंह से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले पर गहरे लाल या नीले-लाल धब्बे पड़ जाते हैं तथा जीभ की जड़ में तेज दर्द होता है और उसकी तालु और तालुमूल ग्रन्थियां सूजी हुई रहती हैं। गले में गोला होने जैसी चीजों की अनुभूति होती है। गले में खराश महसूस होता है। तालुमूल ग्रन्थियां सूजी हुई रहती है, विशेषकर दाईं ओर की ग्रन्थि, इस पर काली-लाल आकृतियां भी बन जाती है। निगलने पर कानों में गोली लगने जैसा दर्द होता है। गले की झिल्लियों में सफेद भूरा, गाढ़ा, लसीला, पीला कफ जमा रहता है जिसे छुड़ाना मुश्किल होता है। कोई भी गरम-गरम चीज निगलने में कठिनाई होती है। कर्णमूल ग्रन्थि में तनाव होता है तथा इसके साथ ही दबाव महसूस होता है। रोहिणी रोग हो जाता है तथा गले में जलन भी होती है और उसमें पीब बनने लगता है। डिफ्थीरिया रोग हो जाता है तथा इसके साथ ही गले में जलन होती है, जीभ की जड़ में दर्द होता है जिसका असर कान तक होता है। रोगी के गले की टांसिल सूज जाती है और इन पर सफेद दाग पड़ जाते हैं जो कभी-कभी आपस में मिलकर घाव बन जाते हैं और उनकी पीड़ा कानों तक होती है, रोगी को ऐसा महसूस होता है कि गले में कफ का ढेला अटका हुआ है जिसे हटाने के लिए रोगी को बार-बार निगलने की क्रिया करनी पड़ती है। गले की टांसिल बढ़ जाती है तथा उस स्थान पर सूजन भी आ जाती है, तालुमूलग्रन्थियों में जलन होती है, तालुमूल ग्रन्थियां व गलतोरणिका में सूजन आ जाती है तथा इसके साथ ही गले में जलन होती है और दर्द होता है। रोगी को इतना तेज दर्द होता है कि वह पानी को भी नहीं निगल पाता है। इस प्रकार के गले से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- दायें अध:पर्शुक प्रदेश में दर्द होता है तथा उस स्थान पर धब्बा पड़ जाता है, पेट के पेशियों के जोड़ों में दर्द होता है, नाभि के पास दर्द होता है, नाभि पर जलन होने के साथ ही ऐंठन भी होती है। पाचनतन्त्र व पेट में कुचलने जैसा दर्द महसूस होता है। वृद्ध व्यक्तियों का हृदय कमजोर हो जाता है तथा इसके साथ ही उन्हें कब्ज की शिकायत भी होती है। मलांत्र से खून बहने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब बहुत ही कम मात्रा में होता है तथा इसके साथ ही पेशाब करने में रुकावट होती है। इसके साथ ही गुर्दे के भाग में दर्द होता है। गुर्दे में जलन होती है। पेशाब में खड़िया जैसा चूना आता है तथा अण्डे की सफेदी जैसा पदार्थ आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्तन में जलन होती है तथा स्तन कठोर हो जाता है और इसमें अहसहनीय दर्द होता है। स्तन में घाव हो जाता है तथा इसके साथ ही कक्षा ग्रन्थियां बढ़ जाती हैं। स्तन में कैंसर हो जाता है। स्तन कठोर, दर्दयुक्त तथा बैंगनी रंग की हो जाती है। स्तन में फोड़ा होना। दायें डिम्बाशय के नाड़ियों में दर्द होना। मासिकस्राव अधिक मात्रा में होना और बार-बार होना। चूचक के आस-पास दरारें पड़ जाती है और छोटे-छोटे घाव हो जाते हैं। स्तन में जलन होती है तथा मासिकधर्म के समय में और उसके पहले के समय में दर्द होता है। स्तन से अधिक मात्रा में दूध का स्राव होता है तथा स्तन में दर्द भी होता रहता है। जब बच्चा दूध पीता है तो चूचक में दर्द होता है और दर्द का असर सारे शरीर में फैल जाता है। इस प्रकार के स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- अण्डकोषों में दर्द होता है तथा इसके साथ ही अण्डकोष कठोर हो जाता है, मूलाधार से लेकर लिंग तक गोली लगने जैसा दर्द होता है। इस प्रकार के पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि जैसे हृत्पिंड गले में उछल आया हो। हृदय के भाग में दर्द होता है तथा इसके साथ ही दायें बाजू में भी दर्द होता है। इस प्रकार के हृदय से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का गला बैठ जाता है तथा वह कुछ भी बोलने में असमर्थ हो जाता है। श्वास लेने में परेशानी होती है तथा सूखी और परेशान करने वाली, कुटकुटीदार खांसी हो जाती है, यह खांसी रात के समय में अधिक होती है। छाती के मध्य भाग अर्थात उरोस्थि भाग में हल्का-हल्का दर्द होता है और इसके साथ ही खांसी भी होती है। निचली मध्यपंजर पेशियों की हडि्डयों के जोड़ों में दर्द होता है। इस प्रकार के श्वास संस्थान सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कमर पर हल्का-हल्का दर्द होता है, दर्द ऊपर की ओर उठता हुआ और नीचे की त्रिकास्थि प्रदेश तक चाला जाता है। गुर्दे के भाग में कमजोरी महसूस होती है और हल्का-हल्का दर्द होता है। पीठ अकड़ी हुई विशेषकर सुबह के समय में उठने पर और भीगी वातावरण में दर्द होता है। इस प्रकार के पीठ से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- दाएं कंधों में गोली लगने जैसा दर्द होता है तथा इसके साथ ही अकड़न और बांह को ऊपर उठाने में रोगी असमर्थ रहता है। जोड़ों पर दर्द होता है तथा सुबह के समय में अधिक दर्द होता है। दर्द बिजली के झटकों के समान उड़ान भरते हुए होता हैं। गोली लगने जैसा दर्द होता है। दर्द अपना स्थान बदलता है। जांघों के भीतरी अंशों की ओर दर्द होता है। एड़ियों में दर्द होता है, पैरों को जब ऊपर उठाते हैं तो रोगी को राहत मिलती है। झटके लगने जैसा दर्द होता है। टांगों में दर्द होता है, रोगी अपने पैरों को ऊपर उठाने से डरता है। पैर सूजे हुए, टखनों व पैरों में दर्द होता है। पैर की उंगलियों में दर्द होता है। रोगी के सारे शरीर में दर्द होता है और कुचलने जैसा दर्द होता है, रोगी कराहता रहता है और रोगी जब हाथ-पैरों को चलाता है तो उसके रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की त्वचा पर खुजली होती है जिसके कारण रोगी खुजलाता रहता है। रोगी की त्वचा सूख जाती है तथा सिकुड़ जाती है और फीका हो जाता है। त्वचा पर फुंसियां हो जाती है। फोड़ा हो जाता है तथा यह ठीक होकर पपड़ियों के रूप में उतरने लगती है। ग्रन्थियों की सूजन और कठोरता। आरक्त-ज्वर जैसा घाव होना। मस्सें और तिल होना। इस प्रकार के चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना चाहिए। चर्म रोग से सम्बन्धित रोग की प्रारम्भिक अवस्थाओं में यह औषधि सर्वाधिक उपयोगी है।
गठिया वाय से सम्बन्धित लक्षण :- सूजाक दोष के कारण उत्पन्न गठिया वात रोग जिसमें गाठें सूजी हुई रहती है तथा दर्द भी होता रहता है, जोड़ों पर सुर्खी आ जाती है और सूजन हो जाती है, पारे के दुरुपयोग और आतशक से टांग की लम्बी हडि्डयों की झिल्ली में सूजन और दर्द होता है, नम मौसम में या रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हैजा से सम्बन्धित लक्षण :- बच्चों को हैजे की बीमारी होने पर बच्चा अपने मसूढ़े को काटता रहता है और सामने जो कुछ पाता है, पकड़कर मुंह में ले लेता है और काटता है। बच्चे के दांत निकलते समय यह लक्षण अक्सर पाया जाता है, दांत निकलते समय दस्त या और किसी रोग के साथ यह लक्षण होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित बच्चें के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
वैद्युतिक परिवर्तनों के प्रति असहिष्णु, भीगने से, जब वर्षा होती है तब, नमी वातावरण में रहने से, ठण्डी वातावरण में, रात के समय में, ठण्डी हवा लगने से, गति करने से और दाएं भाग में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
गर्मी, खुश्क मौसम, आराम करने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
रस-टा, काली-हाइड्रा, मर्क्यू, सैग्वी, एरम-ट्रिफा तथा ब्रायों औषधियों के कुछ गुणों की तुलना फाइटोलेक्का औषधि से करते हैं।
प्रतिकूल :-
मर्क्यू।
प्रतिविष :-
दूध और नमक, बेला, मेजीरि औषधि का उपयोग फाइटोलेक्का औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
अनुपूरक :-
साइ।
मात्रा (डोज) :-
फाइटोलेक्का औषधि की मूलार्क से 3 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। स्तन में जलन होने पर इस औषधि का बाहरी प्रयोग करना चाहिए।
पिक्रिकम एसिडम (Picricum Acidum)
पिक्रिकम एसिडम औषधि का प्रयोग दिमाग की कमजोरी को दूर करने के लिए लाभकारी रहता है। अगर किसी व्यक्ति के अंदर इच्छा शक्ति समाप्त हो जाना, दिमागी काम करने से ज्यादा कमजोरी महसूस होना, किसी प्रकार की गहरी चिंता के कारण कमजोरी पैदा होना जैसे लक्षण उभरते हैं तो उसे यह औषधि देने से आराम मिलता है। पढ़ने-लिखने वाले बच्चों के लिए भी इस औषधि का प्रयोग अच्छा रहता है। इसके अलावा जिस व्यक्ति को गर्मी बर्दाश्त न होती हो, सिर का दर्द या शरीर में किसी तरह की परेशानी ठंडी हवा से कम हो जाती हो, नमी के मौसम में तकलीफ बढ़ जाती हो तो उसे यह औषधि दी जा सकती है। अगर दिमागी कमजोरी से ग्रस्त रोगी में कमर तथा हाथ-पैरों में जलन होना, रीढ़ की हड्डी़ में जलन होना, पतले दस्त आना, शरीर हर समय टूटा-टूटा सा रहना, चिड़चिडा़पन पैदा हो जाना जैसे लक्षण नजर आते हो तो उस रोगी को पिक्रिकम एसिडम औषधि देने से बहुत ज्यादा लाभ होता है।
विभिन्न लक्षणों में पिक्रिकम एसिडम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के आत्मबल में कमी हो जाती है, काम करने की इच्छा नहीं होती है, मस्तिष्क में कमजोरी महसूस होती है, मन में भ्रम पैदा हो जाता है, रोगी शान्त स्वभाव का हो जाता है, पागलपन जैसी स्थिति उत्पन्न हो जाती है, दिमाग ठीक प्रकार से कार्य नहीं करता है, आत्मशक्ति क्षीण हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्रिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द होता है और ऐसा महसूस होता है कि जैसे सिर किसी पट्टी से बंधा हुआ है। सिर के पिछले भाग में दर्द होता है, अधिक मानसिक कार्य करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। सिर में चक्कर आने लगता है और कानों में कई प्रकार की आवाजें सुनाई पड़ती है। कानों के अन्दर और गर्दन के पीछे फोड़ें हो जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब बहुत लम्बे समय तक मानसिक कार्य करता है तो उसे किसी भी कार्य करने के प्रति असफलता का भय लगा रहता तथा इसके साथ ही मानसिक थकान अधिक हो जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्रिकम एसिडम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों के नेत्रश्लेष्म में सूजन आ जाती है और अधिक मात्रा में गाढ़ा पीले रंग का कफ जैसा पदार्थ आंखों से निकलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्रिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जीभ का स्वाद कड़वा लगता है तथा किसी भी प्रकार का भोजन खाने का मन नहीं करता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्रिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बहुत कम मात्रा में पेशाब आता है और पेशाब बूंद-बूंद करके टपकता रहता है। पेशाब में अधिक मात्रा में ´नील´ बेलनाकार कण मिले होते हैं। गुर्दे में जलन होने के साथ ही अधिक कमजोरी महसूस होती है और काला खून मिला हुआ कम पेशाब होता है। रात के समय में पेशाब का वेग अधिक हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्रिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- अधिक मात्रा में वीर्यपात होता है तथा उसके बाद उदासीनता होने लगती है लेकिन संभोग के सपने नहीं आते हैं। लिंग में दर्द होता है तथा इसके साथ ही उत्तेजना होती है। लिंग में दर्द होने के साथ ही वृषणों (अण्डकोष) और वृषणरज्जु में ऊपर की ओर दर्द होता है। पुरःस्थग्रन्थि का बढ़ जाना जब रोग अपनी अन्तिम अवस्था में न पहुंचा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्रिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के बायें डिम्बाशय में दर्द होता है तथा मासिकस्राव से पहले प्रदर स्राव होता है। योनि पर खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्रिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के रीढ़ की हड्डी पर जलन होती है और इसके साथ ही कमजोरी महसूस होती है। सारा शरीर सुस्त और भारी महसूस होता है, ऐसा विशेषकर अंगों में महसूस होता है और परिश्रम करने के बाद अधिक महसूस होता है। पैर ठण्डे पड़ जाते हैं और गर्म नहीं होते हैं। रोगी के शरीर में तेजी से बढ़ता हुआ लकवा रोग का प्रभाव दिखाई देता है। शरीर के कई अंगों पर छोटे-छोटे दर्द युक्त फोड़ें हो जाते हैं लेकिन कान के पास या कान की बाहरी श्रवणनली पर ये फोड़ें नहीं होते है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए पिक्रिकम एसिडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को तैलीय या चिकनाहट युक्त दस्त आने लगते हैं, शाम के समय में अधिक दस्त आता है, पेशाब से अधिक बदबू आती है तथा इसके साथ ही शरीर में बहुत अधिक कमजोरी महसूस होती है तथा दिमाग ठीक प्रकार से कार्य नहीं करता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्रिकम एसिडम औषधि उपयोग लाभदायक है।
दिमागी कमजोरी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को दिमागी कमजोरी अधिक हो जाती है। रोगी की इच्छा शक्ति बिल्कुल भी नहीं रहती है, किसी प्रकार की गम्भीर चिन्ता या मानसिक परिश्रम करने से रोगी को अधिक कमजोरी महसूस होती है तथा इसके साथ ही अनेकों प्रकार की परेशानियां भी होने लगती है, जैसे- कमर, हाथों तथा पैरों में दर्द होता है, रीढ़ की हड्डी में जलन होती है, पतले दस्त लग जाते हैं, रोगी की तबीयत गिरी हुई महसूस होती है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। किसी भी काम को करने में मन नहीं लगता है, हमेशा लेटे रहने का मन करता है। रोगी को गर्मी बर्दाश्त नहीं होती है सिर की और शारीरिक परेशानियां ठण्डी हवा कम कर देती है। ठण्डी हवा और पानी से नहाने से आराम मिलता है। नये मौसम में रोगी के लक्षणों में वृद्धि होने लगती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्रिकम एसिडम औषधि उपयोग लाभकारी है।
थकावट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को हरकत (हाथ-पैर चलाने) से थोड़ी सी थकावट रहते पूरे लकवा रोग का प्रभाव हो जाता है और सारे शरीर में विशेषकर के हाथ-पैरों में भारीपन और थकावट महसूस होती है, रोगी को लेटे रहने तथा आराम करने की अधिक इच्छा होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए पिक्रिकम एसिडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
अधिक श्रम करने से, विशेषकर मानसिक परिश्रम करने से, पढ़ने से, नींद न आने के बाद, भीगे मौसम में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। यह ग्रीष्मकालीन या गर्म जलवायु की औषधि है, रोगी की परेशानी भी इन्हीं दिनों बढ़ती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
ठण्डी हवा से, ठण्डे जल और दबाव से तथा खुली हवा में घूमने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
बैरा-का, कैन्थ, ग्रेफा, हिपर, काली-फा, मर्क, नैट्र-म्यू, आक्जै-ए, जेल्सी, फास्फो, सिलीका, आर्जेन्टना, जिंक-पिकैटा, फेरम-पिकै तथा कल्के-पिकैटा औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पिक्रिकम एसिडम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पिक्रिकम एसिडम औषधि की छठी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पिलोकार्पस माइक्रोफीलस (Pilocarpus Microphyllus)
पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि ग्रन्थियों के कार्य को उत्तेजित करने वाली एक शक्तिशाली और पसीना लाने वाली सर्वश्रेष्ठ औषधि है। क्षय रोग से पीड़ित रोगियों को रात के समय में पसीना निकलने पर इस औषधि के उपयोग करने से रोग ठीक हो जाता है। यह औषधि अधिक पसीना लाने वाली, पेशी संकीर्णन, लालास्राव तथा मिचली चौंध। नेत्रोत्सेधी गलगण्ड के साथ हित्क्रया और धमनियों में कंपन होना, नाड़ियों से सम्बन्धित रोग, शरीर में कंपन होना, श्वासनलियों में उत्तेजना पैदा होना। इस प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि का उपयोग करना चाहिए। शरीर में अधिक ताप होना, पसीना आना, कर्णमूल ग्रन्थि में जलन होना। इस प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
इस औषधि की एक खुराक की मात्रा लेने के बाद कुछ एक मिनटों में ही चेहरा, कान और गला बुरी तरह लाल हो उठते हैं और सारे शरीर पर पसीने की बून्दें फूट पड़ती हैं तथा इसके साथ ही मुंह में पानी भरने लगता है और लगातार लार का स्राव होने लगता है। इसके उपयोग से आंख, नाक, श्वासनलियों तथा आंतों से भी स्राव होने लगता है।
विभिन्न लक्षणों में पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि का उपयोग-
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- किसी भी कारण से आंखों पर दबाव होना। रोमक पेशी में उत्तेजना होना, थोड़ा सा काम करने पर आंखों का जल्दी ही थक जाना, आंखों से काम लेते समय जलन होना तथा इसके साथ ही आंखों में गर्माहट महसूस होना। सिर में दर्द होता है तथा इसके साथ ही आंखों के नेत्रगोलक में चींसे मचने लगती है। कुछ दूरी पर रखी हुई चीजें धुंधली दिखाई देती हैं, कुछ समय के बाद ही आंखों की दृष्टि धुंधली पड़ जाती है, बिजली या किसी प्रकार की अन्य कृत्रिम रोशनी से आंखों में उत्तेजना होना। किसी भी चीज को देखने के बाद बहुत देर तक चक्षुस्नायुपट पर उस वस्तु का प्रतिबिम्ब बना रहता है। पुतलियां सिकुड़ी हुई रहती है तथा प्रकाश-प्रतिक्रिया नहीं होती है। निकट दृष्टि दोष उत्पन्न हो जाता है तथा रोगी किसी भी वस्तु पर एकटक देखता ही रहता है अर्थात उसे अनिमेष दृष्टि दोष उत्पन्न हो जाता है। आंखों से बहुत ज्यादा काम लेने के बाद चक्कर आने लगता है तथा जी मिचलाने लगता है। आंखों के सामने सफेद धब्बे दिखाई देते हैं। आंखों में चीस मचने के साथ ही दर्द होता है। पलकें फड़कती हैं। शुष्क रंजितपट में सूजन हो जाती है। पढ़ते समय आंखों में समंजन क्रिया नहीं हो पाती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कानों से कम सुनाई देता है तथा अजीब-अजीब सी आवाजें सुनाई देती है। कान में से सीरमी रिसाव होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- जीभ का लार चिपचिपा होता है तथा लार अण्डे की सफेद जर्दी के समान लगता है। मुंह में रूखापन हो जाता है। मुंह से लार निकलने के साथ ही शरीर से अधिक मात्रा में पसीना आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के आमाशय में दर्द होने के साथ ही दबाव महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब कोई चलती हुई वस्तु की ओर देखता है तो उसका जी मिचलाने लगता है और उल्टियां होने लगती है। ऐसे रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि उपयोग लाभदायक है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को दस्त आने के साथ ही पेट में दर्द होता है तथा दिन के समय में चेहरा गर्म महसूस होता है और अधिक पसीना आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पेशाब बहुत कम मात्रा में आता है, जांघ के हडि्डयों के ऊपर दर्द होता है तथा मूत्रवेग अधिक होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय की नाड़ी अनियमित गति से तथा द्विस्पन्दी गति से चलती है। छाती में दबाव महसूस होता है। नीलरोग हो जाता है, निपात तथा हृदय के नाड़ियों पर विकार उत्पन्न हो जाता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- श्वासनलियों की श्लैष्मिक झिल्लियों में जलन होती है। रोगी हर वक्त खांसता रहता है और सांस लेने में परेशानी होती है। फुस्फुस धमनियों में सूजन हो जाती है। फेन के समान थूक निकलता है। अधिक मात्रा में पतला और सीरमी बलगम आता है। रोगी की श्वास गति धीमी और आहें भरने जैसी हो जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि उपयोग लाभकारी है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के सभी भागों से अधिक पसीना आता है। त्वचा शुष्क हो जाती है, सूखा अकौता रोग हो जाता है। ठण्ड लगने के साथ ही पसीना आता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
एमीले-नाइ, एट्रोपी-फाइसिष्ट, लाइको तथा रूटा औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि से कर सकते हैं।
पिलोकार्पिन-म्यूर औषधि की 2x विचूर्ण का उपयोग उन रोगियों के रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है जिनकों कान से सम्बन्धित रोग हो जाता है, चक्कर आते हैं, तेजी से बढ़ता हुआ टी.बी. (क्षयरोग) होता है तथा इसके साथ ही अधिक मात्रा में रक्तस्राव होता है और शरीर से अधिक मात्रा में पसीना आता है। ऐसे ही लक्षणों को पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि भी ठीक कर सकता है। अत: पिलोकार्पिन-म्यूर औषधि के कुछ गुणों की तुलना पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि से कर सकते हैं। एट्रोपीन पिलोकार्पिन औषधि की प्रतिविष है, पिलोकार्पिन औषधि के 1/6 ग्रेन के लिए एट्रीपीन का सौवां ग्रेन।
मात्रा (डोज) :-
पिलोकार्पस माइक्रोफीलस औषधि की 3 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इसके ग्रेन के आठवें से लेकर चौथाई भाग तक इंजेक्शन के रूप में उपयोग कर सकते हैं।
पाइनस सिल्वेस्ट्रिय (Pinus Sylvestris)
पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि का उपयोग पीलिया रोग से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है। रिक्केटग्रस्त बच्चों में अधिक कमजोरी आने टखनों में अधिक कमजोरी महसूस होना तथा इसके साथ ही देरी से चलने की शिकायत को दूर करने के लिए इस औषधि का उपयोग किया जाता है।
कमर से नीचे के अंगों में अधिक कमजोरी महसूस होना, जोड़ों का दर्द, श्वासनलिकाओं से सम्बन्धित रोग और शीतपित्त से सम्बन्धित लक्षणों को दूर करने के लिए पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि का उपयोग किया जाता है।
छाती पतली और टूट जाने जैसा महसूस होना, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि का उपयोग-
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंगों में जकड़न होने के साथ ही हडि्डयों में भी दर्द होता है, दर्द विशेषकर अंगुलियों के हडि्डयों के जोड़ों में होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- छपाकी रोग होना, सारे शरीर पर खुजली होना, हडि्डयों के जोड़ों के आस-पास अधिक खुजली होना, पेट पर खुजली होना तथा नाक पर खुजली मचना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कब्ज की समस्या होना, मासिकधर्म कष्ट के साथ आना, गर्भपात होना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइनस लैम्बर्टिना औषधि का उपयोग करते हैं लेकिन ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि का उपयोग करते हैं। अत: पाइनस लैम्बर्टिना औषधि के कुछ गुणों की तुलना पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि से कर सकते हैं।
मासिकधर्म शुरू होने के समय में कष्ट के साथ स्राव होना। इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए पाइनस लैम्ब औषधि का उपयोग किया जाता है लेकिन ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि का उपयोग किया जाता है। अत: पाइनस लैम्ब औषधि के कुछ गुणों की तुलना पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि से कर सकते हैं।
एबीज-नाइग्रा तथा एबीज-कैना औषधि के कुछ गुणों की तुलना पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पाइनस सिल्वेस्ट्रिय औषधि की मूलार्क से लेकर तीसरी शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पाइपर मेथिस्टिकम (Piper methysticum)
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी अत्यन्त संवेदनशील होता है, उसका मन उदास होता है और अधिक दु:ख महसूस करता है और मन को जब दूसरी ओर लगाता है तो दु:ख कुछ समय के लिए कम हो जाता है, रोगी को स्थिति परिवर्तन करने की बेचैन इच्छा होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइपर मेथिस्टिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मूत्राशय बढ़ा हुआ महसूस होता है और मूत्रत्याग करने के समय में जलन होती है और रोगी को इसके साथ ही सूजाक रोग हो जाता है या अण्डकोष पर गिल्टी सी बन जाती है। मूत्राशय में सूजन आ जाती है। लिंग रोग ग्रस्त हो जाता है और उसमें दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइपर मेथिस्टिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- त्वचा पर पपड़ीदार घाव हो जाता है और पपड़ियां सूखकर छूटने पर सफेद दाग हो जाता हैं। कुष्ठ रोग होना। मीनचर्म रोग होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइपर मेथिस्टिकम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- दाहिनी बांह में दर्द होता है। हाथ में लकवा रोग के लक्षण दिखाई देते हैं। अंगूठे के जोड़ों पर दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइपर मेथिस्टिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
तेल और अन्य उत्पादन कुष्ठ की चिकित्सा में कुछ सीमा तक लाभदायक होते हैं विशेषकर प्रारम्भिक अवस्थाओं में। ऐसे ही लक्षणों में चालमूगरा-टैरैक्टोजेनोस औषधि का उपयोग भी लाभदायक होता है और ठीक इस प्रकार की अवस्थाओं में पाइपर मेथिस्टिकम औषधि का भी उपयोग करते हैं।
लेना और बिक्सा एक दक्षिण अमरीकी पौधा जो चालमोगरा के समान है। ये सफेद दाग, श्लीपद (ऐलेफेन्टीज) तथा छाजन रोग को ठीक कर सकता है तथा इस प्रकार के रोगों को पाइपर मेथिस्टिकम औषधि भी ठीक कर सकता है। अत: इन औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पाइपर मेथिस्टिकम औषधि से कर सकते हैं।
शमन (एमेलिओरेशन. ह्रास) :-
मन को दूसरे विषय में लगाने पर, स्थिति बदलने पर रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पाइपर मेथिस्टिकम औषधि की मूलार्क और निम्न शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पाइपर नाइग्रम (Piper Nigrum)
शरीर में जलन और दबाव महसूस होने पर पाइपर नाइग्रम औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
विभिन्न लक्षणों में पाइपर नाइग्रम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का मन दु:खी रहता है और शरीर में ऐसा लगता है कि शक्ति नहीं है। रोगी किसी एक चीज पर अपने मन को एकाग्र नहीं कर पाता है, हल्का सा शोर होने पर वह चौंक जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइपर नाइग्रम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में तेज दर्द होता है और ऐसा महसूस होता है कि कनपटियों को अन्दर की ओर दबाया जा रहा हो, नाक व चेहरे की हडि्डयों में दबाव महसूस होता है। आंखों में जलन होती है और चेहरा लाल तथा जवलशील हो जाता है, चक्षुगोलकों में फट पड़ने जैसी दर्द होती है, नाक पर खुजली होती है, छीकें आती हैं, नाक से खून बहने लगता है, होंठ सूख जाते हैं और फटने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइपर नाइग्रम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले में जलन होने के साथ ही कच्चापन महसूस होता है। गलतुण्डिकाओं में जलन होती है और दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइपर नाइग्रम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- पेट अधिक फूल जाता है और वायु के कारण पेट में दर्द होता है और अधिक प्यास लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइपर नाइग्रम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सांस लेने में परेशानी होती है, खांसी होने के साथ-साथ छाती के सीमित स्थानों पर दर्द होता है और थूक के साथ खून भी आता है। हृत्स्पन्दन, हृच्छूल, नाड़ी की गति अनियमित होना। स्तन में दूध का स्राव बढ़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइपर नाइग्रम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मूत्राशय और मूत्रमार्ग में जलन होती है, पेशाब करने में परेशानी होती है, मूत्राशय पूरी तरह भरा हुआ महसूस होता है, मूत्रत्याग करने की बार-बार इच्छा होती है पर मूत्रत्याग नहीं होता। लिंग पर दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पाइपर नाइग्रम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मात्रा (डोज) :-
पाइपर नाइग्रम औषधि की निम्न शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पीयूषिका ग्रन्थि (Pituitary Gland)
जननांगों के परिवर्द्धन और विकास पर इस ग्रन्थि का सर्वाधिक नियन्त्रण रहता है, पीयूषिका ग्रन्थि औषधि मांसपेशियों की सक्रियता को उत्तेजित करती है और गर्भाशय की निष्क्रियता को दूर करती है। यह औषधि रक्तस्राव को रोकती है और रक्त के थक्कों का अवशोषण करने में मदद करती है।
पीयूषिका ग्रन्थि औषधि का प्रयोग कई प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए किया जाता है जैसे- गुर्दे की अधिक सूजन, पुरस्थग्रन्थि में जलन होना, चक्कर आना, भ्रम पैदा होना तथा माथे की गहराई तक दर्द होना। प्रसव की द्वितीया अवस्था में गर्भाशय के मुंह की निष्क्रियता बढ़ाने में इस औषधि की तीसवीं शक्ति का प्रयोग करने से अधिक लाभ मिलता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
पीयूषिका ग्रन्थि औषधि की क्रिया जरायु पर अधिक होती है तथा प्रसव के समय में इससे बहुत अधिक लाभ मिलता है अथवा प्रसव होने के बाद रक्तस्राव को रोकने के लिए इस औषधि का उपयोग लाभदायक होता है। प्रसव की पीड़ा को उत्तेजित करने के लिए निकासकाल के समय सी.सी.एम. की मात्रा इंजेक्शन के रूप में दी जाती है। इसकी 15 बूंदों को एक पूरी इंजेक्शन की मात्रा माना जाता है। हृदय के पेशियों में सूजन होना, धमनी में तनाव होना, गुर्दे में जलन होना। इस प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए इस औषधि का उपयोग किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
पीयूषिका ग्रन्थि औषधि की मूलार्क की तीसवीं शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। उच्च रक्तचाप के रोग में इस औषधि की 10 बूंदें भोजन करने के बाद लेना चाहिए।
प्राइमुला आब्कोनिया (Primula Obconica)
प्राइमरोज एक प्रकार का पौधा होता है। प्राइमरोज-विष इसके ग्रन्थिल केशों में उत्पन्न होता है, जो अनायास टूट जाते हैं और उनसे उपदाहजनक रसक्षरण होता है जो त्वचा के अंदर चला जाता है।
विभिन्न लक्षणों में प्राइमुला आब्कोनिका औषधि का उपयोग-
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- तर अकौता रोग। ठोड़ी पर पिटकीय घाव होना। रात के समय में चेहरे पर जलन होना। शीतपित्त घाव होना। पलकें सूजी हुई रहती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राइमुला आब्कोनिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- कलाइयों, भुजाओं, बाहों तथा हाथों पर अकौता रोग होना, पिटकीय एवं त्वचा छील देने वाला। कंधों के चारों ओर की जोड़ों पर दर्द होना, हथेलियां शुष्क और गरम होना, संधियों व उंगलियों में कड़कड़ाहट होना, उंगलियों के बीच में घाव होना, हाथों के पीछे बैंगनी धब्बे होना तथा हथेलियों कठोर होना, उंगलियों पर फफोले होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राइमुला आब्कोनिका औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- त्वचा पर अधिक खुजली होना, रात के समय में अधिक खुजली होना, त्वचा पर छोटी-छोटी लाल सूजी हुई फुंसियां होना, सूजन वाले स्थान पर छोटी-छोटी पिटिकायें हो जाती है। चर्म रोग के लक्षणों के साथ ही बुखार से सम्बन्धित लक्षण भी हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राइमुला आब्कोनिका औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
रस, फैगोपाइरम, ह्ममिया एलीगैन्स, चर्मोपसगों की समानता औषधि यों के कुछ गुणों की तुलना प्राइमुला आब्कोनिका औषधि से कर सकते हैं।
प्राइमुला वेरिस (Primula Veris)
मस्तिष्क में रक्त का जमाव होने के कारण मस्तिष्क के नाड़ियों में दर्द होना तथा आधे सिर में दर्द होना, जोड़ों का दर्द और गठिया दर्द को ठीक करने के लिए प्राइमुला वेरिस औषधि का उपयोग किया जाता है।
विभिन्न लक्षणों में प्राइमुला वेरिस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सिर के चारों ओर एक पट्टी बंधने जैसी अनुभूति होती है, टोपी पहनने में मुश्किल होती है। माथे पर की त्वचा तनी हुई रहती है, खड़े होने के समय में गिरने का डर लगा रहता है, तेज चक्कर आता है और ऐसा महसूस होता है कि जैसे सारी चीजें घूम रही हों, कानों में आवाज होती है तथा खुली हवा में ऐसा कम होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- खांसी होने के साथ ही श्वासनली में जलन और चुभन होती है, गले की आवाजे हल्की निकलती है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब से बनफ्शे की बदबू आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राइमुला वेरिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- दाहिने बगल की पेशियों में दर्द होता है, अंगों में भारीपन और आलस महसूस होता है तथा इसके साथ ही कंधों में अधिक भारीपन महसूस होता है। दाहिने हाथ के गड्ढे में जलन होती है। हाथों व पैरों के अंगूठों में खिंचाव होने के साथ ही दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राइमुला वेरिस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- शरीर में कमजोरी महसूस होने के साथ ही दस्त आना तथा बच्चे के हैजा रोग को ठीक करने के लिए साइक्ला, रैननकु या ईनोथेरा औषधियों का प्रयोग किया जाता है। ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राइमुला वेरिस औषधि का भी उपयोग कर सकते है। अत: इन औषधियों के कुछ गुणों की तुलना प्राइमुला वेरिस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :- प्राइमुला वेरिस औषधि का 3 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
प्रौपिलैमिन-ट्राइमेथिलैमिनम (Propylamin-Trimethylaminum)
जोड़ों के दर्द को ठीक करने के लिए प्रौपिलैमिन-ट्राइमेथिलैमिनम औषधि का प्रयोग किया जाता है। ज्वर आने के साथ ही अधिक शरीर में दर्द होना और अधिक परेशानी होने पर इस औषधि से उपचार करने पर रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है तथा यह दर्द को एक-दो दिन में घटा देती है।
विभिन्न लक्षणों में प्रौपिलैमिन-ट्राइमेथिलैमिनम औषधि का उपयोग-
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- कलाइयों व टखनों में दर्द होना तथा अत्यधिक गति करने से दर्द में वृद्धि होना, अधिक बेचैनी होने के साथ ही प्यास लगना। जोड़ों में दर्द होना तथा रोगी अगर उंगलियों में सुई पकड़ने पर सुई बहुत भारी महसूस होती है। उंगलियों में सुन्नपन और चुनचुनी होना। कलाई और टखनों में दर्द होना और खड़ा होने में असमर्थ होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्रौपिलैमिन-ट्राइमेथिलैमिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
चेनोपोडियम वुल्वैरिया औषधि के कुछ गुणों की तुलना प्रौपिलैमिन-ट्राइमेथिलैमिनम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
प्रौपिलैमिन-ट्राइमेथिलैमिनम औषधि की करीब छ: औंस पानी में मिलाकर इसके मूलार्क की दस से लेकर पन्द्रह बून्दें, हर दूसरे घंटे में चाय के चम्मच के बराबर की मात्रा का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
टीलिया (Ptelea)
टीलिया औषधि का उपयोग आमाशय व जिगर से सम्बन्धित रोगों को ठीक करने के लिए बहुत लाभदायक है। यकृत के भाग में भारीपन महसूस होना तथा इसके साथ ही दर्द होना, यह दर्द बाईं करवट लेटने पर बहुत अधिक बढ़ जाता है। दमा रोग को ठीक करने के लिए भी इस औषधि का उपयोग किया जा सकता है।
चिकित्सा के क्षेत्र मे टीलिया औषधि का उपयोग बहुत कम होता है, लेकिन फिर भी यह विशेष लक्षणों में अक्सर बड़ा लाभदायक पाया गया है। पुरानी लीवर दोष, दस्त, पेट में दर्द होना, मन्दाग्नि, अजीर्ण रोग तथा कब्ज आदि पेट की शिकायतों में यह औषधि ठीक कर देती है।
विभिन्न लक्षणों में टीलिया औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी भ्रम में पड़ा रहता है और ऐसा महसूस होता है कि उसका सिर ठीक प्रकार से कार्य नहीं कर रहा है। माथे से लेकर नाक की जड़ तक दर्द होता है और नाक के बाहर की ओर दबाव होने के साथ ही दर्द होता है। माथे पर दर्द होता है और शौरयुक्त माहौल में, गति करने से, रात को आंखें मसलने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इसके साथ ही अम्लता हो जाती है। रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कनपटियों में दर्द हो रहा है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए टीलिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह से अधिक लाल रंग का स्राव होता है तथा इसके साथ ही जीभ सूखा और कड़वा स्वाद वाला हो जाता है। जीभ पर सफेद या पीला लेप जम जाता है, जीभ खुरदरी, सूखी महसूस होती है। जीभ कांटेदार और लाल हो जाती है। जीभ पर कत्थई-पीले रंग का लेप चढ़ा रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए टीलिया औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- आमाशय में भारीपन महसूस होने के साथ ही पूर्णता होना। पाचनतन्त्र में मरोड़ होने के साथ ही मुंह सूखा रहता है। डकारें आती रहती है तथा इसके साथ ही जी मिचलाता है और उल्टी आती है। आमाशय के अन्दर जख्म हो जाता है तथा इसमें गर्माहट महसूस होने के साथ ही जलन भी होती है। भोजन करने के बाद आमाशय में खालीपन महसूस होता है। रोगी में आमाशय और यकृत से सम्बन्धित लक्षण होने के साथ ही कई अंगों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए टीलिया औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
लीवर से सम्बन्धित लक्षण :- लीवर में हल्का-हल्का दर्द होता है, दाहिनी तरफ लेटने से आराम मिलता है, लीवर में छूरी से काटता हुआ दर्द होता है, गहरी सांस लेने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए टीलिया औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट के दाहिने भाग में अधिक भारीपन महसूस होता है तथा इसके साथ ही दर्द भी होता है, पेट में दर्द भी होता है। रोगी को खट्टी चीजें खाने की इच्छा होती है। रोगी मक्खन और चर्बीदार चीजें पसन्द नहीं करता है। खाना खाने के बाद और सुबह के समय में लिवर तथा पेट की परेशानी बढ़ जाती है। दाहिनी ओर लेटने पर आराम मिलता है। यकृत में दर्द होता है तथा इसके साथ ही सूजन भी हो जाती है, दबाव महसूस होता है और दर्द असहनीय हो जाता है। रोगी को ऐसा महसूस होता है कि पेट अन्दर की ओर धंसा जा रहा है। खट्टी डंकारे आती हैं, कडुआ पित्त चढ़ने के कारण जी मिचलाता है और ऊपर के पट में जलन होती है और ऐसा महसूस होता है कि पेट पर पत्थर रखा हुआ है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए टीलिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब पीठ के बल लेटता है तो उसके फेफड़ें पर दबाव महसूस होता है और सांस लेने में परेशानी होती है। दमा रोग होने के साथ ही सांस लेने में परेशानी होना तथा हृदय में ऐंठन होने के साथ ही दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए टीलिया औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का नींद अस्थिर होता है तथा इसके साथ ही भीतिजनक (डरावने) सपने आते हैं और दु:ख भरे सपने आते हैं, जागने पर शरीर थका-थका रहता है तथा शरीर की स्फूर्ति खत्म हो जाती है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
हरकत करने से, गर्म कमरे में रहने से, खाना खाने के बाद, बाईं करवट लेटने पर तथा सुबह के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
खुली हवा में रहने से लीवर का दर्द कम होता है तथा दाहिनी तरफ लेटने से, खट्टे पदार्थो को खाने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
मैग्नी, नक्स, चेलिडो तथा मर्क्यू औषधियों के कुछ गुणों की तुलना टीलिया औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
टीलिया औषधि की 1 से 30 शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पिक्स लिक्वीडा (Pix Liquida)
पिक्स लिक्वीडा औषधि की प्रमुख क्रिया विभिन्न श्लैष्मिक झिल्लियों पर होती है और यह खांसी को ठीक करने की अच्छी औषधि है। चर्म रोग के लक्षणों को भी यह औषधि जल्दी ही ठीक कर देती है।
इंफ्लुएंजा रोग होने के बाद श्वासनलियों में उत्तेजना उत्पन्न होने पर रोग को ठीक करने के लिए पिक्स लिक्वीडा औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
विभिन्न लक्षणों में पिक्स लिक्वीडा औषधि का उपयोग-
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- बांई ओर के तृतीय पंजर व उसकी उपास्थि की हडि्डयों के जोड़ों में एक सीमित स्थान पर दर्द होता है। फेंफड़ों में कर्कश ध्वनियां और बलगम के साथ खून आता है इसमें से बदबू आती है, इसका स्वाद बुरा सा लगता है। श्वास नलियों का पुराना सूजन। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्स लिक्वीडा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- त्वचा कई जगह से फट जाती है तथा उसमें खुजली मचती है और खुजलाने पर उसमें से खून बहने लगता है, हाथों के पीछे की त्वचा पर फोड़ें-फुंसियां होना, पपड़ीदार घाव होना, त्वचा पर अधिक खुजली होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्स लिक्वीडा औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- काले तरल पदार्थो की लगातार उल्टी होना और इसके साथ ही आमाशय में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पिक्स लिक्वीडा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
पाइनस, कार्बोलि ए, टेरीबिन्थ तथा यूपिमन औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पिक्स लिक्वीडा औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पिक्स लिक्वीडा औषधि की पहली शक्ति से छठी शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
प्लैण्टेगो मेजर (Plantago Major)
प्लैण्टेगों मेजर औषधि दांत दर्द तथा कान से सम्बन्धित रोगों को ठीक करने के लिए उपयोग किया जाता है। तम्बाकू खाने के कारण उत्पन्न रोग की अवस्था और चेहरे के नाड़ियों में दर्द होने पर इस औषधि से लाभ मिलता है।
विभिन्न लक्षणों में प्लैण्टेगों मेजर औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सुबह के समय में सिर में दर्द होता है और सुबह सात बजे से दोपहर दो बजे तक रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है तथा इसके साथ ही आंखों से आंसू बहता है, आंखें चौंधियाने लगती है, दर्द का असर कनपटियों और निचले जबड़े तक फैल जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैण्टेगों मेजर औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सुनने की शक्ति तेज हो जाती है और शोर युक्त माहौल में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, कानों में चुभन जैसा दर्द होता है, कान की नाड़ियों में दर्द होना, दर्द का असर सिर से होता हुआ एक कान से दूसरे कान तक फैल जाता है तथा इसके साथ ही दांत में भी दर्द होता है। उच्च शब्द की आवाजें एक कान से होती हुई दूसरे कान तक जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैण्टेगों मेजर औषधि का प्रयोग करना चाहिए। रोगी के कानों में चुभने जैसा दर्द होता है और दर्द का असर सिर से होता हुआ एक कान से दूसरे कान तक फैल जाता है, शोर युक्त जगह पर जाने से रोगी को और भी परेशानी होती है, कानों में कट-कट की आवाजें सुनाई देती है तथा दर्द होता है ऐसी स्थिति में इस औषधि का मूलार्क की दो से चार बूंद कान में डालने से आराम मिलता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- अचानक ही नाक से पीला पानी जैसा स्राव होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैण्टेगों मेजर औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को मलत्याग करने की इच्छा बहुत अधिक होती है, रोगी बार-बार पेशाब करने जाता है पर पेशाब होता नहीं है। बवासीर के रोग से पीड़ित रोगी की दशा अधिक गम्भीर हो गई हो और रोगी ठीक प्रकार से खड़ा भी नहीं हो पा रहा हो। रोगी को दस्त आने के साथ ही बादामी रंग का पानी के समान मल आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैण्टेगों मेजर औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- अधिक मात्रा में पेशाब आता है तथा रोगी बिस्तर पर सोते हुए पेशाब कर देता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए प्लैण्टेगों मेजर औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- त्वचा पर छोटी-छोटी फुंसियां हो जाती है तथा इसके साथ ही खुजली होती है तथा जलन भी होती है। छपाकी रोग हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैण्टेगों मेजर औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
ठण्डी हवा में, छूने से, गर्म चीजों से, ठण्डे पेय पदार्थो से, सुबह के सात बजे से दोपहर दो बजे तक, रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
भोजन करते समय तथा चबाते समय रोग के लक्षण नष्ट होते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
बेल, चायना, फेरम-फा, जेल्स, हिपर, कमो, पल्सा तथा काल्मिया औषधियों के कुछ गुणों की तुलना प्लैण्टेगों मेजर औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (रिलेशन) :-
प्लैण्टेगों मेजर औषधि की मूलार्क और निम्न शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
प्लैटेनस ऑक्सिडेन्टैलिस (Platanus Occidentalis)
आंखों के पास की फुंसियों को ठीक करने के लिए प्लैटेनस ऑक्सिडेन्टैलिस औषधि का उपयोग किया जाता है लेकिन इस रोग को ठीक करने के लिए इस औषधि के मूलार्क का प्रयोग करना चाहिए। दोनों दशाओं में जहां ऊतक नष्ट हो गये हों और घाव होने के कारण पलकों की आकृति नष्ट हो गई हो, वहां यह पलकों को स्वाभाविक आकृति प्रदान करती है। बच्चों में इसकी सर्वोत्तम क्रिया होती है। कुछ दिनों तक इसका उपयोग करते रहना चाहिए तभी इसका पूरा लाभ मिलेगा।
प्लाटिकम मेटालिकम Platinum metallicum
प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का उपयोग अधिकतर स्त्रियों के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है। हिस्टीरिया रोग से पीड़ित स्त्रियों में बेहोशी के लक्षण हो तथा अधिक कमजोरी हो तो ऐसी स्त्रियों का उपचार करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए। ऐसी स्त्रियों में बेहोशी के लक्षण तो होते हैं लेकिन मानसिक रूप से वे पूरी चेतना में रहती है। रोगी स्त्री के मन में किसी को मार डालने या हत्या कर देने के विचार आते रहते हैं। रोगी स्त्री भावावेश में दूसरों को तुच्छ समझती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी स्त्री के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
जस्ता के उपयोग के कारण उत्पन्न शरीर में विष का प्रभाव तथा विशेषकर उन व्यक्तियों को जो जस्ते की खान में या जस्ते के कारखाने में काम करते है। उनके शरीर में इस विष के प्रभाव को नष्ट करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग कर सकते हैं।
हरित्पाण्डु रोग, परनीसियस एनीमिया तथा मिरगी रोग को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का उपयोग किया जाता है।
विभिन्न लक्षणों में प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शारीरिक और मानसिक विकारों में परिवर्तन होता रहता है, मृत्यु हो जायेगी ऐसा भय लगा रहता है, आत्मबल खत्म हो जाता है तथा आंखों से आंसू निकलता रहता है, रोगी स्त्री ऐसा सोचती है कि वह पागल होकर मर जाऐगी, वह बीती यादों से परेशान रहती है, भूतकाल की चिन्ताएं सताती रहती है, कभी रोगी स्त्री खुशी से फूली नहीं समाती और कभी दु:ख के सागर में डूब जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी स्त्री के रोग लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नकसीर फूटती है अर्थात नाक से खून बहने लगता है और खून गहरे रंग का काला होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी स्त्री के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
हाथ-पैरों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के हाथ-पैरों में ऐसा तनाव रहता है कि जैसे पट्टी बंधी हो, आराम करते समय हाथ-पैरों में कमजोरी और थकान महसूस होती है। इस प्रकार के हाथ-पैरों से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में धीरे-धीरे बढ़ता हुआ दर्द होता है तथा वह धीरे-धीरे घटता भी है, ठोड़ी के बायीं तरफ ऐंठन होने के साथ ही दर्द होना और सुन्नपन होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- राक्षसों की तरह भूख लगना, कब्ज की शिकायत रहना, आंतों का ठीक प्रकार से कार्य न कर पाने के कारण से कब्ज की शिकायत रहना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंग सुन्न पड़ जाते हैं और उनमें अकड़न होने लगती है और ऐसा लगता है कि वे ठण्डे पड़ गए हैं, दर्द सिकुडन के साथ होती है और ऐसा लगता है कि दर्द खरोंच लगने के कारण हुई हैं। दर्द धीरे-धीरे शुरू होकर बढ़ती है और धीरे-धीरे घटती हुई शान्त हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। रोगी को शरीर के अंग हर दिशा में बढ़ता हुआ महसूस होता है, उसे भ्रम अधिक होता है, ऐसा लगता है कि हाथ लम्बा हो गया है या पैर लम्बा हो गया है या फिर शरीर का कोई दूसरा अंग लम्बा हो रहा है तथा बढ़ रहा है। जरा सी बात पर स्त्री रोगी उदास हो जाती है और जरा सी बात पर वह खुश हो जाती है, जीवन से निराशा होने लगती है, स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है तथा मृत्यु का भय लगने लगता है। वह हर बात में उपदेश देने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी स्त्री के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। हर बार मासिकधर्म शुरू होने पर शरीर में ऐंठन होती है और बेहोशी की समस्या उत्पन्न हो जाती है जिसके कारण रोगी रोने, चीखने-चिल्लाने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी स्त्री के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। शरीर के कई अंगों में ऐंठन होने के साथ ही भारीपन महसूस होता है। कई अंगों में कुचलन महसूस होने के साथ ही सिर में दर्द होता है जो दबाने पर सिर या सिर को पीछे की ओर मोड़ने पर बढ़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। शरीर पीला हो जाता है तथा इसके साथ ही शरीर में उदासीपन आ जाती है और पूरे शरीर में थकान रहती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के हृदय में सुन्नपन महसूस होता है तथा इसके साथ ही कंपन भी होता है तथा धड़कने कंपन के साथ गति करती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब अपमानित होता है या डर जाता है या जब क्रोध आता है तो रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि उपयोग लाभदायक है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखें ठण्डी है ऐसा महसूस होता है, नज़र में पड़ने वाली सभी चीजें अपनी वास्तविक आकार से छोटी दिखाई पड़ती है। चक्षुगोलकों में ऐंठन के साथ दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- बार-बार मलत्याग करने का प्रयास करते रहना लेकिन मलत्याग कर सकने में असफल रहना। गुदाद्वार में गुठली जैसा चिपकने वाला लिसलिसा मल भरा रहना। यात्रियों और प्रवासियों को कब्ज की शिकायत होना। मल ऐसा जला हुआ होना जैसे काला खुरखुरा मल है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
गर्भाशय से सम्बन्धित लक्षण :- गर्भाशय के बढ़ जाने पर उपचार करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकस्राव अधिक मात्रा में आता है और स्राव का रक्त गाढ़ा और गहरे रंग का होता है जिसके साथ भीतर से सर्दी, कंपकपी और योनिपथ में संवेदनशीलता रहती है। समय से पहले संभोग करने की इच्छा होना। विशेषकर कुवांरी लड़कियों में अधिक संभोग की उत्तेजना होती है, योनि में पागल कर देने वाली सुरसुराहट, चुनचुनाहट होती है जिसके साथ अधिक संभोग क्रिया करने की इच्छा होती है और इसके साथ ही व्याकुलता होती है और हृदय में कंपन होने के साथ ही नाड़ियां चलती हैं। गुप्तांग अधिक ठण्डे हो जाते हैं तथा इसे छूने पर दर्द असहनीय होता है यहां तक कि कपड़ा छू जाने पर भी सहन नहीं होता, इसलिए स्त्री रोगी चड्ढी (पेण्टी) नहीं पहनती है। माहवारी समय से बहुत पहले आ जाती है और अधिक मात्रा में रक्तस्राव होता है। पीठ के छोटे स्थान पर दर्द होता है तथा इसके साथ ही पेट पर दबाव महसूस होता है और लगता है कि मासिकस्राव हो जाएगा लेकिन मासिकस्राव होता नहीं। मासिकस्राव का रुक जाना। माहवारी अनियमित होती है। रक्त शुरू में काला, थक्का-थक्का फिर पतला आता है। रक्त की मात्रा कभी घटी हुई होती है और कभी बढ़ी हुई होती है। योनि छूना या छुआ जाना सहन नहीं होता है, पेट पर नीचे की ओर दबाव होता हुआ दर्द होता है। मासिकस्राव बीस-से पच्चीस दिनों तक बना रहता है। इस प्रकार की अवस्था में रोगी स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि की छठी या तीसवीं शक्तिक्रम का प्रयोग करना चाहिए। दो से तीन महीने में रोगी स्त्री का रोग ठीक हो जाता है। सफेद लसीला प्रदर स्राव होना जो केवल दिन में आता है उसके साथ ही योनि अति संवेदनशील होती है। पेट से नीचे की ओर दर्द होता है तथा इसके साथ ही समय से पहले मासिकस्राव होता है और अधिक मात्रा में गहरे रंग का थक्का-थक्का जैसा जमा हुआ रक्तस्राव होता है। योनि को छूने से दर्द तेज होता है तथा संभोग क्रिया करते समय बेहोशी आ जाती है। योनि में ऐंठन तथा मरोड़ होती है। प्रसव होने के तुरन्त बाद जो स्राव होता है वह बन्द हो जाने के कारण उत्पन्न रोग की स्थिति के कारण प्रलाप होना तथा योनि में खुजली होना। इस प्रकार के स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- सोते समय लिंग में उत्तेजना आ जाती है जिसके कारण संभोग क्रिया के सपने आते हैं और वीर्यपात हो जाता है, हस्तमैथुन करने के कारण उत्पन्न रोग, संभोग क्रिया से नाखुश होना तथा इसके बाद रोगी अपना होशो-हवास खो देता है, रोगी गहरी सांस भरना चाहता है लेकिन छाती पर इतनी कमजोरी महसूस होती है कि गहरी सांस भर नहीं पाता है। जबड़े से सिर में या सिर के ऊपरी भाग में सुन्नपन महसूस होता है तथा इसके साथ ही पुरे शरीर में सिकुड़न महसूस होती है और ऐसा लगता है कि शरीर किसी पट्टी से बंधा हुआ है। चेहरे की दायी तरफ ठण्डक महसूस होती है और रोगी दोनों पैर पूरी तरह से फैलाकर सोना चाहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लाटिकम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
शाम के समय में, आराम करने के बाद, खुली हवा में, मासिकस्राव आने के समय में, लेटे रहने से, क्रोध करने से, उठने पर, खड़े रहने पर, संभोग करते समय रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन. ह्रास) :-
कमरे में रहते समय, टहलते रहने से और हरकत (कोई कार्य करने से) करने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
औरम, ब्राय, ब्यूफो, काल्के-का, कोक, फेरम-फा, ग्रेफा, इग्ने, सीपि, स्टैन, सल्फ, थूजा, वेलेरियन तथा आर्स औषधियों के कुछ गुणों की तुलना प्लाटिकम मेटालिकम औषधि से कर सकते हैं।
क्रियानाशक :-
पल्स, स्प्रिट-ना-ड।
प्लैटीना (Platina)
प्लैटीना औषधि अधिकतर स्त्रियों के रोगों को ठीक करने की औषधि है। लकवा रोग, बेहोशी होना, कई अंग सुन्न पड़ जाना तथा इस प्रकार के लक्षणों के साथ ही रोगी को ठण्ड लगती है। ऐसे रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का उपयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में प्लैटीना औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को हत्या करने की अधिक इच्छा होती है, अपने आप को अन्य व्यक्तियों से श्रेष्ठ समझना और दूसरों के प्रति घृणा होती है। रोगी अत्यधिक अहंकारी, अभिमानी हो जाता है। प्रत्येक विषय के बारे में वह ऊब सा जाता है, प्रत्येक वस्तु परिवर्तित महसूस होती है, मानसिक विकार उत्पन्न हो जाता है जिसका सम्बन्ध मासिकस्राव से जुड़ा रहता है, जैसे-जैसे मानसिक लक्षणों का विकास रोगी में उत्पन्न होता है वैसे-वैसे ही शारीरिक लक्षण कम भी होने लगते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का सिर तना हुआ रहता है और सिर में दबाव होने के साथ दर्द भी होता है, दर्द सिर के एक स्थान पर सीमित रहता है, सिर में निचोड़ने जैसा दर्द होता है, माथे और दाहिनी कनपटी के आस-पास सिकुड़न महसूस होती है। सिर में सुन्नपन होने के साथ ही दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को वस्तुएं स्वाभाविक आकार से छोटी दिखाई पड़ती हैं, पलकें फड़कती रहती है, आंखों में ठण्डक महसूस होती हैं, चक्षुगन्हरों में बांयटेदार दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कान में सुन्नपन महसूस होता है तथा बांयटे पड़ने जैसा दर्द होता है तथा दर्द अचानक होता है और कान में गर्जने तथा गड़गड़ाहट की तरह ध्वनियां सुनाई पड़ती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरे की नाड़ियों में दर्द होता है तथा इसके साथ ही गालों पर सुन्नपन महसूस होता है नाक की जड़ में दर्द होता है जैसे चिमटी से नोची जा रही हो, पूरे दायें चेहरे में ठण्डक महसूस होती है तथा ऐसा लगता है कि चेहरे के दायें भाग में कुछ चल रहा है, दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है और धीरे-धीरे कम होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- पेट अत्यधिक फूल जाता है तथा आमाशय में खमीर होता है। आमाशय में सिकुड़न होती है तथा राक्षसों की तरह भूख लगती है, जी मिचलाने लगता है तथा इसके साथ ही आमाशय में कमजोरी महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में दर्द होता है तथा नाभि के आस-पास के भागों में भी दर्द होता है और दर्द का असर पीठ तक फैल जाता है और इसके साथ ही पेट पर दबाव महसूस होता है और स्त्री रोगी को दर्द ऐसा महसूस होता है जैसे प्रसव के समय दर्द होता है। दर्द का असर गोणिका के अन्दर तक महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को मलत्याग करने में रुकावट होती है तथा मल कम आता है और परेशानी से निकलता है। मल चिकनी मिट्टी की तरह मलद्वार से चिपक जाती है। मल चिटचिटा होता है। यात्रा करने के समय में कब्ज की शिकायत होना जो लगातार खान-पान से बदलता रहता है। मल झुलसा हुआ होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- जननेन्द्रियों में अत्यधिक असहनशीलता होती है, भीतरी और बाहरी भागों में गुदगुदी होती है, डिम्ब ग्रन्थियों की असहनशीलता और जलन होना, मासिकस्राव नियमित समय से पहले होना और अत्यधिक मात्रा में होना, स्राव गाढ़े रंग का थक्केदार होना तथा इसके साथ ही होशों हवास खोना। रोगी स्त्री को ऐसा दर्द होता है कि जैसे प्रसव के समय में दर्द होता है, ठण्ड लगती है। योनिमार्ग को छूने पर बेहोशी उत्पन्न होने लगती है, संभोग की इच्छा होती है, योनि का अधिक विकास होने लगता है, योनि में खुजली होती है, डिम्बाशय में सूजन आ जाती है तथा इसके साथ ही बांझपन की शिकायत हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- जांघों में खिंचाव होता है और ऐसा लगता है जैसे जांघें कसकर लपेट रखे हों, जांघ में सुन्नपन महसूस होता है और थकावट महसूस होती है और लकवा रोग जैसे लक्षण दिखाई देते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी अपने पैरों को दूर फैलाकर सोता है। ऐसे रोग के रोग के इस लक्षण को ठीक करने के लिए प्लैटीना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
बैठने और खड़े होने पर, शाम के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन. ह्रास) :-
चलने पर रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
स्टैनम, वैलेरि, सीपि, रोडियम, प्लैटीनम म्यूरिएटिकम, प्लैटी-म्यूरि-नैट्रो, सेडम एकरे औषधियों के कुछ गुणों की तुलना प्लैटीना औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष :-
पल्सा। पलैटीना सीसा धातु के कुफलों की प्रतिषेधक है।
मात्रा (डोज) :-
प्लैटीना औषधि की 6 शक्ति के विचूर्ण से लेकर तीसवीं शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
प्लैटिनम (Platinum)
प्लैटिनम औषधि स्त्रियों के रोगों को ठीक करने के लिए बहुत उपयोगी है। मानसिक लक्षण पर विशेष ध्यान रखकर प्लैटिनम औषधि का निर्वाचन करना चाहिए। नक्स-वोमिका औषधि जिस कब्ज को दूर नहीं कर पाती है उस कब्ज के रोग को प्लैटिनम औषधि दूर कर सकती है। स्त्री रोगी घमण्डी स्वभाव की होती है और वह किसी की परवाह नहीं करती, सबको हर बात में अपने से छोटा समझती है, वह अपने को हर बात में सब से बड़ा समझती है। वह अपने को बड़े घराने की समझती है, अपने दोस्त और रिश्तेदारों को नीच वंश की समझती और दूसरे से घृणा करती है। स्त्री को इस कदर घमण्ड होता है कि अपने शरीर को भी औरों के शरीर से बड़ा ख्याल करती है। इस प्रकार की हिस्टीरिया रोग से ग्रस्त स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए प्लैटिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कुछ रोगी स्त्री एक पल तो खुश होती है तो थोड़े ही देर के बाद उदास हो जाती है और रोने लगती है, चिड़चिड़ा मिजाज, जिद्दी और बहुत देर तक मुंह फुलाये रहती है, छोटी और बेकार की बातों से नाराज हो जाती है। डर, गुस्सा, अहंकार, गुप्त दुष्कर्म करने से उत्पन्न रोग या किसी प्रकार के मानसिक उपद्रव होने पर प्लैटिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए। रोगी को जीने की इच्छा नहीं होती है लेकिन मृत्यु से भी डर भी लगता है। शारीरिक परेशानियों के अदृश्य हो जाने पर मानसिक रोग पैदा होते हैं और शारीरिक लक्षण उत्पन्न होने पर मानसिक लक्षण लुप्त हो जाते हैं। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए प्लैटिनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
विभिन्न लक्षणों में प्लैटिनम औषधि का उपयोग-
दर्द से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के शरीर में दर्द जिस प्रकार धीरे-धीरे बढ़ता है उसी प्रकार धीरे-धीरे घटता भी है। दर्द के साथ ही वह स्थान सुन्न पड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर दर्द से सम्बन्धित लक्षण :- गर्भाशय से सम्बन्धित रोग से पीड़ित रोगी तथा हिस्टीरिया रोग से ग्रस्त स्त्री को गुस्सा अधिक आता तथा दिमाग या सिर पर, चोटी में दर्द होता है। दिमाग सुन्न पड़ जाता है। दर्द धीरे-धीरे बढ़ता है और धीरे-धीरे घटता है। कनपटी में कीड़े की तरह रेंगती हुई कोई चीज महसूस होती है जोकि नीचे के जबड़े तक फैल जाती है और उस स्थान पर ठण्ड महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटिनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पलकें रह रहकर फड़कती हैं और चीजें असली अवस्था से छोटी दिखाई पड़ती हैं, चीजें बड़ी दिखाई पड़ती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटिनम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के चेहरे के दाहिनी तरफ कुछ रेंगता सा मालूम पड़ता है, वह स्थान सुन्न पड़ जाता है और ठण्डा महसूस होता है, चेहरे के बांयी तरफ से गाल की हड्डी में दर्द होता है और सुन्न पड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटिनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
स्त्रियों में संभोग से सम्बन्धित लक्षण :- अधिकतर कुवारी लड़कियों को संभोग करने की इच्छा अधिक होती है, योनि में तेज खुजली होती है तथा ऐसा लगता है जैसे योनि के अन्दर कोई कीड़ा रेंग रहा हो। गुप्तस्थान इस कदर नाजुक हो जाता है कि कपड़ा तक छू जाने से परेशानियां होने लगती है, योनिद्वार को छूकर देखते समय उसे बेहोशी आ जाती है। इसलिए ऐसी रोगी अपने योनिद्वार की जांच चिकित्सक को नहीं करने देती है। गुप्तस्थान नाजुक होने के कारण पति के साथ संभोग करना असम्भव हो जाता है, संभोग करने के समय में उसे बेहोशी आ जाती है। वह स्त्रियां जिन्हें काम करने की प्रवृति बहुत अधिक होती है, उनका बांझपन प्लैटिना से दूर होता है। ऐसी स्त्रियों के रोग को ठीक करने के लिए प्लैटिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मासिकधर्म (डमदेमे) से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म नियमित समय से बहुत पहले ही आ जाता है और बहुत दिनों तक रहता है, खून ज्यादा आता है तथा बदबूदार रंग स्याही जैसा जमा हुआ होता है, गर्भाशय में दर्द होता है और गर्भाशय लटका हुआ महसूस होता है, गर्भाशय में तेज खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटिनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
कब्ज से सम्बन्धित लक्षण :- सफर करने वालों को कब्ज होना, अन्तड़ियों की जड़ता से कब्ज होना, बार-बार मलत्याग होना, मलद्वार में नर्म चिकनी मिट्टी की तरह का मल चिपका रहना, गर्भावस्था के समय में कब्ज की शिकायत रहना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लैटिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
इग्ने, कैलि-फास, पल्स, सिपि, स्टैनम, वैलेरि, आरम तथा क्रोकस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना प्लैटिनम औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
सोने से पहले, शाम के समय, कमरे के अन्दर, आराम करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन-ह्रास) :-
खुली हवा में कार्य करने से रोग के लक्षण नष्ट होते हैं।
मात्रा (डोज) :-
प्लैटिनम औषधि की छठी से तीसवीं शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
प्लम्बम मेटैलिकम (Plumbum Metallicum)
प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग अनेक प्रकार के लकवा (पक्षाघात) रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है। लकवा रोग से पीड़ित रोगी अधिक चिन्ता तथा भ्रम में होता है, कई बड़े अंगों में कम्पन होने लगती है, बरछी तथा टीस मारता हुआ दर्द होता है, कई अंग दुबले पतले हो जाते हैं, कलाई कमजोर पड़ जाती है। रीढ़ के लकवा से विभिन्न प्रकार के वात रोग उत्पन्न होते हैं। शरीर की जगह-जगह पर मांसपेशियां सूख जाती हैं। लकवा रोग से पीड़ित रोगी को कोई छूता है तो उसे ऐसा लगता है कि उसे कोई मार रहा है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
रोगी रोने तथा चिल्लाने लगता है, वह अपना होशो-हवास खो देता है, रोगी को उच्च रक्तचाप हो जाता है और हृदय की धमनियों में खिंचाव महसूस होता है, पेशियों में सूजन हो जाती है, लकवा जैसे लक्षण हो जाते हैं, ज्यादातर मस्तिष्क के मेरूदण्ड की नाड़ियों के केन्द्र शाखाओं व मेरुदण्ड के भूरे नाड़ियां को रोग ग्रस्त करती है। रीढ़ की हड्डी में दर्द होता है तथा दर्द चुभन सी होती है। गुर्दे में तेज जलन होती है तथा आंखों की दृष्टि कमजोर हो जाती है। पुरानी गठिया का रोग। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
जस्ता की खान या फैक्ट्री में काम करने वालों के पेट में दर्द होना तथा जस्ते के कुप्रभाव के कारण पेट में दर्द होना। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए से सम्बन्धित लक्षण उपयोग लाभदायक है।
विभिन्न लक्षणों में प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का मन निराश होता है, रोगी को ऐसा लगता है कि उसकी कोई हत्या कर देगा, दिमाग की कार्य करने की शक्ति कम हो जाती है जिसके कारण रोगी सोचने में असमर्थ होता है, शब्दों का उच्चारण रोगी ठीक प्रकार से नहीं कर पाता है, भ्रम होता है तथा किसी भी चीजों को देखने में भ्रम होता है, किसी भी चीज के प्रति अरुचि होती है, स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है, मष्तिष्क पर लकवा रोग का प्रभाव पड़ता है तथा जिसके कारण रोगी का दिमाग ठीक प्रकार से कार्य नहीं करता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी रोने तथा चिल्लाने लगता है तथा उसके पेट में दर्द भी होता है, सिर में दर्द होता है तथा इसके साथ ही उसे ऐसा लगता है कि कोई गोला गले से मस्तिष्क की ओर उठा रहा है। बाल अधिक सूख जाते हैं। कान में अजीब-अजीब सी आवाजें सुनाई देती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के नेत्रपटल सिकुड़ जाते हैं, आंखें पीली पड़ जाती हैं, अक्षि-स्नायु में जलन होती है, अन्तरक्षिका से कीचड़ निकलने के साथ ही जलन होती है। अधिमंथ (Glaucoma)। चक्षुस्नायु में जलन होना तथा अक्षि-स्नायु-पट के बीच कांली बिन्दियां के समान की आकृति बनना। अचानक बेहोश होने के बाद आंखों से कुछ दिखाई न देना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का चेहरा फीका होना और मुर्झाया सा लगना और इसके साथ ही चेहरा पीला तथा मोम के जैसा हो जाता है तथा गाल अंन्दर की ओर धंस जाती है। रोगी के चेहरे की त्वचा से तेल जैसा पदार्थ निकलता है तथा चेहरा चकमदार हो जाता है। नाक तथा होंठ की पास की पेशियों में कम्पन होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मसूढ़ों में सूजन होना तथा मसूढ़ों के किनारे पर नीली रेखाऐं दिखाई देना, जीभ पर कम्पन होना और इसके साथ ही जीभ का किनारा लाल हो जाता है, जीभ बाहर नहीं निकल जाता, ऐसा लगता है कि जैसे जीभ पर लकवा मार गया है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- भोजननली और आमाशय में सिकुड़न होने के साथ ही दबाव महसूस होना और इसके साथ ही कसा हुआ महसूस होता है। पाचनतन्त्र में दर्द होना। लगातार उल्टी करने का मन करना। ठोस पदार्थ निगलने में परेशानी होना जिसके कारण ठोस पदार्थ नहीं निगला जा सकता है। रोगी तरल पदार्थों को बिना किसी परेशानी से निगल पाता हैं लेकिन ठोस पदार्थ निगलने पर वह पलटकर दुबारा मुंह में आ जाता है। भूख मर जाता है, तेज प्यास लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में तेज दर्द होना और दर्द का असर पूरे शरीर कें अंगों में फैल जाना, ऐसा लगता है कि पेट किसी डोरी से बंधकर रीढ़ की हड्डी की ओर खींच रही है। दर्द होने के कारण अंगडाई लेने की इच्छा होती है। पेट अन्दर की ओर धंसा जा रहा है ऐसा महसूस होता है। पेट फूलने के साथ ही पेट में तेज दर्द होना। पेट में दर्द होने के कारण रोगी रोने तथा चिल्लाने लगता है, इसके साथ ही उसके शरीर के कई अंगों में भी दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मलांत्र से सम्बन्धित लक्षण :- कब्ज होने के साथ ही रोगी जब मलत्याग करता है तो उसका मल कठोर, गांठदार, काला होता है, रोगी के मलाशय पर दबाव होता है। कब्ज होने के कारण पेट में दर्द होता है और आंतों में खिंचाव आ जाता है। मलाशय में अधिक मल जमा होने के कारण मलत्याग करने में परेशानी होती है, मलाशय की नाड़ियों में दर्द होता है। मलद्वार ऊपर की ओर खिंचा हुआ महसूस होता है तथा इसके साथ ही इसमें सिकुड़न भी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बार-बार पेशाब आता है तथा पेशाब करने में ऐंठन होती है, पेशाब में अन्न जैसा पदार्थ आता है। गुर्दे में लम्बे समय तक जलन होती रहती है और इसके साथ ही पेट में भी तेज दर्द होता है। पेशाब बहुत ही कम आता है। मूत्राशय में ऐंठन होती है। पेशाब बूंद-बूंद करके टपकता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- पूरी तरह से नपुंसक हो जाना तथा इसके साथ ही शरीर अधिक सूखा और कमजोर हो जाता है। पुरुष के शरीर में संभोग क्रिया करने की शक्ति खत्म हो जाती है, अण्डकोष ऊपर की ओर खिंचा हुआ तथा सिकुड़ा हुआ महसूस होता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपस प्लम्बम मेटैलिकम औषधि उपयोग लाभदायक है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्री रोगी की योनि मुझाई हुई रहती है तथा इसके साथ ही योनि ठण्डी महसूस होती है, इसके साथ ही स्त्री को कब्ज की समस्या भी रहती है। स्तन-ग्रन्थियों में कठोरता आ जाती है। योनि और योनिपथ में बहुत अधिक दर्द होता है। स्तनों में सुई जैसी चुभन होती है और जलन होने के साथ ही दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री का गर्भपात हो जाता है तथा स्त्री जम्हाई और अंगड़ाई लेती रहती है। इस प्रकार के स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करे।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय कमजोर हो जाता है, नाड़ी कोमल और ठीक प्रकार से कार्य नहीं करती है, उसके दोनों तरफ कंपन होती है। नाड़ी तार जैसी बारीक हो जाती है और परिसरीय धमनियों में ऐंठन तथा सिकुड़न होती है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- मेरुमज्जा में कठोरता आ जाता है और पीठ पर दर्द होता है तथा पीठ पर दबाव देने से कुछ समय के लिए आराम मिलता है, कमर से नीचे के अंगों में लकवा रोग के लक्षण दिखाई देते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर की त्वचा पीली पड़ जाती है तथा इस पर गहरे-कत्थई रंग के यकृति के धब्बे होते हैं। पीलिया रोग हो जाता है, त्वचा सूखी रहती है, बाहों और टांगों की शिरायें फैलने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के एकल पेशियों में लकवे रोग की तरह के लक्षण दिखाई देते है। रोगी हाथ से कोई भी चीज को उठा नहीं पाता है। अंगों को फैलाना कठिन हो जाता है। पियानों बजाने वाले व्यक्तियों में अत्यधिक परिश्रम करने के कारण पेशियां फैलने लगती है और पेशियों पर लकवा के लक्षण दिखाई देते हैं। जांघ की पेशियों में दर्द होता है जो दौरें के रूप में होता है अर्थात अचानक ही दर्द होता है और अचानक ही दर्द बन्द हो जाता है। चाल लड़खड़ाने लगती है। कलाई लटक जाती है, गुल्फ-पेशियों में ऐंठन होना, अंगों में डंक लगने जैसी और फाड़ती हुआ दर्द होता है, अंगों में चुनचुनी होती है तथा सुन्नपन होने के साथ ही दर्द होता है। शरीर पर लकवा जैसे लक्षण दिखाई देते हैं और पैर सूजे हुए रहते हैं तथा अंगों में दर्द होता है। रात के दायें पैर के अंगूठे में दर्द होता है। अंगों को छूने पर असहनीय दर्द होता है। शरीर की हडि्डयों के जोड़ पर डंक मारने जैसा तथा चीर-फाड़ने जैसा दर्द होता है, कई अंगों में कुचलने जैसा दर्द होता है और लकवा रोग के लक्षण दिखाई देते हैं। बच्चों के लकवा रोग तथा पोलियों का रोग। शरीर के कई अंगों में रात के समय में दर्द बढ़ जाता है और रगड़ने और मालिश करने से दर्द ठीक हो जाता है और पैरों से अधिक पसीना आता है। हडि्डयों में चुनचुनाहट और सुरसुराहट महसूस होती है और कई अंगों में जलन होती है। बेहोश होने के बाद शरीर में लकवा रोग के कई लक्षण दिखाई देना। इस प्रकार के शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
आन्त्र वृद्धि से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में वायु बनने के कारण पेट में दर्द होना और मल की उल्टी होने के साथ ही आंतों में गांठ पड़ जाना। आंतों का आपस में उलझ जाना और मल की उल्टी होना, पेट में तेज दर्द होना। आंतों को ढकने वाली झिल्ली में जलन होती है जिसके कारण पेट के बड़े से भाग में सूजन आ जाती है जो झुद्रांत और उपांत्र प्रदेश में होती है, क्षुद्रांत में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
गुर्दे की बीमारी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर में सूजन आ जाती है और पेशाब करने में परेशानियां होती है, पेशाब बूंद-बूंद करके टपकता है, खून मिला हुआ पेशाब आता है, मूत्र नली में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। गुर्दे के बीमारी से पीड़ित स्त्री ख्याल करती है कि गर्भाशय में बच्चे के रहने के लिए स्थान बहुत कम है, गर्भाशय फैलता नहीं है, जिससे गर्भपात हो जाने की शंका होती है।
मिर्गी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के हाथ-पैरों में ऐंठन होने लगती है तथा सिकुड़न होती है। हाथ-पैरों में ऐंठन होने के साथ जकड़न होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मलेरिया से सम्बन्धित लक्षण :- मलेरिया होने के साथ ही सूखी खांसी आना, त्वचा सूखी और पीली हो जाती है और यकृत में विकार उत्पन्न हो जाता है जिसके कारण से त्वचा पीली पड़ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
पीलिया से सम्बन्धित लक्षण :- पीलिया रोग होने के साथ ही रोगी के आंखों की चुक्षुश्वेत पटल तथा उसके आसपास की त्वचा और नल-मूक्ष आदि सभी गहरे पीले रंग के हो जाते हैं, मानसिक सन्तुलन ठीक नहीं रहता है, समझने की शक्ति कम हो जाती है, कोई भी विषय देर से समझ आता है, स्मरणशक्ति खत्म हो जाती है, बात करते समय सही और अनुकूल शब्द याद नहीं आता है, रोगी शंका ग्रस्त रहता है और उसे ऐसा लगता है कि उसकी कोई हत्या कर देगा, वह भयभीत हो जाता है, कभी-कभी कई प्रकार की आवाजें सुनाई देती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के प्लम्बम मेटैलिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
बिस्तर पर लेटने से, रात के समय में तथा द्रव्य पदार्थ पीने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
शरीर को रगड़ने और जोर से दबाने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
नक्स-वोम्, सल्फ-एसिड, जिंक औषधियों के कुछ गुणों की तुलना से सम्बन्धित लक्षण से कर सकते हैं।
प्रतिविष :-
प्लैटीना, पेट्रोलि तथा एलूमि औषधियों का उपयोग प्लम्बम मेटैलिकम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
प्लम्बम मेटैलिकम औषधि की 3 से 30 शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पोडोफाइलम (Podophyllum)
पोडोफाइलम औषधि पित्तप्रधान प्रकृति वाले व्यक्तियों के लिए लाभदायक होती है। यह औषधि प्रमुख रूप से ग्रहणी, छोटी आंतों, यकृत और मलांत्र को रोगग्रस्त करती है। पोडोफाइलम औषधि की क्रिया पाचनतन्त्र के सूजन पर भी होती है जिसके फलस्वरूप दर्द होता है और उल्टी आती है ओर सूजन ठीक हो जाता है।
पोडोफाइलम औषधि का प्रयोग कई प्रकार के लक्षणों के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है जो इस प्रकार हैं- मल पानी जैसा होना तथा इसके साथ ही लप्सी जैसा श्लेष्मा आना तथा इसके साथ ही पेट में दर्द होना। मल से अधिक बदबू आती है। गर्भावस्था के समय में होने वाले अनेकों रोग, प्रसव के समय में पेट का झूलना, गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली का छिलना। हैजा रोग होना तथा इसके साथ ही पेट में दर्द होना। यकृत का ठीक प्रकार से कार्य न करना, यकृत-शिरा में अत्यधिक खून का जमा होना तथा इसके साथ खूनी बवासीर होता है, पाचनतन्त्र में दर्द होना, पीलिया रोग। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोडोफाइलम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में पोडोफाइलम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- खट्टे फलों को खाने के कारण रोगी अधिक बोलता है तथा रोता ओर चिल्लाता रहता है। मानसिक सन्तुलन ठीक नहीं रहता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को चक्कर आता है तथा इसके साथ ही आगे की ओर गिरता है, सिर में हल्का-हल्का दर्द होता है, दबाव महसूस होता है और चेहरा गर्म हो जाता है, जीभ का स्वाद कड़वा हो जाता है और अतिसार (दस्त) भी आ जाता है। रोग व्यक्ति सिर को एक ओर से दूसरी ओर लुढ़काता रहता है, इसके साथ ही कराहना तथा उल्टी आती है, पलकें आधी खुली रहती है। नींद के समय में बच्चे के सिर से पसीना आता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोडोफाइलम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी रात के समय में दांत को पीसता रहता है, मसूढ़ों को जोरों से दबाने की अधिक इच्छा होती है। बच्चे के दांत निकलने में परेशानी होती है, जीभ चौड़ी, बड़ी और ठण्डी रहती है। मुंह से बदबू आती है तथा जीभ का स्वाद पीब जैसा हो जाता है। जीभ पर जलन होती है। रोगी को हिचकी और उल्टी आने के साथ ही दस्त होता है जिसके बाद पेट में या गुदा में अत्यधिक कमजोरी महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोडोफाइलम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- गर्म, खट्टी डकारें आती है तथा जी भी मिचलाता है और उल्टी आती है। प्यास अधिक मात्रा में लगती है। गर्म तथा फेन कफ के समान उल्टी होती है। हृदय में जलन होती है तथा इसके साथ ही उल्टियां आती है और उबकाई भी आती है। बच्चे को दूध की उल्टियां होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोडोफाइलम औषधि का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना लाभदायक होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का पेट फूला रहता है तथा पेट में खालीपन महसूस होता है और पेट में गर्मी भी महसूस होती है। रोगी को कमजोरी अधिक महसूस होती है तथा इसके साथ ही ऐसा लगता है कि जैसे पेट अन्दर की ओर धंसा जा रहा है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी केवल आमाशय के बल ही आराम से सो पाता है। यकृत प्रदेश दर्दनाक, रोगग्रस्त अंश को मलने से आराम मिलता है। आरोही वृहदान्त्र में गड़गड़ाहट होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोडोफाइलम औषधि का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना उचित होता है।
मलाशय से सम्बन्धित लक्षण :- बच्चे को हैजा हो जाता है और अवस्था अधिक गम्भीर हो जाती है। अधिक लम्बे समय तक दस्त रहता है और सुबह के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। जब बच्चे का दांत निकलने का समय होता है तो दांत निकलने वाली जगह पर गर्मी महसूस होती है, खट्टे फल खाने के बाद गरमी के सीजन में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। सुबह के समय में दस्त हो जाता है और पेट में गड़गड़ाहट होती है तथा इसके साथ ही पेट में दर्द भी होता है, जब शरीर के अन्दर खून जमा होने लगता है या शरीर के आन्तरिक भाग में घाव हो जाता है जिसके कारण हरा, पानी जैसा और बदबूदार मल होता है और मल का वेग तेज होता है। मलत्याग करने से पहले या मलत्याग करने के समय में मलांत्र में फटने जैसा दर्द होता है। रोगी को कब्ज की समस्या होने के कारण अधिक परेशानी होती है, मल मिट्टी के रंग का होता है तथा कड़ा-सूखा होता है ओर मलत्याग करने में अधिक कष्ट होता है। कब्ज होने के साथ ही अतिसार (दस्त) भी हो जाता है तथा रोगी अपने लीवर को बार-बार रगड़ता तथा हिलाता रहता है। बवासीर होना। मलत्याग करते समय या उससे पहले मलद्वार बाहर निकल पड़ता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोडोफाइलम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- गर्भाशय और दाईं डिम्बग्रन्थि में दर्द होता है तथा इसके साथ ही आरोही वृहदान्त्र में चलती-फिरती आवाजें सुनाई देती है तथा इसके साथ ही छाती पर ऐंठन होती है। गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली छिल जाती है और ऐसा अधिकतर प्रसव के बाद होता है। बवासीर हो जाता है तथा इसके साथ ही गर्भकाल के समय में गुदाद्वार छील जाती है। अधिक बोझ उठाने या पेट में ऐंठन होने से गर्भाशय अपने स्थान से हट जाता है और गर्भकाल के समय में अधिक ऐसा होता है। हलक की दाहिनी तरफ डिम्भाशय, दाहिनी कोख में रोग उत्पन्न हो जाता है और दाहिनी डिम्भाशय सुन्न पड़ जाता है, दर्द जांघ तक फैल जाता है। कोई भारी चीजों को उठाने से गर्भाशय बाहर निकल पड़ता है या कब्ज होने के साथ ही प्रसव होने के बाद गर्भाशय बाहर निकल जाता है या जरायु अपनी स्थान से हट जाती है। जब रोगी स्त्री गर्भावस्था की पहली अवस्था में पेट के बल लेटता है तो उसे आराम मिलता है। मासिकधर्म बन्द हो जाना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोडोफाइलम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- कंधों के बीच में, दायें स्कंधफलक के नीचे, नितम्बों और कमर पर दर्द होता है। दायें छाती पर दर्द होता है, भीतरी जांघ में होकर घुटते तक तेज दर्द होता है। बाईं ओर के शरीर के अंगों में लकवा रोग के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोडोफाइलम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- सुबह सात बजे ठण्ड लगती है और बुखार हो जाता है तथा इसके साथ ही अध:पर्शुका-प्रदेशों और घुटनों, टखनों तथा कलाईयों में दर्द होता है। बुखार होने के समय में रोगी अधिक बोलता रहता है और शरीर से अधिक मात्रा से पसीना आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोडोफाइलम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
यकृत से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के यकृत में सूजन आ जाती है और वह संकोचनशील हो जाता है। पीलिया रोग होने के साथ ही पित्त में पथरी हो जाती है और इसके साथ ही पित्त में दर्द होता है। रोगी यकृत प्रदेश पर लगातार अपना हाथ फेरता रहता है, यकृत के भाग को मलता रहता है और उस भाग को हिलाता रहता है। पित्तज पदार्थ की उल्टी होती है और जिसके साथ ही रक्त के छीटे भी आते रहते हैं, इसके साथ ही पेट में मरोड़ होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोडोफाइलम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं।
उल्टी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को उल्टी आती है तथा इसके साथ ही वह इधर, कभी उधर सिर हिलाया रहता है, आधी आंखें बन्द कर कराहता रहता है, ज्वर चढ़ने के समय में रोगी की त्वचा पीली पड़ जाती है और वह बहुत अधिक बकवास करने लगता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोडोफाइलम औषधि उपयोग लाभदायक है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
खाने पीने के बाद, नहलाते-धुलाते समय, भारी वजन उठाते समय, जोर लगाने वाले काम करने के बाद, दस्त आते समय, गर्मी के मौसम में, सुबह के समय में, गर्म आबोहवा में, दांत निकलने के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
पीछे की ओर शरीर मोड़ने से, गरम प्रयोग से, बाहरी गरमी से, पेट के बल लेटने से, यकृत को रगड़ने या धीरे-धीरे ठोकने से, मलने से, शाम के समय में रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
हिपर, इपी, लैके, लायको, कार्बो-वे, चेली, कालिनसोनिया, फेर, लिलि, कालिन, मैण्ड्रागोरा, ऐलो, चेलिडो, मर्क्यू, नक्स, सल्फ, प्रुनेला औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पोडोफाइलम औषधि से कर सकते हैं।
यह औषधि पारे के बुरे फल को दूर करता है।
पेट के रोग में इपिकैक और नक्स के बाद, लीवर की बीमारी में कैलके और सल्फर के बाद पाडोफाइलम औषधि उपयोगी है।
अनुपूरक :-
नैट्र-म्यू, सल्फ।
क्रियानाशक :-
लैक्टि-ए, नक्स-वो।
मात्रा (डोज) :-
पोडोफाइलम औषधि की मूलार्क से छठी शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। 200 वीं और 1000 शक्तियां बच्चों के हैजा रोग को ठीक करने के लिए उपयोग किया जाता है।
पोलीगोनम पंकटैटम (Polygonum punctatum)
पोलीगोनम पंकटैटम औषधि का उपयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है जो इस प्रकार हैं- रक्तप्रदर, स्त्रियों को मासिकधर्म से सम्बन्धित रोग, शिराओं का बढ़ जाना, खूनी बवासीर, मलाशय में थैलियां बनना, आमाशय में जलन होना तथा इसके बाद पेट के आन्तरिक भाग में ठण्डक महसूस होना।
विभिन्न लक्षणों में पोलीगोनम पंकटैटम औषधि का उपयोग-
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में मरोड़ उत्पन्न होने के साथ ही दर्द होता है तथा इसके साथ ही गड़गड़ाहट होती है, जी मिचलाता है और तरल पदार्थ का मल होना। पेट फूलने के साथ ही पेट में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोलीगोनम पंकटैटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मलांत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मलद्वार की अन्दरूनी भाग में खुजलाहट होती है और मलद्वार पर दाना हो जाता है, मलद्वार से खून भी बहता है और तरल पदार्थ का मल होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोलीगोनम पंकटैटम औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मूत्राशय से सम्बन्धित लक्षण :- मूत्राशय की ग्रीवा पर दर्द होता है और सिकुड़न भी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोलीगोनम पंकटैटम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के नितम्बों व जांघों में हल्का-हल्का दर्द होता है और ऐसा लगता है कि नितम्बों को आपस में खींचा जा रहा हो। नाभि के भीतर भार और तनाव महसूस होता है। स्तनों में गोली लगने जैसा दर्द होता है। मासिकधर्म का आना बन्द हो जाना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोलीगोनम पंकटैटम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- कमर से नीचे के अंगों पर घाव हो जाता है और विशेषकर स्त्रियों में ऐसा अधिक होता है और वह भी मासिकधर्म बन्द होने के समय में। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोलीगोनम पंकटैटम औषधि उपयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
घाव को ठीक करने के लिए कार्डुअस मैरिए औषधि का उपयोग करते है लेकिन ठीक इस प्रकार के घाव को ठीक करने के लिए पोलीगोनम पंकटैटम औषधि का भी उपयोग किया जाता है। अत: कार्डुअस मैरिए के कुछ गुणों की तुलना पोलीगोनम पंकटैटम औषधि से कर सकते हैं।
गुर्दे में दर्द तथा पथरी रोग को ठीक करने के लिए हैमामे, सेनेशि, पोनीगोनम, पर्सिकेरिया औषधियों को उपयोग किया जाता है और ऐसे ही रोगों को ठीक करने के लिए पोलीगोनम पंकटैटम औषधि का भी उपयोग किया जाता है। अत: इन औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पोलीगोनम पंकटैटम औषधि से कर सकते हैं।
पोलीगोनम सैजिटैटम, पोलीगोनम, एवीक्यूलर औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पोलीगोनम पंकटैटम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पोलीगोनम पंकटैटम औषधि की मूलार्क का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पोलीपोरस पाइनीकोला (Polyporus pinicola)
स्वल्पविराम, सविराम और पैत्तिक ज्वरों को ठीक करने के लिए पोलीपोरस पाइनीकोला औषधि का उपयोग लाभदायक होता है इन ज्वरों के साथ ही रोगी के सिर में दर्द होता है, जीभ पीली पड़ जाती है, लगातार जी मिचलाता रहता है, रोगी की अवस्था बेहोशी सी हो जाती है, कब्ज की समस्या भी हो जाती है। वनस्पति पोलापो-ऑफीसिनैलिस के समान ही पोलीपोरस पाइनीकोला औषधि के गुण होते हैं। पैर के अन्दरूनी भाग में हल्का-हल्का दर्द होना जिसके कारण रोगी को नींद नहीं आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोलीपोरस पाइनीकोला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में पोलीपोरस पाइनीकोला औषधि का उपयोग-
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक आलस्य आता है, सिर में रक्त जमा होने लगता है तथा इसके साथ ही चक्कर आता है, चेहरा तमतमाया व गर्म हो जाता है तथा सारे शरीर पर चुभन होती है, कलाइयों व घुटनों में दर्द होने के कारण रात को बेचैनी होती है तथा जोड़ों में दर्द होता है, शरीर से अधिक पसीना आता है। सुबह दस बजे के लगभग सिर में दर्द होता है तथा इसके साथ ही पीठ पर दर्द होता है, टखनों और टांगों में दर्द होता है जो दोपहर तीन बजे तक बढ़ता है और फिर धीरे-धीरे कम हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोलीपोरस पाइनीकोला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पापूलस कैंडिकैन्स (Populus Candicans)
सर्दी-जुकाम होने की तेज अवस्था में पापूलस कैंडिकैन्स औषधि का उपयोग किया जाता है जिसके फलस्वरूप सर्दी-जुकाम ठीक हो जाता है। रोगी को सर्दी-जुकाम होने के साथ ही आवाज भारी हो जाती है तथा गले में खराश भी हो जाता है और यहा तक की गला बैठ जाता है।
रोगी की त्वचा विशेषकर पीठ और पेट पर दर्द का अहसास नहीं होता है, उस पर घिसने और पीटने पर भी दर्द नहीं होता है लेकिन इन स्थानों पर जो गर्मी पैदा होती है उसके लिऐ रोगी आभार प्रकट करता है। उंगलियों की नोक मोटी, सींग जैसी हो जाती है, चुटकी काटने या सुई चुभाने पर चुभन महसूस नहीं होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पापूलस कैंडिकैन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में पापूलस कैंडिकैन्स औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री प्रत्येक व्यक्ति से अपने लक्षणों के विषय में आलोचना करती है। सिर गर्म रहता है और इसके साथ ही शरीर के बाहरी अंगों पर ठण्ड महसूस होता है। होंठों पर शीतल क्षत हो जाता है। जीभ मोटी व सुन्न महसूस होती है। आंख, नाक, मुंह, गले और वायुपथों में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पापूलस कैंडिकैन्स औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले में तेज खराश होती है, गले और नथुने पर जलन होती है। सूखी खांसी हो जाती है जिसमें रोगी सामने की ओर झुककर बैठा रहता है। ग्रसनी और स्वरयन्त्र खुश्क महसूस होता है तथा आवाजें कमजोर और बेसुरी निकलती है। छाती व गले में कच्चापन महसूस होता है। नासा-ग्रसनी-प्रतिश्याय से उत्पन्न बच्चों की खांसी पश्चनासारंध्रों से कफ जैसा पदार्थ टपकता रहता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए पापूलस कैंडिकैन्स औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मात्रा (डोज) :-
पापूलस कैंडिकैन्स औषधि की मूलार्क का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पापूलस ट्रेम्युलॉयडेस (Populus Tremuloides)
पापूलस ट्रेम्युलॉयडेस औषधि वृद्ध व्यक्तियों के मूत्र तथा मल से सम्बन्धित रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए अधिक उपयोग में लायी जाती है।
यह मूत्राशय से सम्बन्धित रोगों और मूत्र से सम्बन्धित रोगों को ठीक करने के लिए लाभदायक औषधि है। गर्भावस्था के समय में होने वाली परेशानियों के दूर करने के लिए भी इसका उपयोग किया जाता है।
मूत्राशय में जलन होना। सारे शरीर की सतहों पर गर्मी महसूस होना। ठण्ड लगकर बुखार आना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पापूलस ट्रेम्युलॉयडेस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं।
विभिन्न लक्षणों में पापूलस ट्रेम्युलॉयडेस औषधि का उपयोग-
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- अजीर्ण रोग होने के साथ ही पेट फूलना और अम्लता होना। जी मिचलाने के साथ ही उल्टी आना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पापूलस ट्रेम्युलॉयडेस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब करते समय ऐंठन होती है और दर्द के साथ ही जलन भी होती है। मूत्र में पीब और कफ जैसा पदार्थ आता रहता है। पुर:स्थ ग्रन्थि का बढ़ जाना। पेशाब करते समय पेशाब रुकने के अन्तिम अवस्था में जांघ के पीछे के भाग में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पापूलस ट्रेम्युलॉयडेस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
चायना, कार्नस-फ्लोरि, कैनादि, कैन्थ तथा नक्स औषधियों के कुछ गुणों की तुलना पापूलस ट्रेम्युलॉयडेस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पापूलस ट्रेम्युलॉयडेस औषधि की मूलार्क या 1x विचूर्ण का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पोथस फीटीडस (Pothos Foetidus)
दमा जैसे रोगों को ठीक करने के लिए पोथस फीटीडस औषधि का उपयोग किया जाता है।
दमा रोग होना तथा सांस लेने पर धूल कण श्वासनलियों से अन्दर जाने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होना, हिस्टीरिया रोग, किसी चीज के बारे में सोचने में असमर्थ होने के साथ ही बेहोशी आना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोथस फीटीडस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में पोथस फीटीडस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक डर लगता है और इसके साथ ही सांस से सम्बन्धित रोग भी होता है, तनाव भी होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोथस फीटीडस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द होने के साथ ही रोगी चिड़चिड़ा हो जाता है, सिर के कई भागों में दर्द होने के साथ ही कनपटी के भाग की धमनियों में तेज दर्द होता है। दोनों भौंहों के बीच बाहर की ओर खिंचाव महसूस होता है। खुली हवा में रहने पर आराम मिलता है। नाक की उठी हुई हड्डी के आर-पार लाल सूजन हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोथस फीटीडस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट फूलने लगता है तथा इसके साथ ही तनाव भी हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोथस फीटीडस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- स्वरनली में जलन होने लगती है और श्वास लेने में परेशानी होती है, बेचैनी महसूस होती है, पसीना अधिक आता है। छींके भी आती है और साथ ही गले में दर्द भी होता है। छाती में दर्द होने के साथ ही सांस लेने में परेशानी होती है। जीभ सुन्न हो जाता है। दमा रोग हो जाता है और मलत्याग करने से कुछ आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पोथस फीटीडस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मात्रा (डोज) :-
पोथस फीटीडस औषधि की मूलार्क और निम्न शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
प्राट्यूज Produce
प्राट्यूज औषधि का उपयोग उन व्यक्तियों के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है जो सहनशील स्वभाव के होते हैं, बाल भूरे रंग के होते हैं, शरीर की त्वचा पीली पड़ गई हो तथा अधिक दुबला-पतला होता है। सोरा ग्रस्त रोगी के रोग को यह औषधि ठीक कर देता है।
विभिन्न लक्षणों में प्राट्यूज औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ा होता है तथा तनाव अधिक होता है और मानसिक परिश्रम करने से उदण्ड हो जाता है। रोगी में किसी भी दूसरे के प्रति दया भावना नहीं होती है। वह किसी बात पर चिढ़ने से क्रोध करने लगता है और पागलों की तरह का बर्ताव करता है। रोगी मानसिक उलझनों में फंसा रहता है। उसके हाथों में जो चीज होती है, वह उसे फेंक देता है और अगर कोई चीज पास रखी होती है तो उसे लात मारकर हटा देता है। बच्चा जमीन पर लेटने लगता है और जरा सा अस्वस्थ रहने पर वह चिढ़ जाता है, आत्महत्या करने की बात सोचता है, लेकिन करता नहीं है। रोगी सन्ताप ग्रस्त रहता है और चिड़चिड़ा होकर क्रोध करने लगता है और आत्म हत्या करने लगता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को चक्कर आते हैं और सूरज के चढ़ने के साथ-साथ चक्कर बढ़ने लगता है। सुबह के समय में उठने पर गर्दन में दर्द होना। सिर में भारीपन महसूस होने के साथ ही सिर में दर्द होता है जो सुबह के समय से शुरू हो जाता है। सिर में दर्द के साथ अतिसार होना और जीभ पर सफेद लेप चढ़ा होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- गले के अन्दर गाढ़ा कफ बहने की अनुभूति होती है। बन्द कमरे में नाक बन्द हो जाता है और ऐसा लगता है कि नाक के पिछले भाग में कफ का स्राव हो रहा है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- स्वरयन्त्र में तेज दर्द होने के कारण रोगी को बोलने में परेशानी होती है। खांसी ढीली रहती है और कफ निकलता रहता है, लेकिन चिकटा कफ खांसी के साथ निकलने पर कमजोरी महसूस होती है। गले में सिकुड़न होने के साथ ही छाती में रुकावट महसूस होती है जिसके कारण से दम घुटने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों में जलन के साथ दर्द होता है, आंखों को दबाने से दर्द से कुछ आराम मिलता है। चक्कर आने के साथ आंखों के सामने रंग-बिरंगी तितलियां उड़ती हुई दिखाई पड़ती हैं। आंखें लाल होना और प्रकाश से आंखों में थकावट आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कानों में जलन होना तथा इसके साथ दर्द होना लेकिन बुखार नहीं रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करे।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब में श्वेत कण आते हैं और पेशाब से गन्दी बदबू आती है। भोजन करने के बाद गुर्दे में दर्द होता है, मूत्राशय में तेज दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार होने के साथ ही पेट में मरोड़ होना, मिर्गी का दौरा पड़ता है। मस्तिष्क के कोषाणुओं में संवेदनशीलता आ जाती है। रोगी स्त्री को मासिकस्राव आने के एक सप्ताह पहले से ही सिर में दर्द शुरू हो जाता है। रोगी को घर के अलावा दूसरी जगह पर नींद नहीं आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के होंठों के किनारे फटे-फटे होते हैं जो जल्दी किसी औषधि से ठीक नहीं होते हैं। मसूढ़ें संवेदनशील होते हैं। जीभ का स्वाद नमकीन होता है। रोगी को तेज भूख लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पक्वाशय में घाव हो जाता है जिसके कारण खून की उल्टी होती है। नाश्ते के बाद पीले चिकने दस्त आते हैं। मल के साथ आक्ज्यूरिस आता है। दस्त आने के साथ ही सिर में दर्द होता है और जीभ पर लेप चढ़ा रहता है तथा खून की उल्टी होती है। गुदाद्वार में खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पाचनतन्त्र से सम्बन्धित लक्षण :- मक्खन, उबले अण्डे, सुअर का मांस, सलाद, प्याज और चाकलेट आदि पचता नहीं है इसलिए इन सब की खाने की इच्छा नहीं होती है। गरिष्ठ भोजन, शक्कर, नमक, मक्खन खाने की इच्छा होती है। रोगी को दस्त होने लगता है तथा खून की उल्टी भी आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के हृदय के भाग में भारीपन महसूस होता है, अधिक परिश्रम करने से हृदय में दर्द बढ़ जाता है, हृदय का कपाट बढ़ जाने के कारण कंपन होती है, जरा सी भावुकता बढ़ने के कारण भी कंपन होने लगती है, हृदय की दायीं ओर की नाभीय खण्ड बन्द हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- ‘शरीर की रस धारक नलिकाओं में ऐंठन और मरोड़ होती है और ऐसा लगता है कि उंगलियां सुन्न पड़ गई हैं। पैर की धमनियों में खून जमा होने लगता है। शिरास्फीत रोग होना। पैर के पंजे जैसे कुचल गए हो पैर के अंगूठे में हथैड़ा मारा जा रहा हो। गर्दन में दर्द होता है जिसे दबाने पर आराम मिलता है। हथेलियों से पसीना आता है, इतना अधिक मात्रा में पसीना आता है कि बड़ी-बड़ी बूंदें की तरह शरीर पर जम जाता है, हाथों के पिछले भाग पर चर्म रोग जिसमें स्राव आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- कलाई के ऊपर और उंगलियों के बीच में खुजली भरे दाने होते हैं। अकौता जैसा उद्भेद होना, रस भरे छाले। रक्तयुक्त त्वचा पर दानें होना। त्वचा पर तेज खुजली होता है। बालों का झड़ना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- प्रसव होने के अन्त तक स्राव रुक-रुककर आता है। बवासीर से पीड़ित रोगी के गुदाद्वार से खून का स्राव होता है तथा गुदा में तेज खुजली भी होता है। रोगी स्त्री के मासिकस्राव के साथ ही रक्त के छिछड़े गिरते हैं। मासिकस्राव के आने के पहले भूरे रंग का स्राव आता है, मासिकस्राव के अन्त में धागे जैसा रक्तस्राव होता है। छिछड़े भरे रक्तस्राव के साथ नियमित मासिकस्राव आता है और सात दिन तक बना रहता है। योनि में खुजली होती है और योनि में जलन भी होती है। प्रदर रोग होने पर सफेद पानी का स्राव होता है, डिम्ब क्षरण होता है, योनि और गुदा में जहरीले घाव हो जाते हैं। रात के समय में रोगी स्त्री के हाथ ऐसा लगता है कि बेजान हो गया है, रात को हाथों में जलन होती है, सुबह के समय में हाथ सुन्न हो जाते हैं, हथेलियों में खिंचाव होता है और मुट्ठी बन्द नहीं हो पाता है। हाथों में विकृति पैदा कर देने वाला वात रोग हो जाता है। पिण्डलयों में दर्द होता है पंजों में ऐंठन और मरोड़ होती है इसलिए रोगी लाठी या बेंत लेकर चलने के लिए मजबूर होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए प्राट्यूज औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
सुबह के समय में सोकर उठते समय, किसी कार्य को करते समय, सीढ़ियां चढ़ने पर, शराब पीने से, आंधी तथा पानी भरे मौसम में, गर्मी से सूर्य ताप से, सर्दी के मौसम में, ठण्ड से, लेट जाने पर तथा रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
शरीर को तानकर लेटने से, पहाड़ी स्थानों पर, शुद्ध व्हिस्की पीने से लेकिन व्हिस्की में कुछ मिलाकर पीने से उपसर्ग बढ़ते हैं। सोकर उठने के बाद, भोजन कर लेने के एक घंटे बाद रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
पुलेक्स इर्रिटैन्स (Pulex Irritans)
पुलेक्स इर्रिटैन्स औषधि का उपयोग मूत्रयंत्र तथा स्त्री जननांगों से सम्बन्धित लक्षणों को दूर करने के लिए किया जाता है।
विभिन्न लक्षणों में पुलेक्स इर्रिटैन्स औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी अधिक जिद्दी और चिड़चिड़ा हो जाता है और उसे बेचैनी होती है। माथे पर दर्द रहता है और आंखों में कोई चीज बढ़ जाने जैसी अनुभूति होती है। चेहरा झुर्रीदार और वृद्धों के समान लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पुलेक्स इर्रिटैन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मुंह का स्वाद धात्विक होता है, गले के अन्दर एक डोरी जैसी अनुभूति होती है, प्यास सिरदर्द होने के समय में लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पुलेक्स इर्रिटैन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- श्वास और स्वाद बदबूदार होती है, तेज बेचैनी होने के साथ ही उल्टी आती है, दस्त आता है तथा बेहोशी होती है। मल अधिक बदबूदार होती है। पेट फूलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पुलेक्स इर्रिटैन्स औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पेशाब कम आता है तथा इसके साथ ही मूत्रावेग होने के साथ ही मूत्राशय पर दबाव और मूत्रमार्ग में जलन होती है। पेशाब जब बन्द होता है तो उस समय के बाद दर्द होता है, पेशाब से बदबू आती है। मलत्याग करने के तुरन्त बाद ही पेशाब करने के लिए जाना पड़ता है। मासिकस्राव होने से पहले क्षोभक मूत्राशय हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पुलेक्स इर्रिटैन्स औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकस्राव देर से आता है। मासिकस्राव के समय में अधिक लाल रंग का स्राव होता है। योनि नली में तेज जलन होती है। प्रदर स्राव होता है तथा अधिक मात्रा में स्राव होता है, कपड़े पर बदबूदार हरा तथा पीला दाग पड़ जाता है, मासिकस्राव तथा प्रदरस्राव के दाग को धोकर छुड़ाना कठिन हो जाता है तथा पीठ पर दर्द भी होता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पुलेक्स इर्रिटैन्स औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पीठ पर दर्द होता है तथा इसके साथ ही कंधें पर नीचे की पेशियों में खिंचाव होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए पुलेक्स इर्रिटैन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार रहने के साथ ही सारे शरीर पर आग जैसी ऐसी गर्मी महसूस होती है जैसे- भाप के ऊपर हो। आग के पास बैठने पर ठण्ड लगती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए पुलेक्स इर्रिटैन्स औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- सारे शरीर की त्वचा पर चुभने जैसी खुजलाहट महसूस होती है। सारे शरीर की त्वचा पर जलन युक्त धब्बे पड़ जाते हैं। त्वचा से बदबू आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पुलेक्स इर्रिटैन्स औषधि का प्रयोग करे।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
बाई ओर, हिलते-डुलने रहने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
बैठने और लेटने पर रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
पुलेक्स इर्रिटैन्स औषधि की उच्चतर शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
पल्सटिल्ला (Pulsatilla)
यह स्त्रियों के रोगों को ठीक करने के लिए बहुत ही उपयोगी औषधि है तथा इसका प्रभाव बहुत अधिक लाभदायक होता है। इसका उपयोग होम्योपैथिक चिकित्सा में बहुत अधिक होता है।
स्त्रियों के रोगों के लक्षणों को दूर करने के लिए यह उपयोगी है, स्त्री रोगी की आंखें नीली होती हैं, स्वभाव में वह मृदुल होती है, जरा सी बात पर रो पड़ती है, उनमें करुणा अधिक होती है, सान्त्वना देने पर वह कराहने लगती है, अपनी बात बिना रोए बता नहीं पाती, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री के रोग के लक्षणों को दूर करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का उपयोग करना चाहिए। यह बहुत से पुराने रोगों को भी ठीक करने में उपयोगी है।
कैमोमिला, कुनाइन, पारा, गंधक आदि के सेवन करने के बाद उत्पन्न दुष्परिणामों को दूर करने के लिए इस औषधि का उपयोग किया जा सकता है।
रोगी स्त्री जरा सी बात पर रो पड़ती है और बिना रोए अपने लक्षणों को बता नहीं पाती है, रोते-रोते ही अपने कष्टों को बताती है, रोगी स्त्री को जब देखो तभी आंसू निकलते रहते हैं, खुशी हो या गम लेकिन बात-बात में आंसू छलक पड़ता है, बात कैसी भी हो वह हर बात पर रोती है, जरा सी बात पर हंसना और जरा सी बात पर रोना, उसके सिर में दर्द होता रहता है, सिर पर पट्टी बांधने से दर्द ठीक हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना चाहिए ।
विभिन्न लक्षणों में पल्सटिल्ला औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री अपने आप ही रो पड़ती है और वह डरपोक स्वभाव की होती है, उसमें दृढ़-सकल्प की कमी होती है। शाम के समय में अकेले रहने पर, अंधरे से और भूतप्रेतों से वह भयभीत रहती है। वह सहानुभूति चाहती है। बच्चे स्वयं से प्यार करना, खिलाना, चुमकारना आदि पसन्द करते हैं। उत्साह में कमी होती है। पुरुष स्त्रियों से और स्त्रियां पुरुषो से अत्यधिक अस्वाभाविक रूप से भयभीत रहती हैं। रोगी अत्यन्त भावुक होता है। रोगी की मानसिक अवस्था ऐसी रहती है जैसे वह आनन्द के दिन में हो।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द होता है तथा दर्द का असर चेहरे और दांतों तक फैल जाता है, चक्कर आता रहता है, खुली हवा में आराम मिलता है और माथे और अक्षिकोटरों के ऊपर दर्द होता है, नाड़ियों में दर्द होता है, दर्द दाईं कनपटी के ऊपर से शुरू होता है। अत्यधिक परिश्रम करने से सिर में दर्द होता है। सिर के ऊपरी भाग पर दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि मानों कान के अन्दर से कुछ बाहर की ओर धकेला जा रहा हो, सुनने में परेशानी होती है और ऐसा लगता है जैसे कान बन्द हो गया हो। कान से पीब जैसा पदार्थ बहने लगता है तथा इस पीब से अधिक बदबू आती है। कान का बाहरी भाग लाल हो जाता है। सर्दी के मौसम में कान पर सूजन आ जाती है। कान में दर्द होता है तथा रात के समय में दर्द बढ़ने लगता है। सुनने की शक्ति कम हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों से गाढ़ा अधिक मात्रा में पीला तरल पदार्थ बहता है। आंखों में जलन होने के साथ ही खुजली होती है। अधिक मात्रा में आंखों से आंसू आता है तथा आंखों से कफ जैसा पदार्थ बहता है। पलकों पर जलन होती है तथा वे आपस में चिपक जाती है। गुहेरी रोग हो जाता है। नेत्रबुघ्न (फनडुस ओसुल) की शिराएं अत्यधिक बढ़ जाती है। छोटे बच्चों के आंखों में जलन होना। पुरानी नेत्रश्लेष्मा में सूजन होने के साथ अपच होना, गर्म कमरे में इस रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। आंखों की दृष्टि धुंधली पड़ जाती है, आंखों के सामने चिंगारियां उड़ती हुई दिखाई देती है और ऐसा लगता है कि जैसे किसी ने उसके गाल पर थप्पड़ मार दिया हो, खुली हवा में आंखों से अधिक आंसू निकलता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- सर्दी तथा जुकाम होना, दायीं नाक का बन्द होना, नाक की जड़ में दबाव होने के साथ ही दर्द होना। सूंघने की शक्ति का लोप होना, नाक में बड़ी-बड़ी हरी बदबूदार पपड़ियां जमना, शाम के समय में नाक का बन्द हो जाना, सुबह के समय में नाक के अन्दर से पीला कफ जैसा पदार्थ बहना, पुरानी सर्दी होने के साथ ही बुरी बदबू आना, नाक की हडि्डयों में जलन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरे के दाएं भाग के नाड़ियों में दर्द होना तथा इसके साथ ही अधिक मात्रा में आंखों सें पानी आना, होंठ के निचले भाग में सूजन आना और होंठ का बीच से फट जाना, शाम से लेकर आधी रात तक आननशूल (Prosopalgia) होना, चेहरा अधिक ठण्डा होना और इसके साथ ही चेहरे पर दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करे।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- जीभ का स्वाद तेल जैसा लगना, मुंह का शुष्क हो जाना और इसके साथ ही प्यास न लगना तथा बार-बार कुल्ला करने का मन करना, सूखे होठों को लगतार चाटते रहना, निचले होंठ के बीच में दरार पड़ना, जीभ पर पीली या सफेद लसीली परत जमना, दांत में दर्द होना तथा मुंह में ठण्डा पानी रखने से दांत के दर्द से आराम मिलना, मुंह से बुरी बदबू आना, भोजन तथा विशेषकर रोटी का स्वाद कड़वा लगना, अत्यधिक मीठी लार आना, स्वाद का बार-बार परिवर्तन होना जैसे- कड़वा, पैत्तिक, तैलायुक्त, नमकीन, सड़ा हुआ। स्वाद की पहचान न हो पाना, पौष्टिक दवाइयों के सेवन करने का मन करना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- चर्बीदार चीजों तथा गरम खान-पान के चीजों को खाने का मन न करना, डकारें आना तथा भोजन का स्वाद बहुत देर तक जीभ पर बना रहना, बर्फीली चीजों तथा फलों और मीठी चीजों को खाने के बाद ऐसा अधिक होता है और सभी खाद्य-पदार्थों का स्वाद घटा हुआ रहता है, आमाशय में दर्द होता है और ऐसा लगता है जैसे कि ऊपर की त्वचा पर घाव बन गया है, आमाशय में वायु बनना, मक्खन खाने का मन नहीं करता है, हृदय में जलन होना, अपच होने के साथ ही भोजन के बाद अत्यधिक पेट पर दबाव महसूस होना और कपड़े ढीले करने का मन करना, कई प्रकार के रोगों के साथ प्यास कम लगना, बहुत पहले खाये हुए पदार्थो की उल्टी करना, भोजन के एक घंटे बाद आमाशय में दर्द होना, पत्थर जैसे भार की अनुभूति होना, सुबह जागने पर ऐसा अधिक होता है, चबाने जैसी भूख की अनुभूति होती है, पेट के अन्दरूनी भाग में कम्पन होती है, पेट में खालीपन महसूस होना तथा ऐसा विशेषकर चाय पीने वाले व्यक्तियों को अधिक होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट फूलना तथा इसके साथ दर्द होना और तेज गड़गड़ाहट होना, पेट पर पत्थर के समान दबाव महसूस होना, पेट में दर्द होने के साथ ही शाम के समय में सर्दी लगना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पेट में गड़गड़ाहट होती है और पानी की तरह पतला दस्त होता है, रात के समय में ऐसा अधिक होता है, दो बार मल एक जैसा नहीं होता है, फल खाने के बाद पानी की तरह का मल अधिक होता है, सूखी बवासीर होना तथा इसके साथ ही खुजली और गड़ता हुआ दर्द होना, पेचिश होना, इसके साथ ही मल में कफ तथा रक्त जैसे पदार्थ आते हैं और सर्दी लगती है, सुबह के समय में दो या तीन बार मलत्याग होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब करने की बहुत अधिक इच्छा होती है तथा लेटते समय ऐसा अधिक होता है, पेशाब करने के समय में और उसके बाद मूत्रद्वार में जलन होना, रात को खांसते समय या मलत्याग करते समय अपने आप पेशाब हो जाना, पेशाब करते समय मूत्राशय में अधिक दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना चाहिए ।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म बन्द हो जाना। पैर भीग जाने से, नाड़ियों में कमजोरी आने से या हृरित्पाण्डु रोग के कारण मासिकधर्म का बन्द हो जाना। मासिकधर्म देर से आता है और कम आता है और गाढ़ा, काला, थक्केदार आता है। मासिकधर्म के समय में स्राव रुक-रुककर आता है और इसके साथ ही कमर के नीचे के भाग में दबाव महसूस होता है, दर्द होता है तथा जी भी मिचलाता है। किशोरावस्था की आयु में लड़कियों का स्वास्थ्य असन्तुलित हो जाता है और प्रथम मासिकधर्म शुरू होने के बाद से कभी भी स्वस्थ्य सही नहीं रहता है, चेहरे पर मुहांसे निकलते हैं, शरीर में खून की कमी हो जाती है, हरित्पाण्डु रोग होना, श्वास नली में जलन होना या टी.बी. रोग हो जाता है अथवा ऐसे रोग होने का खतरा उत्पन्न हो जाना। दिन पर दिन बढ़ती हुई बीमारी। गर्भपात हो जाने की आंशका रहती है, स्राव रुक जाता है फिर बड़े वेग से चालू हो जाता है, मरोड़ होती है, दम घुटने लगता है और मूर्छा आने लगती है, खुली ताजी हवा में जाना ही पड़ता है। प्रसव की पीड़ा होने के कारण हृदय की कंपन तेज हो जाती है, दम घुटने लगता है और इसके साथ ही रोगी स्त्री अपना होशों हवास खो देती है। खिड़की दरवाजे खुले रखने पड़ते हैं ताकि स्वच्छ हवा स्त्री को मिल सके। प्रदर स्राव तेज और ज्वलनशील होता है और स्राव क्रीम जैसा होता है। पीठ पर दर्द होता है तथा थकावट महसूस होती है। स्राव गाढ़ा, मलाई या दूध की तरह, पतला होता है तथा योनि के मुंह के दोनों तरफ सूजन आ जाती है लेटने से लक्षणों में वृद्धि होती है। मासिकधर्म के समय में या उसके बाद अतिसार (दस्त) हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- अण्डकोष में जलन होना तथा इसके साथ ही अण्डकोषों में दर्द होता है। वीर्यनलिकाओं में जलन होती है जो ठण्ड लग जाने या सुजाक रोग में स्राव दब जाने के कारण होता है। अण्डकोष और वीर्यनलिकाओं में सूजन आ जाती है, पेशाब करने के बाद या सुजाक दब जाने के बाद मूत्रनली से रक्तस्राव होता है। सूजाक रोग में स्राव हरे-पीले या पीले रंग का होता है। सूजाक रोग होने के कारण लिंग में दर्द होता है। मूत्रमार्ग से गाढ़ा तथा पीला स्राव होता है तथा इसके साथ ही प्रमेह भी हो जाता है। पेशाब बूंद-बूंद करके टपकता है और पेशाब की धार ठीक प्रकार से नहीं बनती है। तेज पुर:स्थग्रन्थि में सूजन होना। मूत्रत्याग करने में दर्द होना तथा ऐंठन भी महसूस होता है और पीठ के बल लेटने पर अधिक दर्द होता है। बच्चों के अण्डकोष में जलन होना तथा पानी उतरना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करे।
बवासीर से सम्बन्धित लक्षण :- बवासीर होने के साथ ही कब्ज ज्यादा होता है और मस्सों में तेज दर्द होता है, मलत्याग करने के बाद मस्सों में दो तीन घंटों तक तेज दर्द होता है, रोगी बेचैन हो जाता है, लेटने और बिस्तर की गर्मी से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, खुली हवा में घूमने से आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- गले में उत्तेजना होती है और इसके साथ ही अचानक से गले से आवाज निकलना बन्द हो जाता है और अपने आप ही यह ठीक भी हो जाता है। शाम के समय में और रात के समय में खांसी होती है और आराम पाने के लिए बिस्तर पर उठकर बैठने को बाध्य, सुबह बलगमयुक्त खांसी के साथ अधिक मात्रा में कफ निकलता है। छाती पर दबाव महसूस होने के साथ ही दर्द होता है। पाचनतन्त्र में दर्द होता है। खांसी होने के साथ ही पेशाब बूंद-बूंद करके टपकता है। छाती के बीच में दर्द होता है और ऐसा लगता है कि छाती में घाव हो गया है। बलगम गाढ़ा, कड़वा तथा हरा होता है। सांस उखड़ा-उखड़ा होता है, बाईं करवट लेटने पर धड़कन अनियमित गति से चलती है, लेटने पर दम घुटने जैसी अनुभूति होती है। दिनभर तर तथा ढीली खांसी आती है और रात को सूखी खांसी आती है, शाम के समय में खांसी तेज हो जाती है यहां तक कि रोगी को औंधें होकर बैठना पड़ता है। पित्ती के दब जाने के बाद दमा रोग का प्रकोप अधिक होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- शाम के समय में बिल्कुल नींद नहीं आती है, पहली नींद बेचैन कर देती है, जागने पर थकावट महसूस होती है, शरीर की स्फूर्ति खत्म हो जाती है, दोपहर के बाद अधिक नींद आती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी अपने हाथों को सिर पर रखकर सोता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- पीठ के पीछे गर्दन के पास और पीठ पर दर्द होता है, कंधों के बीच में दर्द होता है, बैठने के बाद त्रिकास्थि में गोली लगने जैसा तेज दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जांघों व टांगों में खिंचाव तथा तनाव जैसा दर्द होता है तथा इसके साथ ही बेचैनी होती है और ठण्ड लगने के साथ ही नींद नहीं आती है। शरीर के कई अंगों में दर्द होता है जो तेजी से स्थान बदल देता है, तनाव के साथ दर्द होता है, चटकने के साथ अचानक दर्द बन्द हो जाता है। कोहनी के चारों ओर के अंग सुन्न पड़ जाना। नितम्ब की हडि्डयों के जोड़ों में दर्द होना। घुटने में सूजन आना तथा इसके साथ ही फाड़ने जैसा दर्द होना और खिंचाव होना। दोपहर के बाद एड़ियों में बरमें द्वारा छेद किये जाने जैसा दर्द, आक्रान्त अंग को लटकाये रखने पर तकलीफ बढ़ जाती है। बांहों व हाथों की शिरायें सूजी हुई रहती है। पैर लाल, प्रदाहित, सूजे हुए रहते है। टांगें भारी और रोग ग्रस्त महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना चाहिए ।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- भारी भोजन करने के बाद छपाकी रोग होना तथा इसके साथ ही मासिकधर्म देर से आना और दस्त भी होना, वस्त्र को उतारने पर रोग के लक्षणों की वृद्धि होती है। खसरा रोग। यौवनकाल में मुंहासें आना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ठण्ड अधिक लगती है यहां तक कि गर्म कमरे में भी ठण्ड लगती है, प्यास नहीं लगती है। ठण्ड लगने के साथ ही शरीर के कई सीमित अंगों में दर्द होता है, शाम के समय में दर्द अधिक होता है। शाम के लगभग चार बजे ठण्ड लगती है। रात के समय में शरीर में ऐसी जलन होती है जो असहनीय होती है, इसके साथ ही शरीर के कई अंगों में गर्मी होती है, कुछ अंगों में ठण्ड लगती है। शरीर के एकपार्श्विक भाग में पसीना आता है तथा दर्द होता है। बुखार न होने की अवस्था में सिर में दर्द होता है, अतिसार हो जाता है, भूख नहीं लगती है, जी मिचलाने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
दूषित भोजन करने, चर्बीदार भोजन करने से, भोजन के बाद, दोपहर के बाद, गर्म कमरे में, बाईं करवट या दर्दहीन करवट लेटने पर, पैरों को लटकायें रखने पर तथा ताप से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
खुली हवा में गति करने से, ठण्डे विलेपनो से, ठण्डे भोजन व पेय पदार्थो से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
जिन नये रोग को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का उपयोग किया जाता है उन्हीं रोगों को ठीक करने के लिए साइलीशिया औषधि का भी उपयोग किया जाता है। अत: साइलीशिया औषधि के कुछ गुणों की तुलना पल्सटिल्ला औषधि से कर सकते हैं।
पल्सटिल्ला औषधि के पहले और बाद में कैलि-म्यूर औषधि अच्छा काम करता है।
पुराने रोग का उपचार शुरू करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि एक उत्तम औषधि है।
जो टानिक के सेवन करने से उत्पन्न विकारों को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का उपयोग किया जाता है।
कैमोमील, पारा, चाय और सल्फर के उपयोग करने के कारण उत्पन्न रोग को ठीक करने के लिए पल्सटिल्ला औषधि का उपयोग किया जाता है।
पूरक औषधि :-
साइली, सल्फ-ऐसिड, लाइको तथा कैलि।
मात्रा (डोज) :-
पल्सटिल्ला औषधि की 3 से 30 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।