एब्रोमा आगस्टा (ABROMA AUGUSTA)
एब्रोमा आगस्टा (ABROMA AUGUSTA)
एब्रोमा आगस्टा औषधि अनिद्रा रोग, नासूर, मधुमेह, मूत्र रोग, कमजोरी, मानसिक कमजोरी तथा अन्नसारमेह (एल्बुमीनिरिया) रोगों को ठीक करने में बहुत उपयोगी है।
एब्रोमा आगस्टा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
भूख से सम्बन्धित लक्षण :- अस्वाभाविक भूख (किसी ऐसे समय पर भूख लगना जिस समय पर भूख नहीं लगना चाहिए।) जैसे- भरपेट भोजन करने के तुरन्त बाद भी भूख लग जाना और खाना खा लेना। इस लक्षण से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि बहुत उपयोगी है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- भूख महसूस होने के साथ बेहोशी जैसा अनुभव होना, कई प्रकार का भोजन करने की इच्छा होना, पेट के अन्दर खालीपन महसूस होना। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी का इलाज करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि लाभदायक होती है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- आध्मान (फ्लेट्युलेंस) अर्थात पेट के फूलने पर एब्रोमा आगस्टा औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- कब्ज रोग, काला मल होना, गांठदार मल होना, ढेलेदार मल होना, शौच क्रिया में बहुत तेज जोर लगाने के बाद मल निकलना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के इलाज के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि उपयोगी है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- दिन-रात अधिक मात्रा में पेशाब होना, पेशाब करने के लिए बार-बार जाना, मुंह का सुखना, अधिक प्यास लगना, पेशाब करने के बाद पानी पीने की इच्छा करना, पेशाब करने के बाद थकान महसूस होना, पेशाब से मछली जैसी बदबू आना, पेशाब हल्का तैलीय होना, मधुमेह रोग होना, रात के समय में बिस्तर पर पेशाब हो जाना, लिंग के ऊपरी भाग (लिंग के मुख) पर सफेद रंग का घाव हो जाना, यह पेशाब में अधिक मात्रा में शर्करा हो जाने के कारण होता है तथा पेशाब करने में असमर्थ होना (इनबिलिटी टू रिटैंन युरीन)। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि लाभदायक है।
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ा हो, उत्तेजनशील स्वभाव वाला हो, भद्दा मजाक करने वाला हो, याददास्त कमजोर हो, हताश, निराश, धैर्य की क्षमता कम होना तथा अपने स्वभाव को बदलने में असमर्थ होना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि लाभकारी है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :-हृदय में कमजोरी आना, धड़कन की गति तेज होना तथा बेहोशी जैसा अनुभव होना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि बहुत उपयोगी है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण : खुजली, जलन, गर्मियों में छोटे-छोटे फोड़े, नासूर तथा सूखी त्वचा को ठीक करने में एब्रोमा आगस्टा औषधि लाभदायक है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण : खांसी के साथ पीब जैसा बलगम निकलना, छाती में दर्द होना, सफेद या पीला ढेलेदार थूक, ठण्डी हवा से लक्षणों में और तेजी होना, शाम तथा रात के समय में लक्षणों में तेजी होना तथा खांसते समय छाती में दर्द होना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि बहुत उपयोगी है।
गर्दन तथा पीठ और शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण : गर्दन, पीठ तथा शरीर के बाहरी अंगों में हल्का-हल्का दर्द होना, अंगों में कमजोरी होना तथा गुर्दे में दर्द होना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि बहुत उपयोगी है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण : पूरे मुंह के अन्दर रूखापन होना, रोगी एक बार में बहुत सारा पानी पी जाता है, लेकिन फिर भी मुंह के अन्दर का रूखापन दूर नहीं होता है, जीभ साफ और सूखी रहती है, होठ सूखे और नीले-नीले पड़ जाते हैं तथा आवाज साफ निकलती है। इन लक्षणों को दूर करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि बहुत उपयोगी है।
पुरुष से सम्बन्धित लक्षण : सम्भोग क्रिया करने में कमजोरी तथा असमर्थता होना, सम्भोग क्रिया करने के बाद बुरी तरह से थक जाना, वृषणों (अण्डकोष) में सूजन तथा वह ढीले होकर नीचे की ओर लटक जाते हैं, लिंग की उत्तेजना खत्म हो जाना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि बहुत उपयोगी है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण : मासिक धर्म की अनियमिता, खून का काला हो जाना, खून का थक्केदार रूप में हो जाना, शरीर में खून कम या अधिक होना तथा खून पीला हो जाना, मासिक-स्राव का अधिक मात्रा में होना, मासिकधर्म का रूक जाना, कष्टार्तव (डाइमेनोरिया)-मासिक धर्म में अधिक कष्ट होना, मासिकधर्म के समय में स्राव अधिक होना, सफेद, पतला तथा पानी की तरह स्राव होना, हरित्पाण्डू रोग (क्लोरोसिस), मासिकधर्म शुरू होने से दो-तीन दिन पहले पेट के निचले भाग में दर्द होना, हिस्टीरिया रोग तथा मासिकधर्म से सम्बन्धित कुछ गड़बड़ी होना। इन लक्षणों से पीड़ित स्त्रियों का उपचार करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि बहुत उपयोगी है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण : आलस्य, अनिद्रा, किसी कार्य को करने का मन न करना तथा सुबह के समय में अच्छी नींद आना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का रोग ठीक करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि लाभदायक है।
ज्वर (बुखार) से सम्बन्धित लक्षण : रोगी को बुखार के साथ ही शरीर सूख जाता है तथा गर्मी महसूस हो रही हो तथा उसे अधिक प्यास लग रही हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि लाभकारी है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण : सिर में खालीपन महसूस होना, सिर को इधर-उधर लुढ़काते रहने की आदत व घुमरी होना, भारीपन तथा असुविधा महसूस होना तथा अधिक चक्कर आने पर एब्रोमा आगस्टा औषधि का उपयोग लाभकारी है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण : दृष्टि दोष (आंखों की देखने की रोशनी कम होना), पलकों में सूजन होना, भारीपन महसूस होना, आंखें थक जाती हैं, आंखें बार-बार ऊपर नीचे करना, आंखों में दर्द तथा जलन होना, आंखों की नेत्रश्लेष्मा पीली पड़ जाना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि अधिक लाभदायक होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण : सुनने की शक्ति कमजोर होना, कानों में भिनभिनाहट होना तथा कान का बहना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि का उपयोग करना चाहिए। यह बहुत अधिक लाभदायक होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण : चेहरा मुरझाया हुआ लगना, पीला चेहरा होना, चेहरे पर झुर्रिया पड़ना, बूढ़ों जैसा चेहरा हो जाना, चेहरे पर खुजलाहट होने के साथ-साथ जलन महसूस होना तथा चेहरे पर दरारे पड़ना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एब्रोमा आगस्टा औषधि अधिक उपयोगी है।
गले से सम्बन्धित लक्षण : कंठ में खुश्की होना तथा जलन होना, ऐसा महसूस होना जैसे की गले में कुछ अटक गया हो तथा दर्द होने पर इस एब्रोमा आगस्टा औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मात्रा :
एब्रोमा आगस्टा औषधि की मूलार्क, 2x, 3x शक्तियां का प्रयोग करना चाहिए।
अल्स्टोनिया स्कोलैरिस (ALSTONIA SCHOLARIS)
अल्स्टोनिया स्कोलैरिस औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के काम आता है जो इस प्रकार हैं-मलेरिया सम्बन्धी रोगों के साथ पेचिश (डाइसेंटेरी), प्रवाहिका रोग, रक्ताल्पता (ऐनिमिया.शरीर में खून की कमी), पाचन शक्ति कम होना (फीबल डिजिनेशन) आदि। इस प्रकार के लक्षण रोगी के अन्दर हो तो इसका उपयोग लाभकारी है तथा इसके प्रभाव के कारण रोगी का रोग ठीक हो जाता है।
अल्स्टोनिया स्कोलैरिस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को मलेरिया रोग होने के साथ ऐसा महसूस हो रहा हो कि उसके आमाशय के अन्दर खोखलापन हो गया है तथा पेट के अन्दर खालीपन महसूस हो रहा हो और अधिक कमजोरी महसूस हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए अल्स्टोनिया स्कोलैरिस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
क्षय (टी.बी.) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को क्षय रोग होने के साथ बुखार हो तो अल्स्टोनिया स्कोलैरिस औषधि की खुराक देनी चाहिए जिसके फलस्वरूप रोगी के शरीर में शक्ति भी आती है तथा उसका रोग भी ठीक होने लगता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को मलत्याग करने की इच्छा अधिक होती है तथा इसके साथ ही उसके आन्त में ऐंठन भी होती है और निचली आंतों में गर्मी और चुभन हो रही हो, पेचिश हो गया हो तथा इसके साथ खून भी निकल रहा हो और खूनी दस्त हो रहा हो।
गन्दे पानी के सेवन करने तथा मलेरिया के कारण होने वाले दस्त या खाना खाने के बाद दस्त हो जाना।
इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए अल्स्टोनिया स्कोलैरिस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
अल्स्टोनिया स्कोलैरिस औषधि के कुछ गुणों की तुलना कास्ट्रिक्टा, डिटेन, सिन्कोना, हाइड्रेस्टिस, साइनेटम, चायना, फेर औषधियों से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
अर्क से तीसरी शक्ति तथा आमवाती दर्दों के लिए बाहरी प्रयोग करना चाहिए।
आर्जेन्टम नाइट्रिकम, सिलवर नाइट्रेट (AREGENTUM NITRICUM)
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का प्रयोग उन रोगियों के लिए किया जाता है जिन रोगियों के दिमागी लक्षण बड़े ही आश्चर्य जनक होते हैं जैसे- रोगी के मन में तरह-तरह की बेकार की बातें आती हैं, रोगी बड़ा ही डरपोक होता है, कोई भी काम करने से पहले ही वह घबराने लगता है और रोगी के मन में एक प्रकार का डर पैदा हो जाता हैं। जब रोगी रास्ते में चलते समय ऊंची-ऊंची बिल्डिंगो को देखता है तो उसे चक्कर आने लगता है और रोगी को ऐसा भी महसूस होता है कि पूरी बिल्डिंग उसके ऊपर गिरने को आ रही है। जब रोगी ऊंची बिल्डिंगों को देखता है तो उसके कान में सनसनाहट होने लगती है, शरीर कांपने लगता है तथा उसके शरीर से पसीना निकलने लगता है।
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का प्रयोग उन रोगियों के लिए भी किया जाता है, जिनमें ये लक्षण हो जैसे- रोगी किसी पुल या ऊंची जगह को पार करता है तो वह उस समय यह सोचता है कि शायद वह वहां से गिर जायेगा और मर जायेगा, कभी-कभी तो वह सचमुच ही गिर जाता है।
जब रोगी किसी ऊंचे मकान की खिड़की पर से नीचे की तरफ देखता है तो उस समय वह यह सोचता है कि यहां से कूद पड़ना क्या खतरनाक है और दिमागी कमजोरी के कारण कभी-कभी वह सचमूच ही कूद पड़ता है। इस प्रकार के मानसिक लक्षणों में भी रोगी को आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जा सकती है।
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि और ऐकोनाइट औषधि का प्रयोग उन रोगियों के लिए भी किया जा सकता है जिसे मृत्यु का डर बना रहता है और वह कभी-कभी मृत्यु के समय होने वाले दर्द को महसूस करता है, जैसे- चर्च या सिनेमाहाल को जाते समय रोगी को मलत्याग करने का अनुभव होता है और एक प्रकार का डर महसूस करता है। रोगी को सिर्फ चर्च या सिनेमाहाल को जाते समय ही नहीं बल्कि कहीं भी जाते समय, किसी मित्र से मिलते समय या किसी मीटिंग में बहुत बड़े-बड़े आदमियों से मिलने जाते समय मल त्यागने की इच्छा होती है। जिसके कारण रोगी में स्नायु दुर्बलता (नर्वस वीकनेस) हो जाती है। ऐसे ही कुछ लक्षणों के रोगियों को जेल्सेमियम औषधि भी दिया जा सकता है लेकिन इन लक्षणों के अतिरिक्त कुछ अन्य लक्षण होने पर ही जेल्सेमियम औषधि दिया जा सकता है क्योंकि जेल्सेमियम औषधि की तुलना आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि से की जा सकती है।
कई रोगी ऐसे भी होते हैं जो किसी कार्य करने से पहले ही डर तथा सन्देह अनुभव करते हैं कि शायद वह कार्य सफल न हो। रोगी बहुत अधिक उदास रहता है। इन रोगियों की स्मरणशक्ति (सोचने की शक्ति) बहुत अधिक कमजोर होती है। ऐसे रोगी बहुत अधिक जल्दी-जल्दी चलता है और किसी न किसी कार्य को करने में लगा रहता है ऐसे लक्षणों के रोगियों को आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि के बदले में ऐनाका, क्रियोजो, मर्क, लैक, रक्स-मस, फास-ऐसिड औषधि भी दी जा सकती है।
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि उन रोगियों को भी दिया जा सकता है। जिसके मन में कभी-कभी यह विचार आता है कि समय बहुत धीरे-धीरे चल रहा है (टाईम पासेस स्लोली) और वह इसलिए जल्दी-जल्दी कार्य करने लगता है लेकिन उसे यह भी विचार आता है कि कार्य करने में बहुत देरी हो रही है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगियों को कैनैबिस इन्डिका औषधि भी दी जा सकती है। ऐसे ही कुछ लक्षणों के रोगियों को ग्लोनायन, ऐलूमिना, मर्क-साल, नक्स-मस, मेडोराइनम और नक्स-वोम औषधियां भी दी जा सकती है लेकिन आर्जेन्टम नाइट्रिकम और कैनेबिस औषधि की शक्ति उन औषधियों से कहीं ज्यादा होती है।
कुछ रोगियों में यह भी लक्षण देखने को मिलता है कि समय बहुत जल्दी खत्म हो रहा है, ऐसे रोगियों को काक्यूलस और थेरेडियन औषधि दी जा सकती है।
कुछ ऐसे भी रोगी होते हैं जिन्हें ठण्डी हवा, ठण्डी चीजें, बर्फ,मलाई बर्फ अच्छा लगता है। दरवाजे तथा खुली खिड़कियां उसे बहुत पसन्द आती है। रोगी को गर्म कमरे के अन्दर घुटन महसूस होती है, कमरे के अन्दर यदि बहुत से आदमी हो, चर्च, डांसहाल, मेला का स्थान या किसी सभा में उसे परेशानी महसूस होती है। जिस जगह पर बहुत से आदमियों की भीड़ हो ऐसे स्थान में जाते हुए उसे बहुत अधिक डर महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जा सकती है।
जो रोगी बहुत अधिक दुबला-पतला होता है। जवानी में ही बूढ़े की तरह दिखाई देने लगता है, चेहरे पर झुरियां पड़ जाती है, दिन-प्रतिदिन दुबला होता जाता है, विशेष करके सिर से नीचे का धड़ अधिक दुबला पड़ जाता है। ऐसे रोगियों का उपचार करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जाती है।
यदि किसी बच्चे को सूखे की बीमारी है, जिसमें बच्चा सूख कर दुबला पड़ जाता है, बूढ़ों की तरह दिखाई देता है तो बच्चे के इस रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का प्रयोग कर सकते हैं और इसके बदले इन रोगियों को एब्रोटेनम, आयोडियम और सार्सा पैरिला औषधि भी दी जा सकती है।
कुछ रोगियों में मिठाई खाने की इच्छा बहुत अधिक होती है और उसके मल के साथ आंव भी आता है तो ऐसे रोगियों को आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जा सकती है, लेकिन ऐसे रोगियों में चीनी, मिठाई या मिठाई से बनी चीजें खाने की इच्छा तेज होनी चाहिए। ऐसे लक्षण वाले रोगियों को चायना, लाइको, सल्फ औषधि भी दे सकते हैं।
यदि किसी रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि उसके शरीर का कोई अंग, अंश या पूरा शरीर बढ़ रहा है। ऐसे रोगी को सिर में दर्द होना, सिर का बढ़ जाना, डिम्बकोष में कोई रोग हो जाना तथा डिम्बाशय का फूल जाना महसूस हो रहा हो लेकिन ऐसी कोई बात रोगी में देखने को नहीं मिलती हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का प्रयोग कर सकते हैं।
जिन रोगियों को यह अनुभव होता है कि मेरा सिर बहुत बड़ा हो गया है, खोपड़ी की हडि्डयां पतली पड़ गई हैं, आंखें इतनी बड़ी हो गई हैं, कि गड्ढ़े के बाहर निकल पड़ेंगी, जीभ बहुत बड़ी होकर लटक रही है और सिर का एक भाग टोकरी की तरह बड़ा महसूस हो रहा हो तो ऐसे रोगी को इलाज के लिए पेरिस औषधि दी जा सकती है लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी को जेल्सेमियम औषधि भी दी जा सकती है।
यदि किसी रोगी को अपना ठुड्डी बड़ा होना महसूस हो रहा हो तो ऐसे रोगी के उपचार के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जाती है। इसके अतिरिक्त ग्लोनायन औषधि भी रोगी को दी जा सकती है।
यदि रोगी को एक स्थान से दूसरा स्थान बहुत दूर महसूस हो रहा हो तो उसका उपचार के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जाती है इसके अतिरिक्त कैन-इन्डि औषधि भी रोगी को दी जा सकती है।
यदि रोगी को अपनी आंख के पलकों, सिर, कोई वस्तु, एक टांग बड़ा महसूस हो रहा है तो रोगी का उपचार के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जाती है इसके अतिरिक्त कैन-इन्डि औषधि भी रोगी को दी जा सकती है।
अण्डकोष के फूल जाने पर रोगी को उपचार के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जाती है इसके अतिरिक्त सैबैडिला औषधि भी रोगी को दी जा सकती है।
यदि कोई रोगी अपने आप को बहुत अधिक लम्बा महसूस कर रहा हो तो उसे उपचार के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जाती है इसके अतिरिक्त प्लैटि, पैले, ओपि और स्टैमो औषधि भी रोगी को दी जा सकती है।
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि उन रोगियों को भी दिया जा सकता है जिन रोगियों को सिर में चक्कर आ रहा हो, कान में भनभनाइट शब्द के साथ पैरों में कमजोरी महसूस हो रही हो और शरीर कांप रहा हो। सिर को कसकर बांधने से आराम मिलता हो, खुली हवा में रहने से सिर में दर्द और भी तेज हो रहा हो तथा सिर के दाहिनी तरफ अक्सर दर्द हो रहा हो, दर्द तीव्रता तथा जलन के साथ हो रहा हो। ऐसे रोगी जब मानसिक कार्य करते हैं तो उनका दर्द और भी तेज हो जाता है, रोगी को ऐसा लगता है कि सिर बहुत बड़ा हो गया है। रोगी के सिर के जिस भाग की तरफ दर्द होता है। उस भाग की तरफ की आंखें रोगी को बहुत बड़ी महसूस होती है। ऐसे रोगी को उपचार के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि के अलावा बोर, ग्लोन तथा सिमिस औषधि भी दी जा सकती है।
आधे सिर के दर्द से पीड़ित रोगी के रोग की चिकित्सा के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जाती है। आधे सिर में दर्द होने के कारण रोगी पागल सा हो जाता है, जब यह दर्द बहुत तेज हो जाता है तो रोगी का शरीर में कंपन होने लगती है और रोगी बेहोश सा हो जाता है। सिर को किसी कपड़े से कसकर बांधने से और उल्टी हो जाने से रोगी को आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में नज़र आता है तो उसे आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि देते हैं। इससे उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
आंखों के कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि लाभदायक है। आंखों में तेज दर्द होने के कारण आंखें सुर्ख हो जाती हैं, आंखों से मवाद आता है, किसी रोशनी को देखने में परेशानी होती है आदि लक्षण यदि रोगी में हो तो उसका उपचार करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि अधिक उपयोगी है।
यदि रोगी के आंख का कोना खून जैसा लाल होकर फूल गया हो और आंख के किनारे का लाल मांस का टुकड़ा बढ़ गया हो तो उसे ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी होती है।
यदि किसी रोगी के आंखों के सामने सांप की तरह पतली चीज़ उड़ती हुई नज़र आती हो, गर्म कमरे के अन्दर या आग के सामने रहने से परेशानी हो रही हो, आंखों में ठण्डा पानी लगाने या ठण्डी खुली हवा में रहने से आराम मिलता हो तथा आंखों की सिकाई करने से आराम मिलता हो तो ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए मर्क-साल औषधि दी जाती है लेकिन इसके अलावा आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि भी रोगी को दे सकते हैं।
यदि रोगी की आंखें बहुत लाल हो गई हों तो उपचार के लिए बेलाडोना औषधि का प्रयोग कर सकते हैं लेकिन यदि रोगी के आंखों में लाली के साथ सफेद दाने भी दिखाई देते हैं तो रोगी को उपचार करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत अधिक उपयोगी होती है।
यदि रोगी के आंखों से बहुत अधिक मवाद निकल रहा हो या आंख के अन्दर मवाद रुक जाने से आंखों में सूजन आ गई हो तो उसे ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत अधिक उपयोगी है, लेकिन यदि आंखों में से बहुत अधिक गाढ़ा मवाद आ रहा हो तो पल्सेटिला औषधि भी दी जा सकती है।
यदि आंखों में दानें पड़कर सूजन हो तो रोगी की चिकित्सा करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जा सकती है। पलकों में सूजन होने पर भी इस औषधि को दिया जा सकता है।
यदि किसी व्यक्ति को बहुत अधिक बारीक अक्षरों की पुस्तक पढ़ने से नज़र खराब हो गई हो तो उसकी नज़र को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है। रोगी को पास की चीजें ठीक से दिखाई न दें और दूर की चीजें आसानी से दिखाई दें, पढ़ते समय पास से न पढ़ सकने पर पुस्तक को दूर बढ़ाना पड़े, ताकि अक्षर ठीक तरह से दिखाई दें तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि लाभदायक है।
यदि किसी रोगी के चेहरे पर बून्द बून्द पसीना जम रहा हो, चेहरा पीला, नीला सूखा हो गया हो, आंखें और गाल बैठ गये हों, वह जवानी में ही बूढ़ा और रोगी मालूम पड़ रहा हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि अधिक उपयोगी है।
भूख का न लगना, पेचिश का दर्द, अरुचि, पतले दस्त, जीभ पर कांटे पड़ जाना, पेट में हवा भर जाना, जीभ में दर्द होना, जोर-जोर से डकार आना, मलद्वार में से जोर से हवा का निकलना, मीठी चीजों को खाने की इच्छा अधिक होना आदि लक्षण तथा इन लक्षणों के अतिरक्ति रोगी का मल हरा तथा आंव मिला हो रहा हो और मलत्याग करने पर हवा के निकलने के साथ मल के छींटे इधर-उधर पड़ रहा हो तो रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
यदि किसी बच्चे की माता अधिक मीठी चीजें खाती हो और बच्चे को हरे रंग का पतला मल आ रहा हो और बच्चे को मलत्याग करते समय हवा निकलने के साथ मल के छींटे इधर-उधर पड़ रहा हो और यहां तक की मलत्याग करते समय फट-फट की आवाज सुनाई दें तो बच्चे के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि देना चाहिए और माता को मीठी चीजें खाने के लिए मना कर देना चाहिए।
जिन बच्चों को सूखे की बीमारी के साथ हैजा (कलरा इनफेंटम) रोग भी हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत ही उपयोगी है। अधिक मिठाई खाकर जिन बच्चों का पेट खराब हो गया हो उनके लिए भी आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि लाभदायक है। पुरानी पेचिश के रोग में, जिसमें अन्तड़ियों में घाव होने का अनुमान हो उसके रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि लाभदायक है।
विभिन्न रोगों में आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का प्रयोग :-
पेशाब से सम्बन्धित लक्षण :-
मूत्र-नली की सूजन, दर्द और जलन होने पर रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि लाभदायक है। पेशाब के साथ खून आता हो और पेशाब रुक-रुक कर होता हो तथा सूजाक रोग की अवस्था में जब मवाद आ रहा हो तो रोग को ठीक करने में आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि उपयोगी है।
स्त्रियों के सूजाक रोग और पीब युक्त प्रदर रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि उपयोगी है। स्त्रियों के जरायु के मुंह में दर्द के साथ घाव होने और उसमें खून निकलने पर आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का उपयोग अधिक लाभदायक है।
बेहोशी में दिन-रात पेशाब हो जाना, मूत्रनली में जलन होना, मूत्र नली में खुजली होना, मूत्रनली में कांटे गड़ने जैसा दर्द होना, पेशाब बहुत कम होना तथा गहरे रंग का होना। पेशाब करने के बाद भी पेशाब की कुछ बून्दें टपकती रहती हैं। पेशाब करते समय पेशाब की धार बंट जाती है, सूजाक रोग होना, पेशाब करते समय तेज दर्द होना तथा पेशाब में रक्त की मात्रा निकलना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- सुंगध की पहचान न कर पाना, नाक में खुजली, नाक में कोई जख्म होना, नजला-जुकाम, इसके साथ ठण्ड अधिक लगना तथा आंख से आंसू निकलने के साथ सिर में दर्द होना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गला बैठकर आवाज भारी हो जाने पर रोग का उपचार करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि उपयोगी है।
लकवा से सम्बन्धित लक्षण :-
कई प्रकार के लकवा रोग (पक्षाघात) को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि उपयोगी है।
शरीर की नियमित क्रिया खराब हो जाने के कारण हाथ-पैरों का कड़ा और सुन्न पड़ जाना और उनमें तेज टीस की तरह दर्द होने पर रोग को ठीक करने में आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है।
बांयें फेफड़े और दिल में टीस मारने जैसा दर्द होना, सांस लेने में परेशानी होना, पीठ और पांव कमजोर तथा सुन्न पड़ जाना। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसे आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि दी जा सकती है।
हृदय रोग से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है।
लकवा रोग से पीड़ित रोगी को बहुत अधिक कमजोरी हो तो आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि लाभदायक होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :
आमाशय का दर्द (पेट में दर्द), मन्दाग्नि (अपच) और आमाशय के घावों को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है।
अतिसार (दस्त) तथा पेचिश रोग को ठीक करने के लिए भी आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि उपयोगी है।
उबकाई आना, जी मिचलाना, पेट के अन्दरुनी भाग में सूजन तथा दर्द होना, पेट के सभी भागों में दर्द होना, पेट में दर्द के साथ दान्तों से कुतरने जैसी आवाज सुनाई देना, पेट में जलन तथा सिकुड़न होना, डकार लेने का प्रयास करना लेकिन डकार न आना, मीठी चीजों की खाने की इच्छा करना, शरीर के बांई ओर की पसलियों के नीचे घाव होकर दर्द होना, आमाशय के अन्दर कंपन और अकड़न होना तथा पनीर और नमक खाने की इच्छा करना, इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :
पीठ की बीमारी के साथ रोगी को बहुत अधिक आलस्य हो और इसके साथ ही हाथ के अगले भाग और पैर के निचले भाग में खासतौर पर तलुवों में थकान महसूस हो तो रोगी के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है।
पीठ में अधिक तेज दर्द होना, रात के समय में गर्दन पर तेज दर्द होना तथा रीढ़ के पिछले भाग में दर्द महसूस हो। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मिर्गी से सम्बन्धित लक्षण : मिर्गी रोग जिसमें रोगी को दौरे पड़ने के कई घंटे पहले ही रोगी की आंखों की पुतलियां फैल जाती हैं तथा धनुष टंकार रोग (इस रोग के कारण रोगी का शरीर धनुष की तरह अकड़ जाता है) जिसमें रोगी को बहुत बेचैनी महसूस होती हो तो ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का प्रयोग करे।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- गाल धंसा हुआ, बूढ़े जैसा दिखाई पड़ना, चेहरा पीला और नीला पड़ना तथा हडि्डयों के ऊपर की खाल तनी हुई महसूस होती है। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण : मसूढ़े अधिक मुलायम हो जाते हैं जिनमें से रक्त का स्राव (खून निकलना) होना, जीभ पर छाले उभरना, जीभ के आगे का भाग लाल दिखना तथा दर्द होना, दान्तों में दर्द होना, जीभ का स्वाद तांबे और स्याही जैसा लगना, मुंह में घाव होना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण : गले तथा मुंह के अन्दर अधिक गाढ़ा श्लेष्मा (थीक मुसस) जमा हो जाना, जिसे रोगी को खखार कर मुंह से बाहर निकालना पड़ता है। गले में खरखराहट होना तथा दर्द होना, खाना को निगलते समय कांटे की तरह चुभन होना, गले के आन्तरिक हिस्से का लाल पड़ जाना, धूम्रपान करने वालों को नजला होना तथा इसके साथ ही गले के अन्दर बाल अड़ने जैसी गुदगुदी होना तथा दम घुटना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण : पेट में दर्द, पेट का अधिक फूलना, आमाशय के बाई ओर की छोटी पसलियों के नीचे सुई की चुभन जैसा दर्द होना तथा पेट में घाव होना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग का उपचार करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है।
दस्त से सम्बन्धित लक्षण : मल पानी की तरह होना, आवाज तथा हवा के साथ मल का त्याग होना, हरा मल होना साथ ही पेट का अधिक फूलना, बदबूदार मल निकलना, खाना खाते ही तुरन्त दस्त हो जाना, पेय-पदार्थ पीने पर तुरन्त ही मलद्वार से पानी जैसा पदार्थ बाहर निकल जाना, मीठा खाने की इच्छा होना, मानसिक सन्तुलन ठीक न होना तथा मलद्वार में खुजली होना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- नपुंसकता रोग होना, सम्भोग की चेष्टा करते ही लिंग ढीला पड़ जाना, कैंसर रोग होना, सम्भोग की इच्छा नहीं होना, जननांग सिकुड़ जाना, सम्भोग करते समय दर्द महसूस होना आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :
मासिक धर्म शुरू होने पर आंतों में दर्द होना, स्तनों के पास दर्द होना, रात के समय में सम्भोग क्रिया करने की उत्तेजना अधिक होना, मासिकधर्म में अधिक मात्रा में रक्त का स्राव होने के कारण योनि का छिल जाना, किसी भी समय रक्त का स्राव होना, मासिकधर्म के दो सप्ताह बाद गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली से रक्त का स्राव होना तथा बाई डिम्बग्रन्थि का दर्दनाक रोग। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि लाभकारी है।
श्वास संस्थान रोग से सम्बन्धित लक्षण :
ऊंची आवाज में बोलने पर खांसी होना, पुरानी खराश, दम घुटने वाली खांसी होना, गले के अन्दर कई बाल अड़ने जैसा अनुभव होना, सांस लेने में परेशानी होना, छाती का ठोस महसूस होना, धड़कन तथा नाड़ी का अनियमित और रुक-रुककर चलना, दांई तरफ शरीर को करके लेटने में परेशानी महसूस होना, छाती में तेज दर्द होना, हृदय के रोग, इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि बहुत उपयोगी है।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण :
त्वचा में खिंचाव होना, त्वचा मुरझाई हुई लगना, त्वचा का शुष्क हो जाना तथा त्वचा पर चकत्ते से निशान हो जाना आदि लक्षण यदि रोग में तो इसका उपचार आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि से करना चाहिए।
अनिद्रा रोग से सम्बन्धित लक्षण :
नींद न आना, बहुत अधिक सोचने के कारण नींद न आना, सांपों के सपने देखना आदि लक्षण यदि रोगी में है तो इसका उपचार आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि से हो सकता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बन्धित लक्षण :
ठण्ड के साथ जी का मिचलाना, शरीर पर वस्त्र न डालने पर ठण्ड लगना और बुखार हो जाना तथा घुटन महसूस होना जैसे लक्षण यदि रोगी में हो तो इसका उपचार आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि से कर सकते हैं।
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि और लिलियम औषधि में तुलना :
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि और लिलियम औषधि में समान गुण पाये जाते हैं क्योंकि दोनों औषधियों में गर्भाशय की बीमारी को ठीक करने की शक्ति होती है। यदि रोगी उत्तेजना में आकर पतले दस्त कर रहा हो तो इन दोनों ही औषधियों से यह रोग ठीक हो सकता हैं। यदि लक्षणों के अनुसार एक औषधि का प्रयोग एक दूसरे की तुलना में उपयुक्त न लगे तो आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का उपयोग करना ही उचित होता है। ऐसा इसलिए उचित रहता है क्योंकि खनिज औषधियों का प्रभाव कई वर्षों तक रहता है।
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का सल्फर या कास्टिम औषधि से तुलना :
पीठ और बाहरी अंगों पर आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का असर बहुत अधिक होता है। जब किसी रोगी के कमर में दर्द हो रहा हो, खड़े होने या चलने पर यह दर्द घट जाए लेकिन अपनी जगह से उठने पर दर्द बहुत अधिक बढ़ जाता हो तो रोगी के रोग को ठीक करने के लिए सल्फर औषधि बहुत उपयोगी है लेकिन इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी का उपचार आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि से भी हो सकता है।
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि की तुलना :
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि के गुणों की तुलना नाइट्र-एसिड, नेट्रम्-म्यूर, आरम और क्यूप्रम औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :
ठण्डा खाना, चीनी खाना, आइसक्रीम खाना, ठण्डी हवा में रहने तथा अधिक मानसिक परिश्रम का कार्य करने पर आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि अधिक करना पड़ सकता है।
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि की ह्रास :
खुली हवा में रहने, चेहरे पर हवा की झोंक अच्छी लगने तथा ठण्डे पानी से नहाने पर आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का असर कम हो जाता है।
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि के दोषों को दूर करना :
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि का बहुत अधिक दुरुपयोग किया गया हो तो उसके विष के प्रभाव को नष्ट करने के लिए नेट्रम्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए। उस समय तो नेट्रम्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग और भी जरूरी हो जाता है, जब श्लैष्मिक झिल्ली रोग ग्रस्त हो गई हो।
मात्रा :
आर्जेन्टम नाइट्रिकम औषधि की तीसरी से तीसवीं शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
एबिस कैनाडैंसिस (ABIES CANADENSIS-PINUS CANADENSIS)
एबिस कैनाडैंसिस औषधि श्लैष्मिक झिल्लियों को प्रभावित करती है और आमाशय के रोग से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने में लाभदायक होती है। यह आंतों के रोगों को ठीक करने में बहुत ही सहायक औषधि है। कुपोषण तथा कमजोरी को दूर करने में यह बहुत उपयोगी है।
जिन रोगियों को सांस लेने में परेशानी होती है और हर समय लेटे रहने का मन करता है, त्वचा ठण्डी तथा चिपचिपी रहती है तथा हाथ ठण्डे पड़ जाते हैं और शरीर में अधिक कमजोरी महसूस होती है और जिसका दायां फेफड़ा व यकृत कठोर महसूस होता है, इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एबिस कैनाडैंसिस औषधि बहुत उपयोगी है।
एबिस कैनाडैंसिस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोग को ठीक करने में बहुत उपयोगी हैं-
भूख अधिक लगने के साथ यकृत की क्रिया कमजोर हो जाना :- रोगी को पेट में खरोचने जैसी भूख अर्थात तेज भूख लगती है। खुरचन के कारण रोगी भूख से ज्यादा खाना खा जाता है, रोगी इतना अधिक खा लेता है कि उसे पता ही नहीं लगता कि उसने कितना खाया है, अधिक खाना खाने के कारण रोगी का पेट फूल जाता है जिसके कारण हृदय पर दबाव पड़ता है और हृदय की गति तेज होने लगती है। इससे हृदय की धड़कन बढ़ जाती है। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एबिस कैनाडैंसिस औषधि प्रयोग करना चाहिए।
शरीर में अधिक कमजोरी महसूस होना तथा हर समय लेटे रहने की इच्छा करना - रोगी को अपने शरीर में बहुत अधिक कमजोरी महसूस होने लगती है, हर समय लेटे रहने का मन करता है और शरीर में सुस्ती होने लगती है। ऐसे लक्षण खान-पान में पौष्टिकता की कमी के कारण होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एबिस कैनाडैंसिस औषधि बहुत उपयोगी है।
नसों में बर्फ की तरह ठण्डा खून बहना महसूस होना :- रोगी को बहुत अधिक ठण्ड लगती है, हाथ तथा त्वचा ठण्डी पड़ जाती है, रोगी को बुखार हो जाता है तथा इसके साथ-साथ रोगी को ऐसा महसूस होता है कि नसों में बहुत अधिक ठण्डा खून बह रहा है। पीठ में ऊपर से नीचे की तरफ ठण्ड महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एबिस कैनाडैंसिस औषधि बहुत उपयोगी है।
गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली का अपने स्थान से हटना :- स्त्रियों के जरायु के आगे के भाग पर हल्का-हल्का दर्द महसूस होता है और चलने तथा दबने के कारण यह दर्द कम हो जाता है। स्त्रियों को अपना गर्भाशय कोमल तथा कमजोर महसूस होती है। जरायु (गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली) अपने स्थान से हट जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्रियों के रोग को ठीक करने के लिए एबिस कैनाडैंसिस औषधि बहुत उपयोगी है।
शलगम, गाजर तथा अचार खाने की इच्छा :- रोगी को गाजर, शलजम तथा अचार खाने की इच्छा अधिक होती है, मोटा अन्न खाने की इच्छा भी बहुत अधिक होती है। रोगी को बहुत अधिक ठण्ड लगती है, शरीर में कमजोरी बहुत अधिक महसूस होती है, भूख तेज लगती है, चटनी तथा अचार खाने की इच्छा अधिक होती है। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एबिस कैनाडैंसिस औषधि बहुत उपयोगी है।
दायें कन्धे के ब्लड (स्केपुला) में दर्द होना :- यदि किसी रोगी के दायें कन्धे में दर्द हो रहा हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एबिस कैनाडैंसिस औषधि बहुत उपयोगी है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में हल्का-हल्का दर्द महसूस हो रहा हो तथा ऐसा लगता है कि रोगी नसे में है तथा स्वभाव चिड़चिड़ा हो तो उसके रोग को ठीक करने में एबिस कैनाडैंसिस औषधि लाभदायक है।
ज्वर (बुखार) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार कंपकंपी के साथ होता है, खून बर्फ के समान ठण्डा महसूस हो रहा हो, ठण्ड पीठ पर ऊपर से नीचे की ओर महसूस हो रही हो, ऐसा लग रहो हो कि हड्डी के जोड़ों के बीच ठण्डा पानी रख दिया गया हो तथा त्वचा चिपचिपी व लेसदार हो जाती है और रात को पसीना अधिक निकल रहा हो तो रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एबिस कैनाडैंसिस औषधि बहुत उपयोगी है।
मात्रा :-
एबिस कैनाडैंसिस औषधि की 30 व 200 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
एबिस नाइग्रा (Abies Nigra) (Black Spruce)-एबि नाइ
कई प्रकार के रोग जिनमें आमाशय से सम्बन्धित लक्षण अधिक देखने को मिलते हैं, उन रोगों को ठीक करने में एबिस नाइग्रा औषधि बहुत लाभदायक है। इसकी क्रिया का प्रभाव आमाशय के श्लैष्मिक किनारों पर होती है और इसका प्रभाव शरीर पर भी पड़ता है। जिन रोगों में पाचन दोष अधिक देखने को मिलता है, उन रोगों को ठीक करने में भी यह औषधि बहुत उपयोगी है। बूढ़े व्यक्तियों को होने वाला हृदय रोग तथा भूख कम लगने वाले रोग, चाय तथा तम्बाकू के कारण उत्पन्न रोग, कब्ज तथा शरीर के बाहरी रोम छिद्रों तथा रंध्रों में होने वाले दर्द को ठीक करने के लिए यह अधिक उपयोगी है।
मन अत्यधिक खिन्न और उदास रहता है तथा पागलपन की अवस्था बनी रहती है, पढ़ने या लिखने के कार्य करने में असमर्थ होना, मस्तिष्क में धुंधला सा रहना, हल्का-हल्का सिर में दर्द रहना, अजीबों-गरीब अनुभव होना जिसे व्यक्त न कर पाना, बुरा-बुरा सा महसूस होना, सिर गर्म और गालों पर लालिमा तथा भारीपन महसूस होना। ये लक्षण यदि रोगी में है तो उसका उपचार करने के लिए एबिस नाइग्रा औषधि बहुत उपयोगी है।
एबिस नाइग्रा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
पेट के ऊपरी भाग में कोई चीज़ अटकी हुई महसूस होना :-रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसके पेट के ऊपरी भाग में कोई अण्डे के सामान चीज अटकी हुई है जो न बाहर आती है न नीचे उतरती है। इसके कारण रोगी के पेट में दर्द होता है तो रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एबिस नाइग्रा औषधि बहुत उपयोगी है।
खाने के बाद पेट में दर्द होना :- जिन रोगियों को खाना खाने के बाद पेट में दर्द होता है, उन रोगियों के लिए एबिस नाइग्रा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सुबह के समय भूख न लगना :- जिन रोगियों को सुबह के समय में भूख बिल्कुल नहीं लगती है, लेकिन दोपहर और रात के समय में खाने की इच्छा तेज होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लिए एबिस नाइग्रा औषधि लाभकारी है।
बूढ़े व्यक्तियों को बदहजमीं (खाना न पचना) की बीमारी होना :-बूढ़े व्यक्तियों की बदहजमी होने तथा इसके साथ हृदय रोग का लक्षण भी दिखाई दें तो उपचार के लिए एबिस नाइग्रा औषधि बहुत उपयोगी है।
चाय तथा तम्बाकू का सेवन के कारण बदहजमी होना :- चाय और तम्बाकू के सेवन के कारण बदहजमी होने पर तथा पेट के रोग होने पर उपचार करने के लिए एबिस नाइगा्र औषधि लाभदायक है। चाय तथा तम्बाकू के सेवन से अक्सर रोगी में उत्साहहीनता तथा रात को नींद न आना आदि लक्षण होते हैं तो ऐसे रोगियों के लिए यह एबिस नाइग्रा औषधि लाभदायक है।
छाती में कुछ अटका हुआ सा महसूस होना :- रोगी को ऐसा लगता है कि छाती में कुछ अटका हुआ है और खांसने पर ऐसा लगता है कि अटका हुआ चीज़ निकल गया, छाती में दर्द महसूस होता है। खांसी के बाद मुंह में पानी भर जाता है तथा गले में घुटन महसूस होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एबिस नाइग्रा औषधि बहुत उपयोगी है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी रोगी के पीठ के नीचे के भाग में दर्द हो रहा हो तो उसके दर्द को ठीक करने में एबिस नाइग्रा औषधि उपयोगी है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर गर्म होने के साथ-साथ गाल लाल, सुस्ती तथा नींद न आने के लक्षण रोगी में है तो उसके रोगी को ठीक करने के लिए एबिस नाइग्रा औषधि उपयोगी है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रात के समय में नींद न आने के कारण भूख लगने के लक्षण रोगी में है तो उसका रोग एबिस नाइग्रा औषधि से ठीक हो सकता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :-कान के बाहरी नली में दर्द होने पर एबिस नाइग्रा औषधि का उपयोग लाभदायक होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :-गला बैठने जैसा महसूस होना, ऐसा लगना जैसे कि कोई चीज़ गले के नली के अन्दर चिपकी हुई है। इस प्रकार के लक्षण होने पर एबिस नाइग्रा औषधि का उपयोग लाभदायक होता है।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :-रोगी को बुखार के साथ-साथ गर्मी तथा ठण्ड का बारी-बारी से महसूस होना तथा पेट में दर्द होने पर एबिस नाइग्रा औषधि का उपयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-स्त्रियों का मासिकस्राव बन्द रहना या देर से आना सांस लेने में कठिनाई होना, लेकिन सांस छोड़ने में आसानी होना। इन लक्षणों से पीड़ित स्त्री का उपचार करने के लिए एबिस नाइग्रा औषधि उपयोगी है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
एबिस नाइग्रा औषधि की तुलना ब्रायो, कैमो, इग्ले, नक्स-वो, लैक्टि क-ए औषधियों से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
एबिस नाइग्रा औषधि की 1 से 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
आर्जेण्टम मेटालिकम (ARGENTUM METALLICUM)
शरीर में शक्ति की बहुत अधिक कमी हो जाना तथा धीरे-धीरे शरीर का सूखते चले जाना, ताजी हवा की इच्छा होना, सांस लेने में रुकावट होना, शरीर में अधिक फैलाव महसूस होना तथा बाईं ओर दर्द होना आदि लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि उन रोगी के रोगों को ठीक करने के लिए उपयोग किया जाता है जो अधिक ठण्डी प्रकृति वाले होते हैं, गर्मी पसन्द नहीं करते है, गर्मी से उसके शरीर के दर्द में कमी होती है, सिर दर्द होने के कारण रोगी को गर्मी ही अच्छी लगती है, सिर को दबाने और किसी कपड़े से कसकर बांधने से दर्द से आराम मिलता है, ठण्ड, नम, तूफानी मौसम में गठिया रोग की परेशानी अधिक बढ़ जाती है, रोगी की सारी परेशानियां नींद टूटने पर बढ़ने लगती है, जब रोगी अधिक चलने फिरने का कार्य करता है तो उसकी तकलीफें ज्यादा मालूम होती हैं।
शरीर की हडि्डयों के जोड़ों तथा उनके सहायक अंगों, हडि्डयों, उपास्थियों पर आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का अच्छा प्रभाव देखने को मिलता है।
छोटी-छोटी रक्तवाहिनियां बंद हो जाती हैं अथवा सूख जाती है तथा क्षयकारी रोग उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार के लक्षण गुप्त रूप से आरम्भ होते हैं और देरी से उत्पन्न होते है लेकिन बढ़ते रहते हैं तथा स्वरयंत्र की रुकावट होने पर आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी रोगी का शरीर सूखता जा रहा हो तथा शरीर में बहुत अधिक कमजोरी आ गई हो तथा उसका मन व्याकुल हो रहा हो और उसे ऐसा महसूस हो रहा हो कि समय बहुत धीरे-धीरे चल रहा है तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर की बाईं ओर की नाड़ियों में हल्का-हल्का दर्द हो रहा हो, तथा यह दर्द धीरे-धीरे बढ़ता जा रहा हो और अचानक ही गायब हो जाता हो, खोपड़ी को छूने से दर्द महसूस हो रहा हो, रोगी जब बहते हुए पानी को देख लेता है तो उसे चक्कर आने लगता तथा उसे नशा महसूस होने लगता है, सिर खाली तथा खोखला सा महसूस होता है, पलकें लाल और मोटी सी हो जाती है, थका देने वाले नजले और छींके आने लगते हैं, चेहरे की हडि्डयों में दर्द होने लगता है, बाई आंख तथा सिर की अगली हड्डी के उभार के मध्य भाग में दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले में बार-बार खंखार आने लगता है और खंखारने के कारण भूरा, लसलसी जैसा कफ निकलने लगता है और इसके साथ ही गले में दर्द होने लगता है, सुबह के समय में अधिक मात्रा में बलगम निकलता है तथा आसानी से बलगम गले के बाहर निकल जाता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले के अन्दर खंखार अटका हुआ रहता है, आवाज बंद हो जाती हैं इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब खांसता है तो उसके गले में दर्द होने लगता है, बलगम आसानी से निकलने लगता है, कफ ऐसा लगता है जैसे उबला हुआ हो, जब रोगी अधिक बोलने का कार्य करता है तो उसे अधिक परेशानी होने लगती है, दोपहर के समय में बुखार और भी तेज हो जाता है, जोर-जोर से पढ़ते समय बार-बार खंखारना पड़ता है, छाती में कमजोरी महसूस होती है तथा बाईं ओर के छाती में ऐसा अधिक होता है, रोगी की आवाज घटने या बढ़ने लगती है और इसके साथ ही बांईं ओर की निचली पेशियों में दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कमर में तेज दर्द होता है तथा वह झुककर चलने लगता है और इसके साथ ही रोगी को घुटन सी महसूस होने लगती है तथा इसके अलावा शरीर में कमजोरी भी महसूस होने लगती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को मूत्र से सम्बन्धित बीमारी उत्पन्न हो जाती है तथा इसके साथ ही रोगी को पेशाब अधिक मात्रा में आता है तथा पेशाब अधिक गंदा और मीठा और बदबूदार होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के हडि्डयों के जोड़ तथा विशेष रूप से कोहनी और घुटने के जोड़ों में दर्द होने लगता है, टांगें अधिक कमजोर हो जाती है, टांगें कंपकंपाने लगती हैं, जब रोगी सीढ़ियों से उतरता है तो उस समय अधिक दर्द होता है, हाथ-पैरों की उंगलियों में अधिक सिकुड़न और ऐंठन होने लगती है, हाथ के अगले बाजू में लकवा जैसा प्रभाव देखने को मिलता है और इस भाग में ऐंठन होने लगती है और टखनें में भी ऐंठन होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के अण्डकोष में कुचलन महसूस होती है तथा संभोग क्रिया करे बिना ही वीर्यपात हो जाता है। रोगी का पेशाब अपने आप निकल जाता है तथा इसके साथ जलन भी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी स्त्री की डिम्बग्रन्थियां बहुत बड़ी सी महसूस होने लगती है और उनमें ऐसा दर्द होता है जैसे बच्चे के दर्द के समय में होता है।
गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली का फट जाना तथा छील जाना और स्पंज कोमल होना, प्रदर रोग होना और प्रदर रोग के दौरान जब स्राव होता है, उसमें से अधिक बदबू आती रहती है।
किसी किसी स्त्री के गर्भाशय में कैंसर हो जाता है तथा उसमें जलन होने लगती है तथा बाईं ओर की डिम्बग्रन्थियों में दर्द होता है।
रोगी स्त्री के मासिकधर्म के समय में रक्त का स्राव होने लगता है तथा इसके साथ में रोगी स्त्री को पेट में दर्द भी होने लगता है और कभी-कभी तो झटके लगने महसूस होने लगते हैं।
रोगी स्त्री को जरायु रोग के साथ हडि्डयों के जोड़ों तथा शरीर के अन्य अंगों में दर्द होने लगता है।
इस प्रकार के स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण होने पर रोग को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हस्त-मैथुन से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी को प्रत्येक रात के समय में स्वप्नदोष होता है या वह हस्त-मैथुन करता है तो ऐसे रोगी के इस आदत तथा इस रोग को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मिर्गी से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी रोगी को मिर्गी से मिलते जुलते लक्षण हो तथा बेहोशी हो रही हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के अन्दरूनी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के आंतरिक अंगों (अन्दरुनी भाग) में दर्द होना तथा रूखापन महसूस होना, पेट के बल चित्त लेटने पर हृदय की मांसपेशियों में ऐंठन और मरोड़ होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
वीर्यपात से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के लिंग में उत्तेजना खत्म हो जाती है तथा प्रतिदिन रात के समय में अपने आप वीर्यपात हो जाता है जिसके कारण शरीर में अधिक कमजोरी आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
गाड़ी से सवारी करने, बातचीत करने, गाना गाने और जोर से पढ़ने से किसी के स्पर्श होने पर, दोपहर के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
खुली हवा में रहने, रात के समय में लेटने पर खांसी होने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
प्लैटीना, स्टैनम, अम्पोलोप्सिस तथा सेलीनि औषधियों की तुलना आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष :-
मर्क्यू तथा पल्सा औषधियां आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करती है।
मात्रा (डोज) :-
आर्जेण्टम मेटालिकम औषधि की छठी शक्ति के विचूर्ण तथा उच्च शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इसे बार-बार नहीं दोहराई जानी चाहिए।
एक्विलेजिया (Aquilegia)
एक्विलेजिया औषधि का प्रयोग वात रोग (पेट में वायु बनना) को ठीक करने के लिए उपयोग किया जाता है।
बच्चेदानी में वायु का गोला बनना, वायु के कारण पसलियों में दर्द होना आदि लक्षणों को ठीक करने के लिए इस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। स्त्रियों को मासिकधर्म के समय में होने वाले रोगों के साथ हरे रंग के पदार्थों की उल्टी होना, सुबह के समय में अनिद्रा होना, शरीर की स्नायुविक कम्पन (नाड़ियों में कंपन होना), प्रकाश और शोरगुल के प्रति संवेदनशील होना, मासिकधर्म में तेज दर्द आदि इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एक्विलेजिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मासिकधर्म के समय में स्राव बहुत कम होना तथा इसके साथ ही कमर पर तेज दर्द होना तथा दर्द का असर पूरे शरीर पर होना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एक्विलेजिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
एक्विलेजिया औषधि की पहली शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एब्रोमा रैडिक्स ABROMA RADIX
स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए एब्रोमा रैडिक्स औषधि का उपयोग बहुत लाभदायक होता है।
स्त्रियों को मानसिक परेशानी की समस्या, अनियमित मासिकधर्म होना, मासिकधर्म में अधिक कष्ट होना, मासिक धर्म में स्राव अधिक होना तथा कम होना तथा प्रदर रोग को ठीक करने में एब्रोमा रैडिक्स औषधि उपयोग बहुत लाभदायक है।
मात्रा (डोज):-
एब्रोमा रैडिक्स औषधि की मूलार्क, 2x, 3x शक्तियां का प्रयोग करना चाहिए।
एब्रोटेनम-सदर्नवुड (ABROTANUM-SOUTHERNWOOD)-एब्रोटे
सुखण्डी रोग (इस रोग के कारण रोगी का शरीर सूखने लगता है) को ठीक करने के लिए एब्रोटेनम औषधि बहुत उपयोगी है। विशेषकर तब जब शरीर के अंग बहुत अधिक सूखे रोग से प्रभावित हो। किसी अन्य रोग के दब जाने के कारण कोई दूसरा रोग होने पर जैसे कि दस्त के रुक जाने पर गठिया हो जाना, विशेष रूप से गठिया रोग होने पर एब्रोटेनम औषधि का उपयोग बहुत लाभदायक होता है।
यदि कोई बच्चा बहुत ही झगड़ालू और बदमिजाज होता है, जो चीज सामने देखता है उसी पर गुस्से से लात मार देता है या बच्चों के अण्डकोष में वृद्धि हो गया है या बच्चे के नाक से खून निकल रहा है तो एब्रोटेनम औषधि का उपयोगी है।
एक बीमारी के दबने से दूसरी बीमारी उत्पन्न हो गई हो तो इस एब्रोटेनम औषधि का उपयोग लाभकारी होता है और इसके उपयोग से वह बीमारी ठीक हो जाती है। उदाहरण के लिए कर्णमूल (मम्पस-कान की जड़) का उपचार करने के कारण दबाव पड़ने पर अण्डकोष (टेस्टस) या स्तनों का बढ़कर सख्त हो जाना जैसे लक्षण हो तो एब्रोटेनम औषधि का उपयोग लाभकारी होगा।
यदि पेचिश या दस्त की बीमारी किसी दवा (क्रुड मेडीसिंस) से अचानक रुक जाए और इसके बाद वात रोग हो जाए तो इस रोग को ठीक करने के लिए एब्रोटेनम औषधि उपयोगी होगा।
एब्रोटेनम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण: चेहरे पर झुर्रियां पड़ जाना तथा दरार पड़ना, चेहरे की त्वचा ठण्डा होना, त्वचा रूखा तथा पीला हो जाता है, आंखों के चारों ओर नीले छल्ले पड़ना तथा नकसीर रोग होना। इन लक्षणों को ठीक करने के लिए एब्रोटेनम औषधि का उपयोग बहुत अधिक लाभदायक है।
मन से सम्बन्धित लक्षण : रोगी में चिड़चिड़ापन होना, जिद्दी होना, जल्दी घबरा जाना तथा जल्दी निराश हो जाना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी ठीक करने के लिए एब्रोटेनम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण : जीभ का स्वाद चिपचिपा लगना, भूख अधिक लगना, रात के समय में आमाशय में तेज दर्द होना, उल्टी होना जैसे लक्षण यदि रोगी में हैं तो उसका उपचार करने के लिए एब्रोटेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए इससे बहुत अधिक लाभ मिलता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण : पेट के अन्दर कठोर गांठें हो गई हो, दस्त तथा कब्ज की समस्या हो, खूनी दस्त हो रहा हो तथा बवासीर रोग हो गया हो तो ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए एब्रोटेनम औषधि का उपयोग किया जाना चाहिए।
सांस संस्थान से सम्बन्धित लक्षण : सांस लेने तथा छोड़ने में परेशानी होना, दस्त के बाद सूखी खांसी होना, हृदय तथा इसके आस-पास के क्षेत्र में तेज दर्द होने पर रोगी का उपचार एब्रोटेनम औषधि से करने पर रोग ठीक हो जाता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण : रोगी का गर्दन कमजोर हो, सिर को ऊपर उठाकर नहीं रख पा रहा हो तथा कमर दर्द हो रहा हो तो उस रोगी का उपचार एब्रोटेनम औषधि से कर सकते है।
गठिया रोग से सम्बन्धित लक्षण : यदि गठिया वात के रोगी (रीयुमेइक पैसेंट) को पतले दस्त आ रहे हो तथा हल्का दर्द हो रहा हो और यदि कब्ज हो गया हो, दर्द एकदम से बढ़ रहा हो तो एब्रोटेनम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण : कंधों, भुजाओं, कलाइयों और टखनों में दर्द हो रहा हो, उंगलियों और पैरों में पिन चुभने जैसा दर्द हो रहा हो, हाथ तथा पैरों में दर्द हो रहा हो तो ऐसे रोगी का उपचार एब्रोटेनम औषधि से कर सकते है, इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण : चेहरे पर दाने निकल रहे हो या दाने निकल कर दब गये हों, चमड़ी का रंग बैगनी हो गया हो, सिर के बाल झड़ रहे हों, फटी ऐड़ियों में खुजली हो रही हो तो एब्रोटेनम औषधि का उपयोग लाभदायक है, जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :
फेफड़े के चारों तरफ की झिल्लियों में सूजन होने पर ऐकोनाइट और ब्रायोनिया औषधि का उपयोग करते हैं, जबकि फेफड़े के जिस तरफ रोग का प्रभाव अधिक हो, उस तरफ सांस की रुकावट हो तो एब्रोटेनम औषधि का प्रयोग करने से अधिक लाभ मिलता है और रोग ठीक हो जाता है। अत: इन दोनों औषधियों की तुलना एक दूसरे से कर सकते हैं।
बच्चों के सूखे रोग को ठीक करने के लिए जिस प्रकार आयोडियम, नेट्रम-म्यूर, आर्ज नाइट्र, लाइका, सैनिक्यूला, ट्यूबक्लूलिनम औषधियों का उपयोग किया जाता है, ठीक उसी प्रकार से एब्रोटेनम औषधि का उपयोग किया जा सकता है।
गठिया रोग को ठीक करने में एब्रोटेनम औषधि की तुलना स्कोफुलेरिया, ब्रायोनिया, बेंजोइक एसिड तथा सुखण्डी रोग में आयोडिन, नेट्रम-म्यूरि से तुलना कर सकते हैं।
एब्रोटेनम औषधि का ह्रास :-
ठण्डी हवा में रहने तथा स्राव को रोकने तथा गति करने से एब्रोटेनम औषधि का असर कम हो जाता है।
मात्रा (डोज) :-
एब्रोटेनम औषधि की तीसरी से तीसवी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
एस्कुलस-हिप्पोकैस्टेनम (AESCULUS- HIPPOCASTANUM)
एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का प्रभाव (क्रिया) निचली आंत पर होता है। बवासीर के रोग में शिराओं में रक्तसंचित (खून जमा होना) होता रहता है और वे फूल जाती हैं, साथ ही कमर में दर्द भी होता है, लेकिन वास्तविक रूप से कब्ज नहीं होता है लेकिन अधिक दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ ही हल्का रक्त का स्राव (खून बहना) हो रहा हो तथा शिराओं में रक्त (खून) जम रहा हो और साथ ही शिरायें (वेरीकोज वेंस) सूजी हुई हो और उसका रंग बैंगनी हो गया हो, शरीर की सभी क्रियाएं-आंतें, पाचन, हृदय की गति मन्द पड़ गई हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए इसका उपयोग लाभदायक है।
यदि यकृत शिराओं की क्रिया मन्द पड़ गई हो, रक्त का प्रभाव कम हो गया हो तथा इसके साथ कब्ज की शिकायत भी हो, हल्का-हल्का कमर में दर्द हो, ऐसा लग रहा हो कि कमर टूट गई है और रोगी व्यक्ति अपने दिन भर के कार्य को करने में असमर्थ हो, शरीर के कई अंगों में दर्द हो रहा हो, रोगी व्यक्ति को ऐसा महसूस हो रहो हो कि उसके शरीर के कई भागों में रक्त जमा हो रहा है, गले के अन्दर की शिराओं में खून जमा होकर रुक गया हो और श्लैष्मिक झिल्लियां खुश्क और सूजी हुई हो तो एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग लाभदायक होता है और रोगी का रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
सिर से सम्बन्धित लक्षण : रोगी उदास और चिड़चिड़ा हो गया हो, सिर भारी, भ्रमित, ठण्डा तथा दर्द युक्त महसूस हो रहा हो, माथे पर दबाव महसूस हो रहा हो, लगातार दायीं कोख में सुई जैसे चुभने के दर्द का अहसास हो रहा हो। रोगी के सिर के पिछले भाग से लेकर आगे माथे तक दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ-साथ खोपड़ी में कुचले जाने जैसा दर्द महसूस हो रहा हो, ये लक्षण सुबह के समय में अधिक देखने को मिल रहा हो। इस प्रकार के लक्षण होने पर एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग लाभदायक है। माथे में दांयी ओर से बांयी ओर की स्नायुशूल की सूचीवेधी में दर्द हो रहा हो तथा इसके बाद पाचन संस्थान के आधे भाग में तेज दर्द हो रहा हो और बैठे-बैठे, चलते-चलते सिर में चक्कर हो रहा हो तो एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण : रोगी व्यक्ति को सांस लेने पर ठण्डी वायु का अहसास हो रहा हो तथा नाक से सांस लेने वाले वायु के प्रति संवेदशील हो रहा होता है। जुकाम के साथ छीकें आ रही हो तथा नाक से सांस लेने वाली नली में दबाव पड़ रहा हो। नाक की हड्डी की झिल्लियां तनी हुई तथा फूली हुई हो। इन सभी लक्षणों के होने का कारण यदि यकृत की क्रिया में खराबी होना है तो एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण : आंखें भारी तथा गरम महसूस हो रही हो तथा उससे पानी निकल रहा हो और नेत्र-गोलकों में दर्द हो रहा हो तथा रक्तवाहिनियों में रक्त का बहाव बढ़ गया हो तो एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग लाभदायक होता है तथा इसके प्रयोग से रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण : मुंह का स्वाद कषैला हो गया हो, लार अधिक आ रही हो, जीभ पर मोटी परत जमी हो तथा मुंह ऐसा लग रहा हो कि वह गर्म पानी से जल गया हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण : आमाशय में ऐसा महसूस हो रहा हो कि पत्थर रखा हो तथा तेज दर्द हो रहा हो, खाना खाने के तीन घंटे के बाद यह दर्द महसूस हो रहा हो तथा यकृत के भाग में तेज दर्द तथा भारीपन महसूस हो रहा हो तो ऐसे रोगी का रोग ठीक करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग किया जाना फायदेमंद होता है।
उदर (पेट) से सम्बन्धित लक्षण : यदि किसी रोगी को यकृत और पाचन तंत्र के भाग में हल्का-हल्का दर्द महसूस हो रहा हो, नाभि के भाग में दर्द हो रहा हो तथा पीलिया रोग हो गया हो तो ऐसे लक्षणों वाले रोगी को ठीक करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि उपयोग करना चाहिए।
कंठ (गला) से सम्बन्धित लक्षण : यदि कंठ में गर्म, खुरदरा, खुश्क महसूस हो रहा हो, खाना को निगलते समय सुई चुभने जैसा दर्द हो रहा हो। ग्रसनी (भोजननली) की शिराओं में फुलाव और सूजन हो गया हो। कण्ठवायु (गले की नली) के प्रति संवेदनशील (सांस लेने पर वायु ठण्डा लग रहा) हो, गला छिला तथा सिकुड़ा हुआ महसूस हो रहा हो, दोपहर के समय में खाना खाते समय जब खाना को निगल रहे हों, गले में आग की तरह जलन हो रहा हो। अधिक दुबले-पतले व पित्त प्रकृति वाले व्यक्तियों को अपने गले में ठण्ड महसूस हो रही हो। रोगी व्यक्ति जब खंखार रहा हो तब गांठ के रूप में रेशेदार बलगम निकल रहा हो और बलगम का स्वाद मीठा-मीठा लग रहा हो तो ऐसे लक्षणों के रोगियों को ठीक करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
मलान्त्र से सम्बन्धित लक्षण : रोगी व्यक्ति के मलान्त्र भाग में हल्का-हल्का दर्द हो रहा हो। रोगी व्यक्ति को ऐसा लग रहा हो कि उसके मलान्त्र के भाग में छोटी-छोटी लकड़ी के टुकड़े भर दिये गए हैं। जब रोगी व्यक्ति मलत्याग कर रहा होता है तो उसे तेज दर्द होता है और मलद्वार खुरदरा हो गया हो तथा मल त्याग करने पर मलान्त्र बाहर निकल आती हो। बवासीर रोग होने के साथ पीठ में गोली की तरह ऊपर को चलता हुआ तेज दर्द महसूस हो रहा हो, बादी और खूनी बवासीर हो गया हो, स्त्री रोगी को रजोनिवृतिकाल (मासिकधर्म आने के समय) में बादी व खूनी बवासीर अधिक परेशान कर रही हो, रोगी के श्लैष्मिक झिल्ली में सूजन हो गया हो और मल में रुकावट हो रही हो। ऐसे रोगियों के रोग को ठीक करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग लाभदायक होता है। जिन व्यक्तियों के पेट में कीड़े होने के कारण पेट में दर्द हो रहा हो उनके पेट के कीड़े को मारकर मलद्वार के रास्ते बाहर निकालने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि उपयोग करना चाहिए। रोगी के मलद्वार में अधिक जलन हो रही हो तथा इसके साथ-साथ पीठ पर ऊपर से नीचे की तरफ ठण्ड महसूस हो रही हो तो एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग बहुत उपयोगी तथा लाभदायक हो सकता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बन्धित लक्षण : पेशाब बार-बार आ रहा हो तथा थोड़ा-थोड़ा कर के आ रहा हो, पेशाब गर्म तथा कीचड़ के रंग का हो। गुर्दे में दर्द हो रहा हो और दर्द बांयी ओर के गुर्दे से होते हुए मूत्रनली की तरफ हो रहा हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पुरुष से सम्बन्धित लक्षण : शौच क्रिया करता है तो उस समय पु:रस्थ द्रव्य (प्रोस्टेट फाइंड) निकलता हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण : स्त्रियों के जघनास्थियों (साइस्मफाइसिस पुबीस) (जांघों के पास) लगातार गीला हो तथा ऐसा लग रहा हो की द्रव्य पदार्थ वहां टपक रहा है, प्रदर गहरा पीला, चिपचिपा, जघनास्थियों के पास का मांस ऐसा लग रहा है जैसे कि वह छिल गया है तथा यह मासिकधर्म के बाद ज्यादा महसूस हो रहा हो तो ऐसे स्त्रियों के रोग को ठीक करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्तन से सम्बन्धित लक्षण : रोगी को घुटन महसूस हो रही हो, स्त्रियों को अपने हृदय की क्रिया तेज तथा भारी लग रही हो, धड़कन की गति पूरे शरीर में महसूस हो रही हो। रोगी को स्वरयंत्र (कण्ठ) में जलन महसूस हो रही हो। यकृत की बीमारियों के कारण खांसी हो रही हो, छाती के पास गर्मी महसूस हो रही हो। बवासीर के रोगियों को हृदय के आस-पास दर्द महसूस हो रहा हो तो ऐसे रोगियों के रोग को ठीक करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण : रोगी के हाथ-पैरों में अकड़न तथा दर्द हो रहा हो, रोगी को यह दर्द गोली की तरह महसूस होता है तथा दर्द का प्रभाव बायें कंधे के ऊपरी भाग से नीचे के बाजुओं में महसूस होता हो। हाथ की उंगलियों का ऊपरी भाग में सुन्नपन महसूस हो रहा हो तो एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण : रोगी व्यक्ति को गर्दन में ऐसा दर्द महसूस होता है जैसे कोई व्यक्ति सुई चुभो रहा है, दोनों गर्दन के बीच हल्का-हल्का दर्द होता रहता है, गर्दन के पीछे का भाग बहुत अधिक कमजोर हो जाता है। दर्द का असर कमर से लेकर कूल्हे तक हो जाता है, जब रोगी व्यक्ति चलने तथा झुकने का कार्य करता है तो दर्द का असर और तेज हो जाता है। चलते समय पैर का नीचे का भाग अपने आप मुड़ जाता है, पैर के तलुवों में जलन, थकान, तथा सूजन महसूस होती है, हाथ-पैर धोने पर लाल हो जाते हैं और भारी लगते हैं। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसका उपचार करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि बहुत उपयोगी है।
ज्वर (बुखार) से सम्बन्धित लक्षण : रोगी व्यक्ति को शाम के समय में ठण्ड लगती है। ठण्ड का असर पीठ में ऊपर से नीचे की ओर होता है, बुखार का प्रभाव शाम को 7 बजे से 12 बजे तक होता है, शाम के समय में बुखार तेज होता है तथा त्वचा गर्म तथा खुश्क हो जाती है और बुखार के साथ शरीर से बहुत अधिक गर्म पसीना निकलता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि उपयोग लाभकारी है।
ह्रास :
सुबह जागने पर, किसी भी प्रकार की गति करने पर, चलने-फिरने से, मलत्याग करने से, खाना खाने के बाद, दोपहर बाद, खड़े होने पर तथा ठण्डी हवा में रहने से लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि का दूसरी औषधियों से सम्बन्ध :
मलान्त्र में जलन होने पर एस्कुलस ग्लैब्रा औषधि को देते हैं, इस प्रकार के लक्षण होने पर एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि की तुलना एस्कुलस ग्लैब्रा औषधि से कर सकते हैं।
अधिक दर्दनाक, गहरे बैगनी रंग वाले, बवासीर के बाहरी मस्से, साथ ही कब्ज व सिर में दर्द तथा चक्कर होने पर और यकृत-शिराओं में रक्त का जमाव होने पर। आवाज मोटी, गले के अन्दर गुदगुदी, दृष्टि दोष उत्पन्न होने तथा आंशिक रूप से पक्षाघात (लकवा) होने पर फाइटोलक्का औषधि का उपयोग करते हैं, इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि की तुलना फाइटोलक्का औषधि से कर सकते हैं।
मलान्त्र की शिराओं में रक्त का जमाव तथा अधिक तेज दर्द के साथ बवासीर होने पर नेगुण्डियम अमेरिकैनम औषधि उपयोगी है (इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी को मूलार्क की दस-दस बूंदों की मात्रायें, हर दो घंटे के बाद दे सकते हैं)। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि की तुलना नेगुण्डियम अमेरिकैनम औषधि से कर सकते हैं।
एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि की तुलना और भी औषिधियों से कर सकते हैं, जो इस प्रकार हैं- नक्स तथा सल्फर, कोलिनसोनिया तथा एलो औषधि।
मात्रा :
एस्कुलस हिप्पोकैस्टेनम औषधि की मूलार्क से तीसरी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
ऐकैलिफा इन्डिका (Acalypha indica) इण्डियन नेटल (Indian nettel)- ऐकैलि इन Acaly-in
ऐकैलिफा इन्डिका औषधि का उपयोग फेफड़ों के रोगों को ठीक करने के लिए लाभकारी है। सुबह के समय में अचानक सूखी खांसी के साथ खून आना और शाम के समय में स्याही की तरह जमा हुआ खून आए तथा इन सब लक्षणों के होते हुए भी बुखार न हो, सुबह के समय में अधिक कमजोरी महसूस हो रही हो तथा दोपहर के समय में शरीर में शक्ति आ जाती हो तो ऐसे लक्षणों के रोगी को ठीक करने में इस औषधि का उपयोग बहुत लाभकारी है।
पोषण नली और श्वास संस्थान पर ऐकैलिफा इन्डिका औषधि का लाभकारी प्रभाव देखने को मिलता है।
ऐकैलिफा इन्डिका औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- तेज सूखी खांसी होने के बाद खूनी बलगम निकलना, सुबह के समय में खांसी के साथ साफ रक्त निकलना और शाम के समय में काले रंग का थक्केदार खून निकलना, रात के समय में खांसी और तेज हो जाना तथा छाती में तेज दर्द महसूस होना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐकैलिफा इन्डिका औषधि का उपयोग लाभकारी है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के आंतों तथा आमाशय में जलन महसूस हो रही हो, रोगी को दस्त हो गया हो तथा मलत्याग करते समय पड़पड़ाहट की आवाज के साथ वायु निकल रही हो, पेट में मरोड़ के साथ दर्द हो रहा हो, मल के साथ रक्त निकल रहा हो जैसे लक्षण शाम के समय में अधिक दिखाई दे रहे हों तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐकैलिफा इन्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर का रंग पीला हो गया हो जैसे पीलिया रोग हो गया है, त्वचा में सूजन आ गई हो तथा त्वचा पर खुजली मच रही हो तो इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए ऐकैलिफा इन्डिका औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- सूखी खांसी हो तथा बहुत अधिक परेशान करने वाली खांसी हो, बलगम के साथ खून भी निकल रहा हो, सुबह तथा शाम के समय में खांसी का प्रभाव और तेज हो जाता हो। छाती के पास लगातार तेज दर्द महसूस हो रहा हो, सुबह के समय में बलगम के साथ निकलने वाले खून का रंग चमकदार, लाल और थोड़ी मात्रा में निकल रहा हो, दोपहर के बाद निकलने वाले खून में गहरा रंग हो तथा जमा हुआ निकल रहा हो। नाड़ी कोमल और दबावशील हो। ग्रासनली, ग्रसनी तथा आमाशय में जलन महसूस हो रही हो तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए ऐकैलिफा इन्डिका औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
सुबह के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
ऐकैलिफा इन्डिका औषधि का दूसरे औषधि से सम्बन्ध (रिलेशन):-
आर्नि, हेमै, इपि, मिलफोलियम, ऐकोन, काली-नाइट्रि तथा फास्फोरस के साथ ऐकैलिफा इन्डिका औषधि की तुलना कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
ऐकैलिफा इन्डिका औषधि की तीसरी से छठी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
एब्सिन्थियम- कॉमन वार्मवुड (ABSINTHIUM-COMMON WORMWOOD) (कॉमन वार्मवुड (Common Wormwood) एब्सि-Absin.)
एब्सिन्थियम औषधि का असर मिर्गी के रोगी पर बहुत अधिक होता है तथा मिर्गी के रोगी के लिए यह औषधि लाभदायक है। जब रोगी को दौरा पड़ता है और स्नायुविक कंपन्न (नाड़ियों में कंपन्न) होती है। अचानक तेज चक्कर आना तथा रोगी के मन में भ्रम पैदा हो जाना तथा बेहोशी की स्थिति होने पर इस औषधि का उपयोग लाभदायक है। स्नायविक उत्तेजना और अनिद्रा की स्थिति में एब्सिन्थियम औषधि का उपयोग लाभदायक है। वात के कारण शिशु (छोटे बच्चे) में बैचेनी की स्थिति में इसका उपयोग लाभकारी है। कुकुरमुत्ता से होने वाली बीमारी को यह ठीक कर सकता है। शरीर में कंपन होना, स्नायु (नाड़ियों में दर्द) में दर्द, उत्तेजना होना और अनिद्रा की स्थिति में यह लाभदायक है।
एब्सिन्थियम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :-सिर के पीछे की ओर चक्कर आने के साथ-साथ पीछे गिरने जैसी स्थिति होना, बहुत अधिक भ्रम पैदा होना, सिर के नीचे तकिये रखने का मन कर रहा हो। आंखों की पुतलियां असमान रूप से फैली हों। चेहरा नीला पड़ गया हो, सिर के पिछले भाग में हल्का-हल्का दर्द महसूस हो रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को एब्सिन्थियम औषधि दी जाती है।
मुख (मुंह) से सम्बन्धित लक्षण :-जबड़ों में जकड़न होना, जीभ को दांतों से काट लेना, जीभ लड़खड़ाती हो, जीभ ऐसा लग रहा हो कि वह फूलकर बहुत बड़ी हो गई हो और बाहर को फैली हुई हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसे ठीक करने में एब्सिन्थियम औषधि लाभदायक है।
मन से सम्बन्धित लक्षण :-रोगी का मन भ्रमित हो, डरावनी चीजें दिखाई दे रही हो, चोरी करने का मन कर रहा हो, स्मरण शक्ति कमजोर हो गई हो। रोगी को कुछ भी पता न चल रहा हो जैसे कि अभी-अभी क्या हुआ था, क्या नहीं। किसी से भी किसी प्रकार का सम्बंध नहीं रखने का मन कर रहा हो तथा स्वभाव निर्दयी हो गया हो तो इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए एब्सिन्थियम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- कंठ ऐसा महसूस हो रहा हो जैसे कि गर्म पानी से जल गया हो तथा कोई गोला लटक रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए एब्सिन्थियम औषधि का उपयोग फायदेमंद है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का जी मिचला रहा हो, उबकाई तथा डकारें आ रही हो। कमर तथा पेट के चारों तरफ सूजन महसूस हो रही हो तथा पेट में वायु बनने के कारण पेट फूला हुआ हो। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एब्सिन्थियम औषधि लाभदायक है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब करने की बार-बार इच्छा हो रही हो, पेशाब से तेज गंध (बदबू) आ रही हो तथा पेशाब का रंग गहरा पीला हो तो एब्सिन्थियम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
जनन प्रणाली से सम्बन्धित लक्षण :- दायें डिम्ब प्रदेश में भाला गड़ने जैसा दर्द महसूस हो रहा हो, वीर्यपात होने के साथ ही जननांग ढीला व कमजोर हो गया हो। स्त्रियों को समय से पहले ही रजोनिवृत्ति (मासिकधर्म का आना बन्द हो जाना) हो गई हो तो इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए एब्सिन्थियम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
स्तन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि उसके छाती पर कोई बोझ रखा हुआ है, हृदय की गति अनियमित हो गई हो, हृदय की क्रिया कंपनशील हो गई हो जो पीठ में सुनी जा सकती हो तो ऐसे लक्षणों को दूर करने के लिए एब्सिन्थियम औषधि का उपयोगी है।
शरीर का बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- हाथ-पैरों में दर्द हो रहा हो, लकवा रोग के लक्षण (पारलिटिक्स साइप्टोंस) दिखाई दे रहे हों तो इस प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए एब्सिन्थियम औषधि उपयोग करना चाहिए।
एब्सिन्थियम औषधि का दूसरे औषधियों से सम्बन्ध :- आर्टीमिसिया, हाइड्रोसायनिक एसिड, सीना, सुरासार तथा सिक्यूटा से एब्सिन्थियम औषधि की तुलना कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
एब्सिन्थियम औषधि की प्रथम से छठी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
असेटैनिलियडम- ऐन्टीफेब्रीनम (ACETANILIDUM- ANTEFEBRINUM) ऐन्टीफेब्रीनम (Antefebrinum)-( असेटै Acet.)
असेटैनिलियडम औषधि हृदय और श्वास क्रिया को तथा रक्तदाब को बढ़ने से रोकती है और तापमान को नीचे गिरा देती है। नील रोग और निपात रोग (कोलेप्स) रोग को ठीक करने में इस औषधि का उपयोग लाभकारी है। ठण्ड के प्रति बढ़ी हुई सुग्राह्मता (ससपेटीबिलीटी) को यह ठीक कर सकता है। आंखों के अन्दरूनी भाग में पीलापन आ गया हो तो इस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
असेटैनिलियडम औषधि निम्नलिखित लक्षणों में उपयोगी हैं-
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :-
दृष्टि-मण्डल की पीलिमा (आंख का अन्दरूनी भाग पीला पड़ गया हो), दृष्टिक्षेत्र सिकुड़ा हुआ हो तथा आंख की पुतलियां अस्वाभाविक (असमान रूप) रूप से फैल गई हो तो ऐसे लक्षणों के रोगी को ठीक करने के लिए असेटैनिलियडम औषधि उपयोग लाभकारी है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अपना सिर ऐसा महसूस हो रहा हो कि बहुत बड़ा हो गया है, बेहोशी पड़ने लगे तथा कुछ भी समझ में न आ रहा हो कि क्या करना है क्या नहीं। ऐसे लक्षणों के दूर करने के लिए असेटैनिलियडम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय में कमजोरी आ गई हो, हृदय की नीली श्लैष्मिक झिल्लियां अनियमित हो गई हों तथा पैरों व टखनों में दर्द महसूस हो रहा हो, पेशाब में अन्न के समान पदार्थ आना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए असेटैनिलियडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
असेटैनिलियडम औषधि का अन्य औषधियों से सम्बन्ध :-
एण्टीपाइरिन औषधि से असेटैनिलियडम औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा (डोज) :-
असेटैनिलियडम औषधि का उपयोग एक से तीन ग्रेन तक सिर दर्द तथा स्नायुशूल (नाड़ियों में दर्द) और बुखार को ठीक करने के लिए किया जाता है। होम्योपैथिक उपयोग के लिए तीसरी शक्ति का प्रयोग करें।
ऐसेटिक ऐसिड (ACETIC ACID) ग्लैशियल असेटिक एसिड (Glacial Acetic Acid)- असेटिक एसिड (Acet-ac-)
ऐसेटिक ऐसिड औषधि शरीर में अधिक खून की कमी होने (रक्ताल्पता) पर बहुत उपयोगी है। अधिक कमजोरी होना, बार-बार बेहोशी होना, सांस लेने में कमजोरी महसूस होना, अधिक पेशाब आना, पसीना अधिक निकलना, शरीर के किसी भाग से रक्त का स्राव होना और शरीर का रंग पीला पड़ जाना, शरीर में अधिक कमजोरी होने के साथ पेशियां ढीली व थुलथुली हो गई हो तथा शरीर में अधिक कमजोरी आ गई हो तो इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का इलाज करने के लिए यह बहुत उपयोगी है।
त्वचा के ऊपरी परतों में कैंसर रोग होना, शरीर के अन्दरूनी तथा बाहरी दोनों ही प्रकार के कैंसर रोग को ठीक करने में ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग लाभकारी है।
स्त्री रोग होने के साथ-साथ जोड़ों में दर्द होना तथा गांठ बनने और पेट में वायु बनने पर इस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
ऐसेटिक ऐसिड औषधि के 1x घोल का उपयोग करने से सख्त फोड़े नर्म पड़ जाते हैं तथा उनमें पीव पैदा हो जाती है, जिसके बाद फोड़ों को फोड़कर पीब निकाल देने से फोड़ा ठीक होने लगता है।
अधिक मात्रा में पेशाब आ रहा हो, पुराना दस्त रोग हो गया हो, क्षय (टी.वी.) होने के साथ-साथ जलन हो रही हो और अधिक तेज प्यास लग रही हो तथा किसी भी तरल पदार्थ के पीने पर भी प्यास नहीं बुझ रही हो लेकिन बुखार होने पर प्यास बिल्कुल भी नहीं लग रही हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। इस औषधि का उपयोग करने के बाद ठण्डे पीने वाले पदार्थ का उपयोग नहीं करना चाहिए।
रोगी को मानसिक परेशानी अधिक हो तथा रोगी की शारीरिक स्थिति ढीली पड़ गई हो, रोगी की मानसिक स्थिति इतनी बिगड़ गई हो कि उसे तुरन्त की घटी हुई घटना याद न आ रही हो। रोगी अपने ही बच्चों की पहचान नहीं कर पाता है तथा रोगी को अशुभ चिन्ता अधिक होने लगती है। रोगी का स्वभाव अधिक चिड़चिड़ा हो जाता है तथा हर समय व्यवसाय के बारे में चिन्तित रहता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग करना चाहिए।
अधिक पुराने टी. बी. रोग में खांसी होना, हाथ पैरों में सूजन होना लेकिन सूजन होने की शुरुआत पैरों से होती है, दस्त हो गया हो और सांस लेने में परेशानी हो रही हो, टी.बी. रोग के साथ बुखार हो गया हो, रात के समय में शरीर से पसीना अधिक निकल रहा हो, फेफड़े से खून बह रहा हो, छाती और पेट में जलन हो रही हो तथा छाती में घड़घड़ाहट हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि लाभकारी है।
चोट लगने पर, ऑपरेशन कराने के बाद और क्लोरोफार्म रोग होने के बाद ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग लाभकारी होता है। पागल कुत्ते और बिल्ली के काटने पर उसके जहर को दूर करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग लाभदायक होता है, इसके उपयोग से इनके जहर जल्दी ही नष्ट हो जाते हैं।
ऐसेटिक ऐसिड औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- नशीली चीजों का सेवन करने के कारण होने वाला सिर में दर्द या सिर में चक्कर आने के साथ सिर की ओर रक्त का प्रवाह अधिक लग रहा हो, कनपटियों की नाड़ियां तनी हुई रहती हैं, जीभ के एक सिरे से दूसरे सिरे तक दर्द महसूस हो रहा हो तो ऐसे लक्षणों के रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि उपयोग लाभकारी है।
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ा हो, व्यवसाय के कार्यों को करने में अधिक चिन्तित मन होने के कारण उत्पन्न रोग की अवस्था को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग लाभदायक है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :-
चेहरे का रंग पीला होना तथा मोम जैसा हो जाना, एक गाल का रंग फीका और दूसरे का लाल होना, आंखें अन्दर की ओर धंसी हुई लग रही हो तथा आंखों के चारों ओर काले रंग के घेरे बन गये हो, चेहरे से पसीना अधिक निकल रहा हो।
होठों का कैंसर रोग हो गया हो, गाल अधिक गर्म तथा तमतमाया सा लग रहा हो, बायें जबड़े के जोड़ पर दर्द हो रहा हो।
इस प्रकार चेहरे से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :-
मुंह से अधिक लार निकल रहा हो, अधिक प्यास लग रही हो। आमाशय में खमीर बन रहा हो, ठण्डे पानी पीने से दर्द महसूस हो रहा हो, किसी भी प्रकार का भोजन करने पर उल्टी हो रही हो, पाचन संस्थान से सम्बन्धित अंग में हल्का-हल्का दर्द महसूस हो रहा हो, रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो जैसे कि उसके पेट में कोई फोड़ा हो गया हो और उस फोड़े के कारण दर्द हो रहा है तथा जलन हो रही हो।
आमाशय में कैंसर होने के साथ-साथ खट्टी डकारें आ रही हो तथा उल्टी भी आ रही हो, मुंह के अन्दर जलनकारी लार आ रहा हो।
शरीर में हायड्रोक्लोरिक अम्ल की अधिकता हो जाना तथा पाचनतंत्र में दर्द होना।
आमाशय और छाती में तेज जलन होना तथा साथ में दर्द होना, इसके बाद त्वचा में ठण्ड महसूस होना और माथे पर से ठण्डा पसीना निकलना।
इस प्रकार के आमाशय से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि उपयोग लाभकारी है जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि उसका पेट अन्दर की ओर धंसता जा रहा है, बार-बार पानी की तरह दस्त हो रहा हो, सुबह के समय में इस प्रकार के दस्त का प्रभाव तेज होता है।
जलोदर रोग होना तथा इस रोग के साथ ही आंतों से रक्त का स्राव होना।
इस प्रकार के पेट से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मूत्र (पेशाब) से सम्बन्धित लक्षण :-
पेशाब अधिक मात्रा में हो रहा हो और मधुमेह रोग होने के साथ शरीर में अधिक कमजोरी आ गई हो तो रोगी के रोग का उपचार करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्री से सम्बन्धित लक्षण :-
मासिकधर्म के समय में अधिक रक्त का स्राव होना।
गर्भकाल के समय जी मिचलाने के साथ-साथ स्तन का भाग अधिक बढ़ गया हो तथा उसमें दर्द हो रहा हो और स्तन में दूध बहुत अधिक भर गया हो, स्तन का दूध नीले रंग का हो गया हो तथा दूषित हो गया हो इसके साथ ही दूध पारदर्शी और खट्टा हो गया हो।
स्तनपान के समय में दूध पिलाने वाली स्त्रियों के शरीर में खून की कमी हो गई हो।
इस प्रकार के स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग लाभदायक है।
गर्भावस्था के समय से सम्बन्धित लक्षण :-
गर्भावस्था के समय में योनि से अधिक खून निकल रहा हो तो ऐसेटिक ऐसिड औषधि के घोल में रुई को भिगोकर योनि में जहां तक हो सके अन्दर तक रखने से रक्त का निकलना रुक जाता है। ऐसेटिक ऐसिड औषधि के घोल का एक भाग तथा पानी का नौ भाग मिलाकर प्रयोग करना चाहिए।
गर्भावस्था में दिन रात मुंह से पानी का आना, खट्टी डकारें और उल्टी होना आदि इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी स्त्री में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग लाभदायक होता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :-
कमर में दर्द हो रहा हो तथा पेट के बल लेटने से दर्द कम हो रहा हो तो ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
रक्तस्राव से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई भागों के निकास मार्ग जैसे-नाक, गला, फेफड़ा, पेट, मलद्वार, गर्भाशय, जरायु (गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली) आदि से खून निकल रहा हो, चोट लगकर नाक से खून निकल रहा हो तो इन लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि उपयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :-
सांस लेने पर सांय-सांय की आवाज तथा घरघराहट हो रही हो, सांस लेने में परेशानी हो रही हो और सांस लेते समय खांसी हो रही हो।
सुखी खांसी से झिल्लीदार नालियों में उत्तेजना हो रही हो, श्वास-प्रणाली तथा श्वास नलियों के अन्दर उत्तेजना हो रही हो, गले के अन्दर कुछ फंसा-फंसा सा लग रहा हो, श्वास-नलियों से अधिक स्राव हो रहा हो तथा इसके साथ गले में जलन होना।
इस प्रकार के श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग लाभदायक है जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर का कोई अंग नष्ट होना तथा पैरों और टांगों में दर्द होना। यदि ये लक्षण रोगी में है तो उसका उपचार करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
त्वचा का रंग पीला पड़ जाना, त्वचा मोम जैसी मुलायम लग रही हो, त्वचा में जलन हो रही हो, गर्मी महसूस होना तथा त्वचा से अधिक मात्रा में पसीना निकलना तथा किसी जहरीले कीड़े का डंक लग जाना, शिराओं में सूजन होना, इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि उपयोगी है।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार के साथ रात के समय में पसीना अधिक निकल रहा हो, बायां गाल लाल पड़ गया हो तथा गाल पर दाग पड़ गया हो, बुखार होने के साथ में रोगी को प्यास नहीं लग रही हो, पसीना अधिक मात्रा में ठण्डा आ रहा हो तो इन लक्षणों को दूर करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग करना चाहिए।
ऐसेटिक ऐसिड औषधि का सम्बन्ध :-
ऐसेटिक ऐसिड औषधि कई प्रकार के दवाओं के बुरे प्रभावों को दूर करती है।
डिब्बाबंद व मसालेदार मांस के जहरीले प्रभावों को नष्ट कर देती है।
क्लोरोफार्म, गैस के धुएं तथा कोयला, अफीम और धतूरे के दुष्प्रभावों को ऐसेटिक ऐसिड औषधि दूर करती है।
साइडर सिरका अर्थात सेब का सिरका, कार्बोलिक ऐसिड के गलत प्रभावों को ऐसेटिक ऐसिड औषधि नष्ट कर देती है।
ऐसेटिक ऐसिड औषधि का अन्य औषधियों से तुलना :-
अगर किसी रोगी को पेशाब में शर्करा की अधिकता हो तथा इसके साथ-साथ रोगी को पसीने अधिक आ रहा हो तो उसे एमोनि एसिटेट देते है। इस प्रकार के लक्षण में रोगी को एमोनि एसिटेट के अलावा ऐसेटिक ऐसिड औषधि भी दे सकते हैं जिससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है। अत: एमोनि एसिटेट के कुछ गुणों की तुलना ऐसेटिक ऐसिड औषधि से कर सकते हैं।
रात को पसीना अधिक निकलने पर बेजोइन ओडेरी फेरम-स्पाइडस-वुड औषधि देते हैं, लेकिन इसके जगह पर ऐसेटिक ऐसिड औषधि का भी प्रयोग किया जा सकता है। अत: बेजोइन ओडेरी फेरम-स्पाइडस-वुड औषधि के कुछ गुणों की तुलना ऐसेटिक ऐसिड औषधि से कर सकते हैं।
हृदय और वृक्क के रोगों के साथ पेट में जल भर गया हो और बहुत अधिक पुराना दस्त हो गया हो तो ऐसे रोगों को ठीक करने के लिए आर्से, चायना, डिजिटैलिस लिएट्रिस का उपयोग किया जाता है लेकिन इसके अलावा ऐसेटिक ऐसिड औषधि का भी प्रयोग इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी पर कर सकते हैं। इसलिए एमोनि एसिटेट, बेजोइन ओडेरी फेरम-स्पाइस-वुड, आर्से , चायना, डिजिटैलिस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना ऐसेटिक ऐसिड औषधि से कर सकते हैं।
छोटे बच्चों के क्षय रोग (टी.बी.) रोग तथा सूखे रोग और कई प्रकार के क्षय रोगों को ठीक करने के लिए ऐसेटिक ऐसिड औषधि का उपयोग बहुत अधिक लाभदायक है। इस प्रकार के रोगों को अन्य औषधियों जैसे- ऐब्रो, आयोड, सैनी, टयूबर ठीक कर सकते हैं इसलिए इन रोगों के लक्षणों को ठीक करने में इन औषधियों के साथ ऐसेटिक ऐसिड औषधि की तुलना की जा सकती है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
चित लेटने से, आराम करने या ठण्ड लगने से रोग लक्षणों में वृद्धि होती है।
ह्रास (एमेलिओरेशन) :-
पेट के बल लेटने पर रोग के कुछ लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
ऐसेटिक ऐसिड औषधि की तीसरी से तीसवी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। काली खांसी में ऐसेटिक ऐसिड औषधि को बार-बार दे सकते हैं बाकि अन्य रोगों के लक्षणों में इसे बार-बार नहीं देना चाहिए।
अचिरैंथेस आस्पेरा (ACHYRANTHES ASPERA) अपामार्ग-अचिरैं-आसपे
अचिरैंथेस आस्पेरा औषधि का उपयोग कई प्रकार के लक्षणों जैसे- मूत्रल (पेशाब अधिक होना), दस्त, संकोचक (अस्ट्रीजेंट), पेचिश, कष्ट के साथ माहवारी आना तथा कुत्ते और सांप के काटने पर उसके जहर का प्रभाव कम करने के लिए इसका उपयोग लाभकारी है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण:-
नासूर, फोड़े, सूजन, जहरीले घाव, त्वचा पर लाल धब्बा होने, पूरे शरीर पर जलन के साथ दर्द होने पर इस अचिरैंथेस आस्पेरा औशधि का उपयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण:-
अतिसार, हैजा रोग, पानी की तरह मल होना, पीला तथा अधिक मात्रा में श्लैष्मिक पपड़ियों के साथ मल होना, अधिक प्यास लगना, आमाशय में दर्द होना, मिचली और उल्टी होना। इन लक्षणों से पीडि़त रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अचिरैंथेस आस्पेरा औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
नाड़ी से सम्बन्धित लक्षण:-
सूत्रवात नाड़ी (थ्रीडी पल्स)-नाड़ी का तेज या कम चलना, इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए अचिरैंथेस आस्पेरा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मात्रा:-
अचिरैंथेस आस्पेरा औशधि की मूलार्क, 3, 6 शक्तियां का प्रयोग करना चाहिए।
एक्टिया रेसेमोसा-सीमीसिफ्यूगा (actaea racemosa-cimicifuga) शतवारी (Black Snak Root)-- सिमि-रेसध्एक्टि-रेस Cim. Rac./Actea. Rac)
स्नायु की धड़कन अनियमित होना, ऐंठन होना, अकड़न होना, बेहोशी होना, स्नायु में दर्द होना, बिना कंपकंपी के साथ ठण्ड लगना और स्त्रियों के मासिकधर्म के समय में ये सभी लक्षण अधिक दिखाई पड़ते हैं। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
रोगी के पेशियों में आमवात की शिकायत हो, गर्दन में अकड़न हो, सिर के पीछे अधिक खिंचाव हो रहा हो तथा रोगी अपना मस्तिष्क दर्द और अकड़न के कारण घुमा न पा रहा हो, आमवात रोग में पेशी के ऊपरी भाग में दर्द हो रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी ठीक करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि उपयोगी है।
स्त्रियों के कई अंगों पर एक्टिया रेसेमोसा औषधि का प्रभाव बहुत अधिक होता है तथा कई प्रकार के रोग जो स्त्री रोग से संम्बन्धित होते हैं वह इस औषधि के प्रभाव से ठीक हो जाता है।
स्त्रियों के गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली में जब दर्द का असर एक भाग से दूसरे भाग में होता है तो उस रोग को ठीक करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
स्त्रियों के गर्भाशय में रोग होने के साथ अक्सर शरीर में अनेक स्थानों पर सुई की चुभन जैसा दर्द होने पर एक्टिया रेसेमोसा औषधि से उपचार करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप स्त्रियों को इस प्रकार के लक्षणों के रोग ठीक हो जाते हैं।
अपने आप को घायल करने का प्रयास करना, एक बात करते-करते दूसरी बात करने लगना, रोने जैसे स्वभाव हो जाना, आंखों के आगे अंधेरा छा जाने जैसा भ्रम की अनुभूति होना, सिर ढका-ढका सा लगना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि जैसे सिर फटकर बाहर आ जाएगा, खोपड़ी खुल जाएगी, सिर उड़ जाएगा, आंखें बाहर आ जाएंगी तथा गर्दन के पीछे रीढ़ की हड्डी उतर जायेगी आदि भ्रम की स्थिति में एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नाचने-कूदने या अधिक परिश्रम करने के बाद मांसपेशियों में तेज दर्द हो रहा हो, या किसी अन्य प्रकार के कठोर कार्य करने के बाद मांसपेशियों में तेज दर्द हो रहा हो तो इस प्रकार के लक्षण को दूर करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
एक्टिया रेसेमोसा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द होने के साथ ही रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि सिर में बाहर की ओर दबाव पड़ रहा है तथा ऊपर की ओर खिंचाव हो रहा है अर्थात रोगी को ऐसा महसूस हो रहा है कि मानो मस्तिष्क के ऊपरी भाग पर तेज दर्द होने के कारण खोपड़ी उड़ जाएगी। यह दर्द इतना तेज होता है कि दर्द का असर आंखों तक होता है तथा इसके बाद दर्द का असर मेरुदण्ड (रीढ़ की हड्डी) को प्रभावित करता है। रोगी को नींद नहीं आती है तथा वह दु:ख और चिन्ता में डूब जाता है। रोगी को कभी-कभी ऐसा लगता है कि दर्द के कारण वह पागल हो जाएगा। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्रियों के मासिकधर्म से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों को मासिकधर्म के समय में अधिक स्राव (योनि से खून अधिक निकलना) होने पर तथा इसके साथ-साथ कमर तथा कूल्हों में दर्द हो रहा हो और दर्द का प्रभाव जांघों से नीचे की ओर होता हुआ महसूस हो रहा हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
वय:सन्धि काल (यौवन अवस्था) के समय स्त्रियों के स्तन में लगातर दर्द हो रहा हो तथा मासिकधर्म और रजोनिवृति (मासिकधर्म बन्द हो जाने का समय) के समय इस प्रकार के लक्षण अधिक हो तो रोगी का उपचार एक्टिया रेसेमोसा औषधि से किया जा सकता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
स्त्रियों को ठण्ड का अनुभव न होने पर भी कंपकंपी होना, बेहोशी होना, अंसगत बातें करना, शोक में डूब जाना, अधिक परेशानी महसूस करना, लम्बी सांसें भरना, उदास रहना तथा अनिद्रा होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री कभी-कभी यह सोचती है कि कहीं वह पागल तो नहीं हो जाएगी। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी स्त्री में है तो उसके रोग का उपचार एक्टिया रेसेमोसा औषधि से हो सकता है।
हिस्टीरिया रोग के लक्षण यदि स्त्रियों में अधिक देखने को मिलता है तो उसका उपचार भी एक्टिया रेसेमोसा औषधि से हो सकता है।
गठिया रोग से सम्बन्धित लक्षण :- गठिया रोग का सबसे अधिक प्रभाव पेशी के मध्य भाग पर अर्थात पेट पर होता है, इस अवस्था के रोगी का उपचार करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए, इससे रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। कई प्रकार के स्नायुविक रोगों को ठीक करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि लाभकारी है।
गर्भकाल से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों को गर्भकाल के समय में अनिद्रा और उबकाई की समस्या होना, बच्चें को जन्म देने के समय में जैसा दर्द होता है उस प्रकार का दर्द होना, पेट में तेज दर्द होना, तीसरे महीने में गर्भपात हो जाना, इन लक्षणों से पीड़ित स्त्री का उपचार करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
प्रसव (बच्चे को जन्म देना) से सम्बन्धित लक्षण :- बच्चे को जन्म देने के बाद आंखों में तेज दर्द होना, बच्चे को जन्म देने के प्रारिम्भक स्थिति में कंपकंपी अधिक होना, बेहोशी होना जिसके कारण स्नायुविक उत्तेजना (नाड़ियों की उत्तेजना) बढ़ जाना। गर्भाशय मुख कड़ा पड़ जाना, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री को तेज दर्द होता है तथा पेट में खिंचन तथा ऐंठन जरा सी आवाज से और भी तेज हो जाती है, इन लक्षणों के होने पर उपचार करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
प्रसव के समय नींद से सम्बन्धित लक्षण :- बच्चे को जन्म देने के समय में दर्द के कारण स्त्री को नींद नहीं आती, इधर-उधर छटपटाती है, यदि जरा सी नींद आ भी जाती है तो डरावने सपने देखने लगती है, नींद के बाद ताजगी कभी नहीं मिलती है इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री अपने को हल्का महसूस नहीं करती है। इस प्रकार के लक्षण यदि स्त्रियों को बच्चे जन्म देने के समय में हो तो उसका उपचार करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
खांसी से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों को सूखी खांसी हो रही हो, वह जब भी बोलने या बात करने का प्रयास करती है तो उसकी खांसी और बढ़ जाती हो, इस प्रकार के लक्षण यदि स्त्रियों में हो तो उसका उपचार करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग लाभदायक है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले के आस-पास और रीढ़ पर दबाव के कारण उबकाइयां होने के साथ-साथ उल्टियां हो रही हो तथा गले के अन्दर कुछ गड़ने जैसा दर्द महसूस हो रहा हो तो इन लक्षणों को दूर करने के लिए एक्टिया रेसेमोसा औषधि का उपयोग लाभकारी है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
मासिकधर्म के समय में तथा वय:संधिकाल (यौवन अवस्था) के समय में जितना अधिक रक्तस्राव होता है उतना ही अधिक कष्ट होता है, ठण्ड से, सीलन से, सीलन भरी हवा से, सिलाई करने से शराब का सेवन करने से परेशानी और बढ़ जाती है, अत: इस प्रकार की अवस्था में एक्टिया रेसेमोसा औषधि का अधिक असर नहीं होता है इसलिए इन अवस्था में इस औषधिक का अधिक उपयोग करने की अवश्यकता पड़ सकती है।
शमन (एमेलिओरेशन-ह्रास) :-
खुली हवा में रहने, लगातार धीरे-धीरे चलने, रोग को दबाने तथा गर्म कपड़े ओढ़ने से रोग के कुछ लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कैलोफायलम तथा पल्स औषधियों के कुछ गुणों की तुलना एक्टिया रेसेमोसा औषधि कर सकते हैं।
ऐक्टिया स्पाइकेटा (ACTAEA SPICATA) बेनबेरी (Banebarry)-ऐक्टि-स्पाइ
छोटे-छोटे जोड़ों के दर्द को ठीक करने के लिए ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि का उपयोग लाभकारी होता है। कलाई के दर्द, अंगुलियों के जोड़ों में सूजन, दर्द, स्पर्श करने में असहनीय दर्द होना, सुरसुराहट होने के साथ दर्द होना और रात के समय में इस दर्द में और तेजी होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि का उपयोग अधिक लाभदायक होता है।
आमवात के रोग को ठीक करने में ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि बहुत लाभदायक है। कलाई का दर्द, पूरे शरीर में जलन के साथ दर्द तथा जिगर और गुर्दे के भाग में अधिक दर्द महसूस होना, हृदय की ओर रक्त को ले जाने वाली नाड़ियों में रुकावट, छूने तथा चलने-फिरने में दर्द का अधिक बढ़ जाना। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि का उपयोग लाभकारी है।
ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी अधिक डरपोक स्वभाव का हो जाता है, किसी बात पर जल्दी चौंक पड़ता है और भ्रम में उलझा रहता है, कॉफी पीने से सिर की ओर खून का दौरा अधिक तेज हो जाता हो, चक्कर अधिक आते हों, सिर में इस प्रकार का दर्द होता है जैसे कि सिर फड़फड़ा रहा है तथा खुली हवा में जाने पर दर्द से कुछ राहत मिल जाती हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में हैं तो उसका उपचार करने के लिए ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सिर में दर्द तथा दर्द का प्रभाव माथे से चलकर कपाल तक हो, माथे पर अधिक गर्मी लग रही हो, सिर के बाएं भाग में अधिक तेज दर्द हो रहा हो और दर्द ऐसा महसूस हो रहा हो जैसे कि वहां की हड्डी कुचल गई हो। खोपड़ी की चमड़ी में खुजली और गर्मी महसूस हो रही हो तथा नाक का ऊपरी भाग लाल हो गया हो और जुकाम हो गया हो, इस प्रकार के लक्षण को दूर करने के ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- पाचन संस्थान में इस प्रकार का दर्द होना जैसे कि किसी ने वहां के भाग को फाड़ दिया हो तथा उसमें भाला गाड़ दिया हो तथा इसके साथ ही उल्टी हो रही हो। आमाशय तथा पाचन संस्थान में ऐंठन जैसा दर्द हो रहा हो तथा साथ ही सांस लेने में परेशानी और घुटन महसूस हो रही हो। खाना खाने के बाद सुस्ती आ रही हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में देखने को मिल रहा हो तो उसका उपचार करने के लिए ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- ऊपर के जबड़े में तेज दर्द हो रहा हो तथा दर्द का असर दान्तों से शुरू होकर चेहरे की हडि्डयों (मलर बोंस) तथा कनपटियों तक फैल जाता है और चेहरे और सिर पर पसीना अधिक आ रहा हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि का उपयोग लाभदायक है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में दर्द के साथ खिंचाव हो रहा हो और ऐसा महसूस हो रहा हो कि पेट में कोई नोकदार चीज चुभ गई है और पेट फुल रहा हो। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रात के समय में सोने पर अनियमित तथा उखड़ा हुआ सांस लेने पर मजबूर होना, अधिक घुटन महसूस हो रही हो, ठण्डी हवा लगने पर दम घुट रहा हो तो इस प्रकार के लक्षण को दूर करने के लिए ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- कूल्हों में तेज दर्द होना, हडि्डयों के छोटे जोड़ों में दर्द होना तथा कलाई में दर्द होना, हाथ की उंगलियों में दर्द होना, टखनों में दर्द होना, पैर के अंगूठों में आमवाती रोग जैसा दर्द होना, हल्की सी थकान होने पर जोड़ों में सूजन तथा कलाई में सूजन होना, किसी भी प्रकार के कार्य को करने से सूजन आ जाती है तथा सूजन वाले भाग लाल पड़ जाते हैं। हाथों में लकवा जैसी स्थिति उत्पन्न होना। बाजुओं में अकड़न महसूस होना, घुटनों में दर्द होना। खाने तथा बातचीत करने या कुछ खाने के बाद आलस्य आना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
सम्बन्ध :-
ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि की तुलना कई प्रकार के औषधियों जो इस प्रकार हैं-कालो, ऐकोन, कौलेफाइलम, सिमिसीफूगा और लिडम के साथ कर सकते हैं।
मात्रा :-
ऐक्टिया स्पाइकेटा औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
ऐकोनाइटम नैपेल्लस (ACONTUM NAPELLUS)
ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि तीव्र रोगों को ठीक करने के लिए बहुत उपयोगी है। इस औषधि का पुराने रोगों से कोई सम्बन्ध नहीं है। रोगों को ठीक करने के लिए सबसे पहले यह समझ लेना चाहिए कि नए और पुराने रोग क्या होते हैं। नए रोग कहने पर कुछ लोग सोचते हैं कि रोग थोड़े दिनों से ही हैं और पुराना रोग कहने पर बहुत से लोग सोचते हैं कि यह बहुत दिनों से चला आ रहा रोग है। रोग की प्रकृति को देखकर यह पता चलता है कि कुछ ही समय के बाद रोग अपने आप ठीक हो जाएगा, चाहे उसकी चिकित्सा हो या नहीं, उसे नया रोग या एक्युट कहते हैं और इसके विपरीत जो रोग शरीर में बहुत दिनों से चला आ रहा होता है तथा जिसे बिना किसी दूसरी शक्ति या औषधि शक्ति की सहायता से ठीक न किया जा सकता हो और रोगी का जीवन शक्ति असमर्थ हो, उसे पुराना रोग या क्रोनिक कहते हैं।
मृत्यु का भय, घबराहट और बेचैनी होना जैसे रोग का आक्रमण एकदम तेज होने पर ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप रोगी ठीक हो जाता है। इस औषधि का असर थोड़े समय के लिए होता है। जिस रोगी में इस प्रकार के लक्षण होते हैं, उसका रोग कुछ समय में अन्दर ही ठीक हो जायेगा। यदि रोगी ठीक होने वाला है, उस समय इस औषधि का उपयोग किया जाए तो रोग को ठीक होने में देर नहीं लगेगी।
यदि रोग का आक्रमण अचानक हो और उसके साथ मृत्यु का भय (डर) हो रहा हो तथा इसके साथ ही बेचैनी हो रही हो, अधिक घबराहट महसूस हो रही हो, डाक्टर के पास जाने पर रोगी यह कहता हो कि मैं जरूर मर जाऊंगा, ऐसे रोगी को 200 शक्ति ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि की एक खुराक देने से उसका रोग ठीक हो जाता है तथा डर भी खत्म हो जाता है।
छोटे बच्चे को जब बुखार हो जाता है तो वह इसके कारण इस कदर बेचैन हो जाता है कि वह बिछौने पर कराहता है, बार-बार करवटें बदलता रहता है और रोता रहता है, उसको लिटाने से, गोद में लेने या घुमाने से भी चुप नहीं होता है। बच्चा कुछ देर पहले बिल्कुल अच्छा था, खेलता था, लेकिन अचानक बीमार पड़ गया हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित बच्चे के रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
डर के करण रोग की उत्पत्ति हो, सभा या समाज में जाने से, सड़क पार करने से रोग हो गया हो तथा रोगी को अंधेरे कमरे के अन्दर रहने का मन करता हो, इसके साथ-साथ रोगी को बेचैनी भी हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि उन बच्चों के लिए विशेष गुणकारी औषधि है जो कि देखने में मोटे ताजे होते हैं, शरीर में खून तो अधिक हो लेकिन चेहरा लाल पड़ गया हो।
कभी-कभी गर्भवती स्त्री कहती है कि मैं प्रसव वेदना (बच्चे को जन्म देने के समय का दर्द) नहीं सह सकूंगी, बच्चे को जन्म देते समय मेरी मृत्यु हो जाएगी। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्रियों को 200 शक्ति ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि की एक खुराक देनी चाहिए, इससे उसका भय दूर हो जायेगा।
बच्चों और स्त्रियों के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि इसलिए अधिक उपयोग किया जाता है क्योंकि वे डर के कारण अक्सर बीमार हो जाते हैं।
विभिन्न लक्षणों में ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग-
तेज प्यास (अनक्यूंचेबल थ्रस्ट) से सम्बन्धित लक्षण :- बार-बार और अधिक मात्रा में पानी पीने पर भी रोगी की प्यास नहीं बुझती है तो ऐसे रोगी को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए, लेकिन यदि रोगी को तेज प्यास लग रही हो और पानी पीने पर एक बार में पानी पीया न जा रहा हो, रोगी थोड़ा-थोड़ा करके पानी पी रहा हो तो ऐसे रोगी को आर्सेनिक औषधि देना चाहिए। जबकि रोगी को प्यास तो तेज लग रही हो और फिर भी वह बहुत देर के बाद अधिक मात्रा में पानी पी रहा हो तो ऐसे रोगी को ब्रायोनिया औषधि देना चाहिए।
शुष्क वायु से रोग की उत्पत्ति (कोमप्लैंटस बाई एक्सपोस्युर टू ड्राई कोल्ड एअर) से सम्बन्धित लक्षण :- सूखी तथा ठण्डी हवा लगने से वात, कफ, जलन और बुखार रोग हो गया हो या कोई अन्य रोग हो गया हो तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए। लेकिन यदि वायु में किसी प्रकार की नमी न रहे फिर भी रोगी को ठण्ड का अहसास हो रहा हो तथा खुश्क और गर्म वायु के कारण उत्पन्न रोग को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया, कास्टिकम और नक्स-वोमिका औषधि का उपयोग करते हैं। जबकि नम ठण्डी हवा लगने से होने वाले रोग को ठीक करने के लिए डलकैमेरा, रस-टाक्स, नक्स-मस्केटा और नेट्रम-सल्फ औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सूजन, प्रदाह (इनफ्लेमेशन) से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के किसी भाग में जलन या रक्त की अधिकता होने पर ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग लाभदायक है। ज्वलनकारी ज्वर, आंख, कान, तालू, फेफड़ा, दिल, आंतड़ियां तथा शरीर के किसी भी भाग में तेज जलन या रक्त का संचय होने पर, खून या रस के वहां पर जमने से पहले इस औषधि का उपयोग करना चाहिए। जबकि खून अच्छी तरह से जम जाए तो बेलाडोना औषधि का उपयोग करना चाहिए, खून जमकर फैल जाने पर ब्रायोनिया और एपिस औषधि का उपयोग करना चाहिए, मवाद जम जाने पर हिपर तथा साइलिशिया औषधि का उपयोग करना चाहिए।
जुकाम से सम्बन्धित लक्षण :- खुश्क ठण्डी हवा लगने तथा एकाएक पसीना रुक जाने से यदि जुकाम हो गया हो तथा बार-बार छींके आ रही हों, नाक से पतला गर्म पानी निकल रहा हो, शरीर में हल्का दर्द हो और बुखार रहे तो ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग लाभकारी है। जबकि जाड़े के मौसम में जुकाम के बन्द हो जाने और गले में खराश होने पर नक्स-वोमिका, ऐमोन-कार्ब और सैम्बयूकस औषधि का उपयोग लाभदायक होता है। जुकाम के साथ सिर में गर्मी, नसों के फड़कने, गले और तालू में सूजन होने पर बेलाडोना औषधि का उपयोग करना चाहिए। जुकाम सूख जाने पर ब्रायोनिया, चायना औषधि का उपयोग करने से लाभ मिलता है।
स्नायुशूल से सम्बन्धित लक्षण :- रेल या घोड़े की सवारी के समय खुश्क ठण्डी हवा लगने से नसों में तेज दर्द होने लगता है, चेहरा लाल हो जाता है, चेहरे पर जलन होती है और ऐसा महसूस होता है कि मानो आग के शोले चेहरे पर गिर गए हों, कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि चेहरे पर चींटिया रेंग रही हैं और कभी-कभी ऐसा महसूस हो रहा हो कि नसों के अन्दर बर्फ की तरह का ठण्डा पानी दौड़ रहा है तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए। जबकि यदि चेहरे के बांई तरफ के स्नायु में दर्द के साथ जलन भी हो रही हो तो स्पाइलीजिया औषधि का उपयोग करना चाहिए, चेहरे के बांई तरफ का स्नायु तेज दर्द के साथ सुन्न पड़ गया हो तो कालचिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए, यदि चेहरा पर सुखापन आ गया हो तो एमिल नाइट्रोसम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- अचानक खुश्क ठण्डी हवा लगकर आंखों में सूजन, लाली, गर्मी तथा जलन, तेज दर्द, बालू की तरह किरकिराहट होने पर ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए, लेकिन यदि आंख में कुछ पदार्थों के चले जाने से ऐसा हो रहा हो तो आर्निका या सल्फर औषधि का उपयोग करना चाहिए, बांई आंख की पुतली में तेज दर्द हो रहा हो तो स्पाईजीलिया ऐकोनाई औषधि का उपयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- यदि बच्चे को खुश्क हवा तथा उत्तरी हवा में घुमाने के बाद बच्चा चीख़ने और रोने लगे, तथा इसके साथ-साथ उसे बुखार भी आ गया हो, बेचैनी के कारण किसी तरह से चुप नहीं हो रहा हो, गोद में टहलना पसन्द करता हो और कान के पास बार-बार हाथ ले जाता हो, इस प्रकार के लक्षण यदि बच्चे में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए। जबकि यदि बच्चे के कान में जलन हो रही हो तथा उसे कान कटता हुआ महसूस हो रहा हो, उसके कान में इस प्रकार का दर्द हो रहा हो जैसे कि किसी प्रकार के कीड़े का डंक लग गया हो तथा कान पर दर्द और जलन हो रहा हो, गाने सुनने से परेशानी हो रही हो तो उसे नेट्रम-कार्व या सैब औषधि देना चाहिए।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरे के ऊपरी भाग में सुखापन हो गया हो और फीका पड़ गया हो, एक गाल लाल और दूसरा फीका हो गया हो, चेहरा फूल गया हो और सुखापन हो गया हो, रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि चेहरा बढ़ रहा है और फूल रहा है तो इस प्रकार के लक्षण को दूर करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए। जबकि यदि चेहरा पर फीका अनुभव हो रहा हो तो कैमो औषधि का उपयोग करना चाहिए, यदि चेहरा फूल रहा हो और लाल हो गया हो तो बेल, ओपि औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मूत्र-संस्थान (युरिनरी ओरगेंस) से सम्बन्धित लक्षण :-
गुर्दे तथा मूत्राशय (किडनी एंड ब्लेडर) पर ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का लाभदायक प्रभाव होता है। बार-बार पेशाब करने की इच्छा के साथ दर्द और बेचैनी हो रही हो, पेशाब थोड़ा, गर्म, लाल या काला हो रहा हो, पेशाब करने में दर्द महसूस हो रहा हो तथा पेशाब बूंद-बूंद करके आ रहा हो और मूत्र-नली में जलन हो रही हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
ठण्ड लगने पर बच्चों को पेशाब कराने पर वे रोते हैं और उन्हें बेचैनी हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणो में रोगी को ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि देना चाहिए। जबकि यदि रोगी में खाली पेशाब थोड़ा, गर्म और लाल या काला हो रहा हो तो उसे एपिस, आर्स, बेल, कैन्थ औषधि देना चाहिए, यदि पेशाब रुक-रुककर आ रहा हो तो एपिस, हायोस या स्ट्रैमो औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्री जननेन्द्रिय से सम्बन्धित लक्षण :-
रक्त प्रधान स्त्री (शरीर में रक्त की अधिकता वाली स्त्री) का मासिकधर्म ठण्ड लगने तथा डरने या क्रोधित होने से रुक गया हो तो ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग लाभकारी है। ऐसे स्त्री के योनि खुश्क, गर्म हो गया हो और स्पर्श सहन न हो रहा हो तथा जिस प्रकार प्रसव (बच्चे को जन्म देने के समय योनि से खून बहता है उस प्रकार का स्राव) के समय में स्राव होता है उस प्रकार से स्राव हो रहा हो, शरीर गर्म और खुश्क हो गई हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
अचानक मासिकधर्म रुक जाने पर डिम्भकोष में जलन हो रही हो, भय या क्रोध से गर्भपात हो जाने की आशंका हो तो ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए जबकि यदि रोगी स्त्री में केवल योनि खुश्क, गर्म और स्पर्श सहन न होने का लक्षण हो तो उसे बेल औषधि देना चाहिए, बच्चेदानी से रक्त का स्राव हो रहा हो तो उसे हेमा, सिकेल या इपिकैक औषधि देना चाहिए।
पक्षाघात से सम्बन्धित लक्षण :- खुश्क, ठण्डी हवा लगने से शरीर पर पक्षाघत (लकवा) का प्रभाव, रोग ग्रस्त भाग पर ठण्ड अधिक लगना और झनझनाहट हो तो ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग लाभदायक है। यदि रोग ग्रस्त भाग पर झनझनाहट हो तो कैनाबिस इन्डिका और स्टैफिसैग्रिया औषधि देना चाहिए, ठण्ड से होने वाले पक्षाघात में रस-टाक्स, सल्फर और कास्टिकम औषधि देना चाहिए, इस प्रकार के लक्षण होने पर ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि के अलावा इन औषधियों को दे सकते हैं, अत: ऐसे लक्षण होने पर ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि की तुलना कैनाबिस इन्डिका, स्टैफिसैग्रिया, रस-टाक्स, सल्फर और कास्टिकम औषधि से कर सकते हैं।
प्रसव (बच्चे को जन्म देना) से सम्बन्धित लक्षण :- बच्चे को जन्म देते समय यदि बहुत अधिक परेशानी स्त्री को हो रही हो या किसी यंत्र के द्वारा उसका प्रसव कराया जा रहा हो और नवजात शिशु सांस न लेता हो, बेहोश पड़ा हो या दिल की तकलीफ़ के कारण सांस लेने में दम घुटता सा मालूम होता हो तो इस प्रकार के लक्षण में ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए। यदि नवजात शिशु का पेशाब किसी कारण से रुक जाए और कई दिनों तक न हो तो उसे ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि देनी चाहिए इसके अलावा कोई भी दवा नहीं देना चाहिए। जबकि बच्चे को जन्म देने के बाद यदि माता को मूत्राभाव-(मूत्र की कमी या मूत्र का रुक जाना) हो तो एक खुराक कास्टिकम औषधि का सेवन कराना चाहिए इससे उसका यह रोग ठीक हो जाएगा।
सिर दर्द से सम्बन्धित लक्षण :- डर, क्रोध, और रजोधर्म (मासिकधर्म) के एकाएक रुक जाने के कारण सिर में खून की अधिकता से सिर में दर्द और चक्कर आना, सिर की चोटी पर तेज दर्द होना जिसके कारण सिर फटता हुआ मालूम पड़े और रात के समय दर्द में और तेजी होना तथा चलने-फिरने से और खुली हवा में रहने से कुछ आराम मिलता हो, लू, लपट लगने तथा खासकर के धूप में सोने से सिर में दर्द तेज हो जाना, जाड़े के मौसम में उत्तर की खुश्क ठण्डी हवा से रेल या घोड़े की सवारी से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। रक्त प्रधान (रक्त की अधिकता) व्यक्तियों का जुकाम रुक जाने पर और साथ ही सिर में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी व्यक्तियों में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि बहुत उपयोगी है। रोगी के आंखों के भौं पर तेज दर्द हो रहा हो, सिर में दर्द होने के साथ ही बेचैनी हो रही हो, तेज प्यास लग रही हो और भय अधिक हो तो ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक भय हो, अधिक चिन्ता हो, भय के कारण कई चीजों को नष्ट करने का मन कर रहा हो, रोगी को प्रलाप की अवस्था (शोक की अवस्था) हो और वह अप्रसन्न हो, ऐसी अवस्था होने पर भी रोगी को बेहोशी कम आती हो। भविष्य के प्रति निराश तथा भयभीत हो, मौत से डरता हो, रोगी यह सोचता हो कि मृत्यु होने वाली है, रोगी अपनी मौत के दिन की भविष्यवाणी भी कर देता है। भीड़भाड़ तथा सड़क पार करते समय अधिक डर लगता हो, व्याकुलता अधिक हो, बार-बार करवटें बदल रहा हो, चौंकने की प्रवृति बढ़ जाती है, दर्द सहन नहीं हो रहा हो, दर्द के कारण रोगी पागल सा हो जाता है। किसी संगती में रहने का मन नहीं कर रहा हो, रोगी अधिक उदास रहता हो। कभी तो रोगी यह सोचता है कि उसके शरीर का अंग अस्वाभाविक रूप से मोटा हो गया है तथा जो कुछ अभी-अभी किया है वह एक सपना था। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसका उपचार करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
दांतों के दर्द से सम्बन्धित लक्षण :- दांत के दर्द में ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग बहुत राहत देने वाला है लेकिन यह ध्यान देना चाहिए कि दांत का दर्द पुराना हो तथा इसके साथ रोगी को अधिक घबराहट हो रही हो तथा बेचैनी हो रही हो।
मुख (मुंह) से सम्बन्धित लक्षण :- मुख के अन्दर सूखापन और गुदगुदाहट होना, जीभ में सूजन तथा जीभ के अगले भाग में गुदगुदी होना, दांत अधिक ठण्डा हो जाना, निचला जबड़ा लगातार चलना जैसे कुछ चबा रहा हो, मसूढ़े अधिक गर्म तथा उसमें जलन के साथ दर्द होना, जीभ पर सफेद परत जम जाना, इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में हैं तो उसका उपचार करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
जलन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार हो, सिर तथा रीढ़ और नसों में जलन हो रही हो, कभी-कभी रोगी को ऐसी जलन होती है कि उसके शरीर पर किसी ने मिर्च लगा दी हो। इस प्रकार के लक्षण को दूर करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले में जलन, लाली, खुश्की, टॉन्सिल की वृद्धि, सूजन, गले में दर्द, निगलने में तकलीफ और गले में सूजन हो, लेकिन इन लक्षणों के साथ-साथ रोगी को अधिक घबराहट, बेचैनी तथा रोगी के शरीर में रक्त की अधिकता, खुश्की तथा ठण्डी हवा से रोग के लक्षणों में वृद्धि हो तो ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :-
खुश्क ठण्डी हवा लगने से खूनी पेचिश हो गया हो तो ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
शारीरिक परिश्रम करने के बाद बर्फ का पानी पीने से पेट में जलन हो रही हो, मुंह से पेट तक जलन हो रही हो, दर्द ऐसा महसूस हो रहा हो जैसे कि पेट का कोई भाग कट गया हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
उल्टी तथा पेशाब करने में अधिक परेशानी हो रही हो तो रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है लेकिन रोगी को इन लक्षणों के साथ डर तथा बेचैनी भी होना चाहिए।
बच्चे को पानी के समान पतला दस्त हो रहा हो तथा डर और बेचैनी हो रही हो तो ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
बुखार के साथ अचानक तेज ऐंठन हो रही हो, आंव, दस्त में खून आ रहा हो, घास के रंग का हरा दस्त आए तो इस प्रकार के लक्षण होने पर ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग बहुत लाभकारी है।
मलान्त्र से सम्बन्धित लक्षण :- मलद्वार में दर्द होने के साथ रात को खुजली और सुई चुभोने जैसा दर्द होना, बार-बार थोड़ा-थोड़ा मलत्याग होना तथा मल का रंग हरा, कूटी हुई वनस्पति जैसे टुकड़ों में होना, पेशाब का रंग लाल होना, हैजा जैसी अवस्था हो जाना तथा उसके साथ रोगी को बहुत अधिक बेचैनी, घबराहट तथा भय होना। खूनी बवासीर। बच्चों को पानी की तरह दस्त होना तथा इसके साथ बच्चों का अधिक रोना तथा चिल्लाना, नींद न आना और बेचैनी होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- उल्टी आना तथा इसके साथ-साथ भय होना, अधिक गर्मी लगना तथा अधिक पसीना निकलना, पेशाब बार-बार आना, ठण्डे पानी की प्यास लगना, पानी के अलावा हर चीज का स्वाद कड़वा लगना। अधिक प्यास लगना। पानी पीते ही उल्टी आना तथा रोगी यह कहता हो कि अब मैं मर जाऊंगा। पित्त का रंग हरा तथा श्लैष्मिक और रक्त युक्त हो जाना। आमाशय पर अधिक दबाव महसूस होने के साथ सांस लेने में कष्ट होना। खून की उल्टी होना। आमाशय से ग्रासनली (भोजननली) तक जलन होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पुरुष से सम्बन्धित लक्षण :-
रक्त प्रधान (खून की अधिकता वाले पुरुष) पुरुषों को अचानक ठण्ड लगने से उनके अण्डकोष में वृद्धि तथा उसमें दर्द और सूजन हो तो ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग लाभकारी होता है।
लिंगमुंड पर चींटियों के रेगनें जैसा अहसास हो रहा हो तथा डंक लगने जैसी अनुभूति हो रही हो अण्डकोष में कुचले जाने जैसा दर्द तथा कठोरपन महसूस हो रहा हो, कुछ समय के लिए लिंग में उत्तेजना होकर वीर्यपात हो जाना तथा लिंग में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग लाभकारी होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय में रोग होने के साथ बायें कंधे में दर्द होना। छाती में सुई चुभने जैसा दर्द होना। धड़कन की गति तेज होने के साथ बेहोशी होने की समस्या होना, उंगलियों में सुरसुराहट तथा नाड़ी तेज चलना, नाड़ी तेज, कठोर, तनी और उछलती हुई महसूस होना। नाड़ी कभी-कभी रुक-रुककर चलती हुई महसूस होता हो। रोगी जब बैठता है तब उसकी कनपटियों और गले की नाड़ियों को महसूस किया जा सकता हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसका उपचार करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पीठ में सुन्नपन होना तथा पीठ में अकड़न तथा दर्द महसूस होना। पीठ में कुचलन (कुचलने जैसा दर्द) तथा रसकन (क्राउलिंग) और सरसराहट महसूस होना। गर्दन के पिछले भाग में अकड़न तथा स्कन्ध-फलकों के बीच दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि लाभदायक है।
रक्तस्राव से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के किसी भी भाग से रक्त का स्राव (खून का बहना) हो रहा हो तो ऐसी स्थिति में ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए क्योंकि इसके उपयोग से रक्त का स्राव होना बंद हो जाता है और इसलिए इस अवस्था में यह बहुत उपयोगी है।
श्वास-संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :-
न्यूमोनिया की शुरुआती अवस्था में पसीने निकलने के साथ तेज बुखार हो, कष्टदायक सूखी खांसी में और तेज नब्ज और भरी हुई रहने पर ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि लाभकारी है।
न्यूमोनिया का असर रोगी के चेहरे से पता चलता हो, रोगी यह कहता हो कि मेरी मृत्यु हो जायेगी, मै कुछ ही समय में मर जाऊंगा और रोगी को मृत्यु का भय और बेचैनी रहती है। रोगी के छाती में सुई सी चुभन होती है और तेज दर्द होता है, रोगी को पीठ के बल लेटने के अलावा किसी और तरह से लेट न पा रहा हो। रोगी जरा ऊंचा होकर पीठ के बल लेटना पसन्द करता हो। जरा से खांसने से कफ के साथ खून निकलने लगता हो, क्षय (टी.बी.) रोग न होने पर भी अपने आप खून की उल्टी हो रही हो और खून का रंग बिल्कुल लाल हो तो इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी के रोग का उपचार करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए, इसके उपयोग से रोगी को बहुत लाभ मिलता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- गंध के प्रति भारी संवेदनशीलता (गंध का अधिक अनुभव होना), नासिकामूल पर दर्द। नजला होने के साथ अधिक छींके आती हों। नथुनों में जलन तथा दर्द हो। नाक से चमकदार लाल खून निकल रहा हो। श्लैष्मिक झिल्ली सूखी हुई, नाक बंद, सूखा या हल्का बह रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- बुखार किसी न किसी कारण से हुआ हो जैसे कि ठण्डी हवा लग जाना, पसीना दब जाने का बुरा प्रभाव और परिश्रम करने के बाद ही भीग जाना या नहाने से तथा इस बुखार के साथ यदि रोगी को भय, डर तथा मृत्यु का भय लग रहा हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
ठण्ड से सम्बन्धित लक्षण :- ठण्ड हाथ-पैरों से आरम्भ होकर छाती और सिर की तरफ चढ़ता है, एक गाल में सूखापन तथा गर्मी महसूस हो रही हो, दूसरा गाल ठण्डा पीला हो गया हो जरा भी हिलने या रजाई से हटने से ठण्ड अधिक तेज महसूस हो रहा हो तथा डर और भय और बेचैनी हो रही हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
ताप (गर्मी) से सम्बन्धित लक्षण :-
त्वचा बिल्कुल खुश्क और गर्म हो गया हो, चेहरा पर सूखापन और प्यास अधिक मालूम होती है और रोगी एक ही बार बहुत ज्यादा और ठण्डा पानी पी लेता है, रोगी को बेचैनी और घबराहट होती है। रोगी परेशानी के कारण बार-बार करवटें बदलता रहता है, एक स्थान पर वह नहीं रह सकता हो। शाम के समय में तथा नींद न आने पर लक्षणों में और वृद्धि हो, बुखार बहुत देर तक रहता हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंगों में सुन्नपन, सुरसुराहट, तेज दर्द महसूस होना, हाथ-पैरों में बर्फ जैसी ठण्ड महसूस होना और असंवेदनशीलता महसूस हो रही हो। बाहों में कुचलने जैसा दर्द, भारीपन और सुन्नपन महसूस होना। बायें बाजू में नीचे की तरफ दर्द होना। हाथ गर्म तथा पैर ठण्डे होना। हडि्डयों के जोड़ों में आमवाती जलन होना, रात के समय में इन जोड़ों में तेज दर्द होना, हडि्डयों के जोड़ों पर लाल चमकदार सूजन होना। हड्डी के जोड़ ढीले पड़ना तथा कमजोर होना, जोड़ में दर्द तथा कड़कड़ाहट होना। रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि नीचे की जांघ पर पानी की बूंदें टपक रही हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को नींद में डरावने सपने आते हों, बेचैनी हो रही हो। अनिन्द्रा के साथ बेचैनी और करवटें बदलते रहना। सोते-सोते अचानक चौंक पड़ना, सपने आने के साथ छाती पर दबाव महसूस करना। वृद्धों में अनिन्द्रा रोग। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सावधानी :-
ज्वर के शुरुआती अवस्था में ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि नहीं देना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। जब तक रोगी को बुखार की अवस्था में उसे मृत्यु का डर न लग रहा हो, घबराहट न हो रही हो, बेचैनी, रोग का लक्षण तेज न हो और रोग अचानक न हो और तेज न हो तब तक ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि रोगी को नहीं देना चाहिए।
सम्बंध :-
रोग की नई अवस्था (एक्युट स्टेट) में ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि उपयोगी है जबकि पुरानी रोग की अवस्था में (क्रोनिक स्टेट) में सल्फर औषधि उपयोगी है।
अम्ल पदार्थ, शराब और कॉफी, खट्टे फल तथा नींबू का शर्बत ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि की क्रिया को और अधिक प्रभावी करते हैं।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
खुली हवा में टहलने से, गरम कमरे में रहने, शाम तथा रात को, धूम्रपान करने से, पीड़ित अंग का सहारा लेकर लेटने से, संगीत से, शुष्क तथा ठण्डी वायु इस औषधि के लक्षणों में कमी होती है।
मात्रा (डोज) :-
ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि की मात्रा ज्ञानेन्द्रियों के रोगों के लिए छठी शक्ति, रक्तसंकुचन अवस्थाओं के लिए पहली व तीसरी शक्ति उपयोगी है। ऐकोनाइटम नैपेल्लस औषधि तीव्र (तेज) क्रिया करने वाली औषधि है।
एडोनिस वर्नेलिस (ADONIS VERNALIS)
हृदय के लिए एडोनिस वर्नेलिस औषधि बहुत अधिक लाभदायक है। यह औषधि विशेषकर आमवात या इनफ्लुएंजा रोग या गुर्दे में सूजन के बाद, जब हृदय की पेशियों में चर्बी (फेट्टी डेजनिरेशन) हो जाती है तो एडोनिस वर्नेलिस औषधि बहुत लाभकारी है जिसके उपयोग से कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
यह औषधि नाड़ी की गति को नियमित करती है और हृदय की सिकुड़ने की शक्ति को भी बढ़ाती है तथा पेशाब की मात्रा को बढ़ाती है। हृदय में पानी भर जाने (कारडीएक ड्रोप्सी) के रोग को ठीक करने में यह औषधि बहुत उपयोगी है।
हृदय में अधिक कमजोरी होना, हृदय की कार्य करने की गति कम हो जाना तथा नाड़ी की गति कम हो जाना, छाती में पानी भरना, जलोदर रोग आदि रोगों को ठीक करने में एडोनिस वर्नेलिस औषधि बहुत उपयोगी है।
एडोनिस वर्नेलिस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में हल्कापन महसूस होना, सिर में दर्द का असर सिर के पिछले भाग से होते हुए कनपटियों से लेकर आंखों तक होना, उठते समय सिर को जल्दी-जल्दी घुमाने से या लेटते समय सिर में चक्कर आने लगता है, कानों में भनभनाहट की आवाज महसूस होती हो, खोपड़ी कसी हुई महसूस हो रही हो तथा आंखें फैली हुई हो आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एडोनिस वर्नेलिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह लसलसा हो गया हो, जीभ गन्दी और पीली पड़ गई हो और जीभ में दर्द हो रहा हो तथा जलन हो रही हो और ऐसा महसूस हो रहा हो जैसे जीभ जल गई हो, ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए एडोनिस वर्नेलिस औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब में तेलकण तैरते दिखाई दे रहे हों तथा उसमें कुछ अन्न के सामान कण तैरते हुए दिखाई दे रहे हों तो इस प्रकार के लक्षण को दूर करने के लिए एडोनिस वर्नेलिस औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- तेज भूख लग रही हो, पेट में भारीपन महसूस होना, बेहोश होना तथा घर से बाहर जाने पर कुछ आराम मिल रहा हो तो ऐसे रोग को ठीक करने के लिए एडोनिस वर्नेलिस औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- सांस लेने की इच्छा बार-बार हो रही हो, छाती पर कोई भारी बोझा रखने जैसा अहसास हो रहा हो तो इस लक्षणों को दूर करने के लिए एडोनिस वर्नेलिस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बेचैनी हो रही हो तथा इसके साथ-साथ भयानक (डरावनी) सपने आ रहे हों तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एडोनिस वर्नेलिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- गर्दन में दर्द हो रहा हो, रीढ़ की हड्डी में अकड़न तथा दर्द हो रहा हो तो रोग को ठीक करने के लिए एडोनिस वर्नेलिस औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
हृदय रोग से सम्बन्धित लक्षण :- महाधमनी (एरोटीक) से आने वाले रक्त (खून) के वापसी में बहाव होना तथा द्विक्पर्दी (मिटरल), महाधमनी की सूजन (महाधमनी में सूजन), चर्बी होना (फेटी हर्ट), हृदय के अन्दरूनी भाग में सूजन (एण्डोकारडीटिस), हृदय में घाव के कारण सूजन (पेरीकोरडीटिस), हृदय के अगले भाग में दर्द होना, धड़कन में कष्ट तथा सांस लेने में परेशानी होना, शिरारक्त का अधिक संचित होना, दमा रोग, हृदय के भाग में चर्बी होना, हृदय के पेशियों में दर्द होना (माइकरडीटिस), हृदय की कार्य करने की गति अनियमित होना, हृदय में सिकुड़न तथा सिर में चक्कर आना, नाड़ी की गति तेज होना तथा अनियमित रूप से चलना। इन सभी रोगों को ठीक करने के लिए एडोनिस वर्नेलिस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
एडोनिस वर्नेलिस औषधि का अन्य औषधियों से सम्बन्ध :- एडोनिस वर्नेलिस औषधि हृदय के कार्य शक्ति को बल प्रदान करता है तथा पेशाब की मात्रा को तेज करता है। चौथाई ग्रेन प्रतिदिन लेने पर या प्रथम दशमलव अवपेषण की 2 ग्रेन से 5 ग्रेन तक की मात्रा का उपयोग करने से धमनियों में दबाव बढ़ती है तथा धमनी प्रसार (डेस्टोल) भी बढ़ती है, इस औषधि के फलस्वरूप शिराओं में भरे हुए अधिक रक्त की मात्रा घट जाती है। इस प्रकार के लक्षण को दूर करने में डिजिटैलिस औषधि का उपयोग अच्छा है लेकिन इसका बार-बार उपयोग करने से अधिक लाभ नहीं होता है। इसलिए डिजिटैलिस, कैटेलिस, कनैवलेरिया तथा स्टोफैंयस औषधि से एडोनिस वर्नेलिस औषधि की तुलना कर सकते हैं।
मात्रा :-
एडोनिस वर्नेलिस औषधि की मूलार्क की 5 से 10 बून्दें का प्रयोग करना चाहिए।
एड्रिनैलिन (ADRENALIN)
एड्रिनैलिन औषधि का प्रभाव अधिवृक्क ग्रन्थिमज्जा के कार्य पर अधिक होता है। शरीर के संवेदी तन्त्रिका पर इस औषधि का सक्रिय प्रभाव पड़ता है। एड्रिनैलिन औषधि की शरीर के समस्त अंगों पर उसी प्रकार क्रिया होती है जिस प्रकार वह संवेदीतंत्रिकान्तों (साइसपेथेटिक नर्व एन्टीगस) का उद्दीपन करती है।
श्लैष्मिक झिल्लियों पर इसका बाहरी प्रयोग करने से जल्दी ही यह थोड़ी देर के लिए रक्त का बहाव कम कर देता है, तथा आंखों में बूंद-बूंद टपकाने से सफेद पर्दा पीला पड़ जाता है और कई घंटों तक बना रहता है।
तेज आक्सीकरण (रेपिड ओक्सिडेशन) के कारण इस औषधि की क्रिया तब तक और तेज, प्रभावी, रोग को नष्ट करने वाली, हानि को दूर करने वाली होती है जब तक इसे लगातार दोहराया नहीं जाता है।
एड्रिनैलिन औषधि का मुख्य कार्य संवेदी तंत्रिकान्तों, प्रमुख रूप से आंत के क्षेत्र को उत्तेजित करना है। इसके फलस्वरूप परिसरीय लघु धमनियों में सिकुड़न पैदा हो जाती है और रक्तदाब बढ़ जाता है।
आमाशय तथा आंखों में इसका अधिक प्रभाव होता है, त्वचा में कम मात्रा में तथा दिमाग व फेफड़ों में बिल्कुल नहीं होता है, साथ ही ऐसा भी पाया गया है कि यह नाड़ी की गति को कम कर देती है तथा हृदय की गति को मजबूत करती है।
ग्रंथियों की बढ़ी हुई सक्रियता, शर्करामेह, श्वास केन्द्र की कमजोरी, आंख, जरायु (बच्चेदानी) तथा योनि के पेशी-ऊतकों की सिकुड़न, आमाशय, आन्तों तथा मूत्राशय के पेशी-तन्तुओं में ढीलापन आ जाना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए एड्रिनैलिन औषधि का प्रयोग का प्रयोग करना चाहिए।
एड्रिनैलिन औषधि का प्रयोग संकोचन क्रिया (वेसो-कोस्ट्रीकेशन एक्शन) के लिए किया जाता है। इसलिए कहा जा सकता है कि यह औषधि अधिक शक्तिशाली, अतिसार रोग को ठीक करने वाली तथा रक्तस्राव को बंद करने वाली है। यह शरीर के सभी भागों से होने वाले कशेरुका रक्तस्राव को रोकती है, जबकि इस औषधि का बाहरी उपयोग मुख (मुंह), नाक, कान, कंठ (गला), मलान्त्र, आमाशय, स्वरयन्त्र, जरायु (बच्चेदानी), मूत्राशय आदि पर एड्रिनैलिन औषधि का प्रभाव अधिक पड़ता है। रक्त के दोषपूर्ण जमाव के कारण उत्पन्न होने वाली रक्तस्राव की अवस्था को ठीक करने में इस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
बाहरी अंगों पर एड्रिनैलिन औषधि का उपयोग करने के लिए इसके घोल की मात्रा 1:10,0,000-1:1,000 लेना चाहिए। यदि इस घोल को आपरेशन क्रिया में उपयोग करने के समय में आंख, नाक, गले तथा स्वरयन्त्र पर छिड़का या लगाया जाए तो यह खून नहीं बहने देती है।
जालीदार और फन जैसी आकृति वाले हडि्डयों के छिद्रों में जमा होने वाले रक्त और परागज ज्वर को ठीक करने के लिए एड्रिनैलिन औषधि की 1:50,000 मात्रा के घोल उपयोग करने से तुरन्त लाभ मिलता है। यहां पर इसकी तुलना हीपर औषधि से की जा सकती है क्योंकि स्राव को बाहर निकलने के लिए हीपर औषधि की मात्रा 1x का उपयोग किया जाता है।
वर्लहोफ्स (वोरल्होफस) रोग को ठीक करने के लिए एड्रिनैलिन औषधि की मात्रा 1:1,000 के अनुपात में इंजेक्शन के रूप में दिया जाता है जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। इस औषधि का बाहरी उपयोग में स्नायुशूल (नाड़ियों में दर्द), स्नायुप्रदाह (नाड़ियों में जलन), शरीर के कई अंगों में दर्द को ठीक करने के लिए इसकी मात्रा 1:1,000 घोल के 1 से 2 मिनिम मलहम के रूप में उपयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
फेफड़ों में खून का जमना, दमा, गुर्दे की बीमारियां, धमनी में रुकावट (अर्टेरिओस्क्लेरोसिस), जीर्ण महाधमनीशोथ (क्रोनिक औरटिटिस.महाधमनी में सूजन होना), हृदयशूल (एंगिना पेक्टिओरिस. हृदय में दर्द), शरीर के कई अंगों से खून बहना, परागज, बुखार, हीमोफीलिया (हेमियोफिलिया), रक्ताल्पता-(खून की कमी) (क्लोरोसिस), छपाकी आदि रोगों को ठीक करने के लिए एड्रिनैलिन औषधि का उपयोग लाभकारी होता है।
चक्कर आना, उल्टी आना, जी मिचलाना, पेट में दर्द होना, कई प्रकार के औषधियों के दुष्प्रभाव के कारण हृदयघात होना (हियर फैल्युरे) हृदय का रोग), इस प्रकार के लक्षणों में एड्रिनैलिन औषधि का उपयोग कर सकते हैं क्योंकि एड्रिनैलिन औषधि वाहिका प्राचीरों में नाड़ियों के अंतिम सिरों पर दबाव डालकर बड़ी तेजी के साथ रक्तदाब को बढ़ा देती है।
एड्रिनैलिन औषधि की मात्रा :-
त्वचा के माध्यम से इंजेक्शन द्वारा 1 से 5 मिनिम (1:1000 घोल जैसे क्लोराइड) पानी में घोलकर प्रयोग करना चाहिए। खिलाने के लिए 5 से 30 मिनिम (1:1000 शक्ति का घोल) का उपयोग करना चाहिए।
सावधानी :-
ऑक्सीजन के प्रति आकर्षण के कारण एड्रिनैलिन औषधि पानी और तनूकृत अम्लीय घोलों (एसिड सोल्युशंस) में खराब हो जाती है। इस औषधि के घोल को हवा और प्रकाश से बचाकर रखना चाहिए। इस औषधि का उपयोग जल्दी-जल्दी नहीं करना चाहिए, क्योंकि हृदय और धमनियों पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है तथा जिसके कारण उनमें घाव उत्पन्न हो सकता है। होम्योपैथिक उपयोग के लिए 2x से 6x के तनूकरण (एटेन्युशंस) का उपयोग करना चाहिए।
ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया (AEGLE-MARMELOS AND AEGLE-FOLIA)
ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता हैं। जो इस प्रकार हैं- पेचिश, बुखार के साथ जलोदर होना, नपुंसकता, खूनी बवासीर तथा दस्त।
ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- याददास्त कमजोर हो जाना तथा मात्रायें लिखने में गलतियां करना, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के चेहरे पर तथा आंख व कान में गर्मी महसूस होना जो खाना खाने के बाद ठीक हो जाता है, ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को शाम के चार बजे से 8 बजे के बीच सिर में दर्द हो रहा हो, शाम को सिर के ऊपरी भाग में जलन महसूस हो रही हो, ये लक्षण खाना खाने के बाद ठीक हो जाता है तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
जलशोफ (जलोधर) से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के किसी भाग में जल जमा हो गया हो, पलकों के ऊपरी भाग में सूजन आ गई हो, हृदय रोग के कारण उत्पन्न सूजन, इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में हो तो उसे ठीक करने के लिए रोगी को ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का सेवन करना चाहिए।
बेरी-बेरी रोग को ठीक करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- श्वासनलियों में जलन, निमोनिया, खांसी तथा सर्दी-जुकाम को ठीक करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नाड़ी से सम्बन्धित लक्षण :- नाड़ी की गति तेज तथा अनियमित रूप से चलने पर रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का सेवन करना चाहिए।
जठरांत्र से सम्बन्धित लक्षण :- बवासीर, कब्ज, अपच तथा पेट में दर्द होना, भोजन करने की इच्छा न होना, भूख न लगना (अनोरेक्सिया), आमाशय के रोग, मुंह में बार-बार थूक आना (वाटरब्रस), आध्यमान (पेट फूलना), तेज आवाज के साथ मलद्वार से वायु निकलना तथा दोपहर के समय में इस प्रकार की समस्या अधिक होना। अमीबी (अमोएबीक) तथा दण्डाणुक पेचिश रोग। इस प्रकार के लक्षणों के रोगों को ठीक करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग लाभदायक होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब बहुत कम मात्रा में होना, पीठ व कमर के भाग में हल्का-हल्का दर्द महसूस होना, दोपहर के समय में और भी तेज दर्द होना, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- खुजली तथा दाद रोग को ठीक करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
पुरुष से सम्बन्धित लक्षण :- नपुंसकता रोग को ठीक करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- इंफ्लुएंजा रोग को ठीक करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग तब दिया जाता है जब रोगी को लगातार ज्वर रहे, पुराना बुखार जिसका सम्बन्ध यकृत एवं जिगर सम्बन्धित रोगों से जुड़ा हो उस रोग को ठीक करने के लिए ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
मात्रा :-
ऐग्ले-मार्मेलस एवं ऐग्ले-फोलिया औषधि की मूलार्क, 3x 6, 30, 200 शक्तियां का प्रयोग करना चाहिए।
इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम (AESCULUS HIPPOCASTANUM)
इस्क्यूलस हिपोकैस्टेन औषधि का उपयोग बवासीर रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है। रोगी यदि यह कहे कि उसे बवासीर हो गया है, लेकिन बवासीर से खून तो नहीं आ रहा है परन्तु मलद्वार खुश्क और गर्म महसूस हो रहा है। रोगी को कभी ऐसा लगता है कि मलद्वार में किसी ने कुछ लकड़ियां भर दी हो। इस प्रकार के लक्षण यदि बवासीर रोग के साथ में है तो रोग को ठीक करने लिए यह औषधि बहुत लाभदायक है।
किसी-किसी रोगी को अपना हाथ-पैर फूला-फूला और भारी-भारी महसूस होता है। टांगों की नसें फूली रहती हैं, यहां तक की उनमें घाव हो जाते हैं। शरीर के किसी स्थान पर जलन हो रही हो और वहां की नसे फूली हुई दिखाई देती हो। गले के अन्दर, आंख की सफेदी पर नीली नसें दिखाई देती हों। कमर से नीचे की हड्डी के अन्दर दर्द हो, रोगी को चलने-फिरने और पेट के बल लेटने से दर्द बढ़ रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
जिन व्यक्तियों को बवासीर का रोग हो गया हो तथा उनके पाचन संस्थान में रोग उत्पन्न हो गया हो और कफ का रोग हो गया हो तो ऐसे रोगियों का उपचार करने के लिए इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के कई भागों में ऐसा महसूस हो रहा हो कि कुछ भरा-भरा हुआ है जैसे- हृदय, आमाशय, गुदा, मस्तिष्क, फुफ्फुय और पट आदि में कुछ भरा हुआ महसूस हो रहा हो तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि से करना चाहिए।
इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को एकाएक गुस्सा आ जाता हो और धीरे-धीरे शांत होता हो, नींद के बाद रोगी एकदम गुमसुम हो जाता हो, रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि वह एकदम अपरिचित स्थान पर आ गया है। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसका उपचार करने के लिए इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर का बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर में दर्द का स्थान परिवर्तन होता रहता है और दर्द दाहिनी तरफ से बांयी तरफ को जाता है। ऐसे रोगी का इलाज इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि से हो सकता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ-साथ जी मिचलाना और यकृत के पास सुई जैसी चुभन सा दर्द हो रहा हो तो इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सांस लेते समय जब हवा नाक और गले से अन्दर की ओर जाती है तो रोगी को अधिक ठण्ड महसूस होती है। खाना खाने के लगभग तीन घण्टे के बाद रोगी के पेट में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए इससे रोग ठीक हो जाता है।
स्त्री से सम्बन्धित लक्षण :-रोगी स्त्री के पेट में ऐसा महसूस होता है कि उसके पेट से कुछ टपक रहा है तथा इसके साथ ही पेट में दर्द हो रहा हो, वह सीधी होकर खड़ी नहीं हो पाती हो, दर्द के साथ-साथ रोगी स्त्री के योनि से स्याही या पीले रंग का चिपचिपा पदार्थ बह रहा हो और यह चिपचिपा पदार्थ जिस अंग से छू जाता है, वहां छिलन सी हो जाती है। इस प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पुरुष से सम्बन्धित लक्षण :- पुरुषों को शौच क्रिया करते समय मूत्र-द्वार से लाख के रंग का चिपचिपा पदार्थ (प्रोस्टेटीक फ्लुइड) निकल रहा हो तो इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि से उपचार करना चाहिए, यह लक्षण इसके प्रभाव से जल्दी ही ठीक हो जाता है।
गर्भाशय से सम्बन्धित लक्षण :- गर्भाशय संबन्धी रोग होने के साथ ही पीठ में दर्द हो रहा हो तथा जांघों और डिम्ब या अण्डकोषों में दर्द हो रहा हो तथा दर्द चलने और झुकने से और बढ़ जाता हो तो ऐसे रोग को ठीक करने के लिए इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
ज्वर (फीवर) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को दोपहर के बाद चार बजे के लगभग ठण्ड लगकर बुखार आता हो, प्यास तेज लग रही हो और गले में दर्द होने के कारण पानी पीया नहीं जा रहा हो। शाम के सात बजे से रात के बारह बजे तक बुखार रहता हो। सारे शरीर से पसीना निकल रहा हो। इस प्रकार के लक्षण होने पर इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
बवासीर के रोग को ठीक करने में इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि के कुछ गुणों की तुलना कालिन, ऐलो, इग्रे, नक्स, म्यूर-ऐसिड और सल्फ औषधि से कर सकते हैं।
कालिनसोनिया औषधि से बवासीर में लाभ मिलने के बाद इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि का उपयोग करने से रोग जड़ से ठीक हो जाता है।
यदि बवासीर का रोग नक्स और सल्फर औषधि के प्रयोग से ठीक नहीं होता है तो इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि का प्रयोग करने से यह रोग ठीक हो जाता है तथा रोगी को बहुत लाभ मिलता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
रोगी को चलने और झुकने तथा ठण्डी हवा में सांस लेने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
मात्रा (डोज) :-
इस्क्यूलस हिपोकैस्टेनम औषधि की मूलार्क से तीसरी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
आरेगैल्लस लैम्बर्टाइ (Aragallus lamberti)
आरेगैल्लस लैम्बर्टाइ औषधि का प्रभाव स्नायु प्रणाली की क्रिया पर होता है जिसके फलस्वरूप व्याकुलता और भ्रम की स्थिति पैदा हो जाती है।
लकवा रोग के लक्षण होना तथा इसके साथ ही रोगी असमंजस (किसी चीज का फैसला न कर पाना) में पड़ जाता है तो उसके इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए आरेगैल्लस लैम्बर्टाइ औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में आरेगैल्लस लैम्बर्टाइ औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का स्वभाव पागलों की तरह हो जाता है, सुबह या शाम के समय में पागलपन का दौर अधिक बढ़ता है। रोगी चिड़चिड़ा, बेचैन तथा उत्तेजनशील हो जाता है। रोगी को अधिक घबराहट होने लगती है तथा वह उदास रहता है। रोगी का मन एक जगह पर नहीं रहता है, वह कभी किसी और चीजों के बारे में सोचता है तो कभी किसी और चीजों के बारे में। रोगी चलते समय अपने मन को एकाग्र नहीं रख पाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए आरेगैल्लस लैम्बर्टाइ औषधि उपयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को एक वस्तु दो-दो दिखाई देती हैं, तथा उसके आंखों में जलन होने लगती है और होंठ फट जाता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए आरेगैल्लस लैम्बर्टाइ औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले के अन्दरूनी भाग में दर्द होता है तथा ऐसा महसूस होता है कि जैसे गले के अन्दर कोई चीज फंस गई है, रोगी का जी मिचलाने लगता है तथा ग्रासनली (भोजन की नली) में सूजन आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए आरेगैल्लस लैम्बर्टाइ औषधि का उपयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- छाती के उपास्थि प्रदेश में भारीपन महसूस होता है और रोगी को ऐसा लगता है कि जैसे उसके छाती पर बोझ रखा है, घुटन महसूस होती है और छाती में उरोस्थि भाग में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए आरेगैल्लस लैम्बर्टाइ औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के कई अंगों में कमजोर हो गई हो, बाईं नितम्ब की नाड़ी में दर्द हो रहा हो और चलने पर टांगों की आगे वाली पेशियों में ऐंठन हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए आरेगैल्लस लैम्बर्टाइ औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- लोकोवीड के दो रूपों में ऐस्ट्रागैलस तथा आक्सीट्रासि औषधि की तुलना आरेगैल्लस लैम्बर्टाइ औषधि से कर सकते हैं। बैराइटा औषधि से भी इसकी तुलना कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :- आरेगैल्लस लैम्बर्टाइ औषधि की छठी से दोसवीं शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
आर्सेनिक आयोडाइड (ARSENIC IODIED)
गले के रोगों को ठीक करने के लिए आर्सेनिक आयोडाइड औषधि का उपयोग करना लाभदायक है। लसिका ग्रंथियों की बढ़ी हुई अवस्था तथा उसमें जलन को यह औषधि ठीक कर देता है।
सर्दी, हे-फीवर (दूषित ज्वर), आंख आना, नाक, गले और कानों में जलन होने पर इस औषधि का प्रयोग लाभदायक है। कान बन्द हो जाना, स्तन में फोड़ा होना, स्तन की घुण्डियों का फटना-पकना, उनमें मवाद पड़ना और स्तन को छूने से दर्द महसूस होना। आंतों में गांठे पड़ जाना और बच्चों को कालरा रोग होना तथा शरीर के अंगों में सुन्नपन महसूस होना, इन सभी रोगों को ठीक करने के लिए आर्सेनिक आयोडाइड औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आर्सेनिक आयोडाइड औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
फेफड़ों से सम्बन्धित लक्षण :- फेफड़ों का क्षय रोग (टी.बी.), फेफड़ों में कफ जम गया हो और दूषित ज्वर हो गया हो, रात के समय में पसीना अधिक निकल रहा हो, अधिक कमजोरी आ गई हो तो ऐसी अवस्था में रोगी का उपचार करने के लिए आर्सेनिक आयोडाइड औषधि का उपयोग करना चाहिए।
फेफड़ों के पुराना प्रदाह रोग (न्यूमोनिया) हो गया हो तथा इसके साथ-साथ खांसने पर मवाद जैसा कफ निकल रहा हो, सांस लेने में परेशानी हो रही हो, रात के समय में पसीना अधिक निकल रहा हो तो ऐसी अवस्था में रोगी का उपचार करने के लिए आर्सेनिक आयोडाइड औषधि का उपयोग करना चाहिए।
फेफड़ों में फोड़ा बन गया हो या कफ जमने के कारण गुलटियां बन गई हो और बुखार हो गया हो तथा रात के समय में शरीर से अधिक पसीना निकल रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों की चिकित्सा आर्सेनिक आयोडाइड औषधि से करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक से हरा या पीले रंग की पानी जैसा स्राव (हरा या पीला कफ की तरह पानी दूषित पानी निकलना) हो रहा हो आदि लक्षणों की चिकित्सा के करने के लिए आर्सेनिक आयोडाइड औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नाक की जड़ पर तेज दर्द तथा जलन होना और नाक से बादामी या शहद की तरह पीब निकलना तथा जिसके निकलने से नाक की जड़ पर छिलन हो जाता है इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्सेनिक आयोडाइड औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्तन (वक्ष) से सम्बन्धित लक्षण :- स्तन की बीमारियों तथा पुरानी बहुत जटिल बीमारियों को ठीक करने के लिए आर्सेनिक आयोडाइड औषधि का उपयोग अधिक लाभदायक होता है।
स्राव से सम्बन्धित लक्षण :- सभी प्रकार के मवाद (पीब) तथा दूषित खून का स्राव (दूषित द्रव का बहना) जो बहुत ज्यादा क्षारीय और खाल को उधेड़ देने वाला होता है जैसे-कान से निकलने वाले मवाद, प्रदर रोग में होने वाले स्राव, नाक से निकलने वाले स्राव, ये सभी प्रकार के स्राव बहुत तरल होते हैं जो त्वचा पर जम जाती है। दस्त के समय में मल के साथ ऐसा स्राव निकलता है जिससे गुदाद्वार झुलस जाती है। ऐसे लक्षणों के रोगों को ठीक करने के लिए आर्सेनिक आयोडाइड औषधि का उपयोग लाभकारी है।
फोड़े से सम्बन्धित लक्षण :-
शरीर के किसी भाग में बड़ा फोड़ा जिसमें से पीब निकल रहा हो तथा बहुत अधिक दर्द हो रहा हो, फोडे़ से निकलने वाला पीब तरल तथा बादामी रंग का होता है और बाहर आकर आस-पास की त्वचा पर पपड़ी की तरह जम जाती है। इस फोड़े को ठीक करने के लिए आर्सेनिक आयोडाइड औषधि का उपयोग करना चाहिए।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
त्वचा पर जलन तथा इसके साथ खुजली होती है या खोपड़ी पर अकौता रोग हो जाता है तो इसको ठीक करने के लिए आर्सेनिक आयोडाइड औषधि का उपयोग लाभदायक है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
रोगी जब इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित होता है, उस समय जब वह अधिक श्रम (परिश्रम का कार्य करना) करता है या ठण्डी सर्दी युक्त हवाओं में रहता है तो उसके रोग के लक्षणों में वृद्धि हो जाती है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कुछ रोगों के लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्सेनिक आयोडाइड औषधि की तुलना आयोडम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
आर्सेनिक आयोडाइड औषधि की 30वीं और 200वीं शक्तिक्रम का प्रयोग करना चाहिए।
एथूजा सिनापियाम (AETHUSA CYNAPIUM)
एथूजा सिनापियाम औषधि कई प्रकार के रोगों जो बच्चे के दांत निकल रहे हों, उस समय यदि बच्चा अधिक रो रहा हो या चिल्ला रहा हो, निराशा तथा असंतोष हो तो बच्चे के इस रोग को ठीक करने के लिए एथूजा सिनापियाम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गर्मी के समय में बच्चों के रोग जिसमें प्रकाश सहन नहीं हो रही हो, मीबोमी ग्रंथियों में सूजन आ गई हो, नींद आने पर आंखों में कुछ चलता हुआ महसूस हो रहा हो, आंखे नीचे की ओर घूम जाती हो तथा पुतलियां फैल गई हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसका उपचार एथूजा सिनापियाम औषधि से करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- व्यक्ति को ऐसा महसूस हो रहा हो कि उसका कान बंद हो गया है, कान से कुछ गर्म पदार्थ निकल रहा है। कानों के अन्दर फुस्फसाहट सी महसूस हो रही हो तो ऐसे रोगी का उपचार एथूजा सिनापियाम औषधि से हो सकता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक के अन्दर श्लैष्मा जमने के कारण छाला पड़ गया हो, रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि जीभ बहुत लम्बी हो गई है, कण्ठ के अन्दर जलन हो तथा उसमें फोड़े होने के कारण कुछ निगलने में परेशानी हो रही हो, इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसका उपचार करने के लिए एथूजा सिनापियाम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक बेहोशी की समस्या बार-बार हो जाती हो, अधिक बड़बड़ाने की स्थिति हो गई हो, सोचने की शक्ति कम हो गई हो, मन को किसी एक चीज पर एकाग्र (मन को एक जगह न रख पाना) करने मे असमर्थता अधिक हो, क्रोध तथा चिड़चिड़ापन का स्वभाव हो गया हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसका उपचार करने के लिए एथूजा सिनापियाम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अपना सिर ऐसा महसूस हो रहा हो कि किसी ने सिर को किसी चीज से बांध रखा है या किसी शिकंजे में कसा हुआ लग रहा है। सिर के पीछे के भाग में दर्द होना तथा दर्द का असर मेरूदण्ड भाग तक फैला हुआ हो, लेटने तथा दबाव देने से कुछ आराम मिल रहा हो। सिर में ऐसे लक्षणों के साथ रोगी के चक्कर आने के साथ दूध पीते ही उल्टी कर देना या जी मिचलाने लगना। आमाशय में तेज दर्द तथा सिकुड़न होना। उल्टी करने के साथ पसीना अधिक निकलना तथा शरीर में कमजोरी अधिक महसूस होना तथा इसके साथ-साथ बेचैनी तथा आमाशय में दर्द होना, नींद न आना। कभी-कभी रोगी को ऐसा महसूस होता है कि आमाशय के अन्दर चीरने-फाड़ने के जैसा दर्द हो रहा है तथा दर्द का प्रभाव चक्कर आना और इसके साथ-साथ शरीर में कमजोरी अधिक महसूस होना। पेट के ऊपर का भाग तना, फूला हुआ महसूस होना। नाभि के आस-पास दर्द होना तथा पेट के अन्दर की बुलबुलाहट महसूस होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एथूजा सिनापियाम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब मलत्याग करता है (शौच क्रिया करता है।) तो मल अनपचा, पतला, हरा रंग का होता हैं तथा मलत्याग करने से पहले हैजा, बच्चे की त्वचा ठण्डी हो जाती है ओर चिपचिपी हो जाती है तथा इसके साथ ही कब्ज की समस्या होने के साथ ही ऐसा महसूस हो रहा हो कि आंतों की शक्ति कम हो गई है। स्त्री जननेन्द्रियों में लकड़ी की नुकीली चीजें घुसेड़ देने जैसा दर्द महसूस होता है तथा जननेन्द्रियों में फुंसियां हो गई हो। अधिक गर्म मौसम होने पर जननेन्द्रियों में खुजली मचना। कमजोरी महसूस होना, उंगलियां और अंगूठे के आस-पास के भागों में दबाव महसूस होना। हाथों व पैरों में बेहोशी की समस्या उत्पन्न होना। आंखों की नज़र तिरछी होना तथा आंखें बार-बार छपकना (स्प्युइंटिंग)। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में हो तो उसका उपचार करने के लिए एथूजा सिनापियाम औषधि बहुत उपयोगी है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- चक्कर आना तथा दर्द होना और बेचैनी जैसी समस्या उत्पन्न होना। नाड़ी की चलने की गति तेज तथा कठोर होना और कभी-कभी एक दम कम गति से धड़कना, इस प्रकार के लक्षण यदि किसी रोगी में है तो उसका उपचार एथूजा सिनापियाम औषधि से हो सकता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- चलते समय जांघों की चमड़ी छिल गई हो। शरीर से जोड़ों में दर्द और उसके चारों ओर त्वचा पर नीले रंग के दाग हो गए हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एथूजा सिनापियाम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- थोड़ी बहुत नींद आने पर उल्टी आना तथा मलत्याग करने के बाद उंघाई आना। अधिक गर्मी महसूस होना तथा बच्चे को दस्त भी होने लगता है तथा उसका मल हरे तथा पीले रंग का होता है। बच्चे के शरीर से पसीना निकलने लगता है, सारा शरीर ठण्डा हो जाता है। चेहरा फूल जाता है या फीका पड़ जाता है, आंखें बैठ जाती हैं, आंख की पुतलियां बड़ी मालूम होती है, नाक नुकीली हो जाती है, होंठ का रंग नीला पड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर कभी-कभी तो बच्चे की मृत्यु भी हो जाती है। इस प्रकार के लक्षण यदि बच्चे में हो तो उसका उपचार करने के लिए एथूजा सिनापियाम औषधि बहुत ही उपयोगी है।
अपचन से सम्बन्धित लक्षण :- अधिक हैजा जैसी अवस्था उत्पन्न होना। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी बच्चे में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एथूजा सिनापियाम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शारीरिक तथा मानसिक अवस्था से सम्बन्धित लक्षण :- जिन व्यक्तियों को बहुत अधिक शारीरिक तथा मानसिक कमजोरी अधिक हो तथा उसको कोई भी काम करने मे मन नहीं लग रहा हो, खाना खाने पर भोजन न पच रहा हो, इस प्रकार के लक्षण होने पर तथा जलन तथा मिर्गी के दौरे पड़ रहे हो तथा उस समय में अंगूठा मुट्ठी के अन्दर तथा हथेली में जाकर चिपक जाता हो, चेहरा लाल पड़ गया हो, आंखें उतर गई हो, पुतलियां फैल कर स्थिर हो गई हो, मुंह से झाग आ रहा हो, जबड़े आपस में चिपक गये हो और नाड़ी की गति कम या भारी हो गई हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसके रोगी को ठीक करने के लिए एथूजा सिनापियाम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
रोगी के रोग में सुबह के समय में तीन बजे से 4 बजे तक और शाम के समय में तथा गर्मी मौसम में रोग की वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन-ह्रास) :-
खुली हवा में रहने तथा लोगों के साथ रहने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
भ्रम पैदा करने वाले विचार उत्पन्न होने, लेटने से आराम मिलना, जीभ का स्वाद कड़वा होना व लार निकलना। हाथ तथा पैर बर्फ के तरह ठण्डा हो जाना, इस प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए ऐथामन्था औषधि उपयोगी है, लेकिन ऐसे ही लक्षणों में एथूजा सिनापियाम औषधि भी उपयोगी है। इसलिए एथूजा सिनापियाम औषधि की तुलना ऐथामन्था से करना चाहिए।
मात्रा :-
एथूजा सिनापियाम औषधि की तीसरी से तीसवी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अरेका (Areca)
अरेका औषधि पेट के कीड़ें तथा अन्य कीड़ों को नष्ट करने के लिए प्रयोग की जाती है। अरेका औषधि का क्षार एरियोलिन हाइड्रोब्रोम औषधि की तरह ही नेत्र पटलों पर क्रिया करती है। इसकी क्रिया इसेरिना औषधि से कुछ कम होती है।
पेट का फूलना पर इस औषधि का प्रयोग बहुत अधिक लाभकारी होता है। पिलोकार्पिन औषधि के समान एक लारनिस्सारक औषधि का कार्य भी करती है। आंतों की संकोचक शक्ति को यह औषधि बढ़ा देता है और हृदय की कार्य करने की गति भी बढ़ जाती है।
अरेनिया डायडेमा (Arania diadema)
मकड़ी के जहर को खत्म करने के लिए अरेनिया डायडेमा औषधि का उपयोग लाभदायक है और यह स्नायु-प्रणाली को प्रभावित करती है।
मलेरिया रोग को ठीक करने के लिए अरेनिया डायडेमा औषधि का प्रयोग करना चाहिए। रोगी भीगा हो या नम स्थान पर रहता हो और बीमार हो गया हो तो ऐसे रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए अरेनिया डायडेमा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में अरेनिया डायडेमा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के त्रिआनन-तंत्रिका में दर्द होता है, जब रोगी खुली हवा में धूम्रपान करता है तो उसे कुछ राहत मिलती है, आंखों में गर्मी और चिनगारियां तैरती दिखाई देती हैं, नम मौसम में अधिक कष्ट होती है, रात के समय में लेटते ही दांतों में अचानक दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अरेनिया डायडेमा औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री का मासिकधर्म नियमित समय से पहले ही आ जाता है और बहुत कम मात्रा में स्राव होता है, पेट फूलने लगता है, कमर और पेट में दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अरेनिया डायडेमा औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप कुछ ही दिनों में रोग ठीक हो जाता है।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के छाती में दर्द होता है तथा दर्द का असर रीढ़ की हड्डी तक होता है। फेफड़ों से लाल चमकता हुआ खून बहने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए अरेनिया डायडेमा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को हल्का सा भोजन करने के बाद आमाशय के क्षेत्र में दर्द होने लगता है तथा ऐंठन होने लगती है, अधिकतर पाचनतंत्र के भाग में दबाव के साथ दर्द होता है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अरेनिया डायडेमा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की तिल्ली बढ़ जाती है, पेट में दर्द होने लगता है, पेट के निचले भाग में भारीपन महसूस होता है, अतिसार (दस्त) हो जाता है और हाथ-पैरों में ऐसा दर्द होता है जैसे कि वे सो गए हों। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अरेनिया डायडेमा औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के हाथ-पैरों की हडि्डयों में दर्द होने लगता है तथा हाथ-पैरों में सूजन होने की अनुभूति होती है और ऐसा महसूस होता है कि जैसे शरीर के सारे अंग सुन्न हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अरेनिया डायडेमा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को नींद नहीं आती है और बेचैनी होती है तथा इसके साथ-साथ ही हाथ-पैरों में सूजन आ जाती है, भारीपन महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अरेनिया डायडेमा औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार हो जाता है तथा इसके साथ ठण्ड महसूस होती है और शरीर की लम्बी हडि्डयों में दर्द होता है, रोगी को प्रतिदिन एक निश्चित समय में पेट पर पत्थर रखने जैसा दर्द महसूस होता है, वर्षा होने पर रोगी का कष्ट और भी बढ़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अरेनिया डायडेमा औषधि का उपयोग लाभकारी है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
नमीदार मौसम में, दोपहर के बाद तथा आधी रात को रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन. ह्रास) :-
धूम्रपान करने से रोग के लक्षणों में कमी आ जाती है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
आर्स, आर्ज-मेन्ट, सिडून, यूकैल, यूपेटो, सिकेल-कार, टैरेन्टयू तथा आर्निका औषधि की तुलना अरेनिया डायडेमा औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
अरेनिया डायडेमा औषधि की मूलार्क से तीसवीं शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
आर्जेमोन मैक्सिकाना (Argemone mexicana)
तंत्रिकाओं तथा पेशियों की दर्दनाक अवस्थायें जिनके कारण से नीन्द नहीं आती है, आंतों में दर्द तथा ऐंठन और बेहोशी की अवस्था उत्पन्न हो जाती है, आमवाती रोग (जोड़ों का दर्द) जिनका सम्बन्ध गुर्दे की सूजन से जुड़ा रहता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्जेमोन मैक्सिकाना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में आर्जेमोन मैक्सिकाना औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के आंखों और कनपटियों में जलन के साथ दर्द होता है और जिसके कारण सिर में दर्द होता है, सिर गर्म, कण्ठ (गला) अत्यधिक खुश्क, खाना को निगलते समय अधिक दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेमोन मैक्सिकाना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को उल्टी होने लगती है तथा इसके साथ ही पेट के अन्दरूनी भाग में ऐंठनदार दर्द होता है, भूख कम लगती है, उबकाई हो जाती है और पेट में वायु बनने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्जेमोन मैक्सिकाना औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पेशाब बहुत कम होता है और पेशाब का रंग बदलता रहता है तथा इसके साथ ही रोगी को पेट में दर्द तथा आंतों में भी दर्द हो रहता है और नीन्द भी अच्छी नहीं आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आर्जेमोन मैक्सिकाना औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म बंद हो जाने तथा संभोग की इच्छा कम होने के साथ अधिक कमजोरी हो जाने पर आर्जेमोन मैक्सिकाना औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के स्त्री रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के घुटने में दर्द तथा अकड़न हो जाती है और पैरों में सूजन आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्जेमोन मैक्सिकाना औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
दोपहर के समय में रोगी के रोग लक्षणों में वृद्धि होती है।
मात्रा (डोज) :-
आर्जेमोन मैक्सिकाना औषधि की छठी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। घावों तथा मस्सों पर ताजा रस लगाया जाता है।
आर्निका मांटेना
अर्निका एक पौधे का नाम है। जो लगभग 1 से 2 फीट के होते हैं। उस पौधे में पीले रंग के फूल लगे होते हैं मुख्यत उसी फूल का इस्तेमाल दवा के रूप में किया जाता है। यह पौधा मुख्यतः साइबेरिया, यूरोप नॉर्थ, अमेरिका जैसे इलाकों में ज्यादा पाए जाते हैं।
आज अर्निका ‘होम्योपैथिक’ पद्धति में एक प्रमुख दवा माना जाता है। जिसका उपयोग एक से अधिक बीमारियों को खत्म करने में किया जाता है। यह दवा तरल के रूप में होम्योपैथिक पद्धति में उपलब्ध है।
यह मध्य स्तर के सभी तरह के दर्दों को खत्म करने में होमियोपैथिक पद्धति में प्रमुख दवा माना जाता है। अर्निका मोंटाना का इस्तेमाल सभी उम्र के व्यक्तियों पर डॉक्टर के द्वारा किया जाता है। इसका इस्तेमाल चोट का दर्द, दांतों का दर्द, मांसपेशियों में दर्द, अर्थराइटिस का दर्द इत्यादि मैं डॉक्टर के द्वारा किया जाता है।
अरनिका हेयर ऑयल के रूप में भी उपलब्ध है जो आप अपने बालों में इस्तेमाल कर सकते हैं। अगर आपके बालों में रूसी की समस्या है, आपके बाल निरंतर रूप से गिर रहे हैं, बालों के सभी तरह के समस्या में अरनिका मोंट तेल लाभदायक साबित होता है।
यह एक Hemopathic medicine है इसलिए यह अलग-अलग Power और mother tincher के रूप में मार्केट में उपलब्ध है, Arnica Mont बहुत सारे पावर के रूप में मार्केट में उपलब्ध है लेकिन इसमें से जो मुख्य हैं वह Arnica Mont – 30c और अर्निका मोंट- 200c है। Arnica Mont इतने Power में आते हैं।
अर्निका मोंट – 30c
अर्निका मोंट – 200c
Arnica Mont – 1M
अर्निका मोंट – 10M
अर्निका मोंट – CM
Arnica Mont – Q
सभी रोग के अलग-अलग लक्षण होते हैं उन्ही लक्षणों को मिलाकर सभी Homeopathic दवाइयां चलाई जाती है। Arnica Mont बहुत सारी बीमारियों में उनके लक्षण को पहचान कर चलाई जाती है।
लेकिन इन में से जो मुख्य है वह….
चोट के कारण उत्पन्न दर्द ।
चोट के कारण जो दर्द उत्पन्न होते हैं उन दर्दो में Arnica Mont का इस्तमाल बहुत ही बेहतर देखा गया है। बच्चे अक्सर खेलते हुए गिरते हैं और उन्हें चोट भी आती हैं कभी-कभी वह चोट ज्यादा गंभीर हो जाते हैं। वहां पर भी Arnica Mont का इस्तेमाल किया जा सकता है।
Arnica Mont का इस्तेमाल सभी उम्र के लोगों पर किया जा सकता है लेकिन Arnica Mont का पावर बच्चों में अलग दिए जाते हैं और adult में अलग दिए जाते हैं।
चोट का दर्द
दांतों का दर्द,
मांसपेशियों में दर्द
अर्थराइटिस का दर्द
Arnica mont का इस्तेमाल सभी बीमारियों में अलग-अलग की जाती है । यह बीमारी के जटिलता पर भी निर्भर करता है कि मरीजों को Arnica Mont की खुराक कितनी पावर में और कितनी बार दी जाए। अगर आप की बीमारी की जटिलता उतनी ज्यादा नहीं है तो इसके पावर कम इस्तेमाल होंगे और खुराक भी अलग होगी
अगर आपको कम चोट लगा है और दर्द कम है तो Arnica Mont कम power का इस्तेमाल होगा और अगर आपकी जटिलता ज्यादा है तो Arnica Mont ज्यादा पावर का इस्तेमाल किया जाएगा। Arnica mont का इस्तेमाल बीमारी के लक्षणों पर निर्भर करता है Arnica mont के सभी पावर का इस्तेमाल अलग अलग बीमारियों में अलग अलग की जाती हैं।
अर्निका मोंट के खुराक में मुख्यता अर्निका मोंट – 30c और Arnica Mont – 200c का इस्तेमाल किया जाता है
अगर आपके घर में बच्चे खेलते हुए गिर जाते हैं और उन्हें चोट आती है तो आप Arnica Mont – 30 का इस्तेमाल करें और अगर कोई बड़े व्यक्ति को ज्यादा चोटें आई हैं तो उन्हें Arnica Mont – 30 का इस्तमाल करना चाहिए।
Arnica Mont – 30c का इस्तेमाल 2 बूंदें दिन में 3 बार करनी चाहिए।
अर्निका मोंट – 200c का इस्तेमाल 2 बूंदें दिन में दो बार अपने डॉक्टरों के सलाह से करनी चाहिए। जब आपकी दर्द या बीमारी जटिल हो।
Q – क्या Arnica Mont का इस्तेमाल छोटे बच्चों में भी किया जा सकता है ?
हां, अर्निका मोंट का इस्तेमाल छोटे बच्चों में भी किया जाता है, लेकिन इस्तेमाल करने से पहले आप अपने नजदीकी होम्योपैथिक डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
Q – क्या Arnica Mont की खुराक पुराने दर्द को भी खत्म कर देता है?
हां, Arnica Mont की खुराक पुराने से पुराने दर्द को भी खत्म कर देता है, और बो भी जड़ से।
Q – बच्चों में अर्निका मोंट का इस्तेमाल कितनी पावर का करना चाहिए?
सभी दवाओं का इस्तेमाल बीमारी की जटिलता और रोगी के बजन के अनुसार की जाती है। बच्चों को किसी भी तरह का दवा देने से पहले आप अपने नजदीकी डॉक्टर से सलाह जरूर लें।
Q – क्या होम्योपैथिक में अर्निका मोंट का इस्तेमाल केवल दर्द में ही की जाती है?
नहीं, होम्योपैथिक दवा में एक दवा का इस्तेमाल किसी भी एक बीमारी में नहीं की जाती है। होम्योपैथिक दवा का इस्तेमाल उसके लक्षण पर किए जाते हैं।
अमोनियम कार्बोनिकम (AMMONIUM CARBONCUM)
अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग ऐसी स्त्री रोग की अवस्था में किया जाता है, जिसमें स्त्रियां तो स्वस्थ्य जरूर रहती है, लेकिन वे हमेशा थकी हुई और ठण्ड महसूस करती रहती है तथा जो हैजा रोग से पीड़ित हो जाती है, शारीरिक परिश्रम नहीं करती है, कार्य करने के प्रति आलसी स्वभाव की हो जाती है।
अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने लिए उपयोगी है जो इस प्रकार हैं- जुकाम, नकसीर, मसूढे़ के रोग, मांसपेशियों में खिंचावट तथा तनाव, विसूचिका रोग, दस्त, शरीर में खून की कमी, मानसिक परेशानी आदि।
जो स्त्री पानी बोतल में रखकर लगातार सूंघती रहती हैं तथा जिन स्त्रियों को बार-बार हृदय कमजोर होता है, जब वे सांस लेते हैं तो सांय-सांय की आवाज सुनाई देती है, घुटन महसूस होती है। ठण्डी हवा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। रोगी को पानी से घृणा होती रहती है, पानी का स्पर्श भी सहन नहीं होता है, रोगी को सूजन आ जाती है, गले के अन्दर गहरी लाली के साथ बहरापन (हार्डेनेस ऑफ हेयरिंग), दांत पीसते समय कोनों तथा नाक के आर-पार झटके लगते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक में तेज नाक बंद हो जाना तथा इसके साथ नाक से खून निकलना, नाक से पानी जैसा पदार्थ निकलता रहता है तथा जब दाद हो जाता है। स्त्रियों के मासिकधर्म के समय में दांत में दर्द (Toothache) होता रहता है। दांतों को आपस में जोर से दबाने पर सिर, आंखों और कानों के आर-पार झटके लगते हैं, जीभ के ऊपर फफोलें हो जाते हैं। जीभ का स्वाद खट्टा हो जाता है, खाना को चबाते समय जबड़ों में कड़कड़ाहट होती है। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गलतुण्डिकायें (टॉंसिल) तथा ग्रीवा ग्रन्थियां (ग्लैंड ऑफ नेक) बढ़ी हुई हो, कण्ठ के अन्दर तथा नीचे जलन होने के साथ दर्द हो रहा हो, हृदय में जलन हो रही हो तथा बवासीर होने पर तथा मासिकधर्म के समय में इस प्रकार के लक्षण अधिक दिखाई दे रहे हो। खुजली हो रही हो, बवासीर के मस्से फैलने वाले हो, मलत्याग के बाद अधिक परेशानी हो रही हो, रोगी को लेटने से कुछ राहत मिलती हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पेशाब करने की बार-बार इच्छा होती है, रात के समय में बार-बार उठकर पेशाब करने पर वीर्य निकल जाता है अर्थात प्रदर रोग जिसमें अधिक जलन और चीस मच (जलन युक्त दर्द) रही हो तथा इसके साथ ही संभोग से घृणा हो रही हो। पेट में दर्द हो रहा हो तथा मल कठोर हो जिसके कारण वह मलद्वार से कठनाई के साथ निकलने वाला हो, अधिक थकावट महसूस हो रही हो और अधिक खांसी के साथ सांस लेने में अधिक परेशानी होना, सांस का रुकना तथा किसी काम को करने के बाद और गर्म कमरे में जाने पर, यहां तक कि कुछ कदम ऊपर की ओर चढ़ने पर भी कष्ट बढ़ जाता है। शरीर में अधिक निमोनिया रोग हो जाना, सांस लेने की गति धीमी होना, सांस कष्टदायक, धर्राटेदार और बुलबुले उठने जैसी हो जाना, ठण्डे मौसम में जुकाम हो जाना तथा नाक से फेफड़ों में पानी भर जाना, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की धड़कन सुनाई देती है तथा उसके साथ रोगी को डर भी लगता है, उसके शरीर से पसीना निकलता रहता है, जोड़ों में तेज दर्द होता है, जब रोगी बिस्तर के अन्दर होता है तो उसे कुछ आराम मिलता है, हाथ पैरों को फैलाने में दर्द होता है, हाथ की शिरायें नीली, फूली हुई हो जाती है, बाजू को नीचे की ओर लटकाने पर उंगलियों में सूजन आ जाती है, पिण्डलियों तथा तलुवों में दर्द होता है, पैर का अंगूठा दर्दनाक और सूजा हुआ हो जाता है, नाखूनों पर नींद नहीं आती है, रोगी सोते-सोते चौंक जाता है तथा उठ बैठता है उसे दम घुटने जैसा महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पूरे शरीर में त्वचा पर खुजली और जलन के साथ होने वाले छाले, रक्त भरे हुए दाने होना, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मासिकधर्म में स्राव से सम्बन्धित लक्षण :- स्राव होने के पहले रक्तस्राव होने पर आर्निका, नक्स-वोमिका औषधि से उपचार करने पर रोग ठीक हो जाता है, लेकिन रोगी को मुंह धोते समय खून नहीं निकलता है बल्कि अपने आप खून निकलता है। इसी तरह खाना खाने के बाद नाक से खून निकलने की अवस्था में ऐमोनकार्व औषधि का प्रयोग करा जा सकता है।
जुकाम से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बहुत दिनों तक जुकाम रहता है, ऐसे रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नकसीर फूटना से सम्बन्धित लक्षण :- जब रोगी सुबह के समय में अपना मुंह हाथ धोता है तो उसे उस समय नाक से खून निकलने लगता है। भोजन करने के बाद बायें नाक के नथुने से रक्तस्राव (खून निकलना) होने लगता हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पीनस रोग से सम्बन्धित लक्षण :- जब किसी व्यक्ति को पीनस रोग हो जाता है तो वह जब नाक छिड़कता है तो उस समय रक्त का आना बंद हो जाता है लेकिन जब वह झुकता है तो उसके नाक की नोक पर खून जमा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
रात के समय में अक्सर नाक बंद हो जाना :-
इस अवस्था में रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करा जा सकता है लेकिन ऐसे ही कुछ लक्षण होने पर रोग को ठीक करने के लिए स्टिक्टा और मासिकधर्म के शुरुआती अवस्था में दस्त होना। इस प्रकार की अवस्था में रोगी का उपचार करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए लेकिन ऐसे ही कुछ अवस्था में रोगी के रोग को ठीक करने के लिए वेरेट्रम-ऐल्बम तथा ऐमोन-म्यूर औषधि का प्रयोग किया जा सकता है, इसलिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि के कुछ गुणों की तुलना इन औषधियों से कर सकते हैं।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का नाक रात के समय में बंद हो जाता है तथा मुंह से सांस लेनी पड़ती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए। बच्चे को नाक में भारीपन महसूस होता है और नाक को वह सिकुड़ता रहता है और उसे जुकाम हो जाता है, उसके नाक से अधिक मात्रा में पानी बहता है। जब रोगी बिस्तर पर बैठता है तो उसे कुछ आराम मिलता है, और गर्म मौसम होने पर आराम मिलता है, अधिक कमजोरी होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
दांत से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के दांत ढीले पड़ जाते हैं, मसूढ़ों पर घाव हो जाते हैं, मिठाई खाने से दांत में तेज दर्द होने लगता है, जीभ दांत से टकराने पर दर्द होने लगता है, मसूढ़ों से खून निकलने लगता है तथा दर्द रोगी को इस प्रकार का महसूस होता है कि जैसे किसी मधुमक्खी का डंक लग गया हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
मांसपेशियों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर की मांसपेशियों में खिंचावट आने लगती है और ऐसा महसूस होता है कि वे छोटी होती जा रही है तथा सिकुड़ती जा रही हैं, ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
हडि्डयों के जोड़ों से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी व्यक्ति के शरीर के भी भाग की हडि्डयों के जोड़ उतर गये हों और उसमें दर्द हो रहा हो और रोगी को दर्द ऐसा महसूस होता है कि जैसे घाव के होने पर दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी व्यक्ति को संधातिक आरक्तज्वर हो गया हो और इसके साथ ही गले में लाली पड़कर दर्द हो रहा हो, कान के पीछे का भाग (कान की जड़) और गर्दन की ग्रन्थियां बहुत बड़ी-बड़ी हो गई हो, त्वचा पर लाल महीन दाने हो गऐ हों और ये उभरे हुए हों तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
यदि किसी स्त्री को मासिकधर्म शुरू होने के समय में विसूचिका रोग हो गया है तथा इसके साथ ही उसे उल्टियां तथा उबकाइयां हो रही हो और दस्त भी हो गया हो।
मासिकधर्म के समय में रोगी स्त्री के हाथ-पैर तन जाते हैं तथा रोगी को हाथ-पैर फैलाने की इच्छा होती है।
स्त्री रोग का समय से पहले ही मासिकधर्म शुरू हो जाता है तथा इसके साथ ही उसे बहुत अधिक थकावट भी होने लगती है तथा साथ में उसे उबकाइयां तथा उल्टियां और दस्त हो गया हो।
किसी-किसी स्त्री को मासिकधर्म के समय में दस्त होने के साथ ही खून भी आने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
खून की कमी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर में अधिक खून की कमी हो जाती है, शाम के समय में शरीर में बेचैनी हो जाती है, अधिकतर शरीर का दायां भाग रोगग्रस्त हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले में सुरसुरी महसूस होती है तथा इसके साथ ही लगातर सूखी खांसी भी होती रहती है, सुबह तीन से चार बजे के बीच में अधिक खांसी होने लगती है, खांसी रात भर या दिन भर आती रहती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
खुजली से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को खुजली हो जाती है तथा इसके साथ ही त्वचा फटने लगती है, त्वचा के निचले भाग की श्लैष्मिक परत पर सूजन आ जाती है, उंगलियों के जोड़ों पर सूजन आ जाती है और दर्द होने लगता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
श्वास रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सांस लेने में परेशानी होने लगती है, किसी प्रकार की चढ़ाई चढ़ने पर श्वास में रुकावट होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
बवासीर से सम्बन्धित लक्षण :- बवासीर रोग से पीड़ित रोगी जब मलत्याग करता है तो मस्सें बाहर आ जाते हैं तथा खून भी बहने लगता है, मलत्याग करने के बाद बहुत तेज दर्द होता है, रोगी को चलने में परेशानी होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के हृदय का आकार बड़ा हो जाता है, श्वास नलिकाओं का कठोर होना तथा उसमें जलन होना। रोगी को रात के समय में डर लगता है तथा डरावने सपने भी आते हैं, सांस फूलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
न्यूमोनिया से सम्बन्धित लक्षण :- न्यूमोनिया रोग से पीड़ित रोगी की यदि नाड़ी की गति कम हो जाए तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
शाम के समय में, ठण्ड लगने से, नमीदार मौसम में, गीली पटि्टयां लगाने से, हाथ-मुंह धोने से, सुबह के समय में तीन से चार बजे तथा मासिकधर्म की शुरुआती अवस्था में लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
पेट को सहलाने से, लेटने से तथा सूखे मौसम में रहने से रोग के लक्षण नष्ट होते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कैम्फर औषधियां अमोनियम कार्बोनिकम औषधि के दुष्प्रभाव को नष्ट करती है।
मात्रा (डोज) :-
अमोनियम कार्बोनिकम औषधि की निम्न शक्तियां अधिक पुरानी होने पर खराब हो जाती हैं। सामान्य उपयोग के लिये छठी शक्ति सर्वोत्तम होती है।
Arsenicum Album
(1) बेचैनी, घबराहट, मृत्यु-भय और बेहद कमजोरी
(2) मृत्यु के समय की बेचैनी में आर्सेनिक तथा कार्बोवेज शान्त मृत्यु लाते हैं या मृत्यु से बचा लेते हैं।
(3) जलन परन्तु गर्मी से आराम मिलना
(4) बार-बार, थोड़ी-थोडी प्यास लगना
(5) वाह्य-त्वचा, अल्सर तथा गैंग्रीन पर आर्सेनिक का प्रभाव
(6) श्लैष्मिक झिल्ली पर आर्सेनिक का प्रभाव (आंख, नाक, मुख, गला, पेट, मूत्राशय से जलने वाला स्राव)
(7) ‘समयानन्तर’ (Periodical) तथा पर्याय-क्रम (Alternate state) के रोग
(8) रात्रिकालीन या दोपहर के बाद रोग का बढ़ना (जैसे, दमा)
(9) सफाई-पसन्द-स्वभाव
(i) गर्मी से रोग घटना
(ii) गर्म पेय, गर्म भोजन चाहना
(iii) दमे में सीधा बैठने से कमी
(i) ठंड, बर्फ, ठंडा पेय, ठंडा भोजन नापसन्द होना
(ii) मध्य रात्रि 1-2 बजे के बाद रोग का बढ़ना
(iii) 14 दिन बाद, साल भर बाद रोग का आक्रमण
(iv) बरसात का मौसम
(1) बेचैनी, घबराहट, मृत्यु-भय और बेहद कमजोरी – बेचैनी इसका प्रधान लक्षण हैं। किसी स्थान पर भी उसे चैन नहीं मिलता, आराम नहीं मिलता। रोगी कभी यहां बैठता है, कभी वहां, कभी एक बिछौने पर लेटता है, कभी दूसरे बिछौने पर, कभी एक कुर्सी पर बैठता है, कभी दूसरी कुर्सी पर। एक जगह टिक कर बैठना, लेटना, रहना तक उसके लिये दुर्भर हो जाता है। इस प्रकार की बेचैनी किसी दूसरी दवा में नहीं पायी जाती है। रोग की शुरूआत में जो बेचैनी होती है, उसमें तो एकोनाइट काम कर जाता है, परन्तु रोग जब बढ़ जाता है, तब की बेचैनी के लिये आर्सेनिक औषधि अधिक उपयुक्त हैं। उस बेचैनी में रोगी घबरा जाता हैं, जीवनी-शक्ति में दिनोंदिन बढ़ता ह्रास देख कर उसे मृत्यु का भय सताने लगता है। उसे समझ नहीं आता कि क्या करे क्या न करे, दिनोंदिन निर्बलता बढ़ती जाती है, और रोगी इतना कमजोर हो जाता है कि पहले तो कभी उठ बैठता था, कभी लेट जाता था, कभी टहलकर शान्ति पाने का प्रयत्न करता था, परन्तु अब कमजोरी के कारण चल-फिर भी नहीं सकता। यह बेचैनी और घबराहट दूर हो जाने के कारण नहीं होती, कमजोर हो जाने के कारण होती है। चिकित्सक को रोगी के विषय में पूछना चाहिये कि उसकी इस अवस्था से पूर्व क्या उसकी बेचैनी की हालत थी? जब कमजोरी बेचैनी का परिणाम हो तब पूर्व-बेचैनी और वर्तमान कमजोरी-इन लक्षणों के आधार पर आर्सेनिक ही देना होगा। बच्चों की बेचैनी समझने के लिये देखना होगा कि वह कैसा व्यवहार करता है। अगर कभी वह मां की गोद में जाता है. कभी नर्स की गोद में, कभी बिस्तर पर जाने का इशारा करता है, किसी हालत में उसे चैन नहीं पड़ता, तो आर्सेनिक ही उसे ठीक करेगा।
बेचैनी में एकोनाइट और आर्सेनिक की तुलना – एकोनाइट का रोगी बलिष्ठ होता है, तन्दरुस्त होता है। उस पर एकाएक ही रोग का आक्रमण होता है, लगता है कि मृत्यु के मुख में जा पड़ा, उसे भी मौत सामने नाचती दीखती है, परन्तु उसकी जीवनी-शक्ति प्रबल होती है, वह शीघ्र ही दवा के प्रयोग से रोग से छूट जाता है, और पहले जैसा हो जाता है। आर्सेनिक का रोगी मौत के मुख से छूट भी गया तो भी स्वास्थ्य लाभ पाने में उसे देर लगती है। रोग की प्रथमावस्था में एकोनाइट के लक्षण पाये जाते हैं, रोग की भयंकर अवस्था में आर्सेनिक के लक्षण पाये जाते हैं. जब रोग खतरनाक नहीं होता तब एकोनाइट, जब खतरनाक हो जाता है तब आर्सेनिक की तरफ ध्यान देना चाहिये, शर्त यह है कि बेचैनी, घबराहट, मृत्यु-भय आदि लक्षण जो दोनों के समान हैं, मौजूद हों। एकोनाइट रोगी में इतना बल रहता है कि बेचैनी में, घबराहट और भय से, इधर उठता, उधर बैठता, बिस्तर में पलटता है, परन्तु आर्सेनिक का रोगी शुरू में तो बची-खुची ताकत से इधर-उधर उठता-बैठता है, परन्तु अन्त में इतना शक्तिहीन हो जाता है कि निश्चेष्ट ही पड़ जाता है। सत्वहीनता (Prostration) इसका मुख्य लक्षण है। इन दोनों में भय भी हैं, और जलन भी, परन्तु एकोनाइट का भय सिर्फ नर्वस-टाइप का होता है, जलन भी नर्वस-टाइप की होती हैं, आर्सेनिक का भय तथा उसकी जलन वास्तविक होती हैं, बीमारी का परिणाम होती है, इसलिये नर्वस-भय और जलन के लिये एकोनाइट देना चाहिये, उसमें आर्सेनिक देना गलत है।
(2) मृत्यु-समय की बेचैनी में आर्सेनिक तथा कार्बोवेज शांत-मृत्यु लाते हैं या मृत्यु से बचा लेते हैं – मृत्यु सिर पर आ खड़ी होने पर सारा शरीर निश्चल हो जाता है, देखते-देखते शरीर पर ठंडा, चिपचिपाता पसीना आ जाता है। ऐसा समय हैजे या किसी भी अन्य रोग में आ सकता है। उस समय दो ही रास्ते रह जाते हैं-या तो रोगी की शान्ति से मृत्यु हो जाय, उसे तड़पना न पड़े, या वह मृत्यु के मुख से खींच लिया जाय। यह काम होम्योपैथी में दो ही दवाएं कर सकती हैं। एक है आर्सेनिक, दूसरी है कार्बोवेज। ऐसे समय दोनों में से उपयुक्त दवा की उच्च-शक्ति की एक मात्रा या तो रोगी को मृत्यु के मुख से खींच लेगी, या उसे शान्तिपूर्वक मरने देगी।
(3) जलन परन्तु गर्मी से आराम मिलना – आर्सेनिक, फॉसफोरस, सल्फर और सिकेल कौर की तुलना – ये चार औषधियां जलन के लिये प्रधान औषधियां हैं। नवीन-रोग की जलन में आर्सेनिक और पुराने रोग की जलन में सल्फर लाभप्रद है। नये तथा पुराने सभी रोगों में जलन के लक्षण पर फॉसफोरस की तरफ भी ध्यान जाना चाहिये। सिकेल कौर और आर्सेनिक दोनों में जलन और कमजोरी पाये जाते हैं परन्तु इनमें अन्तर यह है कि सिकेल अन्दर जलन किन्तु बाहर बर्फ की तरह ठंडा होने पर भी अंग पर कपड़ा नहीं रख सकता और आर्सेनिक का रोगी अन्दर की जलन होने पर भी गर्म कपड़ा ही ओढ़ना चाहता हैं। आर्सेनिक का यह ‘विलक्षण-लक्षण’ है कि जलन होने पर भी गर्मी से उसे आराम मिलता है। फेफड़े में जलन हों तो रोगी सेक चाहेगा, पेट में जलन हो तो वह गर्म चाय, गर्म दूध पसन्द करेगा, जख्म से जलन हो तो गर्म पुलटिस लगवायेगा, बवासीर की जलन हो तो गर्म पानी में धोना चाहेगा। इसमें अपवाद मस्तिष्क की जलन हैं, उसमें वह ठंड़े पानी से सिर धोना चाहता है। आर्सेनिक का रोगी सारा शरीर कम्बल से लपेटे पड़ा होगा परन्तु सिर उसका खुला होगा ताकि ठंडी हवा उस पर लगती रहे।
(4) बार-बार, थोड़ी-थोड़ी प्यास लगना – आर्सेनिक औषधि में प्यास इसका एक खास लक्षण है, परन्तु इस प्यास की एक विशेषता है। रोगी बार-बार पानी पीता है, परन्तु हर बार बहुत थोड़ा पानी पीता है। प्राय: देखा जाता है कि रोग में एक अवस्था आगे चलकर दूसरी विरोधी अवस्था में परिणत हो जाती है। उदाहरणार्थ, हमने देखा कि आर्सेनिक में शुरू-शुरू में बेचैनी होती है, परन्तु आगे चलकर कमजोरी के कारण रोगी शिथिल पड़ जाता है, एक स्थान को छोड़ दूसरे स्थान में जाने की भी ताकत उसमें नहीं रहती। इसी प्रकार शुरू में आर्स में प्यास पायी जाती है, थोड़ा-थोड़ा पानी पीना, कई बार पीना-परन्तु आगे चल कर इस औषधि का रोगी प्यासहीन हो जाता है। प्रारंभ में प्यास, और रोग के बढ़ जाने पर प्यासहीनता-यह आर्सेनिक का लक्षण है। रोग की जांच करते हुए पूछना चाहिये कि क्या शुरू में रोगी को बार-बार, थोड़े-थोड़े पानी की प्यास लगती थी। चिकित्सक को रोग की शुरूआत से अब तक की हालत जानने का प्रयत्न करना चाहिये। अगर रोगी को अब प्यास नहीं है, अब वह कमजोरी के कारण बेचैन भी नहीं है, तो भी देखना यह है कि क्या शुरूआत में उसे प्यास लगती थी, शुरू में वह बेचैन था? ऐसी हालत में आर्सेनिक उसकी दवा होगी। ब्रायोनिया में रोगी देर-देर बाद बहुत-सा पानी पीता है, एकोनाइट में बार-बार बहुत-सा पानी पीता है, आर्स में बार-बार, थोड़ा-थोड़ा पानी पीता है।
(5) वाह्य त्वचा, अल्सर तथा गैंग्रीन पर आर्सेनिक का प्रभाव – आर्सेनिक की त्वचा सूखी, मछली के छिलके के समान होती है, उसमें जलन होती है। फोड़े-फुंसियां आग की तरह जलती हैं। सिफिलिस के अल्सर होते हैं जो बढ़ते चले जाते हैं, फैलते जाते हैं, ठीक नहीं होते, उनमें से सड़ी, बदबूदार शोथ होने के बाद फोड़ा बन जाय और वह सड़ने लगे-गैंग्रीन बनने लगे-फिर आर्सेनिक दवा सही है।
(6) श्लेष्मिक झिल्ली पर आर्सेनिक का प्रभाव (आंख, नाक, मुख, पेट, मूत्राशय से जलने वाला स्राव) – आर्सेनिक के रोगी का स्राव जहां-जहां लगता हैं, वहां-वहां जलन पैदा कर देता है। उदाहरणार्थ:
जुकाम में जलन – जिसे जुकाम से पानी बहता हो, जहां-जहां होठों पर लगे वहां जलन पैदा कर दे, नाक में भी जलन करे, नाक छिल जाय, गरम पानी से आराम मिले, वहां इसे ही दी।
मुख के छालों में जलन – जब मुख में छाले पड़ जायें, जले, गरम पानी से लाभ हो, तब वहां आर्सेनिक दो।
गले के टांसिल में शोथ तथा जलन – गले में जलन और शोथ के साथ गर्म पानी के सेक से आराम मिलने पर अन्य लक्षणों को ध्यान में रखते हुए यह दवा दी जाये।
पेट में शोथ तथा जलन – पेट का अत्यन्त नाजुक होना, एक चम्मच ठंडा पानी पीने से भी उल्टी हो जाना, गर्म पानी से थोड़ी देर के लिये आराम, भोजन-प्रणालिका की ऐसी सूजन कि जो कुछ खाया जाय उसकी उल्टी हो जाय, सब में जलन होना, बाहर से गर्म सेक से आराम मिलना। रोगी इतना बेचैन होता है कि टहलता फिरता है, चैन से बैठ नहीं सकता और अन्त में इतना शिथिल और कमजोर हो जाता है कि पट पड़ जाता है।
(7) समयानन्तर तथा पर्याय-क्रम के रोग – रोग का समयानन्तर से प्रकट होना इस औषधि का विशिष्ट-लक्षण है। इसी कारण मलेरिया-ज्वर में आर्सेनिक विशेष उपयोगी है। हर दूसरे दिन, चौथे दिन, सातवें या पन्द्रहवें दिन ज्वर आता है। सिर-दर्द भी हर दूसरे दिन, हर तीसरे, चौथे, सातवें या चौदहवें दिन आता है। रोग जितना पुराना (Chronic) होता है उतना ही उसके आने का व्यवधान लम्बा हो जाता है। अगर रोग नवीन (Acute) है तो रोग का आक्रमण हर तीसरे या चौथे दिन होता है। इस दृष्टि से मलेरिया में चायना की अपेक्षा आर्सेनिक अधिक उपयुक्त है।
‘समयानन्तर’ का सिर-दर्द – मलेरिया की तरह आर्सेनिक में ऐसा सिर-दर्द होता है जो हर दो सप्ताह के बाद आता है। रोगी बेचैन रहता है, घबराता है, नवीन रोग में पानी बार-बार पीता है, रोग के पुराना हो जाने पर प्यास नहीं रहती, सिर पर ठंडा पानी डालने से आराम आता है, खुली हवा में घूमना चाहता है, मध्य-रात्रि में 1 या 2 बजे यह पीड़ा शुरू होती है, कभी-कभी दोपहर को 1 से 3 बजे से सिर-दर्द शुरू होकर सारी रात रहता है। समायानन्तर आने वाले इस सिर-दर्द में अन्य लक्षणों को देख कर आर्सेनिक देना लाभकारी है।
आर्सेनिक में रोग का ‘पर्याय-क्रम’ – अनेक रोगों में प्राय: देखा जाता है कि अगर मस्तिष्क के लक्षण प्रकट होते हैं, तो शारीरिक-लक्षण चले जाते हैं, और जब शारीरिक-लक्षण प्रकट होते हैं, तब मानसिक-लक्षण चले जाते हैं। यह बात शरीर तथा मन तक ही सीमित नहीं हैं, इस प्रकार के शारीरिक-लक्षण प्रकट होते हैं, दूसरे प्रकार के शारीरिक-लक्षण लुप्त हो जाते हैं। उदाहरणार्थ, एक स्त्री को सिर पर भारी दबाव प्रतीत होता था, वह इस दवाब को दूर करने के लिये सिर पर कुछ बोझ रख लेती थी। जब सिर का दवाब दूर हो जाता था, तब उसे बार-बार पेशाब जाने की हाजत हो जाती थी। यह एलूमेन से दूर हो गया। एक रोगी को सिर-दर्द होता था, जब सिर-दर्द हटता था, तब दस्त आने लगते थे। यह पीडोफाइलम से दूर हो गया। इस प्रकार दो रोगों के पर्याय-क्रम का अर्थ यह समझना चाहियें कि शरीर में दो रोग एक-साथ हैं, और ऐसी औषधि का निर्वाचन करना चाहिये जो रोगी की दोनों अवस्थाओं पर असर कर सके। अगर इन लक्षणों में आर्सेनिक के लक्षण मौजूद हों, तो इस औषधि का निर्वाचन होंगा, परन्तु लक्षणों के आधार पर हीं, अन्य किसी आधार पर नहीं।
(8) रात्रिकालीन या दोपहर के बाद रोग-वृद्धि (जैसे, दमा) – आधी रात के बाद या दोपहर को 1-2 बजे के बीच रोग का बढ़ जाना इसका चरित्रगत लक्षण है। विशेष रूप से दमे में यह पाया जाता है, परन्तु बुखार, खांसी, हृदय की धड़कन-किसी भी रोग में मध्य-रात्रि या दोपहर में रोग का बढ़ना आर्सेनिक का लक्षण है।
(9) सफाई पसंद स्वभाव – रोगी बड़ा सफाई पसन्द होता हैं। गन्दगी या अनियमितता को बर्दाश्त नहीं कर सकता। अगर दीवार पर तस्वीर टेढ़ी लटकी है, तो जबतक उसे सीधा नहीं कर लेता तब-तक परेशान रहता है। जो लोग हर बात में सफ़ाई पसंद करते हैं, कहीं भी गन्दगी देखकर परेशान हो जाते हैं, इस बात में सीमा का उल्लंघन कर जाते हैं, उनका लक्षण इस दवा में पाया जाता है।
(i) रक्तस्राव – आर्सेनिक रक्त-स्राव की औषधि है। इसमें भिन्न-भिन्न अंगों से ‘रक्त-स्राव’ होता है। चमकता हुआ, लाल रंग का रुधिर। अगर इस रक्त-स्राव का इलाज न हो, तो कुछ देर बाद जिस अंग से रक्त-स्राव हो रहा है उसकी सड़े अंग की हालत हो जाती है और रुधिर काला, थक्केदार हो जाता है। उल्टी में और टट्टी में ऐसा ही रुधिर जाने लगता है। रक्त-स्राव के कष्ट में से गुजरते हुए रोगी बेचैनी की हालत में से गुजरता हुआ अत्यन्त क्षीणता, दुर्बलता की दशा में पहुंच जाता है, इस दुर्बलता में उसे ठंडा पसीना आने लगता हैं। रक्त-स्राव का ही एक रूप खूनी बवासीर है। इसमें रोगी के मस्सों में खुजली होती है, जलन होती और गर्म सूई का-सा छिदता दर्द होता है। गुदा को सेंकने से या गर्म पानी से धोने से शान्ति मिलती है।
(ii) ज्वर – ज्वर में शीत, ताप और स्वेद-ये तीन अवस्थाएं होतीं हैं। आर्सेनिक के ज्वर में शीतावस्था में प्यास नहीं होती, तापावस्था में थोड़ी प्यास होती है, मुँह गीलाभर करने की इच्छा होती है, स्वेदावस्था में खूब प्यास लगती है, जितना पसीना आता है उतनी ही प्यास बढ़ती जाती है। अगर समयान्तर (Periodical) ज्वर हो, मलेरिया हो, तो उक्त-लक्षणों के होते हुए कुनीन की अपेक्षा आर्सेनिक इस ज्वर को जल्दी ठीक कर देता है-ज्वर समयान्तर से आता हो, दूसरे, चौथे दिन आता हो, मध्य-दिन या मध्य-रात्रि में बढ़ता हो, तब तो आर्सेनिक निश्चित औषधि है।
शक्ति तथा प्रकृति – पेट, आंतों तथा गुर्दे की बीमारियों में निम्न शक्ति दी जानी चाहिये, स्नायु-संबंधी बीमारियों तथा दर्द के रोगों में उच्च-शक्ति लाभ करती है। अगर सिर्फ त्वचा के वाह्य-रोग के लिये औषधि देनी हो, तो 2x, 3x देना चाहिये जिसे दोहराया जा सकता है। अन्यथा दमे में 30 शक्ति और पुरानी बीमारी में 200 शक्ति लाभ करती है। औषधि सर्द-प्रकृति के लिये है।
आर्सेनिकम ब्रोमैटम Arsenicum Bromatum
Arsenicum Bromatum Mineral Kingdom की होम्योपैथिक दवाई है। Arsenicum Bromatum त्वचा सम्बन्धी रोगों के लिए इस्तेमाल की जाती है। यह चर्म रोग के समस्याओं को ठीक करने में काम आती है। जो चर्म रोग लम्बे समय तक चलते हैं ये दवाई उनमे भी काम आती है। यह दवाई खून को साफ करने में मदद करती है। साथ ही मधुमेय के लिए भी यह दवा असरदार है, खून से शुगर की मात्रा को कम करने में यह दवाई काम आती है। यह दवाई हमारे शरीर की ग्रंथियों में भी असर करती है, जिन लोगों के glands बड़े हो जाते हैं, उनमे ये दवाई उन्हें सामान्य करने में भी मदद करती है साथ ही कैंसर के कुछ लक्षणों में भी यह दवाई असरदार है।
यह दवाई होम्योपैथिक की बहुत ही अच्छी Antipsoric दवाई है अर्थात अगर आपको कोई भी चर्म रोग हो जाता है जैसे अगर त्वचा में खुजली बहुत होती है, जलन होती है तो यह दवाई इसके लिए बहुत ही फायदेमंद है। अगर आपको सिफिलिस की वजह से कोई चर्म रोग होता है तो भी यह दवाई लाभदायक है। अनुवांशिक तरीके से आये चर्म रोगों के लिए भी यह दवाई बहुत ही लाभदायक है। अगर आपकी त्वचा पर छोटे-छोटे काले दाने हों और यह काफी सालों से हो चाहे किसी भी बीमारी के कारण हो यह दवाई उसे ठीक करने का काम करती है। यदि आपकी ग्रंथियों में कोई समस्या हो गई हो तो Arsenicum Bromatum बहुत ही असरदार दवाई है। यदि आपकी ग्रंथियां बढ़ जाती है, उसमे सूजन आ गई हो या दर्द हो तो Arsenicum Bromatum बहुत फायदेमंद दवाई है। यदि आपको मधुमेय की समस्या हो Arsenicum Bromatum बहुत ही लाभदायक दवाई है।
अगर आपको बहुत समय से Pimple, Acne की समस्या हो और वह ठीक न हो रहे हो तो Arsenicum Bromatum बहुत ही असरदार दवाई है Acne के लिए। अगर आपके Pimples शुरू में लाल होते है फिर उससे त्वचा पर काले दाग बन जाते है फिर वह ठीक हो जाते है और फिर यही प्रक्रिया शुरू से होने लगती है तो यह दवाई इस समस्या को जड़ से ठीक करने के लिए बहुत ही असरदार है।
अगर आपके नाक पर pimples निकलते हों और बार-बार ठीक होकर निकलते हों तो यह दवाई बहुत लाभदायक है। यह दवाई किशोरावस्था में होने वाले Acne और Pimples के लिए बहुत ही लाभदायक है।
अगर आपको मधुमेय की समस्या है, तो Arsenicum Bromatum Q की तीन बून्द एक ग्लास पानी में डाल कर पीना है, इसे आपको दिन में तीन बार पीना है, इससे आपको मधुमेय की समस्या में राहत मिलेगा। मधुमेय के रोगियों को यह दवाई खाना खाने के दस मिनट बाद भी पीना है क्योंकि खाना खाने के बाद अचानक यह समस्या बढ़ जाती है। इसे आपको केवल 10-15 दिन तक लेना है, इसके बाद Arsenicum Bromatum 6 CH में लेना है दो बून्द एक चम्मच पानी के साथ दिन में तीन बार।
अगर आपको Acne की समस्या है तो Arsenicum Bromatum Q की तीन बून्द एक कप पानी में डाल कर दिन में तीन बार पीना है, इस समस्या में भी Arsenicum Bromatum Q का सेवन केवल 10-15 दिन ही करना है अगर उसके बाद भी थोड़ा बहुत Acne या Pimple बचता है तो Arsenicum Bromatum 6 CH में लेना है, इसकी दो बून्द एक चम्मच पानी के साथ दिन में दो बार लेनी है।
अगर आपके शरीर के किसी भी हिस्से पर छोटे-छोटे दाने निकलते रहते है तो Arsenicum Bromatum Q की तीन बून्द एक कप पानी में डाल कर दिन में तीन बार पीनी है। इस समस्या में भी इसका सेवन 10-15 दिन ही करना है और उसके बार Arsenicum Bromatum 6 CH में लेना है, इसकी दो बून्द एक चम्मच पानी में डाल कर दिन में तीन बार पीनी है।
नोट :- Arsenicum Bromatum Q का प्रयोग ज्यादा दिनों तक नहीं करना है, यह दवाई बहुत जल्दी असर करती है शरीर पर और इसके ज्यादा प्रयोग से इसके side effect भी देखने को मिल सकते हैं। इसका प्रयोग 10 से 15 दिन करने के बाद आपको Arsenicum Bromatum 6 CH में लेना है अगर आपकी बीमारी पूरी तरह ठीक नहीं हुई है तो।
आर्सेनिकम हाइड्रोजेनिसेटम Arsenicum Hydrogenisatum
इस दवा में शरीर ठण्डा, हिमांग, उद्वेग, बेचैनी, सुस्ती, कमजोरी इत्यादि बहुत से आर्सेनिक के लक्षण पाये जाते हैं ; किन्तु सम्भवतः निम्नलिखित दो बीमारियों में इससे ज्यादा लाभ होता है।
घाव – लिंगाग्र-चर्म ( prepuce ) और लिंगमुण्ड में पीब भरा, गोल उठा हुआ ( superficial ) घाव ; उपदंश रोग में लिंग पर प्रायः इस तरह का घाव हो जाता है।
हैजा – हैजा की हिमांग अवस्था में जब नाड़ी लोप हो जाती है, अंग ठण्डे पड़ जाते हैं, आँखें भीतर धँस जाती है, बहुत सुस्ती आ जाती है और जब कि आर्स एल्बम के प्रयोग से कोई लाभ नहीं होता तब आर्स हाइड्रो की परीक्षा करें। ये लक्षण ज्वर तथा अन्य किसी भी बीमारी में हों, तो भी यह फायदा करती है।
इसके अलावा ज्यादा छींक आना, कोई चीज पेट में न ठहरना, पानी वगैरह भी कै हो जाना, रक्तस्राव, सिर में चक्कर, माथा भारी इत्यादि में यह लाभदायक है।
आर्सेनिक आयोडेटम ( Arsenicum Iodatum)
(1) नाक या कान से नीलिमा लिये हुए लगने पर काटनेवाला, अत्यधिक पीला-स्राव
(2) यक्ष्मा-रोग, की प्रारंभिक-अवस्था में
(3) आर्सेनिक के कारण शीत तथा आयोडीन के कारण ऊष्णता-प्रधान प्रकृति
(4) हृदय के रोग में उपयोगी
(i) खुली हवा में रोगी में कमी
(i) खुश्क हवा में रोग का बढ़ना
(ii) बन्द कमरे में रोग का बढ़ना
(1) नाक या कान से नीलिमा लिये हुए लगने पर काटने वाला, अत्यधिक पीला-स्राव – साधारण जुकाम तथा पुराने जुकाम में इस औषधि का विशेष प्रयोग होता है। इसका स्राव नीला-पीला होता है। थोड़ा नहीं, बहुत स्राव होता है। जहां छूता है वहां काटता है, लगता है, पस जैसा होता है। जब जुकाम क्रौनिक हो जाय तब यह दवा काम देती है। कई साल से आर्स आयोडाइड मेरी प्रिय औषधि रही है। इसका प्रभाव-क्षेत्र बिल्कुल निश्चित है। इसका स्राव बड़ा लगने वाला, काटने वाला होता है। भले ही कोई रोग हो, उसका कोई-सा भी नाम हो, यह स्राव शरीर के किसी भी अंग से क्यों न जाता हो, अगर यह स्राव श्लैष्मिक-झिल्ली, को जहां से यह बहता है, काटता है, वहां लगता है, तो यह आर्स आयोडाइड औषधि का निश्चित लक्षण है।
इस प्रकार का स्राव नाक से, कान से, योनि से-कहीं से भी निकल सकता है, परन्तु अगर इसका काटनेवाला लक्षण मौजूद है तो इससे लाभ होता है। एरम ट्रिफ में भी नाक से काटनेवाला स्राव है।
(2) यक्ष्मा-रोग की प्रांरभिक अवस्था – यक्ष्मा-प्रकृति के रोगियों के लिये इसकी विशेष उपयोगिता है। रोगी को तुरन्त ठंड लगकर जुकाम हो जाता है, नाक की शिकायत प्राय: बनी रहती है। टी०वी० के रोगी की तरह की रक्तहीनता, पीलापन जो टी०बी० की मरीज लड़कियों में पाया जाता है। वजन कम होता जाता है। बच्चे दिनोंदिन कमजोर होते जाते हैं। जो मरीज टी०बी० की प्राथमिक-अवस्था में हों, दोपहर को तापमान बढ़ जाता हो, पसीना आता हो, शरीर क्षीण हो जाता हो, इन लक्षणों के साथ अतिसार की प्राय: शिकायत हो जाती हो, खांसी रहती हो, उनके लिये इस औषधि का प्रयोग करना चाहिये। यक्ष्मा का.इलाज करने के लिये यह विख्यात है।
(3) आर्सेनिक के कारण शीत तथा आयोडीन के कारण ऊष्णता प्रधान प्रकृति – अगर ठंड ज्यादा न हो तो रोगी खुली हवा पसन्द करता है, दरवाजे तथा खिड़कियां खुलवाना चाहता है, बन्द कमरा उसे नहीं सुहाता, परन्तु ठंडे पानी को भी पसन्द नहीं करता, स्नान करने से उसे ठंड लग जाती है। इस औषधि में आर्सेनिक और आयोडीन का मिश्रण है, इसलिये इसके कई रोगी आर्सेनिक के कारण शीत-प्रधान, और अनेक रोगी आयोडीन के कारण ऊष्णता-प्रधान होते हैं। इसलिये यह दवा सर्द भी है, गर्म भी है, परन्तु मुख्य तौर पर गर्म है।
(4) हृदय के रोग में उपयोगी – एक डाक्टर हृदय के सब रोगों में निम्न दवा दिया करते थे : क्रेटिगस का मदर टिंचर 5 बून्द दोनों वक्त के खाने के समय, बीच में, और खाने के आधे घंटे के बाद आर्सेनिक आयोडेटम 3x दो ग्रेन दोनों वक्त के खाने के बाद। इस प्रकार हृदय के सब रोगी ठीक हो जाते थे। एक डाक्टर ने मरने से पूर्व अपनी पुत्री को यह नुस्खा बतलाया था। कैटिगस तथा आर्स आयोडाइड हृदय के अनेक रोगों के लिये लाभप्रद हैं।
(5) शक्ति तथा प्रकृति – अनुभव से यह देखा गया है कि टी० बी० में उपचार का प्रारंभ 4x से शुरू करना चाहिये, और धीरे-धीरे रोगी को 2x विचूर्ण 5 ग्रेन दिन में तीन बार पर ले आना चाहिये। औषधि ताजी बनानी चाहिये और इसे रोशनी से बचाये रखना चाहिये। साधारणतया अन्य रोगों में 2 या 3 शक्ति व्यवहार में लानी चाहिये। औषधि गर्म प्रकृति के लिये हैं।
आर्सेनिकम सल्फ्यूरेटम फ्लैवम ( Arsenicum Sulphuratum Flavum
धवल या श्वेत कुष्ट ( leucoderma ) और उपदंश रोग में शरीर के चमड़े से मछली के चोयटें जैसे दरोरे या चकत्ते निकलने पर कुछ दिनों तक इसका सेवन कराया जाय तो – इस दवा से लाभ होगा।
घुटनों के जोड़ों में दर्द, प्रत्यंग आदि का पक्षाघात की तरह सुन्न पड़ जाना, श्वास-प्रश्वास में कष्ट, स्वरयंत्र का क्षय रोग इत्यादि में यह लाभदायक है।
ऐसा महसूस होता है जैसे छाती में कोई सुई अन्दर से बाहर की ओर निकाली जा रही हो, माथे के दाईं ओर भी ऐसा ही होता है। कान के पीछे बर्छी लगने जैसा दर्द, श्वास लेने में कठिनाई। गुप्त अंगों की निकटवर्ती त्वचा छिल जाती है।
श्वेत कुष्ट एवं पट्ट की उपदंश ( squamous syphilides ) गृघ्रसी ( Sciatica ) तथा घुटनों के चारों ओर दर्द।
शरीर में कमजोरी महसूस करना, कंपन्न होना और लड़खड़ाना इस तरह के रोग में आर्सेनिकम सल्फ्यूरेटम फ्लैवम बहुत लाभ करता है।
मात्रा – 3 शक्ति का विचूर्ण। 6, 30 शक्ति .
आर्टिमिसिया वल्गैरिस Artemisia Vulgaris
[ एक तरह के पौधे की ताजी जड़ या सोर से टिंचर तैयार होता है ] – साधारणतः मिर्गी के समान आक्षेप, बचपन में किसी बीमारी के साथ आक्षेप या चिहुकबाई ( convulsion ), युवती स्त्रियों की मिर्गी, डर से या अन्य किसी तरह की प्रबल उत्तेजना अथवा हस्तमैथुन आदि के द्वारा शुक्रक्षय होने से मिर्गी हो जाना इत्यादि में तथा अनेक प्रकार के स्नायविक रोगों में इसका उपयोग होता है।
चोट – चोट लगते ही बहुत से लोग पहले आर्निका प्रयोग करते हैं। आर्टिमिसिया सिर्फ आँख में चोट लगने की और उससे उत्पन्न उपसर्गों की बढ़िया दवा है। इसका लगाने और खाने दोनों तरह से प्रयोग होता है। बाहरी प्रयोग के लिए 1 औंस डिस्टिल्ड वाटर में मूल-अर्क की 20-25 बून्द ( इसी हिसाब से ) मिला लेना चाहिए।
मिर्गी ( epilepsy ) – आर्टिमिसिया दवा पहले-पहल डॉ बोरिक से ली गई थी। होम्योपैथिक पद्धति से स्वस्थ शरीर पर परीक्षा नहीं हुई है। उपर्युक्त डॉक्टरों का कहना है – जिन युवती स्त्रियों के मासिक ऋतुस्राव नियमित समय पर नहीं होता उनको तथा जिन्हे पहली बार ऋतु-स्राव होने की उम्र में मिर्गी हो जाती है उनके लिए यह ज्यादा फायदेमंद है। इसके फिट का दौरा ( आक्षेप ) इतना जल्दी-जल्दी होता है कि रोगी को होश में आने का मौका ही नहीं मिलता। हिस्टेरो-एपिलेप्सी में टैरेंटुला हिस्पैनिया लाभदायक है।
सदृश – साइक्यूटा, सिना।
क्रम – 3, 200 शक्ति।
ऐस्पैरेगस ऑफिसिनैलिस (Aspargus officinalis)
ऐस्पैरेगस ऑफिसिनैलिस औषधि की मूत्रस्राव पर तथा द्रुतगामी क्रिया पर प्रभाव पड़ता है। यह औषधि शरीर में कमजोरी लाती है तथा हृदय की गति को कम करके सूजन उत्पन्न करती है।
मेरुदण्ड के स्नायुमण्डल के माध्यम से ऐस्पैरेगस ऑफिसिनैलिस औषधि अपनी मूल क्रिया गुर्दे पर करती है और इस औषधि का सीधा प्रभाव हृदय की क्रिया पर पड़ता है जिसके कारण हृदय की क्रिया गड़बड़ा जाती है।
ऐस्पैरेगस ऑफिसिनैलिस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को भ्रम महसूस होता है तथा उसे सर्दी तथा जुकाम भी हो जाता है, नाक से अधिक मात्रा में पानी जैसा तरल पदार्थ निकलता रहता है, माथे और नाक की जड़ में दर्द होता है, सुबह के समय में जब रोगी उठता है तो उसके सिर में दर्द होने लगता है तथा इसके साथ ही उसकी आंखों के आगे काले रंग के धब्बे पड़ जाते हैं। रोगी का गला खुरदुरा हो जाता है तथा जब वह खंखारता है तो गले से अधिक मात्रा में चिपचिपा पदार्थ (बलगम) बाहर निकलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐस्पैरेगस ऑफिसिनैलिस औषधि का उपयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बार-बार पेशाब आता है तथा मूत्रपथ में बारीक सी सुई चुभने जैसा दर्द होता है तथा इसके साथ मूत्रपथ में जलन और पेशाब से बदबू आती है। मूत्राशय में जलन होने के साथ-साथ पीब जैसा पदार्थ बाहर निकलता है। पथरी रोग। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐस्पैरेगस ऑफिसिनैलिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के छाती में घुटन सी महसूस होने लगती है, नाड़ी रुक-रुककर चलती है, हृदय में दर्द होता है, बायां कंधा कमजोर हो जाता है और इन लक्षणों का सम्बन्ध मूत्राशय के रोगों से जुड़ा रहता है, जब रोगी ‘वास लेता है तो उस समय उसे अधिक घुटन महसूस होती है। छाती में पानी भर जाता है तथा इसके साथ ही रोगी को छाती में भारीपन महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐस्पैरेगस ऑफिसिनैलिस औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पीठ में, कंधों के आस-पास और हाथ-पैरों के जोड़ों में दर्द, बायें कंधे के उभार से लेकर कंठास्थि तक दर्द होता है जो नीचे बाजू तक फैल जाता है और नाड़ी कमजोर हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐस्पैरेगस ऑफिसिनैलिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध :-
आलथिया, फाइलेलिस अल्केकेंगी, डिजिटैलिस, सर्सापैरिल्ला तथा सापइजीलिया औषधि की तुलना ऑफिसिनैलिस औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष :-
ऐकोना, एपिस औषधियां के हानिकारक प्रभाव को ऐस्पैरेगस ऑफिसिनैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
मात्रा :-
ऐस्पैरेगस ऑफिसिनैलिस औषधि की छठी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एस्पिडोस्पर्मा (Aspidosperma) क्यूब्रेको (Quebrecho)-एस्पि
एस्पिडोस्पर्मा औषधि का प्रभाव रोगों को ठीक करने में डिजिटैलिस औषधि के समान है। यह औषधि श्वास नलियों के केन्द्रों को उत्तेजित करके उसकी रुकावट को स्थाई रूप से दूर कर देती है जिसके कारण खून का आवासीकरण (ऑक्सीडेशन) रुक जाता है। इस प्रकार से ऑक्सीकरण में वृद्धि करती है तथा कार्बोनिक एसिड को बाहर निकाल फेकती है। यह फेफड़ों की संकीर्णता (पुलमोनरी स्टेनोसीस), फुफ्फुस धमनी की घनास्त्रता (थ्रोम्बोसीस) को बनाये रखती है।
एस्पिडोस्पर्मा औषधि के प्रभाव से खून में यूरिया बढ़ जाती है जिसके कारण श्वास से संबन्धित अनेक रोग, दमा रोग ठीक हो जाता है। यह श्वास केन्द्रों को उत्तेजित करती है और रक्त में ऑक्सीजन की मात्रा बढ़ती है।
अधिक परिश्रम का कार्य करने पर सांस फूलने लगती है उस समय एस्पिडोस्पर्मा औषधि का प्रयोग करने से बहुत अधिक लाभ मिलता है और रोगी को आराम मिलता है, हृदय रोगों के कारण होने वाला दमा रोग को यह ठीक कर देता है।
सम्बन्ध :-
कोका, आर्सेनिक, कैटाल्पा, काफिया औषधि से एस्पिडोस्पर्मा औषधि की तुलना कर सकते हैं।
मात्रा :-
एस्पिडोस्पर्मा औषधि की पहली शक्ति का विचूर्ण या मूलार्क अथवा ऐस्पिडोस्पर्मिन हाइड्रोक्लोराइड, शक्ति के विचूर्ण का एक ग्रेन का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इस प्रयोग एक-एक घण्टे के बाद करना चाहिए।
एगारिकस Agaricus
रोगी के शरीर की त्वचा पर लाली पड़ गई हो तथा पूरे शरीर पर खुजली के साथ जलन हो रही हो और ऐसा महसूस हो रहा हो कि बर्फ के ठण्डे पानी में पूरा शरीर चला गया है, इस प्रकार के लक्षण यदि किसी व्यक्ति में हो तो उसका उपचार करने के लिए एगारिकस औषधि का उपयोग करना चाहिए क्योंकि ऐसे रोगियों के रोग को ठीक करने की शक्ति इस औषधि में बहुत अधिक होती है।
एगारिकस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी होती है:
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर की त्वचा, चेहरा, नाक और कान पर चेचक की तरह लाल और खुजलाने वाले दाने निकल गये हो तो एगारिकस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसके हाथ-पैरों तथा पलकों में फड़कन हो रही है तथा इस कारण रोगी अपने पूरे शरीर को झटके देता रहता है। जब रोगी नींद की अवस्था में होता है तो उसके शरीर में यह लक्षण दिखाई नहीं देता है, इस प्रकार के लक्षण को दूर करने के लिए एगारिकस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
मेरुदण्ड से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को रीढ़ की हड्डी में दर्द हो रहा हो, किसी भी चीज का स्पर्श सहन न हो रहा हो और इस दर्द का असर शरीर के नीचे के अंगों तक फैल रहा हो तो इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी की चिकित्सा करने के लिए एगारिकस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नाड़ी की धड़कन (स्पन्दन) से सम्बन्धित लक्षण :- नाड़ी की धड़कन से संबन्धित रोगों को ठीक करने के लिए एगारिकस औषधि का उपयोग लाभकारी है। चेहरे से लेकर पलकों तथा हाथ-पैरों में कंपन होना, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एगारिकस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मात्रा :-
एगारिकस औषधि की 200 पोटेंसी का प्रयोग करना चाहिए।
ऐगारिकस मस्केरियस (AGARICUS MUSCARIUS)
जिन वृद्ध (बूढ़े) व्यक्तियों के शरीर में खून संचारण की गति कम हो गई हो, शराब पीने या अधिक नशीले पदार्थो के सेवन करने से स्वास्थ्य बिगड़ गया हो तथा उसके बच्चों में भी कुछ ऐसे ही लक्षण हो तो इस प्रकार के लक्षणों में ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि ठण्डी प्रकृति वाले लोगों के लिए बहुत उपयोगी है। जो व्यक्ति यह कहते हैं कि उनके शरीर की खून की शक्ति घट गई है, इसलिए अब ठण्ड बर्दाश्त नहीं हो रही है। कई प्रकार के गलत कार्य जिनसे खून की ताकत घटती है तथा नाड़ियों की कार्य शक्ति भी घट जाती है। रोगी के सिर के बाल झरने लगते हैं, शरीर का मांस और चमड़ी ढ़ीली पड़ जाती है तथा अनेकों प्रकार के स्नायुविक लक्षण दिखाई देते हैं। इस प्रकार के लक्षण होने पर इसका प्रयोग बहुत अधिक लाभदायक होता है।
पहले से किये गये दुष्कर्म कार्य के कारण बुढ़ापे की स्थिति हो गई हो तथा आनुवांशिक कमजोरी होने के कारण उत्पन्न रोग को ठीक करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि बहुत उपयोगी है।
रोगी को बहुत ठण्ड महसूस होती है। शरीर के किसी भी स्थान की मांसपेशी या हाथ-पैरों का कंपकंपाना, रात के समय में नींद खुलते ही कपंकपी होना और नींद आते ही कंपकंपी बंद हो जाना। सिर का ऊपरी भाग कांपने लगता है, सोने पर सिर की कपंकपी बंद हो जाती है। कभी-कभी शरीर के अनेकों अगों में झनझनाहट और कम्पन होती है तथा रोगी में तान्डव रोग (नाचने का पागलपन) के सारे लक्षण हो जाते हैं। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसे ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि देना चाहिए जिसके फलस्वरूप उसका रोग ठीक हो जाता है तथा बहुत अधिक लाभ मिलता है।
बच्चा चलना और बोलना दोनों ही बहुत देर से सीखता है। बच्चे की हडि्डयों की कोमलता और पोषण ठीक प्रकार से न होने के कारण जल्दी खड़ा नहीं हो पाता, मन तथा मस्तिष्क के सोचने की शक्ति कम हो जाती है, बच्चे को कुछ भी सीखने में उसे बहुत देर लगती है, वह गलतियां बहुत अधिक करता है और उसे कुछ भी याद नहीं रहता। उसे डर बहुत अधिक लगता है तथा डांटने से बेहोश हो जाता है। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी बच्चे में है तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का प्रयोग बहुत ही उपयोगी है।
रोगी का मन तथा मस्तिष्क का कार्य करने की शक्ति नष्ट हो गई हो, रोगी को सुबह के समय में कुछ भी समझ में नहीं आता हो कि क्या करना है क्या नहीं करना है, लेकिन शाम के समय में वृद्धि सही हो जाती है। रोगी शराबी की तरह चिल्लाता और बड़बड़ाता रहता है। कभी-कभी मुंह से सीटी बजाता है, बात का जवाब नहीं देता। लगातार भविष्य के बारे में कुछ न कुछ बकता रहता है, कोई भी कार्य करने में मूर्खो की तरह लापरवाही करता हो और कभी-कभी सही बुद्धि होने का परिचय देता हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
जब रोगी डकार लेता है तो सेब के फल की गन्ध आती है, दांत अस्वाभाविक तथा बड़े महसूस हो रहे हो, पेशाब करते समय पेशाब का ठण्डा होना महसूस हो रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के में उपयोगी हैं-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी गाता रहता है तथा कुछ बोलता रहता है लेकिन कुछ पूछने पर जवाब नहीं देता है। अधिक बोलता रहता है, कोई भी कार्य नहीं करता है। रोगी डरता है, चिल्लाता है तथा कुछ न कुछ बड़बड़ाता रहता है। रोगी कुछ न कुछ भविष्यवाणी करता रहता है। रोगी को जंभाई होने लगती है, रोगी को हल्की उत्तेजना होती है या नशीलापन स्वभाव का हो जाता है या रोगी अधिक चीखता-चिल्लाता रहता है तथा स्वयं को घायल करना चाहता है या मानसिक परेशानी अधिक हो गई हो जिसके कारण अधिक थकावट महसूस करता है। इस प्रकार के लक्षण जिस व्यक्ति में हो उसका उपचार ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि से करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को धूप से तथा चलते समय चक्कर आते हैं। रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसका सिर लगातार गतिशील अवस्था में रहता है। सिर के पीछे की तरफ वह गिरने लगता है, सिर के पिछले भाग में कोई भारी चीज रखी हो ऐसा रोगी को महसूस होता है। रोगी को सिर में दर्द ऐसा महसूस होता है कि किसी ने उसके सिर में नाखुन या कील गाड़ दिया हो। जब रोगी लम्बे समय तक पढ़ने लिखने का कार्य करता है तो उसके सिर में दर्द होने लगता है। रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि सिर पर बर्फ रखी हो और सुइयां या कांटे के चुभने के जैसा दर्द हो रहा है। रोगी अपने सिर पर गर्म कपड़े रखने की इच्छा करता हो। सिर दर्द के साथ नाक से खून बह रहा हो या गाढ़ा कफ की तरह नाक से स्राव हो रहा हो। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी रोगी में है तो उसका उपचार करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के होठों पर डंक मारने जैसा दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ ही जलन भी होती रहती है, जीभ का स्वाद मीठा तथा मुंह के अन्दर की ऊपरी भाग अर्थात तालू में छाले हो जाते हैं, जीभ में कील गड़ने जैसा दर्द महसूस होना, हर समय अधिक प्यास लगना, जीभ में अधिक कंपन महसूस होता है तथा जीभ का रंग सफेद हो जाता है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अपने कान की नली में सुई चुभने जैसा दर्द महसूस होता है और गले में सिकुड़न होती है, बलगम के छोटे-छोटे ठोस थक्के जमकर निकलना, ग्रासनली (भोजननली) में रुखापन, किसी चीज को निगलने में कष्ट महसूस होना। गले के अन्दर खुरचन हो जाना जिसके कारण बोलने में परेशानी होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को डकारें आती है, तथा डकारें लेने पर पानी का स्वाद सेब जैसा लगता है। नाड़ी में कई प्रकार का दोष उत्पन्न हो जाता है। रोगी को हिचकी आती है। रोगी को भूख तेज लगती है, आमाशय तथा पेट में वायु बनने के कारण पेट फूलने लगता है। मलद्वार से वायु निकलने पर अधिक बदबू आती है, भोजन करने के लगभग तीन घंटे के बाद आमाशय में जलन, जो धीरे-धीरे दबाव में बदलता जाता है। पेट में गड़बड़ी होने के साथ यकृत प्रदेश में तेज दर्द होना। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में हो तो उसका उपचार ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि से किया जाए तो रोग ठीक हो जाता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कोई भी अक्षर पड़ने में परेशानी होती है क्योंकि उसके हाथ हिलते रहते हैं जिसके कारण अक्षर भी हिलते रहते हैं। रोगी को सारी चीजें हिलती-डुलती नज़र आती है। आंखों को देखने की शक्ति कम हो जाती है, अधिक लम्बे समय तक कार्य करने से दृष्टि कमजोर हो जाती है, पलकों के किनारे लाल पड़ गये हो जिनमें खुजली तथा जलन होती है और पलकें आपस में चिपक गये हो। आंख का अन्दरूनी भाग अधिक लाल हो गया हो। इस प्रकार के लक्षण होने पर ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का प्रयोग बहुत लाभकारी है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कान में जलन व खुजली होती हो और उसे ऐसा महसूस हो रहा हो कि कान ठण्डे पड़कर जम गया है, कान के पास की पेशियों में कंपन होती है तथा तरह-तरह की आवाजें सुनाई देती हैं। ऐसे रोगी का उपचार ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि से करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण:- रोगी को नाक का कोई रोग हो गया हो तथा नाक के अन्दर या बाहर खुजली मच रही हो और खांसने के बाद छीकें आ रही हो। नाक से पानी निकल रहा हो, नाक का अन्दरूनी कोण अधिक लाल हो गया हो। नाक से गहरे रंग का रक्त स्राव (निकल) हो रहा हो और उससे बदबू आ रही हो। बूढ़े व्यक्तियों में नकसीर रोग हो गया हो तथा उन्हें नाक में तथा मुंह में दर्द हो रहा हो। ऐसे रोगियों की चिकित्सा करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि से हो सकता है तथा इससे उपचार करने से रोगी को बहुत आराम मिलता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अपने चेहरे की पेशियों में अकड़न महसूस होती है, चेहरे पर खुजली और जलन होती है। गालों पर दर्द महसूस होता है तथा दर्द ऐसा महसूस होता है कि जैसे किसी ने गाल पर सुइयां चुभो दिया हो। नाड़ियों में दर्द तथा रोगी को दर्द ऐसा महसूस होता है कि जैसे-बर्फ के समान ठण्डी सुइयां चुभ रही हो और नोकदार बर्फ का स्पर्श करा दिया गया हो। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी व्यक्ति में हो तो उसका उपचार ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि से करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- जिगर, प्लीहा (सिएनोथस) तथा पेट में सुई चुभने जैसा दर्द होना। पेट के बायीं ओर की छोटी पसलियों के नीचे सुई चुभने अहसास होता हो अतिसार (दस्त) के साथ मलद्वार से बदबूदार वायु निकलती हो और मल से अधिक बदबू आ रही हो, इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में हो तो उसका उपचार ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि से करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मूत्रमार्ग में सुई चुभने जैसा दर्द महसूस होना, पेशाब करने की इच्छा अधिक हो रही हो तथा बार-बार पेशाब आ रहा हो तो रोगी का उपचार ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि से करना फायदेमंद होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों को मासिकधर्म के समय में रक्त का स्राव अधिक हो रहा हो तथा मासिक धर्म नियमित समय से पहले ही शुरु हो गया हो, प्रजनन अंगों तथा कमर में खुजली और फाड़ने जैसा दर्द और दबाव महसूस हो रहा हो। प्रजनन अंग के नीचे की ओर दबाव पड़ने के साथ तेज दर्द और रजोनिवृति के बाद तेज दर्द, कामोत्तेजना तथा चूचुकों में खुजली और जलन हो रही हो। बच्चे को जन्म देने के बाद या संभोग करने के बाद प्रजनन अंग में अधिक दर्द हो रहा हो, मासिक स्राव के समय में योनि में अधिक खुजली मच रही हो। इनमें से कोई भी लक्षण स्त्रियों में हो तो ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को तेज खांसी हो रही हो, खाना खाने के बाद कष्ट अधिक हो रहा हो तथा खांसी बंद होते ही सिरदर्द शुरु हो जाता हो। रोगी को रात के समय में अधिक खांसी हो तथा बलगम छोटे-छोटे थक्के के रूप में निकल रहा हो और सांस लेने में परेशानी हो रही हो, छीकें आने पर खांसी आना बंद हो जाता हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- धूम्रपान करने के बाद धड़कन की गति अनियमित रूप से चल रही हो तथा नाड़ी की गति भी अनियमित रूप से हो गई हो। हृदय के आस-पास अधिक दबाव महसूस हो रहा हो और स्तन में अधिक सिकुड़न हो गया हो और रोगी का चेहरा लाल हो गया हो, इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी को ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि से करना चाहिए, इस औषधि के फलस्वरूप रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है तथा रोगी को बहुत अधिक आराम मिलता है।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर की त्वचा में खुजली, जलन, लाली और सूजन आ गई हो। त्वचा पर जो फुंसिया हो वो अधिक कठोर हो गई हो तथा उसमें अधिक तेज दर्द हो रहा हो। त्वचा के दाने पर अधिक खुजली तथा दर्द हो रहा हो। शरीर के कई अंगों पर गुलाबी रंग के दाने हो गए हो। त्वचा पर सूजन तथा सूजी हुई अंग अधिक ठण्डी पड़ गई हो। शरीर के कई भागों पर लाल-लाल, धब्बेदार दाने हो गये हो तथा इसके साथ इन भागों में अधिक खुजली मच रही हो। इनमें से कोई भी लक्षण यदि किसी रोगी में है तो उसको ठीक करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक जंभाइयां आ रही हो, पूरे शरीर पर अधिक जलन तथा खुजली मच रही हो, सोते-सोते एकदम से चौंक जाना, पड़पड़ाना और बार-बार नींद का खुल जाना। अधिक सपने आना। दिन में नींद न आना, जंभाई लेने के बाद बिना किसी कारण से हंसी आती रहती हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में हैं तो उसके रोगी को ठीक करने में ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ठण्डी हवा अच्छी लगती हो, शाम के समय में शरीर अधिक गर्म हो जाता हो तथा शरीर से अधिक पसीना निकलता हो तथा शरीर के कुछ भागों में जलन हो रही हो तो ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पीठ में तथा मेरुदण्ड के पास अधिक दर्द हो रहा हो, कमर पर दर्द, खुली हवा में रहने पर दर्द में और भी तेजी हो जाता हो, पीठ में अकड़न हो गया हो तथा गर्दन की पेशियों में अकड़न हो गया हो, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर का बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अपने पूरे शरीर में अकड़न महसूस हो रही हो, कूल्हे पर अधिक दर्द हो रहा हो, हड्डी के जोड़ों में अधिक दर्द तथा हाथ-पैरों को हिलाने-डुलाने से आराम मिलता हो, कमर की हडि्डयां अधिक कमजोर हो गई हो, रोगी चलने में लड़खड़ाने लगता हो, पैरों की अंगुलियों तथा पैरों में खुजली मच रही हो और रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि पैरों पर बर्फ जम गई है। पैरों के नीचे तलुवों में हल्का दर्द, टांग की लम्बी हड्डी में दर्द हो रहा हो। शरीर के कई अंगों में लकवा रोग का प्रभाव तथा इसके साथ बाजुओं में असहनीय दर्द की अवस्था। टांग के ऊपर एक टांग रखकर बैठने से टांगें सुन्न हो जाती हो, बायीं भुजा में लकवा रोग का प्रभाव तथा इसके साथ इसमें दर्द तथा धड़कन की गति बढ़ गई हो। रोगी के पिण्डलियों में तेज दर्द तथा खिंचाव हो रहा हो। इनमें से जो कोई भी लक्षण रोगी में हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
ठण्डी खुली हवा में, खाना खाने के बाद, संभोग क्रिया करने के बाद, ठण्डे मौसम में रोगी के रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन. ह्रास) :-
पीठ पर दबाव पड़ने से रोगी को हंसी आ जाती है तथा धीरे-धीरे हिलने व चलने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
प्रतिविष :-
काफिया, कैम्फर तथा एबिंसथियम।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
शराबियों की बेहोशी की समस्या को ठीक करने में कैना-इन्डा, हायोस, ऐक्टिया, कैलि-फास, लैक, नक्स-वोम, ओमि और स्ट्रैमो औषधि से ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि की तुलना की जा सकती है।
एक्टि, कल्के-का, लैक तथा स्ट्रैम औषधि के कुछ गुणों की तुलना ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :- ऐगारिक्स मस्केरियस औषधि की 3, 30, 200 शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
आगेव अमेरिकाना (AGAVE AMERICANA)
आगेव अमेरिकाना औषधि का प्रयोग आमाशय तथा सूजाक रोगों को ठीक करने के लिए तब किया जाता है जब उत्तेजना के समय में लिंग में दर्द अधिक हो रहा हो। कई प्रकार के और भी रोग जो आगेव अमेरिकाना औषधि से ठीक होते हैं वे इस प्रकार हैं-मुंह का पीला पड़ जाना, पेशाब करते समय जलन उत्पन्न होना, मसूढ़ों में सूजन तथा मसूढ़ों से खून निकलना, टांगों में सूजन, शरीर के अंगों में दर्द होना तथा टांगों पर गहरे बैंगनी रंग के चकत्ते पड़ जाना, भूख कम लगना तथा कब्ज होना।
संबन्ध :-
आगेव अमेरिकाना औषधि के कुछ गुणों की तुलना लाइसिन, ऐन्हलोनियम, लैकेसिस औषधियों से कर सकते हैं।
मात्रा :-
आगेव अमेरिकाना की मूलार्क का प्रयोग करना चाहिए।
ऐग्नस कैस्टस AGNUS CASTUS
ऐग्नस कैस्टस औषधि का प्रभाव जननेन्द्रियों पर बहुत अधिक पड़ता है। यह औषधि उत्तेजना की शक्ति को घटाने के साथ मन में उदासी लाती है, लेकिन यदि स्नायु-ऊर्जा (नर्वस एंर्जी) नष्ट हो गई हो तो ऐसी अवस्था में इसका प्रयोग लाभदायक है। ऐग्नस कैस्टस औषधि का विशेष प्रभाव स्त्री तथा पुरुषों दोनों के प्रजनन अंगों पर पाया जाता है, लेकिन पुरूषों पर इसका अधिक प्रभाव होता है।
अधिक कामवासना के फलस्वरूप समय से पहले ही बुढ़ापा की अवस्था उत्पन्न हो गई हो तो ऐसे व्यक्तियों को ठीक करने के लिए ऐग्नस कैस्टस औषधि बहुत अधिक लाभदायक है।
मोच तथा मरोड़ को ठीक करने के लिए ऐग्नस कैस्टस औषधि बहुत अधिक लाभदायक है। शरीर के सभी भागों, विशेषकर आंखों में चुभने जैसी खुजली होती है तो इस औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
स्नायुविक प्रकृति वाले व्यक्तियों में अधिक तम्बाकू का सेवन करने से होने वाले रोगों को ठीक करने के लिए ऐग्नस कैस्टस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
जो लोग काम की उत्तेजना में अन्धे होकर दुष्कर्म करके अपने शुक्राणु को नष्ट करते हैं, वे ही स्नायु कमजोरी के रोग से पीड़ित होते हैं और निकम्मा और निंन्दायुक्त जीवन व्यतीत करते हैं। स्नायु में अत्यधिक कमजोरी अर्थात मस्तिष्क शून्यता और नाड़ियों का ठीक प्रकार से कार्य न करने पर ऐग्नस कैस्टस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
जो व्यक्ति जवानी में अधिक मौज-मस्ती करते रहे हैं और कामवासना में अधिक डूबे रहने के कारण शारीरिक रूप से कमजोर तथा नपुंसक हो जाते हैं, उनके रोग को ठीक करने के लिए ऐग्नस कैस्टस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
ऐग्नस कैस्टस औषधि निम्नलिखित लक्षणों में उपयोगी हैं-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- लैंगिक दोष (सेक्सुअल मेलंकोली) उत्पन्न होना, मृत्यु का भय होना। अधिक उदासी के साथ जल्दी मृत्यु का भय महसूस हो रहा हो। मन-मस्तिष्क स्थिर न रहना, याददास्त कमजोर होना, किसी कार्य को करने में उत्साह न होना। मछली तथा कस्तूरी की गंध महसूस होना, स्नायु में अधिक कमजोरी होना और इन लक्षणों से पीड़ित रोगी भविष्यवणियां करता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐग्नस कैस्टस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों की पुतलियां फैली हुई हो, आंखों के आस-पास चारों ओर खुजली हो रही हो तथा अधिक भय हो तो ऐग्नस कैस्टस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- मछली तथा कस्तूरी की बदबू महसूस हो रही हो तथा नाक के नथुने के पिछले भाग में दर्द हो रहा हो जो दबाने से कम होता है, इस प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए ऐग्नस कैस्टस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- तिल्ली में सूजन आ गई हो तथा इसके साथ तेज दर्द हो रहा हो। मल मुलायम हो रहा हो तथा मलान्त्र में वापस चला जाता हो, मलत्याग करने में बहुत अधिक परेशानी हो रही हो। मलद्वार पर गहरी दरारें पड़ गई हो। रोगी को जी मिचलाने के साथ ऐसा महसूस हो रहा हो कि आंतें नीचे की ओर दबा दी गई हैं तथा अंतों को सहारा देने का मन कर रहा हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐग्नस कैस्टस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पीले रंग का पेशाब हो रहा हो, लिंग में उत्तेजना न हो। नपुंसकता रोग हो गया हो। प्रजनन अंग ठण्डे तथा ढीले पड़ गये हो। रोगी को संभोग करने की इच्छा समाप्त हो गई हो। सम्भोग क्रिया करे बिना ही वीर्यपात हो जाता हो। कोई पुराना सुजाक रोग हो। अण्डकोष ठण्डे, सूजे हुए, कठोर तथा दर्दनाक हो गए हों। इनमें से कोई भी लक्षण यदि रोगी में हैं तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐग्नस कैस्टस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म के समय में स्राव बहुत कम हो रहा हो। सम्भोग करने के प्रति घृणा हो रही हो, जननांग ढीले पड़ गए हो तथा इसके साथ प्रदर (योनि से पीला या पारदर्शी रंग का स्राव होना) रोग हो गया हो। स्तनों में दूध की कमी हो गई हो तथा उदासीपन महसूस हो रहा हो। बांझपन रोग हो गया हो। दिमाग में गर्मी होने के कारण पागलपन की स्थिति उत्पन्न हो गई हो तथा इसके साथ ही नाक से खून निकल रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को है तो उसके लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐग्नस कैस्टस औषधि देना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
अधिक वीर्यपात करने तथा स्त्रियों को अधिक रक्तस्राव होने और किसी भी प्रकार से शरीर का खून अधिक नष्ट होने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
ऐग्नस कैस्टस औषधि के कुछ गुणों की तुलना सेलीनियम, कैम्फर, फास्फोरिक एसिड, लाइकोपोडियम औषधि से कर सकते हैं।
नपुंसकता रोग को ठीक करने में ऐग्नस कैस्टस औषधि से कैलेडियम सेलेनियम औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा (डोज) :-
ऐग्नस कैस्टस औषधि की प्रथम से छठी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एग्राफिस नूटैन्स (AGRAPHIS NUTANS)
पूरे शरीर में आलस्यपन उत्पन्न होना तथा शरीर ढीला-ढीला रहना और ठण्डी हवा के लगने से सर्दी तथा जुकाम हो जाने के कारण उत्पन्न रोगों को ठीक करने के लिए एग्राफिस नूटैन्स औषधि का उपयोग लाभकारी है।
नाक बंद होना, गलतुण्डिका का अधिक बढ़ जाना, कंठशालूक रोग (गले की गिल्टी के कारण) (ऐडनोइस) के कारण बहरापन की अवस्था हो जाना, सर्दी लगने के कारण दस्त होना, ठण्डी हवा के कारण शरीर में कपंकंपी होना, गले और कान के रोगों के साथ श्लैष्मिक झिल्लियों से निरंकुश स्राव होना, बचपन में गूंगापन की अवस्था हो जाना तथा इसका बहरेपन से कोई सम्बन्ध नहीं होना आदि रोगों का उपचार करने के लिए एग्राफिस नूटैन्स औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
संबन्ध :-
एग्राफिस नूटैन्स औषधि के कुछ गुणों की तुलना सीपा, कल्केरिया-फास्फो, सल्फ्यूक-आयोड, हाइड्रैस्टिस, कल्केरिया-आयोड औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
एग्राफिस नूटैन्स औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए तथा अर्क की केवल एक मात्रा का प्रयोग करना चाहिए।
एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा (AILANTHUS GLANDULOSA)
एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि एक ऐसी वृक्ष से बनायी जाती है जो चीन, जापान आदि देशों में होता हैं। यह वृक्ष देखने में बहुत अधिक सुन्दर होता है लेकिन जब उसमें फूल आते हैं, तब उनमें से इतनी तेज बदबू आती है कि उस वृक्ष के पास कोई नहीं जा सकता।
एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोग को ठीक करने के काम आता है जो इस प्रकार हैं- फार्लिकुवर, टांन्सिलाइटिस, डिफ्थीरिया, आरक्तज्वर (स्कारलेट फीवर) तथा कोई भी ऐसी बीमारी जिसमें शरीर की त्वचा का रंग एकाएक बैंगनी हो जाती है तथा चेहरा काला पड़ पड़ जाता है। शरीर में बहुत अधिक कमजोरी महसूस होने तथा इसके साथ ही नाड़ी की चलने की गति एकदम कम या तेज हो गई हो तो एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का उपयोग किया जाता है।
हल्के तापमान वाले ज्वर (बुखार), गलतुण्डिकाशोथ (फोल्लीक्युला टॉंसिलिटीज.गले में सूजन), गुच्छाणु रोग (स्ट्रेप्रोकोकस इंफेक्शन), शरीर के किसी अंग से खून बहना आदि रोगों को ठीक करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
वे रोग जिनमें शरीर पर दाने न निकले या दाने देर से निकले या निकलकर दब जाये, तथा इन लक्षणों के साथ ही अनिद्रा रोग हो जाए और बहुत अधिक बेचैनी होती हो, रोगी का जी मिचला रहा हो, उल्टी करने का मन कर रहा हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण :- त्वचा नीली या बैंगनी हो गई हो, चेहरे पर गर्मी महसूस हो रही हो, दान्तों पर मैल जम गई हो, गला सूजकर बैंगनी रंग की हो गई हो, अपने आप में कुछ न कुछ बड़बड़ाने का मन कर रहा हो तथा रोगी को अधिक सोच हो रही हो, नाड़ी कमजोर हो गई हो तथा शरीर का अधिकांश भाग ठण्डा पड़ गया हो। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी रोगी में है तो उसका उपचार करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
अतिसार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अतिसार (दस्त) हो गया हो तथा पेचिश जैसी अवस्था हो गई हो और शरीर में बहुत अधिक कमजोरी आ गई हो तो ऐसी अवस्था में रोगी का उपचार करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी अधिक उदासी होने के कारण आहें भर रहा हो, भ्रम अधिक हो रहा हो, मानसिक परेशानी अधिक हो तथा इसके साथ ही सिर में दर्द हो रहा हो जिसके कारण रोगी को नींद नहीं आ रही हो, शरीर में रक्त का बहाव कम हो गया हो तथा इसके साथ ही सिर में दर्द (पेससीव कोनगेस्टीव हैडक) हो रहा हो। आंखों से आंसू निकल रहा हो तथा आंखें फैली सी लग रही हो, किसी भी प्रकार की रोशनी अच्छी नहीं लग रही हो। नाक से कुछ मात्रा में तीखा तरल पदार्थ निकल रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- सांस क्रिया करने में अधिक तेजी हो रही हो तथा सांस लेने की क्रिया अनियमित हो गई हो। रुक-रुककर होने वाली खुश्क खांसी हो गई हो। फेफड़ें में दर्द हो रहा हो तथा इसके साथ ही फेफड़े में थक्के के समान खून जम गया हो। इस प्रकार के लक्षण होने पर एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है और रोग ठीक हो जाता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- नींद न आ रही हो तथा बेचैनी अधिक हो रही हो, नींद आ जाने पर जल्दी ही टूट जा रही हो तथा शरीर में फुर्ती न रही हो, ऐसी अवस्था में रोगी को एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि देना चाहिए जिसके फलस्वरूप उसका रोग ठीक हो जायेगा तथा रोगी को बहुत अधिक आराम मिलेगा।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले में जलन हो, गले पर लाली पड़ गई हो, गले के अन्दर तथा बाहर की तरफ सूजन आ गई हो। गले के अन्दरूनी भाग रुखी, खुरदरी, खुरचन जैसी हो गई हो तथा रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि दम घुट रहा है। आवाज भारी तथा फटी सी निकल रही हो। जीभ पर सूखापन हो तथा उसका रंग कत्थई हो गई हो। दांतों पर मैल जमा हुआ हो। खाना को निगलते समय गले में दर्द हो रहा हो तथा दर्द का असर कानों तक हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में हो तो एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि देना चाहिए जिसके फलस्वरूप उसका रोग ठीक हो जायेगा।
स्कार लैट ज्वर की तीन अवस्था जिसमें एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि से उपचार किया जा सकता है :-
1. स्कार लैट ज्वर किसी भी मौसम में हो सकता है, यह बुखार बहुत हल्का होता है तथा इससे शरीर पर दाने निकलते हैं, अच्छी तरह से देखभाल करने से तथा रोगी को गर्म कमरे में रखने से यह रोग अपने आप ही ठीक हो जाता है। इस बुखार के होने पर त्वचा लाल, काला तथा चमकदार हो जाता है। रोग का रूप अधिक भंयकर नहीं होता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी का उपचार एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि से कर सकते हैं।
2. स्कार लैट ज्वर की दूसरी अवस्था में रोगी को बुखार तो नहीं होता है लेकिन बहुत अधिक परेशानी होती है। रोगी के गले के अन्दर तथा बाहर की ओर सूजन आ जाती है। गले के अन्दर रूखापन, खुरचन, खुरदरी, खुरचन और घुटन जैसी अनुभूति होती है। रोगी की आवाज भारी तथा फटी निकलती है। रोगी के जीभ में सुखापन हो जाता है तथा जीभ का रंग कत्थई रंग का हो जाता है, उसके दांतों पर मैल जम जाती है, खाना खाते समय तथा निगलते समय रोगी को गले में दर्द होता है तथा दर्द का असर कान तक होता है। इस प्रकार के स्कार लैट ज्वर से पीड़ित रोगी के रोग को उपचार करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
3. स्कार लैट ज्वर की तीसरी अवस्था में रोगी के गले के अन्दर तेज दर्द होता है तथा सूजन आ जाती है, रोग होने के कारण रोगी के शरीर का खून दूषित हो जाता है। रोगी व्यक्ति के टांसिल में सूजन आ जाती है, त्वचा फूल जाती है, त्वचा से बदबू आती है और शरीर पर दाने बहुत कम या न के बराबर होता है। यदि इस बुखार का जल्दी ही उपचार न किया जाए तो रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। इस रोग का उपचार करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है तथा रोगी को बहुत अधिक आराम मिलता है।
मजिल्स (छोटी चेचक) डिफ्थीरिया रोग के वे लक्षण जिसके होने पर एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का उपयोग किया जा सकता है :-
छोटी चेचक की अवस्था जब बहुत अधिक बिगड़ जाती है, दाने निकलकर दब जाते हैं या निकलते नहीं या नीले-नीले रंग के हो जाते हैं तो इस अवस्था के रोगी को एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
गले के रोग के अनुसार एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि से रोगों को ठीक करने में अन्य औषधियों से तुलना :-
एपिस औषधि से एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि की तुलना :-गले की बीमारी में बहुत दर्द नहीं होता, न ही अधिक असुविधा होती है। गले के दांयी तरफ के टांसिलों में भूरे रंग के जख्म दिखाई देते हैं जिनमें से गाढ़ा तरल पदार्थ निकलता हो तो रोग को ठीक करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का प्रयोग करते हैं, जबकि यदि रोगी को इन लक्षणों के साथ-साथ यदि प्यास कम लग रही हो तथा टांसिलों में दर्द न हो, पेशाब करने में दर्द हो रहा हो या पेशाब बहुत कम मात्रा में आता हो, गले में घुटन सी महसूस हो रही हो तथा तेज बुखार हो तो रोग को ठीक करने के लिए एपिस औषधि का प्रयोग कर सकते है।
लाइकोपोडियम औषधि से एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि की तुलना :- गले की बीमारी में बहुत दर्द नहीं हो रहा हो, न ही अधिक असुविधा हो, गले के दांयी तरफ के टांसिलों में भूरे रंग के जख्म दिखाई दे रही हो जिनमें से गाढ़ा तरल पदार्थ निकलता हो तथा इसके साथ-साथ रोगी के गले के दांयी तरफ का दर्द का प्रभाव बांयी तरफ हो जाए तो रोग को ठीक करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का प्रयोग करते हैं, जबकि यदि रोगी को इन लक्षणों के साथ-साथ गर्म पानी पीने की इच्छा हो तो या ठण्डा पानी पीने की इच्छा न हो तो रोगी के रोग को लाइकोपोडिय औषधि से ठीक कर सकते हैं।
कारबोलिक एसिड से एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि की तुलना :- गले की बीमारी हो लेकिन अधिक असुविधा नहीं होती हो। गले के दांयी तरफ के टांसिलों में भूरे रंग के जख्म दिखाई दे रहे हो जिनमें से गाढ़ा तरल पदार्थ निकलता हो तो रोग को ठीक करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का प्रयोग करते हैं, जबकि यदि रोगी को इन लक्षणों के साथ-साथ टांसिलों में दर्द नहीं हो रहा हो तथा कुछ बुखार हो गया हो तथा गले के क्षेत्र में लाली फैल गई हो तो रोग का उपचार कारबोलिक औषधि से कर सकते हैं।
लैकेसिस औषधि से एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि की तुलना :- गले की बीमारी हो, लेकिन इसके साथ न ही अधिक असुविधा होती हो, गले के दांयी तरफ के टांसिलों में भूरे रंग के जख्म दिखाई दे रहे हो जिनमें से गाढ़ा तरल पदार्थ निकलता हो तो रोग को ठीक करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का प्रयोग करते हैं, लेकिन जब इन लक्षणों के होने के बावजूद यदि रोगी के टांसिलों के बांयी तरफ दर्द हो और ठण्डा पानी पीने की इच्छा हो, सोने के बाद लक्षण और बढ़ जाए, गले में दर्द हो रहा हो तथा कुछ निगलते समय बहुत अधिक परेशानी हो तो ऐसे रोग को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का उपयोग कर सकते है।
फाइटोलेक्का से एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि की तुलना :- गले की बीमारी हो, लेकिन इसके साथ न ही अधिक असुविधा होती हो, गले के दायी तरफ के टांसिलों में भूरे रंग के जख्म दिखाई दे रहे हो जिनमें से गाढ़ा तरल पदार्थ निकलता हो तो रोग को ठीक करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का प्रयोग करते हैं, लेकिन यदि इन लक्षणों के अलावा यदि रोगी के गले के अन्दर थूक या कुछ भी निगलते समय कानों में टीस की तरह दर्द महसूस हो रहा हो तथा गर्म पानी पीने से रोग और बढ़ता हो और कुछ न खाने के बावजूद गले से कान तक दर्द महसूस हो रहा हो तो ऐसी अवस्था में रोग को ठीक करने के लिए फाइटोलेक्का औषधि का प्रयोग कर सकते हैं।
नाइट्रिक एसिड से एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि की तुलना :-
गले की बीमारी हो, लेकिन इसके साथ न ही अधिक असुविधा होती हो, गले के दांयी तरफ के टांसिलों में भूरे रंग के जख्म दिखाई दे रहे हो जिनमें से गाढ़ा तरल पदार्थ निकलता हो तो रोग को ठीक करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का प्रयोग करते हैं, लेकिन इन लक्षणों के होने के साथ यदि रोगी के मुंह से अधिक लार निकलती हो तो रोग को ठीक करने के लिए नाइट्रिक एसिड का प्रयोग कर सकते हैं।
क्रोटेलस से एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि की तुलना :- गले की बीमारी हो, लेकिन इसके साथ न ही अधिक असुविधा होती हो, गले के दांयी तरफ के टांसिलों में भूरे रंग के जख्म दिखाई दे रहे हो जिनमें से गाढ़ा तरल पदार्थ निकलता हो तो रोग को ठीक करने के लिए एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि का प्रयोग करते हैं, लेकिन इसके अलावा यदि रोगी के गले के टांसिल में और गले के टांसिल और गले के अन्दर गैंग्रीन नामक रोग हो गया हो जिसके कारण वह स्थान सड़ रहा हो और रोगी को प्यास अधिक लगती हो तो रोगी के रोग को ठीक करने के लिए क्रोटेलस औषधि का प्रयोग कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
एलेन्थस ग्लैण्डुलोसा औषधि की एक से छठी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
आलेट्रिस फैरीनोसा (ALETRIS FARINOSA)
आलेट्रिस फैरीनोसा औषधि का प्रयोग अधिकतर स्त्रियों के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है। इस औषधि का उपयोग विशेषकर मासिकधर्म के समय रक्तस्राव (योनि से रक्त की कुछ मात्रा निकलना) के रोगों को ठीक करने के लिए जैसे- मासिकधर्म में अधिक रक्त का स्राव होना, गर्भपात होने के साथ रक्त का स्राव अधिक होना। स्त्रियों के गर्भाशय की बीमारी होने के साथ प्रदर रोग होना, कब्ज, पाचन शक्ति का कमजोर होना, भोजन करने के बाद पेट भारी सा महसूस होना आदि लक्षणों को ठीक करने के लिए इसका प्रयोग करना चाहिए।
किसी रोगी स्त्री को आधी रात के समय में अधिक मात्रा में रक्त का स्राव हो रहा हो और रक्त का स्राव इतना तेज हो कि रोगी स्त्री बताने में असमर्थ रहती हो, उसे खांसने, चलने तथा सोते समय अपने आप पेशाब निकल जाता है, ऐसे स्त्री रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आलेट्रिस फैरीनोसा औषधि की 45000 शक्ति की मात्रा देने से रोग ठीक हो जाता है।
आलेट्रिस फैरीनोसा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म नियमित समय से पहले तथा मासिकधर्म शुरू होने पर प्रसव जैसी पीड़ा (बच्चे को जन्म देते समय जो दर्द होता है) हो रहा हो और रक्त का स्राव रुक गया हो या कम मात्रा में हो। स्त्री को जरायु (बच्चे दानी) में भारीपन महसूस होती है। जरायुभ्रंश के साथ दायें स्तन के भाग (इंग्युइनल) में दर्द हो रहा हो। स्त्री को बहुत कमजोरी हो गई हो तथा शरीर में खून की कमी हो गई हो तथा गर्भपात होने की आशंका हो, गर्भावस्था के समय में पेशियों में दर्द हो, इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी स्त्री में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए आलेट्रिस फैरीनोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय तथा मलान्त्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री को भोजन में रुचि न हो, थोड़ा सा भोजन करने के बाद परेशानी महसूस हो, मलत्याग करने की शक्ति समाप्त हो गई हो जिसके कारण मलाशय में मल सम्पूर्ण रूप से भर जाता है। रोगी स्त्री का मल कठोर तथा लम्बा होता है जिसके कारण मलत्याग करने में बहुत अधिक परेशानी होती है तथा दर्द के साथ मलत्याग होता है। इस प्रकार के लक्षण हो तो रोगी स्त्री का उपचार करने के लिए आलेट्रिस फैरीनोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री की सोचने की शक्ति कमजोर हो गई हो तथा शरीर बहुत अधिक कमजोर हो गया हो तथा भ्रम की अवस्था अधिक हो उत्पन्न हो, मन किसी एक वस्तु पर एकाग्र नहीं हो रहा हो तथा बेहोशी के साथ चक्कर आ रहा हो तो ऐसे रोगी का उपचार आलेट्रिस फैरीनोसा औषधि से करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री को मासिकधर्म से संबन्धित कोई बीमारी हो तथा इसके साथ ही रोगी के मुंह से अत्यधिक झागदार लार निकल रहा हो तो ऐसे रोगी स्त्री का उपचार आलेट्रिस फैरीनोसा औषधि से करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
आलेट्रिस फैरीनोसा औषधि के कुछ गुणों की तुलना हेलोनियस, टेनासेटम, हाइड्रोस्टिस तथा चायना औषधियों से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
आलेट्रिस फैरीनोसा औषधि की अर्क से तीसरी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
अल्फाल्फा (ALFALAFA)
अल्फाल्फा औषधि का प्रभाव शरीर की संवेदी तंत्रिका पर विशिष्ट क्रिया के रूप में होता है तथा यह भूख और पाचन शक्ति को नियमित करता है, जिसके फलस्वरूप मानसिक व शारीरिक रोगों में बहुत अधिक सुधार हो जाता है। यह कई प्रकार के रोगों में उपयोगी है जो इस प्रकार हैं- स्नायु विकार, आमाशय के रोग, स्नायु में कमजोरी, अपच तथा अनिद्रा रोग आदि।
अल्फाल्फा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
स्तनपान से सम्बन्धित लक्षण :- अल्फाल्फा औषधि वसा बनाती है और ऊतकों को नष्ट होने से बचाती है। स्तनों में दूध की कमी हो जाने के रोग से पीड़ित स्त्री को यदि इसका सेवन कराया जाए तो उसकी दूध की गुणवत्ता तथा मात्रा बढ़ जाती है और दूध भी स्तन में बनने लगता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मूत्र संस्थान पर भी अल्फाल्फा औषधि का विशेष प्रभाव होता है जिसके फलस्वरूप मधुमेह रोग (डाइबेटीज इंसीपाइडेज) तथा मूत्र में फास्फेट आने के रोग ठीक हो जाते हैं। रोगी को पेशाब करने की इच्छा लगातार होती है तथा पेशाब में फास्फो-एसिड इडिकैन आता है। इस प्रकार के रोग को यह औषधि ठीक कर देती है।
पुर:स्थग्रन्थि से सम्बन्धित लक्षण :- जब पुर:स्थग्रन्थि बढ़ जाती है तो उस अवस्था में मूत्राशय की उत्तेजना को अल्फाल्फा औषधि कम करती है।
जोड़ों के दर्द से सम्बन्धित लक्षण :- अल्फाल्फा औषधि जोड़ों के दर्द को ठीक करने में बहुत अधिक उपयोगी है।
मन से सम्बन्धित लक्षण :- अल्फाल्फा औषधि मन में खुशियों का संचार करती है अर्थात रोगी इसके प्रयोग करने के बाद अपने आप को स्वस्थ्य महसूस करता है। रोगी का मन प्रसन्न तथा स्वच्छ हो जाता है और वह अपने आप को तरोताजा महसूस करता है। जिन व्यक्तियों में अधिक चिन्ता, सुस्ती, उदासी और चिड़चिड़ापन होता है तथा शाम के समय में इन लक्षणों में अधिक वृद्धि होती है, उन व्यक्तियों के इन लक्षणों को ठीक करने के लिए अल्फाल्फा औषधि का उपयोग बहुत लाभकारी है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर के पिछले भाग में, आंखों के अन्दर तथा सिर के ऊपरी भाग पर भारीपन महसूस होता है, इन लक्षणों में शाम के समय में और अधिक वृद्धि होती है। सिर के बायीं ओर तेज दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए अल्फाल्फा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को रात के समय में ऐसा महसूस होता है कि कान की नलियां बंद हो गई हैं तथा सुबह के समय में खुली हुई तथा फैली हुई महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों में अल्फाल्फा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सुबह के समय में नींद अच्छी आती है। लेकिन बाद में नींद सही नहीं आती है, शरीर में आलस्यपन अधिक रहता है। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में हैं तो इस औषधि के प्रभाव से रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है तथा रोगी के शरीर में स्फूर्ति आ जाती है तथा नींद भी सही आती है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक प्यास लगती है, भूख नहीं लगती है लेकिन कभी-कभी भूख इतनी बढ़ जाती है कि रोगी असाधारण मात्रा में खाने लगता है। कभी-कभी तो रोगी को भूख इतना लगता है कि वह भोजन करने के समय की प्रतीक्षा नहीं करता है और दोपहर से पहले ही भूख लग जाती है। रोगी भोजन में अनेकों प्रकार के दोश को निकालता रहता है तथा मीठी चीजें अधिक खाने की इच्छा करता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए अल्फाल्फा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- वायु बनने के कारण पेट फूलने लगता है, पेट में हवा इधर-उधर घूमती रहती है, भोजन करने के कई घंटे बाद बड़ी आंत में दर्द होना। रोगी जब मलत्याग करता है तो उसका मल पीले रंग का होता है तथा इसके साथ ही गुदाद्वार में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए अल्फाल्फा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- अल्फाल्फा औषधि के कुछ गुणों की तुलना डिपोडियम, पंक्टा, हाइड्रे, फोस्फो-एसिड़, जिंक, आवेना-सैटा औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
अल्फाल्फा औषधि की बड़ी मात्रा (अर्क की 5 से 10 बूंदें) दिन में कई बार देने से अच्छा परिणाम मिलता है जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाते हैं। अल्फाल्फा औषधि का उपयोग तब तक करते रहना चाहिए, जब तक शरीर में शक्ति नहीं आ जाती है।
एलियम सेपा Allium capa
एलियम सेपा औषधि प्याज के रस से बनाई जाती है। प्याज का रस आंख और मुंह में लगने से जुकाम के सारे लक्षण पैदा हो जाते हैं, ऐसे लक्षणों को ठीक करने के लिए इसका प्रयोग लाभकारी है।
एलियम सेपा औषधि में एक प्रकार की ऐसी उत्तेजना होती है जो आंख तथा नाक में रोगी की अवस्था पैदा करती है जिसके कारण छींके आने लगती हैं तथा आंखों से पानी गिरने लगता है। होमियोपैथिक के अनुसार यह नाक की सर्दी को ठीक करने की एक बहुत अच्छी औषधि है, लेकिन कुछ खास प्रकार के सर्दी जुकाम में ही यह औषधि क्रियाशील है।
एलियम सेपा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
जुकाम से सम्बन्धित लक्षण :- दर्द के साथ नाक से पानी निकलना तथा बार-बार छींके आने पर एलियम सेपा औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार के नाक से पानी बहने के कारण होंठ का ऊपरी भाग तथा नाक की खाल छिल सी जाती है। आंखों से भी बहुत पानी गिरता है लेकिन इस पानी से खाल नहीं छिलती है। इस प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए एलियम सेपा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सिर दर्द से सम्बन्धित लक्षण :- यदि सिर में दर्द शाम के समय में तथा कमरे के अन्दर रहने से बढ़ता हो और खुली हवा में जाने से कम हो रहा हो तो एलियम सेपा औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- सांस लेने की नली से बहुत अधिक श्लेष्मा(कफ) निकल रहा हो तथा वह भी सर्दी तथा जुकाम के कारण। जब रोगी खांसता है तो उस समय कफ निकलने के साथ-साथ गले से घुर-घुर की आवाज होती है। ऐसे रोग का उपचार करने के लिए एलियम सेपा औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों से बहुत अधिक आंसू निकलने लगता है तथा रोगी को ऐसा महसूस होता है कि आंख में कुछ कंकड़ गिर गया है और आंखों में जलन तथा ऐंठन हो रही है, लेकिन आंसुओं से आंखों में कोई जलन नहीं होती तथा आंसू निकलने के कारण आंखों में किसी भी प्रकार का दर्द नहीं होता है। रोगी को सिर में दर्द महसूस होता है। इसके साथ-साथ में जुकाम तथा सर्दी भी हो जाती है और गर्म कमरे में रहने तथा शाम के समय में दर्द अधिक बढ़ जाता है, लेकिन खुली हवा में रहने पर दर्द कम हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एलियम सेपा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
छोटे बच्चों से सम्बन्धित लक्षण :- यदि छोटे बच्चे को सर्दी तथा जुकाम हो गया हो तथा इसके साथ जुकाम की अवस्था बहुत अधिक बिगड़ गई हो तो वह सांस लेने वाली नली को बहुत अधिक प्रभावित कर देता है, गले में घर-घराहट पैदा हो जाती है तथा खांसी बहुत अधिक बढ़ जाती है, इस प्रकार के लक्षण बच्चे में हैं तो उसका उपचार करने के लिए एलियम सेपा औषधि का प्रयोग करना चाहिए, यह औषधि ऐसे लक्षणों को दूर करने में बहुत लाभकारी है।
मासिकधर्म से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म के समय में स्त्रियों के सिर में दर्द नहीं हो रहा हो तथा मासिकधर्म के समय के बाद रक्त का स्राव बंद हो जाने के बाद सिर में दर्द शुरू हो रहा हो तो इस प्रकार के लक्षण को दूर करने के लिए एलियम सेपा औषधि का प्रयोग बहुत लाभदायक है।
स्तन (वक्ष) से सम्बन्धित लक्षण :- सर्दी तथा जुकाम होने के साथ-साथ स्तन भी रोग ग्रस्त हो गया हो तथा खांसी के साथ बहुत अधिक कफ निकलता हो और घबराहट हो तो एलियम सेपा औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
मोच से सम्बन्धित लक्षण :- मोच आने या हडि्डयों के खिसकने पर दर्द अधिक हो रहा हो तो कच्चे प्याज तथा आंबा हल्दी के साथ एलियम सेपा औषधि को मिलाकर पट्टी करने से आराम मिलता है।
मूत्राशय तथा मूत्रपथ से सम्बन्धित लक्षण :- मूत्राशय और मूत्रमार्ग में अधिक कमजोरी महसूस होना, मूत्राशय पर अधिक दबाव पड़ने के साथ ही दर्द होना, सर्दी युक्त जुकाम होने के साथ-साथ बार-बार पेशाब आना तथा पेशाब करने में परेशानी महसूस होना। मूत्राशय में जलन और दबाव के होने के साथ लाल पेशाब होना। इस प्रकार के लक्षणों में एलियम सेपा औषधि का प्रयोग बहुत लाभकारी है।
पेट (उदर) से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में बहुत अधिक गड़गड़ाहट हो रही हो तथा अधिक गर्मी लग रही हो और इसके साथ सर्दी युक्त जुकाम हो गया हो, प्यास लग रही हो। इस प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए एलियम सेपा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :-
शरीर के कई अंगों में गरमी की लहरें महसूस हो रही हो तथा इसके साथ ही सर्दी युक्त जुकाम हो गया हो तो एलियम सेपा औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
रोगी के चेहरे, छाती, सिर और गर्दन की नसों में एक प्रकार का स्नायुविक (नाड़ियों का दर्द) दर्द होता है और रोगी महसूस करता है कि यह दर्द लम्बे समय तक बना रहेगा तो ऐसी स्थिति में रोगी को एलियम सेपा औषधि देना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जायेगा।
आपरेशन से सम्बन्धित लक्षण :-
आपेरशन की सहायता से प्रसव (बच्चे को जन्म देना) कराने के बाद जरायु (बच्चेदानी) की छिन्न-भिन्न नसों में और किसी अंग को काट डालने के बाद उसके टूटे नसों में जलन होना और दर्द (न्युरेलगिया ऑफ स्टम्प अफ्टर एमप्युशन) होने पर एलियम सेपा औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
प्रसव के बाद से सम्बन्धित लक्षण :-
बच्चे को जन्म देने के बाद स्त्री की अंगुलियों में कभी-कभी सूजन आ जाती है तथा बांह पर लाल लकीरें पड़ जाती हैं, यह एक प्रकार का फोड़ा बड़ा ही कष्टदायक होता है तथा इसके कारण रोगी स्त्री दिन-रात तड़पती रहती है, इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए एलियम सेपा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट दर्द से सम्बन्धित लक्षण :- पैर भीगकर ठण्डा पड़ गया हो, बहुत ज्यादा खाने, खीरा या कच्चे साग तथा आचार खाने, बवासीर से उत्पन्न, छोटे बच्चों के पेट में दर्द, बैठे रहने से दर्द होना और चलने फिरने से दर्द में कमी होना। इस प्रकार की अवस्था में एलियम सेपा औषधि का प्रयोग करना चाहिए क्योंकि ऐसी अवस्था को ठीक करने में यह औषधि लाभकारी है।
पैर से सम्बन्धित लक्षण :-
पैर में घाव या एड़ी में जूते की रगड़ से या अन्य किसी प्रकार की रगड़ लगकर घाव हो जाने पर एलियम सेपा औषधि का प्रयोग बहुत अधिक लाभदायक होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक के अन्दर की मांसपेशियों के अन्दर फुंसियां हो जाने पर एलियम सेपा औषधि बहुत ही उपयोगी है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
शाम के समय और गर्म कमरे में रहने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन-ह्रास) :-
खुली हवा में रहने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कुछ गुणों में एलियम सेपा औषधि की तुलना यूफ्रेशिया औषधि से कर सकते है, लेकिन आंसू निकलने की स्थिति में ठीक इसके विपरीत। भीगने के कारण हुए रोग में रस-टाक्स औषधि के साथ इसका सम्बन्ध है।
फास, पल्स और थूजा औषधि के साथ एलियम सेपा औषधि का पूरक सम्बन्ध है।
नाक के अन्दर फुंसिया (मांसार्बुद) होने पर कैल्केरिया और साइलीशिया औषधि के पहले एलियम सेपा औषधि उपयोगी है।
प्रतिविष :-
आर्निका, कमो, वेराट्रम।
दोषों को दूर करने वाला (प्रतिछेदक):-
एलियम सेपा औषधि के अधिक सेवन करने से उत्पन्न दोषों को दूर करने के लिए फास्फोरस, थूजा पल्सा औषधि का प्रयोग किया जाता है।
मात्रा :-
एलियम सेपा औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एलियम सैटाइवम (ALLIUM SATIVUM)
एलियम सैटाइवम औषधि की आंतों की श्लैष्मिक झिल्लियों पर प्रत्यक्ष रूप से क्रिया होती है जिसके फलस्वरूप आन्तों की कार्य करने की शक्ति बढ़ जाती है।
यदि किसी व्यक्ति को बृहदान्त्रशोथ (बड़ी आंत में सूजन होना) की बीमारी है और इसके साथ ही रोग की अवस्था विस्फोटक हो तो एलियम सैटाइवम औषधि की औषधि की 20 से 40 बूंदें पीएं तो 30 से 45 मिनट के अन्दर धमनी की रक्तदाब (अरटियल हाइपोटेशन) की अवस्था शुरु हो जाती है और रोग ठीक हो जाता है।
यदि किसी रोगी की पाचन शक्ति कमजोर हो गई हो तथा इसके साथ ही नजले का रोग भी हो गया हो तो उस व्यक्ति को एलियम सैटाइवम औषधि का सेवन करना चाहिए जिसके फलस्वरूप उसका रोग ठीक हो जाता है तथा उसकी पाचन शक्ति भी सही हो जाती है।
जो व्यक्ति अधिक मांस का सेवन करते हैं और पानी कम पीते हैं उन व्यक्तियों के लिए एलियम सैटाइवम औषधि अधिक लाभदायक है।
कटिलाम्बिका (प्सोस), कूल्हे में दर्द, पेशियों में दर्द और फेफड़ों के क्षय रोग को ठीक करने के लिए एलियम सैटाइवम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
खांसी बहुत तेज हो लेकिन बलगम नहीं आ रहा हो, शरीर का तापमान सामान्य हो तथा वजन अधिक बढ़ गया हो और नींद ठीक से नहीं आ रही हो तथा इसके साथ-साथ खूनी कफ निकल रहा हो। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एलियम सैटाइवम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
एलियम सैटाइवम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को जलन होने के साथ डकारें आ रही हो, भूख इतना तेज हो जैसे राक्षसी भूख, किसी चीज का परहेज न करने पर बहुत अधिक परेशानी हो रही हो, कब्ज के साथ अंतड़ियों में लगातार हल्का दर्द हो रहा हो तथा जीभ का रंग पीला पड़ गया हो और इसके साथ-साथ उस पर लाल-लाल रंग के दाने हो गऐ हो तो ऐसे लक्षणों वाले व्यक्ति का उपचार करने के लिए एलियम सैटाइवम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सांस लेने में पेरशानी हो रही हो तथा घड़घड़ाहट हो रही हो। जब रोगी बिस्तर से उठता है तो उस समय खांसी के साथ बलगम निकलता है, जो बहुत चिपचिपा और बदबूदार होता है। बलगम को बाहर फेकना कठिन हो जाता है। रोगी ठण्डी हवा सहन नहीं कर पाता है। श्वास नलियां फैल जाती हैं। रोगी को छाती में ऐसा दर्द होता है जैसे कि किसी ने उसके छाती में भाला घोंप दिया है। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एलियम सैटाइवम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों के स्तन में सूजन के साथ दर्द होता है। मासिकधर्म के समय में योनि तथा स्तनों और भग (वुल्वा) पर फुंसिया निकल आती हैं। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी स्त्री में हो तो उसका उपचार करने के लिए एलियम सैटाइवम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर भारी-भारी महसूस होता है, कनपटियों में कुछ टपकने जैसा महसूस होता है और नजले के कारण बहरापन का रोग हो जाता है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एलियम सैटाइवम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुख (मुंह) से सम्बन्धित लक्षण :- खाना खाने के बाद और रात के समय में मीठी लार मुंह से निकले, जीभ के ऊपर या कंठ के अन्दर बाल जैसी कोई चीज महसूस हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी की चिकित्सा करने के लिए एलियम सैटाइवम औषधि का प्रयोग करना चाहिए, इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है और उसका रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
एलियम सैटाइवम औषधि की तुलना कुछ औषधियों से कर सकते हैं जो इस प्रकार हैं-नक्स, कोलोसि, डिजि, इग्नेशिया, लाइको तथा ब्रायोनिया औषधि। इन औषधियों से एलियम सैटाइवम औषधि की तुलना इसलिए कर सकते हैं क्योंकि जो व्यक्ति मांसाहारी होते हैं, उन पर इसका असर अधिक होता है और शाकाहारी पर कम और इन औषधियों में भी ये गुण पाये जाते हैं। इसलिए शाकाहारी व्यक्ति की अपेक्षा मांसाहारियों के लिए एलियम सैटाइवम औषधि की उपयोगिता अधिक है।
सेनेगा, कैप्सिकम, आर्से, काली-नाइट्रि औषधि के कुछ गुणों के अनुसार भी एलियम सैटाइवम औषधि से तुलना कर सकते हैं।
पूरक :-
आर्सेनिक।
हानिकारक प्रभाव :-
एलियम सैटाइवा औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए लाइको औषधि का उपयोग किया जाता है।
मात्रा :-
एलियम सैटाइवम औषधि की तीसरी से छठी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। क्षय रोग को ठीक करने के लिए एलियम सैटाइवम औषधि की 4 से 6 ग्राम की मात्रा का प्रयोग करना चाहिए। जब घाव हल्का हो तो प्रतिदिन कई मात्राओं में बांटकर उपयोग करना चाहिए।
ऐलनस (ALNUS)
ऐलनस औषधि कई प्रकार के चर्म रोगों (ग्रेनडुलर एंलार्जमेंट) को ठीक करने तथा पाचक रस के अधिक स्राव होने से होने वाले अजीर्ण रोग को ठीक करने के काम आता है।
ऐलनस औषधि शरीर की पोषण क्रिया को तेज करती है तथा गण्डमाला से सम्बन्धित रोगों को ठीक करती है और ग्रन्थियों की दोषपूर्ण क्रिया को सही करती है। मुंह और कण्ठ के घावों पर भी ऐलनस औषधि का प्रभाव अधिक होता है जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
पीब वाली फुंसियों के कारण उंगलियों पर पपड़ी जम जाती है जिससे बदबू आती है और पाचक रस के अपूर्ण रूप से स्राव होने से होने वाले अजीर्ण रोग को ठीक करने में ऐलनस औषधि का बहुत लाभकारी प्रभाव होता है।
ऐलनस औषधि निम्नलिखित लक्षणों में उपयोगी हैं-
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- छाजन रोग (एक्जीमा), जहरीले फोड़े (र्हेपस), जबड़े के नीचे की ग्रंथियां बढ़ गई हो, विशेष प्रकार का चर्म रोग हो गया हो जिसमें रोगी के शरीर पर बैंगनी रंग के दाने निकलते हैं और उनमें से खून भी बहता रहता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर ऐलनस औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक हो सकता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
प्रदर रोग होने पर बच्चेदानी की मुख छिल जाती है, जिसके कारण रक्त का स्राव अधिक होने लगता है।
मासिकधर्म शुरु होने के साथ पीठ से लेकर जांघ तक के भागों में जलन के साथ दर्द होता है।
इस प्रकार के लक्षण यदि किसी स्त्री में हैं तो उसके लिए ऐलनस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
ऐलनस औषधि की अर्क से तीसरी शक्ति तक का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐलो साकोट्रिना (ALOE SOCOTRINA)
ऐलो साकोट्रिना कई प्रकार के बीमारियों को ठीक करने में बहुत ही उत्तम (अच्छा) औषधि है जो इस प्रकार है- पेचिश, बवासीर तथा दस्त। यदि रोगी किसी भी प्रकार से शारीरिक तथा मानसिक कार्यों को करने से थक जाता हो और मानसिक परिश्रम करने की इच्छा न हो और रोगी को कब्ज की शिकायत रहती हो और व्यक्ति परेशानियों के कारण झुंझलाया रहता हो। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी व्यक्ति में हो तो उसका उपचार ऐलो साकोट्रिना औषधि से करना चाहिए।
जब किसी औषधि का अधिक मात्रा में प्रयोग करने के कारण शारीरिक क्रियाओं का सन्तुलन बिगड़ गया हो तथा कोई रोग होने के कारण लक्षण और अधिक बिगड़ गया हो तो शरीर की क्रिया में दुबारा से सन्तुलन बनाने के लिए और रोग के लक्षणों को दूर करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए, इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने में ऐलो साकोट्रिना औषधि बहुत उपयोगी है।
यकृत के शिराओं की रक्त सन्तुलन संबन्धी रोगों के लक्षणों को दूर करने में ऐलो साकोट्रिना औषधि जितना अधिक उपयोगी है उतना और कोई औषधि उपयोगी नहीं है, चाहे वे रोग की प्रारिम्भक अवस्था ही क्यों न हो।
बहुत कमजोर व्यक्तियों, बूढ़ों तथा जिन व्यक्तियों में कफ अधिक बनता हो या शराबी व्यक्तियों के रोगों को ठीक करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि बहुत उपयोगी है।
ऐलो साकोट्रिना औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
दस्त (डाइरिया) से सम्बन्धित लक्षण - रोगी को सुबह के समय में खाने और पीने के तुरन्त बाद ही पाखाने को दौड़ना तथा पेट में मरोड़ हो रहा हो और रोगी को यह महसूस हो रहा हो कि जल्दी मलत्याग नहीं किया तो कपड़े खराब हो जायेंगे। इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी को ऐलो साकोट्रिना औषधि का खुराक देना चाहिए।
पेचिश (आंव) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पीले रंग का पतला या चमकीला आंव मिला हुआ पाखाना होता है, रोगी का मलद्वार इतना ठण्डा हो जाता है कि कभी-कभी थोड़ा सा मल जब तक पूरे तौर से बाहर निकल नहीं आता, तब तक रोगी को कुछ भी पता नहीं चलता है। रोगी को पेशाब करते या मलद्वार से हवा निकलते समय मलत्याग (मलद्वार से मल निकलना) हो जाता है। रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसका मलद्वार पतले तथा भारी पदार्थों से भरा हुआ है और वह बहुत जल्दी ही निकल पड़ेगा और वास्तव में ऐसा हो भी जाता है। रोग व्यक्ति को मलत्याग करने से पहले पेट में अधिक गड़गड़ाहट होता है, रोगी को अपना नीचे का पेट अधिक भारी महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
यकृत तथा कामला (पीलिया) रोग से सम्बन्धित लक्षण :- पुराने यकृत के रोगों तथा पीलिया रोग में पित्त अधिक बढ़ गया हो, और जीभ पर मैल जम गई हो, मुंह से बदबू आ रही हो तथा इसके साथ ही बुखार तथा यकृत प्रदेश में भारीपन महसूस हो रहा हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
छोटे बच्चे से सम्बन्धित लक्षण :- छोटे बच्चे को जन्म से ही कब्ज की शिकायत हो, मलत्याग कराने पर या बैठाने पर वह अधिक रोना पीटना शुरू कर देता हो और कितना भी कोशिश करें मलत्याग नहीं होता है, लेकिन बिस्तर पर उसका मल अपने आप निकल जाता हो और इसका पता भी न लग पा रहा हो कि उसका मलत्याग कब हुआ है, इस प्रकार के लक्षण यदि पीड़ित बच्चे में हैं तो उसका उपचार करने के लिए 200 शक्ति का ऐलो साकोट्रिना औषधि उसे देना चाहिए।
बवासीर से सम्बन्धित लक्षण :- मलत्याग करते समय रोगी के मलद्वार के पास अंगूर के गुच्छे की तरह मस्सें बारह निकल आते हो, मस्सों पर ठण्डे पानी डालने से दर्द से कुछ आराम मिलता हो, मस्से का रंग नीला हो, मस्सों से खून निकल रहा हो और खुजली मच रही हो, रोगी को मलद्वार की खुजली और जलन के कारण नींद नहीं आ रही हो तो इस प्रकार के लक्षण में रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
जरायु (गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली) का अपने स्थान से हट जाना तथा इसके साथ ही नीचे का पेट और मलद्वार में भारीपन महसूस हो रहा हो तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित स्त्री का उपचार करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
किसी स्त्री रोगी को मलान्त्र के नीचे की ओर दबाव महसूस हो रहा हो, जो खड़े रहने तथा मासिकधर्म के समय में यह दबाव और अधिक बढ़ जाता हो, गर्भाशय में भारीपन महसूस हो रहा हो, चलने-फिरने में परेशानी महसूस हो रही हो, कमर में अधिक दर्द तथा दर्द इस प्रकार का महसूस हो रहा हो कि जैसे कि जब कोई स्त्री बच्चे को जन्म देती है और उस समय जो दर्द होता है ठीक उस प्रकार का दर्द, दर्द का असर टांगों तक हो जाता हो, इस प्रकार के लक्षणों में ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सांस से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ठण्ड लगने के साथ खांसी हो जाती है तथा खुजली भी होती है, सांस लेने में परेशानी महसूस होती है तथा इसके साथ यकृत से छाती तक सुई चुभने जैसा दर्द हो रहा हो तो ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग लाभदायक है जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कमर में दर्द होता है तथा हिलने-डुलने से दर्द बढ़ जाता है। त्रिकास्थि (सेक्रम) प्रदेश के आस-पास सुई के चुभने जैसा दर्द महसूस होता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :-
सिर में दर्द होना, कमर में दर्द तथा इसके साथ आंतों और जरायु (गर्भाशय) से सम्बन्धित रोग होना।
रोगी मानसिक परिश्रम न करना चाहता हो, माथे (मस्तिष्क) के ऊपर हल्का-हल्का दर्द होने के साथ आंखों में भारीपन महसूस हो रहा हो, आंखों को बंद रखने का मन कर रहा हो, मलत्याग (शौच क्रिया) करने के बाद सिर में दर्द होना, तथा मलत्याग करते समय दबाव युक्त दर्द होना और गर्मी महसूस होना।
इस प्रकार के सिर से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसे एलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द होता रहता है तथा इसके साथ ही रोगी को आंखें भींचने पड़ती है, आंखों के आगे चिंगारियां उड़ती हुई दिखाई देती हैं, आंखें लाल होने के साथ पीली दृष्टि हो गई हो तथा नेत्रकोटरों की गहराई में दर्द हो रहा हो। ऐसे लक्षणों में ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कुछ खाते समय कान में कड़कड़ाहट सी आवाज सुनाई देती हो, बायें कान में सहसा धमाका और टकराने की आवाज सुनाई दे रही हो, सिर के किसी भाग में गोल धातु की टक्कर की कंपन महसूस हो रही हो। इस प्रकार के लक्षणों में ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को नाक पर बहुत अधिक ठण्डी महसूस होती है तथा सुबह के समय में जागने पर नाक से खून निकल रहा हो ऐसे लक्षणों में ऐलो साकोट्रिना औषधि से करना चाहिए।
मुख (मुंह) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मुंह का स्वाद कड़वा और खट्टा लगने लगता है, रोगी को डकारें आने लगती है और होठ फट जाता है तथा सूख जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को उपचार करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
कण्ठ (गला) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को गले में ऐसा लगता है कि कफ जम गया है, ग्रसनी (फेरींक्स) की शिरायें फूल जाती है, रोगी को गले में ठण्ड तथा खुरचन सी महसूस होती है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को मांस खाने की इच्छा नहीं होती है बल्कि उसे रसीली चीजें खाने की इच्छा होती है। खाना खाने के बाद पेट में गैस बन रहा हो, मलाशय में जलन हो रही हो। रोगी को मिचली हो रही हो तथा सिर में दर्द हो रहा हो, चलने पर कदम इधर-उधर पड़ रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- नाभि के आस-पास दर्द हो रहा हो तथा दबाव महसूस हो रहा हो, यकृत प्रदेश में भी जलन महसूस हो रही हो, दाईं पसलियों के नीचे दर्द हो रहा हो। पेट भरा, भारी, फूला तथा फैला सा महसूस हो रहा हो। नाभि के आस-पास जलन तथा दर्द हो रहा हो। अधिक कमजोरी महसूस होने के साथ ही दस्त हो गया हो। पेट के अन्दर हवा भर जाना, पेट के नीचे की ओर दबाव महसूस होना तथा आंतों में दर्द होना, मलत्याग करने की इच्छा बार-बार होना और मलत्याग करते समय पेट में दर्द होना तथा जलन और वायु के साथ मल निकलना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मलान्त्र से सम्बन्धित लक्षण :- मलान्त्र में लगातार नीचे की ओर दबाव महसूस होना, मलद्वार से रक्तस्राव (खून बहना), दर्द होना, जलन होना, मलद्वार पर ठण्डे पानी की छींटे मारने से आराम मिलता हो, रोगी को यह निश्चित नहीं होता है कि मलद्वार से कब हवा निकल जाएगा तथा मल निकल जाएगा, कोशिश किए बिना ही या अनजाने में ही मलत्याग हो जाता है, मल ढेलेदार या पानी की तरह होता है, मलत्याग करने में अधिक जलन तथा दर्द महसूस होना। बवासीर के मस्से नीले रंग के होते हैं जिससे मलद्वार पर अधिक दर्द तथा जलन होती है तथा खून की कुछ बूंदें भी निकलती है, मलद्वार पर पानी की छीटें मारने से कुछ आराम मिलता है। रोगी को कब्ज की शिकायत हो तथा पेट के निचले भाग में भारी दबाव महसूस होता हो तथा वियर पीने से दस्त लग जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र (पेशाब) से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब का अपने आप निकल जाना, मूत्राशय में नीचे की ओर दबाव महसूस होता हो, पुर:स्थग्रन्थि अधिक बढ़ी हुई हो, पेशाब कम मात्रा में गहरे रंग का होता हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंगों में खुजली महसूस हो रही हो, जोड़ों में खिंचाव तथा दर्द हो रहा हो, चलते समय पैरों के तलुवों में दर्द हो रहा हो तो ऐसे लक्षणो से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए ऐलो साकोट्रिना औषधि बहुत अधिक लाभकारी है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
ऐमोन-म्यूर, नक्स-वोम, गैम्ब तथा पाडो औषधि से ऐलो साकोट्रिना औषधि में कुछ समान गुण पाये जाते हैं।
मलद्वार से हवा निकलने के साथ मल निकल पड़ना ओलियेन्डर, म्यूरियेटिक ऐसिड और नेट्राम-म्यूर औषधि में भी है अत: इन औषधियों से ऐलो साकोट्रिना औषधि की तुलना कर सकते हैं। लेकिन अन्तर यह है कि ओलियेन्डर औषधि का तब प्रयोग किया जाता है, जब पहले दिन का खाया हुआ खाना मल के साथ निकलता हो या बच्चों के पुराने दस्तों की बीमारी में सुबह के समय में बिस्तर खराब हो जाता हो और म्यूरियेटिक ऐसिड औषधि को प्रयोग तब किया जाता है जब रोगी को पेशाब करते समय ही मल निकल पड़े। नेट्रम-म्यूर औषधि का प्रयोग तब किया जाता है, जब रोगी का मुंह खुश्क, प्यास और बुखार के साथ पुराने दस्तों की बीमारी में हवा मलद्वार से निकलता हो तथा इसके साथ मल निकल पड़ने की आशंका होती हो।
पेट के रोगों को ठीक करने में सल्फर औषधि के समान गुण ही ऐलो साकोट्रिना औषधि में पाया जाता है।
पोडोफाइलम औषधि से ऐलो साकोट्रिना औषधि की तुलना कर सकते हैं क्योंकि दोनों ही औषधि में दस्त के रोग को ठीक करने की शक्ति होती है। फिर भी दोनों औषधियों में काफी अन्तर होता है। दोनों औषधियों का प्रयोग उन रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है जिनमें रोग गर्म मौसम में बढ़ती है तथा सुबह के समय में लक्षण अधिक मुख से सम्बन्धित अधिक होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
सुबह के समय में, शारीरिक परिश्रम न करने, गर्म खुश्क मौसम होने, खाने और पीने के बाद तथा खड़े रहने या चलने से रोगी के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
ठण्डे पानी से, ठण्डे मौसम में, हवा और मलत्याग करने से रोग के लक्षण नष्ट होते हैं।
मात्रा (डोज) :-
ऐलो साकोट्रिना औषधि की छठी से उच्च शक्तियां का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। मलाशय सम्बन्धी लक्षणों में तीसरी शक्ति की कुछ मात्रायें देकर परिणाम की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
एलूमेन (Alumen)
एलूमेन औषधि का प्रयोग होम्योपैथिक चिकित्सा में आंत्र से संबन्धित रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है जो इस प्रकार है- असाध्य कब्ज (ओबसीनेट कोंस्टीपेशन), आंतों के ज्वर (टाइफाइड), आन्तों से होने वाला रक्तस्राव (खून का बहना) जो शरीर के कई भागों की पेशियों की लकवा से सम्बन्धित कमजोरी होती है (पाराट्लीटिक वीकनेस)।
टायफाइड का बुखार होने के कारण आंतों से बहुत अधिक खून बहता है तथा मलान्त्र के रास्ते से मल के साथ काले खून के थक्के गिरने लगते हैं तो ऐसे रोग को ठीक करने में एलूमेन औषधि बहुत अधिक उपयोगी है।
मलान्त्र, जीभ, जरायु (गर्भाशय) के ऊतकों की कठोरता और ऐसे घाव जिनका तल कठोर होता है, नजला तथा जुकाम होने के साथ सांस लेने में परेशानी हो रही हो। इस प्रकार के लक्षण अधिकतर बूढ़े व्यक्तियों में अधिक देखने को मिलती है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए एलूमेन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
रोगी को खुश्की तथा सिकुड़न महसूस होती है, कई मानसिक परेशानियां होने के कारण लकवा जैसा लक्षण देखने को मिलता हो, तरल पदार्थ (द्रव्य पदार्थ) को निगलने में परेशानी होती हो, जीभ का भाग अधिक कठोर लग रहा हो तो ऐसे रोगी का उपचार करने में एलूमेन औषधि बहुत ही उपयोगी है।
एलूमेन औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सिर में जलन होने के साथ दर्द हो रहा हो, ऐसा महसूस हो रहा हो कि जैसे उसके सिर कोई बोझा (गठर) रखा हुआ है तथा हाथ का दबाव सिर पर देने से आराम मिलता हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एलूमेन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले का ऊपरी भाग लाल और सूजी हुई लगती है तथा कंठ ढीला-ढीला सा लगता है, गले के अन्दर गुदगुदाहट और ठण्डक महसूस होती है, गलतुण्डिकायें (टॉसिलस) बढ़ी हुई और कठोर हो जाती है, ग्रासनली (भोजननली) में नीचे की ओर जलन और दर्द होता है। जरा सी ठण्ड लगते ही गला खराब हो जाता है और बोलने में परेशानी होने लगती है, ग्रासनली (भोजननली) सिकुड़ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग का उपचार करने के लिए एलूमेन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- दायीं करवट करके लेटने से हृदय की धड़कन बढ़ जाती है तो रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एलूमेन औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मलान्त्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक कब्ज की शिकायत हो गई हो, कई दिनों तक मलत्याग करने की इच्छा न हो, कई रोगियों में तो मलत्याग करने की इच्छा होती है लेकिन जोर लगाने के बावजूद भी मलत्याग नहीं हो पाता। जब मल त्याग होता भी है तो ऐसे मल अधिक कठोर पिण्ड की तरह होता है, मलान्त्र अधिक भारी सा लगता है। मलत्याग करने के बाद खुजली होती है और बहुत लम्बे समय तक दर्द और चीसे मचती है और मलद्वार पर बवासीर के मस्से भी हो गए हो। आन्तों में से रक्तस्राव हो रहा हो, मल छोटे बच्चे के मल जैसा पीला हो रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एलूमेन औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
जरायुग्रीवा (नेक ऑफ युटैरस.बच्चेदानी का ऊपरी मुंह) तथा स्तन ग्रन्थियां (मैमरी ग्लैंड) अधिक कठोर हो गई हो। योनि से पीला स्राव (पीले रंग का तरल पदार्थ बहना) हो रहा हो तथा यह बीमारी बहुत अधिक पुरानी हो।
पुराना सुजाक रोग होने के साथ पीला स्राव हो रहा हो तथा इसके साथ ही सारे मूत्रमार्ग में छोटी-छोटी गांठें पड़ गई हो।
योनि में छालेदार चकत्ते पड़ गए हो तथा मासिकधर्म शुरु होने पर स्राव (बहना) पानी की तरह हो रहा हो।
इस प्रकार के स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एलूमेन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सांस से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को छाती में अधिक कमजोरी महसूस हो रही हो, खांसने पर बलगम का निकलना अधिक कठिन हो रहा हो। बूढे व्यक्तियों में सुबह के समय में खांसने पर रेशेदार बलगम निकल रहा हो तथा दमा की शिकायत हो, इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एलूमेन औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
ऐसे घाव (अल्सर) जिनका तल कठोर हो, और घाव के आस-पास का भाग फूल गया हो तथा उनसे खून निकल रहा हो। वह घाव जो बहुत पुराना हो तथा उसमें जलन हो रही हो तथा वह कठोर हो गया हो।
प्रजनन अंग तथा वृषणकोष (अण्डाशय) और लिंग के पिछले भाग पर छाजन रोग हो गया हो।
इस प्रकार के चर्म से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एलूमेन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंग तथा पेशियां कमजोर हो गई हो तथा विशेषरूप से टांगों की पेशियां कमजोर हो गई हो और कई अंगों के चारों ओर सिकुड़न महसूस हो रही हो तो ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए एलूमेन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
सिर दर्द के लक्षण को छोड़कर सभी लक्षणों में ठण्ड के कारण वृद्धि होती है।
मात्रा (डोज) :-
एलूमेन औषधि की पहली से तीसवी शक्ति का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। इस औषधि की शक्तियां गुणकारी सिद्ध हुई है। यदि 10 ग्रेन फिटकरी के चूर्ण को जीभ पर रख दिया जाए तो दमा का प्रकोप ठीक होने लगता है।
ऐलूमिना (Alumina)
ऐलूमिना औषधि का उपयोग अधिकतर पुराने रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है। शरीर के किसी भी लकवा रोग के कारण आई कमजोरी को दूर करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए, इससे रोगी की कमजोरी दूर होती है तथा रोगी के शरीर को ताकत मिलती है।
हाथी पांव रोग होने के कारण पैर बहुत अधिक कमजोर हो जाता है और इस कमजोरी के प्रभाव के कारण मलद्वार (रेक्टुम) और मूत्राशय (ब्लेडर) तथा रोगी को हर एक अंग में ठण्डक महसूस होती है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शारीरिक कार्य करने में अधिक कमजोरी महसूस होना, भारीपन तथा सुन्नपन महसूस होना तथा रोगी को चलने में लड़खड़ाहट महसूस होती है और रोगी को कब्ज की शिकायत हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि लाभकारी है।
अधिक कमजोर व्यक्ति या रूखे स्वभाव वाले दुबले-पतले व्यक्तियों के सिर में ठण्ड लग जाने तथा डकारें आने का स्वभाव हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि लाभदायक है।
बच्चा सुबह को जब सो कर उठता है तो घबराया हुआ सा लगता है, उसे घर की सब चीजें अपरिचित सी मालूम होती है, ऐसे बच्चे का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि उपयोगी है।
चेहरे पर मकड़ी के जाले की तरह कुछ लिपटा हुआ मालूम पड़ने लगता है और रोगी का हाथ पकड़ने पर वह बार-बार हाथ छुड़ाने की कोशिश करता है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि लाभदायक है।
ऐलूमिना औषधि निम्नलिखित लक्षणों में उपयोगी हैं-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- उत्साह में कमी, अधिक डर लगना, व्यक्तिगत एकरूपता (पर्सनल इण्डेडीफिकेशन) के प्रति अधिक भ्रम में पड़े रहना आदि समस्या से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इस प्रकार का रोगी कोई भी कार्य करने में जल्दबाजी करता है और उसे ऐसा महसूस होता है कि समय धीरे-धीरे व्यतीत हो रहा है। रोगी परिवर्तनशील स्वभाव का होता है, वैसे रोगी को कभी-कभी आराम महसूस होता है। रोग व्यक्ति चाकू या खून को देखकर आत्महत्या करने की कोशिश करता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में सुई चुभने जैसा दर्द होता है तथा यह दर्द सुबह के समय में अधिक होता है, लेकिन जब रोगी खाना खा लेता है तो उसे कुछ हद तक आराम मिलता है। रोगी के माथे पर दबाव महसूस होता है और ऐसा लगता है कि जैसे तंग टोपी पहन रखी हो। सिर में चक्कर आता है, मिचली होती है, रोगी को सुबह के समय में नाश्ता करने के बाद आराम मिलता है, रोगी का बाल झड़ता है, खोपड़ी में खुजली होती है और सिर में सुन्नपन महसूस होता है, इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को प्रत्येक वस्तु पीली दिखाई देती है, आंखों में ठण्डक महसूस होती है, पलकें, खुश्क, जलती हुई, चीस मारती हुई और मोटी हो जाती है तथा रोगी को सुबह के समय में और भी अधिक परेशानी होती है। आंखों में कोई पुराना रोग हो (क्रोनिक कनजंक्टीवीटीज), वत्र्यपात (प्टोसीस) तथा दृष्टिदोष (स्ट्राबिस्मस) रोग होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कानों में गरजने जैसी आवाज सुनाई देती है तथा रोगी अपने आप से बाते करता रहता है और बड़बड़ाता रहता है और रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसके कान में कोई चीज फंस गई है तथा रोगी के शरीर के कई अंगों में बहुत अधिक कमजोरी हो जाती है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :-
नाक की नलियों में दर्द होता है, रोगी को कुछ न कुछ बदबू महसूस होती है और जुकाम हो जाता है तथा नाक से कफ बहता रहता है, नथुने पर दर्द होता है, नाक के ऊपर का भाग लाल हो जाता है, नाक की अन्दरूनी हिस्से में पपड़ी जम जाती है। नथुने के पास दाद जैसी लाली पड़ जाती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पुराना रोग (ओजिमा) जिसमें नाक की श्लैष्मिक झिल्लियां सूख जाती हैं तथा झिल्लियां फैली हुई और चिपचिपी रहती हैं। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अपने चेहरे पर ऐसा महसूस होता है कि उस पर अनार जैसा कोई पदार्थ सूख गया है। खूनी फोड़े और फुन्सियां, निचले जबड़े में ऐंठन सी होती है। खाना खाने के बाद चेहरे की ओर खून का दबाव अधिक हो जाता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मुंह से बदबू आती है तथा दर्द होता है। दांतों पर मैल जमी रहती है, मसूढ़ों में जलन होती है और उनमें से खून निकलता रहता है। मुंह खोलते समय या किसी चीज को चबाते समय जबड़ों के जोड़ों पर तेज दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि बहुत उपयोगी है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को अपने गले के अन्दरूनी भाग में जलन, खुश्की महसूस होती है तथा खाना को निगलने में परेशानी होती है, भोजन नली सिकुड़ जाती है।
रोगी को लगता है कि उसके गले के अन्दर कोई कांटा या कोई ठोस चुभने वाली चीज फंस गई है, रोगी का चेहरा झुलसा हुआ तथा चिकना लगता है।
अधिक दुबले-पतले व्यक्तियों के गले में जलन होना, नाक के पिछले भाग से गाढ़ा, चिपचिपा कफ बहना तथा लगातार गला साफ करने की कोशिश करना।
इस प्रकार के कण्ठ (गला) से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि बहुत उपयोगी है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बहुत अधिक लकड़ी का कोयला, खल, मिट्टी, सूखे खाद्य पदार्थ, चाय की पत्ती खाने की आदत पड़ जाती है, हृदय में जलन होती है, सिकुड़न महसूस होती है और मांस से बहुत अधिक घृणा होती है, आलू हजम नहीं होता है, कुछ भी खाने की इच्छा नहीं होती, ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी खाने को निगल तो सकता है, लेकिन एक समय में छोटे-छोटे खाद्य पदार्थों के अलावा और कुछ नहीं खा पाता और उसके भोजन नली में सिकुड़न होती रहती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पेट में दर्द होता है तथा इसके साथ-साथ दोनों जांघों से जननांगों की ओर दबाव अधिक महसूस होता है और बाईं ओर पेट में दर्द होता है। ऐसे रोगी का उपचार ऐलूमिना औषधि से करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को सूखा, कठोर, गठीला मलत्याग होता है तथा रोगी को मलत्याग (शौच क्रिया) करने की इच्छा नहीं होती है, मलद्वार में जलन तथा दर्द होता रहता है और मलद्वार से खून भी बहता रहता है, मलद्वार में खुजली तथा जलन होती है, कोमल मल भी परेशानी के साथ मलद्वार से बाहर निकलता है, शौच क्रिया करने में बहुत जोर लगाना पड़ती है।
छोटे बच्चे को होने वाला कब्ज रोग तथा उनके मलद्वार में खुजली तथा जलन होना।
बूढ़े व्यक्तियों को कब्ज की शिकायत तथा मलत्याग करने में अधिक परेशानी, और उनके मलद्वार में जलन तथा खुजली मचना।
स्त्रियों को कब्ज की शिकायत तथा इसके साथ-साथ उन्हें शौच क्रिया करने में परेशानी होती हो और उनके मलद्वार पर जलन तथा खुजली होती रहती है।
रोगी को पेशाब करते-करते दस्त लग जाते हैं, मलत्याग करने से बहुत समय पहले ही उसके पेट में दर्द होने लगता है तथा इसके साथ उसे कब्ज की शिकायत भी रहती है और मलत्याग के समय बहुत जोर लगाना पड़ता हैं।
इस प्रकार के मल से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी के मूत्राशय में पक्षाघात (लकवा) का प्रभाव हो जाता है जिसके कारण रोगी को पेशाब करने में बहुत अधिक जोर लगाना पड़ता है।
रोगी के वृक्कों (गुर्दे) में दर्द होने के साथ अधिक भ्रम (मेंटल कनफ्युशन) महसूस हो रहा हो।
बूढ़े व्यक्तियों में पेशाब करने की इच्छा बहुत अधिक हो और पेशाब करने में बहुत अधिक परेशानी होती है।
इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को संभोग करने की इच्छा बिल्कुल नहीं हो, सैक्स के प्रति अधिक कमजोरी आ गई हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
जब रोगी मलत्याग करने के लिए जोर लगाता है तो उसका अपने आप ही वीर्यपात हो जाता है, ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोगी का यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है तथा उसके शरीर में ताकत भी बढ़ने लगती है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री का मासिकधर्म नियमित समय से पहले होता है तथा वह भी कुछ समय के लिए और बहुत कम मात्रा में, स्राव का रंग पीला होता है तथा रोगी स्त्री को बहुत अधिक कमजोरी महसूस होती है, रोगी स्त्री को प्रदर रोग हो जाता है तथा स्राव होने पर तीखा दर्द होता है और स्राव कम मात्रा में होता है, स्राव पारदर्शक (ट्रंसपैरेंट), रेशेदार होता है तथा इसके साथ-साथ बहुत अधिक जलन और दर्द होता है, इस प्रकार के लक्षणों में मसिकधर्म बंद होने के बाद बहुत अधिक परेशानी होती है, जब रोगी स्त्री अपने योनि को ठण्डे पानी से धोती है तो उसे कुछ आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सुबह जागते ही खांसी होने लगती है, गले में ऐसा लगता है कि कुछ चीज फंसी हुई है, गला बैठा हुआ लगता है, गले के अन्दर गुदगुदाहट महसूस होती है। रोगी जब सांस लेता है तो सांय-सांय आवाज महसूस होती है तथा खड़खड़ाहट युक्त सांस महसूस होती है, जब रोगी सुबह के समय में बातचीत करता है तो उस समय खांसी तेज हो जाती है, छाती में दबाव तथा दर्द महसूस होता है और मीठा खाने की इच्छा होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी जब किसी से बातचीत करता है तो उसके छाती में दर्द और बढ़ने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पीठ पर सुई जैसी चुभन होती है तथा दर्द भी होता है और ऐसा लगता है जैसे पीठ पर किसी धारदार चीज से खरोंच लग गई है या कोई गर्म लोहा रख दिया गया है, रीढ़ की हड्डी पर दर्द होता है तथा लकवा रोग का कुछ प्रभाव पीठ पर नज़र आने लगता है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अपनी भुजाओं तथा उंगलियों में ऐसा दर्द महसूस होता है कि जैसे उन्हें किसी गरम लोहे से छेदा जा रहा हो या भुजाओं पर लकवा मार गया हो, टांगें सोई हुई महसूस होती है, वह भी विशेश रूप से उस समय जब टांग के ऊपर जब दूसरी टांग रखी गई हो, रोगी चलने-फिरने में लड़खड़ाने लगता है, एड़ियां सुन्न पड़ जाती हैं, रोग के तलुवों में दर्द होता है, रोगी को चलते समय अपने तलुवे कोमल और सूजे हुए लगते हैं, कंधे तथा भुजा के ऊपर वाले भाग में दर्द होता हैं, हाथ के उंगलियों में नाखूनों के अन्दर काटता हुआ दर्द होता है। नाखून का ऊपर का भाग उभर जाता है, मेरूदण्ड तथा अन्य अंगों में लकवा रोग का प्रभाव देखने को मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि का असर लाभदायक है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंगों में लकवा का प्रभाव होता है तथा इसके साथ रोगी को बहुत अधिक बेचैनी महसूस होती है, रोगी को भ्रम पैदा करने वाले सपने आते हैं और रोगी को सुबह के समय में नींद अधिक आती है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की त्वचा फटी-फटी सी लगती है, त्वचा पर दर्द तथा जलन होता है, नाखून का भाग भुरभुरा हो जाता है, रोगी को बिस्तर की गर्मी के कारण खुजली होती है, रोगी तब तक खुजाता जाता है जब तक की त्वचा से खून नहीं निकल जाता, इसके बाद रोगी को बहुत अधिक जलन तथा दर्द होता है, हाथ की उंगलियों की त्वचा भुरभुरी हो जाती है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि का उपयोग किया जा सकता है।
पुराना जुकाम रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी बहुत अधिक दुबला तथा पतला होता है और उसके नाक से हर वक्त कफ जैसा पदार्थ बहता रहता है, उसके शरीर के कई भागों में लकवा का प्रभाव होता है, ऐसे रोगी का उपचार ऐलूमिना औषधि से किया जा सकता है, ऐसे रोगी को रात के समय में बहुत देर तक परेशानी होती है, उसे सूखी खांसी भी आती है और खांसते-खांसते उल्टी हो जाती है और उसका दम घुटने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐलूमिना औषधि का उपयोग किया जा सकता है।
लोकोमोटर ऐटैक्सिया (लोकोमोटर ऐटैक्सिया) से सम्बन्धित लक्षण :- यह एक प्रकार का ऐसा लकवा (पक्षाघात) रोग है जिसमें रोगी अपनी दोनों टांगों में अधिक भारीपन महसूस करता है, चलते समय मतवाले की तरह डगमगाता है और बैठ जाने को मजबूर हो जाता है, दोनों पैरों को घसीट कर चलना पड़ता है, रोगी रात के समय चल नहीं सकता, आंखें बंद करके नहीं चल सकता, चलते समय एड़ियों में झनझनाहट होने लगती है, टांगे सुन्न पड़ जाती हैं, अधिक थकावट महसूस होती है और शरीर में अधिक कमजोरी महसूस होती है। रोगी के कमर में दर्द होता है, रोगी को ऐसा महसूस होता है कि रीढ़ के अन्दर एक गर्म लोहे की सींक चलाई जा रही है। गठिया बाय के रोगी में इस प्रकार के लकवा का प्रभाव भी देखने को मिल सकता है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि बहुत उपयोगी है।
वृद्धि (एमेलिओरेशन) :-
रोगी को समय-समय पर तथा दोपहर के बाद, आलू खाने से, गरम कमरे में रहने तथा सुबह के समय में जागने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
ठण्डे पानी से स्नान करने, खुली हवा में रहने, शाम के समय तथा एक दिन छोड़कर और नमीदार मौसम में रहने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं और रोग का प्रभाव कम हो जाता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
मलद्वार की खुजली, बवासीर, कब्ज तथा पेट में हवा भरना आदि रोग को ठीक करने में ऐलूमिना औषधि की तुलना स्लैग सिलिको-सल्फोकेल्साइट आफ एलूमिना 3x औषधि से कर सकते हैं।
रोगी के मलद्वार तक सख्त मल निकलकर फिर अन्दर चला जाता है, उंगुली आदि की सहायता के बिना बाहर निकल नहीं पाता। ऐसे लक्षण होने पर साइलीशिया औषधि का प्रयोग किया जाता है, लेकिन यदि रोगी का मल कभी-कभी गीला भी होता है और फिर भी मलत्याग करने में जोर लगाना पड़ रहा हो फिर भी मल नहीं निकल रहा हो तो ऐसे रोगी के रोग का उपचार करने के लिए ऐलूमिना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पीब वाले घावों तथा चर्म रोगों को धोने के लिए, जरायु (बच्चेदानी) के निश्चलता के कारण होने वाले रक्तस्राव (खून का बहना) को रोकने में, शरीर के विभिन्न अंगों से होने वाले आन्तरिक रक्तस्राव में दो से तीन प्रतिशत घोल का उपयोग करने में, गलतुण्डिका को आपरेशन के समय काट दिए जाने के बाद होने वाला रक्तस्राव होने पर दस प्रतिशत घोल से नाक और ग्रसनी को धोने से खून बहना रुक जाता है ऐसी स्थिति में ऐलूमिना औषधि का उपयोग सीकेल, लैथीइसरस, प्लम्बम एलूमिनम एसिटेट औषधि से कर सकते हैं।
पूरक :-
प्रतिविष :-
इपिका, कमोमि औषधि ऐलूमिना औषधि के विष को नष्ट करती है।
मात्रा (डोज) :-
ऐलूमिना औषधि की छठी से तीसवी और उच्चतर शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। ऐलूमिना औषधि की क्रिया धीमी गति से विकसित होती है।
एलूमिना सिलिकैटा (ALUMINA SILICATA)
एलूमिना सिलिकैटा औषधि का प्रयोग कई प्रकार के पुराने रोग जो मस्तिष्क, मेरूदण्ड तथा स्नायुजाल से सम्बन्धित होते हैं, को ठीक करने के लिए किया जाता है।
शरीर के किसी भी भाग में सिकुड़न हो रही हो, शिराओं से सम्बन्धित रोग, रीढ़ की हड्डी में अधिक कमजोरी आने, रीढ़ की हड्डी में दर्द तथा जलन होना, शरीर के सभी अंगों में सुन्नपन, कंपकंपी होना और दर्द होना, मिर्गी के दौरे जैसी ऐंठन होना तथा दर्द होना और ठण्डक महसूस होना। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसका उपचार एलूमिना सिलिकैटा औषधि से करना चाहिए।
एलूमिना सिलिकैटा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को छाती में बहुत अधिक कमजोरी महसूस होती है तथा दर्द होता है, छाती में सुई चुभने की तरह दर्द होता है। खांसी के साथ पीब चैसा बलगम निकल रहा हो तो ऐसे रोगी का उपचार एलूमिना सिलिकैटा औषधि से करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंगों में सुन्नपन, भारीपन महसूस होना तथा इसके साथ ऐंठन तथा दर्द हो रहा हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एलूमिना सिलिकैटा औषधि का उपयोग करना चाहिए। इससे रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द हो रहा हो, खोपड़ी में सिकुड़न महसूस हो रही हो, मस्तिष्क में रक्त का संचालन ठीक प्रकार से नहीं हो रहा हो, गर्मी से रोगी को कुछ आराम महसूस हो रहा हो, पसीना अधिक आ रहा हो, आंखों में दर्द तथा चिंगारियां सी उड़ती हुई दिखाई दे रही हो, सर्दी तथा जुकाम बार-बार हो रहा हो, नाक पर सूजन आ गई हो और नाक पर घाव हो गया हो तो इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एलूमिना सिलिकैटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- नाड़ियों से सटी हुई शिराओं में भारीपन महसूस होता है तथा कंपकपी महसूस होती है, रोगी की त्वचा फैली सी महसूस होती है, किसी चीज का स्पर्श होने पर दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षण यदि रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए एलूमिना सिलिकैटा औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
वृद्धि :-
ठण्डी हवा में रहने, खाना खाने के बाद तथा खड़े रहने से रोग के लक्षणों में और अधिक वृद्धि होती है।
शमन :-
रोगी जब भूखा रहता है तथा बिस्तर में आराम करता है तो उसके रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
एलूमिना सिलिकैटा औषधि की उच्चतर शक्तियां का प्रयोग करते हैं।
ऐम्ब्रा ग्रीशिया (AMBRA GRISEA)
ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि स्नायुविकार (स्नायु से सम्बन्धित रोग) और हिस्टीरियाग्रस्त (नर्वस एण्ड हिस्टेरिकल- हिस्टीरिया रोग से पीड़ित रोगी) रोगियों के रोग को ठीक करने के लिए बहुत लाभदायक औषधि है।
छोटे बच्चे और बूढ़े व्यक्तियों में ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का असर तेज होता है जिसके फलस्वरूप रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
अधिक दुबले-पतले रोगी तथा जिनके शरीर में खून की अधिक कमी होती है, जिनका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य एकदम बिगड़ा हुआ हो उन रोगियों के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि अधिक लाभकारी होती है।
रोगी का चित्त चंचल स्वभाव का हो, एक विषय को छोड़कर दूसरे विषय पर बात करने लगता हो, अपने प्रश्न के उत्तर के लिए इन्तजार नहीं करता हो, हर बात को जाने की उत्सुकता तो हो लेकिन थोड़ी देर के लिए उसको भूल जाता हो, मन उदास हो, एक पल खुशी महसूस होती हो, सभी बातों को बेपरवाही से लेता हो, रोगी जब सुबह उठता है तो उसका मन उदास रहता है और उसे ऐसा महसूस होता है कि वह सपने देख रहा है और शाम के समय में पागलों जैसा व्यवहार करता है, उसके मन में जो ख्याल आता है वह बहुत जल्द ही गायब हो जाता है, मनुष्यों की उपस्थिति में उसका चित्त घबरा जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी कभी-कभी मृत्यु को पसन्द करने लगता है, उसका मन उदास रहता है, वह कई दिनों तक अकेला बैठकर रोता रहता है, गाना, सुनना, बर्दाश्त नहीं कर पाता, गाना-बाजा सुनने से उसका शरीर कांपने लगता है, उसे शारीरिक और मानसिक परेशानियां अधिक होती है, उसे हथौड़ी पीटने की तरह पीठ में दर्द होता है, गाना बाजा सुनने से सिर में दर्द होने लगता है। रोगी को गाना सुनने से खांसी बढ़ जाती है, गले में दर्द होता है, अधिक सोचने और गम (दु:खी) होने से खांसी होती है। गर्म कमरे के अन्दर और सुबह के समय में रोगी को और भी परेशानी होती है। किसी प्रकार से बिजनेस में हानि होने या घरेलू दुर्घटनाओं के कारण, शरीर के किसी भाग में चोट लग जाने पर रोग का प्रभाव और तेज हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग उन रोगियों पर अक्सर किया जाता है जिनके शरीर में रोग एक तरफा हुआ करती है, जैसे रोगी के शरीर के एक भाग के तरफ या शरीर के जिस भाग के तरफ रोग है उस भाग के तरफ पसीना अधिक निकलता हो।
ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की पलकों पर इतनी तेज खुजलियां होती है कि जैसे बिलनी का रोग हो गया हो, आंखों में इस प्रकार का दर्द होता है कि मानों वह मजबूती से बंद कर दी गई है। ऐसे लक्षण यदि रोगी में हो तो उसका उपचार करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कान के अन्दर बिना किसी प्रकार प्रकार के विकार के हुए ही कम सुनाई पड़ता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का उपयोग लाभकारी है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के नाक के अन्दर से खून बहने लगता है, नाक के अन्दर खून सूख जाने से पपड़ियां जम जाती है, ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कण्ठ (गले के अन्दर का भाग) में बलगम जमने लगती है जो कि आसानी से खंखार कर बाहर निकाला जा सकता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पीठ में एक तरफ ठण्ड महसूस होती है। लीवर में दर्द होता है, बार-बार डकारें आती हैं, जिसके कारण बहुत तेज खांसी होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अन्य व्यक्तियों से डर लगता है तथा अकेले रहने की इच्छा होती है, दूसरों के उपस्थिति में कुछ नहीं कर सकता है। खुली हवा में चलने के बाद, शरीर के खून की गति तेज हो जाती है और शरीर कपंकपाने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की सोचने की शक्ति कम हो जाती है तथा उसे चक्कर आने लगते हैं और उसका आमाशय कमजोर हो जाता है, सिर के अगले भाग में दबाव बना रहता है तथा वह चिड़चिड़े स्वभाव का हो जाता है। मस्तिष्क के आधे भाग में तेज दर्द होता है। बूढ़े व्यक्ति को अधिक परेशानी होती है तथा उनमें चक्कर की शिकायत अधिक होती है। गाना सुनने से सिर की ओर खून का बहाव तेज हो जाता है। कान की सुनने की शक्ति कम हो जाती है तथा कभी-कभी तो नाक से खून निकलने लगता है और दांतों से खून बहने लगता है, रोगी के बाल झड़ने लगते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को डकारें आती है तथा इसके साथ ही खांसी भी होती है, डकारें खट्टी आती हैं और रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे- कलेजा (जिगर) जल रहा हो, आधी रात के बाद आमाशय और पेट फूलने लगता है और पेट में ठण्डक महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को एक ही समय में मूत्राशय तथा मलाशय में दर्द होता है और मूत्रद्वार में जलन होती है। रोगी को मूत्रद्वार में ऐसा महसूस होता है कि जैसे पेशाब की कुछ बूंदें टपक रही हैं, पेशाब करते समय मूत्रनली में अधिक जलन और खुजली होती है। पेशाब मटमैला, कत्थई रंग का तैलीय तरल पदार्थ के समान होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
कब्ज (कोनसेपशन) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब शौच क्रिया (मलत्याग करना) करता है तब उस समय यदि कोई दूसरा व्यक्ति उसके पास होता है तो उसका मलत्याग सही से नहीं होता है और रोगी को कुछ बुरा-बुरा (कुछ अजीब-अजीब सा लगना) महसूस होता है। बार-बार मलत्याग करने की इच्छा होने के कारण उसे परेशानी होती है। बूढ़े व्यक्तियों में कब्ज की शिकायत होने पर, तथा पेशाब का कम होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
स्त्रियों का मासिक-धर्म समय से पहले आना, योनि के बाहरी भाग में खुजली होने के कारण दर्द और सूजन, रात के समय में गाढ़ा सफेदी के साथ हल्का नीले रंग का पीब के सामान योनि में से स्राव हो (ल्युकोरिया.श्लैश्मिक प्रदर) तो ऐसी रोगी स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
उन स्त्रियों के लिए भी ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का विशेष रूप से प्रयोग किया जाता है जो स्नायुविक उत्तेजना की शिकार हो जाती है और कमजोर हो जाती है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के वृशणकोष (अण्डकोष) में उत्तेजना पैदा होने के साथ खुजली होती है, लिंग बाहर से सुन्न तथा अन्दर से जलन युक्त हो जाता हैं। संभोग क्रिया करने की अनुभति होते ही लिंग से वीर्य निकल जाता है और वीर्यपात हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का उपयोग लाभकारी है।
खांसी (कफ) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कुकर खांसी (हूपिंग कफ) हो जाती है, लेकिन जब रोगी सांस लेता है तो कांव-कांव शब्द नहीं होता है और अधिक परेशानी हो रही हो तथा इसके साथ-साथ डकारें आ रही हो, खांसी के साथ पसलियों में दर्द, आवाज बैठी हुई, टान्सिल ग्रंथि (टोंसिल ग्लैंड) बढ़ा हुआ, मुंह से बदबू आ रही हो। कमजोर बच्चे को जुकाम हो गया हो और खांसी भी साथ में हो तथा रोगी का दम घुटने जैसा महसूस हो रहा हो, बात करने या चिल्लाने पर खांसी बढ़ जाती हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं जो खांसी से सम्बन्धित होते हैं।
बुखार (फीवर) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को शरीर के किसी अंग में बहुत अधिक ठण्ड का अनुभव हो रहा हो तथा इसके साथ ही उसे भूख कम लग रही हो, बुखार भी हो गया हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
पसीना से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के जिस भाग में दर्द हो उस तरफ अधिक पसीना निकल रहा हो तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने में ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि उपयोगी है।
सांस से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सांस लेने में परेशानी होती है तथा दमा रोग होने की अनुभूति (महसूस होना) होती है, रोगी को सुबह के समय में खांसी होती है और खांसी होने के साथ ही डकारें आती हैं, अन्य लोगों की उपस्थिति में खांसी अधिक बढ़ जाती है, कंठ, स्वरयन्त्र तथा सांस लेने वाली नलियों में गुदगुदाहट होने लगती है। छाती पर दबाव महसूस होता है, खांसते समय सांस उखड़ने लगती है और कुकुर खांसी होने लगती है। जब रोगी खंखारता है तो उस समय बलगम निकलता है तथा दम घुटने जैसा महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि उपयोगी है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की धड़कन बढ़ने लगती है तथा इसके साथ छाती पर दबाव महसूस होता है जैसे- छाती पर कोई ठोस वस्तु रखी हुई है। खुली हवा में धड़कन बढ़ने के साथ चेहरा पीला पड़ जाता है, ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक चिन्ता होती है जिसके कारण रोगी को रात के समय में कई घण्टे उठकर बैठना पड़ता है, रोगी अधिक सपने देखता है। जब रोगी नींद की अवस्था में होता है तो उस समय उसका सारा शरीर ठण्डा और ऐंठनदार तथा खिंचावयुक्त होता है। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का उपयोग करना चाहिए।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अपनी त्वचा पर खुजली और जलन महसूस होती है तथा इस प्रकार के लक्षण प्रजनन अंगों पर विशेष रूप से होता है। शरीर के कई अंगों की त्वचा सुन्न पड़ जाती है, ऐसा महसूस होता है कि बांहें सो गई हो, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
सावधानी :-
ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का प्रयोग शाम के समय नहीं करना चाहिए क्योंकि रात के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि हो सकती है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि में ऐसाफ, कोका, इग्रे, मास्क, फास, वैलेर, एक्टिया औषधियों की कुछ समगुण पाये जाते हैं, इसलिए ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि का सम्बन्ध इन औषधियों से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
गर्म पेय पदार्थ पीने, गर्म कमरे में रहने, गाना सुनने, लेटने से, चिल्लाकर पढ़ने या बोलने, बहुत से मनुष्यों के भीड़ में रहने, अधिक जागने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
खाना खाने के बाद, ठण्डी दवा से, ठण्डा पानी तथा भोजन सेवन करने से, ठण्डी वस्तु से, बिछौने से उठने पर रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
ऐम्ब्रा ग्रीशिया औषधि की दूसरी और तीसरी शक्तियों का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। इसे उत्तम परिणाम के साथ दोहराई जा सकती हैं।
अम्ब्रोसिया (AMBROSIA)
अम्ब्रोसिया औषधि का प्रयोग उन लक्षणों के रोगियों के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है जो पराग कणों के कारण होने वाले बुखार (हे-फीवर) से पीड़ित होते हैं तथा इसके साथ ही आंखों से पानी निकलता है, पलकों में खुजली होती है जो रोगी के लिए असहनीय होती है और रोगी इसके कारण अधिक परेशान हो जाता है।
काली खांसी होने की अवस्था तथा रोगी की सांस नली बंद हो रही हो, गर्मी के मौसम में होने वाले पेचिश रोग आदि रोगों को ठीक करने के लिए अम्ब्रोसिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
अम्ब्रोसिया औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अपने नाक और सिर में भारीपन महसूस होता है, छीकें अधिक आती हो, नाक से पानी निकल रहा हो, जुकाम के साथ दमा रोग के दौरे पड़ना तथा रोगी को खांसी होने के साथ सांय-सांय की आवाज आ रही हो। इस प्रकार की स्थिति में अम्ब्रोसिया औषधि का उपयोग कराना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों से पानी आ रहा हो तथा उनमें दर्द तथा जलन हो रही हो तो अम्ब्रोसिया औषधि के प्रयोग से रोगी को अधिक लाभ मिलता है।
सम्बन्ध :-
हे-फीवर को ठीक करने में अम्ब्रोसिया औषधि की तुलना बाइथिया, सक्सी-एसिड़, आर्से आयो, अरूण्ड़ो तथा सैवाडि औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा :-
अम्ब्रोसिया औषधि की अर्क से तीसरी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐंथ्रासीनम (ANTHRACINUM)
जिस पालतू पशु के तिल्ली में बुखार हो जाता है, उसकी तिल्ली से ऐंथ्रासीनम औषधि बनाई जाती है।
शरीर के कई अंगों में फोड़े-फुंसियां हो जाने पर इसको ठीक करने के लिए ऐंथ्रासीनम औषधि का उपयोग लाभकारी होती है।
शरीर के कई अंगों में जलन, कोशिका-ऊतक (सेल्लुलर टीस्सु) की कठोरता, फोड़ा, गुल्टी (बुबो) तथा संयोजक ऊतक (कोननेस्टीव टीस्सु) में जलन होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐंथ्रासीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के कई अंगों से रक्तस्राव (खून का बहना) होता है, खून का रंग काला, गाढ़ा तथा तारकोल जैसा होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐंथ्रासीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर की कई ग्रंथियां सूज जाती हैं, कोशिका-ऊतक में (ओडेमेटॉस) सूजन आ जाती है और कठोरतापन उत्पन्न हो जाती है, काले ओर नीले रंग के छाले पड़ जाते हैं, किसी औजार से चोट या चीरा लग जाने के कारण उत्पन्न घाव, कीड़ों के काटने से होने वाले जख्म, बदबूदार पदार्थ सूंघने के कारण उत्पन्न लक्षण, कान में जलन होना आदि लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐंथ्रासीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
ऐंथ्रासीनम औषधि आर्सेनिक औषधि के समान उपयोगी है, जो इसके बाद उत्तम क्रिया करती है।
पाइरोजीनम, हिप्पोजेनियम, लैकेसिस, एचिनेसिया तथा साइलीशिया औषधियों से ऐंथ्रासीनम औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा (डोज) :-
ऐंथ्रासीनम औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐंथ्राकोकाली (ANTHRAKOKALI)
हाथ-पैरों के फटने (क्रेक्स), तेज खुजली होने और जीर्ण परिसर्प (क्रोनिक हर्पेस) रोग को ठीक करने के लिए ऐंथ्राकोकाली औषधि का प्रयोग करना लाभदायक है।
अण्डकोष, टांगों की लम्बी हड्डी, हाथों तथा पैरों के पिछले भागों पर दाने निकल आते हैं तथा उनमें पीब भर जाती है और रोगी को प्यास बहुत लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐंथ्राकोकाली औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पुराने आमवात का रोग (क्रोनिक रीयुमेटिज्म), पित्त से संबन्धित रोग, पित्त-उल्टी (वोमिटिंग ऑफ बाइल), पेट फूलना और अफारा (पेट का फूलना)। ऐसे रोगों को ठीक करने के लिए ऐंथ्राकोकाली औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
ऐंथ्राकोकाली औषधि की निम्न शक्ति वाले विचूर्ण का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एण्टिमोनियम आर्सेनिकोसम (ANTIMONIUM ARSENICOSUM)
श्वास लेने में कई प्रकार की परेशानियां (एम्फाइसेमा वीथ डाइसफोनिया) हो रही हो तथा इसके साथ ही खांसी हो गई हो और बलगम भी निकल रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब खाना खाता है तथा लेटता है तो उस समय रोग के लक्षणों में अधिक वृद्धि होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमोनियम आर्सेनिकोसम औषधि उपयोग लाभदायक है।
यदि किसी रोगी को नजला जुकाम हो गया है और इसके साथ ही रोगी को न्यूमोनिया रोग हो गया हो तथा इन लक्षणों के साथ में इन्फ्लुएंजा (इंफ्लुएंजा) रोग भी हो गया हो, हृदय में दर्द हो रहा हो, हृदय अधिक कमजोर हो गया हो और फेफड़े में पानी भर गया हो, इन लक्षणों के साथ ही बहुत अधिक कमजोरी महसूस होती हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमोनियम आर्सेनिकोसम औषधि का प्रयोग लाभदायक होता है।
आंखों में जलन होना तथा इसके साथ ही चेहरे पर दर्द होने लगे तो एण्टिमोनियम आर्सेनिकोसम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
एण्टिमोनियम आर्सेनिकोसम औषधि की तीसरी शक्ति की विचूर्ण का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एण्टिमानियम क्रूडम (ANTIMONIUM CRUDUM)
होम्योपैथिक चिकित्सा सिद्धान्तों के अनुसार एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का प्रयोग मानसिक रूप से पीड़ित रोगी तथा पाचन सम्बन्धित रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए किया जाता है। ऐसे रोगों से पीड़ित रोगी चिड़चिड़ा स्वभाव का होता है तथा वह क्रोधी स्वभाव का होता है, उसके जीभ के ऊपर सफेद मोटी परत जमी रहती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों में गर्मी के कारण तथा स्नान करने के कारण वृद्धि होती है।
कोई भी रोग क्यों न हो यदि रोगी के शरीर के विशेष लक्षणों को ध्यान में रखकर औषधि का निर्वाचन करके ही रोगी को औषधि का सेवन कराए तो रोग को ठीक होने में जल्दी ही सफलता प्राप्त होती है।
यदि रोगी के पेट में खराबी है तो अक्सर एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ठण्डे पानी से नहाने से मासिकधर्म दब जाने पर एण्टिमानियम क्रूडम औषधि बहुत उपयोगी है तथा गर्भावस्था में जी मिचलाने, उल्टी होने, तथा पतले दस्त होने पर इन लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
शरीर का अधिक मोटा हो जाने पर एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग लाभदायक है जिसके फलस्वरूप रोगी का शरीर पतला होने लगता है तथा शरीर भी स्वस्थ्य हो जाता है।
पैर के तलुओं में गांठे पड़ जाने पर तथा पक्के फर्श पर चलने से बेहद परेशानी होने पर एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करने से ये लक्षण ठीक हो जाते हैं।
एण्टिमानियम क्रूडम औषधि किसी भी प्रकार के बुखार को ठीक करने में उपयोगी है विशेष कर टाइफायड ज्वर के ठीक होने के बाद जब रोगी बिस्तर पर बार-बार पलटता रहता है, जबान पर गाढ़े दूध की तरह सफेद मैल जम जाती है, खाना खाने का मन नहीं करता है, खटाई खाने की इच्छा होती है, विशेष करके सिरके का आचार।
रोगी जब आग या चूल्हे की ओर देखता है तो उसकी खांसी बढ़ने लगती है, खांसी की उत्तेजना की अनुभूति आमाशय से होती है, सुबह के समय में खांसी होने लगती है तथा ऐसा महसूस होता है कि खांसी पेट में दर्द होने के साथ हो रही है, पहले पेट में तेज दर्द होता है तथा फिर धीरे-धीरे पेट में दर्द कम होता जाता है, अन्त में रोगी को खंखार आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
विभिन्न लक्षणों में एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी अपने ही भाग्य के बारे में सोचता रहता है, दिमाग में उट-पटांग बातें आती रहती हैं, वह किसी भी कार्य को करने में संतुष्ट नहीं होता है, उदास रहता है, किसी व्यक्ति से बोलने का मन नहीं करता है, वह नाराज स्वभाव का होता है, उसे किसी भी व्यक्ति का स्पर्श अच्छा नहीं लगता है, वह जल्दी ही भावुक हो जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सिर में भारीपन महसूस होता है तथा सिर में दर्द होता है, ऐसा तब होता है जब वह किसी ऊंचे स्थान पर चढ़ता है, स्नान करता है या उसे यदि पेट में किसी प्रकार से गड़बड़ी हो जाती है, नाक से कभी-कभी खून भी बहने लगता है तथा रोगी के सिर के बाल भी झड़ने लगते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के आंखें लाल रंग की हो जाती है तथा अन्दर की ओर धंस जाती है, आंखों में खुजली होती है, आंखों की पलकें आपस में चिपक जाती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कान से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के कान में तेज दर्द होता है तथा कान के ऊपरी भाग पर सूजन आ जाती है तथा उस पर लाली पड़ जाती है, कानों में घंटी जैसी आवाजे सुनाई देती हैं, रोगी को बहरेपन जैसी अवस्था हो जाती है, कान के आस-पास ठण्डक महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक के अन्दर पपड़ियां जम जाती है तथा उसमें दर्द होने लगता है, नाक के नथुने पर भी दर्द होता है, नथुनों पर छाजन रोग हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण :- चेहरे पर छोटी-छोटी पीबदार फुंसियां और फोड़े हो जाती है, गाल तथा ठोढ़ी पर पीले पीबदार फोड़े या फुंसियां हो जाती है, चेहरा रूखा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मुंह का किनारा हमेशा फटा हुआ रहता है, होंठ सूख जाता है, लार नमकीन निकलता है तथा वह अधिक चिपचिपा तथा श्लेष्मा (कफ) युक्त होता है, जीभ के ऊपर सफेद मोटी परत जम जाती है, मसूढ़ें दांतों से अलग हो जाते हैं, उनमें से खून निकलते लगता है, दांत खोखले हो जाते हैं, पैर के तलुवों में दर्द होता है, रोगी को प्यास बहुत कम लगती है, मुंह के आस-पास घाव हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कण्ठ (गले) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के नाक के पिछले भाग के छेदों से अत्यधिक गाढ़ा पीला कफ जैसा पदार्थ निकलता है जो खुली हवा में बार-बार खंखारकर बाहर निकालना पड़ता है, स्वरयंत्र में घाव हो जाता है जिसके कारण रोगी को बोलने तथा खाना खाने में अधिक परेशानी होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को भूख कम लगती है, खट्टी चीजें तथा आचार खाने की इच्छा अधिक होती है, शाम के समय में तथा रात के समय में अधिक प्यास लगती है, खाए हुए खाना डकार के साथ में मुंह में वापस आ जाता है, कलेजे में जलन महसूस होती है, जी मिचलाने लगता है तथा पेट फूलने लगता है। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित स्त्री यदि किसी बच्चे को दूध पिलाती है तो बच्चा दही के छीछड़ों के रूप में दूध की उल्टी कर देता है और बाद में दूध पीने से इन्कार कर देता है तथा बच्चे का स्वभाव बदमिजाज हो जाता है। रोटी और पेस्ट्री, अम्ल पदार्थ, खट्टी खाद्य पदार्थ, शराब का सेवन करने से, ठण्डे पानी से नहाने, अधिक तप जाने तथा गर्म मौसम के कारण पेट तथा आंतों में रोग हो जाने के कारण रोगी को ऐसे लक्षण हो जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मल से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के मलद्वार में खुजली होने लगती है, कभी-कभी दस्त भी होने लगता है, रोगी को कब्ज की समस्या भी हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से अधिकतर बूढ़े व्यक्ति पीड़ित होते हैं। खट्टी चीजों का सेवन करने, खट्टी शराब पीने, नहाने-धोने से तथा अधिक तप जाने के कारण रोगी को अतिसार (दस्त) हो जाता है तथा रोगी का मल अधिक चिपचिपा तथा वायुयुक्त होता है। कुछ रोगी को ऐसी समस्याओं के साथ बवासीर का रोग भी हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बंधित लक्षण :- रोगी को बार-बार पेशाब होने के साथ जलन और कमर में दर्द होने लगता है, पेशाब अधिक गंदा तथा बदबूदार होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के वृषणकोष (अण्डकोष) तथा जननेन्द्रियों के आस-पास जलन होने लगती है जिसके कारण रोगी को नपुंसकता रोग हो जाता है और वह सैक्स क्रिया करने में असमर्थ हो जाता है, लिंग तथा अण्डकोषों में अधिक कमजोरी उत्पन्न हो जाती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी स्त्री को अपने जननेन्द्रियों में अधिक उत्तेजना उत्पन्न होती है जिसके कारण उसके योनि में खुजली उत्पन्न होने लगती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री का मासिकधर्म समय से पहले ही शुरू हो जाता है और बहुत कम मात्रा में होता है, ठण्डे पानी से नहाने पर स्राव दब जाने के साथ गोणिका में दबाव तथा डिम्ब-प्रदेश में हल्की-हल्की दर्द महसूस होती है।
प्रदर रोग से पीड़ित स्त्री के योनि से पानी के जैसा तरल पदार्थ निकलने लगता है। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित स्त्री रोगी के लक्षण को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- जब रोगी कमरे के अन्दर जाता है तो उसे खांसी होने लगती है तथा इसके साथ ही जलन, खुजली और घुटन होने लगती है, अधिक गर्मी के कारण रोगी को बोलने में परेशानी होने लगती है, आवाज तीखी तथा भद्दी हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- गर्दन और पीठ पर खुजली होने लगती है तथा इसके साथ ही दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के बाहों में अचानक झटके महसूस होते हैं, हाथ की उंगलियों के जोड़ों में दर्द होने लगता है, नाखून का सिरा उभर जाता है, हथेलियों में नुकीले मस्से हो जाते हैं, हाथ तथा पैरों में अधिक कमजोरी हो जाती है जिसके कारण शरीर के ये भाग कंपकपाने लगते हैं तथा मलद्वार से गंदी बदबूदार हवा निकलती है, पीठ के कई जगहों पर नुकीले मांस के समान मस्से हो जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
चर्म रोग से सम्बंधित लक्षण :- छाजन रोग से पीड़ित रोगी के पाचन अंगों में गड़बड़ी हो गई हो तथा शरीर के त्वचा पर छोटी-छोटी फुंसियां निकल गई हो, फुंसियों में दूषित तरल पदार्थ भरा हो, त्वचा के कई भागों में मोटी-मोटी, सख्त, शहद के रंग जैसी पपड़ियां जम गई हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- बूढ़े व्यक्तियों को नींद नहीं आती है, ऐसे रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को गर्म कमरे में ठण्ड लगती है, बुखार रुक-रुककर आता है तथा चढ़ता है, बेचैनी होने लगती है, डकारें भी आने लगती है और इसके साथ ही दस्त भी हो जाता है, शरीर से गर्म पसीना निकलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमानियम क्रूडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
शाम के समय में, गर्मी से, खट्टी चीजों के सेवन करने से तथा खट्टी शराब पीने से, नहाने से एवं गीली पट्टी बांधने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
खुली हवा में रहने, आराम करने तथा पसीना आने वाली गर्मी से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
एण्टिमोनियम क्लोराइडम औषधि की तुलना एण्टिमानियम क्रूडम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
एण्टिमानियम क्रूडम औषधि की तीसरी शक्ति का विचूर्ण का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एण्टिमोनियम सल्फ्यूरेटम औरेटम (Antimonium sulphuratum auratum)
पुराने नजले के विभिन्न लक्षणों तथा श्वासनलियों में बलगम जमा हो जाने की अवस्था में एण्टिमोनियम सल्फ्यूरेटम औरेटम औषधि का उपयोग लाभकारी है। मुहांसे तथा दृष्टिदोष को ठीक करने में भी यह उपयोगी है।
विभिन्न लक्षणों में एण्टिमोनियम सल्फ्यूरेटम औरेटम औषधि का उपयोग-
नाक तथा कंठ से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह धोते समय नाक से खून निकलना, नाक तथा गले के अन्दर से अधिक मात्रा में खून निकलना, नाक का अन्दरूनी भाग छिल जाना तथा खुरदरी होना, बदबू महसूस न होना, खून का स्वाद नमकीन सा लगना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमोनियम सल्फ्यूरेटम औरेटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले के अन्दर गुदगुदी महसूस होना, श्वासनलियों में कफ की मात्रा जम जाना, सांस लेने में अधिक परेशानी होना, श्वासनलियों में दबाव तथा सिकुड़न महसूस होना, सूखी तथा कठोर खांसी होना, बाएं फेफड़े के ऊपरी भाग में खून की अधिकता होना, ठण्ड के समय में होने वाली खांसी, सारे शरीर में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमोनियम सल्फ्यूरेटम औरेटम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मुहासें होना तथा हाथों और पैरों में खुजली होने पर एण्टिमोनियम सल्फ्यूरेटम औरेटम औषधि से उपचार करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- अचानक मल निकल जाना, मलत्याग करते समय हवा निकलने के साथ मल निकलना, पहले कड़ा उसके बाद पीले रंग का पतला दस्त होना, अन्त में पेट में जोर का दर्द होना और गड़गड़ की आवाज होना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्टिमोनियम सल्फ्यूरेटम औरेटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
एण्टिमोनियम सल्फ्यूरेटम औरेटम औषधि की दूसरी अथवा तीसरी शक्ति के विचूर्ण का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम (Antimonium Tartaricum)
बूढ़े तथा बच्चों के रोगों में बलगम अधिक बनना तथा अधिक कमजोरी आने पर ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि के प्रयोग करने से रोगी जल्दी ही ठीक हो जाता है।
ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि एण्टि-टा रक्षात्मक पदार्थ की ऑक्सीजन क्रिया को तेज कर परजीवियों पर अप्रत्यक्ष रूप से प्रभाव डालती है। यह बिलहार्जिया रोग को ठीक करने के लिए लगाए गए इंजेक्शन के दुष्प्रभाव को खत्म करता है। पेशियों में ठण्ड तथा सिकुड़न और दर्द होने पर रोगी के रोग को ठीक करने के लिए इसका उपयोग करना चाहिए।
ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि बच्चों और वृद्धों को समान रूप में देना चाहिए। इस औषधि के सेवन से बच्चे तथा वृद्धों के रोग ठीक हो जाते हैं तथा उन्हें बहुत आराम मिलता है।
सांस सम्बन्धी रोगों को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप सांस सम्बन्धी रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के छाती में खड़खड़ाहट होने के साथ बलगम का अधिक बनता है, शरीर में अधिक गर्मी आ जाती है तथा पसीना भी अधिक निकलता है, प्रत्येक रोग की अवस्था में यदि रोगी को ऐसा लक्षण भी है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए इसका उपयोग करना चाहिए।
यदि रोगी गठिया के रोग से पीड़ित है और उसके पाचन तन्त्र में कोई रोग हो गया हो या उसे इसके साथ ही हैजा हो गया हो, शरीर की रक्तवाहिनियों में ठण्डक महसूस हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
जब रोगी पेशाब करता है तो उसका पेशाब बूंद-बूंद करके निकल रहा हो या पेशाब के साथ खून भी कुछ मात्रा में निकल रहा हो या कुछ अन्न जैसा पदार्थ भी निकल रहा हो, मूत्राशय के मूत्रमार्ग में स्राव (प्रतिश्याय) होने लगता है, रोगी के मलान्त्र (मलद्वार) में जलन होने लगी है, रोगी जब मलत्याग करता है तो उसके मल से रक्त की कुछ मात्रा निकलती है तथा कभी-कभी कफ जैसा पदार्थ भी मल के साथ में निकलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पूरे शरीर में कम्पन होने लगता है, इसके साथ ही उसे उदासीपन महसूस होती है, बेहोशी की समस्या भी हो जाती है, कमर में दर्द होने लगता है, ठण्ड महसूस होती है, शरीर के कई अंगों में सिकुड़न होने लगती है, पेशियों में दर्द होने लगता है, रोगी के शिश्नमुण्ड पर मस्से हो जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
जब बच्चे को किसी प्रकार का रोग हो जाता है तो वह किसी का स्पर्श करना पसन्द नहीं करता है, बोलने या उसकी तरफ ताकने से वह नाराज हो जाता है, सदैव रोता रहता है, नब्ज की परीक्षा करने नहीं देता है, बड़ा ही बदमिजाज और चिड़चिड़ा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित बच्चे का उपचार करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
फेफड़ों के ऊपर वाले स्थान पर उंगली लगाकर चेक करने पर जब भारी आवाज होती है, सांस लेने में आवाज की कमी होती है, सांस छोटी होती है और रोगी कमजेार हो जाता है, नींद आती है और चेहरा नीला पड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग करना चाहिए लेकिन ऐसी ही कुछ अवस्था में सल्फर औषधि का प्रयोग किया जाता है और जब सल्फर के प्रयोग से रोगी की अवस्था में सुधार न हो तो ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का प्रयोग करना ही लाभदायक होता है। इस अवस्था में रोगी के रोग को ठीक करने के लिए 200 से लाख पोटेंसी की मात्रा की खुराक रोगी को देना चाहिए।
ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
मन से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को चक्कर आने लगते है तथा इसके साथ ही रोगी को उदासीपन भी हो जाता है, अधिक निराशा होने लगती है, अकेलेपन से डर लगने लगता है, पीड़ित रोगी कुछ न कुछ बड़बड़ाने लगता है तथा बिना किसी कारण के रोने लगता है।
रोगी को चक्कर आने के साथ ही किसी भी चीज से चिढ़ होने लगती है और उसे उस चीज के प्रति भ्रम पैदा हो जाता है, उसे ऐसा महसूस होता है कि जैसे माथे पर कोई पट्टी बंधी हुई है, चेहरा पीला हो जाता है और अन्दर की ओर धंस जाता है।
रोगी बच्चे को जैसे ही छूते है वैसे ही वह रोने लगता है तथा उसके सिर में दर्द होने लगता है।
इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
जीभ से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के जीभ पर परतदार, लसलसी, मोटी सफेदी आ जाती है तथा उसके साथ ही जीभ की किनारी लाल हो जाती है, जीभ में सूखापन आ जाता है, विशेष रूप से बीच का भाग, जीभ कत्थई रंग की हो जाती है, इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी का उपचार ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि से करना चाहिए।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का चेहरा ठण्डा, नीला तथा पीला हो जाता है, पसीना निकलने लगता है और ठोड़ी में कुछ कम्पन होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण :-
रोगी जब कोई तरल पदार्थो को निगलने की कोशिश करता है तो उसे अधिक परेशानी होने लगती है और जब रोगी दायीं ओर की करवट करके लेटता है तो उसे उल्टियां होने लगती है।
रोगी का जी मिचलाने लगता है, उबकाई होने लगती है, उल्टियां होने लगती है, जब वह खाना खा लेता है तब उसे ऐसे लक्षण अधिक होते हैं, इसके साथ ही रोगी को बेहोशी भी होने लगती है तथा उसे उदासी हो जाती है।
रोगी को ठण्डा पानी पीने की इच्छा अधिक होती है, वह थोड़ी मात्रा में बार-बार भोजन करता है, उसे फल में सेब तथा अधिक खट्टी चीजें खाने की इच्छा होती है, उसका जी मिचलाने लगता है तथा डर लगने लगता है, हृदय के भागों में दबाव महसूस होता है तथा इसके साथ ही सिर में दर्द भी होने लगता है, रोगी को जम्भाई आने लगती है और उल्टियां भी होने लगती है।
इस प्रकार आमाशय से संबन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी के पेट में ऐंठनदार तेज दर्द होने लगता है और मलद्वार से अधिक वायु निकलती है।
रोगी के पेट में दर्द होने के साथ ही दबाव महसूस होता है तथा जब वह आगे की ओर झुकता है तो पेट में अधिक तेज दर्द महसूस होता है तथा ऐंठन होने लगती है।
रोगी को हैजा का रोग हो जाता है तथा इसके साथ ही उसके पेट में दर्द तथा ऐंठन होती है।
रोगी को अतिसार रोग हो जाता है तथा इसके साथ ही रोगी के पेट में ऐंठनदार दर्द होता है और दबाव महसूस होता है।
इस प्रकार पेट से संबन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :-
जब रोगी पेशाब करता है तो उस समय में उसके मूत्रमार्ग में जलन होती है, जब पेशाब की आखिरी बूंदें गिरती है तो उसमें खून की कुछ मात्रा भी निकलने लगती है तथा इसके साथ ही रोगी के मूत्राशय में दर्द भी होने लगता है।
रोगी को पेशाब करने की इच्छा बार-बार होती है लेकिन जब वह पेशाब करता है तो उसके मूत्राशय तथा मूत्रमार्ग में से कफ के समान कुछ लसलसा पदार्थ निकलने लगता है।
रोगी के वृषण (अण्डकोष) में कोई रोग उत्पन्न हो जाए तथा इसके साथ ही रोगी को ऐसा महसूस होता है कि वृषणकोष (अण्डकोष) के पास सिकुड़न हो रही है, जब वह पेशाब करता है तो उसके मूत्रमार्ग तथा मूत्राशय में जलन महसूस होती है।
इस प्रकार के मूत्र से संबन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :-
जब रोगी सांस लेता है तो उसे परेशानी होती है और सांस लेने वाली नली में खड़खड़ाहट होने लगती है लेकिन बहुत कम बलगम निकलता है, छाती में बलगम जम गया है ऐसा महसूस होता है तथा इसके साथ ही छाती में जलन महसूस होती है और यह जलन गले तक होता है।
रोगी तेज उखड़ा-उखड़ा सांस लेता है, सांस लेने में अधिक परेशानी होती है, ऐसा महसूस होता है कि दम घुट जाएगा और रोगी उठकर बैठ जाता है, श्वास नलियों में कफ जमा रहता है, खाने से खांसी होने लगती है तथा इसके साथ ही उसके छाती में भी दर्द होने लगता है।
रोगी के फेफड़ों में सूजन आ जाती है तथा ऐसा महसूस होता है की फेफड़े के भागों में लकवा रोग हो गया है, हृदय की धड़कन बढ़ जाती है तथा रोगी को बेचैनी होने लगती है और फिर खांसी होने लगती है, नाड़ी तेज, कमजोर हो जाती है, चक्कर आने लगता है, सांस लेने में परेशानी होने लगती है,
इस प्रकार के श्वास संस्थान से संम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी के कटि-त्रिक प्रदेश (सेक्रो ल्युबर रिजन) में दर्द होता है, जब रोगी हिलने-डुलने का कार्य करता है तो उबकाई आने लगती है और ठण्ड महसूस होती है, चिपचिपा पसीना आता रहता है। रोगी को भारीपन महसूस होता है, पीठ में हर समय नीचे की ओर खिंचाव बना रहता है, शरीर के कई अंगों में कंपन होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी के शरीर के कई भागों में पीब युक्त दाने हो जाते हैं और जब वह ठीक होते हैं तो उसके स्थान पर निशान पड़ जाता है। चेचक तथा मस्सें के दाग आदि को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ठण्ड लगकर बुखार हो जाता है, उसे कंपकपी लगने लगती है, बहुत अधिक गर्मी महसूस होती है, शरीर से अधिक पसीना निकलता है, पसीना ठण्डा और चिपचिपा होता है, कभी-कभी रोगी को बेहोशी भी होने लगती है और उसमें आलस्यपन आ जाता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक नींद आती है तथा नींद आते ही स्पार्किंग जैसे झटके लगने लगता है, लगभग सभी रोगी व्यक्तियों को सोने की इच्छा अधिक होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग किया जाता है।
न्यूमोनिया से सम्बन्धित लक्षण :- न्यूमोनिया रोग से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग लाभदायक है लेकिन रोगी में ये लक्षण भी साथ में होने चाहिए जो इस प्रकार हैं- रोगी का चेहरा मैला हो जाता है या नीले रंग का हो जाता है, शरीर पर ठण्डा पसीना आता है तथा रोगी हल्का-हल्का खर्राटा भी लेता है।
फेफड़े के रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
फेफड़े की हर प्रकार की परेशानी में जब कि छाती कफ से घड़घड़ करती हो, चाहे मामूली जुकाम, ब्रोंकाइटिस रोग की अवस्था, काली खांसी, दमा, ब्रांको-न्यूमोनियां, प्लोरों न्यूमोनिया आदि हो तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
यदि बच्चा किसी रोग से पीड़ित है और वह अपनी मां या दायी से चिपटना चाहता है, गोद में घूमना चाहता है, चिड़चिड़ा हो जाता है, नब्ज की परीक्षा भी नहीं करने देता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित बच्चे के रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
श्वास रोगों में दम घुटने लगता है, सांस लेने से बहुत अधिक परेशानी होती है और खांसी हो जाती है तथा लेटे रहने से खांसी की वृद्धि होती है, उठकर बैठने से रोगी को शान्ति मिलती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बच्चे की दम घुटने की बीमारी से सम्बन्धित लक्षण :- छोटे बच्चे की दम घुटने की बीमारी में जब छाती अत्यधिक घड़घड़ करती हो, चेहरा नीला पड़ गया हो, तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग करना चाहिए। बच्चे की पसली चलने पर ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
उल्टी आने से सम्बन्धित लक्षण :- उल्टी आने पर ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग लाभदायक है, जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है, लेकिन इसके साथ ही रोगी में यह लक्षण भी होना चाहिए जो इस प्रकार हैं-उल्टी के साथ जी मिचलाना, उल्टी तेज होना, कभी-कभी रोगी को उल्टी करने से बेहोशी भी आ जाती है, उल्टी करने के बाद रोगी को अधिक थकावट महसूस होने लगती है, लेकिन उल्टी करने के कुछ देर बाद रोगी को कुछ आराम भी महसूस होता है।
चेचक (स्मॉल पोक्स) से सम्बन्धित लक्षण :- चेचक के कारण उत्पन्न फुन्सियों के दाने के निशान को ठीक करने में ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
शाम को सोते समय, रात को लेटते समय, अधिक गर्मी लगने से, नमीदार ठण्डे मौसम से, खट्टी चीजें खाने तथा दूध पीने से रोग के लक्षणों में वृद्धि हो जाती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
सीधे तनकर बैठने, डकार लेने तथा बलगम आने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
काली-सल्फ्यू, इपिका औषधि की तुलना ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि से कर सकते हैं।
लाइकोपोडियम औषधि के साथ ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि की समगुण सम्बन्ध है, लोइकों औषधि में नकुरे पंखे की तरह हिलते रहते हैं और ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि में वे फैले रहते हैं।
वेरेट्रम औषधि और ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि दोनों ही में पतले दस्त, पेट दर्द, उल्टी को ठीक करने की शक्ति होती है, ऐसे रोगी का शरीर ठण्डा रहता है और खट्टी चीजों के प्रति रोगी को अधिक खाने की इच्छा होती है।
इपिकैक औषधि के साथ ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि की समगुण सम्बन्ध है लेकिन ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि उन रोगियों पर प्रयोग किया जाता है जिसमें सांस की परेशानी के कारण रोगी को अधिक नींद आती है और जी की मिचलाहट होती है तथा उल्टी भी होती है तथा उल्टी करने के बार रोगी को कुछ आराम मिलता है।
बच्चों के फेफड़े रोगी को ठीक करने के लिए ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि का प्रयोग करने पर जब कोई विशेष लाभ नहीं मिलता है तो हिपर औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
प्रतिविष :-
पल्सा, सीपिया औषधि का उपयोग ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा :-
ऐन्टिमोनियम टार्टाकिम औषधि की दूसरी तथा छठी शक्ति के विचूर्णं का प्रयोग रोगों के लक्षणों को ठीक करने के
ऐण्टिपाइरिनम (ANTIPYRINUM)
ऐण्टिपाइरिनम औषधि का ऐलोपैथिक चिकित्सा में प्रयोग रोगी के शरीर से पसीना निकालकर बुखार को ठीक करने के लिए किया जाता है। शरीर के दाहिनी तरफ, दाहिनी छाती, दाहिने हाथ और दाहिनी ओर के अण्डकोष के दर्द को ठीक करने में इस औषधि का उपयोग किया जाता है।
रोगी को स्नायु उत्तेजना के कारण ऐसा महसूस होता है कि जैसे वह पागल हो गया है, सिर दर्द के साथ कान में कटकटाने वाला दर्द होता है, दर्द का असर कान के नीचे तक चला जाता है, आंखों की पलक सूज जाती है, आंखों में लाली और सूजन आ जाती है, आंखों से पानी निकलता रहता है, चेहरे पर सूजन आ जाती है तथा चेहरा सुर्ख हो जाता है, होंठों पर सूजन आ जाती है, जीभ पर घाव हो जाता है तथा खून मिला हुआ लार का स्राव (बहना) होने लगता है, दांत और मसूढ़ों में दर्द और जलन होती है, खांसी के साथ बदबूदार पीब भी निकलती है, कोई चीज निगलने पर गले में दर्द होता है, सांस लेने में परेशानी होती है और सांस छोड़ने में भी परेशानी होना तथा छाती पर दबाव महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों के साथ ही रोगी को बहोशी की समस्या भी हो जाती है और उसकी नाड़ी की गति कम हो जाती है, शरीर पर खुजली के दाने निकलने लगते हैं, त्वचा से सम्बन्धित कई प्रकार की बीमारियां भी हो जाती है और पसीना बहुत ज्यादा आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में ऐण्टिपाइरिनम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी पागलों की तरह हो जाता है तथा उसकी स्नायु अधिक कमजोर हो जाती है, भ्रम हो जाता है तथा देखने, सुनने की क्षमता ठीक नहीं रहती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोग व्यक्ति के सिर में दर्द होता है तथा उसका सिर गर्म हो जाता है, सिर की त्वचा में सिकुड़न होने लगती है, सिर दर्द के कारण कानों के निचले भाग में भी दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के आंखों की पलकों में सूजन आ जाती है तथा आंखों से पानी निकलता रहता है, आंखें लाल हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द होने के साथ ही कान में दर्द होता है और कान में भिनभिनाहट की आवाज सुनाई देती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के चेहरे पर सूजन आ जाती है, चेहरे पर लाली पड़ जाती है, चेहरे पर जलन और हल्का दर्द भी महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के होठों पर सूजन आ जाती है, मुंह तथा मसूढ़ों में जलन होने लगती है, होंठ तथा जीभ पर घाव हो जाता है, जीभ पर फफोले पड़ जाते हैं, गाल पर छोटी-सी गांठ पड़ जाती है, जीभ में सूजन आ जाती है, लार के साथ खून की कुछ मात्रा भी निकलती है, निचले जबड़ों के दांतों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
गले से सम्बंधित लक्षण :- खाने को निगलते समय गले में दर्द होता है, गले से बदबूदार बलगम खंखार के द्वारा निकलता है, गले में किसी प्रकार का फोड़ा हो जाना, गले में जलन होना। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी रोग में है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को उल्टियां होने लगती है तथा इसके साथ ही आमाशय के भाग में जलन तथा दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बहुत कम मात्रा में पेशाब आता है तथा लिंग अधिक काले रंग का हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
श्वसन संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के नाक से बहुत अधिक मात्रा में पानी जैसा तरल पदार्थ निकलता रहता है, नाक की श्लैष्मिक झिल्ली में सूजन आ जाती है, नाक के नथुने पर दर्द होने लगता है, हल्का गला बैठ जाता है, सांस लेने में परेशानी होने लगती है, फेफड़ों में खून का बहाव अधिक हो जाता है जिसके कारण सांस लेने में परेशानी होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि उपयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के योनि में खुजली तथा जलन होती है तथा मासिकधर्म एकाएक बंद हो जाना और प्रदर रोग में पानी की तरह स्राव होना। स्त्री रोगी के इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- बेहोशी के साथ हृदय की धड़कन एकदम बंद हो जाना, पूरे शरीर में जलन होना, नाड़ी का अधिक कमजोर पड़ जाना तथा अनियमित रूप से धड़कना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्नायु से सम्बन्धित लक्षण :- दमा रोग जैसा दौरा पड़ना, शरीर के सभी अंगों में ऐंठन होना तथा कंपन्न होना, शरीर के अंगों में सिकुड़न होना, हाथ-पैरों में सुन्नपन हो जाना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
शरीर के कई अंगों में लाल-लाल दानें निकल जाना तथा दाग धब्बे हो जाना, तेज खुजली होना, छाजन रोग (एक्जीमा) होना, छपकी रोग होना तथा एकदम ठीक हो जाना और इसके साथ ही रोगी को ठण्ड महसूस होती है।
लिंग पर काले-काले चकत्ते जैसे निशान हो जाना, शरीर में अधिक कमजोरी हो जाना।
इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐण्टिपाइरिनम औषधि उपयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
ऐण्टिपाइरिनम औषधि की 2x, 6 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एपिस मेलीफिका (Apis Melifica)
एपिस मेलीफिका औषधि का प्रभाव शरीर के कोशिका ऊतकों (सेल्लुलर टीस्सु) पर पड़ता है जिसके फलस्वरूप त्वचा तथा श्लेष्म कलाओं की सूजन ठीक हो जाती है।
शरीर के बाहरी अंगों, त्वचा, शरीर के अन्दरूनी भाग की ऊपरी परत तथा सीरम कलाओं (सीरस मम्ब्रेंस), मस्तिष्क, हृदय की झििल्लयों का सद्रव सीरमी की जलन (सीरियस इंफ्लामेशन वीथ एफ्युशन) आदि शरीर के अंगों पर एपिस मेलीफिका औषधि की क्रिया होती है।
रोगी के शरीर के अन्दर स्पर्श करने की संवेदनशीलता, तथा शरीर के कई भागों में सूजन होने के कारण दर्द तथा जलन होना, ऐसा महसूस हो रहा हो कि शरीर के अन्दर सिकुड़न तथा अकड़न हो रही हो, शरीर का कोई अंग चोट के कारण अकड़ कर नष्ट हो गया हो तथा रोगी को भारीपन महसूस हो रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
एपिस मेलीफिका औषधि मधुमक्खी के विष के द्वारा बनाई जाती है। शरीर के किसी भी भाग में सूजन होने पर इस औषधि का उपयोग लाभदायक है। एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करने से यह पता चलता है कि गुर्दे पर एपिस का प्रभाव अधिक पड़ने के कारण ही इसकी क्रिया से सेल्यूलर टिशु श्लैष्मिक झिल्ली, त्वचा, फाइब्रस टिशु, जीभ, मुंह, गला आदि में सूजन होने पर लाभदायक है।
रोगी के आंखें तथा चेहरे पर सूजन आ जाती है और सूजन नीचे की ओर लटक जाते हैं, गले में सूजन आ जाती है। हाथ, पांव फूल जाते हैं, पेट का चमड़ा मोटा पड़ जाता है, सूजन वाले भाग पर अंगुली से दबाव देने पर गाढ़ा पड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
रोगी के शरीर के कई अंगों में सूजन आ जाती है। गर्म कमरे के अन्दर, पीने की गर्म वस्तु से, गर्म कपड़ों से, आग की गर्मी, गर्म कपड़े पहनने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इसलिए इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
रोगी के शरीर की सूजन में इस प्रकार का दर्द तथा जलन होती है जैसे कि यदि कोई मधुमक्खी का डंक लग जाता है तो डंक वाले जगह पर सूजन और जलन होती है। जलन वाले स्थान पर ठण्डा पानी या ठण्डी चीज रखने से रोगी को कुछ आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ऐसे रोग जो दब जाने वाले होते हैं और बार-बार होते रहते हैं और इस प्रकार से पीड़ित रोगी को बुखार अधिकतर बार-बार होता रहता है, खसरा रोग भी हो जाता है, शीतपित्त तथा लाल ज्वर आदि रोग भी हो जाता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि उपयोग लाभदायक है।
जब किसी भी रोगी की त्वचा पारदर्शी और मोम जैसी लगने लगती है तो उसका उपचार करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में मेलीफिका औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी अपने आप को थका हुआ महसूस करता है, सिर में चक्कर आने लगते है तथा इसके साथ ही छीकें आने लगती हैं, जब रोगी लेटता है या आंखें बंद करता है तो उसे अधिक परेशानी होने लगती है, गर्मी से ताप से दर्द वाले जगह पर दबाव देने से तथा हिलने-डुलने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। सिर के पिछले भाग में दर्द होता है तथा भारीपन महसूस होता है, कभी-कभी तो रोगी को ऐसा महसूस होता है कि कोई उसके सिर में छुरा घोंप रहा है, दर्द का असर गर्दन तक फैल जाता है तथा इसके साथ ही रोगी को संभोग करने की इच्छा होने लगती है, इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए मेलीफिका औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मन से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी का स्वभाव उदासीपन हो तथा वह दूसरे व्यक्तियों से घृणा करता हो, कभी-कभी वह बेहोश भी हो जाता हो। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हाथ-पैर तथा शरीर के अन्य अंगों में सूजन आ जाती है, शरीर में अकड़न भी हो जाती है, रोगी कभी-कभी चीखने लगता है, कभी तो वह चौंक भी जाता है, कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि मृत्यु होने वाली है, वह किसी भी चीजों के बारे में ठीक तरह से सोच नहीं पाता है, रोगी को किसी दूसरे व्यक्ति के प्रति चिढ़ होने लगती है और वह किसी भी कार्य को करने से पहले ठीक रूप से उसके बारे में सोच नहीं पाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की पलकें सूजकर लाल हो जाती हैं, आंखों के आस-पास सूजन आ जाती है तथा उसमें जलन होने लगती है, आंखों से आंसू निकलने लगता है।
रोगी को रोशनी अच्छी नहीं लगती है, आंखों में अचानक तेज दर्द होने लगता है, नेत्र कोटरों के चारों ओर दर्द होने लगता है, पानी निकलने लगती है तथा जलन के साथ दर्द होने लगता है।
इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कान के बाहरी भागों पर सूजन आ जाती है तथा लाली पड़ जाती है, उसमें तेज जलन तथा दर्द होने लगता है, कभी-कभी सूजन न होकर खाली लाली पड़ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के नाक के नथुने पर लाली छा जाती है तथा उसमें सूजन भी आ जाती है और उसमें जलन के साथ दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के चेहरे पर सूजन, लाली आ जाती है तथा इसके साथ ही उस भाग में जलन तथा दर्द होने लगता है। कभी-कभी तो चेहरे के किसी भाग में मोम जैसी पीली सूजन आ जाती है और उस भाग में दर्द तथा जलन होने लगती है। रोगी का रोग दायीं चेहरे से बायीं चेहरे की तरफ फैलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मुंह तथा गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की जीभ लाल, सूजन तथा जलन युक्त हो जाता है, जीभ पर खुरदरी फफोलेदार सूजन हो जाती है तथा गले के अन्दर जलन होने लगती है।
रोगी के गले में जलन होने लगती है तथा उसे ऐसा महसूस होता है कि उसके गले के अन्दर कोई आग की तरह गर्म वाली चीज फंसी हुई है, गले में अधिक गर्मी महसूस होती है, रोगी को कंपकंपी होने लगती है, मसूढ़ों में सूजन हो जाती है, होंठ सूज जाते हैं तथा अधिकतर ऊपर के होंठ पर सूजन आ जाती है।
रोगी के मुंह तथा गले के अन्दर झिल्लियां ऐसी चमकती है जैसे उनमें कोई रोग हो गया हो, मुंह तथा गले के अन्दर लाली आ जाती है और उसमें सूजन आ जाती है, रोगी के जीभ के अन्दर कैंसर हो जाता है।
इस प्रकार मुंह तथा गले के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को आमाशय में दर्द महसूस होता है, उसे प्यास नहीं लगती है। रोगी को उल्टी भी हो जाती है जिससे खाया हुआ भोजन बाहर निकलता है, दूध पीने की इच्छा बहुत अधिक होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
जलोदर रोग (पेट में पानी भर जाना) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पेट में पानी भर जाता है जिसके कारण पेट भारी हो जाता है तथा उसमें सूजन आ जाती है, रोगी को पेशाब बहुत कम मात्रा में होती है तथा उसके पेशाब का रंग गहरा होता है, इसके साथ ही पेट के कई भागों में दर्द होता है तथा रोगी को दर्द ऐसा महसूस होता है कि जैसे किसी मधुमक्खी का डंक पेट के उस भाग में लग गया है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
श्वास संस्थान से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के गर्दन में सूजन आ जाती है तथा इस भाग पर कोई चीज छू जाती है तो उसे यह सहन नहीं हो पाता है तथा तेज दर्द होता है तथा इसके साथ उसे सांस लेने में परेशानी होने लगती है, उसका दम घुटने लगता है, रोगी मुश्किल से सांस ले पाता है, उसे कंपकंपी होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हृदय रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को हृदय रोग होने पर दम घुटने लगता है और उसे ऐसा महसूस होता है कि वह अब दुबारा सांस नहीं ले सकेगा। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
गर्भाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के गर्भाशय के मुंह पर घाव हो जाता है, गर्भाशय से रक्त की कुछ मात्रा स्राव होने लगता है तथा रोगी स्त्री का मासिकधर्म शुरु होने पर बहुत कम स्राव होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
डिम्बाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के डिम्बाशय में फोड़ा-फुंसियां हो जाती है तथा उसमें ऐसा दर्द महसूस होता है जैसे की मधुमिक्खयों के डंक मारने पर दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्रियों के रोग को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पेट में दर्द होता है तथा जब पेट पर दबाव देते है या रोगी जब छींकता है तो उसके पेट में मरोड़ के साथ दर्द उत्पन्न होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मल तथा मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को मल कभी कभी अपने आप ही हो जाता है तथा उसका मलद्वार खुला रहता है।
रोगी के मलद्वार से रक्त की कुछ मात्रा का स्राव होने लगता है तथा मलद्वार में जलन महसूस होती है।
बवासीर रोग से पीड़ित स्त्री और इस रोग के साथ ही जब वह बच्चे को जन्म देती है तो उसके बाद उसे तेज दर्द होता है, उसे दस्त हो जाता है, मल से पीला पानी की तरह तरल पदार्थ निकलता है।
रोगी जब तक मलत्याग नहीं कर लेता तब उसे पेशाब नहीं आता है, पेशाब का रंग गाढ़ा होता है तथा उसमें से बदबू आती है, जब रोगी खाना खा लेता है तो उसे अधिक परेशानी होने लगती है, कब्ज की शिकायत भी हो जाती है तथा उसे ऐसा महसूस होता है कि जैसे यदि उसने मलत्याग करने में अधिक जोर लगाया तो उसका मल टूटकर अन्दर ही रह जायेगा।
रोगी को पेशाब करते समय जलन होने लगती है तथा दर्द भी महसूस होता है, पेशाब बहुत ही कम मात्रा में होता है, जब पेशाब की अंतिम बूंद निकलती है तो और भी तेज जलन महसूस होती है तथा रोगी को चीस मारता हुआ दर्द होता है।
इस प्रकार मल तथा मूत्र से संबन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी स्त्री के दाहिनी डिम्बकोष में सूजन हो जाती है तथा इसके साथ इस भाग में जलन तथा दर्द होने लगती है।
रोगी स्त्री को मासिकधर्म शुरु होने के दिनों में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
रोगी स्त्री को गर्भावस्था के शुरू-शुरू के पहले दो से तीन महीने के अन्दर यदि गर्भपात होने की आशंका हो।
रोगी स्त्री को सांस लेने में परेशानी होने लगती है, दम घुटने लगता है, गले में कोई चीज छू जाना महसूस होता है।
इस प्रकार के स्त्री रोग के इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
चर्म (स्कीन) से सम्बन्धित लक्षण :- एपिस मेलीफिका औषधि बहुत से चर्म रोगों को ठीक करने में उपयोगी है, जब रोग का प्रकोप बहुत अधिक हो जाता है तथा त्वचा पर सूजन हो जाती है, उसमें जलन तथा डंक मारता दर्द होता है, गर्मी होने के कारण रोग के लक्षणों में वृद्धि हो जाती है, ठण्ड से रोगी को आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को शाम के समय में तेज बुखार हो जाता है। इस प्रकार के बुखार को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
रोगी को ठण्ड के समय में प्यास लगती है तथा बुखार चढ़ने लगता है या फिर पसीने के समय में प्यास लगती है, जब रोगी गर्म कमरे में रहता है या बाहर की गर्मी अधिक होती है तो उसे अधिक परेशानी होती है, ठण्ड के समय में रोगी के हाथ-पांव गर्म रहते हैं।
रोगी को बुखार रहता है तथा ठण्ड के समय में उसके शरीर में जलन होती है और उसका दम घुटने लगता है।
रोगी के शरीर में जलन होती है तथा जलन उसे मधुमक्खी के डंक लगने के समान लगता है और उसे प्यास नहीं लगती है, आंख के नीचे की त्वचा फूलकर थैले की तरह लटक जाती है, इसे छूने पर दर्द होता है, चमड़ा मोम की तरह सफेद हो जाता है, गर्मी के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, ठण्डा पानी का उपयोग करने से तथा खुली हवा में रहने से रोग के लक्षणों से कुछ आराम मिलता है।
इस प्रकार के बुखार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
दस्त से सम्बन्धित लक्षण :- ऐसा रोगी जिसे अतिसार बार-बार हो रहा हो तथा उसे ऐसा महसूस होता हो कि गुदाद्वार में मल रोकने की क्षमता (शक्ति) नहीं रह गई है या मलद्वार का मुंह खुला हुआ सा लगता हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के बाहरी अंगों में कई जगह पर सूजन आ जाती है, तथा इसके साथ-साथ रोगी को घुटन होने लगती है, उसका सूजा हुआ भाग लाल हो जाता है, सूजन वाले भाग में दर्द होने लगता है, रोगी के शरीर में अकड़न होने लगती है और सूजन वाले भाग में रोगी को ऐसा दर्द होता है जैसे कि उस भाग में मधुमक्खी का डंक लग गया हो। रोगी के पीठ और कई अंगों के जोड़ों में दर्द होने लगता है, पैरों में सूजन तथा अकड़न हो जाती है, हाथ-पैरों की अंगुलियों के पोरों में सुन्नपन आ जाता है, शरीर के कई अंगों में खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कोई रोग हो जाने के कारण नींद सही से नहीं आती है, चिन्ता होने लगती है, रात को नींद में कार्य करने के सपने आते हैं और वह एका-एक चीखकर उठ जाता है तथा वह अचिम्भत (हैरान हो जाना) सा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
नेट्रम-म्यूर औषधि के साथ एपिस मेलीफिका औषधि की समान तुलना कर सकते हैं।
स्कालैटिना, ऐल्बयूमिन्यूरिया (स्कारलेटिना, एल्ब्युमीनिरिया. सफेद दाग, चोट लगे निशान, कटे-फटे निशान आदि ) रोग को ठीक करने में कैन्थ, डिजि-टेलिस, हेल औषधि का उपयोग करने से यदि रोग ठीक न हो तो इसके बदले एपिस मेलीफिका औषधि का उपयोग करने से रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है और रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
नींद टूटने पर, भीगने से, सोने के बाद तथा गर्म करे के अन्दर रहने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन. ह्रास) :-
रोग ग्रस्त स्थान को पानी से धोने से या ठण्डे जल से नहाने से, खुली हवा में रहने, चलने, खांसने या करवट बदलने से दर्द में कमी होती है, ठण्डी वस्तुओं का लेप करने से, सीधे होकर बैठने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
एपिस मेलीफिका औषधि की मूलार्क से तीसवी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। कभी-कभी एपिस मेलीफिका औषधि की धीमी क्रिया होती है, सुबह के समय में इसका प्रभाव कई दिनों के बाद नज़र आता है और इसके बाद मूत्र की मात्रा बढ़ जाती है।
एपियम ग्रैवियोलेन्स (APIUM GRAVEOLENS)
एपियम ग्रैवियोलेन्स औषधि में तेज नींद लाने वाली शक्ति होती है। पेशाब करने में अधिक कष्ट होना, सिर में गर्मी होने के साथ दर्द होना, हृदय में जलन जैसी समस्या होने पर इस औषधि का उपयोग करना चाहिए। गले, चेहरे तथा हाथों में सूजन आना, गर्दन की पेशियों के जोड़ों में दर्द होना, त्रिकास्थि में दर्द होना तथा लगातार बढ़ने वाला दर्द को ठीक करने के लिए एपियम ग्रैवियोलेन्स औषधि का उपयोग लाभदायक है।
स्त्रियों को यदि मासिकधर्म शुरु होने के साथ तेज दर्द हो रहा हो, रुक-रुककर दर्द हो रहा हो। इन लक्षणों के होने के साथ ही यदि स्त्री अपनी टांगों को फैलाती है तो उसे कुछ आराम मिल रहा हो तो ऐसी स्त्रियों के रोगों को ठीक करने के लिए एपियम ग्रैवियोलेन्स औषधि का उपयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में एपियम ग्रैवियोलेन्स औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी घबराया सा रहता है, शरीर में फुर्ती तथा चित्त की चंचलता महसूस होती है, अधिक सोचने-विचारने के कारण सो नहीं सकता। खाना खाने के बाद रोगी को सिर दर्द से कुछ आराम मिलता है, नेत्रगोलक (आइबॉलस) अन्दर की ओर धंसे हुए महसूस होते हैं, आंखों में खुजली मचने लगती है, बायीं आंख के अन्दरूनी कोण में खुजली और चीस मचता हुआ दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एपियम ग्रैवियोलेन्स औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पेट में दर्द होता है तथा पेट में ऐसा महसूस होता है जैसे पेट में कोई चीज फंस गई है जिसके कारण चुभन हो रही है तथा मल ऊपर की ओर आ रहा है, तथा दस्त भी हो जाता है, बायें श्रोणि-प्रदेश (लेफ्ट इलेक रिजन) में तेज दर्द होता है जो दायीं ओर को फैलता है, जैसे-जैसे दर्द बढ़ता जाता है वैसे-वैसे ही जी मिचलाने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपियम ग्रैवियोलेन्स औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्री रोगी के दोनों डिम्बाशय प्रदेशों में तेज और चुभने वाला दर्द होता है, बायीं ओर दर्द होने के समय में ऊपर की ओर मुड़ने से, बायीं ओर लेटने से तथा टांगों को फैलाने से कुछ दर्द से आराम मिलता है, स्तनों को छूने से दर्द महसूस होता है, स्त्रियों के इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपियम ग्रैवियोलेन्स औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को नाक तथा मुंह के आस-पास गुदगुदाहट महसूस होती है, सूखी खांसी हो जाती है, उरोस्थि (स्टेरनम) के ऊपर तेज सिकुड़न होने के साथ लेटने पर पीठ में खिंचाव महसूस होती है, गले में सूजन आ जाती है तथा सांस लेने में परेशानी होती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपियम ग्रैवियोलेन्स औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर पर खुजली होने लगती है तथा खुजलाने पर चकत्ते जैसे निशान बन जाते हैं तथा खुजली होने वाले स्थानों पर जलन तथा चीटी रेंगने जैसा महसूस होता है, शरीर के कई अंगों पर दाने निकल आते हैं, इन दानों से दूषित द्रव्य निकलता रहता है, रोगी को छपाकी रोग हो जाता है तथा इसके साथ पूरे शरीर में कंपकंपी होती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपियम ग्रैवियोलेन्स औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर में फूर्ती नहीं होती है, ठीक तरह से नींद नहीं आती है, सुबह एक बजे से छ: बजे तक रोगी जागता रहता है तथा शरीर में थकान अधिक महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपियम ग्रैवियोलेन्स औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
एपियम ग्रैवियोलेन्स औषधि की पहली से तीसवी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एपोसाइनम एण्ड्रसेमीफोलियम (APOCYNUM ANDROSAEMIFOLIUM)
आमवात के रोग को ठीक करने के लिए एपोसाइनम एण्ड्रसेमीफोलियम औषधि का लाभदायक प्रभाव होता है। रोगी के शरीर के कई अंगों में दर्द होता रहता है तथा दर्द होने के कारण अंगों में खिंचाव तथा सिकुड़न होती है, प्रत्येक वस्तु से शहद जैसी खुश्बू आती है जिसके कारण हर चीज का स्वाद शहद जैसा लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए इसका उपयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में एपोसाइनम एण्ड्रसेमीफोलियम औषधि का उपयोग-
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंगों में दर्द होता रहता है तथा हड्डी के सभी जोड़ों, पैरों की उंगलियों और तलुवों में दर्द होता रहता है, हाथ-पैरों में सूजन आ जाती है, अधिक मात्रा में शरीर से पसीना निकलने लगता है, तलुवों में अधिक गर्मी महसूस होती है, पैर की उंगलियों में चुनचुनाहट युक्त दर्द होता है। तलुवों में ऐंठन और अधिक गर्मी महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपोसाइनम एण्ड्रसेमीफोलियम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
जीभ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जीभ का स्वाद शहद के स्वाद के जैसा हो जाता है और जिसके कारण कोई भी भोजन खाने पर भोजन का स्वाद शहद के स्वाद जैसा ही लगता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए एपोसाइनम एण्ड्रसेमीफोलियम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट के कीड़ों को मारने के लिए एपोसाइनम एण्ड्रसेमीफोलियम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :- एपोसाइनम एण्ड्रसेमीफोलियम औषधि की मूलार्क से पहली शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐपोसाइनम कैनेबिनम (Apocynum Cannabinum)
ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि कई प्रकार के सूजन के रोगों को ठीक करने के लिए प्रयुक्त किया जा सकती है जिसके फलस्वरूप सूजन का रोग ठीक हो जाता है। इसका प्रभाव गुर्दें, त्वचा और त्वचा की झिल्ली पर पड़ता है, जिसके फलस्वरूप अनेकों प्रकार के सूजन के रोग ठीक हो जाते हैं, दोनों के लक्षण इतने मिलते-जुलते हैं कि यदि इनमें व्यापक लक्षणों पर तथा रोग के लक्षणों की वृद्धि और लक्षणों को नष्ट करने पर ध्यान न दिया जाए तो हर एक प्रकार के सूजन रोग को ठीक करने में ये उपयोगी हैं।
ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का उपयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए किया जा सकता है जैसे-जलोदर रोग (पेट में पानी भर जाना), पेट में जल भरने के कारण सूजन होना, गले की सूजन, छाती की सूजन तथा मूत्रप्रणाली से सम्बन्धित रोगों और विशेषत: मूत्ररोध एवम पेशाब का रुक जाना आदि रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है।
गुर्दे में सूजन (ब्राइटस डीसिज) होने के कारण होने वाले पाचन दोशों के साथ मितली की समस्या, उल्टी की समस्या, नींद न आना, सांस लेने में परेशानी आदि लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
जो सूजन का रोग ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि से ठीक हो सकता है वह रोग एपिस औषधि से ठीक नहीं हो सकता है। ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि उन रोगियों पर प्रयुक्त होता है जो ठण्डी प्रकृति वाला होता है, रोगी को ठण्डी हवा अच्छी नहीं लगती है तथा ठण्डी हवा में रहने से उसके रोग के लक्षणों में वृद्धि होने लगती है जबकि एपिस औषधि उन रोगियों में प्रयुक्त होता है जिनको गर्मी ज्यादा पसन्द नहीं। रोगी के इन्ही लक्षणों के अनुसार ही सूजन के कई रोगों को ठीक करने के लिए होम्योपैथिक चिकित्सा शास्त्र में इस औषधि का विशेष महत्व है। हाथ, पांव, नाक, कान, सिर इत्यादि समस्त अंगों के लक्षण मिल जाने पर भी यदि यह प्रधान व्यापक लक्षण है जो कि रोगी से सम्बन्ध रखता हो तो इन लक्षणों को छोड़ दिया जाये तो ऐपोसाइनम औषधि के प्रयोग से जो रोगी ठीक होते हैं उनको किसी भी तरह से आराम नहीं मिले तो इसका उपयोग नहीं करना चाहिए।
रोगी से रोग के लक्षण पूछने ही पर मालूम होगा कि रोगी की समस्त शिकायतें ठण्ड से बढ़ती हैं या नहीं। यदि रोगी खुली हवा बर्दाश्त नहीं कर पर रहा हो तथा गर्मी में रहने से वह अच्छा रहता है।
कुछ रोगी तो खूब गर्मी पसन्द करते हैं, कुछ खूब ठण्डक पसन्द करते हैं, कुछ दोनों को पसन्द करते हैं-इन तीनों प्रकार के लक्षणों पर सर्वप्रथम ध्यान रखना होगा तथा औषधि का प्रयोग ठीक प्रकार से हो सकेगा। रोगी के कमरे के अन्दर पांव रखते ही इन तीनों प्रकार के लक्षणों को जानना पड़ेगा। नये और पुराने रोग को अच्छी तरह से जानने के लिए यह दोनों बातें सर्वप्रथम आवश्यक हैं और भी एक प्रकार के रोगी होते हैं जो ठण्डक भी पसन्द नहीं करते और गर्मी भी पसन्द नहीं करते।
जिस रोगी को सूजन हो जाता है और साथ ही वह पानी काफी ज्यादा पीता है तथापि कुछ भी पानी का निकास नहीं होता अर्थात पेशाब और पसीना बहुत थोड़ा निकलता है, शरीर बहुत ही खुश्क रहता है, रोगी यह महसूस करता है कि उसे पसीना आ जाए तो उसकी तबीयत बहुत हल्की हो जाएगी, लेकिन पसीना नहीं आता है। ऐसे रोगी के सूजन वाले भाग में गड्ढा पड़ जाता है। रोगी रोग ग्रस्त भाग को ढककर रखना पसन्द करता है लेकिन एपिस औषधि का प्रयोग उन रोगियों पर किया जाता है जो रोगी ग्रस्त भाग को खुला ही रखना पसन्द करते हैं।
यदि रोगी को प्यास के साथ शरीर के कई भागों में सूजन है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए आर्सेनिक और ऐसेटिक ऐसिड औषधि का प्रयोग करते हैं। ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का भी प्रयोग किया जाता है अत: कहा जा सकता है कि इन औषधियों का ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि से घनिष्ट सम्बन्ध है, फर्क यह है कि किसी भी रोग में रोगी के साधारण स्वास्थ्य की अत्यन्त कमजोरी उपस्थित होकर बेहद जलन और बेचैनी रहने पर रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्सेनिक औषधि का प्रयोग किया जा सकता है।
दिल और नब्ज की अनियमित गति होने, अधिक नींद आने, उदासी, प्यास आदि लक्षण होने पर ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि उपयोगी है। एसेटिक ऐसिड औषधि का प्रयोग उन रोगियों पर किया जाता है जिनकी नब्ज की गति इस प्रकार की नहीं होती है।
विभिन्न लक्षणों में ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के किसी भाग में सूजन होने के साथ ही और भी कई मन से सम्बन्धित लक्षण हैं जो इस प्रकार हैं- रोगी को व्याकुलता होने लगती है, घबराहट अधिक होती है तथा उत्साह में कमी होती है। इस प्रकार सूजन के साथ मन से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के किसी भाग में सूजन होने के साथ ही और भी नाक से सम्बन्धित कई लक्षण हैं जो इस प्रकार हैं-
रोगी को लम्बे समय तक छींके आती रहती है, बच्चों की नाक से कफ की तरह का पदार्थ निकलता रहता है, , बार-बार नाक बंद हो जाता है, सोचने की शक्ति कमजोर हो जाती है, धीर-धीरे सिर में दर्द होने लगता है।
सूजन रोग होने के साथ-साथ सर्दी तथा जुकाम हो जाता है, नाक के नथुनों में अधिक खून का संचारण होने लगता है और जिसके कारण नाक बंद हो जाता है।
इस प्रकार सूजन के साथ नाक से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के किसी भी भाग में सूजन होने के साथ ही और भी कई आमाशय से सम्बन्धित लक्षण हैं जो इस प्रकार हैं-
रोगी का जी मिचलाने लगता है, वह उदास सा रहने लगता है, चलते समय उसे प्यास अधिक लगती है और कभी-कभी उसे उल्टियां होने लगती है तथा उल्टियों में भोजन तथा पानी अधिक निकलता है।
रोगी को आमाशय में हल्कापन तथा कभी भारीपन महसूस होने लगता है, पांचनतंत्र तथा छाती में घुटन होने लगती है जिसके कारण रोगी को सांस लेने में परेशानी होने लगती है।
रोगी को आमाशय के अन्दर खालीपन महसूस होता है, पेट फूल जाता है, और जलोदर रोग हो जाता है।
इस प्रकार शरीर में सूजन होने के साथ आमाशय के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के किसी भी भाग में सूजन होने के साथ ही मल से सम्बन्धित लक्षण होने पर ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का उपयोग लाभदायक है जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। ये लक्षण कुछ इस प्रकार हैं-रोगी के मल के साथ ही पानी जैसा तरल पदार्थ निकलता है तथा जब मल त्याग करता है तो मल के साथ वायु भी निकलने लगती है, मलद्वार में दर्द भी होने लगता है, खाना खाने के बाद रोगी को और भी अधिक परेशानी होने लगती है, ऐसा महसूस होता है कि मलद्वार के पास की पेशियां सिकुड़ी तथा खुली हुई हो और पाखाना अपने आप बाहर निकल गया हो। इस प्रकार सूजन के साथ मल से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के किसी भी भाग में सूजन होने के साथ में यदि उसे मूत्र से संबन्धित लक्षण भी हो गया हैं तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का प्रयोग लाभदायक है। ये लक्षण इस प्रकार हैं -
रोगी का मूत्राशय अधिक फूला रहता है।
रोगी का पेशाब अधिक गंदा, गर्म और साथ ही गाढ़ा कफ युक्त होता है तथा इसके साथ ही मूत्रमार्ग में जलन भी होती है।
रोगी को पेशाब बाहर निकालने की शक्ति कम हो जाती है, और पेशाब बूंद-बूंद करके टपकता है।
रोगी को पेशाब करने में परेशानी होने के साथ ही दर्द महसूस होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के शरीर के किसी भाग में सूजन होने के साथ ही यदि कई और भी लक्षण हैं तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। ये लक्षण इस प्रकार हैं-
रोगी स्त्री को मासिकधर्म शुरू नहीं होता है तथा इसके साथ ही उसका पेट फूलने लगता है और अधिक मात्रा में स्राव होने लगता है तथा साथ ही शरीर में अधिक कमजोरी महसूस होने लगती है, कभी-कभी तो उसे बेहोशी भी आ जाती है।
रोगी स्त्री को वय:सन्धिकाल (चैंज ऑफ लाइफ) के दौरान रक्तस्राव होने लगता है, खून के बड़े-बड़े थक्के रक्तस्राव के साथ निकलने लगते हैं।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के कई भागों में सूजन होने के साथ ही श्वास से सम्बन्धित लक्षण हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का प्रयोग लाभदायक है। ये लक्षण इस प्रकार हैं-
रोगी को रुक-रुककर खांसी होने लगती है, श्वास उखड़ा सा रहता है तथा श्वास लेने में परेशानी होती है।
रोगी लम्बी श्वास लेता है और श्वास लेते समय ऐसा लगता है कि वह आहें भर रहा है।
रोगी के पाचनतंत्र भाग में घुटन होने लगती है तथा छाती में घुटन होने लगती है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के किसी भाग में सूजन होने के साथ ही हृदय से सम्बन्धित कुछ लक्षण भी हो तो ऐसे लक्षणों को जानकर ही ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। ये लक्षण इस प्रकार हैं- रोगी का हृदय तेज गति से चलता है तथा हृदय कमजोर हो जाता है, उसकी हृदय अनियमित गति से चलने लगती है, कभी-कभी धमनी हल्का तथा तनावयुक्त हो जाता है, गर्दन की नाड़ियां फड़फड़ाने लगती हैं, गले में सूजन हो जाती है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के किसी भाग में सूजन होने के साथ नींद से सम्बन्धित कुछ लक्षण भी हैं तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का उपयोग लाभदायक हैं। ये लक्षण इस प्रकार हैं- रोगी को अधिक बेचैनी होती है तथा बहुत कम मात्रा में नींद आती है।
बच्चों से सम्बन्धित लक्षण :- बच्चे के सिर के अन्दर जल (पानी) जम जाने पर ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
खोपड़ी की हडि्डयों की जोड़ खुल गई हो, बेहोशी आ जाती हो, एक आंख से दिखाई नहीं देता, एक हाथ और एक पांव लगातार हरकत (चलते रहते हैं) किया करते हैं, माथे की हड्डी बाहर की तरफ उभर आती है और इन लक्षणों के साथ में यदि रोगी को पेशाब अधिक आने लगे तो ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
जलोदर रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का पेट फूल जाए और हाथ पांव फूलने लगे और साथ ही यदि किसी स्त्री का मासिकधर्म आना रुक जाए तो ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि से उपचार करना चाहिए। ऐसे रोगी की एक और पहचान है कि वह तकिए से सिर को उठाने में कमजोरी महसूस करती है, कभी-कभी तो उसे बेहोशी भी उत्पन्न हो जाती है।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को मियादी बुखार हो जाता है तथा इसके साथ ही शरीर के कई अंगों में सिकुड़न भी होने लगती है और कुनाइन का अधिक सेवन करने के कारण उत्पन्न रोग को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मस्तिष्क से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मस्तिष्क में शोथ (सूजन) उत्पन्न हो जाता है, मस्तिष्क के अन्दर जल (पानी) जमा हो जाता है और मस्तिष्क के जोड़ ढीले पड़ जाते हैं, आंख की रोशनी भी कम हो जाती है, ठीक प्रकार की नींद भी नहीं आती है, एक हाथ और पैर में कंपन होने लगती है तथा पेशाब भी रुक जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
सूजन के रोग रोग को ठीक करने में ऐसेटिक ऐसिड, एपिस, आर्स, चयना और डिजिटै औषधियों के साथ ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि का सम्बन्ध होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
ठण्डे मौसम में, ठण्डा पानी पीने से, ओढ़ना हटाने से तथा लेटने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होने लगती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
सीधा तनकर बैठने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
ऐपोसाइनम कैनेबिनम औषधि की मूलार्क का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अमार्फिया (Apomorphia)
अमार्फिया औषधि की मुख्य शक्ति का रहस्य है इस बात से पता चल जाता है कि रोगी जब इसका उपयोग करता है तो उसके शरीर में कई प्रकार के लक्षण हो जाते हैं- उल्टी आने के साथ ही जी मिचलाना, आलस्य आना तथा शरीर से पसीना निकलना, आंखों से आंसू निकलना तथा कफ का बाहर निकलना। इन लक्षणों के होने के बाद रोगी का रोग ठीक होने लगता है।
रोगी को न्यूमोनिया रोग के साथ उल्टी होती है और रोगी को कब्ज की शिकायत हो जाती है तथा मलद्वार से हवा निकलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमार्फिया औषधि का उपयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
चक्कर आना, आंखों का फैल जाना, मिचली तथा उल्टियां होना आदि इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए अमार्फिया औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सारे शरीर में गर्मी महसूस होना तथा सिर गर्म होना, उबकाई आना तथा सिर में दर्द होना, हृदय के स्कन्ध फलकों में दर्द होना आदि इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमार्फिया औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
अमार्फिया औषधि के अन्य उपयोग :-
त्वचा के माध्यम से एक ग्रेन के सोलहवें भाग का इंजेक्शन पांच मिनट से पन्द्रह मिनट के अन्दर-अन्दर एक व्यस्क व्यक्ति में बिना किसी अन्य प्रत्यक्ष क्रिया के ही उल्टी की अवस्था पैदा कर देती है जिसके फलस्वरूप शरीर की गंदगी बाहर हो जाती है। अफीम द्वारा उत्पादित विषाक्त अवस्था (जहरीली अवस्था) में इसका प्रयोग मत कीजिए। अपोमार्फिया औषधि को एक ग्रेन के तीसवें भाग या उससे भी कम मात्रा में एक त्वचा के माध्यम से इंजेक्शन द्वारा दिया जाने पर यह सुरक्षित एवं ठीक प्रकार से कार्य करती है जिसके फलस्वरूप कई प्रकार के रोग के लक्षण ठीक हो जाते हैं। प्रलाप (बड़बड़ाना) की स्थिति में भी अमार्फिया औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
मात्रा (डोज) :-
अमार्फिया औषधि की तीसरी से छठी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अरेलिया रेसीमोसा (ARALIA RACEMOASA)
अरेलिया रेसीमोसा औषधि का प्रयोग दमा रोग होने पर उन अवस्थाओं में किया जाता है जिनमें रोगी को लेटने से खांसी बढ़ती, सोते समय पसीना अधिक निकलता है, सारा शरीर भीगा रहता है, रोगी जरा भी हवा बर्दाश्त नहीं करता है, अतिसार हो जाता है, रोगी अपने शरीर को जिस तरफ करके लेटता है उस भाग में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए इसका उपयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में अरेलिया रेसीमोसा औषधि का उपयोग-
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को रात के समय में पहली नींद के बाद सूखी खांसी होती है, लेटने पर दमा का दौरा तेज हो जाता है तथा इसके साथ ही सूखी खांसी होने लगती है, रोगी को पहली नींद लेने के बाद रोग का प्रकोप और तेज हो जाता है और गले के अन्दर गुदगुदी, छाती में सिकुड़न होने लगती है, रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक परेशानी होती है। कभी-कभी रोगी को छींकें आने लगती है, साथ ही नाक से कुछ मात्रा में पानी जैसा दूषित तरल पदार्थ निकलता है जिसका स्वाद नमकीन होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अरेलिया रेसीमोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों का मासिकधर्म बंद होने के साथ रोगी के योनि से सफेद पानी निकलने लगता है तथा तेज दर्द होता है और इसके साथ ही स्त्री के बच्चेदानी की तरफ दर्द होता है, जब यह स्राव होना बंद हो जाता है तो रोगी स्त्री का पेट फूलने लग जाता है। रोगी स्त्री के इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अरेलिया रेसीमोसा औषधि का उपयोग करना फायदेमन्द होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
रात को 11 बजे के बाद रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
दमा रोग होने के साथ ही तेज और कष्टदायक सांस लेने की स्थिति हो तथा दाईं ओर की छाती में सिकुड़न हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अरेलिया रेसीमोसा औषधि का प्रयोग करते हैं लेकिन इस स्थिति में स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए अरेलिया रेसीमोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए। अत:पेक्टन-स्कैला औषधि के कुछ गुणों की तुलना अरेलिया रेसीमोसा औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
अरेलिया रेसीमोसा औषधि की मूलार्क से तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
आर्ब्युटस एण्डरेखने (Arbutus andranchne)
आमवाती गठिया रोग के लक्षणों तथा छाजन रोग को ठीक करने के लिए आर्ब्युटस एण्डरेखने औषधि का उपयोग किया जा सकता है।
हडि्डयों के जोड़ों में दर्द, लम्बी हडि्डयों के जोड़ तथा रोगी को अधिक साफ पेशाब आता है, ऐसे लक्षण त्वचा से हडि्डयों के जोड़ों पर अधिक होते हैं। पेशाब संबन्धी कई लक्षणों को ठीक करने के लिए आर्ब्युटस एण्डरेखने औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
आर्बुटिन, ब्रायोनिया, काल्मिया, लीडम औषधि से आर्ब्युटस एण्डरेखने औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा (डोज) :-
आर्ब्युटस एण्डरेखने औषधि की मूलार्क से तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐसाफेटिडा ( Asafoetida )
(1) फूला हुआ चेहरा, स्थूल, ढीला-ढाला, रक्तनीलिमा युक्त (लाल-नीला) रंग
(2) हिस्टीरिया में पेट से गले की तरफ एक गोलक का चढ़ना
(3) पेट में वायु तथा बड़े-बड़े डकार
(4) आतशकी-मिजाज, भिन्न-भिन्न अंगों में जख्म
(5) हड्डियों में रात को दर्द
(6) बायीं तरफ आक्रमण
(i) खुली हवा में घूमने से रोगी को आराम पहुँचना
(i) रात को रोग बढ़ जाना
(ii) बन्द कमरे में घबराना
(iii) स्रावों के रुक जाने पर
(iv) गर्म कपड़ा लपेटने पर
(v) बाईं ओर लेटने से वृद्धि
(1) फूला हुआ चेहरा, स्थूल, ढीलाढाला, रक्तनीलिमायुक्त रंग – हमारे शरीर में दो प्रकार की रक्तवाहिनियां हैं -‘घमनी’ तथा ‘शिरा’, जिन में से ‘धमनी’ में हृदय से शुद्ध-रक्त शरीर में जाता है, और ‘शिरा’ में अशुद्ध-रक्त फेफड़ों द्वारा शुद्ध होने के लिये हृदय में लौटता है। शिराओं का काम ढीला हो जाय, तो नीला खून शरीर में जगह-जगह रुक जाता है जिससे चेहरा फूला हुआ, शरीर ढीला-ढाला और रक्तनीलिमायुक्त रंग का हो जाता है। रक्त में कुछ लालिमा, कुछ नीलिमा मिली-जुली होती है। ऐसे रोगी को मोटा-ताजा देखकर सब लोग स्वस्थ समझते हैं, परन्तु शिराओं की शिथिलता के कारण उसका चेहरा फूला हुआ होता है, स्वास्थ्य के कारण नहीं। ऐसे रोगी के हृदय में कुछ विकार होता है जिसके कारण उसके शरीर में ‘शिरा-रुधिर-स्थिति’ पायी जाती है। ऐसे रोगियों का इलाज कठिन होता है, ये ‘शिरा-प्रधान-शरीर’ के रोगी होते हैं और इन्हें कई प्रकार के स्नायवीय रोग हुआ करते हैं जिनमें ऐसाफेटिडा लाभदायक है। इनमें से एक रोग हिस्टीरिया भी है।
(2) हिस्टीरिया में पेट से गले की तरफ एक गोलक का चढ़ना – ऐसाफेटिडा औषधि का प्रधान लक्षण है रोगी के पेट से गले की तरफ एक गोलक का चढ़ना। इसे नीचे उतारने के लिये रोगी बार-बार अन्दर निगलने की कोशिश करता है, परन्तु उसे ऐसा मालूम होता है कि यह गोलक पेट में से ऊपर चढ़ता.चला आ रहा है। इसका कारण यह है कि ऐसाफेटिडा औषधि में वायु की गति अधोगामिनी होने के स्थान में अर्ध्वगामिनी हो जाती है। हमारी आंतों में एक विशेष प्रकार की गति हुआ करती है जिससे भीतर का भोजन या मल आगे-आगे को धकेला जाता है। जैसे गिडोया अपने शरीर को आगे-आगे धकेलता है, कुछ वैसी ही आंतों में अग्रगामिनी-गति होती है जिससे मल गुदा-प्रदेश की तरफ बढ़ता है। इस गति को ‘अग्र-गति’ कहते हैं। ऐसाफेटिडा औषधि के रोगी में ‘प्रतिगामी अग्र-गति’ हो जाती है जिससे वायु आगे की तरफ जाने के बजाय पीछे की तरफ लौटती है, और इसी कारण रोगी हिस्टीरिया से पीड़ित हो जाता है जिसमें उसे एक गोलक का पेट से गले की तरफ चढ़ने का कष्टप्रद अनुभव होता है। इग्नेशिया में भी ऐसा गोलक गले की तरफ आता प्रतीत होता है। ऐसाफेटिडा में इस गोलक के अलावा पेट में वायु भी उर्ध्वगामी हो जाती है।
(3) पेट में उर्ध्वगामी वायु तथा बड़े-बड़े डकार – ऐसाफेटिडा का पेट उर्ध्वगामी वायु का मूर्त-चित्रण है। ऐसा लगता है कि वायु का निकास नीचे से बिल्कुल बन्द हो गया है। रोगी ‘प्रतिगामी अग्र-गति’ से पीड़ित हो जाता है। देखनेवाले को समझ नहीं पड़ता कि पेट में से इतनी हवा कैसे ऊपर से निकल रही है। हर सेकेंड बन्दूक की आवाज की तरह डकार छूटते हैं जिन पर रोगी का कोई बस नहीं होता।
(4) आतशकी-मिजाज, भिन्न-भिन्न अंगों में ज़ख्म आदि – सिफ़िलिस के पुराने मरीजों के जख्मों में, आंख के गोलक में स्नायुशूल, उसकी सफेदी, पर जख्म, आइराइटिस, अर्थात् आँख के उपतारा में प्रदाह आदि सिफ़िलिस से उत्पन्न होने वाले जख्मों में यह लाभप्रद है। आतशकी-मिजाज में कान, कान की हड्डी, घुटने के नीचे टांग की हड्डी पर भी जुख्मों का आक्रमण हो सकता है। गले में भी सिफ़िलिस के घाव हो सकते हैं, नाक के घाव जिनसे बदबूदार स्राव निकलता है। नाक की हडड़ी सड़ जाती है। अस्थिवेष्टन में दर्द होता है जो धीरे-धीरे हड्डियों पर आक्रमण कर देता है। इन सब में रोगी से पूछ लेना चाहिये कि उसे कभी आतशक का आक्रमण तो नहीं हुआ। घुटने के नीचे टांग की टीबिया हड्डी के जख्म में हनीमैन के कथनानुसार स्पंजिया बहुत लाभ करता है, यद्यपि ऐसाफेटिडा भी इस आतशकी जख्म में उपयोगी है।
(5) हड्डियों में रात को दर्द – आतशक के रोगियों की तकलीफें रात को बढ़ जाया करती हैं। रात को दर्द होता है। ऐसाफेटिडा दवा में भी आतशकी-मिजाज होने के कारण हड्डियों में और हड्डियों के परिवेष्टन में रात को दर्द होता है। दर्द हड्डी के अन्दर से बाहर की तरफ आता है। सिर-दर्द, किसी भी अंग में हड्डी के भीतर से उठने वाला दर्द-इस औषधि के रोगी में पाया जाता है।
(6) बायीं तरफ आक्रमण – ऐसाफेटिडा औषधि का पेट, हड्डी या शरीर के किसी अंग पर भी प्रभाव हो सकता है, परन्तु इसका आक्रमण शरीर के बायें भाग पर विशेष होता है। उदाहरणार्थ, हम नीचे बायीं, दायीं तथा दायें से बायीं, बायें से दायीं तरफ विशेष रूप से प्रभाव रखने वाली कुछ औषधियों का विवरण दे रहे हैं।
बायीं तरफ के रोग में औषधियां – अर्जेन्टम नाइट्रिकम, ऐसाफेटिडा, असरम, लैकेसिस, ओलियेन्डर, फॉसफोरस, सिलेनियम, सीपिया स्टैनम।
दायीं तरफ के रोग में औषधियां – आर्सेनिक, ऑरम, बैप्टीशिया, बेलाडोना, सारसापैरिला, सिकेल कौर, सल्फ्यूरिक ऐसिड।
दायीं तरफ से चलकर बायीं को जाना – लाइकोपोडियम।
बायीं तरफ से चलकर दायीं को जाना – लैकेसिस
एक तरफ से दूसरी तरफ और फिर पहली तरफ आ जाना – लैक कैनाइनम
(7) शक्ति तथा प्रकृति – 6, 30, 200 (औषधि ‘गर्म’ है)
ऐरण्डो ( Arundo Mauritanica)
[ वृक्ष के अंकुर से इसका टिंचर तैयार होता है ] – दिनों दिन होमियोपैथी की उन्नति के साथ-साथ नई-नई दवाओं का भी अविष्कार हो रहा है। दुःख की बात है कि अधिक परिमाण में व्यवहृत न होने के कारण अब तक उनका पूरा-पूरा लाभ देखने में नहीं आया। नीचे लिखी कई बीमारियों में इस दवा से बहुत फायदा होता देखा जाता है :-
अतिसार – दूध पीने वाले बच्चों के दाँत निकलने के समय पतले दस्त होना; इस वक़्त की खास दवाएँ – कैल्केरिया कार्ब, कैल्केरिया फॉस, कैमोमिला, पोडोफाइलम आदि व्यवहार करके यदि फायदा न मालूम हो तो – आखिर में इस दवा की आजमाइश करें। ऐरण्डो के दस्त का रंग – ज्यादातर हरा होता है और मलद्वार में जलन रहती है। दूध पीने वाले बच्चों को अक्सर अतिसार हो जाता है, उनके अतिसार की ये प्रधान दवा है।
सर्दी-खांसी – नाक से पानी की तरह नया श्लेष्मा या सर्दी झड़ना ; सर्दी आरम्भ होने के पहले नाक, आँख और मुंह के भीतर बहुत कुटकुटाहट और जलन होती है ; छींकें आती है और किसी चीज की गंध नहीं मालूम होती।
यह औषधि परागज – ज्वर (hay-fever) सर्दी जुकाम की अवस्थाओं में प्रयोग की जाने वाली एक प्रमुख औषधि हैं।
नाक व कान – नथुनों के अन्दर तथा मुंह के ऊपर वाले भाग में असहन खुजली होती है, नजला तथा रोगी की सुंघने की शक्ति लोप हो जाती है परागज ज्वर जो तालु तथा नेत्रश्लेष्मा (conjunctive) की जलन और खुजली के साथ शुरू होता है, कानों के पिछले भाग में छाजन (eczema) हो जाता है, श्रवण नलिकाओं (auditory canals) में जलन और खुजली होती है।
मुख – मसूड़ों से रक्तस्राव तथा मुँह में खुजली और जलन होती है। जीभ में दरार पड़ जाती है संयोजिक स्थलों में व्रण (ulcers) एवं नंगे घाव हो जाते हैं।
सिर – सिर में खुजली, बालों की जड़ों में दर्द, बाल झड़ना तथा फुंसियां। सिर के पिछले हिस्से में दर्द होता है, जो दाये रोमक प्रदेश (Ciliary region) तक फैलता है, सिर के दोनों तरफ अन्दर तक दर्द रहता है।
आमाशय तथा उदर – रोगी को खट्टी चीजें खाने की इच्छा होती है तथा आमाशय के अन्दर ठण्डक महसूस होती है। रोगी को ऐसा लगता है कि उसके पेट में कोई सजीव वस्तु घूम रही हैं, जघन प्रदेश में पीड़ा तथा पेट अफर जाता है।
मल, मूत्र – मलद्वार में जलन होती है तथा मल हरे रंग का होता है। पेशाब लाल रंग का तथा तलछट होता है।
रोगी को आलिंगन करने के बाद-शुक्र रज्जु (spermatic cord) में पीड़ा होती है। स्त्रियों को ऋतुस्राव नियत समय से बहुत पहले और अधिक मात्रा में होता है, योनि में खुजली के साथ संभोग की प्रबल इच्छा होती है। श्वास लेने में कष्ट (dyspnoea) खांसी में बलगम नीला होता है।
इन बीमारियों के अलावा – कान के पीछे का एक्जिमा ( अकौता ), सिर के केश झड़ना, केशों की जड़ों में दर्द, माथे में पीब भरे फोड़े, पैर के तलवों में सूजन और जलन, पैर के तलवों से बदबू और पसीना निकलना इत्यादि में भी ऐरण्डो लाभदायक है।
सम्बन्ध – तुलना कीजिए – लोलियम, सीपा, सैबाडि, सिलीका, ऐथोक्सेटम स्वीट, बर्नल ग्रास (परागज ज्वर एवं नजले में प्रयोग की जाने वाली प्रसिद्ध औषधि)।
मात्रा – तीसरी से छठी शक्ति।
ऐसेरम यूरोपियम ( Asarum Europaeum)
ऐसा मालूम पड़ना की जैसे झट से किसी ने कान बंद कर दिए हो, जिससे सुन नहीं पाना। कभी-कभी श्रवण शक्ति तेज हो जाना, यहाँ तक कि कागज की खड़खड़ आवाज़ भी सहन नहीं होना।
आँख की बीमारी – कंठमाला-धातुवालो की आँख की बीमारी में यह कैल्केरिया और सल्फर की अपेक्षा ज्यादा फायदा करती है।
ऐसेरम रोगी बड़ा ही स्नायुक्षीण, उत्तेजित और उदास होता है, उसका चित्त एक ठिकाने नहीं रहता, उसके चित्त में नाना प्रकार की हास्यास्पद बातें उदय हुआ करती हैं। वह अपने शरीर को इस कदर हलका मालूम करता है कि मानो प्रेत-देह की तरह वह शून्य में विचरण कर रहा है।
उसकी नसें इस कदर सचेत होती हैं कि यदि वह ख्याल भी करे तो कोई सूती या रेशमी कपड़े को नाखून से खरोच रहा है या कागज़ से खड़खड़ाहट शब्द पैदा कर रहा है, तो उसके लिए बड़ा ही अप्रिय है और उसके सारे शरीर में एक प्रकार की खलबली सी होने लगती है, इससे थोड़ी देर के लिए उसके सब कार्य तथा चिन्ताएं रुक जाती हैं। रोगी ऐसा अनुभव करता है कि मानो दोनों कान डाट से बन्द हो गये हैं। पढ़ते समय ऐसा अनुभव होता है कि मानों आँखें दब कर फट जायेगी या बाहर निकल पड़ेगी, आँखों को ठण्डे पानी से धोने से आराम मिलता है। आँखों को ठण्डी हवा और ठण्डा पानी अच्छा मालूम होता है; तेज़ हवा, धूप और रोशनी नहीं सही जाती।
सगर्भावस्था में जी की मिचलाहट में यह उपयोगी है।
समस्त रात शराब पीने के बाद सुबह सो कर उठते ही पेट में अत्यन्त दुखदाई दर्द होने पर यह लाभदायक है।
शराब पीने की अत्यन्त अभिलाषा को यह औषधि दूर करती है।
सम्बन्ध (Relation) – क्यूप्र, मास्कस, नक्स-मस, नक्स-वोम, फ़ास और पल्स के साथ तुलना करो।
वृद्धि – ठण्ड और खुश्क या साफ़ मौसम में।
ह्रास (Amelioration) – मुँह अथवा रोगाक्रान्त स्थान को ठण्डे पानी से धोने से, नम और भीगे मौसम में।
मात्रा (Dose) – 3 से 6 शक्ति।
एसिमिना ट्रिलोबा (ASIMINA TRILOBA)
एसिमिना ट्रिलोबा औषधि के प्रयोग करने से कई प्रकार के लक्षण पैदा हो जाते हैं जो इस प्रकार हैं- गले में जलन, बुखार हो जाना, शरीर पर लाल रंग का दाना निकलना, उल्टी आना, गलतुण्डिका और अवहनु ग्रन्थियां (submaxillary) बढ़ जाना तथा इसके साथ ही पतले दस्त होना, मुंह का अन्दरूनी भाग लाल होना तथा उसमें सूजन आ जाना, चेहरा सूज जाना आदि। रोगी को बर्फ जैसी ठण्डी चीजें पंसद आती है और रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है।
मुहासें रोग तथा शाम के समय में कपड़े उतारने पर होने वाली खुजली को एसिमिना ट्रिलोबा औषधि ठीक कर देता है।
सम्बन्ध :-
कैप्सिकम, बेलाडौना औषधियों की तुलना एसिमिना ट्रिलोबा औषधि से कर सकते हैं।
अमोनिकम डोरेमा/गम-अमोनिक (AMMONIACUM DOREMA/GUM AMMONIAC))
अमोनिकम डोरेमा औषधि कमजोर व्यक्तियों तथा बूढ़े व्यक्तियों के लिये लाभदायक है। जब रोगी को अधिक ठण्ड महसूस होती है तथा उसके दिमाग की स्थिति गड़बड़ा गई हो, गर्दन तथा ग्रासनली (भोजननली) में जलन और खुरचन सी महसूस होती है तो ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनिकम डोरेमा औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। पुरानी खांसी (क्रोनिक ब्रोंकाइटिस) के रोग को ठीक करने में यह औषधि लाभदायक है।
अमोनिकम डोरेमा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
फेफड़ें से सम्बन्धित लक्षण :- फेफड़े से बहुत ज्यादा मात्रा में पीब जैसा बलगम जमा हो गया हो लेकिन खांसने पर थोड़ी मात्रा में बलगम निकल रहा हो तथा रोगी खांसने के कारण सो भी नहीं पाता है। दमा रोग में खांसी कभी ढीली, कभी गाढ़ी गोंद जैसी बलगम के रूप में होता है, रोगी बलगम को बार-बार बाहर निकालने की कोशिश करता है लेकिन बाहर नहीं निकाल पाता। ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए अमोनिकम डोरेमा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को नजला हो जाता है तथा इसके साथ उसका नाक बंद हो जाता है जिसके कारण रोगी के सिर में दर्द भी होता है, ऐसे रोगी का उपचार अमोनिकम डोरेमा औषधि से करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को आंख से धुंधलापन नज़र आता है, आंखों के आगे तारे और चिनगारियां तैरती हुई नज़र आती हैं तथा पढ़ते समय अधिक थकान महसूस होती है। ऐसे रोगी का उपचार अमोनिकम डोरेमा औषधि से करना उचित होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का गला सूखा सा रहता है, जब रोगी सांस लेता है तो ताजी हवा नाक के द्वारा शरीर के अन्दर जाने से रोग के लक्षणों में अधिक वृद्धि होती है। रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसका गला भरा हुआ है और उसमें जलन तथा छिलन हो गया है। खाना खाने के बाद रोगी को लगता है कि जैसे कोई चीज गले में अटकी हुई है, जिसे निगलने की वह लगातार कोशिश करता है। ऐसे रोगी का उपचार अमोनिकम डोरेमा औषधि से करना लाभदायक होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सांस लेने में बहुत अधिक परेशानी होती है तथा ठण्ड के समय में परेशानियां और भी बढ़ जाती है। नाक से गाढ़ा चिपचिपा और कठोर बलगम निकलता है। ऐसे रोगी का उपचार अमोनिकम डोरेमा औषधि से करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है और रोगी को अधिक आराम मिलता है।
हृदय से सम्बंधित लक्षण :- रोगी में नजला रोग होने के साथ हृदय की धड़कन तेज हो जाती है तथा धड़कन का असर पेट के अन्दरुनी भाग तक फैल जाती है, बूढ़े व्यक्तियों के छाती में घड़घड़ाहट होती है। इस प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए अमोनिकम डोरेमा औषधि बहुत ही उपयोगी है।
सम्बन्ध :-
अमोनिकम डोरेमा औषधि के कुछ गुणों की तुलना ब्रायो, आर्निका औषधि से कर सकते हैं। सेनेगा, टाटार-इमेंटि, बालसम पेरु औषधि से भी इसकी तुलना कर सकते है।
मात्रा :-
अमोनिकम डोरेमा औषधि की तीसरी शक्ति का विचूर्ण (थर्ड ट्रीटुरेशन) का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अमोनियम बेंजोइकम (AMMONIUM BENZONICUM)
अमोनियम बेंजोइकम औषधि का प्रयोग अन्नसारमेह (पेशाब के साथ सफेद पदार्थ जाना) की अवस्था (एल्बुमीनिरिया) तथा विशेष रूप से पीड़ित रोगियों के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है। गठिया रोग के साथ जोड़ों में खून का जमाव होने तथा बूढ़े व्यक्तियों में असंयतमूत्रता (इंकोंटीनेस. अपने आप पेशाब का निकल जाना) होना। इस प्रकार के लक्षणों के रोग इस औषधि के प्रभाव से ठीक हो जाते हैं।
अमोनियम बेंजोइकम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के चेहरे पर सूजन आ जाती है, पलकें सूज जाती हैं। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार अमोनियम बेंजोइकम औषधि से करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अपना सिर भारी-भारी सा महसूस होता है, इस प्रकार के लक्षणों में अमोनियम बेंजोइकम औषधि का लाभकारी प्रभाव होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पेशाब का रंग धूमिल होता है तथा ऐसा लगता है कि पेशाब में कुछ अन्न का पदार्थ मिला हुआ है और वह गाढ़ा है। इस प्रकार के लक्षण रोगी में है तो उसका उपचार अमोनियम बेंजोइकम औषधि से करना चाहिए।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के त्रिकास्थि भाग के आस-पास दर्द होता है तथा मलत्याग करने की इच्छा बार-बार होती है, दायें तथा बायें वृक्क-प्रदेश में तेज दर्द होता है। ऐसे रोगी का उपचार अमोनियम बेंजोइकम औषधि से करना फायदेमंद होता है।
सम्बन्ध :-
टेरीबिन्थ, बेंजो-अर्से, आमोनिया लवण, कास्टि औषधियों से तुलना अमोनियम बेंजोइकम औषधि से कर सकते हैं।
अन्नसारमेह की अवस्था में काल्मिया, हेलोनि, मक्यू-कौरो औषधियों से अमोनियम बेंजोइकम औषधि की तुलना कर सकते हैं।
मात्रा :-
अमोनियम बेंजोइकम औषधि की दूसरी शक्ति का विचूर्ण (सेकण्ड ट्रीटुरेशन) का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अमोनियम ब्रोमेटम (AMMONIUM BROMATUM)
अमोनियम ब्रोमेटम औषधि का प्रयोग स्वरयन्त्र (कण्ठ) तथा ग्रासनी (भोजननली) से सम्बन्धित रोग, स्नायुविक (सिर की नाड़ियों में दर्द) सिर दर्द और मोटापे रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है।
टांगों, सिर, छाती आदि अंगों में सिकुड़न होने के साथ दर्द होना, हाथ की उंगलियों में नाखुनों के नीचे उत्तेजना होना तथा चिड़चिड़ापन महसूस होना तथा इसके साथ-साथ दांतों को चबाना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम ब्रोमेटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
अमोनियम ब्रोमेटम औषधि निम्नलिखित लक्षणों उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- मस्तिष्क में रक्त का बहाव तेज (सरबल कोंगेशन) होना। कानों के ऊपर पट्टी बंधी होने जैसी अनुभूति होना। बार-बार छींके आना तथा नाक से गाढ़ा कफ के समान तरल पदार्थ निकलना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार अमोनियम ब्रोमेटम औषधि से करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पलकों के किनारे पर सूजन आ जाती है तथा वह भाग लाल हो जाता है, रोगी की मीमाबी ग्रन्थियां लाल होकर सूज जाती है। आंखें बड़ी-बड़ी लगती हैं और आंखों के आस-पास दर्द होता है तथा इसके साथ-साथ सिर में भी दर्द होता है। ऐसे रोगी का उपचार अमोनियम ब्रोमेटम औषधि से करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप रोगी का रोग ठीक हो जाता है तथा रोगी को आराम मिलता है।
गले से सम्बंधित लक्षण:- मुख (मुंह) के अन्दर डंक लगने जैसा दर्द होता है। कंठ के अन्दर गुदगुदाहट होने के साथ सूखापन महसूस होता है तथा खांसी होने लगती है। गले के अन्दरूनी भाग में जलन होता है तथा सफेद बलगम निकलता है। रोगी को जुकाम भी हो जाता है। ऐसे रोगी के रोगों को ठीक करने के लिए अमोनियम ब्रोमेटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को रुक-रुक कर खांसी होती है तथा रोगी को दम घुटने जैसा अनुभव होता है, सांस लेने में परेशानियां होती है, नाक के अन्दरुनी भाग में गुदगुदाहट महसूस होती है, रोगी खांसी के कारण आधी रात को जग जाता है तथा उसे घुटन महसूस होती है।
सोने पर लगातार खांसी होती है, फेफड़ों में तेज दर्द होता है। रोगी को काली खांसी हो जाती है, लेटने पर सूखी खांसी हो होती है और रोगी को बहुत अधिक परेशानी होती है।
इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार अमोनियम ब्रोमेटम औषधि से करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
काली-बाई तथा हायोसा औषधि के कुछ गुणों की तुलना अमोनियम ब्रोमेटम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
अमोनियम ब्रोमेटम औषधि की पहली शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अमोनियम कार्बोनिकम (AMMONIUM CARBONCUM)
अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग ऐसी स्त्री रोग की अवस्था में किया जाता है, जिसमें स्त्रियां तो स्वस्थ्य जरूर रहती है, लेकिन वे हमेशा थकी हुई और ठण्ड महसूस करती रहती है तथा जो हैजा रोग से पीड़ित हो जाती है, शारीरिक परिश्रम नहीं करती है, कार्य करने के प्रति आलसी स्वभाव की हो जाती है।
अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने लिए उपयोगी है जो इस प्रकार हैं- जुकाम, नकसीर, मसूढे़ के रोग, मांसपेशियों में खिंचावट तथा तनाव, विसूचिका रोग, दस्त, शरीर में खून की कमी, मानसिक परेशानी आदि।
जो स्त्री पानी बोतल में रखकर लगातार सूंघती रहती हैं तथा जिन स्त्रियों को बार-बार हृदय कमजोर होता है, जब वे सांस लेते हैं तो सांय-सांय की आवाज सुनाई देती है, घुटन महसूस होती है। ठण्डी हवा के प्रति अत्यधिक संवेदनशील होते हैं। रोगी को पानी से घृणा होती रहती है, पानी का स्पर्श भी सहन नहीं होता है, रोगी को सूजन आ जाती है, गले के अन्दर गहरी लाली के साथ बहरापन (हार्डेनेस ऑफ हेयरिंग), दांत पीसते समय कोनों तथा नाक के आर-पार झटके लगते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक में तेज नाक बंद हो जाना तथा इसके साथ नाक से खून निकलना, नाक से पानी जैसा पदार्थ निकलता रहता है तथा जब दाद हो जाता है। स्त्रियों के मासिकधर्म के समय में दांत में दर्द (Toothache) होता रहता है। दांतों को आपस में जोर से दबाने पर सिर, आंखों और कानों के आर-पार झटके लगते हैं, जीभ के ऊपर फफोलें हो जाते हैं। जीभ का स्वाद खट्टा हो जाता है, खाना को चबाते समय जबड़ों में कड़कड़ाहट होती है। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गलतुण्डिकायें (टॉंसिल) तथा ग्रीवा ग्रन्थियां (ग्लैंड ऑफ नेक) बढ़ी हुई हो, कण्ठ के अन्दर तथा नीचे जलन होने के साथ दर्द हो रहा हो, हृदय में जलन हो रही हो तथा बवासीर होने पर तथा मासिकधर्म के समय में इस प्रकार के लक्षण अधिक दिखाई दे रहे हो। खुजली हो रही हो, बवासीर के मस्से फैलने वाले हो, मलत्याग के बाद अधिक परेशानी हो रही हो, रोगी को लेटने से कुछ राहत मिलती हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पेशाब करने की बार-बार इच्छा होती है, रात के समय में बार-बार उठकर पेशाब करने पर वीर्य निकल जाता है अर्थात प्रदर रोग जिसमें अधिक जलन और चीस मच (जलन युक्त दर्द) रही हो तथा इसके साथ ही संभोग से घृणा हो रही हो। पेट में दर्द हो रहा हो तथा मल कठोर हो जिसके कारण वह मलद्वार से कठनाई के साथ निकलने वाला हो, अधिक थकावट महसूस हो रही हो और अधिक खांसी के साथ सांस लेने में अधिक परेशानी होना, सांस का रुकना तथा किसी काम को करने के बाद और गर्म कमरे में जाने पर, यहां तक कि कुछ कदम ऊपर की ओर चढ़ने पर भी कष्ट बढ़ जाता है। शरीर में अधिक निमोनिया रोग हो जाना, सांस लेने की गति धीमी होना, सांस कष्टदायक, धर्राटेदार और बुलबुले उठने जैसी हो जाना, ठण्डे मौसम में जुकाम हो जाना तथा नाक से फेफड़ों में पानी भर जाना, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की धड़कन सुनाई देती है तथा उसके साथ रोगी को डर भी लगता है, उसके शरीर से पसीना निकलता रहता है, जोड़ों में तेज दर्द होता है, जब रोगी बिस्तर के अन्दर होता है तो उसे कुछ आराम मिलता है, हाथ पैरों को फैलाने में दर्द होता है, हाथ की शिरायें नीली, फूली हुई हो जाती है, बाजू को नीचे की ओर लटकाने पर उंगलियों में सूजन आ जाती है, पिण्डलियों तथा तलुवों में दर्द होता है, पैर का अंगूठा दर्दनाक और सूजा हुआ हो जाता है, नाखूनों पर नींद नहीं आती है, रोगी सोते-सोते चौंक जाता है तथा उठ बैठता है उसे दम घुटने जैसा महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पूरे शरीर में त्वचा पर खुजली और जलन के साथ होने वाले छाले, रक्त भरे हुए दाने होना, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मासिकधर्म में स्राव से सम्बन्धित लक्षण :- स्राव होने के पहले रक्तस्राव होने पर आर्निका, नक्स-वोमिका औषधि से उपचार करने पर रोग ठीक हो जाता है, लेकिन रोगी को मुंह धोते समय खून नहीं निकलता है बल्कि अपने आप खून निकलता है। इसी तरह खाना खाने के बाद नाक से खून निकलने की अवस्था में ऐमोनकार्व औषधि का प्रयोग करा जा सकता है।
जुकाम से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बहुत दिनों तक जुकाम रहता है, ऐसे रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नकसीर फूटना से सम्बन्धित लक्षण :- जब रोगी सुबह के समय में अपना मुंह हाथ धोता है तो उसे उस समय नाक से खून निकलने लगता है। भोजन करने के बाद बायें नाक के नथुने से रक्तस्राव (खून निकलना) होने लगता हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पीनस रोग से सम्बन्धित लक्षण :- जब किसी व्यक्ति को पीनस रोग हो जाता है तो वह जब नाक छिड़कता है तो उस समय रक्त का आना बंद हो जाता है लेकिन जब वह झुकता है तो उसके नाक की नोक पर खून जमा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
रात के समय में अक्सर नाक बंद हो जाना :-
इस अवस्था में रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करा जा सकता है लेकिन ऐसे ही कुछ लक्षण होने पर रोग को ठीक करने के लिए स्टिक्टा और मासिकधर्म के शुरुआती अवस्था में दस्त होना। इस प्रकार की अवस्था में रोगी का उपचार करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए लेकिन ऐसे ही कुछ अवस्था में रोगी के रोग को ठीक करने के लिए वेरेट्रम-ऐल्बम तथा ऐमोन-म्यूर औषधि का प्रयोग किया जा सकता है, इसलिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि के कुछ गुणों की तुलना इन औषधियों से कर सकते हैं।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का नाक रात के समय में बंद हो जाता है तथा मुंह से सांस लेनी पड़ती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए। बच्चे को नाक में भारीपन महसूस होता है और नाक को वह सिकुड़ता रहता है और उसे जुकाम हो जाता है, उसके नाक से अधिक मात्रा में पानी बहता है। जब रोगी बिस्तर पर बैठता है तो उसे कुछ आराम मिलता है, और गर्म मौसम होने पर आराम मिलता है, अधिक कमजोरी होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
दांत से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के दांत ढीले पड़ जाते हैं, मसूढ़ों पर घाव हो जाते हैं, मिठाई खाने से दांत में तेज दर्द होने लगता है, जीभ दांत से टकराने पर दर्द होने लगता है, मसूढ़ों से खून निकलने लगता है तथा दर्द रोगी को इस प्रकार का महसूस होता है कि जैसे किसी मधुमक्खी का डंक लग गया हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
मांसपेशियों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर की मांसपेशियों में खिंचावट आने लगती है और ऐसा महसूस होता है कि वे छोटी होती जा रही है तथा सिकुड़ती जा रही हैं, ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
हडि्डयों के जोड़ों से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी व्यक्ति के शरीर के भी भाग की हडि्डयों के जोड़ उतर गये हों और उसमें दर्द हो रहा हो और रोगी को दर्द ऐसा महसूस होता है कि जैसे घाव के होने पर दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी व्यक्ति को संधातिक आरक्तज्वर हो गया हो और इसके साथ ही गले में लाली पड़कर दर्द हो रहा हो, कान के पीछे का भाग (कान की जड़) और गर्दन की ग्रन्थियां बहुत बड़ी-बड़ी हो गई हो, त्वचा पर लाल महीन दाने हो गऐ हों और ये उभरे हुए हों तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
यदि किसी स्त्री को मासिकधर्म शुरू होने के समय में विसूचिका रोग हो गया है तथा इसके साथ ही उसे उल्टियां तथा उबकाइयां हो रही हो और दस्त भी हो गया हो।
मासिकधर्म के समय में रोगी स्त्री के हाथ-पैर तन जाते हैं तथा रोगी को हाथ-पैर फैलाने की इच्छा होती है।
स्त्री रोग का समय से पहले ही मासिकधर्म शुरू हो जाता है तथा इसके साथ ही उसे बहुत अधिक थकावट भी होने लगती है तथा साथ में उसे उबकाइयां तथा उल्टियां और दस्त हो गया हो।
किसी-किसी स्त्री को मासिकधर्म के समय में दस्त होने के साथ ही खून भी आने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
खून की कमी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर में अधिक खून की कमी हो जाती है, शाम के समय में शरीर में बेचैनी हो जाती है, अधिकतर शरीर का दायां भाग रोगग्रस्त हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले में सुरसुरी महसूस होती है तथा इसके साथ ही लगातर सूखी खांसी भी होती रहती है, सुबह तीन से चार बजे के बीच में अधिक खांसी होने लगती है, खांसी रात भर या दिन भर आती रहती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
खुजली से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को खुजली हो जाती है तथा इसके साथ ही त्वचा फटने लगती है, त्वचा के निचले भाग की श्लैष्मिक परत पर सूजन आ जाती है, उंगलियों के जोड़ों पर सूजन आ जाती है और दर्द होने लगता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
श्वास रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सांस लेने में परेशानी होने लगती है, किसी प्रकार की चढ़ाई चढ़ने पर श्वास में रुकावट होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
बवासीर से सम्बन्धित लक्षण :- बवासीर रोग से पीड़ित रोगी जब मलत्याग करता है तो मस्सें बाहर आ जाते हैं तथा खून भी बहने लगता है, मलत्याग करने के बाद बहुत तेज दर्द होता है, रोगी को चलने में परेशानी होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के हृदय का आकार बड़ा हो जाता है, श्वास नलिकाओं का कठोर होना तथा उसमें जलन होना। रोगी को रात के समय में डर लगता है तथा डरावने सपने भी आते हैं, सांस फूलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
न्यूमोनिया से सम्बन्धित लक्षण :- न्यूमोनिया रोग से पीड़ित रोगी की यदि नाड़ी की गति कम हो जाए तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
शाम के समय में, ठण्ड लगने से, नमीदार मौसम में, गीली पटि्टयां लगाने से, हाथ-मुंह धोने से, सुबह के समय में तीन से चार बजे तथा मासिकधर्म की शुरुआती अवस्था में लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
पेट को सहलाने से, लेटने से तथा सूखे मौसम में रहने से रोग के लक्षण नष्ट होते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कैम्फर औषधियां अमोनियम कार्बोनिकम औषधि के दुष्प्रभाव को नष्ट करती है।
मात्रा (डोज) :-
अमोनियम कार्बोनिकम औषधि की निम्न शक्तियां अधिक पुरानी होने पर खराब हो जाती हैं। सामान्य उपयोग के लिये छठी शक्ति सर्वोत्तम होती है।
अमोनियम कास्टिकम (AMMONIUM CAUSTICUM)
अमोनियम कास्टिकम औषधि हृदय की गति को बढ़ाने वाली औषधि है। रोगी को बेहोशी की अवस्था (थ्रोम्बोसिस) होने पर, रक्तस्राव (हैर्मोरेज.खून बहना) होने पर, सांप के काटने (स्नेक बाइटस) के बाद शरीर में जहर फैलने पर तथा क्लोरोफार्म के उपयोग के कारण बेहोशी होने पर रोगी को यदि यह औषधि सुंघाई जाए तो बेहोशी दूर हो जाती है।
चूंकि अमोनियम कास्टिकम औषधि एक शक्तिशाली औषधि है और श्लेश्मा कलाओं (म्यूकस मम्ब्रैन्स) में सूजन (ओइडेमा) तथा घाव (अल्सरेशन) उत्पन्न करती है। इसलिए इन्ही लक्षणों के आधार पर इसका प्रयोग किया जाता है। फिल्वीदार क्रूप (मेब्रेनस क्रोप) रोग होने पर जब मुंह में खाने की नली में जलन होती है, तब अमोनियम कास्टिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
अमोनियम कास्टिकम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सांस लेने में परेशानी होने लगती है, खांसी होती है तथा इसके साथ ही बलगम भी निकलने लगता है, रोगी की आवाज साफ नहीं निकलती है, गले में जलन होती है और ऐंठन और घुटन महसूस होती है, लम्बी सांस लेने में गले के अन्दर दर्द होता है, नाक का डिफ्थीरिया रोग तथा इसके साथ नाक में जलन होना और वहां की त्वचा छिल जाना और नाक से पानी बहना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम कास्टिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बहुत अधिक थकान होती और पेशियों में कमजोरी आ जाती है, कंधों के जोड़ों में दर्द होता है, त्वचा रुखी और गर्म हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम कास्टिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
मात्रा (डोज) :- अमोनियम कास्टिकम औषधि की पहली से तीसरी शक्ति तक का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अमोनियम आयोडेटम (AMMONIUM IODATUM)
अमोनियम आयोडेटम औषधि का प्रयोग तब किया जाता है, जब सांस लेने वाली नली में सूजन (ब्रोकाइटिस) हो जाती है तथा स्वरयन्त्र में सूजन (लेरींगिटिस) हो जाती है और प्रतिश्यायी फुफ्फुसपाक (कैटरल न्युमोनिया), फेफड़ों की सूजन (ओइडेमा ऑफ लंग्स) में किया जाता है जिसके कारण यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है और रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है।
रोगी के सिर में हल्का-हल्का दर्द होता है, रोगी के चेहरे का स्वभाव पागलों के जैसा हो जाता है तथा रोगी को चेहरे पर भारीपन महसूस होता है। सिर में चक्कर आने लगता है। मिनियर रोग (मेनियरस डीसिज) हो जाता है जिसमें कान की खराबी के कारण सिर में चक्कर आने लगता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
अमोनियम टार्टेरिकम औषधि से अमोनियम आयोडेटम औषधि की तुलना कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
अमोनियम आयोडेटम औषधि की दूसरी और तीसरी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अमोनियम पिकरेटस (AMMONIUM PICRATUM)
मलेरिया बुखार तथा स्नायुशूल (नाड़ियों में दर्द-न्युरेलगिया), सिर के पिछले भाग तथा कान के भाग में दर्द, काली खांसी तथा सिर में दर्द (बाइलीओस हैडक)। इस प्रकार के रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम पिकरेटस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर के दाईं भाग की ओर नियमित समय पर होने वाला स्नायुशूल (नाड़ियों में दर्द), रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कोई उसके कान को छेद हो रहा हो। कान में दर्द का असर नेत्र कोटर तथा जबड़े तक होता है, उठते समय चक्कर आता है, इस प्रकार की अवस्था में रोगी को अमोनियम पिकरेटस औषधि से उपचार करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
अमोनियम पिकरेटस औषधि की तीसरी शक्ति के विचूर्ण का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अमोनियम म्यूरियेटिकम (Ammounium muriaticum)
खांसी होने के साथ ही यदि छाती से सम्बन्धित कोई बीमारी हो गई हो तो उस रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग करना लाभदायक है।
कब्ज को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग लाभदायक है जिसके फलस्वरूप कब्ज ठीक हो जाता है। इस औषधि के प्रभाव से कब्ज के कारण होने वाले रोग ठीक हो जाते हैं। कब्ज से पीड़ित रोगी में कई प्रकार के लक्षण होते हैं जो इस प्रकार हैं-रोगी को मलत्याग करते समय बहुत अधिक परेशानी होती है, कई बार तो मल के टुकड़ों में कफ जैसा पदार्थ भी आने लगता है।
जो व्यक्ति अधिक मोटे होते हैं तथा जिनका शरीर अधिक मोटा, लम्बा और थुलथुला होता है लेकिन उनके पैर बहुत पतले होते हैं, उनके इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
रोगी को ठण्ड बर्दाश्त नहीं होती है, और जब रोगी खुली हवा में रहता है तो रोग के लक्षणों में और भी ज्यादा वृद्धि हो जाती है, रोगी को एकाएक गर्मी मालूम होने के बाद पसीना आने लगता है, रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ा और किसी-किसी विशेष मनुष्य के प्रति घृणायुक्त हो जाती है, पेट और तिल्ली के स्थान में खाली-खाली और काटता हुआ दर्द मालूम होता है। पीठ और कन्धे के बीच में ठण्डक महसूस होती है, रोगी को कंधों के बीच में बर्फ के समान ठण्ड महसूस होती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को दूर करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि उपयोग करना चाहिए।
आलसी व्यक्ति जिसका शरीर ढीला-ढाला हो तथा टांगें अस्वाभाविक रूप से पतली हो ऐसे व्यक्ति के रोग को ठीक करने में अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
विभिन्न लक्षणों में अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग-
जुकाम से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को जुकाम के साथ नाक से अधिक मात्रा में कफ की तरह क्षारीय पदार्थ (तरल पदार्थ) बहता रहता है और इस कारण से नाक के नथुनों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर के कई अंगों में भारीपन महसूस होने के साथ ही दोनों कंधों के बीच ठण्डक महसूस होती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने में अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रभाव लाभदायक है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के शरीर के विभिन्न अंग रोग ग्रस्त हो जाते हैं। इसके साथ ही लक्षण भी भिन्न-भिन्न समय में बदलता है। इसलिए सिर और छाती के लक्षणों में सुबह के समय में, पेट के रोगों में दोपहर के समय में और शरीर के कई अंगों में होने वाले दर्द तथा चर्म रोग और ज्वर (बुखार) के लक्षणों में वृद्धि होती है।
कब्ज से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कब्ज की शिकायत रहती है तथा कभी-कभी तो अतिसार हो जाता है। मलत्याग करने में कठोर मल निकलता है जिसके कारण रोगी को बहुत अधिक परेशानी होती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बवासीर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बवासीर के रोग होने के साथ ही कई प्रकार के लक्षण भी हो जाते हैं, मलत्याग करने के बाद रोगी को कई घंटों तक मलद्वार में जलन होती है और डंक लगने की तरह दर्द होता है। स्त्रियों को प्रदर रोग होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मासिकधर्म से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों को मासिकधर्म शुरू होने के समय में उल्टी तथा दस्त हो जाता है और आंतों से रक्त का स्राव होने लगता है, पैरों की नसों में दर्द होता है, रात के समय में रक्त का स्राव अधिक होता है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी का उपचार करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हड्डी के जोड़ों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को जोड़ों पर खिंचाव महसूस होता है तथा इसके साथ ही रोगी का मांस सिकुड़ता है, घुटने के पीछे वाली जोड़ पर भी खिंचाव आ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
खांसी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को खांसी होने के साथ ही नजला और यकृत से सम्बन्धित लक्षण हो जाते हैं, ऐसे रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग लाभकारी है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी की खांसी गतिशील रहती है तथा कुछ मात्रा में चमकता हुआ बलगम निकलता है।
रक्तसंचार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का रक्तसंचार अनियमित हो जाता है तथा शरीर के खून में लगातार उथल-पुथल (उच्च रक्तचाप तो कभी निम्न रक्तचाप) होता रहता है, तथा शरीर के कई भागों में गर्मी महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि लाभदायक है।
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को डर लगता रहता है तथा वह किसी न किसी कारण से दु:खी रहता है, रोगी का मन ऐसा करता है कि वह जोर-जोर से रोए, लेकिन वह रो नहीं पाता है, रोगी दु:खी स्वभाव का हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के बाल झड़ने लगते हैं तथा इसके साथ ही रोगी को खुजली भी होने लगती है तथा बालों में रूसी हो जाती है। रोगी को अपना सिर भारी-भारी और दबाव युक्त महसूस होता है। सुबह के समय में रोगी के इन लक्षणों में और भी वृद्धि हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के आंखों के आगे अंधेरा सा छा जाता है तथा उसे धुंधला सा दिखाई देता है, मोतियाबिन्द की शुरुआती अवस्था होने पर अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के नाक से लगातार पानी जैसा पदार्थ बहता है और यह पानी जैसा पदार्थ गर्म और जलन युक्त होती है जिसके कारण होंठ भी छिल जाता है, रोगी को छींके आती हैं, नाक तथा नथुनों में ऐसा दर्द होता है जैसे कि उनके अन्दर घाव हो गये हों। रोगी को बदबू (लोस ऑफ स्मैल) महसूस नहीं होती है और सांस लेने में घुटन महसूस होती है। रोगी को लगातार नाक साफ करनी पड़ती है, लेकिन कोई भी लाभ नहीं होता है, नाक में खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अपने चेहरे पर जलन महसूस होती है तथा मुंह और होंठों पर दर्द होता है तथा होठ छिल जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को गलतुण्डिकाओं से सम्बन्धित रोग होने के साथ ही गले में जलन और सूजन हो जाती है। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी जब किसी चीज को निगलता है तो उसे परेशानी होती है। गले की टॉन्सिलों में वृद्धि हो जाती है तथा दर्द होता है। गले के अन्दरूनी भाग में सूजन आ जाती है तथा चिपचिपा बलगम निकलता है। बलगम इतना ठोस होता है कि उसे खंखारकर आसानी से बाहर नहीं फेंका जा सकता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मुंह के अन्दर कड़वापन महसूस होता है, रोगी को मिचली होती है तथा आमाशय के अन्दर दांतों से काटे जाने जैसा दर्द होता है, इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के पाचन संस्थान में दर्द होता है और पेट के चारों ओर बहुत अधिक चर्बी जमा हो जाती है, मलद्वार से अधिक हवा निकलती है तथा कमर पर दर्द महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मलान्त्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मलद्वार पर खुजली होती है तथा बवासीर का रोग हो जाता है, बवासीर की फुंसियां बहुत अधिक दर्दयुक्त होती हैं। रोगी को मलत्याग करने में बहुत अधिक परेशानी होती है। रोगी का मल कठोर तथा टुकड़ेदार होता है और मल में कफ जैसा पदार्थ निकलता है। रोगी को कब्ज की समस्या रहती है, रोगी को मलत्याग करने के बाद तथा पहले मलद्वार में जलन तथा चीस मारता हुआ दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
स्त्री से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री का मासिकधर्म नियमित समय से पहले ही शुरू हो जाता है, योनि से स्राव होता है जो थक्केदार और गाढ़ा होता है। रात के समय में स्राव और भी तेज हो जाता है। गर्भावस्था के समय में रोगी के पेट के बायीं तरफ मोच जैसा दर्द होता है। मासिकधर्म के समय में अतिसार (दस्त होना) होना, हरे रंग का मल निकलना, तथा इसके साथ नाभि में दर्द होता रहता है। पेशाब कत्थे रंग का होना तथा योनि से चिपचिपा स्राव होना आदि विभिन्न प्रकार के लक्षणों में अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग करना लाभकारी होता है।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के स्वरयन्त्र में खराश उत्पन्न होती है तथा उसके नाक तथा गले में जलन होती है, रोगी को खांसी भी हो जाती है जो रुक-रुककर होती है और गले के अन्दर खरोंच पैदा करती है, पीठ के बल या दायीं ओर लेटने से खांसी बढ़ जाती है। दोपहर के समय में खांसी का प्रकोप और भी तेज हो जाता है तथा इसके साथ ही बलगम भी निकलने लगता है। रोगी के छाती में दर्द होता है तथा जलन भी महसूस होने गलती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कंधों के बीचों-बीच ठण्डक महसूस होती है, रोगी को गरम कपड़ा ओढ़ा भी दिया जाए तो भी आराम नहीं मिलता है और इसके बाद पीठ पर खुजली मचने लगती है, जब रोगी बैठने का काम करता है तो दर्द महसूस होता है तथा इसके साथ कमर पर भी दर्द महसूस होता है। रोगी का कमर अकड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग करे।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- हाथों के अंगुलियों के सिरों में दर्द होता है तथा उंगलियों पर घाव हो जाता है। हाथों तथा पैरों की उंगलियों के सिरों पर गोली लगने जैसा तेज व फाड़ता हुआ दर्द होता है। एड़ियों में घाव हो जाता है। घुटने के अन्दर वाली नाड़ियां सिकुड़ जाती हैं, रोगी को बैठने पर अधिक परेशानी, लेटे रहने पर अधिक आराम मिलता है। शरीर के कटे हुए भागों में तेज दर्द होता है, पैरों से बदबूदार पसीना निकलता है। स्त्रियों को मासिकधर्म के समय में पैरों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर की त्वचा पर खुजली होने लगती है, विभिन्न भागों में छाले पड़ जाते हैं। रोगी की त्वचा पर तेज जलन होती है तथा त्वचा पर ठण्डे पदार्थों का प्रयोग करने से आराम मिलता है।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- शाम के समय में लेटने के बाद और जागने पर ठण्ड महसूस होती है तथा प्यास नहीं लगती है, हथेलियों तथा तलुओं में जलन होने लगती है। अस्वस्थ जलवायु के कारण पुराना बुखार हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
खुली हवा में रोगी के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन. ह्रास) :-
सुबह के समय में सिर तथा वक्ष (छाती) से सम्बन्धित कुछ लक्षण नष्ट होने लगते हैं और दोपहर के बाद पेट से संबन्धित कुछ लक्षण नश्ट हो जाते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कल्केरिया, सेनेगा तथा कास्टि औषधियों के कुछ गुणों की तुलना अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष:-
काफिया, कास्टि तथा नक्स औषधियां अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करती हैं।
मात्रा (डोज) :-
अमोनियम म्यूरियेटिकम औषधि की तीसरी से छठी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अमोनियम फास्फोरिकम (AMMONIUM PHOSPHORICUM)
पुराने गठिया तथा यूरिक अम्ल से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम फास्फोरिकम औषधि प्रयोग करना चाहिए।
श्वासनली का रोग (ब्रोकाइटिस) तथा हाथ की उंगलियों के जोड़ों पर तथा हाथ के पिछले भाग में होने वाले गांठें तथा चेहरे पर लकवा रोग का प्रभाव, कंधे के जोड़ों में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम फास्फोरिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
छाती के आस-पास दर्द तथा दबाव महसूस होना, शरीर के कई अंगों में भारीपन महसूस होना, चलने-फिरने में लड़खड़ाहट होना, हल्की सी हवा की झोंक लगने से ही ठण्ड लगने लगती है। इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी को अमोनियम फास्फोरिकम औषधि की मात्रा खुराक के रूप में देना चाहिए।
रोगी को सुबह के समय में अधिक छींके आती हो तथा नाक और आंखों से अत्यधिक पानी निकल रहा हो तो ऐसी अवस्था में रोगी को अमोनियम फास्फोरिकम औषधि का सेवन कराना चाहिए।
रोगी को सांस लेने में परेशानी हो रही हो तथा इसके साथ-साथ खांसी भी हो तथा बलगम हरे रंग का आ रहा हो तो अमोनियम फास्फोरिकम औषधि से उपचार करना चाहिए।
रोगी का पेशाब गुलाबी रंग का तलछट हो रहा हो तो इस लक्षण को ठीक करने के लिए अमोनियम फास्फोरिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
अमोनियम फास्फोरिकम औषधि की तीसरा दशमिक विचूर्ण (थर्ड डेसिमल ट्रीटुरेशन) का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अमोनियम वैलेरियनिकम (AMMONIUM VALERIANICUM)
स्नायुशूल (नाड़ियों में दर्द), सिर में दर्द तथा अनिद्रा रोग (इनसोनिया) से पीड़ित रोगी तथा स्नायु से संबन्धित रोग (नर्वस) और पेट में गैस बनने के कारण दिमागी पागलपन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अमोनियम वैलेरियनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हमेशा भारी स्नायुविक अनिक्षेत्म्यता (नर्वस इरेथिस्म) की अवस्था में अमोनियम वैलेरियनिकम का उपयोग बहुत लाभकारी है जिसके फलस्वरूप स्नायुविक अनिक्षेत्म्यता से सम्बन्धित लक्षण ठीक हो जाते हैं तथा रोगी को बहुत अधिक आराम मिलता है।
हृदय में दबाव तथा दर्द महसूस होने पर रोगी को अमोनियम वैलेरियनिकम से उपचार करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
अमोनियम वैलेरियनिकम औषधि की निम्न शक्तियों वाले विचूर्ण का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एम्पीलोप्सिस (AMPELOPSIS)
एम्पीलोप्सिस औषधि का प्रयोग गुर्दे में पानी भरने का रोग (रेनल ड्रोपसीस), जलवृषण (हाड्रोसिल.अण्डकोष में पानी भरना) तथा गले का रोगों को ठीक करने में किया जाता है।
हैजे के रोग से पीड़ित रोगी के रोग में यदि शाम के छ: बजे के बाद लक्षणों में वृद्धि हो रही हो तथा साथ में आंख की पुतली में फैलाव हो तो इन लक्षणों को ठीक करने के लिए एम्पीलोप्सिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
कोहनी के जोड़ों में दर्द होना तथा कमर में दर्द होना, शरीर के कई अंगों में दर्द होना तथा उल्टी आना, पेट में दर्द तथा इसके साथ गड़गड़ाहट होना और दस्त होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए एम्पीलोप्सिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
एम्पीलोप्सिस औषधि की दूसरी से तीसरी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एमिग्डेलस पर्सिका (AMYGDALUS PERSICA)
उल्टी आने की विभिन्न अवस्थाओं में एमिग्डेलस पर्सिका औषधि का प्रयोग किया जाता है जिसके फलस्वरूप उल्टी से सम्बन्धित कई प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं। ऐसे रोगी को सुबह के समय उल्टी होती है तथा उसके आंखों में चुभन, मल का रुक जाना तथा रक्तमेह हो जाता है।
यदि किसी रोगी के पेशाब में खून आ रहा हो तो ऐसे औषधि के रोग को ठीक करने के लिए एमिग्डेलस पर्सिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
बच्चों के मलद्वार में जलन होना (गेस्ट्रीक इरेशन-मलत्याग करने में परेशानी होना, खाना खाते ही दस्त लग जाना, जीभ का स्वाद बिगड़ जाना तथा जीभ से बदबू आना, मलद्वार के अन्दरूनी भाग में जलन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी की जीभ फैली हुई नोकदार हो जाती है तथा उसके किनारे लाल रहते हैं। रोगी को उल्टी तथा मिचली की समस्या हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एमिग्डेलस पर्सिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
गलतुण्डिकाओं में दर्द होना, गले का अन्दरूनी भाग गहरा पड़ जाना तथा किसी भी चीज को निगलने में कठनाई होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को उल्टी और खांसी हो जाती है तथा इसके साथ दर्द भी होता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एमिग्डेलस पर्सिका औषधि से तुलना एमिग्डेल अमारा औषधि से कर सकते है।
मात्रा (डोज) :-
एमिग्डेलस पर्सिका औषधि का ताजा काढ़ा या मूलार्क का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एमिल नाइट्रिक (Amyl nitric)
मिर्गी के दौरे पड़ने के बाद बेहोशी की अवस्था तथा बेहोशी करने वाली दवाओं के कुप्रभावों से पैदा होने वाली बेहोशी को दूर करने की एक बहुत ही अच्छी और लाभदायक औषधि है। किसी भी प्रकार की बेहोशी की अवस्था को दूर करने के लिए एमिल नाइट्रिक औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में एमिल नाइट्रिक औषधि का उपयोग-
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय-पिण्ड की विशृंखलता का उपचार करने के लिए एमिल नाइट्रिक औषधि का प्रयोग किया जाता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरा लाल हो जाना तथा चेहरे पर खून का दौरा पड़ने की पुरानी बीमारी को ठीक करने के लिए एमिल नाइट्रिक औषधि लाभदायक है इसके प्रभाव से रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- समय से पहले ही मासिकधर्म शुरू हो जाना तथा मासिकधर्म से सम्बन्धित कोई पुरानी बीमारी को ठीक करने के लिए एमिल नाइट्रिक औषधि लाभदायक है।
मात्रा (डोज) :-
एमिल नाइट्रिक औषधि की तीसवीं पोटेंसी का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐमिल नाइट्रोसम (Amyl nitrosum)
दिल से सम्बन्धित कई प्रकार के रोगों को ठीक करने में ऐमिल नाइट्रोसम औषधि बहुत उपयोगी है विशेष करके तब जब वैजो मोटर (वह शक्ति जो नसों में खून को बहाती है) की शक्ति शिथिल (ठण्डी) हो जाती है और चेहरा गर्म और सुर्ख हो जाता है, रोगी के चेहरे और सिर पर खून का दौरा अत्यधिक हो जाता है, जरा सी भी उत्तेजना से चेहरे पर सुर्खी आ जाती है, सिर के अन्दर गर्मी, जलन और भारीपन महसूस होता है, सिर और कान के अन्दर एक प्रकार का ऐसा धक्का और जलन महसूस होता है कि मानो वह फट जाएंगे, साथ ही साथ हलक (गले के अन्दर का भाग) और दिल में खिंचाव महसूस होता है। कनपटियों में जलन इस कदर तेज होती है कि बाहर से दिखाई पड़ती है, रोगी अपने आंखों को ऐसे फैला लेता है मानो आंख निकलकर बाहर आ जायेगी। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए ऐमिल नाइट्रोसम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
इस औषधि को जैसे ही रोगी को सुंघाया जाता है वैसे ही इसका प्रभाव बड़ी तेजी के साथ धमनिकाओं तथा कोशिकाओं में होती है जिसके फलस्वरूप वे फैलती है और चेहरा गर्म हो जाता है तथा शरीर में गर्मी आ जाती है, सिर भी गर्म हो जाता है। धमनियां ठीक प्रकार से कार्य करने लगती है और रोग के लक्षण ठीक हो जाते हैं।
हृदय की बढ़ी हुई धड़कन तथा स्त्रियों को मासिकधर्म बंद होने के समय में होने वाली परेशानियों को ठीक करने के लिए ऐमिल नाइट्रोसम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
हिचकी आना, जम्भाई आना तथा बेहोशी की अवस्था को दूर करने के लिए ऐमिल नाइट्रोसम औषधि का उपयोग बहुत लाभकारी है।
विभिन्न लक्षणों में ऐमिल नाइट्रोसम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :-
सिर में भारीपन महसूस होने लगता है, रोगी ताजी हवा में रहना चाहता है, रोगी के सिर और चेहरे की ओर खून का दौरा बढ़ जाता है, शरीर की गर्मी और लाली के साथ ऐसा महसूस होता है, शरीर की त्वचा के कई भाग से खून स्राव होता है।
स्त्रियों को रजोनिवृत्ति के समय में अधिक पसीना निकलता है, कान के भाग में अधिक गर्मी महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐमिल नाइट्रोसम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को गले में सिकुड़न महसूस होती है, रोगी को घुटन सी महसूस होने लगती है, हृदय की धड़कन तेज हो जाती है तथा शरीर के खून का बहाव सिर से चेहरे की ओर अधिक हो जाता है। इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए ऐमिल नाइट्रोसम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सांस लेने में अधिक परेशानी होती है कभी-कभी तो रोगी को दमा जैसी परेशानी भी होने लगती है, रोगी के छाती में भारीपन और घुटन महसूस होती है, दम घोट देने वाली खांसी होती है, हृदय अस्वस्थ्य रूप से कार्य करता है, हृदय के आस-पास के भाग में दर्द तथा सिकुड़न महसूस होता है, हल्का सा कार्य करने पर छाती में दबाव महसूस होने लगता है, इस प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए ऐमिल नाइट्रोसम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
स्त्री से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के पेट में ऐसा दर्द होता है जैसे कि बच्चे को जन्म देने के समय में दर्द होता है, और योनि से रक्त स्राव (कुछ मात्रा में खून बहना) होने लगता है तथा इसके साथ रोगी के चेहरे पर गर्मी महसूस होने लगती है। स्त्रियों को मासिकधर्म बंद होने के बाद सिर में दर्द होता है तथा सिर अधिक गर्म हो जाता है और हृदय की धड़कन तेज हो जाती है, ऐसी रोगी का उपचार करने के लिए ऐमिल नाइट्रोसम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का शरीर अधिक गर्म हो जाता है तथा इसके तुरन्त बाद कभी-कभी शरीर ठण्डा और चिपचिपा हो जाता है और अधिक पसीना आने लगता है, सारे शरीर में जलन होने लगता है, इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी का उपचार ऐमिल नाइट्रोसम औषधि से करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कई घंटों तक लगातार अंगड़ाइयां आती रहती हैं जिसमें हाथ-पैर फैलाने पड़ते हैं, हाथों की शिरायें फूल जाती हैं, हाथ की उंगलियों के पोरों का अधिक धड़कना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐमिल नाइट्रोसम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
प्रसव (बच्चे को जन्म देना) से सम्बंधित लक्षण :- बच्चे को जन्म देने के तुरन्त बाद ही शरीर में ऐंठन शुरू हो जाना तथा योनि से अधिक मात्रा में खून का बहना, ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐमिल नाइट्रोसम औषधि उपयोग करना चाहिए।
विभिन्न प्रकार के रोगों से सम्बन्धित लक्षण :- ऐमिल नाइट्रोसम औषधि कई प्रकार के रोगों को ठीक करने में बहुत अधिक उपयोगी है जो इस प्रकार है-स्नायुविक के कारण उत्पन्न सिर में दर्द (न्युरालजिक हैडेक), लू (सनस्ट्रोक), स्त्रियों के रजोधर्म की खराबी (मेंस्ट्रुअल इरेग्युलरिटीज), हिस्टीरिया की तकलीफें, मिर्गी और ब्राइट्स रोग आदि।
उपशमनार्थ :- उन सभी लक्षणों से पीड़ित रोगी की अवस्था में ऐमिल नाइट्रोसम औषधि को सुंघने से तुरन्त आराम आता है जिनमें रक्त वाहिकायें ऐंठन के साथ सिकुड़ जाती हैं, जैसा कि हृदय में दर्द होने की स्थिति, मिर्गी के दौरे पड़ने की स्थिति, आधे सिर में दर्द, अधिक ठण्ड लगना, पीलिया आदि अवस्था। दमा के दौरें तथा ‘वास में रुकावट को दूर करने के लिए ऐमिल नाइट्रोसम औषधि का उपयोग बहुत अधिक लाभकारी है। ऐमिल नाइट्रोसम औषधि का होम्योपैथिक व्यवहार में किसी रूमाल पर इसकी दो से 5 बूंदें टपका दी जाती हैं तथा उस रूमाल को रोगी नथुनों पर रखकर सुंघाई जाती है जिसके फलस्वरूप कई प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
ग्लोनाइन, लैकेसिस, ऐकोन, बेल, कैक्ट, कोक औषधि से ऐमिल नाइट्रोसम औषधि की तुलना कर सकते हैं।
ऐमिल नाइट्रोसम औषधि को सूंघने से असर बहुत जल्द होता है, बहोश करने की औषधियों के बुरे फल से जब मनुष्य की मृत्यु होने वाली होती है, तब ऐसी अवस्था में यह बहुत उपयोगी है और मनुष्य को इसके प्रभाव से अधिक लाभ मिलता है।
प्रतिविष :-
कैक्टस, स्ट्रिकनी, एरगट औषधियों का प्रयोग ऐमिल नाइट्रोसम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
मानसिक कारणों तथा शारीरिक परिश्रम अधिक करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
मात्रा (डोज) :-
ऐमिल नाइट्रोसम औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल (Anacardium oriental)
मानसिक कारणों की वजह से होने वाली मस्तिष्क की कमजोर स्मरण शक्ति को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का उपयोग लाभकारी है।
जिन रोगियों की स्मरण शक्ति अधिक कमजोर हो जाती है, मामूली हाल की घटनायें भी याद नहीं रहतीं, जल्दी से कुछ भी समझ में नहीं आता है, रोगी को देखकर हर समय ऐसा लगता है कि वह सपने में खोया हुआ है, स्मरण शक्ति के अधिक कमजोर होने के कारण रोगी को बहुत अधिक मानसिक परेशानी हो जाती है, वह चिड़चिड़ा स्वभाव का हो जाता है, किसी प्रकार का बिजनेस करने के योग्य नहीं होता है, कभी-कभी रोगी को ऐसा महसूस होता है कि मेरा दो दिल है, एक दिल तो एक काम करने के लिए आदेश दे रहा है तथा दूसरा उसे करने से मना कर रहा है। ऐसे रोगी का ख्याल और विचार अद्भुत प्रकृति के होते हैं, उसे ऐसा महसूस होता है कि मेरे पास कोई अनजान मनुष्य खड़ा है, उसे तरह-तरह के चेहरे दिखाई देते हैं, कभी एक दाहिनी तरफ तथा दूसरी बाईं तरफ, इस तरह से वह अपने मन में भ्रम पैदा करता है, वह सबको सन्देह की दृष्टि से देखता है, कई गम्भीर विषयों पर वह हंस देता है और हंसने योग्य विषयों पर गम्भीर भाव धारण कर लेता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
रोगी ईर्ष्यापूर्ण होता है तथा हानि पहुंचाने के लिए बहुत ही तत्पर होता है, अपने को देव ख्याल करता है, सबको कोसने का मन करता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
रोगी के सभी ज्ञानेन्द्रियों में अधिक कमजोरी आ जाती है, जैसे दृष्टि दोष उत्पन्न होना, कान से कम सुनाई देना। इस प्रकार के लक्षण यदि किसी विधार्थियों में है तो उस विधार्थियों को परीक्षा देने में भय लगता है। किसी भी कार्य को करने का मन नहीं करता है, रोगी को सिर पर पट्टी बांधने जैसा महसूस होता है। आमाशय के अन्दर खालीपन महसूस होता है। सभी प्रकार के लक्षणों में खाना खाने के बाद कुछ आराम मिलता है। इनमें से किसी भी प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि उपयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की सोचने की शक्ति नष्ट हो जाती है, कभी-कभी रोगी सोचता है कि वह दो या तीन चार व्यक्तियों से घिरा हुआ है चलते समय ऐसा महसूस होता है कि कोई उसका पीछा कर रहा है, गाली-गलौज करने का स्वभाव पैदा हो जाता है और मानसिक तनाव अधिक हो जाता है, रोगी को कान से बहुत कम सुनाई देता है तथा आंखों से भी ठीक प्रकार से दिखाई नहीं देता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है तथा उसके सिर में चक्कर आने लगते हैं और सिर पर दबाव महसूस होता है। कोई मानसिक कार्य करने पर माथे में, सिर के पिछले भाग में तथा कपालशीर्ष (वरटेक्स) में दर्द बढ़ जाता है, खाना खाने से रोग के लक्षणों से कुछ आराम मिलता है। रोगी की खोपड़ी में छोटे-छोटे फोड़े हो जाते हैं जिनमें खुजली होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का उपयोग लाभदायक है।
आंख से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है तथा इसके साथ ही आंख के ऊपरी कोटर में डाट लग जाने जैसा दबाव होता है और आंखों से धुंधला दिखाई देने लगता है। रोगी को कोई भी चीजें बहुत बुरी दिखाई देती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि उपयोग करे।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है जिसके कारण वह सोचने का कार्य सही से नहीं कर पाता है तथा इसके साथ ही रोगी के कानों से आवाज कम सुनाई देती है और कान पर दबाव महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि उपयोग लाभदायक है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को लगातार छींके आती है, गंध की पहचान सही से नहीं हो पाती है, सर्दी-जुकाम के साथ दिल की धड़कन नीले छल्ले रूप में दिखाई देती है। ऐसे लक्षण वृद्ध व्यक्तियों में अधिक देखने को मिलता है और इन लक्षणों के साथ-साथ रोगी का मानसिक संतुलन भी ठीक नहीं रह पाता है और उसके सोचने की शक्ति नष्ट हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि उपयोग लाभदायक है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के आंखों के आगे नीले छल्ले बन जाते हैं तथा चेहरा पीला पड़ जाता है और इसके साथ रोगी का मानसिक संतुलन ठीक नहीं रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि उपयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जीभ पर छाले पड़ जाते है, मुंह से बदबू आती है, मुंह सूजी हुई लगती है, जीभ को हिलाने में रुकावट महसूस होती है, जिसके फलस्वरूप रोगी को बोलने में परेशानी होती है तथा इसके साथ-साथ रोगी की सोचने की शक्ति कमजोर हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की पाचन शक्ति कमजोर हो जाती है तथा उसे तनाव हो जाता है, रोगी को अपने आमाशय के अन्दर खालीपन महसूस होता है, डकारें आती है, मिचली तथा उल्टी भी आती है, खाना खाने के बाद कुछ आराम मिलता है। खाना खाते समय घुटन महसूस होती है, रोगी खाना निगलता है और जल्दी-जल्दी पानी पीता है। इन लक्षणों के साथ-साथ रोगी का मानसिक संतुलन भी ठीक नहीं रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पेट में दर्द होता है और ऐसा महसूस होता है कि उसके आन्तों के अन्दर कोई हल्का सा पदार्थ फंस गया हैं, पेट में गड़गड़ाहट होती, चुटकी काट दिए जाने जैसी अनुभूति और मरोड़ होता है, सोचने की शक्ति कमजोर हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मलाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की पाचनशक्ति कमजोर हो जाती है, मलत्याग करने की इच्छा तो होती है लेकिन जब वह मलत्याग करता है तो सही से मलत्याग नहीं हो पाता और ऐसा महसूस होता है कि जैसे मलद्वार के अन्दर कोई चीज फंस गई है, गुदा में सिकुड़न तथा ऐंठन होने लगती है, नर्म मल भी बड़ी कठिनाई के साथ बाहर निकलता है। रोगी के मलद्वार में खुजली होती है, मलद्वार से हल्का-हल्का तरल पदार्थ निकलता रहता है, मलत्याग के समय में मलद्वार से खून की कुछ मात्रा भी निकलती है, तथा दर्दनाक बवासीर रोग हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि उपयोग करे।
पुरुष से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को उत्तेजना के समय में लिंग में खुजली होने लगती है, और उत्तेजना अधिक बढ़ जाती है, जिसके कारण वीर्यपात हो जाता है।
स्वप्न में उत्तेजना के साथ ही लिंग में खुजली होती है जिसके कारण वीर्यपात हो जाता है।
रोगी को मलत्याग करते समय खून की कुछ मात्रा मलद्वार से निकलती रहता है।
इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके इन लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि उपयोग लाभदायक है।
स्त्री से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्री को प्रदर रोग होने के साथ ही जननांग में खुजली होना तथा दर्द होना, और मासिकधर्म बहुत कम समय होना तथा कम मात्रा में स्राव होना, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को सांस लेने के साथ ही छाती पर दबाव महसूस होता है तथा ऐसा लगता है कि छाती में कोई चीज अटकी पड़ी है, छाती के भाग में अधिक गर्मी महसूस होती, बातचीत करने में खांसी उत्पन्न हो जाती है।
बच्चे को गुस्सा करने से खांसी होती है, खाना खाने के बाद खांसी होने पर खाए हुए खाने की उल्टी हो जाती है और सिर के पिछले भाग में दर्द होता है और स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है।
इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी के हृदय की धड़कन बढ़ जाती है तथा इसके साथ ही स्मरण शक्ति कमजोर हो जाती है तो रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि उपयोग करना उचित होता है।
बूढ़े व्यक्तियों को सर्दी तथा जुकाम हो जाता है, हृदयप्रदेश में सुई जैसी चुभन हो जाती है।
इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कंधे में हल्का-हल्का दबाव महसूस होता है और उसे ऐसा महसूस होता है कि कोई बोझ कंधे पर रखा हुआ है तथा गर्दन के पिछले भाग में अकड़न होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का उपयोग लाभकारी है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :-
हाथ के अंगूठे के स्नायु (नाड़ियों) में दर्द होना, शरीर के कई अंगों में लकवा जैसा प्रभाव हो जाना, घुटने में लकवा का प्रभाव और ऐसा महसूस होना कि जैसे घुटने पर कोई पट्टी बंधी हो, पिण्डलियों में मरोड़ होना, नितम्बपेशियों में दबाव महसूस होना, हथेलियों में मस्से होना, हाथ की उंगलियों में सूजन होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को मानसिक कमजोरी अधिक हो जाती है तथा उसकी सोचने की शक्ति बहुत कम हो जाती है जिसके कारण रोगी को कई-कई राते गुजर जाने पर भी नींद नहीं आती तथा डरावने सपने अधिक देखना। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि उपयोग करना फायदेमंद होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोग की त्वचा पर तेज खुजली के साथ छाजन रोग (एक्जिमा) हो जाता है, साथ ही चिड़चिड़ापन महसूस होता है, फफोलेदार सूजन हो जाती है, छपकी रोग होना, हाथों पर मस्से होना, बांहों पर घाव होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
गर्म पानी का उपयोग करने से रोगी के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन. ह्रास):-
खाने से, एक ही पाश्र्व की ओर लेटने से तथा रगड़ने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
चेहरे पर फफोले, कुष्ठ रोग के सफेद दाग, मस्से, घट्टे (कोर्नस), तलुवों की चमड़ी फटना आदि को ठीक करने में ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि की तुलना रस, साइप्रिपेडियम, चेलिडोनियम, जिरोफिलम औषधियों से कर सकते हैं।
प्रतिविष :-
ग्रिण्डेलिया, काफिया, रस, यूकेलिप्टिस, औषधि का प्रयोग ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
ऐनाकार्डियम ओरियेनटेल औषधि की 6 से 200 शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। स्मरण शक्ति के लिए 200 शक्ति की एक खुराक प्रतिदिन कुछ दिन तक देने से अच्छा लाभ होता है।
एनागोलिस (ANAGALLIS)
एनागोलिस औषधि एक तरह के वृक्ष के टिंचर से बनाया जाता है। जब रोगी के सारे शरीर में बहुत तेज खुजली होती है और गुदगुदाहट होती है तो इस औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
चर्म रोगों को ठीक करने में एनागोलिस औषधि का उपयोग बहुत लाभदायक है। जब रोगी के पूरे शरीर में बहुत तेज खुजली होती है तथा इसके साथ ही शरीर पर गुदगुदाहट भी होती है तब इसका प्रयोग करना चाहिए।
रोगी के शरीर से दूषित द्रव को बाहर निकालने के लिए एनागोलिस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक है। मांस को नरम बनाने तथा मस्सों को नष्ट करने का गुण इस औषधि में पाया जाता है।
कुत्ता, सियार आदि जानवरों के काटने के कुछ दिन बाद जब रोगी पानी या किसी तरह की चमकीली चीज देखकर डर जाता हो तो ऐसे रोगी के इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने में एनागोलिस औषधि लाभदायक है।
आमवाती और गाऊटी रोग में दर्द कंधों और बांहों में होता है, हाथ के अंगूठें की पोर में दर्द होना तथा उंगुलियों में ऐंठन होना तथा मूत्रनली में जलन (इरेशन) होने के कारण संभोग क्रिया करने के प्रति इच्छा होना, मूत्रनली का छेद बंद हो जाना और पेशाब करने में जलन होना तथा पेशाब कई धाराओं में होना। हाथों और उंगुलियों में खुजली होना तथा छाला पड़ना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए एनागोलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। किसी स्थान पर कांटा गड़ जाने पर इसका उपयोग करने से कांटा निकल जाता है।
विभिन्न लक्षणों में एनागोलिस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा हो, तथा उसके मस्तिष्क पर आंख के पास वाले भाग में दर्द का प्रभाव अधिक हो, रोगी के आंतों में गड़बड़ी हो गई हो और डकारें आ रही हो, कॉफी पीने से आराम मिल रहा हो। पुराने सिर का दर्द। शरीर के कई अंगों में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए एनागोलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- आमवाती रोग या गाऊटी रोग हो जाने तथा इसके साथ शरीर के कई अंगों में दर्द होना, कंधों तथा बांहों में विशेषरूप से दर्द होना, हाथ के अंगूठे के पोर में दर्द होना और उंगलियों में ऐंठन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एनागोलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- लिंग के ऊपर अत्यधिक खुजली मचना जिसके कारण सम्भोग करने की अधिक इच्छा होती है, मूत्रनली में अधिक जलन होने के साथ दर्द होना और मूत्रनली बंद हो जाना, इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए एनागोलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- हाथों और अंगुलियों में खुजली होना तथा छाला पड़ना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एनागोलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
बच्चे को जन्म देने के बाद आंवल की कुछ मात्रा अटक जाने से बच्चेदानी से रक्तस्राव (खून का बहना) होना तथा इसके साथ दर्द होना, ऐसी अवस्था में रोगी स्त्री के इस लक्षण का इलाज करने के लिए एनागोलिस औषधि का प्रयोग कर सकते हैं लेकिन ऐसी अवस्था में स्ट्रैमोनियम औषधि की अपेक्षा सिकेलिस औषधि से उपचार करने से अधिक लाभ मिलता है। अत: इन औषधियों से एनागोलिस औषधि की तुलना कर सकते हैं।
बैलेडोना और कूप्रम औषधी के कुछ गुणों की तुलना एनागोलिस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा :-
एनागोलिस औषधि की 1, 3, 30 या 200 शक्ति अर्थात पहली से तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐनोथेरम (ANATHERUM)
चर्म रोगों से सम्बन्धित लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनोथेरम औषधि बहुत ही उपयोगी है। शरीर के विभिन्न भागों में दर्द होने वाले सूजन, जिसमें पीब पड़ जाती है। ग्रन्थियों में जलन होने पर इस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
विभिन्न लक्षणों में ऐनोथेरम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सिर में ऐसा दर्द होता है जैसे कि नोकदार चीज सिर में गड़ गई हो, दोपहर के समय में रोगी को और भी अधिक परेशानी होती है। खोपड़ी में परिसर्प (हर्पेस), घाव (अल्सरस) तथा शरीर के कई अंगों पर फोड़े-फुंसियां होना। शरीर के कई भागों में मस्सों के जैसा मांस वृद्धि होना। नाक के नोक पर फोड़े-फुंसिया होना तथा घाव होना, जीभ पर दरारें पड़ना, जीभ का किनारा कटी-कटी लगना तथा अधिक लार निकलना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनोथेरम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का पेशाब गाढ़ा, गंदा हो, पेशाब करने की इच्छा बहुत कम हो, पेशाब की बहुत कम मात्रा को भी रोग पाने में असमर्थ हो, मूत्रनली में दर्द या कोई रोग हो गया हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनोथेरम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- कैंसर जैसे घाव, बच्चेदानी में सूजन हो जाने, स्तन में सूजन, स्तन का कठोर होना तथा स्तन की त्वचा उधड़ी हुई हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनोथेरम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- नाखून की त्वचा में रूखापन आ जाता है, पैरों से बदबूदार पसीना निकलता है, शरीर के कई भागों में फोड़े तथा फुंसियां होना तथा खुजली होने पर इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनोथेरम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
ऐनोथेरम औषधि की तुलना स्टैफिसैग्रि, थूजा तथा कर्क्यूरियस औषधियों के कुछ गुणों से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
ऐनोथेरम औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एण्डरसोनिया - अमूरा रोहितका (ANDERSONIA- AMOORA ROHITAKA)
एण्डरसोनिया औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के काम आता है जो इस प्रकार हैं-यकृत तथा प्लीहा से संबन्धित रोग, जीर्ण ज्वर, ग्रंथियों से संबन्धित रोग, प्रदर रोग तथा शरीर के सभी अंगों में कमजोरी आना।
विभिन्न लक्षणों में एण्डरसोनिया औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी व्यक्ति की स्मरण शक्ति बहुत अधिक कमजोर है, वह मात्राओं तथा अक्षरों को गलत लिखता है तथा स्थान आदि बताने में गलती करता है, मन का किसी विषय पर स्थिर नहीं रखता है और क्रोध स्वभाव का होता है ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्डरसोनिया औषधि का उपयोग लाभदायक है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सिर में गर्मी महसूस होती है तथा उसे चक्कर आता रहता है, कनपटियों में दर्द होने के साथ गर्मी महसूस होती है, ठण्डी हवा लगने या ठण्डी लेप करने से आराम आता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्डरसोनिया औषधि उपयोग लाभकारी है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को चेहरे पर गर्मी महसूस होती है, चेहरे और आंखों में जलन महसूस होती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्डरसोनिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह का स्वाद बिगड़ जाता है, सुबह के समय में मुंह का स्वाद कड़वा होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्डरसोनिया औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को हल्का-हल्का बुखार होता है तथा इसके साथ उसके सिर में दर्द होता है और हाथ पैरों में जलन होती है तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्डरसोनिया औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नाड़ी से सम्बन्धित लक्षण :- नाड़ी की गति पूर्ण और थोड़ी सी तेज चलती है तथा इसके साथ रोगी को बुखार भी हो और सिर में दर्द तथा हाथ पैरों में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एण्डरसोनिया औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मात्रा :-
एण्डरसोनिया औषधि की 3x 6x 30, आदि शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एगड्रोग्राफिस पैनीकुलैटा (ANDROGRAPHIS PANICULATA)
एगड्रोग्राफिस पैनीकुलैटा औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों की अवस्थाओं तथा रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है जो इस प्रकार हैं-लम्बी ज्वर की अवस्था, जुकाम-खांसी की प्रारिम्भक अवस्था, शरीर के कई अंगों में अधिक कमजोरी आना, बच्चों का यकृत रोग तथा पीलिया (जोंडिस) रोग।
विभिन्न लक्षणों में एगड्रोग्राफिस पैनीकुलैटा औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बहुत अधिक निराशा महसूस होती है तथा काम करने और किसी से बातचीत करने की इच्छा नहीं होती है, बेचैनी होने लगती है और क्रोध अधिक आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एगड्रोग्राफिस पैनीकुलैटा औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को चक्कर आते हैं तथा सिर के पिछले भाग में दर्द होता है और बहुत अधिक तनाव होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एगड्रोग्राफिस पैनीकुलैटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखें लाल हो जाती है तथा आंखों के अन्दर से पानी निकलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एगड्रोग्राफिस पैनीकुलैटा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक से पानी जैसा द्रव निकलता है और इसके साथ-साथ रोगी को छीकें अधिक आती हैं, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एगड्रोग्राफिस पैनीकुलैटा औषधि का उपयोग लाभकारी है।
मुंख से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मुंह का स्वाद कड़वा हो जाता है तथा इसके साथ ही उसके कंठ के अन्दर सूखापन और जलन महसूस होता है तथा जीभ पर सफेदी आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एगड्रोग्राफिस पैनीकुलैटा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को दस्त हो जाता है तथा कब्ज की शिकायत हो जाती है, मलत्याग करने की इच्छा बार-बार होती है, लेकिन मलत्याग करते समय मल सही से नहीं होता है, मल का रंग काला, कठोर और पीले रंग का होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एगड्रोग्राफिस पैनीकुलैटा औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
ज्वर (बुखार) से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार हो जाता है तथा इसके साथ ही रोगी के शरीर में गर्मी महसूस होती है, रोगी को सिर दर्द होने के साथ ही अधिक प्यास लगती है और सारे शरीर में जलन होती है जो ठण्डी हवा तथा पानी से कम होती है, दोपहर 11 से 12 बजे तक तथा शाम को 7 से 8 बजे तक बुखार अधिक तेज हो जाता है। बुखार कुछ समय के लिए होता है और उतरता और चढ़ता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एगड्रोग्राफिस पैनीकुलैटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा :-
एगड्रोग्राफिस पैनीकुलैटा औषधि की मूलार्क, 3x 6x का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एनोमेप्सिस कैलीफोर्निका (ANEMOPSIS CALIFORNIC)
एनोमेप्सिस कैलीफोर्निका औषधि श्लेष्म कलाओं (म्युकोस मेम्ब्रेंस) की एक प्रमुख लाभदायक औषधि है।
विभिन्न लक्षणों में एनोमेप्सिस कैलीफोर्निका औषधि का उपयोग-
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक की श्लेष्म कला के पुराने जलन (प्रदाह) के साथ नाक की झिल्ली का ढीलापन तथा अधिक स्राव (नाक से पानी की तरह पदार्थ निकलना) होना तथा नजले की अवस्था में जब सिर और गले के अन्दर रुकावट महसूस होती है तब इस औषधि का उपयोग किया जाता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :-
कटे हुए घावों, मोच तथा नीली पड़ी मांस पेशियों को ठीक करने के लिए यह लाभदायक औषधि है।
हृदय रोग में जब दिल की धड़कन तेजी से धड़कता है तब उसे शान्त करने के लिए एनोमेप्सिस कैलीफोर्निका औषधि का प्रयोग बहुत अधिक लाभदायक होता है।
पाचन शक्ति से सम्बन्धित लक्षण :- पाचन क्रिया की शक्ति को बढ़ाने के लिए भी यह औषधि बहुत अधिक लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
पाइपर मेथिस्टिकम औषधि से एनोमेप्सिस कैलीफोर्निका औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा :-
एनोमेप्सिस कैलीफोर्निका औषधि की अर्क का सेवन स्प्रे के रूप में करने से कई प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं।
ऐंगुस्टुरा वेरा (Angustura vera)
जोड़ों का दर्द जिसके कारण रोगी को चलने-फिरने में बहुत अधिक परेशानी महसूस होती है तथा लकवा का प्रभाव अधिक होता है, रोगी को कॉफी पीने की अधिक इच्छा होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐँगुस्टुरा वेरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्लेष्मकलाओं तथा मेरू-प्ररेक तन्त्रिकाओं पर ऐँगुस्टुरा वेरा औषधि का लाभदायक प्रभाव देखने को मिलता है।
विभिन्न लक्षणों में ऐँगुस्टुरा वेरा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द होता है, गालों में तेज दर्द होता है, शरीर के कई अंगों में खिंचाव, शंख-पेशियों में तथा जबड़ा खोलते समय दर्द होता है, हनु-संधियों, चर्वणिका पेशियों में एक प्रकार का ऐसा दर्द होता है जैसे कि वे अधिक थक गई हो, गाल की हडि्डयों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐँगुस्टुरा वेरा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जीभ का स्वाद कड़वा हो जाता है, कॉफी पीने की अधिक इच्छा होती है, नाभी से लेकर छाती तक के भाग में दर्द होता है, रोगी को उबकाई आती है जिसके साथ-साथ रोगी को खांसी भी हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐँगुस्टुरा वेरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी के पेट के नीचे के भाग में खुजली होती है, गर्दन की कशेरुकाओं में दर्द होता है तथा उसमें खिंचाव होता है।
रीढ़ की हड्डी के पिछले भाग में दर्द होता है जो दबाव देने से बढ़ जाती है।
गर्दन के पिछले भाग में तथा त्रिकास्थि में दर्द होना और इसके साथ-साथ रोगी के पीठ के निचले भाग में दर्द होता है और झटके लगते है, रोगी की पीठ पीछे की ओर झुक जाती है।
इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐँगुस्टुरा वेरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मांसपेशियों तथा जोड़ों में अकड़न और तनाव होता है तथा शरीर के कई अंगों में चलते समय दर्द होता है, बाहें थकी हुई और भारी महसूस होती हैं, कभी-कभी तो कई अंगों में लकवा रोग का प्रभाव देखने को मिलता है, हाथ की अंगुलियां ठण्डी पड़ जाती है, घुटनों में दर्द होने लगता है, हडि्डयों के जोड़ों पर कड़कड़ाहट महसूस होती है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को टी.बी. रोग हो जाता है तथा इसके साथ ही शरीर के कई अंगों पर घाव हो जाते हैं जिसके कारण दर्द बहुत अधिक होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐँगुस्टुरा वेरा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- नक्स, मर्क्यूरियस, ब्रूसिया-कुचला, रूटा औषधि से ऐँगुस्टुरा वेरा औषधि की तुलना कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :- शोरगुल स्थान तथा तरल पदार्थों का सेवन करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
मात्रा (डोज) :- ऐँगुस्टुरा वेरा औषधि की छठी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐन्हालोनियम (ANHALONIUM)
ऐन्हालोनियम औषधि मस्कल पदार्थ से बनाई जाती है, मस्कल एक तेज नशीली स्प्रिट है जिसे पल्के फर्टे से खींचा जाता है। पल्के मैक्सिको के आगेव अमेरिकाना (अगेव अमेजीकाना ओर मेक्सिको) में तैयार किया जाता है जिसे वहां मेग्वे (मेग्वे) के नाम से जाना जाता है और मैक्सिको का राष्ट्रीय पेय पदार्थ है। भारतीय लोग इसे पेयोट कहकर पुकारते हैं। यह हृदय को कमजोर करती है तथा पागलपन की स्थिति पैदा कर देती है। कान की नाड़ियों पर इसका ठीक प्रभाव पड़ता है क्योंकि इसके सेवन से कान से सुनने की शक्ति ठीक हो जाती है।
यह नशे की ऐसी अवस्था उत्पन्न करती है जिसमें विचित्र प्रकार की वस्तुएं आती है, अधिक मात्रा में सुन्दर और विभिन्न प्रकार के अदलते-बदलते रंग दिखाई देते हैं तथा शारीरिक शक्ति बढ़ी हुई प्रतीत होती है, रोगी को बड़े-बड़े राक्षस तथा अनेक प्रकार की भयंकर आकृतियां भी दिखाई देती हैं।
ऐन्हालोनियम औषधि हृदय को शक्ति प्रदान करती है, तथा श्वास प्रणाली को तेज करती है, पेट में गैस बनने के कारण पागलपन की स्थिति और नींद न आना, दिमागी थकान होना, पागलपन की स्थिति होना, आधे सिर में दर्द तथा भ्रम पैदा होना जिसमें रोगी को कई चीजें रंग-बिरंगी दिखाई देती हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए इसका उपयोग करना चाहिए।
शरीर की पेशियों में अधिक कमजोरी आ जाना, जोड़ों में दर्द होना तथा शरीर के आधे भाग में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐन्हालेनियम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में ऐन्हालोनियम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को समय का पता नहीं चलता है, शब्दों का ठीक प्रकार से उच्चारण नहीं कर पाता है, रोगी को अविश्वास अधिक होता है तथा वह आलसी हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐन्हालोनियम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द होने के साथ ही आंखों की दृष्टि कमजोर हो जाती है। चलते-चलते रंग-बिरंगी चीजें दिखाई देने लगती हैं, बेकार बैठे रहने से तबीयत खराब हो जाती है, नेत्रपटल फैल जाती है तथा चक्कर आने लगता है तथा दिमाग थक जाता है, विभिन्न प्रकार की रंग-बिरंगी चीटियां दिखाई देती हैं तथा साधारण प्रकार की आवाजें भी कानों में जोर-जोर से गूंजती रहती हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :- आगेव औषधि की तुलना ऐन्हालोनियम औषधि से कर सकते हैं। ऐन्हालोनियम औषधि का नशा कैनाबिस इण्डिका तथा औनैंथे औषधि के समान ही है।
मात्रा (डोज) :-
ऐन्हालोनियम औषधि की अर्क का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐनीलीनम (Anilinium)
रोगी के सिर में अधिक चक्कर आना और सिर में दर्द होने पर ऐनीलीनम औषधि बहुत उपयोगी है।
विभिन्न लक्षणों में ऐनीलीनम औषधि का उपयोग-
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के चेहरे का रंग नीला पड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए ऐनीलीनम औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
सूजन से सम्बन्धित लक्षण :- लिंग (पेनिस) तथा अण्डकोष (स्कर्टम) में दर्द तथा सूजन हो तो इस प्रकार को ठीक करने के लिए ऐनीलीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है जिसके प्रभाव से रोग ठीक हो जाता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मूत्रनलियों में सूजन होना तथा शरीर में खून की कमी होने के साथ त्वचा का रंग फीका (डिस्कोलोरेशन ऑफ स्कीन) होना, होंठ नीला पड़ना, भूख नहीं लगना (एनोरेक्सिया) तथा पाचन दोष उत्पन्न होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐनीलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
त्वचा रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सारे शरीर में खुजली होने लगती हैं। इस प्रकार के लक्षण को ठीक करने के लिए ऐनीलीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बंध (रिलेशन) :-
आर्सेनिक, एण्टिपाइरिन औषधि से ऐनीलीनम औषधि की तुलना की जा सकती है।
ऐंथेमिस नोबिलिस (ANTHEMIS NOBILIS)
ऐंथेमिस नोबिलिस औषधि की प्रकृति सामान्य कोमल (मुलायम) जैसी है। यह औषधि पाचन दोष को ठीक करने वाली है। ऐंथेमिस नोबिलिस औषधि ठण्डी हवा तथा ठण्डी चीजों के प्रति संवेदनशील होती है।
विभिन्न लक्षणों में ऐंथेमिस नोबिलिस औषधि का उपयोग-
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को जुकाम हो जाता है तथा आंख से आंसू निकलता रहता है, छींके आने लगती हैं और नाक से स्वच्छ जल बहता रहता है। कमरे के अन्दर लक्षणों में वृद्धि होती है। गले के अन्दर सिकुड़न (कोंस्ट्रीक्शन) तथा गले के अन्दर छीलन महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐंथेमिस नोबिलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बंधित लक्षण :- रोगी के यकृत-प्रदेश में दर्द (एचिंग पद रिजन ऑफ लिवर), पेट के अन्दर तथा टांगों में ऐंठन तथ ठण्ड महसूस होती है, मलद्वार में खुजली के साथ ऐंठन होती है और दर्द महसूस होता है, मल सफेद रंग का होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐंथेमिस नोबिलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को मूत्राशय फैला हुआ महसूस होता है, अण्डकोष (वृषणरज्जु-स्पेरमेटिक कोर्ड) में दर्द महसूस होता है। पेशाब करने में रुकावट होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐंथेमिस नोबिलिस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को तलुवों में खुजली होती है और यह खुजली इस तरह से होती है जैसे - बिवाइयां फट गई हो, झुर्रीदार मांस (गूसेफ्लेस) हो गया हो। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए ऐंथेमिस नोबिलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :- ऐंथेमिस नोबिलिस औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एथियोप्स मर्क्यूरियेलिस-मिनरैलिस (Aethiops mercurialis-mineralis)
एथियोप्स मर्क्यूरियेलिस औषधि गण्डमाला संबन्धी रोग, आंख में दर्द होना, खाज तथा खुजली जिसमें अधिक जलन तथा दर्द होता है, पपड़ीदार जलन, शरीर में जहरीले तत्व की उत्पति होना आदि रोगों को ठीक करने में उपयोगी है।
एथियोप्स मर्क्यूरियेलिस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- त्वचा के रोग जो मधुमक्खी के छत्ते जैसा हो तथा छाजन रोग से मिलता-जुलता रोगों को ठीक करने के लिए एथियोप्स मर्क्यूरियेलिस औषधि का उपयोग किया जाता है।
ग्रन्थियों से सम्बन्धित लक्षण :- गण्डमाला में किसी प्रकार के रोग तथा ग्रंथियों में सूजन हो जाने पर एथियोप्स मर्क्यूरियेलिस औषधि का प्रयोग लाभदायक है, इसके प्रभाव से रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए इस औषधि की तीसरी शक्ति के विचूर्ण का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कान बहने पर एथियोप्स मर्क्यूरियेलिस औषधि का प्रयोग करने से कान बहना बंद हो जाता है। इस रोग को ठीक करने के लिए इस औषधि की तीसरी शक्ति के विचूर्ण का उपयोग करना उचित होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों के सफेद पर्दे में घाव होने पर एथियोप्स मर्क्यूरियेलिस औषधि का उपयोग करना चाहिए, लेकिन इस रोग को ठीक करने के लिए एथियोप्स मर्क्यूरियेलिस औषधि की तीसरी शक्ति के विचूर्ण उपयोग करना फायदेमंद होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
एथियोप्स एण्टिमोनेलिस औषधि की तुलना एथियोप्स मर्क्यूरियेलिस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा :-
एथियोप्स मर्क्यूरियेलिस औषधि की निम्न शक्ति वाले विचूर्ण, मुख्यत: दूसरी दशमलव शक्ति का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अटिस्टा इण्डिका ATISTA INDICA
अटिस्टा इण्डिका औषधि उन रोगों को ठीक करने के लिए उपयोग में लिया जाता है जो गर्मी के कारण उत्पन्न होता है जैसे- अतिसार (दस्त) तथा पेट में गैस बनना।
अटिस्टा इण्डिका औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की स्मरण शक्ति (याददास्त) कमजोर हो जाती है तथा शरीर में स्फूर्ति कम होती है तथा उदासीपन होता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सुबह के समय में सिर में चक्कर आने लगता है, किसी चीज को चबाने से कनपटी के भाग में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब रोशनी की तरफ देखता है तो उसकी आंखे चौंधिया सी जाती है और जब आंखों को खोलता है तो कुछ सेकेडों के लिए उसे रोशनी कांपती हुई दिखाई देती है जिसके कारण उसे आंखों को बन्द करना पड़ता है। नींद से जागने पर रोशनी कांपती हुई नज़र आती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की सुनने की शक्ति तेज हो जाती है जिसके कारण कानों के अन्दर घूं-घूं की आवाज सुनाई देती है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक से खून बहने लगता है (नकसीर रोग), सूखी सर्दी तथा जुकाम होना। ऐसे रोग को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि उपयोग करना चाहिए।
दांत से सम्बन्धित लक्षण :- मसूढ़ों से खून निकलने लगता तथा दंतमूल पर हल्का-हल्का दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
रुखापन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसी प्यास लगती है जिसमें रोगी पानी तो पीता है लेकिन उसकी प्यास नहीं बुझती तथा उसका गला सूखा सा रहता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार होने के बाद कई सप्ताहों तक गले की नलियों (टॉन्लिस) में जलन होने लगती है। इस प्रकार के लक्षण को दूर करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
जीभ से सम्बन्धित लक्षण :- सुबह के समय में रोगी इधर-उधर थूकता रहता है, कभी-कभी तो रोगी को उल्टी भी हो जाती है, उल्टी में स्वाद नमकीन होता है, उबकाइयां आती हैं, जीभ का स्वाद खट्टा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को तेज भूख लगती है, जब वह तरल खाद्य पदार्थ खाता है तो उसका भूख कम हो जाता है तथा भूख लगना बंद हो जाती है, नींबू की शिकंजी पीने की इच्छा अधिक होती है, पेट में जलन होने लगती है, आमाशय में भारीपन महसूस होता है, पेट में गैस बनने लगती है, जिसमें डकार आने से कुछ समय के लिए अस्थाई रूप से आराम मिलता है, खाना खाने के तीन से चार घण्टे के बाद कलेजे में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के नाभि के चारों ओर दर्द होने लगता है तथा पेट में मरोड़ होने लगती है तथा गुर्दे में खिंचावदार दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हृदय तथा नाड़ी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार होने के समय में धड़कन तथा नाड़ी पूर्ण, कठोर तथा तेज हो जाती है और जब उसका बुखार ठीक हो जाता है तो उसे अधिक कमजोरी महसूस होती है। नाड़ी धीमी गति से चलने लगती है, रोगी को ऐसी अवस्था में अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार होने के साथ कब्ज की समस्या भी हो जाती है और दस्त भी हो जाता है जिसके कारण मल पानी की तरह फीका मिट्टी जैसी होती है, मल के साथ खून भी निकलता है, कभी-कभी तो मल के साथ खून तेजी से निकलने लगता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर उपचार करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की संभोग करने की इच्छा खत्म हो जाती है लेकिन उसको रात के समय में अधिक उत्तेजना होती है जिसके कारण वीर्यपात हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के सभी अंगों में कमजोरी आ जाती है तथा भारीपन महसूस होता है, टांगें सो सी जाती है तथा जब रोगी तनकर खड़ा होता है तो उसके टांगों में दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ठण्ड महसूस होती है तथा इसके साथ ही उसे बुखार हो जाता है तथा उसे प्यास नहीं लगती है, जब बुखार का ताप तेज होता है तो उसे प्यास तेज लगती है, बुखार सुबह पांच बजे के लगभग होता है और अगले दिन सबुह तीन से चार बजे तक रहता है, हर तीसरे दिन बुखार हो जाता है। इस प्रकार के बुखार रोग को ठीक करने के लिए अटिस्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मात्रा :-
अटिस्टा इण्डिका औषधि की मूलार्क, 2x, 3x, 6 आदि शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अटिस्टा रैडिक्स (Atista radix)
अटिस्टा रैडिक्स औषधि के प्रयोग से कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं जो इस प्रकार हैं- पेट में कीड़े होना तथा पेचिश रोग।
अटिस्टा रैडिक्स औषधि की शक्ति अटिस्टा-इण्डिका औषधि की तुलना में अधिक शक्तिशाली होता है और इसका उपयोग अमीबी तथा दण्डाणुक पेचिश की दोनों अवस्थाओं में किया जाता है।
रोगी को खूनी मल हो रहा हो तथा इसके साथ ही उसके नाभि में तेज दर्द हो रहा हो, पेचिश का प्रकोप सर्दी के मौसम में अधिक हो तो अटिस्टा रैडिक्स औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
रोगी के पेट में कीड़े होना तथा इसके साथ ही यदि उसके पेट में गैस बन रहा हो तथा उसके पित्ताशय में दर्द हो रहा हो तो उसके इस रोग को ठीक करने अटिस्टा रैडिक्स औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप उसके पेट के कीड़े मरकर मल के द्वारा बाहर निकल जाता है और उसका रोग भी ठीक हो जाता है।
मात्रा :-
अटिस्टा रैडिक्स औषधि की मूलार्क, 3x, 12, 30 शक्तियां का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
औरम मेटालिकम AURUM METALLICUM
औरम मेटालिकम औषधि का प्रभाव शरीर के खून, हडि्डयों तथा ग्रंथियों की दोषपूर्ण क्रिया पर पड़ता है जिसके प्रभाव से कई प्रकार के रोग जो खून, हडि्डयों तथा ग्रंथियों से सम्बन्धित होते हैं, वे ठीक हो जाते हैं।
उपदंश रोग से पीड़ित रोगी में पाए जाने वाले मानसिक लक्षणों को दूर करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि उपयोगी है। जिन रोगियों में अधिक निराशा, उत्साह की कमी, आत्महत्या करने की इच्छा, रोगी हर समय आत्महत्या करने का अवसर ढूंढता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
औरम मेटालिकम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
मन से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को आत्महत्या करने का मन करता है और अपने आप को बिल्कुल निकम्मा महसूस करता है, निराशा अधिक होने के साथ ही शरीर का रक्तदाब बढ़ जाता है, जीवन में एकदम निराशापन हो जाता है।
इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी आत्महत्या करने की ही बातें करता है, रोगी को मृत्यु से डर लगने लगता है, चिड़चिड़ा स्वभाव का हो जाता है, जरा सा भी विरोध होने पर जोश में आ जाता है।
रोगी को भय लगने लगता है तथा उसे दिमागी परेशानी होने लगती है, किसी उत्तर की प्रतीक्षा किए बिना लगातार प्रश्न करता रहता है।
रोगी को शोरगुल अधिक महसूस होती है, उत्तेजना होने लगती है और भ्रम भी होने लगता है तथा रोगी फुर्ती से काम नहीं करता है।
इस प्रकार के मन से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी के सिर में तेज दर्द होने लगता है तथा रात के समय में और भी तेज दबाव महसूस करता है, रोगी को ऐसा महसूस होता है कि सिर में चक्कर आ रहा है।
रोगी को मस्तिष्क से लेकर माथे तक चीरने तथा फाड़ने जैसा दर्द होता है।
हडि्डयों में दर्द होता है, जिसका प्रभाव चेहरे पर देखने को मिलता है, सिर में अधिक रक्त जमा होने लगता है, सिर पर कई जगह फोड़ें भी हो जाते हैं।
इस प्रकार सिर से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी के आंखों के आस-पास तथा नेत्रगोलकों (आइबॉल) के अन्दर तेज दर्द होता है।
रोगी को कोई भी चीज दो दिखाई देने लगती है या किसी चीज का ऊपरी आधा भाग दिखाई नहीं देता है।
रोगी को ऐसा महसूस होता है कि आंखे तनी हुई हैं, आग जैसी चमकदार चीजें दिखाई देती है तथा आंख के आस-पास की हडि्डयों में तेज दर्द होता है।
रोगी के स्वच्छमण्ड की नाड़ियां फूली रहती हैं, बाहर से अन्दर की ओर दर्द होता है और रोगी को ऐसा महसूस होता है कि कोई नुकीली चीज आंखों में गड़ रही है तथा आंख की स्वच्छमण्डल में लाली पड़ जाती है।
इस प्रकार के आंखों से सम्बन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बुखार हो जाता है और इसके साथ ही कान में से पीब बहने लगता है, कान के बाहरी छेद में पीब भर जाता है तथा कान के अन्दरूनी भागों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक के अन्दर घाव हो जाता है तथा नाक के ऊपरी भाग में सूजन आ जाती है और दर्द होने लगता है। नाक में जलन होने लगती है, नाक से पीब जैसा पदार्थ निकलने लगता है, ज्वलनकारी होता है, कभी-कभी तो नाक से खून भी निलने लगता है, रोगी को ऐसा महसूस होता है कि जैसे उसके नाक को छेदा जा रहा हो, नाक से सड़ी हुई बदबू आती है, किसी चीज की बदबू सहन नहीं होती है, रोगी के नाक के अन्दर गाठें भी पड़ जाती है। इस प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों के मासिकधर्म की अवस्था शुरू होने के समय में मुंह से बदबू आती है, मुंह का स्वाद कड़वा हो जाता है तथा मसूढ़ों में घाव हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्रियों का उपचार करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- गाल की हडि्डयों पर चीरने तथा फाड़ने जैसा दर्द होता है और इस दर्द से चेहरे की कई हडि्डयां प्रभावित होती है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- जब रोगी खाना खाता है तो उसे निगलते समय गले में दर्द होता है और रोगी को ऐसा महसूस होता है कि जैसे गले में कोई चीज गड़ रहा हो, गले की ग्रंथियों में दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को भूख तथा प्यास लगती है, जी मिचलाने लगता है और दम घुटने लगता है तथा गर्मी भी लगने लगती है। पेट के ऊपर के आधे भाग में सूजन आ जाती है, आमाशय में जलन होने लगती है और गरम-गरम डकारें आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट के दायां भाग अर्थात पर्शुक प्रदेश (हाइपोकोन्ड्रियम) में जलन तथा दर्द होने लगता है, पेट के अन्दर हवा रुक जाती है, छाती की ग्रंथियों में सूजन आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेशाब से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का पेशाब गंदा, मट्ठे जैसा होने लगता है तथा यह कुछ गाढ़ा-गाढ़ा तेल के समान होता है और पेशाब करने में रुकावट होती है, दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मलद्वार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कब्ज की शिकायत होती है तथा जब वह मलत्याग करता है तो उसका मल ठोस और गठीला होता है, रात के समय में रोगी को दस्त होने लगता है और मलद्वार में जलन होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- अण्डकोष में दर्द और सूजन आ जाती है, वृषणों में कठोरतापन उत्पन्न हो जाती है, लिंग में तेज उत्तेजना होती है तथा बच्चों के वृषण सिकुड़ जाते हैं। जलवृषण रोग (हाइड्रोसिल.अण्डकोष में पानी भर जाना)। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री के योनि में तेज उत्तेजना होती है। बच्चेदानी बढ़ने लगती है और बच्चेदानी अपने स्थान से हट जाती है। बांझपन का रोग तथा इसके साथ ही योनि में तेज जलन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे दो या तीन सेकेण्ड के लिए धड़कन बंद हो गई हो तथा इसके बाद दिल जोर-जोर से धड़कने लगता है और इसके साथ ही पाचनतंत्र में दबाव महसूस होता है। रोगी की नाड़ी तेज चलने लगती है तथा कमजोरी महसूस होती है और धड़कन अनियमित गति से चलने लगती है। हृत्पिण्ड फैल जाती है, उच्च रक्तचाप हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को रात के समय में सांस लेने में परेशानी होती है, बार-बार जोर से सांस लेना पड़ता है, छाती की हडि्डयों में सुई चुभने जैसी अनुभूति होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हडि्डयों से सम्बन्धित लक्षण :- सिर की हडि्डयों में दर्द होता है तथा चक्कर आने लगता हैं, शरीर की हडि्डयों में फोड़ा हो जाता है तथा रात के समय में हडि्डयों में तेज दर्द होता है। नाक, तालु तथा कान की हडि्डयों में तेज दर्द होना। रोगग्रस्त हडि्डयों में तेज दर्द होना, खुली हवा में रोग के लक्षण कुछ कम हो जाते हैं और रात के समय में लक्षणों में वृद्धि होती है। इन लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि सिर की ओर से सारा खून पैरों की ओर जा रहा है, कई अंगों में सूजन आ जाती है। रोगी को संभोग की उत्तेजना अधिक होने लगती है और रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे उसका सारा खून उबल रहा हो। हडि्डयों के जोड़ों में लकवा का प्रभाव होता है और हडि्डयों के जोड़ों में चीर-फाड़ जैसा दर्द होता है, घुटने कमजोर हो जाते हैं। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को नींद ठीक से नहीं आती है तथा उसे अनिद्रा रोग हो जाता है, इसके अलावा नींद के समय में जोर-जोर से सिसकियां भरता है और डरावने सपने देखता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए औरम मेटालिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
सेफेलिनम तथा औरम मेट औषधियों के कुछ गुणों की तुलना औरम मेटालिकम औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
ठण्ड के मौसम में सर्दी लग जाने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। बहुत से रोगों में सर्दी के मौसम में तथा सूर्यास्त से लेकर सूर्योदय तक लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन ह्रास) :-
गर्म हवा में, सुबह के समय में तथा गर्मी के मौसम में रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा :-
औरम मेटालिकम औषधि की 3 से 30 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। 30 वीं शक्ति बढ़े हुए रक्तचाप में विशेष उपयोगी है।
औरम म्यूरिएटिकम नैट्रोनेटम (AURUM MURIATICUM NATRONATUM)
औरम म्यूरिएटिकम नैट्रोनेटम औषधि स्त्री जननेन्द्रियों पर सर्वाधिक प्रभावशाली क्रिया करती है, स्त्रियों के बच्चेदानी, डिम्बकोष आदि स्थानों में होने वाली अनेक प्रकार की बीमारियों में यह उपयोगी है।
औरम म्यूरिएटिकम नैट्रोनेटम औषधि का सेवन करने से तम्बाकू और अफीम खाने की आदत छूट सकती है। इसके लक्षण ठण्डी तथा नम हवा में आश्विन महीने के अन्त से बसंत ऋतु तक बढ़ा करते हैं।
औरम म्यूरिएटिकम नैट्रोनेटम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों के बच्चेदानी (जरायु) और डिम्बकोष में अधिक मात्रा में खून जमा होने से बच्चेदानी में जलन होने लगती है, बच्चेदानी का पुराना रोग (क्रोनिक मेर्टीटिस), बार-बार गर्भपात होने से गर्भाशय का ढीला हो जाना, बच्चेदानी की गर्दन पर घाव और योनि में घाव, बच्चेदानी का बाहर उतर जाना, बच्चेदानी का अधिक बढ़ जाना, बच्चेदानी में अधिक कमजोरी उत्पन्न होना, मासिकधर्म देर से होना, सफेद प्रदर रोग होना, बच्चेदानी में फोड़ा तथा पीब बनना, जरायु का कैंसर रोग होना डिम्बकोष में सूजन होना आदि स्त्रियों के रोग का अनेक बीमारियों में औरम म्यूरिएटिकम नैट्रोनेटम औषधि लाभदायक है।
जीभ से सम्बन्धित लक्षण :- जीभ में सूइयां चुभने जैसी अनुभूति होती है तथा इसमें जलन और कठोरता उत्पन्न हो जाती है। गठिया का दर्द तथा जोड़ों का पुराना रोग, छोटे-बड़े जोड़ों से सम्बन्धित रोग, यकृत का सूचण रोग (हैप्टीक कीरोसीस) अन्तरालीय वृक्कशोथ (इंसटरस्टीटियल नेर्फीटिस.गुर्दे में सूजन होना)। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए औरम म्यूरिएटिकम नैट्रोनेटम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मात्रा :-
औरम म्यूरिएटिकम नैट्रोनेटम औषधि की 2, 3 शक्ति की विचूर्ण का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
एवेना सैटाइवा (Avena Sativa)
एवेना सैटाइवा औषधि मस्तिष्क तथा स्नायु प्रणाली पर विशेष क्रिया करती है। शरीर में किसी प्रकार से टी.बी (क्षय) रोग होने या कमजोरी लाने वाली बीमारी के बाद इसका सेवन करने से शरीर जल्दी पुष्ट और रोगी ताकतवर हो जाता है।
समस्त स्नायु और मस्तिष्क का ठीक प्रकार से काम न करने के कारण स्नायुविक सुस्ती, सैक्स क्रिया का कम हो जाना, नींद न आना अनजाने में वीर्य का निकल जाना, बहुत दिनों तक वीर्य का अपने आप निकल जाने से रोगी में बहुत अधिक कमजोरी आ जाती है तथा शराब पीने के कारण उत्पन्न स्नायु रोग आदि को ठीक करने के लिए एवेना सैटाइवा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
एवेना सैटाइवा औषधि की सेवन से अफीम और मार्फिया की आदत छूट जाती है और किसी प्रकार की हानि भी नहीं होती है।
लकवा रोग (पारालाइसीस अगीटैंस), मिर्गी रोग, डिफ्थीरिया रोग के बाद होने वाला लकवा रोग तथा आमवात रोग को ठीक करने के लिए एवेना सैटाइवा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सर्दी-जुकाम तथा नजला रोग को ठीक करने के लिए एवेना सैटाइवा औषधि की 20, 20 बूदों की मात्रा को गुनगुने पानी में डालकर सेवन करें तथा इसका सेवन एक-एक घंटे के बाद करना चाहिए।
एवेना सैटाइवा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :-
स्त्रियों को मासिकधर्म के शुरु होने के समय में होने वाला स्नायुविक सिरदर्द के साथ खोपड़ी में जलन होने पर एवेना सैटाइवा औषधि का उपयोग लाभदायक है।
सिर के पीछे के भाग में दर्द (ओस्सीपिटल हैडेक) होने के साथ पेशाब में फास्फेट पदार्थ का आना।
मासिकधर्म के समय में अधिक कष्ट होना तथा शरीर में खून की कमी होना।
इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के रोग को ठीक करने के लिए एवेना सैटाइवा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में अधिक वायु हो जाने के कारण पेट का फूलना, स्नायुशूल (नाड़ियों में दर्द होना), कई घंटे के बाद ही ऊपरी पेट में इसी प्रकार का दर्द होना, बार-बार पीले रंग के दस्त आना, मलद्वार में जलन होना। इस प्रकार के लक्षण होने पर एवेना सैटाइवा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
अल्फालफा औषधि की तुलना एवेना सैटाइवा औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा :-
एवेना सैटाइवा औषधि की मूलार्क की 10 से 20 बूंदों की मात्राओं तक गर्म पानी से सेवन करने से अधिक लाभ मिलता है।
एजाडिरेक्टा इण्डिका (Azadirachta Indica)
एजाडिरेक्टा इण्डिका औषधि का हिन्दी नाम नीम है। इस औषधि का उपयोग साधारण फोड़ा, घाव तथा दूषित घाव इत्यादि में ही प्रयोग किया जाता है। नीम की छाल को सुखाकर खूब महीन कूटकर पीस लें और जब किसी रोगी को बुखार हो तो उसे तीन चार घंटे के अन्तराल पर इस औषधि की खुराक देना चाहिए जिसके फलस्वरूप बुखार ठीक हो जाता है, इसके बाद कमजोरी को दूर करने के लिए दिन भर में दो से तीन बार नीम की छाल का काढ़ा बनाकर पिलाने से शरीर जल्दी ही स्वस्थ्य हो जाता है।
एजाडिरेक्टा इण्डिका औषधि का प्रयोग बुखार तथा शरीर के विभिन्न भागों के जोड़ों में दर्द को ठीक करने के लिए किया जाता है। छाती की हडि्डयों, कमर, कंधों, पसलियों और हाथ-पैरों में दर्द तथा हाथ-पैरों की उंगलियों में जलन को दूर करने के लिए इस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मन उदास रहना, कुछ भी याद नहीं रहना, बाहर जाने या घूमने फिरने से डर लगना, चक्कर आना, सिर में दर्द होना, थोड़ी ही सर्दी से आंखों में लाली पड़ जाना तथा जलन होना, शरीर के ऊपरी भाग से अधिक पसीना निकलना, चेहरा फीका पडना, गले तथा मुंह के अन्दर अधिक लार आना, प्यास न लगना, मुंह चिपचिपा होना, पानी पीने के बाद भी प्यास नहीं बुझना, छाती में जलन होना, पेट फूलना, पेट में गड़बड़ी होना, कब्ज की शिकायत अधिक होना, सुबह के समय में देर से स्नान करने से खांसी होना, सांस लेने में खिंचाव महसूस होना, नाड़ी की गति तेज होना, हाथ-पैर सुन्न होना, हथेली व तलवे में जलन होना आदि इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी को हो गया हो तो उसके रोगों को ठीक करने के लिए एजाडिरेक्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
एजाडिरेक्टा इण्डिका औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी रोगी को भूलने की आदत पड़ गई हो, चक्कर आ रहा हो, सिर में दर्द हो रहा हो, आंखों में जलन तथा दायें नेत्रगोलक में दर्द हो रहा हो तो इन लक्षणों को ठीक करने के लिए एजाडिरेक्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना चाहिए।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- हाथों में ठण्ड लगना, दोपहर के बाद बुखार होना, चेहरे तथा हाथों और पैरों में आग की तरह जलन होना तथा शरीर के ऊपरी भाग से अधिक पसीना निकलना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए एजाडिरेक्टा इण्डिका औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
सेड्रान, आर्सेनिक तथा नेट्रम म्यूरि औषधियों की तुलना एजाडिरेक्टा इण्डिका औषधि से की जाती है।
मात्रा :-
एजाडिरेक्टा इण्डिका औषधि की 6, 30, 200 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
अस्टेकैस फ्लूवियाटिलिस (Astacus fluviatilis)
अस्टेकैस फ्लूवियाटिलिस औषधि का प्रयोग चर्म रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है।
अस्टेकैस फ्लूवियाटिलिस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पूरे शरीर पर ठण्डक महसूस होती है और खुजली होने लगती है, लसीका ग्रंथियां बढ़ जाती हैं, साथ ही दुग्ध निर्मोक विसप और जिगर में कुछ खराबियां उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए अस्टेकैस फ्लूवियाटिलिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बुखार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बहुत सर्दी लगती है, हवा बिल्कुल भी अच्छी नहीं लगती है, कपड़े उतारने पर परेशानी अधिक बढ़ जाती है और इसके साथ तेज बुखार हो जाता है और सिर में दर्द होने लगता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए अस्टेकैस फ्लूवियाटिलिस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
पीलिया से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की ग्रंथियां में सूजन आ जाती है तथा इसके साथ ही उसे पीलिया रोग हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए अस्टेकैस फ्लूवियाटिलिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध :-
रस, होमर, बाम्बिकस तथा एपिस औषधियों की तुलना अस्टेकैस फ्लूवियाटिलिस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा :-
अस्टेकैस फ्लूवियाटिलिस औषधि की 3 से 30वीं शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
आस्टेरियस रुबेन्स (ASTERIAS RUBENS)
जो व्यक्ति मोटे थुलथुले और जिनकी प्रकृति साइकोटिक (प्रमेह-विष-दूषित) है, इस प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए आस्टेरियस रुबेन्स औषधि का उपयोग करना चाहिए। स्नायु रोग, हिस्टीरिया, कोरिया रोग (ताण्डव रोग) को ठीक करने के लिए इस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आस्टेरियस रुबेन्स औषधि कई प्रकार के कैंसर रोग जैसे-स्तन कैंसर तथा शरीर के किसी भी भाग के कैंसर रोग को ठीक करने में उत्तम है। इस औषधि के प्रभाव से इस प्रकार के कैंसर ठीक हो जाते हैं। स्त्री तथा पुरुष की कामोत्तेजना बढ़ाने के लिए इसका उपयोग उत्तम है।
स्त्रियों को सिर में दर्द तथा गर्भाशय और स्तन में दर्द तथा जलन होने लगता है तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आस्टेरियस रुबेन्स औषधि का उपयोग करना चाहिए।
यदि किसी रोगी के स्तन पर चमकीला लाल दाग दिखाई पड़ता है, जो फट जाता है और उसमें से पीब जैसे पदार्थों का स्राव होने लगता है। ऐसा घाव धीरे-धीरे सम्पूर्ण स्तन को रोग ग्रस्त कर देता है, स्तन से जो पीब जैसा पदार्थ निकलता है उसमें से बदबू आती है, घाव के किनारों पर पीलापन रहता है तथा घाव का तल लाल हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए आस्टेरियस रुबेन्स औषधि उपयोग करना चाहिए।
आस्टेरियस रुबेन्स औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को किसी दूसरे व्यक्ति का विरोध बर्दाश्त नहीं होता है, मस्तिष्क में झटके लगते हैं और गर्मी महसूस होती है। रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे गरम हवा ने उसको घेर रखा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आस्टेरियस रुबेन्स औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का चेहरा लाल हो जाता है, नाक के दोनों ओर तथा ठोढ़ी पर और मुंह पर दाने निकल आते हैं, यौवन प्राप्ति के समय में चेहरे पर मुहासें निकलने लगते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आस्टेरियस रुबेन्स औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों के पेट में दर्द होने लगता है तथा इसके साथ ही अन्य मासिकधर्म से सम्बन्धित रोग हो जाना, स्तन में सूजन होना तथा उनमें दर्द होना, बायें स्तन में अधिक कष्ट होना, स्तन में घाव होना तथा दर्द होना, बायें हाथ की उंगलियों में दर्द होना, इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी को बहुत अधिक परेशानी होती है। संभोग करने की उत्तेजना बढ़ जाती है तथा इसके साथ ही मन में कई ऊट-पटांग बाते आने लगती हैं। स्तन-ग्रन्थि में गांठें पड़ जाती है और कठोरता आ जाती है, लगातार हल्का-हल्का दर्द होता है और उनके आस-पास की स्नायु (नाड़ी) में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण स्त्री रोगी को है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए आस्टेरियस रुबेन्स औषधि का उपयोग लाभदायक है।
स्तन से सम्बन्धित लक्षण :- स्तन फूलकर कठोर हो जाते हैं, बायें स्तन तथा बाजू के नाड़ियों में दर्द होने लगता है। छाती की हडि्डयों में दर्द होता है। रोगी को ऐसा महसूस होता है कि बायां स्तन अन्दर की ओर खींचा जा रहा है और दर्द बाजू से लेकर छोटी उंगली के सिरे तक फैल जाता है। बायें हाथ और उसकी उंगलियों की सुन्नता बढ़ जाती है। स्तन का घाव जब कैंसर का रूप ले लेता है तब स्तन की ग्रंथियां सूज जाती हैं तथा कठोर हो जाती है और उनमें गांठें बन जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए आस्टेरियस रुबेन्स औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्नायु जाल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की चाल रुक जाती है, शरीर की पेशियां इच्छानुसार कार्य नहीं करती है। कभी-कभी मिर्गी का दौरा पड़ने लगता है तथा शरीर की स्फूर्ति खत्म हो जाती है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कब्ज की शिकायत हो जाती है, रोगी जब मलत्याग करता है तो उसका मल जैतून जैसा होता है, रोगी को अतिसार (दस्त) हो जाता है तथा मल पानी जैसा पतला हो जाता है, मल का रंग कत्थई होता है और मल बड़ी तेजी के साथ निकलने वाला होता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर रोगी के रोग को ठीक करने के लिए आस्टेरियस रुबेन्स औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर पर खुजली का दाग हो जाता है और शरीर पर एक प्रकार का ऐसा दाग हो जाता है जिसमें घाव से बदबू आती है। चेहरे पर मुहांसें हो जाते हैं, खाज हो जाता है तथा छाजन हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण यदि रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए आस्टेरियस रुबेन्स औषधि का उपयोग करना चाहिए।
रोगी के चरित्र गत कुछ ऐसे लक्षण जिनको दूर करने के लिए आस्टेरियस रुबेन्स औषधि का उपयोग लाभदायक हैं-
स्तन कैंसर जिसमें रोगी को खरोच मारने जैसा दर्द महसूस होता है।
मासिकधर्म शुरु होने के पहले स्तनों का अधिक फूल जाना।
मस्तिष्क में खून की अधिकता हो जाने के कारण सिर में दर्द होना तथा दर्द सुबह के समय में अधिक होता है।
माथा गर्म रहना तथा रोगी को ऐसा महसूस होता कि उसका माथा आग पर रखी हुई है।
छोटी-छोटी बात पर चिढ़ होना।
मिर्गी का दौरा शुरु होने के चार से पांच दिन पहले ही पूरा शरीर फड़कने लगता है।
स्त्रियों में बहुत अधिक संभोग करने की इच्छा होती है।
बायें हाथ व उंगुलियों का सुन्नपन होना।
कब्ज की समस्या रहने के साथ रोगी को मलत्याग नहीं होता है और होता भी है तो मल सख्त तथा गेन्द की तरह गोल होता है।
रोगी व्यक्ति को दस्त हो जाता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कोनियम, आर्से, कार्बो तथा कौण्डुरंगों औषधियों की तुलना आस्टेरियस रुबेन्स औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविश :-
प्लम्ब तथा जिंक औषधियां आस्टेरियस रुबेन्स औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करती है।
वृद्धि :-
कॉफी पीने से, रात के समय में, ठण्डे तर मौसम में, शरीर के बायें भाग में लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (ह्रास) :-
मासिक स्राव रुक या दब जाने से रोगी के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा :-
आस्टेरियस रुबेन्स औषधि की छठी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ऐस्ट्रागैलस मोल्लिस्सीमस (Astrgalus mollssimus)
जिस प्रकार तम्बाकू, मारफीन तथा सुरासार का प्रभाव मनुश्यों पर पड़ता है, ठीक उसी प्रकार से ऐस्ट्रागैलस मोल्लिस्सीमस औषधि का प्रभाव पशुओं पर पड़ता है। शरीर में विषाक्ता (शरीर में जहर फैलना) फैलने की प्रारिम्भक अवस्था में मिथ्याभ्रम (हालल्युनेशन) अथवा पागलपन के साथ दृष्टिदोष हो जाता है जिसके कारण से रोगी पशु की तरह-तरह विचित्र, हास्यप्रद हरकतें करता है। जब एक बार पशु को यह पौधा मुंह में लग जाता है तो फिर वह कोई और चीज खाना पसन्द नहीं करता है। दूसरी अवस्था में शरीर सूख जाता है, आंखें धंस जाती हैं, बाल झाड़ने लगते हैं और शरीर में बहुत कमजोरी आ जाती है जिसके कारण चलना-फिरना भी मुश्किल हो जाता है और कुछ ही महीनों के बाद पशु मर जाता है।
ऐस्ट्रागैलस मोल्लिस्सीमस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के दाईं कनपटी और ऊपर के जबड़ों में तथा बाईं भौहें के ऊपर दर्द होता है, चेहरे की हडि्डयों में तेज दर्द होता है, चक्कर आने लगता है, जबड़ें में दबाव के साथ दर्द होता है तो ऐस्ट्रागैलस मोल्लिस्सीमस औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के आमाशय में अधिक कमजोरी आ जाती है और उसमें खालीपन महसूस होता है, ग्रासनली और आमाशय में जलन होती है तो ऐसी स्थिति में ऐस्ट्रागैलस मोल्लिस्सीमस औषधि का सेवन करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के दांए पैर के बाहरी भाग में एड़ी से लेकर अंगूठे तक सरसराहट होने लगती है, बाईं पिण्डली बर्फ जैसी ठण्डी महसूस होती है। ऐसी अवस्था में रोगी को ऐस्ट्रागैलस मोल्लिस्सीमस औषधि का सेवन कराना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
व्हाइट लोकोबीड, रैटल वीड, बैराइटा, एरागैलस लैम्बर्टी तथा आक्सीट्रोपिस औषधियों की तुलना ऐस्ट्रागैलस मोल्लिस्सीमस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा :-
ऐस्ट्रागैलस मोल्लिस्सीमस औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
आर्सेनिकम मेटालिकम [ Arsenicum Metallicum
आँख की कई बीमारियों और उपदंश, सिर दर्द आदि दो-एक पीड़ाओं में इसका समय-समय पर उपयोग होता है। निर्दिष्ट या बँधे हुए समय का अन्तर देकर ( periodicity ) प्रातः दो तीन सप्ताह के अन्तर से किसी भी बीमारी या बीमारी के लक्षणो का फिर से पैदा हो जाना – इस दवा का एक खास लक्षण है।
आँख की बीमारी – आँख लाल हो जाना, आँखों से पानी गिरना, आँखों का फूल जाना और किरकिरना, आँखों के भीतर जलन होना, दृष्टि-शक्ति की कमी – सूर्य, बत्ती या गैस की रौशनी बिलकुल सहन न होना, उससे बहुत तकलीफ होना, इच्छानुसार आँखों से काम न ले सकना।
सिर-दर्द – कपाल में शोथ की तरह सूजन, सिर झुकाने या सोने पर सिर दर्द बढ़ जाना। सिर में हथौड़ी मारने की तरह दर्द, माथे में बाईं ओर दर्द।
उपदंश ( syphilis ) – इसके सेवन से पहले उपदंश रोग बढ़ता है, परन्तु बाद में रोग पूरी तरह ठीक हो जाता है।
ऊपर लिखी बीमारियों के अलावा – मुंह के भीतर घाव और दर्द की भी यह बढ़िया दवा है।
क्रम – 6 से 200 शक्ति।
एरम ट्रिफाइलम ( Arum Triphyllum )
(1) लगातार होंठ और नाक को कुरेदने और नोचने की इच्छा
(2) भयंकर, जहरीला, खुश्क या बहता हुआ जुकाम
(3) गला बैठ जाना
(i) कुछ विशेष नहीं
(i) भाषण, गायन में वृद्धि
(ii) ठंडक से वृद्धि
(iii) गर्म से ठंडक में आने से वृद्धि
(1) लगातार होंठ और नाक को कुरेदने और नोचने की इच्छा – जब किसी भी रोग में होंठ और नाक को लगातार कुरेदने की इच्छा हो, नाक में अंगुली डालकर, कुरेद-कुरेद कर, नोच-नोच कर रोगी खून तक निकाल डाले और फिर भी कुरेदने की इच्छा शान्त न हो, तब एरम ट्रिफाइलम औषधि काम आती है। होंठ, मुख का खोल तथा नाक आदि की त्वचा छिल जाती है, खून निकलने लगता है, रोगी छिली जगह को भी नोचता रहता है, ऐसा करने से उसे दर्द होता है, बच्चा चीखता भी है, परन्तु नोंचने से नहीं रुकता। त्वचा की सतह कच्चे मांस जैसी लाल हो जाती है। जब किसी भी रोग में ऐसी हालत हो, रोगी त्वचा को दर्द सहते हुए भी नोचता, छीलता ही चला जाय, तो एरम ट्रिफाइलम देना उचित है। संभव है कि होंठ या नाक में कुछ ऐसी प्रबल खुजली-सी होती हो कि रोगी उस स्थान को नोचने के बिना चैन ही अनुभव न करता हों, होंठ से, नाक से खून बहे और वह फिर भी उस स्थान को छिलता जाय-यह ‘विशिष्ट-लक्षण है जिधर ध्यान देना चाहिये। टाइफॉयड में ऐसा नोचना पाया जाता है। कभी-कभी रोगी अचेतनावस्था में नाक में बार-बार अंगुली डालता है और उसे नोचता है-यह लक्षण हेलेबोरस का है। संपूर्ण ज्ञान के साथ नाक में अंगुली डालना और नोचना एरम ट्रिफाइलम का लक्षण है। यह लक्षण इतना प्रबल केवल एरम ट्रिफाइलम दवा में पाया जाता है।
(2) भयंकर, जहरीला, खुश्क या बहता जुकाम – एरम ट्रिफाइलम औषधि में भयंकर जुकाम पाया जाता है। नाक बन्द हो जाती है, खासकर बायीं नाक। रोगी मुख से सांस लेने को बाधित हो जाता है। रात को लगातार छींकें आती हैं। अगर जुकाम खुश्क न होकर बहनेवाला हो, तो नाक का पानी त्वचा के जिस भाग पर से बहता है वहां लाल निशान पड़ जाते हैं नाक को अन्दर से और बाहर से रोगी छीलता जाता है। नाक से पानी बहने पर भी नाक बन्द रहती है तो इन लक्षणों में एरम ट्रिफाइलम देना उपयोगी है।
(3) गाला बैठ जाना – गवैय्ये, व्याख्याता, वकील जब 3-4 घंटे बोल कर ठंडे स्थान में जाते हैं, तब हवा के लगने से उनका गला बैठ जाता है। एरम ट्रिफाइलम उन्हें अपना काम जारी रखने की शक्ति प्रदान करता है, गला खुल जाता है। रसटॉक्स का व्यक्ति जब बोलने लगता है, तब उसका गला बैठा होता है, परन्तु ज्यों-ज्यों वह बोलता जाता है, गला खुलता जाता है, आवाज स्पष्ट होती जाती है। रस टॉक्स की विशेषता ही यह है कि हरकत से उसे लाभ होता है।
(4) शक्ति – एरम ट्रिफाइलम औषधि निम्न-शक्ति में नहीं देनी चाहिये और न इसे बार-बार देना चाहिये। इससे कुफल होता है। उच्च-शक्ति में देने से लाभ होता है। 200 शक्ति में दें।