सोलेनम नाइग्रम (काला धतूरा) Solanum Nigrum (Black Nightshade)
सोलेनम नाइग्रम (काला धतूरा) Solanum Nigrum (Black Nightshade)
सेलेनम नाइग्रम औषधि का सिर और आंखों पर बहुत अच्छा असर पड़ता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सोलेनम नाइग्रम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सिर के घूमने के कारण चक्कर से आना, रोगी को सिर में बहुत तेज दर्द होना, रोगी का सिर में दर्द होने के कारण बहुत तेज रोना, रोगी का अंधेरे में जाते ही डर जाना, रोगी के सिर में खून जमा हो जाने के कारण दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सोलेनम नाइग्रम औषधि देना लाभकारी रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत तेज सर्दी लग जाना, रोगी के दाएं तरफ के नथुने से बहुत ज्यादा मात्रा में पानी जैसा स्राव आना, रोगी की नाक का बाईं तरफ का नथुना बंद हो जाने के साथ ही रोगी को ठण्ड सी महसूस होना जैसे लक्षणों में सोलेनम नाइग्रम औषधि का सेवन उपयोगी रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की दोनों आंखों के ऊपर वाले भाग में दर्द होना, आंखों की पुतलियों का बहुत ज्यादा फैल जाना या सिकुड़ जाना, आंखों की रोशनी का कम होना, आंखों के सामने हर समय धब्बे से घूमते हुए नज़र आना जैसे लक्षणों में रोगी को सोलेनम नाइग्रम औषधि देना लाभकारी रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी छाती सिकुड़ती हुई सी महसूस होने के साथ ही सांस लेने में परेशानी होना, रोगी को खांसी होने के साथ-साथ गले में सुरसुराहट सी होना, रोगी को खांसी के साथ गाढ़ा, पीले रंग का बलगम आना, रोगी की छाती में बाईं तरफ दर्द जो छूने पर और तेज हो जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सोलेनम नाइग्रम औषधि देने से लाभ मिलता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अचानक बहुत तेज ठण्ड लगना और कभी बहुत तेज गर्मी लगना, आरक्त ज्वर में रोगी के शरीर पर फुंसियां सी निकलना आदि लक्षणों में रोगी को सोलेनम नाइग्रम औषधि देने से आराम मिलता है।
तुलना-
सोलेनम नाइग्रम औषधि की तुलना बेला, सोलेनम, कैरोलीनेन्स, सोलेनम मैमोसम, सोलेनम आलिरेशियम, सोलेनम ट्यूबरोसम, सोलेनम बेसिकेरियम, सोलेनिनम असेटिकम, सोलेन-स्यूडोकैप्स, सोलेन-ट्यूबरोसा-ईग्रोटैन्स, सोलेनम ट्येबरोसम से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सोलेनम नाइग्रम औषधि की 2x से 30 शक्ति तक देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
सिंकोना आफिसिनैलिस चायना Cinchona officinalis
सिंकोना आफिसिनैलिस चायना औषधि वैसे तो बहुत से रोगों के लक्षणों में लाभकारी रहती है फिर भी शरीर के विभिन्न अंगों से खून निकलने के कारण आने वाली कमजोरी को दूर करने में इस औषधि को बहुत असरकारक माना जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सिंकोना आफिसिनैलिस चायना औषधि का उपयोग-
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी का पेट फूल जाना जैसे कि रोगी ने बहुत ज्यादा भोजन खाया हो, डकार आने और मलद्वार से गैस निकलने पर भी पेट का कम न होना, रोगी को बिना दर्द के पीले या भूरे रंग के दस्त आना जैसे लक्षणों में सिंकोना आफिसिनैलिस चायना औषधि का उपयोग लाभकारी रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सुबह जागने पर चेहरा बिल्कुल मुरझाया हुआ सा लगता है, आंखें अंदर की ओर धंस जाती है, आंखों के चारों ओर काले-नीले से घेरे पड़ जाते हैं, चेहरा बिल्कुल पीला पड़ जाता है जैसे कि रोगी ने संभोगक्रिया बहुत ज्यादा की हो आदि लक्षणों में सिंकोना आफिसिनैलिस चायना औषधि का उपयोग बेहतर रहता है।
खून से सम्बंधित लक्षण- रोगी के शरीर के सभी अंगों से खून का निकलना, खून का काला या निकलने के बाद काला पड़ जाना, रोगी के कानों में ऐसी आवाज गूंजना जैसे कि मंदिर की घंटियां बज रही हों, रोगी को अपने पूरे शरीर में बहुत ज्यादा ठण्डक महसूस होने के साथ शरीर का अकड़ा हुआ सा लगना इसके साथ ही तेजी से कंपकंपी छा जाना जैसे लक्षणों में रोगी को सिंकोना आफिसिनैलिस चायना औषधि का सेवन कराना अच्छा रहता है।
पसीने से सम्बंधित लक्षण- रोगी जितना भी पानी पी लें उसे फिर भी प्यास लगते रहना इसके साथ ही बहुत ज्यादा पसीना आना, अगर रोगी रात को सोते समय कोई चादर आदि ओढ़ लेता है तो उसका पूरा शरीर पसीने में भीग जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सिंकोना आफिसिनैलिस चायना देने से लाभ मिलता है।
जिगर से सम्बंधित लक्षण- रोगी की दाईं तरफ की कोंख में दर्द होना, जिगर का बढ़ जाना जिसको छूते ही रोगी को बहुत तेज दर्द होता है, रोगी की त्वचा और आंखों के अंदर का सफेद भाग पीला हो जाना, पेशाब का रंग मैला सा आना, मल का रंग भी पहले की अपेक्षा फीका पड़ जाना आदि लक्षणों में सिंकोना आफिसिनैलिस चायना औषधि लाभ करती है।
मात्रा-
रोगी को सिंकोना आफिसिनैलिस चायना औषधि की 200 शक्ति देने से रोगी को बहुत आराम मिलता है।
सैबाडिल्ला (सैबाडिल्ला सीड-असाग्रैइया आफिसिनैलिस) Sabadilla (Cabadilla Seed-Asagraea officinalis)
शरीर में छोटे-छोटे चूने, फीते की तरह के कीड़े और हर तरह के कीड़ों को समाप्त करने के लिए सैबाडिल्ला एक बहुत ही लाभकारी औषधि मानी जाती है। कीड़ों से होने वाले बहुत से रोगों को दूर करने के लिए इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। बच्चों के पेट में होने वाले कीड़ों को समाप्त करने के लिए भी इस औषधि को बहुत असरकारक माना जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैबाडिल्ला औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी को हर समय एक तरह का डर सा लगा रहता है। रोगी बैठे-बैठे ही चौंक पड़ता है। रोगी स्त्री को अपने आप ही मन में अजीब-अजीब से विचार पैदा हो जाते हैं जैसे कि वह अपने आप को रोगी समझने लगती है, उसे लगता है कि वह मां बनने वाली है, उसे कैंसर का रोग हो गया है। रोगी रुक-रुककर आने वाले बुखार के दौरान बहुत तेजी से चीखता-चिल्लाता है। इन सारे मानसिक रोगों के लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को सैबाडिल्ला औषधि देने से वो कुछ ही दिन में ठीक हो जाता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण-रोगी को अपना सिर घूमने के साथ-साथ आसपास की सारी चीजें भी घूमती हुई सी नज़र आती है। रोगी की आंखों के सामने अंधेरा सा छाने लगता है। किसी भी प्रकार की गंध आते ही रोगी के सिर में दर्द चालू हो जाता है। किसी भी बात को सोचने से रोगी को सिर में दर्द और नींद आने लगती है। रोगी की पलकें लाल होने के साथ-साथ उनमें जलन भी होने लगता है, आंखों से हर समय आंसू से निकलते रहते हैं, किसी की कही गई बात साफ तौर पर सुनाई नहीं दे पाती। इस तरह के सिर के रोगों के लक्षणों में रोगी को सैबाडिल्ला औषधि देने से लाभ होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण-रोगी को सर्दी-जुकाम लगने के कारण बार-बार छींके आना और नाक से बहुत ज्यादा मात्रा में स्राव का होना, आंखों के लाल होने के साथ-साथ माथे में बहुत तेजी से दर्द का होना और आंखों से पानी का आना, रोगी की नाक से बहुत ज्यादा मात्रा में पानी जैसा पतला सा स्राव आते रहना जैंसे लक्षणों में सैबाडिल्ला औषधि का प्रयोग लाभदायक सिद्ध होता है।
गले से सम्बंधित लक्षण-गले में बहुत तेजी से दर्द जो बाईं तरफ से शुरू होता है। गले से बहुत ज्यादा मात्रा में ठोस सा बलगम आना। रोगी अगर गर्म भोजन करता है और गर्म पेय पदार्थ पीता है तो उसे आराम आता है। रोगी को अपना गला और गलकोश सूखे हुए से महसूस होते हैं। रोगी की गले में बहुत तेज जलन जो ठण्डी हवा से ज्यादा हो जाती है। जीभ ऐसी महसूस होती है जैसे कि उसे किसी ने जला दिया हो। इन लक्षणों के किसी रोगी में मिल जाने पर उसे सैबाडिल्ला औषधि देने से वह कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को प्यास बिल्कुल न लगना, तेज भोजन को देखते ही जी का खराब हो जाना, सूखी खांसी होना, सांस लेने में परेशानी होने के साथ ही रोगी के आमाशय में बहुत तेज दर्द का उठना, मीठी चीजों और आटे से बनी चीजों को रोगी को जितना भी खिला दो उसकी भूख शांत नहीं होती। मुंह में पानी भर जाना, मुंह से बहुत ज्यादा लार का गिरना, मुंह का स्वाद मीठा सा होना। रोगी को अपने आमाशय के अंदर बहुत ज्यादा ठण्डक और खालीपन सा लगना। इन सारे लक्षणों के रोगी में पाए जाने पर उसे सैबाडिल्ला औषधि देनी चाहिए।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पैरों की उंगलियों के नीचे की चमड़ी का फट जाना, पैरों की उंगलियों के नाखूनों के नीचे जलन सी होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सैबाडिल्ला औषधि देने से लाभ मिलता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्री को मासिकस्राव समय से बहुत बाद में आना आदि लक्षणों में रोगी को सैबाडिल्ला औषधि का प्रयोग कराना लाभकारी रहता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण-रोगी को बुखार आने के लक्षणों में सबसे पहले शरीर में नीचे से ऊपर की तरफ ठण्ड पहुंचती रहती है, रोगी के सिर और चेहरे में गर्मी सी बढ़ जाती है। रोगी के हाथ-पैर बहुत ज्यादा ठण्डे हो जाते है। बुखार होने पर रोगी के आंखों से पानी आता रहता है। बुखार के दौरान रोगी को बिल्कुल प्यास नही लगती। इन सारे लक्षणों के आधार पर रोगी को सैबाडिल्ला औषधि देने से लाभ मिलता है।
वृद्धि-
दोपहर से पहले, रात या दिन में 10 या 12 बजे के बीच में, ठण्ड से, आराम करते समय, ठण्डे पीने वाले पदार्थो से, फूलों या दूसरे किसी चीज की खुशबू से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
किसी तरह की हरकत करने से, निगलने से, गर्म होने पर, गर्म भोजन को खाने से रोग कम हो जाता है।
अनुपूरक-
प्रतिविष-
कोन, लैके, लायको, सल्फ औषधि का उपयोग सैबाडिल्ला औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
तुलना-
सैबाडिल्ला औषधि की तुलना वेरेट्रिना, लैनोलिन, काल्चिक, नक्स, अरुण्डों, पोलैटिन फ्लियम प्रैटेन्स-टिमोथी, कुमैरीनम से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सैबाडिल्ला औषधि की 3 से 30 शक्ति तक देनी चाहिए।
सैबल सेरूलैटा Sabal Serrulata (saw palmetto)
सैबल सेरूलैटा औषधि को जननेन्द्रियों की और मूत्रांगों की उत्तेजना को समाप्त करने वाली औषधि माना जाता है। ये औषधि सिर के रोगों, आमाशय के रोगों और डिम्बाशय के रोगों को दूर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैबल सेरूलैटा औषधि का उपयोग-
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण-रोगी को रात के समय सोते समय कई बार पेशाब करने के लिए जाना पड़ता है। रोगी बिस्तर पर पेशाब कर देता है। पेशाब करते समय पेशाब की नली में दर्द सा होना। रोगी का पुराना सुजाक रोग। रोगी की पेशाब की नली में जलन होने के साथ-साथ पुर:स्थग्रंथि का बढ़ जाना आदि लक्षणों में रोगी को सैबल सेरूलैटा औषधि देने से लाभ मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत ज्यादा डकारें आना। रोगी के पेट में गैस बनना। रोगी का मन करता है कि वह बार-बार दूध पीता रहे। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैबल सेरूलैटा औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत तेज सिर में दर्द होना। रोगी का सिर घूमने के कारण चक्कर आना। कमजोर रोगियों में स्नायु का दर्द जो नाक से ऊपर की ओर होता हुआ माथे में पहुंच जाता है। रोगी को अपना सिर भारी सा लगता है। रोगी को सिर में दर्द होने पर अगर कोई बात भी करता है तो रोगी को गुस्सा आ जाता है। इन सब लक्षणों में रोगी को सैबल सेरूलैटा औषधि का सेवन कराना उचित रहता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण-रोगी को पुर:स्थग्रंथि के रोग, विवर्द्धन, पुर:स्थद्रव्य का स्राव, अण्डकोषों का क्षय (टी.बी), संभोगक्रिया में सफल न हो पाना, रोगी का वीर्य समय से पहले नष्ट हो जाने के कारण रोगी को रात मे संभोगक्रिया के समय परेशानी होती है, रोगी को यौनजनित स्नायुविकार, रोगी को अपनी जननेन्द्रियां ठण्डी सी महसूस होती है। इस तरह के लक्षणों मे रोगी को सैबल सेरूलैटा औषधि देने से लाभ मिलता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण- डिम्बग्रंथियों को छूते ही दर्द होना। स्त्री के स्तनों का सिकुड़ जाना। स्नायु रोग से पीड़ित लड़कियां जिनकी यौन उत्तेजना समाप्त हो जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैबल सेरूलैटा औषधि का सेवन कराना उपयोगी साबित होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण-रोगी को ठण्ड लग जाने के कारण नाक से स्राव का आना। रोगी को बहुत ज्यादा बलगम आना, रोगी को होने वाली सांस की नली की सूजन आदि लक्षणों में रोगी को सैबल सेरूलैटा औषधि का प्रयोग कराना उचित रहता है।
तुलना-
सैबल सेरूलैटा औषधि की तुलना फास्फो-ए, स्टिग्मैटा मेडिस, सन्ताल, एपिस, फेर-पिक्रि, थूजा, पिक्रिक-ए, पापूलस ट्रिम्यूल के साथ की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सैबल सेरूलैटा औषधि का मूलार्क या 3 शक्ति देने से रोगी ठीक हो जाता है।
सैबाइना(सैबाइन- सैबा) Sabina (Savine)
सैबाइना औषधि का प्रयोग अनेक रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है लेकिन इस औषधि को स्त्री रोगों के लिए बहुत लाभकारी माना जाता है। स्त्री रोगों में गर्भाशय में होने वाले रोगों में, डिम्बाशय के रोगों में, मासिकस्राव की परेशानियों में ये औषधि बहुत अच्छा और चमत्कारिक असर दिखाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैबाइना औषधि से होने वाले लाभ-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अगर किसी तरह का भी संगीत सुनाया जाता है तो रोगी को बहुत तेजी से गुस्सा आने लगता है या वह अपने ही बाल नोचने लगता है। इस तरह के मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को सैबाइना औषधि देना बहुत ही लाभकारी साबित होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर में बहुत तेजी से होने वाला दर्द जो अचानक शुरू हो जाता है और कुछ समय के बाद अपने आप ही कम होने लगता है। रोगी का सिर घूमने के कारण चक्कर आना। स्त्रियों में मासिकधर्म के रुक जाने के कारण होने वाला सिर का दर्द। रोगी के सिर और चेहरे की ओर खून का दौरा तेज होने के कारण सिर में दर्द होना। चेहरे की पेशियों में खिंचाव के साथ होने वाला दर्द। किसी चीज को चबाते समय दांतों में दर्द का होना जैसे लक्षणों में रोगी को सैबाइना औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी के दिल में जलन सी महसूस होना। मुंह का स्वाद बिल्कुल कड़वा होना। रोगी का मन हरदम खट्टे पदार्थों का सेवन करने का करता है। पेट के अंदर से लेकर पीठ के आर-पार तक किसी नुकीली चीज के द्वारा काट दिये जाने जैसा दर्द होनाइस तरह के लक्षणों में अगर रोगी को सैबाइना औषधि देना बहुत लाभकारी साबित होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- नाभि के निचले भाग के सिकुड़ जाने के कारण पैदा होने वाला दर्द, पेट में होने वाला दर्द जो ज्यादातर नीचे की तरफ होता है, स्त्रियों की कोख में गैस के कारण किसी तरह का फुलाव आ जाना जैसे लक्षणों में अगर रोगी को सैबाइना औषधि दी जाए तो उसके लिए बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपने मलान्त्र में पूर्णता महसूस होना, रोगी को कब्ज का रोग होना, पीठ से लेकर जांघ की हड्डी तक दर्द का होना, खूनी बवासीर में खून का बहुत ज्यादा मात्रा में आना जैसे लक्षणों में रोगी को सैबाइना औषधि देनी चाहिए।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को गुर्दों के भाग में जलन और कंपन सी महसूस होना, पेशाब का बहुत तेजी से और खून के साथ आना, पेशाब की नली में जलन होने के साथ पूरे शरीर में गर्मी महसूस होना, पेशाब के रास्ते में सूजन आना जैसे लक्षणों में अगर रोगी को सैबाइना औषधि दी जाए तो ये उसके लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध होती है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण- पुरुष रोगी के जननेन्द्रियों में जलन के कारण सुजाक के साथ स्राव का आना, प्रमेह रोग के कारण मांस का बढ़ना, लिंग के आगे के भाग में जलन के साथ होने वाला दर्द, लिंग की चमड़ी में दर्द होना जिसे खोलते समय और भी परेशानी होती है, यौन उत्तेजना का तेज होना जैसे लक्षणों में अगर रोगी को सैबाइना औषधि दी जाए तो उसको बहुत लाभ होता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण- स्त्री का मासिकस्राव समय से पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में आना, गर्भाशय में होने वाला दर्द जो जांघों तक फैल जाता है। स्त्री को ऐसा लगता है जैसे कि उसका गर्भस्राव होने वाला है। स्त्री की यौन उत्तेजना का तेज होना, मासिकस्राव आने के बाद स्त्री का प्रदर-स्राव (योनि मे से पानी का आना) शुरू हो जाना जिसमें कि स्त्री की खाल तक उतर जाती है। मासिकस्राव आने के दौरान बीच मे ही खून का आना और इसके साथ ही यौन उत्तेजना का बढ़ जाना। उन महिलाओं में बहुत ज्यादा मासिकस्राव आना जिन्हे तुरन्त ही गर्भस्राव हो जाता है। स्त्री का गर्भपात हो जाने के बाद डिम्बग्रंथियों और गर्भाशय में जलन होना, त्रिकास्थि से लेकर जांघ की हड्डी तक दर्द, योनि के रास्ते से होकर नीचे से ऊपर तक गोली के लगने जैसा दर्द होना, गर्भाशय की अतानता (एटोनी) जैसे लक्षणों में रोगी को सैबाइना औषधि देने से आराम आता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्रिकास्थि (रीढ़ की हड्डी के नीचे का भाग) से लेकर जांघ की हड्डी के बीच एक हड्डी से लेकर दूसरी हड्डी तक दर्द का होना। कमर में लकवा मार जाने जैसा दर्द का होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सैबाइना औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा पर अंजीरी मस्से होना इसके साथ ही त्वचा पर बहुत तेज खुजली और जलन होना, मांसाकुरों की बहुलता, त्वचा पर मस्से से निकलना, त्वचा पर काले-काले से छेद निकलना जैसे लक्षणों में रोगी को सैबाइना औषधि देने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरीय अंगों से सम्बंधित लक्षण- जांघ के आगे के हिस्से में किसी चीज के द्वारा कुचले जाने जैसा दर्द होना, एड़ियों और पैरों की हडि्डयों में गोली के लगने जैसा दर्द का होना, जोड़ों में जलन के साथ पैदा होने वाला दर्द, गठिया रोग जो गर्म कमरे में ज्यादा पैदा होता है, जोड़ों में होने वाली गांठें आदि लक्षणों में अगर रोगी को सैबाइना औषधि का प्रयोग कराना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
पूरक-
थूजा।
प्रतिविष-
पल्सा औषधि का उपयोग सैबाइना औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
वृद्धि-
किसी तरह की हरकत करने से, गर्म कमरे में, गर्म हवा से, बच्चे को जन्म देने के बाद, संगीत से, गहरी सांस लेने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
ठण्डी हवा से, ताजी हवा से, सांस छोड़ने से और ठण्ड से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
सैबाइना औषधि की तुलना कैल्क-कार्ब, क्रोक, मिलेफ, सिकेल और ट्रिल औषधियों के साथ की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सैबाइना औषधि का मूलार्क या 3 से 30 शक्ति तक देनी चाहिए।
सैकरम आफीसिनैलि-सुक्रोज (इक्षु-शर्करा) Saccharum Officinale-Sucrose (Cane-Sugar)
एक विद्वान व्यक्ति के अनुसार स्त्रियों और बच्चों को होने वाले ज्यादातर रोग चीनी के सेवन से पैदा होते हैं।
सैकरम आफीसिनैलि-सुक्रोज औषधि शरीर में जहर को समाप्त करती है, रोगों को बढ़ने से रोकती है। फाइब्रिन पर इस औषधि की विलायक क्रिया होती है तथा ये तेज परासरणी बदलावों द्वारा स्रावों को उत्तेजित करती है जिसके फलस्वरूप सीरम से जख्म अंदर से बाहर की ओर साफ होते हैं और जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
सैकरम आफीसिनैलि-सुक्रोज औषधि को दिल की मांसपेशियों का पोषक और ताकत बढ़ाने वाला समझा जाता है और इसी कारण से ये औषधि दिल के यंत्र की खून की नलियों के बहुत से रोगों में बहुत लाभकारी है।
कनीनिका की अपारदर्शिता, आंखों की रोशनी कम होना, मलद्वार में खुजली होना, ठण्डा बलगम आना, हत्पेशियों का अपजनन (माइकारडियल डिगेनरेशन) पैरों में पानी भर जाना, रोगी को हर सातवें दिन सिर में दर्द हो जाना आदि में भी सैकरम आफीसिनैलि-सुक्रोज औषधि लाभ करती है।
तुलना-
सैकरम आफीसिनैलि-सुक्रोज औषधि की तुलना सैकरम लैक्टिस से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को 30 शक्ति और ऊंची शक्तियां देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
सैलीसिलिकम एसिडम Salicylicum Acidum (Salicylic Acid)
सैलीसिलिकम एसिडम औषधि को कान के रोगों में बहुत ज्यादा उपयोग किया जाता है। इसके अलावा गठिया का रोग, पुरानी कब्ज, इंफ्लुएंजा रोग के बाद शरीर में कमजोरी आ जाने में भी ये औषधि काफी प्रभावशाली साबित होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैलीसिलिकम एसिडम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- अचानक तेजी से रोगी के सिर में दर्द का उठना, रोगी का सिर घूमने के कारण चक्कर से आना, सर्दी-जुकाम लगने के शुरुआती लक्षण, स्त्री की कनपटियों में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सैलीसिलिकम एसिडम औषधि देने से लाभ मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- रोगी के कान में बहुत तेज आवाज होने के साथ घंटियों की सी आवाज का गूंजना, रोगी का सिर घूमने के साथ-साथ कानों से कम सुनाई देना आदि लक्षणों में रोगी को सैलीसिलिकम एसिडम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी के गले में जख्म होने के कारण गला सूजकर लाल हो जाना, भोजन की नली में सूजन आ जाने के कारण रोगी कुछ भी खाता है तो उसको निगलना मुश्किल हो जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैलीसिलिकम एसिडम औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा पर खुजली के साथ छाले और फुंसियां निकलना जिनमें खुजली करने से आराम पड़ जाता है, रोगी सोता भी नहीं है फिर भी उसे पसीना आता रहता है, छपाकी, गठिया का रोग, रोगी की त्वचा गर्म होना और उस पर जलन होना, चित्तियां, भैंसियां छाजन, रोगी की हडि्डयों का कमजोर हो जाना और गल जाना आदि लक्षणों में रोगी को सैलीसिलिकम एसिडम औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के घुटनों में सूजन आने के साथ दर्द होना, रोगी के शरीर के छोटे जोड़ों का गठिया रोग जो छूने से और गति करने से और बढ़ जाता है, रोगी को बहुत ज्यादा पसीना आना, गृध्रसी (साइटिका) जलन के साथ जो रात को तेज हो जाता है, रोगी के पैरों में बहुत ज्यादा पसीना आना और उसके दब जाने के कारण होने वाली परेशानिया आदि लक्षणों में रोगी को सैलीसिलिकम एसिडम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
मल से सम्बंधित लक्षण- रोगी को पीब जैसे दस्त आना, रोगी को मेंढक के हरे अण्डों जैसे दस्त आना, रोगी के मलद्वार में खुजली सी होना, जठरांत्रज विश्रृंखलाएं जो खासकर बच्चों में होती है जैसे लक्षणों में रोगी को सैलीसिलिकम एसिडम औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पेट में गर्म सी गैस का भरना, रोगी को पूरे दिन खट्टी सी डकारें आना, रोगी की जीभ का रंग बैंगनी सा होना, शीशे के रंग के समान बदबूदार स्राव आना आदि लक्षणों में रोगी को सैलीसिलिकम एसिडम औषधि देने से लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सर्दी के कारण बुखार आने के बाद में दृष्टिपटलशोथ और दृष्टिपलीय रक्तस्राव, अन्नसारिक दृष्टिपटलशोथ आदि लक्षणों में रोगी को सैलीसिलिकम एसिडम औषधि का सेवन कराना उचित रहता है।
तुलना-
सैलीसिलिकम एसिडम औषधि की तुलना सैलोल, काल्चिक, चायना, लैक्टिक-ए से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सैलीसिलिकम एसिडम औषधि की 3 दाशमिक शक्ति का विचूर्ण देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
सैलिक्स नाइग्रा Salix Nigra (black willow)
सैलिक्स नाइग्रा औषधि स्त्री और पुरुष दोनों की ही जननेन्द्रियों के हर तरह के रोगों को दूर करने में बहुत असरदार साबित होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैलिक्स नाइग्रा औषधि से होने वाले लाभ-
पुरुष रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी जब पेशाब करता है तो उसकी पेशाब की नली में जलन होती है, पेशाब की नली से कभी-कभी खून भी आ जाता है, पेशाब की नली में दर्द रहता है, पेशाब कम मात्रा में आता है, पेशाब के साथ पतला या गाढ़ा सा धातु आता है, रोगी के लिंग के मुंह पर सूजन आ जाती है, लिंग बहुत सख्त हो जाता है तथा अण्डकोषों में दर्द होना आदि लक्षणों में सैलिक्स नाइग्रा औषधि का प्रयोग बहुत लाभकारी रहता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी स्त्री के डिम्बकोषों में दर्द होना, स्त्री का मासिकस्राव के समय दर्द और मासिकस्राव आने से पहले और मासिकस्राव के दौरान स्नायविक दर्द होना, मासिकस्राव का ज्यादा मात्रा में और दर्द के साथ आना, स्त्री की यौन उत्तेजना का तेज होना आदि लक्षणों में सैलिक्स नाइग्रा औषधि का सेवन करना अच्छा रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- रोगी के चेहरे पर सूजन आने के साथ-साथ चेहरे का लाल होना खासकर नाक की नोक पर, रोगी की आंखों का लाल होना जिनको छूते ही और हिलाने से दर्द होने लगता है, बालों की जड़ों में दर्द होना, रोगी की नाक से खून बहता रहता है आदि लक्षणों में रोगी को सैलिक्स नाइग्रा औषधि देने से लाभ मिलता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्रिकास्थि (रीढ की हड्डी के नीचे का भाग) और कमर के भाग के आरपार दर्द होना जिसके कारण रोगी जल्दी-जल्दी चल भी नहीं सकता आदि लक्षणों में रोगी को सैलिक्स नाइग्रा औषधि का सेवन कराने से रोगी ठीक हो जाता है।
तुलना-
सैलिक्स नाइग्रा औषधि की तुलना कैन्थ और योहिम्बी से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सैलिक्स नाइग्रा औषधि की 2 शक्ति या मूलार्क की 10 से 30 बूंद देने से रोगी ठीक हो जाता है।
सैल्विया आफीसिनैलिस Salvia Officinalis (sage)
सैल्विया आफीसिनैलिस औषधि शरीर में खून का संचार सही तरह से हो पाने की अवस्था में रोगी के पसीने को काबू में करती है। स्त्रियों के स्तनों में दूध ज्यादा आने और त्वचा के रोगों में भी ये औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैल्विया आफीसिनैलिस औषधि से होने वाले लाभ-
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को टी.बी के रोग में गुदगुदी सी खांसी होने जैसे लक्षणों में सैल्विया आफीसिनैलिस औषधि का सेवन करना बहुत लाभकारी रहता है।
तुलना-
सैल्विया आफीसिनैलिस औषधि की तुलना क्रिजेन्थिमम ल्यूकैन्थिमम, साइप्रिपीडियम, फेलैण्ड्री, सैल्विया स्कलेरैटा, रूबिया टिंक्टोरम से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सैल्विया आफीसिनैलिस औषधि का मूलार्क देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
सम्बूकस नाइग्रा (एलडर) Sambucus Nigra (elder)
सम्बूकस नाइग्रा औषधि रोगी के सांस लेने की नलियों पर बहुत अच्छी क्रिया करती है। बच्चों को होने वाली सर्दी, नाक में से बलगम वाला स्राव आना, पानी वाली सूजन, बहुत से उपसर्गों के साथ ही रोगी को बहुत ज्यादा पसीना आना आदि रोगों में भी ये औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर सम्बूकस नाइग्रा औषधि से होने वाले लाभ-
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी के आमाशय में दबाव के साथ छाती दबी हुई सी महसूस होना और जी का मिचलाना, रोगी को खराश होने के साथ आवाज की नली में लेसदार बलगम आ आना, रोगी को दौरे के रूप में उठने वाली खांसी जिसमें रोगी का दम तक घुटने लगता है और ये आधी रात के समय ही ज्यादा होती है, रोगी को सांस लेने में परेशानी होना, नाक सूखने के साथ बंद होना, बच्चा जब अपनी मां का दूध पी रहा होता है तो वह अचानक दूध पीना छोड़ देता है क्योंकि बच्चे की नाक बंद हो जाती है और उसे सांस लेने में परेशानी महसूस होना, बच्चा अचानक सोते-सोते जाग उठता है, अक्सर उसका दम घुटने लगता है आदि लक्षणों में रोगी को सम्बूकस नाइग्रा औषधि देने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की पैरों और पैरों की उंगलियों में पानी वाली सूजन का आना। रोगी के हाथ बिल्कुल नीले पड़ जाते है। पैर बर्फ की तरह ठण्डे पड़ जाते हैं। रात को सोते समय रोगी को कमजोरी लाने वाला पसीना आना जैसे लक्षणों में रोगी को सम्बूकस नाइग्रा औषधि का सेवन कराना उचित रहता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी को नींद के दौरान त्वचा की सूखी गर्मी, रोगी अकेले रहने से डरता है, जब रोगी जाग रहा होता है तो उस समय उसका पूरा शरीर पसीने से भीग जाता है, रोगी को बिल्कुल प्यास नहीं लगती, रोगी को बुखार आने से पहले बहुत तेज सूखी खांसी होती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सम्बूकस नाइग्रा औषधि का प्रयोग बहुत अच्छा रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की नींद के दौरान त्वचा सूख जाती है, रोगी की त्वचा पर सूजन आने के साथ फूल जाना, रोगी के जागते रहने पर बहुत ज्यादा पसीना आना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को सम्बूकस नाइग्रा औषधि देने से लाभ मिलता है।
मन से सम्बंधित लक्षण- मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाता है, रोगी के आंखों को बंद करते ही बहुत सारी मूर्तियां सी दिखाई देती हैं, रोगी अचानक डर जाता है और डरने के बाद रोगी को सांस के रुकने जैसे दौरे आते हैं। इन लक्षणों में रोगी को सम्बूकस नाइग्रा औषधि का सेवन कराने से रोगी ठीक हो जाता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पेट में दर्द होने के साथ जी मिचलाना और पेट का फूल जाना, रोगी को दिन में कई बार पानी के जैसे पतले दस्त आना जैसे लक्षणों में सम्बूकस नाइग्रा औषधि देना बहुत ही लाभदायक साबित होती है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- रोगी के गालों के ऊपर जलन के साथ होने वाले धब्बे होना। रोगी के चेहरे पर गर्मी के कारण बहुत ज्यादा पसीना आना आदि लक्षणों में रोगी को सम्बूकस नाइग्रा औषधि देना बहुत ही लाभदायक साबित होती है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत ज्यादा पेशाब आने के साथ-साथ त्वचा का सूख जाना। रोगी को बार-बार पेशाब आना लेकिन बहुत ही कम मात्रा में। रोगी के गुर्दों में बहुत ज्यादा सूजन आना, गुर्दो में पानी भरने के साथ ही उल्टी आना जैसे लक्षणों में रोगी को सम्बूकस नाइग्रा औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
प्रतिविष-
आर्से और कैम्फर औषधियों का उपयोग सम्बूकस औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
वृद्धि-
एक जगह बैठे रहने से और फलों का सेवन करने के बाद रोग बढ़ जाता है।
शमन-
रोगी की किसी तरह की हरकत करने से रोगी का रोग बिल्कुल कम हो जाता है।
तुलना-
सम्बूकस नाइग्रा औषधि की तुलना इपिका, मेफाइ, ओपि, सम्बूकस कैनाडेन्सिस से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सम्बूकस नाइग्रा औषधि का मूलार्क या 6 शक्ति तक देने से रोगी कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।
सैंग्वीनेरिया Sanguinaria (Blood-Root)
सैंग्वीनेरिया औषधि स्त्रियों के मासिकधर्म के बंद होने के बाद के रोगों में बहुत लाभकारी मानी जाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैंग्वीनेरिया औषधि से होने वाले लाभ-
सिर सें सम्बंधित लक्षण- रोगी जब धूप में जाता है तो उसके सिर की दाईं तरफ बहुत तेजी से दर्द होने लगता है, उल्टी होने के कारण सिर में दर्द होना जो रोजाना एक ही समय पर होता है ये दर्द माथे से शुरू होता है और सिर में ऊपर की ओर फैल जाता है तथा अन्त में आंखों के ऊपर जाकर रुक जाता है खास करके दाईं ओर, दर्द आराम करने से या सोने से कम हो जाता है, स्त्री के मासिकधर्म के बंद होने पर सिर का दर्द लौट आता है, हर सातवें दिन, आंखों में जलन महसूस होना, रोगी के सिर के पीछे के भाग में इस तरह का दर्द होना जैसे कि बिजली चमकती है आदि लक्षणों में रोगी को सैंग्वीनेरिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
चेहरे सें सम्बंधित लक्षण- रोगी का चेहरा गुस्से के मारे लाल होना, स्नायु का दर्द जो ऊपर वाले जबड़े से चारों ओर फैल जाता है, गालों के लाल होने के साथ जलन होना, रोगी को अपने जबड़ों के कानों के बीच पूर्णता महसूस होना और स्पर्शकातरता (छूने से दर्द होना) जैसे लक्षणों में रोगी को सैंग्वीनेरिया औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
नाक सें सम्बंधित लक्षण- रोगी को काफी समय से चलने वाला जुकाम और इसी के साथ ही बहुत ज्यादा मात्रा में, बदबूदार, पीले रंग का स्राव आना। नासाबुर्द (नाक में फोड़ा होना)। रोगी को सर्दी-जुकाम होना तथा इसी के साथ ही दस्त लगना। चिर नासाशोथ (क्रोनिक रीनिटीस), नाक की झिल्ली का सूख जाना और उसमें खून जम जाना आदि लक्षणों में रोगी को सैंग्वीनेरिया औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- रोगी की कानों में बहुत तेजी से जलन होना, रोगी के कान में दर्द होने के साथ ही सिर में भी दर्द होना, रोगी के कानों में अजीब-अजीब सी आवाजों का गूंजना और आवाजें आना, रोगी के कान में किसी तरह का फोड़ा होना जैसे लक्षणों में अगर रोगी को सैंग्वीनेरिया औषधि दी जाए तो रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी के गले में सूजन जो दाईं ओर ज्यादा होती है, रोगी के गले के सूख जाने के साथ सिकुड़ा हुआ सा महसूस होना, रोगी की जीभ सफेद होने के साथ ऐसी महसूस होती है जैसे कि वह जल गई हो, गले की दोनों ओर की ग्रंथियों में सूजन आ जाना आदि लक्षणों में रोगी को सैंग्वीनेरिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
आमाशय सें सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत ज्यादा प्यास लगती है। रोगी को जी मिचलाने के साथ ही मुंह से बहुत ज्यादा लार आती रहती है। रोगी जैसे ही मक्खन को देखता है उसका जी खराब हो जाता है उसका मन हमेशा चटपटी चीजें खाने का करता रहता है। रोगी के आमाशय में जलन होने के साथ ही उल्टी होने लगती है। रोगी को अपना आमाशय बिल्कुल खाली और अंदर की ओर घुसा हुआ महसूस होता है, जठर-ग्रहणी का प्रतिश्याय आदि लक्षणों में रोगी को सैंग्वीनेरिया औषधि का सेवन कराना उपयोगी साबित होता है।
पेट सें सम्बंधित लक्षण- रोगी को सर्दी-जुकाम होना और जैसे ही सर्दी-जुकाम समाप्त होता है दस्त चालू हो जाते है। रोगी के जिगर में दर्द सा होना। दस्तों का पानी जैसा और बहुत तेजी से आना। रोगी को मलान्त्र में कैंसर होना जैसे लक्षणों के आधार पर सैंग्वीनेरिया औषधि का उपयोग करना काफी लाभकारी रहता है।
स्त्री रोग सें सम्बंधित लक्षण- स्त्री की योनि में से बदबूदार पानी का आना (प्रदरस्राव)। स्त्री का मासिकस्राव बहुत ज्यादा मात्रा में और बदबू के साथ आना। स्त्री के गर्भाशय में फोड़ा होना। स्त्री के स्तनों में किसी जख्म होने के कारण परेशानी होना। मासिकस्राव के आने से पहले स्त्री की कांखों में खुजली होना। स्त्री का मासिकस्राव बंद होने के बाद होने वाले रोग आदि लक्षणों में रोगी को सैंग्वीनेरिया औषधि देना काफी अच्छा रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आवाज की नली की सूजन। गले की नली में बहुत तेज दर्द होना। रोगी की उरोस्थि के पीछे गर्मी और सिकुड़न सी महसूस होना। आवाज का बिल्कुल बंद हो जाना। जठरमूल की खांसी जिनमें रोगी को डकार आने से आराम आता है, रोगी को खांसी होने के साथ ही छाती में जलन होने के साथ-साथ दर्द का होना जो दाईं ओर ज्यादा होता है, रोगी को इंफ्लुएंजा तथा काली खांसी होने के बाद बेहोशी लाने वाली खांसी, रोगी को हर बार सर्दी लगने पर खांसी उठ जाती है। रोगी की छाती में दाईं तरफ जलन के साथ दर्द होना जो दाएं कंधे तक फैल जाती है। रोगी स्त्री के स्तनों में दाईं तरफ के स्तन के निप्पल में दर्द होना, मासिकस्राव रुक जाने के कारण रक्तनिष्ठीवन, रोगी को सांस लेने में बहुत ज्यादा परेशानी होना और छाती का सिकुड़ा हुआ महसूस होना। रोगी की छाती में जलन जैसे कि गर्म भाप छाती से पेट में जा रही हो। निमोनिया जो पीठ के बल लेटने पर ज्यादा हो जाता है। आमाशय के रोगों से पैदा हुआ दमा। फेफड़ों का विकार, पेशाब में फास्फेट जाना और मांसक्षय होना, वायुपथों की सर्दी अचानक रुक जाने पर दस्त चालू हो जाते हैं। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैंग्वीनेरिया औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के दाएं कंधे, बाएं नितंब के जोड़ और गर्दन के जोड़ का गठिया का रोग, रोगी के तलुवों में जलन होना, रोगी के शरीर के सबसे कम मांस वाले स्थान पर आमवाती दर्द लेकिन जो जोड़ों में नहीं होता, रोगी के पैर के अंगूठें और तलुवों में जलन होती रहती है, दक्षिण पाश्र्वी तंत्रिकाशोथ, अगर शरीर के अंगों को छू लिया जाए तो रोगी को आराम मिलता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैंग्वीनेरिया औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक रहता है।
चर्म (त्वचा) सें सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा पर लाल रंग के छोटे दानों का निकलना जो बसंत के मौसम में और ज्यादा हो जाते हैं। रोगी की त्वचा पर जलन और खुजली जो गर्मी से तेज हो जाती है। रोगी के चेहरे पर मुहांसे निकलने के साथ ही कम मात्रा में स्राव का आना। गण्डास्थियों में लाल, गोल से धब्बों का होना जैसे लक्षणों में रोगी को सैंग्वीनेरिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
वृद्धि-
मिठाई खाने से, दाईं ओर तथा गति और किसी के छूने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
खट्टे पदार्थों से तथा नींद और अंधेरे में रोग कम हो जाता है।
पूरक-
टार्टा-इमे।
तुलना-
सैंग्वीनेरिया औषधि की तुलना जस्टीशिया, डिजिटैलिस, बेला, आइरिस, मेलीलो, लैके, फेरम और ओपि से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सिर में दर्द होने पर सैंग्वीनेरिया औषधि का मूलार्क और गठिया के रोग में 6 शक्ति तक देने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
सैंगुनेरिया नाइट्रिका Sanguinaria Nitrica (Nitrate of Sanguinarine)
सैंगुनेरिया नाइट्रिका औषधि सांस के रास्ते की श्लैष्मिक झिल्लियों की परेशानियों को दूर करने में बहुत उपयोगी मानी जाती है। इसके अलावा रोगी के माथे और आंखों में दर्द होने पर, आंखों से पानी आते रहने पर, नई और पुरानी सर्दी जैसे रोगों में भी ये औषधि बहुत अच्छा असर दिखाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैंगुनेरिया नाइट्रिका औषधि का उपयोग-
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी नाक ऐसी महसूस होती है कि जैसे वह बंद हो रही हो, रोगी की नाक में से बहुत ज्यादा मात्रा में पानी जैसा स्राव होता रहता है और इसी के साथ उसकी नाक में जलन के साथ दर्द भी होता रहता है। रोगी जब अपनी नाक में जमी हुई छोटी-छोटी पपड़िया हटाता है तो उसकी नाक में से खून भी निकल जाता है, रोगी की नाक सूखी सी रहती है और स्राव भी कम मात्रा में आता है, रोगी की नाक के पीछे के छेदों से निकलने वाला स्राव नाक की नलियों से ही चिपका रहता है और बड़ी मुश्किल से छूटता है, रोगी के नाक के नथुने, गाढ़े, पीले, खून के श्लेष्मा से भरे रहते हैं, रोगी को बार-बार छींके आती रहती है, नाक के पीछे के भागों में कच्चापन महसूस होना और परेशानी सी पैदा होना आदि लक्षणों में रोगी को सैंगुनेरिया नाइट्रिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपना गला अंदर से सूखा, सिकुड़ा हुआ, खराब और जलता हुआ सा महसूस होता है, गले के दाईं तरफ की गलतुण्डिका की जलन, रोगी कुछ भी खाता-पीता है तो उसे निगलना बहुत मुश्किल हो जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को अगर सैंगुनेरिया नाइट्रिका औषधि का सेवन कराया जाए तो रोगी कुछ ही समय में स्वस्थ हो जाता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी की जीभ में किनारों पर किसी तरह के जख्म हो जाने जैसे लक्षणों में रोगी को सैंगुनेरिया नाइट्रिका औषधि देना लाभकारी रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को धीरे-धीरे और रुक-रुक कर होने वाली खांसी के साथ ही पीले रंग का, गाढ़ा सा बलगम भी आता है। रोगी के उरोस्थि के केन्द्रबिंदु के पीछे दबाव सा महसूस होना। रोगी के गले और सांस की नलियों में जलन होना। रोगी की नाक, आवाज की नली और सांस की नलियों की पुरानी सर्दी। रोगी की आवाज का बदल जाना या खराब होना जैसे लक्षणों में सैंगुनेरिया नाइट्रिका औषधि का प्रयोग अच्छा रहता है।
तुलना-
सैंगुनेरिया नाइट्रिका औषधि की तुलना सोरिनम, कैलि बाइक्रोम, एरम ट्राइपाइलम से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सैंगुनेरिया नाइट्रिका औषधि की 3 शक्ति से 6 शक्ति तक देनी चाहिए। इसके अलावा अगर रोगी को जरूरत पड़ती है तो इस औषधि की ऊंची शक्तियां भी दी जा सकती है।
सैनीक्यूला (एकुआ) Sanicula (Aqua) (The water of sanicula Springs, Ottawa)
सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि बच्चों के रोगों में बहुत लाभकारी सिद्ध होती है। बच्चों के बिस्तर पर पेशाब करने में, बच्चों को होने वाले हडि्डयों का रोग आदि लक्षणों में यह औषधि काफी असरदार साबित होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि का उपयोग-
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी के गले से गाढ़ा, रेशेदार और चिपचपा सा बलगम का आना जैसे लक्षणों में रोगी को सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी की जीभ का बड़ा, थुलथुला होना और इसी के साथ ही जीभ में जलन सी होना जिसको ठण्डा रखने के लिए जीभ को बाहर निकालना पड़ता है। रोगी की जीभ पर दाद से हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि देना बहुत ही लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी जब गाड़ी आदि की सवारी करता है तो उसका जी मिचलाने लगता है और उसे उल्टी होने लगती है। रोगी को प्यास लगने के कारण बार-बार पानी पड़ता है। इसके बावजूद रोगी जैसे ही पानी को पेट में पहुंचाता है उसको उसी समय उल्टी होने लगती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि देने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के नींद में ही माथे के पीछे और गर्दन के जोड़ पर बहुत ज्यादा पसीना आना। अंधेरे में आते ही रोगी को डर लगने लगना, रोगी के ठण्डी हवा में आते ही आंखों से आंसू निकलना। रोगी के सिर में बहुत ज्यादा मात्रा में पपड़ीदार रूसी का होना। रोगी के कान दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि देने से रोगी कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।
मलाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पूरे नाभि के आसपास के भाग में दर्द होना। जब तक मलाशय में बहुत सारा मल जमा नहीं हो जाता तब तक रोगी को मलक्रिया की इच्छा नहीं होती, रोगी के बहुत जोर लगाने के बाद भी थोड़ा सा मल निकलता है और अगर एक बार मल बाहर भी निकलता है तो वह दुबारा अंदर की ओर चला जाता है। मल मलद्वार पर ही टूट जाता है। मल का बहुत बदबू के साथ आना। मलद्वार, नाभि के आसपास के भाग और जननेन्द्रियों के आसपास की त्वचा का फटना। भोजन के बाद दस्त का आना जैसे लक्षणों में रोगी को सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि देना लाभकारी रहता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्री को ऐसा महसूस होता है जैसेकि उसके मलद्वार से सारे यन्त्र बाहर निकल पड़ेंगे। स्त्री को आराम करने से राहत होती है। स्त्री को अपने जनंनांगों को सहारा देने का मन करता है। स्त्री के गर्भाशय में जख्म सा होना, प्रदर-स्राव (योनि में से पानी आना) जिसमें से मछली के तेल या पुराने पनीर जैसी बदबू आती है, स्त्री को अपनी योनि बड़ी महसूस लगती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पैरों के तलुवों में जलन होना। रोगी के पैरों से बदबूदार पसीना आना। प्रत्यंगों में से ठण्डा, चिपचिपा सा पसीना आना जैसे लक्षणों में रोगी को सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि देना लाभकारी रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा का गंदा, तैलीय, कत्थई रंग का होना। रोगी की त्वचा पर झुर्रियां सी पड़ना। रोगी की त्वचा पर फोड़े से पड़ना। रोगी की हाथों और उंगलियों में दरारें सी पड़ना आदि लक्षणों में रोगी को सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि देना उपयोगी साबित होती है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्रिकास्थि (रीढ़ की हड्डी के नीचे का हिस्सा) के जोड़ में दर्द सा होना और दाईं करवट लेटने पर आराम मिलता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि देना उपयोगी साबित होता है।
वृद्धि-
बांहों को पीछे की ओर घुमाने पर रोग बढ़ जाता है।
शमन-
ठण्ड से, चादर हटाने से, आराम करने से, लेट जाने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि की तुलना एब्रोटे, एलूमि, कल्के, सिलिका, सल्फ, सैनीक्यूला से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सैनीक्यूला (एकुआ) औषधि की 30 शक्ति देने से लाभ होता है।
सैण्टोनीनम Santoninum (Santonin)
सैण्टोनीनम औषधि आंखों के रोगों और पेशाब करते समय होने वाली परेशानियों को दूर करने में उपयोगी मानी जाती है। इसके अलावा कीड़े होने पर होने वाले रोगों में जैसे जठरान्त्र क्षोभ, नाक में खुजली, नींद में बैचेनी होना, मांसपेशियों का फड़कना आदि में भी ये औषधि जल्दी और अच्छा असर दिखाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैण्टोनीनम औषधि से होने वाले लाभ-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत तेज सिरदर्द होने के साथ ही रंगों को न पहचान पाना, रोगी की नाक में खुजली होने के कारण रोगी हर समय नाक में उंगली डालकर खुजलाता रहता है आदि लक्षणों में सैण्टोनीनम औषधि का सेवन बहुत ही लाभदायक रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों की रोशनी का कम हो जाना। रोगी को आंखों से किसी भी रंग की सही से पहचान न कर पाना। रोगी की आंखों के चारों ओर काले-काले से घेरे पड़ जाना। कीड़ों के कारण नज़रों का टेढ़ा हो जाना अर्थात देखा कहीं जाता है और दिखता कहीं और है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैण्टोनीनम औषधि देने से लाभ होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सांसों में से बदबू आना, रोगी को सही तरह से भूख न लगना, रोगी को बार-बार प्यास का लगना, रोगी की जीभ का बिल्कुल लाल हो जाना, रोगी रात को सोते समय दांतों को पीसता है, रोगी का जी मिचलाना जो भोजन करने के बाद कम होता है। रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसका दम सा घुट रहा हो। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैण्टोनीनम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के गुर्दों में सूजन आना। रोगी का रात को सोते समय बिस्तर पर ही पेशाब कर देना। रोगी पेशाब को बिल्कुल भी रोक नहीं सकता। रोगी को पेशाब करते समय परेशानी होना। रोगी को पेशाब की नली में पूर्णता महसूस होती है। अम्ल प्रतिक्रियायुक्त होने पर पेशाब हरा तथा क्षार प्रतिक्रियायुक्त होने पर लाल या बैंगनी रंग का पेशाब आता है। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को सैण्टोनीनम औषधि देना बहुत ही लाभकारी रहता है।
तुलना-
सैण्टोनीनम औषधि की तुलना सीना, टियूक्रियम, नैफ्था, नेट्रम-फा और स्पाइजी से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सैण्टोनीनम औषधि की 2 शक्ति से लेकर 3 शक्ति का विचूर्ण देने से रोगी ठीक हो जाता है।
जानकारी-
सैण्टोनीनम औषधि की कम शक्तियां अक्सर जहरीले रूप में काम करती हैं। जिन बच्चों को बुखार या कब्ज का रोग हो उनको ये औषधि नहीं देनी चाहिए।
सैपोनैरिया Saponaria (Soap root)
सैपोनैरिया औषधि हर तरह की सर्दी को दूर करने के लिए बहुत ही उपयोगी औषधि मानी जाती है। इसके अलावा गले की जलन, सर्दी-जुकाम आदि में भी ये औषधि लाभकारी मानी जाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैपोनैरिया औषधि से होने वाले लाभ-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर में इस तरह का दर्द होना जैसे कि कोई सुई चुभा रहा हो, खासकर अक्षिगन्हरों के ऊपर और बाईं तरफ ये दर्द रोजाना शाम के समय और गति करने से बढ़ जाता है। सिर में खून जमा हो जाना। रोगी को अपनी गर्दन के जोड़ पर थकावट सी महसूस होती है। रोगी को ऐसा लगता है कि उसने बहुत सारी शराब पी रखी है और वह बाईं तरफ गिर रहा हो। रोगी को अपनी नाक बंद सी महसूस होती है इसी के साथ ही रोगी को बहुत ज्यादा छींके भी आती है और नाक में खुजली होती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैपोनैरिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों में बहुत तेजी से होने वाला दर्द। अक्षिगोलकों में बहुत अंदर तक ऐसा दर्द जैसे कि सुई चुभ रही हो, रोगी की पलकों में स्नायु का दर्द जो बाईं ओर ज्यादा होता है। रोगी जैसे ही रोशनी में आता है उसकी आंखों में दर्द सा होने लगता है, आंखों से सब कुछ धुंधुला सा दिखाई देना, अक्षिगोलकों का बाहर की ओर फैलना जो पढ़ने-लिखने से ओर बढ़ जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैपोनैरिया औषधि देने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी कुछ भी खाता-पीता है तो उस चीज को निगलने में उसे बहुत ज्यादा परेशानी होती है। रोगी का जी मिचलाते रहना, सीने में जलन सी होना, पूर्णता महसूस होना जो रोगी को डकारें आती रहती है फिर भी कम नहीं होती आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सैपोनैरिया औषधि का सेवन कराना उपयोगी साबित होता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण- दिल में धड़कन का अनियमित होना जैसे कभी तो दिल तेज धड़कता है और कभी कम गति से धड़कता है, दिल का कमजोर सा महसूस होना, नाड़ी का बहुत धीरे-धीरे चलना जैसे लक्षणों में रोगी को सैपोनैरिया औषधि का सेवन कराने से रोगी कुछ ही समय में स्वस्थ हो जाता है।
वृद्धि-
रात के समय, दिमागी मेहनत करने से रोग बढ़ जाता है।
तुलना-
सैपोनैरिया औषधि की तुलना सेपोनिन, क्वालाया, पैरिस, साइक्लामेन और हैलोनियम से की जा सकती है।
सार्कोलैक्टिक एसिड Sarcolactic Acid
सार्कोलैक्टिक एसिड औषधि रीढ़ की हड्डी में स्नायु की कमजोरी में, सांस लेने में परेशानी होने में, पूरे शरीर में थकावट होने में जैसे रोगों में बहुत लाभकारी रहती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सार्कोलैक्टिक एसिड औषधि का उपयोग-
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी भोजन की नली में सिकुड़न सी महसूस होना। रोगी के गले में जलन होने के साथ-साथ नाक की नली में कसाव सा महसूस होना। रोगी को अपने गले में गुदगुदी सी होती हुई महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को सार्कोलैक्टिक एसिड औषधि देना उपयोगी साबित होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी का जी मिचलाना। रोगी के किसी भी चीज को खाने पीने से तुरन्त ही उल्टी हो जाना यहां तक कि रोगी अगर पानी भी पीता है तो उसे उल्टी हो जाती है इसके बाद में रोगी को अपने शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी सी महसूस होना आदि लक्षणों के आधार पर सार्कोलैक्टिक एसिड औषधि का सेवन रोगी के लिए लाभदायक रहता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी पीठ, गर्दन और कंधों में थकान सी महसूस होना। रोगी कुछ लिखने बैठता है तो उसकी कलाई में दर्द होने लगता है। रोगी जब सीढ़ियां चढ़ता है तो उसको अपने शरीर में कमजोरी सी महसूस होती है। पक्षाघाती कमजोरी, रोगी के जांघों और गुल्फों में अकड़न सी महसूस होना। पैरों की पिण्डलियों में ऐंठन सी होना जैसे लक्षणों में रोगी को सार्कोलैक्टिक एसिड औषधि देना लाभकारी रहता है।
मात्रा-
रोगी को सार्कोलैक्टिक एसिड की 6 शक्ति से 30 शक्ति तक देने से रोगी को बहुत लाभ मिलता है।
सैर्रासीनिया पर्प्यूरिया Sarracenia purrurea (Pitcher plant)
सैर्रासीनिया पर्प्यूरिया औषधि को चेचक के रोग में बहुत ही उपयोगी माना जाता है। इसके अलावा आंखों के रोग, सिर में खून जमा हो जाने के साथ ही दिल की धड़कन का अनियमित होना, हरितपाण्डु, उल्टी होने के कारण सिर में दर्द होना, शरीर के अलग-अलग अंगों खासकर गर्दन, कंधों और सिर में जलन होने पर इस औषधि का इस्तेमाल किया जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सैर्रासीनिया पर्प्यूरिया औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर में बहुत तेजी से दर्द होता रहता है। रोगी के सिर में खून जमा होने के कारण सिर में दर्द होने लगता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैर्रासीनिया पर्प्यूरिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों से साफ तरह दिखाई न देना, रोगी जैसे ही रोशनी में आता है उसकी आंखों में दर्द सा होने लगता है, रोगी को अपनी आंखें सूजी हुई और दर्दनाक महसूस होती हैं। आंखों के अंदर के भाग में तेजी से होने वाला दर्द, रोगी को अपनी आंखों के सामने हर समय काले से निशान घूमते हुए नज़र आते हैं। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को सैर्रासीनिया पर्प्यूरिया औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी चाहे जितना भी भोजन कर लें वह फिर भी भूख-भूख करता रहता है। रोगी को भोजन करते समय नींद सी आने लगती है। रोगी के मुंह का स्वाद बिल्कुल खराब हो जाता है। रोगी की जीभ पर सफेद सी मैल की परत छाई हुई रहती है। रोगी को पेट में दर्द होने के बाद बहुत ज्यादा मात्रा में दर्द के साथ उल्टी आने लगती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैर्रासीनिया पर्प्यूरिया औषधि का सेवन कराना बहुत उपयोगी साबित होता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- रोगी के कमर के भाग से दर्द होकर स्कंधफलकों के बीच तक टेढ़ी-मेढ़ी गति से दौड़ता है जैसे लक्षणों में रोगी को सैर्रासीनिया पर्प्यूरिया औषधि लाभकारी है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के हाथ-पैर कमजोर हो जाते हैं, रोगी के घुटनों और ऊरु-संधियों में कुचल दिए जाने जैसा दर्द होना, रोगी की बांहों की हडि्डयां बहुत तेजी से दर्द करती हैं, रोगी के कंधों के बीच वाले भाग में कमजोरी पैदा हो जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सैर्रासीनिया पर्प्यूरिया औषधि देना लाभदायक रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण-चेचक रोग के लक्षणों में सैर्रासीनिया पर्प्यूरिया औषधि का प्रयोग बहुत ही लाभदायक साबित होता है। ये औषधि चेचक के दानों में पीब को भी नहीं बनने देती है।
वृद्धि-
रात को, रोशनी से, शाम को, भोजन के बाद रोग बढ़ जाता है।
शमन-
रोगी जब लेट जाता है तब रोगी का रोग कम हो जाता है।
तुलना-
टार्टा-इमे, वैरियोली, मैलेड्री से सैर्रासीनिया पर्प्यूरिया औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सैर्रासीनिया पर्प्यूरिया औषधि की तीसरी से छठी शक्ति तक देनी चाहिए।
सर्सापैरिल्ला (स्माइलैक्स) Sarsaparilla (Smilax)
सर्सापैरिल्ला औषधि को मूत्राशय के बहुत से रोगों में प्रयोग किया जाता है। गुर्दों में होने वाले दर्द को भी इसी औषधि के सेवन से दूर किया जा सकता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सर्सापैरिल्ला औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी अपनी जिन्दगी से निराश सा हो जाता है उसे लगता है कि उसका जीवन किसी काम का नहीं है। कोई रोगी को समझाने की कोशिश भी करता है या हाथ लगाता है तो रोगी बुरा मान जाता है। रोगी बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाता है। किसी से सही ढंग से बात नहीं करता हर समय अकेले-अकेले बैठा रहता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सर्सापैरिल्ला औषधि का सेवन कराना असरदार साबित होता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्रियों के स्तनों के निप्पलों का सिकुड़ जाना, फट जाना, छोटा हो जाना, उत्तेजना न होना, स्त्री का मासिकस्राव आने से पहले माथे पर खुजली। मासिकस्राव का समय से काफी दिनों के बाद और कम मात्रा में आना। मासिकस्राव आने से पहले दाएं जांघ में गीली फुंसियां होना। ऐसे लक्षणों में रोगी को सर्सापैरिल्ला औषधि का सेवन कराना अच्छा रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा का सिकुड़ जाना। त्वचा पर झुर्रियां सी पड़ जाना। त्वचा पर जख्म होना। त्वचा पर हवा लगने से दाने निकल आते हैं। त्वचा पर सूखी खुजली होना जो बसंत के मौसम में हो जाती है। हाथ और पैरों की त्वचा का फट जाना। त्वचा का सख्त हो जाना। गर्मी के मौसम में त्वचा पर होने वाले फोड़े-फुंसियां जैसे लक्षणों में रोगी को सर्सापैरिल्ला औषधि देना लाभकारी रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के शरीर के अंगों में लकवा मार जाने जैसा बहुत तेज दर्द होना। रोगी के हाथ और पैरों का कांपना। रोगी के हाथ-पैरों की उंगलियों के किनारों पर जलन सी होना। गठिया रोग के लक्षण, हडि्डयों में दर्द जो रात के समय तेज हो जाता है। रोगी के हाथ-पैर की उंगलियों में गहरी दरारें पड़ना। नाखूनों के नीचे जलन, रोगी के हाथों पर दाद जैसे विकारों का होना। उंगलियों की नोकों के चारों और जख्म से होना तथा रोगी को प्रमेह रोग होने के बाद गठिया रोग का दर्द आदि लक्षणों के आधार पर सर्सापैरिल्ला औषधि का सेवन काफी असरदार साबित होता है।
पुरुष रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के लिंग में से वीर्य के साथ खून का आना, रोगी की जननेन्द्रियों में से बहुत ज्यादा बदबू आना, रोगी की जननेन्द्रियों पर दाद जैसे विकारों का होना, रोगी के अंडकोष और मूलाधार में खुजली सी होना, उपदंश, उद्भेद और हडि्डयों में दर्द जैसे लक्षण होने पर रोगी को सर्सापैरिल्ला औषधि देना काफी लाभदायक रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पेशाब करने के बाद में पेशाब की नली में बहुत तेज दर्द होना। रोगी की पेशाब की नली में पथरी होना जो पेशाब के साथ खून और छोटे-छोटे टुकड़ों के रूप में निकलती है। रोगी को बार-बार पेशाब आता है लेकिन बहुत ही कम मात्रा में। पेशाब का रंग गन्दा होना, पेशाब सफेद बालू की तरह जम जाता है। रोगी की पेशाब की नली का फूल जाना जिसे छूने से दर्द होता है। रोगी अगर बैठ कर पेशाब करता है तो पेशाब बूंद-बूंद करके आता है तथा पेशाब खड़ा होकर करने से सही तरह आता है। बच्चा पेशाब करने से पहले और बाद में बड़ी तेजी से चिल्लाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सर्सापैरिल्ला औषधि देने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के दाईं कनपटी के ऊपर सिर में तेज दर्द होना जैसे गोली लगी हो। माथे के पीछे के हिस्से से आंखों तक दर्द होना। ज्यादा तेज आवाज कानों में नाक की जड़ तक आवाज गूंजती रहती है। सर्दी-जुकाम होने के कारण सिर में दर्द होना। इंफ्लुएंजा के बाद होने वाला सिर का दर्द तथा सिर में होने वाले दर्द के कारण रोगी बहुत ज्यादा परेशान हो जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सर्सापैरिल्ला औषधि देने से लाभ होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी की जीभ पर छाले निकलने के कारण जीभ का बिल्कुल सफेद हो जाना। रोगी के मुंह से बहुत ज्यादा लार का गिरना। रोगी को बिल्कुल भी प्यास नहीं लगती, रोगी की सांस के साथ गंदी बदबू आती है। मुंह का स्वाद बहुत ज्यादा खराब हो जाता है आदि लक्षणों में रोगी को सर्सापैरिल्ला औषधि का सेवन कराना काफी लाभदायक साबित होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पेट में बहुत तेज गड़गड़ाहट और खमीरण होना, समकालिक पेट का दर्द और पीठ में दर्द होना। गुदाद्वार से बहुत ज्यादा गंदी वायु का निकलना। बच्चों को होने वाले दस्त जैसे लक्षणों में रोगी को सर्सापैरिल्ला औषधि देने से लाभ होता है।
वृद्धि-
बसंत के मौसम में, पेशाब करने के आखिरी क्षणों में, रात के समय, बारिश के मौसम में, मासिकस्राव के दौरान, अंगड़ाइयां लेने पर रोग बढ़ जाता है।
शमन-
खड़े रहने पर, गर्दन और छाती से कपड़ा हटाने पर रोग कम हो जाता है।
पूरक-
मर्क या सीपिया पहले या बाद में प्रयोग किया जाता है।
प्रतिविष-
बेल, मर्क औषधियों का उपयोग सर्सापैरिल्ला औषधि के हानिकारक प्रभावों को दूर करने के लिए किया जाता है।
तुलना-
सर्सापैरिल्ला औषधि की तुलना बर्बे, लाइको, नेट्रम-म्यू, पेट्रोलि, सेसाफ्रास, सौरूरस, क्यूकरविटा सिट्रेलस से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सर्सापैरिल्ला औषधि की 1 शक्ति से 6 शक्ति तक देने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस Strophanthus Hispidus
स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि को दिल के रोगों को ठीक करने की एक बहुत ही उपयोगी औषधि माना जाता है। दिल को मजबूत करने के लिए और शोफज संचय (शरीर में किसी स्थान पर पानी भरना) को समाप्त करने के लिए इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। इसके अलावा शीतपित्त में, दिल में खून का बहाव सही तरीके से न पहुंच पाना, सांस का सही तरह से न आना जैसे रोगों में भी ये औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी को कनपटी में बहुत तेजी से दर्द का होना और इसके साथ ही रोगी का हर चीज को दो-दो रूप में देखना, आंखों से कुछ भी साफ नज़र ना आना, आंखों का बहुत ज्यादा चमकना, चेहरे का गुस्से में लाल हो जाना, बुढ़ापे में सिर के घूमने के कारण चक्कर से आना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि देने से लाभ होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बार-बार पेशाब का आना, पेशाब का कम मात्रा में आने के साथ पेशाब मे अन्न का आना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि देने से लाभ मिलता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्री के गर्भाशय से खून का आना, मासिकस्राव का बहुत ज्यादा और समेय पर ना आना, मासिकस्राव के दौरान नितंबों और जांघों में होकर जाने वाला दर्द आदि लक्षणों में रोगी को स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि का सेवन कराने से लाभ होता है।
सांस रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी को ऊपर चढ़ते समय जैसे सीढ़ियों में सांस लेने में परेशानी होती है। फेफड़ों में खून जमा हो जाने के कारण सूजन आ जाना, सांस की नली और दिल के रोगों के कारण दमा होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण- रोगी की नाड़ी का बहुत तेज गति से चलना, पेशियों का कमजोर हो जाने के कारण दिल की धड़कन का अनियमित गति से चलना, दिल में दर्द होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि देने से बहुत लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा पर पुरानी प्रकार की छपाकी सी उभरना आदि लक्षणों में रोगी को स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि का इस्तेमाल कराने से आराम मिलता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- शरीर के सारे अंगों में पानी भर जाने के कारण सूजन आ जाना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि का प्रयोग कराना उपयोगी साबित होता है।
तुलना-
स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि की तुलना डिजिटै और फास्फो-ए से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि का मूलार्क या 6 शक्ति तक देनी चाहिए।
जानकारी-
रोगी को स्ट्रोफैन्थस हिस्पिडस औषधि के मूलार्क की लगभग 7-7 बूंदों का सेवन कराने से रोगी का जी मिचलाने लगता है और इसी के साथ सुरासार (शराब) को देखते ही रोगी का जी खराब हो जाता है। इसी के कारण रोगी की शराब पीने की आदत छूट जाती है।
स्ट्रक्नीनम Strychninum
स्ट्रक्नीनम औषधि को शरीर की पेशियों में लकवा मार जाने में, मेरुरज्जू की अस्वाभाविक प्रतिवर्त उत्तेजना के कारण पैदा होने वाले बांयटो तथा पेशाब करने के रास्ते मे आने वाली परेशानियों को दूर करने में उपयोगी माना जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्ट्रक्नीनम औषधि से होने वाले लाभ-
सिर से सम्बंधित लक्षण- बहुत तेजी से होने वाला सिर दर्द तथा इसके साथ ही आंखों में जलन सी महसूस होना, सिर के घूमने के कारण चक्कर आना, रोगी का बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाना, सिर में आगे की ओर झटके से लगना, खोपड़ी में दर्द सा होना, गर्दन के पीछे के भाग में खुजली सी महसूस होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रक्नीनम औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों के सामने चिनगारियां सी नाचती हुई महसूस होना, रोगी के नेत्रपटल फैले हुए, रोगी की आंखों के गर्म होने के साथ-साथ आंखों में दर्द होना, आंखों का बड़ा होना, आंखों की पेशियों की सिकुड़न, पलकों का फड़कना और कंपन आदि लक्षणों में रोगी को स्ट्रक्नीनम औषधि देने से लाभ होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- रोगी की कानों से सुनने की शक्ति का बिल्कुल कम हो जाना अर्थात अगर कोई व्यक्ति रोगी से बात करता है तो उस व्यक्ति की बात भी रोगी को साफ तरह से सुनाई नहीं देती, कानों में जलन, कानों में खुजली मचने के साथ अजीब-अजीब सी आवाजों का गूंजना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रक्नीनम औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक साबित होता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- रोगी का चेहरा कमजोरी के कारण फीका सा पड़ जाना, रोगी के जबड़ों को बहुत ज्यादा टाइट होना, रोगी का नीचे वाला जबड़ा उद्वेष्टकारी रूप में बंद हो जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्ट्रक्नीनम औषधि देने से लाभ मिलता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी का गला सूख जाना, गले का सिकुड़ जाना, रोगी को गले में ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसके अंदर कुछ फंस गया हो, किसी भी चीज को खाते-पीते समय निगलने में बहुत परेशानी महसूस होती है, भोजन की नली में जलन होकर उसका काम करना बंद कर देना, रोगी का तालु सख्त हो जाने के कारण उसमे बहुत तेज खुजली होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को स्ट्रक्नीनम औषधि का प्रयोग कराना लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- स्त्री को गर्भाकाल के दौरान जी मिचलाना, रोगी को बहुत ज्यादा उल्टी होना, लगातार उल्टी होने के कारण आमाशय में दर्द होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रक्नीनम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- पेट की पेशियों में बहुत तेजी से दर्द का होना, आंतों में मरोड़े के साथ उठने वाला दर्द जैसे लक्षणों में स्ट्रक्नीनम औषधि बहुत उपयोगी साबित होती है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- गर्दन की पेशियों का सख्त हो जाना, गर्दन और रीढ़ की हड्डी से लेकर नीचे की ओर तेज दर्द, पीठ का अकड़ जाना, रीढ़ की हड्डी में नीचे की ओर ठंडक महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को स्ट्रक्नीनम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्री की यौन उत्तेजना का बहुत तेज होना, अगर स्त्री को कोई जरा सा भी छू लेता है तो स्त्री की संभोग करने की इच्छा बहुत तेज हो जाती है। इन लक्षणों के आधार पर अगर रोगी स्त्री को स्ट्रक्नीनम औषधि का सेवन कराया जाए तो उसके लिए बहुत लाभदायक साबित होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- आवाज की नली के आसपास की पेशियों का लकवा मार जाना, सांस लेने में बहुत ज्यादा परेशानी होना, छाती की पेशियों में बहुत तेज संकोचक दर्द, रुक-रुककर आने वाली खांसी जो इंफ्लुएंजा के बुखार के बाद फिर से शुरू हो जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्ट्रक्नीनम औषधि देना फायदेमंद रहता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी की रीढ़ की हड्डी से लेकर नीचे तक बिल्कुल ठंडक सी महसूस होना, रोगी का पसीना सिर और छाती पर से होता हुआ धार के रूप मे आना, शरीर के नीचे के अंगों में ठंडक आ जाना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रक्नीनम औषधि देनी चाहिए।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पूरे शरीर में खुजली होना, नाक का बिल्कुल बर्फ की तरह ठंडा होना, ठंडक जो रीढ़ की हड्डी से होकर नीचे तक पहुंच जाती है। इन लक्षणों में अगर रोगी को स्ट्रनीकम औषधि दी जाए तो रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
शरीर से बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी के शरीर के सारे अंगों का अकड़ सा जाना, गठिया के रोग के साथ शरीर के सारे जोड़ों का अकड़ जाना, शरीर में भयंकर झटके लगने के साथ स्फुरण और कंपन होना, रोगी की पीठ का धनुष के आकार में टेढ़ा हो जाना, मांसपेशियों में आघात पहुंचना। आदि लक्षणों में रोगी को स्ट्रनीकम औषधि देना असरकारक रहता है।
प्रतिविष-
क्लोरैल औषधि का उपयोग स्ट्रक्नीनम औषधि के दोषों को दूर करने के लिए करना चाहिए।
वृद्धि-
सुबह के समय, छूने से, ज्यादा शोर-शराबे से, गति करने से, भोजन करने के बाद रोग बढ़ जाता है।
शमन-
सोते समय पीठ के बल सोने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
स्ट्रनीकम औषधि की तुलना यूकैलिप्टस, स्ट्रिकनी और आर्से से की जा सकती है।
मात्रा-
स्ट्रनीकम औषधि की 3 से 30 शक्ति तक रोगी को उसके रोग के लक्षणों के आधार पर देनी चाहिए।
स्ट्रिक्निया फासफोरिका STRYCHNIA PHOSPHORICA (Phosphate of Strychnin)
स्ट्रिक्निया फासफोरिका औषधि मस्तिष्क-मेरुमज्जा संस्थान में होकर पेशियों पर क्रिया करती है जिससे शरीर में कंपन, अकड़न, कमजोरी, शारीरिक ताकत खो जाना जैसी अवस्थाएं पैदा हो जाती है।
विभिन्न लक्षणों के आधार पर स्ट्रिक्निया फासफोरिका औषधि से होने वाले लाभ-
शरीर में रक्तसंचार ठीक तरह से न होने के कारण नाड़ी का अनियमित चलना तथा दिमाग में किसी तरह का रोग होने के कारण नियंत्रण शक्ति कम हो जाना, हंसने की अदम्य इच्छा ओर दिमाग का किसी काम में न लगाना, नाड़ी का तेज और कमजोर होना, तेज बुखार आने के बाद में कमजोरी आने पर, हिस्टीरिया रोग में, रीढ़ की हड्डी में कमजोरी आ जाने के कारण जलन और दर्द होना जो सामने छाती तक फैल जाता है, हाथ और कांख में चिपचिपा सा पसीना आना आदि रोगों और उनके लक्षणों में ये औषधि लाभ करती है।
मात्रा-
रोगी को स्ट्रिक्निया फासफोरिका औषधि की 3 शक्ति का विचूर्ण देने से रोगी को आराम मिलता है।
सक्सीनम (इलेक्ट्रान अम्बर) Succinum
सक्सीनम औषधि को हिस्टीरिया रोग के लक्षणों में, दमा रोग में और प्लीहा से सम्बंधित रोगों में इस्तेमाल करना बहुत ही लाभकारी साबित होता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सक्सीनम औषधि से होने वाले लाभ-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर में दर्द का होना, आंखों से हर समय आंसुओं का निकलते रहना, रोगी को बार-बार छीकें आना, ज्यादा शोर-शराबे के कारण सिर में दर्द होना, रोगी का बंद कमरों में रहने से डर का लगना आदि रोगों के लक्षणों में रोगी को सक्सीनम औषधि देने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को नया-नया टी.बी का रोग होना, सांस की नली की सूजन में, सांस की नली की पुरानी जलन का रोग, छाती में दर्द में, काली खांसी जैसे लक्षणों में सक्सीनम औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
तुलना-
सक्सीनम औषधि की तुलना एरुण्डों, वाइथिया, सैबाडिल्ला और सिनापिस से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सक्सीनम औषधि की 3 शक्ति का विचूर्ण देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
सल्फोनल Sulphonal
सल्फोनल औषधि को शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी आ जाने में, शरीर के अंगों का सुन्न हो जाना, बेहोशी छाने में जैसे रोगों इस्तेमाल करने से लाभ होता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सल्फोनल औषधि से होने वाले लाभ-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी के दिमाग में हमेशा अजीब-अजीब से ख्याल आते रहना, रोगी का सही तरीके से बात ना कर पाना, रोगी का बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाना, रोगी का खुशी के समय भी उदास सा बैठे रहना, रोगी का अपने आपको कमजोर सा महसूस करना जैसे लक्षणों में रोगी को सल्फोनल औषधि देने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी का सिर घूमने के कारण चक्कर का आना, रोगी जैसे ही अपना सिर ऊपर की ओर उठाता है तो उसके सिर में दर्द होने लगता है। सिर के अंदर पानी का भरा हुआ सा महसूस होना, आंखों से हर चीज का दो-दो दिखाई देना, कानों में अजीब-अजीब सी आवाजें गूंजती रहना, रोगी की जीभ ऐसी हो जाना जैसे कि उसमे लकवा मार गया हो, रोगी की आंखों का लाल होकर एक ही जगह जम जाना, रोगी को किसी भी बात को बोलने में बहुत ज्यादा परेशानी होना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को सल्फोनल औषधि देने से लाभ होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बार-बार पेशाब का आना, पेशाब का बहुत कम मात्रा में और कत्थई या लाल रंग का आना, पेशाब के साथ अन्न का आना जैसे लक्षणों में रोगी को सल्फोनल औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी के गुर्दों में खून का जमा हो जाना, रोगी का सोते समय जोर-जोर से खर्राटें लेना, रोगी को सांस लेने में परेशानी होना जैसे सांस रोग के लक्षणों में सल्फोनल औषधि का प्रयोग कराने से रोगी को आराम आता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी की दोनों टांगों का लकवा मार जाने की तरह अकड़ जाना, रोगी को अपनी टांगें बहुत ज्यादा भारी सी महसूस होती है। रोगी का चलते समय लड़खड़ाते हुए चलना, रोगी के शरीर के अंगों का ठंडा, कमजोर या कांपना, रोगी का बहुत ज्यादा बेचैन हो जाना, मांसपेशियों का फैलना, जानुसंधि-कंडराओं की स्वाभाविक प्रतिक्रिया का लोप आदि लक्षणों में रोगी को सल्फोनल औषधि देना लाभदायक साबित होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को त्वचा पर बहुत ज्यादा खुजली सी होना, त्वचा का नीला पड़ जाना, रोगी की त्वचा पर खून के जैसे लाल-लाल से निशान पड़ना जैसे चर्म रोगों के लक्षणो में रोगी को सल्फोनल औषधि का सेवन कराना लाभकारी साबित होता है।
तुलना-
सल्फोनल औषधि की तुलना ट्रायोनल के साथ की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सल्फोनल औषधि की 3 शक्ति का विचूर्ण देने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
सल्फर Sulphur
होम्योपैथी के अनुसार सल्फर को त्वचा पर होने वाली किसी भी प्रकार की खारिश को दूर करने में बहुत उपयोगी माना जाता है। शरीर के किसी भाग में खारिश होने के बाद त्वचा पर दाने निकल आना, खुजली करने से खारिश वाले हिस्से में जलन होना, पैरों के तलुवों में जलन होना, शरीर के सारे भागों का लाल हो जाना जैसे कान, नाक, होंठ, मूत्राशय,आंखों की पलकें, आदि में सल्फर औषधि बहुत ही लाभकारी मानी जाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सल्फर औषधि से होने वाले लाभ-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी का हर बात को तुरंत ही भूल जाना, किसी भी बात को सोचने और समझने में बहुत मुश्किल होना, मन में अजीब-अजीब से विचार आना जैसे कि वह किसी भी चीज को सुंदर वस्तु समझने लगता है, अपने आपको दुनिया का सबसे अमीर आदमी समझने लगता है, रोगी का बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाना, किसी भी व्यक्ति से सही तरीके से बात न करना, काम करने में मन न लगना, रोगी इतना आलसी हो जाता है कि उसको खुद को ही जगा पाना मुश्किल हो जाता है, खुलकर भूख लगने पर भी रोगी का हमेशा कमजोरी और दुबला-पतला सा रहना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक रहता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के माथे के ऊपर के भाग में बहुत गर्मी सी महसूस होना, सिर का बहुत ज्यादा भारी सा लगना, कनपटियों में दबाव सा पड़ना, सिर में धड़धड़ाता हुआ दर्द जो झुकने पर ज्यादा हो जाता है और साथ ही सिर के घूमने के कारण चक्कर आना, खोपड़ी का खुश्क हो जाना, नहाते समय बहुत ज्यादा बालों का झड़ना, सिर में खुजली होना जिनमे खुजली होने पर जलन पैदा होती है। इन सारे लक्षणों मे रोगी को सल्फर औषधि देने से आराम आता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों के पलको के किनारे की ज्वलनशील क्षताक्तता, आंखों के चारों ओर छोटे-छोटे प्रकाश के कण नजर आना, आंखों में जलन सी महसूस होना, आंखों के सामने काली-काली बिंदिया सी नज़र आना, कनीनिका पर नए जख्म का बनना, सान्तक कनीनिका-प्रदाह आदि लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपने कानों में सांय-सांय की आवाज सी गूंजती हुई महसूस होना, कानों में स्राव रुक जाने के कारण होने वाली परेशानिया, किसी भी खुशबू से तुरंत ही कान में दर्द हो जाना, बहरापन आने से पहले सुनने की शक्ति का कमजोर हो जाना, श्लैष्मिक बहरापन जैसे लक्षणों में सल्फर औषधि लाभकारी साबित होती है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- घर के अंदर नाक का बंद हो जाना, नाक के आरपार के भाग में दर्द होना, नाक के अंदर पपड़ी सी जमना, सुबह और शाम के समय स्राव के रूप में जुकाम टपकता रहता है, रोगी को बार-बार छींके आती रहती है, पुराने जुकाम की तरह नाक से बदबू आती रहती है, नाक के आगे के भाग का बिल्कुल लाल हो जाना आदि लक्षणों मे रोगी को सल्फर औषधि देने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी चाहे जितना भी भोजन कर ले उसको तब भी भूख लगती रहती है, अगर रोगी भोजन नही करता तो उसके सिर में दर्द शुरू हो जाता है और कभी-कभी तो रोगी को बिल्कुल भी भूख नहीं लगती, थोड़ा सा भोजन करते ही रोगी की भूख समाप्त हो जाती है। रोगी को सुबह के समय या भोजन करने के बाद खट्टी-खट्टी डकारें आती है, पेट का खाली सा और अंदर की ओर धंसता हुआ सा महसूस होना जैसे लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि देने से लाभ मिलता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पेट को अगर हल्का सा भी दबाया जाए तो उसके पेट में दर्द होने लगता है, रोगी को पेट में ऐसा लगता है जैसे कि पेट के अंदर कोई जीवित प्राणी मौजूद हो, जैसे ही रोगी कुछ पीता है तो उसके पेट में दर्द होने लगता है, रोगी के जिगर में दर्द होता है जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को सल्फर औषधि देने से लाभ मिलता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण- रोगी के मलद्वार में बहुत तेज खुजली और जलन सी होना, मलक्रिया के दौरान बार-बार जोर लगाने पर भी मल का न आना, मल का सख्त और गांठों के रूप में आना, बच्चे को डर लगता है कि मलक्रिया के दौरान दर्द होगा, मलद्वार का चारों ओर से लाल हो जाने के साथ खुजली होना, सुबह के समय बिस्तर पर से तुरंत ही उठकर मलत्याग के लिए भागना पड़ता है, रोगी को अपना मलान्त्र चिरा हुआ सा महसूस होना, बवासीर के मस्से होना, बार-बार डकारें आना जैसे लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी के होंठों का बिल्कुल सूख जाना, होठों में जलन होना, सुबह के समय मुंह का स्वाद कड़वा होना, मसूढ़ों का फूल जाना, पूरी जीभ का सफेद होना लेकिन जीभ के किनारे और नोक लाल होना जैसे लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी गले में कोई नुकीली सी चीज चुभती हुई महसूस होना या गले के अंदर कोई बाल चिपका हो, गले में जलन होने के साथ गले का खुश्क हो जाना, गले में एक तरह का गोला उठता हुआ सा लगता है जो भोजन की नली को बंद कर देता है। इन सारे लक्षणों के आधार पर रोगी को सल्फर औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बार-बार पेशाब आना खासकर जब रोगी सोता है उसके बाद तो थोड़ी-थोड़ी देर में ही रोगी को पेशाब करने के लिए जाना पड़ता है, बच्चे बिस्तर पर ही पेशाब कर देते हैं खासकर ऐसे बच्चे जिनके गले में गांठे होती है, पेशाब का रुक-रुककर आना, पेशाब करते समय पेशाब की नली में जलन सी होना, पेशाब के साथ बलगम और पीब का आना, रोगी को अचानक पेशाब आ जाना और उसको रोकना बहुत ही मुश्किल हो जाना, पेशाब का बहुत ज्यादा लेकिन रंगहीन आना जैसे लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक रहता है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण- रोगी के लिंग में सूजन आने के कारण दर्द होना, वीर्य का अपने आप ही निकल जाना, सोते समय जननेन्द्रियों मे बहुत तेजी से खुजली का होना, जननेन्द्रियों का कमजोर पड़ जाना, अंडकोषों का लटक जाना, रोगी के लिंग में बहुत ही बदबूदार पसीने का आना आदि लक्षणों के आधार पर सल्फर औषधि का प्रयोग करना असरकारक रहता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण- स्त्री की योनि में बहुत तेज खुजली होने के कारण स्त्री का बेचैन हो जाना, योनि में बहुत छोटी-छोटी सी खुजली और जलन के साथ होने वाली फुंसियां, गर्भपात के दौरान खून का ज्यादा आना, स्त्रियों में प्रदर-स्राव (योनि में से पानी का आना) का बहुत ज्यादा मात्रा में, पीले रंग का और जहरीला सा होना, मासिकस्राव का समय से बहुत बाद में, गाढ़ा सा, काले रंग का, कम मात्रा में और दर्द के साथ आना, मासिकस्राव आने से पहले स्त्री के सिर में दर्द हो जाना, स्तनों का कट-फट जाना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि का प्रयोग कराना लाभकारी रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी छाती में दबाव सा और जलन महसूस होना, सांस लेने में परेशानी होना, रोगी को बंद कमरे में दम सा घुटता है, रोगी की आवाज का बंद हो जाना, रोगी की पूरी छाती पर लाल रंग के धब्बे से होना, खांसी का बलगम के साथ आना, छाती का बहुत ज्यादा भारी सा महसूस होना, आधी रात के समय सांस लेने में परेशानी जो उठकर बैठने से थोड़ा कम होती है, सुबह के समय नाड़ी का बहुत तेजी से चलना, सूचीवेधन जैसे दर्द जो छाती से होकर पीठ तक तेजी से दौड़ती है और जो पीठ के बल लेटने से या गहरी सांस लेने से तेज होता है, छाती में गर्मी जो सिर तक पहुंच जाती है, फेफड़ों में बहुत तेज जलन आदि लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि का सेवन कराना लाभदायक साबित होता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- रोगी के कंधों में खिंचाव के साथ दर्द का होना, पश्चग्रीवा (गर्दन के पीछे का भाग) में अकड़न सा आना, रोगी की कशेरुकाये ऐसे लगती है जैसे एक-दूसरे के ऊपर घूम रही हो आदि लक्षणों में सल्फर औषधि लेने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- हाथों का कांपते रहना, हाथों में गर्म पसीना आना, रोगी के बाएं कंधे में गठिया रोग के कारण दर्द होना, गठिया रोग और जोड़ों के साथ ही खुजली भी होना, रात के समय पैरों के तलुवों में और हाथों में जलन महसूस होना, बगल से लहसुन जैसी बदबू का आना, हाथों में खिंचाव के साथ दर्द का होना, घुटनों और टखनों के अकड़ जाने के कारण रोगी सीधा नही चल सकता, कंधों का झुक जाना, लसीकाग्रंथियों का अलग-अलग हो जाना जैसे लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी का नींद मे बोलते रहना, नींद में झटके लगना, रोगी को रात में सोते हुए कई बार उठना पड़ता है, रोगी को रात के लगभग 2 बजे से सुबह 5 बजे के बीच बिल्कुल नींद नही आती, रोगी सुबह गाने गाते हुए जगता है, रोगी को सोते समय जीते-जागते हुए सपने नज़र आना आदि लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि का प्रयोग कराना बहुत उपयोगी साबित होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पूरे शरीर में अंदर और बाहर बुखार होने के कारण बहुत गर्मी पैदा होना, रोगी को बहुत ज्यादा प्यास का लगना, रोगी की त्वचा का सूख जाना, सोते समय गर्दन के पीछे वाले भाग पर और माथे के पीछे के भाग पर पसीना आना, शरीर के किसी एक अंग में पसीना आना, हल्का-हल्का सा बुखार आना जैसे लक्षणों में सल्फर औषधि का प्रयोग करना लाभकारी रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा का सूख जाना, त्वचा पर पपड़ी सी जमना, त्वचा पर हल्का सा कट भी जाता है या छिल जाता है तो वो भी पक जाता है, त्वचा पर खुजली होना जो खुजली करने से या धोने से बढ़ जाती है। रोगी के नाखूनों की चमड़ी में जलन सी होना, नाखूनों की खाल का उखड़ जाना, किसी दवा को खाने के बाद त्वचा पर दाने से निकल आना, बहुत तेज खुजली का होना, खासकर गर्मी के मौसम में। इन सारे लक्षणों के किसी रोगी में नज़र आने पर उसे सल्फर औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
वृद्धि-
आराम करते समय, खड़े रहने पर, बिस्तरों की गर्मी से, नहाने-धोने से, सुबह, दोपहर या रात को, उत्तेजक औषधियों के प्रयोग से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
शुष्क, गर्म मौसम में, दाईं करवट लेटने से, रोग वाले अंग को ऊपर की ओर खींचने से रोग कम हो जाता है।
पूरक-
एलो, सोरा, ऐकोना, पाइरा।
तुलना-
कैल्के-कार्ब, लाइको, पल्स, सार्सा, सिपिया से सल्फर औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सल्फर औषधि की कम से ऊंची शक्तियां देने से लाभ होता है।
जानकारी-
रोगी के पुराने रोगों में 200 और उससे ऊंची शक्तियां रोगी को लाभ पहुंचाती है।
सल्फर आयोडेटम Sulphur Iodatum
सल्फर आयोडेटम औषधि को चर्मरोगों को दूर करने की एक बहुत ही प्रभावशाली औषधि के रूप में देखा जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सल्फर आयोडेटम औषधि से होने वाले लाभ-
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी के गले के अंदर काकलक और गले की नसों का विवृद्ध (अलग-अलग हो जाना) होकर लाल हो जाना, गले का सूज जाना, रोगी की जीभ का सूजकर मोटा हो जाना, रोगी के कान की जड़ की ग्रंथियों का विवृद्ध (अलग-अलग हो जाना) आदि लक्षणों में रोगी को सल्फर आयोडेटम औषधि देना लाभकारी रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के कान, नाक और पेशाब करने के रास्ते में खुजली सी होना, रोगी के चेहरे पर चपटे उद्भेद, रोगी के होठों पर जलन के साथ जख्म होना, रोगी की गर्दन पर फोड़े से होना, रोगी के शेव बनवाते समय उस्तरा लगने के कारण पैदा हुई खुजली, चेहरे के मुहांसे, त्वचा पर दाद होना, रोगी के पूरे हाथों पर खुजली के साथ होने वाले उद्भेद जैसे लक्षणों में रोगी को सल्फर आयोडेटम औषधि देने से लाभ मिलता है।
मात्रा-
रोगी को सल्फर आयोडेटम औषधि की 3 शक्ति का विचूर्ण देने से लाभ मिलता है।
सल्फ्यूरिकम एसिडम Sulphuricum Acidum
सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि को वैसे तो बहुत से रोगों को दूर करने में उपयोग किया जाता है लेकिन फिर भी ये औषधि शरीर में आई हुई कमजोरी और कंपन को दूर करने में बहुत ही अहम भूमिका निभाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि का उपयोग-
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंख में किसी तरह की चोट लग जाने के कारण आंख के अंदर के भाग में खून आना, रोगी का शुक्लमण्डल बहुत ज्यादा सूज जाना और इसी के साथ ही उसमे बहुत तेज दर्द होना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि देने से लाभ मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सीने में जलन सी होना, रोगी को पूरे दिन खट्टी-खट्टी डकारों का आना जिसके कारण रोगी के दांत भी खट्टे हो जाते है, रोगी का मन करता है कि वह शराब का सेवन करें, रोगी को अपना आमाशय खाली-खाली महसूस होता है, कॉफी की खुशबू से ही रोगी का मन खराब हो जाता है, रोगी को खट्टी उल्टी आना, रोगी को बार-बार हिचकी आना, रोगी का जी मिचलाने के साथ-साथ ठंड लगने लगती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग कराना बहुत उचित रहता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी के मुंह में छालों का होना, रोगी के मसूढ़ों से खून का निकलने लगना, रोगी की सांस में से बदबू आना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण- स्त्री का मासिकस्राव समय से काफी पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में आना, बूढ़ी स्त्रियों के गर्भाशय के मुंह पर जख्म जिसमे से अपने आप ही खून आने लगता है, स्त्रियों को आने वाला तीखा, जलन के साथ प्रदर-स्राव (योनि में से पानी आना) आदि लक्षणों में रोगी को सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि देना लाभकारी रहता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपने मलान्त्र में ऐसा महसूस होना जैसे कि उसके अंदर एक बड़ा सा गोला हो, रोगी को काले रंग के, बदबूदार दस्त का आना इसके साथ ही शरीर से खट्टी सी बदबू आना, रोगी को पेट में खालीपन के साथ बेहोशी सी छा जाना, रोगी को बवासीर के मस्सों में से स्राव का होना आदि लक्षणों में रोगी को सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि देनी चाहिए।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर में दाईं तरफ का स्नायुशूल, जिसमे बहुत तेजी से दर्द होता है, रोगी को माथे के अंदर भेजा लुढ़कता हुआ सा महसूस होता है जैसे भेजा इधर-उधर लुढ़क रहा हो, प्रमस्तिष्क संघट्न जब त्वचा ठण्डी और पूरा शरीर ठंडे पसीने से भीग जाता है, कपाल (माथा) के पीछे एक ओर दबाव के साथ होने वाला दर्द, रोगी जब सिर के पास हाथ रखता है तो उसको सिर के दर्द में आराम मिलता है, रोगी की कनपटी में दाहिनी तरफ किसी चीज को घुसाने जैसा महसूस होना जैसे कोई डाट लगा रहा हो। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी को पेट में बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस होना और इसी के साथ ही नितंबों और कमर में खिंचाव सा महसूस होता है जैसे कि आंत्रच्युति होने को हो वो भी खासकर बाईं तरफ के भाग में आदि लक्षणों में सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि का सेवन प्रभावशाली रहता है।
मन से सम्बंधित लक्षण- मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाता है वो किसी से सही तरह से बात नही करता, रोगी हमेशा जल्दबाजी में ही रहता वो सोचता है कि जो भी काम है उसको तुरंत ही समाप्त कर दिया जाए, दूसरों के द्वारा पूछे गए सवालों का जवाब दे पाने में असमर्थ होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि देने से लाभ मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी की सांस का बहुत तेजी से चलना और इसी के साथ ही गर्दन की पेशियों में चिलक मारता हुआ दर्द तथा नाक के नथुनों का फड़कना, आवाज की नली बहुत तेजी से ऊपर और नीचे उतरा करती है, बच्चों की सांस की नली में होने वाली जलन तथा इसी के साथ ही रुक-रुक कर और परेशानी करने वाली खांसी आदि में रोगी को सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि का सेवन कराना लाभकारी होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- शरीर के अंदर चोट लग जाने के कारण होने वाली परेशानियां और इसी के साथ ही कुचलन तथा त्वचा का नीला पड़ना, त्वचा पर नीले रंग के से निशान पड़ना, त्वचा पर नीले और लाल रंग के खुजली के साथ होने वाले धब्बे और उनके सभी द्वारों से काला सा खून बहना, रोगी के पैरों की एड़ियां फट जाने के साथ ही उनमे सूजन आ जाना आदि लक्षणों में रोगी को सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि सेवन कराना लाभकारी रहता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी जब भी कुछ लिखने बैठता है तभी उसकी उंगलियों में झटके से लगने लगते है, रोगी की पूरी बांहों में बायंटेदार पक्षाघाती (लकवे जैसी) सिकुड़न होना जैसे लक्षणों में रोगी को सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि का प्रयोग कराना उचित रहता है।
वृद्धि-
बहुत ज्यादा गर्मी या ठंड से, दोपहर या शाम को रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्माई से, शरीर में रोग वाले भाग के बल लेटने से रोग कम हो जाता है।
पूरक-
पल्स।
तुलना-
सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि की तुलना आर्नि, कैलेण्डु, लीडम, कल्के, सीपि से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सल्फ्यूरिकम एसिडम औषधि की 3x शक्ति देने से लाभ होता है।
स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका Strontiana Carbonica
स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका औषधि को गठिया रोग के कारण होने वाले दर्द में, पुरानी मोच के दर्द में, हडि्डयों में जलन होने में, किसी तरह का आप्रेशन करवाने के बाद बहुत ज्यादा खून आना, हाईब्लडप्रेशर के कारण, भोजन की नली का सिकुड़ जाना आदि रोगों में बहुत उपयोगी साबित होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर के घूमने के कारण सिर में दर्द होना और जी का मिचलाना, गर्दन के पीछे के भाग में दर्द होना जो ऊपर की ओर फैल जाता है, गर्म कपड़े को सिर में बांधने से आराम आता है, स्नायु का दर्द, दर्द जो धीरे-धीरे बढ़ जाता है, नाक के अंदर खून की पपड़ियों का जमना, चेहरे का लाल हो जाने के साथ जलन होना, नाक में खुजली और जलन होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों में जलन होने के साथ आंखों का लाल होना, आंखों से कोई काम करने पर आंखों में दर्द होना और आंखों से आंसूओं का आना, आंखों के सामने हर समय कोई चीज नाचती हुई और रंग बदलती हुई सी लगती है। इस तरह के लक्षणों के रोगी में नज़र आने पर रोगी को स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- भूख का बिल्कुल न लगना, मांस को देखते ही जी का खराब हो जाना, हर समय भूख सी ही लगती रहती है, किसी भी खाने के पदार्थ को खाने पर वो स्वाद नहीं लगता है, भोजन करने के बाद रोगी को डकारे आती रहती है, रोगी को हिचकी आने के कारण छाती में दर्द होता है, इन सारे आमाशय रोग के लक्षणों में रोगी को स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका औषधि देना काफी लाभदायक साबित होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी को दस्त होना जो रात के समय ज्यादा हो जाते है, मल का बहुत तेजी से आना, जो रात के बाद थोड़ा कम होता है, रोगी को मलक्रिया के बाद काफी देर तक मलद्वार में जलन सी होती रहती है, पेट में सूजन आना, चुभता हुआ दर्द होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका औषधि देने से लाभ होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी को गृध्रसी (साइटिका) के साथ टखने का शोफ (पानी भरना), दाईं तरफ के कंधे में गठिया रोग के कारण होने वाला दर्द, गठिया रोग के साथ होने वाला दस्त का रोग, पैरों के तलुवों में बायंटे, चिर आक्षेप खासकर टखने के जोड़ में, शरीर के किसी अंग में पानी भरने के कारण सूजन आ जाना, पैरों का बर्फ की तरह ठण्डा हो जाना, हाथों की नसों का फूल जाना आदि लक्षणों मे रोगी को स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बुखार के लक्षणों में शरीर में गर्मी बढ़ जाने से ऐसा मन करता है कि वह अपने सारे कपड़े उतार दें। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को रात में पसीना आना, त्वचा पर खुजली वाले जलन के साथ होने वाले दाने जो खुली हवा में परेशान करते है। टखने के जोड़ में मोच सी आना और पानी भरना आदि लक्षणों में रोगी को स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका औषधि देना बहुत ही लाभकारी साबित होता है।
वृद्धि-
मौसम बदलने से, शांत होने की शुरूआती अवस्था में, हिलना शुरू करते समय रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्म पानी में डुबोने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका औषधि की तुलना आर्निका, रूटा, सिलिका, बैराइ-का, कार्बो, स्ट्रौशि-आयो, स्ट्रौशियम ब्रोमै और स्ट्रौशिनाइट्रे से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्ट्रॉनशियाना कार्बोनिका औषधि की 6 शक्ति का विचूर्ण या 30 शक्ति तक देनी चाहिए।
स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा Scrophuaria Nodosa (Knotted Fig Wort)
किसी व्यक्ति के शरीर में किसी कारण से जब शरीर की सारी ग्रंथियां बढ़ जाती है उस समय अगर रोगी को स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा औषधि का सेवन कराया जाए तो ये रोगी के लिए बहुत ही लाभकारी साबित होती है। इस औषधि को चर्मरोगों (त्वचा के रोग) को दूर करने के लिए भी बहुत ही प्रभावशाली औषधि माना जाता है। स्त्रियों के स्तनों मे होने वाले फोड़ों का समाप्त करने में भी ये औषधि असरदार साबित होती है। इसके अलावा स्त्री में योनि में होने वाली खुजली, खूनी बवासीर का दर्द, गले में गांठ हो जाने के कारण सूजन आ जाना, अंडकोषों में कोई रोग हो जाना, पूरे शरीर की संकोचक पेशियों में दर्द होना आदि रोगों में भी ये औषधि लाभ करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपना सिर घूमता हुआ सा महसूस होना जो खड़े रहने पर ज्यादा हो जाता है, रोगी के माथे से लेकर सिर के पीछे के हिस्से तक दर्द का होना, रोगी के कान के पीछे का अकौता आदि लक्षणों में रोगी को स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- कान के बाहर के पर्दे में बहुत ज्यादा गहरे जख्म से होना, कान के बाहर के पर्दे के आसपास के भाग में जलन सी होना, कान के चारों और अकौता होने जैसे कान के रोगों के लक्षणों में रोगी को स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी की नाभि के नीचे के भाग में दर्द होना। जिगर दर्द होना, अवग्रहांत्र वंक (सिग्मोइड फ्लेक्चर) और मलाशय में दर्द होना, मलाशय के बाहर फैले हुए दर्दनाक, खून के साथ होने वाले बवासीर के मस्से आदि लक्षणों में रोगी को स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा औषधि का सेवन कराना बहुत ही लाभकारी रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी अगर किसी चीज को ज्यादा देर तक लगातार देखता रहता है तो उसकी आंखों में दर्द होने लगता है। रोगी को अपनी आंखों के सामने धब्बे से नज़र आते हैं, रोगी की भौंहों में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होता है, रोगी के अक्षिगोलकों में बहुत तेज दर्द होता है आदि लक्षणों में रोगी को स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी जब सांस लेता है तो उसको बहुत ज्यादा परेशानी महसूस होती है। इसके साथ ही रोगी की छाती पर दबाव पड़ने के साथ ही कंपन सा महसूस होता है, कंठनाल विभाजित होने वाले स्थान के आसपास के भाग में दर्द होना, कंठमाला ग्रस्त (गले में गांठें) रोगियों को परेशान करने वाला दमा आदि लक्षणों में रोगी को स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा औषधि का सेवन कराना उपयोगी साबित होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा पर बहुत तेजी से चुभन के साथ होने वाली खुजली जो ज्यादा रोगी के हाथ के पीछे की ओर ज्यादा होती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा औषधि देना लाभकारी रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सुबह के समय भोजन करने से पहले और भोजन करने के बाद में बहुत नींद आना, इसी के साथ ही रोगी को अपना शरीर टूटा-टूटा सा महसूस होता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा औषधि देने से लाभ मिलता है।
वृद्धि-
रोगी जब सोते समय दाईं करवट लेटता है तो उसका रोग बढ़ जाता है।
तुलना-
स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा औषधि की तुलना लोबेलिया , रूटा, कार्सिनोसिन, कोनियम और आस्टेरियस से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्क्रौफ्युलैरिया नोडोसा औषधि का मूलार्क या 1 शक्ति देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल ठीक हो जाता है।
स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा Scutellaria Lateriflora
स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा औषधि को एक स्नायुप्रशामक औषधि माना जाता है। ये औषधि हृदय क्षोभ (कार्डीएक इर्रिटेबीलिटीद) (दिल में सूजन आना), लास्य (कोरिया), स्नायुक्षोभ तथा बच्चे के दान्त निकलते समय आने वाले बेहोशी, मांसपेशियों का फैलना, इन्फ्लुएंजा (एक तरह का बुखार) के आने के बाद स्नायविक कमजोरी आदि रोगों में भी ये औषधि अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा औषधि का उपयोग-
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बिल्कुल भी नींद न आना, अगर रोगी को नींद आ भी जाती है तो वह अचानक सोते-सोते जाग उठता है, रोगी को नींद में डरावने से सपने आते हैं, निशा-भीती (रात के समय डर लगना) आदि लक्षणों में रोगी को स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
पुरुष रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी का वीर्य अपने आप ही निकल जाने के कारण उसमे वीर्य की कमी हो जाती है जिसके कारण रोगी को नपुसंकता का रोग हो जाता है, इसी कारण से रोगी को ये डर भी लगता है कि वह कभी ठीक नहीं हो पाएगा। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा औषधि देने से लाभ मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी के आमाशय में बहुत तेजी से दर्द का होना, हर समय रोगी का जी मिचलाता रहता है। रोगी को खट्टी डकारें आती रहती हैं। रोगी को इतनी हिचकी आती है कि उसका खाना-पीना मुश्किल हो जाता है। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा औषधि का प्रयोग कराना उचित रहता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पेट में गैस बनने के कारण पेट का फूल जाना। पूर्णता और स्फीति। रोगी को होने वाला शूल प्रकृति का दर्द और बेचैनी। रोगी को बहुत ज्यादा हल्के रंग के दस्त आना जैसे लक्षणों में रोगी को स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा औषधि देने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के माथे में धीरे-धीरे से होने वाला दर्द। रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसकी आंखें बाहर की ओर निकल रही हैं। निशा-भीती (रात के समय डर लगना)। रोगी के आधे सिर में दर्द होना जो खासकर दाईं आंख के ऊपर होता है, रोगी को सोते हुए बार-बार नींद टूटना और डरावने से सपने आना। जिसके कारण रोगी को रात में उठकर घूमना पड़ता है। अक्षिगोलकों में दर्द होना। ज्यादा शोर-शराबे के कारण होने वाला सिर का दर्द इसके साथ ही बार-बार पेशाब का आना। उल्टी आने के कारण सिर में दर्द होना जो शोर-शराबे से, बदबू से, किसी चीज को लगातार देखते रहने से हो जाता है। इस तरह के लक्षणें में अगर रोगी को स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा औषधि दी जाए तो इसके सेवन से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी को हर समय यह डर लगा रहता है कि उसके ऊपर कोई भारी मुसीबत आने वाली है। रोगी किसी भी काम को सोचने-समझने के लिए अपने दिमाग को एक जगह नहीं लगा सकता, रोगी को हर समय दिमाग में अजीब-अजीब से विचार आते रहते हैं आदि लक्षणों में रोगी को स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के शरीर के ऊपर के अंगों में बहुत तेज किसी जहरीले कीड़े के डंक मारने जैसा दर्द होना। रात को सोते समय बेचैनी महसूस होना। रोगी को अपने शरीर में दर्द के साथ कमजोरी महसूस होना। मांसपेशियों का कंपन जिसके कारण रोगी को मजबूरी में हिलना-डुलना पड़ता है। रोगी के शरीर का अपने आप ही कांपना जैसे लक्षणों में रोगी को स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा औषधि का प्रयोग कराना काफी अच्छा रहता है।
तुलना-
स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा औषधि की तुलना साइप्रिपी और लाइकोपस से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्कुटेल्लैरिया लैटेरिफ्लोरा औषधि का मूलार्क या निम्न शक्तियों का नियमित सेवन कराने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया (एर्गट) Sicale Cornutum-Claviceps Purpurea (Ergot)
सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि बूढ़े, कमजोर, मुरझाए चेहरे के, त्वचा पर झुर्रियां पड़े हुए व्यक्तियों के लिए बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा का बिल्कुल सुन्न हो जाना, रोगी की त्वचा पर नीले रंग के छोटे-छोटे से निशानों का पड़ना, त्वचा का रंग नीला पड़ जाना, रोगी को अपनी त्वचा पर ऐसा महसूस होना जैसे कि पूरे शरीर पर चींटियां सी रेंग रही हो। हाथ-पैरों की त्वचा का बिल्कुल सूख सा जाना। रोगी को अपनी त्वचा पर जलन सी महसूस होना जिसमे ठण्डे स्पर्श से आराम आता है। रोगी अपने शरीर के अंगों को ढककर नहीं रखना चाहता। रोगी की त्वचा पर होने वाले छोटे-छोटे जख्मों से भी खून बहा करता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत ज्यादा ठण्ड सी लगना। रोगी को ठण्डा, चिपचिपा सा पसीना आना। बुखार के दौरान रोगी को बार-बार प्यास सी लगना। रोगी की त्वचा सूख सी जाना। रोगी को शरीर के अंदर गर्मी सी महसूस होना जैसे लक्षणों में रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि का सेवन कराना बहुत लाभकारी रहता है।
पेशाब से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पेशाब की नली में लकवा सा मार जाना। पेशाब में रुकावट सी पैदा होना। रोगी को ऐसा महसूस होना जैसे कि उसको पेशाब आ रहा हो लेकिन पेशाब करने जाने पर काफी देर तक रोगी को पेशाब नहीं आता। रोगी के पेशाब की नली से काले रंग के स्राव का आना, बूढ़े लोगों का बिस्तर पर पेशाब निकल जाना जैसे लक्षणों में रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत तेज भूख लगना इतनी कि अगर रोगी ने अभी पेट भरकर खाना खाया है तो उसके कुछ देर के बाद वह फिर भूख-भूख चिल्लाने लगता है, रोगी को बार-बार प्यास लगती है, रोगी का मन ऐसा करता है जैसे कि उसे सिर्फ खट्टे पदार्थ खिलाए जाए, रोगी को बार-बार हिचकी आती रहती है, जी मिचलाता रहता है, रोगी को खून और काफी के तलछट जैसी उल्टी होना, रोगी के आमाशय और पेट में जलन होना, पेट का फूल जाना, रोगी को बदबूदार डकारे आना जैसे लक्षणों में रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी की जीभ का सूख जाना, जीभ का फट जाना, जिसमें से स्याही के जैसा खून निकलता है, जीभ पर गाढ़ी सी परत का जमना, जीभ का सूज जाने के कारण उसमे लकवा सा मार जाना, जीभ की नोक में चुनचुनी जो सख्त सी रहती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि का सेवन कराना बहुत ही लाभकारी रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- रोगी के चेहरे का रंग बिल्कुल फीका पड़ जाना, चेहरे का कमजोरी के कारण अंदर की ओर घुस जाना, बायंटों का चेहरे से शुरू होकर पूरे शरीर में फैल जाना, रोगी के चेहरे पर नीले-नीले निशान से पड़ जाना आदि लक्षणों में रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि का प्रयोग कराना उचित रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण:- रोगी की आंखों की पुतलियों का फैल जाना, बुढ़ापे में महिलाओं को होने वाला शुरूआती मोतियाबिंद, आंखों का अंदर की ओर धंस जाना, आंखों के आसपास के भाग में काले-काले निशान पड़ जाना जैसे लक्षणों में रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि देने से रोगी ठीक हो जाता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर का बिल्कुल ऐसा महसूस होना जैसे कि वो है ही नही, सिर में खून जमा होने के कारण सिर का दर्द जो सिर के पीछे के भाग से उठता है इसके साथ ही चेहरे का रंग बिल्कुल फीका पड़ जाना, रोगी का अपना सिर पीछे की ओर खिंचता हुआ सा महसूस होता है, बालों का कम उम्र में ही सफेद हो जाना, बालों का झड़ जाना, रोगी की नाक से हर समय काला-काला सा खून निकलता रहता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि का सेवन कराना बहुत ही लाभदायक साबित होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी के दिल में दर्द सा होना, रोगी को अपनी छाती में दबाव महसूस होता है और सांस लेने में परेशानी होती है इसके साथ ही रोगी के मध्यछंन्द (दिल के बीच का हिस्सा) में ऐंठन सी होना, रोगी को अपनी छाती में इतनी तेजी से दर्द होता है कि उसे लगता है कि कोई किसी नुकीली चीज से छाती में सुराख कर रहा हो, दिल की धड़कन का अनियमित होना जैसे कि कभी कम तो कभी तेज होना, नाड़ी का रूक-रूककर चलना आदि लक्षणों में रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी को इतनी गहरी नींद आती है कि उसके कान के आसपास जोर-जोर से चिल्लाते रहो वो फिर भी नींद से नही उठता, रोगी को सोते समय भयानक से सपनों का आना, किसी तरह का नशा करने के कारण नशेड़ी लोगों को नींद ना आना, रोगी को रात के समय नींद ना आना जैसे लक्षणों में रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि का सेवन कराना उचित रहता है।
मल से सम्बंधित लक्षण- रोगी को आने वाला मल जो हरे रंग का, पतला, बदबूदार, खून के साथ आता है, बिना इच्छा के मल का आना, जिसमे मल कब निकल जाता है रोगी को भी ये पता नही होता, मलक्रिया के बाद रोगी को अपने शरीर में बहुत ज्यादा थकान सी महसूस होना, रोगी को अपना मलद्वार बहुत ज्यादा खुला हुआ सा महसूस होना। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी स्त्री को मासिकस्राव के समय दर्द होने के साथ-साथ बहुत ज्यादा ठण्ड का लगना, दुबले-पतले शरीर की महिलाओं को होने वाला हल्का रक्तस्राव, स्त्री को गर्भाशय में जलन के साथ होने वाला दर्द, प्रदर-स्राव (योनि में से पानी का आना) कत्थई रंग का, बदबू के साथ आना, मासिकस्राव का अनियमित, बहुत ज्यादा मात्रा में, गाढ़े रंग का आना, स्त्री को दूसरे मासिकस्राव तक लगातार पानी जैसा खून निकलता रहता है, गर्भवती स्त्री को तीसरे महीने के आसपास गर्भस्राव की आशंका रहती है, बच्चे को जन्म देते समय होने वाला दर्द, स्तनों में दूध का रूक जाना, रोगी स्त्री का पेट फूल जाना, सूतिस्राव काले रंग का और बदबू के साथ आना, स्त्री का पेशाब बंद हो जाना, बच्चे को जन्म देने के बाद होने वाला बुखार (सूतिकाज्वर) जैसे लक्षणों में सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
प्रतिविष-
कैम्फर, ओपियम औषधि का उपयोग सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
वृद्धि-
गर्मी से या रजाई की गर्मी से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
ठण्डी हवा लगने से, रोग का स्थान खुला रहने से रगड़ने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि की तुलना एर्गोटिन, पेडिक्युलैरिस कैनाडेन्सिस, ब्रेसिका नैपस, सिनामोन, काल्चि, आर्से, औरम-म्यूरि, एग्रोस्टेमा, अस्टिलैगो, से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सीकेल कौर्नूटम-क्लैविसेप्स पर्प्यूरिया औषधि की 1 से 30 शक्ति तक देने से रोगी बिल्कुल ठीक हो जाता है।
सेडम ऐक्रे Sedum Acre
सेडम ऐक्रे औषधि खूनी बवासीर के कारण होने वाले दर्द जैसा दर्द मलद्वार में दरारे पड़ने से पैदा होता है, संकोचक दर्द, रोगी के मलत्याग के कुछ समय के बाद मलद्वार में बहुत ज्यादा दरारें जैसे रोगों में लाभदायक साबित होती है।
तुलना-
सेडम ऐक्रे औषधि की तुलना म्यूकना, यूरेन्स, सेडम टेलीफियम, सेडम रेपेन्स-सेडम आल्पेस्टर ये की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सेडम ऐक्रे औषधि की मूलार्क या 6 शक्ति तक देने से रोगी कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।
सेलेनियम Selenium
सेलेनियम औषधि उन रोगियों के लिए बहुत उपयोगी मानी जाती है जो व्यक्ति जवानी के जोश में आकर अपने वीर्य को समय से पहले ही समाप्त कर चुके होते हैं और संभोगक्रिया के समय पूरी तरह सफल नहीं हो पाते। इसके अलावा शारीरिक और दिमागी थकान, बुढ़ापे में, टी.बी रोग के बाद कमजोरी आने में भी ये औषधि लाभकारी मानी जाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सेलेनियम औषधि से होने वाले लाभ-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सिर में इस तरह का चक्कर आता है जैसे कि व्यक्ति ने बहुत ज्यादा शराब पी रखी हो और वह नशे में हो। पुराने शराब पीने वाले लोगों के सिर में दर्द, रोगी जब कंघी करता है तो उसके सिर के बाल झड़ने लगते हैं, इसी के साथ ही गलमुच्छे और जननेन्द्रिय के ऊपर के बाल भी झड़ने लगते हैं। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेलेनियम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी को टी.बी के रोग हो जाने के कारण पैदा हुई आवाज की नली की शुरुआती जलन, रोगी के रोजाना सुबह खंखारने पर पारदर्शी बलगम के ढेले निकलते रहते हैं, रोगी के गले में खराश सी होना, सुबह के समय खांसी के साथ खून वाला बलगम आना, गाना गाने वाले लोगों की गले की खराबी जैसे लक्षणों में रोगी को सेलेनियम औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- रोगी के कान के अंदर मैल जम जाने के कारण रोगी को सुनाई न देने जैसे लक्षणों में सेलेनियम औषधि का सेवन बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- जिगर के रोग होने के कारण जिगर में दर्द होना और इसी के साथ ही जिगर पर छोटे-छोटे से दाने निकलना, पुराना कब्ज होना, मल सख्त और मलान्त्र के अंदर जमा हो जाता है। इन लक्षणों में रोगी को सेलेनियम औषधि देना बहुत ही लाभकारी रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी की नाक के अंदर इतनी तेज खुजली होती है कि रोगी को न चाहते हुए भी बार-बार अपनी उंगली को नाक में डालना पड़ता है, रोगी को जुकाम होने के बाद बहुत पतले दस्त आते हैं। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेलेनियम औषधि का सेवन कराना काफी लाभदायक साबित होता है।
मल से सम्बंधित लक्षण- मल का बड़ी ही मुश्किल से आना और मलत्याग के बाद रोगी के मलद्वार से खून का आना, रोगी को मल इतना सख्त आता है कि रोगी को मलत्याग के दौरान उंगली डालकर मल को बाहर निकलना पड़ता है, रोगी को टाइफाइड का बुखार होने के बाद अक्सर इस तरह की परेशानी पैदा हो जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेलेनियम औषधि देना लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी का मन ऐसा करता है कि वह बहुत तेज शराब का सेवन करें। शक्कर, नमकीन खाना, चाय और कोल्ड ड्रिंक पीने से आमाशय का रोग बढ़ जाता है। रोगी को रात के समय बहुत तेज भूख लगती है आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सेलेनियम औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पेशाब करने के बाद या मलत्याग के बाद, चलते समय पेशाब बूंद-बूंद करके टपकता रहता है, इसी तरह बैठे रहने पर भी पेशाब बूंद-बूंद टपकता रहता है, रोगी को पेशाब के साथ लाल तलछट जम जाता है, रोगी को शाम के समय पेशाब कम मात्रा में और गाढ़ा आता है। इन लक्षणों में रोगी को सेलेनियम औषधि देना बहुत ही लाभकारी रहता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण- अपनी जवानी में ज्यादा यौन क्रियाओं में लिप्त रहने के कारण रोगी को नपुसंकता का रोग हो जाना। स्त्री के साथ संभोगक्रिया करने के बाद रोगी का चिड़चिड़ा हो जाना। सोते समय रोगी का वीर्य अपने आप ही निकल जाना। मन में संभोग करने की इच्छा तेज होना लेकिन संभोग करते समय लिंग का उत्तेजित न होना, वीर्य का पतला हो जाना, अंडकोषों में पानी भर जाना तथा संभोगक्रिया सम्बंधी स्नायुदौर्बल्य आदि लक्षणों में रोगी को सेलेनियम औषधि देने से बहुत लाभ मिलता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की हथेली में सूखे, पपड़ीदार फुंसियों के उत्पन्न होने के साथ ही खुजली होना। रोगी के टखनों और चमड़ी की परत के आस-पास तथा उंगलियों के बीच में खुजली सी होना। रोगी की पलकों के, दाढ़ी के और जननेन्द्रियों के बाल झड़ने लगते हैं। उंगलियों के जोड़ों के आसपास, उंगलियों के बीच में और हथेलियों में खुजली होना। उंगलियों के बीच में फफोले से पड़ना। चेहरे पर मुहांसे निकलना। त्वचा पर काले निशान पड़ने के साथ तेल सा जम जाना आदि लक्षणों में रोगी को सेलेनियम औषधि देने से लाभ मिलता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सुबह उठने पर पीठ के नीचे वाले भाग में लकवा मार जाने जैसा दर्द होना, रात के समय रोगी के हाथों में बहुत तेजी से होने वाला दर्द जैसे लक्षणों में रोगी को सेलेनियम औषधि का सेवन कराना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पूरे शरीर की खून की नलियों में कंपन होने के कारण पूरी रात सो न पाना। पेट में बहुत जलन होती है। आधी रात तक रोगी जितनी भी कोशिश कर ले सो नहीं पाता है लेकिन सुबह के समय अंधेरे में ही रोगी की आंख रोजाना एक ही समय पर खुल जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेलेनियम औषधि देना बहुत ही लाभकारी रहता है।
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी के मन में यौन सम्बंधी विचार आने के साथ ही रोगी का वीर्य निकल जाना। रोगी जरा सा भी दिमाग का काम कर ले उसे थकान सी हो जाती है। रोगी हर समय उदास सा ही बैठा रहता है। रोगी के मन में कभी न मिटने वाली निराशा पैदा हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को सेलेनियम औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
प्रतिविष-
इग्ने, पल्सा आदि औषधियों का उपयोग सेलेनियम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
प्रतिकूल-
चायना, मदिरा।
वृद्धि-
हवा के झोंके से, धूप में, गर्म दिनों में, कोल्ड ड्रिंक, चाय या शराब, नींद के बाद रोग बढ़ जाता है।
शमन-
ठण्डी हवा या ठण्डा पानी मुंह में लेने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
सेलेनियम औषधि की तुलना ऐग्नस, कैलैडि, सल्फ, टेलूरि, फास्फो-ए से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सेलेनियम औषधि की 6 शक्ति से लेकर 30 शक्ति तक देने से कुछ ही समय में रोगी ठीक हो जाता है।
सेम्परवाइवम टेक्टोरम Sempervivum Tectorum
सेम्परवाइवम टेक्टोरम औषधि को मुंह के जख्म को दूर करने के लिए उपयोग में लाया जाता है। इसके अलावा स्त्रियों के स्तनों में होने वाले कैंसर, बवासीर आदि रोगों में भी ये औषधि बहुत लाभ करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सेम्परवाइवम टेक्टोरम औषधि का उपयोग-
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी की जीभ में जख्म बन जाने के कारण जीभ से खून निकलना, मुंह के अंदर गहरे जख्म होना, रात के समय जीभ के जख्म में बहुत तेजी से दर्द का होना, जीभ का कैंसर बन जाना, मुंह इतना नाजुक अवस्था में पहुंच जाता है कि उस पर हाथ लगाते ही दर्द होने लगता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेम्परवाइवम टेक्टोरम औषधि देने से लाभ मिलता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा पर छाले से निकल जाना, त्वचा के ऊपर दानेदार, पीवयुक्त फुंसियां, रोगी के शरीर पर मस्से और घट्टे से निकल जाना, त्वचा का तमतमाना और दंशज वेदनाएं आदि लक्षणों में रोगी को सेम्परवाइवम टेक्टोरम औषधि को सेवन कराना लाभकारी रहता है।
तुलना-
सेम्परवाइवम टेक्टोरम औषधि की तुलना फाइकस कैरिका, सेडम ऐक्रे, ऑक्जेलिस ऐसीटोसेल्ला-वूड, कोटा-इलेडन से किया जा सकता है।
मात्रा-
रोगी को सेम्परवाइवम टेक्टोरम औषधि का मूलार्क या 2 शक्ति तक देना लाभकारी रहता है।
सेनेशियो औरियस Senecio Aureus
सेनेशियो औरियस औषधि को स्त्रियों के मासिकधर्म सम्बंधी रोगों के उपचार के लिए बहुत ही असरकारक औषधि माना जाता है। जिन लड़कियों का मासिकधर्म पहली बार आता है उनको मासिकधर्म सम्बंधी परेशानियों से बचने के लिए इसी औषधि का इस्तेमाल करना चाहिए।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सेनेशियो औरियस औषधि से होने वाले लाभ-
मन से सम्बंधित लक्षण- मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी कभी भी एक बात को दिमाग को एक जगह लगाकर सोंच नहीं सकता, रोगी का बहुत ज्यादा स्नायविक और चिड़चिड़ा हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को सेनेशियो औरियस औषधि देने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर में धीरे-धीरे से सिर को जमा देने वाला सिर का दर्द, पश्चकपाल (औसीपुटज) (खोपड़ी के पीछे के भाग में) से लेकर अग्रोपरिशीर्श (सिंसीपुट) तक बहुत तेज चक्कर आना, बाईं आंख के ऊपर, कनपटी की बाईं तरफ अंदर की ओर फैलता हुआ तेज दर्द, नासापथों की पूर्णता, जलन और बहुत ज्यादा छीकें आना, नाक से बहुत ज्यादा स्राव का आना जैसे लक्षणों में रोगी को सेनेशियो औरियस औषधि देना बहुत उपयोगी साबित होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सुबह उठने पर जी मिचलाता रहता है, रोगी को पूरे दिन खट्टी डकारें आती रहती हैं, रोगी के पेट में दर्द और मरोड़ होते रहते हैं जो सामने की ओर झुकने पर ठीक हो जाते हैं, रोगी को पानी की तरह गहरे रंग के दस्त होना आदि लक्षणों में रोगी को सेनेशियो औरियस औषधि का सेवन कराना उचित रहता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी की नाभि के चारों ओर होने वाला दर्द जो पूरे पेट पर फैल जाता है, इस दर्द में मलत्याग के बाद आराम आता है, रोगी को पतला, पानी के जैसे दस्त आना, रोगी को मलत्याग के लिए बहुत ज्यादा जोर लगाना पड़ता है, मल के साथ खून , पतला, काला आने के साथ ही कूथन आदि लक्षणों में सेनेशियो औरियस औषधि का सेवन लाभकारी रहता है।
पुरुष से सम्बंधित लक्षण- रोगी को रात में सोते समय गंदे सपने आना और इसी के साथ ही अपने आप रोगी का वीर्य निकल जाना, पुर:स्थग्रंथि बढ़ी हुई, वृषणग्रंथि में धीरे से, भारी प्रकृति का दर्द जो अंडकोषों तक फैल जाता है। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को सेनेशियो औरियस औषधि देने से रोगी कुछ ही समय में ठीक हो जाता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- पेशाब का कम मात्रा में, गहरे रंग का, रक्ताक्त, बहुत ज्यादा स्राव और कूथन के साथ आना। बहुत ज्यादा ताप और बार-बार पेशाब का आना। गुर्दो में होने वाली जलन। बच्चों का उपदाहित मूत्राशय के साथ ही सिर में दर्द होना। गुर्दो में दर्द होना आदि लक्षणों में आधार पर रोगी को सेनेशियो औरियस औषधि देने से बहुत लाभ मिलता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्री का मासिकस्राव समय से काफी बाद में आना। मासिकस्राव का रुक जाना। स्त्रियों का मासिकस्राव आने से पहले गले, छाती और मूत्राशय में जलन होना। मासिकस्राव शुरु होते ही स्त्री को आराम आने लगता है। स्त्री में खून की कमी होने के कारण मासिकस्राव आने के समय कष्ट होना और इसी के साथ ही मूत्रयंत्रों के उपसर्ग। मासिकस्राव का समय से पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में आना जैसे लक्षणों में रोगी स्त्री को सेनेशियो औरियस औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी की सांस की नली के ऊपर के रास्ते में बहुत तेज जलन होना, रोगी के गले में खराश सी होना, रोगी को खांसी के साथ बलगम आना और सांस लेने में परेशानी होना, रोगी के ऊपर की तरफ या सीढ़ियों में चढ़ते समय सांस लेने में परेशानी होना, रोगी को होने वाली सूखी खांसी, रोगी की छाती में सूचीवेधी दर्द आदि लक्षणों में रोगी को सेनेशियो औरियस औषधि देना बहुत ही लाभकारी रहता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी को गला और मुंह बहुत ज्यादा सूखा हुआ सा महसूस होना, भोजन करने की नली में जलन होना, नासा-ग्रसनी (नाक की नली) में कच्चापन सा महसूस होना, रोगी को बलगम निगलने के लिए मजबूर होना पड़ता है जबकि इसमें रोगी को बहुत ज्यादा परेशानी होती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेनेशियो औरियस औषधि का सेवन कराना बहुत ही लाभकारी रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- रोगी के दान्त बहुत ही नाजुक से हो जाना, बाईं तरफ बहुत तेजी से काटता हुआ दर्द, गलकोश, मुंह के अंदर और गले के अंदर सूखापन सा महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को सेनेशियो औरियस औषधि का सेवन कराना उचित रहता है।
वृद्धि-
ज्यादातर रोजाना दोपहर के बाद रोगी के सारे रोग बढने लग जाते हैं।
तुलना-
सेनेशियो औरियस औषधि की तुलना सेनेशिओ जैकोबिया, आलेट्रिस, कौलोफा, कैल्क, कार्ब, हेलोन, फास, पल्स, सैंग्वि और सिपि के साथ की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सेनेशियो औरियस औषधि का मूलार्क या 3 शक्ति देने से रोगी कुछ ही समय में अच्छा हो जाता है।
सेनेगा Senega
सेनेगा औषधि फेफड़ों में होने वाले रोगों में बहुत अच्छा असर डालती है। दमे के रोग में जब रोगी की सांस लेने की नली में बलगम जमा हो जाता है और रोगी खांसते-खांसते परेशान हो जाता है तथा इस बलगम को बाहर निकालने में रोगी को बहुत परेशानी होती है, उस समय इस औषधि को प्रयोग करने से बहुत आराम आता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सेनेगा औषधि से होने वाले लाभ-
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी को आंखों से कुछ भी साफ-साफ नज़र नहीं आता है। रोगी जैसे ही कुछ भी लिखने या पढ़ने बैठता है तो उसकी आंखों में जलन होने लगती है। आंखों की पलकों में जलन होना। रोगी को आंखों से देखने पर हर चीज दो-दो नज़र आने लगती हैं। आंखों में से हर समय पानी सा निकलते रहना। रोगी को आंखों के सामने हर समय चिंगारियां सी नाचती हुई नज़र आती है। पलकों का लटक जाना जैसे लक्षणों में रोगी को सेनेगा औषधि का सेवन कराना उचित रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- रोगी के चेहरे के बाईं तरफ के भाग में लकवा सा मार जाना, चेहरे पर जलन होना, रोगी के मुंह और होंठों के कोणों में जलन पैदा करने वाले छालों का होना। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेनेगा औषधि देना बहुत ही लाभकारी रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी के गले का बिल्कुल सूख जाना। रोगी अगर किसी से बात करता है तो उसको बात करने में बहुत परेशानी होती है। रोगी अगर खांसता है तो उसकी पीठ में दर्द होता है। ठण्ड के मौसम में आवाज की नली में ठण्ड होने के कारण आवाज का बंद हो जाना। रोगी को बार-बार उठने वाली खांसी, जो छींके आने के बाद बंद होती है। रोगी को अपनी छाती बहुत ज्यादा सिकुड़ी हुई महसूस होती है। रोगी की छाती में गड़गड़ाहट होना। किसी ऊंचे स्थान पर चढ़ते समय रोगी को अपनी छाती में दबाव सा महसूस होता है। बूढ़ों को आने वाला सख्त बलगम जो बहुत ही मुश्किल से बाहर निकलता है। बूढ़े लोगों में कमजोरी आने के कारण सांस की नली में जलन के साथ ही चिर अन्तरालीय गुर्दों की जलन या छाती की दीर्घस्थायी वायुस्फीति। छाती में पानी भर जाना। रोगी की छाती में दबाव जैसे कि कोई फेफड़े को पीछे की रीढ़ की हड्डी तक धकेले जा रहा हो। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेनेगा औषधि देने से आराम मिलता है।
पेशाब से सम्बंधित लक्षण- पेशाब का बहुत कम मात्रा में आना। पेशाब के साथ झिल्ली के टुकड़े और श्लेष्मा का बहुत ज्यादा मात्रा में आना। पेशाब करने से पहले और उसके बाद पेशाब की नली में बहुत तेजी से होने वाली जलन। रोगी की पीठ और गुर्दों के भाग में फट पड़ने जैसा दर्द आदि लक्षणों में रोगी को सेनेगा औषधि का सेवन कराना बहुत ही लाभकारी रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी की नाक का बिल्कुल सूख जाना। रोगी को सर्दी के कारण जुकाम। रोगी को बार-बार छींके आती रहना। नाक के नथुनों में जैसे मिर्च जैसी जलन होना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को सेनेगा औषधि का सेवन कराना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
वृद्धि-
शाम के समय, आराम करते समय, बहुत देर तक एक ही चीज को लगातार देखते रहने से, खुली हवा में, ठण्डी सांस लेने पर, दबाने से, छूने से और रात के समय रोग बढ़ जाता है।
शमन-
किसी तरह की हरकत करने से, सिर को पीछे की ओर झुकाने से, मोड़ने से या पसीना आने पर रोग कम हो जाता है।
तुलना-
सेनेगा औषधि की तुलना कास्टिक, , सैपोनीन, नेपेटा कैटैरिया से की जा सकती है।
पूरक-
प्रतिविष-
आर्नि, बेल, ब्राय, कैम्फ औषधियों का प्रयोग सेनेगा औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
मात्रा-
रोगी को सेनेगा औषधि का मूलार्क या 30 शक्ति तक देने से रोगी ठीक हो जाता है।
सेंगुइनेरिया केनेडेंसिस Sengunerea Cendensis
रोगी के दाएं कंधे और भुजाओं में बहुत तेजी से दर्द होता है ये दर्द रात को सोते समय बिस्तर पर लेटने पर और ज्यादा बढ़ जाता है जिसके कारण रोगी अपनी भुजा को भी नहीं उठा सकता, शरीर में कम मांस वाले स्थानों में दर्द का उठना, छाती की हड्डी के पिछले भाग में खिंचाव और ताप सा महसूस होना, रोगी को रात और दिन में खांसी होना, शरीर का बहुत ज्यादा कमजोर हो जाना, रोगी को तेज रोशनी और ज्यादा शोर-शराबे से परेशानी पैदा हो जाना, छाती में जलन के साथ दबाव सा पड़ना और इसके तुरंत बाद ही पेट में गर्मी सी महसूस होना और रोगी को दस्त हो जाना आदि लक्षणों में सेंगुइनेरिया केनेडेंसिस को प्रयोग करने से रोगी जल्दी ही ठीक हो जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सेंगुइनेरिया केनेडेंसिस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी को उल्टी होने के साथ ही सिरदर्द होना जो सिर के पीछे वाले हिस्से से शुरू होता है तथा सिर में ऊपर की ओर बढ़ते हुए दाईं आंख पर जाकर रुक जाता है। इस तरह के लक्षणों के आधार पर रोगी को सेंगुइनेरिया केनेडेंसिस औषधि का सेवन कराना बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को गीली खांसी के साथ बदबूदार बलगम आना, रोगी की छाती की हड्डी के पीछे दर्द होना, रोगी को सांस लेने में परेशानी होना, रोगी के गालों पर लाल-लाल से निशानों का पड़ना जो ज्यादातर निमोनिया के बुखार के लक्षण होते हैं। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेंगुइनेरिया केनेडेंसिस औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
मात्रा-
रोगी को सेंगुइनेरिया केनेडेंसिस औषधि की 200 शक्ति तक देने से रोगी को बहुत लाभ मिलता है।
सेन्ना (सरनाय- सेना) Senna (Cassia Acutifolia)
सेन्ना औषधि को बच्चों को होने वाले रोग को दूर करने में बहुत ही चमक्तकारी औषधि माना जाता है। अगर कोई व्यक्ति पहले बहुत हष्ट-पुष्ट है और किसी रोग के कारण वह कमजोर हो जाता है तो उसकी कमजोरी को दूर करने में भी ये औषधि बहुत अच्छे टॉनिक का काम भी करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सेन्ना औषधि से होने वाले लाभ-
मल से सम्बंधित लक्षण- रोगी को मलत्याग से पहले इस तरह का दर्द होना जैसे कि कोई मलद्वार को नाखूनों से नोंच रहा हो। मल का पानी की तरह पीले रंग का आना। मलक्रिया समाप्त होने के बाद भी रोगी को पूरी तरह से संतोष न आना। रोगी को मलान्त्र में जलन होने के बाद पेशाब की नली में भी कूथन के कारण दर्द होना। रोगी के पेट में कब्ज होने के साथ ही पेट में दर्द होना और गैस भरना। जिगर का बढ़ जाना जिसमें छूते ही दर्द होने लगता है। मल का सख्त, काले रंग का आना। रोगी की भूख बिल्कुल समाप्त हो जाना। रोगी की जीभ पर मोटी सी परत का जम जाना। रोगी के मुंह का स्वाद बिल्कुल खराब हो जाना और रोगी के शरीर में कमजोरी आ जाना जैसे लक्षणों में अगर रोगी को सेन्ना औषधि दी जाए तो उसको बहुत लाभ होता है।
मूत्र (पेशाब से सम्बंधित लक्षण)- रोगी को बार-बार पेशाब आना, पेशाब का विशिष्ट गुरुत्व और घनत्व बढ़ा हुआ, पेशाब में बहुत ज्यादा मात्रा में अम्ल, फौस्फेट्स, एसीटोन तथा आक्जैलेट्स का आना जैसे लक्षणों में रोगी को सेन्ना औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
प्रतिविष-
नक्स, कमो औषधि का उपयोग सेन्ना औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
तुलना-
मात्रा-
रोगी को सेन्ना औषधि की 3 से 6 शक्ति तक देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
सीपिया Sepia
सीपिया औषधि को स्त्री रोगों की एक बहुत ही लाभकारी औषधि माना जाता है। ये औषधि स्त्रियों की गर्भाशय की खराबियों को पूरी तरह से समाप्त करने में बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सीपिया औषधि से होने वाले लाभ-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी का मन बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाना, छोटी-छोटी बातों पर ही रोगी का रोने लगना, हर समय उदास सा बैठे रहना, रोगी को हमेशा डर सा लगा रहना कि उसके साथ किसी प्रकार की दुर्घटना न हो जाए, हर काम को करने में लापरवाही बरतते रहना, रोगी को हर बात की जिद् करना, जरा सा भी शोर-शराबा होते ही रोगी का दिमाग परेशान हो जाना, रोगी का हर समय अपने आप से ही बातें करते रहना, भूत-प्रेतों के बारे में बाते करते रहना, रोगी का छोटी-छोटी बातों पर दूसरों से लड़ने लगना, अपने जीवन को बिल्कुल बेकार सा समझते रहना जैसे मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी को सीपिया औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों की पेशियों के कमजोर हो जाने के कारण आंखों की रोशनी कम हो जाना, आंखों के सामने काले धब्बे से नज़र आना, आंखों में जलन होने के कारण आंखों की रोशनी कमजोर हो जाना जिनका सम्बंध गर्भाशय के रोगों से होता है, आंखों के रोग सुबह और शाम के समय बढ़ते है। पलकों पर किसी तरह का फोड़ा हो जाना, पलकों का लटक जाना, आंखों के पीछे के भाग में खून का जमा हो जाना जैसे लक्षणों में रोगी को सीपिया औषधि देना लाभकारी रहता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपना सिर घूमता हुआ सा महसूस होना, रोगी को ऐसा लगता है जैसे कि सिर में कुछ लुढ़क रहा हो, दर्द जो ज्यादातर बाईं ओर या माथे में अंदर से बाहर की ओर तथा ऊपर की ओर डंक के लगने जैसा दर्द होना, इसके साथ ही जी का मिचलाना, घर के बाहर और रोग वाले अंगों के बल लेटने से उल्टी का हो जाना, सिर में पीछे और सामने की तरफ झटके से लगना, माथे के ऊपर के भाग में ठण्डक सी महसूस होना, स्त्री को मासिकस्राव के दौरान सिर में झटके लगने के साथ सिर में दर्द होना, इसके साथ ही मासिकस्राव का कम आना, बालों का झड़ जाना, माथे पर बालों के आसपास के भाग में फुंसियां सी होना आदि लक्षणों में रोगी को सीपिया औषधि का प्रयोग कराना लाभकारी रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी को जुकाम हो जाने के कारण बार-बार छींके आते रहना, रोगी की नाक में से गाढ़ा सा हरे रंग का स्राव आते रहना, नाक में पपड़ियां सी जम जाना, नाक के आरपार पीले रंग का दाग सा हो जाना, नाक की जड़ में दर्द सा होना, नाक का जुकाम हो जाने के कारण चिर सा जाना खासकर नाक के पीछे के छेदों में, रोगी को बार-बार मुंह से बलगम को खखारकर निकालना पड़ता है। इन लक्षणों में अगर रोगी को सीपिया औषधि दी जाए तो काफी उपयोगी साबित होती है।
कान से सम्बंधित लक्षण- कानों के अंदर खुजली होना, कान के अंदर के भाग में से गाढ़ा, पीले रंग का, बदबू के साथ मवाद का आना, रोगी के कानों के पीछे ग्रीवासंधि (गर्दन के जोड़ पर) में दर्द सा होना, कान में सूजन आना और उस पर विकार होना, अधस्त्वक व्रणग्रस्तता (सबक्युटैन्युओस अल्सटेशन) की तरह दर्द का होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सीपिया औषधि का सेवन करना लाभकारी रहता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- चेहरे का बिल्कुल मुरझा सा जाना, चेहरे पर पीले रंग के से धब्बे होना, रोगी के नाक और गालो के ऊपर कत्थई रंग के से धब्बे पैदा होना जैसे लक्षणों में रोगी को सीपिया औषधि का सेवन कराना बहुत ही लाभदायक सिद्ध होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी की जीभ का बिल्कुल सफेद हो जाना, रोगी के मुंह का स्वाद बिल्कुल खराब हो जाना, जीभ का गंदा होना जो मासिकस्राव के दौरान साफ हो जाती है। नीचे के होंठ का सूज जाना और फट जाना, रोगी को शाम के 6 बजे से आधी रात के बीच में दांत में दर्द होता है जो लेटने पर और तेज हो जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सीपिया औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपना आमाशय बिल्कुल खाली सा महसूस होना जो भोजन करने से भी भरा हुआ महसूस नही होता, भोजन की खुशबू या देखने से ही जी मिचलाने लगता है। तंबाकू का सेवन करने के कारण बदहजमी का रोग हो जाना, रोगी को खाने की हर चीज का स्वाद बहुत नमकीन सा लगता है। रोगी जैसे ही भोजन करता है उसको उल्टी होने लगती है। पाचनसंस्थान में जलन सी महसूस होना, रोगी का मन ऐसा करना कि उसे हर समय खट्टे पदार्थ खाने को मिलते रहे, रोगी को बार-बार खट्टी डकारे आना, चिकनाई वाले पदार्थो को देखते ही जी का खराब हो जाना। इन लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को सीपिया औषधि दी जाए तो रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपने जननांग बिल्कुल ठण्डे से महसूस होना और उनमे बहुत ज्यादा पसीना आना, पुराना सुजाक रोग होने के कारण पेशाब के रास्ते से रात के समय दर्द के स्राव का आना, लिंग के आगे के भाग पर मस्से से निकलना, स्त्री के साथ संभोग करने से पैदा होने वाले रोग आदि लक्षणों में अगर रोगी को सीपिया औषधि दी जाए तो रोगी को काफी लाभ मिलता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण- स्त्री को अपने नीचे के अंगों में ऐसा महसूस होता है जैसे योनि के रास्ते से सबकुछ बाहर निकल पड़ेगा, इस कारण से रोगी स्त्री को अपनी जांघो या टांगों को टेढ़ा-मेढ़ा करना पड़ता है या योनि पर दबाव देना पड़ता है। रोगी स्त्री को मासिकधर्म के दौरान, गर्भाकाल के दौरान, बच्चे को दूध पिलाते समय शरीर के अंदर किसी स्थान पर कोई गोल सी चीज लुढ़क रही हो, स्त्री को खुजली के साथ पीले रंग का प्रदर-स्राव (योनि में से पानी आना) का आना, मासिकस्राव का समय से बहुत बाद में और कम मात्रा में आना या मासिकस्राव का समय से पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में आना, योनि के रास्ते में गर्भाशय से नाभि तक बहुत तेज किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना, रोगी स्त्री को अपना गर्भाशय और योनि का चिरता हुआ सा महसूस होना, सुबह के समय रोगी स्त्री का जी मिचलाना और उल्टी होना, संभोगक्रिया के दौरान योनि के रास्ते में बहुत तेजी से दर्द का होना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को सीपिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को तेजी से उठने वाली खांसी जिसमे रोगी का खांसते-खांसते बुरा हाल हो जाता है और जो रोगी को अपने पाचनसंस्थान से उठती हुई महसूस होती है। रोगी को सांस लेने में परेशानी होना जो सोते समय और तेज हो जाती है। सुबह या शाम के समय छाती पर दबाव सा लगता है। सुबह के समय खांसी के साथ बहुत ज्यादा बलगम का आना जिसका स्वाद ज्यादातर नमकीन सा ही रहता है। आवाज की नली या छाती में सुरसुराहट के कारण पैदा होने वाली खांसी। फेफड़ों में सूजन आ जाने के कारण होने वाली खांसी जो बहुत दिनों तक होती रहती है। इस तरह के लक्षणों मे रोगी को सीपिया औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को पेशाब के साथ लाल-लाल से चिपकने वाले बालू के कण से आना, रोगी को रात मे सोते ही पेशाब का आ जाना, पेशाब का रूक-रूककर आना, पेशाब की नली में सूजन आ जाना आदि लक्षणों में अगर रोगी को सीपिया औषधि दी जाए तो रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण- रोगी को मलक्रिया के दौरान मल के साथ खून आना, मलान्त्र में पूर्णता सी महसूस होना, पेट मे कब्ज का बनना, मल का सख्त रूप में आना, रोगी को मलान्त्र में ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसमे कोई गोला सा रखा हो, मलक्रिया के दौरान बहुत ज्यादा कूथन और ऊपर की ओर तेजी से दौड़ता हुआ दर्द। मल का गाढ़े कत्थई रंग का गोल-गोल रूप में आना जो आपस में बलगम से जुड़ा हुआ रहता है। रोगी का गुदा चिर सा जाना, मलद्वार से अक्सर स्राव सा आते रहना, बच्चों को गर्म दूध पिलाने से होने वाले दस्त, मलान्त्र में और योनि के रास्ते में दर्द जो ऊपर की ओर तेज गति से दौड़ता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सीपिया औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी का पेट फूल जाने के साथ ही सिर में दर्द हो जाना, जिगर में दर्द के साथ जलन सी होना जो दाईं तरफ की करवट लेटने से कम हो जाता है। रोगी के पेट पर बहुत से कत्थई रंग के धब्बे से होना, रोगी को अपना पेट खाली सा महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को सीपिया औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा पर जगह-जगह दाद से हो जाना, त्वचा पर इस तरह की खुजली होना जो खुजली करने से भी कम नही होती तथा हाथों की कोहनियों और घुटनों के जोड़ों पर ज्यादा होती है। बसंत के मौसम में हर बार गोल-गोल निशान से पड़ना, खुली हवा में जाने पर त्वचा में छपाकी जो गर्म कमरे में कम हो जाती है। रोगी को बहुत ज्यादा बदबूदार पसीने का आना, रोगी के पैरों में खासकर अंगूठों में बदबूदार पसीने का आना, त्वचा पर मछली के शरीर पर पड़े हुए निशान से पड़ना साथ ही त्वचा में से बदबू का आना। इन लक्षणों में अगर रोगी को सीपिया औषधि दी जाए तो ये रोगी के लिए बहुत अच्छा रहता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- रोगी को कमर के भाग में कमजोरी सी महसूस होना, दर्द जो पीठ तक फैल जाता है। रोगी को कंधों के बीच में ठण्डक सी महसूस होती है। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को सीपिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
वृद्धि-
दोपहर और शाम के समय, धुलाई करने से, बाईं ओर, पसीना आने के बाद, ठण्डी हवा से, आंधी-तूफान से पहले रोग बढ़ जाता है।
शमन-
बिस्तर की गर्मी से, अंगों को अंदर की ओर खींचने से, ठण्डे पानी से नहाने से और सोने के बाद रोग कम हो जाता है।
पूरक-
नेट्रम-म्यू, फास्फो।
प्रतिकूल-
तुलना-
सीपिया औषधि की तुलना लिलियम, म्यूरेक्स, सीलिका, सल्फ, आस्पेरूला, ओजोनम, डिक्टैम्नस, लैपैथम से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सीपिया औषधि की 12वीं शक्ति, 30वीं शक्ति और 200वीं शक्ति देनी चाहिए।
जानकारी-
रोगी के लिए सीपिया औषधि की निम्न शक्तियों का प्रयोग ज्यादा नही करनी चाहिए और ना ही बार-बार देनी चाहिए।
सेरम ऐंग्वीलर इक्थियोटॉक्सिन Serum Anguillar Ichthyotoxin
सेरम ऐंग्वीलर इक्थियोटॉक्सिन औषधि को गुर्दों में कुछ समय से होने वाली जलन, दिल के रोग होने पर उपयोग करने से लाभ होता है। अगर रोगी को गुर्दो में तेज जलन होने के साथ यूरोमिया की आशंका होने पर ये औषधि बहुत ही फायदेमंद साबित होती है।
तुलना-
पिलियास और लैकेसिस के साथ सेरम ऐंग्वीलर इक्थियोटॉक्सिन औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
सेरम ऐंग्वीलर इक्थियोटॉक्सिन औषधि को दिल के रोगों में पहली से तीसरी शक्ति तक देनी चाहिए तथा गुर्दो में अचानक होने वाले रोगों में ऊंची शक्तियां देनी चाहिए।
सबंध-
ईल सौरम और बाइपेरा के जहर में सेरम ऐंग्वीलर इक्थियोटॉक्सिन औषधि को बहुत अधिक साम्य पाया जाता है।
सिकेलि कार्नुटम Sikoli Karnutam
सिकेलि कार्नुटम को स्त्रियों में होने वाले रोग को समाप्त करने में बहुत असरदार औषधि माना जाता है। इसके अलावा हैजा और बच्चों के हैजा रोग में भी ये औषधि बहुत लाभकारी मानी जाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सिकेलि कार्नुटम औषधि से होने वाले लाभ-
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण- स्त्री को मासिकस्राव के समय ज्यादा खून आने के कारण शरीर में कमजोरी आ जाना, स्त्री को कमजोरी के कारण ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसके शरीर के सारे अंगों के सारे जोड़ खुल गए हो, रोगी स्त्री का शरीर ठण्डा हो जाने पर भी वह शरीर पर किसी तरह का चादर आदि ओढ़ना बर्दाश्त नहीं करती, स्त्री को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसके पूरे शरीर पर चींटियां सी रेंग रही हो या पूरे शरीर पर इस तरह की जलन होना जैसे कि आग के पास स्त्री को बैठा दिया गया हो। इस तरह के लक्षणों में अगर रोगी स्त्री को सिकेलि कार्नुटम औषधि दी जाए तो रोगी स्त्री कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाती है।
साइलीशिया (Silicea)
साइलीशिया औषधि एक बहुत ही गहरी क्रिया करने वाली ऐन्टि-सेरिक, ऐन्टि-साइकोटिक और ऐन्टि सिफिलिटिक औषधि है। इस औषधि का असर शरीर मे काफी लंबे समय तक रहता है और ये बच्चे को जन्म लेने के साथ होने वाले रोगों में बहुत उपयोगी साबित होती है। ये पारे के बुरे असर को दूर करती है। अगर किसी व्यक्ति को कोई नई बीमारी घेर लेती है तो साइलीशिया उसे बहुत जल्दी ठीक करने में बहुत मदद करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार साइलीशिया औषधि से होने वाले लाभ-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी अपने जीवन से परेशान हो जाता है वह सोचता है कि उसका जीना बेकार है वह किसी काम का नहीं है, जरा सा भी शोर-शराबा होते ही रोगी डरने लगता है, बच्चे बहुत ज्यादा जिद्दी और चिड़चिड़े हो जाते है, अगर कोई उनको प्यार भी करने लगता है तो वो चिल्लाने लगता है, रोगी हर समय बेचैनी सी ही रहता है, रोगी को अगर कोई दिमागी काम करने के लिए दे दिया जाए तो वो उस काम को करने में बिल्कुल असमर्थ हो जाता है, रोगी हर समय किसी गहरी चिंता में डूबा रहता है, रोगी को डरावने सपने आने लगते हैं, रात को काफी रात तक रोगी बिल्कुल भी सो नहीं पाता है। रोगी को इन लक्षणों के आधार पर साइलीशिया औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
सिर सें सम्बंधित लक्षण- रोगी अगर ऊपर की ओर देखता है तो उसका सिर घूमने लगता है, रोजाना होने वाला सिर का दर्द जो सिर के पीछे के हिस्से से शुरू होता है, सिर के ऊपर तक फैलता है तथा आंखों के ऊपर तक फैल जाता है, रोगी को अपना सिर बहुत बड़ा सा महसूस होता है, रोगी को जरा सी भी हवा लगते ही सिर में दर्द बहुत तेज हो जाता है, लेकिन पेशाब करने से सिर का दर्द कम हो जाता है, जरा सा भी शोर-शराबा होने से या दिमागी काम करने से रोगी के सिर का दर्द बढ़ जाता है, लेकिन सिर पर कसकर पट्टी बांधने से सिर का दर्द कम हो जाता है, रोगी अगर उपवास रखता है तो उनके सिर में दर्द होने लगता है, रोगी के सिर में बहुत ज्यादा पसीना आता है। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को साइलीशिया औषधि देने से लाभ होता है।
आंखों सें सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों में आंसुओं की नली में सूजन आना, आंखों के किनारों में फुंसियां सी हो जाना, आंखों में जलन होना, आंखों में थोड़ी सी ठण्डी हवा लगते ही परेशानी पैदा हो जाना, जो लोग आफिस मे काम करते है उनको होने वाला मोतियाबिंद, आंखों की कनीनिका में किसी तरह की चोट लग जाने के बाद होने वाली परेशानी, रोशनी में आते ही आंखों में दर्द हो जाना, कनीनिका में सूजन आ जाना, आंखों का भ्रम अर्थात रोगी जब पढ़ता है तो उसको अक्षर साथ-साथ चलते हुए दिखाई देते हैं। इस तरह के आंखों के रोगों के लक्षणों में रोगी को साइलीशिया औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
कान से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सुनाई देना बिल्कुल बंद हो जाना, कानों में बहुत तेज-तेज आवाजें गूंजती हुई सी सुनाई देना, जरा सा भी शोर-शराबा होते ही कानों में दर्द हो जाना, कान के अंदर से बदबूदार स्राव का आना, किसी की बात को साफ तरह से ना सुन पाना जैसे कान के रोगों के लक्षणों में रोगी को साइलीशिया औषधि का सेवन कराना लाभदायक साबित होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- नाक के अंदर के भाग पर सूखी, सख्त सी पपड़ियों का जम जाना जिनको अगर छुड़ाया जाता है तो उनमें से खून निकलने लगता है, सुबह के समय छींके बहुत ज्यादा आती है, किसी भी चीज की खुशबू या बदबू का नाक से सूंघ कर पता नहीं लगाया जा सकता, नाक की ग्रंथियों का इतना नाजुक हो जाना कि उनको छूते ही नाक में दर्द चालू हो जाता है, नाक की नोक पर खुजली सी होना। इन लक्षणों में रोगी को साइलीशिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
गले सें सम्बंधित लक्षण- मुंह के अंदर तालू के पिछले भाग की ग्रंथि में रोजाना आने वाली सूजन और उस में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होना, सर्दी का गले में बैठ जाना, कान की ग्रंथियों का सूज जाना, रोगी जैसे ही कुछ चीज खाकर निगलता है तो उसके गले में दर्द होता है, गर्दन की ग्रंथियों की सख्त और ठण्डी सूजन आना जैसे लक्षणों में रोगी को साइलीशिया औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- रोगी का चेहरे का रंग एकदम फीका सा पड़ जाना, रोगी के होंठों पर फुंसियां और छाले हो जाना जिनको जरा सा भी हाथ लगाते ही दर्द शुरू हो जाता है, मुंह के अंदर नीचे वाले जबड़े की गिल्टियों में दर्द और सूजन आ जाती है, मुंह के कोनों का कटा-फटा सा होना आदि लक्षणों में साइलीशिया औषधि का प्रयोग करना उपयोगी साबित होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी के मसूढ़ों में सूजन के साथ दर्द का होना, रोगी को ऐसा लगता है जैसे कि उसके सारे दांत ढीले पड़ गए है, रोगी अगर ठण्डा पानी पीता है तो उसके मसूढ़ों में दर्द होने लगता है, रोगी को अपनी जीभ के आगे के हिस्से पर हर समय कोई बाल सा चिपका हुआ महसूस होता है, सुबह के समय मुंह से बहुत ज्यादा बदबू आती है। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को साइलीशिया औषधि देना बहुत ही लाभकारी साबित होता है।
मूत्र (पेशाब) सें सम्बंधित लक्षण- पेशाब का अपने आप ही लाल या पीले तलछट का आना, रोगी जब मलक्रिया के लिए जोर लगाता है तो उस समय वीर्य टपकता रहता है। बच्चों के पेट में कीड़े होने के कारण रात को बच्चा बिस्तर में ही पेशाब कर देता है। इन सारे लक्षणों में रोगी को साइलीशिया औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत ज्यादा ठण्ड सी लगना, जरा सी भी ठण्डी हवा लगते ही रोगी को बुखार आ जाना, रात के समय रोगी को बहुत ज्यादा पसीना आना, रोगी को बुखार में बिल्कुल प्यास नही लगती, रोगी को बंद कमरे में या गर्म कमरे में भी ठण्ड लगती है, रोगी को हर समय कंपकंपी सी होती रहती है, बुखार शाम को शुरू होता है और रात को बहुत तेज हो जाता है, रोगी को रात के समय पसीना आने से कमजोरी महसूस हो जाती है, रोगी के हाथ, पिण्डलियों, तलुवों, पैर के अंगूठे और बगल में बदबूदार पसीना आता है, रोगी को रूक-रूककर आने वाले बुखार में रोगी को गर्मी बहुत ज्यादा लगती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को साइलीशिया औषधि देने से लाभ होता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी नींद में उठकर चलने लगता है, रोगी नींद में बार-बार चौंक कर उठ जाता है, रोगी को सारे दिन नींद सी आते रहना, नींद ना आने के साथ खून के बहाव का बहुत ज्यादा होना और सिर में गर्मी का बढ़ जाना, रोगी को डरावने से सपने आना आदि लक्षणों में रोगी का साइलीशिया औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- रोगी की रीढ़ की हड्डी का कमजोर हो जाना, रोगी की पीठ पर ठण्डी हवा लगते ही पीठ में परेशानी हो जाना, रोगी की पुच्छास्थि में दर्द का होना, रीढ़ की हड्डी में चोट लगने के बाद रीढ़ की हड्डी में जलन सी हो जाना, रीढ़ की हड्डी में होने वाले रोग, रीढ़ की हड्डी में टी.बी हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को साइलीशिया औषधि का प्रयोग कराना उपयोगी साबित होता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी को गृध्रसी (साइटिका) रोग होना, रोगी के नितंबों, टांगों और पैरों में होता हुआ दर्द, पैरों के गुल्फों और तलुवों में बायंटा सा आना, टांगों का बहुत कमजोर हो जाना, किसी भी काम को करते समय हाथों का कांपना, हाथों की उंगलियों के नाखूनों में किसी रोग के होने के कारण नाखूनों पर सफेद से निशानों का पड़ना, रोगी के पैरों के नाखूनों का अंदर की ओर से बढ़ना, रोगी के पैरों का बर्फ की तरह ठण्डा होना, रोगी के पैरों में बहुत ज्यादा पसीना आना, रोगी जिन अंगों के बल लेटता है वो अंग सुन्न पड़ जाता है, रोगी के हाथों, पैरों और बगल में बदबूदार पसीना आना, रोगी को उंगलियों की नोकों में ऐसा महसूस होता है जैसे की उंगलियां पक रही हो, अंगुलबेढ़ा, रोगी के घुटनों में इस तरह का दर्द होना जैसे कि किसी ने घुटनों को कसकर बांध दिया हो, पैरों की उंगलियों के नीचे दर्द का होना, पैरों और टखनों और अंगूठों के बीच में होकर तलुवों में होने वाली परेशानी जैसे लक्षणों में रोगी को साइलीशिया औषधि का सेवन कराना उपयोगी साबित होता है।
आमाशय सें सम्बंधित लक्षण- रोगी को मांस और गर्म भोजन को देखते ही जी खराब हो जाता है, भोजन निगलने पर भोजन अपने आप ही नासारंध्र में पहुंच जाता है, रोगी को बिल्कुल भूख न लगना, रोगी को बार-बार प्यास लगती है, रोगी जब भोजन करता है तो उसके बाद उसे खट्टी डकारें आना चालू हो जाती है, रोगी के पेट को जरा सा भी दबाते ही दर्द होने लगता है, किसी भी पीने वाले पदार्थ को पीते ही रोगी उल्टी कर देता है। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को साइलीशिया औषधि देना अच्छा रहता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी का पेट बहुत ज्यादा फूल जाना, रोगी के पेट में दर्द होना या दर्द के कारण उत्पन्न ठण्डक सी महसूस होना जो बाहर की गर्मी से कम हो जाता है, रोगी के पेट में पेट में दर्द होना का बनना, रोगी के हाथ और नाखूनों का पीला पड़ जाना, आंतों के अंदर बहुत ज्यादा गड़गड़ाहट सी होना, जिगर का खराब हो जाना, रोगी की वक्षण ग्रंथियों का दर्द के साथ सूज जाना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को साइलीशिया औषधि का प्रयोग कराना उचित रहता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण- रोगी को मलत्याग करने के बाद मलान्त्र में बहुत तेजी से दर्द का होना, रोगी को अपना मलद्वार चिरा हुआ सा महसूस होता है, रोगी के मलान्त्र में गुदा का नासूर बनना, रोगी को भगंदर का रोग होना, रोगी को मलक्रिया के समय मल पूरी तरह से बाहर नही आ पाता और थोड़ा बहुत बाहर भी आता है तो फिर दुबारा अंदर चला जाता है। मल का बहुत कम मात्रा में, सख्त रूप में, छोटी-छोटी गुठलियों के आकार में, बदबू के साथ आता है, मल का रंग हल्का सा होना जैसे लक्षणों में रोगी को साइलीशिया औषधि देने से आराम मिलता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्री का मासिकस्राव काफी समय तक न आना और कभी आना भी तो स्राव का बहुत कम मात्रा में आना, स्त्री जब पेशाब करती है तो उसको पेशाब के साथ दूध जैसा स्राव आता है, तीखा प्रदर स्राव (योनि में से तीखा पानी आना), स्त्री की योनि और योनि के रास्ते में खुजली सी होना, स्त्री का एक मासिकस्राव आने के बाद और दूसरा मासिकस्राव आने से पहले के बीच के समय में खून का आना, स्त्री जब बच्चे को दूध पिलाती है तो उस समय स्त्री की योनि में से खून का स्राव होता है, स्त्री जब तक अपने बच्चे को अपना दूध पिलाती है तब तक स्त्री का मासिकस्राव नहीं आता है, बच्चे को दूध पिलाते समय स्त्री के स्तनों से पीठ तक तेजी से होने वाला दर्द तथा इसी के साथ ही स्त्री के दान्तों में भी दर्द होना, गर्भाशय या योनि में मांस का बढ़ना, स्त्री के स्तनों में सख्त सी गांठों का पड़ जाना, स्त्री के गर्भाशय में कैंसर का होना जैसे लक्षणों में रोगी को साइलीशिया औषधि का इस्तेमाल कराना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण- रोगी के अंडकोषों में पानी भर जाना, रोगी के जननेन्द्रियों में जलन और दर्द होना, रोगी को रात के समय अपने आप ही वीर्य का निकल जाना, स्त्री के साथ संभोग करने के बाद शरीर में थकावट सी महसूस होना और कमर में दर्द होना, बच्चों के अंडकोषों का बढ़ जाना आदि लक्षणों में रोगी को साइलीशिया औषधि देने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) सें सम्बंधित लक्षण- रोगी को अंगुल बेढ़ा होना, रोगी की त्वचा पर पुराने नासूर जैसे जख्मों का होना, उंगलियों की नोक में दरारें पड़ना, ग्रंथियों की वेदनाहीन सूजन, रोगी की त्वचा पर गुलाबी रंग के निशान से पड़ना, फोड़ों में से बदबूदार पीब का आना, रोगी को लगने वाली छोटी से छोटी चोट पक भी जाती है, रोगी को टीका लगाने के बाद होने वाले रोग, त्वचा पर कोढ़ होना, उंगलियों की नोक का सूख जाना। इन सब लक्षणों के आधार पर रोगी को साइलीशिया औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- मुंह से थूक का निरंतर निकलते रहना, रोगी को होने वाला सर्दी-जुकाम का रोग ठीक नहीं होता, खांसी और गले में जलन, खांसी के साथ दिन में बलगम का खून के साथ आना, छाती से होकर पीठ तक सुई के चुभने जैसा दर्द होना, रात को सोते समय बहुत तेज खांसी के साथ गाढ़ा, पीला, ढेलेदार बलगम का आना आदि रोगों में रोगी को साइलीशिया औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
वृद्धि-
अमावस्या के आने के बाद, सुबह के समय, धोने-धुलाने से, मासिकस्राव के दौरान, नंगा रहने पर, लेटते समय आर्द्रता से, बाईं करवट लेटने से और ठण्ड से रोग के लक्षणो मे वृद्धि होती है।
शमन-
गर्माई से, सिर को लपेटने से, गर्मी के मौसम में रोग बढ़ जाता है।
पूरक-
तुलना-
साइलीशिया औषधि की तुलना ब्लैक गनपाउडर, हीपर, काली-फा, पिक्रि-ए, कल्के, टैबाशीर, एरुण्डो डोनैक्स से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को साइलीशिया औषधि की 6 से 30 शक्ति तक देने से रोगी को जल्दी आराम मिलता है।
जानकारी-
रोगी को साइलीशिया औषधि की 200 और ऊंची शक्तियां तक देने से लाभ होता है।
सिल्फियम Silphium
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सिल्फियम औषधि से होने वाले लाभ-
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को खांसी के साथ बहुत ज्यादा मात्रा में, लंबा सा, पानी सा, हल्के रंग का बलगम, छाती में बलगम की घड़घड़ाहट के कारण होने वाली खांसी, जो ठण्डी हवा से बढ़ जाती है, फेफड़ों का सिकुड़ जाना जैसे लक्षणों में रोगी को सिल्फियम औषधि देने से लाभ होता है।
तुलना-
सिल्फियम औषधि को अरेलिया, कोपेवा, टेरिवि, क्यूबेबा, सम्बूक, सिल्फियन साइरेनेकम, पोलिगोनम , सैल्विया, एरम ड्रैको, जस्टीशिया एढाटोडा से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सिल्फियम औषधि की 3 शक्ति देने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
जानकारी-
बहुत से लोग सिल्फियम औषधि की निम्न शक्तियों के विचूर्ण पसंद करते है।
सिनैपिस नाइग्रा-ब्रैसिका नाइग्रा Sinapis Nigra-Brassia Nigra
सिनैपिस नाइग्रा-ब्रैसिका नाइग्रा औषधि को काली सरसों से तैयार किया जाता है। शीत-ज्वर, चेचक, सर्दी-जुकाम आदि में इस औषधि को इस्तेमाल किया जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सिनैपिस नाइग्रा-ब्रैसिका नाइग्रा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर की त्वचा गर्म होने के साथ-साथ उसमे खुजली सी होना, रोगी के ऊपर के होंठ और माथे पर पसीने का आना, रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसकी जीभ पर छाले हो गए हो। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सिनैपिस नाइग्रा-ब्रैसिका नाइग्रा औषधि देने से लाभ मिलता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी की नाक के बाएं तरफ के हिस्से से स्राव का निकलना जो ठण्डा सा महसूस होता है, नाक में से थोड़ी सी मात्रा में तीखे स्राव का आना, रोजाना दोपहर को और शाम को रोगी की बाईं नाक का नथूना बंद हो जाता है, नाक के आगे का भाग का सूख जाना, रोगी को नाक के बंद हो जाने के कारण बार-बार छींके आना, बार-बार आंखों से आंसू का आना, रोगी को बार-बार उठने वाली खांसी जिसमे लेटने पर आराम आ जाता है। इस तरह के लक्षणों के आधार पर रोगी को सिनैपिस नाइग्रा-ब्रैसिका नाइग्रा औषधि का सेवन कराना उपयोगी साबित होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी जब सांस लेता है तो उसके मुंह से प्याज के जैसी गंदी सी बदबू आती है, रोगी के आमाशय में जलन जो भोजन की नली, गले की नली और मुंह के अंदर तक फैल जाती है, रोगी को गर्म और खट्टी डकारें आना, पेट में दर्द जो सामने की ओर झुकने से होता है और सीधा तनकर बैठने से कम हो जाता है, मुंह के छाले से हो जाना जैसे लक्षणों में रोगी को सिनैपिस नाइग्रा-ब्रैसिका नाइग्रा औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपने गले में इतनी तेज जलन होती है जैसे कि किसी ने गले को अंदर से जला दिया हो, रोगी को दमे के रोग जैसा लंबा-लंबा सांस आना, रोगी को बहुत तेज खांसी उठना और इसी के साथ ही जैसे कुत्ता भौंकता है उस तरह की गले में से आवाज का निकलना आदि लक्षणों में रोगी को सिनैपिस नाइग्रा-ब्रैसिका नाइग्रा औषधि देने से लाभ मिलता है।
पेशाब से सम्बंधित लक्षण- रोगी की पेशाब करने की नली में दर्द का होना, रोगी को बार-बार बहुत ज्यादा मात्रा में पेशाब आना। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सिनैपिस नाइग्रा-ब्रैसिका नाइग्रा औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- अन्त:पर्शुक-पेशियों और कमर की पेशियों में गठिया रोग के कारण होने वाला दर्द, रोगी के पीठ और नितंबों में दर्द होने के कारण रोगी को रात में नींद भी नही आ पाती। इन लक्षणों में रोगी को सिनैपिस नाइग्रा-ब्रैसिका नाइग्रा औषधि का सेवन कराना अच्छा रहता है।
तुलना-
सिनैपिस नाइग्रा-ब्रैसिका नाइग्रा औषधि की तुलना सल्फ, कोलोसि, सिनैपिस और एल्वा से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को उसके रोग के लक्षणों के आधार पर सिनैपिस नाइग्रा-ब्रैसिका नाइग्रा औषधि की 3 शक्ति तक देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल ठीक हो जाता है।
स्कैटोल Skatol
स्कैटोल औषधि आमाशय के रोग और पेट के रोगों को दूर करने में लाभकारी मानी जाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्कैटोल औषधि से होने वाले लाभ-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी का स्वभाव बहुत ज्यादा चिड़चिड़ा हो जाना, किसी भी दूसरे व्यक्ति से सही तरह से बात न करना, रोगी को हर व्यक्ति बुरा लगने लगता है, रोगी कुछ भी पढ़ने-लिखने बैठता है तो उसे बहुत परेशानी आ जाती है, रोगी किसी भी काम को करने के लिए अपने दिमाग को एक जगह नही लगा सकता, रोगी हर समय निराश सा ही बैठा रहता है आदि लक्षणों में रोगी को स्कैटोल औषधि देना लाभकारी होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के माथे में दर्द जो बाईं आंख के ऊपर ज्यादा होता है और शाम के समय बढ़ जाता है, इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्कैटोल औषधि देना बहुत ही लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी की जीभ पर मैल की परत का जमना, मुंह का स्वाद बहुत ज्यादा खराब होना, रोगी जो भी चीज खाता या पीता है उसको उसका स्वाद नमकीन लगता है, रोगी को हर समय डकारें सी आती रहती है, रोगी को बहुत ज्यादा भूख लगती है, रोगी को हल्के पीले रंग का, बदबू के साथ मल आता है, रोगी को आंतों के किसी रोग के हो जाने के कारण अजीर्ण (बदहजमी) हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर स्कैटोल औषधि का सेवन कराना उपयोगी साबित होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को दिन में कई बार लेकिन कम मात्रा में, जलन और दर्द के साथ पेशाब आता रहता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्कैटोल औषधि देना लाभकारी रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी को हर समय बहुत ज्यादा नींद सी आती रहती है, अगर रोगी जागता भी है तो उसकी हालत ऐसी होती है जैसे कि वह अभी भी नींद से जगा नहीं हो आदि लक्षणों में रोगी को स्कैटोल औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
तुलना-
स्कैटोल औषधि की तुलना इण्डोल, बैप्टीशि और सल्फ के साथ की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्कैटोल औषधि की 6 शक्ति तक देने से रोगी कुछ ही दिनों में अच्छा हो जाता है।
स्कूकम-चक (चक) Skookum-Chuck
स्कूकम-चक औषधि त्वचा और श्लैष्मिक झिल्लियों पर बहुत तेजी से क्रिया करती है। सोरा-विष के दोषों को दूर करने के लिए इस औषधि को बहुत उपयोगी समझा जाता है। इसके अलावा कान के बीच की सूजन, रोगी के कान के अंदर से बहुत ज्यादा मात्रा में तरल, तीखा और बदबूदार स्राव आता है, रोगी को सर्दी-जुकाम होने के कारण लगातार छींकें सी आते रहना, त्वचा का शुष्क होना, त्वचा पर होने वाले रोग, परागज-ज्वर आदि लक्षणों में रोगी को स्कूकम-चक औषधि का प्रयोग कराना लाभदायक रहता है।
तुलना-
स्कूकम-औषधि की तुलना सैक्सनाइट से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्कूकम-औषधि की 3 शक्ति का विचूर्ण देने से रोगी ठीक हो जाता है।
सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम Solanum Lycopersicum
सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम औषधि गठिया के रोग और इंफ्लुएंजा के बाद होने वाली परेशानियों में बहुत लाभकारी सिद्ध होती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर मे सिर के फटने जैसा दर्द होना जो सिर की पीछे के हिस्से से शुरु होकर पूरे सिर में फैल जाती है, सिर के दर्द के बंद हो जाने के बाद पूरे सिर और उसकी त्वचा में इस तरह का दर्द जैसे कि वो छिल गई हो आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम औषधि देना उपयोगी साबित होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी आंखें भर्राई हुई सी लगना, रोगी की आंखों की पुतलियों का भारी होना और सिकुड़ जाना, आंखों और उसके चारों तरफ दर्द सा होना, आंखों का बिल्कुल काम न करना, रोगी को नेत्रगोलक सिकुड़े हुए से लगते है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम औषधि देने से बहुत ज्यादा लाभ मिलता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सर्दी-जुकाम हो जाने के कारण नाक से बहुत ज्यादा मात्रा में स्राव का आना जो गले में पहुंच जाता है, नाक के आगे के भाग में खुजली होना जो हल्की सी धूल के नाक में जाने से ओर तेज हो जाती है और घर के अंदर रहने से कम हो जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम औषधि देना लाभकारी सिद्ध होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आवाज का खराब हो जाना, रोगी की छाती में ऐसा दर्द जो सिर तक पहुंच जाता है, रोगी के गले में खराश जिसके कारण रोगी को बार-बार अपना गला साफ करने का मन करता है, छाती में रुकावट सी महसूस होना, रोगी को रात के समय बार-बार उठने वाली खांसी जिसके कारण रोगी रात को सो भी नही पाता आदि लक्षणों में रोगी को सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम औषधि देने से रोगी को लाभ मिलता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बार-बार पेशाब आने के कारण रात को कई बार उठकर पेशाब करने जाना पड़ता है, खुली हवा में रोगी का पेशाब लगातार बूंद-बूंद करके टपकता रहता है। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम औषधि का प्रयोग कराना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी के कमर के भाग में हल्के-हल्के रूप में होने वाला दर्द, रोगी की पूरी पीठ में दर्द होना, रोगी के दाएं कंधे की त्रिकोणपेशी और छाती की पेशी में बहुत तेज दर्द होना, रोगी की दाईं बांह के बीच की गहराई में दर्द, रोगी के दाईं कोहनी और कलाई तथा दोनो हाथों में गठिया का दर्द, रोगी की जननेन्द्रियों में बहुत तेज दर्द, जांघ में दाईं तरफ का स्नायु का दर्द आदि लक्षणों के आधार पर सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम औषधि का सेवन काफी प्रभावशाली रहता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण- रोगी की नाड़ी का धीरे-धीरे चलने से रोगी को हर समय डर लगा रहता है और मन में अजीब-अजीब से ख्याल आते है कि कहीं उसे कुछ हो ना जाए। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में सामान्य हो जाता है।
वृद्धि-
दाएं भाग में, खुली हवा में, लगातार चलते रहने से, ज्यादा शोर-शराबे से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्म कमरे में और तंबाकू का सेवन करने से रोगी का रोग कम हो जाता है।
तुलना-
सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम औषधि की तुलना बेलाडोना, यूपाटो-पर्फो, रस-टा, सैंग्वी और कैप्सि से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सेलेनम लाइकोपर्सिकम-लाइकोपर्सिकम एस्कुलेण्टम औषधि की 3x से 30 शक्ति तक देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
सल्फ्येरोसम एसिडम Sulphurosum Acidum
सल्फ्येरोसम एसिडम औषधि को गले की सूजन में, मुंह के घावों में प्रयोग किया जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सल्फ्येरोसम एसिडम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर में बहुत तेजी से होने वाला दर्द जिसमे रोगी को उल्टी होने से आराम मिलता है, रोगी को सिर में दर्द होने के कारण बेचैनी सी छाए रहती है और वो बात-बात पर किसी से भी लड़ने लगता है, रोगी को अपने कान में बहुत सारी घंटियों के बजने जैसा महसूस होता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सल्फ्येरोसम एसिडम औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोग के मुंह में किसी तरह का जख्म होने के कारण जलन होना, रोगी की जीभ पर मैल की मोटी सी परत का जमना, रोगी की जीभ लाल या नीली सी पड़ जाना आदि लक्षणों में रोगी को सल्फ्येरोसम एसिडम औषधि देने से लाभ मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बिल्कुल भूख न लगना, रोगी को बहुत भयंकर कब्ज का रोग हो जाना आदि लक्षणों में सल्फ्येरोसम एसिडम औषधि देने से रोगी को आराम मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सांस लेने में परेशानी होना, रोगी को अपनी छाती सिकुड़ी हुई सी महसूस होना, रोगी की आवाज का खराब हो जाना अर्थात जब रोगी बोलता है तो उसकी आवाज साफ तरह से नही निकलती, रोगी की सांस का लगातार फूलने के साथ खांसी होना और बहुत सारा बलगम आना। इन लक्षणों में अगर रोगी को सल्फ्येरोसम एसिडम औषधि दी जाए तो रोगियों कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्री की योनि में से सफेद पानी आने के कारण स्त्री के शरीर में कमजोरी आने जैसे लक्षणों में सल्फ्येरोसम एसिडम औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
मात्रा-
रोगी को सल्फ्येरोसम एसिडम औषधि की 3 शक्ति देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
जानकारी-
सल्फ्येरोसम एसिडम औषधि को गले की सूजन में फुहार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। रोगी जितनी बार भी भोजन करें, उसे भोजन करने से लगभग 10 मिनट पहले सल्फ्येरोसम एसिडम औषधि की 10-15 बूंदे लेने से मुंह में पानी भरना बंद हो जाता है। ये औषधि मुंह के अंदर होने वाले जख्मों को भी ठीक करती है।
सुम्बुल फेरूला सुम्बुल Sumbul Ferula Sumbul
सुम्बुल फेरूला सुम्बुल औषधि को हिस्टीरिया रोग के लक्षणों को, स्नायविक लक्षणों को, स्नायूशूल जैसे लक्षणों को और दिल के रोगों से सम्बंधित लक्षणों को दूर करने में इस्तेमाल किया जाता है।
विभिन्न रोगों से सम्बंधित लक्षणों के आधार पर सुम्बुल फेरूला सुम्बुल औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी को शाम के समय चाहे जितना भी काम करा लो लेकिन सुबह उठने के बाद रोगी का किसी काम को करने का मन नहीं करता, रोगी का बहुत ज्यादा भावुक हो जाना, रोगी अगर किसी तरह का लिखने-पढ़ने का काम करता है तो वो गलत करता है, रोगी की नाक में से लेसदार और पीले रंग का स्राव का आना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को सुम्बुल फेरूला सुम्बुल औषधि देने से लाभ होता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण- रोगी की नाड़ी का कभी तेज गति से और कभी बिल्कुल आराम से चलना, रोगी अगर थोड़ी सी भी मेहनत करता है तो उसकी सांस फूलने लगती है। दिल में किसी तरह का रोग हो जाने के कारण दमा रोग होना, रोगी के बाईं तरफ के हाथ में दर्द, भारीपन और सुन्नपन हो जाना, स्त्री के बाएं स्तन के चारों ओर बायें कुक्षिप्रदेश में स्नायु का दर्द होना जैसे लक्षणों में रोगी को सुम्बुल फेरुला सुम्बुल औषधि का सेवन कराना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपना दम घुटता हुआ सा महसूस होना, गले से किसी भी चीज को निगलने में बहुत ज्यादा दर्द सा होना, आमाशय में गैस जमा हो जाने के कारण रोगी को डकारे आना, आहारनली में किसी तरह की खराबी का हो जाना, रोगी के गले से लगातार बलगम का निगलते रहना आदि लक्षणों में रोगी को सुम्बुल फेरूला सुम्बुल औषधि का इस्तेमाल कराना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण- स्त्री का पेट फूल जाने के कारण पेट में दर्द होना, स्त्री की डिम्बग्रंथियों में स्नायु का दर्द होना, मासिकस्राव के समय यौन उत्तेजना का बहुत तेज होना आदि लक्षणों में रोगी को सुम्बुल फेरूला सुम्बुल औषधि देना बहुत ही लाभकारी साबित होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को पेशाब के साथ तेल के टुकड़ों का आना जैसे लक्षणों में रोगी को सुम्बुल फेरूला सुम्बुल औषधि का सेवन कराना उपयोगी साबित होता है।
तुलना-
सुम्बुल फेरूला सुम्बुल औषधि की तुलना असाफी और मास्कस से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सुम्बुल फेरूला सुम्बुल औषधि का मूलार्क या 3 शक्ति देनी चाहिए।
सिम्फोरीकार्पस रेसमोसा Symphoricarpus Racemosa
सिम्फोरीकार्पस रेसमोसा औषधि स्त्रियों में गर्भाकाल के दौरान होने वाली अविराम वमन (लगातार उल्टी का होना) और जी का मिचलाना जैसे लक्षणों में बहुत असरकारक साबित होती है।
इसके अलावा पेट में कब्ज का बनना, आमाशय की परेशानियां, मुंह में पानी भर जाना, मुंह का स्वाद खराब हो जाना, किसी भी तरह के भोजन को देखते ही जी का खराब हो जाना, मासिकस्राव के समय जी का मिचलाना आदि में भी ये औषधि लाभदायक साबित होती है।
वृद्धि-
रोग किसी भी प्रकार की गति करने से बढ़ जाता है।
शमन-
पीठ के बल लेटने से रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
रोगी को सिम्फोरीकार्पस रेसमोसा औषधि की 2 से 3 शक्ति तक देनी चाहिए।
जानकारी-
रोगी को सिम्फोरीकार्पस रेसमोसा औषधि की 200 शक्ति तक नियमित रूप से देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल पहले की तरह स्वस्थ हो जाता है।
सिम्फाइटम Symphytum
सिम्फाइटम औषधि किसी भी प्रकार की चोट के लगने जैसे कि किसी चीज से कट जाने पर, गिरने से, मोच आ जाने से में बहुत लाभ करती है। इसके अलावा ये औषधि टूट्टी हुई हड्डी को जोड़ने में भी बहुत मदद करती है। हड्डी जुड़ने या चोट के ठीक हो जाने के बाद उस स्थान पर हल्का सा दर्द रह जाने को भी ये औषधि बिल्कुल दूर कर देती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सिम्फाइटम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के माथे के पीछे, माथे के ऊपर और माथे में जगह बदल-बदलकर होने वाला दर्द जो नाक की हड्डी में पहुंच जाता है, रोगी के जबड़े की नीचे वाली हड्डी में जलन होना, हड्डी का सख्त, लाल और सूज जाना आदि लक्षणों में रोगी को सिम्फाइटम औषधि देना बहुत ही प्रभावशाली रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों में किसी तरह की नुकीली या औजार से चोट लग जाने के बाद आंखों में बहुत तेज दर्द होना, आंखों के अंदर की किसी भी तरह की चोट आदि लक्षणों के आधार पर सिम्फाइटम औषधि का सेवन काफी लाभदायक रहता है।
वृद्धि-
छूने से, किसी तरह की हरकत करने से, दबाने से, शस्त्र की चोट या जख्म होने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्मी से रोगी का रोग कम हो जाता है।
तुलना-
आर्नि, कैलेन्ड, कैल्क-फास, फ्लोर-एसिड, हिपर और साइलीशिया के साथ सिम्फाइटम औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सिम्फाइटम औषधि का मूलार्क देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
जानकारी-
किसी तरह की जख्मों और मलद्वार की खुजली में सिम्फाइटम औषधि का बाहरीय प्रयोग पट्टी आदि के रूप में किया जा सकता है।
सिफिलीनम Syphilinum
सिफिलम औषधि त्वचा के रोगों के लिए बहुत ही उपयोगी मानी जाती है। अक्सर गर्मी के कारण होने वाले जख्म और फोड़े-फुंसियां किसी दवा के लेने के कारण दब जाते है। ऐसा रोगियों को सिफिलम औषधि देने से ये औषधि उन दबे हुए जख्मों और फोड़े-फुंसियों को बाहर निकाल देती है और ठीक कर देती है। इन फोड़े-फुसियों का बाहर दुबारा निकलकर ठीक होना रोगी के लिए बहुत ही फायदेमंद साबित होता है। इन दबे हुए फोड़े-फुंसियों और जख्मों को बाहर निकालकर ठीक करने के बाद रोगी के शरीर में ताकत बढ़ जाती है, उसे भूख भी खुलकर लगने लगती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सिफिलीनम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- याददाश्त का कमजोर होना जैसे किसी भी बात को या काम को तुरंत ही भूल जाना, रोगी को कोई रोग होने से पहले की सारी बाते याद रहती है, रोगी ये महसूस करता है कि वो कभी भी ठीक नही हो पाएगा, हर समय उदास सा बैठा रहता है, इस तरह के मानसिक रोग के लक्षणों में रोगी को सिफिलीनम औषधि देने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर में दर्द होना जैसे कि वो बेहोश होकर गिर पड़ेगा, सिर की हडि्डयों में दर्द होना, बालों का झड़ जाना, कनपटियों के आरपार बहुत तेज दर्द का होना, रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसके माथे के ऊपर का भाग निकलकर बाहर आ रहा हो, आंखों से पीछे की ओर दर्द का होना जिसके कारण रोगी को रात में नींद नही आती। इन लक्षणों में अगर रोगी को सिफिलीनम औषधि दी जाए तो उसके लिए काफी लाभकारी साबित होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों की कनीनिका पर पुराना छाला जो बार-बार हो जाता है और उसमे जलन भी काफी होती है, कनीनिका में फफोलों के झुण्ड और कनीनिका के उपकला तलों के छिले हुए जख्म, आंखों से हर समय आंसुओं का निकलते रहना, पलकों में सूजन आना, पलकों का पक्षाघात, आंखों से हर चीज दो-दो दिखाई देना, क्षयप्रकृतिक परितारिकाशोथ (ट्युबेरकुलर इरिटीस), आंखों पर ऐसा महसूस होना जैसे कि ठंडी हवा बह रही हो आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सिफिलीनम औषधि देने से लाभ होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- नासास्थ्यों का क्षय (नाक की हडि्डयों में टी.बी का रोग हो जाना), इसके साथ ही उनमे छेद हो जाना, पुराना जुकाम, मुंह के तालु का कठोर हो जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को सिफिलीनम औषधि देना बहुत लाभकारी होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- मसूढ़ों से लेकर दांतों तक की टी.बी, जीभ पर मोटी सी मैल की परत का जम जाना, जीभ के ऊपर दांतों से निशान का बन जाना, दांतों के किनारे टेढ़े-मेड़े हो जाना, मुंह से बहुत ज्यादा लार का आना, सोते समय रोगी के मुंह से लार बाहर बहती रहती है, इस तरह के लक्षणों में रोगी को सिफिलीनम औषधि का सेवन कराना काफी लाभदायक साबित होता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्री के योनि वाले भाग पर जख्म सा होना, प्रदर-स्राव अर्थात योनि में से बहुत ज्यादा मात्रा में पतला सा, तीखा स्राव का आना और इसके साथ ही डिम्बग्रन्थियों में बहुत तेजी से दर्द का होना जैसे किसी ने किसी पैने हथियार से काट दिया हो। इस तरह के लक्षणों में अगर रोगी को सिफिलम औषधि दी जाए तो उसके लिए काफी लाभदायक साबित होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आवाज का बिल्कुल बंद हो जाना, गर्मी के मौसम में होने वाला और लंबे समय तक चलने वाला दमा रोग, सूखी खांसी जो रात के समय ज्यादा होती है, सांस की नली को छूते ही परेशानी पैदा होना, रात के समय दिल के भाग से अग्रकोण तक किसी चीज के द्वारा काट दिये जाने जैसा दर्द होने आदि में सिफिलम औषधि लेने से लाभ होता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण- रोगी का मलान्त्र संकीर्णताओं से जकड़ा हुआ सा महसूस होता है, रोगी को एनिमा लेते समय बहुत दर्द होना, मलान्त्र का चिर सा जाना, मलान्त्र में दरार पड़ जाना जैसे लक्षणों में रोगी को सिफिलम औषधि देने से लाभ मिलता है।
बाहरीय अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी को गृध्रसी (साइटिका) का दर्द होना जो रात को बढ़ता है और सुबह कम हो जाता है, स्कंधसंधि का गठिया हो जाना, त्रिकोणपेशी के जोड़ पर, अंगुलबेढ़ा, दीर्घास्थियों में तेज दर्द, पैरों की उंगलियों के बीच में घाव और लालपन आना, गठिया का रोग होना, रोगी हमेशा हाथ धोता रहता है। इन सारे लक्षणों में रोगी को सिफिलम औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा पर लाल या रंग की फुंसियां निकलना और इसके साथ ही बहुत ज्यादा बदबू आना, बहुत ज्यादा शीर्णता आने जैसे रोगों के लक्षणों में रोगी को सिफिलम औषधि देने से लाभ होता है।
वृद्धि-
रात को, रात को सूरज ढलने से लेकर सुबह सूरज उगने तक, समुद्र के किनारे, गर्मी के मौसम में रोग बढ़ जाता है।
शमन-
समुद्र से दूर, पहाड़ों पर, दिन के समय, धीरे-धीरे घूमते रहने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
सिफिलम औषधि की तुलना मर्क्यू,, काली-हाइड्रा, नाइट्रि-ए, औरम, एलूमि से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सिफिलम औषधि की ऊंची शक्तियां देने से रोगी को बहुत जल्दी आराम मिलता है।
सावधानी-
सिफिलम औषधि को दूसरी बार इस्तेमाल करने में काफी समय का अंतर होना चाहिए।
साइजीजियम जाम्बोलैनम (जामुन के बीज)
होम्योपैथिक चिकित्सा में साइजीजियम जाम्बोलैनम औषधि को मधुमेह रोग (डायबटीज) के लक्षणों जैसे रोगी को बार-बार प्यास का लगना, पेशाब का बार-बार आना, शरीर में कमजोरी आना, त्वचा पर जख्म होना आदि की सबसे असरकारक औषधि के रूप में जाना जाता है। इस औषधि के प्रभाव से जितनी जल्दी मधुमेह रोग (डायबिटीज) कम होता है उतना जल्दी असर और किसी औषधि के प्रभाव से नहीं होता।
तुलना-
साइजीजियम जाम्बोलैनम औषधि की तुलना इन्सुलिन से की जा सकती है।
मात्रा-
साइजीजियम जाम्बोलैनम औषधि का मूलार्क रोगी को देना चाहिए।
साइजीजियम जम्बोलीनम Syzygium Jambolinum
साइजीजियम जम्बोलीनम औषधि मधुमेह (डायबिटीज) तथा बार-बार पेशाब आने जैसे रोगों में बहुत उपयोगी साबित होती है। इसके अलावा ये औषधि त्वचा पर घमौरियों जैसे दाद, फुंसियां, खुजली और कमजोरी आदि में बहुत लाभ करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आघार पर साइजीजियम जम्बोलीनम औषधि का उपयोग-
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बार-बार प्यास लगना, रोगी को हर दो घंटे के बाद पेशाब का आना, पेशाब में चीनी का आना आदि मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को साइजीजियम जम्बोलीनम औषधि देने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- शरीर के ऊपर के भाग में छोटी-छोटी और लाल-लाल फुंसियां जिनके अंदर बहुत तेज खुजली होती है, त्वचा पर पुराने जख्म, मधुमेह रोग के कारण शरीर पर किसी तरह का जख्म हो जाना आदि में साइजीजियम जम्बोलीनम औषधि का प्रयोग कराने से आराम आता है।
मात्रा-
रोगी को साइजीजियम जम्बोलीनम औषधि का मूलार्क या 2 से 3 शक्ति देनी चाहिए।
सेलेनम जैंथोकार्पम Solanum Xanthocarpum (kantikari)
सेलेनम जैंथोकार्पम औषधि को सांस के रोगों की एक बहुत ही उत्तम औषधि के रूप में जाना जाता है जैसे खांसी के साथ गले में खराश होना, सर्दी-जुकाम के साथ बुखार का आना, छाती में दर्द होना, सांस की नलियों से सम्बंधित निमोनिया का बुखार, सांस के रोगों के साथ आवाज का बंद हो जाना, पेशाब में रुकावट होना, सांस की नली में जलन और दमा आदि में इस औषधि को बहुत ही लाभकारी औषधि माना गया है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सेलेनम जैंथोकार्पम औषधि का उपयोग-
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बुखार आने के साथ ही बहुत तेजी से प्यास का लगना, भोजन को देखते ही रोगी की भूख अपने आप समाप्त हो जाना, रोगी के पूरे शरीर में जलन और दर्द होना जैसे बुखार के लक्षणों में रोगी को सेलेनम जैंथोकार्पम औषधि देने से लाभ मिलता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को खांसी होने के साथ में गले में खराश सी महसूस होना, सांस की नलियों की जलन के कारण होने वाला निमोनिया, दमा आदि सांस के रोगों के लक्षणों में रोगी को सेलेनम जैंथोकार्पम औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- पेशाब का रुक-रुककर आना, पेशाब की नली का सिकुड़ जाना, पेशाब का बंद हो जाना जैसे मूत्ररोगों के लक्षणों में रोगी को सेलेनम जैंथोकार्पम औषधि का कराना बहुत उपयोगी साबित होता है।
मात्रा-
अगर किसी रोगी को उसके रोग के लक्षणों के आधार पर सेलेनम जैंथोकार्पम औषधि का मूलार्क या 2 से 3 शक्ति तक दी जाए तो इसके सेवन से रोगी कुछ ही दिन में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
सेलिडेगा विर्गो Solidago Virga
सेलिडेगा विर्गो औषधि को कमजोरी में, ठण्ड लगने के साथ बुखार का आना, नाक मे सर्दी का लगना, गले में जलन होना, गुर्दो के भाग में दर्द, पेशाब में जलन होना जैसे रोगों में उपयोग करना काफी लाभदायक रहता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सेलिडेगा विर्गो औषधि से होने वाले लाभ-
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की जननेन्द्रियों पर खुजली होने के कारण निशान से पड़ जाना, जननेन्द्रियों पर चेचक जैसे दाने निकलना इसके साथ ही मूत्रयंत्रों की विश्रंखलायें, सूजन और कोथ आदि लक्षणों में रोगी को सेलिडेगा विर्गो औषधि देने से लाभ होता है।
पीठ से सम्बंधित लक्षण- रोगी के गुर्दों में खून का बहाव रुक जाने के कारण पीठ में दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी को सेलिडेगा विर्गो औषधि का प्रयोग कराना लाभकारी रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- पेशाब का कम मात्रा में लाल या बादामी रंग में आना, पेशाब का तलछट के साथ आना, पेशाब करते समय जलन होना, गुर्दे में पथरी होना, पेशाब में अन्नसार, खून और श्लेष्मा का आना, गुर्दों में दर्द जो सामने पेट और मूत्राशय तक फैल जाता है, पेशाब का बदबू के साथ आना जैसे लक्षणों में रोगी को सेलिडेगा विर्गो औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- सांस की नली में जलन होना, खांसी के साथ बहुत ज्यादा मात्रा में बलगम का आना, बलगम के साथ खून का आना, सांस का धीरे-धीरे से चलना, सांस लेने में परेशानी होना, दमा रोग के साथ रात के समय पेशाब में जलन होना जैसे लक्षणों में रोगी को सेलिडेगा विर्गो औषधि का प्रयोग करना अच्छा रहता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण- गर्भाशय का बढ़ जाना जिसके कारण मूत्राशय के ऊपर दबाव पड़ता है, तत्वाबुर्द (फिक्रोइड ट्युमरस) आदि लक्षणों में रोगी को सेलिडेगा विर्गो औषधि देना अच्छा रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- मुंह का स्वाद खराब हो जाना खासकर रात को सोते समय, जीभ पर मोटी सी परत का जमना, साथ ही अत्यल्प, बादामी और अम्ल मूत्र जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को सेलिडेगा विर्गो औषधि देने से लाभ मिलता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- नाक से बहुत ज्यादा मात्रा में स्राव का आना, बार-बार छीकों का आना आदि लक्षणों में सेलिडेगा विर्गो औषधि बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
तुलना-
आयोडोफार्म और आर्सेनिक से सेलिडेगा विर्गो औषधि की तुलना की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को सेलिडेगा विर्गो औषधि का मूलार्क या 3 शक्ति तक देनी चाहिए।
सोरिनम Sorinum
जब कोई नया रोग ठीक होने की अवस्था में होता है तो उस समय रोगी के शरीर में कमजोरी आ जाती है, रोगी थोड़ी सी भी शारीरिक मेहनत करता है तो बहुत ज्यादा थक जाता है, उसका पूरा शरीर पसीने से भीग जाना, अगर रोगी मेहनत नहीं करता तो उसकी त्वचा बिल्कुल सूख जाती है। इस तरह के रोगों और रोगों के लक्षणों में सोरिनम औषधि बहुत ही अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सोरिनम औषधि से होने वाले लाभ-
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के शरीर में तेज गर्मी के साथ खुजली होना शुरू हो जाना, रोगी के रात को बिस्तर पर लेटते ही खुजली ज्यादा हो जाती है, खुजली इतनी तेज होती है कि रोगी के खुजाते-खुजाते त्वचा पर से खून निकलने लग जाता है, रोगी की त्वचा पर सूखे दाने निकल जाना जिनमें पपड़ी सी जम जाती है, ये दाने गर्मी में दब जाते है और सर्दी के मौसम में निकल आते है, रोगी के उंगलियों के बीच में और घुटनों के जोड़ों में खुजली सी होना, रोगी की त्वचा का बहुत ज्यादा गंदा सा लगना, रोगी की त्वचा में से बदबू आना जो नहाने के बाद भी कम नही होती जैसे लक्षणों में रोगी को सोरिनम औषधि देने से लाभ मिलता है।
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी का हर समय दुखी सा रहना, रोगी को लगता है जैसे कि उसका जीवन बेकार है, किसी काम का नहीं है, रोगी अपने आपको बहुत ज्यादा कमजोर महसूस करता है, रोगी अगर जरा सा भी हिलता-डुलता है तो उसे पसीना आने लगता है इसलिए वो चुपचाप बिना हिले-डुले लेटा रहता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को सोरिनम औषधि देना लाभदायक रहता है।
वृद्धि-
बिस्तर की गर्मी से, ठण्डी हवा में आने पर, उठने-बैठने पर तथा हिलने-डुलने पर रोगी का रोग बढ़ जाता है।
शमन-
भुजाओं को शरीर के निचले भागों के पास लाने पर, सीने पर कपड़ा डाल लेने पर रोगी का रोग कम हो जाता है।
स्पाइजिलिया एथलमिण्टिका Spaijiliya Athlmintica
स्पाइजिलिया एथलमिण्टिका औषधि को दिल के रोगों की एक बहुत ही गुणकारी औषधि माना जाता है। दिल के रोगों में जब रोगी के दिल की धड़कन बहुत तेज हो जाती है तब इस औषधि को प्रयोग करने से लाभ मिलता है। दिल के रोगों के अलावा ये औषधि दिल के कपाटों के रोग में बहुत अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्पाइजिलिया एथलमिण्टिका औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर के पीछे के हिस्से में एक तरफ दर्द होना जो सिर के पीछे के भाग मे रुककर सामने की ओर आकर बाईं आंख पर आकर रुक जाता है। थोड़े से शोर-शराबे से ही रोगी का सिरदर्द बढ़ जाता है। रोगी का सिरदर्द सुबह सूरज उगने के साथ तेज होता है और शाम को सूरज ढलने के साथ ही कम हो जाता है। इस तरह के लक्षणों में अगर रोगी को स्पाइजिलिया एथलमिण्टिका औषधि दी जाए तो रोगी कुछ ही समय में स्वस्थ हो जाता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों के रोगों के लक्षणों में रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसकी आंखों के अंदर के गोले काफी बड़े होकर आंखों से बाहर आ रहे हो, रोगी की पलकों में बहुत तेज दर्द होना, आंखों से हर समय पानी बहते रहना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को स्पाइजिलिया एथलमिण्टिका औषधि देने से लाभ मिलता है।
वृद्धि-
ज्यादा शोर-शराबे से, हिलने-डुलने से, सांस लेने पर, आंख को हिलाने पर, बारिश के मौसम में, ठण्डे मौसम में तथा सूरज उगने पर रोगी का रोग बढ़ जाता है।
शमन-
चुपचाप पड़े रहने पर, सूखी हवा में तथा सूरज के ढलने के साथ ही रोगी का रोग कम होने लगता है।
तुलना-
स्पाइजिलिया एथलमिण्टिका औषधि की तुलना चायना, स्पाइजिलिया तथा बेलेडोना से की जा सकती है।
स्पार्टियम स्कोपैरियम-सिस्टिसस स्कोपैरियस Spartium Scoparium-Cystisus Scoparius (Broom)
स्पार्टियम स्कोपैरियम-सिस्टिसस स्कोपैरियस औषधि का प्रमुख काम दिल की ताकत को बढ़ाना, दिल की धड़कन को कम करना और रक्तचाप को कम करना है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में स्पार्टियम स्कोपैरियम-सिस्टिसस स्कोपैरियस औषधि का उपयोग-
दिल से सम्बंधित लक्षण- जो लोग तंबाकू का सेवन ज्यादा करते है उन लोगों को होने वाले रोग जैसे सीने में दर्द होना, दिल की धड़कन का अनियमित होना जैसे कभी बहुत धीरे से और कभी बहुत तेजी से, दिल में पानी भर जाना, निम्न रक्तचाप (लो ब्लड प्रेशर), हिस्टीरिया रोग से ग्रस्त रोगियों का दिल कमजोर हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को स्पार्टियम स्कोपैरियम-सिस्टिसस स्कोपैरियस औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी की जठरांत्र नली में बहुत ज्यादा हवा भर जाना और इसी के साथ ही रोगी को मानसिक निराशा हो जाना जैसे लक्षणों में रोगी को स्पार्टियम स्कोपैरियम-सिस्टिसस स्कोपैरियस औषधि का सेवन कराना असरकारक रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बार-बार और बहुत ज्यादा मात्रा में पेशाब आना, रोगी के पेशाब के रास्ते में या स्त्री की बाहरी जननेन्द्रियों में जलन होना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को स्पार्टियम स्कोपैरियम-सिस्टिसस स्कोपैरियस औषधि देना काफी असरदार साबित होता है।
मात्रा-
रोगी को स्पार्टियम स्कोपैरियम-सिस्टिसस स्कोपैरियस औषधि की 1 से लेकर 3 शक्ति के विचूर्ण देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
स्पौजिया टोस्टा Spongia Tosta
स्पौजिया टोस्टा औषधि को सांस के रोगों के जैसे खांसी, आवाज की नली की सूजन आदि में इस्तेमाल करना बहुत लाभकारी रहता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्पौजिया टोस्टा औषधि से होने वाले लाभ-
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बार-बार भूख लगना वह चाहे कितना भी भोजन खा ले थोड़ी देर के बाद फिर से भूख-भूख चिल्लाता रहता है, रोगी को बार-बार प्यास लगना, पूरे दिन हिचकियां आते रहना, रोगी को ज्यादा टाईट कपड़े पहनना बर्दाश्त नहीं होता आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी का रात को सोते-सोते अचानक जाग उठना, रोगी को लगता है जैसे कि उसका दम सा घुट रहा है, रोगी को नींद आने के बाद सारे उपसर्ग बढ़ जाते है या रोग के बढ़ने की अवस्था में ही नींद आ जाती है। इस तरह के लक्षणों के आधार पर रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से बहुत लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सांस लेने में परेशानी होना, स्त्रियों को मासिकधर्म आने से पहले या आने के दौरान धड़कन तेज हो जाती है, रोगी का गला बैठ जाना, रोगी जब खांसता है तो उसके गले से ऐसी आवाज निकलती है जैसे कि कोई कुत्ता भौंक रहा हो, सिर को नीचे करने से, ज्यादा गर्म कमरे के अंदर, ठण्डी हवा से खांसी का तेज हो जाना, रोगी को दिन या रात में सूखी खांसी होना, रोगी के सीने में जलन होना, रोगी को खांसी के साथ पीले रंग का, गाढ़ा सा और चिपचिपा बलगम आता हो, खांसी दिन में और रात के समय इतनी तेज होती है कि रोगी सांस भी नही ले पाता आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन कराना अच्छा रहता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- मासिकधर्म का समय से बहुत पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में आना, त्रिकास्थि (रीढ़ की हड्डी के नीचे का भाग) में दर्द सा होना, आमाशय में जलन होना, स्त्रियों के डिम्बों का सख्त हो जाना, स्त्रियों में मासिकधर्म के समय हांथ-पैरों में तेजी से खिंचाव के साथ दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी स्त्री को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से लाभ मिलता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी की जीभ का सूखकर कत्थई रंग का हो जाना तथा जीभ पर पानी वाले फोड़े हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी को हर समय घबराहट और डर सा महसूस होना, किसी भी तरह की उत्तेजना से रोगी की खांसी तेज हो जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में खून का बहाव बहुत तेज होना, बहुत तेजी से सिर में दर्द होना जैसे कि सिर फट रहा हो ये दर्द माथे में ज्यादा होता है आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से आराम मिलता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों से सब कुछ धुंधला-धुंधला दिखाई देना, रोगी की आंखों से पानी सा बहते रहना, आंखों में से चिपचिपा स्राव का होना आदि लक्षणों में स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन प्रभावशाली रहता है।
पुरुष रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के अंडकोषों की नलियां और अंडकोषों में सूजन आना इसके साथ ही उनमे दर्द और स्पर्श असहिश्णुता, अंडकोषों में जलन, अंडकोष के आधे भाग में सूजन आना, जननेन्द्रियों में गर्मी सी लगना आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देनी चाहिए।
गले से सम्बंधित लक्षण- गले की अवटु-ग्रंथि में सूजन आना, गले में सुई के चुभने जैसा महसूस होना और सूखापन आना, रोगी के गले में जलन और डंक लगने जैसा दर्द, गले में जलन होना, मीठे पदार्थ खाने के बाद कष्टों का बढ़ना, रोगी के गले में सुरसुराहटयुक्त खांसी होती है, रोगी को बार-बार खंखारकर गला साफ करना पड़ता है। इन लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से लाभ मिलता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पेट मे बहुत तेजी से होने वाला स्पंदन और इसी के साथ ही रोगी को सांस लेने में परेशानी होना, उसे लेटने में परेशानी होती है तथा आराम करने पर आराम पहुंचता है। रोगी को पेट में दर्द होने और सांस में रुकावट आने के साथ आधी रात के बाद अचानक नींद खुल जाती है, रोगी को ऐसा डर लगना कि वो कुछ समय में मरने वाला है, बेहोशी और कमजोरी लाने वाला पसीना, नसों का सूज जाना आदि लक्षणों मे रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन करना लाभकारी रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी को ऐसा महसूस होना जैसेकि उसकी नाक बंद हो रही हो, रोगी को सर्दी लग जाने के कारण नाक से स्राव का आना, नाक का सूख जाना, नाक की पुरानी सूखी सर्दी आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से लाभ मिलता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा पर खसरे के दाने निकलने के कारण खुजली होना, गर्दन की ग्रंथियों का सूज जाना इसके साथ ही सिर को घुमाने पर तनाव जैसा दर्द होना, दबाने पर दर्द होता है, गलगण्ड आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन कराना लाभकारी होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी के चेहरे की गर्मी और लाली तथा पसीना आना, रोगी को अधीरता के साथ दौरे आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन कराना बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
वृद्धि-
ऊपर की ओर चढ़ते समय, हवा से और आधी रात से पहले रोग बढ़ जाता है।
शमन-
सिर को नीचा करके सोने से और नीचे उतरते समय रोग कम हो जाता है।
तुलना-
स्पौजिया टोस्टा औषधि की तुलना ऐकोना, हीपर, ब्रोम, लैके, मर्क्यू-प्रौटो-आयोडे से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का मूलार्क 2 शक्ति का विचूर्ण या मूलार्क से 3x शक्ति तक देने से लाभ मिलता है।
स्पाइजीलिया (पिंकरूट- स्पाइजी) Spigelia (Pinkroot)
स्पाइजीलिया औषधि शरीर के लगभग सारे स्थानों की नसों के दर्द जैसे सिर, आंख, जबड़ा, गर्दन, कंधा, मुंह, दांत, दिल आदि को दूर कर देती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों आधार पर स्पाइजीलिया औषधि से होने वाले लाभ-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी को जैसे ही कोई नुकीली चीज नज़र आती है वह डरने लगता है जैसे सुई, कील, आलपिन, खूंटी आदि। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को स्पाइजीलिया औषधि का सेवन कराना उपयोगी साबित होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी के दांतों में दर्द का होना जो भोजन करने के बाद और तेज हो जाता है, मुंह से बहुत तेज बदबू का आना, रोगी की जीभ में दरारे पड़ जाने के कारण जीभ में दर्द होना, मुंह का स्वाद बिल्कुल खराब हो जाना जैसे लक्षणों में रोगी को स्पाइजीलिया औषधि का सेवन कराना बहुत ही लाभदायक होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- आंखों की पुतलियों का बहुत ज्यादा फैल जाना, रोगी जैसे ही रोशनी में आता है उसकी आंखों में दर्द चालू हो जाता है, पलकों का स्नायुशूल जो यथार्थ प्रकृति का होता है, स्नायु में होने वाली जलन, रोगी को अपनी आंखें ऐसी महसूस होती है जैसे कि वो बहुत बड़ी हो गई हो और जिन्हे घुमाने पर बहुत दर्द होता है, गठिया रोग के कारण होने वाला आंखों का नेत्राभिश्यंद , आंखों में और उनके चारों ओर बहुत तेज होने वाला दर्द जो आंखों के अंदर तक फैल जाता है जैसे लक्षणों में रोगी को स्पाइजीलिया औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
मलान्त्र से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपने मलान्त्र में खुजली होने के साथ-साथ ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसमें कुछ रेंग सा रहा हो, रोगी को बार-बार मलक्रिया की इच्छा होती है लेकिन मलक्रिया के लिए जाने पर रोगी को मल आता ही नही है, रोगी के मलान्त्र में कीड़े होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्पाइजीलिया औषधि देने से लाभ मिलता है।
दिल से सम्बंधित लक्षण- रोगी की नाड़ी का बहुत धीरे और अनियमित गति से चलना, सांस लेने में परेशानी होना, स्नायु-शूल जो एक बांह से होकर दोनो बांहों तक फैल जाता है, गठिया रोग होने के कारण दिल में सूजन सी आना, रोगी के शरीर का बायां हिस्सा दर्द होना, दिल के अंदर के हिस्से मे जलन होने के साथ बहुत तेज दर्द का होना, भयंकर स्पंदन आदि लक्षणों में रोगी को स्पाइजीलिया औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी के नाक में से स्राव नाक के पीछे के हिस्से से होकर आता है जिसके कारण नाक के आगे का भाग हमेशा ही सूखा रहता है, पुराना नजला होने के साथ-साथ रोगी की नाक के पीछे के हिस्से से स्राव आता रहता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्पाइजीलिया औषधि का उपयोग अच्छा रहता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपने माथे और कनपटियों के नीचे दर्द जो आंखों तक फैल जाता है, सुबह सूरज उगने के साथ शुरू होने वाला दर्द जो शाम को सूरज ढलने के साथ समाप्त भी हो जाता है, रोगी के सिर के पीछे के एक हिस्से में होने वाला सिरदर्द जिसके कारण बाईं आंख में बहुत दर्द होता है और जो गलत काम करने पर बढ़ जाता है, रोगी के सिर में बहुत तेज दर्द जैसे कि किसी ने सिर में कसकर पट्टी बांध रखी हो, रोगी का सिर घूमने के कारण सुनने की शक्ति कमजोर हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को स्पाइजीलिया औषधि का सेवन कराना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
तुलना-
स्पाइजीलिया औषधि की तुलना ऐकोन, आर्स, कैक्ट, डिजि, कैलि-कार्ब, नेजा, कैल्म और स्पाजिया के साथ की जा सकती है।
वृद्धि-
किसी तरह की हरकत करने से, ज्यादा शोर-शराबे से, छूने से, आंखों को फेरने से, हिलने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
सिर को ऊंचा करके और दाहिनी करवट लेटने से रोग कम हो जाता है।
मात्रा-
रोगी को स्पाइजीलिया औषधि की 2 से 30वीं शक्ति तक देने से रोगी को आराम मिलता है।
स्पाइरीया उल्मैरिया Spiraea Ulmaria
रोगी को अपने भोजन की नली में जलन और दबाव सा महसूस होता है तथा उसे लगता है कि उसकी भोजन की नली सिकुड़ सी गई है लेकिन रोगी कुछ भी खाता-पीता है तो उस चीज को निगलने में रोगी को कोई परेशानी नहीं होती।
स्पाइरीया उल्मैरिया रोगी की पेशाब की नली में होने वाली जलन को शांत करती है, ग्लीट और पुर:स्थिस्राव को रोकती है। स्त्री के बच्चे को जन्म देने के बाद होने वाली बेहोशी, मिर्गी और जलांतक (शरीर के किसी हिस्से में पानी भरना) जैसे लक्षणों में इस्तेमाल की जाती है।
स्पाइरैंथिस Spiranthes
स्पाइरैंथिस औषधि बच्चों को दूध पिलाने वाली स्त्री के स्तनों में दूध को बढ़ाती है। इसके अलावा ये औषधि कमर के दर्द, पेट के दर्द और गठिया रोग में भी लाभ करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्पाइरैंथिस औषधि का उपयोग-
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी स्त्री को पुरुष के साथ संभोग करने के दौरान योनि के रास्ते में बहुत तेज जलन होना, स्त्री की योनि में बहुत खुजली हो जाने के कारण योनि का लाल हो जाना, स्त्री का प्रदर-स्राव (योनि मे से पानी आना) खून के साथ आना जैसे लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को स्पाइरैंथिस औषधि दी जाए तो रोगी को काफी लाभ होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के शरीर में बाईं तरफ गृध्रसी (साइटिका) का दर्द होना, रोगी के कंधों में बहुत तेजी से होने वाला दर्द, रोगी के हाथों की नसों का फूल जाना, रोगी के हाथों के सारे जोड़ों में बहुत तेजी से होने वाला दर्द, रोगी के पैरों और उनकी उंगलियों में बहुत ज्यादा ठण्डक महसूस होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्पाइरैंथिस औषधि का सेवन कराना बहुत उपयोगी साबित होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपने हाथ कभी तो बिल्कुल ठण्डे से महसूस होना और कभी बिल्कुल ही तपते हुए लगना, रोगी की हथेलियों पर बहुत ज्यादा पसीना आना जैसे बुखार के लक्षणों में रोगी को स्पाइरैंथिस औषधि देने से लाभ मिलता है।
मात्रा-
रोगी को उसके रोग के लक्षणों को जानकर अगर स्पाइरैंथिस औषधि की 3 शक्ति दी जाए तो इसके सेवन से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
स्पौजिया टोस्टा Spongia Tosta
स्पौजिया टोस्टा औषधि को सांस के रोगों के जैसे खांसी, आवाज की नली की सूजन आदि में इस्तेमाल करना बहुत लाभकारी रहता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्पौजिया टोस्टा औषधि से होने वाले लाभ-
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बार-बार भूख लगना वह चाहे कितना भी भोजन खा ले थोड़ी देर के बाद फिर से भूख-भूख चिल्लाता रहता है, रोगी को बार-बार प्यास लगना, पूरे दिन हिचकियां आते रहना, रोगी को ज्यादा टाईट कपड़े पहनना बर्दाश्त नहीं होता आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी का रात को सोते-सोते अचानक जाग उठना, रोगी को लगता है जैसे कि उसका दम सा घुट रहा है, रोगी को नींद आने के बाद सारे उपसर्ग बढ़ जाते है या रोग के बढ़ने की अवस्था में ही नींद आ जाती है। इस तरह के लक्षणों के आधार पर रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से बहुत लाभ होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सांस लेने में परेशानी होना, स्त्रियों को मासिकधर्म आने से पहले या आने के दौरान धड़कन तेज हो जाती है, रोगी का गला बैठ जाना, रोगी जब खांसता है तो उसके गले से ऐसी आवाज निकलती है जैसे कि कोई कुत्ता भौंक रहा हो, सिर को नीचे करने से, ज्यादा गर्म कमरे के अंदर, ठण्डी हवा से खांसी का तेज हो जाना, रोगी को दिन या रात में सूखी खांसी होना, रोगी के सीने में जलन होना, रोगी को खांसी के साथ पीले रंग का, गाढ़ा सा और चिपचिपा बलगम आता हो, खांसी दिन में और रात के समय इतनी तेज होती है कि रोगी सांस भी नही ले पाता आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन कराना अच्छा रहता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- मासिकधर्म का समय से बहुत पहले और बहुत ज्यादा मात्रा में आना, त्रिकास्थि (रीढ़ की हड्डी के नीचे का भाग) में दर्द सा होना, आमाशय में जलन होना, स्त्रियों के डिम्बों का सख्त हो जाना, स्त्रियों में मासिकधर्म के समय हांथ-पैरों में तेजी से खिंचाव के साथ दर्द होना आदि लक्षणों में रोगी स्त्री को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से लाभ मिलता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी की जीभ का सूखकर कत्थई रंग का हो जाना तथा जीभ पर पानी वाले फोड़े हो जाना आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी को हर समय घबराहट और डर सा महसूस होना, किसी भी तरह की उत्तेजना से रोगी की खांसी तेज हो जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- सिर में खून का बहाव बहुत तेज होना, बहुत तेजी से सिर में दर्द होना जैसे कि सिर फट रहा हो ये दर्द माथे में ज्यादा होता है आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से आराम मिलता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों से सब कुछ धुंधला-धुंधला दिखाई देना, रोगी की आंखों से पानी सा बहते रहना, आंखों में से चिपचिपा स्राव का होना आदि लक्षणों में स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन प्रभावशाली रहता है।
पुरुष रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के अंडकोषों की नलियां और अंडकोषों में सूजन आना इसके साथ ही उनमे दर्द और स्पर्श असहिश्णुता, अंडकोषों में जलन, अंडकोष के आधे भाग में सूजन आना, जननेन्द्रियों में गर्मी सी लगना आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देनी चाहिए।
गले से सम्बंधित लक्षण- गले की अवटु-ग्रंथि में सूजन आना, गले में सुई के चुभने जैसा महसूस होना और सूखापन आना, रोगी के गले में जलन और डंक लगने जैसा दर्द, गले में जलन होना, मीठे पदार्थ खाने के बाद कष्टों का बढ़ना, रोगी के गले में सुरसुराहटयुक्त खांसी होती है, रोगी को बार-बार खंखारकर गला साफ करना पड़ता है। इन लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से लाभ मिलता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पेट मे बहुत तेजी से होने वाला स्पंदन और इसी के साथ ही रोगी को सांस लेने में परेशानी होना, उसे लेटने में परेशानी होती है तथा आराम करने पर आराम पहुंचता है। रोगी को पेट में दर्द होने और सांस में रुकावट आने के साथ आधी रात के बाद अचानक नींद खुल जाती है, रोगी को ऐसा डर लगना कि वो कुछ समय में मरने वाला है, बेहोशी और कमजोरी लाने वाला पसीना, नसों का सूज जाना आदि लक्षणों मे रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन करना लाभकारी रहता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी को ऐसा महसूस होना जैसेकि उसकी नाक बंद हो रही हो, रोगी को सर्दी लग जाने के कारण नाक से स्राव का आना, नाक का सूख जाना, नाक की पुरानी सूखी सर्दी आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि देने से लाभ मिलता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी की त्वचा पर खसरे के दाने निकलने के कारण खुजली होना, गर्दन की ग्रंथियों का सूज जाना इसके साथ ही सिर को घुमाने पर तनाव जैसा दर्द होना, दबाने पर दर्द होता है, गलगण्ड आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन कराना लाभकारी होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी के चेहरे की गर्मी और लाली तथा पसीना आना, रोगी को अधीरता के साथ दौरे आदि लक्षणों में रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का सेवन कराना बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
वृद्धि-
ऊपर की ओर चढ़ते समय, हवा से और आधी रात से पहले रोग बढ़ जाता है।
शमन-
सिर को नीचा करके सोने से और नीचे उतरते समय रोग कम हो जाता है।
तुलना-
स्पौजिया टोस्टा औषधि की तुलना ऐकोना, हीपर, ब्रोम, लैके, मर्क्यू-प्रौटो-आयोडे से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्पौजिया टोस्टा औषधि का मूलार्क 2 शक्ति का विचूर्ण या मूलार्क से 3x शक्ति तक देने से लाभ मिलता है।
स्कुइला Sqilla
स्कुइला औषधि को सांस के रोगों में बहुत ही असरकारक औषधि माना जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्कुइला औषधि से होने वाले लाभ-
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को खांसी के साथ-साथ छींकों का आना, रोगी को इतनी तेजी से खांसी उठती है जिसके कारण रोगी की आंखों में पानी आ जाता है, खांसते-खांसते रोगी का पेशाब निकल जाना, रोगी के गले में अजीब-अजीब सी आवाज होना, रोगी को खांसी के साथ बहुत ज्यादा बलगम आना जैसे लक्षणों में रोगी को स्कुइला औषधि देने से लाभ मिलता है।
स्क्विल्ला मैरीटीमा Squilla Maritima
स्क्विल्ला मैरीटीमा औषधि को फेफड़ों के रोगों मे बहुत ही असरकारक औषधि के रूप में जाना जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों में स्क्विल्ला मैरीटीमा औषधि से होने वाले लाभ-
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी का आमाशय बिल्कुल पत्थर की तरह सख्त हो जाने पर स्क्विल्ला मैरीटीमा औषधि का प्रयोग लाभकारी रहता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी आंखों में ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसकी आंखें जल रही हो, बच्चा अपनी मुट्ठी से आंखों का रगड़ता रहता है, रोगी को ऐसा लगता है जैसे कि उसकी आंखें पानी में तैर रही हो। इन लक्षणों में अगर रोगी को स्क्विल्ला मैरीटीमा औषधि दी जाए तो ये उसके लिए बहुत ही लाभकारी सिद्ध होती है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- सर्दी लग जाने के कारण रोगी की नाक से स्राव का आना, नाक के नथुनों के किनारे पर जख्म से महसूस होते है, बार-बार छींके आना, गले में जलन सी महसूस होना, रुक-रुककर होने वाली सूखी खांसी, रोगी को गहरी-गहरी सांस लेनी पड़ती है, रोगी को सांस लेने में परेशानी होती है। रोगी की छाती में ऐसा दर्द होता है जैसे कि कोई उसमे सुई सी चुभा रहा हो, पेट की पेशियों को सिकुड़ जाने के कारण दर्द हो जाना, रोगी को खांसी होने के साथ बहुत ज्यादा बलगम का आना, पेशाब का अपने आप ही बूंद-बूंद करके टपकते रहना, रात को सोते समय बार-बार पेशाब का आना, बच्चे को खांसी होने पर वह मुट्ठी से चेहरे को रगड़ता है। इन लक्षणों में अगर रोगी को स्क्विल्ला मैरीटीमा औषधि दी जाए तो उसके लिए बहुत ही लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पूरे शरीर पर छोटे-छोटे से लाल रंग के दाने से निकलना जिनके अंदर बहुत तेज किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होता है आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को स्क्विल्ला मैरीटीमा औषधि देना लाभदायक रहता है।
शरीर बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी के हाथ-पैरों का बिल्कुल बर्फ की तरह ठण्डा हो जाना तथा शरीर के बाकी सारे अंग गर्म ही रहना, रोगी अगर खड़ा रहता है तो उसके पैरों में दर्द होने लगता है। इन लक्षणों में अगर रोगी को स्क्विल्ला मैरीटीमा औषधि का सेवन लाभदायक रहता है।
वृद्धि-
गति करने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
आराम करने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
स्क्विल्ला मैरीटीमा औषधि की तुलना डिजिटै, स्ट्रोफैन्थ, एपोसा-कै, ब्रायो, काली-का से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्क्विल्ला मैरीटीमा औषधि की 1 से 3 शक्ति तक देने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
स्टैनम मेटालिकम Stanum Metaliku
स्टैनम मेटालिकम औषधि को शरीर में कमजोर आने पर उपयोग करने से रोगी को काफी लाभ मिलता है खासकर छाती से शुरु होने वाले कमजोरी में ये औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्टैनम मेटालिकम औषधि से होने वाले लाभ-
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी को पूरे शरीर में ठण्ड लगने के साथ कंपकंपी महसूस होना, रोगी को होने वाला विषम ज्वर (मलेरिया), रोगी को हर समय फेफड़ों और सांस की नलियों में किसी तरह का रोग होने पर हल्का-हल्का सा बुखार बना रहता है, रोगी को सर्दी सुबह 10 बजे के लगभग शुरू होती है तथा कंपकंपी के साथ ही रोगी की उंगलियों का अगला भाग सुन्न पड़ जाता है, रोगी को बहुत ही गंदा, बदबूदार पसीना आता है जो सुबह के लगभग 4 बजे आता है और इसके बाद रोगी को शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस होती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण- रोगी को रात में सोते-सोते अपने आप ही वीर्यपात हो जाता है, रोगी की यौन उत्तेजना तेज होने के कारण उसका मन संभोग क्रिया करने का बहुत ज्यादा करता है, लेकिन उसकी जननेन्द्रियां बिल्कुल उत्तेजित नहीं होती। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देना लाभकारी रहता है।
मन से सम्बंधित लक्षण- मानसिक रोगों से ग्रस्त रोगी हर समय अकेला ही बैठा रहता है, रोगी को अगर किसी पार्टी वगैरह में भी ले जाया जाए तो वहां पर भी वो अकेला रहना पसंद करता है, रोगी इतना कमजोर हो जाता है कि अगर उससे कोई कुछ पूछ लेता है तो वह सहजता से उसका जवाब नहीं दे पाता, छोटे बच्चों को अगर बाहर घुमाने ले जाया जाए तो वो चाहता है कि उसे कंधे पर बैठाकर घुमाया जाए, अगर रोगी के सामने बहुत ज्यादा लोग इकट्ठे हो जाए तो रोगी डरने लगता है। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देने से लाभ मिलता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्रियों को प्रदर-स्राव (योनि में से पानी आना) के साथ शरीर में बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस होना जो छाती में ज्यादा महसूस होती है, स्त्रियों का मासिकस्राव आने से पहले उनमें यौन उत्तेजना बहुत तेज हो जाती है, मासिकस्राव समय से पहले और जल्दी-जल्दी आना और उसमे खून ज्यादा मात्रा में आना, स्त्रियों को जब मासिकस्राव आने वाला होता है तो उससे पहले उनमे एक अजीब सी तरह की उदासी छा जाती है। इस तरह के लक्षणों में अगर रोगी स्त्री को स्टैनम मेटालिकम औषधि दी जाए तो रोगी कुछ ही समय में स्वस्थ हो जाता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी मूत्राशय की पेशियां ऐसी महसूस होती है जैसे कि उन्होंने बिल्कुल काम करना बंद कर दिया हो, रोगी को पेशाब आता रहता है फिर भी वह पेशाब करने नहीं जाना चाहता आदि लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देने से लाभ मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बार-बार भूख लगना, रोगी ने अगर अभी भोजन करा हो तो थोड़ी देर के बाद वो फिर से भोजन मांगने लगता है, आमाशय में जख्म हो जाने के कारण दर्द उठना जो धीरे-धीरे शुरू होकर तेज हो जाता है और फिर धीरे-धीरे अपने आप ही कम होता हुआ चला जाता है, रोगी को पूरे दिन कड़वी डकारें आती रहती है, सुबह के समय रोगी के जागने पर जी मिचलाने के साथ उल्टी आने लगती है, रोगी को भोजन की खुशबू से ही जी मिचलाने लगता है, रोगी को अपना आमाशय बिल्कुल खाली-खाली महसूस होता है, रोगी को हर चीज का स्वाद बिल्कुल कड़वा लगता है सिर्फ पानी को छोड़कर, रोगी की नाभि के भाग में खालीपन के साथ रोगी का शरीर सूखता चला जाता है। इस तरह के लक्षणों में अगर रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि दी जाए तो रोगी कुछ ही समय में स्वस्थ हो जाता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी के हाथों की हथेलियों और पैरों के तलुवों में जलन सी होना, रोगी को अपने हाथ-पैर कमजोर से महसूस होते है, रोगी को हाथ-पैरों में दबाव के साथ खिंचाव और जलन सी महसूस होती है, रोगी को अपने शरीर में इतनी ज्यादा कमजोरी महसूस होती है कि अगर वह कुर्सी या जमीन पर बैठने की कोशिश करता है तो गिर पड़ता है, रोगी अगर सुबह के समय घूमने जाता है तो उसे रास्ते में कई बार बैठना पड़ता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि का सेवन कराना उपयोगी रहता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी को होने वाला स्नायविक सिर का दर्द जो धीरे-धीरे से शुरू होकर तेज हो जाता है, काफी देर तक रोगी के सिर में दर्द रहता है और फिर अपने आप ही धीरे-धीरे कम होता हुआ चला जाता है। सिर में तेज दर्द होने के कारण रोगी का चेहरा पीला-पीला सा और आंखें अंदर की ओर धसं जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देना उपयोगी साबित होता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- गाना गाने वाले या ज्यादा बोलने वाले लोगों का गला खराब हो जाना, रोगी की जीभ पर पीले रंग की मैल की परत का चढ़ना, गले के अंदर से आने वाला खोखला स्वर जो खांसी आने पर या बलगम के निकल जाने पर ठीक हो जाता है आदि लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि का सेवन कराना उपयोगी रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को हर समय खुसखुस करती हुई परेशान करने वाली खांसी होती रहती है, रोगी की सांस की नलियों में जलन होना, रोगी को होने वाली ढीली खांसी जिसमें रोगी के गले से हरा, गाढ़ा और मीठा सा बलगम निकलता रहता है, रोगी अगर किसी से बात करता है तो वह भी ठीक से नहीं कर पाता, रोगी को अपने पूरे शरीर में कमजोरी महसूस होती है खासकर छाती में, रोगी अगर सीढ़ियां चढ़ता है तो उसे कोई परेशानी नहीं होती लेकिन जैसे ही वह नीचे उतरता है तो उसे कमजोरी के साथ चक्कर से आने लगते हैं, रोगी अगर कोई मेहनत का काम करता है तो उसकी सांस फूलने लगती है और उसे अपने कपड़े ढीले करने पड़ते है। इन सारे लक्षणों में अगर रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि दी जाए तो ये उसके लिए काफी लाभकारी रहता है।
वृद्धि-
रोगी अगर ज्यादा तेज आवाज में बोलता है या गाना गाता है, सुबह के 10 बजे, दाईं करवट लेटने से, सीढ़ियां उतरने से, हंसने से, गति करने से, गर्म चाय या काफी पीने से रोगी का रोग बढ़ जाता है।
शमन-
जोर से दबाने से, बलगम के निकल जाने पर, तेजी से गति करने से रोगी का रोग कम हो जाता है।
प्रतिविष-
हिपर और पल्स औषधि का उपयोग स्टैनम मेटालिकम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने में किया जाता है।
अनुपूरक-
पल्सटिला।
तुलना-
स्टैनम मेटालिकम औषधि की तुलना काष्टिकम से की जा सकती है।
स्टैनम (टिन- स्टैनम)
स्टैनम औषधि का सबसे अच्छा असर स्नायुसंस्थान और सांस की नलियों पर पड़ता है। स्टैनम औषधि का ज्यादातर प्रयोग तब किया जाता है जब रोगी के फेफड़ों में किसी तरह का रोग या सांस की नलियों में जलन होने के साथ ही टी.बी रोग होने के कारण शरीर में जख्म होने से होने वाला पीब का स्राव हो और रोगी को बहुत ज्यादा कमजोरी आ जाए।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्टैनम औषधि से होने वाले लाभ-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी को दूसरे लोगों से मिलने में डर लगता है, रोगी हर समय अकेले में और दुखी सा बैठा रहता है, रोगी को लगता है कि उसका जीवन किसी काम का नहीं है। इस तरह के लक्षणों में अगर रोगी को स्टैनम औषधि दी जाए तो रोगी जल्दी ही ठीक हो जाता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी को कनपटियों और माथे में बहुत तेजी से होने वाला दर्द, रोगी को तेज सर्दी-जुकाम या इंफ्लुएंजा के कारण होने वाली खांसी, रोगी के सिर में दर्द बहुत धीरे-धीरे बढ़ता है और कुछ समय के बाद धीरे-धीरे ही कम हो जाता है, रोगी को अपना माथा ऐसा महसूस होता है जैसे कि कोई उसे अंदर की ओर दबा रहा हो, गण्डास्थियों और चक्षुगह्यरों में खिंचाव के साथ होने वाला दर्द, कान के छेद में बाली आदि पहनने से होने वाले जख्म जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को स्टैनम औषधि देने से लाभ मिलता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी चाहे जितना भी भोजन खा ले लेकिन फिर भी उसे भूख लगती रहती है। भोजन पकाते समय भोजन की खुशबू से रोगी को उल्टी होने लगती है। रोगी के मुंह का स्वाद बिल्कुल कड़वा हो जाता है। रोगी के आमाशय को हल्का सा दबाने से आमाशय का दर्द कम हो जाता है। रोगी को अपना आमाशय बिल्कुल खाली सा लगता है। इस तरह के लक्षणों में अगर रोगी को स्टैनम औषधि दी जाए तो ये उसके लिए बहुत ही उपयोगी साबित होती है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी नाभि के चारों तरफ बायंटेदार दर्द होना, रोगी को अपना पेट बिल्कुल खाली और अंदर की ओर धंसता हुआ महसूस होता है। रोगी के पेट का दर्द दबाने से कम हो जाता है। इन लक्षणों में अगर रोगी को स्टैनम औषधि का सेवन कराया जाए तो बहुत लाभदायक साबित होता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी अगर जोर से खांसता है तो उसके गले से बलगम निकलता है। रोगी को शाम से लेकर आधी रात तक बहुत तेज सूखी खांसी होती रहती है। रोगी अगर हंसता गाता है, ज्यादा जोर से बात करता है या दाईं करवट से सोता है तो उसकी खांसी तेज हो जाती है। रोगी को अपनी छाती में दर्द सा महसूस होता है। रोगी को अपना सांस उखड़ता हुआ सा महसूस होता है। टी.बी रोग के कारण होने वाला बुखार। इस तरह के लक्षणों में अगर रोगी को स्टैनम औषधि दी जाए तो रोगी को बहुत लाभ पहुंचता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी को पक्षाघाती कमजोरी आ जाना इतनी कि रोगी को अपने हाथों में कोई चीज भी नहीं पकड़ी जाती। रोगी के टखनों का सूज जाना। रोगी अगर बैठना चाहता है तो अचानक उसकी जननेन्द्रियां जवाब दे देती है। रोगी अगर सीढ़ी आदि में से नीचे उतरता है तो उसका सिर घूमने लगता है। भुजाओं और हाथ की पेशियों का कांप जाना। कलम पकड़े रहने पर उंगलियों में झटके से लगते है। रोगी को स्नायु की होने वाली जलन आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को स्टैनम औषधि देने से लाभ मिलता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी को इतनी गहरी नींद आती है कि वह नींद में एक पैर ऊपर और दूसरा पैर फैलाकर सोता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैनम औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी को रोजाना शाम के समय बुखार का आ जाना, रोजाना आधी रात के बाद बहुत ज्यादा पसीने का आना, पसीना ज्यादा माथे और गर्दन के पीछे के भाग पर आता है और इस पसीने में बदबू भी बहुत आती है। इन लक्षणों मे अगर रोगी को स्टैनम औषधि दी जाए तो इससे रोगी कुछ ही दिन में ठीक हो जाता है।
पूरक-
वृद्धि-
जोर से हंसने से, बात करने से, गाना गाने से, दाईं करवट लेटने से, गर्म पीने वाले पदार्थों को पीने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
खांसने या बलगम को बाहर निकालने तथा दबाव देने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
स्टैनम औषधि की तुलना फेलैड्रियम, कास्टिक, कल्के, सिलिका, टुबर, बैसीली, हेलोनियस, मीर्टस चेकान से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्टैनम औषधि की 3 से 30 शक्ति तक देने से रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
स्टैफिसैग्रिया Staphysagria
स्टैफिसैग्रिया औषधि स्त्री और पुरुष दोनों के ही गुप्त रोगों के लिए बहुत लाभकारी औषधि मानी जाती है। ज्यादा संभोग करने के कारण हुए रोग, हस्तमैथुन करने के दुष्परिणाम, वीर्य का समय से पहले ही नष्ट हो जाना, धातु रोगों में ये औषधि बहुत अच्छा असर दिखाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्टैफिसैग्रिया औषधि का उपयोग-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत तेज गुस्सा आना, रोगी की याददाश्त का कमजोर हो जाना, रोगी को कोई रोग हो जाने के कारण उसका मानसिक संतुलन बिगड़ जाना, रोगी हर समय सैक्स के सम्बंध में ही सोचता रहता है, रोगी को दूसरे लोगों के साथ रहने में परेशानी महसूस होती है इसलिए वह अकेले रहना पसन्द करता है। बच्चे का बहुत ज्यादा जिद्दी हो जाना, बच्चे को बाहर घुमाने के लिए ले जाओ तो वह सारी चीजे मांगता है और न दिलाने पर रोता है, लेकिन अगर उसे कोई चीज दिला भी जाए तो वो उसे लेने से मना कर देता है इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि का सेवन कराने से बहुत लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- इतनी तेज सिर में दर्द होता है कि रोगी को लगता है कि उसका सिर एक ही जगह पर जम सा गया है, ये सिर का दर्द जम्भाई लेने से कम हो जाता है। रोगी को अपना दिमाग निचोड़ लिये जाने जैसा महसूस होता है। रोगी के माथे पर एक सीसे का गोला होने जैसा महसूस होना, कान के पीछे और ऊपर खुजली के दाने निकलना जैसे लक्षणों में रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों का अंदर की ओर धंस जाना और इसी के साथ ही आंखों के आस-पास के भाग में नीले से गोल-गोल निशान पड़ जाना, रोगी की पलकों के किनारों में खुजली सी होते रहना, आंखों के अंदर के कोनो के रोग, कनीनिका में कटने-फटने के जख्म से होना, उपदंश (संभोग के कारण पैदा होने वाला रोग), परितारिकाशोथ में आंखों के गोलों में बहुत तेजी से होने वाला दर्द आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि का सेवन कराना बहुत ही लाभकारी साबित होता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी अगर किसी भी चीज को खाता या पीता है तो उसको गले से निगलने समय गले में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द होता है जो बाएं कान तक पहुंच जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि देने से लाभ होता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- स्त्री को मासिकस्राव के समय दांतों में दर्द होना, रोगी स्त्री के दांत कालें और टेढ़े-मेढ़े होना, दांतों में कीड़ा लगने के कारण दांतों का खराब हो जाना, रोगी के मुंह से लार का बहुत ज्यादा मात्रा में आना, मसूढ़ों का बहुत ज्यादा मुलायम सा हो जाना, मसूढ़ों से अपने आप ही खून का आना, जबड़े के नीचे की ग्रंथियों का सूज जाना, मसूढ़ों में जख्म से हो जाना जैसे लक्षणों में रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि का प्रयोग कराने से लाभ होता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी के आमाशय में कमजोरी सी आ जाना, रोगी का मन ऐसा करना जैसे कि उसे उत्तेजक पदार्थ खाने है, रोगी का आमाशय बिल्कुल खाली सा महसूस होना, रोगी को तंबाकू का सेवन करने की बहुत तेज इच्छा होना, रोगी चाहे जितना भी खा ले उसको फिर भी भूख ही लगती रहती है, रोगी के पेट में शस्त्रोपचार होने के बाद जी का मिचलाना जैसे लक्षणों के आधार पर रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि देने से लाभ होता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी को गुस्सा आने के बाद पेट में दर्द होना, रोगी के पेट में गर्म हवा भरने के कारण दर्द होना, पेट में शस्त्रोपचार होने के बाद तेजी से दर्द होना, रोगी के ठण्डा पानी पीने के बाद दस्त आने के साथ ही कूथन, रोगी के पेट में कब्ज का बनना, रोगी को बवासीर का रोग होना और इसी के साथ ही पुर:स्थग्रंथि का बढ़ जाना जैसे लक्षणों में रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि का प्रयोग कराने से लाभ मिलता है।
पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण- लिंग का अपने आप ही उत्तेजित हो जाना, रोगी के हस्तमैथुन करने के बाद, रोगी के हर समय यौन सम्बंधी बातों को ही सोचते रहना, रोगी के स्वप्नदोष होने के कारण शरीर का बिल्कुल कमजोर हो जाना, नज़रों का बहुत ज्यादा भयानक हो जाना, रोगी के शुक्रमेह होने के साथ पीठ में दर्द और कमजोरी आना, रोगी के संभोग क्रिया करने के बाद सांस लेने में परेशानी होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि देने से लाभ होता है।
स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण- स्त्री की जननेन्द्रियों का बहुत ज्यादा नाजुक हो जाना जो बैठने पर और नाजुक हो जाती है, नई-नवेली दुल्हनों की पेशाब की नली में उत्तेजना होना, प्रदर-स्राव (योनि में से पानी आना), गर्भाशय के चिर जाने के साथ पेट के अंदर की ओर धंसने जैसा महसूस होना, रोगी के नितंबों के चारों ओर दर्द सा होना। इन लक्षणों में रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि का सेवन कराना उपयोगी साबित होता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- स्त्री के बच्चे को जन्म देने के बाद पेशाब की नली में जलन होना, नई दुल्हनों को ऐसा महसूस होना जैसे कि उन्हें पेशाब आ रहा है लेकिन पेशाब करने जाने पर उनको पेशाब आता ही नही हैं, रोगी के पेशाब की नली पर दबाव सा पड़ना जैसे कि पेशाब करने के बाद भी वह खाली न हुआ हो, पेशाब करते समय पेशाब करने के रास्ते में जलन सी होना, पुर:स्थग्रंथि के उपसर्ग, रोगी को बार-बार पेशाब आना, पेशाब करने के बाद तेजी से दर्द होना, पथरी का आप्रेशन कराने के बाद दर्द का होना। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि देने से लाभ होता है।
चर्म (त्वचा) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर, कान, चेहरे और शरीर पर फोड़े से निकलना, त्वचा पर मोटी-मोटी सी पपड़ियों का जमना, त्वचा पर बहुत तेज खुजली का होना, जिसमे रोगी खुजली वाले स्थान पर खुजलाता है तो उसको आराम मिलता है लेकिन शरीर में दूसरी जगह खुजली होने लगती है, उंगलियों की हड्डियों में जलन का होना, जोड़ों में सूजन के साथ होने वाली गांठे, रोगी को रात के समय बहुत ज्यादा पसीना आना। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि का प्रयोग कराना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी को इस तरह का दर्द होता है जैसे कि उसकी गुल्फ-पेशियां कुचल दी गई हो, पीठ का दर्द जो सुबह के समय उठने से पहले ज्यादा होता है। रोगी को अपने हाथ-पैरों में इतनी जोर का दर्द होना जैसे कि किसी ने बहुत बुरी तरह से पीटा हो, जोड़ों में स्नायु का दर्द होना, रोगी के नितंबों में धीरे-धीरे होने वाला दर्द जो ऊरुसंधि और पीठ तक पहुंच जाता है। इन लक्षणों में रोगी को स्टैफिसैग्रिया औषधि देना बहुत ही लाभकारी सिद्ध होता है।
अनुपूरक-
काष्टि ।
प्रतिविष-
कैम्फ औषधि का उपयोग स्टैफिसैग्रिया औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
वृद्धि-
गुस्सा करने से, किसी के द्वारा बेइज्जती करने से, दुखी होने से, वीर्य के ज्यादा निकलने से, तंबाकू का सेवन करने से, हस्तमैथुन करने से, बहुत ज्यादा संभोग करने से, रोग वाले स्थान को थोड़ा सा भी छूने से, ठण्डे पदार्थों का सेवन करने से, रात के समय, सुबह के समय, संताप से, संताप से या घुट-घुट कर रहने से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्मी से, आराम करने से, नाश्ता करने के बाद रोग कम हो जाता है।
तुलना-
स्टैफिसैग्रिया औषधि की तुलना कास्टि,, लाइको और पल्स के साथ की जा सकती है।
स्टेलैरिया मीडिया Stellaria Media
स्टेलैरिया मीडिया औषधि का उपयोग पूरे शरीर में जगह बदल-बदलकर होने वाले गठिया रोग के कारण होने वाले दर्द में किया जाता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार स्टेलैरिया मीडिया औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के हल्का-हल्का सा सिर में दर्द होना, सुबह उठने पर दर्द का बढ़ जाना, आंखों में बहुत तेज जलन का होना, आंखें बाहर की ओर फैली हुई सी मालूम होती है, रोगी को किसी भी काम को करने का बिल्कुल मन नहीं करता, गर्दन की बाईं तरफ की पेशियों का अकड़ जाना जैसे लक्षणों में रोगी को स्टेलैरिया मीडिया औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी का जिगर कमजोर हो जाना, पेट में कब्ज का बनना, दस्त का बार-बार और मिट्टी के रंग की तरह का आना, जिगर का बहुत ज्यादा सूज जाना, पेट में सुई के चुभने जैसा दर्द का होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को स्टेलैरिया मीडिया औषधि का प्रयोग लाभदायक रहता है।
बाहरीय अंग से सम्बंधित लक्षण- बहुत तेजी से होने वाला रोगी की कमर में दर्द, रोगी के नितंबों में होने वाला दर्द जो जांघों से होता हुआ नीचे की तरफ पहुंच जाता है, रोगी के पैर में दर्द सा होना, रोगी के कंधों और बांहों में तेज दर्द का होना, रोगी को अपने गुर्दे के ऊपर के भाग में किसी चीज के द्वारा कुचल दिये जाने जैसा दर्द का होना। इन सारे लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को स्टेलैरिया मीडिया औषधि दी जाए तो रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
वृद्धि-
सुबह के समय, गर्मी के मौसम मे, तंबाकू के सेवन से रोग बढ़ जाता है।
शमन-
शाम के समय, ठण्डी हवा से तथा गति करने से रोगी का रोग कम हो जाता है।
तुलना-
स्टेलैरिया मीडिया औषधि की तुलना पल्सा से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्टेलैरिया मीडिया औषधि का मूलार्क या 2 शक्ति तक देनी चाहिए।
जानकारी-
रोगी को स्टेलैरिया मीडिया औषधि का मूलार्क शरीर के बाहरी प्रयोग के लिए दिया जाता है।
स्टैनम मेटालिकम Stanum Metalikum
स्टैनम मेटालिकम औषधि को वैसे तो बहुत से रोगों के लक्षणों में इस्तेमाल किया जाता है लेकिन फिर भी हाथ-पैरों में किसी तरह की कमजोरी आने पर इस औषधि को रोगी को देने से बहुत लाभ मिलता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्टैनम मेटालिकम औषधि से होने वाले लाभ-
बुखार से सम्बंधित लक्षण- बुखार के लक्षणों में रोगी को सबसे पहले बहुत तेज ठंड लगती है, रोगी को टायफाइड बुखार होना, फेफड़ों के आसपास के भाग और सांस की नलियों में किसी तरह का रोग हो जाने पर रोगी को हर समय हल्का-हल्का सा बुखार बना रहता है, रोगी को ठंड लगना सुबह के लगभग 10 बजे के आसपास शुरू होती है और रोगी की उंगलियो का आगे का भाग सुन्न पड़ जाता है, रोगी को सुबह के लगभग 4 बजे के आसपास बहुत गंदा, बदबूदार पसीना आता है और पसीना आने के साथ ही रोगी को कमजोरी भी महसूस होती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देने से लाभ मिलता है।
पुरुष रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी को रात में सोते समय अपने आप ही वीर्य निकल जाना, रोगी की यौन उत्तेजना बहुत तेज होना, रोगी की जननेन्द्रियों का बिल्कुल ठंडा पड़ जाना, रोगी एक पैर सिकोड़कर और दूसरा पैर फैलाकर सोता है आदि लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देना बहुत ही लाभकारी साबित होता है।
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी का हर समय दुखी सा रहना, रोगी का मन करता है कि वह हर समय चीखता-चिल्लाता रहे लेकिन चिल्लाने से रोगी की हालत खराब हो जाती है, रोगी का किसी के द्वारा पूछे गए सवालों का सही तरह से जवाब न दे पाना, ज्यादा लोगों को एकसाथ देखकर रोगी डरने लगता है, रोगी बच्चा चाहता है कि उसे कंधे पर बैठाकर घुमाया जाए आदि लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देने से रोगी कुछ ही समय में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्रियों में प्रदर-स्राव (योनि में से पानी आना) आने के कारण कमजोरी सी महसूस होना और स्त्री को ऐसा महसूस होना जैसे कि सबसे ज्यादा कमजोरी छाती पर आ रही है, स्त्री को छींके आने के साथ ही प्रदरस्राव (योनि में से पानी आना), स्त्री का मासिकस्राव आने से पहले स्त्री में यौन उत्तेजना तेज होने के कारण वह पागलों की तरह चिल्लाती है, स्त्री का मासिकस्राव का समय आने से पहले बहुत जल्दी-जल्दी और ज्यादा मात्रा में खून का स्राव आता है, स्त्री का मासिकस्राव आने से पहले उदासी सी छा जाना आदि लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
बाहरीय अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपने हाथ और पैरों में बहुत ज्यादा कमजोरी महसूस होती है, रोगी के हाथ की हथेलियों और पैरों के तलुवों में जलन होना, रोगी को अपने हाथ और पैरों में दबाव, खिंचाव और जलन सी महसूस होती है, रोगी जब थोड़ी दूर पैदल चलता है तो उसको रास्ते में कई बार बैठना पड़ता है, रोगी को अपने शरीर में इतनी ज्यादा कमजोरी महसूस होती है कि अगर रोगी कुर्सी या जमीन पर भी बैठना चाहता है तो वह नीचे गिर पड़ता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि का सेवन करना बहुत ही उपयोगी साबित हो सकती है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर में स्नायविक सिर का दर्द जो शुरू में धीरे-धीरे होता है और बाद में बहुत तेज होता है, सिर का दर्द काफी दिनों तक रहता है और धीरे-धीरे से कम होता हुआ चला जाता है, सिर में दर्द होने के साथ ही रोगी की आंखें और चेहरे का पीला पड़ जाना और आंखों का अंदर की ओर धंस जाना आदि लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देने से लाभ मिलता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- गाना-गाने वाले या ज्यादा बोलने वाले लोगों की आवाज का खराब हो जाना, स्वरभंग में गहराई से उठकर आने वाला खोखला स्वर जो खांसी आने या बलगम निकलने पर ठीक हो जाता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देने से लाभ मिलता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी के मुंह का स्वाद बहुत ज्यादा खराब हो जाना, रोगी को पानी के अलावा हर चीज कड़वी सी लगती है। इन लक्षणों के आधार पर रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देना लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को आमाशय में खालीपन सा महसूस होना, रोगी के नाभि प्रदेश में तनाव के साथ रोगी का शरीर सूखते जाना, रोगी को भूख तो बहुत तेज लगती है लेकिन उससे भोजन खाया नहीं जाता, रोगी के आमाशय में किसी तरह का जख्म होने के कारण बहुत तेजी से दर्द उठना जिसमे दर्द धीरे-धीरे से शुरु होकर फिर तेज होकर थोड़ी देर रुकता है और फिर धीरे-धीरे कम होता हुआ शांत हो जाता है, रोगी चाहे जितना भी भोजन कर ले फिर भी वो भूख-भूख करता रहता है, रोगी को कड़वी सी डकारें आना, रोगी को सुबह के समय उठने पर उबकाइयां आती है और उल्टी आती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
मूत्र (पेशाब) सम्बंधित लक्षण- रोगी को पेशाब आता है तो उसका मन पेशाब करने का बिल्कुल नहीं करता, रोगी की पेशाब करने की पेशियों का सही तरह से काम न कर पाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को स्टैनम मेटालिकम औषधि का सेवन कराने से रोगी को लाभ मिलता है।
वृद्धि-
बोलने से, गले का ज्यादा प्रयोग करने से, सुबह के समय लगभग 10 बजे, दाईं करवट लेटने से, सीढ़िया चढ़ने से, हंसने से, कोई भी गर्म पेय पदार्थ पीने से, किसी तरह की हरकत करने से रोगी का रोग बढ़ जाता है।
शमन-
जोर से दबाने से, बलगम के निकल जाने के बाद, तेजी से कोई हरकत करने से रोगी का रोग कम हो जाता है।
प्रतिविष-
हिपर और पल्स औषधि का उपयोग स्टैनम मेटालिकम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
अनुपूरक-
तुलना-
स्टैनम मेटालिकम औषधि की तुलना काष्टिकम के साथ की जा सकती है।
स्टर्क्यूलिया Sterculia
स्टर्क्यूलिया औषधि स्नायु की कमजोरी को दूर करने में बहुत ही उपयोगी मानी जाती है। इसके अलावा ये औषधि दस्तों को रोकने में काम आती है, रक्तसंचार प्रणाली को ठीक करती है। दिल की धड़कन को नियमित करती है, पेशाब को लाती है।
स्टर्क्यूलिया औषधि को शराबी लोगों की शराब की आदत छुड़ाने में एक बहुत ही असरकारक दवा माना जाता है। ये औषधि भूख को तेज करती है, दमा रोग को काबू में करती है। स्टर्क्यूलिया औषधि रोगी के शरीर में शारीरिक मेहनत करने की बहुत ज्यादा ताकत प्रदान करती है।
तुलना-
स्टर्क्यूलिया औषधि की तुलना कोका से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को उसके रोग के लक्षणों के आधार पर स्टर्क्यूलिया औषधि की 3 से 10 बूंदों तक देनी चाहिए।
जानकारी-
अगर रोगी को जरूरत हो तो उसके स्टर्क्यूलिया औषधि की 3.5 मिलीलीटर की मात्राएं भी दिन में 3 बार करके दी जा सकती है।
स्टिक्टा (स्टिक्टा पल्मोनेरिया) Sticta (Lungwort)
परिचय-
स्टिकटा औषधि तब बहुत उपयोगी साबित होती है जब रोगी अपने आप को बीमार सा महसूस करता है जैसे रोगी को सर्दी-जुकाम होने वाला हो, माथे में हल्का-हल्का सा दबाव पड़ना आदि। इसके अलावा गर्दन का गठिया रोग के कारण अकड़ जाना जैसे रोगों में भी ये औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्टिक्टा औषधि से होने वाले लाभ-
मन से सम्बंधित लक्षण- रोगी को मन में अजीब-अजीब से ख्याल आते हैं जैसे कि वह हवा में उड़ रहा हो, हर समय रोगी अपने ही बनाए हुए ख्यालों में खोया रहता है, रोगी चाहता है कि हर समय कोई उससे बातें ही करता रहे। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टिक्टा औषधि का सेवन कराना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के हल्का-हल्का सिर में दर्द का होना, रोगी के माथे और नाक की जड़ में दर्द होने के साथ ही उन पर हल्का-हल्का सा दबाव पड़ना, सर्दी का स्राव शुरू होने से पहले सिर में दर्द होना, रोगी को अपनी खोपड़ी बहुत ही छोटी सी लगने लगती है, आंखों में जलन और अक्षिगोलकों में किसी तरह की परेशानी होना, रोगी की पलकों में जलन होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्टिक्ट औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
नाक से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपनी नाक की जड़ के पास पूर्णता सी महसूस होना, नाक में सूजन आने के कारण जलन सी होना, नाक की झिल्लियों का खुश्क सा होना, रोगी लगातार नाक साफ करता रहता है लेकिन उसमें से कुछ भी नहीं निकलता, शाम के समय और रात को रोगी की नाक में सूखी सी पपड़ियां जमती रहती है, परगज ज्वर (हे-फीवर) रोगी को हर समय छीकें सी आते रहना जैसे लक्षणों में रोगी को स्टिक्ट औषधि का प्रयोग कराना बहुत ही लाभकारी रहता है।
पेट से सम्बंधित लक्षण- रोगी को दस्त होना, सुबह के समय मल का बहुत ज्यादा मात्रा में पानी के जैसा आना, पेशाब का बार-बार आना, पेशाब की नली में किसी रोग के होने के कारण दर्द का होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्टिक्ट औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
स्त्री से सम्बंधित लक्षण- अगर किसी स्त्री को स्तनों में दूध कम आने जैसे लक्षण पैदा होते है तो उसे स्टिक्ट औषधि का प्रयोग कराना लाभकारी रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सुबह के समय खांसी के साथ बहुत ज्यादा बलगम का आना, गले की नली में जलन होना, उरोस्थि से रीढ़ की हड्डी तक छाती में पहुंचने वाला दर्द, रोमान्तिका रोग के बाद होने वाली खांसी, रात को सोते समय एक के बाद एक होने वाली खांसी जो सांस लेने पर ज्यादा होती है, उरोस्थि के दाएं भाग से नीचे पेट तक हृत्स्पंदन आदि लक्षणों में रोगी को स्टिक्ट औषधि का सेवन कराना लाभकारी रहता है।
बाहरीय अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी के शरीर में दाईं तरफ स्कंध के जोड़ में गठिया रोग के कारण होने वाला दर्द जो रोगी के त्रिकोणपेशी (कंधे की पेशी) और द्विमुंडपेशी में भी होता है, जोड़ों में सूजन, गर्मी और लाल हो जाना, रोगी के जोड़ों में बहुत तेज और खिंचावदार दर्द का होना, आक्षेप, रोगी को ऐसा लगता है जैसेकि उसके पैर हवा में उड़ रहे हो, घुटने के जोड़ की झिल्ली में जलन होना, घुटनों में बहुत तेजी से होने वाला दर्द, जोड़ों और उसके आसपास की पेशियों का लाल हो जाना, सर्दी के लक्षणों के उत्पन्न होने से पहले गठिया रोग का दर्द होना। इन लक्षणों में अगर रोगी को स्टिक्टा औषधि दी जाए तो उसके लिए बहुत लाभ होता है।
वृद्धि-
अचानक तापमान में होने वाले बदलावों के कारण रोग का बढ़ जाता है।
तुलना-
स्टिक्ट औषधि की तुलना दतूरा आर्बोरिया-बूगमैशिया कैडिडा, ऐकोनाइट, ऐमोन-कार्ब, इरिजि, ड्रासेरा, स्टिलिंजिया, रुमेक्स, कैम्फर, नक्सवोमिका और सैम्ब्यूकस से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्टिक्टा औषधि का मूलार्क या 6 शक्ति तक देने से लाभ होता है।
सिटग्मैटा मेडिस-जीया Stigmata Maydis-Zea
सिटग्मैटा मेडिस-जीया औषधि को मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित रोगों को समाप्त करने में इस्तेमाल किया जाता है। जब रोगी के जननेन्द्रियों में सूजन आ जाती और रोगी को पेशाब आना कम हो जाता है तब इस औषधि को प्रयोग करने से लाभ होता है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर सिटग्मैटा मेडिस-जीया औषधि का उपयोग-
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी का पेशाब बंद हो जाना, पेशाब करते समय पेशाब की नली में जलन होना, गुर्दे में पथरी होना, गुर्दे में सूजन आने के कारण पेट में होने वाला दर्द, पेशाब के साथ खून और बालू के कण आना, पेशाब करने के बाद पेशाब की नली में कूथन होना, सूजाक आदि लक्षणों में रोगी को सिटग्मैटा मेडिस-जीया औषधि देने से लाभ होता है।
मात्रा-
रोगी को सिटग्मैटा मेडिस-जीया औषधि का मूलार्क देने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
जानकारी-
रोगी को पुराने मलेरिया के रोग में सिटग्मैटा मेडिस-जीया औषधि का काढ़ा बनाकर चाय के चम्मच के बराबर की मात्रायें बार-बार देनी चाहिए।
स्टिलिंगिया सिलवेटिका Stillingia Sylvatica
स्टिलिंगिया सिलवेटिका औषधि का सबसे अच्छा असर हड्डी की झिल्ली के ऊपर होता है। आतशक के रोग से हडि्डयों की झिल्ली के वात रोग में, पुराने गठिया के रोग में, खोपड़ी की हड्डी में सूजन आने पर गांठे पड़ जाना या शरीर के दूसरे अंगों में गांठे पड़ जाना, नितंब या कमर के रोग में भी ये औषधि बहुत अच्छा असर करती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्टिलिंगिया सिलवेटिका औषधि से होने वाले लाभ-
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को रोजाना एक ही समय पर उठने वाली सूखी खांसी जो ज्यादातर शाम के समय ज्यादा होती है, रोगी के गले की नली में चिनचिनाहट होने के साथ खांसी होना, रोगी को अपने गले की नली सुन्न सी महसूस होना जैसे वह कोई काम नहीं कर रही हो, आवाज की नली का सिकुड़ जाना जिसमें किसी जहरीले कीड़े के डंक मारने जैसा दर्द होता है। रोगी की नाड़ी का अनियमित हो जाने के कारण वो कभी तो बहुत तेज चलती है और कभी बिल्कुल धीरे-धीरे चलती है, रोगी के दिल के भाग में बहुत तेज दर्द होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को स्टिलिंगिया सिलवेटिका औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
शरीर के बाहरी अंग से सम्बंधित लक्षण- रोगी को रोजाना शाम के समय दाईं कोहनी और दाएं हाथ में तपकन के साथ दर्द का होना, रोगी को अपनी बांहों में इतनी तेज दर्द होना जैसे कि किसी ने गोली मार दी हो ये दर्द रोगी के हाथों की उंगलियों तक फैल जाता है, बांह के ऊपर के भाग में किसी चीज के चुभने जैसा दर्द तथा हाथ के अगले भाग के अंदर तक दर्द का होना, रोगी के नितंबों में दाईं ओर पैरों और पंजों तक दर्द होना, रोगी के घुटनों के नीचे के भाग में जलन और खुजली होना, पैरों की अस्थिवेष्ठनों का बढ़ जाना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को स्टिलिंगिया सिलवेटिका औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- रोगी के पूरे मूत्राशय में बहुत तेज दर्द और जलन होना जो रोगी का पेशाब बूंद-बूंद करके टपकते रहने पर बढ़ जाती है, रोगी को इतना तेज दर्द होता है कि उसे पसीना तक आ जाता है, रोगी के गुर्दों के भाग में धीरे-धीरे से दर्द होता रहता है, रोगी के पेशाब के साथ सफेद या लाल कणों का आना तथा पेशाब करने के बाद तुरंत ही जम जाता है, रोगी को पेशाब गाढ़ा, गहरे रंग का, झागदार आता है। इन लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को स्टिलिंगिया सिलवेटिका औषधि दी जाए तो रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी के गले का सूख जाना, रोगी को अपने गले में ऐसी जलन होती है जैसे कि किसी जहरीले कीड़े ने डंक मार दिया हो, रोजाना दोपहर के बाद रोगी के मुंह में पानी भर जाना, रोगी जैसे ही सोने के लिए बिस्तर पर जाता है तो उसका जी मिचलाने लगता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्टिलिंगिया सिलवेटिका औषधि देना लाभकारी रहता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी के नाभि के भाग में मरोड़ के साथ दर्द उठना, रोगी के आमाशय और आंतों में जलन होना, रोगी की आंतों में गड़गड़ाहट होने के साथ दस्त हो जाना, रोगी को गर्मी के कारण बार-बार झाग भरे दस्तों का आना या पेट में कब्ज का बनना आदि लक्षणों में रोगी को स्टिलिंगिया सिलवेटिका औषधि देने से लाभ होता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर और माथे की हड्डी में सूजन आ जाना, रोगी के सिर में बहुत तेज तपकन होने के साथ चक्कर आना, रोगी की खोपड़ी में इस तरह के फोड़े-फुंसियां निकल आना जिनके अंदर से बहने वाला पीब त्वचा को छील देता है, रोगी की आंखों में बहुत तेज जलन के साथ बहुत तेजी से सिर में भी दर्द होता है। इन लक्षणों के आधार पर अगर रोगी को स्टिलिंगिया सिलवेटिका औषधि का सेवन कराया जाए तो रोगी कुछ ही समय में स्वस्थ हो जाता है।
वृद्धि-
दोपहर के बाद, ठण्डी हवा से, गति करने से रोगी का रोग बढ़ जाता है।
शमन-
रोगी के आराम करने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
स्टिलिंगिया सिलवेटिका औषधि की तुलना आर्ज, आराम, हिपर, कैलि-आयोड, मर्क, मेज, फाइटो, रस-टाक्स और सल्फ के साथ की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्टिलिंगिया सिलवेटिका औषधि की मूलार्क या 1 शक्ति देने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
स्ट्रोमोनियम Stramonium
स्ट्रोमोनियम औषधि का सबसे अच्छा असर दिमाग के ऊपर पड़ता है इसीलिए किसी भी तरह के मानसिक रोगों में ये औषधि बहुत ही उपयोगी साबित होती है। किसी तरह की बेहोशी को दूर करने में ये औषधि बहुत ही जल्दी असर दिखाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्ट्रोमोनियम औषधि से होने वाले लाभ-
मन से सम्बंधित लक्षण- मानसिक रोगों के लक्षणों में रोगी अपने आप ही हंसने लगता है, हर समय गुनगुनाता रहता है, अपने आप से ही बाते करता रहता है, रोगी ऐसी बातें करता है जिनका कोई सिर-पैर नहीं होता, बात-बात में कसमें खाने लगता है, रोगी की याददाश्त बहुत कमजोर हो जाती है वह थोड़ी देर पहले की बातों को भी भूल जाता है, रोगी को ऐसा लगता है कि उसके सामने भूत घूम रहे हैं, अजीब-अजीब सी आवाजें आ रही है, खुशी के मौके पर ही दुखी सी सूरत बनाकर घूमता रहता है, हर समय गंदी-गंदी बातें बोलता रहता है, अपने आप के बारें में रोगी को ऐसा लगता है जैसे कि वह कोई महान हस्ती है, रोगी को अगर अकेले और अंधेरे में छोड़ दिया जाता है तो वह डरने लगता है, रोगी को अगर कोई ज्यादा चमकती हुई चीज दिखाई जाती है तो वो बेहोशी की हालत में पहुंच जाता है, रोगी बहुत तेज-तेज चिल्लाने लगता है इसके साथ ही उसका मन करता है कि कहीं भाग जाऊं आदि लक्षणों में रोगी को स्ट्रोमोनियम औषधि देने से लाभ मिलता है।
सिर से सम्बंधित लक्षण- रोगी के सिर में दर्द होना जिसके कारण रोगी को सोते-सोते तकिए से कई बार सिर को उठाना पड़ता है, रोजाना सुबह के 9 बजे के करीब रोगी के माथें और भौंहों के ऊपर दर्द होना जो दोपहर होने तक तेज हो जाता है, सिर में बहुत तेजी से गड़ने जैसा दर्द तथा उससे पहले नज़रों के सामने धुंधलापन छा जाना, सिर में खून का बहाव बहुत ज्यादा होने के कारण रोगी का चलते समय लड़खड़ाना और इसके साथ ही सामने की ओर बाईं तरफ गिरने का झुकाव, रोगी को सुनने सम्बंधि वहम होना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को स्ट्रोमोनियम औषधि देना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
आंखों से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आंखों का बाहर की ओर निकलता हुआ सा महसूस होना, पुतलियों का बहुत ज्यादा फैल जाना, रोगी की आंखों की रोशनी चला जाना, रोगी रोशनी में बैठे होने पर भी कहता है कि कमरे में लाईट जला दो, रोगी को सारी छोटी-छोटी चीजों का बड़ा सा दिखाई देना, रोगी को अपने शरीर के सारे अंग बहुत ज्यादा सूजे हुए महसूस होते है, तिरछा दिखाई देना, रोगी को सारी चीजें काली सी नज़र आती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्ट्रोमोनियम औषधि का प्रयोग कराना उपयोगी साबित होता है।
चेहरे से सम्बंधित लक्षण- रोगी का चेहरा गर्म, सुर्ख और फूला हुआ सा महसूस होना लेकिन हाथ-पैरों का ठण्डा ही रहना, रोगी का चेहरा घबराया और डरा हुआ सा लगता है, रोगी के गाल सुर्ख हो जाते है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्ट्रोमोनियम औषधि देने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
आमाशय से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बार-बार प्यास लगना, रोगी कुछ भी खाता है तो उसको उस चीज का स्वाद बहुत बुरा लगता है जैसे कि उसने भूसा खा लिया हो, रोगी को बलगम और हरे पित्त की उल्टी होना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रोमोनियम औषधि देना बहुत ही लाभदायक सिद्ध होती है।
मूत्र (पेशाब) से सम्बंधित लक्षण- पेशाब का बहुत कम मात्रा में आना, पेशाब का बूंद-बूंद करके टपकते रहना, पेशाब का बंद हो जाना, पेशाब का गंदे से रंग का आना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रोमोनियम औषधि का सेवन कराना लाभदायक रहता है।
पुरुष रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के शरीर में बहुत तेज यौन उत्तेजना होना और इसी के साथ ही रोगी का अश्लील बातें करना और गंदी-गंदी मुद्राएं बनाना, रोगी अपने हाथ को हर समय जननेन्द्रियों पर रखे रहना चाहता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्ट्रोमोनियम औषधि का सेवन कराना बहुत ही उपयोगी साबित होता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- स्त्री का मासिकस्राव आने के बाद और दूसरा मासिकस्राव आने से पहले के बीच के समय में गर्भाशय से खून का आना इसके साथ ही स्त्री का बड़बड़ाना, गाना गाना, प्रार्थना करना, गर्भवती स्त्री को प्रसव के दौरान यौन उत्तेजना बहुत तेज होना, इसके साथ ही मानसिक लक्षणों का होना और बहुत ज्यादा पसीना आना, स्त्री को प्रसव के बाद बेहोशी आना जैसे लक्षणों में स्ट्रोमोनियम औषधि देने से लाभ मिलता है।
नींद से सम्बंधित लक्षण- रोगी का सोते-सोते अचानक डरकर जाग उठना और चिल्लाने लगना, रोगी सोते समय बहुत जोर-जोर से खर्रांटे भरता है, रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे कि उसे बहुत नींद आ रही है लेकिन सोने पर उसे नींद नही आती। इस तरह के लक्षणों में अगर रोगी को स्ट्रोमोनियम औषधि दी जाए तो रोगी कुछ ही दिनों में बिल्कुल स्वस्थ हो जाता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी को अपना मुंह बहुत ज्यादा सूखा सा महसूस होना, रोगी के मुंह से हर समय लार टपकती रहती है, रोगी का पानी को देखते ही जी खराब हो जाना, रोगी का तुतलाना अर्थात बोलते समय आवाज का साफ ना निकलना, रोगी के द्वारा अपने मुंह को अजीब सी आकृति में बनाना, रोगी पर बेहोशी छा जाने के कारण वो कुछ भी चीज खाता है उसको निगलना मुश्किल हो जाता है, मुंह की किसी चीज को चबाते रहने जैसा चलना आदि लक्षणों के आधार पर रोगी को स्ट्रोमोनियम औषधि का सेवन कराना उचित रहता है।
बुखार से सम्बंधित लक्षण- रोगी को बहुत तेज बुखार आना, जिसमें उसे बहुत ज्यादा पसीना आता है और इसी कारण से रोगी हर समय बेचैन सा रहता है उसे कहीं पर भी आराम नही मिलता। इन लक्षणों में रोगी को स्ट्रोमोनियम औषधि देने से रोगी कुछ ही समय में स्वस्थ हो जाता है।
वृद्धि-
अंधेरे कमरे में, अकेले रहने पर, ज्यादा तेज चमकती हुई चीज की तरफ देखने से, नींद के बाद निगलने पर, डर से, स्राव रुक जाने के बाद, ज्यादा नशा करने से, ज्यादा भोग-विलासी बनने से, सोकर उठने के बाद रोग बढ़ जाता है।
शमन-
गर्माई से, ज्यादा दोस्तों के साथ रहने से और तेज रोशनी से रोग कम हो जाता है।
प्रतिविष-
बेलाडोना, टाबैक, नक्स-वोमिका औषधि का उपयोग स्ट्रोमोनियम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
तुलना-
स्ट्रोमोनियम औषधि की तुलना हायोसायमस और बेलाडौना से की जा सकती है।
मात्रा-
रोगी को स्ट्रोमोनियम औषधि की 30 शक्ति या कम शक्तियां देने से रोगी कुछ ही दिनों में ठीक हो जाता है।
स्ट्रिकनिया Strikniya
स्ट्रिकनिया औषधि रोगी की सांस लेने और छोड़ने की क्रिया को मजबूत बनाती है। इसके अलावा रोगी की पीठ का धनुष के जैसे टेढ़े हो जाने जैसे रोगों में भी ये औषधि बहुत अच्छा असर दिखाती है।
विभिन्न रोगों के लक्षणों के आधार पर स्ट्रिकनिया औषधि से होने वाले लाभ-
गले से सम्बंधित लक्षण- रोगी की आहारनली में किसी तरह का जख्म हो जाना, रोगी अगर कुछ खाता-पीता है तो उसको निगलने में रोगी को बहुत परेशानी होती है, रोगी को हर समय उबकाइयां सी आती रहती है, रोगी को बहुत ज्यादा उल्टी आना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रिकनिया औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है।
स्त्री रोगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी स्त्री में यौन उत्तेजना का तेज होने के कारण स्त्री का संभोग करने का बहुत मन करता है, स्त्री को अगर जरा सा भी हाथ लगा दिया जाता है तो उसके शरीर में यौन उत्तेजना बहुत तेज हो जाती है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को स्ट्रिकनिया औषधि देना बहुत लाभदायक रहता है।
सांस से सम्बंधित लक्षण- रोगी को सांस लेने में बहुत परेशानी होना, रोगी को ऐसा लगता है जैसे कि उसका दम सा घुट रहा हो आदि लक्षणों में रोगी को स्ट्रिकनिया औषधि का सेवन कराने से रोगी कुछ ही दिनों में स्वस्थ हो जाता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण- रोगी के हाथ-पैरों में बहुत तेज कंपन होने के साथ झटके लगना और उनका अकड़ जाना, रोगी की रीढ़ की हड्डी में बहुत तेज झटके से लगना, रीढ़ की हड्डी में नीचे की ओर ठंडक सी उतरती हुई महसूस होना आदि लक्षणों में रोगी को स्ट्रिकनिया औषधि देना लाभकारी रहता है।
मुंह से सम्बंधित लक्षण- रोगी के मुंह के अंदर जबड़ों का अकड़ जाना, रोगी के कान में बहुत तेज आवाज होने के साथ चक्कर से आना जैसे लक्षणों में रोगी को स्ट्रिकनिया औषधि का सेवन कराना अच्छा रहता है।
वृद्धि-
जरा सा छूने या सहलाने से, आवाज और गंध से, किसी तरह की हरकत करने से, भोजन के बाद रोग बढ़ जाता है।
शमन-
रोगी के पीठ के बल सीधा लेटने से रोग कम हो जाता है।
तुलना-
स्ट्रिकनिया औषधि की तुलना आर्नि, बेल, साइक्यू, कुप्रम, कुरार, जेल्स, हायो, इग्ने, काली-फा, लैके, मर्क, नक्स-वोमिका, ओपि, फास्फो-ए, रस-टा, सिकेल और वेरेट्रम से की जा सकती है।