लैबर्नम Laburnum
लैबर्नम Laburnum
लैबर्नम औषधि एक प्रकार की झाड़ी होती है। इस झाड़ी के सभी भाग जहरीले होते हैं। इसलिए यह औषधि आमाशय तथा आन्तों में जलन पैदा करती है, जिसके साथ ही उल्टियों की समस्या भी हो जाती है, अतिसार (दस्त), सिर में दर्द, चेहरे का पीलापन और त्वचा में ठण्ड लगना आदि विकार इसके प्रयोग से उत्पन्न हो जाते हैं।
इस औषधि के प्रभाव से नींद अधिक आती हैं तथा बेहोशी की समस्या भी उत्पन्न हो जाती है।
प्रमस्तिष्क में किसी प्रकार से सूजन होने पर लैबर्नम औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक हो जाते हैं तथा रोगी को अधिक आराम मिलता है।
तेज चक्कर आना तथा इसके साथ ही गले के अन्दर सिकुड़न होना, गर्दन में अकड़न होना, गर्दन के जोड़ से लेकर सिर के पिछले भाग में अन्दर तक फाड़ता हुआ दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों के होने के साथ ही आंखों में गर्मी महसूस हो रही हो तो रोग को ठीक करने के लिए लैबर्नम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
लैबर्नम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक ठण्ड लगती है तथा शरीर के खून में दोष उत्पन्न हो जाता है, आंखों की पलकें फैल जाती हैं, चक्कर आता है, चेहरे की पेशियां फैलने लगती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैबर्नम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :-रोगी को अधिक प्यास लगती है तथा जी मिचलाने के साथ ही उल्टियां भी होती है। इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही पाचनतंत्र में जलन होने के साथ दर्द होता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैबर्नम औषधि उपयोग लाभदायक है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पेचिश रोग होने के साथ ही लिंग में जलन के साथ दर्द होता है और घास जैसा हरा पेशाब होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैबर्नम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के हाथ-पैरों में सुन्नपन जैसी स्थिति हो जाती है तथा दर्द भी होता है। हिलने-डुलाने में परेशानी होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैबर्नम औषधि उपयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
नक्स, जेल्सी तथा सिस्टिन औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लैबर्नम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लैबर्नम औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोगों के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लैक डिफ्लोरेटम Lac Defloratum
लैक डिफ्लोरेटम औषधि उन व्यक्तियों के लिए अधिक लाभदायक है जिनको दूध नहीं पचता है और वे यह कहते हैं कि हम दूध पीने से ही बीमार हो जाते हैं। ऐसे बहुत से पुराने रोगी, जो दूध हजम नहीं कर सकते, वे बहुत ठण्डी प्रकृति वाले होते हैं, कितने ही गर्म कमरे में रहें या गर्म कपड़ें पहन लें ठण्ड नहीं जाती। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी ठण्ड बिलकुल भी नहीं पसन्द करते हैं, सिर का दर्द ठण्डक से कम रहता है लेकिन दूसरे स्थान पर रहने से दर्द बढ़ जाता है, गर्म मौसम में रहने से शरीर की सारी परेशानियां बढ़ने लगती है, जब रोगी स्थिर अवस्था में रहता है तो परेशानियां कम होती है और रोग ग्रस्त भाग को दबाने से दर्द से कुछ राहत मिलती है। लैक डिफ्लोरेटम औषधि उन रोगियों के लिए अधिक उपयोगी है जो दूध किसी रूप में हजम नहीं कर पाते। इन रोगियों में और भी कई प्रकार के लक्षण होते हैं जो इस प्रकार हैं- दस्त होना, जी मिचलाना, उल्टी होना, सिर में दर्द, डकारें आना, दूध पीने से बदहज़मी होना और अधिक मात्रा में पेशाब होना।
लैक डिफ्लोरेटम औषधि का प्रयोग अधिकतर उन रोगियों के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता हैं जिनमें इस प्रकार के लक्षण होते हैं- अधिक निराश होना, जीवित रहने का मन न करना, मृत्यु का भय बिल्कुल न होना और यह सोचना की मृत्यु अब निश्चित ही होगी।
यह पोषण दोष के साथ उत्पन्न होने वाले रोगों को ठीक करने के लिए अत्यधिक उपयोगी औषधि है, उल्टी के साथ सिर दर्द होना और साथ ही अधिक मात्रा में पेशाब होना। इस प्रकार के लक्षणों को दूर करने में यह उपयोगी है।
विभिन्न लक्षणों में लैक डिफ्लोरेटम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक निराशा होती है तथा सुबह के समय में जागने पर सिर में दर्द होता है और दर्द का असर माथे से शुरू होता है और सिर के पिछले भाग तक फैल जाता है, उल्टियां होती है तथा जी मिचलाने के साथ ही आंखों की रोशनी कम हो जाती है, कब्ज की समस्या हो जाती है, शोरयुक्त माहौल, रोशनी, चलना-फिरना और मासिकधर्म के समय में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, सिर पर दबाव देने तथा सिर को किसी पट्टी से बांधने से कुछ राहत मिलती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक डिफ्लोरेटम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को कब्ज की समस्या हो जाती है तथा इसके साथ ही मल कठोर, लम्बा होता है जिसे बाहर निकालने के लिए बहुत जोर लगाना पड़ता है और मलद्वार पर दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक डिफ्लोरेटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मासिकधर्म से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री का मासिकधर्म देर से आता है तथा ठण्डे पानी में हाथ रखने से मासिकस्राव आना बंद हो जाता है, एक गिलास दूध पीने से ही मासिकस्राव दूसरे मासिकस्राव के समय तक तुरन्त बंद हो जाता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक डिफ्लोरेटम औषधि उपयोग लाभदायक है।
सूजन से सम्बन्धित लक्षण :- दिल में रोग होने के कारण या लीवर में किसी प्रकार का रोग होने के कारण या ऐलब्यूमिन्यूरिया के कारण या आन्त्र ज्वर के कारण शरीर फूल रहा हो तो रोग को ठीक करने के लिए लैक डिफ्लोरेटम औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
उल्टी से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब उल्टी करता है तो उल्टी में अधपचा भोजन बाहर आ रहा हो जो अधिकतर क्षारीय होता है तथा बाद में कडुवाहट भरा पानी निकल रहा हो तो ऐसे लक्षणों को दूर करने के लिए लैक डिफ्लोरेटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- ऐसा महसूस हो रहा हो कि पेट में वायु का गोला है तथा इसके साथ ही सांस लेने में परेशानी हो रही हो तथा हिस्टीरिया रोग के लक्षण भी दिखाई दे रहे हों तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक डिफ्लोरेटम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गर्भावस्था से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी स्त्री को गर्भावस्था के समय में उल्टियां हो रही हो तो उपचार करने के लिए लैक डिफ्लोरेटम औषधि का प्रयोग लाभदायक है जिसके फलस्वरूप रोगी स्त्री का यह लक्षण दूर हो जाता है और आराम मिलता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
छोटे बच्चे के अतिसार रोग, खट्टी डकारें आना तथा पेट में दर्द होना आदि लक्षणों को ठीक करने के लिए कोलोस्ट्रम तथा नेट्र-म्यूरि औषधियों का उपयोग किया जाता है लेकिन रोग के ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए लैक डिफ्लोरेटम औषधि का भी उपयोग कर सकते हैं। अत: कोलोस्ट्रम तथा नेट्र-म्यूरि औषधि के कुछ गुणों की तुलना लैक डिफ्लोरेटम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लैक डिफ्लोरेटम औषधि की छठी से तीसवीं शक्ति तक तथा उच्चतर शक्तियों का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लैकेसिस (Lachesis)
लैकेसिस औषधि का प्रयोग उन रोगियों के लक्षणों को ठीक करने के लिए किया जाता है जो बहुत ही उदास और निराश रहते हैं, विशेष रूप से सोकर उठने के बाद या फिर जब मानसिक परेशानियां अधिक होती है तब।
लैकेसिस औषधि सांप के जहरों के समान ही रक्त-विघटन करती है और उसे अधिक तरल कर देती है। शरीर में खून की जहरीली अवस्था उत्पन्न होने तथा डिफ्थीरिया और अन्य रोग की अवस्थाओं को ठीक करने के लिए इस औषधि का अधिक उपयोग किया जाता है।
यदि किसी रोगी को कई प्रकार के रोग होने की अवस्थाओं में जैसे शरीर का खून दूषित होना और डिफ्थीरिया रोग होना। इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही पंखें की हवा अच्छी लगती हो लेकिन पंखा दूर रखकर धीरे-धीरे पंखा चलाने को कहना, इसका और एक विशेष लक्षण है। मुंह या नाक के पास कोई भी चीज आने से परेशानी अधिक होती है या दम घुटने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
ऐसे रोगी जो अधिक दुबले-पतले होते हैं जिनकी शरीर की हडि्डयां दिखाई देती हैं और जो कई प्रकार के रोग से पीड़ित होने के कारण शारीरिक रूप से और मानसिक दृष्टि से अधिक कमजोर हो चुके हैं। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए तथा शरीर पर मांस की वृद्धि बढ़ाने के लिए लैकेसिस औषधि का उपयोग करना चाहिए। यह औषधि उन लड़कियों के लिए भी विशेष उपयोगी है जो बचपन से जवानी की ओर कदम बढ़ाती हैं उस समय में रोग ग्रस्त हो जाती है अर्थात वयसंधि काल के समय में लड़कियों के होने वाले रोगों को ठीक करने के लिए उपयोगी है।
विभिन्न लक्षणों में लैकेसिस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- अधिक बोलने का मन करता है तथा इसके साथ ही शरीर का खून दूषित हो गया हो या फिर डिफ्थीरिया रोग हो गया हो। सुबह के समय में मन उदास रहता हो, किसी के साथ मिलकर रहने की इच्छा नहीं होती है, बेचैनी अधिक होती है तथा कोई भी कार्य करने का मन नहीं करता है, हर समय कहीं दूर रहने का मन करता है, ईर्ष्यालु स्वभाव हो जाता है। रात के समय में रोगी मानसिक कार्य ठीक प्रकार से कर पाता है। कभी-कभी रोगी को मरने का मन करता है तथा रात के समय में आग लगने का डर लगा रहता है। पागलपन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। समय को समझने में गड़बड़ी होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रात के समय में जागने पर सिर के आर-पार दर्द होता है, नाक की नलियों में दर्द होता है, सिर के ऊपरी भाग पर दबाव और जलन होती है। सिर में दर्द लहरों के साथ होता है तथा गति करने के बाद अधिक दर्द होता है। शाम के समय में अधिक सिर में दर्द होता है। सिर दर्द के कारण आंखों के आगे काले धब्बे पड़ जाते हैं, आंखों की रोशनी कम हो जाती है तथा चेहरा अधिक पीला हो जाता है। चक्कर आता रहता है। मासिकधर्म शुरू होने पर सिर दर्द से कुछ राहत मिलती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी रोगी में है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- डिफ्थीरिया रोग होने के बाद आंखों की दृष्टि कम हो जाती है, बाहरी पेशियों में दर्द होता है तथा आंखों की पेशियां इतनी अधिक कमजोर हो जाती हैं कि वे किरण-केन्द्रों को नहीं सम्भाल पाती हैं। रोगी को ऐसा महसूस होता है कि दोनों आंखों को किसी रस्सी द्वारा एक-दूसरे की ओर खींचा जा रहा हो और नासिकामूल पर उसे रस्सी की गांठ मारकर बांध दिया गया हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का सेवन करना चाहिए।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- गले से लेकर कान के अन्दर तक तेज फाड़ता हुआ दर्द होता है तथा इसके साथ ही गले में जलन होती है। कान की अन्दरूनी और ऊपरी भाग कठोर और खुश्क हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
जीभ से सम्बन्धित लक्षण :- बेहोशी की समस्या होना या बेहोशी में धीरे-धीरे बकना, जीभ काली तथा खुश्क हो जाती है और बहुत मुश्किल से बाहर निकलती है, जीभ मुंह से बाहर निकालते समय कांपने लगती है, जीभ दान्त के नीचे अटक जाती है। शराबी व्यक्ति की तरह तुतलाना और जीभ का कांपना एक विशेष लक्षण है। बुखार होने के समय में जीभ कांपना लेकिन इसके साथ ही जीभ खुश्क और मैली नहीं होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक से खून बहने लगता है और नथुना संवेदनशील हो जाता है। नजला हो जाता है तथा नाक से पानी जैसा पदार्थ निकलने से पहले सिर में दर्द होता है। परागज दमा (हे-फीवर) रोग होने के साथ ही बार-बार छीकें आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि उपयोगी है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण:- चेहरा पीला पड़ जाता है तथा त्रिआननतन्त्रिकाशूल (ट्रीफेशियल न्युरालगिया) हो जाता है तथा इस भाग के बाईं ओर गर्मी महसूस होती है तथा यह गर्मी सिर की ओर भागती हुई महसूस होती है। जबड़ों की हडि्डयों में तेज दर्द होता है तथा यह दर्द ऐसा महसूस होता है कि जैसे वहां का भाग फट रहा हो, जबड़ा बैंगनी, चितकबरा, फूला हुआ और सूजा हुआ हो जाता है और पीलिया रोग हो जाता है, किसी-किसी रोगी को इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही हरित्पाण्डु रोग हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का सेवन करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मसूढ़ें सूजे हुए रहते हैं, कोमल हो जाते हैं और उनमें से खून बहता रहता है तथा उनमें जलन भी होती है और मसूढ़ों के ये सूजे हुए भाग लाल खुश्क हो जाता है तथा मसूढ़ों की कुछ त्वचा दांतों में अटक जाती है। मुंह में छाले पड़ना तथा इसके साथ ही धब्बे पड़ जाते हैं और इसके साथ ही मुंह में जलन भी होती है, कच्चेपन का अहसास होता है, जी मिचलाता रहता है। दांत में दर्द होता है जिसका असर कानों तक फैल जाता है और चेहरे की हडि्डयों में दर्द होता है। इस प्रकार के मुंह से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले में तेज दर्द होता है तथा गले के दाईं ओर और भी तेज दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षण होने पर जब तरल पदार्थ को निगलते हैं तो और भी अधिक दर्द होता है।
गले में घाव हो जाता है (परिगलतुण्डिका विद्रधि-क्युंसी ओर पेरीशनसिलर अबसेस)।
कान के पास की जड़ों में सूजन आ जाती है तथा वहां की रक्तवाहिनियों में खून जहरीला हो जाता है।
कान के बाहरी और अन्दरूनी भाग में खुश्की आ जाती है, अधिक सूजन आ जाती है, डिफ्थीरिया रोग हो जाता है, वहां की झिल्ली धूमिल हो जाती है, गले के आस पास का भाग काला पड़ जाता है और गर्म पानी पीने से गले में दर्द तेज होता है। गले में तेज जलन होती है तथा इसके साथ ही खखारने की आदत पड़ जाती है, गले के अन्दरूनी भाग में बलगम चिपका रहता है जो न ऊपर ही आता है और न ही नीचे ही जाता है।
गले में तेज दर्द होता है, दर्द वाले भाग पर दबाव देने से परेशानियां और भी बढ़ जाती है, छूने से दर्द सहन नहीं हो पाता है तथा गले का भाग बैंगनी और नीला पड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि कोई चीज निगल ली गई हो और उसे निगलना जरूरी होता है, लार या तरल पदार्थो को निगलने से कष्ट बढ़ता है।
कान में तेज दर्द होता है तथा गले का ऊपरी भाग ढीली-ढीली महसूस होती है।
इस प्रकार के गले से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :-
शराब (ऐल्कोहल) का सेवन करने तथा घेंघा (ओइस्ट्रस) खाने की इच्छा होती है, खाये हुए प्रत्येक पदार्थों से अधिक कष्ट होता है, पेट के अन्दरूनी भाग में दर्द होता है तथा पेट को ऊपर से छूने से और भी तेज दर्द महसूस होता है, भूख तेज लगती है।
आमाशय में ऐसा दर्द होता है जैसे दांतों से पकड़कर दबा दिया गया हो, आमाशय में दबाव महसूस होता है लेकिन भोजन करने से कुछ राहत मिलती है और कुछ घण्टे के बाद फिर से दबाव महसूस होने लगता है।
पाचनतंत्र में कंपन महसूस होती है तथा ठोस चीजें निगलने की अपेक्षा खाली तरल पदार्थ निगलने पर दर्द अधिक होता है।
इस प्रकार के आमाशय से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :-
कब्ज की शिकायत हो जाती है और मलत्याग करने के बाद मल से बदबू आती है, मलद्वार सिकुड़ा हुआ महसूस होता है और ऐसा लगता है कि जैसे मल बाहर नहीं निकल पायेगा। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी हर बार जब छींकता है या खांसता है तो मलान्त्र के अन्दर नीचे से ऊपर की ओर भाला गाड़ दिये जाने जैसा दर्द होता है।
आंतों से खून बहने लगता है और जो खून बहता है वह जली हुई भूसी जैसा लगता है जिसमें काले-काले कण दिखाई पड़ते हैं।
मलद्वार फैल जाता है और सिकुड़ जाता है तथा नीला पड़ जाता है, छींकने खांसने से उनमें सुई चुभने जैसा दर्द होता है, मलत्याग करने की इच्छा तो होती है लेकिन मलत्याग नहीं हो पाता है।
इस प्रकार के मल से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- यकृत प्रदेश संवेदनशील हो जाता है तथा कमर के चारों ओर के भाग से कोई चीज छू जाये तो वह सहन नहीं हो पाता है। पेट फूला हुआ होता है तथा संवेदनशील हो जाता है और पेट में दर्द होता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का सेवन करना चाहिए।
मूत्राशय से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब लगभग काली, लसीली, गहरी रंग की और अनियमित होती है, मूत्रनली के आगे के भाग में चुभन और दर्द महसूस होता है, मूत्राशय पर ऐसा महसूस होता है जैसे कि गोला रखा हुआ है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
मासिकधर्म से सम्बन्धित समस्या हो जाती है तथा धड़कन की गति भी ठीक प्रकार से नहीं चलती है और गर्मी तेज लगती है, रक्तस्राव होता है, सिर के ऊपरी भाग में तेज दर्द होता है, बेहोशी के दौरे पड़ने लगते हैं तथा कपड़े के दबाव से और भी अधिक समस्या बढ़ने लगती है।
स्राव बहुत कम मात्रा में होता है और बहुत कम समय के लिए होता है और स्राव होते ही सिर में दर्द कम हो जाता है और जब स्राव नहीं होता है तो दर्द अधिक होता है।
बाईं डिम्बग्रन्थियों में सूजन आ जाती है और उसमें अधिक दर्द होता है तथा वे कठोर हो जाती है।
स्तन में जलन होने लगती है और स्तन नीला हो जाता है, गुदास्थि और त्रिकास्थि में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब बैठी हुई अवस्था से उठता है तो दर्द और भी तेज होता है।
मासिकधर्म हमेशा के लिए बंद होने के समय में कई प्रकार के रोग होना जैसे- सिर में दर्द होना, जलन होना, रक्त की अधिकता और खून के संचरण में दौरा पड़ना, पागलपन की अवस्था उत्पन्न होना।
मासिकधर्म के शुरू होने पर स्राव काले रंग का होता है, बांये डिम्बाशय में दर्द और सूजन या बांयी तरफ से आरम्भ होकर दाहिनी तरफ फैलती है, डिम्बाशय में सख्ती आना तथा पक जाना।
गर्भाशय बहुत नाजुक होता है रोगिणी इसे किसी को छूने नहीं देती, जरा सा कपड़ा छू जाने पर बेचैनी महसूस होती है, मासिकधर्म ठीक समय पर नहीं आता है, थोड़े समय तक स्राव होना तथा बहुत कम होना। स्राव होने पर दर्द कम होना।
इस प्रकार के स्त्री रोग से सम्ब्न्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री में है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के लक्षण ठीक हो जाते हैं।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- संभोग करने की अधिक उत्तेजना होती है। इस प्रकार के लक्षण से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :-
सांस लेने वाली नली के ऊपर वाले भाग को छूने से दर्द महसूस होता है, लेटने पर दम घुटने लगता है, विशेष रूप से जब गले के चारों ओर कोई चीज लिपटी हुई हो तब, रोगी बिस्तरे को छोड़ने के लिए मजबूर हो जाता है और खिड़की खोलने के लिए दौड़ता है।
रोगी को ऐसा महसूस होता है कि कोई चीज गर्दन से दौड़ती हुई स्वरयंत्र के अन्दर चली गई हो, जिसके कारण रोगी को ऐसा लगता है कि सांस गहरा लेना चाहिए।
हृदय के भाग में तेज ऐंठन होती है तथा सांस से सम्बन्धित कई प्रकार की परेशानियां होने लगती हैं।
सूखी खांसी हो जाती है और इसके साथ ही दम घुटने के दौरे पड़ने लगते हैं, गले में सुरसुराहट होती है।
स्वरयंत्र अत्यधिक संवेदनशील हो जाती है, स्वरयंत्र पर दबाव देने पर या सोने के बाद खुली हवा में जाने से स्वरयंत्र से स्राव होने लगता है, जैसे ही नींद आती है वैसे ही श्वास बंद हो जाता है, जिसके कारण बहुत अधिक परेशानी होती है, स्वरयंत्र को छूने पर दर्द महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ऐसा महसूस होता है कि गले के अन्दर कुछ अटक गया है जो ऊपर से नीचे की ओर गतिशील रहता है और साथ ही थोड़ी-थोड़ी खांसी भी आती रहती है।
इस प्रकार के श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :-
मासिकधर्म के शुरू होने के समय में धड़कन की गति अनियमित होने के साथ ही बेहोशी के दौरे पड़ने लगते हैं जिसके कारण दिल धड़कने लगता है और साथ ही अधीरता बनी रहती है। ‘यावता (कालोसीस)। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :-
गुदास्थि (कोकिक्स) के नाड़ियों में दर्द होता है तथा बैठने से उठने की स्थिति में अधिक कष्ट होता है जिसके कारण शांत बैठे रहना पड़ता है, गर्दन में दर्द होता रहता है, ग्रीवा-प्रदेश में अधिक दर्द होता है, कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि पीठ से बाहों, टांगों, आंखें आदि की ओर दर्द गतिशील है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गर्भाशय से सम्बन्धित लक्षण :-
गर्भाशय में दर्द होता है जो मासिकस्राव और रक्तस्राव होने पर ठीक हो जाता है लेकिन पेट पर कोई भारी चीज रखने पर दर्द असहनीय हो जाता है, गर्भाशय पर किसी प्रकार का दबाव या छुआ जाना, सहन नहीं होता है इसलिए पेट पर से भारी कपड़े हटा देने पड़ते हैं क्योंकि कपड़ों के कारण नाड़ियों की उत्तेजना पैदा हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का सेवन करना चाहिए।
फेफड़ों से सम्बन्धित लक्षण :-
फेफड़ों में जलन होती है और आन्त्रिक ज्वर की अवस्था उत्पन्न हो जाती है, फेफड़ों में पीब बनने लगता है, पसीना अधिक आता है, कफ के साथ खून तथा पीब आता है, त्वचा तथा हडि्डयों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :-
गृध्रसी (साइटिका) रोग अर्थात गठिया का रोग होना तथा दाईं ओर लेटने से आराम मिलता हो, जांघ के अन्दरूनी भागों में दर्द होता है तथा कुछ समय के बाद जलन होती है। कण्डरायें (टेंडस) छोटी पड़ जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :-
शरीर में खून की जहरीली अवस्था उत्पन्न होने तथा डिफ्थीरिया और अन्य रोग की अवस्था उत्पन्न होने पर रोगी को अधिक नींद आती है, सोते-सोते रोगी अचानक चौंक पड़ता है, नींद आती है, लेकिन सो नहीं सकता, शाम को चाहते हुए भी नींद नहीं आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
यकृत से सम्बन्धित लक्षण :-
यकृत ऐसा हो जाता है जैसे शराबियों का हो जाता है तथा इसके साथ ही यकृत में तेज दर्द होता है, यकृत में कई प्रकार के रोग हो जाते हैं, जैसे फोड़ा तथा घाव होना। यकृत में दर्द बराबर नहीं होता रहता है, पेट में दर्द अधिक होता है, दर्द हर समय रहता है तथा खाना खाने के बाद दर्द अधिक होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का उपयोग करना लाभदायक है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :-
पीठ पर ठण्ड महसूस होती है, पैर बर्फ जैसे ठण्डे पड़ जाते हैं, शरीर की त्वचा से गर्म पसीना निकलता है और बुखार भी हो जाता है, कभी-कभी बुखार ठीक हो जाता है तथा फिर अम्ल पदार्थों का सेवन करने से फिर से बुखार हो जाता है, वसन्त ऋतु में हर बार सविराम ज्वर हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बवासीर रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
बवासीर के मस्से खांसते या छींकते समय दर्द होने के साथ ही मलद्वार से बाहर निकल आते हैं, गुदा में तेज दर्द होता है, ऐसा महसूस होता है कि मलद्वार बंद हो गया है, बेचैनी अधिक होती है, मलत्याग सही से नहीं होता है, कब्ज की समस्या अधिक हो जाती है, मलद्वार ऐसा लगता है जैसे जला हुआ हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
शरीर से गर्म पसीना निकलता है, त्वचा का रंग बैंगनी तथा नीला पड़ जाता है, फोड़े-फुंसियां त्वचा पर हो जाती है जो जल्दी ठीक नहीं होती है, फोड़ें के चारों ओर नीले रंग के दाग पड़ जाते हैं, गहरे रंग के छाले पड़ जाते हैं, बिस्तर पर सोने से होने वाले घाव तथा इन घाव के किनारे काले रहते हैं, नीली काली सूजन पड़ जाती है, चीर-फाड़ करने के कारण होने वाले घाव। इस प्रकार के लक्षणों में से कोई भी लक्षण किसी रोगी को हो तथा इसके साथ ही अधिक उदासीपन होता है। बुढा़पे के समय में होने वाले त्वचा पर घाव, गिल्टियां, कोशिकाओं की सूजन तथा स्फीत व्रण (वेरीकोस अल्सर)। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का प्रयोग करना अधिक लाभदायक होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
सोने की अवस्था में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। वसन्त ऋतु में, गर्म पानी से नहाने से, दबाव या सिकुड़न से, गर्म पेय पदार्थों से और आंखें बंद करने की स्थिति में रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
मासिकधर्म के समय में स्राव होने पर, गर्म सिकाई करने से रोग के लक्षण नश्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
मासिकधर्म से सम्बन्धित रोग को ठीक करने के लिए कोटिलेडन औषधि का उपयोग करते हैं लेकिन ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का उपयोग कर सकते हैं। अत: कोटिलेडन औषधि के कुछ गुणों की तुलना लैकेसिस औषधि से कर सकते हैं।
दायां जबड़ा सूजा हुआ और दर्द नाक हो, ऐसा घाव जिसके कारण से दर्द अधिक हो रहा हो, सिर में दर्द तथा ऐसा दर्द होना जैसा फटते हुआ होता है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए नेट्र-म्यूरि, नाइटि-एसिड, कोटेल तथा एम्फिसबीना औषधियों से कर सकते हैं, ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए लैकेसिस औषधि का उपयोग कर सकते है अत: नेट्र-म्यूरि, नाइटि-एसिड, कोटेल तथा एम्फिसबीना औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लैकेसिस औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष:-
आर्से, मर्क्यू, गर्मी, सुरासार तथा नमक आदि का उपयोग लैकेसिस औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
पूरक:-
कोटेलस, कैस्कावेल्ला बहुधा लैकेसिस के रोगसाधक कार्य को सम्पन्न करती है, लाइको, हीपर, सैलामैण्ड्रा।
प्रतिकूल :-
असेटिक एसिड, कार्बो-एसिड।
मात्रा (डोज) :-
लैकेसिस औषधि की आठवीं से 200वीं शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इसकी मात्राओं को बार-बार नहीं दोहराना चाहिए।
लैकनैंथिस Lachnanthes
लेटने के कारण उत्पन्न कोई रोग की अवस्था या किसी कारण से गर्दन टेढ़ी पड़ जाने पर लैकनैंथिस औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक हो जाता है तथा रोगी को आराम मिल जाता है।
यदि रोगी को ऐसा महसूस हो रहा हो कि गर्दन की हड्डी या जोड़ उखड़ गई है, गर्दन कड़ी पड़ गई है तथा हिलाने से दर्द तेज हो रहा हो तो इस प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए लैकनैंथिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
लैकनैंथिस औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण : रोगी के सिर के दाईं ओर दर्द होता है और दर्द का असर जबड़े तक होता है, रोगी को ऐसा महसूस होता है कि सिर बड़ा हो गया है, हल्के से शोर होने के कारण रोगी को और भी परेशानी होने लगती है, खोपड़ी में तेज दर्द होता है, नीन्द नहीं आती है, कभी-कभी सिर में ऐसा दर्द महसूस होता है कि जैसे बाल खड़े हो जाएंगे, हथेलियों और तलुवों में जलन होती है, नाक के ऊपरी भाग पर ऐसा महसूस होता है कि चुटकी काट दी गई हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लैकनैंथिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के हृदय के चारों ओर गर्मी महसूस होती है और ऐसा भी महसूस होता है कि छाती पर बुलबुले फूट रहे हैं तथा पानी खौल रहा है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैकनैंथिस औषधि उपयोग लाभदायक है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के कंधे के बीच के भागों में ठण्ड महसूस होती है, पीठ में दर्द तथा अकड़न होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैकनैंथिस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी है।
गर्दन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के गले में जलन होती है तथा गर्दन के एक ओर खिंचाव होता है। गर्दन के जोड़ों में दर्द होता है। गर्दन के जोड़ पर दर्द होने के साथ ऐसा महसूस होता है कि गर्दन अपने स्थान से हट जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लैकनैंथिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ऐसा महसूस होता है कि शरीर पर बर्फ रखा हुआ हो, चेहरा पीला पड़ जाता है, पसीना अधिक आता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैकनैंथिस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
गर्दन के जोड़ पर दर्द होना और वहां पर भारी तनाव हो रहा हो तो डल्का, ब्रायों, पल्सा, फेल-टौरी औषधियों का प्रयोग करते हैं जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है, लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैकनैंथिस औषधि का उपयोग कर सकते हैं। अत: इन औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लैकनैंथिस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :- लैकनैंथिस औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। टी.बी. (यक्ष्मा रोग) को ठीक करने के लिए मूलार्क की एकल मात्रायें सप्ताह में एक या दो बार या तीन-तीन बूंदें हर चार घण्टे के बाद लेना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह रोग ठीक होने लगता है।
लैक्टुका एसिडम Lactuca Acidium
लैक्टुका एसिडम औषधि स्त्रियों तथा पुरुष के कष्टदायक प्रमेह रोग होने के साथ ही कई प्रकार के लक्षण होने पर रोग को ठीक करने के उपयोग करना चाहिए। ये लक्षण इस प्रकार हैं जैसे- बैठे रहने पर ऐसा महसूस होता है कि मूत्रनली से बूंद-बूंद करके पेशाब टपक रहा है, स्त्रियों के ओवेरिय टियुमन में बहुत दर्द होना।
लैक्टुका एसिडम औषधि कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए उपयोगी है। ये रोग इस प्रकार हैं- हूपिंग खांसी, कलेजे में दबाव के साथ दर्द होना, आक्षेपिक खांसी, गला कुटकुटाकर खांसी आना, शरीर के कई अंगों में दर्द होना, अधिक जम्हाई लेना, मेरुदण्ड में दर्द होना जिसका असर हड्डी के नीचे तक फैल जाता है, शरीर पर हल्का और गर्म महसूस होना आदि।
सुबह के समय में जी मिचलाना तथा उल्टी होना, मधुमेह रोग तथा जोड़ों में दर्द को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
छाती पर होने वाले घाव तथा स्वर यंत्रों में टी.बी. रोग की तरह का घाव होने पर लैक्टुका एसिडम औषधि का बाहरी उपयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
यदि किसी रोगी को प्रतिदिन सुबह के समय में नाक से खून बह रहा हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
मधुमेह रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि का उपयोग लाभदायक है। मधुमेह रोग से पीड़ित रोगी के पेशाब में अधिक मात्रा में शर्करा आता है। ऐसे रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि की ऊंची पोटेंसी का उपयोग करना चाहिए।
लैक्टुका एसिडम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के छाती में दर्द होता है तथा इसके साथ ही कक्ष ग्रन्थियों में रोग उत्पन्न हो जाता है और दर्द होता है, दर्द का असर हाथ तक फैल जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले के अन्दर ऐसा महसूस हो रहा हो कि गुच्छेदार गेंद जैसी कोई चीज अटकी पड़ी है, रोगी उसे निगलने की कोशिश अधिक कर रहा हो तथा गले के नीचे तक का भाग सिकुड़ा हुआ हो तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि उपयोग लाभदायक है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के जोड़ों तथा कंधों, कलाइयों और घुटनों के जोड़ों में दर्द होता है तथा इसके साथ ही इन अंगों में कमजोरी आ जाती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब चलता है तो उसका शरीर कांपने लगता है, सभी अंग ठण्डे महसूस होते हैं। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि उपयोग लाभकारी है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बार-बार पेशाब आता है तथा अधिक मात्रा में आता है, पेशाब में शर्करा भी आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि का सेवन करना चाहिए।
वात रोग से सम्बन्धित लक्षण :- जोड़ों और पुट्ठों दोनों प्रकार के वात रोगों को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि प्रयोग करते हैं। कलाई, कुहनी, कंधों और हाथ के छोटे-छोटे जोड़ों में सूजन और दर्द होना, रात के समय में या किसी प्रकार का कार्य करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गर्भवती स्त्री से सम्बन्धित लक्षण :- गर्भवती स्त्री की त्वचा पीली पड़ गई हो, शरीर में खून की कमी हो गई हो, जी मिचलाता हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
माहवारी से सम्बन्धित लक्षण :- यदि रोगी स्त्री को माहवारी आने के समय में स्राव होने के साथ खून अधिक निकल रहा हो तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि का सेवन करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी की जीभ सूखी हुई रहती है तथा झुलसी हुई लगती है, प्यास अधिक लगती है तथा भूख भी तेज लगती है, मुंह के अन्दर घाव हो जाता है, जीभ से अधिक लार निकलती है, मुंह में पानी भरा रहता है, जी मिचलाता रहता है, सुबह के समय में अधिक परेशानी होती है। इस प्रकार के लक्षण यदि उन स्त्रियों में हो जिनमें खून की कमी हो तो उनके इस रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गर्म तीखी डकारें आ रही हो तो रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
जी मिचला रहा हो लेकिन खाना खाने के बाद कुछ आराम मिल रहा हो, आमाशय से लेकर गले तक के भाग में जलन हो रही हो और इसके कारण लेसदार कफ अधिक निकल रहा हो, ध्रूमपान करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि हो रही हो तो रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
लिथिया, सार्केलैक्टि एसिड q.v., फास्फो-एसिड औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लैक्टुका एसिडम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लैक्टुका एसिडम औषधि की तीसरी से लेकर तीसवीं शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। पाचनतंत्र के सूजन को ठीक करने के लिए लैक्टुका एसिडम औषधि के छ: से लेकर दस बूंदों को एक छोटे गिलास पानी में मिलाकर पीना चाहिए।
लैक्टुका विरोसा (Lactuca virosa)
लैक्टुका विरोसा औषधि की प्रमुख क्रिया संचार प्रणाली तथा मस्तिष्क पर होती है, जिसके फलस्वरूप संचार प्रणाली और मस्तिष्क से सम्बन्धित रोग ठीक हो जाते हैं।
लैक्टुका विरोसा औषधि स्तन में दूध को बढ़ाने वाली औषधि है। यह शरीर के कई अंगों को मजबूती प्रदान करती है।
नपुंसकता रोग, जलोदर रोग, शरीर के कई अंग रोग ग्रस्त होने के साथ ही उन अंगों में कंपन होना और ठण्डक महसूस होना, सारे शरीर में हल्कापन और कसाव महसूस होता है, विशेषकर छाती पर अधिक दबाव महसूस होता है। ऐसे रोगों को ठीक करने के लिए लैक्टुका विरोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
लैक्टुका विरोसा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी हैं-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सोचने की शक्ति कम हो जाती है तथा अत्यधिक बेचैनी होती है, चक्कर आता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका विरोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सोचने की शक्ति कम हो जाती है तथा चक्कर आता रहता है, सिर भारी सा लगता है, मुंह के अन्दर गर्मी महसूस होती है तथा सिर में दर्द होने के साथ ही ठण्ड महसूस होती है। रोगी के सिर में दर्द होने के साथ ही श्वास से सम्बन्धित रोग हो गया हो। श्वासयंत्रों में किसी प्रकार का घाव हो गया हो जिसके कारण सांस लेने में परेशानी होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका विरोसा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट भारी-भारी सा लगता है, पेट में वायु बनने के कारण गड़गड़ाहट होती है, मलद्वार से वायु निकलता रहता है, सुबह के समय में पेट दर्द होता है, पेट तना हुआ रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब मलत्याग करता है या फिर मलद्वार से हवा निकलता है तो उसे कुछ आराम मिलता है।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- सांस लेने में परेशानी होती है, छाती में सूजन आ जाती है तथा दम घुटने लगता है, सुरसुरी युक्त खांसी हो जाती है, खांसी तेज हो जाती है, रोगी को ऐसा महसूस होता है कि जैसे छाती चूर-चूर हो जाएगी। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका विरोसा औषधि का सेवन करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म के समय में स्राव कम हो रहा हो, स्तन में दूध कम बन रहा हो तो लैक्टुका विरोसा औषधि का उपयोग करने से स्राव बढ़ता है तथा स्तन में दूध भी बढ़ने लगता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को ठीक तरह से नींद नहीं आती है, बेहोशी जैसी समस्या हो जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका विरोसा औषधि लाभदायक है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के बायें कूल्हे से नीचे तक लंगड़ापन, चलने से अधिक होती है, पैर तथा तलुवे ठण्डे पड़ जाते हैं और सुन्न हो जाते हैं, हाथों तथा भुजाओं में कंपन होती है, पैरों में ऐंठन होती है तथा इस ऐंठन का असर उंगलियों तथा टांगों के एक ओर तक होती है जिसके कारण पिण्डली भी रोग ग्रस्त हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैक्टुका विरोसा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
ऐसेटिक एसिड, काफिया, नैबेलस, काली-कार्बो, स्पाइरैन्थिस तथा लैकेसिस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लैक्टुका विरोसा औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लैक्टुका विरोसा औषधि की मूलार्क का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लैमियम (Lamium)
स्त्रियों के जननयंत्र तथा मूत्रयंत्र पर लैमियम औषधि का विशेष प्रभाव होता है।
लैमियम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द होने के साथ ही ऐसा महसूस हो रहा हो कि सिर के सामने और पीछे की ओर अधिक तेज दर्द हो रहा है। ऐसे लक्षणों में लैमियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप इस प्रकार के लक्षण दूर हो जाते हैं।
मासिकधर्म तथा प्रदर रोग से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों को होने वाले प्रदर रोग तथा समय से बहुत पहले तथा कम मात्रा में मासिकस्राव होना पर लैमियम औषधि से उपचार करने पर रोग ठीक हो जाता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- मलत्याग करने पर कठोर मल के साथ खून भी आ रहा हो अर्थात खून युक्त मल होने पर लैमियम औषधि से उपचार करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मूत्रमार्ग में ऐसा महसूस हो रहा हो कि वहां पर कुछ पानी की बून्दें टपक रही है तो इस औषधि से उपचार करने पर यह लक्षण ठीक हो जाता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के बाहरी अंगों में तेज दर्द हो रहा हो तथा दर्द ऐसा महसूस हो रहा हो जैसे कि शरीर को फाड़ा जा रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैमियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
एड़ी से सम्बन्धित लक्षण :- एड़ी को थोड़ा सा रगड़ने पर ही छाले पड़ जाते हों तथा एड़ी पर घाव हो गया हो तो लैमियम औषधि से उपचार करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
लैमियम औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लैपिस ऐल्बा (Lapis alba)
ग्रन्थियों में किसी प्रकार का घाव होना, गलगण्ड होना, कैंसर में घाव बनने से पूर्व की अवस्था को ठीक करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्तन, आमाशय तथा गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली पर जलन होना तथा डंक मारने जैसा दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
ग्रन्थियों के आस-पास के संयोजक ऊतक यदि रोग ग्रस्त है तो उसे ठीक करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
रोगी को अधिक तेज भूख लग रही हो, मोटापन अधिक आना, खून की कमी बच्चे में अधिक हो तथा शरीर में आयोडीन की कमी होने के साथ ही भूख तेज लगना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बच्चेदानी के कैंसर रोग को ठीक करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि उपयोग किया जाता है। जननेन्द्रियों में जलन होने के साथ दर्द होना तथा इसके साथ ही अधिक मात्रा में रक्तस्राव होने पर लैपिस ऐल्बा औषधि से उपचार करना चाहिए।
लैपिस ऐल्बा औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कान के बीच के भाग में सूजन होने पर लैपिस ऐल्बा औषधि से उपचार करना चाहिए।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- छाती में लगातार दर्द हो रहा हो और ग्रन्थियों में कठोरता आ गई हो तो रोग को ठीक करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- गले में घाव होना, ग्रन्थियों का बढ़ना तथा उनमें कठोरता उत्पन्न होना, कैंसर होना तथा तेज खुजली होना आदि रोगों को ठीक करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का उपयोग किया जा सकता है।
गर्भाशय से सम्बन्धित लक्षण :- गर्भाशय तथा स्तन पर छोटे-छोटे फोड़े-फुंसियां होना तथा उसमें जलन और डंक लगने जैसा दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले पर फोड़ा होना तथा गले के कैंसर रोग को ठीक करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
होंठ से सम्बन्धित लक्षण :- नीचे के होंठ पर होने वाले घाव जिसमें डंक मारने वाली जलन तथा दर्द हो रही हो तो रोग को ठीक करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मासिकधर्म से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म के समय में अधिक कष्ट होना तथा दर्द होना, मासिकधर्म के समय अचानक तेज दर्द हो जाना और बेहोश हो जाना, योनि में तेज खुजली होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री के रोग को ठीक करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
सिलीका, बादियागा, कल्के-आयोकोनि, आर्से-आयों, काली-आयो तथा आस्टेरियस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लैपिस ऐल्बा औषधि से कर सकते हैं।
कान की सूजन को ठीक करने के लिए सिलीका औषधि का उपयोग किया जा सकता है और ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का उपयोग कर सकते हैं अत: सिलीका औषधि के कुछ गुणों की तुलना लैपिस ऐल्बा औषधि से कर सकते हैं।
ग्रन्थियों के आस-पास कठोरता को दूर करके लचीलापन तथा कोमलता लाने के लिए कल्केफ्लोरि तथा सिस्टस औषधि का उपयोग करते हैं और इस प्रकार का लाभ पाने के लिए लैपिस ऐल्बा औषधि का उपयोग कर सकते हैं। अत: कल्केफ्लोरि तथा सिस्टस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लैपिस ऐल्बा औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लैपिस ऐल्बा औषधि की छठी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लौरोसेरासस Laurocerasus
तेज गुदगुदाहट युक्त खांसी होना तथा जिसके साथ ही हृदय में भी दर्द होता है, ऐसी खांसी को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। इस औषधि का प्रयोग अधिक वक्ष (छाती) तथा हृदय से सम्बन्धित रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है। आमाशय में किसी प्रकार का दर्द होना तथा ऐंठन होने पर इस औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
यदि किसी रोगी की त्वचा नीली पड़ गई हो तथा इसके साथ ही शरीर में कमजोरी आ गई हो तथा हृदय से सम्बन्धित कोई रोग भी हो गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में लौरोसेरासस औषधि का उपयोग-
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक ठण्ड लग रही हो तथा इसके साथ ही शरीर का ताप भी बढ़ रहा हो और अधिक प्यास लग रही हो, दोपहर के समय में मुंह सूख रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि का सेवन करना चाहिए।
सांस से सम्बन्धित लक्षण :- सांस लेने में परेशानी होना, उठकर बैठने से सांस लेने में परेशानी और भी बढ़ जाना, हृदय पर हाथ रखने से दर्द महसूस होना, हृदय से सम्बन्धित रोग होने के साथ ही खांसी होना, व्यायाम करने से हृदय के चारों ओर दर्द होना। सूखी खांसी होने के साथ ही गुदगुदाहट महसूस होना, सांस लेने में कष्ट होना, हृदय के चारों ओर दर्द होना, छाती में सिकुडन होना, खांसी तेज होना तथा बलगम में खून आना, नाड़ी की गति कमजोर होना, फेफड़ों में लकवा रोग जैसे लक्षण दिखाई देना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय के चारों ओर दर्द होना तथा इसके साथ सांस लेने में परेशानी होना। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि उपयोगे का लाभदायक है।
बेहोशी से सम्बन्धित लक्षण :- बेहोशी की समस्या उत्पन्न हो गई हो तथा इसके साथ ही हृदय में दर्द हो रहा हो और फेफड़ों में जलन हो रही हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी है।
खांसी से सम्बन्धित लक्षण :- खांसी होने के साथ ही बलगम में खून भी आता है तथा खून चमकीले लाल रंग का होता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
नीन्द से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को तेज नीन्द आती है तथा इसके साथ ही खर्राटे भी आते हैं। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि का उपयोग फायदेमन्द है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को किसी भी चीजों को निगलने में परेशानी होती है, ग्रासनली (भोजननली) में सिकुड़न होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब पानी पीता है तो उसके आन्तों से जब पानी नीचे की ओर उतरता है तब गड़गड़ाहट की आवाजें सुनाई देती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि का उपयोग लाभकारी है।
मासिकधर्म से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी स्त्री को मासिकस्राव समय से पहले ही शुरू हो जाता है तथा अधिक मात्रा में होता है, स्राव में पतला खून आता है, त्वचा ठण्डी पड़ जाती है, चेहरे का रंग पीला तथा नीला पड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री कभी-कभी बेहोश भी हो जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि उपयोग अधिक फायदेमंद है।
छोटे बच्चों से सम्बन्धित लक्षण :- छोटे बच्चे का शरीर नीला पड़ जाना या जन्म लेने के बाद बच्चे का नीला पड़ जाना और साथ ही सांस लेने में कष्ट होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित बच्चे के रोग को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- हाथ पैरों के नाखून गांठदार हो जाते हैं, त्वचा नीली पड़ जाती है, नितम्बों, जांघों और एड़ियों में मोच आ जाने जैसा दर्द होता है, पैरों से ठण्डे पसीने निकलते हैं, उंगुलियां टेड़ी-मेढ़ी हो जाती है और हाथ की शिराएं फूल जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लौरोसेरासस औषधि का सेवन करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
हाइड्रोस्या-ए, कैम्फर, सीकेल, अमोनि-कार्बो तथा अम्बरा औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लौरोसेरासस औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
बैठने पर, मेहनत का काम करने से तथा शाम के समय में खुली हवा में भोजन करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
रात के समय में खुली हवा में टहलने से तथा लेटने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लौरोसेरासस औषधि मूलार्क से तीसरी शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। इसके पानी की दो से पांच बूंदों तक की मात्राओं का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए किया जा सकता है।
लैप्पा-आर्कटियम (Lappa-Arctium)
चर्म रोगों को ठीक करने के लिए लैप्पा-आर्कटियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए, क्योंकि इसके प्रभाव से चर्म रोग जल्दी ही ठीक हो जाते हैं।
सिर, चेहरे और गर्दन पर घाव होना, फुंसियां और मुंहासे हो गये हो तो उसे ठीक करने के लिए लैप्पा-आर्कटियम औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
पलकों के किनारों पर गुहेरियां या घाव हो गया हो तो उसे ठीक करने के लिए लैप्पा-आर्कटियम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
लैप्पा-आर्कटियम औषधि निम्नलिखित लक्षणों के रोगियों के रोग को ठीक करने में उपयोगी है-
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- घुटनों, टखनों और हाथों में दर्द होना तथा दर्द का असर पैर की उंगलियों तथा हाथों के उंगलियों तक फैल जाता है, सभी हडि्डयों के जोड़ों में दर्द होता है तथा कई अंगों में घाव होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लैप्पा-आर्कटियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- बच्चेदानी का अपने स्थान से हट जाना, बच्चेदानी में तेज दर्द होना तथा ऐसा महसूस होना कि बच्चेदानी किसी चीज से कुचली जा रही है, योनि ठण्डी पड़ जाती है, वस्ति-गहृर के अंगों का तालमेल बिगड़ जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब खड़ा होता है, चलता है या गलत कदम पड़ने के कारण अचानक झटका लगने से और बढ़ जाते हैं। ऐसे रोगी स्त्री के रोगों को ठीक करने के लिए लैप्पा-आर्कटियम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
लैप्पा-आर्कटियम औषधि की मूलार्क से तीसरी शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम क्लब मॉस (Club Moss)-लाइको –(Lyco)
लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग उन रोगियों के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है जिनका रोग बढ़कर अधिक गंभीर हो जाता है।
यह ऐसे रोगियों के लिए बहुत उपयोगी है जो मानसिक रूप से कमजोर तथा शारीरिक दृष्टि से भी कमजोर होते हैं और शरीर में बहुत अधिक कमजोरी होती है।
शरीर के दाहिने अंगों में घाव होना, विशेषकर गला, छाती, पेट तथा यकृत और डिम्ब प्रदेश में घाव होना। इस प्रकार के लक्षणों के साथ ही रोगी को अधिक लेटने का मन करता है लेकिन हाथ-पैरों को चलाने का मन नहीं करता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
रोगी को और भी कई प्रकार के रोग होते हैं जो इस प्रकार हैं- लालची, कंजूस, धन का लालची, दूसरे के प्रति घृणा की भावना रखना आदि। रोगी को भय होता है तथा क्रोधित स्वभाव का हो जाता है, अपमान के कारण उसे और भी कई प्रकार की बीमारियां हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का उपयोग-
पाचन संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- पाचन संस्थान में किसी प्रकार का रोग उत्पन्न होने के कारण पाचन संस्थान की क्रिया भी गड़बड़ा जाती है और इस कारण से रोगी जो भी भोजन खाता है वह सही से पचता नहीं है और रोगी के शरीर में भी कमजोरी आ जाती है तथा कई प्रकार की समस्या भी उसे हो जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि उपयोग लाभदायक है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंगों में फैलाव होने के कारण उनमें ऐंठन तथा सिकुड़न भी होने लगती है जिसके कारण कभी-कभी पेट में मरोड़ तथा अन्य अंगों में मरोड़ भी होने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हाथ-पैरों से सम्बन्धित लक्षण :- हाथ-पैरों में ऐसा दर्द होना जैसे कि उनमें चीरा लग गया हो या वे अंग फट रहे हो, विशेषकर रात के समय में ऐसा अधिक महसूस होता हैं, हाथ-पैर सुन्न पड़ जाते हैं, ऐसा महसूस होता है कि वे सो गई हों, हाथ पैरों में खिंचाव तथा सिकुड़न होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गठिया रोग से सम्बन्धित लक्षण :- पुराना गठिया रोग और जोड़ों में सफेद खड़िया जैसे कण जम जाना और दर्द का असर शरीर के दायीं ओर से शुरू हो कर बायीं ओर जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब मल त्याग करता है या मूत्र त्याग करता है तो उसके मल-मूत्र से अधिक बदबू आती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि उपयोग लाभदायक है।
हडि्डयों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई हडि्डयों में जलन होने के साथ दर्द होता है तथा रात के समय में दर्द अधिक होता है, अस्थियों का नर्म पड़ जाना, हडि्डयों का अधिक कमजोर होना, शरीर के अन्दरुनी भागों में कोई पुराना रोग होना, सूजन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बच्चों से सम्बन्धित लक्षण :- बच्चा जब मूत्रत्याग करता है तो वह रोने लगता है, बच्चे को दर्द महसूस होता है, बच्चा अधिक दूबला-पतला हो जाता है, उसके शरीर में कमजोरी आ जाती है, सिर बहुत बड़ा महसूस होता है तथा शरीर की त्वचा पर झुर्रियां पड़ जाती है, बच्चा अपनी आयु से बहुत बड़ा लगता है, बच्चे का दिन-प्रतिदिन चीखना चिल्लाना बढ़ता चला जाता है, बच्चा दिन में रोता रहता है तथा रात को सोता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी भी बच्चे को है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग फायदेमंद है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक में सुरसुराहट होती है तथा सिकुड़न महसूस होती है और नींद में सोते-साते अचानक चौंक पड़ना और नाक को रगड़ना, रात को नाक बंद हो जाती है, नाक सूख जाती है, मुंह से ही सांस लेनी पड़ती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि उपयोगी है।
गलशुण्डी से सम्बन्धित लक्षण :- गलशुण्डी बड़ा होने के साथ ही उस पर छोटे-छोटे घावों के निशान पड़ जाते हैं, गलशुण्डिका और जीभ में सूजन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- गाल के दाहिनी ओर रोहिनी जैसी झिल्ली जम जाती है अथा रोहिनी रोग हो जाना, मुंह के अन्दरूनी भाग में भूरी लाली जमना, झिल्ली दाहिनी ओर से बढ़ जाती है और नाक से नीचे उतरती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
गुर्दे और कमर से सम्बन्धित लक्षण :- गुर्दे और कमर में दर्द होता है तथा पेशाब करने के बाद दर्द कम हो जता है ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मूत्र से सम्बन्धित रोग होने के साथ ही गुदा और मूत्राशय में चुभन होती है, पेशाब में लाल रक्त के कण दिखाई पड़ते हैं, पेशाब करने से पहले कमर में दर्द होता है और पेशाब करने के बाद दर्द ठीक हो जाता है, पेशाब में लिथिक एसिड की कुछ मात्रा आने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का सेवन करना चाहिए।
नपुंसकता से सम्बन्धित लक्षण :- नपुंसकता रोग होने के साथ ही रोगी को संभोग करने की इच्छा अधिक होती है तथा समय से पहले अपने आप ही वीर्य निकल जाता है और इसके बाद लिंग ठण्डा हो जाता है तथा संभोग की शक्ति कम हो जाती है अर्थात संभोग करने का मन नहीं करता है, संभोग करने के समय में लिंग में हल्का कड़ापन होता है, संभोग करते समय नींद सी आने लगती है, रोगी संभोग के प्रति भयभीत हो जाता है तथा जम्भाई आती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मासिकधर्म से सम्बन्धित लक्षण :- प्रदर रोग होने के साथ अधिक मात्रा में स्राव होना तथा इसके साथ ही योनि के दायीं ओर से बायीं तरफ जाने की चीरती हुई सी वेदना होती है, स्राव अधिक होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्रियों के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- योनि में सूखापन महसूस होता है, संभोग क्रिया करते समय और संभोग के बाद योनि में जलन होती है, हर बार मलत्याग करते समय प्रजननांगों में से खून बहने लगता है, स्तन के निप्पलों में पीब जमने लगती है और तेज दर्द भी होता है, गर्भवती स्त्री को ऐसा महसूस होता है कि उसका भ्रूण पलट गया है, भ्रूण सही स्थिति में नहीं रहता, कलाबाजी खाता रहता है, योनिपथ में वायु सरसराती हुई महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्रियों के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सांस संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब सांस लेता है तो उसके सांस यन्त्र से आवाजें निकलती रहती हैं, नाक बंद हो जाता है, दिन-रात को नाक से सांस लेना मुश्किल हो जाता है, नाक से पीला हरा श्लेष्मा (कफ) निकलता रहता है, नाक के नथुने फड़फड़ाते रहते हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग अति लाभकारी है।
फेफड़ों से सम्बन्धित लक्षण :- फेफड़ों में जलन होती है, छाती में कफ जम जाता है और सांस लेते समय घरघराहट होती है, सांस लेने में परेशानी होती है, नाक के नथुनों के दोनों तरफ फड़कन होती है, खांसी हो जाती है, खांसने पर अत्यधिक कफ निकलता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
बच्चों से सम्बन्धित लक्षण :- बच्चे को टी.बी. हो जाता है या फिर सूखा रोग होने के साथ ही खांसी हो जाती है, ऐसे बच्चे के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का सेवन करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को खट्टी-खट्टी डकारें आती है तथा शरीर से पसीना निकलता रहता है तथा उल्टी खट्टी आती है और अविराम ज्वर हो जाता है और पेट फूलने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के बाहरी अंगों में सर्दी तथा कंपकंपी होती रहती है तथा पसीना भी आता रहता है और प्यास भी लगती है, बुखार आ जाता है तथा खट्टी डकारें आती है, मलेरिया ज्वर होने के साथ ही कमजोरी आ जाती है, अकेले रहने से डर लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का सेवन करना लाभदायक है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर में बहुत अधिक कमजोरी आ जाती है, नीचे के जबड़े आपस में लटक जाते हैं, आंखों के सामने धुंधलापन छा जाता है तथा मुंह से सांस लेना पड़ता है, सोते समय अंग फड़कना और झटके लगते रहना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब आराम करता है तो उस समय अधिक कमजोरी महसूस करता है, वह किसी भी काम को करना नहीं चाहता है, सुबह के समय में उठने पर कमजोरी महसूस करता है, शरीर में ऐंठन और अकड़न होती है, शाम के समय में बेचैनी महसूस होती है, शरीर में कंपकपी हो जाती है, ऐसा महसूस होता है कि शरीर में खून का संचारण रुक गया है, समय होने से पहले ही बूढ़ा दिखने लगता है, ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
जीभ से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की जीभ मुंह के अन्दर इधर से उधर एक ओर से दूसरी ओर जाता रहता है, माथे पर झुर्रियां पड़ जाती हैं, सिर सीधा नहीं रहता है, सिर एक ओर लटका रहता है, सूखा रोग हो जाता है, शरीर की त्वचा में खुजली होती रहती है, कान से पीब जैसा स्राव होता है, अरक्त ज्वर हो जाता है तथा इसके साथ ही रोगी को कम सुनाई देता है, शाम की रोशनी में कम दिखाई देता है, रोशनी के सामने कुछ भी देखने में असमर्थ रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब किसी चीज को देखता है तो उसे उस चीज का आधा भाग साफ दिखाई देता है लेकिन दायां भाग साफ दिखाई नहीं देता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग फायदेमंद है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर की त्वचा पर कई जगह गांठें हो जाती है तथा सूजन और मवाद पड़ जाती है, खांसी हो जाती है तथा खांसते समय कनपटियों में और छाती में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
गर्दन से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर का ऊपरी भाग सूख जाता है तथा गर्दन और छाती पर सूजन हो जाती है, एक पांव गर्म और दूसरा ठण्डा रहता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का उपयोग लाभकारी है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के माथे पर ऐसी जलन होती है जैसे की कोयला जल रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :-
रोगी को मलत्याग करने में रुकावट महसूस होती है तथा मलत्याग करना लगभग असम्भव हो जाता है, बवासीर का रोग होने के साथ ही मलद्वार से रक्त का स्राव होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
स्त्री रोगी को मलत्याग करने में परेशानी होती है तथा मासिकस्राव होने पर यह समस्या अधिक होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
रोगी को मलत्याग करना असम्भव हो जाता है तथा मलत्याग करने की इच्छा होती है लेकिन मलत्याग ठीक से नहीं होता है, रोगी को ऐसा महसूस होता है कि जैसे मलद्वार पर कुछ रखा हुआ है, मल गुदा द्वार से अन्दर रहने के कारण कब्ज की समस्या हो जाती है, रोगी के जीभ का स्वाद खट्टा हो जाता है, खट्टी डकारें आती हैं, उल्टी आने लगती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
यकृत से सम्बन्धित लक्षण :- यकृत क्रिया बिगड़ जाती है तथा यकृत और फेफड़ों में रोग हो जाता है, रात के समय में मुंह का स्वाद कडुवां हो जाता है, पेट भरा रहता है, मिठाई खाने की इच्छा होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- ऐसा महसूस होता है कि पेट में कुछ पक रहा है, पेट में गड़गड़ाहट होती है, पेट के ऊपरी भाग में तथा आमाशय में जलन महसूस होती है, सर्दी लगती है, बुखार होने लगता है तथा खट्टी उल्टी आती है, तेज भूख लगने के कारण भोजन करने बैठता है लेकिन दो चार कौर (ग्रास) खाते ही खाना छोड़ देता है, ऐसा लगता है कि पेट भर गया, कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि गले तक खाना आ गया है, रोगी को तेज भूख लगने के कारण रात को उठकर टहलने लगता है, जितना खाना खाता है, उतनी ही खाने की इच्छा कम नहीं होती है, अगर रोगी खाना नहीं खाता है तो सिर में दर्द होने लगता है, पेट में अत्यधिक वायु भर जाती है, पेट फूलने लगता है, जब डकारें आती है तो कुछ राहत मिलती है, भोजन करने के बाद औंघाइयां आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का सेवन करना चाहिए।
आंतों से सम्बन्धित लक्षण :- आंतों में वायु इकट्ठा हो जाती है, जो ऊपर की ओर चढ़ती है और गले के पास आकर जमा हो जाती है, जब डकारें आती है तो राहत मिलती है, सांस लेने में परेशानी होती है, डकारें आने पर पेट दर्द होने से राहत मिलती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
पाचन से सम्बन्धित लक्षण :- पाचन क्रिया धीमी हो जाती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- आमाशय के निचले भाग पर सूजन आ जाती है, कसा हुआ कपड़ा पहनना अच्छा नहीं लगता है, गले से हृदय तक जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) -
दोपहर के समय के बाद, रात के समय में, शाम को चार बजे से आठ बजे के बीच में, सर्दी लगने से, गर्म कमरे में रहने से, सिर पर कपड़ा लपेटने से, सिर पर मालिश करने से, लेट जाने पर, पेशाब करते समय रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
हाथ-पैर चलाने से, बिस्तर की गर्मी से, ठण्डी वस्तुओं का प्रयोग करने से, गर्म भोजन करने से और गर्म पेय पदार्थो का प्रयोग करने से, कपड़े ढीले पहनने से, सिर खुला रखने से और डकारें आने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
अनुपूरक-
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कल्के-का, कार्बो-वे, चेली, ग्रेफा, आयो, लैके, नक्स-वो और सल्फर के बाद उत्तम क्रिया करती है।
क्रियानाशक:-
कैम्फ, काष्टि और पल्स औषधियां लायकोपेडियम-क्लेवेन्टम औषधि के दुष्प्रभावों को नष्ट कर देती है।
लैथाइरस(लैथाइरस सैटाइवस) (Lathyrus)
लैथाइरस औषधि का प्रयोग उन रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है जिनमें रोगी का शरीर कांपने लगता है तथा उसके शरीर में लकवा रोग के लक्षण दिखाई देते हैं।
बेरी-बेरी रोग, छोटे बच्चे के शरीर का कोई अंग कमजोर होना, इंफ्लुएंजा तथा अन्य रोग जिसके कारण शरीर में बहुत अधिक कमजोरी आ जाती है। ऐसे लक्षणों को ठीक करने के लिए लैथाइरस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
विभिन्न लक्षणों में लैथाइरस औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के शरीर में उत्साह की कमी हो जाती है तथा उसे भ्रम हो जाता है, जब रोगी आंखों को बंद करता है तो उसके सिर में चक्कर आने लगते हैं और इसके साथ ही शरीर में कमजोरी आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैथाइरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- जीभ की नोक पर जलन होने के साथ ही दर्द होता है, जीभ और होठों पर चुनचुनी होने के साथ ही सुन्नपन उत्पन्न हो जाता है और ऐसा लगता है की जीभ झुलस गई हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैथाइरस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :-पैर की उंगलियां सुन्न हो जाती है तथा उनमें कंपन होने के साथ ही चाल भी लड़खड़ाने लगती है, पैरों में अत्यधिक कठोरता उत्पन्न हो जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी जब चलता है तो उसके घुटने एक-दूसरे से टकराते रहते हैं, टांगों में ऐंठन होती है, ठण्ड अधिक लगती है, पैर के तलुवों ठण्डे पड़ जाते हैं, बैठे रहने पर न टांगों को पसारा जा सकता है और न ही एक-दूसरे के ऊपर चढ़ाया जा सकता है, रीढ़ की हड्डी में सूजन हो जाती है, जोड़ों में लकवे रोग जैसे लक्षण पड़ते हैं, नितम्ब की पेशियां और निम्नांग सूख जाते हैं, टांगें नीली पड़ जाती हैं तथा उनमें सूजन आ जाती है, टखनों तथा घुटनों में खुजली होती है और उनमें कड़ापन महसूस होता है, पिण्डलियां अत्यधिक तनी हुई रहती है, रोगी सामने की ओर झुककर बैठता है, पैरों को कठिनाई से ही सीधा कर पाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैथाइरस औषधि का सेवन करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :-मूत्राशय की कार्य करने की शक्ति बढ़ जाती है, रोगी को बार-बार पेशाब आता है, जब रोगी पेशाब को रोकता है तो उसका पेशाब अपने आप निकल जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैथाइरस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
आक्सीट्रौपिस, सीकेल, पेटिवेरिया, ऐग्रोस्टेमा गिथैगो औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लैथाइरस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लैथाइरस औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लैट्रोडेक्टास मैक्टान्स (Latrodectus mactans)
मकड़ी के काटने से धनुर्वाती उपसर्ग उत्पन्न होते हैं जो कई दिनों तक बने रहते हैं। लैट्रोडेक्टास मैक्टान्स औषधि की क्रिया से हृच्छूल का एक चित्र उपस्थित होता है। पुरोहृद प्रदेश आक्रमण का केन्द्रस्थल प्रतीत होता है। वक्षपेशियों की सिकुड़न, जो कंधों और पीठ तक फैल जाती है, रक्त जमने की क्रिया कम हो जाती है।
विभिन्न लक्षणों में लैट्रोडेक्टास मैक्टान्स औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में तेज दर्द होता है, दर्द के कारण रोगी चिल्लाता रहता है, गर्दन से लेकर सिर के पिछले भाग तक दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैट्रोडेक्टास मैक्टान्स औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सांस से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सांस लेने में अधिक रुकावट होती है, हांफता रहता है, रोगी को ऐसा डर लगता है कि कहीं सांस बंद न हो जाए। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैट्रोडेक्टास मैक्टान्स औषधि का उपयोग लाभदायक है।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय में तेज दर्द होता रहता है, इस दर्द का असर कांखों और नीचे की ओर बांहों से होती हुई उंगलियों तक फैल जाता है, साथ ही शरीर के अंग सुन्न पड़ जाते हैं, रोगी की नाड़ी पतली हो जाती है, रोगी के छाती से लेकर पेट तक ऐंठन होती है तथा दर्द भी होता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लैट्रोडेक्टास मैक्टान्स औषधि का सेवन करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- बायें बाजू में दर्द होता रहता है, बाजू में लकवा रोग के लक्षण दिखाई देते हैं, पैरों में कमजोरी बहुत अधिक होती है, पेट के पेशियों में ऐंठन होती है और कई अंगों में कमजोरी आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैट्रोडेक्टास मैक्टान्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सारे शरीर में ठण्डक महसूस होती है, रोगी को कभी-कभी ऐसा महसूस होता है कि त्वचा संगमरमर जैसी ठण्डी पड़ी हुई है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैट्रोडेक्टास मैक्टान्स औषधि उपयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
लौट्रोडेक्टास हैसेल्टी, आरेनिया, माइगेल, थेरीडियन, लैट्रोडियन कैलियो तथा ट्रायटेमा औषधि के कुछ गुणों की तुलना लैट्रोडेक्टास मैक्टान्स औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लैट्रोडेक्टास मैक्टान्स औषधि की छठी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए किया जाता है।
लेसीथिन (lecithin)
लेसीथिन औषधि जैवीप्रक्रियाओं के लिए अधिक महत्वपूर्ण औषधि है, रोगी को स्वस्थ्यवर्धक बनाने के लिए इस औषधि का उपयोग किया जाता है, खून पर इस औषधि का लाभदायक प्रभाव पड़ता है। यह शरीर में खून की कमी को दूर करता है, शारीरिक कमजोरी तथा स्नायु कमजोरी को दूर करने के लिए यह महत्वपूर्ण लाभदायक औषधि है, अनिद्रा को दूर करने के लिए यह बहुत ही उपयोगी औषधि है। यह शरीर में लाल रक्तकणों की संख्या को बढ़ाती तथा स्तन में दूध को बढ़ाती है, दूध में पौष्टिकता को भी बढ़ाती है।
शरीर में फास्फेटी की मात्रा को घटाने के लिए लेसीथिन औषधि का उपयोग लाभदायक है, यह मानसिक बीमारी को दूर करती है तथा इसके प्रभाव से नपुंसकता रोग ठीक हो जाता है।
टी.बी. (क्षय रोग) के रोग को ठीक करने के लिए लेसीथिन औषधि का उपयोग किया जा सकता है। इसके प्रभाव से टी.बी. का रोग ठीक हो जाता है तथा रोगी का शरीर भी स्वस्थ्य हो जाता है।
यदि किसी रोगी को अधिक थकान हो रही हो तथा घुटन महसूस हो रही हो, शरीर पर से मांस दिन-प्रतिदिन कम होता जा रहा हो, शरीर का स्वस्थ्य बिगड़ रहा हो। इन सभी लक्षणों के होने के साथ ही यदि रोगी को यौन शक्ति में कमजोरी हो तो उसके रोग ठीक करने के लिए लेसीथिन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
यदि किसी रोगी के शरीर में अधिक खून की कमी हो तथा इसके साथ ही उसकी याददास्त अधिक कमजोर हो, वह किसी भी चीज को याद नहीं रख पाता हो, मानसिक कमजोरी अधिक हो, कानों में घंटी बजने जैसी आवाजें सुनाई दे रही हो, चेहरे का रंग पीला पड़ गया हो, आमाशय फूल गया हो तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लेसीथिन औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
विभिन्न लक्षणों में लेसीथिन औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का स्वास्थ्य दिन-प्रतिदिन गिरता चला जाता है तथा याददास्त भी कमजोर हो जाती है, दिमागी शक्ति कमजोर हो जाती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लेसीथिन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सिर में दर्द होता रहता है तथा सिर के पिछले भाग में लगातार दर्द होता रहता है, कानों में अजीबों-गरीब आवाजें सुनाई देती है और रोगी को ऐसा महसूस होता है कि जैसे कानों में घंटियां बज रही हों। इस प्रकार के लक्षणों के साथ ही रोगी के मलद्वार में दर्द होता है तथा चेहरा पीला पड़ जाता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लेसीथिन औषधि का उपयोग लाभदायक है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को प्यास अधिक लगती है और काफी पानी पीने की इच्छा होती है, आमाशय फूला हुआ रहता है, उसमें दर्द होता रहता है और गले की ओर जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लेसीथिन औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को बहुत कम मात्रा में पेशाब होता है तथा पेशाब में फास्फेट पदार्थ आता है तथा शर्करा भी आता है तथा अन्न जैसे पदार्थ पेशाब में दिखाई देती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लेसीथिन औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
जननांग से सम्बन्धित लक्षण :- पुरुष रोगी में पौरुष शक्ति कम हो जाती है तथा शारीरिक कमजोरी अधिक हो जाती है, संभोग करने की शक्ति बहुत ही कम हो जाती है। रोगी स्त्री में डिम्ब-ग्रन्थियों में दोष उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लेसीथिन औषधि का सेवन करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के सभी अंगों में दर्द होता है तथा दबाव महसूस होता है, शरीर की ऊर्जा शक्ति कम हो जाती है, इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी एकदम शांत स्वभाव का हो जाता है तथा उसमें अधिक कमजोरी आ जाती है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लेसीथिन औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
फास्फोरस औषधि के कुछ गुणों की तुलना लेसीथिन औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लेसीथिन औषधि की आधी से दो ग्रेन की मात्रा में स्थूल (क्रूड) औषधि और शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। बारहवीं शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए कर सकते हैं।
लीडम (Ledum)
लीडम औषधि जोड़ों के दर्द के रोगियों के रोगों को ठीक करने के लिए उपयोगी औषधि है।
यह उन रोगियों के लिए विशेष उपयोगी है जिन रोगियों के पैर के जोड़ों में दर्द होता है और दर्द का असर ऊपर की ओर बढ़ता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लीडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
यह औषधि त्वचा को भी प्रभावित करती है, जिसमें सिरौंचा विष जैसे उद्घभेद उत्पन्न होते हैं, अत: यह उसकी प्रतिविष है तथा कीड़ें-मकोड़ों के काटने पर यह प्रतिविष का कार्य करती है। सर्वागीण जैवी ताप का अभाव, फिर भी बिस्तर के ताप को रोगी सहन नहीं कर पाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लीडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नुकीले तथा तेज औजारों के कारण उत्पन्न घाव तथा खरोंच या किसी कीड़ें के काटने से उत्पन्न घावों को ठीक करने के लिए लीडम औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
विभिन्न लक्षणों में लीडम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी जब चलता है तो उसे चक्कर आने लगते हैं, कभी-कभी तो रोगी गिर भी जाता है, जब रोगी व्यक्ति अपने सिर को ढके रहता है तो उसे कुछ आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लीडम औषधि का सेवन करना लाभदायक होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नकसीर फूटने (नाक से खून बहना) पर लीडम औषधि से उपचार करने पर रोग ठीक हो जाता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों में तेज दर्द होना, पलकों एवं श्वेतपटलों में जल अथवा खून का जमना। किसी चीज के आंखों में जले जाने के कारण उत्पन्न रोग। मोतियाबिन्द का रोग। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लीडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के माथे और गालों पर लाल फुंसियां निकल जाती है, इन फुंसियों का स्पर्श करने पर डंक लगने जैसा दर्द महसूस होता है, नाक और मुंह के चारों ओर पपड़ीदार घाव हो जाते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लीडम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी का मुंह सूखा जा रहा हो और डकारें आने के साथ ही उल्टियां भी आती हों, सर्दी-जुकाम होने के साथ ही जीभ का स्वाद भी भद्दा लग रहा हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लीडम औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
सांस से सम्बन्धित लक्षण :- नाक में जलन होने के साथ ही, खांसी हो जाती है, बलगम के साथ खून भी आता है। रोगी को सांस लेने में परेशानी हो रही होती है, छाती में सिकुड़न महसूस होती है, दम घुटने लगता है तथा इसके साथ ही सांस लेने में रुकावट होती रहती है। श्वांसनली में दर्द होता है तथा इसके साथ ही जलन भी होती है तथा छाती में दर्द और दबाव महसूस होता रहता है। रोगी को खांसी हो जाती है तथा बलगम के साथ खून भी आता है, जोड़ों में दर्द होता है। रोगी जब छाती को छूता है तो उसे दर्द होता है। काली-खांसी तथा इसके साथ ही सांस लेने में परेशानी होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लीडम औषधि उपयोगी है।
मलद्वार से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के मलद्वार में दरारें होने के साथ ही दर्द होता है तथा खून भी बहता रहता है। ऐसे रोगी के रोग के लक्षणों को दूर करने के लिए लीडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को गठिया रोग होने के साथ ही शरीर के सभी अंगों में दर्द होता है तथा जोड़ों में दर्द होता है, रोगी को शरीर के छोटे-जोड़ों में इस प्रकार का दर्द होता है कि जैसे कोई गोली लग गई हो, दर्द वाला भाग सूज जाता है। किसी-किसी रोगी के दायें कंधें में कंपकपी होती है तथा इसके साथ ही कंधें में दर्द होता है, हडि्डयों में गतियां अधिक होने से दर्द बढ़ जाता है, जोड़ों से कड़कड़ाहट की आवाज आती है तथा रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। टखने में सूजन हो जाती है तथा इसके साथ ही दर्द होता है। रोगी के तलुवों में तेज दर्द हो रहा हो और दर्द के कारण रोगी चल भी नहीं पाता है। टखने में मोच आ जाती है और रोगी को अधिक दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लीडम औषधि का सेवन करना चाहिए।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को अधिक ठण्ड लगती है, अंगों पर ठण्ड लगती है तथा चेहरे पर गर्मी महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लीडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के चेहरे पर मुहासें हो जाते हैं, चेहरे पर कुछ गड़ने जैसा दर्द होता है। चेहरे पर छाजन रोग होना, पैरों और टखनों में खुजली होती है तथा जब रोगी बिस्तर पर होता है तो उसे अधिक खुजली होती है और शरीर में गर्मी महसूस होती है। किसी प्रकार से चोट लगने के कारण घाव होना। ऐसा घाव होना जो जल्दी ठीक नहीं हो रहा हो। शरीर के खून में दोष उत्पन्न होने के कारण घाव उत्पन्न होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लीडम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
रात के समय में और बिस्तर पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन-ह्रास) :-
ठण्ड लगने से, पैरों को ठण्डे जल में रखने से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
हामे, बेलिस तथा आर्निका औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लीडम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लीडम औषधि की तीसरी से तीसवीं शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लिडम पैलस्टर (Ledum paluster)
जोड़ों के दर्द से पीड़ित रोगी और गठिया रोग से पीड़ित रोगी तथा पुराने शराबियों के लिए भी यह औषधि लाभदायक है।
कील, सूआ आदि चुभने से घाव होने पर लिडम पैलस्टर औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है। कीडे़, मकोड़ें, बरैया के डंक, चूहे के काटने से उत्पन्न घाव, विशेष करके मच्छर से काटे हुए घाव को ठीक करने में इस औषधि का लाभकारी प्रभाव है।
टखना और पांव में किसी प्रकार से मोच आ जाने पर लिड़म पैलस्टर औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप मोच ठीक हो जाता है। ब्रैन्डिड शराब पीने वालों की तरह माथा और गाल में सुर्ख फुन्सियां निकलने पर लिडम पैलस्टर औषधि का उपयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में लिड़म पैलस्टर औषधि का उपयोग-
शारीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- जोड़ों पर सख्त गांठें पड़ना, वात रोग के कारण किसी अंग का पतला पड़ जाना जिसका दर्द तिरछा चलता है जैसे- बांयें कन्धें पर से दाहिने कूल्हें के जोड़ में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को दर्द में जलन और टीस महसूस होती है, हाथ-पैर चलाने से और रात के समय में, बिस्तर की गर्मी और ओढ़ने से लक्षणों में वृद्धि होती है। जब रोगी पैर को बर्फ के पानी में रखता है तो कुछ आराम मिलता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिड़म पैलस्टर औषधि उपयोग लाभदायक है।
घुटनों से सम्बन्धित लक्षण :- घुटनों तक पांव की सूजन हो जाती है, टखने में सूजन आ जाती है, चलने से ऐसा दर्द महसूस होता है कि मानो मोच आ गई हो, पांव के अंगूठें और एड़ी में अत्यंत दर्द के साथ सूजन आ जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिड़म पैलस्टर औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
हाथ और पैर के अंगुलियों से सम्बन्धित लक्षण :- हाथ और पैर के उंगुलियों के जोड़ों में दर्द होने पर लिड़म पैलस्टर औषधि का प्रयोग करना चाहिए। लेकिन यदि औरतों के उंगुलियों के जोड़ों में दर्द हो रहा हो तो कालोफाइलम औषधि का उपयोग अधिक लाभदायक है। औरतों के उंगुलियों के जोड़ों में दर्द हो रहा हो तथा दर्द का असर शाम के समय में तेज हो रहा हो तो कालचिकम औषधि का उपयोग अधिक लाभदायक होता है।
चोट से सम्बन्धित लक्षण :- चोट लगकर वात रोग हो गया हो तो रोग को ठीक करने के लिए लिडम पैलस्टर औषधि का उपयोग करना चाहिए। शारीर में कहीं भी चोट लगकर त्वचा नीली पड़ जाए तो इस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
शरीर के नसों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के नसों में किसी प्रकार से चोट लग जाने के कारण उत्पन्न रोग तथा हड्डी के ऊपर की झिल्ली में चोट को ठीक करने के लिए लिड़म पैलस्टर औषधि का उपयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों के पुतली में किसी प्रकार से चोट लगने से उत्पन्न लक्षणों को ठीक करने के लिए लिड़म पैलस्टर औषधि का उपयोग कर सकते हैं। ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए सिम्फाइटम औषधि का प्रयोग कर सकते हैं।
हड्डी से सम्बन्धित लक्षण :- हड्डी टूट जाने तथा किसी प्रकार से हड्डी पर चोट लगने के कारण उत्पन्न रोग को ठीक करने के लिए लिडम पैलस्टर औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
चोट लगने पर अर्नि, क्रोटेलस, हैमे, बेलिस और रूटा औषधियों का प्रयोग करते हैं लेकिन ऐसे ही लक्षणों पर लिडम पैलस्टर औषधि का उपयोग कर सकते हैं। अत: इन औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लिडम पैलस्टर औषधि से कर सकते हैं।
चोट लगने के बाद दर्द का असर अधिक दिनों तक हो तो इस लक्षण को ठीक करने के लिए कोनायम औषधि का उपयोग करते हैं और ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए लिडम पैलस्टर औषधि का उपयोग करते हैं। अत: कोनायम के कुछ गुणों की तुलना लिडम पैलस्टर औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
गर्मी से, बिस्तर की गर्मी से तथा शाराब पीने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शामन (एमेलिओरेशन) :-
ठण्डे पानी में पांव रखने से तथा सिर खुला रखने से लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लिडम पैलस्टर औषधि की तीसरी से तीसवीं शाक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लेम्ना माइनर (Lemna Minor)
लेम्ना माइनर औषधि नाक की हड्डी, नाक और नाक की श्लैष्मिका झिल्लियों पर विशेष क्रिया करती है जिसके फलस्वरूप नाक से संबन्धित कई प्रकार के रोग ठीक हो जाते हैं।
लेम्ना माइनर औषधि का प्रयोग कई प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए करते हैं, ये लक्षण इस प्रकार हैं- नाक की हड्डी में सूजन आना, नाक से अधिक मात्रा में पीब जैसा पदार्थ निकलना, नाक से बदबू आना, नाक के भीतर की श्लैष्मिक-झिल्ली में सूजन आना, सांस नली का अपने आप बन्द होना, नाक के नथुनों से कान तक डोरी बंधी जैसी महसूस होना आदि।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
टियूकि, कैलैड, नैट्रम तथा कल्के औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लेम्ना माइनर औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लेम्ना माइनर औषधि की तीसरी से तीसवीं शक्ति का प्रयोग कई प्रकार के रोग के लक्षणों को ठीक करने में लाभकारी होता है।
लेपिडियम बोनारिएन्स Lepidium Bonariense
लेपिडियम बोनारिएन्स औषधि का प्रयोग स्तन तथा हृदय सम्बन्धी रोगों को ठीक करने के लिए उस समय किया जाता है, जब इन रोगों में रोगी को चीरे जैसा दर्द हो रहा हो।
हृदय रोग होने के साथ ही रोगी के बाईं बांह में सुन्नपन और दर्द होता है तथा पेट में धंसने जैसा दर्द महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लेपिडियम बोनारिएन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
यदि किसी रोगी के सिर, मुंह, छाती, कूल्हे से घुटने तक चीरे जाने जैसा दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लेपिडियम बोनारिएन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
यदि किसी रोगी के कनपटी से ठोड़ी तक दर्द हो रहा हो और दर्द ऐसा महसूस हो रहा हो कि जैसे रोग ग्रस्त भाग को किसी उस्तरे से काट दिया गया हो। गले में जलन होती है तथा कानों में कई प्रकार की आवाजें सुनाई देती है, छाती के चारों ओर पटि्टयां बंधने जैसी अनुभूति हो रही हो और ऐसा महसूस हो रहा हो जैसे स्तन में छूरी घोंपी जा रही हो। गला, पीठ और शरीर के बाहरी अंगों में दर्द हो रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लेपिडियम बोनारिएन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
आर्निका तथा लैकेसिस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मैंगानम लेपिडियम बोनारिएन्स औषधि से कर सकते हैं।
लैपटेण्ड्रा Leptandra
लैपटेण्ड्रा औषधि यकृत के दोषों को दूर करने वाला होता है, यदि किसी रोगी को काला अलकतरा जैसा मल हो रहा हो तथा साथ में पीलिया रोग हो गया हो तो उसके इस रोग को ठीक करने के लिए लैपटेण्ड्रा औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
पित्त की अवस्था तथा यकृत के सिरे से खून निकलने लगता है तो ऐसी स्थिति में रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैपटेण्ड्रा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
मलेरिया रोग को ठीक करने के लिए लैपटेण्ड्रा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में लैपटेण्ड्रा औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द होना, चक्कर आना, नींद न आना, अधिक निराशा होना, आंखों में दर्द होना तथा चीस मचना इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैपटेण्ड्रा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- जीभ पर पीला लेप जमना, आमाशय तथा आन्तों में अत्यधिक दर्द होता है तथा मल त्यागने की इच्छा नहीं होती है। यकृत भाग में हल्का-हल्का दर्द होता है तथा दर्द का असर मेरुदण्ड तक फैल जाता है और ठण्ड महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लैपटेण्ड्रा औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- काला, बदबूदार मल होता है तथा साथ ही नाभि में दर्द होता है। खूनी बवासीर हो जाता है, आंत्रिक ज्वर होने के साथ ही काला पाखाना होता है और अलकतरा जैसा मल दिखाई देता है। पीलिया रोग होने पर मिट्टी के रंग का मल होता है, मलद्वार से खून निकलता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लैपटेण्ड्रा औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
यकृत से सम्बन्धित लक्षण :- यकृत तथा आंतों से स्राव होने पर लैपटेण्ड्रा औष का प्रयोग करने से स्राव होना बंद हो जाता है तथा यकृत की क्रिया में सुधार हो जाता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के पेट में गड़गड़ाहट होती है तथा यकृत प्रेदश में दर्द होता है दस्त हो जाता है तथा मल काला होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लैपटेण्ड्रा औषधि का सेवन करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
पोडो, आइरिस, ब्रायो, मर्क्यू, प्टंलिया, माइरिका औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लैपटेण्ड्रा औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लैपटेण्ड्रा औषधि की मूलार्क से तीसरी शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
ल्यूकस आस्पेरा (Leucas Aspera)
ल्यूकस आस्पेरा औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए उपयोग किया जाता है, ये रोग इस प्रकार हैं- दमा के साथ खांसी होना, पेचिश, कामला (पीलिया), सविराम ज्वर, यकृत एवं प्लीहा का बढ़ना, शरीर में जहर फैलना, पशुओं द्वारा काट दिये जाने के कारण उत्पन्न रोग तथा चर्म रोग।
यदि किसी व्यक्ति को सांप ने काट लिया है तो उसके सांप के डंक वाले भाग पर इस औषधि का मूलार्क लगाना चाहिए और इसे दवा के रूप में पिलाया भी जाना चाहिए। रोगी को इस औषधि की मात्रा 10-10, 15-15, 20-20 मिनट बाद तब तक देते रहना चाहिए जब तक रोगी की हालत में कुछ सुधार नहीं हो जाता।
बिच्छू द्वारा डंक मार दिए जाने पर भी इस औषधि के मूलार्क का उपयोग करना चाहिए तथा इसकी मात्रा 10-10, 15-15, 20-20 मिनट बाद तब तक देते रहना चाहिए जब तक रोगी की हालत में कुछ सुधार नहीं हो जाए। इसका सफलतापूर्वक उपयोग करने से तुरन्त ही जलन व दर्द गायब हो जाता है।
मात्रा (डोज) :-
ल्यूकस आस्पेरा औषधि की 2x, 3x शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लियाट्रिस स्पाइकैटा सेर्राटुला (Liatris spicata serratula)
लियाट्रिस स्पाइकैटा सेर्राटुला औषधि शरीर की रक्तवाहिनियों को उत्तेजित करती है। यह त्वचा और श्लैष्मिक झिल्लियों की क्रियात्मक शक्ति को बढ़ा देती है।
यकृत और प्लीहा सम्बन्धित रोगों से उत्पन्न सूजन तथा गुर्दे के रोग के कारण उत्पन्न सूजन को ठीक करने के लिए लियाट्रिस स्पाइकैटा सेर्राटुला औषधि का उपयोग करना चाहिए।
लियाट्रिस स्पाइकैटा सेर्राटुला औषधि मूत्र से सम्बन्धित कई प्रकार की समस्याओं को ठीक कर देता है जिसके फलसवरूप रोगी को बहुत अधिक लाभ मिलता है। यह तेज मूत्रनिस्सारक औषधि है।
हृदय और गुर्दे के रोग के कारण उत्पन्न सूजन को ठीक करने के लिए लियाट्रिस स्पाइकैटा सेर्राटुला औषधि अधिक लाभदायक है। यह हृदय तथा गुर्दे के रोगों को ठीक करके सूजन को जड़ से ठीक कर देता है।
अतिसार के साथ अधिक मात्रा में मल तेजी के साथ बाहर आ रहा हो और पीठ के निचले भाग में दर्द हो रहा हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लियाट्रिस स्पाइकैटा सेर्राटुला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट में दर्द होना, कई प्रकार के त्वचा पर घाव होना। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए लियाट्रिस स्पाइकैटा सेर्राटुला औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मात्रा (डोज) :-
लियाट्रिस स्पाइकैटा सेर्राटुला औषधि की मूलार्क या क्वाथ-350 मिली से 1400 मिली तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लिलियम टिग्रीनम (Lilium Tigrinum)
लिलियम टिग्रीनम औषधि की शक्तिशाली क्रिया गोणिकांगों पर होती है और गर्भाशय की झिल्ली एवं डिम्बग्रन्थियों के रोग ग्रस्त होने पर इसका प्रयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
अविवाहित महिलाओं के लिए इसका अधिकाधिक उपयोग किया जाता है, छोटे-छोटे घावों को ठीक करने के लिए तथा जोड़ों के दर्द और सूजन को ठीक करने के लिए इसका प्रयोग किया जाता है। इस औषधि का विकास शरीर के बायीं तरफ अधिक होता है। यह अधिक स्त्रियों को दी जाने वाली औषधि है।
विभिन्न लक्षणों में लिलियम टिग्रीनम औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- निराशा अधिक होती है तथा मोक्षप्राप्ति की चिन्ता होती रहती है, लगातार रोते रहने का मन करता रहता है, भय लगता रहता है, ऐसा महसूस होता है कि कहीं कोई असाध्य रोगों से सम्बन्धित रोग न हो जाए, मार-पीट करने का मन करता है, अश्लील बातें सोचने की प्रवृति होती है, श्राप देने का मन करता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को हर वक्त जल्दबाजी होती है, हर वक्त व्यस्त रहना पड़ता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को सिर भारी-भारी लगता है तथा सिर में गर्मी महसूस होती है, गर्म कमरे में बेहोशी-पन महसूस होता है, भय महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखों के सफेद भाग में दर्द होता है तथा दर्द पीछे की ओर फैलता हुआ सिर तक पहुंच जाता है तथा आंखों से आंसू बहने लगता है, दृष्टि धुंधली पड़ जाती है, निकट दृष्टि दोष उत्पन्न हो जाता है, आंखों की पेशियां कमजोर हो जाती हैं। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके लक्षण को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- आमाशय में वायु भरने के कारण आमाशय फूल जाता है, बेचैनी होती है तथा ऐसा महसूस होता है कि पेट में गोला रखा हुआ है, भूख लगती है तथा मांस खाने की इच्छा होती है, प्यास बराबर लगती है जिसके कारण रोगी अधिक पानी पीता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में वायु बनने के कारण पेट फूलने लगता है तथा पेट में दर्द होता है, पेट में कंपन होती है, मलान्त्र वा मलद्वार के ऊपर नीचे की ओर तथा पीछे की ओर दबाव महसूस होता है, खड़े होने पर दबाव अधिक मसहूस होता है, खुली हवा में टहलने पर दबाव कम महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब करने की गति तेज हो जाती है तथा मूत्राशय में दबाव महसूस होता है, पेशाब दूध जैसा सफेद होता है तथा कम मात्रा में और गर्म होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- मलांत्र में दबाव होने के कारण मलत्याग करने की बार-बार इच्छा होती है, खड़े होने पर अधिक मलत्याग करने की इच्छा होती है, नीचे की ओर मलद्वार पर भी दबाव होता है, सुबह के समय में मलत्याग करने की अधिक इच्छा होती है, मल में पेचिश, कफ तथा खून आता है और पेट में ऐंठन होती है। इस प्रकार के लक्षण यदि स्त्रियों में है तो उन्हें मासिकधर्म के समय में अधिक परेशानी होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- ऐसा महसूस होता है कि हृदय किसी शिकंजे में जकड़ गया है, हृदय में कुछ भरा हुआ महसूस होता है और ऐसा लगता है कि वह फट जायेगा, सारे शरीर में जलन महसूस होती है तथा नाड़ी की गति अनियमित होती है तथा अधिक तेज नाड़ी धड़कती है। हृदय में दर्द होता है तथा साथ ही छाती पर बोझ रखा हुआ महसूस होता है। हृदय के आस-पास ठण्ड महसूस होती है, भीड़ तथा गर्म कमरे में दम घुटने लगता है। हृदय में दर्द होने के साथ-साथ दायें बाजू में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म नियमित समय से पहले, स्राव कम मात्रा में, काला, थककेदार, बदबूदार होता है, चलते-फिरते रहने से स्राव अधिक होता है। ऐसा दर्द होता है जैसे बच्चे को जन्म देने के समय में होता है तथा इसके साथ ही मलत्याग करने की बार-बार इच्छा होती है और ऐसा महसूस होता है जैसे शरीर के नीचे के अंग गिर पड़ेंगे, आराम करते समय स्राव बन्द हो जाता है। गर्भाशय के ऊपरी झिल्ली पर रक्त जमा होने लगता है तथा गर्भाशय अपने स्थान से हटने लगता है और अग्रनति (अन्टीवर्सन) होता है। योनि पर बाहर से सहारा देने की बार-बार इच्छा होती है, डिम्बग्रन्थियों तथा नीचे की ओर जांघों पर दर्द होता है। प्रदर रोग होने के साथ ही स्राव कत्थई रंग का और जलन युक्त होता है, योनि में चिपचिपापन होता है और संभोग की अधिक इच्छा होती है। गर्भाशय तथा उसके आस-पास का भाग फूल जाता है, दबाव महसूस होता है और मलद्वार में भी दबाव महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :- पीठ और मेरुदण्ड पर दर्द होता है तथा साथ ही कंपन और नीचे की ओर दबाव महसूस होने के साथ ही दर्द होता है, उंगलियों में चुभन होती है, दायें बाजू और कूल्हे में दर्द होता है, टांगों में दर्द होता है तथा उन्हें स्थिर रखने में परेशानी होती है, टखनों के जोड़ में दर्द होता है और हथेलियों व तलुवों में जलन होती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर में आलस्य बनी रहती है तथा भूख नहीं लगती है, सोते समय सपने आते हैं, सोने में परेशानी होती है तथा भय लगता रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि का प्रयोग करे।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- बुखार होने के साथ ही शरीर का ताप दोपहर के बाद अत्यधिक गर्म हो जाती है तथा शरीर में आलस्य बना रहता है, सारे शरीर में कंपन होता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिलियम टिग्रीनम औषधि उपयोग लाभदायक है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
गर्म कमरे में, सान्त्वना देने से लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
ताजी हवा से लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
हेलोनि, म्यूरेक्स, सीपि, प्लैटीना कैक्टस तथा पैलैडि औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लिलियम टिग्रीनम औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष :-
हेलोनि औषधि का उपयोग लिलियम टिग्रीनम औषधि के हानिकारक प्रभाव को नष्ट करने के लिए किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
लिलियम टिग्रीनम औषधि की मध्यम और उच्चतर शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए, कभी-कभी इसकी रोगसाधक क्रिया का विकास देर से होता है।
लाइकोपोडियम (Lycopodium)
जब तक इसके बीजों को अच्छी तरह पीस नहीं लिया जाए, तब तक यह औषधि निष्क्रिय रहती है। इसके अद्भुत उपचारक गुणों का ज्ञान केवल विचूर्ण तथा शक्तिकृत तनूकरणों से ही हो पाता है।
मूत्र तथा पाचन सम्बन्धी विकार रोग, शरीर में दर्द होना, ताजी हवा से आराम मिलना, अधिक बाल झड़ते रहना, छाजन रोग होना, कानों के पीछे से तरल पदार्थ का स्राव होना, माथे पर गहरी रेखाएं पड़ना तथा बाल सफेद होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में लाइकोपोडियम औषधि का उपयोग-
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंख के भीतरी कोण के पास की पलकों पर कीचड़ लगा रहता है अर्थात अंजनियां रोग होना, रतौंधी रोग होना, किसी भी वस्तु का आधा भाग दिखाई देना, पलकों पर घाव होना तथा लाली पड़ना, नींद के समय में आधी आंख खुली रहना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- कान के अन्दर से गाढ़ा पीब जैसा बदबूदार पदार्थ बहना, कान के आस-पास और पीछे की ओर छाजन रोग होना, कान से पीब जैसा पदार्थ बहने के साथ ही कम सुनाई देना, आरक्त ज्वर होने के बाद कम सुनाई देना, तथा अजीबों-गरीब आवाजें सुनाई देना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- नाक के पिछले भाग में रूखापन महसूस होना, नाक के अगले भाग से कुछ मात्रा में तथा त्वचा को छील देने वाला तरल पदार्थ का स्राव होता है, नाक के नथुने पर घाव हो जाता है, नाक के निचले भाग में पपड़ियां जम जाती हैं, नजला हो जाता है, कभी-कभी नाक बंद हो जाती है, बच्चों की नाक से कफ जैसा स्राव होने लगता है, बच्चा नींद के समय में अपने नाक को रगड़ता रहता है, नाक में फड़फड़ाहट होती रहती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरे का रंग भूरा तथा पीला हो जाता है और इसके साथ ही आंखों के चारों ओर नीले घेरे पड़ जाते हैं, चेहरा सूखा तथा सिकुडा़ हुआ महसूस होता है, तांबे के रंग जैसी छोटी-छोटी फुंसियां चेहरे पर हो जाना, आंत्रिक ज्वर (टाइफायड) होने के साथ ही निचला जबड़ा लटक जाना, खुजली होना और चेहरे व मुंह के कोणों पर पपड़ीदार घाव होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- दांतों को छूने पर तेज दर्द होना, इसके साथ ही जबड़ों पर गोली जैसी सूजन होना तथा सिकाई करने से आराम मिलाना। मुंह और जीभ पर रूखापन महसूस होने के साथ ही प्यास न लगना। जीभ सूखी, काली कटी-फटी, सूजी हुई महसूस होती है तथा इधर-उधर हिलती रहती है, मुंह में पानी भरा रहता है, जीभ पर छाले पड़ जाते है और मुंह से बदबू आती रहती है। इस प्रकार मुंह से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
गले से सम्बन्धित लक्षण :- गले में रूखापन महसूस होता है तथा प्यास बिल्कुल भी नहीं लगती है, भोजन और पेय पदार्थ नाक के रास्ते बाहर निकल पड़ते हैं, गले में जलन होने के साथ निगलने पर सुई की चुभने जैसा दर्द होता है, गर्म पेय पदार्थ पीने से आराम मिलता है। गलतुण्डिकाओं में सूजन आ जाती है और गलतुण्डिकाओं पर घाव हो जाता है, इसके दायीं तरफ दर्द होता है। डिफ्थीरिया रोग होने के साथ ही गले की झिल्ली दाईं ओर से बाईं ओर फैलने लगती है, ठण्डे पेय पदार्थो का सेवन करने से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। स्वरयंत्र में घाव उत्पन्न हो जाता है जिसके कारण स्वरयंत्र में सूजन आ जाती है। इस प्रकार गले से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- खमीर तथा श्वेतसारिक बनाने वाले खाद्यानों जैसे पत्तागोभी, सोयाबीन आदि से उत्पन्न अजीर्ण रोग, अधिक भूख लगना, रोटी खाने का मन न करना, मीठी चीजें खाने की इच्छा करना, भोजन खट्टा लगना और खट्टी डकारें आना। पाचन क्रिया अधिक कमजोर होना, राक्षसों जैसी भूख होना तथा इसके साथ ही पेट फूलना। खाना खाने के बाद आमाशय में दबाव महसूस होना, साथ ही मुंह में कड़वाहट महसूस होना। पेट में हवा इधर-उधर घूमना और पेट में दर्द होना। भूख लगने के कारण रात के समय में नींद न आना, हिचकी आना, जलनयुक्त डकारें आना, जो भोजन नली तक होती रहती है और कई घण्टों तक होती रहती है। गर्म भोजन तथा गर्म पदार्थ पसन्द करना। आमाशय अन्दर की ओर धंसने जैसा महसूस होना। इस प्रकार के आमाशय से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- थोड़ा सा भोजन करने के बाद ही पेट फूल जाना, पेट के अन्दर लगातार खमीर बनने का एहसास होना, खमीर ऊपर से नीचे की ओर जाते हुए महसूस होना। हर्निया रोग होना, यकृत को छूने से दर्द महसूस होना। पेट पर कत्थई रंग के धब्बे पड़ना। यकृत में जलन भरना, जलन होना, यकृत के अन्दर रूखापन महसूस होना। निम्नोदर में दाई ओर से बाईं ओर गोली लगने जैसा दर्द महसूस होना। इस प्रकार पेट से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मल से सम्बन्धित लक्षण :- अतिसार होना। कभी-कभी मल कठोर होना तथा जिसके कारण मलद्वार पर दर्द होना, मलद्वार को छूने पर दर्द महसूस होना और मलद्वार के मस्से को छूने पर दर्द होना। इस प्रकार मल से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब करने से पहले पीठ में दर्द होना तथा पेशाब कर लेने के बाद दर्द बंद हो जाना, पेशाब करते समय पेशाब देर से बाहर निकलता है और पेशाब करने के लिए जोर लगना पड़ता है, पेशाब करने में रुकावट होती है। रात के समय में अधिक पेशाब आना और पेशाब भारी और तैलीय होना। पेशाब करने से पहले बच्चे का रोना। इस प्रकार मूत्र से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- नपुंसकता रोग होना तथा इसके साथ ही लिंग की उत्तेजना शक्ति कम होना। संभोग क्रिया करते समय, समय से पहले ही वीर्यपात हो जाना। पुर:स्थ-ग्रन्थि की वृद्धि होने लगती है। कॉण्डीलोमा (कोन्डीलोमा) होना। इस प्रकार पुरुष रोग के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म नियमित समय के बहुत दिनों के बाद और अधिक मात्रा में होना, योनि शुष्क दर्दनाक हो जाती है। दायें डिम्बाशय में दर्द होना। दायें डिम्ब में दर्द होना। गुह्म (पुंडेन्डा की शिरायें फूली हुई रहती हैं। प्रदर रोगी होने के साथ ही स्राव जलन युक्त होना और योनि में जलन होना, मलत्याग करने के समय में योनि से खून का स्राव होना। इस प्रकार स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी स्त्री को हो गया है तो उसके रोग के लक्षणों ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करे।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- गुदगुदाहटयुक्त खांसी होना, सांस लेने में कष्ट होना, छाती में तनाव तथा सिकुड़न महसूस होना, जलन के साथ दर्द होना। पहाड़ से नीचे उतरते समय खांसी बढ़ जाती है, खांसी गहरी और खोखली हो जाती है, बलगम भूरा, गाढ़ा, रक्तयुक्त, पीबदार और नमकीन होता है। रात के समय में खांसी होना तथा मुंह से धुंए जैसी बदबू आती है। छोटे बच्चों की छाती में ठण्ड लगना, छाती में कफ जमना तथा घड़घड़ाहट महसूस होना। निमोनिया रोग होने के साथ ही अत्यधिक श्वास लेने में कष्ट होना, नाक के पक्षकों में फड़फड़ाहट होना और छाती में घड़घड़ाती हुई आवाजें आना। इस प्रकार श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय की धमनी में फोड़ा होना तथा महाधमनी से सम्बन्धित रोग, रात के समय में हृदय की बढ़ी हुई धड़कन होना, बाईं करवट नहीं लेट सकना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- दोनों कंधों के मध्य भाग में जलन होना तथा ऐसा महसूस होना जैसे पीठ गर्म कोयले से जल गया हो, कमर के निचले भाग में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि उपयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- शरीर के कई अंगों में सुन्नपन, खिंचाव और फड़फड़ाहट होने के साथ ही दर्द होना, आराम करते समय तथा रात के समय में इस प्रकार के लक्षणों में वृद्धि होती है। बांहों में भारीपन महसूस होना। कंधों और कोहनी की हडि्डयों के जोड़ों में तेज दर्द होना और दर्द ऐसा महसूस होता है कि ये भाग किसी चीज से फाड़ें जा रहे हों, एक तलुवा गर्म और एक ठण्डा महसूस होना। जीर्ण रोग होने के साथ ही गठिया के साथ हडि्डयों के जोड़ों में खड़िया मिट्टी जैसा जमाव होना। तलुवों से अत्यधिक पसीना निकलना और चलने पर एड़ियों में कंकड़ गड़ने जैसा दर्द होना, पैरों और हाथों की उंगलियों में सिकुड़न होना। रात के समय में बिस्तर पर लेटे-लेटे पिण्डलियों और पैर की उंगलियों में ऐंठन होना, हाथ-पैरों में ऐसा महसूस होना जैसे कि सो गए हों, हाथ पैरों में झटके लगना। इस प्रकार शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
ज्वर से सम्बन्धित लक्षण :- दोपहर में तीन बजे से चार बजे के बीच बुखार रहना तथा उसके बाद पसीना आना, त्वचा का बर्फ के समान ठण्डा हो जाना और ऐसा महसूस होना जैसे बर्फ के ऊपर लेटा हुआ हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित का प्रयोग लाभदायक है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- नींद में अचानक चौंक जाना, रात के समय में नींद न आना, किसी दुर्घटनाओं के सपने देखना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बिन्घत लक्षण :- त्वचा के नीचे फोड़ा होना और सिकाई करने से आराम मिलना, ठण्ड के समय में शरीर के ताप में वृद्धि होना, तेज खुजली होना, त्वचा पर दरारें पड़ने के साथ ही घाव होना। मुहासें होना। जीर्ण छाजन (क्रोनिक एग्जिमा) होना जिसका सम्बन्ध पेशाब से सम्बन्धित रोगों से होना और पाचनतंत्रों में दोष उत्पन्न होना तथा यकृत रोगों से जुड़ा रहता है और इसके बाद खून बहने लगता है। त्वचा मोटी तथा कठोर होना। त्वचा पर तिल तथा फोड़ें-फुंसियां होना, कत्थई रंग के धब्बे होना, चकत्तेदार घाव होना, बायें चेहरे और नाक पर अधिक चकत्तेदार घाव होना। त्वचा सूखी तथा सिकुड़ी होना तथा विशेषकर हथेलियों का बाल समय से पहले ही सफेद सफेद पड़ जाना। त्वचा से लसीला तथा बदबूदार पसीना आना, तलुवों और कांख से अधिक आना। खुजली होना। इस प्रकार चर्म रोग लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
दाईं ओर, दाईं ओर से बाईं ओर, ऊपर से नीचे की ओर, दोपहर के चार बजे से आठ बजे तक, ताप से या गर्म कमरे में रहने से, गर्म हवा से, बिस्तर की गर्मी से, रोग होने पर सिकाई करने से लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
चलने-फिरने का कार्य करने से, आधी रात के बाद, गर्म भोजन और पेय पदार्थो से, शरीर ठण्डा होने पर और निर्वस्त्र रहने पर रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
पूरक:- कल्केरिया और सल्फर औषधि के उपरान्त लाइकोपोडियम औषधि विशेष लाभदायक होती है।
प्रतिविष :- कैम्फर, कास्टि तथा पल्सा औषधि का उपयोग लाइकोपोडियम औषधि के दोषों को दूर करने के लिए किया जाता है।
शारीरिक गठन में कार्बो.नाइट्रोजेनाईड के तरह ही लाइकोपोडियम औषधि का उपयोग कर सकते हैं।
सल्फर, रस-टा, मर्क्यू, हीपर, एलूमिना औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लाइकोपोडियम औषधि से कर सकते हैं।
ऐसा रोगी जिसे सूरज की रोशनी में मुश्किल से कोई भी चीज दिखाई देती हो, दायें पैर के अंगूठे में दर्द को ठीक करने के लिए क्रूड, नेट्रम-म्यूरि, ब्रायों, नक्स, बोथ्रौप्स औषधियों का प्रयोग किया जाता है, लेकिन ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का प्रयोग कर सकते है। अत: इन औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लाइकोपोडियम औषधि से कर सकते हैं।
कब्ज होने के साथ ही पेशाब लाल रंग का होना, गुर्दों, हडि्डयों और सारे शरीर में दर्द होना तथा मुंह पर घाव होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए प्लम्बागों लिट्टोरैलिस औषधि का प्रयोग करते हैं लेकिन ऐसे ही लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपोडियम औषधि का भी प्रयोग कर सकते हैं। अत: प्लम्बागों लिट्टोरैलिस औषधि के कुछ गुणों की तुलना लाइकोपोडियम औषधि से कर सकते हैं।
अजीर्ण रोग को ठीक करने में लाइकोपोडियम औषधि के बाद हाइड्रैस्टिस अच्छी क्रिया करती है।
मात्रा (डोज) :-
लाइकोपोडियम औषधि की निम्नतर और उच्चतम दोनों प्रकार की ही शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। नि:स्राव बढ़ाने के लिए मूलार्क से तैयार की गई दूसरी और तीसरी शक्तियों की दो-दो, चार-चार बूंदें, दिन में तीन बार देने से लाभ होता है, अन्यथा छठी या 200 वीं और उच्चतर शक्तियों का उपयोग करना चाहिए लेकिन उन्हें बार-बार नहीं दोहराया जाना चाहिए।
लाइकोपस वर्जीनिकस (Lycopus virginicus)
लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि रक्तचाप को कम करती है, हृदय की धड़कन को कम करती है और हृदय की धड़कन के समय को भी बढ़ाती है तथा मुंह से खून निकलने को रोकती है। इस औषधि की सबसे प्रमुख क्रिया हृदय पर होती है जो डिजेटेलिस औषधि के समान ही है।
लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि हृदय के सभी प्रकार के रोगों को ठीक करती है तथा खूनी बवासीर (वह रोग जिसमें मलद्वार से खून निकलता हो) के रोग को ठीक करने के इसका उपयोग किया जाता है।
हृदय की क्रिया अचानक से बढ़ गई हो और अधिक दर्द हो रहा हो तो इस प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
यदि शरीर का खून दूषित हो चुका है तो उसे साफ करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि की मूलार्क की 4 बूंदों का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- माथे में दर्द होना, ललाट (माथे का ऊपरी भाग) में तेज दर्द होना, अधिक परिश्रम का कार्य करने से हृदय की पेशियों में भी दर्द होना तथा नाक से खून बहना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- छाती पर दर्द होने के साथ ही दबाव महसूस हो रहा हो और श्वास लेने और बाहर छोड़ने पर अधिक दबाव महसूस हो तो ऐसे लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- आंखें बाहर की ओर फैली हुई दिखाई पड़ती हैं तथा इसके साथ ही आंखों पर दबाव महसूस होता है और हृदय पिण्ड पर तेज दर्द होता है। अक्षिगहृर के ऊपर दर्द होने के साथ ही अण्डकोष में भी दर्द होने लगता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह के निचले भाग जहां पर भोजन को चबाने वाले दांत होते हैं उस दांत में दर्द होने पर लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि से उपचार करने पर दर्द होना बन्द हो जाता है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- धूम्रपान करने वाले व्यक्तियों के हृदय में तेज दर्द होने पर उसके इस रोग का उपचार करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का उपयोग करना चाहिए। हृदय में पुराना दर्द का रोग, नाड़ी की गति कमजोर होना, हृदय में सिकुड़न महसूस होना, हृदय धड़कन अनियमित होना, हृदय में कंपन के साथ दर्द होना, नील रोग। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। हृदय की नाड़ियों की गति अनियमित होने के कारण हृदय के चारों ओर घुटन महसूस होने पर लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करने से आराम मिलता है। जोड़ों में दर्द होने के साथ ही ऐसा महसूस होना कि दर्द ऊपर से नीचे की ओर जा रहा है और इस दर्द का सम्बन्ध किसी हृदय रोग से हो तो इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। हृदय की गति अनियमित होने के साथ ही दमा रोग होने पर लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करने से रोगी का रोग पुरी तरह से ठीक हो जाता है।
श्वास से सम्बन्धित लक्षण :- सांस लेते समय सांय-सांय की आवाज होना, खांसी के साथ ही नाक से खून बहना लेकिन थोड़ा और बार-बार बहना और पसलियों में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब रंगहीन होता है, विशेषत: हृदय अत्यंत उत्तेजित होता है तब और कम मात्रा में होता है, खाली रहने पर मूत्राशय फूल जाता है। पेशाब अधिक मात्रा में होना। वृषणों में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- पीठ के जोड़ों पर दर्द होना जिसका असर पीठ से लेकर कमर तक हो तथा वे व्यक्ति जिनके जोड़ों में दर्द का असर बायीं ओर से दायीं हो और फिर बायीं ओर हो जाता हो तो ऐसे लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मलद्वार से सम्बन्धित लक्षण :- मलद्वार से खून बहने पर लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करने से खून बहना बन्द हो जाता है।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- रात के समय में अधिक जगना अर्थात नींद न आना और इसके साथ ही शरीर में खून का संचारण ठीक प्रकार से न होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- आमाशय में एक प्रकार ऐसा दर्द होना जैसे कि कोई गोल चीज आमाशय के अन्दर रखी हो और उसके कारण दर्द हो रहा हो। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में गड़गड़ाहट होने के साथ ही मरोड़ होना और अतिसार होना। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि उपयोग लाभदायक है।
पीलिया से सम्बन्धित लक्षण :- पीलिया रोग होने के साथ ही अतिसार होना, हृदय में रोग उत्पन्न हो जाना और मलत्याग करने में परेशानी होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
वृद्धि (रिलेशन) :-
ठण्ड से, अधिक सोचने से, हाथ-पैर अधिक चलने से और एक दिन के अन्तर पर लक्षणों में वृद्धि होती है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
ऐफेड्रा टी, , स्पार्टी, एलो, कैक्ट, डेजी, कैल्मि, कैटेगस, एड्रिनैलिन औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि से कर सकते हैं।
विशेष :-
हृदय के रोगों को ठीक करने में यह औषधि अधिक लाभदायक है। हृदय पर दबाव महसूस होना और ऐसा महसूस होना कि हृदय पर कोई बोझ रखा है, तम्बाकू के सेवन से उत्पन्न लक्षण, फेफड़ों में उत्तेजना के साथ आने वाली खांसी, हृदय रोग के साथ ही अन्य रोग होना। ऐसे लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मात्रा (डोज) :-
लाइकोपस वर्जीनिकस औषधि की पहली से तीसवीं शक्ति तक का प्रयोग कई प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए किया जाता है।
लिमुलस, जिफासूरा Limulus, xiphosuran
लिमुलस औषधि का प्रयोग उन रोगियों के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है जिनमें मानसिक थकान के लक्षण दिखाई देते हैं तथा पाचनतंत्र जिनका खराब रहता है और रोगी के शरीर के दायें भाग में दर्द रहता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को जब समुद्र में स्नान कराया जाता है तो उसे नीन्द आने लगती है।
विभिन्न लक्षणों में लिमुलस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- मानसिक थकान अधिक होती है, किसी भी व्यक्ति या वस्तु के नामों को याद रखना कठिन हो जाता है, चेहरे पर गर्मी महसूस होती है, चेहरे की ओर खून का अधिक बहाव हो जाता है, जब रोगी किसी भी कार्य को ध्यान से करता है तो उसके रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, बायें आंखों के गोलक के पीछे दर्द होता है। ऐसे रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लिमुलस औषधि का उपयोग करना चाहिए।
नाक से सम्बन्धित लक्षण :- सर्दी-जुकाम हो जाता है तथा नाक से पानी जैसा स्राव होता रहता है, छींकें आती है तथा पानी पीने से परेशानी अधिक होती है, नाक से लगातार पानी टपकता रहता है, नाक के ऊपर और आंखों के पीछे दबाव महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लिमुलस औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में दर्द होता है तथा जलन होती है, पानी जैसा मल त्याग होता है तथा पेट में ऐंठन के साथ दर्द होता है, पेट गर्म तथा सिकुड़ा हुआ महसूस होता है, मलद्वार में सिकुड़न महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लिमुलस औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
सांस से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी की आवाज भारी हो जाती है, पानी पीने के बाद सांस लेने में परेशानियां होती है, छाती में घुटन महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लिमुलस औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- नितम्बों के स्नायु में दर्द होता है, तलुवों में दर्द होता है, कभी-कभी तो तलुवों में सुन्नपन महसूस होता है, दायें कूल्हे के जोड़ों में दर्द होता है, एड़ियों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लिमुलस औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरे और हाथों पर खुजलाने के धब्बें और छालें पड़ना और हथेलियों में जलन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लिमुलस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
आस्टेरियस, क्यूप्रम तथा होमारस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लिमुलस औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लिमुलस औषधि की छठी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लाइनैरिया (Linaria)
लाइनैरिया औषधि पाचनतंत्रों पर प्रमुख क्रिया करती है। यदि किसी रोगी को अधिक डकारें आ रही हो तथा जी मिचलाने के साथ ही मुंह से लार बहने लगता है और इसके साथ ही मलद्वार पर दबाव महसूस हो रहा हो तो रोग को ठीक करने के लिए लाइनैरिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
जीभ खुदरी, सुखी हुई महसूस होती है तथा गले में सिकुड़न महसूस होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लाइनैरिया औषधि का प्रयोग करना फायदेमन्द होता है।
मूत्रनली (लिंग) के ऊपर तथा मलद्वार पर घाव होने पर घाव को ठीक करने के लिए लाइनैरिया औषधि का उपयोग करना चाहिए।
यकृत और प्लीहा में वृद्धि होना तथा इसके साथ ही नींद अधिक आना। हृदय से सम्बन्धित रोग होना तथा बेहोशी होना। धनुष्टांकर (इस रोग के कारण रोगी का शरीर धनुष के तरह टेढ़ा हो जाता है) रोग तथा जीभ पर लकवा रोग का प्रभाव होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइनैरिया औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
मात्रा (डोज) :-
लाइनैरिया औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लाइनम युसिटैटिस्सीमम (Linum usitatissimum)
अलसी की पट्टी बांधने से संवेदनशील व्यक्तियों में भयंकर सांस सम्बन्धी रोग उत्पन्न होता है, जैसे- दमा, शीतपित्त (हिवज) आदि। ऐसी दशाओं में लाइनम युसिटैस्सीमम औषधि की क्रिया का प्रभाव तेज हो जाता है। इस औषधि में हाइड्रोस्यानिक एसिड की भी कुछ मात्रा पाई जाती है, जो इस तीव्रता का कारण हो सकती है।
मूत्रनलियों में जलन होना, मूत्राशय में जलन होना, पेशाब कष्ट से होना आदि लक्षणों को दूर करने के लिए लाइनम युसिटैस्सीमम औषधि की क्वाथ का प्रयोग करना लाभदायक होता है। आंत्रपथ के रोगों को ठीक करने के लिए भी इसका प्रयोग लाभकारी है।
दमा रोग, परागज-ज्वर और जुलपित्ती होना, जीभ में लकवा का प्रभाव होना। इस प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए लाइनम युसिटैस्सीमम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
लाइनम कैथार्टिकम औषधि का प्रयोग सांस सम्बन्धित लक्षणों तथा पेट दर्द और अतिसार से सम्बन्धित लक्षणों को दूर करने के लिए किया जाता है लेकिन ऐसे ही लक्षणों को ठीक करने के लिए लाइनम युसिटैस्सीमम औषधि का प्रयोग किया जा सकता है। अत: लाइनम कैथार्टिकम औषधि के कुछ गुणों की तुलना लाइनम युसिटैस्सीमम औषधि से कर सकते हैं।
लिथियम कार्बोनिकम (Lithimu Carbonicum)
चिकित्सा के क्षेत्र में लिथियम कार्बोनिकम औषधि का विशेष प्रभाव श्लेष्मज स्तरों तथा मांसल तंतुओं पर पड़ता है, इसका स्थानीय प्रभाव हृदय, वृक्कों (गुर्दे) और आंखों पर अधिक होता है। इन सभी अंगों से सम्बन्धित रोगों को ठीक करने के लिए इसका उपयोग लाभदायक होता है। गठिया के रोगों को ठीक करने के लिए भी इसका प्रयोग कर सकते हैं।
रोगी की याददास्त कमजोर हो जाती है तथा वह किसी का नाम भी याद नहीं रख पाता है, रात के समय में अधिक बेचैनी होती है तथा निराशा होती है, माथे के आधे भाग में दर्द होता है, भोजन करते समय सिर में दर्द ठीक हो जाता है लेकिन भोजन करने के बाद फिर लौट आता है और तब तक होता रहता है जब तक फिर से भोजन करने नहीं बैठता है। इस प्रकार के लक्षण रोगी में है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
सारे शरीर में लकवे जैसे लक्षण होना तथा शरीर के कई अंगों में कमजोरी आ जाना, घुटने के जोड़ों में अधिक कमजोरी आना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का सेवन करना फायदेमंद होता है।
विभिन्न लक्षणों में लिथियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- अधिक तनाव महसूस होता है, बैठने और बाहर जाने से आराम मिलता है, शरीर के बाहरी अंग ठीक प्रकार से कार्य नहीं करते हैं, खाते समय सिर दर्द बंद हो जाता है, सिर में कंपन होता है, हृदय के आस-पास दर्द होता है, जो सिर तक फैल जाता है, कानों में घण्टी बजने जैसी आवाजें सुनाई पड़ती हैं, चक्कर आने लगते हैं, दोनों गाल पर सूखापन महसूस होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- किसी भी वस्तु का आधा भाग दिखाई नहीं देता है, आंखों की ऊपरी भाग में दर्द होता है, पलकें सूख जाती है, किसी भी अक्षर को पढ़ने के बाद आंखों में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- जी मिचलाने के साथ ही दान्तों में चबाये जाने जैसा दर्द होता है, भोजन करने से आराम मिलता है। इस प्रकार के लक्षण होने के साथ ही अम्लता होता है, आमाशय पर कपड़े का थोड़ा सा भी दबाव सहन नहीं हो पाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग करना उचित होता है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब करते समय मूत्राशय मे ऐंठन होती है तथा पेशाब गंदा, कफ तथा लाल रंग का तेल के समान होता है। दायें गुर्दे में दर्द होता है। पेशाब अधिक मात्रा में तथा रंगहीन होता है। पेशाब करने के समय में हृदय में दबाव महसूस होता है। मूत्राशय में जलन होने के साथ ही जीर्ण रोग हो जाना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
श्वास संस्थान से सम्बन्धित लक्षण :- छाती में सिकुड़न महसूस होती है तथा लेटने पर तेज खांसी होती है। सांस लेने पर हवा ठण्डी महसूस होती है। स्तन की ग्रन्थियों में दर्द होता है जो बांहों व उंगलियों तक फैल जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- मूत्राशय में दर्द महसूस होना, दायें गुर्दे में और मूत्रनली में दर्द होना, पेशाब में कफ जैसा पदार्थ आना, पेशाब कम मात्रा में और गहरे रंग का होना, रेतीला तेल के समान पेशाब होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- सारे शरीर में लकवे जैसी लक्षण दिखाई पड़ती है, हडि्डयों के जोड़ों पर खुजली होती है तथा कंधें, बांह और उंगलियों और लगभग सभी छोटी हडि्डयों के जोड़ों में दर्द होना। पैर के खोखले भाग में दर्द होना तथा दर्द का असर घुटने तक फैल जाना। हाथ-पैरों की उंगुलियों के जोड़ों में सूजन आना और उसे छूने से या गर्म पानी से आराम मिलना। हडि्डयों के गांठों पर सूजन होना और चलते समय टखनों में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
यकृत से सम्बन्धित लक्षण :- यकृत (जिगर) में दबाव महसूस होता है और दर्द होता है, पसलियों से पित्ताशय तक दर्द होता रहता है, कभी-कभी ऐसा महसूस होता है जैसे यकृत में हवा भरी हुई है।
होने के साथ ही अतिसार हो गया हो तथा मल पीले रंग का होना और उससे बदबू आना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- पीठ पर दबाव महसूस होता है तथा दबाव का असर पीठ की बायीं ओर तथा त्रिक प्रदेश तक होता है, बाएं कंधे पर दर्द होता है और किनारों पर अधिक होता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का उपयोग लाभदायक है।
हडि्डयों से सम्बन्धित लक्षण :- अंगूठों के जोड़ों पर दर्द होना, उंगलियों के जोड़ों पर दर्द होना, हडि्डयों के इन भागों में दर्द होने के साथ ही जलन भी होती है, पैरों के जोड़ों में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- हाथों, सिर और गालों पर पपड़ीदार दर्दयुक्त दाने होना तथा इन भागों में दर्द होना, खुजली होने पर दर्द बंद हो जाता है। सारे शरीर पर खुरदरा दाना निकल आता है तथा इसके साथ ही उपकला (एपीथिलीयम) बहुत ढीली, ठोस, सूखी, खुजलीदार हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मासिकधर्म से सम्बन्धित लक्षण :- मासिकधर्म के समय में स्राव होने से पहले शरीर के बायें तरफ के लक्षणों में बढ़ोत्तरी होती है और मासिकधर्म के बाद दाहिनी तरफ के लक्षणों में तेजी आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
हृदय से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय में दर्द होने के साथ ही उसके आस-पास की हडि्डयों के जोड़ों में दर्द होना, हृदयपिण्ड में अचानक धक्का लगना, हृदय में कंपन होने के साथ ही सुई की चुभन जैसी हल्का-हल्का दर्द महसूस होना।
मासिकधर्म के समय में स्राव होने से पहले हृदय में दर्द होना तथा जिसका सम्बन्ध मूत्राशय में दर्द होने के साथ जुड़ा रहता है और पेशाब करने से पहले भी दर्द होना, मासिकस्राव के बाद कुछ आराम मिलाना।
हृदय में कंपन और फड़फड़ाहट होने के साथ ही दर्द होना और दर्द का असर पीठ तक होना।
इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लिथियम कार्बोनिकम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
लाइको, ग्रैफ, मैग्ने-कार्ब, लैक, डिजि, कैक्टस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लिथियम कार्बोनिकम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लिथियम कार्बोनिकम औषधि की पहली से तीसरी शक्ति का प्रयोग कई प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स (Lobelia Purpurascens)
शरीर में बहुत अधिक कमजोरी आ जाती है तथा इसके साथ ही नाड़ियों में भी कमजोरी आ जाती है और शरीर अधिक सुस्त पड़ा रहता है और श्वास लेने वाली अंगों में लकवा रोग के जैसा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि का उपयोग करते हैं। इस औषधि का प्रयोग और भी कई प्रकार के लक्षणों को ठीक करने में उपयोगी है जैसे- इन्फ्लुएंजा जनित से सम्बन्धित लक्षण, नाड़ियों की कमजोरी से सम्बन्धित लक्षण, सन्यास (कोमा. यह एक प्रकार की ऐसी अवस्था होती है जिसमें रोगी मृत अवस्था में होता है, रोगी जीवित तो होता है लेकिन उसे कुछ भी पता नहीं चलता है), जीभ पर लकवा रोग का प्रभाव होना तथा जीभ पर सफेदी होना।
विभिन्न लक्षणों में लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द होने के साथ ही चक्कर आता है तथा मितली आती है, भौंहों के बीच वाले भाग में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षण होने के कारण रोगी आंखों को खुला न रख पाता है, पलकें अपने आप ही बंद हो जाती हैं, उत्साह कम हो जाता है, मन में भ्रम पैदा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय और फेफड़ें पर लकवा रोग का प्रभाव पड़ता है तथा इसके साथ ही श्वास गति धीमी पड़ जाती है, धड़कन की गति ठीक प्रकार से न चलने के कारण धड़कन की ध्वनि ढोल-की ध्वनि की तरह सुनाई देती है तथा इसके साथ ही श्वास लेने में परेशानियां होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी अपनी आंखों को खुली नहीं रख पाता है और नींद ठीक प्रकार से नहीं आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कमर से नीचे के अंगों में कमजोरी आना, सांस लेने के साथ ही घुटन महसूस होना, फेफड़ों के ऊपरी आवरण में सूजन होना, गहरी सांस लेने पर छाती में सुई चुभने वाला दर्द होना, बायें फेफड़े में दर्द होना, दिन में रुक-रुककर चुभन होती रहती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए बैप्टीशिया, लोबेलिया कार्डिनैलिस औषधियों का उपयोग कर सकते हैं। अत: बैप्टीशिया, लोबेलिया कार्डिनैलिस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लोबेलिया इनफ्लेटा (Lobelia Inflata)
लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का अधिकतर प्रयोग ऐसे श्वास यन्त्र से सम्बन्धित रोग (डीसिज ऑफ द रेसपीरेट्री ट्रेक्ट) में हुआ करता है जिसमें जी का मिचलाना, उल्टी आना, अधिक कमजोरी होना, छाती में बोझ महसूस होना और सांस लेने में परेशानी आदि लक्षण होता है। इसका प्रयोग कई प्रकार के रोग जैसे- दमा, ब्रोकाइटिस क्रूप खांसी होना, दम घुटना तथा क्षय रोग (टी.बी.) आदि को ठीक करने के लिए करते हैं।
शराब पीने के कारण उत्पन्न लक्षण जैसे, अधिक दुबला पतला होना, चिड़चिड़ा हो जाना, बैठ-बैठकर दिन बिताना और दिमागी काम अधिक करना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप यह लक्षण ठीक हो जाता है।
विभिन्न लक्षणों में लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का उपयोग-
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह का स्वाद बहुत बिगड़ जाता है और राल अधिक निकलता है, गले में ऐसा महसूस होता है कि कुछ अटका हुआ हो, जी मिचलाने के साथ ही चक्कर आना, सिर से ठण्डा पसीना आना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का उपयोग-
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह का स्वाद बहुत बिगड़ जाता है और राल अधिक निकलता है, गले में ऐसा महसूस होता है कि कुछ अटका हुआ हो, जी मिचलाने के साथ ही चक्कर आना, सिर से ठण्डा पसीना आना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पेट से सम्बन्धित लक्षण :- पेट में दर्द होने के साथ ही अजीर्ण रोग होना तथा छाती में जलन होना, पेट के ऊपरी भाग अन्दर की ओर दबाव महसूस होना, जी मिचलाने के साथ ही छाती पर बोझा रखने जैसा दबाव महसूस होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
जीभ से सम्बन्धित लक्षण :- जीभ का स्वाद जलन युक्त हो जाता है तथा भूख मर जाती है अर्थात भूख लगना बंद हो जाता है और इसके साथ ही पेट में जलन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
गर्भावस्था से सम्बन्धित लक्षण :- स्त्रियों को गर्भावस्था के समय में सुबह के समय में जी मिचलाने पर लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आंत से सम्बन्धित लक्षण :- आंत उतर आने या गांठ हो जाने पर लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिससे रोगी को लाभ मिलता है।
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- चक्कर आना और मृत्यु का भय होना, सिर में दर्द होने के साथ ही जी मिचलाना और उल्टी होना, सिर में भारीपन महसूस होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
चेहरे से सम्बन्धित लक्षण :- चेहरे से ठण्डा पसीना निकलना और चेहरे का पीला रोग हो जाना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
कान से सम्बन्धित लक्षण :- छाजन रोग होने के कारण कम सुनाई देना, गले से कानों तक गोली लगने जैसा दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह से लाल रंग का लार निकलना तथा लार का स्वाद तीखा और जलनकारी होना, जीभ का स्वाद चिपचिपा और उस पर सफेद परत जमना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षण को दूर करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का उपयोग करना फायदेमंद होता है।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- खाना ठीक प्रकार से न पचना तथा खाना खाने के बाद पेट फूलना तथा दम घुटना। छाती में जलन होने के साथ ही प्रचुर मात्रा में खून बहना। जी मिचलाने के साथ ही उल्टी होना। सुबह के समय में उल्टी होना। अधिक बेहोशी पन होने के साथ ही कमजोरी महसूस होना। शरीर से अधिक मात्रा में पसीना आना तथा दिमाग ठीक से काम न करना, तम्बाकू की बदबू सहन न होना। जीभ का स्वाद ज्वलनशील होना, पाचनतंत्र ठीक से न होना, साथ ही पेट के भीतरी भाग में सिकुड़न होना, पेट फूलना और खाना खाने के बाद दम घुटना, छाती में जलन। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
श्वांस स्थान से सम्बन्धित लक्षण :- छाती में सिकुड़न महसूस होने के साथ ही सांस लेने में परेशानी होती है, किसी भी कार्य को करने से सांस लेने में अधिक परेशानी होती है। छाती में दबाव महसूस होने के साथ ही सांस लेने में परेशानी होना और तेज चलने पर दम घुटना, ऐसा महसूस होता है कि हृदय की गति रुक जाएगी। दमा रोग होने के साथ ही दौरे पड़ते समय कमजोरी अधिक महसूस होना और पेट अन्दर की ओर धंसते हुए महसूस होना और उससे पहले सारे शरीर पर चुभन होती है। श्वास यंत्र में ऐंठन होने के साथ ही घंटी बजने जैसी खांसी होना, सांस लेने में रुकावट होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
पीठ से सम्बन्धित लक्षण :- त्रिकास्थि (रीढ़ की हड्डी के नीचे का भाग) में दर्द होना, दर्द वाले भाग को छूने पर अधिक तेज में दर्द होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी सामने की ओर झुककर बैठता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का उपयोग लाभदायक है।
मूत्र से सम्बन्धित लक्षण :- पेशाब अधिक मात्रा में होता है तथा पेशाब का रंग लाल और तेलीय होता है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का उपयोग लाभकारी है।
नाभि से सम्बन्धित लक्षण :-
अधिक कमजोरी तथा बेहोशी की समस्या होने के साथ ही नाभि के भाग में बयान न की जा सकने वाली अनुभूति है जो विशेषकर तम्बाकू सेवन तथा चाय पीने वालों को होती है। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को दूर करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का उपयोग करना चाहिए।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :-
त्वचा पर खुजली होने के साथ ही चुभन होना और जी मिचलाना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
खांसी से सम्बन्धित लक्षण :-
काली खांसी होने के कारण दम घुटने की अवस्था और मृत्यु का भय होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कक्यू, इपि, टैबेक, वेरेट्र ऐल्ब, आर्स तथा ऐन्टि-टार्ट औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
तम्बाकू के सेवन करने से, अधिक गति करने से, ठण्ड लगने से, ठण्डे पानी का उपयोग करने से, हाथ-पैर धोने से रोग के लक्षण बढ़ने होने लगते हैं।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
शाम के समय में रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
क्रियानाशक :-
इपी।
मात्रा (डोज) :-
लोबेलिया इनफ्लेटा औषधि की मूलार्क से तीसवीं शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। सिरोंचाजनित विषक्तता में इसका स्थानिक प्रयोग प्रतिविष का कार्य करता है। अन्य किसी लोबेलिया की तुलना में असेटम लोबेलिया औषधि अधिक लाभदायक होता है। लोबेलिया का इन्जेक्शन देने से डिफ्थीरिया में ठीक वैसी ही क्रिया होती है जैसे डिफ्थेनिलयारोधक टीके की होती है और इसके साथ ही यह शरीर को शक्तिशाली बनाकर उसे भविष्य में रोगप्रतिरोध करने के योग्य बना देती है।
लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स (Lobelia Purpurascens)
शरीर में बहुत अधिक कमजोरी आ जाती है तथा इसके साथ ही नाड़ियों में भी कमजोरी आ जाती है और शरीर अधिक सुस्त पड़ा रहता है और श्वास लेने वाली अंगों में लकवा रोग के जैसा प्रभाव उत्पन्न हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि का उपयोग करते हैं। इस औषधि का प्रयोग और भी कई प्रकार के लक्षणों को ठीक करने में उपयोगी है जैसे- इन्फ्लुएंजा जनित से सम्बन्धित लक्षण, नाड़ियों की कमजोरी से सम्बन्धित लक्षण, सन्यास (कोमा. यह एक प्रकार की ऐसी अवस्था होती है जिसमें रोगी मृत अवस्था में होता है, रोगी जीवित तो होता है लेकिन उसे कुछ भी पता नहीं चलता है), जीभ पर लकवा रोग का प्रभाव होना तथा जीभ पर सफेदी होना।
विभिन्न लक्षणों में लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर में दर्द होने के साथ ही चक्कर आता है तथा मितली आती है, भौंहों के बीच वाले भाग में दर्द होता है। इस प्रकार के लक्षण होने के कारण रोगी आंखों को खुला न रख पाता है, पलकें अपने आप ही बंद हो जाती हैं, उत्साह कम हो जाता है, मन में भ्रम पैदा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
छाती से सम्बन्धित लक्षण :- हृदय और फेफड़ें पर लकवा रोग का प्रभाव पड़ता है तथा इसके साथ ही श्वास गति धीमी पड़ जाती है, धड़कन की गति ठीक प्रकार से न चलने के कारण धड़कन की ध्वनि ढोल-की ध्वनि की तरह सुनाई देती है तथा इसके साथ ही श्वास लेने में परेशानियां होती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
आंखों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी अपनी आंखों को खुली नहीं रख पाता है और नींद ठीक प्रकार से नहीं आती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लक्षणों को ठीक करने के लिए लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कमर से नीचे के अंगों में कमजोरी आना, सांस लेने के साथ ही घुटन महसूस होना, फेफड़ों के ऊपरी आवरण में सूजन होना, गहरी सांस लेने पर छाती में सुई चुभने वाला दर्द होना, बायें फेफड़े में दर्द होना, दिन में रुक-रुककर चुभन होती रहती है। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए बैप्टीशिया, लोबेलिया कार्डिनैलिस औषधियों का उपयोग कर सकते हैं। अत: बैप्टीशिया, लोबेलिया कार्डिनैलिस औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लोबेलिया पर्प्यूरासेन्स औषधि की तीसरी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लोलियम टेमुलेण्टम (Lolium Temulentum)
मस्तिष्क में दर्द होना, साइटिका रोग, लकवा (पक्षाघात) आदि में लोलियम टेमुलेण्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए, जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। अवसन्नता तथा बेचैनी होने पर भी इसका उपयोग कर सकते हैं।
विभिन्न लक्षणों में लोलियम टेमुलेण्टम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी हतोत्साहित हो जाता है तथा किसी भी कार्य को करने में जल्दी ही घबरा जाता है, चक्कर आने के साथ ही आंखें बंद होती है और सिर भारी-भारी लगता है, कानों में अजीबों-गरीब आवाजें सुनाई देती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लोलियम टेमुलेण्टम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आमाशय से सम्बन्धित लक्षण :- पेट अन्दर की ओर धंस जाता है तथा पेट में दर्द होता है। जी मिचलाने के साथ उल्टियां होना। तेज अतिसार होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लोलियम टेमुलेण्टम औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- चलते समय चाल लड़खड़ाना। शरीर के सारे अंगों में कंपन होना। सभी अंगों में कमजोरी महसूस होना। पिण्डलियों में तेज दर्द होने के साथ ही पिण्डलियों में रस्सी बंधी हुई लगती है। शरीर के कई अंग ठण्डे पड़ जाते हैं। बांहों और पैरों की गतियां गड़बड़ा जाती है। रोगी के हाथों में कंपन होती है जिसके कारण वह ठीक प्रकार से लिख नहीं पाता है, पानी का गिलास भी ठीक प्रकार से पकड़ नहीं पाता। शरीर के कई अंगों में लकवे जैसी स्थिति उत्पन्न होना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लोलियम टेमुलेण्टम औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
सीकेल, लैथइरस तथा ऐस्ट्रागै औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लोलियम टेमुलेण्टम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लोलियम टेमुलेण्टम औषधि की छठी शक्ति का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लोनीसेरा जाइलौस्टियम (Lonicera xylosteum)
लोनीसेरा जाइलौस्टियम औषधि का प्रयोग बेहोशी तथा अकड़न को दूर करने के लिए किया जाता है। यदि किसी रोगी के छाती व सिर में रक्त की अधिकता हो जाती है, रोगी अज्ञान हो जाता है, एक आंख की पुतली सिकुड़ी हुई तथा दूसरी फैली रहती है, अधमुंदी आंखे करके रोगी सोया रहता है, चेहरा लाल दिखाई देता है, सारा शरीर कांपने लगता है, भयानक रूप का आक्षेप सिर और कई अंग इस प्रकार गिर पड़ते हैं, जैसे लकवा के लक्षण हो गया हो, हाथ-पैर ठण्डे हो जाते हैं तथा पसीना आता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लोनीसेरा जाइलौस्टियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
विभिन्न लक्षणों में लोनीसेरा जाइलौस्टियम औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- सिर और छाती में रक्त का संचार तेज होता है, एक पुतली सिकुड़ जाती है तथा दूसरी फैल जाती है, रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे नींद तेज आ रही हो, आंखें आधी खुली हुई रहती हैं तथा चेहरा लाल हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लोनीसेरा जाइलौस्टियम औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- अंगों में झटके लगते हैं तथा सारे शरीर में कंपन होती है, तेज बेहोशी की अवस्था उत्पन्न हो जाती है, सिर तथा अंगों में लकवा जैसे लक्षण दिखाई पड़ते हैं, अंग ठण्डे पड़ जाते हैं, त्वचा से ठण्डे पसीने निकलते हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लोनीसेरा जाइलौस्टियम औषधि का प्रयोग करना लाभदायक होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
मिजाज चिड़चिड़ा हो जाता है तथा साथ ही तेज क्रोध भी आता है, इस प्रकार के लक्षणों को दूर करने के लिए लोनीसेरा पेरिलमेनम औषधि का प्रयोग करते हैं। इस प्रकार के लक्षणों को लोनीसेरा जाइलौस्टियम औषधि से भी ठीक कर सकते हैं। अत: लोनीसेरा पेरिलमेनम औषधि के कुछ गुणों की तुलना लोनीसेरा जाइलौस्टियम औषधि से कर सकते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लोनीसेरा जाइलौस्टियम औषधि की तीसरी से छठी शक्ति तक का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लुफ्फा अमारा (Luffa Amara)
तिल्ली का रोग होने के साथ ही बुखार होना तथा यकृत में खून के संचार की गति में गड़बड़ी उत्पन्न होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लुफ्फा अमारा औषधि का उपयोग करते हैं। इसका प्रयोग शरीर में शक्ति को प्रदान करने के लिए किया जाता है।
विभिन्न लक्षणों में लुफ्फा अमारा औषधि का उपयोग-
मन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को डर लगता है तथा उसके शरीर में कमजोरी आ जाती है तथा यकृत और तिल्ली से सम्बन्धित रोग हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लुफ्फा अमारा औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
मुंह से सम्बन्धित लक्षण :- मुंह सूखा रहता है तथा अत्यधिक प्यास लगती है और मुंह का स्वाद कड़वा हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लुफ्फा अमारा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
मल और उल्टी से सम्बन्धित लक्षण :- पतला मल आता है, हर पन्द्रह मिनट के बाद चावलों के माण्ड जैसा, उल्टी में पदार्थ आता है, पित्त जैसा या कभी-कभी कफ जैसा हर आधे घण्टे उल्टी होती है, कभी-कभी एक साथ ही अतिसार और उल्टी की अवस्था उत्पन्न हो जाती है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लुफ्फा अमारा औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के सारे शरीर में जलन की अनुभूति होती है तथा कभी-कभी ठण्ड लगने लगती है, नाड़ी कमजोर हो जाती है, उखड़ी हुई रहती है तथा पसीने से ठण्ड लगता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लुफ्फा अमारा औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
मात्रा (डोज) :-
लुफ्फा अमारा औषधि की मूलार्क, 3x, 6x शक्तियों का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लुफ्फा बिण्डल (Luffa Bindal)
लुफ्फा बिण्डल औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है। जीर्ण विषम ज्वर (क्रोनिक मलेरिया फीवर), पित्ताशय में दर्द होना, जलोदर रोग, जुकाम होना, यकृत तथा प्लीहा से सम्बन्धित रोग, बवासीर का रोग आदि रोगों को ठीक करने के लिए भी इस औषधि का उपयोग किया जाता है। बवासीर के मस्सों पर इस औषधि का बाहरी प्रयोग करना चाहिए।
उन रोगियों को इस औषधि से सर्वाधिक लाभ होता है जो शीत के प्रति अत्यंत सुग्राही होते हैं या मौसम परिवर्तन से जिनके कष्ट बढ़ जाते हैं अथवा जिन्हें बार-बार जुकाम तथा सर्दी होती है।
मात्रा (डोज) :-
लुफ्फा बिण्डल औषधि की मूलार्क, 3x, छठी शक्तियों का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।
लुपुलस-हुमुलस (Lupulus-Humulus)
स्नायु-जाल की ठण्डी पड़ने की स्थिति में इस औषधि की तब उत्तम क्रिया होती है जब इस स्थिति में जी मिचलाता है, चक्कर आते हैं और रात के समय में चिन्ता करने से सिरदर्द हो जाता है।
छोटे बच्चों के पीलिया रोग को ठीक करने के लिए लुपुलस-हुमुलस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप बच्चे का पीलिया रोग ठीक हो जाता है।
लुपुलस-हुमुलस औषधि का प्रयोग कई प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए किया जाता है जो इस प्रकार हैं- मूत्रमार्ग में जलन होना, पेशियों में फैलाव होना, नाड़ियों में कंपन होना, शराबियों की तरह आंखों में नींद भरी रहना और पागलपन की स्थिति होना, सिर में चक्कर आने के साथ ही बेहोशी की समस्या होना, नाड़ी की गति धीमी पड़ जाती है, पसीना अधिक मात्रा में आना, त्वचा चिपचिपी तथा तैलीय होना।
विभिन्न लक्षणों में लुपुलस-हुमुलस औषधि का उपयोग-
सिर से सम्बन्धित लक्षण :- नींद न आना, अत्यधिक उत्तेजित हो जाना, सिर में दर्द होने के साथ ही चक्कर आना और प्रत्येक पेशियों में खिंचाव और कंपन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लुपुलस-हुमुलस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
नींद से सम्बन्धित लक्षण :- दिन के समय में नींद आना तथा गहरी नींद आना ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लुपुलस-हुमुलस औषधि का उपयोग लाभदायक है।
पुरुष रोग से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी के लिंग में दर्द होता है तथा संभोग के प्रति कमजोरी उत्पन्न होती है। हस्तमैथुन के कारण होने वाला स्वप्नदोष। पेशाब के साथ धातु आना। इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लुपुलस-हुमुलस औषधि का प्रयोग करना फायदेमंद होता है।
चर्म रोग से सम्बन्धित लक्षण :- आरक्त-बुखार के कारण चेहरे पर उत्पन्न होने वाला घाव, त्वचा के नीचे कीड़ें रेंगने जैसी अनुभूति चमड़ी फटी हुई जिससे पपड़ियां उतरती हैं। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लुपुलस-हुमुलस औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
नक्स, अर्निका तथा कैनाबि औषधियों के कुछ गुणों की तुलना मैंगानम लुपुलस-हुमुलस औषधि से कर सकते हैं।
प्रतिविष:-
विनीगर तथा काफिया औषधियों का उपयोग लुपुलस-हुमुलस औषधि के हानिकारक प्रभाव को दूर करने के लिए किया जाता है।
मात्रा (डोज) :-
लुपुलस-हुमुलस औषधि की मूलार्क से तीसरी शक्ति तक का प्रयोग रोगों को ठीक करने के लिए करना चाहिए। लुपुलिन 1x शक्ति का विचूर्ण (स्वप्नदोष में सर्वोत्तम। दर्दनाक कैंसर में स्थानिक प्रयोग)।
लाइसीन (Lyssin)
लाइसीन औषधि पागल कुत्ते के लार से बनाई जाती है। इस औषधि का प्रभाव बहुत ही गंभीर, लम्बे समय तक, स्थायी और निश्चित रहता है।
यदि कोई रोगी उबलते हुए पानी तथा बहते हुए पानी को देखता है तो उसकी परेशानियां बढ़ जाती हैं जैसे पानी को देखने से डर लगना, पागल कुत्ते के काटने से पागल हो जाना। ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लाइसीन औषधि उपयोग लाभदायक है।
यदि कोई रोगी सूरज की रोशनी को सहन नहीं कर पा रहा हो तो ऐसे रोगी का उपचार करने के लिए लाइसीन औषधि का उपयोग करना चाहिए।
ऐसे जानवर जो पागल नहीं है यदि वह किसी को काट लेता है तो उसके जहर को नष्ट करने के लिए लाइसीन औषधि का उपयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप पागल जानवर के काटने का जहर नष्ट हो जाता है।
विभिन्न अंगों से संबंधित लक्षणों में लाइसिन औषधि का उपयोग-
सिर दर्द से सम्बन्धित लक्षण :- यदि किसी व्यक्ति को कुत्ते ने काट लिया है तो व्यक्ति पागल हो या न हो, उसमें इस प्रकार के लक्षण हैं- उमंग या परिश्रम करने से, बहते हुए पानी की आवाज या चमकीली रोशनी से सिर में दर्द होना, ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लाइसीन औषधि का उपयोग लाभदायक है।
ऐंठन से सम्बन्धित लक्षण :- रोगी को पानी से तथा आईना की चकाचौंध या अक्स पड़ी हुई रोशनी से, पानी के समान किसी पतले पदार्थ के बारे में सोचने से, जरा भी छू जाने या हवा की झोंक से ऐंठन होना। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी को पानी या पतले पदार्थ से निगलने में परेशानी होती है, बार-बार निगलने की इच्छा रहती है और गले में दर्द होता रहता है, ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए लाइसीन औषधि का उपयोग लाभकारी है।
सेक्स से सम्बन्धित लक्षण :- मन अधिक उत्तेजित हो तथा कोई भी दु:ख की खबर को सुनकर तकलीफे बढ़ जाती हो, घाव का रंग नीला पड़ गया हो, संभोग की अधिक इच्छा होने के कारण परेशानियां अधिक हो रही हो, संभोग की इच्छा को रोकने से शरीर में कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो गए हों इस प्रकार के लक्षणों में से यदि कोई भी लक्षण किसी व्यक्ति को हो गया है तो उसके रोग को ठीक करने के लिए लाइसीन औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है। इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित रोगी का उपचार कोनायम औषधि से भी कर सकते हैं।
स्त्री रोग से सम्बन्धित लक्षण :- कई वर्षों से गर्भाशय की ऊपरी झिल्ली योनि से बाहर निकल आने की शिकायत हो तो उसे ठीक करने के लिए लाइसीन औषधि का प्रयोग लाभदायक है। यदि किसी स्त्री की योनि अधिक नाजुक हो गई हो तथा पुरुष के साथ संभोग क्रिया करने में अधिक परेशानी महसूस हो रही हो तो ऐसी स्त्री रोगी का उपचार करने के लिए लाइसीन औषधि का प्रयोग लाभदायक है, जिसके फलस्वरूप स्त्री की ये समस्या दूर हो जाती है और उसे पुरुष के साथ संभोग करने में परेशानी नहीं होती है।
प्रदर रोग से सम्बन्धित लक्षण :- प्रदर रोग की अवस्था बहुत अधिक गंभीर हो तथा स्राव टांगों तक लटक रहा हो तो इस प्रकार के लक्षणों से पीड़ित स्त्री का उपचार करने के लिए लाइसीन औषधि का प्रयोग लाभदायक है।
सम्बन्ध (रिलेशन) :-
कैन्थ, बेल, हायोस, लैके और स्ट्रैमो औषधियों के कुछ गुणों की तुलना लाइसीन औषधि से कर सकते हैं।
वृद्धि (ऐगग्रेवेशन) :-
पानी देखने या उसके शब्द से, चमकीली या चकाचौंध रोशनी से, गाड़ी की सवारी से, झुकने से, सूरज की गर्मी से, जरा भी छू जाने से, हवा तथा बिजली के पंखे की झोंक से, नम हवा और गर्मी से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन (एमेलिओरेशन) :-
गर्दन का दर्द सिर के पीछे की ओर झुकाने से कम रहता है, सिर दर्द ठण्डी हवा से कम रहता है, गर्म भाप या गर्म पानी से रोग के लक्षण नष्ट होने लगते हैं।
मात्रा (डोज) :-
लाइसीन औषधि के मूलार्क का प्रयोग रोग के लक्षणों को ठीक करने के लिए करना चाहिए।