बैसीलीनम BACILINUM
बैसीलीनम BACILINUM
बैसीलीनम औषधि का प्रयोग अनेक प्रकार के रोगों को ठीक करने में किया जाता है परन्तु इस औषधि का प्रयोग विशेष रूप से यक्ष्मा (टी.बी.) रोग से संबन्धित लक्षणों को दूर करने में अधिक लाभकारी माना गया है। बैसीलीनम औषधि यक्ष्मा (टी.बी.) रोग को ठीक करने में अत्यधिक लाभकारी है। इसके प्रभाव से शरीर में बनने वाले अधिक बलगम की मात्रा कम होती है। इस औषधि के प्रयोग से फेफड़ों में वायु अधिक मात्रा में पहुंचने लगती है जिससे खून में बनने वाले दूषित द्रव्य बाहर निकल जाती है और फेफड़ों की वायुकोष्ठ खुल जाती हैं जिसके कारण फेफड़ों में वायु अधिक मात्रा में जाने लगती है और धीरे-धीरे यक्ष्मा (टी.बी.) से संबन्धित लक्षण समाप्त होकर रोग ठीक हो जाता है।
बैसीलीनम औषधि का विशेष प्रभाव रोगों में तब पड़ता है जब रोगी के शरीर में पीब जैसा पतला कफ अधिक मात्रा में बनने लगता है और रोगी व्यक्ति के शरीर में पीब अधिक मात्रा बनने से रोगी को सांस लेने में भी कठिनाई होती है और पीब सांस नली में भर जाती है जो बलगम के रूप में निकलती रहती है। ऐसे लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बैसीलीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है जिसके फलस्वरूप शरीर में पीब का बनना बंद होकर शरीर से पीब बाहर निकलता है। रोगी को सांस लेने में उत्पन्न परेशानी को दूर करता है साथ ही यक्ष्मा (टी.बी.) रोग को भी समाप्त करता है। बैसीलीनम का प्रयोग यक्ष्मा (टी.बी.) के अतिरिक्त अन्य पुराने रोगों में भी लाभकरी माना गया है।
बैसीलीनम औषधि का प्रयोग उन वृद्ध व्यक्तियों के फेफड़ों की बीमारियों में लाभकारी है जिन व्यक्तियों को पुराने नजला-जुकाम की शिकायत बराबर बनी रहती है। इसके अतिरिक्त जिस व्यक्ति के फेफड़ों में खून का प्रवाह ठीक से नहीं हो पाता, रात को अचानक घुटने के दौरे पड़ते हैं और खांसते समय परेशानी होती है। ऐसे में बैसीलीनम औषधि के प्रयोग से रोग जल्द दूर होता है। दान्तों पर मैल जम जाने पर बैसीलीनम औषधि का प्रयोग से दान्तों पर जमी मैल साफ होती है। जिस व्यक्ति को बार-बार सर्दी-जुकाम होती रहती है, उसके लिए भी यह औषधि लाभकारी होती है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर बैसीलीनम औषधि का उपयोग :-
1. सिर से संबन्धित लक्षण :
बैसीलीनम औषधि का प्रयोग सिर दर्द के विभिन्न लक्षणों में किया जाता है, जैसे- रोगी व्यक्ति में अधिक चिड़चिड़ापन तथा उत्साहहीनता आ जाना। तेज सिर दर्द जो सिर की गहराई से उत्पन्न होता हुआ महसूस होता है और रोगी को अपने सिर पर रस्सी बांधने जैसा अनुभव होता रहता है। रोगी की त्वचा पर दाद और पलकों का छाजन अर्थात खुजली होना आदि सिर रोग से संबन्धित लक्षणों में बैसीलीनम का प्रयोग किया जाता है।
2. पेट से संबन्धित लक्षण :
पेट रोगग्रस्त होने पर उत्पन्न होने वाले विभिन्न लक्षण जैसे- पेट में दर्द रहना, ऊरू ग्रंथियां फूली हुई, आन्तों की टी.बी. होना, भोजन करने से पहले पतला दस्त आना, पेट में अधिक कब्ज बनना और कब्ज के कारण दुर्गन्धित हवा निकलना आदि पेट से संबन्धित लक्षण रोगी में उत्पन्न होने पर रोगी को ठीक करने के लिए बैसीलीनम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
3. सांस संस्थान से संबन्धित लक्षण :
सांस रोग से ग्रस्त व्यक्ति को घुटन होना तथा नजले के कारण सांस लेने में परेशानी होना, तर दमा रोग तथा सांस नली में बुलबुले उठने जैसी आवाज निकलना के साथ श्लेष्मा-पूय बलगम निकलना आदि लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बैसीलीनम औषधि देनी चाहिए।
सांस नली की सूजन से पीड़ित रोगियों में श्लेष्म-पूय बलगम बहुदण्डाणुक (पोली बैसलरी) होता है। यह रोगाणुओं की अनेक जातियों का सम्मिश्रण होता है और इससे व्यवहार में लाने का स्पष्ट संकेत रहता (कार्टियर)। यह औषधि आमतौर पर फेफड़ों में अतिरक्तसंकुलता (कोनगेशन) को दूर करती है और इस तरह यह औषधि यक्ष्मारोग को दूर करने में अधिक प्रभावशाली होता है।
5. त्वचा से सम्बंधित लक्षण :
बैसीलीनम औषधि का प्रयोग त्वचा से संबन्धित विभिन्न लक्षणों जैसे- त्वचा का एक विशेष प्रकार का रोग जिसमें त्वचा पर बारीक कीलें निकलती हैं और जिस पर कभी खुरण्ड नहीं जमते। त्वचा पर निकलने वाली यह कीलें बार-बार निकलती रहती हैं। रोगी व्यक्ति के गर्दन की ग्रन्थियां बढ़ी हुई तथा पलकों में छाजन रहती है। ऐसे त्वचा रोग के लक्षणों में रोगी को ठीक करने के लिए बैसीलिनम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
वृद्धि :
रात को तथा सुबह के समय तथा ठण्डी हवा में घूमने से रोग बढ़ता है।
संबन्ध :
बैसीलीनम औषधि का संबन्ध एण्टिमोनियम आयोडे, लैके, आर्सेनिकम आयोडे, मायोसोटिस, लेविको आदि से माना जाता है। इन औषधियों का प्रयोग रोगी में अधिक दुर्बलता होने पर जल्दी लाभ के लिए रोगी व्यक्ति को 5-10 बूंदें दी जाती हैं।
पूरक :
कल्के-फा और काली-का औषधि बैसीलीनम औषधि का पूरक है।
तुलना :
बैसीलीनम औषधि की तुलना ´टुबरकुलीनम´ औषधि से की जाती है। बैसीलीनम और टुबरकुलीनम दोनों ही औषधियों को यक्ष्मा रोग को दूर करने में अधिक लाभकारी माना गया है। इन दोनों औषधि का विशेषकर लाभ तब मिलता है जब फेफड़ों में यक्ष्मा रोग विकसित होने के छोटे-मोटे लक्षण उत्पन्न होने के आशंका हो। बैसीलीनम का प्रयोग ग्रन्थियों, सन्धियों, त्वचा और ह़ड्डियों की टी.बी. की शुरुआती अवस्था में करने से रोग दूर करने में यह अधिक लाभकारी होता है। ´बैसीलीनम टैस्टियम´ विशेषत: शरीर के निचले अंगों पर प्रतिक्रिया कर रोगों को दूर करती है।
मात्रा :
बैसीलीनम औषधि को 30 शक्ति से नीचे की शक्ति नहीं देनी चाहिए और नहीं यह औषधि बार-बार रोगी को देना चाहिए। इस औषधि को सप्ताह में एक बार लेना चाहिए। यह औषधि रोग में बहुत जल्दी लाभ पहुंचाती है। इस औषधि के एक डोज से ही रोग खत्म हो जाते हैं।
बादियागफ्रेश (वाटर स्पॉज) BADIAGA (Fresh-water-sponge)
बादियाग औषधि कैल्शियम, एल्यूमीनियम और साइलीसिया को मिलाकर तैयार की जाती है। इन तीनों औषधियों को मिलाने से बनने वाली बादियाग औषधि अनेक प्रकार के रोगों को दूर करने में बहुत ही लाभकारी है। बादियाग औषधि का प्रयोग मुख्य रूप से सर्दी से होने वाले रोग तथा शरीर के किसी भी अंग में गांठ उत्पन्न होने पर किया जाता है। बादियाग औषधि शरीर में बनने वाली विष (दूषित द्रव्य) को दूर करने में अधिक लाभकारी है। यह औषधि खून में अपनी प्रतिक्रिया कर कण्ठमाला रोग का लक्षण प्रकट करती है। यह औषधि पेशियों और उनके ऊपरी परत में होने वाले दर्द को दूर करती है। रोगी को हिलने-डुलने और कपड़े पहनने से रोगग्रस्त अंगों पर रगड़ होने से दर्द होना तथा रोगी में सर्दी सहन करने की क्षमता कम होना आदि में बादियाग औषधि लाभकारी है। ग्रिन्थयों की सूजन। पूरे शरीर में लकवा मार जाने जैसी स्थिति। गलगण्ड, आतशक (गर्मी का रोग), गिल्टी, लाल खसरा आदि में बादियाग औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। इस औषधि का प्रयोग गर्मी के मौसम में अच्छा रहता है और बरसात व सर्दी के मौसम में इसके सेवन से इस औषधि में मौजूद लक्षण रोगी में उत्पन्न हो सकते हैं।
शरीर के विभिन्न अंगों के लक्षणों के आधार पर बादियाग औषधि का उपयोग :-
खांसी से संबन्धित लक्षण :
खांसी रोग से ग्रस्त रोगी को सर्दी लगने से नाक से तरल पानी की तरह बलगम का निकलना, अधिक छींके आना, छाती में दमा की तरह खिंचाव महसूस होना है तथा सांस लेने और छोड़ने में कठिनाई होना आदि लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को बादियाग औषधि का सेवन कराने से रोग ठीक होता है। बादियाग औषधि हूपिंग खांसी के साथ सुई चुभने जैसा दर्द उत्पन्न होने पर रोगी को यह औषधि देने से दर्द आदि में आराम मिलता है। इसके अतिरिक्त कुकर खांसी में भी बादियाग औषधि लाभकारी होती है। कुकर खांसी ऐसी खांसी है, जिसमें कफ निकालने के लिए पूरा जोर लगाना पड़ता है और कफ की गुठलियां बाहर आती हैं। इस खांसी में रोगी खांसते-खांसते बेदम हो जाता है और मवाद की तरह कफ की गुठलियां बाहर आती हैं। ऐसे में रोगी को बादियाग औषधि सेवन देनी चाहिए। इसके उपयोग से खांसी ठीक होती है।
सिर से सम्बंधित लक्षण :
सिर रोग ग्रस्त होने के साथ रोगी में उत्पन्न होने वाले लक्षण जैसे- रोगी को अचानक महसूस होना कि सिर बहुत बढ़ गया है और सिर के अन्दर कोई चीज भरी हुई है। रोगी के सिर और कनपटियों में दर्द होता है जो धीरे-धीरे आंखों तक फैल जाता है और वह दर्द दोपहर के बाद और अधिक बढ़ जाता है, आंखों के नीचे नीला घेरा बनने लगता है, सिर में सिकुड़ापन और खोपड़ी में तेज दर्द होने लगता है, सिर में खुश्की होती है। इस तरह के लक्षणों में कोई भी लक्षण से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बादियाग औषधि का प्रयोग किया जाता है।
सिर में जड़ता और चक्कर आने जैसा अनुभव होना। सर्दी-जुकाम के साथ छींकें अधिक आना तथा नाक से पानी जैसा पतला बलगम निकलने के साथ दमा जैसा सांस और दम घोट देने वाली खांसी में भी यह औषधि लाभकारी है। इन्फ्लुएंजा रोग, हल्की सी आवाज भी बहुत तेज महसूस होना आदि सिर से सम्बंधित ऐसे लक्षणों में बादियाग औषधि का प्रयोग किया जाता है।
आंखों से संबधित लक्षण :
आंखों के रोगग्रस्त होने पर उत्पन्न होने वाले लक्षण, जैसे- बांई आंख की ऊपरी पलक में खिंचाव होना, आंखों के गोले में दर्द होना। दोपहर के बाद आंखों के गोले में रुक-रुककर होने वाला तेज दर्द। आंखों के इन रोगों में कभी-कभी कम या अधिक सिर दर्द होना तथा साथ ही आंखों के गोलक में दर्द बना रहना ऐसे आंखों के रोगों के लक्षणों में बादियाग औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है।
बालों से संबन्धित लक्षण :
जिसके बाल अधिक झड़ते हो, खल्वाट रोग (गंजापन), सिर में खुजली रहती है। सिर की त्वचा छूने से दर्द होता है। माथे पर भी फुंसियां जैसे लक्षण उत्पन्न होते हैं। इस प्रकार के लक्षणों को ठीक करने के लिए बादियाग औषधि का उपयोग करना अधिक लाभकारी होता है।
गांठ से संबन्धित लक्षण :
गांठ वाले स्थान पर सूजन होने के साथ गाल, गर्दन व गर्दन के पिछले भाग में, बगल में, कान की जड़ और जबड़े की गांठ आदि में सूजन उत्पन्न होना आदि ऐसे लक्षणों को दूर करने के लिए बादियाग औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
बादियाग औषधि का प्रयोग प्रमेह, गर्मी, प्लेग आदि किसी भी कारण से उत्पन्न होने वाले बाघी रोग में पत्थर की तरह सख्त होने वाली गांठों को तोड़ने के लिए किया जाता है। गांठों के रोग में बादियाग औषधि का सेवन करने के साथ इसके रस को रुई पर लगाकर गांठ पर लगाने से अधिक लाभ मिलता है।
बाघी रोग से संबन्धित लक्षण :
बाघी रोग में जांघ के जोड़ों में गांठ बन जाती है और फिर गांठ सख्त हो जाती है, जिसके कारण उस स्थान पर सूजन आ जाती है। ऐसे में बादियाग औषधि का सेवन करने और इसके रस का मदर टिंचर (मूलार्क) गांठ के ऊपर लगाने से रोग में जल्दी लाभ मिलता है।
कंठमाला से संबन्धित लक्षण :
बादियाग औषधि का उपयोग कंठमाला में अधिक लाभकारी होता है, विशेषकर जब गले की ग्रन्थियां अधिक कठोर हो गई हो और उनमें मवाद पैदा होकर गांठ पकने व फूटने लगा हो। ऐसे में बादियाग का उपयोग करने से कंठमाला नष्ट होता है। बादियाग औषधि के उपयोग से कंठमाला की बढ़ी हुई अवस्था, कंठमाला होने पर आंखों में जलन होना, दांई आंखों में स्नायविक पीड़ा रहना आदि में भी लाभ मिलता है।
बुखार से संबन्धित लक्षण :
बादियाग औषधि का उपयोग दूषित वायु के कारण होने वाले बुखार में भी लाभकारी होता है। इसके अतिरिक्त अधिक छींके आने व नाक से श्लेष्मा निकलने पर भी इस औषधि का सेवन लाभकारी होता है।
अन्य रोग :
गर्भाशय से खून का आना और रात को स्राव अधिक बढ़ जाना व सिर बढ़ा महसूस होना आदि में बादियाग औषधि का प्रयोग लाभकारी है। बादियाग औषधि का प्रयोग बवासीर, मस्से, दाहिने आंख के स्नायुओं में दर्द होना, हूपिंग खांसी में अधिक खांसने से बलगम निकलना, घोड़े के खुर की चोट आदि बीमारियों में लाभदायक है।
सांस संस्थान से संबन्धित लक्षण :
खांसी दोपहर के बाद बढ़ जाती है और गर्म कमरे में जाने पर खांसी कम हो जाती है। इस रोग में खांसने पर बलगम रोगी के मुंह या नाक से निकलकर अपने-आप दूर जा गिरता है। सांस रोग के ऐसे लक्षणों में बादियाग औषधि का उपयोग लाभकारी होता है।
रोगी में उत्पन्न काली खांसी जिसमें पीले रंग का गाढ़ा बलगम मुंह और नाक से निकलता रहता है। परागत ज्वर के साथ दमा में रोगी को सांस लेने में परेशानी होना, छाती की सूजन, गर्दन की सूजन और पीठ की सूजन के साथ फेफड़ों की झिल्ली की सूजन आदि लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को ठीक करने के लिए बादियाग औषधि का सेवन कराना चाहिए।
आमाशय से संबन्धित लक्षण :
रोगी का मुंह गर्म रहता है, प्यास अधिक लगती है, पेट में चुभने जैसा तेज दर्द होता है जो पेट से शुरू होकर धीरे-धीरे कशेरुका और कन्धों तक फैल जाता है। आमाशय रोगग्रस्त होने पर रोगी में ऐसे लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को ठीक करने के लिए बादियाग औषधि का सेवन कराना चाहिए।
स्त्री रोग से संबन्धित लक्षण :
स्त्रियों में मासिक धर्म के साथ जब खून आने लगता है तो उसे रक्तप्रदर कहते हैं। रक्तप्रदर होने पर स्त्री को रात के समय अपना सिर धीरे-धीरे बढ़ता हुआ अनुभव होता है। ऐसे में स्त्रियों को बादियाग औषधि देने से रक्तप्रदर के साथ उत्पन्न होने वाले अन्य लक्षण भी दूर होते हैं। बादियाग औषधि के प्रयोग से स्तन कैंसर भी ठीक होता है।
कान से संबन्धित लक्षण :
कान रोगग्रस्त होने पर उत्पन्न होने वाले विभिन्न लक्षणों जैसे-कान के निचली ग्रन्थियां का बढ़ जाना, कान की ग्रन्थियों में सूजन आना, सभी ग्रन्थियों का बढ़कर अण्डाकार हो जाना तथा इन ग्रन्थियों में से कुछ ग्रन्थियां का कठोर हो जाना और कुछ पककर फूट जाना जैसे लक्षण उत्पन्न होने के कारण कान से पीब बाहर आने लगता है। इस रोग में तेज चुभन वाली पीड़ा होती है जो दाईं ओर से शुरू होकर कंठास्थि तक पहुंच जाती है। इस रोग के होने पर कंधों के पीछे की ओर मोड़ने तथा छाती तानने या शरीर के किसी भी ओर हल्का मोड़ने पर दर्द तेज हो जाता है। रोगी में इस तरह के लक्षणों में से कोई भी लक्षण उत्पन्न होने पर बादियाग औषधि का सेवन कराना चाहिए। यह औषधि सभी लक्षणों को दूर कर रोग को ठीक करती है।
हृदय से संबन्धित लक्षण :
हृदय रोग में रोगी के हृदय के आस-पास विकार का अनुभव होने के साथ ही हृदय के पास तेज दर्द होता है तथा रोगी के पूरे शरीर में सुई चुभने जैसा दर्द होता रहता है। इस तरह के हृदय रोग में बादियाग औषधि का उपयोग करना अत्यधिक लाभकारी होता है।
गर्दन से संबन्धित लक्षण :
गर्दन कठोर होने या गर्दन अकड़ जाने पर बादियाग औषधि का उपयोग लाभकारी होता है। गर्दन में दर्द होने पर विशेषकर गर्दन के पिछले भाग में चुभन जैसा दर्द होने पर जो आगे की ओर झुकने या पीछे की ओर मुड़ने से अधिक तेज हो जाता है। ऐसे गर्दन के दर्द में बादियाग औषधि का सेवन करने से अकड़न और दर्द आदि में जल्दी आराम मिलता है।
त्वचा से संबन्धित लक्षण :
इस रोग में रोगी के त्वचा को छूने पर रोगी को दर्द होता है, रोगी के त्वचा पर दरारें पड़ जाती है और त्वचा पर दाग व चकत्ते आदि उत्पन्न हो जाते हैं। त्वचा पर ऐसे लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को बादियाग औषधि देनी चाहिए।
मांसपेशियों का दर्द :
यदि रोगी की मांसपेशियां और उसको ढकने वाली त्वचा में दर्द का अनुभव होता है तथा मांसपेशियों को छूने से भी दर्द का अनुभव होता है। मांसपेशियों का यह दर्द इतना असाधारण होता है कि पहना हुआ कपड़ा भी रोगग्रस्त अंगों को छू जाने से दर्द होने लगता है तथा ऐसा दर्द अनुभव होता है जैसे किसी ने उस अंगों को पीट या कुचल दिया हो। इस तरह के मांसपेशियों में उत्पन्न होने वाले संवेदनशील दर्द में बादियाग औषधि का उपयोग करने से रोग जल्द ठीक होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों :
गर्दन और कन्धों में सुई चुभने जैसा दर्द होने पर बादियाग औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। इस औषधि का उपयोग कमर, नितम्बों और उसके निचले हिस्से में दर्द आदि उत्पन्न होने पर, गर्दन में अकड़न पैदा होने पर किये जाते हैं। कभी-कभी पेशियों और त्वचा पर ऐसे दर्द महसूस होता है, मानो किसी ने शरीर को कूट दिया है। शरीर में इस तरह दर्द उत्पन्न होने पर बादियाग औषधि का उपयोग करने से दर्द में जल्दी आराम मिलता है।
उपदंश रोग :
गर्मी से उत्पन्न होने वाले रोग तथा एड़ियों के फटने और खूनी बवासिर में भी बादियाग औषधि का उपयोग लाभकारी होता है।
वृद्धि :
ठण्डी हवा या ठण्डे मौसम में रहने से रोग बढ़ जाता है।
शमन :
गर्मी या गर्म कमरे में रहने से रोग में आराम मिलता है।
मात्रा :
बादियाग 3x या बादियाग 6 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
बैलसमम पेरूवियेनम BALSAMUM PERUVIANUM
बैलसमम पेरूवियेनम औषधि का प्रयोग रोगी में उत्पन्न होने वाले किसी भी प्रकार के स्राव को रोकने के लिए अधिक लाभकारी है। बैलसमम पेरूवियेनम औषधि का प्रयोग अधिकतर ऐसे स्राव में विशेष रूप से लाभकारी होता है जिसमें स्राव से सड़न जैसी बदबू आती है और रोगी को बराबर प्रलेपक ज्वर (हैक्टीक फीवर) बना रहता है। रोगों में बैलसमम पेरूवियेनम औषधि का प्रयोग 3 प्रकार से किया जाता है- 1. सेवन करना 2. लेप के रूप में और 3 स्टीम ऑटोमाइजर नामक यंत्र द्वारा धुंआ करके रोगी को सांस से ग्रहण कराना।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न होने वाले लक्षणों के आधार पर बैलसमम पेरूवियेनम औषधि का उपयोग :
1. नाक से संबन्धित लक्षण :
नाक से अधिक मात्रा में गाढ़े कफ की तरह स्राव होना, नाक में खुजली होना, नाक में छोटी-छोटी फुंसियां या घाव होना। अधिक पुराना नजला जिससे दुर्गन्ध आती हो। रोगी में उत्पन्न होने वाले ऐसे लक्षणों को ठीक करने के लिए बैलसमम पेरूवियेनम औषधि के प्रयोग करने से रोग समाप्त होता है।
2. सांस रोग (निमोनिया, थाइसिस और बांक्डाइटि) से संबन्धित लक्षण :
रोगी के फेफड़े से अधिक बदबूदार पीले या हरे रंग की गाढ़ी पीव या मक्खन की तरह सफेद बलगम निकलना। रोगी को बुखार होने के साथ बड़बड़ाने की इच्छा करना और रात को पसीना अधिक आना। ऐसे लक्षणों में रोगी को बैलसमम पेरूवियेनम औषधि का सेवन कराना लाभकारी होता है।
3. खांसी से संबन्धित लक्षण :
रोगी को खांसी के साथ बलगम आता है और कभी-कभी खांसते समय बलगम के साथ खायी हुई पदार्थ की उल्टियां हो जाती है। रोगी के अन्दर से श्लेष्मा सरल और घड़-घड़ आवाजें निकलती रहती है। इन लक्षणों में बैलसमम पेरूवियेनम औषधि का सेवन कराने से रोग ठीक होता है।
3. मूत्र रोग से संबन्धित लक्षण :
रोगी को कम मात्रा में पेशाब आता है तथा पेशाब के साथ सफेद रंग का पदार्थ निकलना या मूत्राशय का प्रतिश्याय आदि पेशाब से संबन्धित लक्षण दिखाई देने पर रोगी को बैलसमम पेरूवियेनम औषधि का सेवन कराने से रोग जल्द ठीक होता है।
4. आमाशय से संबन्धित लक्षण :
पुरानी पेचिश अर्थात मल के साथ खून का आना तथा मल से तेज बदबूदार पीव और अधिक मात्रा में आंव आने पर रोगी को बैलसमम पेरूवियेनम औषधि सेवन करानी चाहिए। इससे आमाशय रोगग्रस्त होने पर उत्पन्न होने वाले अन्य लक्षण दूर होकर रोग ठीक होते हैं।
5. त्वचा रोग से संबन्धित लक्षण :
शरीर पर किसी भी कारण से बनने वाले घाव या पुराने सर्दी जुकाम से संबन्धित लक्षण उत्पन्न होने पर बैलसमम पेरूवियेनम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। किसी भी प्रकार के चर्म रोग, एक्जिमा के कारण त्वचा पर घाव बनना और उस घाव से बदबूदार गाढ़ा मवाद निकलना आदि लक्षण उत्पन्न होने पर बैलसमम पेरूवियेनम का प्रयोग लाभकारी होता है। त्वचा पर सूखी या तर खुजली होने पर बैलसमम पेरूवियेनम औषधि का प्रयोग किया जाता है।
6. स्तन रोग से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी स्त्री के स्तन की घुण्डी में घाव हो गया हो तो बैलसमम पेरूवियेनम औषधि के 15 बूंद देने से घाव ठीक होता है।
तुलना :
बैलसमम पेरूवियेनम की तुलना बालसमम टोलूटैनम और ओलियम कैरियोफीलम औषधि से की जाती है।
मात्रा :
बैलसमम पेरूवियेनम के 2x या 3 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। परन्तु प्रलेपक ज्वर होने पर बैलसमम पेरूवियेनम के 6ग देना चाहिए।
अन्य रोगों में बैलसमम पेरूवियेनम का उपयोग :
सामान्य रूप से उत्पन्न होने वाले रोग जैसे- मण्दरोही घावों, खुजली, स्तनों के निपल फटने पर, त्वचा का फटने आदि रोगों में बैलसमम पेरूवियेनम औषधि का प्रयोग करने से यह त्वचा की शक्ति को बढ़ाकर रोग को ठीक करती है। यह कर्णाकुर को बढ़ाती है और बदबू को खत्म करती है।
सांस से संबन्धित रोगों में पिचकारी द्वारा 1 प्रतिशत सुरासार या ईथर के घोल का प्रयोग किया जा सकता है। पुरानी सांस नली की सूजन में बैलसमम पेरूवियेनम औषधि का उपयोग करने से सूजन ठीक होती है और कफ को खत्म करती है। इस रोग में बैलसमम पेरूवियेनम औषधि की मात्रा 5 से 15 बूंदे गोंद के पानी या अण्डे की सफेदी में मिलाकर देने से लाभ मिलता है।
बैप्टीशिया (जंगली नील) Baptisia (Wild indigo)
बैप्टीशिया औषधि के सेवन से रोगी के शरीर में ऐसे लक्षण उत्पन्न होते हैं, जो लक्षण रोगों से संबन्धित होते हैं। इसके सेवन से रोगी व्यक्ति में हल्का बुखार आना, खून दूषित होने के कारण उत्पन्न रोग, मलेरिया तथा महावसाद (एक्सट्रेम प्रोस्ट्रेशन) आदि लक्षणों को पैदा कर उस रोग को ठीक करता है। बैप्टीशिया के उपयोग से अवर्णनीय रोग अनुभव होना बंद हो जाता है। इसके अतिरिक्त पेशियों में तेज दर्द और सड़ाव के लक्षण हमेशा मौजूद रहने पर, रोगी व्यक्ति के सांसों से, मल से, पेशाब, पसीना आदि से दुर्गन्ध आने पर बैप्टीशिया औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। महामारी के रूप में फैलने वाला इनफ्लूएंजा (हैजा) तथा बच्चों के आन्तों में मल के सड़ने से पैदा होने वाले विष जिसके कारण मल और डकारों से बदबू आती हो ऐसे में बैप्टीशिया औषधि के सेवन से मल साफ होकर रोग ठीक होता है।
बैप्टीशिया का प्रयोग टाइफाइड ज्वर में अधिक लाभकारी है। यदि बैप्टीशिया का प्रयोग टाइफाइड ज्वर के समय ही उसके लक्षणों के अनुसार किया जाए तो रोग समय से पहले ही समाप्त हो जाता है। ऐलोपैथिक चिकित्सक के अनुसार रोग का समय पूरा न होने पर रोगी पूरी तरह से ठीक नहीं हो पाता है, परन्तु होम्योपैथिक चिकित्सक के अनुसार होम्योपैथिक चिकित्सा से रोग का प्रभाव घटकर रोग ठीक हो जाता है। टाइफाइड ज्वर, निमोनिया, हूपिंग कफ, कुकर खांसी आदि रोग होने पर उसकी चिकित्सा रोग के लक्षणों के आधार पर की जाती है। वैज्ञानिक चिकित्सा द्वारा रोग को दूर करने वाले सभी चिकित्सा कितने भी प्रभावकारी क्यों न हो परन्तु वे एक बात पर कभी स्थिर नहीं रहते हैं। किसी रोग को ठीक करने के लिए प्रयोग किये जाने वाले चिकित्सा से रोग तो ठीक होते हैं परन्तु कुछ साल बाद वही रोग अन्य रोग के रूप में उत्पन्न हो जाते हैं। होम्योपैथिक चिकित्सा विज्ञान का कहना है कि ऐलोपैथिक चिकित्सा विज्ञान उन्नति कर रहा है, परन्तु अभी तक सफलता के अन्त तक नहीं पहुंच पाया है। अभी तक वे खोज में ही लगे हैं। अत: उन सबको असत्य, अवैज्ञानिक और आनुमानिक समस्या के अतिरिक्त और क्या कहा जा सकता है। होम्योपैथिक चिकित्सा पद्धति के अनुसार बड़े-बड़े रोगों में सही चिकित्सा करने में भूल होने और औषधि प्रयोग के फल से भयंकर अनिष्ट होते देख कर ही होमियोपैथिक चिकित्सकों ने कहा था कि काम के अनुसार ही मनुष्य का जीवन-मरण निश्चित होता है। आनुमानिक ज्ञान द्वारा रोगी की चिकित्सा करना किसी तरह से लाभकारी नहीं है। रोग की चिकित्सा के लिए होमियोपैथिक एक तरफ आसान चिकित्सा पद्धति है तो दूसरी ओर रोगों के लक्षणों का पूरा ज्ञान न होने, लक्षण विचार और तदनुसार औषधि व्यवस्था वैसा ही कठिन है। अत: रोगों को दूर करने के लिए सिर्फ लक्षण ही चिकित्सा का मूल आधार है।
शरीर के विभिन्न अंगों के लक्षणों के आधार पर फेरम आयोडेटम औषधि का उपयोग-
टाइफायड ज्वर :
टाइफायड ज्वर में रोगी के पूरे शरीर में चोट लगने जैसा दर्द अनुभव होता है तथा रोगी को पहले ठण्डक का अनुभव होता है और धीरे-धीरे रोगी व्यक्ति के पूरे शरीर में, मस्तिष्क, कमर और हाथ-पांव में ऐंठन सा दर्द अनुभव होने लगता है। इसके बाद रोगी व्यक्ति दिन प्रतिदिन कमजोर होता चला जाता है और साथ ही रोगी को अधिक नींद आने लगती है। रोगी व्यक्ति के चेहरे पर निराशा रहती है, चेतना शक्ति इतना कम हो जाती है कि कुछ पूछने पर जवाब देने से पहले ही सो जाता है या घबराहट के मारे बेहोश हो जाता है। रोगी व्यक्ति के जीभ के अगले भाग पर सफेद रंग का मैल जमा हो जाता है, जो पीला या भूरे रंग का होता है। रोग अधिक बढ़ जाने पर रोग का लक्षण बिल्कुल साफ हो जाता है। रोगी अपने बिस्तर पर बार-बार करवटें लेता रहता है और उसे देखने से ऐसा प्रतीत होता है मानो वह कोई चीज इकट्ठा कर रहा है। रोगी को ऐसा महसूस होता है जैसे उसके शरीर के सभी अंग बिस्तर पर इधर-उधर फैल गया हो और वह उसे एकत्रित करने की कोशिश करता है। इस तरह रोग में अनुभव होने से रोगी को नींद नहीं आती। रोगी के पेट में गड़-गड़ की आवाज होना, पेट के नीचे और जांघों के बीच दर्द अनुभव होना। दर्द वाले स्थान पर दबाने से अन्दर बज-बज की आवाज आना और फिर पतले दस्त होना। मल और मूत्र से बदबू आना। टाइफायड बुखार में उत्पन्न होने वाले इन सभी लक्षणों में बैप्टीशिया औषधि का प्रयोग किया जाता है। इससे रोगी में उत्पन्न लक्षण समाप्त होकर रोग ठीक होता है।
मानसिक रोग :
मानसिक रोग से ग्रस्त रोगी का मन हमेशा भ्रमित रहता है। रोगी व्यक्ति सोचने व समझने में असमर्थ रहता है। किसी बातों का फैसला करने में असमर्थ रहना, मन का भटकते रहना, मन में ऐसी भावना पैदा होना कि जैसे शरीर कई भागों में बंट गया है। मन में ऐसे विचार आना कि उसका शरीर टूट गया है या दोहरा हो गया है। रोगी व्यक्ति के मन में टूटे हुए अंगों को इकट्ठा करने का विचार करना और बार-बार करवटें लेना। रोगी व्यक्ति का रोना, भटकाव, बड़बड़ाना, बातें करते-करते नींद आ जाना तथा विषाद के साथ गहरी नींद का आना आदि मानसिक रोगों में बैप्टीशिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे मानसिक संतुलन बना रहता है और रोग ठीक होता है।
सिर रोग :
सिर के रोगों में रोगी व्यक्ति हमेशा भ्रमित रहता है, उसे ऐसा महसूस होता है मानों वह पानी में तैर रहा है। रोग में चक्कर आना, नाक की जड़ में दबाव अनुभव होना, माथे की त्वचा में खिंचाव महसूस होना तथा सिर के पीछे की ओर भी खिंचाव महसूस होना। सिर का भारी होना तथा सुन्नपन जैसा लगना। आंखों के गोलक में दर्द होना तथा मस्तिष्क में दर्द महसूस होना। तेज नींद का आना, बाते करते-करते सो जाना तथा टाइफायेड ज्वर के शुरू में ही सुनाई न देना और पलकें भारी हो जाना आदि सिर रोग के लक्षणों में बैप्टीशिया औषधि का उपयोग करना लाभकारी होता है तथा रोग में जल्द आराम मिलता है।
चेहरे रोग :
रोग में अनिमेष दृष्टि (बेसोट्टेड लूक)। चेहरे का रंग गहरा लाल हो जाना, नाक की जड़ में दर्द होना और जबड़े में पेशियां कठोर हो जाना आदि चेहरे के रोग के लक्षण है। ऐसे बैप्टीशिया औषधि के सेवन से रोग ठीक होता है।
मुंह के रोग :
इस रोग में रोगी व्यक्ति का मुंह कड़वा हो जाता है तथा दान्त और मसूढ़ों में दर्द रहता है। मसूढ़ों व मुंह में घाव हो जाते हैं। रोगी व्यक्ति के सांसों से बदबू आती रहती है। रोगी को जीभ पर ऐसा महसूस होता है मानो उसकी जीभ जल गई हो। जीभ पीली व कत्थई रंग की हो जाना, जीभ के किनारे लाल और चमकदार होना, मध्य भाग में सूखी और कत्थई रंग की साथ ही किनारे सूखे और चमकदार तथा तल कटा-फटा और उसमें दर्द होना। भोजन आदि करने पर दर्द होना तथा घुटन सी महसूस होना आदि मुंख रोग के लक्षणों में बैप्टीशिया औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे मुंह के दर्द और घाव व छाले आदि भर जाते हैं।
गले का रोग :
गले के रोग होने पर गलतुण्डिका (टॉन्सिल) रोग के कारण कोमल तालु में गहरी लाली पड़ जाती है। आहार नली सिकुड़ जाती है। भोजन करने में परेशानी व दर्द होता है। गले में खराश होने पर दर्द होता है और साथ ही बदबूदार द्रव्य का स्राव होता है। हृदय के पास सिकुड़न महसूस होता है। इस तरह के गले से संबन्धित लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बैप्टीशिया औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
आमाशय :
आमाशय रोगग्रस्त होने पर रोगी व्यक्ति को भोजन निगलने में दर्द होता है तथा ग्रासनली में ऐंठन होने के कारण उल्टियां हो जाती है। आमाशय में पैदा होने वाले दूषित विकारों के कारण रोगी को बुखार आ जाता। रोगी व्यक्ति को भूख नहीं लगती है तथा प्यास अधिक लगने लगता है। आमाशय की कमजोरी तथा पाचनतंत्र में दर्द तथा आमाशय में ठोस पदार्थ अनुभव होता है। शराब या बीयर पीने से रोग बढ़ जाता है। हृदय अधिक सिकुड़ जाता है और आमाशय तथा आंतों के घाव में सूजन पैदा हो जाती है। आमाशय से संबन्धित ऐसे लक्षण उत्पन्न होने पर रोग को ठीक करने के लिए रोगी को बैप्टिशिय औषधि का सेवन करना चाहिए। बैप्टिशिय औषधि के सेवन से दर्द, घाव व बुखार आदि में जल्द लाभ मिलता है।
पेट रोग :
पेट रोगग्रस्त होने पर रोग से दांया भाग अधिक प्रभावित होता है जिसके कारण पेट फूल जाता है और पेट में गड़-गड़ाहट रहती है। पित्ताशय प्रदेश के ऊपर भाग में दर्द होता है और दस्त लगते हैं। रोगी व्यक्ति का दस्त पतला, गहरे रंग का तथा दस्त के साथ बदबूदार खून स्राव होता है। जिगर व पेट के आस-पास दर्द होता है और दस्त के साथ आंव(सफेद रंग का चिकना पदार्थ) आता। पेट के इस रोग में बैप्टीशिया औषधि का सेवन अधिक लाभकारी होता है। इससे पेट के सभी विकार दूर होते हैं और दर्द आदि समाप्त होता है।
स्त्री रोग :
स्त्रियों में होने वाले रोगों में बैप्टीशिया औषधि का उपयोग लाभकारी होता है, जैसे- हिस्टिरिया रोग, चोट लगना या रात को जागने के कारण बुखार होना। गर्भस्राव होने पर बैप्टीशिया औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। मासिक धर्म का समय से पहले अत्याधिक मात्रा में आना। सूति स्राव तीखा और दुर्गन्धित रहना। प्रसूति ज्वर होना आदि स्त्री रोग में बैप्टीशिया औषधि लाभकारी है।
सांस संस्थान :
सांस रोग के लक्षण जैसे- फेफड़ों में खिंचाव जैसा अनुभव होना। सांस लेने में परेशानी, खुले स्थान पर सोने की इच्छा करना तथा कमरे आदि में घुटन महसूस होना। रोगी को डरावने स्वप्ने और भय के कारण नींद न आना। छाती में दर्द व सिकुड़ापन या खिंचाव महसूस करना आदि सांस रोग के लक्षणों में बैप्टिशिय औषधि का सेवन करने से यह सभी लक्षणों को समाप्त कर रोग को ठीक करता है।
शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित लक्षण :
गर्दन में थकावट या भारीपन महसूस होना। शरीर में अकड़न और दर्द रहना। बाजूओं और टांगों में दर्द और खिंचाव। त्रिकास्थि, नितम्बों और टांगों के आस-पास दर्द होना। रोगी को ऐसा अनुभव होना मानों किसी ने शरीर को कुचल दिया हो। अधिक देर लेटने से पीठ में दर्द व जख्म हो जाना। बाहर अंगों में उत्पन्न होने वाले ऐसे लक्षणों में बैप्टिशिय औषधि का सेवन करना चाहिए। इस औषधि के सेवन से अंगों की थकावट व दर्द आदि दूर होते हैं।
अनिद्रा रोग :
इस रोग में रोगी को नींद नहीं आती और वह हमेशा बेचैन रहता है। रात को डर अधिक लगता है और सोने पर डरावने सपने आते हैं। रोगी को ऐसा महसूस होना मानो उसका शरीर टुकड़े-टुकड़े हो गये हो और बिस्तर पर बिखरा हो। बोलते-बोलते सो जाना आदि अनिद्रा रोग के लक्षण है। अत: ऐसे रोगों में बैप्टिशिय औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
त्वचा रोग :
त्वचा रोग में पूरे शरीर व हाथ-पैरों पर नीले रंग के दाग पड़ जाते हैं। रोगी को त्वचा पर जलन होती है और त्वचा में गर्मी अनुभव होती है। शरीर के किसी अंग पर होने वाले सड़े-गले घाव तथा नींद का अधिक आना, हल्की बड़बड़ाहट और त्वचा का सुन्न पड़ जाना आदि त्वचा रोग के लक्षण है। त्वचा से सम्बंधित इन लक्षणों में बैप्टिशिया औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे जलन, दर्द व दाग आदि जल्द ठीक होते हैं।
बुखार :
बुखार के विभिन्न लक्षणों जैसे- बुखार होने पर रोगी को सर्दी लगना, पूरे शरीर में आमवाती दर्द व थकान बना रहना। पूरे शरीर में गर्मी महसूस होने के साथ-साथ बीच-बीच में ठण्ड भी लगना। दोपहर से पहले लगभग 11 बजे तक ठण्डी का असर रहना। कमजोरी के कारण पैदा होने वाला बुखार, टाइफायड ज्वर तथा सामुद्रिक ज्वर आदि में बैप्टीशिया औषधि का सेवन लाभकारी होता है।
वृद्धि :
नमोदार गर्मी, कोहरे तथा घर के अन्दर रोग बढ़ता है।
तुलना :
बैप्टीशिया औषधि की तुलना आर्सेनिक´ से की जाती है। ऐलान्थस में बैप्टिशिय के अपेक्षा अधिक शक्ति पायी जाती है।
प्रतिविष :
टाइफायड और टाइफस ज्वर में आर्सेनिक औषधि के सेवन से हानि होने पर बैप्टीशिया औषधि का सेवन करने से उसका असर समाप्त हो जाता है और रोग में आराम मिलता है।
मात्रा :
बैप्टीशिया 12 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है। बैप्टीशिया औषधि का प्रभाव रोगों पर धीरे-धीरे होता है। अत: इसका प्रयोग रोग में कई बार किया जा सकता है।
बैरोज्मा केनैटा (बूचू) BAROSMA CRENATA (Buchu)
बैरोज्मा केनैटा औषधि का प्रयोग मुख्य रूप से प्रजनन और मूत्र संस्थान तथा पीब के रंग वाले श्लेष्मा निकलना (म्युकोप्युरुलेंट डीसचार्जेस) पर किया जाता है, जिससे रोग में जल्दी लाभ मिलता है। बैरोज्मा केनैटा औषधि का प्रयोग मूत्र की उत्तेजना के अतिरिक्त पेशाब के साथ सफेद पदार्थ का आना (विसीकल कैटर्रे), पुर:स्थिग्रन्थिपरक रोग(प्रोस्टैटीक डीसकोर्डरस) तथा पथरी व प्रदर रोग में किया जाता है।
बैरोज्मा केनैटा औषधि की तुलना-
बैरोज्मा केनैटा औषधि की तुलना कोपेवा, थूजा, पॉपूलस, चिमाफिला औषधि से किया जाता है।
मात्रा-
बैरोज्मा केनैटा औषधि के जड़ का रस अथवा इसके पत्तियों की चाय का सेवन किया जाता है।
बैराइटा असेटिका (ऐसीटेट ऑफ बेरियम) BARYTA ACETICA (Acetate of Barium)
बैराइटा असेटिका औषधि का प्रयोग पक्षाघात (लकवा) के रोग में किया जाता है। यह औषधि लकवा रोग के उस अवस्था को उत्पन्न कर उसे ठीक करता है जिसमें पक्षाघात पैरों से शुरू होकर ऊपर की ओर फैलता है। यह औषधि लकवा रोग में अत्यधिक लाभकारी है। बैराइटा असेटिका औषधि बुढ़ापे में होने वाले खाज में भी लाभकारी है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर बैराइटा असेटिका औषधि का उपयोग -
मन :
रोग के कारण रोगी को भूलने की आदत पड़ जाती है तथा रोगी में आत्मविश्वास की भारी कमी रहती है। इस रोग में रोगी अपने ही दो विचारों के जाल में हमेशा उलझा रहता है। ऐसे रोग में बैराइटा असेटिका का सेवन कराने से रोग ठीक होते हैं।
बाहरी अंग के रोग :
रोगी के बायें पैर में खिंचाव वाला दर्द अनुभव होता रहता है। त्वचा पर चींटियां रेंगने जैसा अनुभव होता रहता है तथा रोगी को गर्म सुई चुभोने जैसा दर्द होता है। इस तरह के लक्षणों में बैराइटा असेटिका का सेवन करना चाहिए।
पक्षाघात (लकवा) मार जाना, कमर दर्द तथा पेशियों व जोड़ों में आमवाती दर्द होने पर भी बैराइटा असेटिका का प्रयोग लाभकारी होता है।
मात्रा :
बैराइटा असेटिका दूसरी और तीसरी शक्ति का चूर्ण को बार-बार दिया जा सकता है।
बैराइटा कार्बोनिका BARYTA CARBONICA (Carbonate Of Baryta)
परिचय-
बैराइटा कार्बोनिका औषधि का प्रयोग बचपन और बुढ़ापे के समय उत्पन्न होने वाले रोगों को ठीक करने के लिए किया जाता है। बैराइटा कार्बोनिका औषधि बच्चों में होने वाले कंठमाला रोग को ठीक करता है। बैराइटा कार्बोनिका औषधि विशेष रूप से उन बच्चों में लाभकारी होती है जिन बच्चों का मानसिक एवं शारीरिक विकास सही से न हो रहा हो।
बैराइटा कार्बोनिका औषधि का प्रयोग कण्डमालापरक रोग तथा नेत्राभिश्यन्द (स्क्रोफ्युलोस ओप्रथाल्मिया) आदि से ग्रस्त होने पर किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग पेट की सूजन, अकारण उत्पन्न होने वाली सर्दी-जुकाम के कारण गलतुण्डिकायें (टोन्सिलस) हमेशा सूजा हुआ रहने पर किया जाता है। बैराइटा कार्बोनिका औषधि का प्रयोग बुढ़ापे के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों में तथा अपजननात्मक परिवर्तन (डीजेनरेटीव चैन्ज) शुरू होने पर किया जाता है, चाहे यह परिवर्तन हृदय संबन्धी हो या बाहिकाओं संबन्धी अथवा मस्तिष्क संबन्धी सभी में लाभकारी होता है।
पुर:स्थ ग्रन्थियां बढ़ने अथवा अण्डकोष का कठोर होना, रोगी को ठण्ड अधिक लगना, पैरों में तेज बदबूदार पसीना आना तथा रोगी में कमजोरी एवं शारीरिक थकान रहना आदि रोगों में बैराइटा कार्बोनिका औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है। जिन रोगियों को खड़ा होने तथा झुकने में कठिनाई होती है। रोगी अधिक देर तक लेटे रहता है और बिना सहारे के उठ भी नहीं सकता। रोगी को किसी दूसरे से मिलने में घबराहट महसूस होती है तो ऐसे लक्षण वाले रोगी को बैराइटा कार्बोनिका औषधि देना लाभकारी होता है। नाक के पिछले छिद्र से नजला निकलना तथा बार-बार नाक से खून का आना आदि में भी यह औषधि लाभकारी है।
नवयुवकों में होने वाले मन्दाग्नि (पांचन तंत्र का खराब होना) में बैराइटा कार्बोनिका औषधि का सेवन अधिक लाभकारी होता है। ऐसे युवक जिन्हें हस्तमैथुन करने की आदत पड़ गई हो तथा वीर्यपात (सेमीनल इमेशन) होने की शिकायत रहती हो साथ ही हृदय क्षोभ (कारकीएक एरीटेबीलिटी) और धड़कन बढ़ने जैसी अवस्था बनी रहती हो तो बैराइटा कार्बोनिका का प्रयोग करने से इस तरह के रोग ठीक हो जाते हैं।
बैराइटा कार्बोनिका औषधि ग्रन्थियों की बनावट को प्रभावित करती है और सर्वांगीण अपजननात्मक परिवर्तनों विशेष रूप से धमनी की झिल्लियों, धमनी विस्फर (एन्युरीज्म) तथा बुढ़ापे में लाभकारी होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों के लक्षणों के आधार पर बैराइटा कार्बोनिका औषधि का उपयोग :-
1. मन से सम्बंधित लक्षण :
रोगियों की स्मरण शक्ति समाप्त होने लगती है, सोचने व समझने की शक्ति खत्म होने लगती है तथा रोगी में आत्मविश्वास की कमी हो जाती है। ऐसे मानसिक लक्षण वाले रोगी को बैराइटा कार्बोनिका औषधि देना चाहिए।
इसके अतिरिक्त बुढ़ापे के समय उत्पन्न होने वाली मानसिक कमजोरी। मन भ्रमित रहना। घबराना तथा अधिक लज्जाशील (बेसफुल)। दूसरों से मिलने में परेशानी। बच्चों की तरह व्यवहार करना। छोटी-छोटी बातों पर उदास रहने लगना आदि मानसिक लक्षणों में बैराइटा कार्बोनिका औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे मानसिक विचारों में परिवर्तन होता है और रोग ठीक होते हैं।
2. सिर से सम्बंधित लक्षण :
अचानक सिर चकराना। अधिक गर्मी के कारण या धूप में निकलने से सिर में दर्द तेज सुई चुभन की तरह उत्पन्न होने के साथ ही दर्द सिर के आर-पार फैलता हुआ महसूस होना। मस्तिष्क में ढीलापन महसूस होना। बालों का झड़ना। भ्रमित होना तथा मांस की गांठें बनना। इस तरह के सिर रोग के लक्षणों में बैराइटा कार्बोनिका औषधि का सेवन करने से रोग ठीक होते हैं।
3. आंखों से सम्बंधित लक्षण :
जिन रोगी के आंखों की पुतली अधिक फैल गई हो या सिकुड़न हो गई हो तो उसे यह औषधि देने से लाभ होता है। प्रकाश भीति (फोटोफोबिया) अर्थात तेज रोशनी बर्दाश्त न कर पाना। आंखों के आगे जालीदार झिल्ली छाना तथा मोतियाबिन्दु का रोग होना। इन लक्षणों में रोगी को बैराइटा कार्बोनिका औषधि देना चाहिए। इससे रोग ठीक होते हैं।
4. कान :
कान से संबन्धित रोग जैसे- ऊंचा सुनाई देना या बहरापन। आवाज खराब व कड़ा हो जाना। कान के आस-पास वाली ग्रन्थियों में दर्द और सूजन आ जाना। नाक साफ करने से कानों के अन्दर थरथराहट होना आदि में बैराइटा कार्बोनिका औषधि का सेवन करने से रोग ठीक होता है।
5. नाक :
सर्दी-जुकाम होना, नाक में खुश्की होना, छींके अधिक आना, ऊपर होंठ और नाक की सूजन आदि में बैराइटा कार्बोनिका औषधि का सेवन करना चाहिए।
इसके अतिरिक्त नाक के अन्दर धुंएं जैसा अनुभव होना, नाक से गाढ़े पीला बलगम निकलना, नाक से बार-बार खून आना तथा नथुनों के आस-पास पपड़ीदार फुंसियां होना आदि लक्षणों में रोगी को बैराइटा कार्बोनिका औषधि का सेवन करना लाभदायक होता है।
6. चेहरे :
रोग के कारण चेहरा पीला तथा फूला हुआ रहना। चेहरे पर मकड़ी का जाला अनुभव होना तथा ऊपर के होंठ में सूजन आ जाना आदि चेहरे के रोग को दूर करने के लिए बैराइटा कार्बोनिका का सेवन करना चाहिए। इससे रोग ठीक होते है और चेहरे की चमक बनी रहती है।
7. मुंख :
मुंह रोगग्रस्त होने पर रोगी में कई प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते हैं, जैसे- सोकर उठने पर मुंह सूखा होना तथा मसूड़ों से खून का आना। दांतों का अलग-अलग हो जाना आदि में बैराइटा कार्बोनिका का सेवन करने से लाभ मिलता है। मुंह जलने से मुंह में फफोलें पड़ना तथा मुंह का स्वाद खराब होना। जीभ का सुन्न पड़ जाना। नाक के अगले भाग पर टीस मारता हुआ तथा जलनयुक्त दर्द। सुबह सोकर उठने पर मुंह से लार टपकना। भोजन करने पर ग्रासनली में ऐंठन वाला दर्द होना। स्त्री के मासिक धर्म से पहले दांतों में दर्द होना। इस तरह मुंह रोगग्रस्त होने पर उत्पन्न लक्षणों में रोगी को बैराइटा कार्बोनिका औषधि का सेवन कराएं।
8. गले का रोग :
बैराइटा कार्बोनिका औषधि का प्रयोग अधोहनुगन्थियां (सबमेक्सीलंरी ग्लैंडस) और गले की ग्रन्थियां की सूजन को दूर करने के लिए किया जा सकता है। यदि किसी रोगी को बराबर सर्दी-जुकाम होने के साथ चुभन व चीस मारता हुआ दर्द होता है तो उसे बैराइटा कार्बोनिका का सेवन करना चाहिए।
सर्दी के कारण गलतुण्डिका के सूजन में पीब का भर जाना तथा गलतुण्डिका में जलन होने के साथ ही शिराओं का सूज जाना। भोजन आदि करते समय भोजन निगलने पर टीस मारता हुआ दर्द होना तथा ग्रासनली में भोजन पहुंचने पर ऐंठन सा दर्द होना जिससे घुटन जैसा महसूस होना। तथा ग्रसनी (फैरींक्स) के अन्दर डाट लग जाने जैसा दर्द होना। अधिक बोलने से गले में दर्द होना। गलतुण्डिका, ग्रसनी या स्वरयन्त्र में डंक लगने जैसा दर्द होना। गले रोग से संबन्धित ऐसे लक्षणों वाले रोगियों को बैराइटा कार्बोनिका औषधि देने से रोग ठीक होता है।
9. आमाशय रोग :
आमाशय रोगग्रस्त होने पर रोगी को ऐसा महसूस होना मानो पेट में कोई पत्थर रखा हो, रोगी को मुंखप्रेशक (वाटरब्रस), हिचकी व डकारें आने पर रोग में आराम व हल्कापन महसूस होता है आदि लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को बैराइटा कार्बोनिका औषधि सेवन कराना चाहिए।
आमाशय रोग में कभी-कभी रोगी में ऐसे लक्षण उत्पन्न होते है जिसमें रोगी को भूख तो लगती है परन्तु रोगी भोजन नहीं कर पाता क्योंकि भोजन करने के तुरन्त बाद ही दर्द होने लगता है। इस तरह के आमाशय के रोग में बैराइटा कार्बोनिका का सेवन करना चाहिए। रोगी को अधजठरीय स्पर्शकतार (एपीगैस्टीक टेंडेर्नेस) होना तथा गर्म भोजन करने पर दर्द होना। बूढ़े व्यक्ति में यह रोग होने पर पाचन दुर्बलता के साथ होने वाले रोग क्रियाशील रहता है। ऐसे में रोगी को बैराइटा कार्बोनिका औषधि देना चाहिए।
10. पेट रोग :
इस रोग में स्पर्शकतार कठोर और फूला हुआ। बिजली की तरह तेज दर्द होना। आंत्र योजनी ग्रन्थियां (मेसेन्टरीक ग्लैंडस) बढ़ी हुई। भोजन निगलने में परेशानी होना तथा भोजन करने के तुरन्त बाद ही तेज दर्द होना भूख लगने पर भी भोजन न करना आदि पेट रोग के लक्षणों में बैराइटा कार्बोनिका औषधि लाभकारी होती है।
11. मल से सम्बंधित लक्षण :
कभी-कभी मल सूखकर कठोर हो जाता है जिसके कारण मल त्याग करने में परेशानी होती है। मल त्याग पूर्ण रूप से न होने पर धीरे-धीरे कब्ज बनने लगता है। कब्ज के कारण पेट में गैस बनने लगती है जिसके कारण बवासीर रोग उत्पन्न होता है। बवासीर रोग में गुदाद्वार पर मस्से निकल आते हैं जो मल त्याग करते समय फूट जाता है और उससे खून निकलने लगता है। इस रोग के कारण मल त्याग करने में और अधिक परेशानी होती है। मल रोग में पेट में सुरसुराहट जैसी आवाज आती है और हल्की गुदगुदी होती रहती है। मलद्वार से रिसव होता रहता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को बैराइटा कार्बोनिका औषधि देना चाहिए।
12. मूत्र रोग से सम्बंधित लक्षण :
मूत्र रोग के कारण पेशाब में जलन होना और पेशाब का बार-बार आने पर बैराइटा कार्बोनिका औषधि का सेवन करने से लाभ होता है।
13. पुरुष रोग से सम्बंधित लक्षण :
सम्भोग करते समय जल्दी वीर्यपात होना। नपुंसकता। सम्भोग की इच्छा न होना। पुर:स्थ ग्रन्थि का बढ़ जाना तथा अण्डकोष कठोर हो जाना आदि पुरुष रोग में बैराइटा कार्बोनिका औषधि का सेवन करने से नपुंसकता व अन्य रोग समाप्त होता है।
14. स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :
मासिक धर्म आने से पहले पेट में और कमर में दर्द होने तथा मासिक धर्म कम मात्रा में आने पर बैराइटा कार्बोनिका औषधि का सेवन करें। इससे मासिक धर्म बिना किसी परेशानी के सही समय पर तथा उचित मात्रा में आता है।
15. सांस रोग :
सूखी खांसी आने तथा घुटन सा महसूस होना। छाती में कफ का भरना। कफ को निकालने में परेशानी। मौसम परिवर्तन के कारण खांसी का बढ़ जाना। स्वरयन्त्र में ऐसी अनुभूति होना जैसे धुएं में सांस ले रहा हो। आवाज का खराब हो जाना। छाती में सुई चुभन जैसा दर्द होना तथा सांस लेने पर दर्द का बढ़ जाना। फेफड़े जैसे धुएं से भरे हुए हो। इस तरह के सांस संबन्धी रोगों में बैराइटा कार्बोनिका औषधि को सेवन करने से अत्यन्त लाभ होता है। यह सांस संबन्धी रोगों को दूर करते हैं।
16. हृदय रोग :
धड़कन और हृदय में बेचैनी वाला दर्द होना। धमनी विस्फार। हृदय की धड़कन का बढ़ जाना तथा खून के दबाव में वृद्धि होना। रक्तवाहिनियों का सिकुड़ जाना। बांई करवट लेटते ही धड़कन की गति बढ़ जाना। नाड़ी भरी हुई और कठोर तथा पैरों का पसीना रुकने से उत्पन्न होने वाले हृदय रोग। हृदय रोग से संबन्धित इन लक्षणों में बैराइटा कार्बोनिका औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
17. पीठ रोग :
बैराइटा कार्बोनिका औषधि का प्रयोग पीठ रोग जैसे- गर्दन की ग्रन्थियां फूल जाना है और गर्दन के आस-पास वसार्बुद (फैट्टीमोरस) होना है। कंधों के बीच दर्द होना और त्रिकास्थि में अकड़न होना, मेरुदण्ड में कमजोरी आ जाना आदि लक्षणों में यह औषधि लाभकारी होती है।
18. शरीर के बाहरी अंगों से सम्बंधित रोग :
पैरों से पसीना आना तथा पैर हमेशा ठण्डे व चिपचिपे रहना। कक्षा की ग्रन्थियों (एक्सील्लरी ग्लैण्डस) में दर्द होना। हाथ-पैरों में सुन्नता और घुटनों से अण्डकोष तक सुन्नता का अनुभव होना तथा बैठने पर सुन्नपन समाप्त होना। पैरों की उंगुलियों और तलुवों में दर्द होना। चलते समय तलुवों में दर्द होना। निचले अंगों के जोड़ों में दर्द होना और जलन होना आदि शरीर के बाहरी लक्षणों में बैराइटा कार्बोनिका औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे रोग ठीक होता है।
19. नींद :
नींद में बड़बड़ाना। सोते-सोते अचानक जाग उठना। अधिक गर्मी महसूस करना तथा नींद में ही स्फुरण (टेइचिंग) होना आदि लक्षणों में बैराइटा कार्बोनिका औषधि का करना चाहिए।
वृद्धि :
औषधि के गुणों के बारे में सोचते समय, मुंह-हाथ धोने से तथा करवट लेने से रोग बढता है।
शमन :
खुली हवा में टहलने से रोग में आराम मिलता है।
तुलना :
बैराइटा कार्बोनिका औषधि की तुलना डिजिटैलिस, रेडियम, ऐरागैलस, आक्सीट्रापिस और ऐस्ट्रागैलस से किया जाता है।
पूरक :
डल्कामारा, सिलीका और सोराइनम औषधि बैराइटा कार्बोनिका औषधि का पूरक है।
शक्तिनाशक :
कल्के औषधि के सेवन करने से हानि होने पर उसके विष को काटने के लिए इप्सम साल्ट औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।
मात्रा :
बैराइटा कार्बोनिका औषधि के 3 से 30 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। 30 शक्ति बार-बार उत्पन्न होने वाले गलतुण्डिकाशोथ में लाभकारी होता है। बैराइटा कार्बोनिका औषधि को रोगों पर धीरे-धीरे प्रभाव पड़ता है। अत: इसकी मात्रा को दोहराया जा सकता है।
बैराइटा आयोडेटा BARYTA IODATA (IODIDE OF BARYTA)
बैराइटा आयोडेटा औषधि का प्रयोग गले से संबन्धित रोगों में अधिक किया जाता है। यह औषधि लसीका प्रणाली (लाइफेथिक सिस्टम) पर अपनी प्रतिक्रिया कर खून में सफेद कोशिकाओं की संख्या को बढ़ाती है। बैराइटा आयोडेटा औषधि गले के अन्य रोग जैसे गलतुण्डिका व गलक्षत को ठीक करता है। ग्रिन्थयां कठोर होना मुख्य रूप से गले की ग्रन्थियां और स्तन कठोर होने पर बैराइटा आयोडेटा औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। गर्दन की ग्रिन्थयां फूल जाने तथा रोगी का शारीरिक व मानसिक विकास रुक जाने पर भी इस औषधि के प्रयोग करने से आयोडेटा की कमी दूर हो शारीर व मस्तिष्क का सही विकास होता है। बैराइटा आयोडेटा औषधि का प्रयोग आंखों में दर्द होने पर भी करना लाभकारी होता है।
अण्डकोष की पुरानी सूजन तथा अण्डकोष का कठोर होना आदि रोगों में बैराइटा आयोडेटा औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है। यह औषधि गले के रोगों को दूर कर शरीरिक और मानसिक विकास करता है।
तुलना :
बैराइटा आयोडेटा औषधि की तुलना एकोनाइट, लाइकोटोनम, लेपिस, कॉनियम, मर्क्यू आयोड और कार्बो ऐनि से किया जाता है।
मात्रा :
बैराइटा आयोडेटा औषधि 2 और 3 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
बैराइटा म्यूरिएटिका BARYTA MURIATICA (BARIUM CHORIDE)
बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का उपयोग बूढ़े व्यक्तियों में जैवी विक्षतियों (औरगैनिक लेसंस) तथा मानसिक एवं शारीरिक दोनों प्रकार के विकारों को दूर करने के लिए किया जाता है। बुढ़ापे में उत्पन्न होने वाले धमनी की कठोरता एवं मस्तिष्क संबन्धी रोग में भी बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह बुढ़ापे में होने वाले सिर दर्द, सिर का भारीपन, मस्तिष्क में खून की कमी के कारण चक्कर आना और कानों में आवाज सुनाई देना आदि लक्षणों में भी बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का उपयोग किया जाता है। बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का प्रयोग पोषण नली (एलीमेंट्री केनल) के लिए किया जाता है जिसका प्रभाव मुख्य रूप से मलाशय, पेशियों और जोड़ों पर पड़ता। इससे शारीरिक कमजोरी और शरीर की अकड़न दूर होती है। इस औषधि के प्रयोग से शरीर में सफेद रक्तकणों की वृद्धि होती है और वाहिका प्रजनन (वेस्कुलर डीजनरेशन) ठीक रहता है। यह औषधि नाड़ियों में उत्पन्न होने वाले तनाव को दूर करती है। यह औषधि उच्च प्रकुंचन दबाव के अनुपात में निम्न अनुशिथिलन तनाव के साथ मानसिक तथा हृदय संबन्धी लक्षणों में लाभकारी होता है। बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि अनेक प्रकार के रोग जैसे पाचन क्रिया ठीक करना, दस्त का अधिक आना, उल्टी, मिचली, ओकाई, पेट में दर्द आदि में प्रयोग किया जाता है।
बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि में हृदयद्वार की कठोरता एवं सिकुड़न को दूर करने की शक्ति पाई जाती है। यह भोजन करने के तुरन्त बाद हृदय में उत्पन्न होने वाले दर्द को दूर करता है। पेट स्पर्शकतार हो जाता है। बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का प्रयोग धमनी विस्फार तथा गलतुण्डिका के जीर्ण विवर्धन में भी लाभकारी होता है।
जननेन्द्रिय रोग :
स्त्री और पुरुष दोनों में अधिक कामवासना उत्पन्न होने पर भी इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह आक्षेप तथा पागलपन की ऐसी अवस्था जिसमें सम्भोग की इच्छा बनी रहती है और आत्महत्या की भावना पैदा होती है। आरिगेनम, प्रसूति के लिए प्लैटि तथा पुरुष को ऐसिड पिक्रि, कैन्थर व शराबियों की तरह लक्षण पैदा होता है। इस तरह के स्त्री-पुरुष रोगों में बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे कामवासना दूर होती है।
पक्षाघात(लकवा) से सम्बंधित लक्षण :
पक्षाघात की ऐसी स्थिति जिसमें शरीर बर्फ की तरह ठण्डा हो जाता है। इस तरह के पक्षाघात में बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का प्रयोग पक्षाघात को ठीक करता है। यह औषधि मस्तिष्क और मेरूदण्ड की कठोरता तथा पेशियों की शक्ति कम हो जाती है। इन्फ्लुएंजा और डिफ्थीरिया के बाद आंशिक पक्षाघात, सुबह के समय सुस्ती, हाथ-पैरों में कमजोरी, पेशियों में अकड़न आदि में भी बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का सेवन करना चाहिए।
जिस बच्चे को मुंह खोलकर हर समय रहने की आदत हो उसे भी यह औषधि दी जा सकती है। बुद्धिहीन तथा बहरेपन में भी यह औषधि लाभकारी है।
कान रोग से सम्बंधित लक्षण :
कानों में भिनभिनाहट, किसी चीज को चबाते या निगलते समय या छींकते समय कानों में आवाज होना। कानों का ऐसा दर्द जो ठण्डे पानी पीने से ठीक हो जाता हो। कान के जड़ में सूजन आ जाना तथा कानों से बदबूदार पीब का निकलना। नाक साफ करने से कान के बीच का भाग फैल जाना आदि कानों के रोगों में बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का प्रयोग करें। इससे कान के सभी रोग ठीक होते हैं।
गले का रोग :
गले के रोग से ग्रस्त होने पर भोजन निगलने में परेशानी होती है। गले की ग्रिन्थयां सूज जाती है तथा कम्बुकर्णी नलियों में सुन्नता अनुभव होना साथ ही छींकें और कानों में आवाजें आना। ऐसा महसूस होना मानो गले की नली अधिक फैल गई हो। इस तरह के गले के रोग में बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का सेवन करना चाहिए।
श्वास रोग से सम्बंधित लक्षण :
बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का प्रयोग सांस रोग में किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग बुढ़ापे में सांस नली में उत्पन्न सूजन तथा हृदय के फैल जाने से होने वाली परेशानी में किया जाता है। यह औषधि फेफड़ों में जमी हुई बलगम को निकालता है। हृदय की नाड़ियों में कठोरता को दूर करने में किया जाता है। यह बुढ़ापे के कारण सांस रोग में धमनियों के तनाव को कम करता है।
आमाशय रोग :
आमाशय रोग के कारण अधिजठर में खालीपन महसूस होना। उबकाई और वमन आना तथा सिर की ओर चढ़ती हुई गर्मी का अनुभव होना आदि आमाशय रोग में बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का प्रयोग सावधानी के साथ किया जा सकता है।
मूत्र रोग :
पेशाब में यूरिक एसिड की मात्रा बढ़ जाती है तथा क्लोराइड पदार्थ कम हो जाता है। मूत्र रोग में बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि का सेवन करें।
पेट के रोग :
पेट के विभिन्न रोग जैसे जलन, क्लोमगन्थि की कठोरता, पेट की धमनियों का फैल जाना, वक्षण ग्रन्थियों की सूजन तथा मलाशय में आक्षेपयुक्त दर्द आदि में बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि के सेवन से लाभ मिलता है।
तुलना :
बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि की तुलना प्लम्बम आयोड, औरम म्यूरि से किया जाता है।
मात्रा :
बैराइटा म्यूरिएटिका 3x या 200 शक्ति सेवन किया जा सकता है। यह औषधि रोगों में धीरे-धीरे असर करती है। अत: इसकी मात्रा को दोहराया जा सकता है।
सावधानी :
बैराइटा म्यूरिएटिका औषधि को मात्रा से अधिक सेवन करने पर रोगी में कुबड़ापन आ सकता है। इस औषधि से शरीर में सफेद रक्तकण बढ़ता है। अत: इसके अधिक सेवन से चेहरा सफेद सा हो जाता है।
बेलाडौना BELLADONNA
बेलाडौना औषधि का प्रयोग करने से इस औषधि का प्रभाव मुख्य रूप से स्नायुतन्त्र पर पड़ता है जिसके कारण सक्रिय रक्तसंकुलता, तेज उत्तेजना, ज्ञानेन्द्रियों की विशिष्ट क्रिया का पलट जाना, स्फुरण, लकवा और दर्द जैसी शांत लक्षणों को उत्पन्न कर उससे संबन्धित रोगों को जड़ से समाप्त करता है। बेलाडौना औषधि के सेवन करने से शरीर पर औषधि भिन्न प्रतिक्रिया कर विभिन्न प्रकार के लक्षणों, जैसे- शरीर गर्म रहना, त्वचा लाल होना, तमतमाता हुआ चेहरा, चमकदार आंखें, गर्दन की नाड़ियों में जलन, मन में उत्साह, सभी ज्ञानेन्द्रियों की शक्ति का बढ़ जाना, शोकग्रस्त, नींद का अधिक आना, बेहोशी की स्थितियां (कोनव्युल्सीव मुवमेन्टस), मुंह और गले की खुश्की के साथ पानी पीने से घृणा, अचानक आने व जाने वाला तंत्रिकाओं का दर्द (न्युरेलरीक पैन) तथा जलन आदि लक्षणों को ठीक करता है।
मिर्गी के दौरों के बाद मितली आना और उल्टी होना आदि क्रिया में बेलाडौना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
आरक्त ज्वर के लिए बेलाडौना औषधि सबसे अधिक लाभकारी होती है। इस रोग में बेलाडौना औषधि 30 शक्ति की मात्रा का सेवन करना चाहिए।
इस औषधि का प्रयोग हवाई यात्रा के समय होने वाले अनेक शिकायतों में लाभकारी है। यह औषधि भय, अधीरता और प्यास का अधिक लगना कम करता है।
अचानक उत्पन्न होने वाले किसी रोग में तेज दर्द के लिए भी यह अधिक लाभकारी औषधि है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न होने वाले लक्षणों के आधार पर बेलाडौना औषधि का उपयोग :
1. मन से संबन्धित लक्षण :
मानसिक रोग से ग्रस्त रोगी अपने ही विचारों के विभिन्न रूपों में भटकटा रहता है। रोगी को अनेक प्रकार के स्वप्न आते हैं और अनेक प्रकार की चीजें दिखाई देती हैं तथा रोगी को अपने वस्तविकता के कोई ज्ञान नहीं रह जाता। मानसिक रोगी अपने अनेक विचारो में ही उलझकर चिन्तन करता रहता है। मन के कुछ ऐसे विचार भी उत्पन्न होते हैं जिसके कारण रोगी भयभीत और घबराया हुआ रहता है। मानसिक रोग से ग्रस्त रोगी को भूतप्रेत और भयानक चेहरे, प्रलाप, भय लगना, इच्छा के विरूद्ध उत्पन्न आकृतियां दिखाई देना, अधिक गुस्सा आना, दूसरे को मार डालने जैसी इच्छा पैदा होना तथा भागने जैसी मनोभावना बनी रहना आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी को बेलाडौना औषधि का सेवन कराना चाहिए। इस औषधि के प्रयोग से रोगी का भय दूर होता है तथा अनचाहे रूप से दिखाई देने वाली आकृति का आना समाप्त हो जाता है। मानसिक रोग में यदि रोगी को अचेतन की स्थिति बनती रहती है तथा ज्ञानशक्ति का पलट जाने के साथ आंखों में आंसू आ जाना आदि मानसिक अवस्था के लक्षण उत्पन्न होते हैं तो रोगी को बेलाडौना औषधि का सेवन कराने से लाभ मिलता है। इस औषधि के सेवन से मानसिक रोग में उत्पन्न होने वाले सभी लक्षण दूर होते हैं।
2. सिर रोग से संबन्धित लक्षण :
सिर से संबन्धित लक्षणों में बेलाडौना औषधि का सेवन अत्यधिक लाभकारी माना गया है। इस औषधि के सेवन से सिर से संबन्धित विभिन्न लक्षण, जैसे- सिर में चक्कर आने के साथ ही सिर के बाईं ओर या पीछे की ओर गिरने जैसा महसूस होना। त्वचा पर हल्का छूने से दर्द होना। शरीर में जलन व गर्मी होने के साथ ही हृदय धड़कने से सिर दर्द का अनुभव होना जिससे सांस लेने में परेशानी होती है। इन लक्षणों में से कोई भी लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को बेलाडौना औषधि का सेवन करना चाहिए।
सिर के अन्य लक्षण जैसे सर्दी-जुकाम रूकने से या अन्य कारणों से उत्पन्न होने वाला सिरदर्द। धूप में निकलने व दोपहर के बाद बढ़ने वाला सिर दर्द तथा ऐसे सिर दर्द जो शोरगुल, झटका लगना तथा लेटने के कारण भी बढ़ जाता है। सिर को दबाने से या झुकने से सिर दर्द कम हो जाता है। सिर दर्द होने पर रोगी सिर को तकिये के अन्दर रखता है, सिर पीछे की ओर खिंच जाता है और बार-बार इधर-उधर लुढ़कता रहता है। रोगी हमेशा गहरी सांस भरता रहता है, बाल बिखर जाते हैं, खुश्क रहते तथा झड़ते हैं। सिर दर्द दाईं ओर अधिक होता रहता है और लेटने पर बढ़ जाता है। सर्दी लगने तथा बाल आदि कटवाने पर भी सिर दर्द होता रहता है। इस तरह के सिर रोग से संबन्धित लक्षणों में से कोई भी लक्षण उत्पन्न होने पर उस लक्षणों से ग्रस्त रोगी को बेलाडौना औषधि का सेवन कराना चाहिए। बेलाडौना औषधि के प्रयोग से सिर से संबन्धित सभी प्रकार के लक्षण दूर होते हैं।
3. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी व्यक्ति का चेहरा लाल, नीला लाल, गर्म, सूजा हुआ तथा चमकदार हो गया है। चेहरे की पेशियों में सुन्नता आ गई है, ऊपर वाला होंठ सूजा हुआ है, चेहरे के स्नायुओं में दर्द रहता है तथा स्फुरणशील पेशियां हैं तो इस तरह के चेहरे से संबन्धित लक्षणों में बेलाडौना औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
4. आंखों से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी व्यक्ति को लेटने से आंखों की गहराई में जलन होती है। नेत्रपटल फैल गया है। आंखों की सूजन और आंखें बाहर की ओर फैली हुई महसूस हो, आंखें स्थिर हो गई हो, चमकदार, श्वेतपटल लाल और खुश्क हो गया है और उसमें जलन होती है। तेज रोशनी बर्दाश्त न कर पाता है तथा आंखों में गोली लगने जैसा दर्द होता। नेत्रोत्सेध (एक्सोफ्थालम्युस) आंखों का वह रोग जिसमें आंखें बाहर निकल आती है। सोने पर अनेक प्रकार की आकृति दिखाई देती हैं। अंग गिरते हुए दिखाई देता है। आंखों के ऐसे लक्षण जिसमें व्यक्ति को सामान्य से अधिक वस्तु दिखाई देती हैं। तिर्येकदृष्टि (स्क्वाइटींग), पलकों की ऐंठन। आंखें बंद करने पर भी आंखें अधखुले जैसा लगना। पलकों की सूजन तथा आंखों के निचले भाग में खून का जमाव होना आदि आंखों से संबन्धित रोगों में बेलाडौना औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे आंखों के सभी रोग दूर होते हैं और आंखों में ठण्डक व मन में शान्ति का अनुभव होता है।
5. कानों से संबन्धित लक्षण :
कान से संबन्धित विभिन्न लक्षण जैसे- कान के बीच भाग में और बाहर चीरने-फाड़ने जैसा दर्द होना। कानों में भिनभिनाहट जैसी आवाज सुनाई देना। कान की झिल्ली फूल जाना और खून का जमाव होना। कान के निचली ग्रन्थियों में सूजन आ जाना जिसके कारण ऊंची आवाज सुनाई न देना। सुनने की शक्ति बढ़ जाना। कान के बीच में सूजन होना। तेज दर्द के कारण रोने की स्थिति बन जाना। बच्चे में कान रोग से संबन्धित लक्षण उत्पन्न होने पर बच्चे सोते-सोते ही अचानक दर्द के कारण जाग उठता है। कान के अन्दर जलन व स्पन्दनशील दर्द होना जो हृदय की धड़कन से सम्पर्क रखता है। कान का फोड़ा जिसमें खून भरा रहता है। कान की नली की नयी या पुराने रोग उत्पन्न होने पर। अपनी आवाज अपने कानों में गुंजते रहते रहने जैसा लक्षण। इस तरह के कान से संबन्धित लक्षणों से कोई भी लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को बेलाडौना औषधि देना चाहिए। बेलाडौना औषधि के प्रयोग से कान से संबन्धित उत्पन्न होने वाले सभी लक्षण समाप्त होते हैं और साथ ही कान के स्राव, सूजन, दर्द तथा अन्य कानों के आन्तरिक रोग भी ठीक होते हैं।
6. नाक से संबन्धित लक्षण :
नाक की नोक में सुरसुराहट होना। नाक से होने वाले स्राव में दुर्गंध आना। नाक सूजकर लाल हो जाना। नकसीर अर्थात नाक में निकलने वाली छोटी-छोटी फुसिंयों के फूट जाने के साथ ही दर्द से चेहरा लाल हो जाना। तेज जुकाम और नाक से निकलने वाले द्रव्य में खून का मिला होना आदि नाक से संबन्धित लक्षणों में से किसी भी लक्षण से ग्रस्त रोगी को बेलाडौना औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे नाक के रोग ठीक होते हैं तथा दर्द आदि कम होता है।
7. मुंख से संबन्धित लक्षण :
मुंह में खुश्की होने के साथ दांतों में जलनयुक्त दर्द होना। मसूढ़ों में फोड़ा होना तथा जीभ के किनारे लाल दिखाई देना। जीभ पर झरबेर की रंगत के छोटे-छोटे लाल दाने निकल आना। दांतों में सबसबाहट होने के कारण दांतों को पीसना, जीभ का सूज जाना आदि मुंह से संबन्धित लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को बेलाडौना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
8. गले से संबन्धित लक्षण :
किसी कारण से गला बिल्कुल सूख जाना और गले में पानी की कमी महसूस होना। अत्याधिक रक्तसंकुलता (कोनगेशन) अर्थात खून का एकत्रित होना। गले का रंग लाल होना दायीं ओर अधिक लाल होना।
किसी कारण से गलतुण्डिकायें अर्थात गले की ग्रन्थि का बढ़ जाना। गले में घुटन महसूस होना। भोजन आदि निगलने में परेशानी होना। गले में कुछ फंसने जैसा अनुभव होना। आहार नली सूखा महसूस होना तथा गले का सिकुड़ा हुआ महसूस होना।
गले में ऐंठन सा दर्द होना। बार-बार निगलने की आदत बन जाना तथा ऐसा महसूस होना मानो गला खरोंचा जा रहा है।
इस तरह के गले लक्षणों से ग्रस्त रोगी को बेलाडौना औषधि का सेवन कराना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग में जल्द आराम मिलता है।
9. आमाशय से संबन्धित लक्षण :
आमाशय का रोग ग्रस्त होने से भूख का न लगना। मांस और दूध से मन का भटक जाना। ऐंठन वाला दर्द होना। आमाशय का सिकुड़ जाना तथा आमाशय से उत्पन्न होने वाले दर्द का रीढ़ की हड्डी तक फैल जाना। रोग में मितली और उल्टी की इच्छा बना रहना। प्यास का अधिक लगना विशेषकर ठण्डे पानी को पीने की इच्छा अधिक करना। आमाशय में ऐंठन से दर्द होना, सूखी उबकाइयां, तरल पदार्थो से घृणा तथा बेहोश पैदा करने वाली हिचकी का आना। पानी से डरना तथा उल्टी होने पर बिना रुके उल्टी करना। इस तरह के आमाशय से संबन्धित लक्षणों से ग्रस्त रोगी को बेलाडौना औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे आमाशय से संबन्धित सभी रोग ठीक होते हैं।
10. मल रोग से संबन्धित लक्षण :
पतला दस्त आना, हरे रंग का दस्त आना दस्त में आंव का आना आदि मल रोग में बेलाडौना औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है। शौच करते समय सर्दी लगना। मलाशय में डंक मारने जैसा दर्द होना तथा ऐंठन वाला दर्द होना। मल रुकने से गैस बनना तथा गैस के कारण बवासीर रोग उत्पन्न होना तथा कमर दर्द होना आदि मल रोग में बेलाडौना औषधि का प्रयोग करना लाभकारी है। इससे बवासीर में होने वाले मस्से सूख जाते हैं और कब्ज आदि भी दूर होता है। गुदा का चिर जाना (प्रोलेप्सस एनी) आदि में भी बेलाडौना औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
11. मूत्र रोग से संबन्धित लक्षण :
मूत्र रोग से संबन्धित लक्षण जैसे- पेशाब रुक जाना अथवा मूत्र नली में होने वाले अन्य रोग। पेशाब नली में कीड़ा रेंगने जैसा महसूस होना। पेशाब का कम मात्रा में आना तथा कूथने की आदत बन जाना। पेशाब का रंग गहरा, फास्फेट से भरपूर होना। मूत्राशय वाले भाग स्पर्शकातर होना। पेशाब का बार-बार आना या पेशाब का बूंद-बूंद कर आना। पेशाब बार-बार और अधिक मात्रा में आना। पेशाब से खून का आना। पुर:स्थग्रन्थियां बढ़ जाना आदि लक्षण। इस तरह के लक्षण जिन व्यक्तियों में उत्पन्न होता है उसे बेलाडौना औषधि का सेवन करना चाहिए।
12. पुरुष रोग के लक्षण :
अण्डकोष का कठोर होने के साथ अण्डकोष में खिंचाव और जलन उत्पन्न होना। जननांगों पर रात को अधिक पसीना आना। पुर:स्थ द्रव्य(प्रोस्टैटीक फ्ल्युइड) बहना। संभोग की इच्छा कम हो जाना। इस तरह के पुरुषों में उत्पन्न होने वाले लक्षणों में रोगी को बेलाडौना औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है। इस औषधि के प्रयोग से नपुंसकता दूर होती है और पुरुष शक्ति बढ़ती है।
13. स्त्री रोग के लक्षण :
स्त्रियों में होने वाले कुछ ऐसे रोग जिसमें शरीर के निचले अंगों में दबाव जैसा दर्द अन्तरंग जननांगों पर फैल जाते हैं तथा योनि सूखी और गर्म रहती है। जांघों के आर-पार खिंचाव होने जैसा दर्द होता। त्रिकास्थि में दर्द होता रहता है। मासिक धर्म संबन्धी परेशानी जैसे मासिक धर्म का अधिक मात्रा में आना, खून चमकता हुआ लाल रंग का आना, समय से पहले ही मासिक धर्म का अधिक मात्रा में आना तथा खून का गर्म रहना। एक नितम्ब से दूसरे नितम्ब तक काटता हुआ दर्द होना। मासिक धर्म और सूतिकास्राव के साथ गर्म व बदबूदार स्राव होना। अचानक उत्पन्न होने वाला प्रसव दर्द जो अपने आप समाप्त हो जाता है। स्तनों में जलन होना, जलन युक्त दर्द होना, रंगत लाल होना, एक स्तन से दूसरे स्तन तक लाल लकीरें बनना। स्तनों का भारी हो जाना और स्तनों कठोर व लाल रंग का हो जाना। स्तनों में गांठ होना (ट्युर्मस ऑफ ब्रैस्ट) होना तथा लेटने पर दर्द होना। रक्तस्राव अधिक बदबूदार, गर्म और तेजी से स्राव होना। सूतिकास्राव (लोकिया) की मात्रा कम होना। इस तरह के स्त्री रोग से संबन्धित लक्षणों में बेलाडौना औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। इससे मासिक धर्म संबन्धी सभी रोग दूर होते हैं और दर्द व अन्य स्त्री रोग भी ठीक होता है।
14. सांस संस्थान से संबन्धित लक्षण :
नाक में खुश्की होना, गलतोरणिका (फोसेस), स्वरयंत्र और सांस नली में खुश्की होना। गले में गुदगुदी के साथ सूखी खांसी आना जो रात को बढ़ जाती है तथा स्वरयंत्र में दर्द अनुभव होना। दम घुटने जैसा अनुभव होना तथा सांस क्रिया का बढ़ जाना। सांस रोग। आवाज कर्कश तथा आवाज का खराब होना। असहनीय दर्द वाला कर्कशता। खांसी के साथ बायें कूल्हे में दर्द होना। खांसी रुक-रुक कर आना, काली खांसी होने पर आमाशय में दर्द होना और बलगम के साथ खून आना। खांसते समय सुई चुभन जैसा दर्द होना। स्वरयंत्र में कुछ अटकने जैसा दर्द होना जिसके कारण खांसी उत्पन्न होना। तेज आवाज। सांस लेते व छोड़ते समय कराहना। सांस से संबन्धित इन लक्षणों में से कोई भी लक्षण से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बेलाडौना औषधि का सेवन कराना लाभकारी है। इससे सांस के सभी रोग व दर्द समाप्त होते हैं।
15. हृदय से संबन्धित लक्षण :
हृदय रोग के कारण धड़कन तेज रहती है और धड़कन की प्रतिक्रिया सिर में अनुभव होती है साथ ही रोगी को सांस लेने में कठिनाई महसूस होती है और हल्का काम करने पर भी धड़कन की गति बढ़ जाती है। रोगी व्यक्ति के पूरे शरीर में जलन वाला दर्द होता है। रोगी को दो हृदय की धड़कने सुनाई देती जो शरीर के किसी छिद्र से खून बहने का संकेत देती हैं। अचानक ऐसा लगता है मानो हृदय अधिक बढ़ गया है। नाड़ी की गति तेज होने के साथ उसमें कमजोरी आ जाना। हृदय से संबन्धित इन लक्षणों में रोगी को ठीक करने के लिए बेलाडौना औषधि का प्रयोग किया जाता है। इससे धड़कन की गति सामान्य होती है और रोग ठीक होता है।
16. बाहरी अंगों के लक्षण :
यदि किसी व्यक्ति को हाथ-पैरों में गोली लगने जैसे लक्षण वाले दर्द महसूस होते हैं। जोड़ों में सूजन आ जाती है, सूजन वाले स्थान चमकदार लाल रंग का हो जाता है और उस पर लाल रंग की लकीरें बन जाती हैं। रोगी व्यक्ति लड़खड़ाकर चलता है, चलने पर गठिया दर्द बढ़ जाता है। प्रसव के बाद जांघों के ऊपरी हिस्से में दर्द व जलन होता हो। सभी अंगों में झटका महसूस होता हो। अंगों में लकवा मार जाने जैसा महसूस होता है। लड़खड़ाने पर अपने आप को स्थिर होने में परेशानी तथा हाथ-पैरों का ठण्डा पड़ जाना। इस तरह के बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बेलाडौना औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इस औषधि के प्रयोग से अंगों का दर्द, जलन व कमजोरी आदि सभी लक्षण दूर होते हैं।
17. गर्दन से संबन्धित लक्षण :
गर्दन से संबन्धित विभिन्न लक्षण जैसे-गर्दन का अकड़ जाना। गर्दन की ग्रन्थियों में सूजन आ जाना। गर्दन के जोड़ों में ऐसा दर्द महसूस होना मानो किसी ने गर्दन तोड़ दिया हो। इस तरह के लक्षणों से ग्रस्त रोगी को बेलाडौना औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है।
18. कमर से संबन्धित लक्षण :
पीठ पर तेज दर्द होने के साथ कमर, कूल्हों व जांघों में दर्द होना आदि कमर रोगों में बेलाडौना औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
19. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
त्वचा में रूखापन और सूजन आ जाना, त्वचा छूने से दर्द होना, त्वचा में जलन होना, त्वचा के आरक्त दाने जो फैलता है। लाल रंग का रक्तिम दाग और चेहरे पर फुन्सियां। ग्रन्थियां सूजी में सूजना होना। लाल फोड़ें। गुलाबी मुंहासे तथा पीब युक्त घाव होना। त्वचा का रंग लाल और पीला होना तथा त्वचा पर जलन पैदा होकर उस स्थान को कठोर बना देना आदि त्वचा से सम्बंधित लक्षणों में बेलाडौना औषधि का प्रयोग लाभकारी है। इससे त्वचा से संबन्धित सभी रोग ठीक होते हैं।
20. बुखार(ज्वर) :
अत्यधिक बुखार होने के साथ बुखार में तेजी उत्पन्न होना और शरीर से दूषित द्रव्य का कम निकलना। पूरे शरीर में बुखार के कारण जलन, तीखी, तेज गर्मी का बनना। पैर बर्फ जैसा ठण्डा हो जाना। ऊपर की खून की नली तनी हुई होना। सिर को छोड़कर पूरे शरीर में तेज पसीना आना तथा बुखार के कारण प्यास अधिक लगना आदि बुखार होने पर बेलाडौना औषधि का सेवन किया जाना लाभकारी होता है।
21. नींद से संबन्धित लक्षण :
नींद न आने से बेचैनी बना रहना, सोते-सोते अचानक चिलाकर उठ बैठना और सोते हुए दांत किटकिटाना। रक्तवाहिकाओं में जलन के कारण नींद पूरी न होना और नींद में चिल्लाना। अनिद्रा रोग में परेशानी के बाद नींद आने पर नींद में ही चौंक पड़ना। हाथों को सिर के नीचे रखकर सोना आदि नींद से संबन्धित लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बेलाडौना औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। इससे अनिद्रा रोग में अधिक लाभ मिलता है। इससे नींद अच्छी आती है और नींद न आने से होने वाली थकावट दूर होती है।
वृद्धि :
रोगग्रस्त स्थान को छूने से, क्षेप और हवा लगने पर, शोरगुल, दोपहर के बाद तथा लेटने पर रोगी में बढ़ता है।
शमन :
झुकने से रोगी को आराम मिलता है।
तुलना :
बेलाडौना औषधि की तुलना सैग्वीसोरवा आफिसिनैलिस 2x 6x से किया जाता है। इसके अतिरिक्त मेण्ड्रेगोरा, स्ट्रामोनियम, होइट्जिया तथा एट्रोपिया से किया जाता है।
प्रतिविष :
बेलाडौना औषधि के प्रयोग करने में असावधानी के कारण यदि कोई हानि होती है तो उस हानि को रोकने के लिए कैम्फर, काफि, ओपियम और ऐकोनाइट औषधि का प्रयोग किया जाता है।
पूरक :
कल्केरिया औषधि बेलाडौना औषधि का पूरक औषधि है। यह अधिकतर कुछ दिन पुराने रोग तथा परम्परागत रूप से एक दूसरे से होने वाले रोगों में भी लाभकारी है।
मात्रा :
बेलाडौना औषधि के 1 से 3 शक्ति या उच्च शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है। किसी नये रोग के रोगी में बेलाडौना औषधि का प्रयोग बार-बार किया जा सकता है।
बेलिस पेरेनिस BELLIS PERENNIS
बेलिस पेरेनिस औषधि का प्रयोग करने से इसका विशेष प्रभाव रक्तवाहिकाओं की पेशियों पर पड़ता है। पेशियों में अधिक दर्द होने पर बेलिस पेरेनिस औषधि का सेवन करने से दर्द में आराम मिलता है। यह औषधि लंगड़ापन (लैमनेस) जैसे मोच आ गई हो तथा यांत्रिक कारणों से शिराओं में खून का जमा हो जाना आदि में लाभकारी होता है। ऑपरेशन के बाद गहराई में स्थिति ऊतकों को होने वाले हानि को ठीक करने के लिए विशेषतौर पर बेलिस पेरेनिस औषधि का प्रयोग किया जाता है। इस औषधि के प्रयोग से तन्त्रिकाओं में होने वाले हानि को रोकता है तथा तन्त्रिकाओं में हानि होने के कारण दर्द उत्पन्न तथा ठण्ड के प्रति संवेदनशीलता अर्थात पानी को शरीर पर रखने से ठण्डक अधिक महसूस होना आदि को दूर करता है। बेलिस पेरेनिस औषधि के सेवन से गठिया के बाद अंगों में आने वाली कमजोरी दूर होती है।
गोणिकांगों पर चोट तथा अपने आप लगने वाले चोट जैसी अवस्थाओं में बेलिस पेरेनिस औषधि का प्रयोग करके रोग को ठीक किया जा सकता है। हस्तमैथुन के कारण उत्पन्न रोग तथा मोच के कारण मोच वाले स्थान की त्वचा नीला रंग की हो जाने पर बेलिस पेरेनिस औषधि का सेवन लाभकारी होता है। जिस व्यक्ति का शरीर गर्म प्रकृति का हो उसे ठण्डे पानी पीने या नहाने या ठण्डी वस्तुओं का सेवन करने आदि कारणों से उत्पन्न होने वाले रोगों में बेलिस पेरेनिस औषधि का सेवन करना चाहिए।
चेहरे के मुंहासें (एक्ने)। शरीर पर फोड़े होना। गोणिकांगों (पैलवीक और्गेंस) पर ऐसा दर्द होना मानो किसी चीज से कुचल दिया हो। इस तरह के रोगों में बेलिस पेरेनिस औषधि का सेवन लाभकारी होता है। रिसाव (एक्सुडीयंस), रक्त संचार में बाधा और सूजन आदि में भी इस औषधि का उपयोग करना लाभकारी होता है। इस औषधि का प्रयोग गठिया के विभिन्न लक्षणों में प्रयोगकर रोग को ठीक किया जा सकता है। बेलिस पेरेनिस औषधि खून को साफ करता है। यह औषधि ऐसे व्यक्ति जो अधिक आयु के बाद भी काम करते रहते हैं, उन व्यक्तियों के लिए लाभकारी है।
शरीर के विभिन्न अंगों के लक्षणों के आधार पर बेलिस पेरेनिस औषधि का उपयोग :-
1. सिर से सम्बंधित लक्षण :
सिर रोग से संबन्धित लक्षण जैसे- पेट में अधिक गैस बनने के कारण सिर चकराना। सिर का ऐसा दर्द जिसमें दर्द सिर के पिछले भाग से शुरू होकर मस्तक तक फैल जाता है। रोगी को सिर सिकुड़ने जैसा महसूस होता रहता है। सिर में ऐसा दर्द होना मानो किसी ने सिर कुचल दिया है तथा कपाल के आस-पास और पीछे की ओर खुजली होती है जो नहाने तथा सोते समय और बढ़ जाता है। ऐसे सिर रोग के लक्षणों में रोगों को बेलिस पेरेनिस औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है। इस औषधि के प्रयोग से सभी प्रकार के सिर दर्द ठीक हो जाते हैं।
2. नींद से सम्बंधित लक्षण :
नींद का न आना, नींद न आने के कारण शारीरिक थकान बना रहना, सुबह जल्द उठ जाना और फिर उसके बाद नींद का न आना आदि नींद के रोगों में बेलिस पेरेनिस औषधि का प्रयोग करने से नींद रोग ठीक होते हैं।
3. पेट रोग से सम्बंधित लक्षण :
पेट में उत्पन्न होने वाले अनेक रोग जैसे- पेट की आंतरिक परतें तथा गर्भाशय की झिल्ली में दर्द होना। प्लीहा रोग जिसमें सुई की चुभन जैसा दर्द होने तथा प्लीहा का बढ़ना आदि लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बेलिस पेरेनिस औषधि प्रयोग करना चाहिए।
दस्त का अधिक आना, चेहरे का रंग पीला होना, पेट दर्द होना, शरीर से बदबू आना जो रात को बढ़ जाता है और पेट का फूल जाना व आंतों में गड़गड़ाहट रहना आदि रोगों में बेलिस पेरेनिस औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
4. त्वचा रोग से सम्बंधित लक्षण :
बेलिस पेरेनिस औषधि का प्रयोग त्वचा पर नीले रंग का दाग होना तथा त्वचा पर सूजन आ जाने पर करने से लाभ होता है। इसके अतिरिक्त त्वचा के अन्य रोग जैसे-शिरा विस्फार के साथ कुचलने जैसा दर्द अनुभव होना और साथ ही यांत्रिक कारणों से होने वाली शिराओं में खून का जमाव। रिसाव और सूजन आदि में बेलिस पेरेनिस औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।
5. बाहरी अंगों का रोग :
अंगों में तेज दर्द तथा पेशियों में दर्द होने पर बेलिस पेरेनिस औषधि का प्रयोग करने से रोगी ठीक होता है। पीठ व जांघों की पेशियों का सिकुड़ जाना और उस पर खुजली होना, जांघों के ऊपरी भागों में दर्द होना जो गहराई से उत्पन्न होता है। कलाई सिकुड़ापन महसूस होना। कलाई में खिंचाव अनुभव होना और ऐसा प्रतीत होना मानो कई लचकदार चीजें कलाई पर बांध दी गई हो। मोच आने पर तेज दर्द होना। किसी दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी पर आने वाले चोट व दर्द आदि लक्षण। इस तरह के लक्षणों में बेलिस पेरेनिस औषधि का प्रयोग करने से सभी प्रकार के दर्द से आराम मिलता है।
6. स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :
स्तनों और गर्भाशय की झिल्ली में खून का जमा होना। गर्भकालीन शिराओं का फैल जाना। गर्भकाल में कमजोरी के कारण चलने में कमजोरी महसूस होना, पेट की पेशियां का ढ़ीला पड़ जाना तथा गर्भाशय की झिल्ली में ऐसा दर्द होना मानो किसी न उसे भींच दिया हो। इस तरह के स्त्री रोगों में उत्पन्न होने वाले लक्षणों में बेलिस पेरेनिस औषधि का सेवन करना चाहिए।
तुलना :
बेलिस पेरेनिस औषधि की तुलना आर्सेनिक, आर्निका, स्टैफिसै, हैमामेलिस, ब्रायोनिया, वैनाढिडयम से किया जाता है। बेलिस पेरेनिस औषधि के न मिलने पर जल्द आराम के लिए इन औषधियों का प्रयोग किया जा सकता है।
वृद्धि :
बाईं ओर लेटने से, गर्म पानी से स्नान करने तथा बिस्तर की गर्मी के कारण रोग बढ़ता है। इसके अतिरिक्त तूफान से पहले, ठण्डे पानी से स्नान करने तथा ठण्डी हवा में घूमने से भी रोग बढ़ता है।
मात्रा :
बेलिस पेरेनिस औषधि के मूलार्क से 3 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
बेंजेनम-कोल नैफ्था (बेंजोल) BENZENUM COAL NAPHTHA
बेंजेनस-कोल नैफ्था औषधि का स्नायु प्रणाली पर विशेष प्रभाव पड़ता है। इस औषधि के प्रयोग से नाड़ी की रक्त धारा शिथिल पड़ जाती है। बेंजेनस-कोल नैफ्था औषधि की एक सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसके सेवन से शरीर में सफेद रक्तकणों की वृद्धि होती है। अत: जिस व्यक्ति के शरीर में सफेद रक्तकणों की मात्रा बढ़ गई हो उसे इस औषधि का सेवन नहीं करना चाहिए क्योंकि ऐसा करने से रोगी को भारी हानि हो सकती है। इसके अतिक्ति आंखों के विभिन्न रोग, मिर्गी के दौरे, मूर्च्छा और सुन्नता आदि रोग में बेंजेनस-कोल नैफ्था का प्रयोग लाभकरी होता है।
शरीर में उत्पन्न होने वाले अनेक रोगों में बेंजेनस-कोल नैफ्था का प्रयोग :-
1. सिर से संबन्धित लक्षण :
सिर रोगग्रस्त होने पर रोगी के सिर में चक्कर आता है तथा रोगी को ऐसा महसूस होता मानो वह गिर जाएगा। सिर में उत्पन्न होने वाले ऐसा दर्द जिसमें दर्द नीचे से उपर की ओर फैलता जाता है। थकान के कारण तथा स्नायविक थकान के कारण सिर दर्द होता रहता है। सिर का ऐसा दर्द जो नाक के जड़ तक फैल जाता है। सिर का चक्कर आना, सिर में दबाव महसूस होना। सिर के दाईं ओर दर्द होना आदि सिर रोगों में बेंजेनस-कोल नैफ्था औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है। इससे सिर में उत्पन्न होने वाले सभी रोगों में आराम मिलता है।
2. आंखों से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी रोगी को ठीक से दिखाई नहीं देता है या किसी वस्तु को देखने पर एक से अधिक दिखाई देता है। आंखों के अन्य रोग जैसे-पलकों का फड़कना, तेज रोशनी बर्दाश्त न कर पाना, धुंधला दिखाई देना। आंखों और पलकों में दर्द होना। नेत्रपटलों का अधिक फैल जाना। प्रकाश में देखने में परेशानी होना। इस तरह के आंखो रोगों से संबन्धित लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बेंजेनस-कोल नैफ्था का प्रयोग करना चाहिए।
3. नाक से संबन्धित लक्षण :
नाक से पानी का निकलना, तेज जुकाम के कारण सिर दर्द, नाक से नजला निकलना जो दोपहर के बाद अधिक हो जाता है। रोगी को अधिक छींके आना आदि नाक से संबन्धित रोगों में बेंजेनस-कोल नैफ्था का प्रयोग लाभकारी होता है।
4. पुरुष रोग से संबन्धित लक्षण :
दाएं अण्डकोष में सूजन होना। अण्डकोषों में तेज दर्द होना। अण्डकोष की खुजली तथा पेशाब अधिक मात्रा में आना आदि रोगों में बेंजेनस-कोल नैफ्था का प्रयोग करना लाभकारी होता है। इस औषधि के सेवन से अण्डकोष व अन्य पुरुष रोग ठीक होते हैं।
5. शरीर के बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षण :
हाथ-पैरों का भारी होना, पैरों का ठण्डा होना, घुटनों में झटकन आना, हाथों में नीचे से ऊपर की ओर चलने वाला दर्द होना आदि शरीर के बाहरी अंगों के लक्षणों वाले रोगी को ठीक करने के लिए बेंजेनस-कोल नैफ्था दें। इसका सेवन रोग में अत्यन्त लाभकारी होता है।
6. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
त्वचा के अनेक रोग जैसे- त्वचा में उत्पन्न होने वाला एक ऐसा रोग जिसमें फुन्सियां खसरे जैसे दानेदार होती हैं, बाईं करवट सोने से बाईं ओर और दाईं करवट सोने से दाईं ओर ही पसीना आना। पूरे पीठ पर खुजली उत्पन्न होती रहती है। ऐसे त्वचा से संबन्धित लक्षणों को ठीक करने के लिए बेंजेनस-कोल नैफ्था का प्रयोग लाभकारी होता है। इससे त्वचा के अन्य रोगों में भी लाभकारी प्रभाव पड़ता है।
वृद्धि :
रात को रोग बढ़ जाता है तथा दायें करवट सोने से रोग बढ़ जाता है।
तुलना :
बेंजेनस-कोल नैफ्था औषधि की तुलना बेन्जिन, पेट्रोलियम ईथर, औक्सीहेमोग्लोबीनीमिय, बेन्जिन डिनिट्रिकम से की जाती है।
मात्रा :
बेंजेनस-कोल नैफ्था 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
ब्रायोनिया एल्ब BRAYONIYA ALBA
ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग शरीर में उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के लक्षणों में किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग व्यक्ति के चेहरे पर उदासी तथा चिड़चिड़ापन आदि को दूर करने में किया जाता है। इसके अतिरिक्त वात रोग, गर्मी के मौसम में शरीर में सूखापन, ठण्डी हवा में निकलने तथा नमी वाले मौसम में निकलने से उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के शारीरिक रोगों से संबन्धित लक्षणों में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग अत्यन्त लाभकारी है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ब्रायोनिया एल्ब औषधि का उपयोग :-
1. सिर से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी रोगी के सिर में तेज दर्द होता है, शरीर में कफ की मात्रा अधिक बढ़ गई हो तथा सूखी खांसी के साथ दर्द होता हो तो ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करें।
यदि रोगी में ऐसे लक्षण उत्पन्न हो जिसमें रोगी को झुकने पर, गर्मी के मौसम में, खांसी आने पर तथा किसी प्रकार की शारीरिक हलचल होने पर सिर दर्द और तेज हो जाता है तो ऐसे में रोगी को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया एल्ब औषधि का सेवन करना चाहिए। यदि सिर में चक्कर आने साथ ही जी मिचलाना व बेहोशी का अनुभव हो तो ऐसे लक्षणों में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करें। यदि सिर में ऐसे लक्षण पैदा हो जिसमें आग के पास बैठने या हाथों से कोई कार्य करने पर सिर दर्द होता है तो रोगी को ब्रायोनिया एल्ब औषधि का सेवन करें। रोगी को अपने सिर फाड़ने जैसा दर्द महसूस होता रहता है। आंखें खोलने या बंद करने पर भी दर्द बढ़ जाता है तो ऐसे लक्षणों में ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग करें। यह सिर रोग के सभी लक्षणों में दूर करने में लाभकारी औषधि है। सिर में खून जमने से होने वाले सिर दर्द होने पर ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग करें।
2. मिचलने व उल्टी से संबन्धित लक्षण :
पानी या अन्य पेय पदार्थ पीते समय जी मिचलाने व सिर चकराने के साथ रोगी को सीधा बैठने में परेशानी होना आदि रोगों में ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग करें। खट्टी डकार के साथ कड़वी उल्टी होना। खाने के तुरन्त बाद उल्टी होना। पेट के निचले भाग में दबाव महसूस होना। अधिक डकारें आना जिसके कारण रोग में आराम मिलता हो तो ऐसे में रोगी को ब्रायोनिया एल्ब का सेवन कराने से रोग में लाभ मिलता है।
रोगी को प्यास अधिक लगती है, फिर भी रोगी पानी बार-बार नहीं पीता और जब पानी पीता है तो एक बार में एक गिलास पी लेता है। ऐसे लक्षणों में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करने से प्यास का अधिक लगना दूर होता है।
3. मुंह से संबन्धित लक्षण :
जीभ सूख जाने के साथ जीभ का पीला होना। होठों का सूख जाना आदि मुंह के रोगों में ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग लाभकारी होता है। इस औषधि का प्रयोग मुंह सूख जाने और अधिक प्यास लगने पर भी किया जाता है। यह औषधि मुंह का सूखापन और अधिक प्यास को दूर करती है।
4. आमाशय से संबन्धित लक्षण :
यदि आमाशय की थैली में चोट लगने जैसा दबाव महसूस हो तथा डकारें लेने पर दर्द से आराम मिलता हो तो आमाशय से संबन्धित ऐसे लक्षणों में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करें। आंत की ऊपरी झिल्ली में जलन और डंक मारने जैसा दर्द अनुभव होने पर ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग करने से लाभ होता है।
5. स्त्री रोग से संबन्धित लक्षण :
मासिक धर्म समय से पहले आना तथा मासिक धर्म के साथ-साथ नाक से भी खून बहने पर ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है। कालिमायुक्त पानी सा प्रदरस्राव आने पर ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है। कभी-कभी स्त्रियों में मासिक धर्म के समय मासिक धर्म न आकर नाक से खून निकलने लगता है। ऐसे मासिक धर्म संबन्धी परेशानी में ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग करने से मासिक धर्म की परेशानी दूर होती है। मासिक धर्म बंद हो जाने पर ब्रायोनिया एल्ब औषधि का सेवन करने से मासिक धर्म समय से तथा उचित मात्रा में आना शुरू हो जाती है। मासिक धर्म के समय पैरों में चीरने-फाड़ने जैसी पीड़ा होना जो शारीरिक हरकत होने पर और बढ़ जाता है। प्रसूतिका स्राव का दब जाने पर स्राव को शुरू करने के लिए ब्रायोनिया एल्ब औषधि का सेवन करें।
यदि किसी स्त्री के स्तन भारी होने के साथ स्तन कठोर व पीले रंग का हो गये हो तथा स्तनों को छूने से गर्मी महसूस होने के साथ उसमें दर्द होता हो तो स्तनों में उत्पन्न होने वाले ऐसे लक्षणों को दूर करने के लिए ब्रायोनिया एल्ब औषधि लाभकारी है। दूध पिलाने वाली स्त्री का दूध दब जाने से स्त्री में बुखार आ जाता है जैसे लक्षण में भी इस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
6. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
त्वचा पर तेलिय, चिपचिपा तथा खट्टा पसीना आना आदि त्वचा रोगों में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करें।
7. जिगर से संबन्धित लक्षण :
यदि जिगर में जलन तथा डंक मारने जैसा दर्द होता हो जो हल्के से शारीरिक हरकत होने पर और बढ़ जाता है तो ऐसे लक्षणों में रोगी को ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग करना चाहिए। जिगर प्रदेश में कातर करने वाले तथा जलन भरे दर्द होने पर और जिगर बढ़ जाना तथा जिगर में दर्द होने पर रोगी को ब्रायोनिया एल्ब का सेवन कराएं।
8. छाती से संबन्धित लक्षण :
छाती में दबावयुक्त दर्द होना। तरल संचय के कारण फुफ्फुस आवरक की झिल्ली की जलन। फुफ्फुस आवरक झिल्ली के संक्रमण विशेषकर काली खांसी के कारण रिसाव होना आदि लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करें।
9. बुखार से संबन्धित लक्षण :
टाइफायड ज्वर में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करने से टाइफायड ज्वर ठीक होता है। रोग में रुक-रुक कर आने वाले बुखार, इस बुखार में रोगी को पहले अपने होठों, उंगुलियों व अंगूठे पर ठण्डक महसूस होती है और बुखार उत्पन्न होता है। इस तरह के लक्षणों वाले बुखार को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करें। इससे बुखार में जल्द आराम मिलता है।
10. जोड़ों से संबन्धित लक्षण :
जोड़ों का दर्द जो छूने या शरीर की अन्य हलचल से बढ़ जाता है तथा दर्द वाले स्थान पर पीले रंग की सूजन आ जाती है। शरीर में खिंचाव के साथ वात दर्द होना तथा जोड़ों में कड़ापन आ जाना आदि जोड़ों के लक्षणों में ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग लाभकारी माना गया है। जोड़ों, मांसपेशियों और शरीर के अन्दरूनी अंगों में चुनचुनाहट या झनझनाहट और डंक मारने की तरह दर्द उत्पन्न होने पर इस औषधि का प्रयोग करें। इस औषधि के प्रयोग से अंगों में होने वाली जलन आदि भी दूर होती है। इसके अतिरिक्त हड्डियों में कुचलन जैसे दर्दो में भी इस औषधि का प्रयोग किये जाते हैं।
11. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
चेहरा नीला पड़ जाना आदि रोगों में इस औषधि के प्रयोग से विशेष लाभ मिलता है।
12. मन से संबन्धित लक्षण :
रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ापन होने के साथ अधिक गुस्सा आना आदि मानसिक लक्षणों से पीड़ित रोगी को ब्रायोनिया एल्ब का सेवन कराएं। इससे गुस्सा शांत होने के साथ रोगी में सहनशीलता आती है। यदि रोगी में अधिक दु:ख की भावना रहती है तथा रोगी अपने मन में किसी तरह के दु:खों को दबाकर रखता है जिसके कारण शारीरिक रूप वह बीमार पड़ता हो तो लक्षणों में रोगी को ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग करना चाहिए। मानसिक रोग के कारण रोगी के मन में ऐसी वस्तुओं को पाने की इच्छा होती रहती है जिसे वह पा नहीं सकता और जब उस रोगी को उसकी मन पसन्द वस्तु दी जाती है तो वह उस वस्तु को लेने से इंकार कर देता है। रोगी को अपनी इच्छाओं का वास्तविक ज्ञान न होने के कारण ही रोगी में ऐसे स्वभाव पैदा होता है। अत: रोगी में उत्पन्न ऐसे लक्षणों में ब्रायोनिया एल्ब का सेवन कराएं। इससे रोगी का स्वभाव परिवर्तन होता है और रोगी को अपनी इच्छाओं के बारे में फैसला करने की शक्ति उत्पन्न होती है।
रोगी में ऐसी भावना पैदा होना मानो वह गुम हो गया है और अपने घर जाने की इच्छा करता है। रोगी बच्चों को गोद में लेना या घुमाना पसन्द नहीं करता तथा रोगी में हमेशा चिड़चिड़ापन रहता है। इस तरह के मानसिक रोगी को ब्रायोनिया एल्ब दें। इसकी औषधि के प्रयोग से अधिक गुस्सा का आना कम होता है।
13. मल से संबन्धित लक्षण :
दस्त अधिक आने पर ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग लाभकारी है। गर्मी के कारण यदि दस्त अधिक लगता हो और गुदाद्वार में दस्त के समय दर्द हो रहा हो तो ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग करने से दस्त के समय उत्पन्न होने वाले दर्द में आराम मिलता है। यदि मल के साथ अपचा हुआ खाद्य पदार्थ निकलता है, पेट में दर्द रहता है, मल रुक गया है, कब्ज की शिकायतें रहती हो और पेट में दर्द हो भी रहा हो तो ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया एल्ब का प्रयोग करें।
अधिक गर्मी अथवा लू लगने पर, ठण्डा पानी या अन्य पदार्थ पीने से दस्त लगता हो या खट्टे फल या अन्य पदार्थों को खाने से दस्त लगते हो तो रोगी को ब्रायोनिया एल्ब का सेवन कराएं। यदि रोगी को सुबह के समय हल्का सा शारीरिक हलचल होने पर दस्त लग जाता है तो रोगी को यह औषधि देना लाभकारी होता है। गंदा पानी पीने या अंडी का तेल पीने से दस्त लगता हो तो भी रोगी को ब्रायोनिया एल्ब औषधि का सेवन करना चाहिए।
सावधानी : ब्रायोनिया एल्बा औषधि मुख्य रूप से दस्त को रोकने वाली औषधि है। इसलिए इस औषधि का प्रयोग अधिक दस्त लगने पर ही देना लाभकारी होता है।
14. मूत्र से संबन्धित लक्षण :
पेशाब कम मात्रा में आना साथ ही पेशाब का रंग लाल और गर्म होना आदि लक्षणों में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करें।
15. आंखों से संबन्धित लक्षण :
आंखों में अधिक दर्द होने के साथ आंखें बाहर निकलने जैसा अनुभव होना आदि रोग में रोगी को ब्रायोनिया एल्ब का सेवन कराएं।
16. सांस संस्थान से संबन्धित लक्षण :
रोगी को सांस लेने में परेशानी तथा सांस का रुक-रुककर आना सांस रोग में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
17. खांसी से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी रोगी को सूखी खांसी के साथ ऐंठन वाला दर्द व उल्टी होने के साथ सांस लेने में कठिनाई होती है तो रोगी को ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करना चाहिए। पीठ में चुभनयुक्त तेज दर्द होना। तेज सिर दर्द। खाने-पीने और बंद कमरे में रहने पर दर्द में आराम मिलना। गहरी सांस लेने पर दर्द का और बढ़ जाना आदि खांसी रोग के लक्षणों में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
रोगी व्यक्ति में उत्पन्न होने वाली ऐसी खांसी जिसमें खांसने पर कुछ भी नहीं निकलता, गीली खांसी में खांसने पर कफ बाहर आता है तथा कठोर खांसी जिसमें रोगी को अपने गले में कुछ फंसा हुआ महसूस होता है परन्तु खांसने पर बाहर नहीं निकलता है। खांसी में उत्पन्न होने वाले ऐसे लक्षणों में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। कभी-कभी खांसी के साथ खून की उल्टी। खांसी के साथ खून के छींटे आना आदि खांसी रोग के लक्षणों में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
तुलना :
ब्रायोनिया एल्ब औषधि की तुलना एपिस, बेल, हिपर, काली-का, मर्क, फास, पल्स, रैन-बल्ब, सीपि, अल्फाल्फा से की जाती है।
संबन्ध :
ब्रायोनिया एल्ब औषधि की तुलना एल्यूमिना और रस-टाक्स से की जाती है।
वृद्धि :
शरीर को स्थिर रखने तथा रोग ग्रस्त भाग की ओर करवट लेकर सोने से रोग बढ़ता है। सिर को झुकाने, खांसने तथा आंखों को घुमाने-फिराने तथा गर्मी के कारण भी रोग बढ़ता है।
शमन :
शरीर हिलाने-डुलाने तथा अचानक मौसम परिवर्तन के कारण सर्दी से गर्मी महसूस होने पर रोग कम होता है। जागने बेहोशी-मितली, लेटने पर रोग में आराम मिलता है।
ब्रायोनिया एल्ब औषधि के कुछ मुख्य लक्षण :
ब्रायोनिया एल्ब औषधि के सेवन करने वाले रोगी में कभी-कभी ऐसे भी लक्षण उत्पन्न होते है मानो सिर फटा जा रहा है। मासिक धर्म के समय नाक से खून निगलना तथा थूंकने पर खून आना।
स्तनों में जलन, स्तनों का रंग पीला होना तथा स्तनों में कठोरता उत्पन्न करता है। प्रसव के बाद खून का स्राव रुक जाना।
ब्रायोनिया एल्बा औषधि के कुछ अन्य लक्षण भी है जैसे- स्तनों का दूध सूख जाना, मासिक धर्म की परेशानी, चेचक का दब जाना या निकलना आदि।
बार-बार लम्बी सांस भरने की इच्छा, फेफड़े का फैलना जरूरी है।
सूखी खांसी भोजन के बाद बढ़ जाती है तथा कभी-कभी उल्टी भी हो जाती है। घूमने-फिरने, खुली हवा में तथा गर्म घर में आने पर रोग बढ़ता है।
खांसने पर छाती और माथे में जोर का धक्का सा लगने पर तथा रोगी में लड़खड़ाहट आ जाती है।
औषधि की कुछ मुख्य बातें :
ब्रायोनिया एल्ब औषधि और पल्सटिला औषधि दोनों के लक्षण समान होते हैं। यदि किसी रोगी का रोग शरीर हिलने-डुलने पर बढ़ जाता है तो रोगी को ब्रायोनिया एल्ब औषधि का सेवन करना चाहिए।
रोगी के शरीर में ब्रायोनिया एल्ब औषधि की कमी से जोड़ों में लाली व सूजन आ जाती है तथा जोड़ों वाला स्थान इतना कठोर हो जाता है कि हिलने-डुलने से उस स्थान पर सुई के समान चुभनयुक्त दर्द होने लगता है।
शरीर में उत्पन्न होने वाले किसी भी रोग में यदि रोगी को चुपचाप सोते रहने पर आराम महसूस होता है और हल्का सा शारीरिक हलचल होने पर रोग बढ़ जाता है तो रोग के ऐसी स्थिति में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग करना चाहिए। रोग में एक बार औषधि के प्रयोग करने के बाद दूसरी बार रोगी को तभी औषधि देनी चाहिए जब रोगी में रोग के विपरीत लक्षण पैदा हो।
ब्रायोनिया एल्ब औषधि के सेवन से रोगी के शरीर में एक विशेष प्रकार की प्रतिक्रिया होती है जिसके कारण रोगग्रस्त वाले स्थान पर दबाव देने से रोग में आराम मिलता है। इस औषधि के सेवन करने वाले व्यक्ति अधिकतर रोगग्रस्त वाले करवट लेटकर ही सोता है क्योंकि इससे रोग में आराम मिलता है।
पल्सटिला और ब्रायोनियां दोनों ही औषधि श्लैष्मिक झिल्लियों पर समान रूप से कार्य करती है परन्तु कभी-कभी रोगों के आधार पर इन औषधि के लक्षणों में अन्तर भी आ सकता है। ब्रायोनिया एल्ब औषधि में सूखापन उत्पन्न करने की शक्ति होती है तथा खून के बहाव को कम करने की भी शक्ति होती है। ब्रायोनिया एल्ब औषधि के सेवन करने वाले व्यक्ति में यह औषधि अपनी प्रतिक्रिया पहले रोगी के होठों पर खुश्की पैदा करके सभी श्लैष्मिक झिल्लियों को प्रभावित करते हुए मलाशय तक पहुंच जाती है। इस औषधि के प्रयोग से मल प्रभावित होता है और पाचन तंत्र में सूखापन आ जाता है जिसके कारण रोगी को प्यास अधिक लगती है और रोगी अधिक पानी पीता है।
ब्रायोनिया एल्ब औषधि में सूखेपन के लक्षण होने के कारण फेफड़े व सांस नली पर भी प्रभाव पड़ता है जिसके कारण रोगी में सूखी खांसी तथा कम मात्रा में बलगम आती है। रोगी जब खांसता है तो उसके छाती में दर्द होता है जो छाती छूने से और बढ़ जाता है। ब्रायोनिया एल्ब औषधि के सेवन से रोगी व्यक्ति में पेशाब की मात्रा कम हो जाती है।
वास्तव में होमियोपैथिक की सभी औषधियों में दोहरी प्रतिक्रिया करने के गुण होते हैं। यदि किसी औषधि में नींद लाने या बेहोशी पैदा करने की शक्ति होती है तो उसका एक अन्य प्रतिक्रिया के दौरान यह नींद को समाप्त भी कर देती है। इसलिए किसी भी औषधि का प्रयोग रोगों और औषधि के गुण व लक्षणों को जान लेने के बाद ही करनी चाहिए। औषधि के प्रयोग करते समय विशेष सावधानी रखनी चाहिए विशेष तौर पर जब औषधि का पहली खुराक रोगी को दिया जा चुका हो तो रोगी को दुबारा औषधि देते समय रोग के पहले वाले लक्षण और वर्तमान समय में रोग के लक्षणों को मिलकार ही औषधि का सेवन कराएं। इस तरह रोगों के लक्षणों को सही तरह से जानकर औषधि का प्रयोग कराने से रोग पूर्ण रूप से ठीक हो जाते हैं।
स्नेहिक झिल्लियों पर ब्रायोनिया एल्ब औषधि का असर साफ रूप से देखा जा सकता है। चिकना स्राव होने पर जलन की दूसरी अवस्था में यह दवा अधिक लाभकारी होती है। इसकी पहली अवस्था में रोगी में एकोनाइट, बेलाडोना, फेरमफास आदि औषधियों के लक्षणों की तरह ही लक्षण उत्पन्न होते हैं।
जिस तरह ब्रायोनिया एल्ब औषधि में चुभन जैसा दर्द उत्पन्न करने के लक्षण मौजूद होते हैं, उसी तरह स्नेहिक झिल्लियों की जलन में चुभन जैसा दर्द होता है। अत: ऐसे में ब्रायोनिया एल्ब औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। इसके अतिरिक्त ब्रायोनिया एल्ब औषधि फुफ्फसवेटस्ट की जलन, मस्तिश्क की झिल्ली की जलन, आन्तों की जलन और हृदय की जलन में भी लाभकारी माना गया है।
ब्रायोनिया एल्ब के अतिरिक्त नक्स वोमिका तथा पल्सटिला का प्रयोग पाचन क्रिया को ठीक करने के लिए किया जाता है। परन्तु इन तीनों औषधियों के सेवन से रोगी को ऐसा महसूस होता है मानो पेट में पत्थर आ गया हो। पेट में पत्थर का अनुभव अधिकतर ब्रायोनिया और नक्स वोमिका में पायी जाती है।
यदि किसी व्यक्ति को प्यास अधिक लगती हो तो उसे ब्रायोनिया एल्ब औषधि का सेवन कराना चाहिए और प्यास कम लगने पर नक्स वोमिका औषधि का सेवन कराएं। परन्तु यदि प्यास बहुत अधिक हो या फिर प्यास बिल्कुल ही न लग रही हो तो रोगी को पल्सटिला औषधि का सेवन कराएं।
ब्रायोनिया एल्ब औषधि और पल्सटिला का स्वाद कडवीं होती है जबकि नक्स वोमिका औषधि स्वाद में खट्टी होती है तथा इन तीनों औषधियों में जी मिचलाना व उल्टी के लक्षण मौजूद होते हैं।
नक्स वोमिका औषधि के सेवन से जी मिचलाना व उल्टी भोजन करने के बाद बढ़ जाती है तथा पल्सटिला के सेवन से मुंह में कडुवापन के साथ जी मिचलाना व उल्टी की इच्छा शाम के समय होता है।
किसी रोग में ब्रायोनिया एल्ब औषधि प्रयोग करने के बाद इस औषधि के कुछ लक्षण बहुत समय बाद प्रकट होते हैं जैसे- भोजन खराब होने के कारण तथा सर्दियों के बाद गर्मी का मौसम आने पर अचानक पेट खराब हो जाना।
नक्स वोमिका का सेवन करने वाले व्यक्ति में इस औषधि के कुछ लक्षण तब उत्पन्न होते हैं जब रोगी में पेट से संबन्धित परेशानी गड़गड़ाहट, अधिक भोजन करने, व्यायाम न करने, अधिक दवाओं का सेवन करने तथा मादक पदार्थो के सेवन करने से होता है।
पल्सटिला के कुछ लक्षण अधिक मसालेदार, तले हुए पदार्थ के सेवन करने, चर्बीयुक्त पदार्थों, कुल्फी व बर्फ आदि सेवन करने के कारण उत्पन्न होता है। पल्सटिला के सेवन करने वाले रोगी को कम मात्रा में बर्फ सेवन कराने से आराम मिलता है। परन्तु अधिक मात्रा में सेवन करने से हानिकारक होता है।
ब्रायोनिया एल्ब, ब्रायोनिया और नक्स वोमिका औषधि में मुख्य रूप से पतले दस्त लाने के लक्षण मौजूद होते हैं। परन्तु ब्रायोनिया एल्ब और नक्स वोमिका में कब्ज पैदा करने के भी लक्षण होते हैं।
ब्रायोनिया औषधि के सेवन करने वाले रोगी में सुबह शरीर में अधिक हलचल होने या गर्मियों में अधिक खा लेने से पतले दस्त जैसे लक्षण उत्पन्न होता है।
पल्सटिला औषधि की क्रिया बदल जाने पर रात के समय दस्त बार-बार लगता है। पेट में गड़गड़ाहट की आवाज आती रहती है।
रोगी की जीभ का रंग सफेद या जीभ मैली रहती है। ब्रायोनिया एल्ब और नक्स वोमिका दोनों ही औषधि सामान्यता रखती है। परन्तु ब्रायोनिया एल्ब में वात का लक्षण तेज होता है तथा इसके सेवन करने वाले व्यक्ति में उत्तेजना और क्रोध बढ़ता है।
बैप्टीशिया टिंक्टोरिया BAPTISIYA TINKTOJIYA
बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि का प्रयोग रोगी में उत्पन्न होने वाले रोगों के लक्षणों के आधार पर किया जाता है जिससे रोगों से संबन्धित लक्षण दूर होकर रोग ठीक होता है। परन्तु इस औषधि का प्रयोग विशेष रूप से टाइफायड ज्वर को ठीक करने में अधिक लाभकारी होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि का उपयोग :-
1. मन से संबन्धित लक्षण :
व्यक्ति में उत्पन्न ऐसी मानसिकताएं जिसके अनुसार व्यक्ति अपने ही विचारों में उलझा रहता है तथा रोगी को ऐसा लगता है जैसे उसने नशा कर रखा है। व्यक्ति स्वयं को स्थिर नहीं रख पाता और उसे ऐसा लगता है जैसे उसके शरीर का अंग-अंग अलग हो गया है और वे सभी अंग आपस में मिल नहीं पा रहे हो। रोगी व्यक्ति में उत्पन्न ऐसी मानसिक लक्षणों में बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि का सेवन कराना लाभकारी होता है।
2. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
चेहरे का रंग काला और मलिन हो गया है तो चेहरे पर उत्पन्न ऐसे लक्षणों में रोगी को बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
3. आंखों से सम्बंधित लक्षण :
आंखों की रोशनी कम होने लगती है और चेहरे पर कुछ ऐसा भाव आ जाता है जैसे वह कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो। रोगी में उत्पन्न ऐसे लक्षणों में रोगी को बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि का सेवन कराना चाहिए।
4. मुंह से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी के मुंह में छाला हो गया है और उसके मुंह से बदबू आती है तो ऐसे लक्षणों वाले रोगी को बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि देना चाहिए।
यदि जीभ सूख गई हो और जीभ के बीच में धारी या धब्बे बनने जैसा लक्षण उत्पन्न हो रहा हो तो रोगी को बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि का सेवन कराना लाभकारी होता है।
5. पेट से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी के पेट से संबन्धित लक्षण उत्पन्न होते है, जैसे पेट के बगल की ओर वाले भाग को छूने से तेज दर्द होता है और पेट में बराबर गड़गड़ाहट की आवाज होती रहती है तो ऐसे लक्षणों में रोगी को बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि देना चाहिए।
6. मल-मूत्र से संबन्धित लक्षण :
किसी व्यक्ति को पतला दस्त आने के साथ दस्त से तेज बदबू आती है तथा मल-मूत्र, पसीना या शरीर से निकलने वाले अन्य स्राव से अधिक बदबू आती है तो ऐसे लक्षणों वाले रोगी को बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
7. नींद से संबन्धित लक्षण :
यदि रोग के कारण शारीरिक थकान अधिक होती है और नींद खुलने पर भी व्यक्ति पूरी तरह ताजगी महसूस नहीं कर पाता। रोगी खुले स्थान पर अधिक हवा में रहना चाहता है। रोगी व्यक्ति को भारी सुस्ती का अनुभव होता है तथा शरीर में ऐसा दर्द होता है मानो किसी ने शरीर को कुचल दिया है। इस तरह के लक्षणों वाले रोगी को बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि देना चाहिए।
टाइफाइड ज्वर में रोगी को ठीक से नींद न आने पर भी बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
यदि किसी व्यक्ति को भोजन निगलने में कठिनाई होती हो तो रोगी को बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि देना चाहिए।
रोग के कारण रोगी की स्थिति ऐसी हो जाती है कि सोते समय रोगी जिस करवट सोता है, उस तरफ के अंगों में ऐसा दर्द होता है जैसे किसी चीज से उन अंगों को कुचल दिया गया हो।
बुखार में ´जेलसिमियम´ के प्रयोग करने के बाद ´जेलसिमियम´ की शक्ति समाप्त होने के बाद रोगी में बुखार के ऐसे लक्षण उत्पन्न होते हैं, जिसमें बैप्टीशिया टिंक्टोरिया का प्रयोग करने से रोग ठीक हो जाता है।
टायफायड ज्वर को होमियोपैथिक चिकित्सा अन्य दूसरे चिकित्सा के अपेक्षा जल्दी ठीक करता है।
7. टायफायड ज्वर से संबन्धित लक्षण :
टायफायड ज्वर की शुरुआती अवस्था में उत्पन्न होने वाले लक्षण जैसे- पूरे शरीर में अधिक ठण्ड लग रहा है और पूरे शरीर में विशेषकर सिर, पीठ और अंग-प्रत्यंग में कुचलने की तरह दर्द होता है तथा छूने से दर्द होना आदि टायफायड बुखार के लक्षणों में बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे बुखार शान्त होता है और समय से पहले ही समाप्त हो जाता है।
इसके बाद रोगी धीरे-धीरे कमजोर होता जाता है। रोगी में घबराहट, सुस्ती, नींद आदि बढ़ने लगती है तथा मानसिक हालत खराब होने लगती है, जिससे रोगी में सोने की शक्ति कम हो जाती है। रोगी व्यक्ति के चेहरे पर कुछ ऐसा भाव आ जाता है जैसे उसका दिमाग काम नहीं कर रहा हो। रोगी व्यक्ति की आंखें हमेशा छलछलाई रहती है। रोगी व्यक्ति के ज्ञान तन्तु काम करना बंद कर देता है, जिससे रोगी को कुछ पूछने पर वह जबाव देते-देते सो जाता है। इसके बाद रोगी की जीभ के बीच के भाग में नीचे की ओर दाग उभर आते हैं। जीभ का दाग पहले सफेद रंग का होता है और फिर भूरे रंग का हो जाता है। रोगी व्यक्ति पर टायफायड का प्रभाव जैसे-जैसे बढ़ता जाता है जीभ का दाग गहरे रंग का होता जाता है। जीभ का दाब जब स्पष्ट हो जाता है तो रोगी के मस्तिष्क में विकार उत्पन्न हो जाता है और रोगी मन ही मन बड़बड़ाता रहता है। वह बिस्तर में चारों तरफ अपने हाथ फैंकता है, इधर-उधर करवट बदलता है और उसे ऐसा अनुभव होता है कि उसके अंग बिस्तर पर चारों ओर फैल गये हैं और वह उन्हें जोड़ने की कोशिश कर रहा है। बाद में रोगी को पतले दस्त लग जाते हैं तथा मल, मूत्र व पसीने से बदबू आती रहती है। टायफाइड ज्वर में बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि का सेवन करना चाहिए। टायफायड ज्वर को ठीक करने में बैप्टीशिया टिंक्टोरिया औषधि का प्रयोग अधिक लाभकारी होता है।
बारबेस्कम थैप्सस BARBESKAM THAIISAS
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर बारबेस्कम थैप्सस औषधि का उपयोग :-
1. सिर से संबन्धित लक्षण :
सिर दर्द की ऐसी स्थिति जिसमें रोगी को ऐसा महसूस होता है मानो किसी ने उसके खोपड़ी को चकनाचूर कर दिया हो। इस तरह के सिर दर्द में बारबेस्कम थैप्सस औषधि का सेवन करने से दर्द जल्द खत्म होता है।
2. बहरेपन से संबन्धित लक्षण :
बारबेस्कम थैप्सस औषधि बहरेपन को दूर करने वाले सबसे अधिक लाभकारी औषधि है।
3. जोड़ों के दर्द से संबन्धित लक्षण :
जोड़ों का ऐसा दर्द जिसमें डंक मारने जैसा दर्द होता है और बायें घुटने में भी स्नायविक दर्द हो रहा हो तो बारबेस्कम थैप्सस औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे जोड़ों का दर्द ठीक होता है।
3. दर्द :
आमतौर पर उत्पन्न होने वाले ऐसे दर्द जिसमें दर्द वाले स्थान पर सुन्नता आ जाती है।
मौसम परिवर्तन के कारण या ठण्डे से गर्म या गर्म से ठण्डे स्थान पर जाने के कारण उत्पन्न होने वाले रोगों के लक्षण।
रोगी व्यक्ति के शरीर में किसी रोग आदि के कारण पैदा होने वाले ऐसे दर्द जिसमें रोगी को ऊपर से नीचे की ओर चीरने-फाड़ने जैसा दर्द होता।
कान बंद हो जाने जैसा अनुभव होना। बायें कान में चीरने, खोंचा मारने जैसा दर्द होना तथा बायें गाल खींचने पर चक्कर आना आदि लक्षण।
तेज दबाव के साथ सिर में दर्द। सिर के बाएं भाग के जोड़ों, कान और गले के आस-पास स्नायविक दर्द रहता हो तथा यह दर्द तापमान परिवर्तन के कारण बढ़ा रहता हो, बातचीत करने, छींकने, भोजन आदि चबाने तथा दान्त से दांत टकराने पर भी तेज हो जाता है।
इस प्रकार दर्द से सम्बन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी के रोग को ठीक करने के लिए बारबेस्कम थैप्सस औषधि का सेवन करना चाहिए जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाता है।
4. सर्दी से संबन्धित लक्षण :
शरीर में एक ओर कंपकंपाहट पैदा होने वाले लक्षणों में बारबेस्कम थैप्सस औषधि का सेवन लाभकारी होता है।
5. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
तापमान बदलने के कारण चेहरे के स्नायुओं में दर्द होने पर बारबेस्कम थैप्सस औषधि रोगी को सेवन करना चाहिए।
6. पेट दर्द से संबन्धित लक्षण :
पेट में मरोड़ के साथ अधिक दस्त लगना आदि लक्षण।
नाभि के आस-पास वाले स्थान पर होने वाले तेज दर्द जिसमें ऐसा महसूस होता है मानो आन्ते उलझ गई हैं।
आंतों में ऐंठन सा दर्द होता है।
पेट में उत्पन्न होने वाले ऐसे लक्षणों से पीड़ित रोगी को बारबेस्कम थैप्सस औषधि का प्रयोग करना चाहिए जिसके कारण रोग ठीक हो जाते हैं।
7. मल-मूत्र रोग से संबन्धित लक्षण :
मल का सूख जाने के कारण मल त्याग करने में परेशानी होना। अधिक कब्ज बनने पर। मूत्र रोग जिसमें मूत्राशय पर दबाव महसूस होता है और पेशाब में जलन होती रहती है। पेशाब करने में परेशानी या पेशाब का बूंद-बूंद करके आता है। अनजाने में बिस्तर पर पेशाब हो जाना आदि लक्षण। इस तरह के लक्षणों में रोगी को बारबेस्कम थैप्सस औषधि उपयोग करना चाहिए।
8. बवासीर रोग से संबन्धित लक्षण :
बवासीर रोग में रोगी को मल त्याग करते समय तेज दर्द होता है तथा मलद्वार पर मस्से आदि निकल आने के कारण मल त्याग के समय मल के साथ खून भी आता है। बवासीर में उत्पन्न होने वाले ऐसे लक्षणों को दूर करने के लिए बारबेस्कम थैप्सस औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
9. खांसी रोग से संबन्धित लक्षण :
जिस व्यक्ति को सोते समय खांसी होती हो और रोगी बिना उठे ही खांसता रहता है।
स्नायविक खांसी जिसमें गहरी सांस लेने पर खांसी कम हो जाती है।
ऐसे रोग जिसमें नींद में खांसी आती हो और भोजन आदि पदार्थ निगलते समय गले में तेज दर्द होता है।
इस तरह के खांसी से संबन्धित लक्षणों से ग्रस्त रोगी को बारबेस्कम थैप्सस औषधि का सेवन कराना चाहिए। इससे खांसी के सभी लक्षण दूर होकर रोग ठीक होता है।
11 सांस से संबन्धित लक्षण :
कभी-कभी ऐसे रोग भी उत्पन्न होते हैं जिसमें सर्दी, जुकाम, खांसी सब स्नायविक पीड़ा के साथ ही आते हैं। रोगी की आवाज कुत्ते भौकने की तरह हो जाता है तथा खोखली खांसी आती है।
कंठ तथा सांस नली में उत्तेजना होने के साथ खांसी का आना आदि लक्षण।
इस तरह के खांसी से संबन्धित लक्षणों में वाले रोगी को बारबेस्कम थैप्सस औषधि देने से रोग ठीक होता है।
12 छाती का रोग से संबन्धित लक्षण :
छाती में चुभन वाला दर्द होने वाले लक्षण तथा शरीर में पसीना न आने पर रोगी को बारबेस्कम थैप्सस औषधि का सेवन कराना चाहिए। इससे रोगी को पसीना आता है और रोग का दूषित द्रव्य बहार निकलता है।
13 आलस्य व थकान :
सोने के बाद भी नींद आना, शारीरिक थकावट, आलस्य तथा शरीर में दर्द होना आदि में बारबेस्कम थैप्सस औषधि का सेवन करने से आलस्य दूर होती है और रोग ठीक होता है।
वृद्धि :
बैठने पर, तापमान के परिवर्तन होने पर, शाम के समय, सर्दी के कारण, जोर से पढ़ने पर, छींकने, दांत टकराने या किटकिटाने या काटने पर रोग बढ़ता है।
शमन :
बैठने के बाद उठने पर तथा गहरी सांस लेने पर रोग से आराम मिलता है।
संबन्ध :
बारबेस्कम थैप्सस औषधि की तुलना बेल, चायना, लायको, पल्स, रस-टा, सीपि और स्ट्रैम से किया जाता है।
तुलना :
बारबेस्कम थैप्सस औषधि की तुलना एको, ब्राय, कल्के-का, काष्टि, ड्रासेरा, जेल्स, हिपर, काली-स, काली-का, लैके, लायको, मर्क, म्यूरे-ए, नैट्र म्यू, नाइ-ए, ओपिस, फास, रस-टा, स्पान्ज, सल्फ, थूजा आदि औषधियों से किया जाता है।
प्रतिविष :
बारबेस्कम थैप्सस औषधि के सेवन के बाद असावधानी के कारण यदि रोगी को हानि होती है तो उस हानि को रोकने के लिए कैम्फर औषधि का सेवन करना चाहिए।
विशेष प्रयोग :
इस औषधि का तेल मुलियन ऑयल नाम से मिलता है। इसके तेल को कान में डालने से कान का दर्द व बहरापन दूर होता है।
बोरेक्स वेनेटा BOREKS VANETA
बोरेक्स वेनेटा औषधि अनेक प्रकार के रोगों को ठीक करने में लाभकारी माना गई है। इस औषधि के सेवन से इसका स्नायुमण्डल पर विशेष प्रभाव पड़ता है। जिस रोगी को डर अधिक लगता है तथा शोरगुल, खांसी, आवाज आदि सुनने पर परेशान हो उठता है उसके लिए बोरेक्स वेनेटा औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह औषधि विशेष रूप से डर को समाप्त करती है।
बोरेक्स वेनेटा औषधि विभिन्न प्रकार के रोगों में उत्पन्न लक्षणों को दूर कर रोगी को ठीक करने में उपयोग :-
1. मन से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी रोग के कारण रोगी का मानसिक सन्तुलन खराब हो गया है तथा रोगी के मन में उस रोग के कारण डर बैठ गया है। रोगी अधिकतर नीचे की ओर गति का अहसास करते ही डरने लगता है। बच्चों में डर का रोग पैदा होने पर बच्चे कभी-कभी सोते-सोते अचानक चिल्लाकर उठ जाता है। बच्चे में अधिक घबराहट उत्पन्न होने लगती है तथा किसी भी प्रकार की आवाज सुनने से बच्चे गहरी नींद में ही डर जाता है। इस तरह के डर उत्पन्न होने पर बोरेक्स वेनेटा औषधि का प्रयोग करने से डर समाप्त होता है तथा रोगी में सहनशीलता बढ़ती है।
2. मुंह से संबन्धित लक्षण :
बच्चे के मुंख के अन्दर सफेद रंग के छोटे-छोटे छाले पड़ जाते हैं। उसका मुंह अधिक गर्म रहता है तथा दस्त हरे रंग का होता है। इस तरह के बच्चो में उत्पन्न लक्षणों को दूर करने के लिए बच्चे को बोरेक्स वेनेटा औषधि देना चाहिए।
3. खांसी से संबन्धित लक्षण :
बोरेक्स वेनेटा औषधि का प्रयोग खांसी के लक्षणों में किया जाता है। यदि किसी रोगी को खांसने पर खांसी के साथ दाएं छाती में दर्द रहता है तथा खांसी में बदबू आती है तथा खांसी के साथ हरे रंग का बलगम निकलता है तो ऐसे लक्षणों वाले खांसी के रोग में इस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
4. कान से संबन्धित लक्षण :
कान के बहने पर बोरेक्स वेनेटा औषधि का प्रयोग करने से कान का बहना बंद होता है।
5. आंखों से संबन्धित लक्षण :
यदि सुबह सोकर उठने पर आंखों से लेसदार स्राव होता है तथा आंखों की पुतलियां आपस में चिपक जाती है तो ऐसे लक्षणों में रोगी को ठीक करने के लिए बोरेक्स वेनेटा औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
6. मल-मूत्र से संबन्धित लक्षण :
नाक के अन्दर सफेद पपड़ी जमना तथा बार-बार पपड़ी हटाने के बाद फिर पपड़ी जमते रहने तथा मल का रंग हरा होना आदि मल रोग में बोरेक्स वेनेटा औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
पेशाब में जलन होना जिससे पेशाब करते समय बच्चा चिल्लाता है। पेशाब में बालू जैसा कण दिखाई देना आदि मूत्र रोगों में बच्चे को बोरेक्स वेनेटा औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे मूत्र रोग दूर होकर पेशाब साफ होता है।
7. सांस से संबन्धित लक्षण :
बोरेक्स वेनेटा औषधि के प्रयोग से सांस से संबन्धित रोग ठीक होते हैं। सांस नली की श्लैष्मिक झिल्ली को भी प्रभावित कर अन्दर के हरे रंग के बलगम को बाहर निकालता है। रोगी के छाती के दाहिने ओर प्लूराइटिस रोग के लक्षणों उत्पन्न होने पर बोरेक्स वेनेटा औषधि का प्रयोग अत्यन्त लाभकारी होता है।
8. स्त्री रोग से संबन्धित लक्षण :
श्वेतप्रदर रोग में बोरेक्स वेनेटा औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है। हल्की चोट लगने पर घाव बनने की स्थिति बनने पर बोरेक्स वेनेटा औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
ब्राह्मी BRAHMI
ब्राह्मी औषधि का प्रयोग मुख्य रूप से रोगी व्यक्ति की स्मरणशक्ति को बढ़ाने के लिए किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग काली खांसी को दूर करने तथा रोगी में आत्माविश्वास को बढ़ाने के लिए किया जाता है।
मात्रा :
ब्राह्मी की मूलार्क का प्रयोग करें।
बेंजोइक एसिड BENZOICUM ACIDUM-(Benz-ac)
बेंजोइकम एसिड औषधि के प्रयोग करने से इस औषधि का सबसे अधिक प्रभाव रोगी के पेशाब में दिखाई देता है। बेंजोइकम एसिड औषधि चयापचय क्रिया पर भी गहरा प्रभाव डालती है। यह औषधि वात, गठिया, सूजन, पतले दस्त, सिर दर्द, आतशक, सूजाक आदि रोगों के लिए अत्यधिक लाभकारी औषधि है। इस औषधि के सेवन से पेशाब का रंग बदल जाता है और रोगों के अनुसार पेशाब का रंग बदलता रहता है। रोगों को ठीक करने के लिए यह औषधि जितनी तीव्र व गहरी प्रतिक्रिया करती है रोगी के पेशाब का रंग उतना अधिक गहरा व बदबूदार होता जाता है। यह औषधि पेशाब में क्षार को लाता है और फिर उसे समाप्त करता है। बेंजोइकम एसिड औषधि के प्रयोग से गठिया तथा गुर्दे रोग भी ठीक होते हैं।
जिन बच्चों को गोद में रहकर ही दूध पीने की आदत हो और बिस्तर पर लेटना नहीं चाहता हो तो ऐसे लक्षणों वाले बच्चे को बेंजोइकम एसिड औषधि के सेवन से इस तरह की आदतें छूट जाती है। इस औषधि के सेवन से बिस्तर पर पेशाब करने वाले बच्चे की बिस्तर पर पेशाब करने की आदत छूट जाती है।
बेंजोइकम एसिड औषधि का प्रयोग गठिया और दमा रोग में करने से रोग ठीक होता है। शरीर में उत्पन्न वाले दर्द जो अचानक अपना स्थान बदल लेता है। ऐसे लक्षणों वाले दर्द आदि में इस औषधि का प्रयोग करने से दर्द समाप्त होता है।
विभिन्न प्रकार के रोगों में बेंजोइकम एसिड औषधि का प्रयोग कर रोगों को ठीक किया सकता है।
1. मन से संबन्धित लक्षण :
व्यक्ति में किसी कारण से उत्पन्न होने वाले रोग के परिणामस्वरूप रोगी की मानसिकता खराब हो जाती है जिससे रोगी हमेशा अपने पिछली बातों को याद करता रहता है और चिन्तित होता रहता है। कुछ भी लिखते समय बीच में कुछ लिखना भूल जाता है। पागलपन उत्पन्न होता है। ऐसे मानसिक लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बेंजोइकम एसिड औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
2. सिर से संबन्धित लक्षण :
यदि रोगी का सिर चकराने के साथ ऐसा महसूस होता है कि वह दाईं या बाईं ओर गिर जाएगा तथा रोगी के कनपटियों की धमनियों में जलन और कानों के आसपास सूजन उत्पन्न होना आदि सिर रोग के लक्षणों में बेंजोइकम एसिड औषधि का सेवन करें। इसके अतिरिक्त सिर के अन्य लक्षण जैसे भोजन करते समय भोजन निगलने की आवाज कानों में सुनाई देना। जीभ पर घाव बन जाना और कान के पीछे सूजन आ जाना। माथे पर ठण्डा पसीना आना। मुंह में कांटे गड़ने जैसा अनुभव होना। मसूढ़ों की रंगत नीला पड़ जाना और उससे खून निकलना। वसार्बुद उत्पन्न होना। इस तरह के लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को ठीक करने के लिए बेंजोइकम एसिड औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे सिर रोग के सभी लक्षण समाप्त होकर रोग ठीक होता है।
3. नाक से संबन्धित लक्षण :
नाक में खुजली होना तथा नाक की हड्डियों में दर्द होना आदि में बेंजोइकम एसिड औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे नाक की खुजली व दर्द दूर होता है।
4. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
चेहरे पर तांबे के रंग जैसा दाग बनना तथा चेहरे पर लाल रंग के छोटे-छोटे छाले निकलना। गालों पर लाल रंग का दाग आदि बनना। इस तरह के चेहरे पर होने वाले दाग-धब्बों में बेंजोइकम एसिड औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
5. आमाशय से संबन्धित लक्षण :
भोजन करते समय अधिक पसीना आना तथा पेट में भारीपन महसूस होना मानो पेट पर कोई चीज रखी हो। ऐसे में रोगी को बेंजोइकम एसिड औषधि का उपयोग किया जाता है।
6. पेट से संबन्धित लक्षण :
नाभि के आस-पास काटता हुआ दर्द होना तथा यकृत के पास चुभन वाला दर्द होना आदि पेट के रोगों में बेंजोइकम एसिड औषधि का सेवन करें।
मलाशय में चुभन और सिकुड़न महसूस होना। मलाशय में ऐसा महसूस होना जैसे मलाशय की परतें लटक रही हो। मलद्वार के चारों ओर खुजली होना और खुजलाने पर पनीला द्रव्य निकलना आदि में बेंजोइकम एसिड औषधि का सेवन करें।
7. मल से संबन्धित लक्षण :
पतला, झागदार, बदबूदार व हल्के रंग का दस्त आना तथा मल के साथ हवा निकलना आदि में बेंजोइक एसिड औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
8. मूत्र से संबन्धित लक्षण :
बेंजोइकम एसिड औषधि का प्रयोग मूत्र रोग में पेशाब से तेज बदबू आने, पेशाब का रंग बदलने, पेशाब में सफेद रंग का पदार्थ आने तथा पेशाब का बार-बार आना जैसे रोगों में की जाती है। इससे पेशाब की बदबू तथा अन्य रोग दूर होकर पेशाब को साफ करता है। पेशाब के अन्य रोग जैसे पेशाब बूंद-बूंद करके आने पर भी सेवन करना लाभकारी होता है। बुढ़ापे में पेशाब से बदबू आने पर भी बेंजोइक एसिड औषधि का सेवन करना चाहिए। पेशाब में धातु का आना। सूजाक दब जाने के बाद मूत्राशय में विकार होना तथा मूत्राशय की सूजन में बेंजोइकम एसिड औषधि का सेवन लाभकारी होता है। यह औषधि सभी रोगों को ठीक करने में लाभकारी होती है।
9. सांस संस्थान से संबन्धित लक्षण :
सांस संबन्धी परेशानी होने पर सुबह के समय आवाज खराब हो जाता है तथा रोगी में दमा युक्त खांसी उत्पन्न होती है जो खांसी रात में या बायें करवट सोने से बढ़ जाती है। हृदय के आस-पास दर्द रहता है। खांसी के साथ हरे रंग का बलगम निकलता है। इस तरह के सांस संबन्धी परेशानी में बेंजोइक एसिड औषधि का प्रयोग करें। इससे सांस के रोग दूर होते हैं।
10. पीठ से संबन्धित लक्षण :
जिस व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी पर दबाव महसूस होता है, त्रिकास्थ में ठण्डक महसूस होती है, जिगर में हल्का दर्द होता है और दर्द शराब पीने से बढ़ जाता है तो रोगी को बेंजोइकम एसिड औषधि का सेवन कराना चाहिए। इससे रोग में आराम मिलता है।
11. बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षण :
चलते समय जोड़ों में कड़कड़ाहट होती है, चीर-फाड़ की तरह दर्द होता है और सुई चुभन जैसा दर्द होता है। टखने की मोटी कण्डरा में दर्द होता है। आमवाती गठिया, गांठें अत्यंत दर्दनाक, छोटे-छोटे जोड़ों पर गांठ बनना। कण्डराओं में रसौलियां, कलाई पर सूजन। घुटनों का दर्द और सूजन। पैर के अंगूठें का कठोर सूजन। पांव के अंगूठे में चीर-फाड़ किये जाने जैसा दर्द होना आदि रोग में बेंजोइकम एसिड औषधि का प्रयोग कर रोग को समाप्त किया जाता है।
12. बुखार (ज्वर) से संबन्धित लक्षण :
हाथ-पैर, घुटने व पीठ में तेज ठण्ड लगना, सर्दी लगना, ठण्डा पसीना आना, जागने पर अन्दर-ही-अन्दर गर्मी महसूस होना है। ऐसे में बेंजोइकम एसिड औषधि का सेवन लाभकारी होता है।
13. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
त्वचा पर लाल धब्बे होना तथा त्वचा पर उत्पन्न धब्बे में खुजली होना आदि रोगों में बेंजोइक एसिड औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
वृद्धि :
खुली हवा में घुमने से तथा नंगे बदन रहने से रोगों में वृद्धि होती है।
तुलना :
बेंजोइक एसिड औषधि की तुलना नाइट्रिक एसिड, अमोनियम बेंजी, सैबाइना, ट्रौपोलम आदि से की जाती है।
गठिया रोग में काल्चिकम के सेवन से लाभ न मिलने पर कोपेवा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
हानिकारक :
बेंजोइकम एसिड औषधि के प्रयोग के साथ कोपेवा औषधि का प्रयोग करना हानिकारक होता है।
मात्रा :
बेंजोइकम एसिड औषधि की 3 से 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
बर्बेरिस एक्विफोलियम मैहोनिया BERBERIS AQUIFOLIUM MAHONIA
बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का प्रयोग मुख्य रूप से त्वचा रोगों में करने से लाभ होता है। यह औषधि चिर प्रतिश्यायी रोगों, सामान्य रूप से उत्पन्न होने वाले ऐसे रोग जो आसानी से उत्पन्न नहीं हो पाता है, यकृत की दुर्बलता, आलस्य तथा अपूर्ण रूपान्तरण संबन्धी साक्ष्य रोगों में लाभकारी होता है। इस औषधि के सेवन से सभी ग्रन्थियों को बल मिलता है और शरीर का पोषण ठीक प्रकार से होता है।
बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का प्रयोग अनेक प्रकार के रोगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर किया जाता है :-
1. सिर से संबन्धित लक्षण :
जिस व्यक्ति को पित्त के कारण सिर दर्द रहता है उसे बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का सेवन करना चाहिए। कानों के ऊपर रस्सी बांधने जैसा महसूस होना तथा ऐसा दर्द होना मानो सिर से गर्म भाप निकल रहा हो। शरीर पर पपड़ीदार छाजन उत्पन्न होना आदि रोगों में बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।
2. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
जिस व्यक्ति के चेहरे पर मुंहासे, चकत्ते, फुंसियों आदि उत्पन्न हो उसे बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह मुंहासे आदि चेहरे के रोगों को दूर करके चेहरे को साफ करती है।
3. मूत्र से संबन्धित लक्षण :
मूत्र रोग में सुई चुभने व ऐंठनयुक्त दर्द होना। पेशाब से गाढ़ा श्लेष्मा, चमकदार लाल रंग का तलछट आदि निकलना। इस तरह के मूत्र रोगों में बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।
4. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी की त्वचा खुश्क, पपड़ीदार, खुरदरा हो गया हो और त्वचा पर फुंसियां उत्पन्न हो रही हो तो उसे बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का सेवन करना चाहिए। सिर में उत्पन्न होने वाली ऐसी फुंसियां जो चेहरे और गर्दन तक फैल जाती है उसे ठीक करने के लिए इस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। स्तनों पर फुंसियां उत्पन्न होने के साथ दर्द होना। दानेदार फुंसियां, मुंहासे, सूखा छाजन, तेज खुजली, ग्रन्थियों का कठोर होना आदि त्वचा रोगों में बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
तुलना :
बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि की तुलना कार्बोलिक एसिड, योनीम, बर्बेरिस बुल्गैरिस तथा हाईड्रैस्टिस से की जाती है।
मात्रा :
बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि के मूलार्क को अधिक मात्रा में रोगी को दिया जा सकता है। परन्तु औषधि का प्रयोग रोग के अनुसार ही करना चाहिए।
बर्बेरिस वुल्गैरिस BERBERIS VULGARIS (BARBERRY)
बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि अपनी प्रतिक्रिया रोग में तीव्र गति से बदलता रहता है। इस औषधि के प्रयोग से रोग में उत्पन्न होने वाला दर्द अपना स्थान तेजी से बदलता है। कभी-कभी यह औषधि रोगों को ठीक करने के लिए रोगी व्यक्ति में भूख और प्यास को बढ़ा देती है और कभी-कभी भूख और प्यास को बिल्कुल समाप्त करती है। बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि विशेष रूप से यकृत (जिगर), गठिया, मूत्र रोग, बवासीर और मासिक धर्म संबन्धी रोगों के कारणों को उत्पन्न कर इन रोगों को जड़ से समाप्त करता है।
बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग ऐसे रोग में भी अधिक लाभकारी है जो रोग किसी को अपने माता-पिता या घर के अन्य सदस्यों से हुआ हो। इस औषधि का प्रयोग वृक्कों, मूत्र संबन्धी विकारों, पित्त पथरी और मूत्राशय प्रतिश्याय आदि रोगों में किया जाता है। रोगों को ठीक करने के लिए जब इस औषधि का प्रयोग किया जाता है तो यह औषधि पहले वृक्क प्रदेश में दर्द उत्पन्न करता है जिससे यह साबित होता है कि बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि रोगों में सही कार्य कर रहा है। कभी-कभी यह औषधि गुर्दे में जलन और पेशाब में खून की मात्रा लाकर भी रोगों को ठीक करता है। अत: इस औषधि के सेवन के बाद पेशाब का रंग बदलना या खून के आने से घबराना नहीं चाहिए क्योंकि यह शरीर की गन्दगी को पेशाब के रास्ते बाहर निकालता है।
कमर का ऐसा दर्द जो कमर के निचले भाग से शुरू होकर ऊपर की उठता है, उसमें भी बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि सेवन लाभकारी है। यकृत पर औषधि का प्रभाव पड़ने से पित्तस्राव बढ़ जाता है। बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग जोड़ों के दर्द में भी लाभकारी है।
शरीर में उत्पन्न होने वाले ऐसा दर्द जो अपने स्थान बदलता रहता है तथा जिस व्यक्ति में सहनशीलता की कमी हो उस व्यक्ति के लिए भी बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि मेरुदण्ड की उत्तेजना को शान्त करता है। बर्बेरिस का दर्द जो धीरे-धीरे चारों ओर फैलता है तथा खड़ा होने व हाथ-पैर चलाने से दर्द बढ़ जाता है। ऐसे रोगों में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन करने से रोग दूर होता है।
मूत्र संबन्धी रोग के लिए बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि एक अच्छी औषधि है। यह औषधि गुर्दा और मूत्राशय संबन्धी रोग को ठीक करता है। यह गुर्दे का दर्द व जलन, बायें गुर्दे से मूत्रनली व मूत्राशय तक सुई चुभन की तरह दर्द होना। मूत्र नली में जलन तथा पेशाब करने के बाद या पेशाब करते समय जलन और दर्द होना। पेशाब करने के बाद भी संतुष्टी न होना तथा ऐसा महसूस होना मानो अभी पेशाब लगा ही हो। इस तरह के मूत्र संबन्धी रोगों में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग करने से दर्द, जलन व अन्य मूत्र रोग ठीक होते हैं।
बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग स्त्रियों के मूत्राशय से योनिद्वार तक सुई चुभन की तरह दर्द होने और पेशाब करते समय कमर और कूल्हों में दर्द होना पर करने से भी लाभ मिलता है।
बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि रोग से संबन्धित लक्षणों को पहले उत्पन्न करती है और फिर उस रोग को जड़ से समाप्त करती है।
बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधर पर उपयोग :-
1. सिर से संबन्धित लक्षण :
रोगी में हतोत्साह (जल्दी घबरा जाना), चेहरे का रंग बदरंग होना (विरक्त), रोगी में आत्मविश्वास की कमी तथा रोगी को ऐसा महसूस होना मानो सिर बड़ा व भारी हो गया हो ऐसे रोगों वाले लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन लाभकारी होता है।
चक्कर आना और बेहोशी उत्पन्न होना। सिर में दर्द व सिर के पिछले हिस्से और कमर में ठण्ड का अनुभव होना। सिर का दर्द हरकत करने पर बढ़ जाना और खुली हवा में ठीक होना। सोने के बाद भी हल्कापन महसूस नहीं कर पाना तथा पूरा शरीर भारी लगना। हल्के काम करने के बाद भी पसीना अधिक आना आदि में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन करने से रोग ठीक होता है।
हृदय में दर्द होना तथा गठियावाती गांठे होने पर बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन करने से लाभ होता है। इसके अतिरिक्त ऐसे दर्द जिसमें पूरे सिर में दबाव वाला दर्द महसूस होता है और ऐसा महसूस होता है मानो सिर पर टोपी रखा हो तो ऐसे सिर से संबन्धित लक्षणों में भी बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
2. नाक से संबन्धित लक्षण :
बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग नाक में खुश्की होने तथा सरसराहट रहने व नाक के बाएं नथुने का पुराना नजला होने पर किये जाने पर लाभकारी होता है।
3. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
चेहरे का पीला पड़ जाना, चेहरा मुरझाया हुआ और उत्साहीन रहना, आंखें धंसी हुई और आंखों पर नीले रंग का घेरा बनना, चेहरा दुखी और रोने जैसा बना रहना आदि चेहरे के रोगों में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे रोग समाप्त होने के साथ चेहरे पर चमक आती है।
4. मुंख से संबन्धित लक्षण :
मुंख में होने वाले रोग जिसमें मुंह में कुछ चिपका हुआ महसूस होता है तथा मुंह से लार कम आता हो तो बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन करें। जिस रोगी के मुंह में झागदार लार अधिक आता है तथा उसका मुंह कपास जैसा हो जाता है। तालुमूल, वायुयंत्रों में जलन और तेज लालिमा के साथ कंठ में गोले अटकने जैसा अनुभव होना। जीभ में होने वाले जलन जैसे गर्म पानी से जल गया हो और जीभ के छालों में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग करने से जल्द लाभ मिलता है।
5. आमाशय से संबन्धित लक्षण :
आमाशय रोग में सुबह के समय कुछ खाने से पहले जी मिचलाना तथा कलेजे में जलन होना आदि में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
6. पेट से संबन्धित लक्षण :
पेट में उत्पन्न होने वाला वह दर्द जिसमें सुई चुभन जैसा अनुभव होता है जो बोलने से बढ़ता है और दर्द आमाशय तक पहुंच जाता है। पित्ताशय के प्रतिश्याय(Catarrh) के साथ कब्ज होना और त्वचा का रंग पीला हो जाना। पेट रोग ग्रस्त होने पर गुर्दों के अगल-बगल में सुई चुभन जैसा दर्द होता है जो धीरे-धीरे बढ़ते हुए यकृत, प्लीहा, आमाशय, जांघों, पौपार्ट बन्धनों (Poupart’s ligament) आदि तक फैल जाता है। ऐसे रोगों में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग अत्यन्त लाभकारी होता है। यह औषधि कूल्हे की हड्डीी के गहराई में होने वाले दर्द को भी ठीक करता है।
7. मल से संबन्धित लक्षण :
इस रोग से ग्रस्त रोगी को शौच खुलकर नहीं आता जिससे कब्ज बनने लगता और मल सूख जाता है। शौच जाने के बाद भी शौच की इच्छा बनी रहती है। दस्त के साथ दर्द होता, दस्त का रंग मटमैला होने के साथ मलद्वार और मूलाधार में जलन होती रहती है। ऐसे लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग लाभकारी है। इसके अतिरिक्त मलद्वार के आस-पास चीर-फाड़ जैसा दर्द होना तथा पेट में गैस बनने से भगन्दर रोग आदि में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन करने से लाभ होता है। यह औषधि कब्ज दूर करता है और मल रुकने से होने वाले भगन्दर आदि रोगों को ठीक करता है।
8. कमर से संबन्धित लक्षण :
यह औषधि कमर के विभिन्न लक्षण जैसे- कमर में दर्द होता रहता है जो रोगी के बैठने या उठने पर बढ़ता-घटता रहता है, कमर में जकड़न महसूस होना, रोगी के लेटने या बैठने पर दर्द का बढ़ जाना, रोगी को कमर में अकड़न व सुन्नता अनुभव होना, कमर के पास तपकन जैसा महसूस होने जिसको दबाने से दर्द होता हो तो बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए है। रोगी को गुर्दे वाले स्थान पर बुलबुला फूटने जैसा महसूस होना आदि कमर रोगों में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग करके रोग को दूर किया जा सकता है।
9. मूत्र से संबन्धित लक्षण :
पेशाब करते समय पेशाब नली में जलन व दर्द होने पर औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। मूत्र रोग से संबन्धित अन्य लक्षण जैसे- पेशाब करने के बाद भी पेशाब करने की इच्छा बना रहना। पेशाब में धातु का आना, पेशाब लाल चमकदार तलछट रंग का होना। गुर्दों में बुलबले जैसा अनुभव होना। मूत्राशय में दर्द होने के साथ पेशाब करते समय जांघों में दर्द होना। पेशाब का बार-बार आना तथा पेशाब रोकने पर मूत्रनली में तेज दर्द होना आदि लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
10. पुरुष रोग से संबन्धित लक्षण :
किसी कारण से लिंग और अण्डकोष के स्नायुओं में दर्द होने पर बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग करने से दर्द ठीक होता है। अडकोष और लिंग में चीस मारता हुआ दर्द होता है। जलन और सुई चुभन जैसा दर्द होता है तो ऐसे लक्षण वाले रोगों को ठीक करने के लिए बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन करें।
11. स्त्री रोग से संबन्धित लक्षण :
स्त्रियों में उत्पन्न होने वाले रोग जिसमें पेडू पर चुटकी काटने जैसा दर्द के साथ पेडू में सिकुड़न महसूस होता है। योनि की सुन्नता, योनि की सिकुड़न और स्पर्शमात्र से ही दर्द और जलन होना। स्त्रियों में सेक्स की इच्छा समाप्त होना। संभोग करते समय योनि में काटने जैसा दर्द होता है। ऐसे स्त्री रोग के लक्षणों से ग्रस्त होने पर बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन करना चाहिए।
मासिक धर्म संबन्धी परेशानी जैसे मासिक धर्म का कम मात्रा में आना, योनि से भूरे रंग का श्लैष्मिक स्राव होना तथा पेशाब करते समय दर्द होना। डिम्बाशय और योनि के स्नायुओं में दर्द होना आदि मासिक धर्म संबन्धी रोगों में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
12. सांस संस्थान से संबन्धित लक्षण :
सांस संबन्धी परेशानी जैसा सांस का रुक-रुक कर आना, गले में फुंसियां होना। छाती और हृदय के आस-पास चीर-फाड़ जैसा दर्द होना। इस तरह के सांस रोगों में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन अत्यन्त लाभकारी होता है।
13. पीठ से संबन्धित लक्षण :
गर्दन और पीठ में सुई चुभने जैसा दर्द होता है तथा सांस लेने पर दर्द बढ़ जाता है। गुर्दों के आस-पास तेज दर्द उत्पन्न होता है जो धीरे-धीरे चारों ओर फैलता हुआ कूल्हों और जांघों तक पहुंच जाता है। रोगी की पीठ सुन्न पड़ गई है तथा ऐसा दर्द उत्पन्न होता है मानो किसी ने पीठ को कुचल दिया है। गुर्दे से लेकर मूत्राशय तक ऐसा दर्द होता है मानो सुई चुभ रही है। पीठ में चीर-फाड़ जैसा दर्द होता है साथ ही पीठ में अकड़न व कूल्हे, नितम्ब व हाथ-पैरों में भी दर्द व सुन्नपन आ जाता जिसके कारण रोगी को खड़े होने में परेशानी होती है। यदि किसी व्यक्ति के अन्दर ऐसे लक्षण उत्पन्न हो रहे हों तो रोगी को ठीक करने के लिए बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि देना चाहिए।
यदि कमर में दर्द होता है। कलाई और उंगुलियों के बीच की हड्डियों और टखनों की हड्डियों में दर्द होता है। कमर के किसी भाग का ऑपरेशन होने के बाद उस अंग में दर्द होता है। कूल्हे की वातनाड़ी से मसाने तक दर्द होता है और पेशाब बार-बार आता है। ऐसे लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग करना अत्यन्त लाभ होता है।
14. शरीर के बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षण :
कन्धों, हाथों, अगुलियों और पैरों में गठिया और लकवे का दर्द होने पर बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन करें। हाथ के नाखूनों के स्नायुओं में दर्द होने के साथ उंगुलियों के जोड़ों पर सूजन होना। जांघों के बाहरी भागों में ठण्डी का अनुभव होना, एड़ियों में दर्द होने के साथ ऐसा महसूस होना मानो एड़ियों में घाव हो गया है। खड़े होते समय कलाई की हड्डियों के बीच के भागों में सुई चुभने जैसा दर्द होना। चलने पर पैर के मांसपेशियों में दर्द होना। थोड़ी दूर चलने से रोगी में भारी थकान के साथ चिड़चिड़ापन आ जाता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को ठीक करने के लिए बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
15. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
त्वचा पर चपटे दाने निकलना, त्वचा पर खुजली और चीसें जो खुजलाने से बढ़ता है तथा त्वचा पर ठण्डे पानी या अन्य पदार्थ लगाने से आराम मिलता है। सारे शरीर पर छोटे-छोटे दाने निकल आना। मलद्वार और हाथों की खुजली होती है। इस तरह के त्वचा रोगों में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन लाभकारी होता है।
16. बुखार से संबन्धित लक्षण :
पूरे शरीर में ठण्डक महसूस होना। पीठ के निचले भाग, कूल्हों और जांघों में गर्मी उत्पन्न होना आदि बुखार के रोगों में बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का सेवन करना चाहिए।
वृद्धि :
शरीर के हिलने-डुलने से तथा खड़े होने से रोग बढ़ता है। चलने-फिरने तथा शरीर में झटका लगने से रोग में बढ़ता है।
प्रतिविष :
कैम्फर और बेलाडौना औषधि बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि के विष को दूर करता है।
तुलना :
बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि की तुलना कैन्थ, लाइको, सार्सा टैब, इपोमिया, एलो, लाइकोपोडियम, नक्स, सर्सापैरिल्ला, जैन्थेरिया अरबोरिया आदि से की जाती है।
मात्रा :
बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि मूलार्क या 6 शक्ति का प्रयोग करना रोगों में लाभकारी होता है।
इस औषधि के प्रयोग करने से उत्पन्न हो सकने वाले लक्षण :-
बर्बेरिस वुल्गैरिस औषधि का रक्तसंचार पर विशेष प्रभाव पड़ता है जिसके फल स्वरूप गोणिका में अतिरक्तसंचय और खूनी बवासीर जैसे रोग उत्पन्न होने की संभावना रहती है। यह औषधि मूत्र संबन्धी विकारों को पैदा करती है और उसे बढ़ाती है।
बेटा वुल्गैरिस (चुकन्दर-मल) BETA VULGARIS (BEET-ROOT)
बेटा वुल्गैरिस औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों को दूर करने में किया जाता है, परन्तु टी.बी. रोग में विशेष रूप से यह औषधि लाभकारी है। यह औषधि पुराने नजला-जुकाम(Chronic catarrhal states) को ठीक करता है। इस औषधि में बेटैनम हाइड्रोक्लोरिकम(etanum hydrochlotricum) नामक पदार्थ मिला होने के कारण यह फेफड़ों की यक्ष्मा (टी.बी) से ग्रस्त रोगियों में अत्यंत लाभकारी होता है। यह औषधि बच्चे के रोगों के लिए अत्यंत लाभकारी होती है।
मात्रा :
बेटा वुल्गैरिस औषधि 2x चूर्ण की शक्तियों का प्रयोग करना चाहिए।
बोरेक्स BORAX (BORATE OF SODIUM) सुहागा (बोरेट ऑफ सोडियम)
बोरेक्स औषधि के सेवन से अनेक प्रकार के रोग ठीक होते हैं। यह औषधि बाल रोगों और मिर्गी के रोग में विशेष रूप से लाभकारी है। इसके अतिरिक्त यह औषधि जठरान्त्र (इंस्टेटिनल) का रोग। मन की व्याकुलता (गैस्ट्रो इर्रिऐशन)। लालस्राव (सलीवेटीपोन) होना, जी मिचलाना, उल्टी (वमन), पेट का दर्द, दस्त, निरात (कोलैप्स), पेशाब के साथ सफेद पदार्थ का जाना (एल्ब्युमीन्युरिया), निर्मोक (कास्टस) एवं मूत्राशय की ऐंठन (वेसिकल स्पस्म), प्रलाप (डिलीरियम) अर्थात मानसिक रूप से परेशानी के कारण रोना-धोना, आंखों का रोग, रक्तमेह (हैमेट्युरिया) तथा त्वचा का फटना (स्कीन एऱ् युप्शन) आदि रोगों को ठीक करता है।
इस औषधि का प्रयोग बच्चों के रोगों में अधिक लाभकारी माना जाता है। बच्चों के दांत निकलते समय दर्द होने पर बोरेक्स औषधि का प्रयोग करने से दर्द से आराम मिलता है तथा दांत आसानी से निकलते हैं। कभी-कभी बच्चों को डर अधिक लगता है, ऊंचाई से बच्चे को डर लगता है तथा ऊपर से नीचे की ओर आने या सीढ़ी से उतरने या झूले के ऊपर-नीचे होने से बच्चे को अधिक डर लगता है। इस तरह बच्चे में डर होने पर बच्चे को बोरेक्स औषधि का सेवन कराने से बच्चे में डर समाप्त होता है। बच्चों का अधिक सोना तथा सोते-सोते अचानक चिल्लाकर उठ जाना तथा हल्की आवाज भी सुनने पर डर जाना आदि में बोरेक्स औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर बोरेक्स औषधि का उपयोग :-
1. मन से संबन्धित लक्षण :
मानसिक रोग में सहनशीलता की कमी होती है तथा किसी वस्तु को ऊपर फेंकने व पकड़ने की इच्छा पैदा होने लगती है। मानसिक रोगी में नीचे की ओर आते हुए चेहरे पर अधीरता का भाव उत्पन्न होता है। रोगी अपने हाथों को ऊपर की ओर रखता है मानों वह किसी चीज को गिरने से रोकने की कोशिश करता है। इस रोग में रोगी को अधिक घबराहट होती है तथा वह जल्दी डर जाता है। किसी भी तरह के आवाजों को सुनने पर डर जाता है। मानसिक रोगों के इन लक्षणों में बोरेक्स औषधि का सेवन करने से मानसिक रोगी ठीक होता है। मानसिक कार्य करने से जी मिचलाने या चक्कर आना। ऐसे में इस औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
2. सिर से संबन्धित लक्षण :
सिर रोग ग्रस्त होने पर अनेक प्रकार के लक्षण उत्पन्न होते है जैसे- सिर दर्द तथा जी मिचलाने के साथ शरीर में कम्पन्न होना। रोगी के बाल आपस में उलझ जाना तथा सिर में जूं पड़ना आदि सिर रोग के लक्षणों में बोरेक्स औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है। इससे दर्द तथा बालों की परेशानी दूर होती है।
3. आंखों से संबन्धित लक्षण :
आंखों में चमकती लहरें दिखाई देती हैं। पलकों में जलन होती है, नेत्रगोलक से सटी हुई पलक कटी हुई महसूस होती है। पलकों की बालों को अन्दर की ओर मुड़ने और आंखों की बाहरी कोनों की सूजन आदि में बोरेक्स औषधि का सेवन लाभकारी होता है। सुबह सोकर उठने पर आंखों से मैल का निकलना और आंखें भारी महसूस होना आदि में बोरेक्स औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
4. कान से संबन्धित लक्षण :
कभी-कभी अचानक हुए किसी घटना के कारण रोगी में सुनने की शक्ति बढ़ जाती है जिससे रोगी जरा सी भी आवाज को तेजी से सुनता है। इस तरह के रोग में रोगी को आमतौर पर कोई परेशानी नहीं होती परन्तु आवाज की ध्वनि तेज होने पर रोगी के कान में तेज झन-झनाहट उत्पन्न होती है। इस तरह की परेशानी में बोरेक्स औषधि का सेवन लाभकारी होता है।
5. नाक से संबन्धित लक्षण :
नवयुवतियों की नाक लाल हो जाती है। नाक पर लाल और चमकदार सूजन होने के साथ ही तपकन और तनाव पैदा होना। नाक की नोक सूजी हुई और घाव की तरह बन जाना है। नाक पर सूखी पपड़ियां बनना। इस तरह नाक पर होने वाले रोगों में बोरेक्स औषधि का सेवन करने से रोग ठीक होता है।
7. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
चेहरे पर पीलापन आना, चेहरे का रंग मटियाला होना जैसे शरीर रोग ग्रस्त हो। चेहरे की सूजन तथा होठों व नाक पर फुंसियां होना। चेहरे पर मकड़ी का जाला जैसा अनुभव होना आदि चेहरे की परेशानी में बोरेक्स औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है।
8. मुंह से संबन्धित लक्षण :
मुंह में छाले होने पर बोरेक्स औषधि के सेवन से छाल दूर होते हैं। मुंह के अन्दर सफेद फफूंदी से अंकुरित होना या सफेद कवक जैसा गुल्म होने पर भी औषधि के प्रयोग से लाभ मिलता है। मुंह गर्म और स्पर्शकातर तथा छाले के कारण छूने और खाने से छाले से खून निकलने पर। मसूढ़ों में फोड़े होने के कारण मसूढ़ों में तेज दर्द होना आदि मुंह में उत्पन्न लक्षणों को ठीक करने के लिए रोगी को बोरेक्स औषधि देना चाहिए।
इसके अतिरिक्त बच्चा स्तनपान करने के लिए अधिक रोता हो तो भी औषधि का प्रयोग किया जाता है। मुंह का स्वाद का कड़वा होने तथा फफूंद जैसा स्वाद होने पर बोरेक्स औषधि का प्रयोग करें। यह मुंह के स्वाद को ठीक करता है।
मुंह का स्वाद कड़वा होने पर बोरेक्स औषधि न मिलने पर ब्रायोनिया, पल्सा तथा क्यूप्र का भी प्रयोग किया जा सकता है।
9. पेट से संबन्धित लक्षण :
भोजन करने के बाद पेट फूल जाता है तथा उल्टी करने की इच्छा बनी रहती हो तो बोरेक्स औषधि का सेवन करें। योनि विकार के कारण पेट में उत्पन्न होने वाले दर्द को ठीक करने के लिए बोरेक्स औषधि का सेवन लाभकारी होता है। यह औषधि पेट के ऐसे दर्द जिसमें दर्द के साथ दस्त लगने जैसा अनुभव होता प्रयोग करने से दर्द दूर होता है।
10. मल से संबन्धित लक्षण :
यह औषधि बच्चों के रोग में अधिक लाभकारी है। बच्चों में होने वाले बदबूदार पतले दस्त में बोरेक्स औषधि के प्रयोग से दस्त का बार-बार आना बंद होता है। कभी-कभी बच्चों में बदबूदार दस्त आने से पहले बच्चे के पेट में मरोड़ वाला दर्द होता है, ऐसे में बोरेक्स औषधि देने से जल्द आराम मिलता है। दस्त के साथ श्लैष्मिक होने के साथ मुंह में छाले होने पर बोरेक्स औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
सावधानी : बच्चों में बोरेक्स औषधि का प्रयोग मानसिक लक्षणों को देखकर सावधानी से प्रयोग करें।
11. मूत्र रोग से संबन्धित लक्षण :
जिन बच्चों को बार-बार पेशाब आता रहता है और पेशाब करने से पहले बच्चा चीखकर रोता हो तो बच्चे को बोरेक्स औषधि का सेवन करने से पेशाब से होने वाले दर्द दूर होते हैं। यदि किसी रोगी का पेशाब अधिक गर्म रहता है तो उसे भी बोरेक्स औषधि का सेवन कराना चाहिए। मूत्रनली में चीस मारता हुआ दर्द तथा पेशाब से तेज बदबू आने पर बोरेक्स औषधि का सेवन करना चाहिए। अण्डकोषों पर छोटे-छोटे लाल कण दिखाई देते हो तो बोरेक्स औषधि का प्रयोग करें।
12. स्त्री रोग से संबन्धित लक्षण :
प्रसव के समय दर्द होना और बार-बार डकारें आना आदि में बोरेक्स औषधि का सेवन कराने से प्रसव का दर्द दूर होता है। स्तनों में दूध अधिक होने के कारण दूध अपने आप स्तनों से निकलने लगता है। इस तरह के रोगों में बोरेक्स औषधि का प्रयोग करने से स्तनों में दूध की अधिकता कम होती है। बच्चों को स्तनपान कराते समय दूसरे स्तन में दर्द होना। मासिक धर्म में सफेद रंग का गाढ़ा प्रदर अधिक मात्रा में स्राव होने तथा ऐसा महसूस होना मानो गर्म पानी का स्राव हो रहा हो ऐसे रोगों में बोरेक्स औषधि का सेवन लाभकारी होता है। इसके अतिरिक्त स्त्रियों के अन्य रोग जैसे- मासिक धर्म का समय से पहले तथा अधिक मात्रा में आना, पेट में मरोड़ जैसा दर्द होना, जी मिचलाना और पेट दर्द जो पेट से धीरे-धीरे कमर तक फैल जाता है। झिल्लीदार कष्टार्तव (मेम्बेरेनौस)। बांझपन (स्टैरीलिटी)। योनि के मुंख पर फूला हुआ महसूस होने के साथ कुछ गड़ने जैसा दर्द होने पर बोरेक्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए। बोरेक्स औषधि के सेवन से योनि की छाजन और खुजली भी दूर होती है। इस औषधि के प्रयोग से स्त्री में गर्भधारण करने की क्षमता बढ़ती है।
13. सांस संस्थान से संबन्धित लक्षण :
खांसी अधिक आना तथा खांसी के साथ मैला व बदबूदार बलगम आने जैसे लक्षणों में रोगी को ठीक करने के लिए बोरेक्स औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह औषधि खांसी को दूर कर कफ को समाप्त करती है। सांस लेने या खांसने पर यदि छाती में चुभनयुक्त दर्द का अनुभव हो तो बोरेक्स औषधि का सेवन करें। इसके अतिरिक्त खांसने पर बदबू आना, सांसों में बदबू, फेफड़ों की झिल्ली में दर्द, दाईं छाती के ऊपरी भाग में अधिक दर्द होना आदि में भी इस औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
लेटकर सांस लेने में परेशानी, सांस लेने के लिए उठना पड़ता है जिसके कारण सांस लेने के साथ दाईं पसलियों में दर्द होता है तथा सीढ़ियों पर चढ़ने या हल्का कार्य करने से दम फूलने लगता है। ऐसे सांस संबन्धी परेशानी होने पर बोरेक्स औषधि का प्रयोग अत्यधिक लाभकारी माना गया है।
14. शरीर के बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षण :
रोगी को ऐसा महसूस होता है मानो हाथों पर मकड़ी का जाला छाया हुआ है। अंगुलियों के जोड़ों के पीछे और हाथों पर खुजली होती रहती है। हाथ के अंगूठे की नोक पर जलन के साथ दर्द होता रहता है। तलुवे में सुई गड़ने जैसा दर्द होता है। ऐड़ी में दर्द रहता है। पैर के अंगूठे में जलन के साथ दर्द रहता है। पांव के अंगूठे के अगले भाग में जलन होती रहती है। हाथ-पैर की अंगुलियों के छाजन के साथ नाखुन का खराब होना आदि बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बोरेक्स औषधि का सेवन कराना चाहिए। इससे हाथ-पैरों व अन्य अंगों में होने वाले जलन व दर्द आदि दूर होते हैं।
15. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
त्वचा पर खुजली उत्पन्न हो गई है। चेहरे का विसर्प (एरीसीपल्स)। हाथ की अंगुलियों के जोड़ों के पिछले भाग में खुजली होती रहती है तथा त्वचा अधिक मैला होने के साथ पसीने से बदबू आती रहती है तो ऐसे त्वचा रोग में बोरेक्स औषधि का प्रयोग करने से त्वचा से संबन्धित लक्षण दूर होते हैं। शरीर के अन्दर गड़बड़ी होने के कारण त्वचा रोग ग्रस्त हो जाती है जिसके कारण हल्की चोट लगने पर भी चोट वाले स्थान पर त्वचा पककर सूज जाती है, ऐसे में त्वचा पर घाव बनने से रोकने के लिए बोरेक्स औषधि का सेवन करें। यह औषधि परिसर्प, विसर्पी प्रदाह (जलन) व सूजन तथा त्वचा में तनाव उत्पन्न होने पर प्रयोग करने से रोग ठीक होता है। एड़ी फटने पर जिसमें खुली हवा से आराम मिलता है तथा उंगुलियों व हाथों पर उद्भेद होने पर, खुजली तथा डंक लगने जैसा दर्द होने पर बोरेक्स औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। कभी-कभी त्वचा रोग के कारण सिर के बाल आपस में उलझ जाते हैं जिसे सुलझाना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में बोरेक्स औषधि के सेवन से सिर की त्वचा स्वस्थ होती है और बालों की उलझन समाप्त होती है।
16. नींद से संबन्धित लक्षण :
रात को सोने पर सपने में काम वासना से संबन्धित सपने देखना। शरीर में अधिक गर्मी विशेषकर सिर में अधिक गर्मी के कारण रात को ठीक से नींद न आना। सोते-सोते अचानक चिल्लाकर उठ जाना तथा डर का अधिक लगना आदि नींद में बाधा पहुंचने से रोगी में कमजोरी व अन्य परेशानी उत्पन्न हो जाती है। अत: इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए बोरेक्स औषधि का सेवन करना चाहिए। इस औषधि में डर को दूर करने की शक्ति होती है जिसके कारण रोगी को नींद में डरावने या काम वासना वाले सपने आना बंद हो जाता है।
वृद्धि :
नीचे की ओर गतिमान रहने पर, शोरगुल, धूम्रपान करने तथा गर्मी के मौसम या गर्म कमरे में रहने से रोग बढ़ता है। मासिक धर्म के बाद भी रोग बढ़ता है।
शमन :
रोग वाले स्थान पर दबाव डालने पर, शाम के समय तथा ठण्डी के मौसम में रोग नष्ट होता है।
तुलना :
बोरेक्स औषधि की तुलना कल्के, ब्रायो, सैनीक्यूला तथा स्ल्फ्यू-एसिड से की जाती है।
संबन्ध :
असेटिक एसिड, सिरका और शराब आदि औषधि एक-दूसरे की विरोधी औषधि है। अत: इन औषधियों को एक साथ नहीं लिया जा सकता है। इन औषधियों को एक साथ प्रयोग करने से हानि हो सकती है।
प्रतिविष :
बोरेक्स औषधि से होने वाले हानि को दूर करने के लिए ´कमो´ और ´काफिया´ औषधि का प्रयोग किया जाता है।
मात्रा :
बोरेक्स औषधि की 1 से 3 शक्ति का प्रयोग करें।
त्वचा रोग में इस औषधि का प्रयोग कई दिनों तक करते रहने से लाभ मिलता है।
योनि के बाहरी भाग में खुजली आदि में इस औषधि का लोशन बनाकर धोने से लाभ मिलता है।
बिस्मथम BISMUTHUM
बिस्मथम औषधि का प्रयोग अनेक प्रकार के रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है। यह औषधि सिर, आमाशय, सांस संस्थान, मूत्र रोग आदि में लाभकारी है।
1. मन से संबन्धित लक्षण :
मानसिक असन्तुलन के कारण रोगी की मानसिकता ऐसी हो जाती है कि रोगी अकेलापन बिल्कुल सहन नहीं कर पाता। रोगी व्यक्ति हमेशा खुशी के माहौल में रहना चाहता। अपने दु:ख दर्द को दूसरे को बताता रहता है। रोगी हमेशा परेशान रहता है तथा अंसतुष्ट रहता है। इस तरह के मानसिक रोग से संबन्धित लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए बिस्मथम औषधि का सेवन करना चाहिए।
2. सिर से संबन्धित लक्षण :
सिर और पेट में उत्पन्न होने वाले दर्द जो सिर और पेट में बदल-बदल कर आता है। स्नायुओं में तेज दर्द होने पर ऐसा महसूस होता है मानो किसी ने चिमटी से दर्द वाले स्थान को फाड़ दिया हो, चेहरे और दांत दोनों ही रोग से ग्रस्त रहते हैं और उसमें दर्द होता रहता है, यह दर्द भोजन करने से बढ़ता है और ठण्डक से घटता है, पर्यायक्रम से पेट में दर्द होता है तथा दाईं आंखों के कोटर के ऊपर काटता हुआ दर्द होता है। सिर के पिछले भाग में दबावदार दर्द होना जो हिलने-डुलने से बढ़ता है तथा शरीर में भारीपन महसूस होता है। सिर का ऐसा दर्द जो हमेशा सर्दी के मौसम में ही उत्पन्न होता है। इस तरह के रोगों में बिस्मथम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
रोगी में अधिक सुस्ती, बेचैनी और मानसिक रूप से परेशान रहने वाले लक्षण। रोगी के आंखों के चारों ओर काले घेरे बनना तथा चेहरा पीला पड़ जाना व शरीर से पसीना अधिक आना। इस तरह के लक्षणों में बिस्मथम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
3. मुंह से संबन्धित लक्षण :
मसूढ़ों में सूजन, दांतों में दर्द होना और ठण्डा पानी पीने से दर्द कम हो जाना आदि मुंह के रोग में बिस्मथम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। जीभ का रंग सफेद होना, जीभ में सूजन, जीभ के पीछे और किनारों पर कालापन आ जाना, कोथमय कीलें दिखाई देना आदि लक्षण। मुंह से अत्यधिक लार का आना तथा दांतों का ढीला हो जाना। ठण्डे पानी की प्यास हमेशा बना रहना आदि मुंह के रोगों के लक्षणों को दूर करने के लिए बिस्मथम औषधि का प्रयोग लाभकारी है। इस औषधि का प्रयोग करने से दांतों मजबूत होती है और मुंह में उत्पन्न होने वाले छाले व अन्य रोग भी ठीक होते हैं।
4. बच्चों का रोग :
बिस्मथम औषधि का प्रयोग बच्चों में होने वाले हैजा रोग में अत्यंत लाभकारी है। बच्चों में होने वाले हैजा रोग जिसमें बच्चे की हालत मरने जैसी हो जाती है ऐसी स्थिति में बच्चे को बिस्मथम औषधि देने से लाभ मिलता है। हैजा रोग में पतले दस्त अधिक मात्रा में आने के साथ प्यास अधिक लगती है। बच्चा बार-बार उल्टी करता है। दस्त से तेज बदबू आती रहती है तथा गर्म पसीना शरीर से निकलता रहता है। हैजा रोग में उत्पन्न होने वाले इस तरह के लक्षणों में बिस्मथम औषधि का प्रयोग अत्यंत लाभकारी होता है।
5. आमाशय से संबन्धित लक्षण :
आमाशय रोग ग्रस्त होने के कारण रोगी को उल्टी होने के साथ घुटन और दर्द अनुभव होना तथा पानी पीने के तुरन्त बाद ही उल्टी कर देने जैसी आदतों में बिस्मथम औषधि के सेवन करने से लाभ मिलता है। किसी भी तरल पदार्थ के सेवन करने से उल्टी हो जाने की आदत में बिस्मथम औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।
आमाशय में जलन और भारीपन महसूस होना। कभी-कभी अचानक भोजन करने के बाद उल्टी कर देना। पाचन क्रिया का खराब होना तथा डकारें लेने पर बदबू आना। पेट में दर्द, आमाशय में उत्पन्न होने वाले ऐसा दर्द जो आमाशय से शुरू होकर रीढ़ की हìी तक फैल जाता है। ऐसे लक्षणों में बिस्मथम औषधि का प्रयोग करें।
यदि पाचनतंत्र में सूजन आ गई है, ठण्डी वस्तु सेवन करने या पीने से आराम मिलता है तथा ठण्डे पदार्थ का सेवन करने या पीने के बाद पदार्थ पेट में पहुंचने के साथ ही उल्टी हो जाती है। इस तरह के आमाशय ग्रस्त होने के बाद उत्पन्न लक्षणों में बिस्मथम औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है। आमाशय रोग के कारण जीभ का रंग सफेद होना, मुंह का स्वाद मीठा या कसैला हो जाना। आमाशय के अन्दर तेज दर्द होना तथा पीछे की ओर झुकने से दर्द में आराम महसूस करना जैसे लक्षण। पेट में भारीपन महसूस होना तथा पेट में जलन व ऐंठन सा दर्द होने के साथ कलेजे में उत्पन्न होने वाली जलन अदल-बदल कर महसूस होते रहना। अत: ऐसे लक्षणों में बिस्मथम औषधि का उपयोग करने से रोग ठीक होता है।
6. दस्त से संबन्धित लक्षण :
रोगी को अधिक दस्त आना तथा प्यास का अधिक लगना। पेशाब का बार-बार आना और उल्टी होना। पेट में चुभन जैसा दर्द और गड़गड़ाहट जैसा महसूस होना। इस तरह के मल रोगों में बिस्मथम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
पतले दस्त अधिक मात्रा में आना तथा दस्त से तेज बदबू आना और कभी-कभी दस्त से ऐसी बदबू आती है मानो मुर्दे से बदबू आ रही हो। पेशाब का बार-बार व बूंद-बूंद कर आना आदि मूत्र रोग में बिस्मथम औषधि का सेवन करना चाहिए।
7. सांस संस्थान से संबन्धित लक्षण :
मध्यच्छद (क्पंचीतंहउ) के बीच के भाग में चुभनयुक्त दर्द होता है जो धीरे-धीरे आड़ा-तिरछा होकर पूरे शरीर में फैल जाती है। हृदय में दर्द होता है जो हृदय के आस-पास से बाईं हाथ में उंगुलियों तक फैल जाती है। इस तरह के सांस रोग से संबन्धित लक्षणों में बिस्मथम औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
8. शरीर के बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षण :
हाथ-पैरों में ऐंठन सा दर्द होना। कलाई में चीर-फाड़ वाला दर्द होना। लकवा मारने के कारण उत्पन्न कमजोरी मुख्य रूप से बाजू, उंगुलियों में तथा पैरों के नाखूनों में चीर-फाड़ जैसा दर्द होना। पिण्डली की बड़ी हड्डी तथा पैरों के पीछे जोड़ों के पास खुजली जैसा खरोंच। हाथ-पैरों में ठण्डापन महसूस होना आदि बाहरी अंगों में उत्पन्न लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए बिस्मथम का प्रयोग करना चाहिए।
9. नींद से संबन्धित लक्षण :
रात को सोते समय बुरे व काम वासना वाले सपने आना जिसके कारण रोगी में बेचैनी बढ़ जाती है और रोगी ठीक से नींद नहीं ले पाता है। सुबह भोजन करने के बाद नींद व आलस्य आना। इस तरह के लक्षणों को ठीक करने के लिए रोगी को बिस्मथम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे आलस्य दूर होती है और डरावने सपने आना बन्द हो जाता है।
10. पेट से संबन्धित लक्षण :
पेट में दर्द होने पर बिस्मथम औषधि का प्रयोग करने से दर्द में जल्द आराम मिलता है। छाती और पेट में जलन, पेट और रीढ़ में तेज दर्द जो पीछे की ओर झुकने से आराम मिलता है। ऐसे रोगों में बिस्मथम औषधि के प्रयोग से जल्द लाभ मिलता है। पेट का कैंसर होने पर रोग में भी बिस्मथम का प्रयोग करने से लाभ मिलता है। रोग के कारण रोगी में बेचैनी बनी रहती है तथा दर्द अपने स्थान बदलता रहता है। रोगी को अकेलापन से डर लगता है। रोगी में उत्पन्न होने वाले इस तरह के लक्षणों में बिस्मथम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
नोट : इस औषधि के प्रयोग करने से रोगी में उल्टी आती है। अत: रोगी को घबराना नहीं चाहिए क्योंकि यह औषधि उल्टी लाकर रोग को ठीक करता है।
तुलना :
बिस्मथम औषधि की तुलना एण्टिमोनियम, आर्सेनिकम, बेलाडौना तथा क्रियोजोट औषधि से की जाती है।
वृद्धि :
अकेले रहने से गर्मी के मौसम में, खाने-पीने से तथा सर्दी के मौसम में रोग बढ़ता है।
शमन :
ठण्डा पदार्थ खाने या पीने से दांतों में दर्द कम होता है तथा लोगों के साथ रहने से तथा कार्य करने से रोग में आराम मिलता है।
प्रतिविष :
नक्स, कैप्सिकम तथा कल्केरिया बिस्मथम औषधि से होने वाले हानि को समाप्त करती है।
मात्रा :
बिस्मथम औषधि 1 से 6 शक्ति तक का प्रयोग किया जा सकता है।
ब्लूमिया ओडोरैटा (कुकसिमा) BLUMEA ODORATA (KUKSIMS)
ब्लूमिया ओडोरैटा औषधि का उपयोग कई प्रकार के रोगों को दूर करने में किया जाता है लेकिन यह खांसी, बुखार, रक्तस्राव और खराश में यह बेहद लाभकारी होती है। इस औषधि का उपयोग रक्तस्राव सम्बंधी रोगों में किया जाता है जैसे- दस्त के साथ खून आना, दस्त में आंव व खून आना (पेचिश), दस्त का बार-बार आना आदि।
गर्भावस्था के दौरान खून का स्राव होने पर ब्लूमिया ओडोरैटा औषधि का उपयोग बेहतर होता है। इससे खून का स्राव रुकता है। रक्तप्रदर से पीड़ित स्त्री को यह औषधि देने से प्रदर में खून आना बन्द हो जाता है। इस औषधि का उपयोग किसी भी प्रकार के रक्तस्राव को रोकने में बेहद लाभकारी है।
विभिन्न लक्षणों में औषधियों का उपयोग :
बुखार :
तृतीयक मलेरिया अर्थात तीसरे दिन आने वाले बुखार से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए इस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। इसका उपयोग बुखार उत्पन्न होने से पहले करने से बुखार नहीं आता है और अन्य कष्ट भी दूर होते हैं।
मासिकधर्म की गड़बड़ी :
यदि मासिकधर्म अधिक मात्रा में आता हो तो ऐसे में ब्लूमिया ओडोरैटा औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे मासिकधर्म सामान्य बनता है और अन्य गड़बड़ी भी दूर होती है।
खांसी :
यह औषधि खांसी को रोकती है। खांसी के साथ गले में खराश होना खांसते समय कुत्ते की तरह आवाज निकलना आदि लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
मात्रा :
इस औषधि का मूलार्क 2x, 3x का उपयोग किया जाता है।
ब्लाटा अमेरिकाना (झींगुर (तिलचट्टा) BLATTA A MERICANA (COCKROACH)
ब्लाटा अमेरिकाना औषधि का प्रयोग कई प्रकार के रोगों को ठीक करने में लाभकारी माना गया हैं। यह औषधि जलोदर (पेट में पानी का भरना) तथा जलोदर रोग में उत्पन्न होने वाले विभिन्न अवस्था में लाभकारी है। शारीरिक रूप से उत्पन्न थकान आने पर तथा पेशाब करते समय होने वाले दर्द को ठीक करने में भी यह औषधि लाभकारी है। चलने या हल्के सीढ़ियां चढ़ने से अधिक थकान अनुभव होना आदि रोगों में ब्लाटा अमेरिकाना औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह औषधि कमजोरी को दूर करके थकावट को दूर करती है।
मात्रा :
ब्लाटा अमेरिकाना औषधि के 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
ब्लाटा ओरिएण्टैलिस (इण्डियन काकरोच) BLATTA ORIENTALI (INDIAN COCKROACH)
ब्लाटा ओरिएण्टैलिस औषधि का प्रयोग अनेक प्रकार के रोगों में किया जाता है परन्तु यह औषधि दमा, सांस संबन्धी परेशानी तथा खांसी में विशेष रूप से लाभकारी होती है। ब्लाटा ओरिएण्टैलिस औषधि का प्रयोग करने से यह रोग में तेजी से प्रतिक्रिया कर रोग को ठीक करता है। ब्लाटा ओरिएण्टैलिस औषधि का प्रयोग दमा रोग व सांस नली की सूजन में करने से दमा व सूजन दूर होती है।
सांस नली की सूजन और फेफड़ों की टी.बी. को ठीक करने के लिए तथा खांसी आने व सांस लेने में परेशानी होने पर ब्लाटा ओरिएण्टैलिस औषधि का प्रयोग करने से रोग दूर होते हैं। मोटे व्यक्ति में होने वाले रोग में ब्लाटा ओरिएण्टैलिस औषधि के प्रयोग से लाभ अधिक तेजी से होता है। खांसी के साथ पीव जैसा श्लेष्मा की अत्यधिक मात्रा निकलने पर ब्लाटा ओरिएण्टैलिस का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
सांस नली की जलन तथा सांस रुकने के साथ ही खांसी का आना। क्षय (टी.बी.) रोग तथा अधिक मवाद बनने पर ब्लाटा ओरिएण्टैलिस का प्रयोग कर रोग को ठीक किया जा सकता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ब्लाटा ओरिएण्टैलिस औषधि का उपयोग :
सांस संस्थान से संबन्धी लक्षण :
ब्लाटा ओरिएण्टैलिस औषधि का प्रयोग दमा रोग में अधिक लाभकारी है। दमा रोग अधिक बढ़ जाने या शुरुआती अवस्था में ही ब्लाटा ओरिएण्टैलिस औषधि की निम्न शक्ति का प्रयोग करने से अत्यंत लाभ होता है। परन्तु अधिक पुराने दमा रोग में उच्च शक्ति वाली ब्लाटा ओरिएण्टैलिस औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह औषधि सांस नली में होने वाले सूजन, खांसी, सांस लेने में परेशानी आदि में लाभकारी होता है। पीब जैसा बलगम आने पर और दम घुटने की आशंका बने रहने से सांस रोगों के लक्षणों में भी ब्लाटा ओरिएण्टैलिस औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
वृद्धि :
रात के समय, बरसात के मौसम में तथा लेटने पर रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है।
शमन :
ब्लाटा ओरियण्टेलिस औषधि के प्रयोग से धीरे-धीरे कफ निकलकर रोग शांत होता है।
मात्रा :
ब्लाटा ओरिएण्टैलिस औषधि के मूलार्क या 3x, 6x या 2 से 200 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। रोग के दौरान निम्न शक्तियां। बेहोशी जैसी स्थिति उत्पन्न होने पर तथा खांसी के लिए उच्च शक्तियों का प्रयोग किया जाता है और रोग ठीक होने पर औषधि का प्रयोग बंद कर दिया जाता है।
ब्लूमिया ओडोरैटा (कुकसिमा) BLUMEA ODORATA (KUKSIMS)
ब्लूमिया ओडोरैटा औषधि का उपयोग कई प्रकार के रोगों को दूर करने में किया जाता है लेकिन यह खांसी, बुखार, रक्तस्राव और खराश में यह बेहद लाभकारी होती है। इस औषधि का उपयोग रक्तस्राव सम्बंधी रोगों में किया जाता है जैसे- दस्त के साथ खून आना, दस्त में आंव व खून आना (पेचिश), दस्त का बार-बार आना आदि।
गर्भावस्था के दौरान खून का स्राव होने पर ब्लूमिया ओडोरैटा औषधि का उपयोग बेहतर होता है। इससे खून का स्राव रुकता है। रक्तप्रदर से पीड़ित स्त्री को यह औषधि देने से प्रदर में खून आना बन्द हो जाता है। इस औषधि का उपयोग किसी भी प्रकार के रक्तस्राव को रोकने में बेहद लाभकारी है।
विभिन्न लक्षणों में औषधियों का उपयोग :
बुखार :
तृतीयक मलेरिया अर्थात तीसरे दिन आने वाले बुखार से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए इस औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। इसका उपयोग बुखार उत्पन्न होने से पहले करने से बुखार नहीं आता है और अन्य कष्ट भी दूर होते हैं।
मासिकधर्म की गड़बड़ी :
यदि मासिकधर्म अधिक मात्रा में आता हो तो ऐसे में ब्लूमिया ओडोरैटा औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे मासिकधर्म सामान्य बनता है और अन्य गड़बड़ी भी दूर होती है।
खांसी :
यह औषधि खांसी को रोकती है। खांसी के साथ गले में खराश होना खांसते समय कुत्ते की तरह आवाज निकलना आदि लक्षणों में इस औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
मात्रा :
इस औषधि का मूलार्क 2x, 3x का उपयोग किया जाता है।
बर्बेरिस एक्विफोलियम मैहोनिया BERBERIS AQUIFOLIUM MAHONIA
बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का प्रयोग मुख्य रूप से त्वचा रोगों में करने से लाभ होता है। यह औषधि चिर प्रतिश्यायी रोगों, सामान्य रूप से उत्पन्न होने वाले ऐसे रोग जो आसानी से उत्पन्न नहीं हो पाता है, यकृत की दुर्बलता, आलस्य तथा अपूर्ण रूपान्तरण संबन्धी साक्ष्य रोगों में लाभकारी होता है। इस औषधि के सेवन से सभी ग्रन्थियों को बल मिलता है और शरीर का पोषण ठीक प्रकार से होता है।
बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का प्रयोग अनेक प्रकार के रोगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर किया जाता है :-
1. सिर से संबन्धित लक्षण :
जिस व्यक्ति को पित्त के कारण सिर दर्द रहता है उसे बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का सेवन करना चाहिए। कानों के ऊपर रस्सी बांधने जैसा महसूस होना तथा ऐसा दर्द होना मानो सिर से गर्म भाप निकल रहा हो। शरीर पर पपड़ीदार छाजन उत्पन्न होना आदि रोगों में बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।
2. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
जिस व्यक्ति के चेहरे पर मुंहासे, चकत्ते, फुंसियों आदि उत्पन्न हो उसे बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह मुंहासे आदि चेहरे के रोगों को दूर करके चेहरे को साफ करती है।
3. मूत्र से संबन्धित लक्षण :
मूत्र रोग में सुई चुभने व ऐंठनयुक्त दर्द होना। पेशाब से गाढ़ा श्लेष्मा, चमकदार लाल रंग का तलछट आदि निकलना। इस तरह के मूत्र रोगों में बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।
4. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी की त्वचा खुश्क, पपड़ीदार, खुरदरा हो गया हो और त्वचा पर फुंसियां उत्पन्न हो रही हो तो उसे बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का सेवन करना चाहिए। सिर में उत्पन्न होने वाली ऐसी फुंसियां जो चेहरे और गर्दन तक फैल जाती है उसे ठीक करने के लिए इस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। स्तनों पर फुंसियां उत्पन्न होने के साथ दर्द होना। दानेदार फुंसियां, मुंहासे, सूखा छाजन, तेज खुजली, ग्रन्थियों का कठोर होना आदि त्वचा रोगों में बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
तुलना :
बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि की तुलना कार्बोलिक एसिड, योनीम, बर्बेरिस बुल्गैरिस तथा हाईड्रैस्टिस से की जाती है।
मात्रा :
बर्बेरिस एक्विफोलियम औषधि के मूलार्क को अधिक मात्रा में रोगी को दिया जा सकता है। परन्तु औषधि का प्रयोग रोग के अनुसार ही करना चाहिए।
बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस BOTHROPS LANCIOLATUS
कमजोर शरीर जिसकी आंतरिक शक्ति बिल्कुल नष्ट हो गई हो। खून का अधिक बहना तथा शरीर में दूषित द्रव्य का बनना। अधिक आलस्य। शरीर के विभिन्न द्वार (जैसे मलद्वार, मूत्रद्वार आदि तथा नाक, मुंह, कान आदि) से खून का बहना तथा शरीर पर काले धब्बे उत्पन्न होना। आधे शरीर में लकवा मार जाना साथ ही बोलने में परेशानी होना। व्यक्ति स्वस्थ व हष्ट-पुष्ट होने पर भी व्यक्ति के अन्दर बोलने की शक्ति कम होना। स्नायविक में कम्पन्न होना। दायें पैर के अंगूठे में दर्द होना। फेफड़ों में खून का जमना आदि। इस तरह के लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस-लैकेसिस लैसियोलेटस औषधि का प्रयोग करें।
बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस-लैकेसिस लैसियोलेटस औषधि विभिन्न प्रकार के रोगों के लक्षणों को दूर कर रोगी को ठीक करने में उपयोग :-
1. आंखो से संबन्धित लक्षण :
नज़रों का कमजोर होना तथा कनीनिका से खून निकलने के कारण अंधे होने की सम्भावना बने रहने पर बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस -लैकेसिस लैसियोलेटस औषधि का सेवन करें। दिन में दिखाई न देना तथा सूर्योदय के बाद बिल्कुल न दिखाई देना आदि में भी इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। इस औषधि के प्रयोग से आंखों को देखने की शक्ति उत्पन्न होती है। आंखों के श्वेतपट से खून निकलने पर बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस - लैकेसिस लैसियोलेटस औषधि का प्रयोग करें।
2. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस-लैकेसिस लैसियोलेटस औषधि का प्रयोग चेहरे की सूजन और चेहरे के फूल जाने पर करने से लाभ होता है। यह औषधि चेहरे की उदासी और चेहरे की चमक को बढ़ाती है।
3. गले से संबन्धित लक्षण :
गले का लाल होना, खुश्क होना तथा गले में सिकुड़न महसूस होने के साथ भोजन आदि निगलने पर परेशानी होना आदि गले के रोगों में बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस-लैकेसिस लैसियोलेटस औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
4. आमाशय से संबन्धित लक्षण :
पेट के ऊपर के आधे भाग में दर्द होना, काले रंग का वमन (उल्टी) होना। खून की उल्टी होना तथा पेट का फूल जाना। दस्त के साथ खून आना आदि आमाशय से संबन्धित लक्षणों में रोगी को ठीक करने के लिए बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस-लैकेसिस लैसियोलेटस औषधि का प्रयोग किया जाता है।
5. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
त्वचा की सूजन, त्वचा का रंग नीला व ठण्डा पड़ जाना तथा त्वचा से खून का निकलना आदि में बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस-लैकेसिस लैसियोलेटस का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है। कोथ (गैंग्रेन)। लसीकावाहिनियां की सूजन। आंगारव्रण(अंथ्रेक्स) तथा दुर्दम विसर्प(मेलिग्नेट एरीसिपल्स) आदि रोगों में बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस-लैकेसिस लैसियोलेटस औषधि का प्रयोग करना लाभकरी होता है।
वृद्धि :
दाईं ओर करवट लेकर सोने से तथा झुकने से रोग बढ़ता है।
तुलना :
बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस-लैकेसिस लैसियोलेटस औषधि की तुलना टाक्सिकोफिस औषधि से की जाती है।
मात्रा :
रोगों में बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस-लैकेसिस लैसियोलेटस 3 से 6 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
ट्रंचिनस :
अत्यधिक तेज दर्द होने पर, सूजन, तेज विष वाला खून का निकलना तथा कोथ आदि उत्पन्न होने पर रोग ग्रस्त भाग पर इस औषधि का ट्रंचिनस का प्रयोग किया जाता है।
विशेष प्रयोग :
टाक्सिकोफिस नामक सांप जब किसी को काट लेता है तो व्यक्ति में पहले बुखार आता है। फिर बुखार अपने-आप समाप्त होने के बाद फिर वही बुखार हर साल आता रहता है। कभी-कभी इस सांप के काटने पर बुखार आदि का आना बंद हो जाता है और उसके स्थान पर अन्य लक्षण प्रकट हो जाते हैं। इस सांप के काटने पर त्वचा में असाधारण खुश्की आती है, शोफज सूजन, नियम समय पर प्रकट होने वाला स्नायुशूल तथा शरीर में उत्पन्न होने वाला ऐसा दर्द जो पूरे शरीर में घूमता रहता है। इस तरह के जहरीले सांप के काटने पर बॉथ्रॉप्स लैसियोलेटस औषधि का प्रयोग करने से जहर का असर समाप्त हो जाता है।
बोटूलीनम (बेसीलस बोटूलीनम का विष ) BOTULINUM (TOXIN OF BACILLOUS BOTULINUM)
पालक को डिब्बे में बंद करके अधिक दिन तक रखने से पालक विषैला हो जाता है। जब कोई व्यक्ति उस पालक का प्रयोग खाद्य पदार्थ के रूप में करता है तो उससे उत्पन्न होने वाला रोग कंधाघात (कंधा लकवा मार जाना) के रूप में जाना जाता है।
1. आंखों से संबन्धित लक्षण :
पालक से होने वाली खाद्य विषाष्णता से रोगी में कई लक्षण उत्पन्न होते हैं जैसे- आंखों से कोई भी वस्तु दो-दो दिखाई देना, धुंधली दिखाई देना, भोजन निगलने व सांस लेने में परेशानी, घुटन महसूस होना, कमजोरी और चलते समय लड़खड़ाना। चक्कर आना, रोगी की आवाज भारी होना, पेट में मरोड़ वाला दर्द होना। इस तरह के आंखों के रोगों में बोटूलीनम औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
2. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
चेहरे पर पर्दा पड़ने जैसा महसूस होना तथा चेहरे की पेशियों की कमजोरी के कारण चेहरे की गन्दगी न निकल पाने के कारण चेहरे का रोगग्रस्त हो जाना बोटूलीनम औषधि का प्रयोग लाभकारी होती है।
मात्रा :
बोटूलीनम औषधि की उच्च शक्ति का प्रयोग किया जाता है।
बोविस्टा (पफ-बाल) BOVISTA (PUFF-BAL)
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर बोविस्टा औषधि उपयोग :-
1. मन से सम्बंधित लक्षण :
रोगी को ऐसा महसूस होता है मानो उसका सिर भारी व फूल गया है तथा सिर में अन्दर से दर्द उत्पन्न हो रहा है। रोगी के हाथों में रखी हुई वस्तु अचानक हाथों से छूटकर नीचे गिर जाती है ऐसे में रोगी को बोविस्टा औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह औषधि सूक्ष्मग्राही होता है और शरीर में विभिन्न अंगों की चेतना शक्ति को जगाती है। इस औषधि का प्रयोग स्मरण शक्ति के कम होने पर करने से रोगी की स्मरण शक्ति बढ़ती है।
2. सिर से संबन्धित लक्षण :
रोगी को अपने सिर का पिछला भाग बढ़ा हुआ महसूस होता है। सिर दर्द के साथ ऐसा महसूस होता है मानो सिर फैल गया हो। रोगी में उत्पन्न होने वाला यह सिर दर्द सुबह के समय, खुली हवा में और लेटने पर बढ़ जाता है। रोगी के नाक से ठोस की तरह बलगम निकलता रहता है। मस्तिष्क के अन्दर मन्द-मन्द कुचलन जैसा दर्द होता रहता है। रोगी तुतलाता रहता है। सिर में उत्पन्न होने वाली खुजली जो गर्मी से और बढ़ जाती है। त्वचा की अत्यंत संवेदनशीलता तथा खुजली वाले स्थान को तब तक खुजलाना जब तक दर्द न उत्पन्न हो जाए। सिर रोग में उत्पन्न होने वाले इन लक्षणों में बोविस्टा औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है। यह औषधि सुबह सोकर उठने पर सिर में चक्कर आने, जड़मति होने तथा चक्कर आने पर बेहोश होने पर अधिक लाभकारी होती है।
3. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
रोगी के नथुनों के आस-पास और मुंह के कोनों पर पपड़ियां जमना तथा रोगी का होंठ कटे-फटे रहना आदि चेहरे पर उत्पन्न लक्षणों में बोविस्टा औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। यदि नाक और मसूढ़ों से खून आता हो, गाल व होंठ फूल गया हो तथा चेहरे में कीलें निकलने के कारण दर्द होता हो तो ऐसे लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बोविस्टा औषधि का सेवन करना चाहिए। चेहरे के मुंहासें, गर्मियों में अधिक दाने निकलना तथा श्रृंगार आदि से चेहरे पर होने वाले रोगों में बोविस्टा औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। अधिक क्रीम आदि प्रयोग करने से होने वाले चेहरे की मुंहासे आदि में भी बोविस्टा औषधि लाभकारी है।
4. बुखार से संबन्धित लक्षण :
रोगी को यदि बुखार लग रहा है तथा बुखार में 7 बजे से 10 बजे तक रोगी को अधिक ठण्ड लगती हो तो रोगी को बोविस्टा औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे बुखार में जल्द आराम मिलता है। इसके अतिरिक्त बुखार में रोगी को अधिक प्यास लगने तथा बिस्तर पर जाते ही सर्दी के साथ पूरे शरीर में कंपकंपी शुरू हो जाने जैसे लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को ठीक करने के लिए इस औषधि का सेवन विशेष रूप से लाभकारी है।
5. हृदय से संबन्धित लक्षण :
हृदय की धड़कन और हृदय के पास अनुभव होने के साथ घुटन होना मानो हृदय का आकार बढ़ गया है। हृदय रोग के इन लक्षणों में बोविस्टा औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
6. आंखों से संबन्धित लक्षण :
कोई भी दूर रखी हुई चीज अधिक पास दिखाई देना तथा आंखों की चमक कम होने के साथ ही आंखों का धंस जाना आदि में बोविस्टा औषधि का प्रयोग करें।
7. आमाशय से संबन्धित लक्षण :
आमाशय रोग ग्रस्त होने पर रोगी को अपने पेट में ऐसा महसूस होने लगता है मानो बर्फ का गोला पेट में रखा हो और साथ ही रोगी चुस्त कपड़े कमर पर पहनने से तेज दर्द होने लगता है। इस तरह के लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए रोगी को बोविस्टा औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
8. स्त्री रोग से संबन्धित लक्षण :
यदि स्त्री को मासिक धर्म के समय या मासिक धर्म से पहले दस्त आता हो उसे बोविस्टा औषधि का सेवन करना चाहिए। मासिक धर्म समय से पहले और अधिक मात्रा में आना तथा मासिक धर्म विशेष रूप से रात को अधिक आना आदि में भी बोविस्टा औषधि से लाभ मिलता है। मासिक धर्म के बाद गाढ़ा, ठोस व हरे रंग का प्रदर आना। चुस्त कपड़े कमर पर पहनने से दर्द होना। मासिक धर्म के बाद बीच-बीच में थोड़ा-थोड़ा खून का आना आदि स्त्री रोगों में उत्पन्न लक्षणों में बोविस्टा औषधि का प्रयोग करने से मासिक धर्म की परेशानी दूर होती है। जिन स्त्रियों को मासिक धर्म के समय जांघों में दर्द होता है उसके लिए बोविस्टा औषधि का प्रयोग लाभकारी है। खूनी प्रदर तथा डिम्बाशय के पास रसौलियां आदि होने पर बोविस्टा औषधि का प्रयोग करें। जिन स्त्रियों में कामोत्तेजना की भावना अधिक उत्पन्न होती है और प्रदर रोग में वायु भरने व योनिमार्ग से गड़गड़ाहट की आवाज आती है तो ऐसे लक्षणों में बोविस्टा औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
9. पेट से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी को पेट में दर्द होने के साथ ही लाल रंग का पेशाब आता है तथा भोजन करने के बाद पेट का दर्द कम हो जाता है तो रोगी में उत्पन्न होने वाले ऐसे लक्षणों में बोविस्टा औषधि का प्रयोग करना चाहिए। यह पेट के दर्द को दूर कर पेशाब को साफ करता है। पेट में तेज दर्द होना जिसके कारण रोगी को झुककर रहना रहना पड़ता है या रोगी को नाभि के पास दर्द होता हो तो रोगी को बोविस्टा औषधि का सेवन कराए। यदि रोगी को मूलाधार के आरपार सुई चुभने जैसा दर्द महसूस होता हो जो मलद्वारा व अण्डकोष तक फूल जाता हो तो रोगी को बोविस्टा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
बूढ़े लोगों में उत्पन्न होने वाले पुराना आतिसार जो रात और सुबह के समय बढ़ जाता है तो रोगी को बोविस्टा औषधि देना लाभकारी होता है।
10. नाक-कान से संबन्धित लक्षण :
नाक और अन्यान्य श्लैष्मिक झिल्ली से चिमड़ी, लसदार और सूत की तरह नाक से स्राव होना तथा सुबह के समय नाक से खून निकलने पर बोविस्टा औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। यह औषधि नकसीर रोग में भी लाभकारी है। कान में दुर्गंधित पीव निकलने या कान में खुजली होने पर बोविस्टा औषधि का सेवन करें। इससे कान के रोग दूर होते हैं।
11. मल-मूत्र से संबन्धित लक्षण :
पेशाब में जलन होना, मूत्र नली में डंक मारने जैसा दर्द होना तथा मूत्रनली में खुजली होने पर बोविस्टा औषधि का सेवन करें। इससे मूत्र रोग से संबन्धित लक्षणों को दूर कर रोग को ठीक करता है। गुदाद्वार में कीड़े काटने जैसी खुजली होने पर भी बोविस्टा औषधि का प्रयोग लाभकारी है। गुदाद्वार और जननेन्द्रिय के बीच चुभनयुक्त दर्द होने पर भी यह औषधि लाभकारी है।
12. बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षण :
यदि शरीर के सभी जोड़ों वाले स्थान पर कमजोरी आ गई हो और हाथों में इतनी कमजोरी आ गई है कि हाथों में पकड़ी हुई चीज अपने-आप हाथों से छूट जाती है तो रोगी में उत्पन्न इस तरह के लक्षणों को ठीक करने के लिए बोविस्टा औषधि का सेवन करना चाहिए। हाथ-पैरों में थकान महसूस होने पर भी यह औषधि लाभकारी होती है। शरीर के बगल से प्याज की गंधयुक्त बदबू आने पर। गुदाद्वार के नोक पर अधिक खुजली होना। हाथों के पीछे गीली छाजन होना। पैरों पर खुजली होना तथा जोड़ टूटने के बाद उसमें पानी भरने के रोगों में बोविस्टा औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। कलाई के जोड़ों में मोच आने पर बोविस्टा औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है। हाथ-पैरों में भारीपन होने से बोविस्टा औषधि का प्रयोग लाभकारी है।
13. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
बोविस्टा औषधि का प्रयोग विभिन्न प्रकार के त्वचा रोग से संबन्धित लक्षणों में किया जाता है जैसे-किसी कारण से त्वचा पर निशान पड़ना। जोश आने पर शीतपित्त उत्पन्न होना। रोगी में गठियावात, लंगड़ापन, धड़कन और दस्त जैसी अवस्थाएं उत्पन्न होना, पित्त उछलना, दाद तथा सूखी या गीली एक्जिमा होना आदि त्वचा रोग के लक्षणों में बोविस्टा औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है। गर्मी के कारण शरीर में खुजली होने पर इस औषधि का प्रयोग करें। यदि किसी को गीली छाजन होने के साथ छाजन वाले स्थान पर पपड़ियां हो तो बोविस्टा औषधि का सेवन करें। इसके अतिरिक्त पूरे शरीर पर फुंसियां आना, सर्दी लगना, गुदाद्वार में खुजली, सुबह सोकर उठने पर शीतपित्त निकलना जो नहाने से बढ़ जाती है तथा पिल्लागरा नामक त्वचा रोग होना आदि लक्षणों में बोविस्टा औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। बोविस्टा औषधि का प्रयोग रीढ़ की हड्डी के निचले भाग में अधिक खुजली को दूरकर रोग को ठीक करता है।
औषधि के प्रयोग से शरीर में उत्पन्न लक्षण :
बोविस्टा औषधि त्वचा को विशेष रूप से प्रभावित करती है जिसके फलस्वरूप छाजन जैसा विस्फोट प्रकट हो जाता है।
तुलना :
बोविस्टा औषधि की तुलना कल्के, रस-टाक्स, सीपिया, सिक्यूटा आदि से की जाती है।
संबन्ध :
बोविस्टा तारकोल की प्रतिरोधक है। पेट में गैस चढ़ जाने से दम घुटता है। पुराने शीतपित्त में रस-टाक्स के बाद रोग बढ़ता है। इस औषधि के सेवन से रोगी में कभी-कभी बुखार भी पैदा हो जाता है जो सुबह 5 से 8 बजे और रात को 7 से 10 के अन्दर होता है।
वुद्धि :
रात के समय और सुबह के समय, भोजन करने के बाद तथा छींकने पर रोग बढ़ता है। इसके अतिरिक्त मासिक धर्म के समय बोविस्टा औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
शमन :
दिन के समय, भोजन करते समय, दोहरा होने पर तथा पैरों को मोड़कर पेट में लगाकर रखने से रोग में आराम मिलता है।
मात्रा :
बोविस्टा औषधि 3 से 6 शक्ति तक का प्रयोग किया जा सकता है।
ब्रैची ग्लोटिस BRACHY GLOTTIS (PUKA-PUKA)
ब्रैची ग्लोटिस औषधि शरीर के अंगों में उत्पन्न लक्षणों को दूर कर उससे संबन्धित रोग को ठीक करने में लाभकारी मानी गई है। परन्तु कभी-कभी इस औषधि के सेवन से यह औषधि शरीर में प्रतिक्रिया शरीर में फड़फड़ाहट जैसी विशेष लक्षण पैदा करती है। यह औषधि गुर्दे और मूत्र संबन्धी रोगों को दूर करने में लाभकारी है। इसके अतिरिक्त ब्रैची ग्लोटिस औषधि से कान, नाक, खुजली, छाती में घुटन तथा लिखने पर हाथों में ऐंठन सा दर्द होने पर, अण्डकोष की सूजन तथा गुर्दे का एक विशेष प्रकार का रोग जिसमें अन्नसार उत्पन्न होता है उसे ठीक करता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों को दूर करने में ब्रैची ग्लोटिस औषधि का उपयोग :-
1. पेट से संबन्धित लक्षण :
रोगी के पेट में ऐसा महसूस होना मानो पेट में कोई चीज चक्कर काट रही हो या डिम्बाशय प्रदेश में फड़फड़ाहट अनुभव होना आदि लक्षणों में ब्रैची ग्लोटिस औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे पेट की फड़फड़ाहट आदि दूर होती है।
2. मूत्र से संबन्धित लक्षण :
किसी कारण से मूत्राशय में दबाव महसूस होने पर तथा पेशाब करने के बाद भी पेशाब करने की इच्छा बना रहने जैसे मूत्र रोग के लक्षणों में ब्रैची ग्लोटिस औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। यह औषधि मूत्राशय में लहर जैसी अनुभूति होने पर तथा मूत्रनली में दर्द होने पर प्रयोग करने से विशेष लाभकारी होती है। यदि किसी रोगी के पेशाब में श्लेष्मा कण आता हो, उपकला, अन्नसार और निर्मोक रहते हो तो ब्रैची ग्लोटिस औषधि का प्रयोग करें।
3. बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षण :
लिखते समय यदि हाथों की अंगुलियों, अंगूठें और कलाई में ऐंठन सा दर्द होने के साथ ही दर्द धीरे-धीरे पूरे हाथ की मांसपेशियों और हड्डियों तक फैल जाता है तो हाथ-पैर या शरीर किसी भी अंग में उत्पन्न होने वाले इस तरह के रोगों को ठीक करने के लिए ब्रैची ग्लोटिस औषधि का सेवन करें। इससे हाथ-पैरों में उत्पन्न दर्द आदि दूर होते हैं और शरीर शक्तिशाली बनता है।
तुलना :
ब्रैची ग्लोटिस औषधि की तुलना एपिस, हेलोनियस, मर्क्यू-कौ और प्लम्बम से की जाती है।
मात्रा :
ब्रैची ग्लोटिस औषधि 1 से 3 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
बोरिकम एसिड BORICUM ACID (BORACIC ACID)
बोरिकम एसिड औषधि का प्रयोग रोगों को रोकने के लिए विशेष रूप से किया जाता है। यह औषधि खमीरण (फरमेन्टेशन) तथा पूतीभवन (प्युट्रेशन) जैसे रोगों को बढ़ने से रोकती है।
बोरिकम एसिड औषधि का विभिन्न प्रकार के लक्षणों में उपयोग :-
1. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
पूरे शरीर व हाथों की त्वचा पर लाल-लाल दाने निकलने पर बोरिकम एसिड औषधि का प्रयोग करना चाहिए। आंखों के आस-पास सूजन होना। निस्त्वचनीय (एक्सफोलाइटिंग) तथा त्वचा सूज जाने पर इस औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है। आंखों के आस-पास के ऊतकों में पानी भर जाने पर बोरिकम एसिड औषधि का प्रयोग करें। इससे आंखों व त्वचा आदि का रोग ठीक होता है।
2. मूत्र से संबन्धित लक्षण :
यदि किसी रोगी के मूत्रनली में दर्द होता है तथा पेशाब बार-बार आता है तो ऐसे मूत्र रोग के लक्षणों में बोरिकम एसिड औषधि का सेवन करना चाहिए। रोगी को अधिक ठण्ड महसूस होना तथा मधुमेह के रोगों में बोरिकम एसिड औषधि का प्रयोग किया जाता है। यह औषधि जीभ सूखने, जीभ लाल और कटी-फटी होने तथा मुंह से ठण्डा लार गिरने पर भी किया जाता है। इसके सेवन से सभी रोग ठीक होते हैं।
3. स्त्री रोग से संबन्धित लक्षण :
मासिक धर्म के समय स्वभाव में चिड़चिड़ापन आने पर बोरिकम एसिड औषधि का प्रयोग करें। योनि का अधिक ठण्डा होना। पेशाब के बार-बार आने के साथ पेशाब में जलन और कूथने आदि रोग में बोरिकम एसिड औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है। इसके सेवन से सभी स्त्री रोग ठीक होते हैं तथा पेशाब की जलन आदि भी दूर होती है।
मात्रा :
बोरिकम एसिड 3 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
रोग के विशेष परिस्थिति में औषधि की मात्रा :
1. यदि आहार नली या सांस नली में सूजन हो और थूक में युग्म जीवाणु मौजूद हो साथ ही निमोनिया में चिपचिपा थूक आता हो और दर्द के साथ बार-बार खांसी आ रही हो तो रोगी को बोरिकम एसिड औषधि 0.30 ग्राम की मात्रा में दिन में 6 बार सेवन कराया जा सकता है।
2. मूत्राशय में सूजन के साथ चिरने जैसा दर्द होने पर बोरिकम एसिड औषधि के घोल को इंजेक्शन के रूप में या 1 गिलास गर्म दूध में 1 चम्मच चूर्ण मिलाकर सेवन कराया जा सकता है।
3. गुहेरिया रोग में बोरिकम एसिड औषधि की 1 ग्राम की मात्रा में 28 मिलीलीटर पानी मिलाकर सेकने से रोग ठीक होता है।
4. घावों पर बोरिकम एसिड औषधि के पांउडर के रूप में छिड़कने से घाव ठीक होता है।
ब्रोमम (ब्रोमाइन) (ब्रोम) BROMUM (BROMINE)
ब्रोमम औषधि का प्रयोग अनेक प्रकार के रोगों को दूर करने में किया जाता है परन्तु यह औषधि सांस रोगों में विशेष रूप से लाभकारी मानी गई है। यह औषधि बच्चों में होने वाले कण्ठमाला जिसमें गले की ग्रन्थियां बढ़ जाती है तथा सफेद दाग को ठीक करता है। इसके अतिरिक्त कान की ग्रन्थियों की सूजन और गलगण्ड, रोगी में अधिक गुस्सा आना, दाई ओर के कान में कनफेड़ होने पर, घुटने महसूस होने के साथ शरीर से अधिक गर्मी, अत्यधिक पसीना और अधिक कमजोरी होने पर इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। शरीर में अधिक गर्मी पैदा होने के कारण उत्पन्न होने वाले रोग जैसे- ग्रन्थियों में रस या पीव का भर जाना तथा ग्रन्थियों का कठोर हो जाना जो पकती नहीं है। ऐसे लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए ब्रोमम औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है और ग्रन्थियों की कठोरता दूर होती है।
ब्रोमम औषधि के लक्षण :
ब्रोमम औषधि के सेवन से रोगी के बाएं अंगों में अधिकतर लक्षण उत्पन्न होते हैं। यदि इस औषधि के सेवन करने पर ऐसे कोई लक्षण उत्पन्न होते हो तो समझना चाहिए कि औषधि अपना कार्य ठीक तरह से कर रही है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर ब्रोमम औषधि का उपयोग :-
1. मन से सम्बंधित लक्षण :
मानसिक रोगों में रोगी की मानसिकता खराब हो जाती है जिसके कारण रोगी को ऐसा महसूस होता है कि उसके पीछे कोई व्यक्ति है या उसे कोई देख रहा है। रोगी के अन्दर चिड़चिड़ापन आ जाता है। रोगी में सोचने की शक्ति कम हो जाती है। ऐसे मानसिक रोगों के लक्षणों में ब्रोमम औषधि का प्रयोग करने से रोगी की मानसिकता ठीक होती है। मानसिक कार्य करने में असहाय। अपने ही विचारों में हमेशा उलझा रहना। स्मरण शक्ति का कम होना आदि मानसिक रोगों के लक्षणों में ब्रोमम औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
2. सिर से सम्बंधित लक्षण :
माईग्रेन अर्थात आधे सिर का दर्द जो सिर झुकाने पर तथा दूध पीने पर बढ़ जाता है। सिर का ऐसा दर्द जो धूप लगने से और तेज चलने से बढ़ता है। ऐसा सिर दर्द जिसमें दर्द आंखों से होते हुए चलता रहता है। नदी नाला पार करते समय सिर चकराना। लेटने पर चक्कर आने के साथ सिर दर्द होना। शाम के समय विशेष रूप से चक्कर आना तथा पानी का बहना या झरना आदि देखने पर चक्कर आना आदि लक्षणों में ब्रोमम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
3. नाक से संबन्धित लक्षण :
सर्दी-जुकाम होने के कारण नाक से अधिक स्राव होता है जिसके कारण नाक के नथुने छिल जाते हैं। जुकाम के कारण दांई छिद्र बंद हो जाता है। नाक की जड़ पर दबाव महसूस होना। नाक की सरसराहट, चसचसाहट तथा चेहरे या नाक पर मकड़ी का जाला तना हुआ महसूस होना। नाक के नथुने बार-बार फड़कना। नाक से खून आने के साथ छाती की तकलीफ कम हो जाना। इस तरह के लक्षणों में रोगी को ब्रोमम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
4. गले से संबन्धित लक्षण :
गले में ऐसा महसूस होना मानो गले में कच्चापन आ गया है तथा शाम के समय कर्कशता महसूस होता है। भोजन आदि निगलते समय गलतुण्डिकाओं में दर्द होता तथा गलतुण्डिका का रंग गहरा लाल होने के साथ ही रक्तवाहिनियां उभरी हुई महसूस होती हैं। सांस लेते समय सांस नली में गुदगुदी होना तथा अत्यधिक तप जाने के कारण आवाज खराब होना। गले के रोगों के ऐसे लक्षणों में ब्रोमम औषधि का प्रयोग करना लाभकारी है। इस औषधि के प्रयोग करने पर यह उत्पन्न होने वाले रोगों पर तेजी से प्रतिक्रिया कर रोगों को ठीक करता है।
5. फेफड़े से संबन्धित लक्षण :
फुफ्फुस के निचले भाग में अधिक भारीपन महसूस होना। सांस लेने से छाती में दर्द होना। गहरी सांस लेने पर दर्द होना। छाती में ऐसा महसूस होना जैसे गंधक अथवा धुआं आदि भर गया हो। ऐसे लक्षणों में रोगी को ब्रोमम औषधि का सेवन कराना चाहिए।
6. आमाशय और पेट से संबन्धित लक्षण :
आमाशय या पेट रोगग्रस्त होने पर उससे संबन्धित लक्षणों में रोगी की जीभ से लेकर नीचे पेट तक तेज जलन होती है। पेट में दबाव के साथ भारीपन महसूस होता है। जठरशूल (गैस्ट्राल्गिया) जो भोजन करने से कम होता है। पेट का अधिक फूल जाना। दर्द के साथ खूनी बवासीर होने के साथ काले रंग का मल निकलना आदि आमाशय व पेट के रोगों के लक्षणों में ब्रोमम औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है।
7. आंखों से सम्बंधित लक्षण :
आंखों का रंग हल्का नीला, बालों का रंग भूरा, भौं का रंग सफेद होना तथा त्वचा का रंग अधिक सफेद हो जाने पर ब्रोमम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
8. गले से संबन्धित लक्षण :
ब्रोमम औषधि का प्रयोग कण्ठमाला होने पर करने से लाभ मिलता है। यह औषधि गले का रंग गहरा लाल होने जैसी लक्षण उत्पन्न होने पर भी लाभदायक है। ब्रोमम औषधि का प्रयोग थाइराइड ग्रन्थि की सूजन, गर्दन, जबड़े और जीभ के नीचे की गिलटियां आदि उत्पन्न होने पर भी किया जाता है। यह औषधि घेंघा के रोग को भी दूर करने में लाभकारी होती है। गले में जलन या दर्द आदि होने पर भी ब्रोमम औषधि के सेवन से जलन दूर होती है। कंठमाला, तपेदिक (टी.बी.) और अन्य गांठों के उत्पन्न होने पर ब्रोमम औषधि का सेवन करें।
9. सांस संस्थान से सम्बंधित लक्षण :
लगातार 10 दिन तक चलने वाली काली खांसी में ब्रोमम औषधि का प्रयोग करने से खांसी दूर होती है। सूखी खांसी के साथ सांस नली में कर्कशता तथा उरोस्थि के पीछे जलन के साथ दर्द होना। खांसी के साथ रोगी में अधिक गुस्सा आने के साथ स्वरयंत्र में कफ भरने से खड़खड़ाहट होना। गले में घुटन पैदा करने वाली खांसी होना। बुखार के बाद होने वाली खांसी। सांस लेने में कठिनाई और दर्द होना। छाती में तेज ऐंठन सा दर्द होना। छाती का दर्द ऊपर की ओर चलना। सांस लेते समय ठण्ड महसूस होना। सांस लेने पर खांसी पैदा होना। स्वरयन्त्र का डिफ्थीरिया, झिल्ली स्वरयंत्र में बनना और झिल्लियों का ऊपर की ओर फैलना आदि सांस रोगों में ब्रोमम औषधि का प्रयोग करने से सांस के सभी रोग ठीक होते हैं। इसके अतिरिक्त ब्रोमम औषधि का प्रयोग अन्य सांस संबन्धी रोगों जैसे- दमा, फेफड़े के अन्दर सांस लेने में कठिनाई। नाविकों का दमा जो समुन्द्र तट या स्थान पर आ जाने से ठीक होता है। सांस नली की सूजन, सांस नली में अत्यधिक जलन। कभी-कभी सांस नली में रोगी को ऐसा महसूस होना मानो सांस नली में धुंआ भरा हो। ऐसे सांस संबन्धी लक्षणों में ब्रोमम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
डिफ्थीरिया और क्रुप रोग में भी ब्रोमम औषधि का प्रयोग विशेष रूप से लाभकारी माना गया है।
10. पुरुष रोग से संबन्धित लक्षण :
अण्डकोष की सूजन तथा अण्डकोष का कठोर होने के कारण हल्का सा झटका लगने से दर्द पैदा हो जाना आदि लक्षणों में ब्रोमम औषधि का प्रयोग करें।
11. स्त्री रोग से संबन्धित लक्षण :
डिम्ब ग्रन्थियों में सूजन आ जाना, मासिक धर्म समय से पहले तथा अधिक मात्रा में आना। मासिक धर्म से पहले चेहरे पर उदासी व मायुसी छाना आदि लक्षणों में ब्रोमम औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
स्तनों से कांख तक सुई चुभन की तरह दर्द होना। बांई स्तन में गोली लगने जैसा दर्द होना जो दबाव देने से बढ़ जाती है। ऐसे लक्षणों में भी इस औषधि का प्रयोग करें।
12. नींद से सम्बंधित लक्षण :
रात को सोते समय सपने में बुरे विचार आना जिसके कारण रात को ठीक से नींद नहीं आती है। डरावने सपने आने के कारण सोते-सोते अचानक उठकर बैठ जाना और चौंकना। रात को ठीक से न सो पाने के कारण शारीरिक थकान व काम में आलस्य बना रहना। साथ ही नींद न आने के कारण शरीर में कंपन्न और कमजोरी आ जाना। नींद रोग से संबन्धित ऐसे लक्षणों में ब्रोमम औषधि का प्रयोग करने से रोग ठीक होता है और रोगी को नींद में डरावने सपने आना बंद हो जाते हैं।
13. शरीर के बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षण :
शरीर के किसी भी अंगों में उत्पन्न होने वाले गांठों को ठीक करने के लिए ब्रोमम औषधि का सेवन करना चाहिए। इससे गांठ टूटकर समाप्त होती है। किसी प्रकार की गर्मी से अत्यधिक प्रभावित होने पर उत्पन्न होने वाले उपसर्ग को दूर करने में यह औषधि लाभदायक है। पूरे शरीर में पत्थर की तरह कठोर होने वाली ग्रन्थियों के लिए भी ब्रोमम औषधि का सेवन करने से रोग ठीक होता है।
14. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
चेहरे पर मुंहासें होना तथा दाने निकलने पर ब्रोमम औषधि का प्रयोग करें। बाजुओं और चेहरे पर फोड़े होना। ग्रंथियां पत्थर जैसा कठोर विशेष कर जबड़े और गले की कठोरता। कठोर गलगण्ड आदि रोगों में ब्रोमम औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। त्वचा के अन्दर जीवित कीटाणु अथवा अन्य चीज होने की अनुभूति जो अधिकतर हाथ-पैरों में महसूस होता है। त्वचा रोग में ऐसे लक्षण उत्पन्न होने पर ब्रोमम औषधि का सेवन करने से लाभ मिलता है।
तुलना :
ब्रोमम औषधि की तुलना कोनियम, स्पांजिया, आयोडम, आस्टेरियस, औषधि से की जाती है।
वृद्धि :
शाम से लेकर आधी रात तक, गर्म कमरे में बैठे रहने पर, नमी वाले मौसम में, आराम के समय और बांई करवट लेने पर रोग बढ़ता है।
शमन :
शरीर में किसी प्रकार की हरकत, व्यायाम करने तथा समुन्द्र तट पर रोग कम होता है।
संबन्ध :
घेंघा रोग होने पर रोगी आयोडम का सेवन करने के बाद ब्रोमम औषधि का सेवन कराए। इससे घेंघा रोग बिल्कुल ठीक हो जाता है। कुकर खांसी या काली खांसी जिसे ठीक करने के लिए आयोड, हिपर, फास, स्पान्जिय औषधि के प्रयोग से ठीक किया गया हो। परन्तु इन रोगों के पुन: शुरू होने पर ब्रोमम औषधि का सेवन कराने से रोग जड़ से समाप्त हो जाता है।
प्रतिविष :
ब्रोमम औषधि के प्रयोग से रोगों में हानि होने पर अमोनि-कार्बो, कैम्फर आदि का प्रयोग करना चाहिए। इससे ब्रोमम औषधि से होने वाली हानि दूर होती है।
ब्रायोनिया (वाइल्ड हाप्स) (ब्राया) BRYONIA (WILD HOPS)
ब्रायोनिया औषधि शरीर के सभी सीरमीं कलाओं तथा आंतरिक अंगों को प्रभावित करती है। यह औषधि सभी प्रकार के दर्द को दूर करने में लाभकारी है, जैसे-सुई चुभन वाला दर्द, चीर-फाड़ वाला दर्द तथा टिस मारता हुआ दर्द। इस तरह का दर्द शरीर में होने वाली किसी भी हरकत से बढ़ जाता है तथा आराम करने से दर्द में आराम मिलता है। छाती में उत्पन्न होने वाला चुभन के दर्द को ठीक करने में ब्रायोनिया औषधि का सेवन विशेष रूप से लाभकारी है।
इसके अतिरिक्त रोगी में उत्पन्न होने वाले अन्य कई लक्षणों के होने पर ब्रायोनिया औषधि का उपयोग किया जाता है, जैसे- रोगी में चिड़चिड़ापन होना, सिर उठाने पर चक्कर आना, सिर दबाने से दर्द होना, मुंह और होठों का सूख जाना व फट जाना, प्यास का अधिक लगना, मुंह का स्वाद कडुवा होना, पेट के ऊपर का आधा भाग संवेदनशील रहना तथा आमाशय में ऐसा महसूस होना मानों की पत्थर रखा हो। यह औषधि खुश्क, कठोर, सूखी खांसी तथा आमवाती दर्द और सूजन को दूर करती है।
ब्रायोनिया औषधि के गुण :
ब्रायोनिया औषधि को मुख्य रूप से सुदृढ़ व स्वस्थ्य शरीर वाले व्यक्तियों में उत्पन्न होने वाले चिड़चिड़ापन व कमजोरी आदि को दूर करने में लाभकारी माना गया है। इस औषधि का प्रयोग करने से यह औषधि रोग को ठीक करने के लिए अधिकतर दाएं भाग की प्रतिक्रिया करती है तथा खुली हवा में रहने से इस औषधि के प्रतिक्रिया से उत्पन्न होने वाले लक्षण तेज हो जाते हैं। सर्दियों के मौसम के बाद गर्मी का मौसम आने पर रोग अधिक बढ़ जाता है।
ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग बच्चों के ऐसे रोग जिसमें बच्चे गोद से नीचे नहीं रहना चाहता है, हमेशा रोता रहता है और बच्चे में कमजोरी उत्पन्न होना आदि लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि का सेवन कराने से रोग ठीक होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न होने वाले रोगों के लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि का उपयोग :-
1. मन से संबन्धित लक्षण :
रोगी में अधिक चिड़चिड़ापन आना तथा बात-बात पर गुस्सा आना। हमेशा उदास व रोते रहना तथा मन में ऐसा महसूस करना मानो वह खो गया हो। रोगी हमेशा अपने कारोबार संबन्धी बातें ही करता है तथा अपने ही विचारों में उलझा रहता है। इस तरह की मानसिकता वाले रोगी को ब्रायोनिया औषधि का सेवन कराना चाहिए।
2. सिर से संबन्धित लक्षण :
सिर को ऊपर उठाने पर चक्कर आना साथ ही रोगी का जी मिचलाना व बेहोशी उत्पन्न होना। सिर रोग के कारण कभी-कभी दिमाग का भ्रमित हो जाना। सिर में फाड़ने जैसा दर्द होना तथा ऐसे महसूस होना मानो कोई चीज अन्दर टक्कर खा रही हो जो हिलने-डुलने या झुकने से, आंखें खोलने-बंद करने से और बढ़ जाता है तथा सिर का यह दर्द सिर के पिछले भाग में जा कर रुकता है। इस तरह के लक्षण वाले सिर दर्द में ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। गाल की हड्डियों में खिंचाव महसूस होना। तेज सिर दर्द जो हिलने-डुलने से दर्द इतना अधिक बढ़ जाता है कि नेत्रगोलक तक दर्द पहुंच जाता है। सिर का साधारण दर्द जिसमें दर्द से सिर के दोनों कोटर प्रभावित होते हैं। सिर रोग के ऐसे लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि का सेवन कराएं। इससे सभी प्रकार का सिर दर्द व अन्य रोग में आराम मिलता है।
3. नाक से संबन्धित लक्षण :
मासिक धर्म के समय मासिक स्राव आने के बदले बार-बार नाक से खून का गिरना। सुबह के समय नाक से खून गिरने पर सिर दर्द से आराम मिलना आदि नाक रोग के लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग करें। सर्दी-जुकाम के साथ सिर में गोली लगने जैसा दर्द होना। नाक की नोक में सूजन तथा ऐसा महसूस होना मानो सूजन को छूने से वह घाव बन जाएगा। ऐसे लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि का सेवन करें।
4. कान से संबन्धित लक्षण :
कान रोग ग्रस्त होने के कारण आने वाले चक्कर को दूर करने के लिए ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग करें। कान रोगग्रस्त होने के कारण चक्कर आने वाले रोग में ब्रायोनिया औषधि के स्थान पर औरम, नेट्रम-सैली तथा चाइना का भी प्रयोग किया जा सकता है। कानों में गरजन व भिन्भिनाहट जैसी आवाज सुनाई देने पर ब्रायोनिया औषधि का सेवन कराने से रोग में लाभ मिलता है।
5. आंखों से संबन्धित लक्षण :
आंखों में दबाव महसूस होने के साथ कुचलन जैसा हल्का दर्द महसूस होना। अधिमंथ(ग्लूकोमा) रोग। आंखो को छूने या आंखों को घुमाने से दर्द होना आदि आंखों से संबन्धित लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग करें।
6. मुंह से संबन्धित लक्षण :
होंठ खुश्क होना तथा बिल्कुल कटे-फटे जैसा हो गया हो। मुंह, जीभ और गला सूख गया हो जिसके कारण प्यास अधिक लग रही हो। जीभ पर पीले गहरे तथा कत्थई रंग की परत जम जाना तथा पाचनतंत्र संबन्धी खराबी के कारण जीभ का सफेद होना आदि मुंह रोग के लक्षण प्रकट होने पर ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है। मुंह का स्वाद कडुवा होना, पुराने धूम्रपान करने वालों के निचले होंठों में जलन होना, होठों की सूजन, होंठ का रूखापन तथा काले व कटे-फटे होने पर ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग करना लाभदायक है।
7. गले से संबन्धित लक्षण :
गले का सूख जाना, भोजन करने पर चुभन वाला दर्द होना तथा गले में खुरचा व संकीर्ण जैसा महसूस होना, स्वरयंत्र और सांसनली में ठोस कफ बनना जो अधिक खखारने के बाद ढीला होकर बाहर निकलता हो तथा गर्म कमरे में जाने से रोग का बढ़ जाना आदि गले रोग से संबन्धित लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग करें।
8. आमाशय से संबन्धित लक्षण :
सोकर या बैठकर उठने पर जी मिचलाना व बेहोशी छाना, भूख का कम लगना, अधिक प्यास लगना, खाना खाने के बाद उल्टी होने के साथ पित्त व पानी निकलना, गर्म पेय पदार्थ पीने से रोग बढ़ जाने के साथ ही उल्टी हो जाना, आमाशय वाले स्थान को छूने से दर्द होना, भोजन करने के बाद पेट में ऐसा महसूस होना मानो कोई पत्थर रखा हो। खांसने पर आमाशय में दर्द होना, गर्मी के मौसम में पाचन तन्त्र खराब होना तथा पेट के आधे से ऊपर वाले भाग को छूने से तेज दर्द होना। इस तरह के आमाशय से संबन्धित लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग किया जाता है।
9. पेट से संबन्धित लक्षण :
जिगर में सूजन होने के साथ जिगर में दर्द व कठोरता आ जाना, जिगर में जलन के साथ चुभन वाला दर्द होना जो दबाने, खांसने तथा सांस लेने पर बढ़ता है। पेट की परतों में उत्पन्न होने वाला ऐसा दर्द जो पेट को छूने से दर्द बढ़ जाता हो। इस तरह के लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को ब्रायोनिया औषधि का सेवन कराएं।
10. मल से संबन्धित लक्षण :
मल का कठोर व सूख जाने के कारण मल का रूक जाना। मल का रंग कत्थई होना तथा मल कठोर होने के कारण मल के साथ खून का आना साथ ही हिलने-डुलने, गर्म मौसम, गर्म के बाद ठण्डे पदार्थ का सेवन करने से रोग और बढ़ जाना आदि लक्षणों में रोगी को ब्रायोनिया औषधि का सेवन कराना अधिक लाभकारी होता है।
11. मूत्र से संबन्धित लक्षण :
पेशाब का रंग लाल, मटमैला रंग का होना तथा पेशाब गर्म व कम मात्रा में आना आदि मूत्र रोगों में ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग किया जाता है।
12. सांस संस्थान से संबन्धित लक्षण :
सांस नली व स्वरयंत्र में दर्द पैदा होना, सांस के साथ आवाज का भारी होना तथा खुली हवा में और तेज होना। सांस नली के ऊपरी भाग में उत्तेजना के कारण सूखी व कष्टकारी खांसी होना, रात को होने वाली सूखी खांसी जिसमें रोगी को खांसने के लिए उठकर बैठना पड़ता है, भोजन करने के बाद खांसी का बढ़ जाना और खांसते-खांसते उल्टी होने के साथ छाती में सुई चुभने जैसा दर्द होना, कफ गहरे लाल रंग का निकलता है। सांस लेने में परेशानी होना है तथा फेफड़े फैलने के कारण सांस जल्दी-जल्दी लेना। हिलने-डुलने से रोग बढ़ जाता है क्योंकि ऐसा करने से छाती में सुई चुभने जैसा दर्द होने लगता है। खांसी आने के साथ ऐसे महसूस होता है मानो खांसते-खांसते छाती के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगें। सिर व छाती पर दबावयुक्त दर्द होना जो हाथ फेरने से आराम मिलता है। इस तरह के सांस संबन्धी लक्षणों से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग किया जाता है।
इसके अतिरिक्त यह औषधि कृपमय तथा फुफ्फुसावरणीय निमोनिया को दूर करने में भी लाभकारी है। खखार के साथ गहरे लाल रंग का ठोस व लप्सी के गांठों की तरह बलगम निकलना। सांस नली में ठोस बलगम का आना जिसे निकालने में अधिक परेशानी होती है। गर्म कमरे में खांसी का बढ़ जाना, उरोस्थि के नीचे भारीपन जो धीरे-धीरे दांए कंधे तक फैल जाती है। ऐसे सांस संबन्धी लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि का सेवन करें। हृदय के पास सुई चुभने जैसा दर्द होने तथा हृदय के स्नायुविक में दर्द होने पर ब्रायोनिया औषधि का मूलार्क का प्रयोग करें।
13. पीठ से संबन्धित लक्षण :
पीठ रोग से संबन्धित लक्षण जैसे- गर्दन के पिछले भाग में तेज दर्द होना, कमर के निचले भाग में सुई चुभने जैसा दर्द व अकड़न होने पर ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है। पीठ रोग में उत्पन्न ये लक्षण मौसम परिवर्तन व भारीपन से बढ़ता है।
14. शरीर के बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षण :
हाथ-पैरों या शरीर में अकड़न व दर्द होने पर, पैरों की गर्म सूजन तथा जोड़ों की सूजन जिसमें सूजन वाला स्थान लाल, गर्म हो जाता है और उसमें सुई चुभने या चीर-फाड़ जैसा दर्द होता रहता है तथा हिलने-डुलने से दर्द बढ़ जाता है। शरीर के किसी भी अंग पर दबाव देने से उस स्थान पर दर्द होने लगता है तथा बायां हाथ व पैर लगातार हिलता रहता है। इस तरह के बाहरी रोगों से संबन्धित लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
15. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
त्वचा का रंग पीला, फीका, सूजा हुआ, शोफ, गर्म और दर्दयुक्त होना, त्वचा पर रूसी की तरह पपड़ियां बनना तथा त्वचा के बाल अत्यधिक चिकने होने आदि त्वचा रोगों में ब्रायोनिया औषधि का सेवन करें।
16. नींद से संबन्धित लक्षण :
नींद का न आना तथा सोने पर अचानक चौंककर उठना। मन हमेशा कारोबार या अन्य विचारों में उलझा रहना, नींद न आने से थकान व आलस्य आदि लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग करें।
17. बुखार से संबन्धित लक्षण :
बुखार होने पर नाड़ी अधिक कठोर होने के साथ नाड़ी की गति तेज होना, सर्दी लगने के साथ बाहरी अंगों में ठण्डक महसूस होना, सूखी खांसी के साथ सुई चुभने जैसा दर्द होना, रोगी को शरीर के अन्दर गर्मी महसूस होना, हल्का कार्य करने पर ही बदबूदार पसीना आ जाना, पसीना अधिक मात्रा में आना, आमवाती और आंत्रिक ज्वर जैसी अवस्थायें जिनके साथ पेट तथा जिगर की खराबियां मौजूद रहती है। रोगी में उत्पन्न बुखार के साथ ऐसे लक्षण उत्पन्न होने पर रोगी को ठीक करने के लिए ब्रायोनिया औषधि का सेवन कराए।
18. स्त्री रोग से संबन्धित लक्षण :
मासिक धर्म समय से पहले आना, मासिक धर्म का अधिक मात्रा में आना तथा चलने-फिरने से चीरने-फाड़ने जैसा दर्द होना। मासिक धर्म रुक जाने के कारण विपरीत दिशा में स्राव होना के साथ सिर दर्द होना। गहरी सांस लेने पर डिम्बग्रन्थियों में सुई चुभने जैसा दर्द होना तथा छूने से दर्द का तेज होना तथा दर्द धीरे-धीरे जांघों तक फैल जाना। स्त्रियों में इस तरह के लक्षण उत्पन्न होने पर ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
दूध रुक जाने के कारण उत्पन्न होने वाला बुखार। मासिक धर्म के समय स्तनों में दर्द होना। स्तनों के गर्म होने के साथ उसमें दर्द होना, स्तन का फोड़ा (Abscess of mammae)। मासिक धर्म के समय नाक से खून का आना, मासिक धर्म समय से पहले या बाद में जाने के कारण पाचन तंत्र खराब हो जाना। डिम्बाशय की जलन। एक से दूसरे मासिक धर्म के बीच दर्द होने के साथ पेट और वस्ति प्रदेश में अधिक तेज दर्द होना आदि स्त्री रोगों के लक्षणों से पीड़ित स्त्री को ब्रायोनिया औषधि का प्रयोग करने से विशेष लाभ मिलता है।
वृद्धि :
गर्मी के मौसम में, शारीरिक कार्य या हलचल से सुबह के समय, भोजन करने के बाद, रोगग्रस्त स्थान को छूने से तथा बैठने से रोग बढ़ता है। इससे रोगी में बेहोशी भी उत्पन्न हो सकती है।
शमन :
रोगग्रस्त भाग वाले करवट लेकर सोने से, दर्द वाले स्थान को दबाने से तथा ठण्डे पदार्थ पीने से रोग में आराम मिलता है।
संबन्ध :
ब्रायोनिया औषधि के अतिरिक्त रोग में लाभ के लिए रोगी को रस-टाक्स, एलूमिना या इल्लेसिब्रम दिया जा सकता है।
प्रतिविष :
ब्रायोनिया औषधि के सेवन से किसी प्रकार की हानि होने पर उसके प्रभावों को दूर करने के लिए रोगी को ऐकोना, कमो या नक्स-वोमिका देना चाहिए।
तुलना :
ब्रायोनिया औषधि की तुलना ऐस्क्लेपियस-टुबरेसा, काली म्यूरि तथा पटेलिया से की जाती है।
मात्रा :
ब्रायोनिया 1 से 12 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
बुफो राना Bufo rana
बुफो औषधि मुख्य रूप से स्नायुजाल और त्वचा पर विशेष रूप से क्रिया करती है। इस औषधि के सेवन से जरायु संबन्धित कुछ लक्षण भी उत्पन्न होते हैं। लकवा रोग के कुछ लक्षणों में बुफो औषधि के प्रयोग से रोग ठीक होता है।
बुफो औषधि व्यक्ति में निम्न वासनाओं को उत्तेजित करती है और मादक पेय पदार्थो के सेवन की इच्छा जगाती है, साथ ही इस औषधि के सेवन से नपुंसकता बढ़ती है।
बच्चों में बुद्धि के विकास के लिए इस औषधि का सेवन लाभकारी है। इसके अतिरिक्त बुढ़ापा, मिर्गी, रात को सोते समय आक्षेप (बेहोशी) के दौरे पड़ना, यौन संबन्धी रोग तथा हाथ-पैर, उंगुलियां आदि में चोट लगने से उत्पन्न होने वाले लहरयुक्त दर्द आदि रोगों में लाभकारी होता है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर बुफो औषधि का उपयोग :-
1. मन से संबन्धित लक्षण :
कभी-कभी मानसिक रोगों के कारण व्यक्ति को अपने मन में स्वास्थ्य के बारे में चिन्तित होना, दु:ख अनुभव होना, व्याकुल रहना, दान्तों काटने का स्वभाव पैदा होना, जोर-जोर से गुर्राना, हतोत्साहित होना, घबराना तथा शक्ति का कम होना, अकेला रहना अच्छा लगना तथा बुद्धि का विकास कम होना आदि रोगों में बुफो औषधि का प्रयोग करने से लाभ होता है तथा रोगी में बुद्धि का सही विकास होता है।
2. सिर से संबन्धित लक्षण :
सिर में ऐसा महसूस होना मानो सिर के अन्दर से गर्म-गर्म भाप निकलकर कपाल के ऊपर जा रहा है। दिमाग का सुन्नपन अर्थात कुछ भी समझ में न आना, चेहरे से अधिक पसीना गिरना, चेहरा तमतमाया हुआ और सिर में दर्द होना, नाक से खून का बहना, अधिक गुस्सा आने के कारण चेहरा लाल हो जाना और सिर में ऐसा दर्द जिसमें नाक से खून निकलने पर आराम मिलना। इस तरह के सिर रोग से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए बुफो औषधि का प्रयोग किया जाता है।
3. चेहरे से संबन्धित लक्षण :
चेहरे की सूजन, मुंह और आंखें सुन्न पड़ जाना या लकवा मारना तथा चेहरे पर पसीना अधिक आना आदि चेहरे के रोगों के लक्षणों में बुफो औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
4. आंखों से संबन्धित लक्षण :
अधिक रोशनी में आंखें चौंधिया जाना तथा आंखों में छोटे-छोटे छाले बनना, आंखों के गोले ऊपर की ओर घुमे हुए, बाईं आंख का बंद हो जाना आदि आंखों में उत्पन्न लक्षणों में बुफो औषधि सेवन करने से लाभ मिलता है।
5. जीभ से संबन्धित लक्षण :
लकवा मारने से पहले जीभ का लपलपाना तथा रोगी की आवाज लड़खड़ाकर या हकलाकर निकलना जिसके कारण उसकी बातें जल्द न समझ पाना तथा रोगी को गुस्सा अधिक आना। ऐसे में रोगी को बुफो औषधि का सेवन कराएं।
6. कान से सम्बंधित लक्षण :
तेज आवाज सहन नहीं कर पाने के कारण संगीत आदि सुनने की इच्छा न होना, कान का बहना तथा बाहरी कान का पककर खून निकलना आदि कान रोगों से संबन्धित लक्षणों में बुफो औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
7. हृदय से संबन्धित लक्षण :
हृदय बहुत बड़ा महसूस होना तथा धड़कन तेज होना। हृदय के आस-पास सिकुड़न महसूस होने के साथ ऐसे महसूस होना मानो हृदय पानी में तैर रहा हो। ऐसे लक्षण वाले रोगी को बुफो औषधि दें।
8. मिर्गी रोग से संबन्धित लक्षण :
रोगी यदि गुस्सा के साथ जोर से चिल्लाता है तो समझना चाहिए कि रोगी को मिर्गी का दौरा पड़ने वाला है। जननेिन्द्रय में उत्तेजना का अभाव तथा जननेन्द्रिय में सुरसुरहट आने पर भी मिर्गी का दौरा पड़ सकता है तथा मिर्गी के दौरे के बाद रोगी में अधिक नीन्द आने के लक्षण उत्पन्न हो सकते हैं। ऐसे लक्षणों में रोगी को बुफो औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है। मिर्गी के कुछ लक्षण जैसे- आवाज या रोशनी से मिर्गी का दौरा पड़ना, पांव का ठण्डा पड़ जाना, हृदय की धड़कन बढ़ जाना, सिर के एक ओर या दांई अथवा बांई ओर खिंचाव होना तथा मिर्गी के दौरान पीछे की ओर खिंचाव होना आदि रोगों में बुफो औषधि का सेवन लाभकारी होता है।
9. स्त्री रोग से सम्बंधित लक्षण :
मासिक धर्म समय से पहले तथा अधिक मात्रा में आना, दूसरी अवधि के दौरान थक्के और खून निकलना, प्रदर में पानी आना, उत्तेजना के साथ मिर्गी का दौरा पड़ना, मासिक स्राव के समय मिर्गी का दौरा पड़ना।
स्तनों की कठोरता, स्तनों का कैंसर, डिम्बग्रन्थियों और जरायु की जलन आदि में बुफो औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है। जरायु ग्रीवा के घाव, दुर्गन्धित और खून निकलने के साथ दर्द पैरों तक फैल जाना। स्तनों से खून मिला हुआ दूध निकलना। प्रसव के बाद पैरों की सूजन होना जो खून की रुकावट के कारण पैदा होती है। शिराओं की सूजन तथा गर्भाशय में फोड़ा होना आदि रोग में बुफो औषधि का प्रयोग किया जाता है।
10. पुरुष रोग से संबन्धित लक्षण :
स्वप्नदोष, नपुंसकता, शीघ्रपतन, सम्भोग के समय मिर्गी का दौरा पड़ना, गर्मी का रोग, हस्तमैथुन आदि पुरुष रोगों में बुफो औषधि का प्रयोग करें।
11. बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षण :
जांघों का दर्द, अंगों में सुन्नपन तथा ऐंठन वाला दर्द होना, लड़खड़ाकर चलना तथा जोड़ों में कील चुभने जैसा दर्द होना व हड्डियों की सूजन में बुफो औषधि का सेवन किया जाता है।
12. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
नाखून में घाव होने के साथ उत्पन्न होने वाले तेज दर्द जो नाखून के घाव से शुरू होकर हाथों के ऊपरी भाग तक पहुंच जाता है ऐसे दर्द में बुफो औषधि का सेवन किया जाता है। त्वचा की सुन्नता, त्वचा की फुंसियां, त्वचा पर हल्की चोट लगने पर घाव बन जाना, त्वचा पर निशान छोड़ने वाले छाले होना जिनमें खुजली पैदा करने वाली पीब भर जाती है तथा हथेलियों व तलुवों पर छाले, खुजली व जलन होना आदि त्वचा रोगों में बुफो औषधि का प्रयोग किया जाता है। बुफो औषधि का प्रयोग पुराने घाव होने पर भी लाभकारी है।
तुलना :
बुफो औषधि की तुलना बैराइटा-का, ऐस्टेरियस, सालमेण्डरा से की जाती है तथा इन औषधियों में मिर्गी को ठीक करने तथा मस्तिष्क में विनम्रता के लक्षण पैदा करने की शक्ति होती है।
प्रतिविष :
बुफो औषधि के सेवन से होने वाले हानि को समाप्त करने के लिए लैकेसिस तथा सेनेगा औषधि का प्रयोग किया जाता है।
पूरके :
बुफो औषधि तथा सालमेण्डरा एक दूसरे की पूरक औषधि है।
वृद्धि :
गर्म कमरे या गर्म स्थान पर तथा जागने पर रोग बढ़ता है।
शमन :
नहाने, खुली हवा में घूमने तथा गर्म पानी में पैर रखने से रोग में आराम मिलता है।
मात्रा :
बुफो औषधि के 6 से 200 शक्तियों का प्रयोग किया जा सकता है।
ब्यूटाइरिक एसिड BUTYRIC ACID
इस औषधि का प्रयोग अनेक प्रकार के लक्षणों को ठीक करने में किया जाता है। परन्तु इस औषधि का प्रयोग मुख्य रूप से सिर व आमाशय से संबन्धित लक्षणों को ठीक करने में किया जाता है।
शरीर के विभिन्न अंगों के लक्षणों के आधार पर ब्यूटाइरिक एसिड का उपयोग :-
1. मन से सम्बंधित लक्षण :
हमेशा चिन्तित रहना, मन में आत्महत्या करने का विचार करना, रोगी में भय व घबराहट बना रहना, सिर दर्द के कारण छोटी-छोटी बातों से परेशान हो उठना तथा सिर में हल्का दर्द होना आदि मानसिक व सिर रोग के लक्षणों में ब्यूटाइरिक एसिड का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
2. आमाशय से सम्बंधित लक्षण:
भूख कम लगना, पेट व अंतड़ियों में हवा भर जाना, पेट में ऐंठन सा दर्द होना तथा दर्द रात को बढ़ जाना, आमाशय भारी लगना, नाभि के नीचे पेट में ऐंठन होना, दस्त का अधिक आना, दस्त के समय दर्द होना तथा दस्त के समय जोर लगाना या कूंथना आदि आमाशय के रोग में इस औषधि प्रयोग लाभकारी माना गया है।
3. पीठ से सम्बंधित लक्षण :
कमर के निचले भाग में हल्के दर्द के साथ थकान महसूस होना तथा चलने-फिरने से दर्द का बढ़ना, टखनों व टांगों में ऊपर पीछे की ओर दर्द होना आदि लक्षण उत्पन्न होने पर ब्यूटाइरिक एसिड का प्रयोग किया जाता है।
4. नींद से सम्बंधित लक्षण :
नींद का न आना अथवा नींद में डरावने सपने आने के कारण ठीक से सो न पाना आदि नींद रोग में ब्यूटाइरिक एसिड का प्रयोग करने से लाभ होता है।
5. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
कोई भी कार्य करने पर पसीना आना, पैरों पर अधिक दुर्गन्धित पसीना आना तथा हाथ की उंगुलियों के नाखून भूरे रंग के हो जाना आदि त्वचा के रोग के लक्षणों में ब्यूटाइरिक एसिड का सेवन करने से रोग ठीक होता है।
वृद्धि :
रात के समय, तेज चलने या शारीरिक हलचल होने पर रोग बढ़ता है।
मात्रा :
ब्यूटाइरिक एसिड 3 शक्ति का प्रयोग किया जा सकता है।
बेटोनिका (बेटोनी वूड) BRTONICA (BETONY WOOD)
बेटोनिक औषधि के सेवन करने पर यह औषधि रोगों को ठीक करने के लिए प्रतिक्रिया कर दर्द करती है और धीरे-धीरे रोग को ठीक करती है।
शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधार पर बेटोनिक औषधि का उपयोग :-
1. सिर से संबन्धित लक्षण :
रोगी के दाईं कनपटी में सुई चुभन जैसा दर्द होता हो तथा मन को स्थिर और एकाग्र करने की शक्ति का कम होना आदि रोगों में बेटोनिक औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।
2. पेट से संबन्धित लक्षण :
पेट में दर्द होना, जिगर के आस-पास और अनुप्रस्थ वृहदांत्र में दर्द होना साथ ही पित्ताशय, दायें अण्डकोष तथा अण्डकोष की रज्जुओं में होने वाले हानि को दूर करने के लिए बेटोनिक औषधि का प्रयोग किया जाता है।
3. शरीर के बाहरी अंगों से संबन्धित लक्षण :
कलाई में तेज दर्द होने पर बेटोनिक औषधि का सेवन करें। कलाई में ढीलापन। घुटने के पिछले भाग में लकवा मारने जैसा तेज दर्द होने पर बेटोनिक औषधि का प्रयोग लाभकारी होता है।
बोइर्हाविष डिफ्यूजा (पुनर्नवा) BOERHAAVIA DIFFUSA (PUNARNAVA)
बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि का प्रयोग अनेक प्रकार के रोगों में उत्पन्न विभिन्न लक्षणों को दूर करके रोग को ठीक करने के लिए किया जाता है। यह औषधि विशेष रूप से दमा, बेरी-बेरी तथा उच्च रक्तचाप को ठीक करने में लाभकारी औषधि है। इसके अतिरिक्त यह औषधि पेट में पानी भरने, कामला, सूजाक, हृदयरोग आदि में भी अत्यंत लाभकारी माना गया है। यह औषधि किसी भी प्रकार सांपों के काटने पर या डंक मारने पर विष के प्रभावों को दूर करता है।
बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि का प्रयोग अंगों में उत्पन्न विभिन्न प्रकार लक्षणों में किया जाता है :-
1. सिर से संबन्धित लक्षण :
रोगी के सिर में तेज दर्द होना तथा ऐसा महसूस होना मानो किसी ने सिर फाड़ दिया हो। सिर के निचले भाग में सिर दर्द होना जो ठण्डे पानी या अन्य ठण्डे चीज से ठीक होता है, सिर में उत्पन्न इस तरह के लक्षणों में बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि का प्रयोग किया जाता है।
2. खांसी से संबन्धित लक्षण :
बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि सर्दी व जुकाम के साथ उत्पन्न होने वाली सूखी खांसी में रोगी को सेवन कराने से खांसी ठीक होती है। खांसी के साथ गाढ़ा सफेद बलगम आने पर भी बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
3. हृदय से संबन्धित लक्षण :
उच्च रक्तचाप तथा हृदय में रुक-रुककर उत्पन्न होने वाली जलनयुक्त दर्द में बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि का प्रयोग करने से हृदय से संबन्धित रोग ठीक होते हैं।
4. यकृत (जिगर) से संबन्धित लक्षण :
कभी-कभी जिगर रोगग्रस्त होने पर जिगर में दर्द होने लगता है। जिगर में उत्पन्न होने वाला दर्द के कारण जिगर के आस-पास छूने से दर्द और बढ़ जाता है तथा रोगग्रस्त स्थान के पास जोर से दबाने से आराम मिलता है। इस तरह का जिगर के दर्द में रोगी को बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि का प्रयोग करना चाहिए। इससे दर्द से आराम मिलता है। यकृद्दाल्युदर(किरोशीस ऑफ लिवर) के रोग में भी बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि का प्रयोग किया जाता है।
5. सूजन से सम्बंधित लक्षण :
शरीर के किसी भी अंग में उत्पन्न होने वाली सूजन को ठीक करने के लिए बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि का प्रयोग किया जाता है। आंखों की पलकों की सूजन, हाथों की सूजन, पेट की सूजन तथा पैरों की सूजन को दूर करने के लिए बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि का प्रयोग किया जाता है।
6. मूत्र से संबन्धित लक्षण :
रोगी में मूत्र संबन्धी रोग जैसे पेशाब कम मात्रा में आना तथा पेशाब का रुक-रुक कर आना आदि में बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि के प्रयोग से रोग ठीक होता है। पेशाब गाढ़े रंग का आना तथा जलन के साथ पेशाब का बार-बार आना तथा पेशाब करने में कष्ट होना आदि लक्षणों में बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि का सेवन करना चाहिए। यह विभिन्न प्रकार के पेशाब रोगों को दूर करती है।
7. शरीर का दर्द :
रोगी के पूरे शरीर में आमवाती दर्द होने पर बोइर्हाविष डिफ्यूजा औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
मात्रा :
बोइर्हाविष डिफ्यूजा के मूलार्क का प्रयोग किया जाता है।
बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल(व्हाइट अगारिक) BOLETUS LARICIS-POLYPORUS OFFICINALE (WHITE AGARIC)
बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि का प्रयोग चतुर्थक ज्वर में विशेष रूप से लाभकारी माना गया है। चतुर्थक ज्वर हर चार दिन बाद रोगी में उत्पन्न होता है। रोगी के शरीर पर हल्का पसीना आने के बाद भी रोगी का बुखार खत्म न हो रहा हो तो बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि का सेवन करना चाहिए। फेफड़े के यक्ष्मा (टी.बी) में रात के समय पसीना आता हो तो बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि का सेवन करें।
बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि शरीर के विभिन्न अंगों में उत्पन्न लक्षणों के आधर पर किया जाता है :-
1. सिर से संबन्धित लक्षण :
कभी-कभी रोग में रोगी को अपना सिर हल्का और खोखला महसूस होता है, साथ ही सिर के गहराई में तेज दर्द होता रहता है। ऐसे लक्षण वाले सिर रोग को ठीक करने के लिए बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि का सेवन करना चाहिए। जीभ पर पीले रंग का मैल जम जाना और जीभ पर दांतों के निशान पड़ जाना तथा हर समय जी मिचलाना आदि सिर रोगग्रस्त होने पर इस तरह के लक्षण उत्पन्न होने पर बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि का प्रयोग करें।
2. बुखार से संबन्धित लक्षण :
बुखार में रोगी को रीढ़ की हड्डी में ठण्डक के साथ बराबर गर्मी की तमतमाहट महसूस होने जैसे लक्षण उत्पन्न होने पर बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि का प्रयोग करें। सर्दी लगने पर रोगी में अंगड़ाई जैसे लक्षण उत्पन्न होने के साथ पूरा शरीर टूटता हुआ महसूस होता है। कन्धों के जोड़ों और कमर के निचले भाग में तेज दर्द होता है। यक्ष्मा बुखार के साथ ठण्ड लगना और रात को बहुत अधिक पसीना होने जैसे लक्षण। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
3. त्वचा से संबन्धित लक्षण :
त्वचा गर्म और खुश्क होने पर विशेषकर हथेलियों पर अधिक खुश्की उत्पन्न होने पर इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। कंधों तथा बाजुओं पर अधिक खुजली होने पर बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।
तुलना :
बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि की तुलना एगारिसीन, पोलीपोरस , बोलेटस ल्यूराडस तथा बोलेटस सैटेनस औषधि आदि से की जाती है।
मात्रा :
बोलेटस लैरीसिस-पोलीपरस आफिसिनेल औषधि की 1 शक्ति का तनूकरण का प्रयोग करें।