“Ek Thā Rājā Chhoṭā Sā”
from Mehr-e Do-Nīm
Iftiḳhār ʿĀrif
London, 1983
अली इफ़्तिख़ार की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को
तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए
उसे रोकिए कि पड़ोसियों के घरों में झूले पड़े हुए हैं तो उस से क्या
उसे क्या पड़ी कि कबूतरों को बताए कैसे हवाएँ उस की पतंग छीन के ले गईं
अली इफ़्तिख़ार की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे
को तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए
कहीं यूँ न हो कि फिर एक बार भरी बहार में एतिबार के सारे ज़ख़्म महक उठें
कहीं यूँ न हो कि नए सिरे से हमारे ज़ख़्म महक उठें
अली इफ़्तिख़ार की माँ से मैं ने बता दिया है कि अपने बेटे को
तितलियों के क़रीब जाने से रोकिए