दिल की बात जुबां पर लाना ठीक नहीं,
अपने ज़ख्म हर किसी को दिखाना ठीक नहीं,
अकेले रो लेना खुद को गले लगाकर ।
पर यूँ महफिल में आंसू बहाना ठीक नहीं ।।
अब ऐसे मिलते नहीं, जो दर्द में दवा बन सकें ।
यूँ हर किसी को हमदर्द बनाना ठीक नहीं ।
कि अब छोड़ दिया है हमने लोगों के पीछे जाना,
क्योंकि जो सच पर रूठे उसे मनाना ठीक नहीं ।।
अगर तुमने छेड़ा तो वारदात फिर से होगी,
क्योंकि घायल होना कहानी का अंत नहीं ।।
और हमारा केवल स्वभाव ही शांत है,
हमारे रक्त में कायरता नहीं ।।
केवल सांसों का चलना ही जीवन नहीं होता,
उसे जीवन काटना कहते हैं...
जिसके जीवन का कोई लक्ष्य नहीं !
बड़ी भारी होती है यह उर्जा,
जो ठहर गई तो जीने नहीं देगी ।
अतंतः केवल शांति पाना ही जीवन का लक्ष्य नहीं...
चलना - गिरना, गिर कर उठना... उठ कर फिर चलना,
यही है जीवन की रीत ।।
कहते है क्षमा शोभती उस भुजंग को,
जिसके पास "गरल" हो...
वो विषधर ही क्या है ?
जो "दंतहीन" "विषहीन" विनीत, सरल हो ।।
इसलिए तो कहता हूँ मैं, महाभारत के इस सार को,
बिना युद्ध के कभी किसी को मिलती शांति नहीं ।।
क्या द्वंद है तेरे मन में, क्यों युद्ध को तू टाल रहा,
अब कोई निमंत्रण नहीं देना कृष्ण के अवतार को ।।
क्योंकि निष्कर्ष तो यही आएगा...
कायर कहेगा विश्व उसे, जो युद्ध नहीं कर पाएगा ।।
क्या सिर्फ सांसों का थम जाना ही मौत है ?
और घुट-घुट कर मरना है ज़िन्दगी...!!!
ज़िंदा वो नहीं जो बस जी रहा है,
ज़िंदा वो है जो मरने से पहले मरा नहीं ।।
पतझड़ सा है उसका जीवन,
संघर्षों से जिसका जीवन हरा-भरा नहीं ।।
जब तक तपा नही तपिश में इसकी,
तब तक कोई सिक्का बना खरा नहीं ।।
पर नित संघर्षों से जब टूट चुका हो अन्तर्मन,
तब सुख के मिले समन्दर का रहता कोई अर्थ नहीं ।।
वक्त के बदलते इस चक्र का भरोसा हम कर सकते नहीं...
कि आज जी भर जी लो, कल का कोई भरोसा नहीं ।।
दे रहे हैं वो अगले जनम की खबर !!!
जिनको अगले ही पल का भरोसा नहीं ।।
कोई हर पल जी कर मरा हुआ है,
कोई एक पल जी के कभी मरा नहीं ।।
कि मौत अटल सत्य है जीवन का,
बस जिंदा वही है जो इससे डरा नहीं ।।
दो में से तुम्हे क्या चाहिए कलम या कि तलवार
मन में ऊँचे भाव कि तन में शक्ति अपार
अंध कक्ष में बैठ रचोगे ऊँचे मीठे गान
या तलवार पकड़ जीतोगे बाहर का मैदान
कलम देश की बड़ी शक्ति है भाव जगाने वाली,
दिल की नहीं दिमागों में भी आग लगाने वाली
पैदा करती कलम विचारों के जलते अंगारे,
और प्रज्वलित प्राण देश क्या कभी मरेगा मारे
एक भेद है और वहां निर्भय होते नर-नारी,
कलम उगलती आग, जहाँ अक्षर बनते चिंगारी
जहाँ मनुष्यों के भीतर हरदम जलते हैं शोले,
रक्त में बिजली होती, होते दिमाग में गोले ।
जहाँ पालते लोग लहू में हालाहल की धार,
क्या चिंता यदि वहाँ हाथ में नहीं हुई तलवार ।।
तुम चाहे लाख दीये और मोमबत्तियां जलाओ इनसे तुम्हारे जीवन में रोशनी होने वाली नहीं, असली दिवाली तो उस दिन ही समझना जिस दिन तुम्हारे भीतर का दीया जले । उससे पहले तो सब अंधकार ही समझो ।। और राम के घर लौटने से तुम्हारा क्या लेना-देना, बात तो उस दिन बनेगी, जब तुम अपने भीतर लौटोगे ।।
- एक महान दार्शनिक के विचार...