विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ।।
विद्या से विनय आता है, विनम्रता से योग्यता आती है । योग्य व्यक्ति ही धन कमा सकता है । धन से धर्म के कार्य सिद्ध होते है और फिर धर्मपुर्वक आचरण से ही सुख की प्राप्ति होती है ।
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ।।
कार्य करने से ही सफलता मिलती है, न कि सिर्फ मंसूबे गांठने से । जैसे सोते हुए शेर के मुंह में हिरन अपने-आप ही आकर नहीं घुस जाता । कि ले भाई खा ले मेरे को, तुझको बड़ी भूख लगी होगी ।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्शो महारिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कुर्वाणो नावसीदति ।।
आलस्य ही मनुष्य के शरीर का सबसे बड़ा दुश्मन होता है और परिश्रम ही सबसे बड़ा दोस्त, परिश्रम करने वाले का कभी नाश या नुकसान नहीं होता ।
आलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मित्रम् अमित्रस्य कुतो सुखम् ।।
आलस्य करने वाले को विद्या कैसे प्राप्त होगी ? जिसके पास विद्या नहीं है उसके पास पैसा भी नहीं होगा । जिसके पास पैसा नहीं उसके दोस्त भी नहीं बनेंगे और बिना दोस्त के सुख कैसे प्राप्त होगा ।
विद्वानेवोपदेष्टव्यो नाविद्वांस्तु कदाचन ।
वानरानुपदिश्याथ स्थानभ्रष्टा ययुः खगाः ।।
सलाह भी समझदार को ही देनी चाहिए, ना कि किसी मूर्ख को । ध्यान रहे कि बंदरों को सलाह देने के कारण ही पंक्षियों ने अपना घोसला गंवा दिया था ।
मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं मुखे ।
हठी चैव विषादी च परोक्तं नैव मन्यते ।।
मूर्खों की पांच निशानियां होती हैंः- 1. वे अहंकारी होते हैं, 2. उनके मुंह से हमेशा बुरे शब्द ही निकलते हैं, 3. वे जिद्दी होते हैं, 4. हमेशा बुरी सी शक्ल बनाए रहते हैं और 5. दूसरे की बात कभी नहीं मानते ।
सुलभा: पुरुषा: राजन् सततं प्रियवादिन: ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:।।
मीठा-मीठा और अच्छा लगे ऐसा बोलने वाले बहुतायत मिलते हैं । लेकिन अच्छा न लगने वाला और हित में बोलने वाले और सुनने वाले लोग बड़ी मुश्किल से मिलते हैं ।
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥
जिसके पास खुद की बुद्धि नहीं शास्त्र भी उसके किस काम की ? जिसकी आंखें ही नहीं हैं वो आईने का क्या करेगा ?
श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ।।
करोड़ों ग्रंथों में जो बात कही गई है वो आधी लाइन में कहता हूँ, दूसरे का भला करना ही सबसे बड़ा पुण्य है और दूसरे को दुःख देना ही सबसे बड़ा पाप ।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैवकुटम्बकम् ।।
यह अपना है वह दूसरे का है, इस तरह की सोच छोटे मन वाले कहते हैं । उदार मन वाले लोगों के लिए तो पुरा विश्व ही परिवार है ।
बहुत गयी थोड़ी रही, व्याकुल मन मत होय ।
धीरज सबका मित्र है, करी कमाई मत खोय ।।
Every action has an equal and opposite reaction...