अब्दुलाशाह (बुल्लेशाह)
।। यह वह नगमा है जो हर साज पर नहीं गाया जाता ।।
रहमत का तेरी मेरी गुनाहों को नाज है ।
बदां हूँ जानता हूँ तो बदां नवाज है ।।
उसके खारेपन में भी कोई कशिस होगी जरूर,
वरना क्यों सागर में यूं गंगा जाकर मिले ।।
तेरी आवाज में जो कभी कमी आ जाती है,
देख... मेरी आँखों में नमी आ जाती है ।
मेरी दिवानगी पर होश वाले बेशक बहस फरमाये ।
पर पहले उन्हें दिवाना बनने की जरूरत है ।।
जख्मी न हुआ था दिल ऐसा,
सीने में खटक दिन-रात न थी ।
पहले भी लगे थे सदमें बहोत, रोये थे,
मगर यह बात न थी ।।
अगर तू नहीं है मेरी जिंदगी में,
नहीं जिंदगी से है कोई वास्ता ।
सच कहता हूँ...तू न मिला अगर,
इस जिंदगी का मौत ही है रास्ता ।।
कैसे कहूँ खुद से कितना लडा हूँ मैं,
हकीकत है ये वहीं पर खडा हूँ मैं ।
अब थक गया हूँ बहोत रो चुका हूँ,
हुआ खत्म जीवन से जो भी है सिला ।।
अगर तू नहीं है मेरी जिंदगी में.........
चल पडा हूँ तुम्हें मनाने, कुछ ऐसे राहों पे,
जिसे दुनिया के लोग बदनाम कहते है ।
बदनामी का डर भी नहीं है मुझे अब,
शायद इसी को दिवाने प्यार कहते है ।।
सिर्फ तुझको अपने आस-पास चाहता हूँ,
कि आज मैं जी भरके रोना चाहता हूँ ।
ऐसा करदो कि मेरा सिर तेरी गोद में हो,
बस तेरा हाथ अपने सिर पे चाहता हूँ ।।
मेरी मांग कुछ नहीं, मेरी चाह कुछ नहीं,
आरजू कुछ नहीं, जुस्तजु कुछ नहीं ।
बस एक तमन्ना कि तुझको पाना चाहता हूँ,
हे सद्गुरू... मैं आज जी भरके रोना चाहता हूँ ।।
चिरागो को दिल में महफूज रखना,
बहोत दूर तक रात ही रात होगी ।
चलोगे नहीं खो जाओगे जो, बोलो...
फिर मुकाम से कैसे मुलाकात होगी ।।
ये इम्तहां है इश्क की, यह शौक है फिराक का,
आँसुओं की दल-दल में भी कोई कदमों को उठा रहा है ।
कैसी तासीर है कैसा जूनून है, कैसी है चिद तेरी,
जो जिस्म को, रूह को, लहू को नचा रहा है ।
तडप को आहों को, जुस्तजु को लहरा रहा है,
एक-एक खनक के साथ हस्ती को मिटा रहा है ।
देखो आज... इश्क को कैसे इश्क नचा रहा है ।।
जो दिल में बसा हो उसका नाम हलक से उछल कर
जुबां तक आने में देर ही कितनी लगती है ।
ये कसक दिल की दिल में चुभी रह गई,
जिदंगी में तुम्हारी कमी रह गई ।
एक मैं एक तुम यही दिवार थी,
जिंदगी आधी-अधुरी बटी रह गई ।।
उनके दर पे पहुँने तो पायें,
ये ना पुछों कि हम क्या करेंगें ।
सर झुकाना अगर जुल्म होगा,
हम निगाहों से सिजदा करेगें ।।
बात भी तेरी रखनी है साखी,
सर्फ को भी ना रूसवा करेगें ।
जाम दे या ना दे आज हमको,
हम मैकदे में सवेरा करेंगें ।।
इस तरफ अपना दामन जलेगा,
उस तरफ उनकी महफिल सजेगी ।
हम अधेंरो को अपने घर में बुलाकर,
उनके घर में उजाला करेगें ।।
आखरी साँस भी हम उनसे
बेरूखी ना सिकवा करेगें ।
उनके दर पे पहुँने तो पायें,
ये ना पुछों कि हम क्या करेंगें .........
कभी यूँ भी आओ मेरी आँखों में,
कि मेरी नजर को खबर ना हो ।
मुझे एक रात नवाज दे,
कि उसके बाद सुबह ना हो ।।
तरस रहा हूँ मैं लम्हायें सुकुन के लिए,
ये जिंदगी तो नहीं जिंदगी का मातम है ।
तमाम आलम फानी ने साथ छोड दिया,
बस अब सुरज-चाँद ही मेरे हमदम है ।।
आपकी मोहब्बत की नजर का दरकार है,
इश्क हर दर्द हर सर्द का इलाज होता है ।
फखत आपकी उल्फत का मैं दम भरता हूँ,
आप खुश हो तो रजामन्द खुदा होता है ।।
मौत पर हमको है यकीन,
तुम पर भी एतबार है ।
देखे आज पहले कौन आता है ?
हमें तो दोनों का इन्तजार है ।।
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