पृथिव्यां त्रीणि रत्नानि जलमन्नं सुभाषितम् । मूढः पाषाणखंडेषु रत्नसंज्ञा प्रदीयते ।।
अर्थातः- इस पृथ्वी पर जल, अन्न और सुभाषित (अच्छे वचन) ही असली तीन रत्न हैं। मूर्ख लोग पत्थर के टुकड़ों (हीरे-जवाहरात) को रत्न का नाम देते हैं।
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात्, न ब्रूयात् सत्यमप्रियम् । प्रियं च नानृतं ब्रूयात्, एष धर्मः सनातनः॥
अर्थ: हमेशा सत्य बोलें और प्रिय बोलें। ऐसा सत्य न बोलें जो किसी को अप्रिय (बुरा) लगे, और न ही ऐसा असत्य (झूठ) बोलें जो प्रिय हो। यही सनातन धर्म (उचित आचरण) है।
सत्यं ब्रूयात् प्रियं ब्रूयात ब्रूयान्नब्रूयात् सत्यंप्रियम् । प्रियं च नानृतम् ब्रुयादेषः धर्मः सनातनः॥
आशय...सत्य कहो किन्तु सभी को प्रिय लगने वाला सत्य ही कहो, उस सत्य को मत कहो जो सर्वजन के लिए हानिप्रद है, (इसी प्रकार से) उस झूठ को भी मत कहो जो सर्वजन को प्रिय हो, यही सनातन धर्म है।
काव्यशास्त्रविनोदेन कालो गच्छति धीमताम् ।
व्यसनेन च मूर्खाणां निद्रया कलहेन वा ।।
अर्थात : बुद्धिमान लोगों का समय काव्य और शास्त्रों के अध्ययन व विनोद में बीतता है, जबकि मूर्खों का समय बुरी आदतों, सोने या झगड़ने में बर्बाद होता है।
विद्वत्वं च नृपत्वं च न एव तुल्ये कदाचन् ।
स्वदेशे पूज्यते राजा विद्वान् सर्वत्र पूज्यते ।।
अर्थात : विद्वान और राजा का तुलना नहीं किया जा सकता है । राजा को तो केवल अपने राज्य में ही सम्मान मिलता है परन्तु विद्वान का सर्वत्र सम्मान होता है ।
अग्निशेषमृणशेषं शत्रुशेषं तथैव च ।
पुन: पुन: प्रवर्धेत तस्माच्शेषं न कारयेत् ॥
अर्थात : आग, ऋण और शत्रु अल्प मात्रा अथवा न्यूनतम सीमा तक भी अस्तित्व में बचा रहेगा तो बार-बार बढ़ेगा, अत: इन्हें थोड़ा सा भी बचा नही रहने देना चाहिए । इन तीनों को सम्पूर्ण रूप से समाप्त कर डालना चाहिए ।
नाभिषेको न संस्कार: सिंहस्य क्रियते मृगैः ।
विक्रमार्जितराज्यस्य स्वयमेव मृगेंद्रता ॥
अर्थात : वन्य जीव शेर का राज्याभिषेक तथा कतिपय कर्मकांड के संचालन के माध्यम से ताजपोशी नहीं करते किन्तु वह अपने कौशल से ही कार्यभार और राजत्व को सहजता व सरलता से धारण कर लेता है ।
विद्यां ददाति विनयं विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति धनात् धर्मं ततः सुखम् ।।
अर्थात : विद्या से विनय आता है, विनम्रता से योग्यता आती है । योग्य व्यक्ति ही धन कमा सकता है । धन से धर्म के कार्य सिद्ध होते है और फिर धर्मपुर्वक आचरण से ही सुख की प्राप्ति होती है ।
उद्यमेन हि सिध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः ।
न हि सुप्तस्य सिंहस्य प्रविशन्ति मुखे मृगाः ।।
अर्थात : कार्य (परिश्रम) करने से ही सफलता मिलती है, न कि सिर्फ मंसूबे गांठने से । जैसे सोते हुए शेर के मुंह में हिरन अपने-आप ही आकर नहीं घुस जाता । कि ले भाई खा ले मेरे को, तुझको बड़ी भूख लगी होगी ।
आलस्यं हि मनुष्याणां शरीरस्शो महारिपुः ।
नास्त्युद्यमसमो बन्धुः कुर्वाणो नावसीदति ।।
अर्थात : आलस्य ही मनुष्य के शरीर का सबसे बड़ा दुश्मन होता है और परिश्रम ही सबसे बड़ा दोस्त, परिश्रम करने वाले का कभी नाश या नुकसान नहीं होता ।
आलसस्य कुतो विद्या अविद्यस्य कुतो धनम् ।
अधनस्य कुतो मित्रम् अमित्रस्य कुतो सुखम् ।।
आलस्य करने वाले को विद्या कैसे प्राप्त होगी ? जिसके पास विद्या नहीं है उसके पास पैसा भी नहीं होगा । जिसके पास पैसा नहीं उसके दोस्त भी नहीं बनेंगे और बिना दोस्त के सुख कैसे प्राप्त होगा ।
विद्वानेवोपदेष्टव्यो नाविद्वांस्तु कदाचन ।
वानरानुपदिश्याथ स्थानभ्रष्टा ययुः खगाः ।।
सलाह भी समझदार को ही देनी चाहिए, ना कि किसी मूर्ख को । ध्यान रहे कि बंदरों को सलाह देने के कारण ही पंक्षियों ने अपना घोसला गंवा दिया था ।
मूर्खस्य पञ्च चिह्नानि गर्वो दुर्वचनं मुखे ।
हठी चैव विषादी च परोक्तं नैव मन्यते ।।
मूर्खों की पांच निशानियां होती हैंः- 1. वे अहंकारी होते हैं, 2. उनके मुंह से हमेशा बुरे शब्द ही निकलते हैं, 3. वे जिद्दी होते हैं, 4. हमेशा बुरी सी शक्ल बनाए रहते हैं और 5. दूसरे की बात कभी नहीं मानते ।
सुलभा: पुरुषा: राजन् सततं प्रियवादिन: ।
अप्रियस्य तु पथ्यस्य वक्ता श्रोता च दुर्लभ:।।
मीठा-मीठा और अच्छा लगे ऐसा बोलने वाले बहुतायत मिलते हैं । लेकिन अच्छा न लगने वाला और हित में बोलने वाले और सुनने वाले लोग बड़ी मुश्किल से मिलते हैं ।
यस्य नास्ति स्वयं प्रज्ञा शास्त्रं तस्य करोति किम् ।
लोचनाभ्यां विहीनस्य दर्पणः किं करिष्यति ॥
जिसके पास खुद की बुद्धि नहीं शास्त्र भी उसके किस काम की ? जिसकी आंखें ही नहीं हैं वो आईने का क्या करेगा ?
श्लोकार्धेन प्रवक्ष्यामि यदुक्तं ग्रन्थकोटिभिः ।
परोपकारः पुण्याय पापाय परपीडनम् ।।
करोड़ों ग्रंथों में जो बात कही गई है वो आधी लाइन में कहता हूँ, दूसरे का भला करना ही सबसे बड़ा पुण्य है और दूसरे को दुःख देना ही सबसे बड़ा पाप ।
अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम् ।
उदारचरितानां तु वसुधैवकुटम्बकम् ।।
यह अपना है और वह पराया है, इस तरह की सोच छोटे मन (संकीर्ण मति) वाले कहते हैं । उदार मन (विशाल हृदय) वाले लोगों के लिए तो पुरा विश्व ही एक परिवार है ।
अङ्गेन गात्रं नयनेन वक्त्रं, न्यायेन राज्यं लवणेन भोज्यम् ।
धर्मेण हीनं खलु जीवितं च, न राजते चन्द्रमासा बिना निशा ।।
अर्थात : जैसे हाथ के बिना शरीर, नेत्र के बिना मुख, न्याय व्यवस्था के बिना राज्य, नमक के बिना भोजन, और धर्म के बिना मानव जीवन शोभित और प्रतिष्ठित नहीं होता । ठीक उसी प्रकार जैसे आकाश में चंद्रमा के बिना एक अंधेरी रात ।
न चोरहार्यं न च राजहार्यं न भ्रातृभाज्यं न च भारकारी।
व्यये कृते वर्धत एव नित्यं विद्याधनं सर्वधनप्रधानम् ।।
अर्थात : विद्या रूपी धन को न तो चोर चुरा सकता है, न राजा छीन सकता है, न भाइयों में इसका बँटवारा हो सकता है और न ही यह वजन में भारी होता है। यह खर्च करने से हमेशा बढ़ता है, इसलिए विद्या-धन सभी धनों में सबसे प्रधान है।
धर्मो हि तेषामधिको विशेषो ।
धर्मेण हीना: पशुभिः समाना: ।।
अर्थ: आहार, निद्रा, भय और मैथुन (वासना)—ये चारों पशुओं और मनुष्यों में समान हैं। मनुष्य का विशेष गुण 'धर्म' (कर्तव्य बोध) है; धर्म के बिना मनुष्य पशु के समान ही है।
गुणी गुणं वेत्ति न वेत्ति निर्गुणो,
बली बलं वेत्ति न वेत्ति निर्बलः।
पिको वसन्तस्य गुणं न वायसः
करी च सिंहस्य बलं न मूषकः॥
अर्थात : गुणवान ही गुण को जानता है, गुणहीन नहीं । बलवान ही बल को समझता है, निर्बल नहीं । वसंत ऋतु के गुण को केवल कोयल ही जानती है, कौआ नहीं । और हाथी ही सिंह के बल को समझ सकता है, चूहा नहीं।
विचित्र खलु संसारे नास्ति किञ्चिन्निरर्थकम् ।
अश्वश्च चेद्वहने वीरः भारस्य वहने खरः ।।
अर्थात : इस विचित्र संसार में कुछ भी निरर्थक (बेकार) नहीं है। यदि घोड़ा दौड़ने में वीर है, तो गधा भी बोझा उठाने में सक्षम होता है।
विहाय पौरुषं यो हि दैवमेवावलम्बते।
प्रासादसिंहवत् तस्य मूर्ध्नि तिष्ठन्ति वायसाः॥
अर्थात : जो मनुष्य अपने परिश्रम (पौरुष) को छोड़कर केवल भाग्य (दैव) का ही सहारा लेता है, महल के दरवाजे पर बने शेर की मूर्ति (प्रासादसिंह) की तरह उसके सिर पर कौवे बैठते हैं (अर्थात उसका जीवन दीन-हीन हो जाता है)।
अपि स्वर्णमयी लंका न मे लक्ष्मण रोचते।
जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी ।।
अर्थात : श्री रामजी लक्ष्मण से कहते हैं - हे लक्ष्मण ! यह सोने की लंका भी मुझे अच्छी नहीं लगती। जननी (माता) और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर महान व श्रेष्ठ होती हैं।