आज के तीव्र औद्योगिकीकरण के दौर में, चाहे वह छोटा व्यवसाय हो या बहुराष्ट्रीय स्तर की विशाल फैक्ट्री दोनों ही अनजाने अथवा जानबूझकर पर्यावरण प्रदूषण की श्रृंखला को विस्तार दे रहे हैं। आर्थिक लाभ की अंधी प्रतिस्पर्धा में पर्यावरणीय उत्तरदायित्व अक्सर उपेक्षित रह जाता है।
स्मॉल बिज़नेस की भूमिका भी कम चिंताजनक नहीं है।
छोटे स्तर पर चलने वाले उद्योग और दुकानदार बड़ी मात्रा में प्लास्टिक बैग, सिंगल-यूज़ पैकेजिंग, थर्मोकोल और डिस्पोज़ेबल उत्पादों का उपयोग करते हैं। ये सामग्री अल्पकालिक सुविधा तो देती हैं, परंतु दीर्घकाल में मिट्टी की संरचना को नष्ट करती हैं, नालियों को अवरुद्ध करती हैं और जलस्रोतों को प्रदूषित करती हैं। पुनर्चक्रण की समुचित व्यवस्था न होने के कारण यह प्लास्टिक कचरा वर्षों तक प्रकृति में अविघटित पड़ा रहता है।
बड़ी फैक्ट्रियों का प्रभाव और भी व्यापक है।
औद्योगिक इकाइयाँ प्लास्टिक बोतलों, रासायनिक उत्पादों तथा भारी मात्रा में ठोस एवं द्रव अपशिष्ट का निर्माण करती हैं। यदि इन अपशिष्टों का वैज्ञानिक और पर्यावरण-अनुकूल निस्तारण न हो, तो वे नदियों में विषाक्त तत्वों का संचार करते हैं, भूजल को दूषित करते हैं और वायु में जहरीली गैसों का उत्सर्जन करते हैं। औद्योगिक चिमनियों से निकलने वाली कार्बन डाइऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और सल्फर यौगिक न केवल वायु गुणवत्ता को गिराते हैं, बल्कि वैश्विक तापवृद्धि और अम्लीय वर्षा जैसी समस्याओं को भी जन्म देते हैं।
परिणामस्वरूप प्रदूषण केवल प्रकृति तक सीमित नहीं रहता; यह मानव स्वास्थ्य, जैव विविधता और भविष्य की पीढ़ियों के अस्तित्व पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
अतः यह अनिवार्य है कि छोटे और बड़े दोनों प्रकार के उद्योग सतत विकास (Sustainable Development) के सिद्धांतों को अपनाएँ, प्लास्टिक के स्थान पर पर्यावरण-अनुकूल विकल्पों का प्रयोग करें, तथा अपशिष्ट प्रबंधन की प्रभावी प्रणाली विकसित करें। अन्यथा, प्रगति का यह मार्ग अंततः विनाश की ओर ही अग्रसर होगा।