Hindi-Urdu Sher by Uday Shah
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मनन क्या, कवन क्या, चलन क्या ‘उदय’ का?
ग़ज़ल ही ग़ज़ल है, ग़ज़ल के सिवा क्या!
छंद/बहर : लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकारांत
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कोई भी मंज़र जो देखूं याद आता है तू ही तू;
मूंदके आंखें कुछ भी सोचूं याद आता है तू ही तू।
छंद/बहर : गांगाग़ागा गांगाग़ागा गांगाग़ागा गांगाग़ा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : ऊंकारांत
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ख़ुदा तेरा जहां में क्या असर है;
नहीं वाबस्ता तुझसे पर बसर है।
छंद/बहर : लग़ागागां लग़ागागां लग़ागा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : अकार+सर
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ये पहाड़ें ये नदी और आपको देखा करूं;
गर हक़ीक़त ना सही, पर ख़्वाब में सोचा करूं।
छंद/बहर : गांलग़ागा गांलग़ागा गांलग़ागा गांलग़ा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकारांत
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देखे हसीन लाखों जहां में मगर कहीं;
देखा हो आप जैसा मुझे याद ही नहीं।
छंद/बहर : गागां लग़ालगां लल़गागां लग़ालगां
क़ाफ़िया-व्यवस्था : अकार+हीं
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आप आए है ज़िन्दगी में मेरी;
ज़िन्दगी लाजवाब है अब तो।
छंद/बहर : गाल़गागां लग़ालगां लल़गा
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तर्क की मैंने मुहब्बत मैं मगर मजबूर था;
दाग़ था दामन पे मेरे, आंसूओं से धो लिया।
छंद/बहर : गांलग़ागा गांलग़ागा गांलग़ागा गांलग़ा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकारांत
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आप क्यूं शर्म से हुए पानी;
आपका नाम तो लिया ही नहीं।
छंद/बहर : गाल़गागां लग़ालगां लल़गा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : ईकारांत
(इस प्रकार के क़ाफ़ियों में अनुनासिक अनुस्वार की छूट ली जा सकती है।)
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राज़-ए-दिल सबको पता चल ही गया;
जबसे मैंने उसे अहबाब किया।
छंद/बहर : गाल़गागां लल़गागां लल़गा
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ख़ुश्बू इसकी हमें लुभाती रही;
अपने ज़ख्मों को फिर सीया ही नहीं।
छंद/बहर : गाल़गागां लग़ालगां लल़गा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : ईकारांत
(इस प्रकार के क़ाफ़ियों में अनुनासिक अनुस्वार की छूट ली जा सकती है।)
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तुम्हारे बिना कुछ कमी तो नहीं;
मगर ज़िन्दगी, ज़िन्दगी तो नहीं।
छंद/बहर : लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा लगां
क़ाफ़िया-व्यवस्था : ईकारांत
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बेवफ़ाई के सबब को लब पे वो लाए नहीं;
उनकी आंखों से अयां सब दिल की बातें हो गईं।
छंद/बहर : गांलग़ागा गांलग़ागा गांलग़ागा गांलग़ा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : ईंकारांत
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मैं रहा ख़ामोश सारी ज़िन्दगी;
डर के मारे तो कभी एहसान के।
छंद/बहर : गांलग़ागा गांलग़ागा गांलग़ा
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ग़म से पत्थर हो चुका हूं प्यार ना कर;
रोने को मजबूर हो जाऊंगा मैं दोस्त।
छंद/बहर : गांलग़ागा गांलग़ागा गांलग़ागा
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टूट कर मैं बिखर गया यारों;
ग़म मुझे बेअसर हुआ यारों।
छंद/बहर : गाल़गागां लग़ालगां लल़गा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : आकारांत
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जब भी तेरी बात चले;
याद की ख़ुश्बू साथ चले।
छंद/बहर : गांगाग़ागा गांगाग़ा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : अकारांत
(अकारांत क़ाफ़ियों के प्रयोग को क़ाफ़ियादोष माना जाता है।)
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सुन कर मेरा नाम वो हो जाते हैं तंग;
जैसे अपने आपसे खेल रहे हैं जंग।
छंद/बहर : गांगाग़ागा गांगाग़ागा गांगाग़ा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : अंकार+ग
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क्यूं है नम आंखें मेरी कैसे बताऊं आपको;
दास्तां जो कह सके ना दिल में उसका शोर है।
छंद/बहर : गांलग़ागा गांलग़ागा गांलग़ागा गांलग़ा
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कोई मुश्किल नहीं आसान को मुश्किल करना;
ये बड़ी बात है दुश्वार को आसां करना।
छंद/बहर : गाल़गागां लल़गागां लल़गागां लल़गा
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नक़्श-ए-क़दम पे मेरे अब आते हैं काफ़िलें;
मंज़िल थी उस तरफ़ कि जहां रास्ता नहीं।
छंद/बहर : गागां लग़ालगां लल़गागां लग़ालगां
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ज़माने को आईना दिखलाने वाले;
कभी अक्स ख़ुद का कहां देख पाए।
छंद/बहर : लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा
क़ाफ़िया-व्यवस्था : एकारांत
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राह-ए-मंज़िल बना दी है हमने,
आपको सिर्फ़ चलना ही होगा।
छंद/बहर : गाल़गागां लग़ालगां लल़गा
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‘उदय’ से मुलाक़ात करके तो देखो;
बस इक पल में अपना-सा लगने लगेगा।
छंद/बहर : लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा लगांग़ा
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