महाभारत के समय की कथा है । अधीरथ और राधा नामक एक वृद्ध जोड़ी, गंगा किनारे रहती थी । अधीरथ सारथी थे । सारथी याने रथ हांकने वाला । यह कार्य वे कार्य वे करते थे । वे वृद्ध हो चले थे लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी । इससे वे अत्यंत दुखी रहते थे । रोज प्रातः देवता से प्रार्थना करते थे, ’’हे सूर्य भगवान्, आप समस्त संसार को प्रकाशवान बनाते हो । मैं संतान न होने के कारण बहुत दुखी हूं । मुझे संतान प्रदान कीजिये । मेरा जीवन प्रकाश से भर दीजिये ।‘‘ प्रार्थना करते समय उनकी आखों से आंसुओं की अविरत धारा बहने लगती थी ।गंगा की लहरों पर:
एक दिन गंगा के तट पर वे सूर्य देवता से यही प्रार्थना कर रहे थे । वे सोच रहे थे कि भगवान उनकी प्रार्थना नहीं सुन रहे । उनके नेत्र आंसुओं से तर थे । वे जाने ही वाले थे कि उन्हें गंगा की लहरों पर कोई वस्तु बहती दिखाई दी । अधीरथ आगे बढ़े । नदी में एक टोकरी बहती चली आ रही थी । अधीरथ ने टोकरी पास में आते ही देखा की उसमें नर्म गद्दे पर एक प्यारा सा, सुन्दर बच्चा है । वह सूर्य की तरह तेजस्वी है । उसकी भुजाओं पर कवच व कानों में स्वर्णकुंडल है ।
उक्त बच्चे को देखकर अधीरथ खुशी से भर उठे । उनके मन में दया भी उपजी । इतना प्यारा बच्चा नदी में कैसे ? तुरंत उन्होंने बच्चे को उठाया । बच्चा उन्हें उसी स्थान पर मिला जहां खड़े होकर वे प्रार्थना कर रहे थे । उनकी आंखों से खुशी के आंसू छलक उठे । वे सोचने लगे ’’क्या भगवान ने उसकी प्रार्थना सुन ली है ? यह प्यारा बच्चा किसका होगा ? कोई भी हो । अब यह सिर्फ उनका ही रहेगा ।‘‘ अधीरथ बच्चे को लेकर घर चले आये ।
अधीरथ की पत्नी राधा संतान न होने के कारण दुखी थी । जब उसने बच्चा देखा तो वह अपनी प्रसन्न्ाता छिपा नहीं पाई । पति-पत्नी ने बच्चे का बड़े प्यार से लालन-पालन किया । उन्होंने उसका नाम वसुसेन रखा । यही बालक बाद में कर्ण के नाम से प्रसिद्ध हुआ ।
’’मैं उनका शिष्य बनूंगा‘‘:
कर्ण अब बड़ा हो गया था । वह बचपन में ही अपने साथियों से ज्यादा बुद्धिमान, शक्तिशाली तथा दृढ़ निश्चयी था । उसे धनुष-बाण अत्यंत प्रिय थे । धनुर्विद्या तथा निशानेबाजी में वह अपने मित्रों में कहीं ज्यादा निपुण था । उसकी प्रतिभा देखकर लोग आश्चर्य करते हुये कहते थे, ’’यह इतना छोटा है, फिर भी कितना बुद्धिमान है । उसका निशाना अचूक है !‘‘
कर्ण धनुर्विद्या में सबसे बढ़कर रहना चाहते थे । इसके लिये वह गुरू की खोज में थे । एक बार किसी व्यक्ति से बातचीत करते हुये कर्ण ने परशुराम का नाम सुना । उन्होंने पूछा । ’परशुराम कौन हैं ?‘ जवाब मिला ’’परशुराम जमदग्नि ऋषि के पुत्र हैं । परशुराम ऋषि होने के साथ-साथ अद्वितीय योद्धा भी हैं । वे सारे देश का 21 बार भ्रमण कर चुके हैं । कोई भी क्षत्रिय उन्हें हरा नहीं सकता । उनके धनुष से सारा विश्व कांपता है । धनुर्विद्या में कोई उनका मुकाबला नहीं कर सकता । वे भगवान हैं और अन्याय को समाप्त करने के लिये पृथ्वी पर अवतरित हुये हैं ।‘‘
परशुराम का शिष्य:
परशुराम की इतनी प्रशंसा सुनकर कर्ण के मन में उनके प्रति सम्मान पैदा हो गया । वे परशुराम के शिष्य बनकर उनसे धनुर्विद्या सीखने के इच्छुक थे । लेकिन उनके मन में शंका थी कि क्या परशुराम उन्हें अपना शिष्य बनायेंगे ? कर्ण साहस कर परशुराम के आश्रम में पहुंचे परशुराम ने पूछा कि ’’बेटा तुम कौन हो ?‘‘ कर्ण ने उन्हें अपना परिचय दिया तथा कहा कि ’’आप अद्वितीय योद्धा हैं और धनुर्विद्या में आपका कोई सानी नहीं है । मैं आपसे धनुर्विद्या सीखना चाहता हूं । मुझे अपने शिष्य के रूप में स्वीकार कीजिये ।‘‘
कर्ण की श्रद्धा और लगन देखकर परशुराम ने उन्हें अपना शिष्य बना लिया । धनुर्विद्या में कर्ण की प्रतिभा देखकर वे चकित हो उठे । उन्होंने कर्ण को धनुर्विद्या सिखाना प्रारंभ किया । उन दिनों सिर्फ क्षत्रिय तथा ब्राह्मण ही गुरू के पास रहकर धनुर्विद्या सीख सकते थे ।
परशुराम क्षत्रियों से घृणा करते थे । अतः वे सिर्फ ब्राह्मणों को ही शिक्षा देते थे । उन्होंने सोचा कि कर्ण ब्राह्मण है । कर्ण ने भी अपने ब्राह्मण न होने की बात छिपा रखी । कर्ण बिना किसी बाधा के परशुराम से शिक्षा ग्रहण करते रहे । उनकी बुद्धि अत्यंत तीक्ष्ण थी । परशुराम ने उन्हें धनुर्विद्या में पारंगत बना दिया । अपने गुरू की उन्होंने अत्यंत श्रद्धापूर्वक सेवा की ।
एक दिन परशुराम कुछ थके से थे । कर्ण की गोद में सिर रखकर सो रहे थे । इसी समय एक मधुमक्खी कहीं से आकर कर्ण की जांघ पर बैठ गयी और काटने लगी । कर्ण ने सोचा कि यदि वे जरा भी हिले-डुले तो गुरू की निद्रा भंग हो जायेगी । मधुमक्खी के काटने से कर्ण की जांघ खून से बहने लगा । जब परशुराम के गाल पर खून लगा तो वे उठ बैठे और कर्ण से पूछा, ’’बेटा, इतना खून कहां से बहा ?‘‘ कर्ण ने उन्हें सारी बात बता दी । परशुराम ने फिर पूछा ’’तुमने इतना दर्द चुपचाप सहन कर लिया ?‘‘ कर्ण ने जवाब दिया ’’मुझे कुछ अधिक दर्द नहीं हुआ ।‘‘
परशुराम को इससे आश्चर्य हुआ । उन्होंने कर्ण को सिर से लेकर पैर तक देखा । वे अब तक यही समझ रहे थे कि कर्ण ब्राह्मण-पुत्र है लेकिन कोमल शरीर वाला ब्राह्मण इतनी असह्य वेदना सहन नहीं कर सकता । परशुराम को शंका हो गयी कि कर्ण क्षत्रिय है । उन्होंने कठोर स्वर में कर्ण से पूछा, ’’कर्ण‘‘ ’’कर्ण ने कहा, ’’आज्ञा गुरुदेव !‘‘ परशुराम ने कहा, ’’मुझे सच-सच बताओ कि तुम कौन हो ? क्या तुमने मुझसे कुछ छिपाया है ?‘‘ ’’मैंने क्या छिपाया, मैं नहीं जानता ।‘‘ कर्ण ने जवाब दिया । परशुराम ने पूछा ’’क्या तुम ब्राह्मण के लड़के हो ? मुझे सत्य बताओ ।‘‘
कर्ण ने कोई जवाब नहीं दिया । वे मौन खड़े रहे । वे सिर झुकाकर मौन खड़े थे । वे यही समझते थे कि उन्हें पालने वाला अधीरथ ही उनके पिता हैं । अधीरथ एक सारथी थे । कर्ण एक सारथी के पुत्र थे । वे ब्राह्मण या क्षत्रिय नहीं थे । कर्ण सोचने लगे, वे अपने गुरू को क्या जवाब दें । वे दुखी हो उठे । साथ ही साथ उन्हें डर भी लग रहा था । कर्ण के मौन से परशुराम समझ गये कि उनकी शंका सच है । गुस्से में वे कर्ण की नम्रता, साहस, गुरूभक्ति तथा धनुर्विद्या सीखने के प्रति उनका प्रेम सब भूल गये । उन्होंने कर्ण को शाप दिया, ’’लड़के ! क्या तुमने अपने गुरू को धोखा देकर शिक्षा प्राप्त नहीं की ? मैंने तुम्हें शक्तिशाली अस्त्रों का उपयोग करना सिखाया; लेकिन जब तुम्हें उनकी सबसे ज्यादा आवश्यकता पड़ेगी, तभी तुम उनका प्रयोग करना भूल जाओगे ?‘‘
कर्ण को ऐसा महसूस हुआ, मानों उनके पैरों तले की जमीन खिसक गयी है । उन्होंने अपने गुरू का दिल दुखाया है । इससे उन्हें गुरु ने शाप भी दिया है । वे समझ नहीं पाये कि उन्हें अब क्या करना चाहिये । इसी अवस्था में वे परशुराम के आश्रम को छोड़कर चले गये ।
हस्तिनावती में:
हस्तिनावती नगरी में पांडव तथा कौरव राजकुमारों की धनुर्विद्या के कौशल का प्रदर्शन आयोजित किया गया था । राजकुमारों की शिक्षा अभी हाल ही में पूरी हुयी थी । जब कर्ण को यह खबर मिली तब वे राजकुमारों की धनुर्विद्या का कौशल देखने के लिये हस्तिनावती नगरी आये । हस्तिनावती के बाहर एक बहुत बड़ा मैदान था । वहां सारी व्यवस्था थी । मैदान के बीच एक विशाल घेरा बना था । शेष मैदान दर्शकों से खचाखच भरा था । राजपरिवार के सदस्य भी मैदान में उपस्थित थे ।
राजकुमारों की कला का प्रदर्शन शुरू हुआ । राजकुमारों ने घुड़सवारी, तलवारबाजी तथा रथ चलाने के अद्भुत कारनामें दिखाये । हाथी पर बैठकर युद्ध कैसे करते हैं, यह भी उन्होंने दिखाया । अर्जुन ने धनुर्विद्या में सुन्दर प्रदर्शन किया । भारी बाणों का प्रयोग देखकर तो लोगों ने दांतों तले अंगुली दबा ली । वे यह कहते हुये उसकी प्रशंसा करने लगे कि ’’अर्जुन धनुर्विद्या में सर्वश्रेष्ठ एवं अद्वितीय है ।‘‘
पार्थ ! गर्व मत करो:
उसी समय दरवाजे के निकट कठोर ध्वनि सुनाई दी । लोग मुड़कर देखने लगे । एक युवक आगे बढ़ता चला आ रहा था । उसका तेज, उसका बलिष्ठ शरीर, लंबाई, चमकदार कवच तथा कुंडल देखकर लोग स्तंभित रह गये । मैदान में उपस्थित दर्शक कानाफूसी करने लगे । यह युवक कर्ण थे । वह मैदान में बने गोलाकार स्थल पर आये तथा अर्जुन की ओर मुड़कर कहने लगे:-
’’पार्थ ! तुम यह मत सोचो कि धनुर्विद्या में तुमसे श्रेष्ठ और कोई नहीं है । मैं धनुर्विद्या में तुमसे कहीं बहुत अधिक श्रेष्ठ कला का प्रदर्शन कर दिखाता हूं ।‘‘ इतना कहकर कर्ण ने अपनी कला का प्रदर्शन किया । उन्होंने ’पर्जन्य‘ अस्त्र आकाश में छोड़ा और वर्षा होने लगी । ’वायव्य‘ का प्रयोग कर कर्ण ने वर्षा बंद करवा दी । ’आग्नेय‘ अस्त्र छोड़कर उन्होंने अग्नि उत्पन्न्ा की तथा ’वरुण‘ से उसे बुझा भी दिया । धातु के बने तेजी से घूमते हुये सूअर के मुंह में उन्होंने पांच बाण छोड़े । इसके बाद अंतर्धान हथियार का प्रयोग कर कर्ण अदृश्य हो गये । पलक झपकते ही वे गोलाकर के दूसरे भाग में दिखाई दिये । फिर गदा हाथ में लेकर, वे उसे चलाने लगे । गदायुद्ध का भी प्रदर्शन उन्होंने किया । जनता शस्त्र-कला में कर्ण की निपुणता देखकर दंग रह गयी ।
प्रदर्शन खत्म होते ही दुर्योधन ने कर्ण को अपने बाहुपाश में लिया तथा कहने लगा, ’’हे अद्वितीय योद्धा ! तुम्हारे साहस और शस्त्र-कला से मैं अत्यंत प्रसन्न्ा हुआ हूं । मैं तथा मेरा राज्य तुम्हारा है । जो चाहो, मांग सकते हो । मैं तुम्हारी इच्छा तुरंत पूरी कर दूंगा ।‘‘ कर्ण ने कहा, ’’महाराज, मुझे कुछ नहीं चाहिये । मैं सिर्फ आपकी मित्रता और अर्जुन से धनुर्विद्या में मुकाबला करना चाहता हूं ।‘‘ दुर्योधन ने कहा ’’तुम्हारी दोनों इच्छायें पूरी होंगी । आज से तुम मेरे घनिष्ट मित्र हुये । तुम मेरे बराबर हो । अब मुझे भविष्य में किसी से डरने की कोई जरूरत नहीं ।‘‘
अर्जुन निकट ही खड़े थे । इन सब बातों से वे उत्तेजित हो गये । उन्होंने कहा, ’’कर्ण ! हमने तुम्हें निमंत्रित नहीं किया था लेकिन फिर भी तुम आये । हमने तुमसे बोलने के लिये नहीं कहा था, लेकिन तुम बहुत अधिक बोल रहे हो । तुमने एक शांत सभा में बाधा पहुंचाई है । मैं तुरंत तुम्हें मार डालूंगा । हथियार संभालो और युद्ध के लिये तैयार हो जाओ ।‘‘
अर्जुन की बातें सुनकर कर्ण क्रोधित हो उठे । उन्होंने कहा, ’’अर्जुन, यह क्षेत्र तुम्हारे लिये ही सुरक्षित नहीं है । यह एक सार्वजनिक स्थल है । जिस किसी को धनुर्विद्या आती हो, वह यहां आकर उसका प्रदर्शन कर सकता है । तुम्हें क्या आपत्ति है ? तुम मेरा अपमान कर रहे हो । क्या एक सच्चा योद्धा इस तरह की बातें बोलता है ? आओ, युद्ध करो । मैं अभी यहां, इसी क्षण तुम्हें अपने बाणों का शिकार बना दूंगा ।‘‘
कर्ण और अर्जुन युद्ध के लिये तैयार हो गये । राजकुमारों के गुरू द्रोणाचार्य को इस लड़ाई की सहमति देनी पड़ी । मैदान में बैठे दर्शकों में तरह-तरह की बातें होने लगी । पांडवों की माता कुंती अर्जुन और कर्ण के बीच लड़ाई की खबर सुनते ही बेहोश हो गयी । कृपाचार्य द्वंद्वयुद्ध के नियमों को अच्छी तरह जानते थे । वे बीच में गये तथा उन्होंने कर्ण से कहा,
’’देखो कर्ण, अर्जुन - जिससे तुम युद्ध करना चाहते हो, चंद्रवंश का राजकुमार है । वह राजा पांडू का पुत्र है । अतः उसका मुकाबला करने वाला व्यक्ति सब मामलों में उसके बराबर होना चाहिये । तुम किसके पुत्र हो ? तुम्हारी जाति कौन सी है ? तुम किसके शिष्य हो ? वह सभी जानकारी इस सभा को दो ।
शर्म तथा दुख से कर्ण का सिर झुक गया । उन्होंने सोचा, ’’मैं सारथी का पुत्र हूं । अतः ऐसा लगता है कि मैं नीच जाति का हूं । इसे यह लोग तूल दे रहे हैं कि मैं कौन हूं, इससे क्या फर्क पड़ता है ?‘‘ लेकिन उस समय की परंपरा ही ऐसी थी कि कर्ण कुछ नहीं कर सकते थे । वे मौन खड़े रहे ।
अंग-नरेश कर्ण:
जब दुर्योधन ने यह देखा, तब वह क्रोधित होकर कहने लगा, ’’कृपाचार्य, आप क्या कह रहे हैं ? आप सोचते हैं कि अर्जुन राजकुमार है, कर्ण नहीं ? तब ठीक है । मैं अभी इसी क्षण कर्ण को राजा बताता हूं । तब वह अर्जुन को चुनौती दे सकता है ? कहिये ?‘‘ इतना कहकर दुर्योधन ने कर्ण को वहीं पर अंग प्रदेश का राजा बना दिया । जनता ने एक स्वर में उसे अपनी सहमति प्रदान की । कर्ण ने कृतज्ञता प्रकट करते हुये दुर्योधन से कहा, ’’महाराज मैं आपके इस अहसान को कैसे चुका सकता हूं ? दुर्योधन ने कहा, ’’कर्ण, मैं तुम्हारी दोस्ती की कदर करता हूं । यह हमेशा बनी रहे ।‘‘ इतना कहकर दुर्योधन ने कर्ण को गले लगा लिया ।
अर्जुन और कर्ण युद्ध शुरू ही करने वाले थे कि अधीरथ वहां आ पहुंचे । उन्होंने कुछ क्षण पूर्व ही अपने पुत्र के राजा बनने की खबर सुनी थी । कर्ण अपने पिता के पास गये तथा उन्हें नमन किया । अधीरथ ने अपने पुत्र को बाहों में भरकर आशीर्वाद देते हुये कहा, ’’बेटा, तुम्हारी कीर्ति बढ़ती रहे ।‘‘ भीम, जो यह देख रहे थे, समझ गये कि कर्ण अधीरथ के पुत्र हैं ।
भीम ने गर्जना करते हुये कहा, ’’हे कर्ण क्या तुम सारथी अधीरथ के पुत्र नहीं हो ? तब तुम चंद्रवंशी अर्जुन की बराबरी कैसे कर सकते हो ? पवित्र अग्नि के पास खड़े होने से ही क्या एक कुत्ता पवित्र प्रसाद प्राप्त करने का अधिकार पा सकता है । तुम अंग प्रांत के राजा बनने के योग्य नहीं हो । तुम तो युद्ध में अर्जुन के हाथों मारे जाने के योग्य भी नहीं हो ।‘‘ जब दुर्योधन ने यह सुना तो वह उत्तेजित हो गया । वह भीम की तरफ मुड़कर चीखा, ’’तुम्हारी वाणी एक क्षत्रिय के योग्य नहीं है । क्षत्रिय साहस को ज्यादा महत्व देता है । कर्ण की जाति की तुलना उसकी वीरता से करना कहां तक ठीक है ? इंद्र का शक्तिशाली हथियार वज्रायुध महर्षि दधीचि की हड्डियों से बना था । द्रोणाचार्य एक पवित्र कुंभ में जन्में थे । कहा जाता है कि महर्षि कृपाचार्य का जन्म पवित्र दूब से हुआ था । तब जन्म का सवाल ही कहां है ? कर्ण पवित्र कुंडल कवच के साथ पैदा हुये हैं । वे सूर्य की तरह तेजस्वी हैं । ऐसा व्यक्ति अंग राज्य का राजा बनने योग्य क्यों नहीं है ? यदि किसी को कर्ण का राज्याभिषेक मंजूर न हो, तो वह कर्ण से युद्ध करे तथा विजयी हो ।‘‘
दुर्योधन की घोषणा से जनसमुदाय में हलचल मच गयी । शाम हो चली थी और अंधेरा छाने लगा था । सभा समाप्त हो गयी । लोग कर्ण की शक्ति की प्रशंसा करते हुये घर लौटे ।
दुर्योधन का घनिष्ठ मित्र:
दुर्योधन तथा कर्ण के बीच मित्रता दिन व दिन गहरी होती गयी । दुर्योधन ने कभी भी कर्ण को अपने से कम नहीं समझा । वह हमेशा कर्ण के साथ ही रहता था । वह अपनी प्रत्येक बात कर्ण से कह देता था । जब उसके कर्मचारी उसकी प्रशंसा करते तो वह उन्हें कर्ण की प्रशंसा करने को कहता और उसी में उसे संतोष होता था । प्रतिदिन दुर्योधन, कर्ण को बहुमूल्य उपहार देता था । वह कर्ण के उज्ज्वल चरित्र, शक्ति, ईमानदारी तथा उदारता का सम्मान करता था ।
कर्ण भी दुर्योधन के उपहार को चुकाने में पीछे नहीं रहे । दुर्योधन को वे अपने प्राणों से भी अधिक प्यार करते थे । उसकी खातिर कर्ण अपने प्राण तक न्योछावर कर सकते थे । जब दूसरों ने ’सारथी का पुत्र‘ कहकर कर्ण का अपमान किया, तब सिर्फ दुर्योधन ने ही उन्हें अपने बराबर सम्मान प्रदान किया था । अतः कर्ण, दुर्योधन की बड़ी इज्जत किया किया करते थे ।
दानवीरता में कर्ण अद्वितीय थे । अपने वचन पूरे करने में वे प्राणों की आहुति तक देने से नहीं चूकने वाले थे । प्रतिदिन सैकड़ों निर्धन व्यक्ति सहायता की आशा में कर्ण के पास आते थे । कर्ण उन्हें वस्त्र या धन प्रदान करते थे । इसी गुण के कारण कर्ण ’दानशूर‘ कहलाये ।
कौरव पांडव चचेरे भाई थे । राज्य के लिये उनमें हमेशा विवाद होता रहता था । जब कभी भी दोनों के बीच झगड़ा होता, कर्ण कौरवों में सबसे बड़े दुर्योधन का पक्ष लेते थे । वे हमेशा यह कहा करते कि, ’’दुर्योधन के लिये मैं युद्ध करूंगा । भविष्य में यदि युद्ध हुआ तो मैं दुर्योधन के शत्रुओं का संहार करूंगा । पांडव उसके शत्रु हैं । मैं पांडवों विशेष रूप से उनमें सबसे शक्तिशाली अर्जुन का वध करूंगा ।‘‘ कर्ण के यह वचन सुनकर दुर्योधन प्रसन्न्ा होता था । उसे विश्वास था कि भीष्माचार्य, द्रोणाचार्य तथा अन्य योद्धाओं के साथ छोड़ देने के बाद भी कर्ण उसकी मदद अवश्य करेंगे । जब कभी दुर्योधन पांडवों की ताकत देखकर चिंतित होता, कर्ण उससे कहते, ’’कृपया चिंतित मत होइये । हमारे तथा पांडवों के बीच युद्ध भर होने दीजिये तब देखना । मैं उन्हें कुचल दूंगा ।‘‘ इन शब्दों से दुर्योधन को राहत मिलती ।
कर्ण आओ, राजा बनो:
कौरव तथा पांडव बंधुओं में राजय के लिये युद्ध की तैयारियां हो गयी । युद्ध रोकने के लिये भगवान श्रीकृष्ण हस्तिनावती गये । राज-दरबार में उन्होंने दुर्योधन को युद्ध करने को युद्ध न करने की सलाह दी । दुर्योधन ने भगवान कृष्ण की सलाह नहीं मानी । हस्तिनावती से लौटते समय भगवान कृष्ण, कर्ण को अपने साथ रथ में बिठाकर कुछ दूर ले गये । कर्ण संकोच में पड़ गये । वे सोचने लगे कृष्ण एक महान व्यक्ति हैं । मुझ जैसे तुच्छ जातिवाले व्यक्ति की उनसे क्या तुलना ? कृष्ण ने मुझे अपने पास क्यों बिठाया ?
कृष्ण ने कर्ण की बेचैनी को समझ लिया और हंसकर कहा । कर्ण तुम्हें संकोच करने की आवश्यकता नहीं है । तुम यह सोचते हो कि तुम एक सारथी के पुत्र हो । यही न् ! तो सुनो, अधीरथ तुम्हारे असली पिता नहीं हैं । तुम कुंती के पुत्र हो । कुंती जब अविवाहित थी, तब उन्होंने तुम्हें जन्म दिया । लोकलाज से डरकर कुंती ने तुम्हें डलिया में लिटाकर गंगा में प्रवाहित कर दिया था । तुम अधीरथ को मिले । कर्ण ! तुम सूर्य की कृपा से पैदा हुये हो । तुम क्षत्रिय हो तथा पांडवों में सबसे बड़े हो । कुंती मेरी बुआ है अतः तुम मेरे भी रिश्तेदार हो । मेरे साथ आओ । मैं तुम्हें पांडवों के पास ले चलता हूं । तुम कौरव तथा पांडव भाइयों में सबसे बड़े हो । तुम्हीं संपूर्ण साम्राज्य के राजा बनोगे । पांडवों को भी यह जानकर अत्यंत प्रसन्न्ाता होगी कि तुम उनके सबसे बड़े भाई हो । दुर्योधन तथा धर्मराज युधिष्ठिर दोनों ही तुम्हें राजा के रूप में स्वीकार कर लेंगे । तब युद्ध नहीं होगा तथा हजारों निर्दोष व्यक्तियों का खून नहीं बहेगा । तुम एक महान परिवार के सदस्य हो, लेकिन अब तक तुम्हें सारथी पुत्र माना जाता रहा । यह कितने शर्म की बात है । इनता अपमान काफी है । तुम्हें एक राजा की तरह रहना चाहिये तथा कौरवों, पांडवों एवं यादवों को तुम्हारी आज्ञा का पालन करना चाहिये, लेकिन तुम दुर्योधन की दया पर जी रहे हो !‘‘
दुर्योधन मेरे लिये सब कुछ है:
भगवान कृष्ण की बातें सुनकर कर्ण आश्चर्यचकित रहे गये । उन्हें प्रसन्न्ाता के साथ-साथ दुख भी हुआ । उनका गला भर आया और वे बोलने में असमर्थ हो गये । भावावेश में उन्होंने कहा, ’’कृष्ण आप कहते हैं कि कुंती मेरी माता हैं । यह हो सकता है । लेकिन जन्म देने के तुरंत बाद कुंती ने मुझे त्याग दिया । अधीरथ तथा उनकी पत्नी राधा ने मुझे माता-पिता की तरह पाला पोसा । माता राधा ने मुझे अपना दूध पिलाया । अधीरथ ने मुझे अपने पुत्र से भी बढ़कर प्यार किया । उन्होंने धूमधाम से मेरा विवाह किया । अब मेरे पुत्र तथा पोते भी हैं । आप चाहे मुझे कुद भी दें पर मैं अपने इन माता-पिता को कैसे छोड़ सकता हूं ? दुर्योधन और मैं दो शरीर एक प्राण हैं । जब सारा संसार मुझे तुच्छ जाति का समझकर मेरा उपहास कर रहा था, दुर्योधन ने तब मुझे सम्मान दिया । मेरे पास कुछ नहीं था । दुर्योधन ने मुझे राजा बना दिया । उसकी मित्रता असीम है । मैं उनका ऋण कैसे भूल सकता हूं ? मुझ पर भरोसा करके ही उन्होंने पांडवों से युद्ध करने की घोषणा की है । क्या मैं पांडवों के साथ मिलकर दुर्योधन के साथ विश्वासघात करूं ? नहीं कृष्ण ! दुर्योधन मेरा स्वामी है । मेरे लिये सब कुछ है । मैं उसका साथ दूंगा तथा पांडवों के साथ युद्ध करूंगा । यदि मैं विजयी रहा तो, मुझे अपने स्वामी का काम सफलतापूर्वक करने की प्रसन्न्ाता होगी । यदि मैं मारा गया तो इसे मैं अपना सौभाग्य समझूंगा । मुझे वीरगति मिलेगी । इसीलिये मैं अपने निर्णय पर अडिग हूं । अब हमें एक दूसरे से बिदा लेनी चाहिये ।‘‘
कर्ण के वचन सुनकर कृष्ण ने मन ही मन उसकी प्रशंसा की । उन्होंने कहा, ’’कर्ण अपने स्वामी के प्रति तुम्हारी भक्ति अप्रतिम है ।‘‘ इसके बाद उन्होंने कर्ण से बिदा ली ।
’तुम्हारे पांच पुत्र रहेंगे ही‘:
अगले दिन प्रातः काल जब कर्ण नदी के किनारे खड़े होकर सूर्य की आराधना कर रहे थे, उसी समय कुंती वहां आयी । कृष्ण ने ही कुंती को वहां भेजा था । उन्होंने कुंती को यह कहला भेजा था कि वह कर्ण से यह वचन ले ले कि वे पांडवों का वध नहीं करेंगे । जब कर्ण ने कुंती को देखा तो आदर से प्रणाम किया । कुंती ने कहा, ’’बेटा ! तुम मेरे पुत्र हो । पांडव तुम्हारे छोटे भाई हैं । तुम्हें इसका ज्ञान नहीं है । तुम अपने भाइयों को अपना शत्रु समझ रहे हो । तुमने उन्हें मार डालने की प्रतिज्ञा की है । कृपया ऐसा मत करना । कौरवों का साथ छोड़ दो । अपने छोटे भाइयों के पास आ जाओ । क्या बच्चों का यह कर्तव्य नहीं है कि वे अपने माता-पिता की इच्छा-पूर्ति करें ?‘‘
कर्ण ने उत्तर दिया, ’’मां, आप मेरी मां है, यह सत्य है । लेकिन अब तक लोग इसे जानते नहीं थे । जिन्होंने मेरा पालन-पोषण किया है, वे भी मेरे माता-पिता हैं । मैं उन्हें कैसे छोड़ सकता हूं ? यह युद्ध का समय है । इस समय दुर्योधन का नमक खानेवालों को मृत्यु की चिंता किये बिना उसके लिये युद्ध करना पड़ेगा । पिछले 13 वर्षों से मैंने दुर्योधन केसाथ समस्त राजसी सुख-सुविधाओं का उपभोग किया है । उसकी मित्रतावश ही आज मैं यहां तक पहुंचा हूं । अब तक मैंने अपने भाइयों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा । मान लीजिये की अब यदि मैं युद्ध के अवसर पर पांडवों का साथ दूं, तो सारा संसार मुझे अविश्वासघाती कहेगा । अतः मेरा पांडवों का साथ देना असंभव है । लेकिन माता, मैं आपकी एक इच्छा पूरी कर सकता हूं । आप चाहती है कि मैं पांडवों का संहार न करूं । मैं अर्जुन के सिवा किसी भी पांडवों को नहीं मारूंगा । प्रश्न यह है कि मैं अर्जुन का संहार करता हूं या अर्जुन मेरा । हम दोनों में से किसी एक की मृत्यु के बाद भी आपके पांच पुत्र शेष रहेंगे ही । अब हमें अलग हो जाना चाहिये ।‘‘ इतना कहकर कर्ण ने पुनः श्रद्धापूर्वक अपनी माता के चरण स्पर्श किये तथा बिदा ली ।
कौरवों तथा पांडवों की सेनायें युद्ध के लिये तैयार हो गयी । भीष्म पितामह कौरव सेना के सर्वोच्च सेनापति बने । वे अपनी सेना तथा पांडवों की सेना के महत्वपूर्ण सेनानायकों की सूची बना रहे थे । उन दिनों योद्धाओं को उनकी शक्ति के अनुसार अतिरथ एवं महारथ की पदवी दी जाती थी । भीष्म ने कहा कि, ’’कर्ण अतिरथ तो क्या पूर्णरथ भी नहीं है । कर्ण के गुरू ने भी उसे शाप दिया है । कर्ण ने सूर्य द्वारा भेंट किये गये कवच तथा कुंडल को भी दान कर दिया है । अतः वह पहले की तरह शक्तिशाली नहीं रहा । अतः वह अर्धरथ है ।‘‘ इतना कहकर भीष्म ने कर्ण को शूरवीर सेनाधिपतियों से बहुत नीचा स्थान दिया । भीष्म पितामह के समीप खड़े द्रोणाचार्य ने भी कहा, ’’हां ! हां ! कर्ण सत्य में अर्धरथ है ।‘‘
कर्ण को यह सब सुनकर अत्यंत दुःख हुआ । वे क्रोधित भी हुये । उन्होंने कहा, पितामह भीष्म आप मुझसे इतनी घृणा क्यों करते हैं । मैं निर्दोष हूं । फिर भी आप कठोर शब्दों से मेरे हृदय पर आघात कर रहे हैं । आप सर्वोच्च सेनापति हैं । क्या सेना में फूट डालना उचित है ? कौन यह कह सकता है कि सर्वोच्च सेनापति के रूप में आप अपने दायित्व को जानते हैं ? आप अत्यंत वृद्ध हो चुके हैं । इसलिये आप ऐसी बातें कह रहे हैं ।‘‘ इसके बाद कर्ण, दुर्योधन की ओर मुड़कर बोले, ’’मित्र, पितामह भीष्म सोचते हैं कि संसार में वही एक मात्र योद्धा हैं । मैं अकेले ही, पांडव तथा उनकी सेना को नष्अ कर सकता हूं । लेकिन यदि यह मुझे इस तरह लांछित करेंगे तो मैं क्यों लडूं ? यदि मैं शत्रुओं का संहार भी करूंगा, तो सारा श्रेय सर्वोच्च सेनापति को ही मिलेगा । मुझे यह पसंद नहीं है । किसी भी स्थिति में वृद्ध पितामह भीष्म युद्ध में हारेंगे । उसके बाद में लडूंगा और शत्रुओं का संहार करूंगा ।‘‘ इतना कहकर कर्ण युद्धक्षेत्र से चले गये ।
पितामह क्षमा करें :
युद्ध शुरू हुआ । प्रधान सेनापति भीष्म के नेतृत्व में कौरवों की सेना पांडवों से 10 दिन तक लड़ी । भीष्म पितामह ने पांडवों की सेना के हजारें सैनिकों को मार गिराया । यहां तक कि अर्जुन भी परेशान हो उठे । 10 दिन युद्ध करने के बाद पितामह भीष्म बाणों से छलनी होकर गिर पड़े । बाण उनके सारे शरीर में घुस गये थे ।
भीष्म द्वारा अपमान करने के कारण कर्ण उनसे क्रोधित थे । जब उन्होंने भीष्म की वीरता देखी तब उनका सारा क्रोध जाता रहा । कर्ण स्वभाव से अत्यंत उदार थे । अपने शत्रु केस ाहस तक की वे प्रशंसा करते थे । वे पितामह भीष्म के आहत होने का समाचार पाकर युद्ध क्षेत्र में गये । भीष्म बाणशैय्या पर लेटे थे । कर्ण ने पितामह भीष्म के चरण छुये तथा आदरपूर्वक कहा, ’’पितामह, मैं कर्ण हूं । मैं आपको श्रद्धासुमन अर्पित करने आया हूं ।‘‘ यह सुनकर भीष्म के नेत्रों में आंसुओं की धारा बह चली । उन्होंने कर्ण को बाहुपास में ले लिया तथा कहा, ’’कर्ण, तुम सोचते हो कि मैं तुमसे घृणा करता हूं । नहीं बेटे, मेरे मन में तुम्हारे प्रति सत्य ही कोई कटुता नहीं है । मैं जानता हूं तुम एक वीर योद्धा हो । तुम ईश्वर की तरह हो । साहस एवं वीरता में तुम अद्वितीय हो । युद्ध-कला में तुम कृष्ण तथा अर्जुन के समकक्ष हो । लेकिन तुमने अपनी शक्ति पर हमेशा गर्व किया । मैं तुम्हारी गर्वोक्ति को रोकने के लिये तुमसे कठोर शब्दों में वार्तालाप किया करता था ।‘‘
भीष्म के वचन सुनकर कर्ण का गला भर आया । वह बोले, ’’पितामह ! मैंने गुस्से से या अज्ञानवश आपसे कटु वचन कहे । कृपया मुझे क्षमा कर दें ।‘‘ भीष्म ने कहा, ’’तुम कुंती के पुत्र हो । कौरवों के लिये यह युद्ध जीतना असंभव है । पांडवों के साथ मिल जाओ । दुर्योध को युद्ध रोकने की सलाह दो । तुम सब को एकता से रहना चाहिये ।‘‘
कर्ण ने विनम्रता पूर्वक कहा, ’’मैं पांडवों का साथ नहीं दे सकता । सफलता या असफलता भगवान के हाथ में है । मैं अंतिम सांस तक दुर्योधन के लिये लडूंगा । वह मुझ पर विश्वास करता है ।‘‘ इतना कहकर कर्ण ने फिर भीष्म को प्रणाम किया तथा वहां चले गये ।
भीष्म के बाद द्रोणाचार्य कौरव-सेना के प्रधान सेनापति बने । चैथे दिन मशालों के प्रकाश में युद्ध रात को भी हुआ । भीम के पुत्र घटोत्कच ने भीषण युद्ध किया । वह हिडिंबा राक्षसी से पैदा हुआ था और अत्यंत वीर एवं युद्धशास्त्र निपुण था । उसके युद्ध कौशल से कौरव सेना के छक्के छूट गये । यह देखकर कर्ण ने उसका सामना किया । उनके पास वैजयंती नामक अचूक हथियार था जो उन्होंने अर्जुन को मारने के लिये रखा था । कर्ण ने इस अस्त्र का उपयो कर घटोत्कच के दो टुकड़े कर दिये । कौरव-सेना में नये उत्साह का संचार हुआ । कर्ण द्वारा ’वैजयंती‘‘ का प्रयोग करने की खबर सुनकर, कृष्ण तथा अर्जुन ने राहत की सांस ली ।
कर्ण सवोच्च सेनापति:
द्रोणाचार्य पांच दिन युद्ध करने के बाद मारे गये । उनके बाद कर्ण सर्वोच्च सेनापति बने । पहले ही दिन वे नकुल का संहार करने वाले थे लेकिन कुंती को दिया वचज याद कर उन्होंने नकुल को जीवनदान दिया ।
कर्ण, अर्जुन का संहार करने को उत्सुक थे । युद्धकला के हर क्षेत्र में वह अर्जुन से ज्यादा निपुण थे; लेकिन उनके पास अर्जुन के सारथी भगवान कृष्ण जैसा कुशल सारथी नहीं था । दुर्योधन को संदेश भेजकर कर्ण ने शल्य को अपना सारथी बनाया । इससे कर्ण की ही हानि हुयी । शल्य पांडवों का मामा था । यद्यपि वह कौरवों के साथ था । लेकिन वह पांडवों से स्नेह करता था ।
पांडवों ने गुप्त रूप से शल्य से प्रार्थना की थी कि यदि वह कर्ण के सारथी बनें तो ऐसी बातें करें जिससे कर्ण अपना साहस खो बैठे । शल्य ने ऐसा ही किया । उसने सारथी बनकर कर्ण के सामने अर्जुन की खूब प्रशंसा की । उसने अर्जुन को कर्ण से अधिक शक्तिशाली सिद्ध करने का प्रयास किया । इससे कर्ण का उत्साह ठंडा पड़ गया । यह कर्ण का दुर्भाग्य था कि जिस सारथी ने उसे सहायता करनी चाहिये थी, वही कर्ण को परास्त करवाने में जुटा था । यही नहीं, उस दिन युद्ध में कर्ण के दो पुत्र भी मारे गये ।
स्वामी की सेवा में मृत्यु:
इससे कर्ण हताश नहीं हुये । उस दिन कर्ण तथा अर्जुन के बीच भीषण युद्ध हुआ । कर्ण के युद्ध-कौशल से कौरव और पांडव सेना दंग रह गयी तथा उनकी प्रशंसा करने लगी । कृष्ण, भीम तथा अन्य योद्धा अर्जुन से कहले लगे, ’’यह क्या अर्जुन, तुम उत्साह से युद्ध नहीं कर रहे हो । कर्ण तुम्हारे सभी हथियारों को नष्ट कर रहा है । अपनी लड़ाई में प्राण फूंको । अर्जुन यथाशक्ति प्रयास करने के बावजूद युद्ध में फीके पड़ रहे थे । अतः उन्होंने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया । यह देखकर कौरव सेना आतंकित होकर भागने लगी । लेकिन कर्ण विचलित नहीं हुये । हंसकर उन्होंने एक अत्यंत शक्तिशाली अस्त्र का उपयोग कर ब्रह्मास्त्र रोक दिया । इसके बाद उन्होंने सर्प बाण छोड़ा, जो अर्जुन को मारने के लिये ही कर्ण ने रखा था । सर्प बाण से सारा युद्ध क्षेत्र प्रकाशवान् हो गया । बाण तेजी से अर्जुन की ओर बढ़ने लगा लेकिन इसी समय अर्जुन के सारथी कृष्ण ने आने पैर से रथ दबाया जिससे वह पांच इंच नीचे धस गया । इससे सर्फ बाण अर्जुन के सिर को बेधने के बजाय उनके मुकुट को लगा ।
सर्प बाण बेकार होने पर कर्ण ने एक और घातक हथियार प्रयुक्त करना चाहा लेकिन परशुराम के शाप के कारण वे उनका उपयोग करना नहीं जान पाये । यही नहीं उनके रथ का बायां पहिया भी जमीन में धंस गया । इससे रथ रुक गया । कर्ण के दुर्भाग्य की कोई सीमा नहीं थी ।
कर्ण ने अर्जुन की तरफ मुड़कर कहा, ’’अर्जुन मेरे रथ का पहिया जमीन में धंस गया है । मुझे एक क्षण का समय दो । मैं पहिये को बाहर निकाल दूंगा उसके बाद हम फिर युद्ध कर सकते हैं । जब मैं रथ से उतरुंगा, तब मेरे पास बाण नहीं होगा, तुम बाण मन चलाओ । एक योद्धा के लिये निहत्थे पर वार करना उचित नहीं है ।‘‘
अर्जुन शायद कर्ण की बात मान लेते, परंतु कृष्ण ने उन्हें समझाया, ’’अर्जुन ! यह कर्ण को मारने का उचित समय है । बिना किसी हिचक के बाण छोड़ो ।‘‘ कर्ण रथ से उतरकर पहिया निकालने का प्रयास कर रहे थे । लेकिन दुर्भाग्यवश पहिया हिला नक नहीं । इसी बीच कृष्ण की सलाह मानकर अर्जुन ने ’अंजलिका‘ बाण चला दिया । वीर कर्ण का सिर पृथ्वी पर ऐसे गिरा, मानो सूर्य आकाश से नीचे गिर पड़ा हो ।
इस प्रकार कर्ण ने अपने मित्र तथा स्वामी दुर्योधन की खातिर प्राण न्योछावर कर दिये । उन्होंने सच्चाई तथा निष्ठा का एक उदाहरण प्रस्तुत किया ।
महाभारत के इतिहास को देखें तो भगवान श्रीकृष्ण के बाद, कर्ण की ही महानता मान्य की गयी है । कर्ण का प्रभाव मित्रों पर भी था । एक बार तो उन्होंने सम्राट जरासंध समान श्रेष्ठ मल्ल को भी पराजित कर दिया था ।
पराक्रम के साथ कर्ण मे अन्य अनेक गुण थे । वे दानवीर थे । तपस्वी थे । अपने कवच कुंडल भी उन्होंने दान किये । सूर्य भगवान से उन्होंने कहा था कि, ’’यदि इंद्र ब्राह्मणवेश में कवच कुंडल मांगने आ रहे हैं, तो मैं दे दूंगा । अपनी कीर्ति नष्ट हो यह मैं नहीं चाहता । कीर्तियुक्त मुत्यु मुझे स्वीकार है ।‘‘
कर्ण में जितनी सहनशीलता थी, उतनी ही समयसूचकता भी । भीष्म पितामह की मृत्यु पर, कौरव उन्हें सेनापति बनाना चाहते थे । परंतु कौरव सेना के अपने से बड़े, वृद्ध योद्धाओं को यह गौरव मिलना ही चाहिये, यह उनका आग्रह था । वे नहीं चाहते थे कि कौरव सेना में फूट पड़े । जिन गुरू द्रोणाचार्य की उन्होंने निंदा की थी, उन्हीं को आग्रहपूर्वक सेनापति का पद दिलवाया ।
कर्ण पांडवों के गुणों का भी आदर करते थे । अर्जुन को युद्ध में मार डालने की घोषणायें उन्होंने की पर अर्जुन की वीरता की वे प्रशंसा करते थे । अपने सारथी शल्य के पास भी उन्हों यह प्रशंसा की । भगवान श्रीकृष्ण के साथ बातचीत करते समय, युधिष्ठिर को धर्मात्मा कह कर उनका गौरव भी किया ं पितामह भीष्म की मृत्यु पर उन्हें भारी दुःख हुआ ।
साभार
लेखक: एन.एस. लक्ष्मीनारायण भट्ट