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कलयुग का आगमन और राजा परीक्षित को मिला श्राप
" मुक्तिबोध " पेज नंबर ( 187-188 )
जिस समय बड़े भईया को बुरे -2 स्वपन आने लगे हम आप के पास कष्ट निवारण के लिए विधि जानने गए तो आपने बताया कि जो युद्ध में बन्धुघात अर्थात् अपने नातियों ( राजाओं , सैनिकों , चाचा , भतीजा आदि ) की हत्या का पाप दुःखी कर रहा है । मैं ( अर्जुन ) उस समय भी आश्चर्य में पड़ गया था कि भगवन् गीता ज्ञान में कह रहे थे कि तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा युद्ध करो ।
आज कह रहे है कि युद्ध में की गई हिंसा का पाप दुःखी कर रहा है । आपने पाप नाश होने का समाधान बताया " अश्वमेघ यज्ञ " करना जिसमें करोड़ों रूपये का खर्च हुआ । उस समय मैं अपने मन को मार कर यह सोच कर चुप रहा कि यदि मैं आप ( श्री कृष्ण जी ) से वाद - विवाद करूँगा कि आप तो कह रहे थे तुम्हें युद्ध में होने वाली हत्याओं का कोई पाप नहीं लगेगा । आज कह रहे हो तुम्हें महाभारत युद्ध में की हत्याओं का पाप दुःख दे रहा है । कहाँ गया आप का वह गीता वाला ज्ञान । किसलिए हमारे साथ धोखा किया , गुरू होकर विश्वासघात किया । तो बड़े भईया ( युधिष्ठर जी ) यह न सोच लें कि मेरी चिकित्सा में धन लगना है । इस कारण अर्जुन वाद - विवाद कर रहा है । यह ( अर्जुन ) मेरे कष्ट निवारण में होने वाले खर्च के कारण विवाद कर रहा है यह नहीं चाहता कि मैं ( युधिष्ठर ) कष्ट मुक्त हो जाऊँ । अर्जुन को भाई के जीवन से धन अधिक प्रिय है । उपरोक्त विचारों को ध्यान में रखकर मैंने सोचा था कि यदि युधिष्ठर भईया को थोड़ा सा भी यह आभास हो गया कि अर्जुन ! इस दृष्टि कोण से विवाद कर रहा है तो भईया ! अपना समाधान नहीं कराएगा । आजीवन कष्ट को गले लगाए रहेगा । हे कृष्ण ! आप के कहे अनुसार हमने यज्ञ किया । आज फिर आप कह रहे हो कि तुम्हें युद्ध की हत्याओं का पाप लगा है । उसे नष्ट करने के लिए शीघ्र राज्य त्याग कर हिमालय में तपस्या करके गल मरो । आपने हमारे साथ यह विश्वास घात किसलिए किया ? यदि आप जैसे सम्बन्धी व गुरू हों तो शत्रुओं की आवश्यकता ही नहीं ।
हे कृष्ण हमारे हाथ में तो एक भी लड्डू नहीं रहा न तो युद्ध में मर कर स्वर्ग गए न पृथ्वी के राज्य का सुख भोग सके । क्योंकि आप रहे हो कि राज्य त्याग कर हिमालय में गल मरो । आँसू टपकाते हुए अर्जुन के मुख से उपरोक्त वचन सुनकर युधिष्ठर बोला , अर्जुन ! जिस परिस्थिति में भगवान है । इस समय ये शब्द बोलना शोभा नहीं देता । श्री कृष्ण जी बोले हे अर्जुन ! सुन मैं आप को सत्य -2 बताता हूँ । गीता के ज्ञान में मैंने क्या कहा था मुझे कुछ भी ज्ञान नहीं । यह जो कुछ भी हुआ है यह होना था इसे टालना मेरे वश नहीं था । कोई अन्य शक्ति है जो आप और हम को कठपुतली की तरह नचा रही है । वह तेरे वश न मेरे वश । परन्तु जो मैं आपको हिमालय में तपस्या करके शरीर अन्त करने की राय दे रहा हूँ । यह आप को लाभदायक है । आप मेरे इस वचन का पालन अवश्य करना । यह कह कर श्री कृष्ण जी शरीर त्याग गए । जहाँ पर उनका अन्तिम संस्कार किया गया । उस स्थान पर यादगार रूप में श्री कृष्ण जी के नाम पर द्वारिका में द्वारिकाधीश मन्दिर बना है ।
कृष्ण ने पाण्डवों से कहा था कि मेरे शरीर का संस्कार करके राख तथा अधजली अस्थियों को एक काष्ठ के संदूक ( wood ) में डालकर उसको पूरी तरह से बंद करके यमुना में प्रवाह कर देना । पाण्डवों ने वैसा ही किया । वह संदूक बहता हुआ समुद्र में उस स्थान पर चला गया जिस स्थान पर उड़ीसा प्रान्त में जगन्नाथ का मंदिर बना है ।
एक समय उड़ीसा का राजा इन्द्रदमन था जो श्री कृष्ण जी का परम भक्त था । स्वपन में श्री कृष्ण जी ने बताया कि एक काष्ठ के संदूक में मेरे कृष्ण वाले शरीर की अस्थियाँ हैं । उस स्थान पर वह संदूक बहकर आ चुका है । उसी स्थान पर उनको जमीन में दबाकर एक मंदिर बनवा दें । राजा ने स्वपन अपनी धार्मिक पत्नी तथा मंत्रियों के साथ साझा किया और उस स्थान पर गए तो वास्तव में एक लकड़ी का संदूक मिला । उसको जमीन में दबाकर जगन्नाथ नाम से मंदिर बनवाया ।
धर्मदास जी को परमेश्वर कबीर जी ने बताया । हे धर्मदास ! सर्व ( छप्पन करोड़ ) यादव का जो आपस में लड़कर मर गए थे , अन्तिम संस्कार करके अर्जुन को द्वारिका में छोड़ कर चारों भाई इन्द्रप्रस्थ चले गए । अकेला अर्जुन द्वारिका की स्त्रियों तथा श्री कृष्ण जी की गोपियों को लेकर आ रहे थे । रास्ते में जंगली लोगों ने अर्जुन को पकड़ कर पीटा । अर्जुन के पास अपना गांडीव धनुष भी था जिस से महाभारत का युद्ध जीता था । परन्तु उस समय अर्जुन से वही धनुष नहीं चला । अपने आप को शक्तिहीन जानकर अर्जुन कायरों की तरह सब देखता रहा । वे जंगली व्यक्ति स्त्रियों के गहने लूट ले गए तथा कुछ स्त्रियों को भी अपने साथ ले गए । शेष स्त्रियों को साथ लेकर अर्जुन ने इन्द्रप्रस्थ को प्रस्थान किया तथा मन में विचार किया कि श्री कृष्ण जी महाधोखेबाज ( विश्वासघाती ) था । जिस समय मेरे से युद्ध कराना था तो शक्ति प्रदान कर दी । उसी धनुष से मैंने लाखों व्यक्तियों को मौत के घाट उतार दिया । आज मेरा बल छीन लिया , मैं कायरों की तरह पिटता रहा मेरे से वही धनुष नहीं चला ।
कबीर परमेश्वर जी ने बताया धर्मदास ! श्री कृष्ण जी छलिया नहीं था । वह सर्व कपट काल ब्रह्म ने किया है जो ब्रह्मा विष्णु व शिव का पिता है । जिसके समक्ष श्री विष्णु ( कृष्ण ) तथा श्री शिव आदि की कुछ पेश नहीं चलती । उपरोक्त कथा सुनकर धर्मदास जी ने प्रश्न किया : - धर्मदास ने कहा हे परमेश्वर कबीर बन्दी छोड़ जी ! आप ने तो मेरी आँखे खोल दी हे प्रभु ! हिमालय में तपस्या कर युधिष्ठर का तो केवल एक पैर का पंजा ही बर्फ से नष्ट हुआ तथा अन्य के शरीर गल गए थे । सुना है वे सर्व पापमुक्त होकर स्वर्ग चले गए ? उत्तर : - परमेश्वर कबीर जी ने कहा हे धर्मदास ! हिमालय में जो तप पाण्डवों ने किया वह शास्त्र विधि त्याग कर मनमाना आचरण ( पूजा ) होने के कारण व्यर्थ प्रयत्न था । ( प्रमाण - गीता अध्याय 16 श्लोक 23 तथा गीता अध्याय 17 श्लोक 5-6 में कहा है कि जो मनुष्य शास्त्रविधि से रहित केवल कल्पित घोर तप को तपते हैं वे शरीरस्थ परमात्मा को कृश करने वाले हैं उन अज्ञानियों को नष्ट हुए जान । ) क्योंकि जैसी तपस्या पाण्डवों ने की वह गीता जी व वेदों में वर्णित नहीं है अपितु ऐसे शरीर को पीड़ा देकर साधना करना व्यर्थ बताया है ।
यजुर्वेद अध्याय 40 मन्त्र 15 में कहा है ओम् ( ॐ ) नाम का जाप कार्य करते -2 कर , विशेष कसक के साथ कर मनुष्य जन्म का मुख्य कर्त्तव्य जान के कर । यही प्रमाण
गीता अध्याय 8 श्लोक 7 व 13 में कहा है कि मेरा तो केवल ॐ नाम है इस का जाप अन्तिम सांस तक करने से लाभ होता है इसलिए अर्जुन ! तू युद्ध भी कर तथा स्मरण ( भक्ति जाप ) भी कर अतः हे धर्मदास ! जैसी तपस्या पाण्डवों ने की वह व्यर्थ सिद्ध हुई ।