अजामेल से अधम उधारे , पतित पावन बिरद तास है|

एक अजामेल नाम का ब्राह्मण एक नगरी में रहता था। संयोगवश वह एक वैश्या से प्रेम करने लगा। ब्राह्मण समाज ने उन दोनों को नगरी से निकाल दिया। वह शराब भी पीता था , माँस भी खाता था। दोनों जंगल में झोंपड़ी डालकर रहने लगे। जंगल से पशु - पक्षी मारकर लाता और खाता। एक दिन एक सन्त उनको मिले , आध्यात्म ज्ञान समझाया। दोनों ने माँस - शराब सेवन न करने की प्रतिज्ञा की और संत से दीक्षा लेकर दोनों मोक्ष को प्राप्त हुए। इसलिए वाणी में कहा है कि परमात्मा स्वयं ही अजामेल तथा उसकी पत्नी को मिले , उन पापियों का उद्धार किया। परमात्मा का बीरद (स्वभाव तथा महिमा) पतित पावन है अर्थात् पापियों को पवित्र करने वाला है।

केशव आन भया बनजारा षट्दल किन्ही हाँस है।

जिस समय पूर्ण ब्रह्म कबीर जी बनारस शहर में जुलाहे की भूमिका तथा तत्वज्ञानी संत की भूमिका रहे थे। काशी शहर के जितने भी हिन्दू धर्म गुरू (ब्राह्मण , ऋषि , नाथ , गिरी , पुरी , सरस्वती अखाड़ों वाले) परमेश्वर के सामने निरूत्तर हो गए। जनता के सामने अपनी बेइज्जती (Insult) मानने लगे। ज्ञान का उत्तर तो बचा नहीं था , फिर कबीर जी को मार्ग से हटाने के लिए कई बार बदमाशों से मराने की योजना बनाई जो विफल रही। इसी प्रकार मुसलमानों के काजी - मुल्ला , पीर भी परमेश्वर कबीर के तत्वज्ञान के सामने बौने लगने लगे। सबने मिलकर परमेश्वर कबीर जी की हत्या की योजना कई बार बनाई। परंतु वे तो अमर पुरूष थे , उनको कौन मार सकता था। सब षड़यंत्र फैल हो गए तो सब काशी के पंडित , काजी - मुल्लाओं ने सभा करके निर्णय लिया कि कबीर एक निर्धन जुलाहा है। हम इसके नाम से पूरे हिन्दुस्तान में चिट्ठी भिजवा देते हैं कि कबीर सेठ पुत्र नीरू जुलाहा कॉलोनी बनारस वाला एक तीन दिन का भोजन - भण्डारा (धर्म यज्ञ) करने जा रहा है। सब अखाड़े वाले बाबा , साधु - संत आमंत्रित हैं। साथ में अपने सर्व शिष्यों को अवश्य लाऐं। तीनों दिन प्रत्येक भोजन के पश्चात् प्रत्येक साधु - संत , ब्राह्मण , काजी - मुल्ला , पीर - पैगम्बर , औलिया को एक दोहर , एक मोहर तथा जो कोई सुखा - सीधा (आटा , मिठाई , घी , दाल , चावल) भी लेना चाहे तो वह भी दिया जाएगा। ' दोहर ' एक लोई होती थी जो उस समय की सबसे मँहगी तथा उपयोगी कम्बल मानी जाती थी जिसको अमीर लोग ही ओढ़ते थे। ' मोहर ' लगभग 10 ग्राम सोने (Gold) से बना वर्तमान कीमत लगभग 30 हजार रूपये है। उस लोई की कीमत वर्तमान में 10 हजार से कम नहीं है।

सर्व सम्मति से यह निर्णय लेकर पत्र भिजवा दिए , दिन निश्चित कर दिए। निश्चित दिन को 18 लाख साधु - संत , ब्राह्मण , मण्डलेश्वर अपने - अपने सर्व शिष्यों सहित पहुँच गए। सबको लालच था कि प्रत्येक भोजन के पश्चात् उपरोक्त दक्षिणा मिलेगी। इसलिए अपने - अपने सर्व शिष्यों को मण्डलेश्वर ले आए कि अच्छा माल मिलेगा , सूखा - सीधा भी लेंगे। महीनों का खाने का तथा कई - कई हजार का सोना तथा लोई मिलेगी। बेचकर काम चलाएंगे।

कबीर परमेश्वर ने दो रूप में अभिनय किया। एक रूप तो अपनी कुटिया में बैठे रहे। दूसरे रूप में अपने सतलोक से 9 लाख बैलों पर थैले रखकर पका - पकाया सामान तथा सूखा सामान तथा दोहर - मोहर भरकर ले आए। (बोरे जो वर्तमान में गधों पर रखते हैं । उस समय बनजारे अर्थात् व्यापारी बैलों पर रखकर माल एक मण्डी से दूसरी मण्डी में ट्रान्सपोर्ट करते थे।) काशी के बाजार में टैंट लगाकर सारा सामान टैंटों में रख दिया और कुछ सेवादार भी सतलोक से साथ आए थे जो सर्व व्यवस्था संभाल रहे थे। भण्डारा शुरू कर दिया , तीन दिन तक चिट्ठी में लिखे अनुसार सर्व दक्षिणा दी गई। उस समय भोजन - भण्डारे में दिल्ली का राजा सिकन्दर लोधी भी आया था तथा उसका निजी पीर शेखतकी भी आया था। शेखतकी उपरोक्त षड़यंत्र का मुख्य सदस्य था। उसने सिकंदर लोधी को भी पत्र भिजवाया। वह चाहता था कि किसी तरह सिकंदर लोधी के दिल से कबीर जी उतरे और मेरी पूर्ण महिमा बने। उस शेख का अनुमान था कि अबकी बार कबीर काशी से भाग जाएगा और भण्डारे में पहुँचे साधु कबीर को गालियाँ दे रहे होंगे। राजा भी कबीर जी का फैन नहीं रहेगा।

परंतु जब भण्डारे के स्थान पर पहुँचे तो देखा , लंगर चल रहा है , सर्व दक्षिणा दी जा रही है। सब साधु तथा अन्य व्यक्ति भोजन खाकर दक्षिणा लेकर कबीर सेठ की जय - जयकार कर रहे हैं। बादशाह सिकंदर लोधी ने पता किया कि भण्डारा करने वाला कहाँ है? बताया गया कि उस सामने वाले बड़े टैंट (तम्बू) में है। राजा तथा शेखतकी उस तम्बू में गए और पहले अपना परिचय दिया , फिर उसका परिचय पूछा । तम्बू में बैठे सेठ ने परिचय बताया कि मेरा नाम केशव है , मैं बनजारा हूँ। कबीर जी मेरे मित्र हैं। उनका मेरे पास संदेश गया था कि एक छोटा - सा भण्डारा करना है , कुछ सामान लेकर आना। मेरा भी निमंत्रण भेजा था। राजा सिकंदर लोधी ने पूछा कि कबीर जी क्यों नहीं आए ? केशव रूपधारी परमेश्वर ने कहा मैं जो बैठा हूँ उनका नौकर , वे मालिक हैं , इच्छा होगी , तब चले आएंगे। उनकी कृपा तथा आदेश से सब ठीक चल रहा है। आप जी भी भोजन करें। राजा ने कहा पहले उस शुभान अल्लाह के दर्शन करूंगा , बाद में भोजन करूंगा। यह कहकर हाथी पर बैठकर राजा सिकंदर कबीर जी की कुटिया पर पहुंचे। साथ में कई अंगरक्षक भी थे।

कबीर परमेश्वर जी को संत रविदास जी ने सुबह ही बता दिया था कि हे कबीर जी ! आज तो विरोधियों ने बनारस छोड़कर भगाने का कार्य कर दिया। आपके नाम से पत्र भेज रखे हैं और ऐसा - ऐसा लिखा है। लगभग 18 लाख व्यक्ति साधु - संत लंगर खाने पहुंच चुके हैं। कबीर जी ने कहा कि मित्र आजा बैठ जा ! दरवाजा बंद करके सांगल लगा ले। आज - आज का दिन बिताकर रात्रि में अपने परिवार को लेकर भाग जाऊँगा। कहीं अन्य शहर - गाँव में निर्वाह कर लूंगा। जब उनको कुछ खाने को मिलेगा ही नहीं तो झल्लाकर गाली - गलौच करके चले जाएंगे। हम सांकल खोलेंगे ही नहीं , यदि किवाड़ तोड़ेंगे तो हाथ जोड़ लूंगा कि मेरा सामर्थ्य आप जी को भण्डारा कराने का नहीं है। गलती से पत्र डाले गए , मारो भावें छोड़ो। इतनी चर्चा चल रही थी , दोनों संत माला लेकर भक्ति कर रहे थे। मुँह बोले माता - पिता तथा मृतक जीवित किए हुए लड़का तथा लड़की सुबह सैर को गए थे। इतने में दिल्ली के बादशाह सिकंदर लोधी ने दरवाजा खटखटाया। संत रविदास जी ने कहा प्रभु ! लगता है कि अतिथि यहाँ पर भी पहुंच गए हैं। कबीर जी ने कहा कि देख सुराख से बच्चे तो नहीं आ गए हैं। रविदास जी ने देखकर बताया कि नहीं , कोई और ही है । दो - तीन बार दरवाजा खटखटाकर राजा सिकंदर ने अपना परिचय देकर बताया कि आपका दास सिकंदर आया है , आपके दर्शन करना चाहता है। परमेश्वर कबीर जी ने कहा राजन ! आज दरवाजा नहीं खोलूंगा। मेरे नाम से झूठी चिट्ठियाँ भेज रखी हैं , लाखों संत - भक्त पहुँच चुके हैं। रात्रि होते ही मैं अपने परिवार को लेकर कहीं दूर चला जाऊँगा। सिकंदर लोधी ने कहा परवरदिगार ! आप मुझे नहीं बहका सकते , मैं आपको निकट से जान चुका हूँ। आप एक बार दरवाजा खोलो , मैं आपके दर्शन करके ही जलपान करूंगा। परमेश्वर की आज्ञा से रविदास जी ने दरवाजा खोला तो सिकंदर लोधी मुकट पहने - पहने ही चरणों में लोट गया और बताया कि आप अपने आपको छिपाकर बैठे हो , आपने कितना सुंदर भण्डारा लगा रखा है। आपका मित्र केशव आपके संदेश को पाकर सर्व सामान लेकर आया है। आपके नाम का अखण्ड भण्डारा चल रहा है। सर्व अतिथि आपके दर्शनाभिलाषी हैं। कह रहे हैं कि देखें तो कौन है कबीर सेठ जिसने ऐसे खुले हाथ से लंगर कराया है। मेरी भी प्रार्थना है कि आप एक बार भण्डारे में घूमकर सबको दर्शन देकर कृतार्थ करें। तब परमेश्वर कबीर जी उठे और कुटिया से बाहर आए तो आकाश से कबीर जी पर फूलों की वर्षा होने लगी तथा आकाश से आकर सिर पर सुन्दर मुकुट अपने आप पहना गया। तब हाथी पर बैठकर कबीर जी तथा रविदास जी व राजा चले तो सिकंदर लोधी परमेश्वर कबीर जी पर चंवर करने लगे और पीलवान से कहा कि हाथी को भण्डारे के साथ से लेकर चल। जो भी देखे और पूछे काशी वालों से कि कबीर सेठ कौन - सा है , उत्तर मिले कि जिसके सिर पर मोरपंख वाला मुकुट है , वह है कबीर सेठ जिस पर सिकंदर लोधी दिल्ली के बादशाह चंवर कर रहे हैं। सब एक स्वर में जय बोल रहे थे। जय हो कबीर सेठ की , जैसा लिखा था , वैसा ही भण्डारा कराया है। ऐसी व्यवस्था कहीं देखी न सुनी। भोजन खाने का स्थान बहुत लम्बा - चौड़ा था। उसमें घूमकर फिर वहाँ पर आए जहाँ पर केशव टैंट में बैठा था। हाथी से उतरकर कबीर जी तम्बू में पहुँचे तो अपने आप एक सुंदर पलंग आ गया , उसके ऊपर एक गद्दा बिछ गया , ऊपर गलीचे बिछ गए जिनकी झालरों में हीरे , पन्ने , लाल लगे थे। टैंट को ऊपर कर दिया गया जो दो तरफ से बंद था। खाना खाने के पश्चात् सब दर्शनार्थ वहाँ आने लगे , तब परमेश्वर कबीर जी ने उन परमात्मा के लिए घर त्यागकर आश्रमों में रहने वालों तथा अन्य ग्रहस्थी व्यक्ति व ब्राह्मणों को आपस में (केशव तथा कबीर जी ने) आध्यात्मिक प्रश्न - उत्तर करके सत्यज्ञान समझाया। 8 पहर (24 घण्टे) तक सत्संग करके उनका अज्ञान दूर किया। कई लाख साधुओं ने दीक्षा ली और अपना कल्याण कराया। विरोधियों ने तो परमेश्वर का बुरा करना चाहा था , परंतु परमात्मा को इकट्ठे करे - कराए भक्त मिल गए अपना ज्ञान सुनाने के लिए। उन भक्तों को सतलोक से आया हुआ उत्तम भोजन कराया जिसके खाने से अच्छे विचार उत्पन्न हुए। उन्होंने परमेश्वर का तत्वज्ञान समझा , दीक्षा ली तथा एक वर्ष का खर्चा भी दे दिया। सब भण्डारा पूरा करके सर्व सामान समेटकर बैलों पर रखकर जो सेवादार आए थे , वे चल पड़े। तब सिकंदर लोधी , शेखतकी , कबीर जी , केशव जी तथा कई अंगरक्षक भी खड़े थे। अंगरक्षक ने आवाज लगाई कि बैल धरती से छः इन्च ऊपर चल रहे हैं। पृथ्वी पर पैर नहीं रख रहे। यह लीला देखकर सब हैरान थे। फिर कुछ देर बाद देखा तो आसपास तथा दूर तक न बैल दिखाई दिए और न बनजारे सेवक। सिकंदर लोधी ने पूछा हे कबीर जी! बनजारे और बैल कहाँ गए? परमेश्वर कबीर जी ने उत्तर दिया कि जिस परमात्मा के लोक से आए थे , उसी में चले गए। उसी समय केशव वाला स्वरूप देखते - देखते कबीर जी के शरीर में समा गया। सिकंदर राजा ने कहा हे अल्लाहु अकबर ! मैं तो पहले ही कह रहा था कि यह सब आप कर रहे हो , अपने आपको छिपाए हुए हो। शेखतकी तो जल - भुन रहा था। कहने लगा कि ऐसे भण्डारे तो हम अनेकों कर दें। यह तो महौछा - सा किया है । हम तो जग जौनार कर देते। महौछा कहते हैं वह धर्म अनुष्ठान जो किसी पुरोहित द्वारा पितर दोष मिटाने के लिए थोपा गया हो। उसमें व्यक्ति बताए गए नग ( Items ) मन मारकर सस्ती कीमत के लाकर पूरे करता है , हाथ सिकोड़कर लंगर लगाता है।

जग जौनार कहते हैं जिसके घर कई वर्षों उपरांत संतान उत्पन्न होती है तो दिल खोलकर खर्च करता है , भण्डारा करता है तो खुले हाथों से।

संत गरीबदास जी ने उस भण्डारे के विषय में जिसकी जैसी विचारधारा थी , वह बताई :-

गरीब, कोई कहे जग जौनार करी है, कोई कहे महौछा।

बड़े बड़ाई कऱया करें, गाली काढ़े औछा।।

भावार्थ है कि जो भले पुरूष थे , वे तो बड़ा कह रहे थे कि जग जौनार करी है। जो विरोधी थे , ईर्ष्यावश कह रहे थे कि क्या खाक भण्डारा किया है, यह तो महौछा-सा किया है। जब शेखतकी ने ये वचन कहे तो गूंगा तथा बहरा हो गया, शेष जीवन पशु की तरह जीया। अन्य के लिए उदाहरण बना कि अपनी ताकत का दुरूपयोग करना अपराध होता है , उसका भयंकर फल भोगना पड़ता है।

केशव आन भया बनजारा षट्दल किन्ही हाँस है।

परमेश्वर कबीर जी स्वयं आकर (आन) केशव बनजारा बने। षट्दल कहते हैं गिरी - पुरी , नागा - नाथ , वैष्णों , शैव पंथों के व्यक्तियों को जिन्होंने हँसी - मजाक करके चिट्ठी डाली थी। परमात्मा ने यह सिद्ध किया है कि भक्त सच्चे दिल से मेरे पर विश्वास करके चलता है तो मैं उसकी ऐसे सहायता करता हूँ।