नाम सुमर ले सुकर्म कर ले कोन जाने कल की खबर नहीं पल की
कोडी कोडी माया जोड़े , बात करे छल की पाप पुण्य की ये भांद्ध गठरिया , कैसे हो हल्की खबर नहीं पल की
मात पिता परिवार भाई भन्थु , दरिया मतलब की चलती वरियाँ कोई ना साथी , ये माटी दलदल की खबर नहीं पल की
तारों बीच चन्द्रमाँ ज्यों झलके , तेरी महिमा झला झलकी बने कुकरा बिश्टा खावे , अब बात करे बल की खबर नहीं पल की
ये संसार रैन का सुपना , जैसे ओस बूंद जल की सतनाम बिना सभी साधना , जैसे गारा दलदल की खबर नहीं पल की
अंत समे जब चले अकेला , आँसू नैन ढलकी कहे कबीर शरण गए मेरी , हो रक्षा जल थल की खबर नहीं पल की
नाम सुमर ले सुकर्म कर ले कोन जाने कल की खबर नहीं पल की
अनादि काल से ही मानव परम शांति , सुख व अमृत्व की खोज में लगा हुआ है । वह अपने सामर्थ्य के अनुसार प्रयत्न करता आ रहा है लेकिन उसकी यह चाहत कभी पूर्ण नहीं हो पा रही है । ऐसा इसलिए है कि उसे इस चाहत को प्राप्त करने के मार्ग का पूर्ण ज्ञान नहीं है ।
◇ सभी प्राणी चाहते हैं कि कोई कार्य न करना पड़े,
◇ खाने को स्वादिष्ट भोजन मिले,
◇ पहनने को सुन्दर वस्त्र मिलें,
◇ रहने को आलीशान भवन हों,
◇ घूमने के लिए सुन्दर पार्क हों,
◇ मनोरंजन करने के लिए मधुर संगीत हों,
◇ नांचे - गाए , खेलें - कूदें , मौज - मस्ती मनाए और कभी बीमार न हों,
◇ कभी बूढ़े न हों और कभी मृत्यु न होवे आदि ,
परंतु जिस संसार में हम रह रहे हैं यहां न तो ऐसा कहीं पर नजर आता है और न ही ऐसा संभव है । क्योंकि यह नाशवान है , इस लोक की हर वस्तु भी नाशवान है और इस लोक का राजा ब्रह्म काल है जो एक लाख मानव सूक्ष्म शरीर खाता है ।
उसने सब प्राणियों को कर्म - भर्म व पाप - पुण्य रूपी जाल में उलझा कर तीन लोक के पिंजरे में कैद किए हुए है ।
कबीरसाहेबकहतेहैंकि :
● कबीर , तीन लोक पिंजरा भया , पाप पुण्य दो जाल । सभी जीव भोजन भये , एक खाने वाला काल ।।
● गरीब , एक पापी एक पुन्यी आया , एक है सूम दलेल रे । बिना भजन कोई काम नहीं आवै , सब है जम की जेल रे ।।
वह नहीं चाहता कि कोई प्राणी इस पिंजरे रूपी कैद से बाहर निकल जाए । वह यह भी नहीं चाहता कि जीव आत्मा को अपने निज घर "सतलोक" का पता चले । इसलिए वह अपनी त्रिगुणी माया से हर जीव को भ्रमित किए हुए है ।
फिर मानव को ये उपरोक्त चाहत कहां से उत्पन्न हुई है ?
यहां ऐसा कुछ भी नहीं है । यहां हम सबने मरना है,
सब दुःखी व अशांत हैं ।
जिस स्थिति को हम यहां प्राप्त करना चाहते हैं ऐसी स्थिति में हम अपने निज घर "सतलोक" में रहते थे । काल ब्रह्म के लोक में स्व इच्छा से आकर फंस गए और अपने निज घर का रास्ता भूल गए ।
कबीरसाहेबकहतेहैंकि -
● इच्छा रूपी खेलन आया , तारौं सुख सागर नहीं पाया । इस काल ब्रह्म के लोक में शांति व सुख का नामोनिशान भी नहीं है ।
◇ त्रिगुणी माया से उत्पन्न काम , क्रोध , लोभ , मोह , अहंकार , राग - द्वेष , हर्ष - शोक , लाभ - हानि , मान - बड़ाई रूपी अवगुण हर जीव को परेशान किए हुए हैं ।
◇ यहां एक जीव दूसरे जीव को मार कर खा जाता है ,
◇ शोषण करता है , ईज्जत लूट लेता है , धन लूट लेता है , शांति छीन लेता है ।
◇ यहां पर चारों तरफ आग लगी है ।
◇ यदि आप शांति से रहना चाहोगे तो दूसरे आपको नहीं रहने देंगे ।
◇ आपके न चाहते हुए भी चोर चोरी कर ले जाता है , डाकू डाका डाल ले जाता है ,
◇ दुर्घटना घट जाती है ,
◇ किसान की फसल खराब हो जाती है ,
◇ व्यापारी का व्यापार ठप्प हो जाता है ,
◇ राजा का राज छीन लिया जाता है ,
◇ स्वस्थ शरीर में बीमारी लग जाती है अर्थात् यहां पर कोई भी वस्तु सुरक्षित नहीं ।
◇ राजाओं के राज , ईज्जतदार की ईज्जत , धनवान का धन , ताकतवर की ताकत और यहां तक की हम सभी के शरीर भी अचानक छीन लिए जाते हैं ।
◇ माता - पिता के सामने जवान बेटा - बेटी मर जाते हैं ,
◇ दूध पीते बच्चों को रोते - बिलखते छोड़ कर मात - पिता मर जाते हैं ,
◇ जवान बहनें विधवा हो जाती हैं और पहाड़ दुःखों को भोगने को मजबूर होते हैं ।
विचारकरेंकिक्यायहस्थानरहनेकेलायकहै?
लेकिन हम मजबूरी वश यहाँ रह रहे हैं क्योंकि इस काल के पिंजरे से बाहर निकलने का कोई रास्ता नजर नहीं आता और हमें दूसरों को दुःखी करने की व दुःख सहने की आदत सी बन गई।
यदि आप जी को इस लोक में होने वाले दुःखों से बचाव करना है तो यहां के प्रभु काल से परम शक्ति युक्त परमेश्वर ( परमअक्षरब्रह्म ) की शरण लेनी पड़ेगी।
जिस परमेश्वर का खौफ काल प्रभु को भी है । जिस के डर से यह उपरोक्त कष्ट उस जीव को नहीं दे सकता|
जो पूर्ण परमात्मा अर्थात् परम अक्षर ब्रह्म ( सत्यपुरूष ) की शरण पूर्ण सन्त के बताए मार्ग से ग्रहण करता है । वह जब तक संसार में भक्ति करता रहेगा , उसको उपरोक्त कष्ट आजीवन नहीं होते।
हम अपने निज घर को भूल गए हैं । वह परम शांति व सुख यहां न होकर निज घर "सतलोक" में है|
जहां पर न जन्म है , न मृत्यु है , न बुढ़ापा , न दुःख , न कोई लड़ाई - झगड़ा है , न कोई बिमारी है , न पैसे का कोई लेन - देन है , न मनोरंजन के साधन खरीदना है । वहां पर सब परमात्मा द्वारा निःशुल्क व अखण्ड है।
गरीबदासजीमहाराजकीवाणीमेंप्रमाणहैकि :
● बिन ही मुख सारंग राग सुन , बिन ही तंती तार । बिना सुर अलगोजे बसें , नगर नांच घुमार ।।
● घण्टा बाजै ताल नग , मंजीरे डफ झांझ । मूरली मधुर सुहावनी , निसबासर और सांझ ।।
● बीन बिहंगम बाजहिं , तरक तम्बूरे तीर । राग खण्ड नहीं होत है , बंध्या रहत समीर ।।
● तरक नहीं तोरा नहीं , नाही कशीस कबाब । अमृत प्याले मध पी , ज्यों भाटी चर्फे शराब ।।
● मतवाले मस्तानपुर , गली -२ गुलजार । संख शराबी फिरत हैं , चलो तास बजार ।।
● संख - संख पत्नी नाचें , गावैं शब्द सुभान । चंद्र बदन सूरजमुखी , नाही मान गुमान ।।
● संख हिंडोले नूर नग , झूलें संत हजूर । तख्त धनी के पास कर , ऐसा मुलक जहूर ।।
● नदी नाव नाले बगैं , छूटें फुहारे सुन्न । भरे होद सरवर सदा , नहीं पाप नहीं पुण्य ।।
● ना कोई भिक्षुक दान दे , ना कोई हार व्यवहार । ना कोई जन्मे मरे , ऐसा देश हमार ।।
● जहां संखों लहर मेहर की उपजैं , कहर जहां नहीं कोई । दासगरीब अचल अविनाशी , सुख का सागर सोई ।।
"सतलोक" में केवल एक रस परम शांति व सुख है । जब तक हम "सतलोक" में नहीं जाएंगे तब तक हम परमशांति , सुख व अमृत्व को प्राप्त नहीं कर सकते । "सतलोक" में जाना तभी संभव है जब हम पूर्ण संत से उपदेश लेकर पूर्ण परमात्मा की आजीवन भक्ति करते रहें । सर्व पवित्र धर्म ग्रंथों में छुपे गूढ रहस्य को उजागर करके यथार्थ भक्ति मार्ग बताना चाहा है जो कि वर्तमान के सर्व संत , महंत व आचार्य गुरु साहेबान शास्त्रों में छिपे गूढ रहस्य को समझ नहीं पाए।
● परम पूज्य कबीर साहेब अपनी वाणी में कहते हैं कि- ' वेद कतेब झूठे ना भाई , झूठे हैं सो समझे नाही।
जिस कारण भक्त समाज को अपार हानि हो रही है । सब अपने अनुमान से गुरुओं द्वारा बताई गई शास्त्र विरुद्ध साधना करते हैं । जिससे न मानसिक शांति मिलती है और न ही शारीरिक सुख , न ही घर व कारोबार में लाभ होता है और न ही परमेश्वर का साक्षात्कार होता है और न ही मोक्ष प्राप्ति होती है।
यह सब सुख कैसे मिले तथा किस प्रकार से काल ब्रह्म की जेल से छुटकारा पाकर अपने निज घर "सतलोक" में वापिस जा सकते हैं|
● यदि एक आत्मा को सतभक्ति मार्ग पर लगाकर उसका आत्म कल्याण करवा दिया जाए तो करोड़ अवश्वमेघ यज्ञ का फल मिलता है और उसके बराबर कोई भी धर्म नहीं है । जीवात्मा के उद्धार के लिए किए गए कार्य अर्थात् सेवा से श्रेष्ठ कोई भी कार्य नहीं है।
अपने पेट भरने के लिए तो पशु - पक्षी भी सारा दिन भ्रमते हैं। उसी तरह वह व्यक्ति है , जो परमार्थी कार्य नहीं करता , परमार्थी कर्म सर्वश्रेष्ठ सेवा जीव कल्याण के लिए किया कर्म है । जीव कल्याण का कार्य न करके सर्व मानव मरूस्थल के हिरण की तरह दौड़ कर मर जाते हैं । जिसे कुछ दूरी पर जल ही जल दिखाई देता है और वहां दौड़ कर जाने पर थल ही प्राप्त होता है । फिर कुछ दूरी पर थल का जल दिखाई देता है अन्त में उस हिरण की प्यास से ही मृत्यु हो जाती है । ठीक इसी प्रकार जो प्राणी इस काल लोक में जहां हम रह रहे है । वे उस हिरण के समान सुख की आशा करते हैं जैसे निःसन्तान सोचता है सन्तान होने पर सुखी हो जाऊँगा।
सन्तान वालों से पूछे तो उनकी अनेकों समस्याएं सुनने को मिलेंगी । निर्ध न व्यक्ति सोचता है कि धन हो जाए तो में सुखी हो जाऊं । जब धनवानों की कुशल जानने के लिए प्रश्न करोगे तो ढेर सारी परेशानियाँ सुनने को मिलेंगी । कोई राज्य प्राप्ति से सुख मानता है , यह उसकी महाभूल है । राजा (मन्त्री , मुख्यमन्त्री , प्रधानमन्त्री , राष्ट्रपति ) को स्वपन में भी सुख नहीं होता।
जैसे चार - पांच सदस्यों के परिवार का मुखिया अपने परिवार के प्रबन्ध में कितना परेशान रहता है । राजा तो एक क्षेत्र का मुखिया होता है। उसके प्रबन्ध में सुख स्वपन में भी नहीं होता । राजा लोग शराब पीकर कुछ गम भुलाते हैं । माया इकट्ठा करने के लिए जनता से कर लेते हैं फिर अगले जन्मों में जो राजा सत्यभक्ति नहीं करते , पशु योनियों को प्राप्त होकर प्रत्येक व्यक्ति से वसूले कर को उनके पशु बनकर लौटाते हैं।
जो व्यक्ति मनमुखी होकर तथा झूठे गुरुओं से दिक्षित होकर भक्ति तथा धर्म करते हैं । वे सोचते हैं कि भविष्य में सुख होगा लेकिन इसके विपरित दुःख ही प्राप्त होता है । कबीर साहेब कहते हैं कि मेरा यह ज्ञान ऐसा है कि यदि ज्ञानी पुरुष होगा तो इसे सुनकर हृदय में बसा लेगा और यदि मूर्ख होगा तो उसकी समझ से बाहर है।
● "कबीर , ज्ञानी हो तो हृदय लगाई , मूर्ख हो तो गम ना पाई"