Sab per penni nazar
कट्टर छर्रे किसी देश के अच्छे नही होते।
ये जो MAGA बनकर ट्रम्प के चुनाव में घूम रहे थे, ये उधर के कट्टर हैं जो अपने यूरोपियन कॉलोनाइजर बापों पर घमंड करते हैं।इनके लिए सिर्फ यही अमरीका के मालिक हैं।ट्रम्प की भी सोच यही है और मस्क की भी।लेकिन ये दोनों राजनेता हैं(ट्रम्प बिजनेसमैन से नेता पहले बन गया था, मस्क अब बन रहा है), तो इन्हें अब समझ आ रहा है।हालांकि ट्रम्प अभी चुप है लेकिन मस्क ने कहना शुरू कर दिया है कि ज्यादा बकलोली मत करो।इन MAGA वालों ने इस समय एन्टी हिन्दू/इंडिया अभियान चला रखा है।इनके हिसाब से भारतीय क्यों बड़े पदों पर भरे जा रहे।लेकिन फिलहाल मुद्दा भारतीयों का चल रहा है इस समय, बाकियों पर नही।लेकिन ये आग वहां भी जाएगी, फिलहाल भारतीयों से शुरुआत हुई है।
इसका नतीजा ये होगा कि ट्रम्प मिड टर्म इलेक्शन हारने जा रहा है।2026 में वो होगा और ट्रम्प की पार्टी संसद में हार जाएगी।
उधर कुछ भी बिल या फैसला पहले संसद से पास करवाना होता है।अगर कोई यूक्रेन को मदद देनी है तो उसके लिए भी संसद(कांग्रेस) की परमिशन चाहिए।इस समय ट्रम्प बहुमत के साथ आया है लेकिन इन "सांसदों" के चुनाव हर दो साल में होते हैं।दो साल बाद अब ट्रम्प की पार्टी बुरी तरह हारेगी क्योंकि ये तो सबको दिख रहा कि MAGA क्या गन्द मचा रहे।
ऐसे में ब्लैक्स हों, हिसपेनिक हों, नेटिव अमरीकन हों, एशियन हों, इंडियन हों, महिलाएं हों, इस्लामिस्ट हों, हर किसी को दिख रहा कि आज भारतीयों की बारी है तो कल हमारी आएगी।
और इन सबने मिलकर ट्रम्प को जिताया है भले ही हमारे कट्टर छर्रो की तरह MAGA वालों को भी गलतफहमी हो कि उनके भरोसे ट्रम्प जीता है।
इसलिए यदि ट्रम्प इन्हें चुप नही कराता तो हारेगा और कुछ कहता है तो भी नुकसान करेगा क्योंकि फिर ये ट्रम्प को "सबक" सिखाने निकलेंगे।इसलिए उसने मस्क को आगे किया है कि तू आगे आकर इन्हें शांत करवा।साथ ही भारतीयों को विश्वास दिलाने को विवेक रामास्वामी को आगे किया है कि डरने की जरूरत नही है क्योंकि अभी शाब्दिक लिंचिंग चल रही लेकिन आगे ये सब फिजिकल पर जाने की संभावना है।
यही होता है ज्यादा कट्टर बनने से।और इस सबके बीच हंस कौन रहा?, तो वो हैं डेमोक्रेट्स।क्योंकि सुलगा तो वही रहे हैं कि "मेक अमरीका ग्रेट अगेन कराएंगे, लेकिन तारीख नही बताएंगे"और जो कट्टर जैसा होता है, वो सुलग रहा है।
कट्टर को कभी पता नही चलता कि चिंगारी कौन लगाता है इनके।इन्हें लगता है कि ये इनकी "ओरिजिनल" सोच है।
जैसे किसी डेमोक्रेट्स ने चिंगारी सुलगाई कि ये भारतीय इतने क्यों ट्रम्प भर रहा, और इन्हें लगा कि "अरे हाँ! हम क्या मर गए हैं?"
ऐसे में ट्रम्प के सामने "कुँवा/खाई" सिचुएशन बन चुकी है।
इनका साथ देगा तो बाकी वोट खोएगा, और बाकियों के समर्थन में बोलेगा तो इनका समर्थन खोएगा।वैसे भी, पहले ही डेमोक्रेट्स जाते जाते दुनिया मे आग लगवाना चाहते हैं/लगा रहे हैं, ताकि ट्रम्प फंस जाए।अब वो घर मे भी आग लगा रहे ताकि वहां भी ट्रम्प फंस जाए।ऊपर से ट्रम्प की बड़ी बड़ी बातें हैं मेक इन अमरीका की।ऐसे में उसके पास 2 साल का समय है।
असल मे, 1 साल का।
1 साल में उसे पॉलिसी बदलनी है और फिर दूसरे साल मिड टर्म के लिए तैयारी करनी है। यदि वहां हार गया तो रबर स्टैम्प राष्ट्रपति रहेगा बाकी के 2 साल। जीत भी गया तो फिर तीसरे साल वापिस पॉलिसी पर काम करना है और चौथे साल चुनाव को ध्यान रखते हुए फैसले लेने हैं।
यही पर डेमोक्रेट्स उसी के कट्टर समर्थकों से खेल रहे कि देखते हैं कि कितना होता है तुम्हारा MAGA(मेक अमरीका ग्रेट अगेन), और वो इसी तरह बार बार इन्हें सुलगाएँगे ताकि ट्रम्प अपने कार्यकाल में ऐसा कुछ न कर जाए कि आगे फिर रिपब्लिकन ही जीतते रहें।क्योंकि डेमोक्रेट्स भी उधर की मुस्लिम लीग है जिसे अच्छे से पता है कि चुइया जनता के दिमाग से कैसे खेला जाता है।
ऐसे में ट्रम्प का देखना होगा कि क्या वो चुनाव जीतने जितना नेता भर है या मास्टर स्ट्रैटजिस्ट भी है जो इन सब चीजों से पार पा लेगा।खैर, जो भी हो, भारतीयों के साथ ये होना ही था।
डेमोक्रेट्स भी यही करते लेकिन स्लोली, क्योंकि अमरीका को सर्वाइव करने के लिए उन्हें भी वही सब करना पड़ता जो ट्रम्प करना चाह रहा है।फिर वो डॉलर का खात्मा हो, बाकियों को निकालना हो या अपने यहां प्रोडक्शन शुरू करना।
लेकिन फर्क ये आता कि डेमोक्रेट्स अपने वोटर(मुस्लिम जैसे) न निकालते बल्कि वो भारतीयों जैसों को निकालते।डॉलर भी वो धीरे धीरे खत्म करते नाकि ट्रम्प जैसे वहां "नोटबन्दी" कर एकदम से सबको क्रिप्टो में ले जा रहा है, जिसपर काम चल रहा है।इसी तरह वो प्रोडक्शन भी डायरेक्ट अपने देश मे न ला, "फ्रेंडली" देशों में शिफ्ट करते पहले, जहां से वो वापिस वैसा ही करते जैसा एक समय चीन या बाकी देशों के साथ किया था जिन्होंने अब अमरीका को आंख दिखा दी है और फिर उधर से शिफ्ट कर, वो अमरीका में प्रोडक्शन लाते ताकि डॉलर या उनकी बादशाहत को एकदम से झटका न लगता।
जबकि ट्रम्प इधर भी, एक साथ मेक्सिको, कनाडा, जापान, चीन, भारत, पनामा, ग्रीनलैंड सबको धमकी दे चुका है।
मृत्यु, टैक्स और साल दर साल बढ़ती कंप्यूटिंग पॉवर ही इस मानवीय सभ्यता के अंतिम सच हैं।सिर्फ एक दिन का वेतन सैलेरी या फिर कहो तनख्वाह 48 करोड रुपए।यह कोई परी कथा नहीं है यह रियलिटी है यानी की सच्चाई है। और यह कारनामा कर दिखाया है जगदीप सिंह ने। जोकि क्वांटम एस्केप के सीईओ हैं।
जो मुझे मुझे रेगुलर जुड़े हुए हैं उनको शायद याद होगा कि कुछ वर्ष पूर्व मैंने लिखा था कि आने वाला समय ए-आई क्वांटम कंप्यूटिंग और रिन्यूएबल एनर्जी का होगा आज जगदीप सिंह ने इसे साबित कर दिखाया।जब प्रोग्रामिंग हुआ था तो 160 kb की फ़्लॉपी से dos ऑपरेटिंग सिस्टम पहले लोड होता है तब कंप्यूटर स्टार्ट होता था।फिर 1.44 mb की फ़्लॉपी आई तो दुनिया ही बदल गई। इंजीनियरिंग कॉलेज में 42 MB हार्ड डिस्क का कंप्यूटर आया तो दैनिक जागरण ने लेख लिखा था कि कंप्यूटर इतनी ज्यादा मेमोरी वाला हो रहा है।आज इससे हज़ारों गुना कंप्यूटिंग पॉवर मेरे मोबाइल फ़ोन की है।
बात वही जो थोड़े टेक्निकल हैं सबको पता है कंप्यूटर सारी कंप्यूटिंग बिट्स में करता है जिसके दो वैल्यू हो सकते हैं जीरो और एक। इन्हीं बिट्स के विभिन्न कॉम्बिनेशन से कंप्यूटिंग होती है।पर फिर भी एक लिमिट है क्योंकि एक बिट की वैल्यू दो ही हो सकती है जीरो या एक।तो लग रहा था कि कंप्यूटिंग पॉवर बढ़ने का सिलसिला समाप्त होने वाला है।अब आ गई क्वांटम कंप्यूटिंग।इसमें डेटा प्रोसेसिंग बिट्स नहीं बल्कि क्यूबिट्स में होती है। एक और जीरो के बीच अनंत स्टेजेस होती हैं जिनमे डेटा स्टोर हो सकता है।थ्योरेटिकली क्वांटम कंप्यूटिंग की पॉवर अनंत है।
दिसंबर में गूगल लेकर आया है अपनी क्वांटम चिप - विलो। इसकी कंप्यूटिंग पॉवर इतनी ज्यादा है कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ सुपर कंप्यूटर को जो एक्वेशन सोल्व करने में 10 सेप्टिलियन साल लगेंगे वह यह चिप पाँच मिनट में सॉल्व कर देती है। सेप्टिलियन अर्थात् एक के बाद चौबीस जीरो लगा दीजिए।तो जो काम करने में सर्वश्रेष्ठ सुपर कंप्यूटर को खरबों खरबों खरबों खरबों साल लगेंगे वह काम यह चिप पाँच मिनट में कर दे रही है।
यह तो आरंभ है बीस साल में देखियेगा आपके मोबाइल में इतनी पॉवर होगी जितनी आज के तारीख़ में सारी दुनिया के मोबाइल में मिला कर नहीं है। क्वान्टम जेनरेशन का स्वागत करिए।
लोग सुबह से रात तक किसी से भी मिलते हैं, तो अधिकतर शिकायतें ही करते रहते हैं। *"यहां यह गड़बड़ है, वहां वह गड़बड़ है। यहां यह अव्यवस्था है, वहां वह अव्यवस्था है। इन्हीं बातों को दोहरा दोहरा कर सारा दिन दुखी रहते हैं।"*
जरा सोचिए! *"क्या आप अपनी पूरी शक्ति लगाकर भी किसी दूसरे व्यक्ति को 100% प्रसन्न कर सकते हैं? नहीं कर सकते। तो दूसरे लोग भी पूरी शक्ति लगाकर भी आपको 100% प्रसन्न नहीं कर पाएंगे। इसलिए परिस्थितियां कभी भी 100% आप के अनुकूल नहीं होंगी। और न ही आपकी शिकायतें कभी खत्म होंगी। इस प्रकार से तो आप जीवन भर दुखी रहेंगे।"*
*"इसलिए जहां जितनी परिस्थितियां आपके अनुकूल मिलें, वहां उतना लाभ उठा लें, और प्रसन्न रहें। और वहां जो सुविधा नहीं मिली, वहां या तो स्वयं सुविधा जुटा लें, या उसके बिना ही काम चला लें।"*
*"इस शैली से आप बहुत अच्छी प्रकार से सुख पूर्वक जीवन जी सकते हैं। सुख से जीने का दूसरा कोई उपाय नहीं है।"*