Sab per penni nazar
➖यदि आसी हैं❗तो❗➖ *अपने दोषों को स्वीकार करिए*
जो हमें हमारे "दोष" दिखा सकें, वही हमारे "सच्चे मित्र" हैं।* उन्हें ही अपने मित्रों में सम्मिलित करना है चाहिए जो हमारे दोष दर्शा सकें और कुमार्ग से हटाने का साहस उत्पन्न करें। *आमतौर पर होता यही है कि "चापलूसी" भाती है और "दोषों" की चर्चा करने वाला "शत्रु" लगता है।* हम चोरी का धन्धा करते हों और कोई चोर कह दे, बेइमानी करते हों और कोई बेईमान कह दे तो बहुत बुरा लगता है और उससे लड़ने-मरने के लिए तैयार हो जाते हैं। *इसे अपनी "कायरता" ही कहना चाहिए कि वस्तुस्थिति को बताने वाले दर्पण में अपनी कुरूपता देखना हमें सहन नहीं होता और अपने अपराध का दण्ड उस दर्पण को तोड़ने के रूप में देना चाहते हैं ।* कई बार ऐसे तर्क प्रस्तुत करके हम अपना बचाव करते हैं कि हमीं अकेले तो नहीं हैं, दुनिया में और भी तो बहुत लोग यह कर रहे हैं, उन्हें क्यों नहीं लोग रोकते ? अपनी दुर्बलताओं के इसी बचाव के कारण हम और हमारा व्यक्तित्व सारी जिन्दगी अविकसित ही बने रहते हैं।* न जाने कौन-सी दुष्प्रवृत्ति हमारे हमारे अन्दर दोषों-दुर्गुणों के रूप में पल रहे हैं।
*अच्छा यही है कि हम अपने "दोषों" की समीक्षा के लिए आज और अभी आगे बढ़ चलें, ताकि अपने व्यक्तित्व के विकास में रुकावट डालने वाले सारे अवरोध भी हट जाएँ और किसी दूसरे को अपने लिए निन्दा करने का दोष भी न सहना पड़े।* फिर चर्चा या निन्दा उतनी आवश्यक भी नहीं है जितना कि अपने सुधार के लिए किया गया प्रयत्न। *कोई हमारी "निन्दा" करे और हम किसी की "निन्दा" करें, इससे समस्या का समाधान नहीं हो जाएगा।* बुराइयों का अन्त करने के लिए सिर्फ चीख-पुकार या नारे- बाजी पर्याप्त नहीं। उसके लिए तो ठोस कदम उठाने की जरूरत है। *इसमें सबसे पहला और सबसे प्रभावशाली कदम यह हो सकता है कि हम अपने दोषों को "साहसपूर्वक स्वीकार करें।"* यह स्वीकारोक्ति हर किसी के सामने की जाय यह जरूरी नहीं। परन्तु हमें अपनी बुराइयों को स्वयं अपने सामने मानने में, आत्मीय गुरुजनों के समक्ष स्वीकारने और परमेश्वर की समर्थ सत्ता की साक्षी में कहने में तनिक-सी भी हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। हम यदि ऐसा कर सकें तो हमारी आत्मा, गुरुजनों का आशीष और भगवान का अनुग्रह हमारे अपने अन्दर अपूर्व साहस को जन्म देगा। ऐसा साहस, जिसके बलबूते अपनी दुर्बलताओं को उखाड़ फेंकने के लिए वह पराक्रम-पुरुषार्थ दिखा सकेंगे जो सच्चे और बहादुर योद्धा ही दिखाया करते हैं। अपने आप से लड़ना और अपने आप को शुद्ध बना लेना बाहर की दुनिया को निर्मल-निष्पाप बना सकने की "सबसे बड़ी योग्यता" और "वीरता" की सबसे बड़ी निशानी है।
निर्मल-निष्पाप हृदय में ईश्वरीय विभूतियाँ पुष्पित-पल्लवित होती हैं। ऐसे ही व्यक्ति अपनी निष्कलुष भावनाओं से परमात्म-सत्ता से एकाकार होते हैं। महापुरुषों का जीवन इस बात का साक्षी है कि वे पर दोष-दर्शन के स्थान पर सतत आत्मनिरीक्षण करते रहे। अच्छा यही है कि हम अपनी त्रुटियाँ खोजें और उन्हें दूर करें। यही अपनी शक्तियों को पहचानने और उन्हें विकसित करने का राजमार्ग है।
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जो हमें हमारे "दोष" दिखा सकें, वही हमारे "सच्चे मित्र" हैं।* उन्हें ही अपने मित्रों में सम्मिलित करना है चाहिए जो हमारे दोष दर्शा सकें और कुमार्ग से हटाने का साहस उत्पन्न करें। *आमतौर पर होता यही है कि "चापलूसी" भाती है और "दोषों" की चर्चा करने वाला "शत्रु" लगता है।* हम चोरी का धन्धा करते हों और कोई चोर कह दे, बेइमानी करते हों और कोई बेईमान कह दे तो बहुत बुरा लगता है और उससे लड़ने-मरने के लिए तैयार हो जाते हैं। *इसे अपनी "कायरता" ही कहना चाहिए कि वस्तुस्थिति को बताने वाले दर्पण में अपनी कुरूपता देखना हमें सहन नहीं होता और अपने अपराध का दण्ड उस दर्पण को तोड़ने के रूप में देना चाहते हैं ।* कई बार ऐसे तर्क प्रस्तुत करके हम अपना बचाव करते हैं कि हमीं अकेले तो नहीं हैं, दुनिया में और भी तो बहुत लोग यह कर रहे हैं, उन्हें क्यों नहीं लोग रोकते ? अपनी दुर्बलताओं के इसी बचाव के कारण हम और हमारा व्यक्तित्व सारी जिन्दगी अविकसित ही बने रहते हैं।* न जाने कौन-सी दुष्प्रवृत्ति हमारे हमारे अन्दर दोषों-दुर्गुणों के रूप में पल रहे हैं।
*अच्छा यही है कि हम अपने "दोषों" की समीक्षा के लिए आज और अभी आगे बढ़ चलें, ताकि अपने व्यक्तित्व के विकास में रुकावट डालने वाले सारे अवरोध भी हट जाएँ और किसी दूसरे को अपने लिए निन्दा करने का दोष भी न सहना पड़े।* फिर चर्चा या निन्दा उतनी आवश्यक भी नहीं है जितना कि अपने सुधार के लिए किया गया प्रयत्न। *कोई हमारी "निन्दा" करे और हम किसी की "निन्दा" करें, इससे समस्या का समाधान नहीं हो जाएगा।* बुराइयों का अन्त करने के लिए सिर्फ चीख-पुकार या नारे- बाजी पर्याप्त नहीं। उसके लिए तो ठोस कदम उठाने की जरूरत है। *इसमें सबसे पहला और सबसे प्रभावशाली कदम यह हो सकता है कि हम अपने दोषों को "साहसपूर्वक स्वीकार करें।"* यह स्वीकारोक्ति हर किसी के सामने की जाय यह जरूरी नहीं। परन्तु हमें अपनी बुराइयों को स्वयं अपने सामने मानने में, आत्मीय गुरुजनों के समक्ष स्वीकारने और परमेश्वर की समर्थ सत्ता की साक्षी में कहने में तनिक-सी भी हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए। हम यदि ऐसा कर सकें तो हमारी आत्मा, गुरुजनों का आशीष और भगवान का अनुग्रह हमारे अपने अन्दर अपूर्व साहस को जन्म देगा। ऐसा साहस, जिसके बलबूते अपनी दुर्बलताओं को उखाड़ फेंकने के लिए वह पराक्रम-पुरुषार्थ दिखा सकेंगे जो सच्चे और बहादुर योद्धा ही दिखाया करते हैं। अपने आप से लड़ना और अपने आप को शुद्ध बना लेना बाहर की दुनिया को निर्मल-निष्पाप बना सकने की "सबसे बड़ी योग्यता" और "वीरता" की सबसे बड़ी निशानी है।
निर्मल-निष्पाप हृदय में ईश्वरीय विभूतियाँ पुष्पित-पल्लवित होती हैं। ऐसे ही व्यक्ति अपनी निष्कलुष भावनाओं से परमात्म-सत्ता से एकाकार होते हैं। महापुरुषों का जीवन इस बात का साक्षी है कि वे पर दोष-दर्शन के स्थान पर सतत आत्मनिरीक्षण करते रहे। अच्छा यही है कि हम अपनी त्रुटियाँ खोजें और उन्हें दूर करें। यही अपनी शक्तियों को पहचानने और उन्हें विकसित करने का राजमार्ग है।
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ब्यूरो चीफ/लखनऊ
कोमल
शवेता दर्पण समाचार
ऐतिहासिक सत्य-*
*क्या आपने अमीर अली का नाम सुना है?*
राजस्थान के इतिहास में यह वह व्यक्ति है जिसके धोखे के कारण महिलाएं जोहर नहीं कर पाई और उन्हें तलवारो से काटना पड़ा।
तो चलिए आज *जैसलमेर के राजा लूणकरण* को याद करते है, जो मित्रता के नाम पर राजस्थान के सबसे बड़े धोखे का शिकार हुआ।
अमीर अली कंधार का नवाब था, तथा उसकी उसके भाई के साथ लड़ाई हो गयी और उसके भाई ने उसे हरा दिया।
अपने भाई से हारने के बाद आमिर अली जैसलमेर के राजा लूणकरण के पास शरण लेता है, और चूँकि शरणागत की रक्षा करना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। महाराज लूणकरण अमीर अली को शरण दे देते है। दोनों अपनी मित्रता को दर्शाने के लिए पगड़िया बदलते है। लूणकरण अमीर अली को जैसलमेर में जागीर देकर उसके रहने का प्रबंध करते है। दिन बीतते है, राजा का अमीर अली पर विश्वास बढ़ता जाता है, और राजा अमीर अली पर बहुत ज्यादा विश्वास करने लगते है।
अमीर अली ने एक बार राजा से कहता है की, उसकी बेगमें रनिवास की महिलाओ से मिलना चाहती है, पर वह नहीं चाहता की कोई और उसकी महिलाओं को देखे। इस पर राजा लूणकरण कहते है की कुछ दिनों में, राजमहल के अधिकांश व्यक्ति एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने जायेगे, तब किले में कोई पुरुष नहीं होगा, उस दिन उनकी बेगमें, उनकी रानियों से मिल सकती है। इस पर अमीर अली हामी भर देता है।
कुछ दिनों बाद वह दिन आता है जब महल के अधिकांश पुरुष, *राजकुमार मालदेव भाटी* के साथ विवाह समारोह में भागलेने चले जाते है।
राजा अमीर अली को संदेसा सन्देशा भिजवाते है, की उनकी बेगमें किले में आ सकती है।
पर अमीर अली के मनसूबे कुछ और ही थे, वह जैसलमेर पर कब्ज़ा करना चाहता था और उसके लिए एक अच्छे मोके का इन्तजार कर रहा था, और उसे वह अवसर मिल गया। वह महिलाओं की पालकियों में अपने सैनिकों को बिठा देता है, और उसमें हथियार रखवा देता है। और प्रत्येक पालकी को उठाने वालो की जगह भी सैनिक लगा देता है।
जब अमिर अली की पालकिया किले के प्रथम द्वार को पार कर रही होती है तो, वहा उपस्थित एक सैनिक को उन पर शक हो जाता है, और वह पालकियों की तलाशी लेने को कहता है। अमीर अली उन्हें समझाता है पर वह सैनिक नहीं मानते। जब अमीर अली को लग जाता की है यदि पालकियों की तलाशी हुई तो वे पकडे जायेंगे, और किले के बाकी दरवाजे बंद हो जाएंगे तो वह वही से अपने सिपाहियों को हमला कर देने का आदेश देता है। अचानक हुए इस हमले से सिपाही भी कुछ समझ नहीं पाते है, व जैसे तैसे किले के अंदर ख़बर पहुँचती है की अमीर अली ने विश्वास घात कर दिया है और किले पर हमला हो चूका है। पर किले में उस वक्त बहुत कम ही पुरुष थे।
इसीलिए हमेशा की तरह, जब सिपाही कम और हार निश्चित थी तो साका किया गया, पर एक समस्या राजा के सम्मुख आ खड़ी हुई, साके में सबसे पहले जौहर किया जाता है, जिसमे महिलाये अग्नि स्नान कर लेती है। जोहर पुरे विधि विधान द्वारा किया जाता है। पर अब जौहर करने का समय नहीं बचा था, दुश्मन किसी भी वक्त किले में प्रवेश कर सकते थे, तब महिलाएं कहती है की उन्हें तलवारो से काट दिया जाए। इस पर महिलाओं को तलवार से काट दिया जाता है और इस युद्ध में महिलाएं अग्नि स्नान नहीं कर पाती इसलिए इस युद्ध में जौहर नहीं हो पाता, वरन इसमें धारा स्नान होता है। चूँकि महिलाये जोहर नहीं कर पायी थी, और सिर्फ पुरुषो ने केसरिया किया था इसलिए इस साके को जैसलमेर का अर्धसाका कहा जाता है।
अमीर अली किले पर कब्ज़ा कर लेता है। पर जब यह खबर राजकुमार मालदेव भाटी तक पहुँचती है तो मालदेव भाटी अपनी सेना लेकर आते है व अमीर अली को मारकर किले पर पुनः कब्ज़ा कर लेते है।
_यह घटना समस्त भारतवासी से छुपाने के कृत्य किए गये जिससे, मुस्लिम समुदाय को किसी भी कीमत पर धोखेबाज गद्दार कौम का टैग न लग पाए। यह कौम बदनाम न होने पाए। ऐसे कुत्सित प्रयास भारत भूमि पर सदैव कांग्रेस पोषित इतिहासकारों आज तक जारी है। जो कौम इतिहास से सबक नहीं लेती वह सिर्फ मूर्ख ही नहीं कुल द्रोही है। धर्मद्रोही समुदाय की कठपुतली है। `इसके बाद भी अगर कोई हिंदू मुस्लिम एकता रोग से संक्रमित है या सेकुलर है तो उसे अपना डीएनए परीक्षण करव
कोमल
शवेता दर्पण समाचारऐतिहासिक सत्य-*
*क्या आपने अमीर अली का नाम सुना है?*
राजस्थान के इतिहास में यह वह व्यक्ति है जिसके धोखे के कारण महिलाएं जोहर नहीं कर पाई और उन्हें तलवारो से काटना पड़ा।
तो चलिए आज *जैसलमेर के राजा लूणकरण* को याद करते है, जो मित्रता के नाम पर राजस्थान के सबसे बड़े धोखे का शिकार हुआ।
अमीर अली कंधार का नवाब था, तथा उसकी उसके भाई के साथ लड़ाई हो गयी और उसके भाई ने उसे हरा दिया।
अपने भाई से हारने के बाद आमिर अली जैसलमेर के राजा लूणकरण के पास शरण लेता है, और चूँकि शरणागत की रक्षा करना भारतीय संस्कृति का अभिन्न अंग है। महाराज लूणकरण अमीर अली को शरण दे देते है। दोनों अपनी मित्रता को दर्शाने के लिए पगड़िया बदलते है। लूणकरण अमीर अली को जैसलमेर में जागीर देकर उसके रहने का प्रबंध करते है। दिन बीतते है, राजा का अमीर अली पर विश्वास बढ़ता जाता है, और राजा अमीर अली पर बहुत ज्यादा विश्वास करने लगते है।
अमीर अली ने एक बार राजा से कहता है की, उसकी बेगमें रनिवास की महिलाओ से मिलना चाहती है, पर वह नहीं चाहता की कोई और उसकी महिलाओं को देखे। इस पर राजा लूणकरण कहते है की कुछ दिनों में, राजमहल के अधिकांश व्यक्ति एक विवाह समारोह में सम्मिलित होने जायेगे, तब किले में कोई पुरुष नहीं होगा, उस दिन उनकी बेगमें, उनकी रानियों से मिल सकती है। इस पर अमीर अली हामी भर देता है।
कुछ दिनों बाद वह दिन आता है जब महल के अधिकांश पुरुष, *राजकुमार मालदेव भाटी* के साथ विवाह समारोह में भागलेने चले जाते है।
राजा अमीर अली को संदेसा सन्देशा भिजवाते है, की उनकी बेगमें किले में आ सकती है।
पर अमीर अली के मनसूबे कुछ और ही थे, वह जैसलमेर पर कब्ज़ा करना चाहता था और उसके लिए एक अच्छे मोके का इन्तजार कर रहा था, और उसे वह अवसर मिल गया। वह महिलाओं की पालकियों में अपने सैनिकों को बिठा देता है, और उसमें हथियार रखवा देता है। और प्रत्येक पालकी को उठाने वालो की जगह भी सैनिक लगा देता है।
जब अमिर अली की पालकिया किले के प्रथम द्वार को पार कर रही होती है तो, वहा उपस्थित एक सैनिक को उन पर शक हो जाता है, और वह पालकियों की तलाशी लेने को कहता है। अमीर अली उन्हें समझाता है पर वह सैनिक नहीं मानते। जब अमीर अली को लग जाता की है यदि पालकियों की तलाशी हुई तो वे पकडे जायेंगे, और किले के बाकी दरवाजे बंद हो जाएंगे तो वह वही से अपने सिपाहियों को हमला कर देने का आदेश देता है। अचानक हुए इस हमले से सिपाही भी कुछ समझ नहीं पाते है, व जैसे तैसे किले के अंदर ख़बर पहुँचती है की अमीर अली ने विश्वास घात कर दिया है और किले पर हमला हो चूका है। पर किले में उस वक्त बहुत कम ही पुरुष थे।
इसीलिए हमेशा की तरह, जब सिपाही कम और हार निश्चित थी तो साका किया गया, पर एक समस्या राजा के सम्मुख आ खड़ी हुई, साके में सबसे पहले जौहर किया जाता है, जिसमे महिलाये अग्नि स्नान कर लेती है। जोहर पुरे विधि विधान द्वारा किया जाता है। पर अब जौहर करने का समय नहीं बचा था, दुश्मन किसी भी वक्त किले में प्रवेश कर सकते थे, तब महिलाएं कहती है की उन्हें तलवारो से काट दिया जाए। इस पर महिलाओं को तलवार से काट दिया जाता है और इस युद्ध में महिलाएं अग्नि स्नान नहीं कर पाती इसलिए इस युद्ध में जौहर नहीं हो पाता, वरन इसमें धारा स्नान होता है। चूँकि महिलाये जोहर नहीं कर पायी थी, और सिर्फ पुरुषो ने केसरिया किया था इसलिए इस साके को जैसलमेर का अर्धसाका कहा जाता है।
अमीर अली किले पर कब्ज़ा कर लेता है। पर जब यह खबर राजकुमार मालदेव भाटी तक पहुँचती है तो मालदेव भाटी अपनी सेना लेकर आते है व अमीर अली को मारकर किले पर पुनः कब्ज़ा कर लेते है।
_यह घटना समस्त भारतवासी से छुपाने के कृत्य किए गये जिससे, मुस्लिम समुदाय को किसी भी कीमत पर धोखेबाज गद्दार कौम का टैग न लग पाए। यह कौम बदनाम न होने पाए। ऐसे कुत्सित प्रयास भारत भूमि पर सदैव कांग्रेस पोषित इतिहासकारों आज तक जारी है। जो कौम इतिहास से सबक नहीं लेती वह सिर्फ मूर्ख ही नहीं कुल द्रोही है। धर्मद्रोही समुदाय की कठपुतली है। `इसके बाद भी अगर कोई हिंदू मुस्लिम एकता रोग से संक्रमित है या सेकुलर है तो उसे अपना डीएनए परीक्षण करवाना चाहिए`।_
ब्यूरो चीफ /नोएडा
मीनाक्षी वर्मा
शवेता दर्पण समाचार पत्र
मैं पैसा हूँ:!*
मुझे आप मरने के बाद ऊपर नहीं ले जा सकते;मगर जीते जी मैं आपको बहुत ऊपर ले जा सकता हूँ।
।*मैं पैसा हूँ:!*
मुझे पसंद करो सिर्फ इस हद तक कि लोग आपको नापसन्द न करने लगें।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं नमक की तरह हूँ। जो जरुरी तो है, मगर जरुरत से ज्यादा हो तो जिंदगी का स्वाद बिगाड़ देता है।
*मैं पैसा हूँ:!*
इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जिनके पास मैं बेशुमार था;
मगर फिर भी वो मेरे और उनके लिए रोने वाला कोई नहीं था।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं कुछ भी नहीं हूँ; मगर मैं निर्धारित करता हूँ कि लोग
आपको कितनी इज्जत देते है।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं आपके पास हूँ तो आपका हूँ!
आपके पास नहीं हूँ तो,
आपका नहीं हूँ! मगर मैं
आपके पास हूँ तो
सब आपके हैं।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं नई नई रिश्तेदारियाँ बनाता हूँ;
मगर असली औऱ पुरानी बिगाड़ देता हूँ।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं सारे फसाद की जड़ हूँ;
मगर फिर भी न जाने क्सब मे
मीनाक्षी वर्मा
शवेता दर्पण समाचार पत्र
मैं पैसा हूँ:!*
मुझे आप मरने के बाद ऊपर नहीं ले जा सकते;
मगर जीते जी मैं आपको बहुत ऊपर ले जा सकता हूँ।
*मैं पैसा हूँ:!*
मुझे पसंद करो सिर्फ इस हद तक कि लोग आपको नापसन्द न करने लगें।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं नमक की तरह हूँ। जो जरुरी तो है, मगर जरुरत से ज्यादा हो तो जिंदगी का स्वाद बिगाड़ देता है।
*मैं पैसा हूँ:!*
इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जिनके पास मैं बेशुमार था;
मगर फिर भी वो मेरे और उनके लिए रोने वाला कोई नहीं था।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं कुछ भी नहीं हूँ; मगर मैं निर्धारित करता हूँ कि लोग
आपको कितनी इज्जत देते है।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं आपके पास हूँ तो आपका हूँ!
आपके पास नहीं हूँ तो,
आपका नहीं हूँ! मगर मैं
आपके पास हूँ तो
सब आपके हैं।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं नई नई रिश्तेदारियाँ बनाता हूँ;
मगर असली औऱ पुरानी बिगाड़ देता हूँ।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं सारे फसाद की जड़ हूँ;
मगर फिर भी न जाने क्योंसब मेरे पीछे इतना पागल हैं?
मीनाक्षी वर्मा
शवेता दर्पण समाचार पत्र
मैं पैसा हूँ:!*
मुझे आप मरने के बाद ऊपर नहीं ले जा सकते;
मगर जीते जी मैं आपको बहुत ऊपर ले जा सकता हूँ।
*मैं पैसा हूँ:!*
मुझे पसंद करो सिर्फ इस हद तक कि लोग आपको नापसन्द न करने लगें।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं नमक की तरह हूँ। जो जरुरी तो है, मगर जरुरत से ज्यादा हो तो जिंदगी का स्वाद बिगाड़ देता है।
*मैं पैसा हूँ:!*
इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जिनके पास मैं बेशुमार था;
मगर फिर भी वो मेरे और उनके लिए रोने वाला कोई नहीं था।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं कुछ भी नहीं हूँ; मगर मैं निर्धारित करता हूँ कि लोग
आपको कितनी इज्जत देते है।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं आपके पास हूँ तो आपका हूँ!
आपके पास नहीं हूँ तो,
आपका नहीं हूँ! मगर मैं
आपके पास हूँ तो
सब आपके हैं।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं नई नई रिश्तेदारियाँ बनाता हूँ;
मगर असली औऱ पुरानी बिगाड़ देता हूँ।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं सारे फसाद की जड़ हूँ;
मगर फिर भी न जाने क्योंसब मेरे पीछे इतना पागल हैं?
मीनाक्षी वर्मा
शवेता दर्पण समाचार पत्र
मैं पैसा हूँ:!*
मुझे आप मरने के बाद ऊपर नहीं ले जा सकते;
मगर जीते जी मैं आपको बहुत ऊपर ले जा सकता हूँ।
*मैं पैसा हूँ:!*
मुझे पसंद करो सिर्फ इस हद तक कि लोग आपको नापसन्द न करने लगें।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं नमक की तरह हूँ। जो जरुरी तो है, मगर जरुरत से ज्यादा हो तो जिंदगी का स्वाद बिगाड़ देता है।
*मैं पैसा हूँ:!*
इतिहास में कई ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे जिनके पास मैं बेशुमार था;
मगर फिर भी वो मेरे और उनके लिए रोने वाला कोई नहीं था।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं कुछ भी नहीं हूँ; मगर मैं निर्धारित करता हूँ कि लोग
आपको कितनी इज्जत देते है।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं आपके पास हूँ तो आपका हूँ!
आपके पास नहीं हूँ तो,
आपका नहीं हूँ! मगर मैं
आपके पास हूँ तो
सब आपके हैं।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं नई नई रिश्तेदारियाँ बनाता हूँ;
मगर असली औऱ पुरानी बिगाड़ देता हूँ।
*मैं पैसा हूँ:!*
मैं सारे फसाद की जड़ हूँ;
मगर फिर भी न जाने क्यों
सब मेरे पीछे इतना पागल है
सम्राट चंद्रगुप्त अपने मंत्रियों के साथ एक विशेष मंत्रणा मं व्यस्त थे कि प्रहरीने सूचित किया कि आचार्य चाणक्य राजभवन में पधार रहे हैं....सम्राट चकित रह गए इस असमय में गुरू का आगमन ! वह घबरा भी गए अभी वह कुछ सोचते ही कि लंबे-लंबे डग भरते चाणक्य ने सभा में प्रवेश किया सम्राट चंद्रगुप्त सहित सभी सभासद सम्मान में उठ गए सम्राट ने गुरूदेव को सिंहासन पर आसीन होने को कहा !
आचार्य चाणक्य बोले – ”भावुक न बनो सम्राट, अभी तुम्हारे समक्ष तुम्हारा गुरू नहीं, तुम्हारे राज्य का एक याचक खड़ा है, मुझे कुछ याचना करनी है ।”चंद्रगुप्त की आँखें डबडबा आईं बोले – ” आप आज्ञा दें, समस्त राजपाट आपके चरणों में डाल दूं !! ” चाणक्य ने कहा ” मैंने आपसे कहा भावना में न बहें, मेरी याचना सुनें... ” गुरूदेव की मुखमुद्रा देख सम्राट चंद्रगुप्त गंभीर हो गए बोले -” आज्ञा दें...चाणक्य ने कहा – ” आज्ञा नहीं , याचना है कि मैं किसी निकटस्थ सघन वन में साधना करना चाहता हूं... दो माह के लिए राजकार्य से मुक्त कर दें और यह स्मरण रहे वन में अनावश्यक मुझसे कोई मिलने न आए आप भी नहीं , मेरा उचित प्रबंध करा दें !!!
चंद्रगुप्त ने कहा – ” सब कुछ स्वीकार है ” दूसरे दिन प्रबंध कर दिया गया चाणक्य वन चले गए अभी उन्हें वन गए एक सप्ताह भी न बीता था कि यूनान से सेल्युकस (सिकन्दर का सेनापति) अपने जामाता चंद्रगुप्त से मिलने भारत पधारे उनकी पुत्री हेलेन का विवाह चंद्रगुप्त से हुआ था दो – चार दिन के बाद उन्होंने चाणक्य से मिलने की इच्छा प्रकट कर दी सेल्युकस ने कहा – ”सम्राट, आप वन में अपने गुप्तचर भेज दें उन्हें मेरे बारे में कहें...वह मेरा बड़ा आदर करते है । वह कभी इन्कार नहीं करेंगे “ अपने श्वसुर की बात मान चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया गुप्तचर भेज दिए गए...चाणक्य ने उत्तर दिया – ”ससम्मान सेल्युकस वन लाए जाएं, मुझे उनसे मिल कर प्रसन्नता होगी ।”
सेना के संरक्षण में सेल्युकस वन पहुंचे औपचारिक अभिवादन के बाद चाणक्यने पूछा – ”मार्ग में कोई कष्ट तो नहीं हुआ ?? ”इस पर सेल्युकस ने कहा – ”भला आपके रहते मुझे कष्ट होगा !! आपने मेरा बहुत ख्याल रखा“ !! न जाने इस उत्तर का चाणक्य पर क्या प्रभाव पड़ा कि वह बोल उठे – “हां, सचमुच आपका मैंने बहुत ख्याल रखा ।”इतना कहने के बाद चाणक्य ने सेल्युकस के भारत की भूमि पर कदम रखने के बाद से वन आने तक की सारी घटनाएं सुना दीं उसे इतना तक बताया कि सेल्युकस ने सम्राट से क्या बात की, एकांत में अपनी पुत्री से क्या बातें हुईं मार्ग में किस सैनिक से क्या पूछा !!
सेल्युकस व्यथित हो गए बोले – ”इतना अविश्वास ? मेरी गुप्तचरी की गई मेरा इतना अपमान" !!.....
चाणक्य ने कहा – ”न तो अपमान, न अविश्वास और न ही गुप्तचरी अपमान की तो बात मैं सोच भी नहीं सकता । सम्राट भी इन दो महीनों में शायद न मिल पाते आप हमारे अतिथि हैं...रह गई बात सूचनाओं की तो वह मेरा ”राष्ट्रधर्म” है...आप कुछ भी हों, पर विदेशी हैं !! अपनी मातृभूमि से आपकी जितनी प्रतिबद्धता है, वह इस राष्ट्र से नहीं हो सकती ! यह स्वाभाविक भी है मैं तो सम्राज्ञी की भी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रखता हूं ! मेरे इस ‘धर्म‘ को अन्यथा न लें मेरी भावना समझें“ !!!
सेल्युकस हैरान हो गया । वह चाणक्य के पैरों में गिर पड़ा
उसने कहा – ” जिस राष्ट्र में आप जैसे राष्ट्रभक्त हों, उस देश की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देख सकता ।” सेल्युकस वापस लौट गया !!!
मित्रों… क्या हम भारतीय राष्ट्रधर्म का पालन कर रहे है???"श
शआचार्य चाणक्य बोले – ”भावुक न बनो सम्राट, अभी तुम्हारे समक्ष तुम्हारा गुरू नहीं, तुम्हारे राज्य का एक याचक खड़ा है, मुझे कुछ याचना करनी है ।”चंद्रगुप्त की आँखें डबडबा आईं बोले – ” आप आज्ञा दें, समस्त राजपाट आपके चरणों में डाल दूं !! ” चाणक्य ने कहा ” मैंने आपसे कहा भावना में न बहें, मेरी याचना सुनें... ” गुरूदेव की मुखमुद्रा देख सम्राट चंद्रगुप्त गंभीर हो गए बोले -” आज्ञा दें...चाणक्य ने कहा – ” आज्ञा नहीं , याचना है कि मैं किसी निकटस्थ सघन वन में साधना करना चाहता हूं... दो माह के लिए राजकार्य से मुक्त कर दें और यह स्मरण रहे वन में अनावश्यक मुझसे कोई मिलने न आए आप भी नहीं , मेरा उचित प्रबंध करा दें !!!
चंद्रगुप्त ने कहा – ” सब कुछ स्वीकार है ” दूसरे दिन प्रबंध कर दिया गया चाणक्य वन चले गए अभी उन्हें वन गए एक सप्ताह भी न बीता था कि यूनान से सेल्युकस (सिकन्दर का सेनापति) अपने जामाता चंद्रगुप्त से मिलने भारत पधारे उनकी पुत्री हेलेन का विवाह चंद्रगुप्त से हुआ था दो – चार दिन के बाद उन्होंने चाणक्य से मिलने की इच्छा प्रकट कर दी सेल्युकस ने कहा – ”सम्राट, आप वन में अपने गुप्तचर भेज दें उन्हें मेरे बारे में कहें...वह मेरा बड़ा आदर करते है । वह कभी इन्कार नहीं करेंगे “ अपने श्वसुर की बात मान चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया गुप्तचर भेज दिए गए...चाणक्य ने उत्तर दिया – ”ससम्मान सेल्युकस वन लाए जाएं, मुझे उनसे मिल कर प्रसन्नता होगी ।”
सेना के संरक्षण में सेल्युकस वन पहुंचे औपचारिक अभिवादन के बाद चाणक्यने पूछा – ”मार्ग में कोई कष्ट तो नहीं हुआ ?? ”इस पर सेल्युकस ने कहा – ”भला आपके रहते मुझे कष्ट होगा !! आपने मेरा बहुत ख्याल रखा“ !! न जाने इस उत्तर का चाणक्य पर क्या प्रभाव पड़ा कि वह बोल उठे – “हां, सचमुच आपका मैंने बहुत ख्याल रखा ।”इतना कहने के बाद चाणक्य ने सेल्युकस के भारत की भूमि पर कदम रखने के बाद से वन आने तक की सारी घटनाएं सुना दीं उसे इतना तक बताया कि सेल्युकस ने सम्राट से क्या बात की, एकांत में अपनी पुत्री से क्या बातें हुईं मार्ग में किस सैनिक से क्या पूछा !!
सेल्युकस व्यथित हो गए बोले – ”इतना अविश्वास ? मेरी गुप्तचरी की गई मेरा इतना अपमान" !!.....
चाणक्य ने कहा – ”न तो अपमान, न अविश्वास और न ही गुप्तचरी अपमान की तो बात मैं सोच भी नहीं सकता । सम्राट भी इन दो महीनों में शायद न मिल पाते आप हमारे अतिथि हैं...रह गई बात सूचनाओं की तो वह मेरा ”राष्ट्रधर्म” है...आप कुछ भी हों, पर विदेशी हैं !! अपनी मातृभूमि से आपकी जितनी प्रतिबद्धता है, वह इस राष्ट्र से नहीं हो सकती ! यह स्वाभाविक भी है मैं तो सम्राज्ञी की भी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रखता हूं ! मेरे इस ‘धर्म‘ को अन्यथा न लें मेरी भावना समझें“ !!!
सेल्युकस हैरान हो गया । वह चाणक्य के पैरों में गिर पड़ा
उसने कहा – ” जिस राष्ट्र में आप जैसे राष्ट्रभक्त हों, उस देश की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देख सकता ।” सेल्युकस वापस लौट गया !!!
मित्रों… क्या हम भारतीय राष्ट्रधर्म का पालन कर रहे है???"श
आचार्य चाणक्य बोले – ”भावुक न बनो सम्राट, अभी तुम्हारे समक्ष तुम्हारा गुरू नहीं, तुम्हारे राज्य का एक याचक खड़ा है, मुझे कुछ याचना करनी है ।”चंद्रगुप्त की आँखें डबडबा आईं बोले – ” आप आज्ञा दें, समस्त राजपाट आपके चरणों में डाल दूं !! ” चाणक्य ने कहा ” मैंने आपसे कहा भावना में न बहें, मेरी याचना सुनें... ” गुरूदेव की मुखमुद्रा देख सम्राट चंद्रगुप्त गंभीर हो गए बोले -” आज्ञा दें...चाणक्य ने कहा – ” आज्ञा नहीं , याचना है कि मैं किसी निकटस्थ सघन वन में साधना करना चाहता हूं... दो माह के लिए राजकार्य से मुक्त कर दें और यह स्मरण रहे वन में अनावश्यक मुझसे कोई मिलने न आए आप भी नहीं , मेरा उचित प्रबंध करा दें !!!
चंद्रगुप्त ने कहा – ” सब कुछ स्वीकार है ” दूसरे दिन प्रबंध कर दिया गया चाणक्य वन चले गए अभी उन्हें वन गए एक सप्ताह भी न बीता था कि यूनान से सेल्युकस (सिकन्दर का सेनापति) अपने जामाता चंद्रगुप्त से मिलने भारत पधारे उनकी पुत्री हेलेन का विवाह चंद्रगुप्त से हुआ था दो – चार दिन के बाद उन्होंने चाणक्य से मिलने की इच्छा प्रकट कर दी सेल्युकस ने कहा – ”सम्राट, आप वन में अपने गुप्तचर भेज दें उन्हें मेरे बारे में कहें...वह मेरा बड़ा आदर करते है । वह कभी इन्कार नहीं करेंगे “ अपने श्वसुर की बात मान चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया गुप्तचर भेज दिए गए...चाणक्य ने उत्तर दिया – ”ससम्मान सेल्युकस वन लाए जाएं, मुझे उनसे मिल कर प्रसन्नता होगी ।”
सेना के संरक्षण में सेल्युकस वन पहुंचे औपचारिक अभिवादन के बाद चाणक्यने पूछा – ”मार्ग में कोई कष्ट तो नहीं हुआ ?? ”इस पर सेल्युकस ने कहा – ”भला आपके रहते मुझे कष्ट होगा !! आपने मेरा बहुत ख्याल रखा“ !! न जाने इस उत्तर का चाणक्य पर क्या प्रभाव पड़ा कि वह बोल उठे – “हां, सचमुच आपका मैंने बहुत ख्याल रखा ।”इतना कहने के बाद चाणक्य ने सेल्युकस के भारत की भूमि पर कदम रखने के बाद से वन आने तक की सारी घटनाएं सुना दीं उसे इतना तक बताया कि सेल्युकस ने सम्राट से क्या बात की, एकांत में अपनी पुत्री से क्या बातें हुईं मार्ग में किस सैनिक से क्या पूछा !!
सेल्युकस व्यथित हो गए बोले – ”इतना अविश्वास ? मेरी गुप्तचरी की गई मेरा इतना अपमान" !!.....
चाणक्य ने कहा – ”न तो अपमान, न अविश्वास और न ही गुप्तचरी अपमान की तो बात मैं सोच भी नहीं सकता । सम्राट भी इन दो महीनों में शायद न मिल पाते आप हमारे अतिथि हैं...रह गई बात सूचनाओं की तो वह मेरा ”राष्ट्रधर्म” है...आप कुछ भी हों, पर विदेशी हैं !! अपनी मातृभूमि से आपकी जितनी प्रतिबद्धता है, वह इस राष्ट्र से नहीं हो सकती ! यह स्वाभाविक भी है मैं तो सम्राज्ञी की भी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रखता हूं ! मेरे इस ‘धर्म‘ को अन्यथा न लें मेरी भावना समझें“ !!!
सेल्युकस हैरान हो गया । वह चाणक्य के पैरों में गिर पड़ा
उसने कहा – ” जिस राष्ट्र में आप जैसे राष्ट्रभक्त हों, उस देश की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देख सकता ।” सेल्युकस वापस लौट गया !!!
मित्रों… क्या हम भारतीय राष्ट्रधर्म का पालन कर रहे है???"
आचार्य चाणक्य बोले – ”भावुक न बनो सम्राट, अभी तुम्हारे समक्ष तुम्हारा गुरू नहीं, तुम्हारे राज्य का एक याचक खड़ा है, मुझे कुछ याचना करनी है ।”चंद्रगुप्त की आँखें डबडबा आईं बोले – ” आप आज्ञा दें, समस्त राजपाट आपके चरणों में डाल दूं !! ” चाणक्य ने कहा ” मैंने आपसे कहा भावना में न बहें, मेरी याचना सुनें... ” गुरूदेव की मुखमुद्रा देख सम्राट चंद्रगुप्त गंभीर हो गए बोले -” आज्ञा दें...चाणक्य ने कहा – ” आज्ञा नहीं , याचना है कि मैं किसी निकटस्थ सघन वन में साधना करना चाहता हूं... दो माह के लिए राजकार्य से मुक्त कर दें और यह स्मरण रहे वन में अनावश्यक मुझसे कोई मिलने न आए आप भी नहीं , मेरा उचित प्रबंध करा दें !!!
चंद्रगुप्त ने कहा – ” सब कुछ स्वीकार है ” दूसरे दिन प्रबंध कर दिया गया चाणक्य वन चले गए अभी उन्हें वन गए एक सप्ताह भी न बीता था कि यूनान से सेल्युकस (सिकन्दर का सेनापति) अपने जामाता चंद्रगुप्त से मिलने भारत पधारे उनकी पुत्री हेलेन का विवाह चंद्रगुप्त से हुआ था दो – चार दिन के बाद उन्होंने चाणक्य से मिलने की इच्छा प्रकट कर दी सेल्युकस ने कहा – ”सम्राट, आप वन में अपने गुप्तचर भेज दें उन्हें मेरे बारे में कहें...वह मेरा बड़ा आदर करते है । वह कभी इन्कार नहीं करेंगे “ अपने श्वसुर की बात मान चंद्रगुप्त ने ऐसा ही किया गुप्तचर भेज दिए गए...चाणक्य ने उत्तर दिया – ”ससम्मान सेल्युकस वन लाए जाएं, मुझे उनसे मिल कर प्रसन्नता होगी ।”
सेना के संरक्षण में सेल्युकस वन पहुंचे औपचारिक अभिवादन के बाद चाणक्यने पूछा – ”मार्ग में कोई कष्ट तो नहीं हुआ ?? ”इस पर सेल्युकस ने कहा – ”भला आपके रहते मुझे कष्ट होगा !! आपने मेरा बहुत ख्याल रखा“ !! न जाने इस उत्तर का चाणक्य पर क्या प्रभाव पड़ा कि वह बोल उठे – “हां, सचमुच आपका मैंने बहुत ख्याल रखा ।”इतना कहने के बाद चाणक्य ने सेल्युकस के भारत की भूमि पर कदम रखने के बाद से वन आने तक की सारी घटनाएं सुना दीं उसे इतना तक बताया कि सेल्युकस ने सम्राट से क्या बात की, एकांत में अपनी पुत्री से क्या बातें हुईं मार्ग में किस सैनिक से क्या पूछा !!
सेल्युकस व्यथित हो गए बोले – ”इतना अविश्वास ? मेरी गुप्तचरी की गई मेरा इतना अपमान" !!.....
चाणक्य ने कहा – ”न तो अपमान, न अविश्वास और न ही गुप्तचरी अपमान की तो बात मैं सोच भी नहीं सकता । सम्राट भी इन दो महीनों में शायद न मिल पाते आप हमारे अतिथि हैं...रह गई बात सूचनाओं की तो वह मेरा ”राष्ट्रधर्म” है...आप कुछ भी हों, पर विदेशी हैं !! अपनी मातृभूमि से आपकी जितनी प्रतिबद्धता है, वह इस राष्ट्र से नहीं हो सकती ! यह स्वाभाविक भी है मैं तो सम्राज्ञी की भी प्रत्येक गतिविधि पर दृष्टि रखता हूं ! मेरे इस ‘धर्म‘ को अन्यथा न लें मेरी भावना समझें“ !!!
सेल्युकस हैरान हो गया । वह चाणक्य के पैरों में गिर पड़ा
उसने कहा – ” जिस राष्ट्र में आप जैसे राष्ट्रभक्त हों, उस देश की ओर कोई आँख उठाकर भी नहीं देख सकता ।” सेल्युकस वापस लौट गया !!!
मित्रों… क्या हम भारतीय राष्ट्रधर्म का पालन कर रहे है???"
ब्यूरो चीफ/कलकत्ता।
स्मिता रस्तोगी
शवेता दर्पण समाचार पत्र
एक सीख
एक शेरनी गर्भवती थी, गर्भ पूरा हो चुका था, शिकारियों से भागने के लिए टीले पर गयी, उसको एक टीले पर बच्चा हो गया। शेरनी छलांग लगाकर एक टीले से दूसरे टीले पर तो पहुंच गई लेकिन बच्चा नीचे फिसल गया……नीचे भेड़ों की एक कतार गुजरती थी, वह बच्चा उस झुंड में पहुंच गया। था तो शेर का बच्चा लेकिन फिर भी भेड़ों को दया आ गई और उसे अपने झुंड में मिला लिया….. भेड़ों ने उसे दूध पिलाया, पाला पोसा। शेर अब जवान हो गया. शेर का बच्चा था तो शरीर से सिंह ही हुआ लेकिन भेड़ों के साथरहकर वह खुद को भेड़ मानकर ही जीने लगा। एक दिन उसके झुंड पर एक शेर ने धावा बोला. उसको देखकर भेड़ें भांगने लगीं, शेर की नजर भेड़ों के बीच चलते शेर पर पड़ी, दोनों एक दूसरे को आश्चर्य से देखते रहे सारी भेंड़े भाग गईं शेर अकेला रह गया, दूसरे शेर ने इस शेर को पकड़ लिया। यह शेर होकर भी रोने लगा, मिमियाया, गिड़गिड़ाया कि छोड़ दो मुझे.... मुझे जाने दो... मेरे सब संगी साथी जा रहे हैं.... मेरे परिवार से मुझे अलग न करो…..
दूसरे शेर ने फटकारा- "अरे मूर्ख! ये तेरे संगी साथी नहीं हैं, तेरा दिमाग फिर गया है, तू पागल हो गया है। परन्तु वह नहीं माना, वह तो स्वयं को भेंड मानकर भेलचाल में चलता था"।
बड़ा शेर उसे घसीटता गया नदी के किनारे ले गया। दोनों ने नदी में झांका। बूढ़ा सिंह बोला- नदी के पानी में अपना चेहरा देख और पहचान... उसने देखा तो पाया कि जिससे जीवन की भीख मांग रहा है वह तो उसके ही जैसा है। उसे बोध हुआ कि मैं तो मैं भेड़ नहीं हूं, मैं तो इस सिंह से भी ज्यादा बलशाली और तगड़ा हूं। उसका आत्म अभिमान जागा, आत्मबल से भऱकर उसने भीषण गर्जना की……
सिंहनाद था वह, ऐसी गर्जना उठी उसके भीतर से कि उससे पहाड़ कांप गए। बूढ़ा सिंह भी कांप गया।
उसने कहा- "अरे! इतने जोर से दहाड़ता है?" युवा शेर बोला- "उसने जन्म से कभी दहाड़ा ही नहीं, बड़ी कृपा तुम्हारी जो मुझे जगा दिया," इसी दहाड़ के साथ उसका जीवन रूपांतरित हो गया।
यही बात हिंदुओ के संबंध में भी हैं। अगर मनुष्य यह देख ले कि जो कृष्ण और श्रीराम में हैं वह उसमें भी है।
फिर हमारे भीतर से भी वह गर्जना फूटेगी-
अहं ब्रह्मास्मि... मैं ब्रह्मा हूँ....गूंज उठेंगे पहाड़, कांप जाएंगे मन के भीतर घर बनाए सारे विकार और महसूस होगा अपने भीतर आनंद ही आनंद हिंदुओ को साजिश के तहत भेड़ों के झुंड में मिलाया गया,..हिंसा का पाठ पढ़ा कर उन्हे नपुंसक बनाया गयाआज जब हिंदू अपने को वापस पुनर्जागरण की ओर देख रहा है तो कुछ लोगो के पेट में दर्द है खासकर उनके जिन्होंने हिंदुओ को भेड़ों की भाती ट्रेनिंग दी हो कटने और मरने की क्षत्रिय भी मैं हूँ..ब्राहमण भी मैं हूँ.जाट भी मैं हूँ राजपुत और मराठा भी मैं हुँ.हिला कर रख दे जो दुष्टोँ की हस्ती.तूफान और ज्वारभाटा भी मैँ हूँ बाल्मीकि भी मैं हूँ विदुर नीति भी मैं हुँ..दुष्ट सिकन्दर को हराने वाला पौरूष भी मैं हुँ…सर्वश्रैष्ठ गुरू चाणक्य भी मैं हुँ..महावीर कर्ण भी मैं हूँ परशुराम भी मैं हूँ…मुरलीधर मनोहर श्याम भी मैं हूँ..एक वचन की खातिर वनवासी बननेवाला मर्यादा पुरूषोतम श्रीराम भी मैं हूँ..शिवाजी और प्रताप भी मैं हुँ..धधकती है जो जुल्म देखकर‘हिन्दुत्व” नाम की आग भी मैं हुँ..हाँ मैं हिन्दू हूँ जात पात मैं ना बाँटो मुझको मैं दुनिया का केन्द्र बिन्दु हुँ…हाँ मैं हिन्दू हूँ….
कूटने की परम्परा ✧_*
*︶︸︶︸︶︸︶︸︶︸︶कल एक बुजुर्ग आदमी से पूछा, कि पहले इतने लोग बीमार नहीं होते थे,जितने आज हो रहे हैं.तो बुजुर्ग ने अपने तजुर्बे से बोला ~भाईजी ! पहले कूटने की परंपरा थी,जिससे इम्यूनिटी पावर मजबूत रहता था.
★ पहले हम हर चीज को कूटते थे. ★
जबसे हमने कूटना छोड़ा है, तब से हम सब बीमार होने लग गए.जैसे पहले खेत से अनाज को कूट कर घर लाते थे.घर में मिर्च मसाला कूटते थे,कभी-कभी तो बड़ा भाई भी छोटे को कूट देता था, और जब छोटा भाई उसकी शिकायत माँ से करता था, तो माँ बड़े भाई को कूट देती थी.और कभी-कभी तो दादाजी भी पोते को कूट देते थे.*यानी कुल मिलाकर दिन भर*कूटने का काम चलता रहता था.*कभी माँ , बाजरा कूट कर शाम को खिचड़ी बनाती पहले हम कपड़े भी कूट कर धोते थे स्कूल में मास्टरजी भी कूटते थे जहाँ देखो वहाँ पर कूटने का काम चलता रहता था, इसीलिए बीमारी नजदीक नहीं आती थी.*सबका इम्यूनिटी पावर*मजबूत रहता था.जब कभी बच्चा सर्दी में नहाने से मना करता था,तो माँ पहले कूटकर उसका इम्यूनिटी पावर बढ़ाती थी,और फिर नहलाती थी.वर्तमान समय में इम्यूनिटी पावर बढ़ाने के लिए कूटने की परंपर फिर से चालू होनी चाहिए.
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