Sab per penni nazar
2011 में पद्मनाभ स्वामी मंदिर के तहखाने के दरवाजे खुलते हैं और सोने जवाहरात की गिनती शुरू होती है.. जब गिनती शुरू होती है तो दुनिया की आँखे फटी की फटी रह जाती है.. मन्दिर के मुख्य तहखाने का दरवाजा तो अब तक भी नहीं खुला है और इसे बंद रखने का ही फैसला लिया गया है। .. जो दरवाजे खुल पाये उसमें से बरामद किए गए सोने और आभूषणों की कीमत 1 लाख 32 करोड़ रुपये बताई गई है।.. एक अनुमान के मुताबिक मुख्य तहखाने में रखी गई आभूषणों की कीमत इनसे 10 गुना तक ज्यादा हो सकती है।
वर्तमान समय में दुनिया के सबसे अमीर लोगों की बात करे तो बिलगेट्स और जेफ बेजोस के बीच मुकाबला चलते रहता है.. पिछले साल की बात करे तो बिलगेट्स के पास 6 लाख करोड़ के आस पास संपत्ति थी और यही कोई बेजोस के पास भी।.. मने सिर्फ भारत के एक मंदिर पद्मनाभ स्वामी मंदिर ही इन दोनों के संपति की बराबरी कर सकता है।
अब थोड़ा सा यहां एक चीज और जोड़ लेते हैं.. टीपू सुल्तान.. हाँ वही जो बड़का स्वतंत्रता सेनानी योद्धा बनता घूमता है ने केरल और कर्नाटक के सैकड़ों मंदिर को लूट के अथाह संपति जमा की थी। जिसे ईस्ट इंडिया कम्पनी ने मार कर हरा कर सारा सोना और संपत्ति लूट लिया। इसे लूटने वाला रोथरचिल्ड भाउ का परिवार था। जो आज पूरी दुनिया के बैंकिंग सिस्टम को कंट्रोल करता है। बिलगेट्स को तो जान बूझ के सबसे अमीर का तमगा लगा कर पेश किया जाता है जबकि रोथरचिल्ड भाउ के परिवार के संपत्ति के मुकाबले में सौ बिलगेट्स भी समा जाए।
खैर छोड़िये... तनी दूसर तरफ चलते है..
भारत सोने की चिड़िया.. कैसे? भारत के पास कितने सोने के खान हैं?? अगर नहीं तो इतना सोना कहाँ से आया ? सोने की खान अफ्रीका में सबसे ज्यादा और वो भी घाना और माली में। तो सोना भारत कैसे आता था ??
प्राचीन व्यापार मार्ग की बात करें तो 'सिल्क रुट'(रेशम मार्ग) सबके जुबान पे आता है। लेकिन ये तो जमीनी मार्ग था जबकि सबसे ज्यादा व्यापार समुद्री मार्ग से होता था। यूरोप और मिडिल ईस्ट के साथ सारे व्यापार समुद्री मार्ग से होता था। और बड़े-बड़े विदेशी यात्री और विद्वान भी समुद्री मार्ग से ही भारत आते थे। और समुद्री मार्ग से भारत आते थे तो कालीकट,केरल ही क्यों जाते थे?? ऐसा क्या खास रहता था वहाँ ?
भारत में ईसाई आया तो केरल से ही हो कर.. इस्लाम आया तो केरल से ही हो कर .. क्यों ?
क्योंकि ये भारत के लिए व्यापार का केंद्र था.. और ये सारे बाहरी आक्रमणकारी धर्म का लबादा ओढ़े भारत आये.. और ये कोई धर्म का पताका लहराने थोड़े बल्कि भारत की वैभवता को लूटने के वास्ते आये। जितने भी अब भी अंतराष्ट्रीय बंदरगाह हैं वे कालीकट से ही नियंत्रित होते थे।
चलिये एक रुट बता ही देते हैं...
कालीकट से जहाजी बेड़े लोड होते थे फिर बेड़े ग्वादर,पाकिस्तान..सलालह(Salalah),ओमान.. अदेन (Aden),यमन के बंदरगाह में जाता था। फिर यहाँ से ऊँटों के काफिलों में लद के सामान दूसरे देशों में भेजा जाता था।
सलालह से ऊँटों में लद कर सामान मक्का जाता था .. फिर मक्का से फिलिस्तीन,जेरूश्लेम, पेटरा, तुर्की होते हुए यूरोप, भूमध्य सागर के रास्ते से।.. मक्का व्यापारियों के ठहरने का एक उत्तम स्थान था.. और विशेष इसलिए कि यहाँ ऊँटों को पानी पिलाया जाता था.. यहीं से ऊंट और व्यापारी रिचार्ज होते थे और आगे का सफर तय करते थे।.. मक्का से मिस्र होते हुए मोरोक्को और माली तक व्यापार होता था। एक तरह से देखा जाय तो मक्का व्यापार का हब था.. यहीं से यूरोप और अफ्रीका को सामान जाता था।
भूमध्य सागर से यूरोप में समुद्री मार्ग से व्यापार करने में दो परिवार आते थे जिनके जहाजी बेड़े भूमध्य सागर में दौड़ते थे.. एक पुर्तगाली गरासिया मेंडिस(Gracia Mendes) और दूसरा जर्मन यहूदी रोथरचिल्ड परिवार।
केरल से ग्वादर,सलालह,अदेन,सोकोर्टो इन बंदरगाहों पे कालीकट राजा का नियंत्रण रहता था.. मक्का में भी इनका नियंत्रण रहता था.. और इन सभी जगहों पे हिन्दू मन्दिर हुआ करते थे जहाँ हिन्दू व्यापारी आराम करते थे और पूजा भी। कई हिन्दू व्यापारियों के खुद के भी ऊँटों के कारवाँ होते थे जो सामानों की ढुलाई करते थे।
अब भारत से मिडिल ईस्ट और यूरोप जुड़ गए।
अब जरा फिर तनिक दूसर दिशा में चलते है..
दुनिया की बड़ी जानी मानी पत्रिका है फोर्ब्स.. ये विश्व के सबसे अमीर लोगों की लिस्ट निकालती है हर साल।.. इसने एक बार आल टाइम 25 रिचेस्ट लोगों की लिस्ट निकाली.. अब सोच सकते है कि इस लिस्ट में टॉप पे कौन होगा ? कोई यूरोपीयन गौरा ?? नहीं। टॉप मोस्ट रिचेस्ट शख्स बना अफ्रीकी देश माली का किंग मनसा मूसा!! जी मनसा मूसा। और आज माली दुनिया के सबसे गरीब देशों में से एक की गिनती में आता है। और मूसा 14 वीं शताब्दी का राजा था।
मूसा के समय पूरी दुनिया का 70% सोना अकेले माली कवर करता था। टिम्बकटू और गाओ सबसे विकसित शहर में से आते थे।मनसा मूसा दुनिया की नजर में तब आया जब सन 1324 ई में हज की यात्रा किया। जब वो हज की यात्रा में गया तो जहां-जहां से उसका काफिला पास हुआ वहाँ वहाँ के लोग उनकी वैभवता देख के अवाक रह गए। माली से मक्का की ये यात्रा एक साल में पूरी हुई। जहां जहां से गुजरते लोग उनके काफिला देखने को ही सामने जाते।
लोगों ने देखा कि मनसा मूसा के कारवां में 60 हज़ार लोग शामिल थे और इनमें 12 हज़ार तो केवल सुल्तान के निजी अनुचर थे. मनसा मूसा जिस घोड़े पर सवार थे, उससे आगे 500 लोगों का दस्ता चला करता था जिनके हाथ में सोने की छड़ी होती थी. मनसा मूसा के ये 500 संदेशवाहक बेहतरीन रेशम का लिबास पहना करते थे.
इनके अलावा इस कारवां में 80 ऊंटों का जत्था भी रहता था, जिस पर 136 किलो सोना लदा होता था. कहा जाता है कि मनसा मूसा इतने उदार थे कि वे जब मिस्र की राजधानी काहिरा से गुजरे तो वहां उन्होंने ग़रीबों को इतना दान दे दिया कि उस इलाके में बड़े पैमाने पर महंगाई बढ़ गई.
मनसा मूसा की इस यात्रा की वजह से उनके दौलत के क़िस्से यूरोपीय लोगों की कान तक पहुंचे. यूरोप से लोग सिर्फ़ ये देखने के लिए उनके पास आने लगे कि उनकी दौलत के बारे में जो कहा जा रहा है वो किस हद तक सच है.
मनसा मूसा की दौलत की जब पुष्टि हो गई तो उस वक्त के महत्वपूर्ण नक़्शे कैटलन एटलस में माली सल्तनत और उसके बादशाह का नाम शामिल किया गया.14वीं सदी के कैटलन एटलस में उस वक्त की उन तमाम जगहों का वर्णन है जो यूरोपीय लोगों को मालूम थी.
मनसा मूसा जो था वो बड़ा विजनरी राजा था। वो केवल धन दौलत ही नहीं बल्कि ज्ञान का भी भूखा इंसान था। वो मक्का शहर में जमकर सोने को व्यय किया। और वो व्यर्थ में ही सोना व्यय नहीं किया बल्कि उसके बदले उन्होंने ढेर सारे किताब खरीदे जो ज्योतिष शास्त्र, आयुर्वेद, गणित और विज्ञान से संबंधित थे।
अपने साथ वो इन क्षेत्रों के विद्वानों के साथ- साथ अनुवादक भी अपने साथ माली ले आया। वो जानता था कि जितना धन हम सोने से कमा पा रहे हैं उससे ज्यादा हम नॉलेज से कमायेंगे। इन विद्वानों और किताबों की मदद से माली अफ्रीका ही नहीं बल्कि विश्व के लिए ज्ञान का केंद्र बन के उभरा। बड़े बड़े लाइब्रेरी स्थापित हुए.. यूनिवर्सिटी बनी। इनके समय में माली विश्व के सबसे धनी देशों में से आता था। और किताबों की मदद से ही माली ने सोने से भी ज्यादा का व्यापार किया बल्कि करता ही रहा जब तक कि घाघ यूरोपीयन्स न आ गए। इन लोगों ने एक जीती जागती और फलरिश करते देश को लूट के गरीब बना दिया... जैसे भारत की विश्व की 35% की जीडीपी जाते जाते केवल 2% तक रह गई। माली के लोगों किताबों की रेगिस्तान के बालू में गाड़-गाड़ के संरक्षित करने का प्रयास किया,जबकि कई बड़े पुस्तकलाय जला दिए गए।
अब जरा सब को मिलाते हैं...
अरब में मोहम्मद के जन्म के पूर्व ही संस्कृत और मलयालम में रचित विज्ञान,गणित, ज्योतिष शास्त्र और आयुर्वेद का अरबी में अनुवाद होता रहा था .. ये अरबी अनुवाद रोमन साम्राज्य तक भी पहुँचा फिर वहाँ भी इसका अनुवाद हुआ। अब्बासी वंश के दूसरे खलीफा अल-मंसूर (770 ई) के दरबार में भारतीय ज्योतिषाचार्य के माध्यम से मोहम्मद इब्न इब्राहिम अल-फजरी ने भारतीय ज्योतिष को अरबी में अनुवाद किया। 600 ई में ही भारतीय गणितज्ञ विराहांक ने अरबी में भारतीय वैदिक गणित का अनुवाद कर रहे थे जिसे Liber-Abbaci में संकलित किया जा रहा था। इसी तरह अन्य ज्ञान भी अरबी में अनुवादित हो रहे थे। और ये अनुवादक कालीकट राजा के अधीन होते थे.. इन अनुवादों के बदले राजा को अनगिनत रॉयलिटी मिलती थी जो सोने में आदान प्रदान होता था। और इन सभी किताबों को मनसा मूसा ने भारी कीमत दे कर खरीदा था फिर अपने साथ माली ले गया था।(यूट्यूब में आप ढेरों डॉक्युमेंट्री देख सकते हैं इसके ऊपर). और जब मनसा मूसा कुछ अनुवादित किताबों के बदले सोने से भी ज्यादा व्यापार कर सकता था तो केरल राजा कितना कर सकता था अनुमान लगा लीजिये।
माली राजा सोने के बदले नमक खरीदता था.. और यूरोपीयन और मिडिल ईस्ट के व्यापारी सोने के बदले भारत से मसाले, चन्दन,नील आदि खरीदते थे।
मूसा के 9 वर्ष बाद जब इब्न बतूता हज के लिए मक्का पहुँचा तो उसने भारत के बारे में बड़ा सुना.. फिर वो वहाँ से जमीनी मार्ग से होते हुए दिल्ली पहुँचा... कुछ समय पश्चात वो करीब 1342 के आस पास कालीकट भी पहुँचा। और उसने हर गतिविधि और वैभवता को अपनी किताब में उकेरते भी गया।
1498 में कालीकट के तट पे पुर्तगाली नाविक वास्कोडिगामा आता है और बोलता है कि हमने भारत को खोज लिया!! बुड़बक कहीं के। साले चोरकट लूटेरे।
ये तो हो गया हलेलुइया!!
इससे पहले .. जोल्हेलुइया का भी देख ले।
चेरामन पेरुमल का नाम तो सुने होंगे ? नहीं सुने तो बता देते हैं.. ये कालीकट के राजा हुए.. मोहम्मद के समय। इनके जैसा तब कोई शायद ही अमीर होगा। मोहम्मद के जिंदा रहते ही मने कि सन 629 ई में चेरामन जुमा मस्जिद,कोडुंगलुर में बन जाता है जो मक्का के बाद दूसरा होता है। मोहम्मद की मृत्यु 632 ई में होती है।
कहते है कि व्यापारियों के माध्यम से ही इन्हें मोहम्मद के इस्लाम के बारे में पता चलता है और वो उनसे मिलने मक्का को जाता है। जबकि कालीकट राजाओं के लिए मक्का प्रमुख व्यापारिक केंद्र था व वहाँ शिव मंदिर था जिसे कि अब काबा कहते हैं जिसे तिरपाल से ढंक के रखा जाता है। उस काबालीश्वरम मंदिर का मुख्य पुजारी मोहम्मद का चाचा रहता है जो मरते दम तक भी इस्लाम नहीं कबूलता है। और जब इन्हें मंदिर के संकट की चिंता होती है तो ये राजा पेरुमल के संदेश भिजवाते हैं और हस्तक्षेप करने की बात कहते हैं। राजा पेरुमल वहाँ जाता है और मोहम्मद से मिलता है। उससे इस्लाम के बारे में जानता है, काबा में स्थापित किये गए काले पत्थर के बारे में भी जानता है। अपने साथ ले गए अदरक के अचार भी सभी को चखाता है। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उन्होंने इस्लाम स्वीकार कर लिया था। लेकिन हल्ला ये हुआ कि पेरुमल ने इस्माल स्वीकार कर लिया। और कबूतर के माध्यम से ये संदेश कालीकट भी पहुँचा दिया गया। जबकि राजा के दरबार से ऐसी कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई इस खबर की।
कालीकट लौटने के दरमियां सलालह में पेरुमल बीमार पड़ जाते हैं और वहीं मर भी जाते हैं।(जैसे सिकन्दर मर जाता है न वापस लौटते हुए,बस वैसे ही) सलालह में उनके मकबरे के ऊपर बढ़िया मस्जिद भी बना है जो इस्लामिक सेंटर भी है और इसे इस तरह बयां किया जाता कि पहला हिन्दू राजा जो इस्लाम में दीक्षित हुआ। इसका नाम कनवर्जन के बाद 'ताजुद्दीन' हो जाता है जिसे खुद मोहम्मद देता है।
632 में मोहम्मद के मरने के बाद 643 ई में उनके वफादार मलिक बिन दीनार कालीकट पहुँचता है। उनके हाथ में राजा पेरुमल के द्वारा हस्तलिखित मलयालम पत्र होता है जिसमें कि वो मोहम्मद को कालीकट में मस्जिद बनाने का परमिशन देता है। लेकिन ये इस्लामिस्ट लोगों का झूठ है। जब राजा पेरुमल सलालह पहुँचता है तो उससे जबरदस्ती पत्र लिखवाया जाता है,फिर उसे मार दिया जाता है। या जब वे ये पत्र लिख देते हैं तो वे ग्लानि से बीमार पड़ जाते हैं फिर उसे मार दिया जाता है।
और भारत में, केरल के कोडुंगलुर में जब पहला मस्जिद बनता है तो उसका काज़ी यही मलिक बिन दीनार होता है।
और कोडुंगलुर ही ज्ञान का केंद्र होता है,कोडुंगलुर यूनिवर्सिटी से ही इतने सारे स्कॉलर निकलकर विश्वभर में फैलते है। अरबी अनुवाद और फिर उसको बेचना।
इसके पीछे-पीछे हलेलुइया सब आये और ये भी सोना लूटने के साथ साथ ज्ञान भी लूट के ले गए। और अब भी देखिये कि इनके अंग्रेजी किताब का विश्वभर में किस कदर तक बिकती है।
फिर भी हम साला भिखारी और इल्लिट्रेट। गँवार ,देहाती,मूर्ख,मोरोन और पता नहीं क्या क्या।
खैर इतना बहुत हो गया।..
कुबेर पुत्रों का उद्धार*
द्वापर युग में कुबेर जैसा शानवान कोई नहीं था। उसके दो पुत्र थे एक का नाम नलकूबर था व दूसरे का मणिग्रीव कुबेर के ये दोनों बेटे अपने पिता की धन−सम्पत्ति के प्रमाद में घमंडी और उद्दंड हो गए थे राह चलते लोगों को छेड़ना, उन पर व्यंग्य कसना, ग़रीब लोगों का मखौल उड़ाना उन दोनों की प्रवृत्ति बन गयी थी.
एक दिन दोनों भाई नदी में स्नान कर रहे थे तभी आकाश मार्ग से आते हुए उन्हें देवर्षि नारद दिखाई दिए उनके मुख से 'नारायण−नारायण' का स्वर सुनकर नदी पर स्नान के लिए पहुँचे लोग उन्हें प्रणाम करने लगे, लेकिन नलकूबर और मणिग्रीव तो अपने पिता के धन के कारण दंभ में भरे हुए थे। उन्होंने नारद को प्रणाम करने के स्थान पर उनकी ओर मुँह बिचकाया और उनका उपहास उड़ाया.
उन दोनों का व्यवहार नारद को बहुत अखरा क्रोध में भरकर उन दोनों को शाप दे दिया, 'जाओ, मर्त्यलोक में जाकर वृक्ष बन जाओ' शापवश उसी समय दोनों मर्त्यलोक में, गोकुल में नंद बाबा के द्वार पर पेड़ बन कर खड़े हो गए कुबेर को अपने पुत्रों की दुर्दशा की ख़बर मिली तो वह बहुत दुःखी हुआ और महर्षि नारद से बार−बार क्षमा याचना करने लगा नारद जी को उस पर दया आ गई उन्होंने अपने शाप का परिमार्जन करते हुए कहा, 'अभी तो कुछ हो नहीं सकता, किंतु जब द्वापर में भगवान विष्णु कृष्ण के रूप में वहाँ अवतरित होंगे और दोनों वृक्षों का स्पर्श करेंगे तब उन्हें मुक्ति मिल जाएगी।'
नारद के वचनों को सिद्ध करने के लिए ही मानो वासुदेव श्रीकृष्ण को गोकुल के राजा नंद के घर पलने के लिए छोड़ गए वैसे तो सभी जानते हैं कि श्रीकृष्ण के गोकुल छोड़ आने का उद्देश्य था− प्रजा को कंस के अत्याचारों से बचाना। नंद की पत्नी यशोदा कृष्ण को बड़े लाड़−प्यार से पालती थी, परंतु कृष्ण को तो अपनी लीला रचानी थी। ग्वालिनों के घरों से मक्खन चुराना, उनके मटके फोड़ देना, घर के मक्खन को ग्वाल सखाओं में बाँटना, आदि खेल कृष्ण करते थे.
एक दिन सुबह−सुबह माता यशोदा दही मथ रही थीं और नंद बाबा गौशाला में बैठकर गायों का दूध दुहवा रहे थे, तभी कृष्ण जाग गए और माता यशोदा से दुग्ध पान की ज़िद करने लगे किंतु काम में व्यस्त होने के कारण यशोदा को थोड़ा−सा विलम्ब हो गया। बस, फिर क्या था, कृष्ण रूठ गए और गुस्से में मथनी ही तोड़ डाली यशोदा को भी क्रोध आ गया उन्होंने एक रस्सी से कृष्ण को बांध दिया और रस्सी एक ऊखल से बांध दी कृष्ण ठहरे अंतर्यामी, इन्हें अपने दरवाज़े के दो शापित वृक्षों की याद आ गई नारद द्वारा शापित कुबेर के पुत्र काफ़ी समय तक अपनी अशिष्टा की सज़ा पा चुके थे। अब उन्हें मुक्त करना था। ऐसा सोचकर ऊखल खिसकाते हुए कृष्ण आगे बढ़े और दोनों वृक्षों के समीप आकर उनका स्पर्श किया और ऊखल से धक्का मारा। दोनों वृक्ष तत्काल हरहराते हुए नीचे आ गिरे वृक्षों के गिरने से जो भारी शोर हुआ, उसे सुनकर नंद बाबा, माता यशोदा सहित सभी पड़ोसी वहाँ दौड़ते हुए पहुँचे। तब सभी ने एक चमत्कार देखा। उन वृक्षों में से दो सुंदर युवक, जो कोई देवता जैसे लग रहे थे, कृष्ण के सामने हाथ जोड़े खड़े थे फिर वे अंतर्ध्यान होकर अपने लोक को चले गए इस प्रकार नलकूबर और मणिग्रीव को नारद के शाप से मुक्ति मिली...
li.महुवा-का-पेड़.
एक गांव में एक मुखिया रहता था जो अपने अतिथियों से बड़े आदर से बड़े प्रेम से पेश आता था। वह मुखिया हमेशा प्रतीक्षा करता था कि उसके घर कोई आये, और वह उसकी देखभाल बहुत अच्छी तरह करे, और प्रतिदिन सुबह मुखिया यही सोचता था कि आज अतिथियों को खिलाया जाये, क्या पिलाया जाये ताकि अतिथि खुशी से झूम उठे। अतिथि बड़ी खुशी से वहाँ से विदा लेते और जाने से पहले मुखिया को हमेशा कहते कि उन्हें इतने अच्छे से किसी ने नहीं रखा। लेकिन मुखिया के मन में यही बात खटकती कि अतिथि खुशी से झूम नहीं रहे हैं।
रोज सुबह होते ही मुखिया जंगल में घुमता रहता, फूल कंदमूल इकट्ठे करते रहता था ताकि कोई अतिथि अगर आये, तो उन्हें अच्छी प्रकार से भोजन करा सके।
मुखिया का बेटा भी अपने पिता की तरह अतिथि सत्कार में बड़ा माहिर था। एक दिन जब उनके घर में अतिथि आए जो पहले भी आ चुके थे, मुखिया और मुखिया का बेटा दोनो कंद-मूल और फलों से अच्छी तरह से उनका सत्कार किया। अतिथि भी बड़े प्यार से, खुशी से खा रहे थे। खाते-खाते अतिथि ने कहा - "इस जंगल में सिर्फ यही फल मिलता है - हमारे उधर के जंगल में बहुत कि के फल होते हैं। पर मुझे तो ये फल बहुत ही अच्छा लगता है।"
मुखिया का बेटा अपने पिता की ओर देख रहा था। मुखिया ने कहा - "हम जंगल में घुमते रहते हैं ताकि हमें कुछ और प्रकार का फल मिल जाए। लेकिन इस जंगल में सिर्फ ये ही पाई जाती है" -
अतिथि ने कहा - "मुझे तो सबसे अच्छा आप का अतिथि सत्कार लगता है। इतने आदर से तो हमें कोई भी नहीं खिलाता।"
उस रात को मुखिया का बेटा मुखिया से कहा - "मैं कुछ दिन के लिए जंगल के भीतर और अच्छी प्रकार से छानबीन करने के लिए जा रहा हूँ। देखु-अगर मुझै कुछ और मिल जाये" -
मुखिया को बडी अच्छी लगी ये बात। उसने बेटे से कहा - "हाँ बेटा, तू जा" -
कई दिन तक मुखिया का बेटा जंगल में घूमता रहा पर उसे कोई नई चीज़ दिखाई नहीं दी। घूमते-घूमते वह बहुत ही थक गया था, एक पेड़ के नीचे बैठ वह आराम करने लगा। अचानक उसके सर पर एक चिड़िया आकर बैठी। और फिर फुदकती हुई चली गई।
अरे! ये चिड़िया तो बड़ी मस्ती से झूम रही है। उसने चारों ओर देखा - यहाँ की सारी चिड़िया तो बड़ी प्रसन्न दिख रही है। क्या बात है? वह गौर से देखता रहा चिड़ियों की ओर। उस पेड़ के नीचे एक गड्ढ़ा था जिसमें पानी था। चिड़िया उड़ती हुई उस गड्ढ़े के पास गई, उन्होंने पानी पिया और झुमते हुये चहकनी लगी और जिस चिड़िया ने अभी तक पानी नहीं पिया था, वह उतने उत्साह से झूम नहीं रही थी। इसका मतलब है कि उस पानी में कुछ है।
मुखिया का बेटा गड्ढ़े के पास बैठ गया और उसने गड्ढ़े का पानी पी लिया। अरे-ये पानी तो बड़ा अजीब है। पीने से झूमने को मन करता है। क्या है इस पानी में? अच्छा यह तो महुए का पेड़ है।
इसके फल झड़-झड़ के उसी पानी में गिर रहे थे। तो इसका मतलब है कि महुए के फल में वह झूमने वाली चीज़ है।
मुखिया का बेटा मन ही मन झूम उठा। ये ही तो वह कितने दिनों से तलाश कर रहा था। इतने दिनों के बाद उसे वह चीज़ मिल गई।
उसने महुए का फल इकट्ठा करना शुरु कर दिया। ढ़ेर सार फलों को लेकर वह घर की ओर चल दिया।
उधर मुखिया बहुत ही चिन्तित हो उठा था। कहाँ गया उसका बेटा? उस दिन तीन अतिथि आए हुए थे। अतिथीयों को मुखिया की पत्नी प्यार से खिला रही थी पर साथ ही साथ उदास भी थी। अपने पति की ओर बार-बार देख रही थी।
अचानक मुखिया के चेहरे पर चमक आ गई। उसकी पत्नी समझ गई कि बेटा वापस आ गया है।
अतिथी अब जाने ही वाले थे। पर मुखिया के बेटे ने उनसे अनुरोध किया कि वह थोड़ी देर के लिए रुक जाये।
अपनी माँ को उसने सारी बात बताई। माँ ने कहा - "पर बेटा, पानी में कुछ समय वह फल रहने के बाद ही असर होगा - तुम्हारी कहानी से मुझे तो यही समझ आ रहा है।"
मुखिया का बेटा मान गया। इसके बाद पानी में वह फल डालकर कुछ दिन तक वे सब इन्तज़ार करने लगे। अगली बार जब अतिथि आए उन्हें वह पानी दिया गया पीने के लिए।
उस दिन मुखिया, मुखिया की पत्नी और मुखिया का बेटा, तीनों खुशी से झूम उठे। क्योंकि पहली बार अतिथि जाते वक्त झूमते हुए चले जा रहे थे
माता पार्वती औरआत्मज्ञानी साधु*
*एक बार भगवान शंकर जी के पास से चार साधू गुजर रहे थे वे अपने धुन में मस्त थे जिससे उन्होंने भगवान शंकर जी को प्रणाम नहीं किया। जिससे माता पार्वती जी को बहुत गुस्सा आया तो उन्होंने ने उन साधुओं को श्राप दे दिया की जाओ कोचवान बन जाओ।*
*जिससे श्राप के कारण वे चारों हाथी को चलाने वाले कोचवान बन गए। एक दिन चारों हाथी पर बैठ के कहीं जा रहे थे तब माता पार्वती उनके सामने पहुँच कर पूछा अच्छा बताओ जी कोचवान बनकर कैसा लग रहा है ?*
*तब उन चारों ने कहा बहुत अच्छा लग रहा है। फिर माता पार्वती जी बोलीं पहले तुम साधू थे चारों तरफ तुम्हारी पूजा होती थी, अब हाथी हांक रहे हो और बोलते हो अच्छा लग रहा है। तब उन साधुओं ने कहा इससे क्या फर्क पड़ता है हमारा तो केवल बाहरी रूप ही बदला है, किसी नाटक में अगर कोई पहले चौकीदार और बाद में राजा बन कर आये तो उससे कोई अंतर तो नहीं पड़ता।*
*माता को उन पे और गुस्सा आया और श्राप दिया जाओ तुम ऊंट बन जाओ। फिर वे ऊंट बन गए एक दिन वे चारों कहीं जा रहे थे और अपने लम्बी गर्दन से पेड़ की पत्तियां तोड़ के खा रहे थे, तभी वहां माता पार्वती जी पहुंची पर बोलीं अब बताओ ऊंट बन कर कैसा लग रहा है तब वे बोले अब तो और अच्छा लग रहा है न नहाने की फिक्र न धोने की मस्त पत्ते खाते हैं और घूमते हैं।*
*माता पार्वती जी ने सोचा ये तो हद हो गयी इनका तो कुछ बिगड़ता ही नहीं। तब वो भगवान शंकर जी के पास पहुंची और बोलीं प्रभु वे साधू किस मिट्टी के बने हैं उनको तो किसी बात की कोई तकलीफ ही नहीं होती,पहले कोचवान बनाया फिर ऊंट फिर भी वे कहते हैं कि वे सुखी हैं।*
*तब भगवान ने कहा,पार्वती वे साधू आत्मज्ञानी हैं वो खुद को आत्मा मानते हैं उन्हें ये फर्क नहीं पड़ता कि वे किस शरीर में है क्योंकि ये शरीर आज है तो कल नहीं लेकिन आत्मा अजर अमर है।इसी प्रकार चाहे तुम बिल्ली बनो,राजा बनो या कंगाल बनो,रोगी बन जाओ या पहलवान इससे किसी का कुछ नहीं बनता बिगड़ता है लेकिन व्यवहार के बदलने से सब कुछ बिगड़ जाता है..!
*जयश्री कृष्ण*
माता पार्वती औरआत्मज्ञानी साधु*
*एक बार भगवान शंकर जी के पास से चार साधू गुजर रहे थे वे अपने धुन में मस्त थे जिससे उन्होंने भगवान शंकर जी को प्रणाम नहीं किया। जिससे माता पार्वती जी को बहुत गुस्सा आया तो उन्होंने ने उन साधुओं को श्राप दे दिया की जाओ कोचवान बन जाओ।*
*जिससे श्राप के कारण वे चारों हाथी को चलाने वाले कोचवान बन गए। एक दिन चारों हाथी पर बैठ के कहीं जा रहे थे तब माता पार्वती उनके सामने पहुँच कर पूछा अच्छा बताओ जी कोचवान बनकर कैसा लग रहा है ?*
*तब उन चारों ने कहा बहुत अच्छा लग रहा है। फिर माता पार्वती जी बोलीं पहले तुम साधू थे चारों तरफ तुम्हारी पूजा होती थी, अब हाथी हांक रहे हो और बोलते हो अच्छा लग रहा है। तब उन साधुओं ने कहा इससे क्या फर्क पड़ता है हमारा तो केवल बाहरी रूप ही बदला है, किसी नाटक में अगर कोई पहले चौकीदार और बाद में राजा बन कर आये तो उससे कोई अंतर तो नहीं पड़ता।*
*माता को उन पे और गुस्सा आया और श्राप दिया जाओ तुम ऊंट बन जाओ। फिर वे ऊंट बन गए एक दिन वे चारों कहीं जा रहे थे और अपने लम्बी गर्दन से पेड़ की पत्तियां तोड़ के खा रहे थे, तभी वहां माता पार्वती जी पहुंची पर बोलीं अब बताओ ऊंट बन कर कैसा लग रहा है तब वे बोले अब तो और अच्छा लग रहा है न नहाने की फिक्र न धोने की मस्त पत्ते खाते हैं और घूमते हैं।*
*माता पार्वती जी ने सोचा ये तो हद हो गयी इनका तो कुछ बिगड़ता ही नहीं। तब वो भगवान शंकर जी के पास पहुंची और बोलीं प्रभु वे साधू किस मिट्टी के बने हैं उनको तो किसी बात की कोई तकलीफ ही नहीं होती,पहले कोचवान बनाया फिर ऊंट फिर भी वे कहते हैं कि वे सुखी हैं।*
*तब भगवान ने कहा,पार्वती वे साधू आत्मज्ञानी हैं वो खुद को आत्मा मानते हैं उन्हें ये फर्क नहीं पड़ता कि वे किस शरीर में है क्योंकि ये शरीर आज है तो कल नहीं लेकिन आत्मा अजर अमर है।इसी प्रकार चाहे तुम बिल्ली बनो,राजा बनो या कंगाल बनो,रोगी बन जाओ या पहलवान इससे किसी का कुछ नहीं बनता बिगड़ता है लेकिन व्यवहार के बदलने से सब कुछ बिगड़ जाता है..!
*जयश्री कृष्ण*
माता पार्वती औरआत्मज्ञानी साधु*
*एक बार भगवान शंकर जी के पास से चार साधू गुजर रहे थे वे अपने धुन में मस्त थे जिससे उन्होंने भगवान शंकर जी को प्रणाम नहीं किया। जिससे माता पार्वती जी को बहुत गुस्सा आया तो उन्होंने ने उन साधुओं को श्राप दे दिया की जाओ कोचवान बन जाओ।*
*जिससे श्राप के कारण वे चारों हाथी को चलाने वाले कोचवान बन गए। एक दिन चारों हाथी पर बैठ के कहीं जा रहे थे तब माता पार्वती उनके सामने पहुँच कर पूछा अच्छा बताओ जी कोचवान बनकर कैसा लग रहा है ?*
*तब उन चारों ने कहा बहुत अच्छा लग रहा है। फिर माता पार्वती जी बोलीं पहले तुम साधू थे चारों तरफ तुम्हारी पूजा होती थी, अब हाथी हांक रहे हो और बोलते हो अच्छा लग रहा है। तब उन साधुओं ने कहा इससे क्या फर्क पड़ता है हमारा तो केवल बाहरी रूप ही बदला है, किसी नाटक में अगर कोई पहले चौकीदार और बाद में राजा बन कर आये तो उससे कोई अंतर तो नहीं पड़ता।*
*माता को उन पे और गुस्सा आया और श्राप दिया जाओ तुम ऊंट बन जाओ। फिर वे ऊंट बन गए एक दिन वे चारों कहीं जा रहे थे और अपने लम्बी गर्दन से पेड़ की पत्तियां तोड़ के खा रहे थे, तभी वहां माता पार्वती जी पहुंची पर बोलीं अब बताओ ऊंट बन कर कैसा लग रहा है तब वे बोले अब तो और अच्छा लग रहा है न नहाने की फिक्र न धोने की मस्त पत्ते खाते हैं और घूमते हैं।*
*माता पार्वती जी ने सोचा ये तो हद हो गयी इनका तो कुछ बिगड़ता ही नहीं। तब वो भगवान शंकर जी के पास पहुंची और बोलीं प्रभु वे साधू किस मिट्टी के बने हैं उनको तो किसी बात की कोई तकलीफ ही नहीं होती,पहले कोचवान बनाया फिर ऊंट फिर भी वे कहते हैं कि वे सुखी हैं।*
*तब भगवान ने कहा,पार्वती वे साधू आत्मज्ञानी हैं वो खुद को आत्मा मानते हैं उन्हें ये फर्क नहीं पड़ता कि वे किस शरीर में है क्योंकि ये शरीर आज है तो कल नहीं लेकिन आत्मा अजर अमर है।इसी प्रकार चाहे तुम बिल्ली बनो,राजा बनो या कंगाल बनो,रोगी बन जाओ या पहलवान इससे किसी का कुछ नहीं बनता बिगड़ता है लेकिन व्यवहार के बदलने से सब कुछ बिगड़ जाता है..!
*जयश्री कृष्ण*
‼️आटा आधा किलो‼️*
एक दिन एक सेठ जी को अपनी सम्पत्ति के मूल्य निर्धारण की इच्छा हुई
लेखाधिकारी को तुरन्त बुलवाया गया
सेठ जी ने आदेश दिया, "मेरी सम्पूर्ण सम्पत्ति का मूल्य निर्धारण कर ब्यौरा दीजिए, यह कार्य अधिकतम एक सप्ताह में हो जाना चाहिए"
ठीक एक सप्ताह बाद लेखाधिकारी ब्यौरा लेकर सेठ जी की सेवा में उपस्थित हुआ
सेठ जी ने पूछा- “कुल कितनी सम्पदा है?”
सेठ जी, मोटे तौर पर कहूँ तो आपकी सात पीढ़ी बिना कुछ किए धरे आनन्द से भोग सके इतनी सम्पदा है आपकी बोला लेखाधिकारी
लेखाधिकारी के जाने के बाद सेठ जी चिंता में डूब गए, ‘तो क्या मेरी आठवी पीढ़ी भूखों मरेगी?’
वह रात दिन चिंता में रहने लगे तनाव ग्रस्त रहते, भूख भाग चुकी थी,कुछ ही दिनों में कृशकाय हो गए सेठानी जी द्वारा बार बार तनाव का कारण पूछने पर भी जवाब नहीं देते.
सेठानी जी से सेठ जी की यह हालत देखी नहीं जा रही थी.
मन की स्थिरता व शान्त्ति का वास्ता देकर सेठानी ने सेठ जी को साधु संत के पास सत्संग में जाने को प्रेरित कर ही लिया
सेठ जी भी पँहुच गए एक सुप्रसिद्ध संत समागम में।
एकांत में सेठ जी ने सन्त महात्मा से मिलकर अपनी समस्या का निदान जानना चाहा.
“महाराज जी! मेरे दुःख का तो पार ही नहीं है, मेरी आठवी पीढ़ी भूखों मर जाएगी मेरे पास मात्र अपनी सात पीढ़ी के लिए पर्याप्त हो इतनी ही सम्पत्ति है कृपया कोई उपाय बताएँ कि मेरे पास और सम्पत्ति आए और अगली पीढ़ियाँ भूखी न मरे आप जो भी बताएं मैं अनुष्ठान, विधी आदि करने को तैयार हूँ।" सेठ जी ने सन्त महात्मा से प्रार्थना की
संत महात्मा जी ने समस्या समझी और बोले- “इसका तो हल तो बड़ा आसान है ध्यान से सुनो, सेठ! बस्ती के अन्तिम छोर पर एक बुढ़िया रहती है, एक दम कंगाल और विपन्न न कोई कमानेवाला है और न वह कुछ कमा पाने में समर्थ है उसे मात्र आधा किलो आटा दान दे दो यदि वह यह दान स्वीकार कर ले तो इतना पुण्य उपार्जित हो जाएगा कि तुम्हारी मनोकामना पूर्ण हो जाएगी तुम्हें अवश्य अपना वांछित प्राप्त होगा”
सेठ जी को बड़ा आसान उपाय मिल गया अब कहां सब्र था उन्हें घर पहुंच कर सेवक के साथ एक क्विंटल आटा लेकर पहुँच गए बुढिया की झोंपड़ी पर
“माताजी! मैं आपके लिए आटा लाया हूँ इसे स्वीकार कीजिए"सेठ जी बोले
“आटा तो मेरे पास है,बेटा! मुझे नहीं चाहिए।”
बुढ़िया ने स्पष्ट इन्कार कर दिया
सेठ जी ने कहा- “फिर भी रख लीजिए”
बूढ़ी मां ने कहा- “क्या करूंगी रख कर मुझे आवश्यकता ही नहीं है”
सेठ जी बोले, “अच्छा, कोई बात नहीं,एक क्विंटल न सही यह आधा किलो तो रख लीजिए”
“बेटा!आज खाने के लिए जरूरी,आधा किलो आटा पहले से ही मेरे पास है, मुझे अतिरिक्त की जरूरत नहीं है” बुढ़िया ने फिर स्पष्ट मना कर दिया
लेकिन सेठ जी को तो सन्त महात्मा जी का बताया उपाय हर हाल में पूरा करना था।
एक कोशिश और करते सेठ जी बोले “तो फिर इसे कल के लिए रख लीजिए।”
बूढ़ी मां ने कहा- “बेटा! कल की चिंता मैं आज क्यों करूँ, जैसे हमेशा प्रबंध होता आया है कल के लिए भी कल ही प्रबंध हो जाएगा।”
इस बार भी बूढ़ी मां ने लेने से साफ इन्कार कर दिया।
सेठ जी की आँखें खुल चुकी थी,"एक गरीब बुढ़िया कल के भोजन की चिंता नहीं कर रही और मेरे पास अथाह धन सामग्री होते हुए भी मैं आठवी पीढ़ी की चिन्ता में घुल रहा हूँ मेरी चिंता का कारण अभाव नहीं तृष्णा है।"
वाकई तृष्णा का कोई अन्त नहीं है
संग्रहखोरी तो दूषण ही है संतोष में ही शान्ति व सुख निहित है.
पल की तो खबर नहीं... चिंता कल की हो रही है...
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ब्यूरो चीफ/लखनऊ
कोमल
शवेता दर्पण समाचार पत्र
मृत्यु का भय
मौत का डर बहादुर निडर बाहुबली लोगों के मन में भी घर कर जाता है। चाहे बड़ा हो या छोटा, विद्वान् हो या अज्ञानी, हर कोई मृत्यु से डरता है, लेकिन वास्तव में मृत्यु जैसी कोई चीज नहीं है। तथाकथित 'मृत्यु' और कुछ नहीं बल्कि जन्म की घटना का एक स्वाभाविक परिणाम है। मृत्यु से बचने का एकमात्र उपाय जन्म लेने से बचना है। जन्म लेना और मरना नहीं हो सकता।
शरीर में रहने वाला व्यक्ति आत्मा अमर है। यह एक नया शरीर धारण करने के लिए एक पुराने शरीर को त्याग देता है, जैसे हम अपने पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्र धारण करते हैं। यदि हम एक पुराने वस्त्र को त्यागकर नया वस्त्र धारण करने में प्रसन्न हैं, तो आत्मा द्वारा एक पुराने शरीर को त्याग कर नया धारण करने पर दुखी होने का कोई कारण नहीं है।
एक भारतीय अफ्रीका गया। जब उसके पैसे खत्म हो गए तो वह एक साहूकार के पास कर्ज मांगने गया। तभी उस पड़ोस में रहने वाले एक भारतीय परिवार में किसी की मौत हो गई और परिवार के लोग बिलख-२ कर रोने लगे।
साहूकार ने भारतीय से पूछा कि उसके देशवासी क्यों रो रहे हैं। भारतीय ने उत्तर दिया कि उनके देश में परिवार में किसी की मृत्यु होने पर रोने की प्रथा थी।
साहूकार ने फिर पूछा, और जब परिवार में जन्म होता है तो क्या करते हो? भारतीय ने कहा, फिर हम आनन्दित होते हैं।
साहूकार ने कहा तो फिर, यदि तुम उस तरह के व्यक्ति हो, जो कुछ पाकर आनन्दित होता है, लेकिन जब तुम्हें उसे वापस करना होता है, तो रोता है, तो मैं निश्चित रूप से तुम्हें कोई पैसा नहीं दूंगा
एक व्यक्ति जो मर जाता है, उसने कभी यह कहने के लिए वापस नहीं लिखा कि मृत्यु के बाद उसके साथ क्या होता है। इसलिए, हमारे लिए एकमात्र रास्ता खुला है कि हम मृत्यु और उसके बाद के विषयों पर पवित्र शास्त्रों का अधिकार लें।
हम वहां इन विषयों पर बहुत सारी जानकारी प्राप्त कर सकते हैं। भगवद-गीता की निम्नलिखित शिक्षाएँ हमें बताती हैं कि मृत्यु से कैसे निपटा जाए:
अतीत को भूल जाएं। भविष्य से भी डरो मत। वर्तमान को भगवान की पूजा में अर्पित करें। भगवान का भक्त कभी नष्ट नहीं होता।
सभी कर्तव्यों और दायित्वों को त्याग दें, अपने आप को पूरी तरह से भगवान की एकमात्र देखभाल और सुरक्षा के लिए समर्पित कर दें। वह आपको सभी बुरे परिणामों से बचाएगा और उसमें आपकी सभी चिंताओं का अंत होगा।
यदि कोई भगवान को हर चीज में और हर चीज में देखता है, और हर चीज को और हर चीज को भगवान में देखता है, तो ऐसे व्यक्ति के लिए भगवान कभी भी अस्पष्ट नहीं होता है और वह कभी भी भगवान के लिए अस्पष्ट नहीं होता है।
हम मृत्यु से डरते हैं, क्योंकि अज्ञानता के प्रभाव में, हम अपने वास्तविक स्व को भूल गए हैं। और यह दिव्य आत्मा का यह विस्मरण ही है जो हमारे लिए हमारे सभी कष्टों का कारण बनता है। यह परमेश्वर नहीं है जो हमारी परेशानियों का निर्माता है
जब कोई इस दुनिया में आता है तो किसी और दुनिया से आता है। इस दुनिया में अपना जीवन जीने के बाद, उसे उस दूसरी दुनिया में लौटना होगा, इसलिए सार्वभौमिक क्षेत्र से, व्यक्ति जन्म के समय व्यक्तिगत दायरे में आता है।
जब कोई व्यक्ति मरता है, तो वह व्यक्ति वापस पिता के पास जा रहा होता है और यह दुःख के बजाय आनन्द का क्षण होता है, क्योंकि वह परम अवस्था को प्राप्त कर रहा होता है।
फिर किसी के जाने पर तनिक भी शोक नहीं करना चाहिए, क्योंकि वह लौकिक और लौकिक माता-पिता को छोड़कर वास्तविक पिता के पास जा रहा है। हमें अपने आप को सांत्वना देनी चाहिए और अपना ध्यान सभी के वास्तविक पिता की ओर लगाना चाहिए, जिसका परिवार दुनिया भर में फैला हुआ है। जब किसी को वापस बुलाया जाता है, तो हमें खुशी-२ उस व्यक्ति को जाने देना चाहिए; अगर हम उसे याद करते रहेंगे, तो हम उस जीव को चोट पहुँचा रहे होंगे क्योंकि वह इस जीवन के प्रति कुछ लगाव, कुछ आकर्षण महसूस करेगा क्योंकि हम जो दुःख दिखाते हैं।
युवा हो या वृद्ध, हमें ख़ुशी की अनुभूति करनी चाहिए कि उनका एक बच्चा अपने असली घर वापस चला गया है। यह जगत् यात्रा-स्थल है-हम यहाँ थोड़े ही समय के लिए आये हैं।
🚩 है तो सब है अन्यथा शव ही शव है 🚩
समय’ और ‘धैर्य*
एक साधु था, वह रोज घाट के किनारे बैठ कर चिल्लाया करता था, ”जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे।” बहुत से लोग वहाँ से गुजरते थे पर कोई भी उसकी बात पर ध्यान नही देता था और सब उसे एक पागल आदमी समझते थे.
एक दिन एक युवक वहाँ से गुजरा और उसने उस साधु की आवाज सुनी, “जो चाहोगे सो पाओगे”, जो चाहोगे सो पाओगे”,और आवाज सुनते ही उसके पास चला गया उसने साधु से पूछा -“महाराज आप बोल रहे थे कि ‘जो चाहोगे सो पाओगे’ तो क्या आप मुझको वो दे सकते हो जो मै जो चाहता हूँ?”
साधु उसकी बात को सुनकर बोला – “हाँ बेटा तुम जो कुछ भी चाहता है मै उसे जरुर दुँगा, बस तुम्हे मेरी बात माननी होगी लेकिन पहले ये तो बताओ कि तुम्हे आखिर चाहिये क्या?” युवक बोला-” मेरी एक ही ख्वाहिश है मै हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनना चाहता हूँ.“
साधू बोला,” कोई बात नही मै तुम्हे एक हीरा और एक मोती देता हूँ, उससे तुम जितने भी हीरे मोती बनाना चाहोगे बना पाओगे!” और ऐसा कहते हुए साधु ने अपना हाथ आदमी की हथेली पर रखते हुए कहा, ” पुत्र, मैं तुम्हे दुनिया का सबसे अनमोल हीरा दे रहा हूं, लोग इसे ‘समय’ कहते हैं, इसे तेजी से अपनी मुट्ठी में पकड़ लो और इसे कभी मत गंवाना, तुम इससे जितने चाहो उतने हीरे बना सकते हो.
युवक अभी कुछ सोच ही रहा था कि साधु उसका दूसरी हथेली, पकड़ते हुए बोला, ” पुत्र , इसे पकड़ो, यह दुनिया का सबसे कीमती मोती है, लोग इसे “धैर्य” कहते हैं, जब कभी समय देने के बावजूद परिणाम ना मिलें तो इस कीमती मोती को धारण कर लेना, याद रखन जिसके पास यह मोती है, वह दुनिया में कुछ भी प्राप्त कर सकता है.
युवक गम्भीरता से साधु की बातों पर विचार करता है और निश्चय करता है कि आज से वह कभी अपना समय बर्वाद नहीं करेगा और हमेशा धैर्य से काम लेगा। और ऐसा सोचकर वह हीरों के एक बहुत बड़े व्यापारी के यहाँ काम शुरू करता है और अपने मेहनत और ईमानदारी के बल पर एक दिन खुद भी हीरों का बहुत बड़ा व्यापारी बनता है.
*तात्पर्य*
समय’ और ‘धैर्य’ वह दो हीरे-मोती हैं जिनके बल पर हम बड़े से बड़ा लक्ष्य प्राप्त कर सकते हैं।अतः ज़रूरी है कि हम अपने कीमती समय को बर्वाद ना करें और अपनी मंज़िल तक पहुँचने के लिए धैर्य से काम लें..!!
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li.बड़े-का-आश्रय.li
बाप इतना बड़ा कि सारे इलाके में नाम! राजद्वार में भी सम्मान। मुँह खोले श्लोक, हँसे श्लोक, छींके श्लोक, इधर बेटा निरा मूर्ख, बाप का नाम भी बता नहीं सकता। पंडित ने बहुत कोशिश की, सब बेकार। वह राजद्वार से जाकर पैसे लाता। बेटा सब खा-पी लेता। दंता तास-चौपड़ खेलता। कुसंगियों का साथी बना। कुजगह बैठता।
पंडित ने मरते समय छड़ी माथे पर रख कहा, “तुम तो कुछ बने नहीं। जितना समझाया, वैसे ही रहा। सदा बड़े का आश्रय लेना, छोटे के पास न फटकना।”
बेटे ने सबकुछ बेच, उधार कर श्राद्ध कर दिया। अब दुनियादारी की बात दिमाग में आई। कैसे हो, क्या करे? सिर पर हाथ दे बैठ गया। सोचने लगा, बापू की बात याद आई। बड़ों का आसरा, छोटे के पास न फटकना। उनके पास कौन नहीं जाता। मारनेवाले को मारे, राजा बैठे सिंहासन पर। लक्ष्मी बैकुंठ छोड़ राजा के भंडार में। सरस्वती है दरबार में। राजा के आश्रय में सारा दुःख मिटेगा।
मूर्ख राजसभा में आया, मगर सहमा खड़ा रहा। किसी ने न पूछा। न पास बिठाया। सीधे मुँह बात न की। कुछ कहना चाह रहा था, तभी एक पंडित वहाँ पहुँचा। राजा ने आकर पंडित को नमस्कार किया। मूर्ख को लगा, राजा से बड़ा है। धन से विद्या बड़ी है। वह पंडित के पीछे हो गया।
पंडित ने पूछा, “अरे, मेरे पीछे क्यों आ रहे हो?”
मूर्ख ने कहा, “राजा ने जब आपको नमस्कार किया, आप बड़े हैं। बापू ने कहा था, बड़े का आसरा लेना। मैं आपके आश्रय में रहूँगा।”
पंडित ने सोचा, ‘वाह! मेरी बात तो पानी की लकीर है। कमाकर लाओ तो चूल्हा जले। मैं इसे कैसे चलाऊँगा?’ समझाए क्या बनेगा? तभी अक्ल आ गई।
मूर्ख पीछे-पीछे चला। पंडित ने देखा, खेत की बाड़ के सहारे-सहारे सियार-सियारनी आ रहे हैं। कुछ दूर चलने के बाद पंडित ने दोनों को नमस्कार किया। मूर्ख देखकर सोचने लगा, पंडित तो सियार को नमस्कार कर रहा है। तो पंडित कैसे बड़ा होगा? ये सियार-सियारनी बड़े हैं।
मूर्ख उनके पीछे चला। सियार ने सोचा, यह हमें मारने आ रहा है। भागना होगा। मूर्ख ने पीछा किया। रास्ते से गली, गली से खेत-बाग, उजाड़ में भागते-भागते तीन दिन, तीन रात चले, भागने के चक्कर में सियार-सियारनी पानी की बूँद भी नहीं पी सके। थक गए। प्राण गले में आ गए। स्वर्ग में हलचल। दोनों की उमर पूरी हुई नहीं। अकाल में मरने पर स्वर्ग को दोष लगेगा। यह मूर्ख है, जो जिद पकड़ी, नहीं मानेगा, क्या करें? लक्ष्मीजी बोलीं, “बउला गाय की बछिया है। वह सोना गोबर करती है, वह इसे दे दो, धन मिलेगा तो जिद छोड़ देगा।”
सरस्वती सियारनी के गले में बैठी। आदमी के स्वर में बोली, “अरे हमारे पीछे क्यों भागते हो? यह गाय हमारी इष्ट गुरु है, इसे ले जाओ। यह तुम्हारी मनोकामना पूरी करेगी।” दोनों ने एक झुरमुटे में घुसकर चैन की साँस ली।
ब्राह्मण गाय को बाँध घर ले आया। घोर अँधेरा। इस समय कहाँ जाए? तेली के बरामदे में गाय बाँध दी। बड़ी सुबह तेली उठा। बटोही बरामदे में सोया है। पास में गाय बँधी है। उसके पीछे गोबर नहीं, सोना के तीन लेंदे पड़े। इतना सोना कभी नहीं देखा। आँखें देख चौड़ी हो गईं। गमछे में लपेट घर ले जाने लगा, ब्राह्मण की नींट टूट गई।
“ऐं, मेरा धन लेजा रहा है?”
तेली—“तेरा उपकार किया। उलटे मुझे कहता है, तेरा धन मैं ले रहा हूँ?”
“मेरे खूँटे ने सोना दिया।”
इस तरह ‘मेरी गाय’ मेरी खूँटी करते-करते धक्का दे तेली ने घर में घुस किवाड़ बंद कर लिया। ब्राह्मण ने राजा से जाकर फरियाद की। उससे पहले तेली फरियाद ले पहुँच गया। उसने सोने की दो मुहर राजा को भेंट दे दी।
राजा ने विचारकर कहा, “गाय बछिया जनम दे, सोना नहीं जनमती।”
ब्राह्मण—“मैं साक्षी दूँगा।”
राजा—“साक्षी कौन है?”
ब्राह्मण—“सियार-सियारनी।”
राजा—“बुला उन्हें।”
ब्राह्मण ने जाकर सियार-सियारनी के निहोरे किए। कुछ न सुना। कहा, “तुम मनुष्यों का विश्वास नहीं, इसमें खतरा है। हम तुम्हारे साथ नहीं जाएँगे। जरूरत हो तो तुम हमारे पास आओ।”
तब राजा वहाँ गए। सियार एक ओर बैठा।
राजा—“तू ब्राह्मण का साक्षी है?”
“जी हाँ।”
“गाय सोने का गोबर करती है, ब्राह्मण का कहना सच है?”
“ये लक्ष्मीजी की गाय है। स्वर्ग की है, सोना जन्म करती है। सच-झूठ महाराज पहचान लें।”
तेली-ब्राह्मण घबरा गए।
“आँख पर पट्टी बाँध दें, जिसके सिर पूँछ रख दूँ, सोना उसका।”
उन्होंने सात परत पट्टी सियार की आँख पर बाँधी। तेली-ब्राह्मण पाँच बार इधर-उधर हो बैठे। सियार ने ब्राह्मण के सिर पूँछ रख कहा, “सच हो, सब सच।”
ब्राह्मण सोना लेकर राजा से पाट-सिरोपाव ले घर लौटा। पीछे-पीछे लौटी बउला गाय की बछिया। तेली मामा घर में आकर अपने धंधे में लगा।
li.असुर-और-बढई.
एक बढ़ई था। सुखसे खाना, दो घड़ी सोना। बाकी समय काम-ही-काम में लगा रहता। किसी का पान रखने का, किसी का नमक रखने का, किसी का हल्दी डिब्बा, खाट, बक्सा, संदूक, किसी की सवारी, पालकी, किसी का खटोला, यह सब बनाना चलता। फिर हल, बैलगाड़ी बनाना भी होता।
अपने लिए कभी खाट या पलंग बनाने की फुरसत न होती। कहा जाता है—केवट लाता मछली, पर केंकड़ा खाता। वैसे ही बढ़ई खाट-पलंग बनाता, पर खुद नीचे सोता। इस पर घरवाली सदा झंझट करती। एक दिन मन किया, चल पलंग बना दे। अच्छी लकड़ी न हो, न सही। पलंग बनाएँ। मोटा, पका पेड़ काटा, पर नीचे न पड़ा। जड़ कट गई, लेकिन वैसे ही खड़ा रहा। अचंभे की बात। रस्सी लगा जितना खींचा, टस-से-मस न हुआ। मन में सोचा—इसमें भूत-प्रेत या यक्ष-देवता है? है तो रहे, कल आऊँगा।
अगले दिन आकर देखा, पेड़ वैसे ही खड़ा है। एक पत्ता या फूल भी मुरझाया नहीं। बढ़ई ने सोचा—मेरा भाग्य ही खोटा है, नीचे सोना है। बिना काठ पलंग बने कैसे?
पेड़ से आवाज आई, “हाँ होगा, बड़ा बेटा दे तो?”
बढ़ई ने मन में सोचा—पलंग पर नहीं सोया, न सही। क्या डूब जाएगा। इधर पेड़ को मुँह खोलकर कहा, “तू सो, मैं कल भेज दूँगा बेटे को।”
पेड़ सो गया। बढ़ई ने सोचा, पेड़ क्या करेगा बेटे का?
बेटे से कहा, “बैलगाड़ी ले जा, लकड़ी लादकर लानी है।”
बेटा इतनी बात जानता न था। बैलगाड़ी लेकर जंगल गया। उसके काले-सफेद बैल।
कालिया ने कहा, “सामंतजी भागो। बाप ने मौत के मुँह में भेजा है। यह पेड़ नहीं असुर है। पहुँचते ही निगल जाएगा। जाओ भागो।” सफेद बैल ने कहा, “ये मुट्ठी भर सींग और मुरगी का अंडा साथ में ले। जरूरत के समय काम आएगा। पेड़ पीछा करे तो उस पर फेंक देना।” बैलों की बात मान बढ़ई का बेटा चला गया। इधर पेड़ गुस्सा हो रहा। बढ़ई की बात सच नहीं। लंबे-लंबे डग भरकर वह बढ़ई के दरवाजे पर पहुँचा। कहा, “बेटे को क्यों नहीं भेजा?”
खाती—“मैंने तो बड़ी भोर ही भेज दिया। तो फिर गया कहाँ?”
“अच्छा तो देखता हूँ!” पेड़ और दस हाथ ऊँचा हो गया। चारों ओर देखा। देखा, दो कोस पर भागा जा रहा है। पेड़ कूदता-कूदता चला उधर। एक छलाँग में दस हाथ। घड़ी भर में खाती के बेटे तक पहुँच गया।
“अरे, भाग कहाँ रहा है?” कह अपने दोनों हाथ बढ़ा दिए। छोकरा पत्ते की तरह काँपता रहा, पर मन मजबूत कर अंडा उस पर फेंक दिया। अंडा फटा, एक नदी बह चली। सिर कटे साँप की तरह का बहाव। पेड़ नदी में उतरा। पर धारा का जोर न सह कुछ दूर बह गया। मुश्किल से जमीन पर टिका। तब तक लड़का आधा कोस बढ़ गया। पेड़ फिर भागने लगा।
पेड़ ने कहा, “अब जाएगा कहाँ?” कसकर पकड़ा। पकड़ते ही सींक फेंक दी। देखते-ही-देखते एक बाँस का झुरमुट काँटों का हो गया। यों घना बाँस का वन हो गया। पार जाने को रास्ता नहीं। पेड़ जितना तोड़ रहा, वन घना हो रहा। देखते-ही-देखते आग लग गई। जल गया। उसके साथ वह पेड़ भी जल गया।
लड़के ने चैन की साँस ली।
सोचा, अब किधर जाऊँ? जिस बाप ने एक खाट पर सोने के लिए मौत के मुँह में भेज दिया, वह कैसा बाप है? अब जन्मस्थान पर पाँव न रखूँ। सीधे चल पड़ा। चलते-चलते एक बूढ़ी के द्वार पर जा पहुँचा। काली स्याह बूढ़ी। सिर के बाल जूट हो गए। मूली-से एक-दो दाँत हैं। लड़के ने बूढ़ी को नमस्कार किया। बूढ़ी बोली—
“साँझ को खिल सुबह जा।
तोरई फूल-सी आयु पा॥”
बूढ़ी ने बढ़ई के बेटे से सारी बात सुनी। सोचने लगी—जो हो, आहार द्वार पर आ गया। कहा, “बेटे, मेरे घर रह। मेरा कहीं कोई नहीं। मेरे मरे मुँह में आग देना।”
लड़के को शक हुआ। ये वन में अकेली, कोई नहीं। गुजारा कैसे हो?
चारों ओर देखा—आदमी की हिड्डयाँ, जानवरों, गाय-गोरु की हिड्डयाँ, पहाड़-सा ढेर है।
“पोखर जाकर आता हूँ।” कहकर भाग आया।
घड़ी-पहर बीता। न लौटा। अब बच्चों के नाम लेकर पुकारा—
“अरे, बिचकिया, किरकिटया, घूमसा, ढूमढामा, घड़चा, चपटखना, भुड़भुखा! सब कहाँ गए? सातों पता नहीं कितनी दूर गए हैं? बूढ़ी की पुकार न सुनी।
खाती के लड़के को जब से देखा, तब से बूढ़ी के मुँह से लार बह रही है। कितना कोमल-नरम मांस। बूढ़ी को कुछ भी न सूझा। घर में आग लगा दी।
असुर सारे पहाड़ पर रहते। घर जलता देख दौड़े। थूक-थूककर आग बुझा दी। माँ को पूछा, “आग कैसे लगी, किस ने लगाई, बता?” बूढ़ी ने सारी बात कही।
असुर सारे गरज उठे।
आकाश में देखा, बढ़ई का बेटा दौड़ रहा। एक पेड़ पर चढ़ गया। पेड़ के नीचे पहुँचे असुर। डाल पर आकर एक चोट कर दी। यों एक-एक कर सातों को निपात कर डाला। वहाँ खून की नदी बह चली। हाथ-मुँह धोकर वह एक घर में घुसा। उनके घर में चूल्हा न जला। बात क्या? माली का घर।
बात क्या है? पता चला, कोई असुर आया है। सबको खा जाता, मगर राजा ने समझाया, “ऐसे तो एक दिन में खत्म हो जाएँगे। हम तुम्हें रोज एक-एक कर भेजेंगे।”
बस्ता भर चावल, एक सगड़ भर पिठऊ, भात, भेड़ या बकरी या सूअर, छेना, पना आदि। असुर खुश। राजा ने राज्य में
पारी बाँट दी। जिसकी जिस दिन पारी होती, सुबह ही ले वह पहुँचा देता।
उस दिन पारी माली की थी। घर-बार बेचे भी असुर का पेट न भर सके। गाड़ी भर पकाकर वहाँ कैसे भेजे, किसे भेजे, खुद जाए तो फिर बच्चे पलेंगे कैसे? चिंता में कोई रास्ता न था।
तभी खाती का लड़का पहुँचा। कहा साहस कर, “खाना दो। मैं निपट लूँगा।”
मालिन ने आव-भगत कर खाना खिलाया। खा-पीकर अब उससे आधी गाड़ी पत्थर, दो बस्ते कंकड़ ले पहुँचा।
असुर भूख में बेहाल। खाती के लड़के को देख कहा, “तुझे मेरा डर नहीं लगा? पहले तुझे खाता हूँ।”
लड़के ने कहा, “पीठा वगैरह बनाते-बनाते देर हो गई। पहले यह खा लो। फिर मुझे खा लेना।” ऐसा कह एक मोटा ढेला उस की ओर लुढ़का दिया।
भूख में व्याकुल। देखा नहीं। ढेला मुँह में ले लिया। दाँत कड़-कड़ कर टूट गए। खून बह चला। आँख से आग बरसी।
मुँह से बोल न निकले। उसने दो बोरा कंकड़ बढ़ा दिए। चने चबाओ। गरम हैं। असुर ने दो मुट्ठी कंकड़ चबाए, बाकी दाँत भी झर गए। खून और बढ़ गया। असुर की ताकत कम हुई, उठ भी न सका।
अब लड़के ने असुर की छाती पर चोट की। सिर कट गिर पड़ा। असुर के नख-दाँत ले आया।
इधर राजा ने घोषणा कर दी थी, जो असुर को मारे, आधा राज दूँगा। उसके संग राजकुमारी ब्याह दूँगा। खाती के लड़के ने नख-दाँत ले जाकर राजा को भेंट कर दिए। राजा का काँटा खत्म हो गया। राजा खुश। तुरंत राजकुमारी की शादी कर दी। आधा राज देकर राज्याभिषेक कर दिया।
सफलतम मैनेजर
कई साल पहले एक कॉर्पोरेट हाउस ने मैनेजमेंट गुरुओं का एक सम्मेलन कराया था.उसमें एक सवाल पूछा गया था.
आप सफलतम मैनेजर
किसे मानते हैं ? विशेषज्ञों ने ~रोनाल्ड रीगन से नेल्सन मंडेला तक,चर्चिल से गाँधी तक, टाटा से हेनरी फोर्ड तक,चाणक्य से बिस्मार्क तक इनके अलावा न जाने कितने और नाम सुझाये.लेकिन ज्यूरी ने कुछ और ही सोच रखा था.सही उत्तर था *★ ~ एक आम गृहिणी ~ ★*एक गृहिणी परिवार से किसी का ★ ट्राँसफर नहीं कर सकती. ★★ किसी को सस्पेंड नहीं कर सकती. ★किसी को ★ टर्मिनेट नहीं कर सकती. ★ और किसी को ★ अपॉइंट भी नहीं कर सकती. परन्तु फिर भी सबसे काम करवाने की◆ क्षमता रखती है.किससे क्या और कैसे कराना है,कब प्रेम के राग में
हौले से काम पिरोना है और कब 'राग सप्तक' पर उच्च स्वर में 'भैरवी सुना कर' जरूरी कामों को परिणाम तक पहुँचाना है.◆ उसे पता होता है. ◆मानव संसाधन प्रबंधन का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है ?बड़े बड़े उद्योगों में भी कभी-कभी इसलिए काम रुक जाता है क्योंकि जरूरी फ्यूल नहीं था, या कोई स्पेयर पार्ट उपलब्ध नहीं था, या रॉ मटेरियल कम पड़ गया. पर किसी गरीब से गरीब घर में भी नमक कम नहीं पड़ता.शायद बहुत याद करने पर भी आपको वह दिन याद न आ पाए,जिस दिन माँ आपको खाने में सिर्फ इसलिए कुछ नहीं दे पाई कि बनाने को कुछ नहीं था. या गैस खत्म हो गई थी, या कुकर का रिंग खराब हो गया था.हर कमोबेशी और समस्या का विकल्प◆ एक गृहिणी रखती है. ◆वो भी बिल्कुल खामोशी से.सामग्री एवं संसाधन प्रबंधन व संचालन का इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है ?काम वाली बाई का बच्चा दुर्घटना का शिकार हो जाता है.डॉक्टर बड़ा खर्च बता देता है,बाकी सब बगलें झाँकने लगते हैं.लेकिन वो फटाफट पुराने संदूकों में छुपा कर रखे बचत के पैसे निकालती है कुछ गहने गिरवी रखती है.कुछ घरों से सिर्फ साख के आधार पर उधार लेती है.लेकिन पैसे का इंतजाम कर ही लेती है.◆ संकट कालीन अर्थ प्रबंध का ◆इससे बेहतर उदाहरण और क्या हो सकता है ?निचले इलाकों में बेमौसम बारिश से घर में पानी भरने लगे या बिना खबर अचानक चार मेहमान आ जाएं सब के लिए ◆ आपदा प्रबंधन की योजना ◆उसके पास रहती है और इन सारे प्रबंधन के लिए उसके पास हैं, बस कुछ आँसू और कुछ मुस्कान लेकिन जो सबसे बड़ी चीज होती है, वो है ★ समर्पण और प्रेम सफल गृहिणी का सबसे बड़ा संबल होता है★ सब्र ★वही सब्र जिसके बारे में किसी ने बहुत सटीक कहा है सब्र का घूँट दूसरों को पिलाना कितना आसान लगता है. लेकिन जब ख़ुद पियो तो क़तरा-क़तरा ज़हर लगता है. ◆
*🌹🌸 ।। जय माता दी ।। *
भगवान का हौद*
प्राचीनकाल में एक परम शिवभक्त राजा था। एक दिन उसके मन में इच्छा हुई कि सोमवार के दिन अपने आराध्य भगवान शिव का हौद (वह भाग जहां जलहरी सहित पिण्डी स्थित होती है) दूध से लबालब भर दिया जाए.
जलहरी का हौद काफी चौड़ा और गहरा था राजा की आज्ञा से पूरे नगर में डुग्गी पिटवा दी गयी कि...
‘सोमवार के दिन सारे ग्वाले शहर का पूरा दूध लेकर शंकर जी के मन्दिर आ जाएं, भगवान का हौद भरना है; जो इसका उल्लंघन करेगा, वह कठोर दण्ड का भागी होगा।’
राजा की आज्ञा सुनकर सारे ग्वाले बहुत परेशान हुए किसी ने भी अपने बच्चों को दूध नहीं पिलाया और न ही गाय के बछड़ों को दूध पीने दिया.
दुधमुंहे बच्चे भूख से व्याकुल होने लगे सभी ग्वाले सारा दूध इकट्ठा कर मन्दिर पहुंचे और भगवान शंकर के हौद में दूध छोड़ दिया.
किन्तु आश्चर्य! इतने दूध से भी हौद पूरा न भर सका यह देखकर राजा बड़ी चिन्ता में पड़ गया.
तभी एक बुढ़िया एक लुटिया भर दूध लेकर आयी और बड़े भक्तिभाव से भगवान पर दूध चढ़ाते हुए बोली...
‘शहर भर के दूध के आगे मेरे लुटिया भर दूध की क्या बिसात! फिर भी भगवन्, मुझ बुढ़िया की श्रद्धा भरी ये दो बूंदें स्वीकार करो।’
जैसे ही बुढ़िया दूध चढ़ाकर मन्दिर से निकली, भगवान का हौद एकाएक दूध से भर गया।
वहां उपस्थित सभी लोग आश्चर्य में पड़ गए राजा के पास खबर पहुंची तो उसके भी आश्चर्य का ठिकाना न रहा.
अगले सोमवार को राजा ने फिर भगवान शिव का हौद दूध से भरने की आज्ञा दी
पूरे नगर का दूध भगवान शंकर के हौद में छोड़ा गया; परन्तु फिर से हौद खाली रह गया पहले की तरह बुढ़िया आई और उसने अपनी लुटिया का दूध हौद में छोड़ा और हौद भर गया.
राजकर्मचारियों ने जाकर राजा को सारा वृतान्त सुनाया राजा के आश्चर्य का ठिकाना न रहा उसने स्वयं वहां उपस्थित रहकर इस घटना के रहस्य का पता लगाने का निश्चय किया.
तीसरे सोमवार को राजा की उपस्थिति में नगर भर का दूध भगवान के हौद में डाला गया, पर हौद खाली रहा.
इसी बीच वह बुढ़िया आयी और उसके लुटिया भर दूध चढ़ाते ही हौद दूध से भर गया। पूजा करके बुढ़िया अपने घर को चल दी.
राजा उसका पीछा करने लगा। कुछ दूर जाने पर राजा ने बुढ़िया का हाथ पकड़ लिया।
बुढ़िया भय से थर-थर कांपने लगीं। राजा ने उसे अभय देते हुए कहा.. ‘माई! मेरी एक जिज्ञासा शान्त करो
तुम्हारे पास ऐसा कौन-सा जादू-टोना या मन्त्र है जिससे तुम्हारे लुटिया भर दूध चढ़ाते ही शंकरजी का हौद एकाएक भर जाता है।’
बुढ़िया ने कहा.. ‘मैं जादू-टोना, मन्त्र-तन्त्र कुछ भी नहीं जानती, न ही करती हूँ घर के बाल-बच्चों, ग्वालबालों सभी को दूध पिलाकर तृप्त कर बचे दूध में से एक लुटिया दूध लेकर आती हूँ, भगवान को चढ़ाते ही वे प्रसन्न हो जाते हैं.
भाव से उन्हें अर्पण करते ही वे उसे ग्रहण करते हैं और हौद भर जाता है.
किन्तु तुम दण्ड का भय दिखाकर जबरन नगर के सारे बाल बच्चों, बूढ़ों व ग्वालबालों का पेट काटकर उन्हें भूख से तड़पता छोड़कर सारा दूध अपने कब्जे में करते हो...
और फिर उसे भगवान को चढ़ाते हो तो उनकी आह से भगवान उसे ग्रहण नहीं करते और उतने सारे दूध से भी भगवान का पेट नहीं भरता और हौद खाली रह जाता है।
राजा को अपनी भूल समझ में आ गई और आगे से उसने किसी को भी कष्ट पहुंचाने वाली हरकतें न करने की कसम खाली...
*पूजनकर्म करते समय रखें इस बात का ध्यान..*
‘मेरे पास जो कुछ है, वह सब उस परमात्मा का ही है, मुझे तो केवल निमित्त बनकर उनकी दी हुई शक्ति से उनका पूजन करना है’....
इस भाव से जो कुछ किया जाए वह सब-का-सब परमात्मा का पूजन हो जाता है.
इसके विपरीत मनुष्य जिन वस्तुओं को अपना मानकर भगवान का पूजन करता है, वे (अपवित्र भावना के कारण) पूजन से वंचित रह जाती है.
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li.ठगों-से-ठगी.li
एक गरीब किसान था । वह घास -फूस की छोपड़ी में रहता था । उसे सभी कुणनेटी के नाम से पुकारते थे । कुणनेटी बूढ़ा होकर मर गया । उसके बाद घर की सारी जिम्मेदारी उसके इकलौते लड़के फगुणू पर आ गई थी । फगुणू को सभी कुणनेटी का छोरा नाम से पुकारने लगे ।
एक बार फगुणू की भेंट राजदरबार में काम करने वाले ठेकेदार से हो गई । उसने फगुणू को मजदूरी पर लगा दिया । काफी दिन मजदूरी करने के बाद ठेकेदार ने उसे एक सौ लाल (तत्कालीन प्रचलित सिक्के) और एक घोड़ा दिया । घोड़े पर सवार होकर फगुणू घर जा रहा था । वह थक गया था । उसने घोड़े से उतरकर पीपल की छांव में बैठने का निर्णय लिया । उसने देखा चार आदमी उसी की ओर आ रहे हैं । उनके रंग ढंग से फगुणू समझ गया कि वे ठग हैं । उनके पहुंचने से पहले फगुणू ने एक लाल घोड़े की पूंछ के नीचे छिपा दिए । जैसे ही वे ठग फगुणू नजदीक आए | फगुणू ने उनसे कहा, ‘‘ मामा! सेमान्या (सेवा मानो, आदरसूचक संबोधन) आपने मुझे पहचाना नहीं ? मैं आपका भांजा हूँ ।‘‘ उसने ठगों के सामने ही घोड़े की पूंछ पर हाथ फेरते हुए कहा,‘‘निकाल, घोड़ा! एक लाल । उसने पूंछ हटाई तो वह लाल नीचे गिर पड़ा । उस लाल को फगुणू ने उठा कर संभाल लिया । घोड़े को देखकर चोरों को लालच आ गया । उन्होंने फगुणू से कहा, ‘‘ भांजे! यह घोड़ा हमें बेच दो ।
‘‘मामा! तुम मुझे जान से मार दो किन्तु मैं यह घोड़ा नहीं बेच सकता ‘‘-फगुणू ने जवाब दिया।
‘‘तू हमारा भांजा है । हम तुझे क्यों मारेंगे ? मामाओं का ख्याल रखते हुए घोड़ा तो तुम्हें बेचना ही पड़ेगा ।‘‘- चारों एक साथ बोले ।
‘‘ठीक है, तुम कह रहे हो, इसलिए मैं घोड़ा बेचने को तैयार हूँ । ‘‘-फगुणू ने कहा।
फगुणू ने कई गुना दाम पर वह घोड़ा बेच दिया ।
जाते समय फगुणू ने उन चारों से कहा,‘‘ घोड़ा पालना काफी कठिन काम है । आप घोड़े को दाने के साथ काफी नमक खिलाएं पानी कम पिलाएं तथा तपती धूप में खड़ा रहने दें ।‘‘
वे ठग उस घोड़े को अपने घर ले गए । उन्होंने घोड़े को काफी नमक के साथ दाना खिलाया । पानी भी कम पिलाया । उन्होंने घोड़े को तपती धूप में बांधे रखा । कुछ देर में घोड़ा मर गया ।
वे ठग दूसरे दिन गुस्से में फगुणू के घर आ गए । उन्होंने घोड़े के मरने का समाचार फगुणू को सुनाया । फगुणू ने बेहोश पड़ने का नाटक किया । आधे घण्टे के बाद वह उठा । उसने ठगों से कहा, ‘‘ कहीं तुमने घोड़े को दाना के साथ अधिक नमक तो नहीं खिलाया ? कहीं तपती धूप में तो नहीं रखा ? ‘‘
ठगों ने कहा,‘‘ हॉ , हमने ऐसा ही किया था । तुमने भी तो हमें ऐसा करने के लिए कहा था ।‘‘
‘‘ नहीं मैंने तुम्हें ऐसा करने के लिए मना किया था । तुमने मेरी बात को ठीक से नहीं समझा।‘‘- रोते -रोते फगुणू बोला ।
चारों ठग फगुणू के घर से वापस लौट आए । उन्होंने आपस में विचार विमर्श किया कि फगुणू को फिर कभी बुरी तरह ठग लेंगे ।
एक दिन फगुणू लकड़ी लेने जंगल गया । उसे वहां दो तितराले (एक प्रकार का जंगली जीव ) दिखाई दिए । वह उन तितरालों को अपने घर ले आया । दूसरे दिन उसने एक तितराला अपने घर में ही बांध दिया । वह अपनी मॉ से बोला, ‘‘ माँ ! आज घर में बहुत अच्छा खाना बनाना । मैं उन चारों ठगों को खाने पर बुलाऊंगा ।‘‘ दूसरे दिन एक तितराले को अपने साथ लेकर फगुणू उसी रास्ते पर चल पड़ा जिस रास्ते वे चार ठग आते थे । रास्ते में उनकी भेंट फगुणू से हो गई । फगुणू ने उन्हें अपने घर आने का न्यौता दिया । वे राजी हो गए। फगुणू ने अपने साथ लाए तितराले से कहा, ‘‘ जाओ, मेरे घर जाओ । मेरी माँ से कहना मेरे घर पहुंचने तक बारह व्यंजन, छत्तीस प्रकार बनाना । मेरे साथ मेरे चार मामा भी आएंगे । ‘‘- यह कहकर उसने तितराले की रस्सी खोली और उसे छोड़ दिया ।
चारों ठग जब फगुणू के साथ उसके घर पहुंचे तो उनकी नजर वहाँ बंधे तितराले पर पड़ी । उनको आश्चर्य हुआ । घर पर बंधे तितराले का रंग भी वही था जो ठगों ने जंगल में देखा था। उन्होंने घर में बंधे तितराला को वही तितराला समझा जिसके पास फगुणू ने अपनी माँ के लिए संदेश भेजा था । फगुणू ने अपनी माँ को सुबह घर से निकलने से पहले ही सब बता रखा था । फगुणू ने तितराले को पुचकारते हुए कहा, ‘‘शाबाश! तूने हमारा समय बचा दिया । माँ को मामा लोगों के लिए भी खाना बनाने के लिए समय पर बता दिया ।‘‘
पहले फगुणू ने चारों ठगों को खाना खिलवाया । उनके खाने के बाद वह भी खाने पर बैठ गया । उसने अपनी माँ से कहा,‘‘ मेरे लिए घी कहाँ है ?
उसकी माँ गुस्सा जताते हुए बोली, ‘‘घ्यू न स्यू, खा मेरु ज्यू ( घी नहीं है। इसके बदले मेरा जी (हृदय) को खा ।‘‘ यह सुनते ही फगुणू ने उन चारों ठगों के सामने गुस्सा दिखाते हुए अपनी माँ के गले के नीचे चाकू से वार किया । वहाँ पर खून ही खून हो गया । उसकी माँ वहीं रसोईघर में गिर पड़ी । फगणू ने अपनी माँ के गले के नीचे एक थैली पर बकरे का खून भरा हुआ था । इसी थैली पर उसने चाकू से वार किया था । ठगों ने समझा फगणू ने अपनी माँ को मार दिया है।
‘‘भांजे! यह तुमने क्या किया ? तुमने हमारी बहिन को मार दिया‘‘- एक ठग बोला ।
‘‘मामा जी! जब भी मुझे गुस्सा आता है, मैं ऐसा ही करता हूँ । आप चिन्ता मत करो । मैं अभी माँ को ठीक कर देता हूँ ।‘‘
यह कहकर फगुणू ने अपने हाथ में कुछ चावल और काली दाल के बीज लिए । उसने इन्हें हाथ में लेकर उसने अपनी माँ पर जोर से मारा । मुँह के अन्दर वह कुछ बुदबुदाया । कुछ देर बाद उसकी माँ उठकर खड़ी हो गई । यह देखकर ठगों को आश्चर्य हुआ । जाते समय ठग फगुणू से बोले, ‘‘ भांजे! आज के बाद हम तुमसे न तो कुछ मांगेगे और न खरीदेंगे लेकिन आज तुम्हें दो चीजें तो हमें देनी ही पड़ेंगी । ‘‘
‘‘क्या ?‘‘- फगु
‘‘एक तो तितराले को बेचना होगा। दूसरा हमें भी वह तरीका बताना होगा जिससे तुमने अपनी माँ को मारकर जिन्दा किया ।‘‘- ठगों ने कहा ।
‘‘ठीक है। मामाओं की बात कैसे टाली जा सकती है ?‘‘- यह कहकर उसने एक कागज पर ‘अकणम-बकणम-जकणम जा, जा जा जा सकणम पा‘ लिखकर उन्हें दे दिया और कहा-‘‘यही वह मंत्र है जिससे आदमी को मारकर फिर से जीवित किया जा सकता है ।‘‘
फगुणू ने उन ठगों को वह तितराला भारी कीमत में बेच दिया ।
रास्ते में ठगों ने तितराला से कहा,‘‘ हमारे घर जाओ । हमारी पत्नियों से कहो कि घर पहुंचने से पहले हमारे लिए खाना बनाकर रखें । यह कहकर उन्होंने तितराला को छोड़ दिया । तितराला जंगल में चला गया । जब वे ठग घर पहुंचे तो वहाँ कोई तितराला नहीं था । उन्हें जोर की भूख लगी हुई थी । उनकी पत्नियों ने खाना भी तैयार नहीं किया था । उन्होंने समझा कि तितराला उनके घर तक पहुंचा होगा किन्तु उनकी पत्नियों की लापरवाही से वह भाग गया होगा ।
उन्होंने गुस्से में आकर चाकू से अपनी अपनी पत्नियों के गले के नीचे वार कर दिया । उनकी पत्नियां मर गई । उन्होंने दाल और चावल के दाने हाथ में लेकर फगुणू के दिए मंत्र को पढ़ डाला पर उनकी पत्नियां जीवित नहीं हुई ।
पत्नियों की मौत से ठगों को बहुत दुख हुआ । उन्हें फगुणू पर बहुत गुस्सा आया । वे फगुणू को जान से मारने के इरादे से उसके घर पहुंच गए । फगुणू के घर पहुंचने पर ठगों ने उसकी माँ को फूट फूट कर रोते हुए देखा । वह अपना माथा पीटकर कह रही थी, ‘‘ हाय! क्या करूं ? मेरा बेटा मर गया है । देखो ,उस पर मक्खियां भिनभिना रही हैं ।‘‘
ठगों ने देखा । उनका गुस्सा उतर गया । फगुणू मरा नहीं था, उसने अपने शरीर पर गुड़ का लेप किया था । इसलिए मक्खियां भिनभिना रही थी । ठगों ने समझा कि फगुणू मर गया है । वे खुश हो गए । वे फगुणू की माँ से बोले,‘‘ बहिन ! जो होना था वह हो गया । अब हमें भांजे का खटुला (अर्थी) तैयार करना होगा ।
‘‘ हमारे गाँव का विधान है कि खटुला माँ को ही तैयार करना पड़ता है ।‘‘- यह कहकर फगुणू की माँ ने खटुला तैयार किया । उसने इसमें फगुणू को लिटा लिया । खटुला इस ढंग से बांधा जिससे वह आसानी से खुल भी सके । फगुणू के खटुले को श्मशान घाट ले जाने से पहले उसकी माँ ने उन ठगों को समझा दिया कि खटुले को यहां की रीति के अनुसार एक घण्टे तक धार में रखकर फिर वापस घर आना पड़ता है । इसके बाद श्मशान घाट में पूरे खटुले को गाड (नदी) में बहाया जाता है ।
फगुणू का मकान बस्ती से दूर निर्जन स्थान पर था । इसलिए वे चार ठग ही फगुणू के खटुले को ले गए । उन्होंने उसे धार में छोड़ दिया और फगुणू के घर वापस आ गए ।
धार में जहाँ पर फगुणू का खटुला रखा हुआ था, वहाँ से एक ग्वाला गुजर रहा था । फगुणू ने उससे कहा, ‘‘ दोस्त! कुछ लोगों ने मुझे जबरदस्ती इस खटुले में बांध लिया है । मुझे खोल दो ।‘‘
उस ग्वाले ने फगुणू को बंधनमुक्त कर दिया । फगुणू ने उस खटुले में अपने ही आकार का पहले से तैयार एक पुतला रख दिया । वह पास के उड्यार ( गुफा) में छिप गया ।
थोड़ी देर में वहाँ चारों ठग पहुंचे । वे खटुले को कंधे में लादकर श्मशान घाट ले गए । वहाँ उन्होंने खटुले को गाड में बहा दिया । वे खुशी खुशी वापस फगुणू के घर आने लगे । जब वे फगुणू के घर पहुंचे तो उन्होंने फगुणू को घर में हुक्का पीते हुए देखा । वे आश्चर्य से बोले,‘‘ भांजे! तुम जिन्दा हो ? ‘‘
‘‘ मामा जी! तुम मेरे खटुले को नदी में बहाकर अभी आ रहे हो । मैं जिन्दा कैसे हूँ ? यह गुप्त रहस्य मैं तुम्हें इसलिए बता रहा हूँ कि तुम मेरे मामा हो । जब तुमने मुझे खटुले सहित गाड में बहाया तो थोड़ी देर बाद किसी और आदमी ने नदी में छलांग लगा दी थी । जब कोई आदमी चाहे वह जिन्दा हो या मरा, खटुले सहित नदी में बहाया जाए और इसके तुरंत बाद यदि कोई गाड में छलांग मारे तो मरा हुआ आदमी जिन्दा हो जाता है । छलांग लगाने वाली की भी उम्र दो गुनी हो जाती है । अगर उसकी पत्नी मरी हो तो वह भी जीवित हो जाती है । ‘‘- फगुणू ने ठगों को समझाया ।
ठग फगुणू के घर से वापस चले गए । उन्होंने तय किया कि चार ठगों में से दो ठगों का खटुला तैयार किया जाएगा । शेष दो ठग गाड में छलांग लगाएंगे । इससे उनकी आयु भी दो गुनी हो जाएगी और उनकी पत्नियां भी जीवित हो जाएंगी । ठगों ने ऐसा ही किया । वे पानी में डूबकर मर गए । जब ठगों के मरने का समाचार राजा को मिला तो वह बहुत प्रसन्न हुआ । राजा की कोई संतान नहीं थी । राजा ने फगुणू को अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया । वह अपनी माँ के साथ सुखपूर्वक राजमहल में रहने लगा ।
,*कर्ज वाली लक्ष्मी*
एक 15 साल का भाई अपने पापा से कहा "पापा पापा दीदी के होने वाले ससुर और सास कल आ रहे है" अभी जीजाजी ने फोन पर बताया।
दीदी मतलब उसकी बड़ी बहन की सगाई कुछ दिन पहले एक अच्छे घर में तय हुई थी।
दीनदयाल जी पहले से ही उदास बैठे थे धीरे से बोले...
हां बेटा.. उनका कल ही फोन आया था कि वो एक दो दिन में दहेज की बात करने आ रहे हैं.. बोले... दहेज के बारे में आप से ज़रूरी बात करनी है..
बड़ी मुश्किल से यह अच्छा लड़का मिला था.. कल को उनकी दहेज की मांग इतनी ज़्यादा हो कि मैं पूरी नही कर पाया तो ?"
कहते कहते उनकी आँखें भर आयीं..
घर के प्रत्येक सदस्य के मन व चेहरे पर चिंता की लकीरें साफ दिखाई दे रही थी...लड़की भी उदास हो गयी...
खैर..
अगले दिन समधी समधिन आए.. उनकी खूब आवभगत की गयी.
कुछ देर बैठने के बाद लड़के के पिता ने लड़की के पिता से कहा" दीनदयाल जी अब काम की बात हो जाए..
दीनदयाल जी की धड़कन बढ़ गयी.. बोले.. हां हां.. समधी जी.. जो आप हुकुम करें..
लड़के के पिताजी ने धीरे से अपनी कुर्सी दीनदयाल जी और खिसकाई ओर धीरे से उनके कान में बोले. दीनदयाल जी मुझे दहेज के बारे बात करनी है!...
दीनदयाल जी हाथ जोड़ते हुये आँखों में पानी लिए हुए बोले बताईए समधी जी....जो आप को उचित लगे.. मैं पूरी कोशिश करूंगा..
समधी जी ने धीरे से दीनदयाल जी का हाथ अपने हाथों से दबाते हुये बस इतना ही कहा.....
आप कन्यादान में कुछ भी देगें या ना भी देंगे... थोड़ा देंगे या ज़्यादा देंगे.. मुझे सब स्वीकार है... पर कर्ज लेकर आप एक रुपया भी दहेज मत देना.. वो मुझे स्वीकार नहीं..
क्योकि जो बेटी अपने बाप को कर्ज में डुबो दे वैसी "कर्ज वाली लक्ष्मी" मुझे स्वीकार नही...
मुझे बिना कर्ज वाली बहू ही चाहिए.. जो मेरे यहाँ आकर मेरी सम्पति को दो गुना कर देगी..
दीनदयाल जी हैरान हो गए.. उनसे गले मिलकर बोले.. समधी जी बिल्कुल ऐसा ही होगा..
*शिक्षा-*
"कर्ज वाली लक्ष्मी ना कोई विदा करें नही कोई स्वीकार करे .."
*पुण्य लाभ के लिए इस पोस्ट को कृपया औरो को भी अवश्य भेजिए*
💐ना तीन में, ना तेरह में💐
एक नगर सेठ थे। अपनी पदवी के अनुरुप वे अथाह दौलत के स्वामी थे। घर, बंगला, नौकर-चाकर थे। एक चतुर मुनीम भी थे जो सारा कारोबार संभाले रहते थे।
किसी समारोह में नगर सेठ की मुलाकात नगर-वधु से हो गई। नगर-वधु यानी शहर की सबसे खूबसूरत वेश्या। अपने पेशे की जरुरत के मुताबिक नगर-वधु ने मालदार व्यक्ति जानकर नगर सेठ के प्रति सम्मान प्रदर्शित किया। फिर उन्हें अपने घर पर भी आमंत्रित किया।
सम्मान से अभिभूत सेठ, दूसरे-तीसरे दिन नगर-वधु के घर जा पहुँचे। नगर-वधु ने आतिथ्य में कोई कमी नहीं छोड़ी। खूब आवभगत की और यकीन दिला दिया कि वह सेठ से बेइंतहा प्रेम करने लगी है।
अब नगर-सेठ जब-तब नगर-वधु के ठौर पर नजर आने लगे। शामें अक्सर वहीं गुजरने लगीं। नगर भर में खबर फैल गई। काम-धंधे पर असर होने लगा। मुनीम की नजरें इस पर टेढ़ी होने लगीं।
एक दिन सेठ को बुखार आ गया। तबियत कुछ ज्यादा बिगड़ गई। कई दिनों तक बिस्तर से नहीं उठ सके। इसी बीच नगर-वधु का जन्मदिन आया। सेठ ने मुनीम को बुलाया और आदेश दिया कि एक हीरों जड़ा नौलखा हार खरीदा जाए और नगर-वधु को उनकी ओर से भिजवा दिया जाए। निर्देश हुए कि मुनीम खुद उपहार लेकर जाएँ।
मुनीम तो मुनीम था। खानदानी मुनीम। उसकी निष्ठा सिर्फ सेठ के प्रति भर नहीं थी। उसके पूरे परिवार और काम धंधे के प्रति भी थी। उसने सेठ को समझाया कि वे भूल कर रहे हैं। मुनीम ने बताने की कोशिश कि वेश्या किसी व्यक्ति से प्रेम नहीं करती, पैसों से करती है।
मुनीम ने उदाहरण देकर समझाया कि नगर-सेठ जैसे कई लोग प्रेम के भ्रम में वहाँ मंडराते रहते हैं।
लेकिन सेठ को ना समझ में आना था, ना आया। सेठ ने सख्ती से कहा कि मुनीम नगर-वधु के पास तोहफा पहुँचा आएँ।
मुनीम क्या करते !! एक हीरों जड़ा नौलखा हार खरीदा और नगर-वधु के घर की ओर चल पड़े। लेकिन रास्ते भर वे इस समस्या को निपटाने का उपाय भी सोचते रहे।
नगर-वधु के घर पहुँचे तो नौलखा हार का डब्बा खोलते हुए कहा, “यह तोहफा उसकी ओर से जिससे तुम सबसे अधिक प्रेम करती हो।”
नगर-वधु ने फटाफट तीन नाम गिना दिए। मुनीम को आश्चर्य नहीं हुआ कि उन तीन नामों में सेठ का नाम नहीं था। निर्विकार भाव से उन्होंने कहा, “देवी, इन तीन में तो उन महानुभाव का नाम नहीं है जिन्होंने यह उपहार भिजवाया है।”
नगर-वधु की मुस्कान गायब हो गई। सामने चमचमाता नौलखा हार था और उससे भारी भूल हो गई थी। उसे उपहार हाथ से जाता हुआ दिखा। उसने फौरन तेरह नाम गिनवा दिए।
तेरह नाम में भी सेठ का नाम नहीं था। लेकिन इस बार मुनीम का चेहरा तमतमा गया। ग़ुस्से से उन्होंने नौलखा हार का डब्बा उठाया और खट से उसे बंद करके उठ गए। नगर-वधु गिड़गिड़ाने लगी। उसने कहा कि उससे भूल हो गई है। लेकिन मुनीम चल पड़े।
बीमार सेठ सिरहाने से टिके मुनीम के आने की प्रतीक्षा ही कर रहे थे। नगर-वधु के उत्तर की प्रतीक्षा कर रहे थे।
मुनीम पहुचे और हार का डब्बा सेठ के सामने पटकते हुए कहा, “लो, अपना नौलखा हार, न तुम तीन में न तेरह में। यूँ ही प्रेम का भ्रम पाले बैठे हो।”
सेठ की आँखें खुल गई थीं। इसके बाद वे कभी नगर-वधु के दर पर नहीं दिखाई पड़े।
प्रार्थना नष्ट नहीं होती। उपयुक्त समय पर क्रियान्वित होती हैं। ईश्वर सदैव आपको सपरिवार स्वस्थ व सुखी रखें।
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((( सरकारी विद्यालय की )))
((( शिक्षा व्यवस्था )))
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आज विद्यालय में बहुत चहल-पहल है.सब कुछ साफ-सुथरा ठीक-ठाक ढंग से सुना है ... निरीक्षण के लिये कोई साहब आने वाले हैं.
❗पूरा विद्यालय चकाचक ❗
नियत समय पर साहब विद्यालय पहुँचे.ठिगना कद, रौबदार चेहरा, और आँखें ... ...ऐसी ..भजैसे जीते जी पोस्टमार्टम कर दें. पूरे परिसर के निरीक्षण के बाद ...उन्होंने कक्षाओं का रुख किया.कक्षा पाँच के एक विद्यार्थी को उठाकर पूछा ~ बताओ देश का प्रधान मंत्री कौन है बच्चा बोला ~ जी ... रामलाल साहब ने फिर पूछा ~ बेटा ! प्रधान मंत्री बच्चे ने वही जवाब दिया ~ रामलाल अब साहब गुस्साए ~ अबे तुझे कक्षा पाँच में किसने पहुँचाया ? पता है .मैं तेरा नाम काट सकता हूँ. बच्चा ~ कैसे काटोगे ?मेरा तो नाम ही नहीं लिखा है.
मैं तो बाहर बकरी चरा रहा था.
इस मास्टर ने कहा ~कक्षा में बैठ जा दस रूपये मिलेंगे. तू तो ये बता रूपये तू देगा या मास्टर ? साहब भुनभुनाते हुवे मास्टर जी के पास गए, और कड़क आवाज में पूछा ~क्या मजाक बना रखा है ?फर्जी बच्चे बैठा रखे हैं.
पता है मैं तुम्हें नौकरी से बर्खास्त कर सकता हूँ.
गुरूजी ~ कर दे भाई मैं कौन सा यहाँ का मास्टर हूँ.मास्टर तो मेरा पड़ौसी दुकानदार है.वो दुकान का सामान लेने शहर गया है. कह रहा था एक खूसट साहब आएगा, झेल लेना.अब तो साहब का गुस्सा .सातवें आसमान पर पैर पटकते हुए प्रधानाध्यापक के सामने जा पहुँचे
और चिल्लाकर बोले ~क्या अंधेरगर्दी है ? शर्म नहीं आती.क्या इसी के लिए तुम्हारे स्कूल को .सरकारी सहायता मिलती है ?
पता है ! मैं तुम्हारे स्कूल की
मान्यता समाप्त कर सकता हूँ.जवाब दो .. प्रिंसिपल साहब प्रिंसिपल ने दराज से एक सौ की गड्डी निकाल कर
मेज पर रखी और बोला ~ मैं कौन सा प्रिंसिपल हूँ.प्रिंसिपल तो मेरे चाचा हैं.प्रॉपर्टी डीलिंग भी करते हैं.आज एक सौदे का बयाना लेने ... शहर गए हैं. कह रहे थे एक कमबख्त निरीक्षण को आएगा. उसके मुँह पर ये गड्डी मारना,और बिदा करना.साहब ने मुस्कराते हुए . गड्डी जेब के हवाले करी और बोले आज बच गये तुम सब.अगर आज मामाजी को सड़क के ठेके के चक्कर में शहर न जाना होता, और अपनी जगह वो मुझे न भेजते, तो
तुम में से एक की भी नौकरी न बचती.
ब्यूरो चीफ/लखनऊ
कोमल
शवेता दर्पण समाचार पत्र
︷︵︷︵︷︵︷︵︷︵
*पत्नी का ख़ौफ़*
︶︸︶︸︶︸︶︸︶︸︶
मैं ऑफिस पहुँचा ही था, कि
मेरी पत्नी का फोन आया,बोली ~ आज तारीख क्या है ? मैं घबराते हुए बोला 27 अगस्त उसने फोन काट दिया.अब मैं काफी डर रहा था, और सोचने लगा ~ उसका जन्मदिन ? नहीं मेरा जन्मदिन ? नहीं हमारी सालगिरह नहीं .बच्चों के जन्मदिन नहीं .सास ससुर का जन्मदिन ? नहीं उनकी सालगिरह ? नहीं सिलेंडर बुकिंग ~ करवा चुका.डिस, मोबाइल, बिजली बिल, पेपर बिल, दूध बिल सभी का भुगतान ~ हो गया तो तारीख क्यों पूछी उसने मेरा लंच और शाम की चाय भी इसी सोच और भय में गुजरी.खैर मैं शाम को घर पहुँचा.मेरा लड़का बाहर ही मिल गया. मैंने उससे पूछा ~ घर का मौसम कैसा है ? बवंडर या सुनामी ? बेटे ने कहा ~ सब ठीक है पर आप क्यों पूछ रहे हो पापा ? मैंने कहा ~ सुबह तुम्हारी मम्मी ने आज की तारीख पूछी थी.लड़का मुस्कुराया और बोला~आज सुबह मैंने कैलेंडर में से कुछ पन्ने फाड़ लिए थे.शायद इसीलिए वो कन्फ्यूज् हो गई होगी यकीन मानिये ~एक शादीशुदा आदमी का जीवन दहशत से भरा
कोमल
शवेता दर्पण समाचार पत्र
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*पत्नी का ख़ौफ़*
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मैं ऑफिस पहुँचा ही था, कि
मेरी पत्नी का फोन आया,बोली ~ आज तारीख क्या है ? मैं घबराते हुए बोला 27 अगस्त उसने फोन काट दिया.अब मैं काफी डर रहा था, और सोचने लगा ~ उसका जन्मदिन ? नहीं मेरा जन्मदिन ? नहीं हमारी सालगिरह नहीं .बच्चों के जन्मदिन नहीं .सास ससुर का जन्मदिन ? नहीं उनकी सालगिरह ? नहीं सिलेंडर बुकिंग ~ करवा चुका.डिस, मोबाइल, बिजली बिल, पेपर बिल, दूध बिल सभी का भुगतान ~ हो गया तो तारीख क्यों पूछी उसने मेरा लंच और शाम की चाय भी इसी सोच और भय में गुजरी.खैर मैं शाम को घर पहुँचा.मेरा लड़का बाहर ही मिल गया. मैंने उससे पूछा ~ घर का मौसम कैसा है ? बवंडर या सुनामी ? बेटे ने कहा ~ सब ठीक है पर आप क्यों पूछ रहे हो पापा ? मैंने कहा ~ सुबह तुम्हारी मम्मी ने आज की तारीख पूछी थी.लड़का मुस्कुराया और बोला~आज सुबह मैंने कैलेंडर में से कुछ पन्ने फाड़ लिए थे.शायद इसीलिए वो कन्फ्यूज् हो गई होगी यकीन मानिये ~एक शादीशुदा आदमी का जीवन दहशत से भरा है.
*!! आशा !!*
एक राजा ने दो लोगों को मौत की सजा सुनाई। उसमें से एक यह जानता था कि राजा को अपने घोड़े से बहुत ज्यादा प्यार है।
उसने राजा से कहा कि यदि मेरी जान बख्श दी जाए तो मैं एक साल में उसके घोड़े को उड़ना सीखा दूँगा। यह सुनकर राजा खुश हो गया कि वह दुनिया के इकलौते उड़ने वाले घोड़े की सवारी कर सकता है।
दूसरे कैदी ने अपने मित्र की ओर अविश्वास की नजर से देखा और बोला, तुम जानते हो कि कोई भी घोड़ा उड़ नहीं सकता! तुमने इस तरह पागलपन की बात सोची भी कैसे? तुम तो अपनी मौत को एक साल के लिए टाल रहे हो।
शशश
पहला कैदी बोला, ऐसी बात नहीं है। मैंने दरअसल खुद को स्वतंत्रता के चार मौके दिए हैं
१. पहली बात राजा एक साल के भीतर मर सकता है!
२. दूसरी बात मैं मर सकता हूं!
३. तीसरी बात घोड़ा मर सकता है!
४. और चौथी बात… हो सकता है, मैं घोड़े को उड़ना सीखा दूं!!
_*शिक्षा-* बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी आशा नहीं छोड
एक राजा ने दो लोगों को मौत की सजा सुनाई। उसमें से एक यह जानता था कि राजा को अपने घोड़े से बहुत ज्यादा प्यार है।
उसने राजा से कहा कि यदि मेरी जान बख्श दी जाए तो मैं एक साल में उसके घोड़े को उड़ना सीखा दूँगा। यह सुनकर राजा खुश हो गया कि वह दुनिया के इकलौते उड़ने वाले घोड़े की सवारी कर सकता है।
दूसरे कैदी ने अपने मित्र की ओर अविश्वास की नजर से देखा और बोला, तुम जानते हो कि कोई भी घोड़ा उड़ नहीं सकता! तुमने इस तरह पागलपन की बात सोची भी कैसे? तुम तो अपनी मौत को एक साल के लिए टाल रहे हो।
पहला कैदी बोला, ऐसी बात नहीं है। मैंने दरअसल खुद को स्वतंत्रता के चार मौके दिए हैं
१. पहली बात राजा एक साल के भीतर मर सकता है!
२. दूसरी बात मैं मर सकता हूं!
३. तीसरी बात घोड़ा मर सकता है!
४. और चौथी बात… हो सकता है, मैं घोड़े को उड़ना सीखा दूं!!
_*शिक्षा-* बुरी से बुरी परिस्थितियों में भी आशा नहीं छोड़नी चाहिए।_
जीवन के सच्चे मूल्यों की याद
पत्नी की बहुत सीख देने वाली मर्मस्पर्शी कहानी पढ़िएगा जरूर
*पूरे चार महीने बाद वो शहर से कमाकर गाँव लौटा था। अम्मा उसे देखते ही चहकी...*
"आ गया मेरा लाल! कितना दुबला हो गया है रे! खाली पैसे बचाने के चक्कर में ढंग से खाता-पीता भी नहीं क्या!"
बारह घंटे की ड्यूटी है अम्मा, बैठकर थोड़े खाना है! ये लो, तुम्हारी मनपसंद मिठाई!"--कहकर उसने मिठाई का डिब्बा माँ को थमा दी!
"कितने की है?"
"साढ़े तीन सौ की!"
इस पैसे का फल नहीं खा सकता था! अब तो अंगूर का सीजन भी आ गया है!"--अम्मा ने उलाहना दिया।
पूरा दिन गाँव-घर से मिलने में बीत गया था! रात हुई, एकांत में उसने बैग खोलकर एक पैकेट निकाला और पत्नी की ओर बढ़ा दिया--
क्या है ये?"
चॉकलेट का डिब्बा, खास तुम्हारे लिए!"
"केवल मेरे लिए ही क्यों!"
अरे समझा करो। सबके लिए तो मिठाई लायी ही है!"
"कितने का है?"
"आठ सौ का!"
हांय!!"
"विदेशी ब्रांड है!"
"तो क्या हुआ!"
"तुम नहीं समझोगी! खाना, तब बताना!"
"पर घर में और लोग भी हैं। अम्मा, बाबूजी, तीन तीन भौजाइयां, भतीजे। सब खा लेते तो क्या हर्ज था!"
अरे पगली, बस चार पीस ही है इसमें, सबके लिए कहाँ से लाता!"
तो तोड़कर खा लेते!"
"और तुम!"
"बहुत मानते हैं मुझे?"
"ये भी कोई कहने की चीज है!"
"आह! कितनी भाग्यशाली हूँ मैं जो तुम मुझे मिले!"
उसकी आँखें चमक उठी--"मेरे जैसा पति बहुत भाग्य से मिलता है!"
सच है! लेकिन पता है, ये सौभाग्य मुझे किसने दिया है?"
"किसने?"
"तुम्हारी अम्मा और बाबूजी ने! उन्होंने ही तुम्हारे जैसा हट्टा-कट्टा, सुंदर और प्यार करने वाला पति मुझे दिया है! सोचो, तुम्हारे जन्म पर खुशी मनाने के लिए मैं नहीं थी, एक अबोध शिशु से जवान बनने तक, पढ़ाने-लिखाने और नौकरी लायक बनाने तक मैं नहीं थी। मैं तुम्हारे जीवन में आऊं, इस लायक भी उन्होंने ही तुम्हें बनाया!"
।"तुम आखिर कहना क्या चाहती हो?"
"यही कि ये पैकेट अब सुबह ही खुलेगा! एक माँ है, जो साढ़े तीन सौ की मिठाई पर भी इसलिए गुस्सा होती है कि उसके बेटे ने उन पैसों को अपने ऊपर खर्च नहीं किया! और वो बेटा आठ सौ का चॉकलेट चुपके से अपनी बीवी को दे, ये ठीक लग रहा है तुम्हें!"
वो चुप हो गया! पत्नी ने बोलना जारी रखा...
"अम्मा-बाबूजी और लोग गाँव में रहते हैं! तुम ही एकमात्र शहरी हो। बहुत सारी चीजें ऐसी होंगी, जो उन्हें इस जनम में नसीब तो क्या, उनका नाम भी सुनने को नहीं मिलेगा! भगवान ने तुम्हें ये सौभाग्य दिया है कि तुम उन्हें ऐसी अनसुनी-अनदेखी खुशियां दो! वैसे कल को हमारे भी बेटे होंगे! अगर यही सब वे करेंगे तो.......!"
अचानक उसे झटका लगा। चॉकलेट का डिब्बा वापस बैग में रख वो बिस्तर पर करवट बदल सुबकने लगा!
"क्या हुआ? बुरा लगा सुनकर!"
नही.....नही......
"मर्दों को रोना शोभा नहीं देता! खुद की खुशियों को पहचानना सीखो! जीवन का असल सुख परिजनों को खुश देखने में है! समझे पिया!
*शिक्षा:=*
यह कहानी हमें जीवन के सच्चे मूल्यों की याद दिलाती है। यह हमें समझाती है कि जीवन का असल सुख परिजनों को खुश देखने में है, न कि सिर्फ अपनी खुशियों में खो जाने में।
इस कहानी में पत्नी की बातें हमें कई महत्वपूर्ण सबक सिखाती हैं:
- परिवार के प्रति प्रेम और समर्पण।
- माता-पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता।
- जीवन की खुशियों को साझा करना।
- अपनों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना।
यह कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि जीवन में हमें अपनी प्राथमिकताओं को सही तरीके से निर्धारित करना चाहिए और अपने परिवार की खुशी को अपनी खुशी का आधार बनाना चाहिए।
*धन्यवाद इस अनमोल कहानी के लिए!ओम शांति।*
पत्नी की बहुत सीख देने वाली मर्मस्पर्शी कहानी पढ़िएगा जरूर
*पूरे चार महीने बाद वो शहर से कमाकर गाँव लौटा था। अम्मा उसे देखते ही चहकी...*
"आ गया मेरा लाल! कितना दुबला हो गया है रे! खाली पैसे बचाने के चक्कर में ढंग से खाता-पीता भी नहीं क्या!"
"बारह घंटे की ड्यूटी है अम्मा, बैठकर थोड़े खाना है! ये लो, तुम्हारी मनपसंद मिठाई!"--कहकर उसने मिठाई का डिब्बा माँ को थमा दी!
"कितने की है?"
"साढ़े तीन सौ की!"
"इस पैसे का फल नहीं खा सकता था! अब तो अंगूर का सीजन भी आ गया है!"--अम्मा ने उलाहना दिया।
पूरा दिन गाँव-घर से मिलने में बीत गया था! रात हुई, एकांत में उसने बैग खोलकर एक पैकेट निकाला और पत्नी की ओर बढ़ा दिया--
"क्या है ये?"
"चॉकलेट का डिब्बा, खास तुम्हारे लिए!"
"केवल मेरे लिए ही क्यों!"
"अरे समझा करो। सबके लिए तो मिठाई लायी ही है!"
"कितने का है?"
"आठ सौ का!"
"हांय!!"
"विदेशी ब्रांड है!"
"तो क्या हुआ!"
"तुम नहीं समझोगी! खाना, तब बताना!"
"पर घर में और लोग भी हैं। अम्मा, बाबूजी, तीन तीन भौजाइयां, भतीजे। सब खा लेते तो क्या हर्ज था!"
"अरे पगली, बस चार पीस ही है इसमें, सबके लिए कहाँ से लाता!"
"तो तोड़कर खा लेते!"
"और तुम!"
"बहुत मानते हैं मुझे?"
"ये भी कोई कहने की चीज है!"
"आह! कितनी भाग्यशाली हूँ मैं जो तुम मुझे मिले!"
उसकी आँखें चमक उठी--"मेरे जैसा पति बहुत भाग्य से मिलता है!"
"सच है! लेकिन पता है, ये सौभाग्य मुझे किसने दिया है?"
"किसने?"
"तुम्हारी अम्मा और बाबूजी ने! उन्होंने ही तुम्हारे जैसा हट्टा-कट्टा, सुंदर और प्यार करने वाला पति मुझे दिया है! सोचो, तुम्हारे जन्म पर खुशी मनाने के लिए मैं नहीं थी, एक अबोध शिशु से जवान बनने तक, पढ़ाने-लिखाने और नौकरी लायक बनाने तक मैं नहीं थी। मैं तुम्हारे जीवन में आऊं, इस लायक भी उन्होंने ही तुम्हें बनाया!"
"तुम आखिर कहना क्या चाहती हो?"
"यही कि ये पैकेट अब सुबह ही खुलेगा! एक माँ है, जो साढ़े तीन सौ की मिठाई पर भी इसलिए गुस्सा होती है कि उसके बेटे ने उन पैसों को अपने ऊपर खर्च नहीं किया! और वो बेटा आठ सौ का चॉकलेट चुपके से अपनी बीवी को दे, ये ठीक लग रहा है तुम्हें!"
वो चुप हो गया! पत्नी ने बोलना जारी रखा...
"अम्मा-बाबूजी और लोग गाँव में रहते हैं! तुम ही एकमात्र शहरी हो। बहुत सारी चीजें ऐसी होंगी, जो उन्हें इस जनम में नसीब तो क्या, उनका नाम भी सुनने को नहीं मिलेगा! भगवान ने तुम्हें ये सौभाग्य दिया है कि तुम उन्हें ऐसी अनसुनी-अनदेखी खुशियां दो! वैसे कल को हमारे भी बेटे होंगे! अगर यही सब वे करेंगे तो.......!"
अचानक उसे झटका लगा। चॉकलेट का डिब्बा वापस बैग में रख वो बिस्तर पर करवट बदल सुबकने लगा!
"क्या हुआ? बुरा लगा सुनकर!"
नही.....नही......
"मर्दों को रोना शोभा नहीं देता! खुद की खुशियों को पहचानना सीखो! जीवन का असल सुख परिजनों को खुश देखने में है! समझे पिया!
*शिक्षा:=*
यह कहानी हमें जीवन के सच्चे मूल्यों की याद दिलाती है। यह हमें समझाती है कि जीवन का असल सुख परिजनों को खुश देखने में है, न कि सिर्फ अपनी खुशियों में खो जाने में।
इस कहानी में पत्नी की बातें हमें कई महत्वपूर्ण सबक सिखाती हैं:
- परिवार के प्रति प्रेम और समर्पण।
- माता-पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता।
- जीवन की खुशियों को साझा करना।
- अपनों की खुशी में अपनी खुशी ढूंढना।
यह कहानी हमें यह भी याद दिलाती है कि जीवन में हमें अपनी प्राथमिकताओं को सही तरीके से निर्धारित करना चाहिए और अपने परिवार की खुशी को अपनी खुशी का आधार बनाना चाहिए।
*धन्यवाद इस अनमोल कहानी के लिए!ओम शांति।*
श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा
"अरे! भाई बुढापे का कोई ईलाज नहीं होता . अस्सी पार कर चुके हैं . अब बस सेवा कीजिये ." डाक्टर पिता जी को देखते हुए बोला .
"डाक्टर साहब ! कोई तो तरीका होगा . साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है ."
"शंकर बाबू ! मैं अपनी तरफ से दुआ ही कर सकता हूँ . बस आप इन्हें खुश रखिये . इस से बेहतर और कोई दवा नहीं है और इन्हें लिक्विड पिलाते रहिये जो इन्हें पसंद है ." डाक्टर अपना बैग सम्हालते हुए मुस्कुराया और बाहर निकल गया .
शंकर पिता को लेकर बहुत चिंतित था . उसे लगता ही नहीं था कि पिता के बिना भी कोई जीवन हो सकता है . माँ के जाने के बाद अब एकमात्र आशीर्वाद उन्ही का बचा था . उसे अपने बचपन और जवानी के सारे दिन याद आ रहे थे . कैसे पिता हर रोज कुछ न कुछ लेकर ही घर घुसते थे . बाहर हलकी-हलकी बारिश हो रही थी . ऐसा लगता था जैसे आसमान भी रो रहा हो . शंकर ने खुद को किसी तरह समेटा और पत्नी से बोला -
"सुशीला ! आज सबके लिए मूंग दाल के पकौड़े , हरी चटनी बनाओ . मैं बाहर से जलेबी लेकर आता हूँ ."
पत्नी ने दाल पहले ही भिगो रखी थी . वह भी अपने काम में लग गई . कुछ ही देर में रसोई से खुशबू आने लगी पकौड़ों की . शंकर भी जलेबियाँ ले आया था . वह जलेबी रसोई में रख पिता के पास बैठ गया . उनका हाथ अपने हाथ में लिया और उन्हें निहारते हुए बोला -
"बाबा ! आज आपकी पसंद की चीज लाया हूँ . थोड़ी जलेबी खायेंगे ."
पिता ने आँखे झपकाईं और हल्का सा मुस्कुरा दिए . वह अस्फुट आवाज में बोले -
"पकौड़े बन रहे हैं क्या ?"
"हाँ, बाबा ! आपकी पसंद की हर चीज अब मेरी भी पसंद है . अरे! सुषमा जरा पकौड़े और जलेबी तो लाओ ." शंकर ने आवाज लगाईं .
"लीजिये बाबू जी एक और . " उसने पकौड़ा हाथ में देते हुए कहा.
"बस ....अब पूरा हो गया . पेट भर गया . जरा सी जलेबी दे ." पिता बोले .
शंकर ने जलेबी का एक टुकड़ा हाथ में लेकर मुँह में डाल दिया . पिता उसे प्यार से देखते रहे .
"शंकर ! सदा खुश रहो बेटा. मेरा दाना पानी अब पूरा हुआ ." पिता बोले.
"बाबा ! आपको तो सेंचुरी लगानी है . आप मेरे तेंदुलकर हो ." आँखों में आंसू बहने लगे थे .
वह मुस्कुराए और बोले - "तेरी माँ पेवेलियन में इंतज़ार कर रही है . अगला मैच खेलना है . तेरा पोता बनकर आऊंगा , तब खूब खाऊंगा बेटा ."
पिता उसे देखते रहे . शंकर ने प्लेट उठाकर एक तरफ रख दी . मगर पिता उसे लगातार देखे जा रहे थे . आँख भी नहीं झपक रही थी . शंकर समझ गया कि यात्रा पूर्ण हुई .
तभी उसे ख्याल आया , पिता कहा करते थे -
"श्राद्ध खाने नहीं आऊंगा कौआ बनकर , जो खिलाना है अभी खिला दे ."
माँ बाप का सम्मान करें और उन्हें जीते जी खुश रखे।
मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l बेटी बनूं तो पिता की शान बन जाती हूं, बहन बनूं तो भाई का अभिमान बन जाती हूं l बीवी बनूं तो पति का भाग्य बन जाती हूं,मां बनूं तो बच्चों की ढाल बन जाती हूं l मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l होए जो पैसा पहन के गहने मैं बहुत इठलाती हूं, हालात ना हो तो दो जोड़ी कपड़े में ही अपना जीवन बिताती हूं l कभी तो अपनी हर बात में मनवा जाती हूं, तो कभी चुप घड़ी औरों की बात सुन जाती हूं l मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l कभी बनकर की लाडली मैं खूब खिलखिलाती हूं,तो कभी दरिंदों से अपना दामन बचाती हूं l कभी रख फूलों पर अपने कदम महारानी बन जाती हूं,तो कभी दे अग्नि परीक्षा अपना अस्तित्व बचा जाती हूं l मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l आए मौका खुशी का तो फूलों से नाजुक बन जाती हूं, आए जो दुखों का तूफान तो चट्टान बन अपनों को बचाती हूं l मिले जो मौका हर क्षेत्र पर अपना हुनर दिखलाती हूं, जो ना मिले मौका तो चारदीवारी में ही अपना जीवन बिताती हूं l मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l उड़ान भर्ती हूं तो चांद तक पहुंच जाती हूं, मौके पड़ने पर बेटों का फर्ज भी निभा जाती हूं lकरके नौकरी पिता का हाथ बताती हूं, दे कांधा उन्हें श्मशान भी पहुंचाती हूं मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं l आए जो भी चुनौती उसका डट के सामना कर जाती हूं,मिले जो प्यार तो घर को स्वर्ग सा सजाती हूं, हुए जो अत्याचार तो बन काली सर्वनाश कर जाती हूं l मैं कोई बोझ नहीं यह हर बार साबित कर जाती हूं l मैं एक नारी हूं, हर हाल में जीना जानती हूं
हार-जीत का फैसला*
〰️〰️〰️〰️
बहुत समय पहले की बात है। आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच सोलह दिन तक लगातार शास्त्रार्थ चला। शास्त्रार्थ में निर्णायक थीं- मंडन मिश्र की धर्म पत्नी देवी भारत
हार- जीत का निर्णय होना बाक़ी था, इसी बीच देवी भारती को किसी आवश्यक कार्य ससभी दर्शक हैरान हो गये कि बिना किसी आधार के इस विदुषी ने अपने पति को ह हार का नया रास्ता खोल देता है। क्रोध न सिर्फ हार का दरवाजा खोलता है बल्कि रिश्तों में दरार का कारण भी बनता है। इसलिये कभी भी अपने क्रोध के ताप से अपने फूल रूपी गुणों को मुरझाने मत दीजिये।
कोमल
शवेता दर्पण समाचापञ।
💐 सद्गुरु की कृपा 💐*
एक बार एक चोर ने गुरु से नाम ले लिया, और बोला गुरु जी चोरी तो मेरा काम है ये तो नहीं छूटेगी मेरे से..
अब गुरु जी बोले ठीक है मैं तुझे एक दूसरा काम देता हुँ, वो निभा लेना...बोले पराई इस्त्री को माता बहन समझना..चोर बोला ठीक है जी ये मैं निभा लूंगा।
एक राजा के कोई संतान नहीं थी तो उसने अपनी रानी को दुहागण कर रखा था
10-12 साल से बगल मे ही एक घर दे रखा उसमे रहती और साथ ही सिपाहियों को निगरानी रखने के लिए बोल दिया।
उसी चोर का उस रानी के घर मे चोरी के लिए जाना हुआ.. रानी ने देखा के चोर आया है।
उधर सिपाहियों ने भी देख लिया के कोई आदमी गया है रानी के पास...
राजा को बताया राजा बोला मैं छुप-छुप के देखूंगा... अब राजा छुप छुप के देखने लगा।
रानी बोली चोर को कि तुम किस पे आये हो..
चोर बोला ऊंट पे..
शवेता दर्पण समाचापञ।
💐 सद्गुरु की कृपा 💐*
एक बार एक चोर ने गुरु से नाम ले लिया, और बोला गुरु जी चोरी तो मेरा काम है ये तो नहीं छूटेगी मेरे से..
अब गुरु जी बोले ठीक है मैं तुझे एक दूसरा काम देता हुँ, वो निभा लेना...
बोले पराई इस्त्री को माता बहन समझना..
चोर बोला ठीक है जी ये मैं निभा लूंगा।
एक राजा के कोई संतान नहीं थी तो उसने अपनी रानी को दुहागण कर रखा था
10-12 साल से बगल मे ही एक घर दे रखा उसमे रहती और साथ ही सिपाहियों को निगरानी रखने के लिए बोल दिया।
उसी चोर का उस रानी के घर मे चोरी के लिए जाना हुआ.. रानी ने देखा के चोर आया है।
उधर सिपाहियों ने भी देख लिया के कोई आदमी गया है रानी के पास...
राजा को बताया राजा बोला मैं छुप-छुप के देखूंगा... अब राजा छुप छुप के देखने लगा।
रानी बोली चोर को कि तुम किस पे आये हो..
चोर बोला ऊंट पे..
शवेता दर्पण समाचापञ।
💐 सद्गुरु की कृपा 💐*
एक बार एक चोर ने गुरु से नाम ले लिया, और बोला गुरु जी चोरी तो मेरा काम है ये तो नहीं छूटेगी मेरे से..
अब गुरु जी बोले ठीक है मैं तुझे एक दूसरा काम देता हुँ, वो निभा लेना...
बोले पराई इस्त्री को माता बहन समझना..
चोर बोला ठीक है जी ये मैं निभा लूंगा।
एक राजा के कोई संतान नहीं थी तो उसने अपनी रानी को दुहागण कर रखा था
10-12 साल से बगल मे ही एक घर दे रखा उसमे रहती और साथ ही सिपाहियों को निगरानी रखने के लिए बोल दिया।
उसी चोर का उस रानी के घर मे चोरी के लिए जाना हुआ.. रानी ने देखा के चोर आया है।
उधर सिपाहियों ने भी देख लिया के कोई आदमी गया है रानी के पास...
राजा को बताया राजा बोला मैं छुप-छुप के देखूंगा... अब राजा छुप छुप के देखने लगा।
रानी बोली चोर को कि तुम किस पे आये हो..
चोर बोला ऊंट पे..
*🌹जिंदगी का सबक 🌹*
जीवन के 20 साल हवा की तरह उड़ गए । फिर शुरू हुई नोकरी की खोज । ये नहीं वो, दूर नहीं पास । ऐसा करते करते दो तीन नोकरियाँ छोड़ते एक तय हुई। थोड़ी स्थिरता की शुरुआत हुई।
फिर हाथ आया पहली तनख्वाह का चेक। वह बैंक में जमा हुआ और शुरू हुआ अकाउंट में जमा होने वाले शून्यों का अंतहीन खेल। दो तीन वर्ष और निकल गए। बैंक में थोड़े और शून्य बढ़ गए। उम्र पच्चीस हो गयी।
और फिर विवाह हो गया। जीवन की राम कहानी शुरू हो गयी। शुरू के एक दो साल गुलाबी , सपनीले गुजरे । हाथो में हाथ डालकर घूमना फिरना , रंग बिरंगे सपने। पर ये दिन जल्दी ही उड़ गए।
और फिर बच्चे के आने ही आहट हुई। वर्ष भर में पालना झूलने लगा। अब सारा ध्यान बच्चे पर केन्द्रित हो गया। उठना बैठना खाना पीना लाड दुलार।
समय कैसे फटाफट निकल गया, पता ही नहीं चला।
इस बीच कब मेरा हाथ उसके हाथ से निकल गया, बाते करना घूमना फिरना कब बंद हो गया दोनों को पता ही न चला।
बच्चा बड़ा होता गया। वो बच्चे में व्यस्त हो गयी , मैं अपने काम में । घर और गाडी की क़िस्त , बच्चे की जिम्मेदारी , शिक्षा और भविष्य की सुविधा और साथ ही बैंक में शुन्य बढाने की चिंता ! उसने भी अपने आप काम में पूरी तरह झोंक दिया और मैंने भी !
इतने में मैं पैंतीस का हो गया। घर , गाडी , बैंक में शुन्य , परिवार सब है फिर भी कुछ कमी है ? पर वो है क्या समझ नहीं आया। उसकी चिड चिड बढती गयी , मैं उदासीन होने लगा।
इस बीच दिन बीतते गए। समय गुजरता गया। बच्चा बड़ा होता गया। उसका खुद का संसार तैयार होता गया। कब दसवीं आई और चली गयी पता ही नहीं चला। तब तक हम दोनों ही चालीस बयालीस के हो गए। बैंक में शुन्य बढ़ता ही गया।
एक नितांत एकांत क्षण में मुझे वो गुजरे दिन याद आये और मौका देख कर उस से कहा " अरे जरा यहाँ आओ , पास बैठो। चलो हाथ में हाथ डालकर कही घूम के आते हैं।"
उसने अजीब नजरो से मुझे देखा और कहा कि "तुम्हे कुछ भी सूझता है यहाँ ढेर सारा काम पड़ा है तुम्हे बातो की सूझ रही है ।" कमर में पल्लू खोंस वो निकल गयी।
तो फिर आया पैंतालिसवा साल , आँखों पर चश्मा लग गया , बाल काला रंग छोड़ने लगे, दिमाग में कुछ उलझने शुरू हो गयी।
बेटा उधर कॉलेज में था , इधर बैंक में शुन्य बढ़ रहे थे। देखते ही देखते उसका कॉलेज ख़त्म। वह अपने पैरो पे खड़ा हो गया। उसके पंख फूटे और उड़ गया परदेश।
उसके बालो का काला रंग भी उड़ने लगा। कभी कभी दिमाग साथ छोड़ने लगा। उसे चश्मा भी लग गया। मैं खुद बुढा हो गया। वो भी उमरदराज लगने लगी।
दोनों पचपन से साठ की और बढ़ने लगे। बैंक के शून्यों की कोई खबर नहीं। बाहर आने जाने के कार्यक्रम बंद होने लगे।
अब तो गोली दवाइयों के दिन और समय निश्चित होने लगे। बच्चे बड़े होंगे तब हम साथ रहेंगे सोच कर लिया गया घर अब बोझ लगने लगा। बच्चे कब वापिस आयेंगे यही सोचते सोचते बाकी के दिन गुजरने लगे।
एक दिन यूँ ही सोफे पे बेठा ठंडी हवा का आनंद ले रहा था। वो दिया बाती कर रही थी। तभी फोन की घंटी बजी। लपक के फोन उठाया। दूसरी तरफ बेटा था। जिसने कहा कि उसने शादी कर ली और अब परदेश में ही रहेगा।
उसने ये भी कहा कि पिताजी आपके बैंक के शून्यों को किसी वृद्धाश्रम में दे देना। और आप भी वही रह लेना। कुछ और ओपचारिक बाते कह कर बेटे ने फोन रख दिया।
मैं पुन: सोफे पर आकर बेठ गया। उसकी भी दिया बाती ख़त्म होने को आई थी। मैंने उसे आवाज दी "चलो आज फिर हाथो में हाथ लेके बात करते हैं "
वो तुरंत बोली " अभी आई"
मुझे विश्वास नहीं हुआ। चेहरा ख़ुशी से चमक उठा।आँखे भर आई। आँखों से आंसू गिरने लगे और गाल भीग गए । अचानक आँखों की चमक फीकी पड़ गयी और मैं निस्तेज हो गया। हमेशा के लिए ! !!
उसने शेष पूजा की और मेरे पास आके बैठ गयी "बोलो क्या बोल रहे थे ?"
लेकिन मेने कुछ नहीं कहा। उसने मेरे शरीर को छू कर देखा। शरीर बिलकुल ठंडा पड गया था। मैं उसकी और एकटक देख रहा था।
क्षण भर को वो शून्य हो गयी।
" क्या करू ? "
उसे कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन एक दो मिनट में ही वो चेतन्य हो गयी। धीरे से उठी पूजा घर में गयी। एक अगरबत्ती की। इश्वर को प्रणाम किया। और फिर से आके सोफे पर बैठ गयी।
मेरा ठंडा हाथ अपने हाथो में लिया और बोली
"चलो कहाँ घुमने चलना है तुम्हे ? क्या बातें करनी हैं तुम्हे ?" बोलो !!
ऐसा कहते हुए उसकी आँखे भर आई !!......
वो एकटक मुझे देखती रही। आँखों से अश्रु धारा बह निकली। मेरा सर उसके कंधो पर गिर गया। ठंडी हवा का झोंका अब भी चल रहा था।
क्या ये ही जिन्दगी है ? नहीं ?
सब अपना नसीब साथ लेके आते हैं इसलिए कुछ समय अपने लिए भी निकालो । जीवन अपना है तो जीने के तरीके भी अपने रखो। शुरुआत आज से करो। क्यूंकि कल कभी नहीं आएगा।.....
*राधे राधे .* 🙏🙏
कान कटा गधा
(Without prejudice to any one's feelings)
एक बार की बात है शेर को भूख लगी तो उसने लोमड़ी से कहा - मेरे लिए कोई शिकार ढूंढकर लाओ अन्यथा मैं तुम्हें ही खा लोमड़ी एक गधे के पास गई और बोली - मेरे साथ शेर के समीप चलो क्योंकि वो तुम्हें जंगल का राजना चाहता है...गधा लोमड़ी के साथ चला गया शेर ने गधे को देखते ही उस पर हमला कर दिया और उसके कान काट लिए लेकिन गधा किसी प्रकार बच कर भागने में सफल रहा।तब गधे ने लोमड़ी से कहा - तुमने मुझे धोखा दिया शेर ने तो मुझे मारने का प्रयास किया और तुम कह रही थी कि वह मुझे जंगल का राजा बनायेगा...
लोमड़ी ने कहा - मूर्खता भरी बातें मत करो...
शेर ने तुम्हारे कान इसीलिए काट लिए ताकि तुम्हारे सिर पर ताज सुगमता पूर्वक पहनाया जा सके, समझे...
आओ चलो लौट चलें शेर के पास...
गधे को यह बात ठीक लगी, इसलिए वह पुनः लोमड़ी के साथ चला गया...
शेर ने फिर गधे पर हमला किया तथा इस बार उसकी पूँछ काट ली...
गधा फिर लोमड़ी से यह कहकर भाग चला - तुमने मुझसे फिर झूठ कहा, इस बार शेर ने तो मेरी पूँछ भी काट ली...
लोमड़ी ने कहा - शेर ने तो तुम्हारी पूँछ इसलिए काट ली ताकि तुम सिंहासन पर सहजता पूर्वक बैठ सको चलो पुनः उसके पास चलते हैं...
इस प्रकार लोमड़ी ने गधे को फिर से लौटने के लिए मना लिया...
इस बार सिंह गधे को पकड़ने में सफल रहा और उसे मार डाला...
शेर ने लोमड़ी से कहा - जाओ, इसकी चमड़ी उतार कर इसका दिमाग फेफड़ा और हृदय मेरे पास ले आओ और बचा हुआ अंश तुम खा लो...
लोमड़ी ने गधे की चमड़ी निकाली और गधे का दिमाग खा लिया और केवल फेफड़ा तथा हृदय सिंह के पास ले गई सिंह ने गुस्से में आकर पूछा - इसका दिमाग कहाँ गया
लोमड़ी ने जवाब दिया - महाराज इसके पास तो दिमाग था ही नहीं...
यदि इसके पास दिमाग होता तो क्या कान और पूँछ कटने के उपरान्त भी आपके पास यह पुनः वापस आता...
शेर बोला - हाँ, तुम पूर्णतया सत्य बोल रही हो...
यह कहानी हर उस छद्म हिंदू गधे की कहानी है जो 1000 वर्षों से अधिक समय से सभी हिंदुओं को खत्म करने के बारम्बार षड्यंत्र होने के बाद भी धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करता है...
यह कहानी हर उस छद्म हिंदू गधे की कहानी है जो सन् 1990 में कश्मीरी पंडितों का कत्लेआम चुका है और फिर भी धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करता है...
यह कहानी हर उस छद्म हिंदू गधे की कहानी है जो भारत के इन 7 राज्यों (लक्षद्वीप, जम्मू & कश्मीर, असम, पश्चिम बंगाल, केरल, उत्तर प्रदेश और बिहार) की तेजी से बदलती हुई डेमोग्राफी को अपनी खुली आंखों से देख रहा है किंतु फिर भी धर्मनिरपेक्षता में विश्वास करता है...?
*अविद्या*
_एक बार अकबर ने बीरबल से पूछा कि बीरबल, "यह अविद्या क्या है".... ?_
बीरबल ने बोला कि आप मुझे 4 दिन की छुट्टी दे दो फिर मैं आपको बताऊंगा !
अकबर राजी हो गया और उसने चार दिनों की छुट्टी दे दी !
*बीरबल मोची के पास गया* और बोला कि भाई जूती बना दो, मोची ने नाप पूछी तो बीरबल ने बोला भैया ये नाप वाप कुछ नहीं। डेढ़ फुट लंबी और एक बित्ता चौड़ी बना दो,और इसमें हीरे जवाहरात जड देना । सोने और चांदी के तारों से सिलाई कर देना और हाँ पैसे वैसे चिंता मत करना जितना मांगोगे उतना मिलेगा।
तो मोची ने भी कहा ठीक है भैया तीसरे दिन ले लेना !
*तीसरे दिन जूती मिली* तब पारितोषिक देने के पहले बीरबल ने उस मोची से एक ठोस आश्वासन ले लिया कि वह किसी भी हालात में इस जूती का कभी भी जिक्र नहीं करेगा यानि हर हालात में अनजान बना रहेगा ।
*अब बीरबल ने एक जूती* अपने पास रख ली और दूसरी मस्जिद में फेंक दी । जब सुबह मौलवी जी नमाज पढ़ने (बाँग देने ) के लिए मस्जिद गए तो मौलवी को वो जूती वहाँ पर मिली।
*मौलवी जी ने सोचा यह जूती* किसी इंसान की तो हो ही नहीं सकती जरूर अल्लाह मियां नमाज पढ़ने आये होंगे और उनकी छूट गई होगी....।
*तो उसने वह जूती अपने सर पर रखी, मत्थे में लगाई और खूब जूती को चाटा ।*
*क्यों ?*
_क्योंकि वह जूती अल्लाह की थी ना ।_
वहां मौजूद सभी लोगों को दिखाया सब लोग बोलने लगे कि हां"
भाई यह जूती तो अल्लाह की रह गई उन्होंने भी उसको सर पर रखा और खूब चाटा।
*यह बात अकबर तक गई।*
_अकबर ने बोला, मुझे भी दिखाओ ।_
अकबर ने देखा और बोला यह तो अल्लाह की ही जूती है।
*उसने भी उसे खूब चाटा, सर पर रखा और बोला इसे मस्जिद में ही अच्छी तरह अच्छे स्थान पर रख दो !*
बीरबल की छुट्टी समाप्त हुई, वह आया बादशाह को सलाम ठोका और उतरा हुआ मुंह लेकर खड़ा हो गया।
_अब अकबर ने बीरबल से पूछा कि क्या हो गया मुँह क्यों 10 कोने का बना रखा है।_
तो बीरबल ने कहा राजासाहब हमारे यहां चोरी हो गई ।
*अकबर बोला - क्या चोरी हो गया ?*
*बीरबल ने उत्तर दिया - हमारे परदादा की जूती थी चोर एक जूती उठा ले गया । एक बची हैः*
_अकबर ने पूछा कि क्या एक जूती तुम्हारे पास ही है ?_
*बीरबल ने कहा -* जी मेरे पास ही है । उसने वह जूती अकबर को दिखाई । अकबर का माथा ठनका और उसने मस्जिद से दूसरी जूती मंगाई और बोला *या अल्लाह मैंने तो सोचा कि यह जूती अल्लाह की है मैंने तो इसे चाट चाट के चिकनी बना डाली*
_बीरबल ने कहा :- राजा साहब यही है "*अविद्या*" ।_
पता कुछ भी नहीं और भेड़ चाल में चले जा रहे हैं....
*इस कहानी का "CAA" और* *"NRC" से कोई लेना-देना नहीं....*
*ये मिट्टी किसी को नही छोडेगी:-*हमारे जीवन का कहानी
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*एक राजा बहुत ही महत्त्वाकांक्षी था और उसे महल बनाने की बड़ी महत्त्वाकांक्षा रहती थी उसने अनेक महलों का निर्माण करवाया!*
*रानी उनकी इस इच्छा से बड़ी व्यथित रहती थी की पता नही क्या करेंगे इतने महल बनवाकर!*
*एक दिन राजा नदी के उस पार एक महात्मा जी के आश्रम के वहाँ से गुजर रहे थे तो वहाँ एक संत की समाधी थी और सैनिकों से राजा को सूचना मिली की संत के पास कोई अनमोल खजाना था और उसकी सूचना उन्होंने किसी को न दी पर अंतिम समय मे उसकी जानकारी एक पत्थर पर खुदवाकर अपने साथ ज़मीन मे गढ़वा दिया और कहा की जिसे भी वो खजाना चाहिये उसे अपने स्वयं के हाथों से अकेले ही इस समाधी से चोरासी हाथ नीचे सूचना पड़ी है निकाल ले और अनमोल सूचना प्राप्त कर लेंवे और ध्यान रखे उसे बिना कुछ खाये पिये खोदना है और बिना किसी की सहायता के खोदना है अन्यथा सारी मेहनत व्यर्थ चली जायेगी !*
*राजा अगले दिन अकेले ही आया और अपने हाथों से खोदने लगा और बड़ी मेहनत के बाद उसे वो शिलालेख मिला और उन शब्दों को जब राजा ने पढ़ा तो उसके होश उड़ गये और सारी अकल ठिकाने आ गई!*
*उस पर लिखा था हॆ राहगीर संसार के सबसे भूखे प्राणी शायद तुम ही हो और आज मुझे तुम्हारी इस दशा पर बड़ी हँसी आ रही है तुम कितने भी महल बना लो पर तुम्हारा अंतिम महल यही है एक दिन तुम्हे इसी मिट्टी मे मिलना है!*
*सावधान राहगीर, जब तक तुम मिट्टी के ऊपर हो तब तक आगे की यात्रा के लिये तुम कुछ जतन कर लेना क्योंकि जब मिट्टी तुम्हारे ऊपर आयेगी तो फिर तुम कुछ भी न कर पाओगे यदि तुमने आगे की यात्रा के लिये कुछ जतन न किया तो अच्छी तरह से ध्यान रखना की जैसै ये चोरासी हाथ का कुआं तुमने अकेले खोदा है बस वैसे ही आगे की चोरासी योनियों मे तुम्हे अकेले ही भटकना है और हॆ राहगीर ये कभी न भूलना की "मुझे भी एक दिन इसी मिट्टी मे मिलना है बस तरीका अलग अलग है"*
*फिर राजा जैसै तैसे कर के उस कुएँ से बाहर आया और अपने राजमहल गया पर उस शिलालेख के उन शब्दों ने उसे झकझोर के रख दिया और सारे महल जनता को दे दिये और "अंतिम घर" की तैयारियों मे जुट गया!*
*इस मिट्टी ने जब रावण जैसै सत्ताधारियों को नही बक्सा तो फिर साधारण मानव क्या चीज हैl सभी को एक दिन इसी मिट्टी मे मिलना है क्योंकि ये मिट्टी किसी को नही छोड़ने वाली है..!!*
*🙏🏻🙏🏽🙏🏿🙏🙏🏾🙏🏼
अनुसूया जयंती सती अनुसूया की परीक्षा लेने में शिशु बन गए थे त्रिदेव
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28 अप्रैल 2024 को सती अनुसूया जयंती मनाई जाएगी। पतिव्रता स्त्रियों श्रेणी में अनुसूया जी का स्थान सर्वोपरि है। दक्ष प्रजापति की 24 कन्याओं में से एक अनुसूया, मन से पवित्र और निश्छल प्रेम का जीता-जागता उदाहरण थीं। उनका विवाह ब्रह्मा जी के मानस पुत्र परम तपस्वी महर्षि अत्रि जी के साथ हुआ था। अपनी सेवा तथा समर्पित प्रेम से इन्होंने अपने पति धर्म का सदैव पालन किया।
पौराणिक कथाओं में कहा जाता है कि जब देवता आकाश मार्ग से गुजरते थे, तो उन्हें देवी अनुसूया के तप और प्रताप का अनुभव होता था। माता सीता जी भी इनके तेज से बहुत प्रभावित हुई थी। वनवास में जाने के दौरान उन्होंने सीता जी को पतिव्रत धर्म की शिक्षा दी थी।
पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती को हुआ द्वेष
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पौराणिक कथा के अनुसार, देव ऋषि नारद बारी-बारी से विष्णुजी, शिव जी और ब्रह्मा जी की अनुपस्थिति में विष्णु लोक, शिवलोक तथा ब्रह्मलोक पहुंचे। वहां उन्होंने लक्ष्मी जी, पार्वती जी और सावित्री जी के सामने अनुसूया के पतिव्रत धर्म की बढ़-चढ़ के प्रशंसा की। उनके सती धर्म के बारे में सुनकर देवी पार्वती, लक्ष्मी जी और देवी सरस्वती जी के मन में द्वेष का भाव जागृत हो गया।
तीनों देवियों ने अनुसूया कि सच्चाई एवं पतिव्रता के धर्म की परिक्षा लेने की ठानी तथा अपने पतियों शिव, विष्णु और ब्रह्मा जी को अनसूया के पास परीक्षा लेने के लिए भेजना चाहा। हालांकि, त्रिदेवों ने पहले तो देवियों को समझाने का प्रयास किया कि यह पाप करने के लिए उन्हें विवश नहीं करें। मगर, जब उनकी एक भी नहीं चली, तो वे अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंचे।
जब त्रिदेवों ने ली परीक्षा
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वहां जाकर देवों ने साधुओं के वेश में पहुंचकर भोजन मांगा। जब देवी अनसूया उन्हें भोजन देने लगी, तो उन्होंने शर्त रखी कि वे तीनों तभी यह भोजन स्वीकार करेंगे जब देवी निर्वस्त्र होकर उन्हें भोजन परोसेंगी। इस पर देवी चिंता में डूब गईं। अत: देवी ने आंखे मूंद कर पति को याद किया इस पर उन्हें दिव्य दृष्टि प्राप्त हुई तथा साधुओं के वेश में उपस्थित देवों को उन्होंने पहचान लिया।
तब देवी अनसूया ने कहा की जो वह साधु चाहते हैं, वह वैसा करेंगी, लेकिन साधुओं को शिशु रूप लेकर उनके पुत्र बनना होगा। इस बात को सुनकर त्रिदेव शिशु रूप में बदल गए और तब माता अनुसूया ने देवों को भोजन करवाया। इस तरह तीनों देव माता के पुत्र बन कर रहने लगे। काफी समय बीत जाने के पश्चात भी त्रिदेव देवलोक नहीं पहुंचे तो पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती जी चिंतित एवं दुखी हो गई।
तीनों देवियों ने सती अनसूइया के समक्ष क्षमा मांगी एवं अपने पतियों को बाल रूप से मूल रूप में लाने की प्रार्थना की। माता अनसूया ने त्रिदेवों को उनका रूप प्रदान किया और तभी से वह मां सती अनसूइया के नाम से प्रसिद्ध हुई।
ईमानदारी के मिसाल -आर्य
यह घटना सन् 1947 में भारत के विभाजन से पूर्व की है। आर्यसमाज के विद्वान एवं शास्त्रार्थ महारथी पं. लोकनाथ तर्कवाचस्पति एक गांव में प्रचारार्थ आये थे। वहां बिजली नहीं थी। पानी के लिए कुएं पर जाना होता था वा रहट चलते थे। उपदेश्क भी प्रातः निकल जाते थे। पंडित जी एक दिन रहट पर गये थे। रहट चल रहा था। प्रातः काल के समय अपने कपड़े धोने के लिए वह रहट के निकट खड़े हो गये। सामने रास्ता था। उस पर चलकर एक अपरिचित व्यक्ति उनके पास आया। वह शाल ओढ़े हुए था। उसने पं. लोकनाथ जी को नमसते की। उसने अपनी शाल हटाई। एक पोटली उसके पास थी। उसने पंडित जी को कहा कि उसे सामने वाले गांव में जाना है। मैं अपनी इस पोटली को अपने साथ गांव में ले जाना नहीं चाहता। यदि आपको एतराज न हो तो मैं यह आपके पास छोड़े जा रहा हूं। लौट कर ले लूगां। उसने पंडित जी से पूछा कि आपको कितना समय लगेगा? पंडित जी ने कहा कि मुझे अपने यह तीन चार धोती कुर्ते धोने हैं। पंडित जी ने प्रश्न किया कि यदि आप समय पर न लौटे तो क्या होगा? उसने पंडित जी को कहा कि मैं जल्दी ही आ जाऊंगा। पंडित जी ने उसे कहा कि जहां इच्छा हो अपनी पोटली रख दो। समय पर आ जाना और अपनी पोटली ले जाना। मुझे परेशान न करना। वह व्यक्ति अपनी पोटली वहां रखकर चला गया। किसी कारण वह बताये समय पर न आ सका और उसे देर हो गई। पंडित जी उसकी प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने देखा कि वह व्यक्ति भागता हुआ आ रहा है। दूर से ही जोर जोर से बोल रहा था, पंडित जी मुझे क्षमा करना। पंडित जी मुझे क्षमा कर दें। मैं गांव में फंस गया था। पंडित जी ने उसे डांट लगाई और कहा कि दूसरे के समय की भी कदर करनी चाहिये।
पंडित जी ने उस व्यक्ति से पूछा कि आपकी इस पोटली में क्या है? उसने पंडित जी को बताया कि मेरी इस पोटली में डेढ़ सेर सोना है। यह मेरी बेटी के आभूषण हैं। उसे देने के लिए साथ लाया था। बेटी की ससुराल में कुछ विवाद चल रहा है। मन में विचार आया कि पहले विवाद की स्थिति का जायजा ले लूं। इस लिए यह पोटली को आपके पास रख दिया। पंडित जी ने पूछा कि क्या तुम मुझे जानते हो, फिर मेरे पास कैसे रख दिया? उस व्यक्ति ने पंडित जी को कहा कि आपको देखकर मैं जान गया था कि आप आर्यसमाजी हो। पंडित जी ने प्रश्न किया कि आर्यसमाजी इतने विश्वास का पात्र है, यह आपने कैसे जाना? उस व्यक्ति ने पंडित जी को अपनी आत्मकथा सुनाई। उसने कहा कि मैं अपने गांव का दुकानदार हूं। हमें लोग शाह जी कहते हैं। मेरे गांव के एक किसान ने अपनी बेटी के विवाह के लिए तीन सौ रूपये का कर्ज लिया था। उसने कहा था कि अगली फसल पर दे दूंगा। वह मेरा परिचित व मित्र था इसलिए मैंने उससे लिखा-पढ़ी नहीं की थी। मैंने जब उससे पैसे मांगे तो उसने कहा कि बारिस न होने के कारण फसल नहीं हुई। इसलिए आपके पैसे लौटा नहीं पाया। मैं कुछ समय बाद दूंगा। अगला साल भी निकल गया। कहता रहा कि फसल नहीं हुई, आपके पैसे अवश्य लौटाऊंगा। तीन साल बीतने के बाद वह मुकर गया। कहने लगा कि मैंने आपसे एक पैसा नहीं लिया। पंडित सत्यपाल पथिक जी के अनुसार उस समय के तीन सौ रूपये आज के तीन लाख व उससे भी अधिक होंगे। उसने बताया कि मैं जब उससे पैसे मांगता तो वह मुझे मारने को दौड़ता था।
अपना पैसा वसूल करने के लिए मेरे पास एक ही उपाय था कि मैं उस पर केस कर दूं। मेरा अनुमान था कि वह डर जायेगा और पैसे लौटा देगा। मैंने उसके खिलाफ केस दायर कर दिया। जज ने उस किसान से पूछा क्या तुमने इनसे तीन सौ रूपयों का कर्ज लिया था। वह व्यक्ति बोला कि कोई कर्ज नहीं लिया। जज ने मुझसे कहा कि कोई गवाह लाओं जिसके सामने पैसे दिये थे। मुझे याद आया उस किसान का 18-19 साल का एक बेटा है। वह अपने आप को आर्यसमाजी कहता है। मेरे मन में विचार आया कि आर्यसमाजी सच बोलते हैं। अतः उस कर्जदार का बेटा झूठ नहीं बोलेगा। वह बेटा जवान था। और कोई साक्षी मेरे पास नहीं था। अतः मैने उसे ही अपना गवाह बनाया। उससे अदालत में पूछा गया कि आपके पिता ने पैसे लिये या नहीं? उसकी गवाही पर ही फैसला होना था। पिता ने अपने बेटे को आंखे दिखाई और इशारों में कहा कि वह मना कर दें। बेटे ने अदालत में कहा कि मेरे पिता ने बहिन की शादी के लिए किसी से तीन सौ रूपये का कर्ज लिया था और मां को रखने के लिए दिये थे। मैं तब वहां था और इस घटना को देख रहा था। दो तीन से बारिस नहीं हुई। जज साहब मेरे पिता ने किसी से पैसे अवश्य लिये थे। वह फिर बोला जज साहब, मेरे पिता का कर्जा मेरे नाम लिख लिया जाये। मैं वह कर्जा दूंगा। शाहजी ने पं. लोकनाथ जी को बताया कि उसकी सच्चाई को देख कर मैं रो पड़ा। मैं बोला बस, बस। मुझे पैसा नहीं चाहिये। इस घटना के कारण मुझे विश्वास था कि आपके आर्यसमाजी होने के कारण मेरी पोटली आपके पास पूर्ण सुरक्षित रहेगी।
आजादी से पहले आर्यसमाजियों की ऐसी साख थी। इससे मिलते जुलते आर्यसमाजियों के सत्य व्यवहार के अनेक उदाहरण हैं। हम आशा करते हैं कि पाठक इस सच्ची घटना को पसन्द करेंगे और प्रेरणा ग्रहण करेंगे। आर्यसमाजी इस घटना को पढ़कर अपना सिंहावलोकन करें और आवश्यकता हो वा सुधार कर सकें तो सुधार कर लें। इति।
आज के दिन रणबंका ने सिर कटने के बाद भी हजारो को काटा
वीर लोक देवता कल्ला जी राठौड़
24 फरवरी सन 1568 ई. को 13000 राजपूत रमणियो और कुमारियों ने गंगा जल का पान कर, चन्दन लेप लगाकर और अपने परिजनों को अंतिम बार मिल कर गीता सार का स्मरण कर हिन्दू धर्म की रक्षा के लिये हँसते हँसते जौहर की अग्नि में समर्पित हो गई।
सन 1567 ई. से 4 महीने तक किले को घेरे अकबर बैठा रहा, पर सफलता मिलने का कोई भी चिन्ह नजर नहीं आ रहा था। लगातार कई दिनों के युद्ध तथा राजपूत सेना के पराक्रम से घबरा कर बादशाह अकबर ने राजा टोडरमल को भेज कर जयमल को कहलवाया की, आप तो मेड़ता के स्वतंत्र शासक हो। राणा के लिए क्यों व्यर्थ अपने प्राण खो रहे हो? मै कुरान और ईमान की सौगंध खा कर कहता हूँ की यदि आप चितौड़ के किले पर मेरा कब्ज़ा करा दोगे तो मै आपको सम्पूर्ण पैतृक राज्य तथा उसके अलावा और भी बहुत सा राज्य भेंट करूँगा। जिस पर महान शूरवीर जयमल राठोड ने जबाब दिया,
"यह दुर्ग मेरा है। मै इसका स्वामी हूँ तथा इस दुर्ग की चाबियाँ मुझे भगवान् इकलिंग जी के दीवान महाराणा ने सौंपी है। असुरों की दुहाई यहाँ कैसे फिर सकती है? बादशाह अकबर सुनिए। तुम्हारी दुहाई किले पर तब ही फिर सकती है, जब हमारे धड़ इस धरती पर पड़ेंगे। अन्यथा मेरे जीवित रहते आप इस दुर्ग में प्रवेश नहीं पा सकते।"
वीरवर कल्ला, जयमल, पत्ता और ईश्वरदास आदि अपने प्राणों का मोह छोड़ कर अपनी दोनों भुजाओं से तलवार चलाते हुए देशभक्त, शूरवीर, सैनिकों एवं क्षत्रियों के साथ शत्रुदल पर भूखे शेर की भांति महाकाल बन कर टूट पड़े।
जब बादशाह ने देखा की किला आसानी से प्राप्त नही होगा तो उसने सुरंगे और साबात बनवाना आरम्भ किया। सुरंगे तलहटी तक पहुंच गई और उनमे 80 मन और दूसरी में 120 मन बारूद भरी गई। इनके फटने से किले का बुर्ज उड़ गया और कई योद्धा हताहत हुए। परन्तु अब तक अकबर को युद्ध में सफलता नही मिली, अकबर के सैनिकों ने कई जगह किले की दीवारें तोड़ दी, परन्तु राजपूतों ने पुनः बना ली।
अकबर की सेना के बार बार तोपों के आक्रमण से किले की कई दीवारें टूट चुकी थी। एक रात्रि जयमल टूटी हुई प्राचीर की मरम्मत मशाल की रोशनी में करा रहे थे, तब अकबर ने मशाल की रोशनी को देख अपनी “संग्राम” नामक बन्दुक से निशाना साध कर गोली चला दी, जिसकी गोली राव जयमलजी की जांघ में लगी जिससे जयमल घायल होकर चलने लायक नही रह सके। दुर्ग में सेनाध्यक्ष जयमल के घायल होने से शोक की लहर छा गयी।
रात्रि में सभी क्षत्रिय व क्षत्राणियों ने एकत्र होकर शाही फौज का बढता हुआ दबाव, दुर्ग में गोला बारूद की कमी, भोजन की कमी और सेनाध्यक्ष के घायल होने कारण जौहर और शाका का फैसला किया। तारीख 24 फरवरी सन 1568 ई. को 13000 राजपूत रमणियो और कुमारियों ने गंगा जल का पान कर, चन्दन लेप लगाकर और अपने परिजनों को अंतिम बार मिल कर गीता सार का स्मरण कर हिन्दू धर्म की रक्षा के लिये हँसते हँसते जौहर की अग्नि में समर्पित हो गई।
क्षत्रीयों ने दुर्ग के गौमुख में स्नान कर केसरिया बाना धारण कर गंगा जल का पान कर, सुंगधित इत्र का छिड़काव कर व गीता पाठ सुन दो हाथों में तलवार धारण कर विशाल प्रांगन में एकत्रीत हुए।बड़े हर्ष और उमंग के साथ चित्तौड़ के साहसी योद्धाओं ने केशरिया वस्त्र धारण कर अमल पान किया। सेनाध्यक्ष राव जयमल ने सरदारों को अमल पान कराया। सेनाध्यक्ष के अन्तिम मनुहार को चित्तौड़ की सेना ने बड़े प्रेम और सत्कार से स्वीकार किया। अब राजपूतों के उत्साह की कोई सीमा न रही। इस युद्ध में घायल सेनापति जयमल को लड़ते लड़ते युद्ध में वीरगति प्राप्त करने की इच्छा थी। लेकिन गोली जयमल की जांघ में लगी थी। युद्ध करना तो दूर वे चलने फिरने से भी मजबूर हो गये थे। तब वीर शिरोमणी कल्लाजी राठौड़ ने काका जयमल जी की पीड़ा को दूर करने के किये अपनी पीठ पर बैठा कर युद्ध करने का फैसला किया।
25 फरवरी 1568 की सुबह राजपूतों क्षत्रियों ने दो हाथों में तलवार धारण कर और नर नाहर शूरवीर राठौड़ रणबंकेश श्री कल्लाजी अपनी दोनों हाथों में भवानी धारण कर 60 साल के काका जयमल जी को अपनी पीठ पर बैठा कर उनके दोनों हाथों में भवानी धारण करा कर मुगलों सेना पर भूखे शेर की तरह किले के विशाल कपाट खोल आक्रमण कर दिया।
क्षत्रियों ने जय एकलिंगनाथ, जय महादेव के नारों के साथ कई मुगलों को मार डाला वही श्री कल्लाजी व वीरवर जयमल जी का चतुर्भुज रूप रणभूमि में कही भी गुजरता वही को शत्रु सेना का मैदान साफ हो जाता। यह देख शत्रु सेना मैदान छोड़ भाग जाती थी।
बादशाह अकबर ने मुगल सेना को रणक्षेत्र से पीछे हटते देख राजपूतों पर मतवाले खूनी हाथियों को छोड़ दिया। अकबर ने अपने विशाल हाथियों की सूंड़ो में तलवारें की झालरें और दुधारे खांडे बंधवाई। मधुकर हाथी को सर्वप्रथम आगे बढ़ा कर पीछे जकिया, जगना, जंगिया, अलय, सबदलिया, कादरा आदि हाथी को बढ़ा दिया। इन हाथियों ने राजपूतों का घोर संहार करना आरम्भ कर दिया, लेकिन वीर क्षत्रिय राजपूतों कहा मानने वाले थे। वे भीषण गर्जना कर विशालकाय हाथियों पर खड्ग लेकर टूट पड़ते।
इस बीच कई राजपूतों ने मतवाले हाथियों से लड़ते लड़ते वीरगति प्राप्त की। जिसमे से वीर ईश्वरदास ने असंख्य हाथियों का संहार कर मातृभूमि के चरणों में बलिदान दिया। वही महापराक्रमी पत्ता सिसोदिया रामपोल पर एक हाथी ने उन्हें पकड़ कर जमीन पर जोर से पटक दिया। वही पत्ता सिसोदिया ने वीरगति प्राप्त की।
“सर्वदलन” नामक हाथी जो एक राजपूत सैनिक को सूंड में पकड़ उठा लिया यह देख सुर शिरोमणी कल्लाजी ने तलवार के एक भीषण प्रहार से उस विशालकाय हाथी की सूंड काट दी। हाथी वही धराशायी हो गया। वह राजपूत सैनिक भी उठ खड़ा हुआ।
मुगल सेना पुरे जोश के साथ राजपूतों का मुकाबला कर रही थी। इस भंयकर युद्ध में सैकडों घाव लगने पर राव जयमल का शरीर निश्चेष्ट हो गया। उनको भैरोंपोल के पास ही भूमि पर रख कर राठौड़ कल्ला पूरे वेग से शत्रुओं की और झपटा।
वीर कल्लाजी माता भद्रकाली के बड़े उपासक थे। कहा जाता है, देवी से उन्हें एक वरदान प्राप्त था की जबतक वे पीछे नहीं मुडेंगे और लड़ते रहेंगे तब तक उनहे कोई परास्त नहीं कर सकेंगा।
जब कल्लाजी पूर्ण शक्ति के साथ गांजर मूली की तरह मुसलमानी सेना को काटते जा रहे थे तब उन्हें अचानक किसी ने राव जयमल जी के मृत्यु की सुचना दी, सुन कर कल्लाजी पीछे मुड़े, यह देखकर एक मुगल सैनिक ने मुसलमानी प्रवृत्ति के अनुसार पीछें से तलवार चला कर वीर कल्ला का सिर काट दिया।
अब बिना सिर के कल्लाजी का कंबध (कमधज) घोर संग्राम करता हुआ दोनों हाथों से तलवार लिये मुगलों की फौज को चीरता जा रहा था। भला इस कंबध को रोकने की शक्ति किसमें थी। शाही फौज रास्ता छोड़ कर खड़ी हो गई। कल्ला का कंबध योग व देवी शक्ति और गुरु आशीर्वाद से कृष्णकांता की याद में आधुनिक मंगलवाड़, कुराबड़, बम्बोरा जगत और जयसमन्द होता हुआ रनेला जा पहुंचा।
शिवगढ़ में राजकुमारी कृष्णकांता ने विशुद्ध स्नेहाकर्षण शक्ति से यह अनुभव कर लिया की कल्लाजी ने मेवाड़ रक्षार्थ अपना शीश मातृभूमि को अर्पण कर दिया है। कृष्णकांता प्रिय मिलन को आतुर होकर दुल्हन के रूप रनेला जा पहुंची।
रनेला में कल्लाजी का कबंध नीले घोड़े पर सवार होकर दो हाथों में तलवार लेकर आया। वीर शिरोमणी कल्लाजी ने राजकुमारी को दिये हुये वचन को पूरा करता हुआ रनेला की पावन धरा पर अपना मानव देह त्याग दिया।
विधिवत चन्दन की चिता तैयार की गई। राजपुताना परम्परा के अनुसार कृष्णकांता ने सती होने के लिये कल्लाजी का कबंध को गोद में लेकर चिता में विराजमान हो गई। कल्लाजी को शीश कबंध से जोड़ विक्रम संवत 1624 (26 फरवरी 1568) में कल्लाजी के भाई तेजसिंह ने ईश्वर का स्मरण कर चिता में आग लगा दी। इस प्रकार वीर शिरोमणी कल्लाजी और महासती कृष्णकांता का प्रेम आज पुरे विश्व में अमर हो गया।
ब्यूरो चीफ/हरदोई
गीतांजली वर्मा
*अनुभव*
*गर्मी का दिन था। जंगल में एक लकड़ बग्घा प्यास से तड़प रहा था ,साथ ही साथ वो पानी के तलाश में जंगल में इधर उधर भटक रहा था। तभी घूमते हुए उसे एक नदी दिखाई पड़ी।दूर से देखने पर नदी में पानी कम लग रहा था फ़िर भी उसने दौड़कर जल्दी से अपनी प्यास बुझाई। भरपेट पानी पीने के बाद लकड़बग्घा मानो तृप्त हो गया।*
*अब उसने सोंचा कि गर्मी काफ़ी है तो क्यों न नदी के बीच में जाकर साफ़ व स्वच्छ पानी में स्नान भी कर लिया जाए ।लेकिन नदी की कितनी गहराई है ,उसे मालूम न था। लकड़बग्घे ने वहीं खड़े एक ऊँट से पूछा... ताऊ,नदी में पानी कितना है, कहीं मैं डूब तो नहीं जाऊँगा स्नान करने में।*
*ऊँट ने अपना दाँत निपोरते हुए कहा... मेरे घुटने भर पानी है बच्चे ।मैं अभी अभी नहा कर निकला हूँ।जा तू भी नहा ले।*
*ऊँट की बात सुनते ही लकड़बग्घे ने छलाँग लगाई औऱ नदी के बीचों बीच जा पहुंचा। फ़िर वो अचानक डूबने लगा ।लकड़बग्घा क़भी गोते खाता तो कभी अपना सिर पानी से बाहर निकाल कर सांस लेता। जैसे तैसे उसने अपनी जान बचाई औऱ बाहर आया ।*
*बाहर आते ही उसने ग़ुस्से में ऊँट से कहा " बेवकूफ़,तुमने क्यों कहा,पानी घुटनों तक है... मैं तो डूबकर मरने वाला था ?"*
*ऊँट ने जवाब दिया " भड़क क्यों रहा है बच्चे, मैंने तो बिलकुल ठीक ही कहा था कि नदी में पानी मेरे घुटनों तक है,अब तुझें मेरी बात समझ में न आई तो मैं क्या करूँ। ".....!! उसके बाद लकड़बग्घे को अपनी ग़लती का एहसास हुआ ।*
*शिक्षा: आत्मीय जनों .... ज़िंदगी में हर किसी का अनुभव अलग अलग होता है और वो सिर्फ़ अपने व्यक्तिगत अनुभव की रौशनी में ही किसी विषय का जवाब देता है, मुमकिन है जो बातें उसके लिए फायदेमंद हो, हमारे लिए नुक़सान पहुंचाए । इसलिए ये हमेशा याद रखना चाहिए कि सिर्फ दूसरों के अनुभव को देखकर चलना जीवन में हमें कभी भी डुबो सकता है ।अपने विवेक से काम लेना ज़रुरी है।सावधान रहें, सतर्क रहें, मस्त रहें औऱ हमेशा हँसते खिलखिलाते रहें*
*जय श्री कृष्ण*