संक्षिप्त जीवन परिचय
डॉ० भीमराव अम्बेडकर एक महान नेता, अर्थशास्त्री, विधिवेत्ता और समाज सुधारक थे जिन्होंने भारतीय संविधान के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उन्हें बाबासाहेब अम्बेडकर के नाम से भी जाना जाता है। आइए उनके जीवन और योगदान के बारे में जानते हैं। पूरा पढ़ें>>
स्वभाविक है।
मनुष्य का व्यवहारिक स्वभाव यह है की जो जीवन मे आनंद प्राप्त करता है उसे वह बाटना चाहता, महसूस करता है, तो वह उसे दूसरों में बाँटना चाहता है। यदि हम अपनी आँखें खुली रखें, अपने विवेक को जागृत रखें, विना सोचे-समझे किसी भी बात पर विश्वास करना छोड़ दें, तो दूसरों द्वारा बताया गया रास्ता निश्चित रूप से सहायक सिद्ध हो सकता है। इन सबका एक महत्व है। इसे बहुत अधिक महत्वपूर्ण बनाया जा सकता है, यदि इसे काम में लेना ठीक से आ गया तो। जो भी दूसरों से मिलता है वह ज्ञान भी बहुत काम का हो सकता है, पर इसका निर्णय स्वयं को करना है कि वह किस प्रकार से, कितनी मात्रा में और किस समय मुझे काम में लेना है। दूसरों द्वारा दिया हुआ वही ज्ञान हमारे काम का है, जो हमें जगाता है, जो हमारे विचारों में हलचल पैदा करता है, जो जीवन के लिए मार्ग खोजने में स्वयं की भूमिका के बारे में चेतना देता है। जो मार्ग हमारे विवेक पर ताला लगाकर सिद्धान्तों की लकीरों पर चलने पर ज़ोर देता है, जो हमारे मन में भय पैदा करता है, वह ज्ञान नहीं भ्रम है। ...और हम जीवन भर ऐसा भ्रम इकट्ठा करते जा रहे हैं। हमने अपने मस्तिष्क में भ्रमों का इतना भण्डार भर लिया है कि उसे ख़ाली करना ही मुश्किल हो गया है। जो बिल्कुल नहीं चाहिए, उसको इतना ज़्यादा एकत्रित कर लिया है कि हमारी पूरी चेतना ही विलुप्त हो गई है। हमने अपनी चेतना को चैन की नींद सुलाकर शारीरिक क्रियाओं को बहुत अधिक महत्व दे दिया है। राम-राम रटते रहो तर जाओगे, पैदल यात्रा करो तर जाओगे, भूखे रहो तर जाओगे, लोट-लोट कर परिक्रमा करो तर जाओगे, पूजा-पाठ, कर्म-काण्ड और न जाने क्या-क्या, यह सब करके कोई यह समझ लेता है कि मैंने बहुत धर्म कर लिया है। मैं बहुत आध्यात्मिक हूँ, तो यह एक भ्रान्ति है। अध्यात्म का सम्बन्ध शारीरिक क्रियाओं से हो ही नहीं सकता।
✒️ सागर मतवाला
भारतीय राजनीति
भारतीय राजनीति से ओछ पन समाज में व्याप्त आम जनमानस के बीच विषमता को समतुल्य रखने के लिए कई दषक पहलें समाज के सभी वर्गों के हक,न्याय एवं वंचितों के सर्वांगीण विकास के लिए लड़ने हेतु समाज के कुछ बुद्धिजीवी ने भविष्य की सम्पन्नता व सम्मान के मध्य नजरिया रखते हुऐ बहु विकल्प एवं उददेश्य युक्त सर्व सम्मति से दिव्य शस्त्र के रूप में राजनीति की नीव रखी गयी। राजनैतिक-सामाजिक धारा प्रवाहिता बुनियादी ढांचे से उठकर अभी दो कदम चली भी न की उददेश्य हीन धाराये पुनः विषमता के सागर में जा गिरी और भारतीय राजनेताओं की मिथ्या कल्पनाओं व स्वार्थी संकल्प धारण करना और उनको फिर उस सपथ पत्र की तरफ मुडकर न देखना नेताओं की फितरत हो गयी।और भारतीय राजनीति दिनों दिन दूषित होती गयी नेतृत्व के अभाव से प्रदूषित राजनीति लाइलाज बिमारी बन गयी हैं। आज इसका इलाज करने की जितनी कोशिश की जा रही है मर्ज़ उतना ही बढता जा रहा है ठोस विकल्प किसी पार्टी के पास नहीं है। नीति विहीन नेता अपशब्दो के प्राकान्ड विद्वता में परिपक्व से झूठ फरेब और निठुरता से राजनीति का मात्र एक ही लक्ष्य सत्ता हथियाना ही रह जाये। तो फिर इसमें साफ सुथरी छवि के लोगों की जगह अपने आप ही खत्म हो जाती हैं। और राजनीति सिर्फ निठुर का व्यवसाय ही हैं।
✒️ सागर मतवाला