बबेसियोसिस (BABESIOSIS)
बबेसियोसिस (BABESIOSIS)
इस प्रोटोजोअन रोग में बबेसिया पैरासाइट के कारण मूत्र का रंग लाल होता है। इसे रेट वॉटर डिजीज भी कहते हैं। इसमें एलोपैथिक दवाइयों के साथ होम्योपैथिक दवाइयां उपयोग करना काफी लाभदायक रहता है।
एकोनाइट (Aconite)
जब बुखार हो तो हर घंटे दें, जब तक बुखार न उतर जाए।
चायना ऑफिसिनालिस (China)
यह शरीर में ब्लड के नुकसान होने के बाद वापस शक्ति प्रदान करती है। दिन में तीन बार पांच दिन तक दें।
फाइकस रिलिजिओसा (Ficus Relgiosa)
यह शरीर में से हेमोरेज रोकता है और सांस सामान्य करती है। दिन में तीन बार एक सप्ताह तक दें।
मिलेफोलियम (Milefollium) यह ब्लीडिंग को रोकती है तथा ब्लड कमी की पूर्ति करती है।
• क्रोटालस हॉरीडस (Crotalus Horridus)
यह ब्लड की रेड ब्लड सेल्स के नुकसान को रोकती है। हिमोलाइसिस को रोक कर अंततः हीमोरेंज रोकती है। इसे हर घंटे कुल पांच बार दें ।
• पल्सेटिला (Pulsatilla)
यदि मूत्र गाढा हो तो दिन में चार बार तीन दिन तक दें। • बेलाडोना (Belladonna) यदि मूत्र का रंग पीला लाल हो, मूत्र करते समय दर्द हो, मूत्र करने के बाद
पिछले पैर दर्द के मारे हिलाता हो तो दिन में तीन बार दें।
फॉस्फोरस 1000 (Phosphorus 1M)
खून की कमी होने पर दिन में एक बार एक सप्ताह तक दें।
एनाप्लाज्मोसिस (ANAPLASMOSIS)
टाईनाइट्रो टॉल्युन (Trinitrotoluene)
एनाप्लाज्मोनिस की यह एक असरदार दवा है। यह हार्ट रेट को सही करती है तथा खून की कमी की पूर्ति करती है। शुरू में हर चार घंटे एक दिन तक तथा इसके बाद दिन में एक बार एक सप्ताह तक दें।
क्रॉटेलस हॉरिडस 1000 (Crotalus Horridus)
रोग की एक्यूट अवस्था में तथा रोग के बढने पर लिवर पर अधिक जोर पड़ने पर हर दो घंटे बाद दें।
फॉस्फोरस 1M (Phosphorus 1M
)
यह लिवर के नुकसान को रोकता है और भूख सही करता है। दिन में एक बार एक सप्ताह तक दें।
चायना (China)
शरीर में ब्लड की कमी के बाद शरीर को पुनः शक्ति प्रदान करता है। इसे दिन में दो बार एक सप्ताह तक दें
टॉक्सोप्लाज्मोसिस (TOXOPLASMOSIS)
एकोनाइट (Aconite)
रोग की शुरूआत में फीवर हो तो हर आधा घंटे बाद पांच डोज दें। लेथिरस सेटाइवा (Lathyrus Sat)
जब नर्वस सिस्टम के लक्षण प्रकट हो, पैरालाइसिस जैसी स्थिति हो, ऐटेक्सिया (ataxia) हो तो दिन में तीन बार दो दिन तक फिर दिन में एक बार तीन दिन तक दें।
स्ट्रेमोनियम (Stramonium)
जब शरीर के विशेष भाग में मांसपेशियों में अकड़न से झटके हो, ऐंठन हो
तो दिन में दो बार एक सप्ताह तक दें। क्युप्रम 1M (Cuprum 1M )
शरीर की मांसपेशियों में अकड़न, कठोरता तथा झटके लगते हों तो दिन में एक बार एक सप्ताह तक दें।
109
कोनियम (Conium)
जब अधिक कमजोरी हो, पैरों में लड़खड़ाहट हो तो दिन में तीन बार एक सप्ताह तक दें।
● स्ट्रिकनिन (Strychnine)
कोरिया (chorea) की तरह लक्षण प्रकट होने पर यह दवा असरदार है। इसे दिन में दो बार एक सप्ताह तक दें।
त्वचा रोग
जलना (BURNS)
कैन्थेरिस (Cantharis)
यह बर्न की प्रमुख दवा है। जब जलन तेज हो। हर घंटे बाद दें। इससे फफोले नहीं बनते हैं। जले भाग पर कैंथेरिस के मदर टिंचर को पानी में मिला कर लगाए, तर करें।
कैलेण्डुला Q (Callendula Q)
जब ज्यादा जलने के कारण घाव हो तो कैलेण्डुला के मदर टिंक्चर को पानी में मिलाकर घाव साफ करें।
कॉस्टिकम (Causticum)
जब थर्ड डिग्री का बर्न हो, घाव गहरे हो, भर नहीं रहे हों। छः पोटेन्सी प्रयोग करें। घावों पर हाइपेरिकम लोशन 1.10 में प्रयोग करें।
एकोनाइट (Aconite)
ज्यादा जलने के कारण डर, बैचेनी व घबराहट हो तो दिन में चार बार दें।
आर्सेनिक एल्ब (Arsenic Alb )
जलने के बाद तेज प्यास, कमजोरी व मौत की शंका हो, दिन में चार बार।
हिपर सल्फ (Hepar Sulph)
जलने के बाद घावों में मवाद, काफी दर्द हो तो दिन में तीन बार दें। अर्टिका यूरेन्स Q (Artica Urens)
यदि गर्म पानी, गर्म तेल आदि से त्वचा जली हो, तेज दर्द हो और त्वचा पर
फफोले नहीं बने हो तो अर्टिका यूरेन्स के मदर टिक्चर को 1:10 पानी में मिला कर जले भाग पर लगाएं।
खुजली (MANGE)
यह माइट्स (mites) के कारण होती है जो सोरोप्टिक, सारकोप्टिक और कोरिऑप्टिक तीन प्रकार की होती है।
सल्फर (Sulphur)
त्वचा के रोगों में सल्फर काफी उपयोगी दवा है। दिन में दो बार एक सप्ताह
तक दें।
सल्फर + आर्सेनिक (Sulphur + Arsenic)
दोनों के मिक्चर को दिन में दो बार एक सप्ताह तक दें।
सोरिनम (Psorinum )
जब तेज खुजली हो, स्किन सूखी रूखी हो गई हो तो दिन में एक बार एक
सप्ताह तक दें।
काली आर्सेनिकम (Kali Arsenicum)
स्किन सूखी मोटी हो गई हो, खुजली हो तो दिन में एक बार एक सप्ताह
तक दें।
रिंग वर्म (Ring worm)
फंगस के कारण होने वाले इस इन्फेक्शन में स्किन पर गोल चकते बन जाते हैं। खुजली होती है।
बेसिलिनम (Bacillinum )
यह एक नोसोड है रोग की रोकथाम के लिए महीने
में एक बार दें।
टेलुरिएम (Tellurium)
जब स्किन पर गोलाकार चकते विशेषकर कान के आस-पास अधिक हो। दिन में एक बार सात दिन तक दें।
नैट्रम सल्फ (Natrum Sulph)
दिन में एक बार एक सप्ताह तक दें।
मस्से (WARTS)
● थूजा (Thuja)
थूजा मस्सों की काफी उपयोगी दवा है। यह उन मस्सों में विशेष उपयोगी है जो लटके हुए से हो तथा जिनमें से ब्लीडिंग सी होती हो। थूजा की पांच बूंदे दिन में एक बार पन्द्रह दिन तक दें। मस्सों पर थूजा का मल्हम लगाएं। इसके लिए थूजा को वैसेलिन में मिलाकर लगाएं। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार थूजा 30 सप्ताह में एक बार चार सप्ताह तक 1ml s/c इंजेक्शन लगाने से भी लाभ होता है।
कॉस्टिकम (Causticum)
मस्से जो एक एक कर या गुच्छों के रूप में हों, जिनमें अल्सर की तरह ब्लीडिंग अधिक होती हो, दर्द भी होता हो। ऐसे मस्सों में इसे दिन में दो बार पन्द्रह दिन तक दें।
केल्केरिया कार्बोनिका (Calc. Carb)
यदि मस्से छोटे, चपटे अधिक संख्या में खासतौर से गाय, भैंस, बकरी आदि के थनों पर हो तो सप्ताह में दो बार एक महीने तक दें।
• एसिड नाइट्रिकम (Acid Nitricum)
जब मस्से बड़े, तीखे जिनसे आसानी से ब्लीडिंग होती हो तो इसे दिन में एक बार दस दिन तक दें।
डल्कामारा (Dulcamara )
जब मस्से आकार में बड़े माथे पर चपटे मस्से, पैरों पर हो तो दिन में एक बार दस दिन तक दें।
सबाइना (Sabina)
जब मस्से वेजाइना, वल्वा, पेनिस आदि जनन अंगों पर हों तो सबाइना दिन में दो बार पन्द्रह दिन तक दें।
यदि थूजा+सोरायनम+ग्रेफाइट+आर्सेनिकम+फेरम फॉस के मिक्चर को दिन में दो बार पन्द्रह दिन दें तो सभी प्रकार के मस्सों में लाभ होता है।