कारण– जरूरत से ज्यादा मात्रा में खाना, सड़ा हुआ, फफूंद लगा हुआ, दूषित
अधिक अपाच्य चारा खाना, अधिक मेहनत और पेट के कीड़े हाने पर। लक्ष्ण- चारा दाना नहीं खाना, भूख नहीं लगना, सुस्त, रूमन का मूवमेन्ट नॉर्मल नहीं होना, पेट में हल्की गैस बनना, कभी दस्त कभी मींगने जैसा गोबर, कभी अधपचा चारा गोबर के साथ निकलना, गोबर में बदबू, पशु निरन्तर कमजोर होता जाता है।
• नक्सवोमिका (Nux vomica) - जब डंठल युक्त सूखा अपाच्य चारा अधिक खाने से कब्ज हो, गोबर कम या कड़ा हो तो 5 बूंद दिन में तीन बार ।
सल्फर (Sulphur) - जब रोग के लक्षण
नक्स जैसे हो तो नक्स के साथ सल्फर देने से अधिक फायदा होता है। इसके लिए रात को नक्स तथा सुबह सल्फर दें। आर्सेनिकम (Arsenicum) - जब दस्त हो, दस्त के साथ ब्लड भी आता
हो तथा लम्बे समय से भूख नहीं लग रही हो। 5 बूंद दिन में तीन बार दें। चायना (China) – जब पशु छोटी उम्र का हो, पेट में कीड़े होने से कब्ज व भूख नहीं लगती हो तो 5 बूंद दिन में तीन बार दें।
दस्त विभिन्न तरह की हो सकती है। दूषित चारा पानी, पेट के कीड़े , हरे चारे का अधिक मात्रा में खाने से, अधिक मेहनत आदि कारणों से हो सकती है। पानी जैसी बार बार दस्त होने से पशु निरन्तर कमजोर होता जाता है। भूट नहीं लगती है, कमर से सिकुड़ जाता है। पेट भी फूल जाता है, पेट में दर्द रहता है।
• एकोनाइट (Aconite) - इसे दस्त की शुरूआती अवस्था में दे जब दस्त के साथ हल्का बुखार हो। 5 बूद हर दो तीन घंटे बाद, 2-3 बार ।
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नक्सवोमिका (Nuxvomica) - पतले, बदबूदार दस्त, गैस भी निकलती हो, दस्त के साथ कब्ज, नक्स कुछ दिन तक देने के बाद एसिड फॉस या मर्क देना चाहिए।
आर्सेनिकम (Arsenicum) पतले दस्त, हरे भूरे रंग के दस्त, गड़गडाहट, दर्द हो भी सकता है और नहीं भी।
मर्कयूरिस (Mercurius)- जब गोबर के साथ म्युकस आती हो, हल्का दर्द हो। ऐसे में इसे आर्सेनिकम के साथ बदल कर दे सकते है।
एसिडकम फॉस (Acidicum Phos)- इसके लक्षण आर्सेनिकम जैसे ही
रहते है। चायना (China)- क्रॉनिक डायरिया में यह उपयोगी है, जब दस्त गर्मी के कारण हो, दर्द नहीं हों। भूख नहीं लगती हो। इसको दस्त कम होने के बाद एक टॉनिक के रूप में भी दे सकते है। दिन में दो बार दें।
ब्रायोनिया (Bryonia) – जब दस्त के बाद कब्ज हो, जब वातावरण में गर्मी से ठंड का बदलाव हो, दस्त बहुत ज्यादा पतली हो।
• वेराट्रम एल्बम (Veratrum album)- बार बार तेज पतले दस्त से भयंकर कमजोरी, पशु निढाल सा मूंह लटकाए लेटा रहता हो, शरीर ठंडा पड़ गया हो। शुरू में इसे हर आधे घंटे बाद दें, फिर लक्षण कम होने के बाद अन्तराल
बढाते जाए।
• पल्सेटिला (Pulsatilla) - यह बछड़ो
के दस्तों में काफी उपयोगी है। 5 बूंद दिन में दो बार दें ।
रूमन (rumen) में अधिक मात्रा में गैस इकटठी हो जाना आफरा या टिम्पेनी कहलाता है। हल्की टिम्पेनी अधिक नुकसान नहीं करती है लेकिन एक्युट, तेज व गंभीर टिम्पेनी जानलेवा हो सकती है इसलिए गंभीरता को ध्यान में रखते हुए। फुर्ती से इलाज करना चाहिए। यह निम्न कारणों से होती है।
आफरा (TYMPANY)
Primary ruminal tympany
यह टिम्पेनी रूमन में अधिक फर्मेन्टशन के कारण होती है। जैसे अधिक मात्रा
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में हरा चारा खाना, अधिक मात्रा में फलीदार, दाल वाले पौधे खाना आहार रेशेदार भाग कम होना, अधिक मात्रा में साबुत दाना खाना।
Secondary runinal tympany
यह सामान्य रूप से गैस बाहर निकलने के मार्ग में कोई रुकावट आने से रूमन में गैस इकट्ठी होती है। जैसे इसोफेगस में कोई गेंद, आलू, गोभी आदि फंस जाने, इसोफेगस का संकरा होने, इसोफेगस के बाहर कोई ट्यूमर, सूजन होने, डायफ्रेग्मेिटिक हर्निया, रेटिकुलम में कोई फॉरेन बॉडी होने, रूमन के मूवमेन्ट सामान्य नहीं होने, वेगस इन्डायजेशन, पशु का काफी देर तक एक ही ओर लेटे रहने तथा पेट के कीड़ों के कारण आफरा रहता है।
• कोलोसिन्थिस (Colocynthis)
जब टिम्पेनी अधिक मात्रा में हरा चारा खाने से हो तो दस बूंद हर दस-पन्द्रह मिनट बाद दे तथा लक्षण कम होने पर दो-तीन घंटे बाद जरूरत के अनुसार दें
• कोलचिकम (Colchicum)
तेज, गंभीर व एक्युट टिम्पेनी में, हर पन्द्रह मिनट बाद पांच-छ: बार दें। एंटिमोनियम क्रुडम (Antimonium Crudum)
टिम्पेनी की शुरूआती अवस्था में इसे उपयोग करें। हर बीस मिनट बाद
पांच-छ: बार दें।
• नक्सवोमिका (Nuxvomica) हर बीस मिनट बाद पांच-छः बार दें।
• एपोसाइनम (Apocyanum) जब पेट अधिक फूला हुआ हो, दस बूद दिन में पांच बार दें।
• लाइकोपोडियम (Lycopodium)
आंतों में हवा का गोला बना हो । आंतों का फूल जाना या आत के आगे सूखे गोबर की वजह से रूकावट हो। दस बूंद दिन में चार बार दें।
पेट में कीड़े (WORM INFESTATION)
पालतू पशुओं के आमाशय, छोटी आत व बड़ी आत में विभिन्न तरह के कीड़े या कृमि (worms) पाये जाते हैं जिनकी वजह से कई तरह के रोग पैदा हो जाते है। जैसे कब्ज, दस्त, कमजोरी, खून की कमी, शारीरिक वृद्धि में कमी, सुस्ती,
दूध उत्पादन में कमी आदि ।
• चायना ( China)
जब कीड़ों के कारण भूख अधिक या एकाएक कम हो, गोबर में बदबू, काला गोबर पांच बूंद दिन में दो बार पांच दिन तक दें।
● सिना ( Cina)
भूख कम या अधिक, कब्ज या दस्त, कमजोरी, पांच बूंद दिन में दो बार पांच दिन तक दें।
• मर्क सोल (Mercurium Solubills)
छः बूंद दिन में दो बार दें ।
• आर्सेनिकम (Arsenicum)
यदि ऊपर वाली दवाइयां असर नहीं करें तो इसे दिन में दो बार दें।
• फिलिक्स मास ( Filix mas)
यह टेपवर्म के लिए प्रभावी दवा है। छः बूदें दिन में तीन बार दें।
काली म्यूर (Kali Mur )
यह छोटे थ्रेड वर्म के लिए प्रभावी दवा है। जब कुत्ते एनस को रगड़े तो इसे दिन में दो बार पांच दिन तक दें।
पेचिश या खूनी दस्त (DYSENTERY)
यह सामान्य दस्त से गंभीर होता है। जिसमें आंतों की म्युकस मेम्ब्रेन में सूजन हो जाती है। दस्त का इलाज न होने पर भी यह पेचिश में बदल सकता है। पेचिश अधिक गमी, बुखार, अचानक तेज सर्दी तथा सड़ा-गला चारा खाने, दुषित पानी पीने से, आदि कारणों से हो सकती है। सामान्य दस्त का उचित इलाज नहीं होने पर भी यह कभी-कभी खूनी दस्त में बदल सकता है।
खूनी दस्त होने पर बार-बार म्यूकस मिला हुआ या आंतों की म्युकस मेम्ब्रेन के टुकड़े मिला हुआ, ब्लड मिला दस्त होता है तथा साथ में दर्द भी होता है। बार-बार दर्द के कारण रोगी पशु की कमर धनुष की तरह मुड़ सी जाती है।
• एकोनाइट (Aconite)
इसे एक्युट केस में दें जब दस्त के साथ बुखार भी हो। एकोनाइट को नक्स वोमिका के साथ एक के बाद दूसरी देने पर जल्दी फायदा होता है। इसकी चार-पांच डोज हर घंटे में दें।
नक्सवोमिका (Nuxvomica)
प्रायः खूनी दस्त के साथ कब्ज भी होता है। एकोनाइट के साथ नक्स को एक के बाद एक दें। जब तक फीवर कम न हो जाय। जब बुखार हो तो इसे अकेला ही दे सकते हैं। इसे हर दो घंटे में दे लेकिन एक दिन से ज्यादा नहीं दें।
• मक्युरिस कोर (Mercurius Cor.)
जब एकोनाइट तथा नक्सवोमिका से भी खूनी दस्त बंद न हो। दस्त के साथ म्युकस व ब्लड निकलना जारी रहे, दस्त के साथ बदबू भी आए तो मर्क कोर देवें। जब एनस के आसपास के भाग में सूजन सी हो जाय, दस्त के दौरान
दर्द हो तो मर्क कोर फायदा करता है।
• कोलोसिन्थिस (Colocynthis)
यह सभी तरह की डिसेन्ट्री में लाभदायक है। इसे उस समय दें जब दस्त के साथ उबकाई सी हो, तेज कॉलिक हो तथा चिकना गोबर या मल निकलता हो, दस्त के साथ ब्लड या म्युकस निकलता हो। यह उस समय ज्यादा लाभकारी है जब दस्त के कारण तेज दर्द हो । कमर धनुष की तरह मुड़ सी गई हो। कभी बुखार तो कभी ठंड सी कंपकंपाहट होती है। इसे मर्क कोर के प्रयोग के बाद भी काम में ले सकते हैं। इसे हर तीन घंटे में दें।
हाइड्रेस्टिस (Hydrastis)
जब खूनी दस्त गंभीर हो, जब रेक्टम में अल्सर से घाव हो जाय, मवाद मिली हुई दस्त हो, मल या गोबर कम हो। ऐसा प्रायः लिवर रोग के साथ होने से भी होता है। इसके मदर टिंक्चर की डोज हर चार घंटे
में देवें। इसी तरह मदर टिक्चर को पतला कर एनिमा भी दे सकते हैं। पांच बूद हर चार घंटे तथा आधा ड्राम मदर टिंक्चर को सौ मिली. पानी में मिला कर एनिमा दें।
आर्सेनिकम (Arsenicum)
जब कमजोर पशु खूनी दस्त के कारण ग्रस्त हो जाय, दस्त पतला बार बार, ब्लड मिला हुआ, हरा लाल या काला सा, बदबूदार दस्त, गैस भी निकलती हो, दस्त के साथ पेट दर्द हो तो आर्सेनिकम दें सकते हैं। इसे उस समय भी प्रयोग में ले सकते हैं जब त्वचा तथा शरीर के कुछ अंग जैसे पैर ठंडे पड़ गये हों। एक डोज हर दो घंटे में दें।
सल्फर (Sulphur)
क्रॉनिक डिसेन्ट्री में सल्फर को मर्क कोर के साथ एक के बाद एक दें।
बायोकेमिक दवाएं (Biochemic)
कैल्केरिया फॉस्फोरिका 3x, काली म्यूर 3x., काली फॉसफोरिकम 3x, फेरम फॉस्फोरिकम 12x, मैग्नेशिया फॉस्फोरिकम् 3x नैट्रम फॉस्फोरिकम् 3x तथा नैट्रम सल्फ 3x इन सभी बायोकैमिक इवाइयों को मिलाकर देने से डिसेन्ट्री में काफी लाभ होता है।
भूख न लगना (ANOREXIA)
प्रायः हर रोग के साथ पशु खाना पीना कम कर देता है तथा रोग से उबरते
ही फिर से पहले की तरह खाना पीना शुरू कर देता है। भूख कम लगना हल्के
रूप में भी हो सकता है या पशु बिल्कुल खाना पीना बंद भी कर सकता है। कभी कभी पशु सिर्फ एक विशेष प्रकार का आहार नहीं खाता है। कभी कभी मुंह में घाव होने, किसी चोट, सूजन या कोई चीज फंसी होने के कारण भी पशु नहीं खाता है। इसलिए रोग के इलाज से पहले पशु की जांच भी कर लेनी चाहिए।
आर्सेनिकम (Arsonicum)
सडा गला, फफूंद लगा, अधिक सूखा या सख्त चारा खाने से हाजमा खराब हो और भूख नहीं लगे तो आर्सेनिकम की पांच बूंद दिन में दो बार दें।
नक्सवोमिका (Nuxvomica)
जब किसी डायजेस्टिव गड़बड़ी के साथ कठोर मिंगने जैसा गोवर या मल आता हो तो नक्सवोमिका की पांच बूंद दिन में तीन बार दें।
पल्सेटिला (Pulsatilla)
जब भूख कम लगने के साथ प्यास भी नहीं लगती हो या दस्त हो, पैर ठंडे पड़ गये हो तो पल्सेटिला दें। पांच बूंद दिन में दो बार दें।
) पेरोटाइटिस (PAROTITIS)
प्रायः दूसरी सेलिवरी ग्लेड्स के मुकाबले पेरोटिड ग्लेण्ड ही अधिक प्रभावित होती है। इसमें इन्फेक्शन होने से सूजन हो जाती है। कभी-कभी तो गले तक सूजन हो जाती है। अडिमा भी हो जाता है तथा सांस में तकलीफ होती है।
बेरिटा कार्बोनिका (Baryta Carbonica)
छोटे बछड़ों में यह रोग होने पर दिन में दो बार पांच दिन तक दें।
बेलाडोना 1000 (Belladonna 1M )
जब पेरोटाइटिस में सूजन के साथ त्वचा गर्म हो, सूजन कठोर हो तो बेलाडोना हर घंटे चार-पांच बार दें।
हिफर सल्फ (Hepar Sulph)
ग्लेण्ड की सूजन के साथ तेज दर्द हो तथा मवाद बननी शुरू हो गई हो।
पल्सेटीला (Pulsatilla)
जब दाहिने साइड की पैरोटिड ग्लैण्ड में सूजन हो तो दिन में दो बार चार दिन तक दें।
फायटोलेका (Phytolacca)
जब पेरोटिड ग्लेण्ड में कठोर सूजन हो, मवाद नहीं बनी हो तथा आस पास की दूसरी ग्लेण्ड्स भी प्रभावित हो सकती है तो पांच बूंद दिन में तीन बार तीन दिन तक दें।