ऑरम मेटालिकम (AURUM METALLICUM)
ऑरम मेटालिकम (AURUM METALLICUM)
ऑरम मेटालिकम (AURUM METALLICUM)
हड्डी का घाव, श्वसन तंत्र का पुराना रोग, नाक से गाढा म्युकस, मवाद, पानी, ब्लड आदि निकलना । आंख के सफेद भाग का लाल हो जाना, कॉर्निया के ऊपर हल्के घाव नाक की हड्डी का घाव ।
कान से बदबूदार मवाद निकलना, कान बार बार हिलाना, सिर टेढा रखना (ओटोरिया)।
अण्डकोषों ( scrotum) के ऊपर सूजन व दर्द होने पर युटेरस का प्रोलेप्स होने पर।
एकोनाइट नेपेलस (ACONITE NAPELLUS)
एकोनाइट नेपेलस (ACONITE NAPELLUS)
काष्टविष- डकरा- यह दवा एक पेड़ के सारे भागों से तैयार की जाती है। एकोनाइट होम्योपैथी की एक प्रधान दवा है। इसका प्रमुख एक्शन नर्वस सिस्टम व सेरेब्रो स्पाइनल पर होता है। इसलिए किसी भी रोग में सूजन व उसके कारण। बुखार की स्थिति में यह पहली दवा है।
इसे अधिकतर रोगों की शुरूआती अवस्था में दिया जाता है और काफी लाभ होता है इसी प्रकार शरीर के किसी भी भाग में सूजन (inflammation) को दूर करने की यह पहली दवा है। यह तेज तथा लगातार रहने वाले बुखार में ही असरदार है। बुखार के साथ पसीना नहीं आता है। पसीना होने पर इसकी जरूरत नहीं होती है। जब बुखार के साथ पसीना आता हो तो एकोनाइट की जगह बेलाडोना दें।
• एसिड्स, एल्कोहल, कॉफी, खट्टे फल, खट्टे फलों का रस आदि एकोनाइट के असर को खत्म कर देते हैं।
• एनिमल को बेचैनी, फीवर, भय, नाड़ी या सांस तेज चलना, शॉक, छटपटाहट, जोर की प्यास आदि । • मसल्स, म्युकस मेम्ब्रेन, स्किन आदि भागों पर सूजन के साथ बुखार ।
• अधिक ठंड, अधिक गर्मी के कारण शॉक या बेचैनी, ऑपरेशन का आघात।
• सर्दी, नाक में सूजन, छींके आना, पानी गिरना, सूखी खांसी, न्युमोनिया।
• मेस्टाइटिस की शुरूआती अवस्था, अडर में सूजन, लाल तथा गर्म हो
• आंखों में सूजन, लाल होना, पानी गिरना।
बार बार पानी की तरह दस्त, गोबर के साथ रक्त या म्युकस मिला हो, गोबर हरा, काला, पेटदर्द।
● किसी भी रोग में तेज बुखार की शुरूआती अवस्था जब बेचैनी, प्यास होती है लेकिन पसीना नहीं होता है।
अल्फा-अल्फा (ALFA-ALFA) Lucerne or California Clover
अल्फा-अल्फा (ALFA-ALFA) Lucerne or California Clover
यह रिजका या लुसर्न प्रजाति की एक प्रकार की घास होती है जो काफी पौष्टिक होती है तथा मुख्य रूप से पाचन सम्बंधी रोगों में काम में ली जाती है यानी पाचन को सही कर भूख बढ़ाती है और अंततः शरीरिक वृद्धि कार्य क्षमता, बल व स्टेमिना बढ़ाती है। यह मनुष्य में बलवर्धक टॉनिक के रूप में खूब उपयोग में लिया जाता है। बिना कोई रोग के इसे नियमित रूप से प्रयोग में लिया जा सकता है।
• दूधारू पशुओं में दूध की मात्रा तथा गुणवत्त में भी वृद्धि करती है।
• इसके प्रयोग से शरीर में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, वसा, खनिज लवण आदि का पाचन सही होता है।
● किसी भी रोग में यह भूख को बढ़ाती है।
मुर्गियों में यह अंडों के उत्पादन में वृद्धि करती है।
एलेट्रिस फेरिनोसा (ALETRIS FARINOSA) Star Grass
एलेट्रिस फेरिनोसा (ALETRIS FARINOSA) Star Grass
यह एक विशेष प्रकार की घास से बनी औषधी है जो मुख्य रूप से मादा पशुओं के स्वास्थ्य लाभ हेतु काफी उपयोगी है। गर्भकाल के दौरान वेजाइना, युटेरस आदि में ढीलापन होने पर गर्भाशय के बाहर आने (prolapse of uterus) रक्त कभी काला, कभी थक्का वाला आदि के इलाज में काफी उपयोगी।
• गाय-भैसों में बार बार होने वाले गर्भपात में काफी लाभकारी। गर्भाशय में मवाद बनने (endometritis) के रोग में
• गर्भाशय में गाय भैस के शारीरिक दुर्बलता, एनीमिया । एलिट्रिस फेरिनोसा की 30 पोटेन्सी को इन रोगों में 20-30 दिन तक देंवे ।
एंटिमोनियम कूडम (ANTIMONIUM CRUDUM) Black Sulphide of Antimony
•एंटिमोनियम कूडम (ANTIMONIUM CRUDUM) Black Sulphide of Antimony
यह औषधी एंटिमनी सल्फाइड से बनाई जाती है जिसे स्किन तथा पेट की बीमारियों में अधिक प्रयोग में लिया जाता है। बच्चों के लिए अधिक लाभदायक।
अधिक आहार खाने से पेट बंध जाना, कभी दस्त व कभी कब्ज, गोबर भीगने के रूप में आना। गर्मी के दिनों में दस्त में अधिक लाभदायक। नाक, मुंह व होंठ के चारों ओर स्किन फटना, पपड़ी सी जमना, एग्जिमा।
त्वचा पर सींग जैसे नुकीले फोड़े होने पर, एग्जिमा ।
इसके साथ हिफर, मर्क, पल्सेटिला नहीं दें।
एंटिमोनियम टार्टरिकम (ANTIMONIUM TARTARICUM)
एंटिमोनियम टार्टरिकम (ANTIMONIUM TARTARICUM)
Tartar Emetic
टार्टर एमेटिक, एंटिमोनी और पोटाश से बनाई जाने वाली इस औषधी को
सर्दी, न्युमोनिया, खांसी, ब्रोंकाइटिस यानी रेस्पिरेटरी सिस्टम की बीमारियों
में प्रयोग में लिया जाता है।
जब रोगी को न्युमोनिया के साथ खांसी तो आती है लेकिन कफ नहीं निकलता हो। रोगी हमेशा शांत रहता है।
• दमा जिसमें पशु को दर्दभरी खांसी होती है, गले में गर्र-गर्र की आवाज आती हो मानो गला बलगम से भरा हो जो सहज बाहर नहीं आता हो। • एंटिमोनी टार्ट इन्डायरेक्ट रूप से पैरासाइट्स पर भी असर करता है
एपिस मेलिफिका (APIS MELLIFICA)
एपिस मेलिफिका (APIS MELLIFICA)
Bee Poision
एक विशेष प्रकार की मधुमक्खी के पॉयजन को एल्कोहल में मिलाकर यह विशेष दवा बनाई जाती है, चुंकि इसका एक्शन बहुत धीरे होता है इसलिए इसे बार बार प्रयोग नहीं करना चाहिए।
. कुत्तों में एसाइटिस (Ascites) में यह काफी गुणकारी है। शरीर के किसी भाग पर अडिमा (oedema) में काफी उपयोगी।
किसी रोग में जब बेचैनी, प्यास अधिक लगने तथा गर्मी के बेचैनी होने पर पैर के जोड़ों में सूजन (synovitis), गले में
सूजन, सांस में तकलीफ होने पर।
गाय-भैसों में फॉलीकुलर सिस्टिक आवेरी (follicular cystic ovaries) के उपचार में एपिस मेल तथा ल्युटियल सिस्ट (luteal cyst) में पल्सेटिला दें।
● एपिस मेल के साथ कैन्थर, इपिकाक,
लिडम, नमक, मीठी चीज, तेल, प्याज नहीं दें।
अर्निका मोन्टाना (ARNICA MONTANA)
अर्निका मोन्टाना (ARNICA MONTANA)
Leopard's Bane
यह दवा लिओपर्डस बेन नामक पौधे से बनाई जाती है तथा यह होम्योपैथी में अधिक काम में आने वाली दवाइयों में से एक है।
● शरीर के किसी भाग पर चोट, गिरने से पैदा होने वाले लक्षणों में विशेषकर चोट के बाद रक्त जम जाने (hematoma), सूजन होने, कुचल जाने पर दर्द पर उपयोगी चोट के कारण बेहोशी हो ।
इसका असर वहां अधिक होता है जहां चोट में स्किन फटी नहीं हो। • अधिक थकान, मांसपेशियों में खिंचाव आदि में यह मांसपेशियों के लिए टॉनिक का काम करती है।
ऑपरेशन से पहले व बाद में देने पर यह शॉक की संभावना को कम करती है तथा ब्लीडिंग रोकती है।
• गर्भावस्था में देने से पशु आसानी से ब्याता है तथा ब्याने के बाद देने से गर्भाशय के अंदर की ब्लीडिंग,
सूजन, घाव, चोट के कारण गर्भपात आदि रोकने में काफी मदद मिलती है। गाय-भैंसों के ब्याने के बाद मिल्क फीवर में उपयोगी।
सिर में चोट, दुर्घटना आदि में बेहोशी होने पर अर्निका का उपयोग काफी लाभकारी। इससे लाभ नहीं हो तो हेलिबोरस दें। चोट के कारण स्किन और मांस कट फट जाये
तो कैलेण्डुला को घाव पर लगाए तथा मुंह से
भी दें। यदि हड्डी में चोट या टूटी हो तो सिम्फाइटम
दें। अर्निका रक्त स्त्रव को भी रोकता है।
अर्निका के साथ-साथ एकोनाइट, आर्सेनिक, कैम्फर, चाइना, इपेकाक का प्रयोग न करें।
आर्सेनिकम एल्बम (ARSENICUM ALBUM)
आर्सेनिकम एल्बम (ARSENICUM ALBUM)
Arsenic Trioxide
यह एक तरह का विष (संखिया) है। रोग के साथ बैचेनी शरीर में सूजन और प्यास लगती हो तो इसे देते हैं। एकोनाइट सूजन या दर्द की पहली अवस्था में और आर्सेनिक रोग की बढ़ती हुई अवस्था में दी जाती है।
यह दवा आर्सेनिक ट्राइआक्साइड नामक केमिकल से बनाई जाती है जिसका उपयोग सभी टिश्यु प्रकार व अंगों के रोगों में किया जाता है
रोग के ऐसे लक्षण जैसे थकान, बेचैनी, कमजोरी,
बुखार आदि दोपहर तथा रात को अधिक तेज होते है। गाय भैसों के खुरपका मुहपका रोग (FMD) का प्रकोप रोकने तथा रोग की
बाद की स्थिति में ।
● स्किन के रोग जैसे खुजली, एग्जिमा विशेषकर सूखे एग्जिमा की यह प्रमुख दवा है। जब चर्म रोग में बहुत बदबू हो। स्किन से सूखी पपडी निकलती हो|
सर्दी बुखार की पहली अवस्था, नाक से पानी गिरना, छींके आना, न्युमोनिया, शरीर के बाल खड़े होना, सुस्ती, बेचैनी, बार बार थोड़ा पानी पीना, तेज सांस चलना।
कोक्सिडियोसिस व कोलाई बिसिलोसिस के इलाज की यह पुख्ता दवा है।
किसी भी तरह का घाव जो सड़ रहा हो, बदबूदार पतली मवाद । • हरे, काले, पीले पानी की तरह दस्त, मछली जैसी बदबू थोड़ा खाते ही दस्त,
दस्त के साथ पेट दर्द। बहुत खुजली और खुजलाने के बाद जलन हो ।
आर्सेनिक के साथ चिना, सल्फर, चाइना, हिफर, इपिकाक, मर्क, नक्सवोमिका नहीं दें।
आर्सेनिकम आयोडेटम (ARSENICUM IODATUM)
आर्सेनिकम आयोडेटम (ARSENICUM IODATUM)
lodine of Arsenic
यह दवा आर्सेनिक और आयोडिन के मिलन से बनाई जाती है जिसका उपयोग विशेषकर सर्दी, सर्दी के साथ दमा, बुखार, आंख, कान में सूजन, थनों में सूजन आदि में किया जाता है।
यह आर्सेनिकम एल्बम से अधिक लाभकारी होती है तथा अन्य दवाइयां
नाकाम होने पर इसका प्रयोग किया जाता है और प्रभावी काम करती है।
● विशेषकर गंभीर न्युमोनिया, ब्रोंकाइटिस, नई सर्दी आदि में। • नेजल डिस्चार्ज में म्युकस के साथ हल्का ब्लड मिला हो, नाक में घाव से
हों, सांस में तकलीफ हों।
बछड़ों को पौष्टिक आहार देने के बावजूद अच्छी शारीरिक वृद्धि नहीं होना । • गायों के कान से मवाद निकलना, अनेक लिम्फ ग्लेण्ड्स फूल जाना।
औरम म्युरिएटिकम (AURUM MURIATICUM NATRONATUM) Sodium Chloroaurate
औरम म्युरिएटिकम
(AURUM MURIATICUM NATRONATUM) Sodium Chloroaurate
यह दवा फीमेल एनिमल के विभिन्न रोगों में काफी उपयोगी है। • गर्भाशय में ट्यूमर (uterine tumor), एड्रोमेट्राइटिस, युटेरस के प्रोलेप्स।
• सर्विक्स, ओवरी व गर्भाशय रोगों में।
ब्याने के बाद गर्भाशय को फिर से जल्दी सामान्य अवस्था (involution) लाने में लाभकारी।
● पेशाब में बदबू, पेशाब गंदला, बार-बार पेशाब करना।
एकेनिशिया (ECHINACEA)
एकेनिशिया (ECHINACEA)
Purple Cone Flower
यह दवा पर्पल कोन फ्लोवर नामक वनस्पति से तैयार की जाती है जिसे ब्लड प्योरिफायर (blood purifier) भी कहा जाता है।
शरीर में पॉयजनिंग तथा सेप्टिसीमिया में इसका प्रयोग लाभकारी है।
इसका असर ब्रेन की तंत्रिकाओं पर भी होता है इसलिए गाय भैंस ब्याने के बाद बछड़ा मर जाने पर वह शोक के कारण दूध नहीं देती है उसे एकेनिशिया देना चाहिए। शोक, दुःख या भय के कारण उपजी स्थिति में यह लाभकारी है।
इपिकाकुआन्हा (IPECACUANHA)
इपिकाकुआन्हा (IPECACUANHA)
Ipecac Root
यह दवा ब्राजिल के जंगलों में पायी जाने वाली इपिकाक नामक वनस्पति की जड़ों से बनाई जाती है जिसमें एमेटिन (emetine) नामक तत्व होता है। मिचली आना तथा उल्टी करना इसका प्रमुख लक्षण है। कुत्तों में उल्टी कराने के लिए इसे अधिक मात्रा में देते हैं और कम मात्रा में देने पर यह उल्टी रोकता है।
खाने पीने की गड़बड़ी, खायी हुई चीज अच्छी तरह न पचने से पेट दर्द, उल्टी दस्त, अजीर्ण आदि कोई भी पीड़ा हो तो नक्सवोमिका, इपिकाक और पल्सेटिला में से किसी एक का प्रयोग करते हैं।
अधिक खाने से बछड़ों व बड़े पशुओं में यदि मिचली व उल्टी होने की संभावना हो तो इसे देवें ।
• गोबर का रंग हरा काला, पेड़ के पत्ते जैसे हरा, घास के समान, उसमें झाग जैसे हों, ब्ल्ड मिला गोबर डिसेन्ट्री होने के रोग में उपयोगी
• शरीर के किसी भाग नाक, मुंह, फेफड़े, रेक्टम, युटेरस आदि की ब्लीडिंग हो तो हैमोमोलिस, सैबाइना, सिकेलि, ट्रिलियम आदि दवाएं देते हैं लेकिन यदि ब्लीडिंग के साथ उल्टी जैसी स्थिति हो, सांस में तकलीफ हो तो इपिकाक अधिक लाभ करती है।
• यदि शरीर के किसी भाग से तेज चमकीला लाल रंग की ब्लीडिंग हो रही हो। जैसे थनैला रोग में इपिकाक दें। दूध के साथ ब्लड आता हो तो
● बछड़ों में उजला पीला दस्त (white scour)
व कोक्सिडियोसिस हो ।
• तेज खांसी जिसमें पशु का खांसते खांसते बुरा हाल हो जाए. खासी के साथ ब्लड की उल्टी हो । गाढ़ी सर्दी जिसमें नाक भरी हो, बोंकाइटिस साथ में बुखार व उल्टी जैसी स्थिति हो तो इपिकाक दें।
• तेज
बुखार के साथ यदि मिचली हो या उल्टी हो
तो इपिकाक दें।
• इपिकाक के साथ अर्निका, सिना, नक्स वोसिका, आर्सेनिक एल्बम नहीं दें।
इयुफ्रेसिया (EUPHRASIA OFFICINALIS)
इयुफ्रेसिया (EUPHRASIA OFFICINALIS)
Eye bright
यह दवा आई ब्राइट नामक यूरोपीय वनस्पति से बनाई जाती है। आंख के • रोगों में काम आने वाली यह एक प्रमुख दवा है। विशेषकर कंजक्टिवाइटिस तथा कॉर्नियल अल्सर में काफी उपयोगी है। आंख व नाक की म्युकस मेम्ब्रेन की सूजन, पानी गिरने में यह उपयोगी है।
आखों से पानी के साथ चिपचिपा डिस्चार्ज हो, पलकों में सूजन हो । • इसे आंख में उपयोग के साथ मुंह द्वारा 1:10 पतला कर देना चाहिए।
इयुफ्रेसिया के साथ कॉस्टिकम, पल्से, कैम्पर दवाइयां नहीं दें।
अमोनियम कार्बोनिकम (AMMONIUM CARB)
अमोनियम कार्बोनिकम (AMMONIUM CARB)
Carbonate of ammonia or smelling salt
यह दवा चूना व नौसादर को बराबर मात्रा में मिलाने से बनाई जाती है। जिसका उपयोग श्वास अगों की म्युकस मेम्ब्रेन प्रभावित होने पर किया जाता है। इस दवा को अच्छी तरह पैक कर रखना चाहिए ताकि उड़े नहीं।
जब पशु सर्दी में ठंडी हवा के सम्पर्क में आते ही जुकाम से पीड़ित हो जाए, नाक से डिस्चार्ज, नाक में रूकावट से सांस में तकलीफ हो।
सांस के मार्ग में दर्द हो, गले में खरास म्युकस के साथ ब्लड मिला हो
पाचन में गड़बड़ी, रुमन की सामान्य क्रिया गड़बड़ाने पर। • इसके साथ अर्निका, हिपर व कैम्फर नहीं दें।
अमोनियम कौस्टिकम (AMMONIUM CAUSTICUM)
अमोनियम कौस्टिकम (AMMONIUM CAUSTICUM) Ammonia water
यह दवा अमोनिया वॉटर यानी एक्वा ऑफ अमोनिया से बनाई जाती है जिसे मुख्य रूप से खांसी, गले में खरास व रेस्पिरेटरी सिस्टम की अन्य बीमारियों में उपयोग में लिया जाता है।
जब नाक से जलन के साथ, खाल गला देने वाला पतला डिस्चार्ज निकलता हो, लेरिंक्स में सूजन के कारण आवाज भी नहीं आती हो।
बेलोडोना (BELLADONNA)
बेलोडोना (BELLADONNA) Deadly Nightshade
यह दवा धतुरा नामक वनस्पति के जब फूल आते हैं उसी अवस्था में सम्पूर्ण
पौधे से तैयार की जाती है। इसका प्रयोग निम्न लक्षणों में अधिक होता है। बेलाडोना लगातार रहने वाले फीवर में काम नहीं करता है जो बुखार एकाएक आते हैं तथा घटते बढ़ते हैं। उनमें यह फायदा करता है।
• नर्वस सिस्टम के लक्षण जैसे उत्तेजना, छटपटाना, ऐंठन, अकड़न, दर्द, पागलपन जैसे लक्षण, दर्द एकाएक होता हो तथा एकाएक गायब हो जाता हो। ऐसे में बेलाडोना ज्यादा प्रभावी होता है।
ब्लड वेस्कुलर सिस्टम के लक्षण, त्वचा के रोग व ग्लेण्ड्स में सूजन। ● ब्याने के बाद एक्युट मेस्टाइटिस (acute mastitis) में जब अडर गर्म, सूजन, तना हुआ हो तथा दर्द हो ।
• व्याने के बाद मिल्क फीवर की वह अवस्था जिसमें पशु पैर छटपटाता हो।
• आंखों में सूजन, खून सी लाली, दर्द, जलन, पानी गिरना। • बेलाडोना को एकोनाइट, हिफर सल्फ, ब्रायोनिया, मर्क सॉल आदि के साथ
प्रयोग नहीं करना चाहिए।
बेलिस पेरेनिस (BELLIS PERENNIS)
बेलिस पेरेनिस (BELLIS PERENNIS)
Daisy
• यह दवा गुलबहार (daisy) नामक वनस्पति से बनाई जाती है। जिसका
प्रमुख एक्शन ब्लड वेस्कुलर सिस्टम की मसल्स पर होता है। • बड़े ऑपरेशन के बाद, शरीर पर घाव, चोट आदि में कई विशेषज्ञों के अनुसार चोट लगने, मोच आने और कुचल जाने के कारण होने वाले दर्द में यह अर्निका से भी ज्यादा फायदा करती है।
ब्याने के बाद गर्भाशय व अन्य संबंधित अंगों की टोन बढ़ाने के लिए इस अर्निका के साथ एक के बाद दूसरी दें।
बेर्बेरिस वल्गेरिस (BERBERIS VULGARIS )
बेर्बेरिस वल्गेरिस (BERBERIS VULGARIS )
Barberry
यह दवा बारबेरी नामक वनस्पति की जड़ से बनाई जाती है। • गुर्दे व गॉल ब्लेंडर से जुड़े रोग जैसे गुदों में सूजन, गॉल ब्लेडर में पथरी। • मूत्राशय में सूजन, हीमेचुरिया, ब्लड मिला हुआ मूत्र आना आदि।
बोरेक्स या सुहागा (BORAX)
बोरेक्स या सुहागा (BORAX) Borate of Sodium
• मुंह के घाव, बहुत दिनों से बहने वाली कान की मवाद, आंख के रोग, दस्त मेट्राइटिस, डाहयरिया आदि बीमारियों में इसका प्रयोग अधिक होता है।
● पशुओं के मुंह में जीभ, तालु पर, खुरपका-मुंहपका रोग के छाले, स्टोमेटाइटिस, मुंह से लार टपकने पर, नाक व मुंह पर चारों ओर पपड़ी जम जाना आदि लक्षणों में ग्लिसरीन के साथ मिला कर दो-चार दिन जीभ व मुंह में लगाने से काफी आराम होता है। जीभ में छालों पर शहद में बोरेक्स या अन्य दवा मिला कर प्रयोग नहीं करना चाहिए क्योंकि शहद, चीनी व अन्य मीठी चीजों से एसिड फर्मेन्टेशन अधिक होता है जिससे घाव और अधिक बढ़ जाते हैं। आंखों की बीमारी में पलकों से लसदार चिपचिपा पदार्थ जमना, आखें चिपक
जाना, पलकों के किनारे दर्द होना आदि में इसका प्रयोग करें। • वेजाइना या युटेरस से सफेद, चिकना चिपचिपा मवाद या डिस्चार्ज निकलता
हो तो बोरेक्स का प्रयोग करें।
कान के रोग में कान से मवाद आना (otorrhoea), कान फूलना, कान पकने पर इसके प्रयोग से फायदा होता है।
ब्रोमियम (BROMIUM)
ब्रोमियम (BROMIUM)
नमकीन झरने के पानी में और समुद्री पानी में यह आयोडिन तत्व के साथ मिलता है जो रासायनिक प्रक्रिया द्वारा निकाला जाता है। शुद्ध पानी, डायल्यूट एल्कोहल तथा स्पिरिट में मिलाकर अलग अलग शक्तियों का ब्रोमियम तैयार किया जाता है।
● इसका मुख्य एक्शन रेस्पिरेटरी सिस्टम की म्युकस मेम्ब्रेन, ट्रेकिया, लेरिंक्स के अलावा पेरोटिड ग्लेण्ड पर भी होता है।
खासी, दमा, सूखी खांसी, काली खांसी में इसका अच्छा फायदा होता है। • अंडकोषों की बीमारी- अंडकोष फूलना, कड़े हो जाना, दर्द हो । • ब्रोमियम सेवन करते समय दूध का सेवन नहीं करें।
ब्रायोनिया ऐल्बा (BRYONIA ALBA)
ब्रायोनिया ऐल्बा (BRYONIA ALBA)
White Bryony
• यूरोप में पायी जाने वाली यह एक प्रकार की बेल होती है। फूल और फल लगने से पहले इसकी जड़ से सत्व निकाल कर दवा तैयार की जाती है। 25
• फायब्रस टिश्यु फेफड़े, सिरस मेम्ब्रेन, सायनोवियल मेम्ब्रेन, ब्रेन, प्लुएरेसी, हर्ड मेस्टाइटिस आदि में इसका असर अच्छा होता है।
• ब्रोंकाइटिस, ब्रोंकोन्युमोनिया आदि की पहली
अवस्था में इसका प्रयोग करें।
प्लुऐरेसी, मेनिंजाइटिस, पेरिटोनाइटिस, पेरिकार्डाइटिस आदि बीमारियों में सुई गड़ने जैसा दर्द हो तो ब्रायोनिया प्रयोग में लें।
बुखार- सर्दी, जुकाम या अन्य रोगों के बुखार में इसका प्रयोग करें।
साथ
• खांसी- सूखी खांसी जिसमें बलगम नहीं निकलता हो, खासी के सिरदर्द हो तो प्रयोग करें।
● मेस्टाइटिस (Mastitis) - लाल, गरम, हार्ड
अडर में तेज दर्द होने पर। कब्ज- सूखेपन के कारण गोबर या मल
सख्त मेगने के रूप में काले रंग का आता हो तो प्रयोग करें।
• जिन रोगों की नई अवस्था में ब्रायोनिया का प्रयोग होता है उन रोगों की पुरानी अवस्था में ऐल्युमिना का प्रयोग किया जाता है।
कैल्केरिया कार्बोनिकम (CALCAREA CARBONICUM)
कैल्केरिया कार्बोनिकम (CALCAREA CARBONICUM)
Carbonate of Lime
यह दवा कार्बोनेट ऑफ लाइम के पाउडर को एल्कोहल में मिलाकर तैयार की जाती है। किसी भी रोग में इसका प्रयोग करते समय रोग की अपेक्षा इस केमिकल के गुणों पर अधिक ध्यान देना चाहिए।
• शरीर में कभी कभी केल्शियम की कमी में तथा मेग्नेशियम की कमी में
मेग्नेशिया फॉस, फॉस्फोरस तथा केल्केरिया कार्ब दिया जाता है।
छोटे बछड़ों व पिल्लों में उल्टी दस्त से पशु बिल्कुल निढाल हो जाता है तो पहले चायना का प्रयोग करने से रोगी में थोड़ी जान आ जाती है उसके बाद केल्केरिया फॉस का प्रयोग करना चाहिए।
कान की बीमारी कान में मवाद, गाढी मवाद, दर्द होता है तो केल्केरिया कार्य फायदा करता है।
केल्केरिया फास्फोरिका (CALCAREA PHOSPHORICA)
केल्केरिया फास्फोरिका (CALCAREA PHOSPHORICA)
Phosphate of Lime
यह दवा फॉस्फेट ऑफ लाइम के पाउडर से तैयार की जाती है। यह हड्डियों के रोग, एनीमिया, शारीरिक कमजोरी, शरीर सूखता जाने पर, मेरुदण्ड में कमजोरी, टेढापन आदि में इसका प्रयोग अधिक किया जाता है।
कैल्केरिया कार्ब हड्डी के सामने वाले भाग और कैल्केरिया फॉस हड्डी के सामने और पीछे दोनों ओर अपना असर करता हैं। बछड़ों और पिल्लों में से उल्टी दस्त से पशु बिल्कुल निढाल सा हो जाता
है। आंखें धंस जाती है। मृतप्राय सा पड़ा रहता है तो कैल्केरिया फॉस देवें
के टूट जाने पर यदि जल्दी नहीं जुड़े तो सिम्फाइटम देवें। यदि सिम्फायटम से लाभ नहीं हो तो केल्केरिया फॉस 6x से 12x तक प्रयोग करें। इससे हड्डी मजबूत हो जाती है। इसके प्रयोग से कोमल, कमजोर और सूखी हड्डी मजबूत, ताकतवर व पुष्ट हो जाती है।
कैल्केरिया फ्लोरेटा (CALCAREA FLUORATA)
कैल्केरिया फ्लोरेटा (CALCAREA FLUORATA)
Chloride of Lime
यह क्लोरोइड ऑफ लाइम से तैयार की जाती है। इसका प्रमुख एक्शन हड्डियों, ग्रंथियों और शिराओं पर होता है। हड्डी, आंख, दात के रोग आदि की यह बढिया दवा है।
आंख के रोगों में केटेरेक्ट में साइलिसिया, कोनियम व कैल्केरिया फ्लोर प्रयोग होती है। कुछ विशेषज्ञों के अनुसार केटेरेक्ट में सिनेरेरिया श्रेष्ठ दवा है। इसकी एक-दो बूंद को दिन में चार-पांच बार कई महीनों तक आंख में डालना पड़ता है। थोड़े दिन से लाभ नहीं होता है। आंख में डालने के साथ यदि मुह से भी कोई दवा ले तो जल्दी लाभ होता है।
दांत हिलने के साथ, दर्द हो, मसूढों में सूजन, जबड़ों में सूजन कठोर हो जाना और फूल जाना, दांत के अल्सर जैसे घाव।
• साइनोवाइटिस- जोड़ों के पुराने दर्द, सूजन में कैल्केरिया फ्लोर तथा नये रोगों में ब्रायोनिया प्रयोग करें।
• इसके अलावा अंडकोषों का फूलना (orchitis), कठोर, ट्यूमर, कमर का पुराना दर्द, बार बार गर्भपात, हड्डी के घाव में मवाद होने पर भी दी जाती है।
कैलेण्डुला ऑफिसिनेलिस (CALENDULA OFFICINALIS)
कैलेण्डुला ऑफिसिनेलिस (CALENDULA OFFICINALIS)
गेंदे के फूल की तरह दक्षिण यूरोप में भी इस प्रकार का फूल पाया जाता है जिसे मेरी गोल्ड कहते हैं। कैलेण्डुला मेरी गोल्ड का टिचर यानी मूल अर्क है। यह दवा घाव में लगाने के लिए बहुतायत से प्रयोग में ली जाती है।
घाव में सड़न होने पर भी इसका लोशन लगाने से जल्दी आराम मिलता है। चोट से चमड़ी छिल जाय, घाव बन जाय तो भी इसका प्रयोग करें।
यदि चोट के वजह से स्किन फटी न हो और हेमेटोमा बन गया हो, काला दाग पड़ गया हो, दर्द हो तो अर्निका प्रयोग करें।
धारदार अस्त्र से घाव होने पर दर्द होने पर पहले मुंह द्वारा अर्निका काम
में लें और यदि फायदा न हो तो लिडमसे का प्रयोग करें। घाव धोने के लिए कैलेण्डुला मदर टिंचर की 50-60 बूंद 250 मिली गरम
पानी में मिला कर लोशन बनाए घाव पर पट्टी बांधने के लिए मदर टिंचर
की 20-30 बूंद को ग्लिसरिन या वैसेलिन के साथ मिलाकर मरहम बना लें।
घाव पर अच्छे असर के लिए कैलेण्डुला ऑफिसिनैलिस की अपेक्षा कैलेण्डुला सक्कस अधिक प्रभावशाली है।
कैन्थेरिस (CANTHARIS)
कैन्थेरिस (CANTHARIS) Spanish Fly
• स्पेन में पायी जाने वाली एक प्रकार की मक्खी के टिंचर को कैन्थेरिस कहते हैं। इसका प्रयोग किडनी, मूत्रनली और त्वचा पर प्रमुख रूप से होता है। इसका प्रयोग नेफ्राइटिस, सिस्टायटिस के उपचार में किया जाता है।
आग में जलने के कारण जलन, पेशाब करने से पहले, करते समय और बाद में जलन, बूंद-बूंद पेशाब के साथ रक्त आना, नाक, मुह, मूत्रद्वार आदि से खून आना, त्वचा पर छाले, दाने या घाव हो तो कैन्थेरिस प्रयोग करें।
जैसी . मांस के धोवन जैसे फीके लाल रंग के पतले दस्त, मल के साथ खून म्युकस मेम्ब्रेन के टूकडे निकलना।
स्त्रियों व पुरुषों में जननेद्रियों में उत्तेजना तथा सेक्स डिजायर बढ़ाने के लिए
कैन्थेरिस दिया जाता है। • मूत्र मार्ग के रोगों में पथरी के कारण दर्द (renal colic) हो तो कैन्थेरिस 6 शक्ति 5-6 मात्रा 15 मिनट के अंतराल से देने से दर्द तुरंत गायब होता है।
कार्बो वेजिटेबिलिस (CARBO VEGETABILIS)
कार्बो वेजिटेबिलिस (CARBO VEGETABILIS)
लकड़ी के कोयले के चूर्ण से यह औषधी तैयार की जाती है। यह शरीर में ब्लड सर्कुलेशन सिस्टम पर असर कर शरीर को शक्ति प्रदान करती है। यह शरीर में कार्बन डाईआक्साइड की मात्रा कम कर ऑक्सीजन बढ़ाती है।
• दस्त में पेट फूलने और आलस, मोटापन में भी इसका प्रयोग किया जाता है। • अधिक रक्तस्त्राव होने पर कमजोरी (पर्निशस एनीमिया) में इसे दें।
• यदि दस्त के साथ आफरा हो तो कार्बोवेज, कब्ज या कडे गोबर के साथ
आफरा हो तो लाइकोपोडियम तथा पेट में अधिक गैस इकट्ठा होने से आफरा
हो तो ऐसाफिटिडा दें।
कौलोफायलम (CAULOPHYLLUM)
कौलोफायलम (CAULOPHYLLUM)
■ यह दवा ब्ल्यू कोहोश नामक वनस्पति की जड़ से तैयार की जाती है। प्रसव
के समय तथा प्रसव के बाद जब तक बछड़ा या पिल्ला मादा का दूध पीते रहते हैं इस दौरान विभिन्न रोगों में इसका प्रयोग किया जाता है। ■ कार्बो ऐनिमेलिस, सिमिसिफ्यूगा की तरह यदि प्रसव से कुछ दिन पहले से
ही इसका प्रयोग किया जाय तो प्रसव आसानी से होता है।
• अधिक प्रसव दर्द, मादा गर्भाशय का मुंह नहीं खुलना, प्रसव के बाद अधिक रक्तस्त्राव होना, प्रसव के बाद गर्भाशय का स्वाभाविक संकुचित न होना, प्रसव के बाद गर्भाशय ढीला पड़ जाने के कारण बहुत दिनों तक डिस्चार्ज आना, तथा इसकी वजह से पेट दर्द होना आदि में यह उपयोगी है।
गर्भाशय की मांसपेशियों में कमजोरी के कारण गर्भाशय बाहर आ जाने पर (prolapse of uterus) कौलोफायलम देवें।
प्रसव के बाद पशु काफी कमजोर हो जाने पर कोलोफायलम देवें ।
कौस्टिकम (CAUSTICUM)
कौस्टिकम (CAUSTICUM)
यह दवा जलाया हुआ पत्थर (caustic lime) और बायफॉस्फेट ऑफ पोटाश मिलाकर बनायी जाती है। गले, तंत्रिका तंत्र व त्वचा के रोगों में इसका अधिक प्रयोग किया जाता है।
यह सल्फर, सोरिनम, ग्रेफाइटिस, केल्केरिया कार्ब आदि की तरह एक प्रमुख सोरा विषनाशक और फॉस्फोरस विरोधी दवा है इसलिए कॉस्टिकम से पहले या बाद में फॉस्फोरस नहीं देना चाहिए।
गले के अंदर दर्द, तनाव और जलन में कॉस्टिकम लाभप्रद है। इसके अलावा
गले का स्वर बंद हो जाना, गले की आवाज कर्कश, लेरिंग्स में सूखापन में
उपयोगी है।
● मुह के रोगों में चेहरे का पक्षाघात, रोगी का मुह नहीं फाड़ सकना आदि। दात के रोगों में मसूढे फूल जाना, मसूढों से सहज ही खून निकलना, दांतों में दर्द होना, ठंड लगकर दात में दर्द हो तो कॉस्टिकम लाभदायक है।
• लेड पॉयजनिंग में यह एटीडोट की तरह काम करता है।
त्वचा पर मस्सों में थूजा प्रथम तथा कॉस्टिकम दूसरे नम्बर की दवा है। जब मस्सा फटा फटा हो तो थूजा देते हैं जबकि मस्सा ठोस, आकार छोटा और चपटा या नोकदार हो जो प्रायः पलक, नाक की नोंक, नाखून के किनारे पर होते हैं ऐसे में कॉस्टिकम दिया जाता है।
चेलिडोनियम मेजस (CHELIDONIUM MAJUS)
चेलिडोनियम मेजस (CHELIDONIUM MAJUS)
फ्रांस व जर्मनी में पायी जाने वाली एक वनस्पति से इसका टिंचर तैयार किया जाता है। लिवर दोष के कारण उत्पन्न रोगों में यह दवा अधिक प्रयोग में ली जाती है। इसके अलावा सिर, मुंह, कान, आंख के रोगों में भी इसका असर होता है।
छोटे पशुओं में कैपिलरी ब्रोंकाइटिस और न्युमोनिया, खांसी, लिवर रोग के बुखार, दस्त आदि में भी प्रयोग किया जाता है।
सिना (CINA)
सिना (CINA) - Worms Seed
● विशेष प्रकार के पौधे के सूखे फूल से इसका टिंचर तैयार होता है। मनुष्य के पेट के कीड़ों को मारने की यह एक बेहतरीन दवा हे। पशुओं में भी इसे प्रयोग में लिया जाता है। यह खासतौर से राउंडवर्म व थ्रेडवर्म की दवा है।
• यह टेप वर्म के अलावा अन्य प्रकार के कृमियों के लिए ज्यादा असरदार है। जिनकी वजह से कब्ज रहती है। कुप्रम ऑक्सीइडेटम नायग्रा 1x सभी तरह के कृमियों के लिए अच्छी दवा है। इससे टेपवर्म भी मर जाते हैं।
• कृमियों की अन्य दवाओं में फिलिक्स मास, सेंटोनाइन 1x, चेनापोडियम प्रमुख है। चेनापोडियम तेल की 8-10 बूंद मात्रा 2 घंटे के अंतराल से सिर्फ एक दिन 3 मात्रा (खाली पेट) सेवन करने से टेपवर्म और हुकवर्म में असरकारी है।
सिनकोना या चायना (CINCHONA OR CHINA)
सिनकोना या चायना (CINCHONA OR CHINA)
• पेरू व बोलिविया देशों में पाये जाने वाले सिनकोना पेड़ की सूखी छाल से इसका मदर टिंचर तैयार किया जाता है। इसका प्रयोग दस्त, बछड़ों में व्हाइट स्कोर, आफरा, रक्त स्त्राव, लिवर रोग, बच्चों के दूध पिलाने के बाद की कमजोरी आदि में इसका प्रयोग अधिक होता है।
• अधिक रक्त स्त्राव, ब्याने के बाद द्रव व रक्त स्त्राव के कारण कमजोरी, दस्त के बाद की कमजोरी, फेफड़े, नाक, गर्भाशय, आंत, पेट आदि अंगों से
अधिक द्रव स्त्राव के बाद कमजोरी में यह दवा उपयोगी है। चायना को एक टॉनिक के रूप में भी दिया जा सकता है।
आफरा व पेट फूलना में यह काफी उपयोगी है।
• शरीर में किसी भी स्थान से चमकदार लाल रक्त निकलने के बाद थक्का जमने लगे और इतना ज्यादा खून निकले कि रोगी सफेद सा पड़ जाय शरीर ठंडा हो जाय, ऐसी स्थिति में चायना कम पोटेन्सी में एक बूंद मात्रा, एक या आधा घंटे के अंतराल से देवें ।
प्रसव या गर्भस्त्राव के बाद फूल (सर्विक्स)अटक जाना तथा इसकी वजह से
अधिक रक्त स्त्राव होने पर चायना देना चाहिए। जो पशु कभी हष्ट-पुष्ट बलवान थे और रक्त स्त्राव, दस्त, सूजन आदि अन्य बीमारियों के कारण कमजोर हो जाए है उन्हें चायना दें।
साइक्यूटा विरोसा (CICUTA VIROSA)
साइक्यूटा विरोसा (CICUTA VIROSA)
यह जर्मनी में पैदा होने वाले एक तरह के वॉटर हेमलॉक का मूल अर्क है
जो शरीर के नर्वस सिस्टम पर अपना विशेष एक्शन करता है जैसे स्पाइनल
कोर्ड पर चोट, सेरेब्रोस्पाइनल नेक्रोसिस, टेटेनस, खींचन, मिल्क फीवर,
मेनिंजाइटिस आदि
शरीर में तनाव, शरीर धनुष के समान हो जाए या बेहोश सा होना। पशु के व्याने से पहले गर्भावस्था में और ब्याने के बाद इस तरह के दौरे पड़ना। एपिलेप्सी के दौरे, फिट्स कन्वल्जन ।
• ब्रेन या स्पाइनल कॉर्ड में चोट लग कर ब्रेन में विकार की वजह से बीमारी पैदा होना।
• बिल्कुल बेहोश सा हो जाने पर शरीर में अकड़न, दौरे, टेटेनस, पेट के कीड़ें, कुत्तों में डिस्टेम्पर के बाद कोरिया, दौरो के साथ मुंह से खून मिले हुए झाग निकलना, चाहे कोई भी रोग जिसमें रोगी बेहोश रहता है। इसमें साइक्यूटा प्रमुख दवा है जबकि नक्स वोमिका उसमें दी जाती है जिसमें रोगी होश में रहता है।
कोबाल्टम मेटालिकम (COBALTUM METALLICUM)
कोबाल्टम मेटालिकम (COBALTUM METALLICUM) यह एक तरह की खनिज धातु है। जिस क्षेत्रा की जमीन में कोबाल्ट धातु की
कमी होती है वहां पैदा होने वाली घास या चारा से पशुओं में भी कोबाल्ट की कमी हो जाती है। उसमें सशक्त किया कोबाल्ट उपयोगी है। स्त्री संसर्ग के बाद पुरूष के कमर में दर्द रहता है तो काफी लाभकारी है।
कोलचिकम ऑटमनेल (COLCHICUM AUTUMNALE)
कोलचिकम ऑटमनेल (COLCHICUM AUTUMNALE)
जर्मनी, फ्रांस में मिडो सैफन नामक वनस्पति की जड़ से इनका टिंचर तैयार किया जाता है इसका पेरिआस्टियम, जोड़ों की साइनोवियल मेम्ब्रेन, मस्कुलर टिश्यू भागों पर अच्छा एक्शन होता है खासकर रोग की पुरानी अवस्था में लाभकारी है।
पेशाब में एल्यूमिन मिला खून आने से पेशाब का रंग काला भूरा हो जाए तो कॉलचिकम देवे। पेशाब में ब्लड का रंग साफ लाल हो तो टेरिबिन्धि दें। • पानी जैसी पतली दस्त, दस्त के साथ सफेद म्युकम मेम्ब्रेन के टुकड़े आते हो, पेट में वायु एकत्रित होती हो तो यह दवा दें।
कोलोसिन्थिस (COLOCYNTHIS)
कोलोसिन्थिस (COLOCYNTHIS)
बिटर कुम्कुम्बर नामक पौधे के सूखे फलों की छाल और बीज निकाल देने के बाद बचे हुए गुदे से इसका टिंचर तैयार किया जाता है। यह बहुत कड़वा फल होता है इस फल में जो ग्लूकोसाइड होता है उसे ही कॉलोसिन्सि कहते है। इसका मुख्य एक्शन आहार नाल की बीमारियों में होता है।
• बछड़ो के व्हाइट स्कोर व अन्य प्रकार के दस्त में काफी लाभप्रद होती है। जब दस्त का रंग गहरा पीला, गंधक जैसा हो, साथ में झाग हो, ब्लड पित्त मिला हो तो यह उपयोगी दवा है।
कोनियम मैकुलेटम (CONIUM MACULATUM)
कोनियम मैकुलेटम (CONIUM MACULATUM)
हेमलॉक नामक वनस्पति से यह टिंचर तैयार किया जाता है यह एक तरह का जहर है। ऐसा कहा जाता है कि दार्शनिक सुकरात की हत्या इसी जहर द्वारा की गई थी। यह मुख्य रूप से पैरालाइसिस, पैरों का अकड़ जाना, पेशाब से संबंधित रोग,
दुबर्लता, ट्यूमर, कैंसर आदि मे प्रयोग में लिया जाता है।
दुधारू पशुओं में मिल्क फीवर में भी यह
उपयोगी है।
पैरालाइसिस जो पैर से शुरू होकर ऊपर अंगों में फैलता है।
चोट से सूजन व इसका तेज दर्द तथा चोट के कारण सूजन, ट्यूमर और कैंसर हो जाए तो कोनियम लाभकारी है।
ओवरी में सूजन, सर्विक्स कड़ी हो जाना आदि में भी कोनियम दे सकते है।
क्रोटोन टिग्लियम (CROTON TIGLIUM)
क्रोटोन टिग्लियम (CROTON TIGLIUM)
जमाल गोटा वनस्पति के सूखे बीजों से टिंचर तैयार किया जाता है। इसका प्रयोग मुख्य रूप से दस्त, सूखी खुजली जैसे चर्म रोगों में किया जाता है। पीले रंग की पतली दस्त हो, कुछ खाने के बाद फिर दस्त हो तो क्रोटोन दें।
• मुंह और अंडकोषों के एग्जिमा में यह बहुत फायदा करती है जिसमें बहुत खुजली रहती है और दर्द भी होता है।
क्युबेबा ऑफिसिनालिस (Cubeba Officinalis)
क्युबेबा ऑफिसिनालिस (Cubeba Officinalis)
• क्युबेबा यानी सीतल चीनी नामक वनस्पति के कच्चे फलों से टिंचर तैयार किया जाता है। इसका मुख्य एक्शन युरिनरी सिस्टम की म्युक्स मेम्ब्रेन पर होता है। सिस्टाइटिस, युरेथ्राइटिस, हिमेचुरिया, मूत्रा मार्ग में सूजन आदि में में उपयोगी है।
पेशाब के मार्ग में जलन हो, पीले रंग का मवाद जैसा गाढा स्त्राव होता हो। उसमे क्युबेबा विशेष लाभकारी है। क्युप्रम मेटालिकम (CUPRUM METALLICUM)
यह ताबा धातू है। पाचन तंत्रा, लिवर, किडनी, सेरिब्रोस्पाइनल सिस्टम और
ब्लड वेस्कुलर सिस्टम पर इसका असर होता है। यह दवा शरीर में कॉपर
की कमी दूर करती हैं।
कुरारे (CURARE)
कुरारे (CURARE)
• यह एक तरह का तेज व जानलेवा जहर होता है जो शरीर में मसल पैरालाइसिस करता है। इसी जहर को एल्कोहल में मिलाकर टिंचर तैयार किया जाता है।
• जब शरीर में हिलने डुलने की शक्ति नहीं रहती है लेकिन चेतना शक्ति (sensation) ठीक रहती है, पैर कांपना, कमजोरी तथा पक्षाघात होने पर कुरारे देवें । • गाय, भैसों में ब्याने के बाद डाउनर काऊ सिन्ड्रोम में यह लाभकारी है।
ड्रॉसेरा (DROSERA ROTUNDIFOLIA)
ड्रॉसेरा (DROSERA ROTUNDIFOLIA)
• यह दवा सनड्यू नामक वनस्पती से तैयार की जाती है। खांसी, न्युमोनिया व सांस नली की अन्य बीमारियों में यह लाभप्रद है।
डल्कामारा (DULCAMARA )
डल्कामारा (DULCAMARA )
• यह दवा वूडी नाइटशेड नामक वनस्पति से तैयार की जाती है। जो बीमारियां सर्दी लगकर होती है। ज्यादा सर्दी पड़ने पर बढ़ जाती है। जैसे जुकाम, खांसी में यह लाभकारी है। एकोनाइट सूखी सर्दी के कारण पैदा हुई बीमारी में जबकि डल्कामारा सर्द जगह या ठंड लग जाने के कारण पैदा हुई बीमारी में लाभप्रद है।
• सर्दी लगकर पानी में भीगकर या गर्मी के बाद अचानक सर्दी लगाकर जुकाम खांसी हो जाये तो डल्कामारा उपयोगी है।
फेरम ऑयोडेटम (FERRUM TODATUM)
फेरम ऑयोडेटम (FERRUM TODATUM)
• आयोडाइट ऑफ आयरन का चूर्ण एल्कोहल में मिलाकर यह दवा तैयार की जाती है। शरीर में लौह तत्व की कमी के कारण जो बिमारियां होती है। उनमें यह उपयोगी है।
फाइकस रिलिजिओसा (FICUS RELIGIOSA)
यह दवा पीपल की छाल से बनाई जाती है। आहार नाल, मुंह, फैफड़ों, नाक, मादा जननेद्रियों से होने वाले रक्त स्त्राव में यह लाभकारी है। पशुओं में ब्रेकन फर्न, पॉयजनिंग, मुर्गियों में कॉक्सिडिओसिस में काफी उपयोगी है। मर्क कोर के साथ देने से बेहतर परिणाम मिलते है।
जेलसेमियम सेम्पर (GELSEMIUM SEMPER)
जेलसेमियम सेम्पर (GELSEMIUM SEMPER)
• चमेली जाई (यलो जास्मिन) नामक वनस्पति की जड़ से यह दवा बनाई.
जाती है। इसका मुख्य एक्शन नर्वस सिस्टम पर होता है। शरीर में कम्पन, सुस्ती, शिथिलता, शरीर में ऐंठन, लेरिंग्स का लकवा, गोबर या मल द्वार का लकवा हो तो यह उपयोगी है। पशु ब्याने की कोशिश कर रहा हो और यदि ब्याते समय आँस (cervix) नहीं
खूली हो तो हर पन्द्रह मिनट बाद जेलसिमियम दें। • सुस्ती, सिर में चक्कर और आलसीपन (dullness, dizziness and drowsiness) में यह प्रमुख दवा है।
ग्लोनॉयिन (GLONOIN)
ग्लोनॉयिन (GLONOIN)
एक भाग नाइट्रोग्लिसरिन को 9 भाग एल्कोहल में गलाकर 2x शक्ति की
दवा तैयार की जाती है मेडुला ऑब्लोंगेटा तथा ब्रेन की शिराओं व धमनियों
पर इसका प्रमुख एक्शन होता है। मनुष्य में बढ़े हुए ब्लड प्रेशर को घटाने की यह बेहतरीन दवा है। यदि 2x शक्ति ग्लोनॉयिन की दो बूंद किसी व्यक्ति की जीभ पर डाल दी
जाये तो वह बेहोश हो जायेगा।
• मेनिन्जायटिस, मिर्गी जैसे दौरे में तथा मनुष्य में हृदय रोग के कारण नाड़ी धीमी चले, मुरछा सी आ जाए, ब्रेन में खून का दौरा कम हो, शरीर बिल्कुल ठंडा हो जाये तो यह दवा दें।
. लू लगन (Heat stroke) में ग्लोनॉयिन काफी लाभकारी है। ग्लोनॉयिन के साथ एकोनाइट, नक्स, कैम्फर नहीं दें।
ग्रेफाइटिस (GRAPHITES)
ग्रेफाइटिस (GRAPHITES)
सोरा (ब्लेक लैड) को एल्कोहल में मिलाकर यह दवा बनाई जाती है जो प्रमुख एंटीसोरिक दवा है। यह मुख्य रूप से त्वचा के रोगों में दिया जाता है।
चर्म रोगों में एग्जिमा सा होना जिसमें शहद जैसा गाढ़ा लसदार रस निकलना, बाल झड़ना में यह उपयोगी है।
ग्रेफाइटिस का बार बार प्रयोग करने से रोग बढ़ जाता है इसलिए इसकी 1-2 मात्रा देकर परिणाम देखने चाहिए। कम पोटेन्सी की बजाय अधिक पॉटेन्सी का ग्रेफाइटिस ज्यादा लाभकारी रहता है।
• एग्जिमा जिसमें त्वचा फट जाती है मोटी हो जाती हो, शहद जैसा लसदार पदार्थ निकलता हो, ग्रेफाइटिस को वैसेलिन में मिलाकर त्वचा पर लगाने से भी बहुत फायदा होता है)
हेक्ला लावा (HECLA LAVA)
हेक्ला लावा (HECLA LAVA)
• हेक्ला नामक ज्वालामुखी से निकली हुई राख से यह दवा तैयार की जाती
है। हड्डियों, दातों तथा मसूढ़ों के रोगों में यह अधिक उपयोगी है। • मसूढों में घाव, दातों में कीड़े लगना, सड़ना, मसूढों में सूजन, दातों का दर्द, मुंह में बदबू आना आदि में उपयोगी है।
• हड्डी की ऑस्टाइटिस, हड्डी का ट्यूमर (osteosarcoma) में भी काफी लाभकारी है।
हिपर सल्फर (HEPAR SULPHUR)
हिपर सल्फर (HEPAR SULPHUR)
• कैल्शियम सल्फाइड चूर्ण और सल्फर के रासायनिक संयोग से यह दवा तैयार की जाती है। ग्लेण्ड, त्वचा, सेलीवरी ग्लेण्ड्स, थनों में सूजन व मवाद आदि में यह अधिक उपयोगी है।
• जिस स्थान पर मवाद बनती है उसमें यह काफी असरदार है क्योंकि यह उसे बाहर निकाल देती है । यदि मवाद बनने से पहले ही दिया जाय तो कोई भी एब्सेस बैठ जाती है।
• एसेस (abscess ) - प्राय मेच्योर तथा इम्मेच्योर एब्सेस के लिए तीन तरह की दवाएं बेलाडोना, मर्क्युरियस तथा हिपर सल्फ काम में लेते है। बेलाडोना- पहली अवस्था जहां सूजन, दर्द तथा लाल हो।
• मर्क सोल मवाद पैदा होने के पहले से मवाद नही या कम बनती हो और जब मवाद बन जाती है तो उसको बढ़ाकर पका देती है तब एब्सेस मेच्योर होकर फट जाती है।
हिपर यह मर्क सोल से ज्यादा उपयोगी है। जब एब्सेस पकी हुई नही होती है। उस समय हिपर 200 या इसके अधिक पोटेन्सी प्रयोग करें। इसके अलावा मवाद पैदा हो जाती है मवाद चाहे अंदर या नीचे की ओर हो तो हिपर की कम पोटेन्सी प्रयोग करने से मवाद खींच कर बाहर आ जाती है। इसी गुण के कारण होम्योचिकित्सक हिपर को होम्योपैथिक नश्तर की छूरी (lancet) कहते है।
साइलिसिया प्रायः घाव फट जाने या एब्सेस खोलने के बाद ही साइलेसिया काम में लिया जाता है। इससे मवाद की मात्रा कम होती है और घाव जल्दी सूख जाता है।
• न्यूमोनिया – न्युमोनिया की तीसरी अवस्था में हिपर सल्फ दी जाती है तथा
पहली अवस्था में एकोनाइट दिया जाता है। कान की बीमारी - काम में मवाद होने से पहले अगर बहुत दर्द रहें तो हिपर लाभदायक है। बाद में कान से मवाद गिरती है तो टिलुरियम दें।
आंख में गीड़, सूजन, दर्द लालिमा होने पर हिपर सल्फ दें।
दस्त – पतली दस्त, बदबू, सफेद दस्त में दें।
हाइड्रास्टिस (HYDRASTIS CANADENSIS)
हाइड्रास्टिस (HYDRASTIS CANADENSIS)
• गोल्डन सील वनस्पति की जड़ से टिंचर तैयार किया जाता हैं। इसका एक्शन म्युकस मेम्ब्रेन पर अधिक होता है। नाक, गला, आहारनाल, गर्भाशय, मूत्रानली आदि की म्युकस मेम्ब्रेन में पहले साफ, सफेद, पतला, चिपचिपा तथा बाद में पीला, हरा, गाढ़ा स्त्राव निकलता हो तो हाइड्रेस्टिस का प्रयोग किया जाता है।
गाय, बछड़े का कब्ज, गाय-भैस की गर्भावस्था व प्रसव के बाद कब्ज। जब सूखी मिंगने जैसी गोबर के साथ म्युकस भी लिपटा आता हो तो हाइड्रेस्टिस मदर टिंचर की 5-10 बूंद दें
गर्भाशय में मवाद पड़ने पर, रोग की पुरानी अवस्था में जब चिपचिपी पीली मवाद बाहर निकलती है उस समय हाइड्रेस्टिस दें।
हाइपेरिकम पर्फोरेटम (HYPERICUM PERFORATUM)
हाइपेरिकम पर्फोरेटम (HYPERICUM PERFORATUM)
. सेंट जनस्वर्ट नामक वनस्पति से टिंचर तैयार किया जाता है। चोट लगने की वजह पैदा हुई किसी बीमारी में और चोट के कारण पैदा हुए टेटेनस, दौरे पड़ना, बेहोशी, अकडन आदि में हाइपेरिकम लाभदायक है।
शरीर में किसी जगह चोट लगने से यदि उस स्थान की तंत्रिका (nerves) में चोट आ जाये तो हाइपेरिकम और किसी स्थान पर मासपेशी (muscle) में चोट लगने पर अर्निका दिया जाता है।
● चोट लगकर कोई जगह कुचल या छिल जाय तो अर्निका ही देवें। यदि अर्निका से फायदा न हो तो लिडम दें। यह हेमेटोमा के कारण काला दाग भी मिटा देता है। चोट लगने से चोट वाली जगह अगर कट जाय तो कैलेण्डुला सबसे ज्यादा फायदा करती है। यदि पिन, कील, सुई, कांच आदि चुम जाय तो लिडमसे ही दें।
आयोडम (IODUM)
आयोडम (IODUM)
• आयोडिन 1 भाग का 99 भाग एल्कोहल में मिलाकर 2x एक्स पोटेन्सी का आयोडम बनाया जाता है। शरीर से विभिन्न तरह की ग्रंथिया बढ़ जाती (hypertrophy) है या छोटी (atrophy) हो जाती है। या सूख जाती है उसमें ऑयोडम लाभकारी है।
• थायरॉइड ग्रंथि, थन, अण्डकोष, गर्भाशय, मूत्राशय आदि ग्रंथियों के बढ़ने में आयोडम दें।
कैलि बाइक्रोमिकम (KALI BICHROMICUM) एक भाग बॉयक्रॉमेट ऑफ पोटाश का 99 भाग डिस्टिल्ड वॉटर में गलाकर
टिंचर तैयार किया जाता है। इसका मुख्य एक्शन श्वास नली, नाक, गर्भाशय मूत्रानली या घाव आदि किसी भी म्युकस डिस्चार्ज जो कि रबड या गाढे गोंद जैसा होता है, में होता है।
ब्रोन्कोन्युमोनिया, लेरिंजाइटिस सायनुसाइटिस, पायलोनेफ्राइटिस में यह लाभकारी है।
कैलि कार्बोनिकम (KALICARBONICUM)
कैलि कार्बोनिकम (KALICARBONICUM)
कार्बोनेट ऑफ पोटाश से यह औषधि तैयार की जाती है। इसका मुख्य एक्शन युरिनरी सिस्टम के रोगों में होता है। शरीर में एनीमिया हो जाने पर यह लाभकारी है।
कैलि हाइड्रोआयोडिकम (KALI HYDROIDDICUM)
कैलि हाइड्रोआयोडिकम (KALI HYDROIDDICUM)
• पोटेशियम आयोडाइड को एल्कोहल में मिलाकर यह दवा तैयार की जाती
हैं जो कि रेस्पिरेटरी सिस्टम तथा आंखों की बीमारियों में लाभदायक है।
सर्दी
जुकाम के बाद तेज खांसी हो, बलगम निकलता हो तो कैलिहाइड्रो
फायदा करती है। नाक से पानी गिरना, आंखों से पानी गिरना।
फेफड़े में पानी इकट्ठा होना, (hydrothorax), वायु इकट्ठा होना (emphysema),
पुराना न्युमोनिया, खांसी में इसे दें। यदि हड्डी के ऊपर कोई ट्यूमर हो या पशु में एक्टिनोमाइकोसिस (actionmycosis) हो तो यह फायदा करती है।
लैकेसिस (LACHESIS)
लैकेसिस (LACHESIS)
एक विशेष प्रजाति के सांप के जहर से यह दवा तैयार की जाती है। इसका मुख्य एक्शन तंत्रिका तंत्रा पर तथा इससे कम त्वचा रोग तथा म्युकस मेम्ब्रेन पर होता है।
जो कई तरह के रोगों के बाद बहुत कमजोर हो गया हो उसे दें। पशु खांसी साधारण खांसी से लेकर ब्रोन्काइटिस, न्युमोनिया में
• मूत्रा रोग मूत्रा काला, एल्बुमिन मिला हो, मूत्रा में थक्का जमा हुआ काला रक्त मिला हुआ हो। गर्भाशय में सूजन, मवाद पड़ गई हो। लिवर रोग लिवर में मर्क सोल यदि फायदा नहीं करें तो लैकेसिस दें।
इसके अलावा लिवर के कई रोगों के साथ रोग होने पर इसे दें। कान में अधिक मवाद निकलने पर कोई दवा लाम न करने पर इसे दें। ऐसा कोई भी घाव जो पुराना हो, बिगड़ गया हो, भरता नहीं हो तो लैकेसिस
-
लाभ करता है।
मसूढ़ों या दांत की जड़ में घाव, दात सड़ना, मुंह से बदबू आना, 1000 पोटेन्सी की लैकेसिस बड़े पशु को दें।
लिडम पैलस्टर (LEDUM PALUSTER)
लिडम पैलस्टर (LEDUM PALUSTER)
मार्शरी नामक वनस्पति से टिंचर बनाया जाता है। यह मुख्य रूप से गठिया, आर्थाइटिस जैसे रोगों में लाभकारी है।
. पैर के जोड़ों में आर्थाइटिस, साइनोवाइटिस, जोड़ों में दर्द, चलने फिरने में तकलीफ । • शरीर में कोई नुकीली चीज धंस गई हों जैसे सुई, पीन, कांटा आदि । कांटा
धंसा रहने पर लिडम उसे बाहर निकाल देता है।
• मधुमक्खी, भौरा, बर्रे, चुहा, सियार आदि काटने पर भी लिडम लाभकारी है।
लाइकोपोडियम (LYCOPODIUM)
लाइकोपोडियम (LYCOPODIUM)
• यह दवा पहाड़ी शैवाल से बनाई जाती है। इसका मुख्य प्रयोग डायजेस्टिव सिस्टम, युरिनरी, रेस्पिरेटरी, युटेरस आदि रोगों में किया जाता है। • लाइकोपोडियम एक सोरा विषनाशक दवाई
है तथा देरी तक एक्शन करने वाली (deep
acting) दवा है। इसलिए इसकी एक दो
मात्रा देकर बहुत दिनों तक परिणाम की प्रतिक्षा
करनी चाहिए।
• पेट फूलना, खांसी, गला फूलना, न्युमोनिया आदि में। ● लिवर रोग जैसे लिवर सिरोसिस, हैपेटाइटिस आदि में लाइकोयोडियम काफी लाभकारी है।
गले में टॉन्सिलाइटिस से सास लेने में असुविधा हो, पशु मुह फाड़ कर सांस लें तो लाइकोपोडियम दें।
● सूखी खांसी जिससे खांसते खासते पेट दर्द हो जाए, पीला मवाद जैसा बलगम निकलता हो ।
शरीर में ड्रॉप्सी या अडिमा के कारण सूजन हो तो इसे दें। • कुत्तों में बाल अधिक झड़ने पर लाइकोपोडियम
इसके साथ एकोनाइट, ग्रेफाइटिस, पल्सेटिला नहीं दें।
मर्क्युरियम कोरोसाइवस (MERCURIUS CORROSIVUS)
मर्क्युरियम कोरोसाइवस (MERCURIUS CORROSIVUS)
इसे रस कपूर (corrosive sublimate) कहते है जो मादा पशुओं की अपेक्षा
नर पशु रोगों में अधिक उपयोगी है।
जब दस्त के साथ खून आता हो तो उसकी यह प्रमुख दवा है। दस्त के साथ मरोड़ व पेट में दर्द हो, जो दस्त के बाद भी बना रहता हो, लगातार थोड़ी थोडी दस्त हो, खून मिली हुई दस्त, कभी-कभी सिर्फ खून की निकलता हो।
दस्त के इन लक्षणों के साथ यदि बूंद-बूंद मूत्रा होता हों। पेशाब करते समय
जलन हो तो मर्क कोर अधिक कार्य करता है।
ध्यान रखें कि मर्क कोर का एक्शन आत के निचले भाग पर अधिक होता है इसलिए इसका प्रयोग ताजी खूनी दस्त (acute dysentery) में करना चाहिए। मर्क्युरियम डलसिस का एक्शन आत में ऊपरी भाग पर अधिक होता है इसलिए साधारण दस्त में या अतिसार में इसे प्रयोग में लें।
आव आने पर नक्सवॉमिका 200 की एक डोज देकर इलाज शुरू करें। पेनिस में फाइमोसिस या पैराफोइमोसिस होने पर मर्क मोर उपयोगी।
मर्क सियानेटस (MERC CYANATUS)
मर्क सियानेटस (MERC CYANATUS)
यह पशु का गला फूल जाने पर प्रमुख दवा है। अचानक गला फूल जाता है रोगी जल्दी कमजोर हो जाता है, घाव हो जाने पर नाक तक भी फैल जाता है।
• पशुओं में गलघोटू (H.S.) रोग में इसे दें।
मर्क्युरियस सॉल (MERCURIUS SOLUBILIS)
• इसका दूसरा नाम प्रेसिपिटेड ऑक्साइड ऑफ मर्करी है। इसकी व मर्क्युरियस वाइवस का एक्शन लगभग एक जैसा ही होता है। म्यूकस मेम्ब्रेन, ग्लेण्ड्स तथा हड्डियों पर इसका प्रमुख एक्शन होता है।
दांतों के रोग में, मसूढे फूलना, उनमें खून निकलना, मसूढ़ों पर घाव हो जाना, दांत काले पड़ जाना, दांत सड़ना, मुंह में बदबू आना, दांत में मवाद बन जाना।
यदि दांत का उपरी भाग सड़ जाय लेकिन जड़ ठीक है तो मर्क सॉल दें और
जड़ सड़ जाए व ऊपरी भाग ठीक रह तो मेजेरियम दें।
कान में मवाद पड़ना, जब मवाद के साथ खून मिला हो । यदि कान में ज्यादा दिन तक मवाद बहती रहे, रोग जटिल हो जाय तो टेलुरियम प्रयोग करें इसका असर थोड़े दिनों बाद दिखता है।
• पेट के रोग, विभिन्न तरह के दस्त, तेज खूनी या साधारण दस्त, पेट दर्द के साथ रेक्टम बाहर निकल जाती हों। • एब्सेस की पहली अवस्था में बेलाडोना, मवाद बनने पर मर्क्यूरियस दें।
• मूत्रा रोग – पेशाब के साथ मवाद, बार बार पेशाब आना, दर्द व जलन हों।
मर्क्यूरियस डलसिस (MERCURIUS DULSIS) • कैलोमेल (क्लोराइड ऑफ मर्करी) का लैटिन नाम मर्क्यूरियस डलसिस है। लिवर रोग तथा कान के रोग में इसका प्रमुख एक्शन होता है। एनीमिया, पीलिया तथा लिवर सिरोसिस में काफी कामयाब दवा है।
• बहुत दिनों तक कान में मवाद निकलने वाली स्थिति में तथा मुंह में बदबू आना, में बदबूदार लार बहना जैसे लक्षणों में यह फायदा करती है।
• जब कुत्तों में दस्त हरे रंग की हों, तथा दस्त के साथ दर्द नही हो तो दें।
मिलिफोलियम (MILLEFOLIUM)
मिलिफोलियम (MILLEFOLIUM)
• यह दवा मिलोफोलियम नामक वनस्पति से तैयार की जाती है। यह रक्त स्त्राव को रोकने वाली एक श्रेष्ठ दवा है। मुंह, फेफड़ा, आहारनाल, मूत्राद्वार, नाक, गर्भाशय, थन आदि शरीर के किसी भी स्थान से ब्लड निकले और ब्लड का रंग चमकीला लाल हो उसमें यह काफी प्रभावकारी है।
यदि मुंह से ब्लड निकलने के साथ, बुखार, छटपटाहट चमकीला लाल ब्लड निकले तो पहली अवस्था में एकोनाइट देवें। यदि इससे फायदा नहीं हो तो मिलिफोलियम देंवें
• दूधारू पशुओं में थनों में से दूध के ब्लड निकलने पर दें। मुंह से ब्लीडिंग होने पर फॉस्फोरस और पल्सेटिला दें।
म्यूरेक्स परप्यूरिया (MUREX PURPUREA)
म्यूरेक्स परप्यूरिया (MUREX PURPUREA)
• म्युरेक्स प्रजाति के घोंघे की गर्दन के रंगीन भाग से यह दवा तैयार की जाती है। इसके प्रमुख एक्शन फीमेल रिप्रोडक्टिव सिस्टम पर होता है। दूधारू पशुओं के हीट में नहीं आने पर ओव्युलेशन, सिस्टिक ओवरी की निम्फोमेनिक अवस्था, जब पशु बार बार हीट में आता है। गर्म नहीं ठहरता
है तो म्यूरेक्स परप्यूरिया दें।
नक्स वोमिका (NUX VOMICA)
नक्स वोमिका (NUX VOMICA)
नक्स वोमिका को हिन्दी में "कुचला" तथा संस्कृत में कच्चीर कहते है। इसके बीज पाउडर बनाकर ट्राइचुरेशन द्वारा इसका टिंचर तैयार किया जाता है। हमारे भोजन में जितना नमक का महत्व है ठीक वहीं महत्व होम्योपैथी में नक्सवोमिका का है। इससे शरीर की एक तिहाई बीमारियां ठीक हो जाती है। होम्योपैथी की प्रमुख दवाईयों में एकोनाइट तथा नक्सवोमिका प्रमुख दवा है। एकोनाइट एक विशेष पेड़ की जड़ से तैयार की जाती है यह एक तेज विष है। जिसे एक्युट इन्फ्लामेशन में दिया जाता है।
होम्योपैथी विशेषज्ञों का कहना है कि यदि आपको कुछ नही मालुम कि रोगी को कौनसी दवा देनी चाहिए तो नक्स वोमिका दे दो। • नक्सवोमिका को कम मात्रा में देने से भूख बढ़ती है। शरीर को शक्ति प्रदान
करती है जबकि अधिक मात्रा में देने से टेटेनस रोग जैसे लक्षण पैदा करती
है। कब्ज, बार बार गोबर करने की स्थिति लेकिन थोड़ा थोड़ा पेशाब करना, पेट में गैस बनना, कब्ज, गोबर बंध जाना, लिवर रोग, आंखों में सूजन में नक्सवोमिका दें।
पशुओं में जुगाली न करना, रुमन का मूवमेन्ट सामान्य नहीं होना, कब्ज, गोबर मींगने जैसे करना आदि में देवे। गाय, भैंस, बकरी, कुतिया आदि पशु जल्दी जल्दी हीट में आना तथा ह
अधिक तेज व बहुत दिनों तक रहना।
किसी भी प्रकार के बुखार में नक्सवोमिका दें।
ओपियम (OPIUM)
ओपियम (OPIUM)
अफीम के कच्चे फलों पर चीरा लगाने से दूध जैसा पदार्थ निकलता है इस रस को गाढ़ा करके टिंचर तैयार किया जाता है। अफीम लेने से मादकता, नींद, मस्तिष्क में उत्तेजना, शरीर में पसीना पैदा करना तथा दर्द दूर करने वाली क्षमता होती है। इसका एक्शन नर्वस सिस्टम पर होता है।
ओपियम कब्ज की एक अच्छी दवा है। पेट भरा रहने पर भी गोबर या मल नही आना, गोबर मींगनों के रूप में करना। ओपियम कब्ज की एक अच्छी दवा होने के बावजूद दस्त में भी इसका प्रयोग होता है।
• पेट में बहुत ज्यादा गैस जमा होना, पेट फूल जाना, पेट दर्द होना।
पैलेडियम ( PALLADIUM)
पैलेडियम ( PALLADIUM)
• यह धातू (metal) पदार्थ है जिसका प्रयोग स्त्री, गाय भैसों व अन्य मादा पशुओं की बीमारियों में अधिक किया जाता है।
• ओवरी में सूजन में इसे दिया जाता है।
प्लेटिनम मेटालिकम (PLATINUM METALICUM)
प्लेटिनम मेटालिकम (PLATINUM METALICUM)
• प्लेटिनिम धातु से यह दवा तैयार की जाती है। यह स्त्री व मादा पशुओं के विभिन्न रोगी की बहु उपयोगी दवा है। गर्भाशय, अण्डाशय, मस्तिष्क, तंत्रिका आदि के ऊपर इसका प्रमुख एक्शन होता है।
• यह मादा पशुओं में इस्ट्रस पीरियड नियमित करता है तथा ओवरी के विकार ठीक करता है।
ओवरी में सूजन, गवाद होने पर, रिपिट बीडर आदि में लेकेसिस, सिपिया या प्लाटिनम दवाईयां प्रमुख रूप से काम में ली जाती हैं।
● गुटेरस का प्रोलेप्स होने पर प्लेटिनम दें, यदि कुतिया हीट के दौरान कुत्ते को मेटिंग के लिए पास न आने दें, गेटिंग से अनजान हो तो प्लेटिनम दें।
फोस्फोरस (PHOSPHORUS)
फोस्फोरस (PHOSPHORUS)
● फोस्फोरस का प्रमुख एक्शन ब्रेन, फेफड़े, लिवर, म्युकम मेम्ब्रेन, बोन, नर्व
आदि पर होता है।
● टी.बी., न्युमोनिया, ब्रोंकाइटिस, खांसी, खांसते खांसते सारा शरीर कांप उठना । कब्ज, दस्त, मामूली घाव से ज्यादा ब्लीडिंग होना आदि।
● फोस्फोरस का अधिक यानी विष की मात्रा में सेवन करने से गेस्ट्राइटिस, एंट्राइटिस, खूनी दस्त, हेमोरेज, हेपेटाइटिस, न्युमोनिया, प्ल्युराइटिस, मसूढे व हड्डी का टूटना, पीलिया रोग पैदा हो जाता है। यानि इस सब रोगों में कम मात्रा में फॉस्फोरस बढ़िया दवा है। यदि फेफड़ों से मुंह के रास्ते ब्लड निकले तो फॉस्फोरस दें। जिन रोगियों
में ब्लड का थक्का जल्दी नहीं जमता हो।
• यदि रोगी का पहले एलोपैथिक इलाज हुआ हो तो फॉस्फोरस देने के 3-4 घंटे पहले हाई पोटेन्सी नक्सवोमिका की एक डोज देने से अधिक लाभ होता है।
पोडोफाइलम पेल्टेटम (PODOPHYLUM PELTATUM)
पोडोफाइलम पेल्टेटम (PODOPHYLUM PELTATUM)
यह दवा एक वनस्पति की जड़ से बनाई जाती है जो कि दस्त, लिवर रोग, छोटी आंत, बड़ी आंत, रेक्टम के रोगों में प्रमुखता से प्रयोग में ली जाती है। इसलिए पेट दर्द, आत में सूजन, उल्टी, पतले बदबूदार दस्त जैसे रोगों में यह काफी लाभदायक है।
• पोडोफाइलम अधिक मात्रा में सेवन करने से पतले दस्त होते है। इसलिए मनुष्य में इसे जुलाब के रूप में भी प्रयोग में लिया जाता है।
गाय भैंस में व्याने के बाद गर्भाशय का बाहर आना (prolapse of uterus) में यह काफी फायदा करती है । ओवरी में सूजन, ट्यूमर में, लिवर रोग, रेक्टम का प्रोलेप्स आदि रोगों में भी
पोडोफाइलम दें। खूनी दस्त (dysentery) में इपिकाक के बाद यह फायदा करती है।
पल्सेटिला नाइग्रीकैन्स (PULSATILLA
पल्सेटिला नाइग्रीकैन्स (PULSATILLA
NIGRICANS) अमेरिका में पायी जाने वाली एक वनस्पति से यह दवा तैयार की जाती है। आंख, कान, नाक, आहारनाल, गर्भाशय, म्युकस मेम्ब्रेन, नर व मादा दोनों पशुओं के रिप्रोडक्टिव सिस्टम, युरिनरी सिस्टम आदि पर इसका प्रमुख एक्शन होता है। जो पशु शांत व धीर स्वभाव प्रकृति के होते है उनके रोगों में यह औषधि अधिक उपयोगी है।
• दस्त - अधिक आहार व अन्य चीजें खाने से दस्त हों, दस्त का रंग व मात्रा बदलती रहती हो, पेट में ऐंठन हो, आहार दोष से दस्त में पल्सेटिला दें। गर्भवती पशुओं में गर्भावस्था के आखरी महीनों में रोजाना कम या मीडियम
पोटेन्सी की पल्सेटिला देने से गर्भाशय की ताकत बढ़ती है तथा प्रसव
आसानी से होता है। व्याने के बाद के दर्द में अर्निका, सिकेलि के अलावा
पल्सेटिला भी दिया जाता है।
• ऐसी एब्ससेस जो खूब पक गई हो, उसमें मवाद इकट्ठी हो गई हो लेकिन फटती नही हो तो उसके ऊपर पल्सेटिला का मदर टिंचर रूई से कई बार लगाएं या 30 ग्राम ग्लिसरिन में 20-30 बूंद मदर टिंचर मिलाकर उसकी पट्टी एब्सेस के ऊपर बांधे। इसके साथ हिपर दवा मुंह से सेवन कराएं तो एब्सेस जल्दी फट जाता है।
• ओवरी व मादा जननागों के अन्य विकारों में पल्सेटिला काफी उपयोगी है।
• पशु को हीट में लाने के लिए भी पल्सेटिला दिया जाता है।
• चोट के कारण अण्डकोष सूज कर बड़े हो जाय तो पल्सेटिला दें।
ब्याने के बाद प्लेसेन्टा नहीं गिरे तो पल्सेटिला दें।
मादा जनन रोगों में सीपिया के बाद पल्सेटिला फायदेमंद रहता है।
रस टॉक्सिकोडेण्ड्रन (RHUS TOXICODENDRON)
रस टॉक्सिकोडेण्ड्रन (RHUS TOXICODENDRON)
उत्तरी अमेरिका में पायी जाने वाली पायजन ओक नामक वनस्पति के फूलों से यह दवा तैयार की जाती है जिसका प्रमुख एक्शन मांसपेशिया, त्वचा न्यूरो मस्कुलर सिस्टम, म्युकस मेम्ब्रेन पर होता है।
पशु चिकित्सा में भी इसका बहुत उपयोग है क्योंकि पानी में भीगना, ठंड
लगना, अधिक मेहनत कराना आदि कारणों से बहुत से रोग होते है जिनमें
रस टॉक्स एक बेहतरीन दवा है।
फाइब्रस टिश्यू, जोड़ों में दर्द, ऐंठन, जकडन सुबह उठने पर दर्द बढ़ना, बैठे रहकर उठने पर पहले दर्द बहुत बढ़ जाता है तथा कुछ देर तक चलने से दर्द घटता है।
• बैचेनी और छटपटी में एकोनाइट, आर्सेनिक और रस टॉक्स ये तीन दवाईया
दी जाती है जब दर्द के कारण छटपटाहट हो तो रस टॉक्स दें।
सर्दी लगकर पानी में भींग कर बुखार, सर्दी, शरीर में दर्द आदि होने पर। किसी भाग पर मोच होने पर इसे बाहरी रूप से भी लगाया जाता है। शरीर में दर्द होने पर रस टॉक्स एक उपयोगी दवा है लेकिन लक्षण के आधार पर ही इसका चयन करें।
• अर्निका चोट के कारण दर्द।
• फाइटालेक्का समूचे शरीर में अकडन का दर्द, हिलडुल नहीं सकता।
रस टॉक्स पहली बार हिलने डूलने के समय दर्द पर थोड़ा चलने फिरने से घट जाता है।
• चायना - • हड्डी, गांठ, त्वचा में भी दर्द, रोगी छूने तक नहीं देता। • त्वचा पर लाल रंग के दाने या फोड़े हो उससे मवाद बनी है, पपड़ी जमती है। त्वचा मोटी व कड़ी हो जाती है तो रस टॉक्स दें।
• प्रायः रस टॉक्स की 30 पोटेन्सी अधिक लाभ करती है। • रस टॉक्स के साथ एकोनाइट, बेलाडोला, ब्रायोनिया, सल्फर, ग्रफाइट नहीं दें।
रिसिनस कॉम्युनिस (RICINUS COMMUNIS)
रिसिनस कॉम्युनिस (RICINUS COMMUNIS)
एरेण्ड वृक्ष के पके बीजों से इसका टिंचर तैयार किया जाता है। यह दस्त और उनमें भी पुराने दस्त (chromic diarrhoea) की बढिया दवा है। इसके सेवन से दूधारू पशुओं व स्त्री में भी दूध बढ़ जाता है। दस्त- पतले दस्त, टुकड़े टुकड़े मिला हुआ दस्त, पैरों में ऐंठन, प्यास, लेकिन
पेट में दर्द नहीं होना ।
● मछली या मास धोवन की तरह खून मिले दस्त आते हैं लेकिन पेट दर्द न हो तो रिसिनस दें।
रियुमेक्स क्रिस्पस (RUMEX CRISPUS)
रियुमेक्स क्रिस्पस (RUMEX CRISPUS)
● यह एक वनस्पति की जड़ से तैयार की जाती है इस मुख्य प्रयोग खांसी,
डायहरिया और चर्म रोगों में किया जाता है। ● लगातार कष्ट देने वाली खांसी, गले में सुरसूरी, खांसते खांसते परेशान हाल, गले में दर्द।
• सुबह जल्दी दस्त होना, अधिक मात्रा में बदबूदार पतले दस्त । • शरीर में जगह जगह खुजली, दाने निकलना।
रूटा ग्रैवियोलेन्स (RUTA GRAVEOLENS)
रूटा ग्रैवियोलेन्स (RUTA GRAVEOLENS)
• एक वनस्पति से इसका टिंचर बनाया जाता है। शरीर के किसी भी भाग में चोट लगने या जख्म की तरह का दर्द हो, जोड़ों का कोई रोग जो सर्दी से बढ़ता और चलने फिरने पर घटता हो तो रूटा लाभदायक है। इसका मुख्य एक्शन हड्डी का आवरण पेरिओस्टियम तथा कार्टिलेज पर होता है।
• शरीर में प्रोलेप्स ऑफ रेक्टम और प्रोलेप्स ऑफ युटेरस, प्रोलेप्स ऑफ वेजाइना में यह उपयोगी है।
• मोच आने के बाद साइनोवाइटिस में लाभदायक है। • मादा पशुओं में गर्भाशय की संकुचन क्षमता इसके देने से बढ़ती है।
सैबाइना (SABINA)
सैबाइना (SABINA)
एक विशेष प्रकार की वनस्पति के पत्तों से टिंचर तैयार किया जाता है। गर्भाशय और ओवरी पर इसका प्रमुख एक्शन होता है। गर्भाशय से रक्त स्त्राव, पशु का हीट में जल्दी जल्दी आना और तेज हीट
आना, गर्भपात, समय से पहले ब्याने के बाद ओवरी या गर्भाशय में सूजन होने
पर सैबाइना दें। हीट में आने संबंधी गड़बड़ी, ब्याने से पहले या बाद में गर्भाशय में रक्त स्त्रय गर्भाशय में सूजन।
प्रसव या गर्भपात के बाद अधिक मात्रा में ब्लीडिंग, ब्लड का रंग चमकीला लाल, ब्लड कुछ पतला कुछ जगा जमा थक्का और साथ में पेट दर्द। इसके साथ पल्सेटिला नहीं दें।
सिकेल कॉर्नुटम (SECALE CORNUTUM)
सिकेल कॉर्नुटम (SECALE CORNUTUM)
यह दवा एक फंगस से बनाई जाती है। कमजोर व दुबली मादा पशुओं में यह ज्यादा फायदा करती है। इसका मुख्य एक्शन गर्भाशय व ओवरी से जुड़ी बीमारियों में होता है। एलोपैथी में इसे आर्गोटिन कहते है।
• पशु का हीट में नियमित नहीं आना, गर्भाशय से रक्त स्त्राव रक्त पतला,
काला तथा अधिक मात्रा में व्याने के बाद बदबूदार डिस्चार्ज, ब्याने के बाद
दर्द होना, गर्भाशय में सूजन, रक्त स्त्राव के साथ शरीर ठंडा पड़ जाना।
• अधिक मात्रा में आगेट सेवन करने से गर्भाशय का कॉन्ट्रेक्शन जोर जोर से होता है। इसलिए ऐलोपैथी में गर्भाशय ब्लीडिंग रोकने तथा प्रसव की क्रिया जल्दी होने के लिये इसका प्रयोग किया जाता है। कभी कभी असर इतना तेज होता है कि भूण तेज बाहर निकलता है जिससे गर्भाशय का अंश भी बाहर आकर प्रोलेप्स हो जाता है लेकिन ध्यान रखें जब तक गर्भाशय का मुंह यानी सर्विक्स का मुंह पूरी तरह खुला हो तभी आर्गट का प्रयोग करें।
• पशुओं में सर्विक्स (Cervix) का मुह खुला होने पर सिकेलि को 200 पोटेन्सी में देने से जल्दी फायदा होता है। यदि इससे भी लाभ नही हो तो सिकेलि के मदर टिंचर की 4-5 बूंद प्रत्येक आधा घंटे बाद दें। सर्विक्स का मूह बद होने पर सिकेलि कभी नहीं दे वरना गर्भाशय फट सकता है।
यह गर्भाशय से प्रसव बाद अधिक ब्लीडिंग रोकने की बढ़िया दवा है।
सिपिया (SEPIA)
सिपिया (SEPIA)
● समुद्र की कटल फीश के शरीर से स्याही की तरह निकलने वाला काला रस (inky juice) लेकर यह दवा तैयार की जाती है। इसका मुख्य एक्शन मादा पशुओं की ओवरी व गर्भाशय के रोगों में होता है। यह एक एंटीसोरिक दवा भी है।
गर्भाशय बाहर आना (prolapse of uterus), गर्भाशय में सूजन, मेट्राइटिस। प्रोलेप्स ऑफ युटरेस में लिलियम टिग्रिनम भी दिया जाता है। यदि रोग तेज और नई अवस्था में हो तो लिलियम दें और पुरानी बीमारी हो तो सिपिया
फायदा करती है।
● ब्याने के बाद गर्भाशय से गाढा, पीला, पीला हरा या सफेद डिस्चार्ज।
• पशु हीट में नही आना। अनियमित ढंग से हीट में आना, जल्दी जल्दी या देर से हीट में आना ।
कब्ज तथा चर्म रोग में भी सीपिया दिया जाता है। दाद, एग्जिमा, त्वचा पर छोटे छोटे मवादयुक्त फोड़े, एक के बाद दूसरा फोड़ा निकला करता है।
यदि पशु व्याने के बाद बछड़े को दूध नही पिलाएं तो यह प्रवृति रोकने से
लिए सीपिया दें। यदि 5-7 वें महीने में गर्भस्त्राव हो तो सिपिया, तीसरे महीने में हो तो सेबाइना तथा आठवें महीने में हो तो कैल्केरिया फ्लोर दें।
• इसके साथ एकोनाइट, सल्फर, सभी एसिड, डिजिटेलिस नहीं दें।
साइलिसिया (SILICEA)
साइलिसिया (SILICEA)
यह दवा अविमिश्र बालू से तैयार की जाती है इसका साधारण नाम सिलिका है। एक बार देने पर यह लम्बे समय तक काम करती है इसलिए इसे बार बार नहीं देना चाहिए। silicea is chronic to pulsatilla यानि किसी रोग के
नये रूप में जहां पल्सेटिला प्रयोग में ली जाती है उसी रोग के पुरानी में साइलिसिया का प्रयोग होता है।
शरीर के किसी भी भाग पर मवाद पड़ने पर साइलिसिया प्रयोग मवाद की मात्रा घट जाती है तथा घाव भी जल्दी भर जाता है।
● हड्डी, मज्जा तथा शरीर के किसी महत्वपूर्ण पोषण भाग का क्षय, विकृति,
कमजोर होने पर, जैसे कुत्तों में रिकेट्स।
● हड्डी या दांत का सड़ना, नासूर उसमें से मवाद या हड्डी टुकड़ा निकलना।
एब्सेस (abscess) एब्सेस की मवाद जब जल्दी नही सूखती हो, मवाद पतले रस की तरह या मांस धोये पानी की तरह खून मिला, बदबूदार, एब्सेस से आराम होने पर भी यहां कडापन कई दिनों तक बना रहें तो साइलिसिया से लाभ होता है। किसी भी तरह का घाव न सुखने पर गन पाउडर 3x दें।
• हिपर सल्फ व साइलिसिया दोनों का प्रयोग मवाद रोकने के लिए किया जाता है। जब मवाद मक्खन की तरह गाढ़ी हो तथा दर्द हो तो हिपर दें तथा जब मवाद पतली व ब्लड मिली हुई, मांस धोये पानी की तरह तथा दर्द नहीं हो तो साइलीसिया दें।
जब एब्सेस की सूजन की अवस्था खत्म होने के बाद भी सूजन रहती है, मवाद नही बनती हो, न पकती है न बैठती है उस समय साइलिसिया 3x या 6x बार बार दें, जल्दी ही एब्सेस पक जायेगी और फट जाएगी।
कुत्तों में एनस के चारों ओर एनल फिस्चुला होने पर साइसीलिया दें। रीढ़ की हड्डी में टेढ़ापन होने पर यह काफी उपयोगी दवा है।
हिफ ज्वाइंट में मवाद या घाव हो जाने पर इसे दें।
• आंखों में मोतियाबिन्द, आंख में तेज दर्द, सूरज की रोशनी सहन न करना.. आंख में मवाद पड़ गई हो।
कान में बदबूदार पतली मवाद यदि लम्बे समय से निकलती हो, यदि कान
की टिम्पेनिक मेम्ब्रेन फट भी कई हो तो इससे फायदा होता है।
• साइलीसिया के साथ कैम्फर, हिपर नहीं दें। अधिक मात्रा में साइलीसिया सेवन करने से एंटीडोट का काम करता है।
सल्फर (SULPHUR)
सल्फर (SULPHUR)
सल्फर को साधारण भाषा में गंधक कहते है। होम्योपैथी के जनक हैनिमैन द्वारा बनाई गई यह एक प्रमुख एंटिसोरिक (सोरा दोषनाशक) दवा है। त्वचा
तथा त्वचा जैसे भाग पर इसका प्रमुख एक्शन होता है। त्वचा का रोग जिसमें कोई दवा लगाने से ठीक हो जाता है और फिर पैदा हो जाती हो, शरीर में जगह जगह जलन हो, बार बार नहलाने पर भी शरीर
में से बदबू नहीं जाती हो। सूखी खुजली में बहुत खुजलाहट, रस बहने वाली खुजली, त्वचा रूखी सूखी, एग्जिमा, दाद आदि ।
विभिन्न चर्म रागों में सल्फर काफी उपयोगी दवा है। खुजली, एग्जिमा, दाद, बार बार जलन, जब त्वचा रोग के कारण बहुत मैली कुचैली रहती हो। खुजली में सेलेनियम भी दी जाती है। जब खुजलाने के बाद झुनझुनी हो तो सेलेनियम तथा खुजलाने के बाद जलन होती है तो सल्फर दें।
दस्त हरा पीला, मवाद की तरह दस्त कैसा भी हो सल्फर दे सकते है। सल्फर से पहले कैल्केरिया का प्रयोग नहीं करें। न्युमोनिया तथा दूसरी नई बीमारियों में एकोनाइट के बाद सल्फर बहुत फायदा करती है। सल्फर के बाद लाइकोपोडियम का प्रयोग नहीं करें। सल्फर के साथ एकोनाइट, कैम्पर,
चायना, नक्स, रसटाक्स, पल्सेटिला, साइलीसिया नहीं दें।
सिम्फाइटम ऑफिसिनेल (SYMPHYTUM OFFICINALE)
सिम्फाइटम ऑफिसिनेल (SYMPHYTUM OFFICINALE)
यह दवा आफुला गाछ की जड़ से तैयार की जाती है। शरीर के किसी भी भाग में हड्डी टूट जाने पर हड्डी जोड़ने के लिए सिम्फाइटम का प्रयोग किया जाता है।
• कैलेन्डुला, अर्निका, लिडम के साथ इसका प्रयोग घाव को भरने के लिए भी किया जाता है। बाहर घाव पर इसके मदर टिंचर या इसके लिनिमेन्ट का प्रयोग किया जाता है।
टेल्यूरियम (TELLURIUM)
टेल्यूरियम (TELLURIUM)
यह एक धातु पदार्थ है जिसकी मुख्य किया त्वचा और कान पर होती शरीर पर गोल गोल सेवचा के दाद में यह फायदा करती है। प्राय कान में मवाद होने पर हिपर साइलीसिया, कैल्केरिया आदि प्रयोग में लेते है लेकिन जब कान की मवाद पानी की तरह पतली, बहुत बदबूदार मानो मछली का पानी धोया हुआ स्त्राव हो तो टेल्यूरियम दें। जब मवाद
गाड़ी हो तो पल्सेटिला देखें।
त्वचा के उपर किसी भी तरह के रिंगवर्ग, फंगल इन्फेक्शन, दाद, खुजली मे तेज खुजलाहट हो तो इसका प्रयोग करें। यह दवा दिन में 2-3 बार कुछ अधिक दिनों तक दें तथा फायदा होते ही बंद कर दें। टेल्यूरियम के साथ नक्सयोगिका नहीं दें।
टेरेबिन्थिना (TEREBINTHINA)
टेरेबिन्थिना (TEREBINTHINA)
यह शुद्ध तारपीन का तेल होता है इसकी 1 बूंद 99 बूंद स्पिरिट में मिलाकर 2x पोटेन्सी की दवा तैयार की जाती है।
पेशाब के साथ जलन, बूंद बूंद पेशाब निकलना, पेशाब के समय दर्द होना, ब्लड मिला हुआ पेशाब होना, पेशाब में बदबू आना।
थूजा ऑक्सिडेण्टालिस (THUJA OCCIDENTALIS)
थूजा ऑक्सिडेण्टालिस (THUJA OCCIDENTALIS)
कनाडा में पायी जाने वाली ऑर्बरव्हिरी नामक वनस्पति के पत्तों से धूजा का टिचर तैयार किया जाता है। त्वचा, युरिनरी सिस्टम तथा रिप्रोडक्टिव सिस्टम पर इसका प्रमुख एक्शन होता है। मस्सों की यह प्रभावशाली दवा है। वैसे शरीर के विभिन्न भागों पर मस्सों में अलग अलग दवा प्रयोग करें। तो अधिक लाभ होगा।
● गुह में मस्सा - कोस्टि, नाइट्रिक एसिड, थूजा भौहों पर कॉस्टि। आंख की पलकों में नाइट्रिक एसिड। नाक में धूजा, कौस्टि। जीभ में ऑरम म्यूर गर्दन, में नाइट्रिक एसिड हाथ पैरों में केल्केरिया, लेकेसिस, लाइकोपोडियम, थूजा, रसटोक्स, नर पशु के लिंग की त्वचा में या लिंग के अग्र भाग पर मस्से सिनाबेर, थूजा।
• पुराना मस्से - कौस्टि नैट म्यूर, सल्फ। रक्त स्त्रावी मस्से - सिनाबेर, नाइट्रिक एसिड, सिपिया चपटे मस्से लैकेसिस कड़े मस्से- एंटि क्रूड, कौस्टि, लैकसिस सींग की तरह मस्से- एंटि क्रूड, बौरक्स, कैल्केरिया, थूजा। बड़े मस्से कौस्टि, एसिड नाइट्रिक, सिपिया। छोटे मस्से केल्के, फेरम, हिपर, लैके, एसिड नाइ, थूजा।
कैल्केरिया कार्ब- चेहरे पर, गर्दन पर और शरीर के ऊपरी अंश में मस्से। कौस्टिकम पुराना मस्सा, नाक, भौंह, मुंह के
मस्से। • लाइकोपोडियम - फटे फटे मस्से।
नैट्रम म्यूर पुराना मस्सा, कट जाने की तरह दर्द, पैरों पर अनगिनत मस्से ।
• नैट्रम सल्फ गांठदार मस्से, मल द्वार में • नाइट्रिक एसिड फूल गोभी की तरह मस्से, कड़े, हमेशा बदबूदार रस निकलता हो, छूने पर ब्लड निकलता हो • मुह की दवा देने के साथ मस्से पर दवा का मदर टिंचर लगाने से मस्से जल्दी
ठीक होते है।
ट्राइनाइट्रोटोलीन (TRINITROTOLUENE)
ट्राइनाइट्रोटोलीन (TRINITROTOLUENE)
• पशुओं में विभिन्न ब्लड प्रोटोजोआ पैरासाइट के कारण हिमोग्लोबिन और लाल रक्त कणिकाएं कम हो जाती है। ब्लड के इस तरह के नुकसान के रोग
जैसे बबेसियोसिस में इसका उपयोग करते है।
आर्टिका यूरेन्स (URTICA URENS)
आर्टिका यूरेन्स (URTICA URENS)
यह दवा स्टिंगींग नेटल वनस्पति से बनाई जाती है। इसका प्रमुख उपयोग त्वचा के रोगों में होता है।
मादा पशु के ब्याने के बाद यदि दूध कम हो या एक दम ही दूध नहीं आता हो तो इसके सेवन से विशेष लाभ होता है।
• मूत्रा में यूरिक एसिड अधिक निकलने पर यह काफी लाभदायक है।
वैरेट्रम एल्बम (VERATRUM ALBUM)
यह दवा व्हाइट हेलीबोर नामक वनस्पति की जड़ से बनाई जाती है। इसका प्रयोग उल्टी दस्त के इलाज में किया जाता है।
जब उल्टी की अपेक्षा दस्त ज्यादा हो, दर्द रहता हो, दस्त के बाद कमजोरी, बार बार ठंडा पानी जीने की इच्छा हो, दस्त कभी पानी की तरह, कभी हरा, कभी पीला हो।
वर्बेस्कम थैप्सस (VERBASCUM THAPSUS)
वर्बेस्कम थैप्सस (VERBASCUM THAPSUS)
• इसे मूलेन ऑयल कहते है। कान में मवाद पड़ने पर कान में डाला जाता है।
वाइपेरा (VIPERA)
वाइपेरा (VIPERA)
• यह दवा जर्मनी के पाये जाने वाले एक सांप के जहर से तैयार की जाती है। शिरा (vein) का बहुत अधिक फूलना, शिरा प्रसारण (varicosis) लिवर का बढ़ना आदि रोगों में इसे दिया जाता है।
जिंकम मेटालिकम (ZINCUM MATALLICUM)
जिंकम मेटालिकम (ZINCUM MATALLICUM)
जस्ता धातु से यह दवा तैयार की जाती है। इसका मुख्य एक्शन ब्रेन व स्पाइनल कोर्ड पर होता है। यह तंत्रिका को ताकत देता है। • शरीर में जीवन शक्ति की कमजोरी, बार बार या अधिक दिनों तक की बीमारी से शारीरिक कमजोरी हो तो जिंक दें।
• मेनिन्जाइटिस, सेरेब्रोस्पाइनल मेनिन्जाइटिस, कोरिया (chorea) में। किसी भी बीमारी में सारे शरीर में कम्पन्न रहने पर जिकम दें।