तेरी नाराज़गी
तेरी नाराज़गी में, आशिक़ी है,
तेरी रवानगी में, उदासी है।
तुम्हारा रूठ जाना, हमसे
मेरे दिल में, तेरी बेताबी है।
तुम्हारा मुंह फेर लेना लगे,
चांद की फीकी चांदनी है।
अब कितनी अमावस रातें होंगी,
कितने टूटे तारे गिनेंगे।
कितनी दफा तुम्हें पूछेंगे,
तुम मान भी जाओ, मेरी रहनुमा,
एक झलक मुस्कुरा दो, हम हंसते दिखेंगे।
तेरी ख़ुशी में, मेरी सादगी है,
मेरी गलतियों में, तेरी माफ़ी है।
तेरे गम मुझे रुला दे,
कुछ करो ना, मेरी जान,
हर पल मुझे सताती है।
तुम्हारा रूठ जाना, हमसे
मेरे दिल में, तेरी बेताबी है।
तुम्हारा मुंह फेर लेना लगे,
चांद की फीकी चांदनी है।
तुम डांटती रहो, मैं सुनता रहूं,
तुम मारती रहो, मैं सहता रहूं,
बस दूर मत जाना किसी पहर,
तुम दिल में छिपा लो, मैं सहमा रहूं।
नाराज़गी अब छोड़ भी दो,
मेरी प्यारी पागल दिलरुबा।
मत करो गुमान, मान भी जाओ,
सीने से लगाओ, दिल में रहेंगे।
दूर मत जाना, फिर से मिलेंगे,
तुम सुनती नहीं, हम लिख कर कहेंगे।
तुम मान भी जाओ, मेरी रहनुमा,
एक झलक मुस्कुरा दो, हम हंसते दिखेंगे।
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हसीन ख़्याति
इस क़दर तुम आ गई हो,
रूह में मेरे छा गई हो।
जब जब साँसे भरता हूँ मैं,
हवाओं के संग समा गई हो।
क्या हो तुम, क्या फ़ितरतें हैं,
क्या हसरतें हैं, क्या दीवानगी है।
क्या दिल्लगी है या मोहब्बतें हैं,
कहाँ हो तुम इस सफ़र में?
रहगुज़र सी हमसफ़र हो।
चार कदम की ज़िंदगी में,
हमकदम मेरी हमनशीं हो।
ख़्वाबों के पन्नों पर जैसे जैसे लिखता हूँ,
वैसे वैसे कलम की स्याही सिर्फ़ तेरी ओर बहती है।
कोरा कागज़ रंग के मेरा,मुझको मुझसे कहती है।
तारे टूटे मत माँगो, चाँद के दर्द को सहती है,
अलबेली, निराली सी, नादानियाँ वो करती है।
रात भर छत पर रह के,शबनम से बातें करती है।
बहाने उसके बहाने नहीं होते,
नाराज़गी दिखाकर बढ़ी शैतानी करती है।
भोली भाली सूरत लेकर,
हँसती और हँसाती रहती है।
कभी अंदर ही अंदर
अपने दुखों को छिपाती है,
आँसुऐं बहाती है,
रोती है, रुलाती है,
छुई मुई सी मुरझा कर,
मानती नहीं, मनाती है।
ये लापरवाह लड़की
बड़ी हसीन ख़्याति है।
इस क़दर तुम आ गई हो,
रूह में मेरे छा गई हो।
जब जब साँसे भरता हूँ मैं,
हवाओं के संग समा गई हो।
तेरी ज़ुल्फ़ों के आशियाने में,
मैं रहता हूँ तेरे सिरहाने में।
मैं सुनता हूँ तेरे बताने में,
तेरी लबों की मिठास मेरे ख़जाने में।
मैं आईना बन जाऊँ तुम्हें सजाने में।
तुम इतनी ख़ूबसूरत मेरी निगाहों में,
देख लो बस एक झलक इसी बहाने से।
तुम्हें कितनी फ़ुर्सत से बनाया इस ऊपर वाले ने,
कैसे शुक्रियादा करूँ जो तुमसे है मिलाया।
अब तुम ज़िंदगानी हो मेरी, इसी ज़माने में।
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सोचा है
क्यों मैं किसी के साये में छिपा हूँ,
खुद की काबिलियत में न जिया हूँ।
जब अंधेरी रातों में जलने का सोचा है,
अकेले सफ़र में चलने का सोचा है।
चाहे वीरान पड़ा हो आशियाना मेरा,
फिर भी तकलीफों में हँसने का सोचा है।
इस आइने में मुझको भरोसा है,
जितना भी दिखेगा, सच ही दिखेगा।
न शक की कोई गुंजाइश रहेगी,
ख्यालों से निकलो जब हकीकत में धोखा है।
माना, ओस की तरह अभी नाज़ुक हो तुम,
जब धूप में तपोगे, खुद ही हवा बनकर उड़ोगे।
क्या बारिश को किसी ने गिरने से रोका है,
जब खुद की तलाश में लिखने का सोचा है।
कहीं रह न जाए कोई ख्वाहिश अधूरी,
क्योंकि मरने से पहले जीने का सोचा है।
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कहां हो तुम
ख्वाबों के सपनों में आखें जो खुलती है
उन खुली हुई आंखों में दिखती हो तुम
ख्यालों के दारिया में उठती जो लहरें हैं
उन लहरों के पानी में बहती हो तुम
घड़ी के काटों में चलती जो समय है
उन समय के दर्मियां गुजरती हो तुम
रातों के अंधेरे में रौशन जो दिया है
उस दिए की बाती में जलती हो तुम
आसमानों के प्याले में चमकते जो तारें है
उन तारों के चांद में रहती हो तुम
जीने की चाहत में मांगे जो ख्वाहिश है
उन ख्वाहिश के पेड़ों में खिलती हो तुम
गुलाबों की टहनी में खिले जो फूल हैं
उन फूलों से निकली खुशबू हो तुम
यादों के बाग़ में मीठी जो बातें हैं
उन बातों के लफ्ज़ों में मिठास हो तुम
किताबों के पन्नों में अल्फाज़ जो लिखें है,
उन लिखे हुए एहसासों में मिलती हो तुम
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