"Your mind creates: It is not created.
Think about it".
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इरादे
क्यों खुद को रखते हो इतने अंधेरे में,
काली समा नहीं, काली घटा नहीं,
काले इरादे हैं, काली दुआ नहीं।
क्यों बहती हुई हवा को पीते हो,
जब ठहरी हुई जिस्म में जीते हो।
थोड़ा जुनून तुम खुद में जला लेना,
उसकी तपिश में खुद को पका लेना।
फिर हुनर, काबिलियत मसाल बनेगी,
अपने रग के अंधियारों को जगा देना।
सरल सरस सा मिला है जीवन,
समय पर संघर्ष से सँवारो ना।
बेशक भय सताएगा,
खुद को अभय बनाओ ना।
सहम सहम कर चलना मत,
संयम से कदम बढ़ाओ ना।
दुनिया का दस्तूर यही है,
गिराती है, रुलाती है,
हंसाती है, सिखाती है।
होना मत हताश कभी,
यह वक्त बहुत लगाती है।
सब्र का सागर शांत रखो,
लहरों में हौंसले बांध रखो।
चाहे पानी खारा कितना मिले,
मीठा अक्स संभाल रखो।
दुःख के पहाड़ तले दबना मत,
ख्यालात, जहन में मरना मत।
तुम गलतफहमियों में न रहो,
अंधेरी हकीकत में जलना मत।
नींद के सपने त्याग के तुम,
ख्वाब के सरहदें पार करोगे।
मुश्किल चाहे जितनी हो,
कोशिश बेहिसाब करोगे।
हार जाना हज़ार दफा,
एक दफा खुद से जीतोगे।
फिर आइने में हंस कर खुद को देखना,
उस शख्स की तारीफ करोगे।
ऐसी किताब बनकर पढ़ना,
कहानी जिसकी तुम खुद लिखोगे।
यही ज़िंदगी है, इसी को है जीना,
अभी नहीं तो कब खुलकर जिओगे।
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उम्मीद
इस भीड़ भाड़ की दुनिया में
कही छूट गई
जिदंगी की डोर
न उड़ पाया न गिर पाया
यूं ही उलझ के रह गया मैं
उम्मीद की तालाश में सिर्फ
कास की राह ताक रहा हूं
न उम्मीद मिली न राह मिली
बेहतरीन की आस में
और बत्तर की ओर जा रहा हूं
शामें ढली उम्मीद डूबा कर
चांदनी रात में चांद से बस
दुआएं ही तो मांग रहा हूं
सूरज की पहली किरण
मुझ पर ऐसे आ टिकी
जैसे दुआओं का ये असर हो
एक पतंग दिखी आसमां में
जो हवाओं से थी लड़ रही
दटके लड़कर अपना परचम
पूरे आसमां में लहरा आई
सिर्फ नजरें मेरी उस पर थी
कि आंखें उसकी
मुझसे आ मिली
उसकी तीर जैसी आंखें
फिर मुझे घायल कर गई
पहले से मैं टूटा था
और चकनाचूर हो गया मैं
उम्मीदों का कहीं पता नहीं
शायद दुआओं का ये असर था
उसकी डोर मुझसे आ फंसी
सोचा कि मैं और उलझा
पर सुलझा के ऐसे ले गई
आसमां भी देख शर्मा गया
मन में लड्डू ऐसे फूटा कि
इस दुनिया में उसकी भी कोई आ गई
हाथ भी छूटा साथ भी छूटा
गिर के जमीं पे आ गया मैं
आसमां की ऊंचाई देख
हकीकत में फिर जाग गया मैं
इस भीड़ भाड़ की दुनिया में
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हम विद्यालय जाएंगे
हम बच्चे हैं
थोड़े कच्चे हैं
जैसे हैं
पर सच्चे हैं
पढ़ेंगे हम अधिकार है
लिखना बेशुमार है
रह न जाए पीछे कोई
सबको साथ लाएंगे
हम विद्यालय जाएंगे
तभी
कुछ सीखेंगे कुछ पाएंगे
शिक्षक ही भगवान है
किताबों में जो ज्ञान हैं
कुछ पढ़ेंगे कुछ लाएंगे
सबको हम समझाएंगे
पढ़ लो अभी उम्र है
यह वक्त नहीं गवाएंगे
खेलेंगे भी खिलाएंगे
भागेंगे दौड़ाएगें
जो गिरे उसे उठाएंगे
सबको साथ लाएंगे
क्योंकि
हम विद्यालय जाएंगे
तभी
कुछ सीखेंगे कुछ पाएंगे
दो चार कदम बढ़ाएंगे
सबको हम बताएंगे
शिक्षा क्यों आवश्यक है
पढ़ेंगे नहीं तो
जानेंगे कैसे
हमारा क्या अधिकार है
क्योंकि
हम विद्यालय जाएंगे
तभी
कुछ सीखेंगे कुछ पाएंगे
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भारत
जहां बादल गरजे, खुशियां बरसे
कलियां खिलकर मोती बनते
आगरा में ताज चमकता, मेघालय के मेघ बरसते
सिंधु घाटी सभ्यता, राजस्थान से ढोल बजते
गुजरात में लौह पुरुष, अयोध्या में राम बसते
महाराष्ट्र के छत्रपति, इसे सोने की चिड़िया कहते
कश्मीर की वादियां, पंजाब के खेतों में बाली होती
अमृतसर का स्वर्ण मंदिर, अरुणाचल की हरियाली होती
उत्तराखंड में बद्री और केदार, पुरी में जगन्नाथ होती
दक्षिण में रामेश्वरम, पश्चिम में द्वारिका होती
वृंदावन के कृष्ण, कन्याकुमारी होती
थार का मैदान, कोलकाता से हुगली बहती
जोधपुर का किला, झांसी की रानी होती
सियाचिन के ग्लेशियर, बंगाल की खाड़ी होती
सतपुड़ा के पर्वत, हिमालय की चोटी होती
चेन्नई का भरतनाट्यम,केरल की खूबसूरती होती
भाखड़ा नांगल बाँध, कुचिंकल में झरना गिरती
दिल्ली का लाल किला, एलोरा की गुफाएं होती
शिमला की बर्फ, असम की चाय होती
जयपुर का हवा महल, जैसलमेर की शाम होती
हैदराबाद की चार मीनारें, रानी की वाव होती
मीनाक्षी मदुरई में, खजुराहो की कारीगरी
मध्य प्रदेश की जान नर्मदा, अमरकंटक संभाल रही
वाराणसी के तट से, गंगा बहते जा रही
सौंदर्य, संस्कृति अपनी दुनिया को दिखा रही
यह महान देश मेरा भारत मां कहला रही
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अये समा
ख्वाहिश के किताबों में, कागज के लिफाफों में
बारिस के बूंदों में, सपनों के नींदों में
मुस्कुराते रूप लेकर, आसमां को धूप देकर
अये समा बनके हवा, बह रही तू हर जगह
खिलखिलाती फूलों में, लटके लता के झूलों में
मधु की मिठास से, तितलियों के पास में
शांत स्वर से कविता में, बिना हलचल के सरिता में
स्वाभिमान के गरिमा से, मातृभूमि की महिमा में
बहते हुए नीर बनकर, शब्दों से जमीर बनकर
अये समा बनके हवा, बह रही तू हर जगह
कोयल की बोली से, रंगो की रंगोली से
मस्त पवन के झोके से, हंसते गगन के धोखे से
रेत सी फिसल रही, बर्फ सी पिघल रही
शबनम जैसे गिरकर, भाप बनकर उड़ रही
अये समा बनके हवा, बह रही तू हर जगह
पहेली के सवालों में, अंधेरों से उजालों में
गुनगुनाते गीत में, बज रहे संगीत में
गुजरे हुए कल से, वक्त के हर पल में
चांद की चमक बन, सूरज जैसे जल के
न हाथों की लकीर में, किस्मत की तक़दीर में
जज़्बाती बन जीत के, ख़्वाब है उम्मीद से
अये समा बनके हवा, बह रही तू हर जगह
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