दिल की ग़मी
मैं बिखरा, दिल की ग़मी से कभी उभरा ही नहीं,
मैं भीगा, अश्कों की बारिश से कभी सूखा ही नहीं।
देखा एक ख़्वाब, जो हक़ीक़त में आकार खिलती रही,
ढली जो शाम, फिर
मंजर था ऐसा, उससे बेहतर,
मेरे दिल की ज़मीं, बंजर ही सही।
आशनाई है, अंधेरी रातों से,
अफ़्सुर्दगी भरी, इन दीवारों से।
टूटे शीशे में शक्ल क्यों देखूं,
उस शख्स के टुकड़े हैं, हजारों में।
बीती बातों में, खुशी थी ऐसे,
बीती बात तो, सिर्फ ग़म है ठहरा।
नम हैं आंखें, सहमी हैं सांसें,
क्या पलकें झपकाऊं, जी नहीं कह रहा।
तड़पती हैं आंखें, नींद के लिए,
असलियत में, हर जगह वहम ही दिख रहा।
वहम भी उसका, जिसके हम कोई नहीं,
उम्मीद जगाई, टूटेंगे तारे,
क्या मांगूं उन्हें, जो मेरे लिए रोए नहीं।
अब मुकरती है, चांद निकलने से रातों में,
कहीं अमावस के अंधेरों में, खोए नहीं।
मैं बिखरा, दिल की ग़मी से कभी उभरा ही नहीं,
मैं भीगा, अश्कों की बारिश से कभी सूखा ही नहीं।
देखा एक ख़्वाब, जो हक़ीक़त में आकार खिलती रही,
ढली जो शाम, फिर
मंजर था ऐसा, उससे बेहतर,
मेरे दिल की ज़मीं, बंजर ही सही।
सब पढ़ते हैं मुझे, किताबों की तरह,
कोई समझ न सका, क्या किताब हूं मैं।
लिखता हूं मैं भी, दो-चार नज़्म,
कुछ में भरे हैं, थोड़े से ग़म।
थोड़ी सी वो, थोड़े से हम।
अब क्या लिखूं मैं आगे,
हर कदम पर मिलेंगे, जख्म।
हर ज़ख्म के मरहम ढूंढ रहा हूँ,
जहन से अपने बीते बातें भूल रहा हूँ।
नादान था कि ग़लतियाँ,
ग़लतियों से मैं सीख रहा हूँ।
बादल की बारिश में भीग रहा हूँ,
बंजर ज़मीं को सींच रहा हूँ।
वहम से परे अब ख़्वाब भी खिलेंगे,
अमावस के अंधेरों में चाँद भी दिखेंगे।
देखो, सवेरा होने को है,
सूरज की रौशनी हँसने लगी।
अब सुरमई मुझको शाम भी मिलेंगे।
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ख्यालों का शोर
मैं जिंदगी अपनी रेत में खोज रहा,
मेरा पत्थरों से अब कोई वास्ता नहीं।
मैं चाहता हूं गुम अंधेरों में होना,
अब झूठी उम्मीद लिए भागता नहीं।
कितने चेहरे देखे मैंने इस आइने में,
ये शख़्स है जो मुझे पहचानता नहीं।
कितनी रातें मैंने जागी नींद के लिए,
मेरी आंखों में सपना क्यों आता नहीं।
अपनी ही दीवारों में चुना है खुद को,
अब समंदर के किनारे मैं जाता नहीं।
न होश है मुझे, न डर लग रहा,
मैं बेहोश नहीं, मदहोश नहीं।
ख्यालों में खुद के शोर कर रहा,
क्या सुकून है मिला, क्या गुरूर है मुझे।
छांव भी है, मैं धूप में रहा,
मैं मीठे पानी में खारा अक्स,
आंसू की बूंदों में बहता दर्द,
ख़ामोश ही रहूं, मैं ऐसा लफ्ज़।
मैं तस्वीर पे लगे कील की तरह,
बारिशों में झील की तरह,
बहना चाहूं, कभी भर न सकूं,
अपनों के बीच जलील की तरह।
मौत से मिलूं, नया रिश्ता जुड़े,
रस्म के लिए कफ़न सिल रहा।
असलियत में कोई वजूद न मिले,
बिन रूप के साए में वहम दिख रहा।
मजबूर हूं या दस्तूर है मेरी,
कपूर की तरह रोग है मुझे।
जल भी जाऊं तो कोई हर्ज नहीं,
न राख बचे, न राज रहे,
न सबूत दिखे, न इल्ज़ाम लगे।
खुद के गम में सुलगता रहा,
थोड़ा दर्द बढ़े, मुझमें आग लगे।
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मैं अब मैं ही न रहा
मैं अब मैं ही न रहा,
एक सफर में ख़ुद को छोड़ के
ख़ुद ही जा रहा।
मैं रहा… न रहा।
मेरे जाने से मुझे
मैं रोक न सका,
न रुका… मैं जा चुका।
क्यों फासले दूरियां बनाता फिर रहा हूं,
आईने में ख़ुद को देख छिपाता फिर रहा हूं।
मेरे कमरे की दीवारें मुझे दबाने सी लगी हैं,
मैं जाता छत पर बैठने, आसमान काला दिख रहा है।
उजाले के लिए मैंने आग जो लगाई,
उन कागज़ों के लौ में जलता फिर रहा हूं।
नज़रों के सामने सब ओझल हो गया है,
आंसू की बूंदें हैं या कोहरा उड़ रहा।
मैं राज हूं इस धुंध में घुला हुआ,
मैं किताब हूं बिन स्याही के जला हुआ।
मैं राख हूं इस अर्श में पड़ा हुआ।
ये अक्स बोलती है, रोती है, सहती है,
मैं ख़्याल हूं इस शख़्स पे मरा हुआ।
मैं अब मैं ही न रहा,
एक सफर में ख़ुद को छोड़ के
ख़ुद ही जा रहा।
मैं अब मैं ही न रहा,
मैं अब मैं ही न रहा।
रास्तों में हादसे मैं खुद से ला रहा,
एक सफर में ख़ुद को छोड़ के
ख़ुद ही जा रहा।
मैं अब मैं ही न रहा।
किन्हीं यादों के बहाने मैं रोता फिर रहा हूं,
किसी बातों के सहारे मैं सोता फिर रहा हूं।
मुझे नींद क्यों आती नहीं बंद आंखें खुली करके,
मैं अपने दिल के संदूकों में ज़ख्म गिन रहा हूं।
कुछ तो इतने गहरे हैं, उन्हें अब भी सिल रहा हूं,
किसी मरहम की दुआ में मैं अब भी लिख रहा हूं।
मैं अब मैं ही न रहा,
एक सफर में ख़ुद को छोड़ के
ख़ुद ही जा रहा।
मैं अब मैं ही न रहा,
मैं अब मैं ही न रहा।
रास्तों में हादसे मैं खुद से ला रहा,
एक सफर में ख़ुद को छोड़ के
ख़ुद ही जा रहा।
मैं अब मैं ही न रहा।
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ये कैसी कहानी है
ये ज़िंदगी सर्द हवा सी बह रही,
गम के साये में सब कुछ सह रही।
बेरूख़ी सी हो गई हैं दोनों आँखें,
अफ़्सुर्दगी अंधेरे में क्या-क्या कह रही।
न जाने क्यों बेचैन हो रहा हूँ,
दिल की ज़मीं पे वहम बो रहा हूँ।
फिर रुक-रुक के क्यों बारिश होती,
अधूरी ख्वाहिशें आँखों में रोती।
बिखरा हुआ मैं भीग रहा हूँ,
न उम्मीद है, बस चीख रहा हूँ।
ये कैसी महफ़िल में आकर,
वक़्त की तरह मैं बीत रहा हूँ।
मेरी दीवारें मुझे सुनती हैं,
बयाबान मैं बस लिख रहा हूँ।
अगर
ख़ुशी लिखूँ तो वो दुःख बन जाए,
दुःख लिखूँ तो वो दर्द बन जाए,
दर्द लिखूँ तो वो ज़ख्म बन जाए,
ज़ख्म लिखूँ तो वो ज़हर बन जाए,
ज़हर लिखूँ तो वो कफ़न बन जाए,
कफ़न लिखूँ तो वो दफ़न कर जाए।
इस क़दर महरूम हो गया हूँ,
बिन आशियाने मैं सो गया हूँ।
नींद की तलाश में अंधेरी रातों के,
तारों के बीच कहीं खो गया हूँ।
ये कैसी कहानी है,
यही तो मेरी ज़िंदगानी है।
इस कलम में कितनी स्याही थी,
थोड़ा और लिखूँ, बहुत प्यासी है।
ये कागज़ जैसे आईना है,
ख़ुद से मुझे दिखाती है।
कहती नहीं, बताती है
तुम ये नहीं जो कहानी हैं।
माना यादों में समाई हुई,
बहुत सी लम्हें उदासी है।
किताब बदलो, किरदार नहीं,
अभी बहुत से पहलू बाक़ी हैं।
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वीरान इमारत
कैसे कोई पहचाने मुझको,
आइने में ये किसका चेहरा?
घुट-घुट के मैं सांसें भरता,
काली दीवारों में रहता।
खामोशी की आहट ऐसी,
दिल की धड़कन से भी डरता।
आंखों में क्यों नींद नहीं है,
सोते ही सपनों में मरता।
बिन मौसम बारिश में भीगे,
इक अरसा जमाना गुजरा।
उम्मीदों का साया नहीं है,
तकलीफों का आलम कैसा।
शाम-सवेरा मैं क्या जानूं,
चांदनी रात मुझे नहीं दिखती।
क्यों तारे टूटे तब ही मांगूं,
ख्वाब नहीं हैं आंखों में,
अश्क बहे, मैं साथ चाहूं।
वीरान सा मैं इमारत,
नींव नहीं, सिर्फ चीख सहता।
करीब न आना मेरे तुम,
मैं टूटा हूं, बिखर के कहता।
घुट-घुट के मैं सांसें भरता,
काली दीवारों में रहता।
खामोशी की आहट ऐसी,
दिल की धड़कन से भी डरता।
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सुकून
मैं आज कल शामों सुबह
खोया खोया सा सुकून ढूंढता
कहीं तो मुझे मिलेगा वो कभी
दिल और दिमाग़ में फासले बढ़े
हर बार क्या रास्ते मैं गलत चुनता
मंजिल मिली नहीं, सपने बिखर गए
हौसले में अब वो बात नहीं रही
जब किस्मत सामने से मुंह मोड़ता
मौत से मिलूं तो कुछ सुकून हो
जीते जी सिर्फ मेरा खून खौलता
सजा मुझे किन गुनाहों की मिली
रिहाई लेने मैं गवाह ढूंढता
गवाह भी मेरे खिलाफ़ खड़े थे
पहचानने से मैं इनकार कर दूं
जब आईने में खुद को सौ बार देखता
मैं अंजान ही था, ज्यादा जानता भी क्या
मोहब्बत पे लिखा तो अश्क गिरता
ख्यालों के कैद से रिहा मैं हुआ
हकीकत पे लिखा तो लहू बहता
मैं आज कल शामों सुबह
खोया खोया सा सुकून ढूंढता
कहीं तो मुझे, मिलेगा वो कभी
सफ़र में अकेला मुसाफ़िर, मैं सड़क ढूंढता
सड़क सड़क मैं शहर घूमता
इमारतें हैं ऊंची, गलियां बड़ी तंग, वीरान पड़े लोग,
बाज़ार की भीड़ में हज़ार जिंदगियां
ज़िन्दगी झूठ है या झूठ पे ज़िन्दगी
क्यों सपने को बेच, कोई खुशियां खरीदता
कोई भूख लिए, रात में पनाह
कोई दोपहर में छाव ढूंढता
सुकून की तालाश में क्या कोई गांव घूमता
मुझे लगता, मेरी ज़िन्दगी खराब है
दुनिया में देखा, दर्द और तकलीफें
खुशियों के नाम पे, जीने को मजबूर लोग,
मरने को तैयार हैं
ज़िन्दगी खाली एक किताब है
स्याही रगों में, कलम ख्याल है
सुकून खोजने निकला था जमाने में
जमाने से मेरे ज़हर निकला
सुकून मुझे नहीं चाहिए
अब खुद से मैं सवाल पूछता
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बिखरा हुआ
बूंद बूंद सपने
गिरते जा रहे
बारिशों की आड़ में
आंसुएं छिपा रहा
तिनका तिनका
रोकूं कैसे
खुद में खुदको
खोजूं कैसे
बारिश की इन बूंदों में
सपनों को
मैं ढूंढूं कैसे
ये बादल आवारा
हंसता रहा
ज़माने की तरह
हौसले मेरे
गिरा के चल पड़ा
पानी की तरह
मैं बिखरा हुआ
न सूखता मैं
न ही बह सका
उम्मीद की आस में
एक ही जगह
फंसता गया
यादों को खुरेदती
आदतें मेरी
चांद की तरह
चमकना था मुझे
एक ही रात में
सब गुजर गया
वक्त से लड़ूं
या
वक्त पे लड़ूं
लड़ता भी क्या
वो ख्वाहिशें मेरी
ये वक्त निगल गया
तोड़ के मुझे
ये बादल आवारा
हंसता रहा
ज़माने की तरह
हौसले मेरे
गिरा के चल पड़ा
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