ठंड का मौसम चाहे कितना ही बेरहम था लेकिन हम उससे लड़ना सीख चुके थे। मैं कभी नहीं भूल सकता हूँ उस बाल्टी को जिसमें आग जलाकर हम एक घेरे में घंटों बैठा करते थे।
सुबह पुलाऊ खाने के बाद थाली धोने से ज़्यादा कठिन शायद ही कुछ था लेकिन लोगों में टैलेंट की कमी कहाँ थी, किसी ने ये खोज लिया था कि गर्म चाय से थाली आराम से धुल जाती है और ये खोज हमारे लिए किसी परमाणु की खोज से ज़्यादा महत्वपूर्ण थी।
दसवीं और बारहवीं की बच्चे अपनी अपनी कुर्सियाँ पकड़कर बैठ जाते थे कहीं धूप मैं पढ़ाई करने क्योंकि सर्दियों का मौसम सिर्फ़ धूप सकने का ही नहीं बल्कि पढ़ाई का भी मौसम था। कोई शॉल ओढ़कर तो कोई कंभल ओढ़कर क्लास पहुँचता था पर सबसे ज़्यादा परेशानी तो वो सफेद जूतों में लगने वाली ठंड देती थी, ऐसा लगता था मानो पैर मैं कोई जूता ही ना पहना हो। जो पीटी सर पुलिया तक दौड़ाने के बाद भी आधा घंटा पीटी करवाते थे, वो भी ठंड के मौसम में हमें मॉर्निंग वाक करवाकर छोड़ दिया करते थे। शायद ही कोई भूल पाए उस दुर्गन्ध को जो सुबह मॉर्निंग वाक करते वक्त मेन गेट से थोड़ा पीछे आती थी। वो ठंड मैं हाथ की उँगलियों का सूजना हो या सुबह सुबह मेस में बर्फ जितने ठंडे पानी से प्लेट धोना हो, इन सब चीजों ने हमें मजबूत बनना सिखाया। मैं कभी नहीं भूल सकता हूँ कि कैसे हम लोग सुबह 4 बजे हमाम से गर्म पानी लेने के लिए उठ जाते थे और हमाम के पास जल रही आग को बिना सेके जाना तो शायद ही किसी से हो पता था। 10वीं और 12वीं के बच्चों को सुबह चाय भी मिलती थी और ये चीज़ उनको सुबह उठने की और पढ़ने की एक हिम्मत देती थी।
असेंबली ग्राउंड का वो पीछे वाला हिस्सा जो गर्मियों में हमे किसी AC का एहसास देता था, वही हिस्सा ठंडियों में महीनों तक बर्फ़ या पाले से जमा रहता था। फैशन की दृष्टि से भी ठंड का मौसम बहुत ख़ास था। किसी साल “गाफ़ा “तो किसी साल “मास्क और काला स्टाल” कभी “बफ” तो कभी “मफलर” और “लंबी टोपी” का ट्रेंड चल जाता था। जब कोई बच्चा गर्मियों के बाद स्कूल का ब्लेजर पहनकर आता था, उसी को ठंड का ऐलान माना जाता था। ठंड की ऐसी कितनी ही यादें हैं जो उसको एक मौसम से बहुत ख़ास बनाती हैं। आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है की ठंड का मौसम सिर्फ़ एक मौसम ही नहीं था बल्कि एक यादों की एक पूरी किताब थी जिसे मैंने और मेरे दोस्तों ने साथ में लिखा था।