Hastamlakam / हस्तामलकं

हस्तामलकम्
(
मूल संस्कृत)
हस्तामलकम्
(हिंदी भावानुवाद)
Hastamlakam (English)
कस्त्वं शिशो कस्य
कुतोऽसि गन्ता,
किं नाम ते त्वं
कुत आगतोऽसि।
ऐतंमयोक्तम
वद चार्भकत्वं,
मत्प्रीतये
प्रीतिविवर्धनोऽसि ॥१॥
श्री शंकराचार्य हस्तामलक से प्रश्न करते हैं - मेरी प्रीति को बढ़ाने वाले तुम कौन हो? किसके पुत्र हो? कहाँ जा रहे हो ? तुम्हारा नाम क्या है? कहाँ से आए हो? हे बालक, मेरी प्रसन्नता के लिए, मुझे यह सब बताओ ॥१॥
Sri Shankaracharya asks the little boy, Hastamlaka - Who are you invoking love in me? Whose child are you? Where are you going? What is your name? From where have you come? O Child! please answer these for my happiness. ॥1॥
नाहं मनुष्यो
न च देवयक्षौ,
न ब्राह्मणक्षत्रिय
वैश्यशूद्राः।
न ब्रम्हचारी
न गृही वनस्थो,
भिक्षुर्न चाहं
निजबोधरूपः ॥२॥
हस्तामलक उत्तर देते हैं - न मैं मनुष्य हूँ , न देवता अथवा यक्ष हूँ , न मैं ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य या शूद्र हूँ, न ब्रह्मचारी, गृहस्थ, वानप्रस्थ या सन्यासी हूँ , मैं केवल आत्मज्ञान स्वरुप हूँ ॥२॥ Little Hastamlaka answers - I am not man, not demigod or yaksha, not brahman, kshatriya, vaisya or sudra (not belonging to any of the varnas), not brahmachari, householder, forest-dweller or sanyasi (not belonging to any of the four stages of life); but I am self knowledge alone. ॥2॥
निमित्तं मनश्चक्षु-
रादिप्रवृत्तौ,
निरस्ताखिलोपाधि-
राकाशकल्पः।
रविर्लोक चेष्टा-
निमित्तं यथा यः, 
स नित्योपलब्धि-
स्वरुपोऽहमात्मा ॥३॥
जिस प्रकार सूर्य इस संसार के सारे क्रिया - कलापों का कारण है, उसी प्रकार मन और चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों की चेष्टाओं का आधार परन्तु समस्त उपाधियों से आकाश के समान रहित, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥३॥ As the sun is the cause of all worldly activities, similarly I am the cause of the activities of mind, eyes and other sense organs. Devoid of all limiting adjuncts like space, I am that ever-present, eternal self-knowledge. ॥3॥
यमग्न्युष्णवन्-
नित्यबोधस्वरूपं,
मनश्चक्षुरादीन्य-
बोधात्मकानि।
प्रवर्तन्त आश्रित्य-
निष्कंपमेकं, 
स नित्योपलब्धि-
स्वरुपोऽहमात्मा ॥४॥
जिसका अग्नि की उष्णता के समान अनवरत बोध होता है, जो स्वयं स्थिर रह कर अकेले ही मन, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों को कार्यशील बनाता है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥४॥ Like heat invariably is experienced along with fire, I am sensed eternally as self knowledge. Mind, eyes and other sense organs function under whose supervision, who is motionless himself and one, I am that ever-present, eternal self-knowledge. ॥4॥
मुखाभासको
दर्पणे दृश्यमानो, 
मुखत्वात्पृथक्त्वेन
नैवास्ति वस्तु।
चिदाभासको धीषु
जीवोऽपि तद्वत्, 
स नित्योपलब्धि
स्वरुपोऽहमात्मा ॥५॥
जिस प्रकार मुख की छाया ही शीशे में दिखाई देती है, मुख के हटने पर कुछ भी दिखाई नहीं देता उसी प्रकार चेतना भी जीवरूपी छाया जैसे बुद्धि में प्रतिबिंबित होती है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥५॥ Like shadow of face is reflected in mirror and on removing face, nothing is visible, similarly consciousness gets reflected in the mirror of intelligence like a living being. I am that ever-present, eternal self-knowledge or consciousness. ॥5॥
यथा दर्पणाभाव
आभासहानो, 
मुखं विद्यते
कल्पनाहीनमेकं।
तथा धीवियोगे
निराभासको यः, 
स नित्योपलब्धि
स्वरुपोऽहमात्मा ॥६॥
जिस प्रकार शीशे के हटने पर छाया विलुप्त हो जाती है और अकल्पनीय मुख विद्यमान रहता है उसी प्रकार बुद्धि के हटने पर जीव रुपी प्रतिबिम्ब रहित चेतना विद्यमान रहती है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥६॥ As image is lost on removing the mirror and unimaginable face remains, similarly on removing the mirror of intelligence, that which is remaining, I am that image-less ever-present, eternal self-knowledge. ॥6॥
मनश्चक्षुरादे-
विर्युक्तः स्वयं यो, 
मनश्चक्षुरादे-
र्मनश्चक्षुरादिः।
मनश्चक्षुरादे-
रगम्यस्वरूपः, 
स नित्योपलब्धि-
स्वरुपोऽहमात्मा ॥७॥
मन, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों से रहित, मन, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों का भी मन और चक्षु, मन, चक्षु आदि ज्ञानेन्द्रियों के लिए अगम्य, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥७॥ Devoid of mind, eyes and other sense organs, which is mind of mind and eye of the eyes, and so on, not cognizable by the mind eyes and other sense organs, I am that ever-present, eternal self-knowledge. ॥7॥
य एको विभाति
स्वतः शुद्धचेताः, 
प्रकाश स्वरूपोऽ-
पि नानेव धीषु।
शरावोदकस्थो
यथा भानुरेकः, 
स नित्योपलब्धि
स्वरुपोऽहमात्मा ॥८॥
जिस प्रकार एक सूर्य अनेक सरोवरों में अनेक रूपों में दिखाई देता है उसी प्रकार जो एक, स्वयं प्रकाशित, शुद्ध, चेतना स्वरुप और नाना बुद्धियों में प्रकाश स्वरुप है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥८॥ Like a single sun is seen in many forms in different ponds, in the same way who is one, pure, living, illumined in various intellects, who is like light, I am that self-luminous, ever-present, eternal self-knowledge. ॥8॥
यथाऽनेकचक्षुः
प्रकाशो रविर्न-
क्रमेण प्रकाशी-
करोति प्रकाश्यम्।
अनेकाधियो
यस्तथैकप्रबोधः, 
स नित्योपलब्धि-
स्वरुपोऽहमात्मा ॥९॥
जिस प्रकार सूर्य का प्रकाश अनेक आँखों को एक साथ प्रकाशित करता है, उसी प्रकार जो अनेक बुद्धियों को एक साथ प्रकाशित करता है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥९॥ Like the light of sun simultaneously illumines all eyes, the one who alone illumines all the intellects simultaneously, I am that ever-present, eternal self-knowledge. ॥9॥
विवस्वत् प्रभातं
यथारूपमक्षं, 
प्रगृण्हाति नाभात-
मेवं विवस्वान्।
यदाभात आभासय-
त्यक्षमेकः, 
स नित्योपलब्धि-
स्वरुपोऽहमात्मा ॥१०॥
जिस प्रकार सूर्य के प्रकाश में आँख अनेक प्रकार के रूपों में सूर्य के प्रकाश को ही देखती है, उसी प्रकार जिसके प्रकाश में आँखें एक(ब्रह्म) को देखती हैं, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥१०॥ Like in the light of Sun, eyes actually see sun only in the form of different things, similarly in whose light eyes see the One, I am that ever-present, eternal self-knowledge. ॥10॥
यथा सूर्य एकोऽप्स्व-
नेकश्चलासु,
स्थिरास्वप्यनन्य-
द्विभाव्यस्वरूपः।
चलासु प्रभिन्नासु
धीष्वेवमेकः, 
स नित्योपलब्धि-
स्वरुपोऽहमात्मा ॥११॥
जिस प्रकार स्वयं स्थिर होते हुए भी एक सूर्य चंचल जल में अनेक भागों में बँटा दिखाई देता है, लेकिन स्थिर जल में सभी बँटे हुए भाग एक सूर्य में मिल जाते हैं , उसी प्रकार जोएक होते हुए भी अनेक बुद्धियों में अनेक दिखाई देता है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥११॥ Like the non-moving sun seems to break up in many in moving waters, but all those images merge in one in a calm water, similarly who looks many, moving and different in many intellects but is one, I am that ever-present, eternal self-knowledge. ॥11॥
घनच्छन्न दृष्टिर्घन-
च्छन्नमर्कं, 
यथा निष्प्रभं
मन्यते चातिमूढ़ः।
तथा बद्धवद-
भाति यो मूढ़दृष्टे:, 
स नित्योपलब्धि-
स्वरुपोऽहमात्मा ॥१२॥
जिस प्रकार बादलों से रुकी हुई द्रष्टि के कारण अत्यंत मोहित व्यक्ति सूर्य को छिपा हुआ मानता है, उसी प्रकार जो विवेकहीन द्रष्टि से बंधा हुआ सा दिखाई देता है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥१२॥ Like sun seems to be hidden by dense clouds to a deluded person, similarly without right knowledge who looks to be bound, I am that ever-present, eternal self-knowledge. ॥12॥
समस्तेषु वस्तुष्व-
नुस्यूतमेकं,
समस्तानि वस्तूनि
यं न स्पृशन्ति।
वियद्वत्सदा
शुद्धमच्छस्वरूपं, 
स नित्योप्लब्धि-
स्वरूपोऽहमात्मा ॥१३॥
जो समस्त वस्तुओं में आकाश के समान विद्यमान है, परन्तु जिसे समस्त वस्तुऎं स्पर्श नहीं कर सकती हैं, जो शुद्ध, सत्य स्वरुप है, मैं सनातन, निरंतर विद्यमान रहने वाला, वह ज्ञानस्वरुप आत्मा हूँ ॥१३॥ Which pervades everything like space but nothing can even touch it, which is pure and absolute truth, I am that ever-present, eternal self-knowledge. ॥13॥
उपाधौ यथा
भेदता सन्मणीनां,
तथा भेदता
बुद्धिभेदेषु तेऽपि।
यथा चन्द्रिकाणाम्
जले चंचलत्वं,
 तथा चंचलत्वं
तवापीह विष्णो ॥१४॥
जिस प्रकार मणियों में भेद उनके आकार-प्रकार के कारण होता है, वस्तुतः नहीं, उसी प्रकार आप में भेद बुद्धि की भिन्नता के कारण ही दिखाई देता है। जिस प्रकार जल की चंचलता के कारण अनेक चन्द्र प्रतिबिम्ब चलायमान दिखते हैं उसी प्रकार हे सर्वव्यापक प्रभु आपमें भी चंचलता प्रतीत होती है ॥१४॥ Like crystal are differentiated based on their size and shape, but are same substance-wise, similarly You also look different due to difference in intellects. As many images of moon appear in moving waters, O all-pervading God, you also appear to be moving. ॥14॥
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