जीवन भी एक रंगोली जैसा,
रंग–बिरंगा, अनकहा, अनदेखा।
कभी रंग गहरे, कभी हल्के,
कभी बिखरे, फिर भी सलोने छलके।
हर सुबह हम फिर से सज़ाते
नए सपनों के छोटे–छोटे घेर;
कुछ रेखाएँ बिगड़ भी जातीं,
पर सीख देतीं चलना मत फेर।
दर्द के रंग भी ज़रूरी होते,
बिना उनके चित्र अधूरा होता;
खुशियों की लकीरें संग मिलकर
जीवन की थाली पूर्णता से रोता।
जैसे रंगोली हर घर सजाती,
वैसे ही उम्मीद हर दिल जगाती;
दोनों में छुपा है एक ही संदेश
बिखर कर भी सुंदर होना सीखो,
हर क्षण को अपने रंग से रीझो।