सैफी पारंपरिक रूप से बढ़ई और लौहार के काम से जुड़ा समुदाय है. उनका नाम अरबी शब्द सैफ से आया है, जिसका अर्थ तलवार होता है. यह एक भूमिहीन समुदाय हैं. अब से करीब 50 साल पहले गांवों में अन्य बिरादरी के लोग इन्हें "मिस्त्री" या "मियांजी" या फिर "खान साहब" कहकर पुकारते थे. उस ज़माने में सैफी बिरादरी के लोग पूरे साल जी तोड़ मेहनत करके किसानो की खेती के लिए लकड़ी के नये-नये "कृषि-यंत्र", और "हल" आदि बनाते थे और साथ ही उनकी "मरम्मत" करते थे, और इतना सब कुछ करने के बाद बदले में लोगों को अन्न और "अनाज" मिलता था जिससे वे अपना "भरण-पोषण" करते थे.
बिरादरी का नाम रखने की कोशिशों एवं बैठकों का आयोजन करने में सैफ़ी बिरादरी के कुछ "मुख्य" एवं "महत्वपूर्ण लोगों" का विशेष योगदान रहा, जिन्होंने दिन-रात मेहनत करते हुए करीब तीन साल तक बिरादरी के लोगों में ऐसी बैठकें कीं जिसमें स्वतंत्रता सेनानी और अल-जमियत (उर्दू समाचारपत्र) के संपादक हज़रत मौलाना उस्मान फारक़लीत साहब (पिलखुवा), मुल्ला सईद पहलवान (अमरोहा), डॉ. मेहरूद्दीन खान (मशहूर लेखक पत्रकार नवभारत टाइम्स), बाबू हनीफ बछरायूंनी, अली हसन सैफ़ी चकनवाला (पत्रकार व लेखक गजरौला), मौजी ख़ान एसीपी दिल्ली पुलिस (रमाला बागपत), हाजी अलीशेर सैफी, युसुफ सैफी, रशीद सैफ़ी सैदपुरी (शायर व लेखक), मुहम्मद गुलाम जीलानी, मुहम्मद किफायतुल्लाह सैफी, अब्दुल हफीज़ सैफी, कामरेड हकीमुल्लाह सैफ़ी, नज़ीरुल अकरम सैफ़ी, मुहम्मद अतीक़ सैफ़ी (मुरादाबाद), नज़ीर अहमद सैफ़ी (बुलंदशहर), मुहम्मद अली सैफ़ी (बुलंदशहर), सुलेमान साबिर सैफ़ी (पिलखुवा), एम. वकील सैफ़ी (लेखक दिल्ली) सहित हज़ारों सैफ़ी समाज के बुज़ुर्गों ने बहुत सारी मीटिंग्स की एवं बहुत सारे नाम बिरादरी के लियें प्रस्तावित किये, जिनमे "नूही", "दाऊदी","सैफ़ी" आदि नामों पर विचार किया गया. जिसमे सबकी राय मिलाकर एक नाम तय किया गया और वो नाम था "सैफ़ी". यूँ तो बिरादरी का नाम चुनने को लेकर बहुत सारी मीटिंग्स हुईं, लेकिन मार्च 1975 में गुलावठी में एक शानदार "सम्मेलन" हुआ और इस सम्मलेन में नाम रखने को लेकर आगे की "रूपरेखा" तैयार की गई. इसी कड़ी में "अथक मेहनत" और कोशिशें करने के बाद "6 अप्रैल 1975" को "अमरोहा" में एक "महासम्मेलन" रखा गया, जिसमे बिरादरी के हज़ारों लोगों ने हिस्सा लिया, और इसी "ऐतिहासिक महासम्मेलन" में स्वतंत्रता सेनानी और अल-जमियत (उर्दू समाचार पत्र) के संपादक एवं नेक बुज़ुर्ग हज़रत मौलाना मुहम्मद उस्मान फारक़लीत सैफ़ी साहब जो कि पिलखुवा ग़ाज़ियाबाद के रहने वाले थे, आपके ज़ेरे-साये में बढ़ई बिरादरी का नाम "सैफ़ी" रखा गया.
उत्तर प्रदेश में, सैफी मुख्य रूप से मेरठ, गाजियाबाद, सहारनपुर, मुरादाबाद, बुलंदशहर, गौतमबुद्धनगर, बिजनौर, मुज़फ्फरनगर, अमरोहा और अलीगढ़ जिलों में पाए जाते हैं. लखनऊ, बरेली और गोरखपुर में मौजूद अन्य महत्वपूर्ण आबादी के साथ वे रोहिलखंड क्षेत्र में भी मौजूद हैं. साथ ही साथ मोतिहारी, पूर्वी चंपारण, बटाया, गोपालगंज, मुज़फ़्फ़रपुर, पटना, सीवान, सिवाह, सीतामढ़ी आदि सहित बिहार के विभिन्न जिलों में भी मौजूद हैं. सैफी की महत्वपूर्ण आबादी दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान, मध्य प्रदेश और गुजरात में भी रहती है. उत्तर प्रदेश में सैफी समुदाय की कुल आबादी का लगभग 5% हिस्सा है.
लेकिन अभी भी समुदाय मुख्य धारा से काफी पीछे है, खासकर ग्रामीण इलाकों में रहने वाले लोग. हालांकि सैफी समाज को अन्य पिछड़ा वर्ग में शामिल किया गया है, लेकिन समुदाय को इससे कोई फायदा नहीं हुआ क्योंकि वे तथ्यों के बारे में पूरी तरह से जागरूक नहीं हैं. अधिकांश लोग अशिक्षित हैं और अपने पारंपरिक व्यवसाय में शामिल हैं. सैफी समुदाय की बेहतरी के लिए किसी भी सरकार ने गंभीर प्रयास नहीं किया. यहां तक कि सैफी समुदाय को राजनीति में किसी भी तरह की भागीदारी नहीं मिली है. सभी सरकार इस समुदाय को अपने वोट बैंक के रूप में उपयोग करती है.
इसलिए सैफी संघर्ष समिति की स्थापना सैफी समुदाय की बेहतरी के उद्देश्य से और समुदाय को सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक मामलों के बारे में जागरूक करने के उद्देश्य से की गई थी. कोर टीम में सैफी समुदाय की बेहतरी पर प्राथमिक ध्यान देने के साथ एक दूसरे के साथ संयुक्त रूप से विभिन्न क्षेत्रों के समुदाय के कई अनुभवी, कर्मठ और नौजवान उत्साही सदस्य शामिल हैं. टीम के सभी सदस्य इस समिति के दृष्टिकोण के बारे में बहुत स्पष्ट हैं.