श्री गोप्रेक्षेश्वर महादेव मोक्षलिंग शिव-शक्ति धाम
श्री गोप्रेक्षेश्वर महादेव मोक्षलिंग शिव-शक्ति धाम
जहाँ दर्शन से मिले क्लेश मुक्ति, गौ-हत्या पाप नाश और अनंत गौ-दान फल, सतयुग कालीन महातीर्थ।
वाराणसी, उत्तर प्रदेश के पावन गोप्रेक्ष तीर्थ घाट पर स्थित, श्री गोप्रेक्षेश्वर मोक्षलिंग एक अद्वितीय एवं प्राचीन शिव-शक्ति धाम है। यह सत्युगीन शिवलिंग, जहाँ शिव और शक्ति एकाकार रूप में विराजते हैं, दर्शन मात्र से ही भक्तों को क्लेशों से मुक्ति, गौ-हत्या जैसे महापापों का नाश और अनंत गौ-दान का पुण्य फल प्रदान करता है। इसकी महिमा इतनी महान है कि स्वयं भगवान कृष्ण ने भी गौ-हत्या के पाप से मुक्ति पाने हेतु यहाँ दर्शन किए थे।
श्री श्री 1008 श्री गोपीगोविंद जी
॥ माधव उवाच ॥ गोपी गोविंदतीर्थे तु गोपीगोविंदसंज्ञकम् ॥ समर्च्यमां नरो भक्त्या मम मायां न संस्पृशेत् ॥१९ ॥ स्कन्दपुरापुराणम् /खण्डः _४_(काशीखण्डः )/अध्यायः _०६१ ॥
माधव ने कहा : गोपीगोविन्द तीर्थ में भक्तिपूर्वकर्व गोपीगोविन्द नाम से मेरी पूजा करने से मनुष्य मेरी माया के स्पर्श से दूर रहता है ।
वाराणसी के प्रसिद्ध गोपीगोविंद घाट (H. No. K. 4/24) पर, गोप्रेक्षेश्वर महादेव मंदिर के भीतर स्थित, गोपीगोविंद तीर्थ अपने दर्शन मात्र से वृंदावन तीर्थ का फल प्रदान करता है। यह पवित्र स्थल, जहाँ स्वयं भगवान कृष्ण ने गौ-हत्या पाप से मुक्ति हेतु गोप्रेक्षेश्वर महादेव के दर्शन किए और अपनी गोपियों संग दिव्य रास लीला रचाई थी, 'काशी का वृन्दावन' कहलाता है।
गोप्रेक्षेश्वर काशी (वाराणसी) में स्थित एक अत्यंत प्राचीन और महत्वपूर्ण शिवलिंग है, जिसका उल्लेख पद्म पुराण, स्कंद पुराण, लिंग पुराण और नारद पुराण जैसे विभिन्न हिंदू धर्मग्रंथों में मिलता है। यह स्थान न केवल अपनी पौराणिक उत्पत्ति के लिए जाना जाता है, बल्कि इससे जुड़े आध्यात्मिक लाभों के लिए भी विशेष महत्व रखता है।
गोप्रेक्षेश्वर कथा
गोप्रेक्षेश्वर कथा
भक्ताः गुरुम् गोप्रेक्षेश्वरमहादेवस्य कथां विस्तरेण वक्तुम् अकथयन्।
"श्रीदुर्गाप्रसादमिश्र उवाच - यथा मार्कण्डेयेन राज्ञः युधिष्ठिरस्य पुरतः गोप्रेक्षेश्वरमहादेवस्य माहात्म्यं वर्णितं, तथैव तव पुरतः अहमपि वर्णयामि।“
श्रीमार्कण्डेय उवाच -
काशी: गंगातटे कूले तीर्थं परमशोभनम् ।
सर्वपापहरं पार्थ गोप्रेक्षेश्वरमुत्तमम् ।
गोदेहान्निःसृतं लिङ्गं पुण्यं भूमितले नृप ॥ ७३.१ ॥
युधिष्ठिर उवाच -
गोदेहान्निःसृतं कस्माल्लिङ्गं पापक्षयंकरम् ।
काशी: गंगातटे कूले गोपीगोविंदसमीपतः ।
संक्षेपात्कथ्यतां विप्र गोप्रेक्षेश्वरसम्भवम् ॥ ७३.२ ॥
श्रीमार्कण्डेय उवाच -
कामधेनुस्तपस्तत्र पुरा पार्थ चकार ह ।
ध्यायते परया भक्त्या देवदेवं महेश्वरम् ॥ ७३.३ ॥
तुष्टस्तस्या जगन्नाथ कपिलाय महेश्वरः ।
निःसृतो देहमध्यात्तु अच्छेद्यः परमेश्वरः ॥ ७३.४ ॥
तुष्टो देवि जगन्मातः कपिले परमेश्वरि ।
आराधनं कृतं यस्मात्तद्वदाशु शुभानने ॥ ७३.५ ॥
सुरभ्युवाच -
लोकानामुपकाराय सृष्टाहं परमेष्ठिना ।
लोककार्याणि सर्वाणि सिध्यन्ति मत्प्रसादतः ॥ ७३.६ ॥
लोकाः स्वर्गं प्रयास्यन्ति मत्प्रसादेन शङ्कर ।
तीर्थे त्वं भव मे शम्भो लोकानां हितकाम्यया ॥ ७३.७ ॥
तथेति भगवानुक्त्वा तीर्थे तत्रावसन्मुदा ।
तदाप्रभृति तत्तीर्थं विख्यातं वसुधातले ।
स्नानेनैकेन राजेन्द्र पापसङ्घं व्यपोहति ॥ ७३.८ ॥
गोप्रेक्षेश्वरगोदानं यस्तु भक्त्या च कारयेत् ।
योग्ये द्विजोत्तमे देया योग्या धेनुः सकाञ्चना ॥ ७३.९ ॥
सवत्सा तरुणी शुभ्रा बहुक्षीरा सवस्त्रका ।
कृष्णपक्षे चतुर्दश्यामष्टम्यां वा प्रदापयेत् ॥ ७३.१० ॥
सर्वेषु चैव मासेषु कार्त्तिके च विशेषतः ।
दापयेत्परया भक्त्या द्विजे स्वाध्यायतत्परे ॥ ७३.११ ॥
विधिना च प्रदद्याद्यो विधिना यस्तु गृह्णते ।
तावुभौ पुण्यकर्माणौ प्रेक्षकः पुण्यभाजनम् ॥ ७३.१२ ॥
पिण्डदानं प्रकुर्याद्यः प्रेतानां भक्तिसंयुतः ।
पिण्डेनैकेन राजेन्द्र प्रेता यान्ति परां गतिम् ॥ ७३.१३ ॥
भक्त्या प्रणामं रुद्रस्य ये कुर्वन्ति दिने दिने ।
तेषां पापं प्रलीयेत भिन्नपात्रे जलं यथा ॥ ७३.१४ ॥
तत्र तीर्थे तु यो राजन्वृषभं च समुत्सृजेत् ।
पितरश्चोद्धृतास्तेन शिवलोके महीयते ॥ ७३.१५ ॥
युधिष्ठिर उवाच -
वृषोत्सर्गे कृते तात फलं यज्जायते नृणाम् ।
तत्सर्वं कथयस्वाशु प्रयत्नेन द्विजोत्तम ॥ ७३.१६ ॥
श्रीमार्कण्डेय उवाच -
सर्वलक्षणसम्पूर्णे वृषे चैव तु यत्फलम् ।
तदहं सम्प्रवक्ष्यामि शृणुष्व धर्मनन्दन ॥ ७३.१७ ॥
कार्त्तिके चैव वैशाखे पूर्णिमायां नराधिप ।
रुद्रस्य सन्निधौ भूत्वा शुचिः स्नातो जितेन्द्रियः ॥ ७३.१८ ॥
वृषस्यैव समुत्सर्गं कारयेत्प्रीयतां हरः ।
सांनिध्ये कारयेत्पुत्र चतस्रो वत्सिकाः शुभाः ॥ ७३.१९ ॥
दत्त्वा तु विप्रमुख्याय सर्वलक्षणसंयुताः ।
प्रीयतां च महादेवो ब्रह्मा विष्णुर्महेश्वरः ॥ ७३.२० ॥
वृषभे रोमसंख्या या सर्वाङ्गेषु नराधिप ।
तावद्वर्षप्रमाणं तु शिवलोके महीयते ॥ ७३.२१ ॥
शिवलोके वसित्वा तु यदा मर्त्येषु जायते ।
कुले महति सम्भूतिर्धनधान्यसमाकुले ॥ ७३.२२ ॥
नीरोगो रूपवांश्चैव विद्याढ्यः सत्यवाक्शुचिः ।
गोप्रेक्षेश्वरमाहात्म्यं मया ख्यातं युधिष्ठिर ।
गोदेहान्निःसृतं लिङ्गं काशी: गंगा तटे ॥ ७३.२३ ॥
पावनगोप्रेक्षेश्वरकथा प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति॥
॥ इति श्रीमद्दुर्गाप्रसादमिश्रविरचितं
पावनगोप्रेक्षेश्वरकथा समाप्तं ॥
श्री गोप्रक्षेश्वर महात्म्य: काशी के आनंद कानन की कथा
प्रभु शिव ने देवी से कहा, "हे सुंदरी, आओ, हम इस नश्वर लोक के सबसे सुंदर वन में हैं, जो मेरे हृदय के अत्यंत निकट है।"
पार्वती जी सहज ही सहमत हो गईं। पलक झपकते ही, वे दोनों काशी के उस अलौकिक पुरातत्व में उपस्थित थे।
यह स्थान वास्तव में एक स्वर्गिक उद्यान था। यहां का पर्यावरण दिव्य था कि मानो हवा में दिव्यता घूम गई हो। यह वन चंपक (चंपा), अशोक, और पुन्नाग (नागकेसर) के मनमोहक पुष्पों से भरा हुआ था। यहां बिल्व, अर्जुन, स्टेपब, न्यग्रोध (बरगद), और उडुम्बर (गूलर) के विशाल वृक्ष थे। सुंदर केसर के फूलों की क्यारियों से दिव्य सुगंध आ रही थी, जहां मधुमक्खियां लगातार गूंज रही थीं। चारों ओर एक शांत, मनोरम और पवित्र जंगल का दृश्य था।
इस प्राकृतिक को देखकर माँ पार्वती मोहित हो गई। उन्होंने विस्मय के साथ पवित्र दर्शनों के दर्शन कर शिवजी से पूछा, "हे महादेव! यह स्थान इतना अद्भुत और ऊर्जावान क्यों है? यहां की प्रत्येक वस्तु में एक विशेष स्पंदन है। मुझे इस भूमि का रहस्य बताएं।"भगवान शिव, करुणा के सागर, मंद मंद मुस्कुराए और बोले, "हे देवी, सुनो। मैं इस स्थान का वास्तविक महात्म्य बताता हूं, जिसका संबंध मेरे 'गोप्रक्षेश्वर' स्वरूप से है।
मैं बहुत काल से इसी देश (काशी क्षेत्र) में निवास करता हूं। शिवजी ने कथा आरंभ की:
"एक समय, मैं इसी आनंद कानन में गहरे ध्यान में लीन था। क्षण, गोलोक में कपिला गायें अपने वात्सल्य में व्याख्यान अपने कंधों को दूध पिलाती रही। जिज्ञासा में, एक गाय के थान से दूध की कुछ बूंदें और झाग के रूप में सीधे मेरे ऊपर गिरीं, जिससे मेरा ध्यान टूट गया।
ध्यान भंग होते ही, मैंने ऊपर की ओर, जहाँ से दूध गिरा था, देखा। मेरे नेत्रों से निकले तेज के कारण वह कपिला गाय जलने लगी। यह देखकर सभी देवतागण भयभीत हो गए। वे तुरंत यहाँ प्रकट हुए, मेरी स्तुति की, और उस निरीह गाय पर दया करने की विनती की।
देवताओं की प्रार्थना से मेरा क्रोध शांत हो गया। मेरी करुणा जागृत हुई। मेरी कृपा-दृष्टि पड़ते ही, सभी कपिला और सुरभि गायें पुनः जीवित और स्वस्थ हो गईं। कृतज्ञता से भरकर, उन सभी गायों ने भक्तिभाव से मेरी आराधना और स्तुति की।
उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर, मैंने उन्हें वरदान दिया: 'जो भी जीव तुम्हारी स्तुति करेगा, वह तत्काल सभी पापों से मुक्त हो जाएगा।'
और हे पार्वती, मैंने उसी स्थान पर उन सभी गायों को—और तुम्हें भी साक्षी मानकर—एक ही लिंग के भीतर, साकार और निराकार दोनों रूपों में दर्शन दिए।
मैंने उसी क्षण यह घोषणा की कि मैं इस पवित्र स्थान पर 'गोप्रक्षेश्वर' के नाम से जाना जाऊँगा। जो भी मनुष्य इस तीर्थ में आकर पवित्र स्नान करेगा और गोप्रक्षेश्वर के दर्शन करेगा, उस पर मेरी असीम और अत्यंत कृपा होगी। वह इस भवसागर से पार हो जाएगा।"
पद्मपुरापुराणम् /खण्डः _३_(स्वर्गखण्डः )/अध्यायः _३७
हिरण्यगर्भं गोप्रेक्षंतीर्थं चैवमनुत्तमम् ॥
काशी में हिरण्यगर्भ एवं गोप्रेक्ष नामक उत्तम तीर्थ है ।
स्कन्दपुरापुराणम् / खण्डः _४_(काशीखण्डः )/अध्यायः _०९७
सापूजिता प्रयत्नेन सुखवस्तिप्रदा सदा ॥
महादेवस्य पूर्वेण गोप्रेक्षंलिंगमुत्तमम् ॥ ९ ॥
तद्दर्शनाद्भवेत्सम्यग्गोदानजनितं फलम् ॥
गोलोकात्प्रेषिता गावः पूर्वंयच्छंभुना स्वयम् ॥ १० ॥
वाराणसीं समायाता गोप्रेक्षं तत्ततः स्नृतस्नृम् ॥
महादेव जी का पूर्व दिशा में एक बहुत ही अध्भुत लिंग है जिसे गोप्रेक्ष नाम से जाना जाता है, यह अर्धनारीश्वर का ऐसा स्वरूप जिसमें शिव स्वयं लिंग रूप में और मां गौरी स्वयं मूर्ति रूप में एक ही विग्रह में साथ-साथ विराजते हैं भगवान शंकर ने गायो को स्वयं गोलोक से काशी जाने का आदेश दिया, जब वे भोलेनाथ की आज्ञा से काशी पहुंचे तो भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर मां गौरी सहित दर्शन दिए, गायो को दर्शन देने के कारण गोप्रेक्ष नाम हुआ, और यहां दर्शन करने से अनंत गौ दान का फल प्राप्त होता है और दम्पत्य क्लेश नाश होता है।
लिङ्गपुरापुराणम्-पूर्वभागः /अध्यायः _९२
जन्मांतरसहस्रेषु यं न योगी समाप्नुयात् ॥ तमिहैव परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते ॥६६ ॥
गोप्रेक्षप्कमिदं क्षेत्रं ब्रह्मणा स्थापितं पुरा ॥ कैलासवनं चात्र पश्य दिव्यं वरानने ॥६७ ॥
गोप्रेक्षकमयागम्य दृष्ट्वामामत्र मानवः ॥ न दुर्गति मवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते ॥६८ ॥
हे प्रिये! मेरी कृपा से मनुष्य को यहाँ सहज ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, जो एक योगी को हजार जन्मों में प्राप्त नहीं होती है । इस पवित्र स्थान ( गोप्रेक्ष ) पर एक तीर्थ (कुंड/जलभरी) की स्थापना ब्रह्मा द्वारा पूर्वकार्व काल में की गई थी ।
हे देवी ! यहाँ दिव्य धाम कैलास को देखो । जो मनुष्य गोप्रेक्ष जा कर मेरा दर्शन करता है, वह दुर्गति एवं कल्मष से मुक्त हो जाता है ।
नारदपुराणम्-_उत्तरार्धः /अध्यायः _५०
तस्मिन्स्थाने तु सुभगे स्वयमाविरभूच्छिवः ॥ गोप्रेक्षक: इति ख्यातः संस्तुतः सर्वदैवतैः ॥४३ ॥
गोप्रेक्षेश्वरमागत्य दृष्ट्वा भ्यर्च्य च मानवः ॥ न दुर्गति मवाप्नोति कल्मषैश्चषै वि मुच्यते ॥४४ ॥
सुभगे! इस शुभ स्थान पर भगवान् शिव माँ गौरी संग स्वयं प्रकट हुए थे, जो 'गोप्रेक्ष' के नाम से विख्यात इुए । सम्पूर्ण देवता उनकी स्तुति करते हैं । गोप्रेक्षेश्वर के पास आकर उनका दर्शन-पूजन करके मनुष्य कभी दुर्गति में नहीं पड़ता और सब पापों से मुक्त हो जाता है ।
स्कन्दपुरापुराणम्/म्खण्डः _४_(का शीखण्डः )/अध्या यः _०७३
॥ स्कंद उवाच ॥ अन्यान्यपि च विंध्यारे देव्यै प्रोक्ता निशंभुना ॥ स्वभक्ता नां हिताथार्य तान्यथाकर्णयाग्रज ॥५९ ॥
शैलेशः संगमेशमेश्च स्वर्लीनो मध्यमेश्वमेरः ॥ हिरण्यगर्भ ईशानो गोप्रेक्षो वृषभध्वजः ॥६० ॥
उपशांत शिवो ज्येष्ठो निवासेश्वर एव च ॥ शुक्रेशो व्याघ्रलिंगं च जंबुकेशं चतुर्दशम् ॥६१ ॥
मुने चतुर्दशैतानि महांत्याहांत्यायतनानि वै ॥ एतेषामपि सेवातो नरो मोक्षमवाप्नुयात् ॥६२ ॥
चैत्रकृष्णप्रतिपदं समारभ्य प्रयत्नतः ॥ आ चतुर्दशि पूज्यानि लिंगान्येतानि सत्तमैः ॥६३ ॥
स्कन्ददेव कहते हैं- हे द्विज! विन्ध्यपर्वत के शत्रु! भगवान् शंभु ने अपने भक्तगण के हितार्थ अन्य जिन लिङ्गों का वर्णनर्ण भगवती से किया था , मैं उसे भी कहता हूं । श्रवण करिये : शैलेश्वर, संगमेश्वर, स्वर्लिनेश्वर, मध्यमेश्वर, हिरण्यगर्भेश्वर, ईशानेश्वर, गोप्रेक्षेश्वर, वृषभध्वजेश्वर, उपशान्तेश्वर, ज्येष्ठेश्वर, निवासेश्वर, शुक्रेश्वर, व्याघ्रेश्वर, जम्बुकेश्वर नामक चतुर्दश लिङ्ग हैं । ये सभी चैत्रकृष्ण प्रति पदा से प्रारंभ करके यत्नतः पूज्य हैं ।
स्कन्दपुरापुराणम्/म्खण्डः _४_(का शीखण्डः )/अध्या यः _१००
ततः कूपमुपस्पृश्य गोप्रेक्ष मवलो कयेत् ॥
तत्पश्चात गोप्रेक्ष कूप में जल संस्कार करना चाहिए और गोप्रेक्षेश्वर का दर्शन करना चाहिए ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि गौरीयात्रा मनुत्तमाम् ॥
शुक्लपक्षे तृतीयां या यात्रा विष्वगृद्धिदा ॥
गोप्रेक्षतीर्थे सुस्ना य मुखनिर्मालिकां व्रजेत् ॥
इसके बाद मैं शुक्ल पक्ष की तृतीया को की जाने वाली उत्तम गौरी यात्रा का वर्णन करूंगा । यह समस्त ऐश्वर्य प्रदान करता है । गोप्रेक्षतीर्थ (गाय घाट से वर्तमान लाल घाट तक) में स्नान करके भक्त को मुखनिर्मालिका गौरी का दर्शन-पूजन करना चाहिए ।
स्कंद पुराण अवंती खंड, अध्याय 28, श्लोक 1 से 17
व्यास उवाच
एवं कालेन संप्राप्य वाराणस्यां निकेतनम् ।
जगतः पितरौ देवौ चक्रतुः किमतः परम् । ।१ । ।
सनत्कुमार उवाच
ततः स भगवान् देवो देवीं हिमवतः सुताम् ।
उवाच देवि पश्याम उद्यानं यदि रोचते । ।२ ।।
देव्युवाच
एवं भवतु देवेश यथात्थ त्वं वृषध्वज ।
न हि मेन्यत्र गन्तव्यमुद्यानात् परतो हर । ।३ ।।
सनत्कुमार उवाच
सह देव्या ततो व्यास वाराणस्यां वृषध्वजः ।
दिव्यो द्यानदिदृक्षार्थं विचचार समन्ततः ।४। ।
पूर्वस्मिन् स दिशो भागे देव्या देवः पिनाकधृक्। ।
उद्यानं दर्शयामास नानाकुसुमशोभितम् ।।५।।
चंपकाशोकपुन्नागप्रियंगूचूतसंकुलम् ।
बिल्वार्जुनकदम्बैश्च न्यग्रोधोदुम्बरैरपि । ।६। ।
गन्धवद्भिश्च कुसुमैर्जातीकेसरकेतकैः ।
रम्यैः सुरभिपुष्पैश्च षट्पदव्रातसेवितैः । ।७।।
संयुक्तं सर्वतः श्रीमद्वनं वैभ्राजसन्निभम् ।
स तदुद्यानमासाद्य देवीमाह जगत्पतिः ।।८।।
अस्मिन् देशे पुरा देवि तिष्ठतो मम शोभने ।
ऊर्ध्वं गोलोकसंस्थानाद् गवां वत्सैः स्वयंभुवैः । ।९ । ।
पीयमान पयोवेगात् फेनं मूर्ध्नि समापतत ।
ततो मयो र्ध्वतो दृष्टा गावस्ताः सोमपार्श्वतः । । 8.29.१० ।।
ततस्ताः प्रेक्षितास्तत्र मया गावस्तदाभवन् ।
तेजसा दह्यमानास्तु नैकवर्ण्णा भृशार्दिताः । । ११ ।।
गावः पूर्वमिमा देवि आसन् कपिलवर्णजाः ।
नैकवर्णास्तदाभूवन् यदा संप्रेक्षिता मया । । १ २।।
तासां शरण्यतां यात्वा ताभिर्मामेव शैलेजे ।
आश्रितः सोम आगत्य स्रवन्तीभिः समन्ततः । ।१ ३ ।।
अर्दिताभिस्तदा गोभिर्ब्रह्मा मामब्रवीत्ततः ।
प्रसादं कुरु देवेश सौरभ्य स्तेजसा तव ।। १४। ।
न नश्यन्ति यथा सद्यस्तथा सर्वसुरार्चित ।
ततोहमास्थितो देवि स्थानेस्मिन् स्वयमेव तु । । १ ५। ।
गोप्रेक्ष इति विख्यातः संस्तुतः सर्वदेवतैः ।
गोप्रेक्षेश्वरमागत्य दृष्ट्वाभ्यर्च्य च मानवः । । १६ । ।
न दुर्गति मवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते ।
ततस्ता दह्यमानास्तु प्रसन्ने कपिला मयि । ।१७। ।
॥ श्री गोप्रेक्षेश्वर प्राकट्य कथा ॥
प्रसंग: यह कथा सत्ययुग की है, जिसका स्मरण स्वयं भगवान शिव ने माता पार्वती को काशी भ्रमण के दौरान कराया था।
१. गौ-लोक से पृथ्वी का उद्धार
सत्ययुग का काल था। मनुष्यों के कल्याण के लिए धर्म, यज्ञ और दिव्य बल की आवश्यकता थी। यज्ञों की पूर्णता और मानव जाति की रक्षा के लिए गौ-माता का पृथ्वी पर होना अनिवार्य था। तब महादेव की आज्ञा पाकर गौ-माता गौ-लोक से पृथ्वी पर उतरने के लिए तैयार हुईं।
२. काशी की पावन धरा पर प्रथम चरण
जब गौ-माता का झुंड पृथ्वी पर उतरा, तो उनके पहले चरण देवाधिदेव महादेव की नगरी काशी में पड़े। गौ-माताओं की भक्ति और विनम्रता देख महादेव अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने प्रकट होकर कहा— "हे सुरभि! मैं तुम्हारी भक्ति से प्रसन्न हूँ, वर मांगो।"
तब गौ-माताओं ने करबद्ध होकर प्रार्थना की— "हे प्रभु! यदि आप प्रसन्न हैं, तो हमें अपने उस 'सत्य स्वरूप' के दर्शन दीजिए जिसमें सृष्टि का सार समाया हो।"
३. दिव्य अर्धनारीश्वर मोक्षलिंग का प्राकट्य
गायों की इस निःस्वार्थ इच्छा को पूरा करने के लिए महादेव ने एक अभूतपूर्व रूप धारण किया। वे एक ऐसे शिवलिंग के रूप में प्रकट हुए, जिसमें आधा भाग आदिशक्ति माता पार्वती का (साकार ब्रह्म) और आधा भाग स्वयं महादेव का (निराकार ब्रह्म) था।
यह अर्धनारीश्वर स्वरूप ही 'मॊक्षलिंग' कहलाया। महादेव ने वचन दिया:
"गायों की रक्षा के लिए मैं सदैव यहाँ निवास करूँगा और उन पर अपनी दृष्टि (प्रेक्षण) बनाए रखूँगा। इसीलिए इस लोक में मैं 'गोप्रेक्षेश्वर' (Gopreksheshwar) के नाम से विख्यात होऊँगा।"
४. महादेव और पार्वती का काशी आगमन
कथा के दूसरे पड़ाव में, जब माता पार्वती को कैलाश की अत्यधिक ठंड के कारण किसी सुरक्षित और प्रिय स्थान पर रहने की इच्छा हुई, तो महादेव उन्हें लेकर अपनी प्राणप्रिया नगरी काशी आए। काशी भ्रमण के दौरान जब वे 'गोप्रेक्ष तीर्थ' पहुँचे, तब महादेव ने माता पार्वती को पूर्वकाल की यह घटना याद दिलाई कि कैसे वे दोनों यहाँ 'एकाकार' होकर गौ-रक्षा के लिए स्थापित हुए थे।
५. महिमा और फलश्रुति
बाद में इस परम पावन कथा को भगवान स्कंद (कार्तिकेय) ने महर्षि अगस्त्य को सुनाया, और कालांतर में ऋषियों ने इसे स्कंद पुराण, लिंग पुराण और पद्म पुराण में संकलित किया।
गोप्रेक्ष तीर्थ में स्नान और महादेव के दर्शन से समस्त पापों का नाश होता है।
अनंत गौ-दान का फल प्राप्त होता है।
अनजाने में हुए गौ-हत्या के पाप से मुक्ति और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
॥ श्री गोप्रेक्षेश्वराय नमः ॥