भारतीय आध्यात्मिक परंपरा में, भगवान शिव की उपासना उनके विभिन्न स्वरूपों और प्रतीकों के माध्यम से की जाती है। इनमें शिव लिंगम का स्थान सर्वोपरि है, जिसे ब्रह्मांडीय ऊर्जा, सृजन और परम चेतना का प्रतीक माना जाता है। हिंदू धर्म में, शिव लिंगम की दो प्रमुख श्रेणियाँ विशेष महत्व रखती हैं: ज्योतिर्लिंग और मुक्ति लिंगम (मोक्ष लिंगम)। ये दोनों ही भक्तों को आध्यात्मिक उन्नति और परम मुक्ति की ओर अग्रसर करने में सहायक हैं, यद्यपि उनके प्रकटीकरण और महत्व के विशिष्ट पहलू भिन्न हैं।
ज्योतिर्लिंग: प्रकाश के स्तंभ
ज्योतिर्लिंग, शाब्दिक अर्थ में "प्रकाश के स्तंभ" या "ज्योति के रूप में लिंग", भगवान शिव के वे 12 स्वयंभू प्रकटीकरण हैं जहाँ वे स्वयं प्रकाश के रूप में प्रकट हुए थे। इन स्थानों को अत्यंत पवित्र माना जाता है और इनके दर्शन मात्र से ही भक्तों के समस्त पापों का नाश होता है और उन्हें आध्यात्मिक शांति प्राप्त होती है। ये 12 ज्योतिर्लिंग पूरे भारत में फैले हुए हैं, और प्रत्येक का अपना एक अनूठा पौराणिक महत्व और इतिहास है। इन ज्योतिर्लिंगों की यात्रा को 'द्वादश ज्योतिर्लिंग यात्रा' के रूप में जाना जाता है, जो भक्तों के लिए एक गहन आध्यात्मिक अनुभव है।
भारत के 12 ज्योतिर्लिंगों की सूची:
1. सोमनाथ ज्योतिर्लिंग (Somnath Jyotirlinga) - Gujarat
2. मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग (Mallikarjuna Jyotirlinga) - Srisailam, Andhra Pradesh
3. महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग (Mahakaleshwar Jyotirlinga) - Ujjain, Madhya Pradesh
4. ओंकारेश्वर ज्योतिर्लिंग (Omkareshwar Jyotirlinga) - Khandwa, Madhya Pradesh
5. केदारनाथ ज्योतिर्लिंग (Kedarnath Jyotirlinga) - Rudraprayag, Uttarakhand
6. भीमाशंकर ज्योतिर्लिंग (Bhimashankar Jyotirlinga) - Pune, Maharashtra
7. काशी विश्वनाथ ज्योतिर्लिंग (Kashi Vishwanath Jyotirlinga) - Varanasi, Uttar Pradesh
8. त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग (Tryambakeshwar Jyotirlinga) - Nashik, Maharashtra
9. वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग (Vaidyanath Jyotirlinga) - Deoghar, Jharkhand
10. नागेश्वर ज्योतिर्लिंग (Nageshwar Jyotirlinga) - Dwarka, Gujarat
11. रामेश्वरम ज्योतिर्लिंग (Rameswaram Jyotirlinga) - Rameswaram, Tamil Nadu
12. घृष्णेश्वर ज्योतिर्लिंग (Grishneshwar Jyotirlinga) - Aurangabad, Maharashtra
इन ज्योतिर्लिंगों का दर्शन और पूजन भक्तों को न केवल भौतिक लाभ प्रदान करता है, बल्कि उन्हें आध्यात्मिक रूप से भी सशक्त बनाता है, जिससे वे जीवन के लक्ष्यों को प्राप्त करने और मोक्ष की ओर बढ़ने में सक्षम होते हैं।
मुक्ति लिंगम (मोक्ष लिंगम): आध्यात्मिक स्वतंत्रता का मार्ग
ज्योतिर्लिंगों के समान ही, एक और महत्वपूर्ण श्रेणी मुक्ति लिंगम या मोक्ष लिंगम की है। ये 42 लिंगम विशेष रूप से आध्यात्मिक मुक्ति और जन्म-मृत्यु के चक्र से स्वतंत्रता (मोक्ष) प्रदान करने वाले माने जाते हैं। "मुक्ति" या "मोक्ष" शब्द का अर्थ है सांसारिक बंधनों, दुखों और पुनर्जन्म के चक्र से परे परम आध्यात्मिक स्वतंत्रता। इन 42 लिंगमों की पूजा और दर्शन को इस परम लक्ष्य को प्राप्त करने का एक अत्यंत शक्तिशाली साधन माना जाता है। यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि ये सभी 42 मुक्ति लिंगम काशी (वाराणसी) में स्थित हैं, यही कारण है कि काशी को 'मोक्ष नगरी' के नाम से भी जाना जाता है, जहाँ मृत्यु को भी मुक्ति का द्वार माना जाता है। शास्त्रों में काशी तीर्थ अथवा काशी यात्रा का वास्तविक अर्थ इन्हीं मोक्ष लिंगों के दर्शन और पूजन से है।
प्रत्येक मुक्ति लिंगम, जैसे ओंकारेश्वर महादेव, त्रिलोचन महादेव, आदि महादेव, गोप्रेक्षेश्वर महादेव, और अन्य, अपने आप में एक अनूठी ऊर्जा और आशीर्वाद धारण करता है। यह ऊर्जा भक्तों को उनके आध्यात्मिक मार्ग पर सहायता करती है, उन्हें आंतरिक शुद्धता और आत्मज्ञान की ओर ले जाती है। इन पवित्र स्थानों पर सच्चे मन से की गई प्रार्थनाएं और अनुष्ठान व्यक्ति के कर्मों को शुद्ध करते हैं और उन्हें परमात्मा से जुड़ने में मदद करते हैं। भगवान शिव, जो स्वयं मुक्ति के दाता और परम चेतना के प्रतीक हैं, इन लिंगमों के माध्यम से अपने भक्तों पर कृपा करते हैं। इन लिंगमों की संख्या 42 होना भी अपने आप में एक विशेष आध्यात्मिक गणना या परंपरा का प्रतिनिधित्व करता है, हालांकि इसका विस्तृत विवरण अक्सर गूढ़ होता है। यह संख्या एक पूर्णता या एक विशिष्ट आध्यात्मिक यात्रा के चरणों का प्रतीक हो सकती है।
विभिन्न पुराणों में मुक्ति लिंगम का उल्लेख:
इन मुक्ति लिंगमों और मोक्ष प्राप्ति के उनके महत्व की चर्चा विभिन्न प्राचीन हिंदू धर्मग्रंथों और पुराणों में भी की गई है। उदाहरण के लिए:
स्कंद पुराण में काशी के विभिन्न शिव लिंगों और उनके दर्शन से प्राप्त होने वाले पुण्य तथा पापों से मुक्ति का विस्तृत वर्णन मिलता है। इसमें गोप्रेक्षेश्वर महादेव लिंग जैसे कई लिंगों का उल्लेख है, जिनकी पूजा से आध्यात्मिक लाभ और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
लिंग पुराण में शिव लिंग को शिव और शक्ति के संयुक्त स्वरूप के रूप में वर्णित किया गया है और भगवान शिव को "भुक्ति-मुक्तिदायक" (सांसारिक सुख और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाला) कहा गया है। यह ज्ञान और भक्ति के माध्यम से मुक्ति के मार्ग पर प्रकाश डालता है।
नारद पुराण स्वयं को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों पुरुषार्थों को प्रदान करने वाला बताता है, और यह पढ़ने या सुनने वालों को भक्ति और मुक्ति प्रदान करने का आश्वासन देता है। यह पवित्र स्थानों और भक्ति के माध्यम से मुक्ति के महत्व पर जोर देता है।
पद्म पुराण में भी विभिन्न तीर्थों और पवित्र स्थलों के महत्व का वर्णन है, जहाँ स्नान और पूजा से पापों से मुक्ति और आध्यात्मिक सुख प्राप्त होता है, जो मोक्ष की अवधारणा से जुड़ा है।
यह दर्शाता है कि मुक्ति लिंगम की अवधारणा और उनका महत्व भारतीय आध्यात्मिक साहित्य में गहराई से निहित है, जो सदियों से भक्तों को मुक्ति के मार्ग पर प्रेरित कर रहा है।
सांस्कृतिक और भक्तिमय दृष्टिकोण से, इन मुक्ति लिंगमों की उपस्थिति भक्तों के लिए तीर्थयात्रा और गहन भक्ति का एक महत्वपूर्ण स्रोत है। इन पवित्र स्थलों की यात्रा करना, वहां पूजा-अर्चना करना और ध्यान करना, भक्तों को न केवल आध्यात्मिक शांति प्रदान करता है बल्कि उन्हें अपने जीवन के अंतिम लक्ष्य – मोक्ष – की ओर बढ़ने में भी मदद करता है। यह दृढ़ विश्वास है कि इन लिंगमों के दर्शन मात्र से भी व्यक्ति को पापों से मुक्ति मिलती है और वह परमात्मा के करीब आता है। यह परंपरा भारतीय धर्म और संस्कृति की उस गहरी समझ को दर्शाती है जहाँ आध्यात्मिक स्वतंत्रता को जीवन का सर्वोच्च उद्देश्य माना जाता है।
ओंकारेश्वर महादेव (Omkareshwar Mahadev)
त्रिलोचन महादेव (Trilochan Mahadev)
आदि महादेव (Adi Mahadev)
गोप्रेक्षेश्वर महादेव (Goprekshareshwar Mahadev)
कृतिवासेश्वर महादेव (Kritivaseshwar Mahadev)
रत्नेश्वर महादेव (Ratneshwar Mahadev)
चंद्रेश्वर महादेव (Chandraeshwar Mahadev)
केदारेश्वर महादेव (Kedareshwar Mahadev)
धर्मेश्वर महादेव (Dharmeshwar Mahadev)
वीरेश्वर महादेव (Veereshwar Mahadev)
कामेश्वर महादेव (Kameshwara Mahadev)
विश्वकर्मेश्वर महादेव (Vishwakarmaeshwar Mahadev)
मणिकर्णिकेश्वर महादेव (Manikarnikeshwar Mahadev)
अविमुक्तेश्वर महादेव (Avimukteshwar Mahadev)
विश्वेश्वर महालिंग महादेव (Vishweswar Mahaling Mahadev)
अमृतेश्वर महादेव (Amruteshwar Mahadev)
तारकेश्वर महादेव (Tarkeshwar Mahadev)
ज्ञानेश्वर महादेव (Gyaneshwar Mahadev)
करुणेश्वर महादेव (Karuneshwar Mahadev)
मोक्षद्वारेश्वर महादेव (Mokshadwareshwar Mahadev)
स्वर्गद्वारेश्वर महादेव (Swargadwareshwar Mahadev)
ब्रह्मेश्वर महादेव (Brahmeshwar Mahadev)
लांगलीश्वर महादेव (Langlishwar Mahadev)
वृद्धकालेश्वर महादेव (Vruddhakaleshwar Mahadev)
वृषेश्वर महादेव (Vrisheshwar Mahadev)
चंडीश्वर महादेव (Chandishwar Mahadev)
नन्दिकेश्वर महादेव (Nandikeshwar Mahadev)
महेश्वर महादेव (Maheshwar Mahadev)
ज्योतीरूपेश्वर महादेव (Jyotiroopeshwar Mahadev)
शैलेश्वर महादेव (Shaileshwar Mahadev)
संगमेश्वर महादेव (Sangameshwar Mahadev)
स्वर्लीनेश्वर महादेव (Swarlineeshwar Mahadev)
मध्यमेश्वर महादेव (Madhyameshwar Mahadev)
हिरण्यगर्भेश्वर महादेव (Hiranyagarbheshwar Mahadev)
ईशानेश्वर महादेव (Ishaneshwar Mahadev)
वृषभध्वजेश्वर महादेव (Vrishabhdhwajeswar Mahadev)
उपशान्त शिव महादेव (Upashant Shiva Mahadev)
ज्येष्ठेश्वर महादेव (Jyeshthaeshwar Mahadev)
निवासेश्वर महादेव (Nivaseshwar Mahadev)
शुक्रेश्वर महादेव (Shukreshwar Mahadev)
व्याघ्रेश्वर महादेव (Vyaghreshwar Mahadev)
जंबुकेश्वर महादेव (Jambukeshwar Mahadev)
ज्योतिर्लिंग और मुक्ति लिंगम दोनों ही भगवान शिव की दिव्य उपस्थिति और उनकी कृपा के प्रतीक हैं। जहाँ ज्योतिर्लिंग भगवान के प्रकाशमय स्वरूप को दर्शाते हैं, वहीं मुक्ति लिंगम विशेष रूप से आध्यात्मिक स्वतंत्रता और मोक्ष की प्राप्ति का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ये पवित्र स्थल भारतीय आध्यात्मिकता के गहरे ज्ञान और भक्ति परंपराओं का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो भक्तों को जीवन के परम सत्य और आनंद की ओर मार्गदर्शन करते हैं। इन लिंगमों की पूजा और दर्शन करना, भक्तों के लिए न केवल एक धार्मिक अनुष्ठान है, बल्कि आत्म-खोज और परमात्मा के साथ एकात्म होने की एक गहरी आध्यात्मिक यात्रा भी है।
प्रस्तावना: काशी की शाश्वत भूमि में एक दिव्य आह्वान
काशी, जिसे वाराणसी के नाम से भी जाना जाता है, केवल एक प्राचीन नगरी नहीं है, यह स्वयं एक जीवंत तीर्थ है जहाँ हर कण में आध्यात्मिकता का वास है। इसी पावन भूमि में एक ऐसा रहस्यमय और अत्यंत महत्वपूर्ण शिवलिंग प्रतिष्ठित है, जिसे गोप्रेक्षेश्वर कहते हैं। इसका उल्लेख केवल किंवदंतियों में ही नहीं, बल्कि पद्म पुराण, स्कंद पुराण, लिंग पुराण और नारद पुराण जैसे विभिन्न प्रतिष्ठित हिंदू धर्मग्रंथों में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। गोप्रेक्षेश्वर अपनी पौराणिक उत्पत्ति, अद्वितीय स्वरूप और भक्तों को प्रदान किए जाने वाले असाधारण आध्यात्मिक लाभों के लिए विशेष महत्व रखता है। यह स्थान न केवल अपनी प्राचीनता के लिए जाना जाता है, बल्कि मोक्ष और परम शांति की तलाश में आने वाले साधकों के लिए एक beacon (मार्गदर्शक) के रूप में भी खड़ा है।
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## अध्याय 1: दिव्य उत्पत्ति और गो-कृपा का इतिहास
गोप्रेक्षेश्वर की कथा *सतयुग* के प्रारंभिक काल से जुड़ी है, जब स्वयं *भगवान शिव* ने गोलोक (गायों का दिव्य निवास) से पवित्र गायों को काशी आने का आदेश दिया था। शिव की आज्ञा का पालन करते हुए, जब ये गायें पवित्र काशी नगरी में पहुँचीं, तो उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव, अपनी शक्ति *माता पार्वती (गौरी)* के साथ प्रत्यक्ष प्रकट हुए और उन्हें साक्षात दर्शन दिए। गायों को इस दिव्य दर्शन के कारण ही, यह शिवलिंग *गोप्रेक्षेश्वर* के नाम से विख्यात हुआ।
यह पवित्र स्थल आज के *महादेव मंदिर के पूर्व दिशा* में स्थित है। इसके निकट ही एक प्राचीन *गोप्रेक्ष कूप (कुआँ)* है, जिसमें स्नान करने का विशेष महत्व बताया गया है, क्योंकि इसका जल उसी दिव्य घटना से जुड़ा माना जाता है। *स्कंद पुराण* के अनुसार, गोप्रेक्ष तीर्थ का क्षेत्र वर्तमान *गाय घाट* से लेकर *लाल घाट* तक विस्तृत है, जो इसकी प्राचीनता और व्यापकता को दर्शाता है। *लिंग पुराण* में यह भी उल्लेख है कि स्वयं *ब्रह्मा* ने इस स्थान पर एक पवित्र कुंड की स्थापना की थी, जो इसकी ब्रह्मांडीय उत्पत्ति को रेखांकित करता है।
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## अध्याय 2: अद्वितीय अर्धनारीश्वर स्वरूप – निराकार और साकार का संगम
जो बात गोप्रेक्षेश्वर को काशी के अन्य असंख्य शिवलिंगों से अत्यंत विशिष्ट बनाती है, वह है इसका *अद्वितीय अर्धनारीश्वर स्वरूप। यह केवल एक कल्पना नहीं, बल्कि एक साकार विग्रह है जहाँ **भगवान शिव स्वयं लिंग रूप में विराजते हैं, जो निराकार ब्रह्म का प्रतीक है, और उन्हीं से जुड़ी हुई माँ पार्वती मूर्ति स्वरूप में विराजमान हैं, जो साकार ब्रह्म का प्रतीक हैं।* यह एक दुर्लभ और अत्यंत गहरा दार्शनिक प्रतिनिधित्व है, जो इस मूलभूत सत्य पर जोर देता है कि *शिव स्वयं ही शक्ति हैं और शक्ति ही स्वयं शिव हैं*। यह स्वरूप इस अविभाज्य सत्य को भी प्रकट करता है कि निराकार ब्रह्म (अव्यक्त, निराकार ईश्वर) और साकार ब्रह्म (व्यक्त, सगुण ईश्वर) मूलतः एक ही हैं, वे परस्पर संबंधित और अविभाज्य हैं। गोप्रेक्षेश्वर इस महान अद्वैत दर्शन का एक जीवंत प्रतीक है, जहाँ भक्त एक ही विग्रह में परम पुरुष और आदि शक्ति दोनों के दर्शन प्राप्त कर सकते हैं।
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## अध्याय 3: आध्यात्मिक महत्व और अकल्पनीय लाभ
गोप्रेक्षेश्वर के दर्शन और पूजन से भक्तों को अनगिनत और असाधारण आध्यात्मिक लाभ प्राप्त होते हैं, जिनका वर्णन स्वयं पुराणों में मिलता है:
* *मोक्ष की प्राप्ति और 'मुक्ति लिंगम': गोप्रेक्षेश्वर का सबसे महत्वपूर्ण लाभ मोक्ष की प्राप्ति है। **लिंग पुराण और नारद पुराण* में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि "जो मोक्ष एक योगी को हजारों जन्मों में कठिन तपस्या से प्राप्त होता है, वह मेरी (भगवान शिव की) कृपा से गोप्रेक्षेश्वर में सहज ही प्राप्त हो जाता है।" यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि गोप्रेक्षेश्वर को काशी के *42 मोक्षलिंगों में से एक* माना जाता है। जिस प्रकार पूरे भारत में 12 ज्योतिर्लिंग फैले हुए हैं, उसी प्रकार काशी में 42 ऐसे मोक्षलिंग (मुक्ति लिंगम) हैं, जिनके मात्र दर्शन से मोक्ष प्राप्त होता है, और गोप्रेक्षेश्वर इनमें से एक प्रमुख है।
* *समस्त पापों से मुक्ति और दुर्गति का नाश*: जो भक्त श्रद्धापूर्वक गोप्रेक्षेश्वर के दर्शन और पूजा करते हैं, वे अपने सभी संचित पापों से मुक्त हो जाते हैं। उन्हें जीवन में कभी भी दुर्गति या किसी भी प्रकार के दुर्भाग्य का सामना नहीं करना पड़ता, जिससे उनके जीवन में सुख और समृद्धि आती है।
* *अनंत गौदान का फल: **स्कंद पुराण* विशेष रूप से बताता है कि गोप्रेक्षेश्वर के मात्र दर्शन से *अनंत गौदान का पुण्य* प्राप्त होता है। गौदान को हिंदू धर्म में सर्वोच्च दान माना जाता है, और इसका फल गोप्रेक्षेश्वर के दर्शन मात्र से मिलना इस स्थान की असीम शक्ति और पवित्रता को दर्शाता है।
* *दाम्पत्य क्लेश का नाश*: यह पवित्र स्थल दाम्पत्य जीवन में आने वाले क्लेशों और विवादों को समाप्त करने में भी सहायक माना जाता है। गोप्रेक्षेश्वर में दर्शन और पूजा करने से पारिवारिक जीवन में सौहार्द, सुख-शांति और सामंजस्य स्थापित होता है।
* *देवताओं द्वारा स्तुति: **नारद पुराण* के अनुसार, यह वह स्थान है जहाँ भगवान शिव माता गौरी के साथ स्वयं प्रकट हुए थे और समस्त देवतागणों ने उनकी स्तुति की थी। यह इस स्थान की परम पवित्रता और दिव्य महत्व को और भी अधिक उजागर करता है।
* *भगवान कृष्ण का प्रायश्चित: **द्वापर युग* में, स्वयं *भगवान कृष्ण* को गोहत्या के पाप का सामना करना पड़ा था जब उन्होंने एक राक्षस का वध किया था जिसने गाय का रूप धारण किया था। इस गंभीर पाप के प्रायश्चित के लिए, भगवान कृष्ण ने गोप्रेक्ष तीर्थ में आकर स्नान किया, गोप्रेक्ष कूप का जल स्पर्श किया और गोप्रेक्षेश्वर महादेव का दर्शन किया। यह भी कहा जाता है कि उन्होंने इस पवित्र स्थान पर *रास लीला* का प्रदर्शन किया था। यह कथा गोप्रेक्षेश्वर के पाप निवारण की अद्वितीय शक्ति और वैष्णव परंपरा से उसके गहरे संबंध को स्थापित करती है, जिसे *'काशी का वृन्दावन'* भी कहा जाता है। मंदिर परिसर में एक प्राचीन *गोपीगोविंद विग्रह* (काशी के 18 सबसे पुराने विष्णु रूपों में से एक) की उपस्थिति इस संबंध को और मजबूत करती है।
फाल्गुन शुक्ल तृतीया के दिन स्नान के वाद गोप्रेक्ष का दर्शन
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## अध्याय 4: चौदह महत्वपूर्ण लिंगों में स्थान और दैनिक सेवा
गोप्रेक्षेश्वर का महत्व केवल उसके व्यक्तिगत गुणों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसे काशी के व्यापक आध्यात्मिक मानचित्र में एक केंद्रीय स्थान प्राप्त है। *स्कंद पुराण* में काशी के *चौदह अत्यंत महत्वपूर्ण लिंगों* की सूची दी गई है, जिनमें शैलेश्वर, संगमेश्वर, स्वर्लिनेश्वर, मध्यमेश्वर, हिरण्यगर्भेश्वर, ईशानेश्वर, *गोप्रेक्षेश्वर*, वृषभध्वजेश्वर, उपशान्तेश्वर, ज्येष्ठेश्वर, निवासेश्वर, शुक्रेश्वर, व्याघ्रेश्वर और जम्बुकेश्वर शामिल हैं। इन सभी लिंगों की पूजा चैत्र कृष्ण प्रतिपदा से प्रारंभ होकर चतुर्दशी तक विशेष रूप से करने का विधान है, जिससे मोक्ष की प्राप्ति होती है। गोप्रक्षेश्वर का इस सूची में शामिल होना इसकी सर्वोपरि पवित्रता और महत्व को दर्शाता है।
इस प्राचीन मंदिर में *सेवा* का भाव सर्वोच्च है। *आठवें पीठाधीश, पंडित कृष्ण कुमार मिश्र महंत जी*, इस पवित्र दायित्व को पूरी निष्ठा से निभाते हैं। उनका पूरा जीवन विग्रह की निरंतर सेवा को समर्पित है, जो एक शुद्ध भक्ति का अनुपम उदाहरण है। उनकी यह गहन साधना उन्हें मंदिर के बाहर शायद ही कभी उपलब्ध होने देती है, क्योंकि उनका एकमात्र ध्यान भगवान की सेवा पर केंद्रित होता है।
मंदिर की दैनिक पूजा-अर्चना का क्रम भी अत्यंत व्यवस्थित और पारंपरिक है:
* *सुबह 4:30 बजे:* मंदिर के द्वार खुलते ही *मंगला पूजा* के साथ दिन का आरंभ होता है, जिसे स्वयं महंत जी द्वारा संपन्न किया जाता है।
* *सुबह 4:30 से दोपहर 12:00 बजे तक:* मंदिर *भक्तों के दर्शन* के लिए खुला रहता है।
* *दोपहर 12:30 बजे:* महंत जी द्वारा भगवान को *राजभोग* अर्पित किया जाता है, जिसके बाद उन्हें विश्राम (निद्रा) के लिए छोड़ दिया जाता है।
* *शाम को:* महंत परिवार के सदस्य *अपारस* (बिना किसी बाहरी स्पर्श के) विधि से लिंगम का *श्रृंगार* करते हैं। इस समय भक्त लिंगम को स्पर्श नहीं कर सकते, लेकिन वे इस दिव्य और सुंदर श्रृंगार के दर्शन कर सकते हैं।
* *रात 8:00 बजे:* दिन का समापन भव्य *महा आरती* के साथ होता है, जिसके बाद मंदिर अगले दिन के लिए बंद कर दिया जाता है।
इसके अतिरिक्त, प्रत्येक *सोमवार, प्रदोष और मास शिवरात्रि* के साथ-साथ सभी प्रमुख *पर्व और त्यौहारों* को गोप्रेक्षेश्वर में *विशेष दर्शन और विस्तृत श्रृंगार* के साथ उत्साहपूर्वक मनाया जाता है, जिससे भक्तों का तांता लगा रहता है।
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## निष्कर्ष: एक कालातीत विरासत और परम लक्ष्य की ओर
गोप्रेक्षेश्वर केवल एक प्राचीन शिवलिंग नहीं है, बल्कि यह भगवान शिव और माता गौरी की असीम कृपा, गायों के प्रति उनके प्रेम और भक्तों को मोक्ष व समस्त पापों से मुक्ति दिलाने वाले एक पावन धाम का प्रतीक है। विशेष रूप से एक *मोक्षलिंग* के रूप में इसका महत्व, जहाँ *42 मोक्षलिंगों* में से एक होने के नाते मात्र दर्शन से ही परम गति प्राप्त होती है, और इसका *अद्वितीय अर्धनारीश्वर स्वरूप* इसे काशी के उन अद्वितीय स्थलों में से एक बनाता है, जहाँ मात्र दर्शन से जीवन के परम लक्ष्य, मोक्ष की प्राप्ति संभव है। यह आंतरिक शांति और जागरूकता के दर्शन को भी गहराई से दर्शाता है, जो भक्तों को इच्छाओं पर नियंत्रण और आत्म-ज्ञान की ओर प्रेरित करता है।
गोप्रेक्षेश्वर वह स्थान है जहाँ इतिहास, पौराणिक कथाएं और जीवंत भक्ति एक साथ आते हैं। यह उन सभी श्रद्धालुओं के लिए एक अनिवार्य तीर्थस्थल है जो काशी आते हैं और आध्यात्मिक मुक्ति की गहराई का अनुभव करना चाहते हैं। यह पवित्र भूमि, जहाँ स्वयं भगवान ने गो-कृपा के लिए अवतरण किया, आज भी अपने भक्तों को अनंत आशीर्वाद प्रदान कर रही है, उन्हें जीवन के सर्वोच्च आध्यात्मिक लक्ष्य की ओर अग्रसर कर रही है।
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काशी: काशी नगरी वर्तमान वाराणसी शहर में स्थित एक पौराणिक नगरी है। इसे संसार के सबसे पुराने नगरों में से एक माना जाता है। भारत की यह जगत्प्रसिद्ध प्राचीन नगरी गंगा के बाएँ (उत्तर) तट पर उत्तर प्रदेश के दक्षिण-पूर्वी कोने में वरुणा और असी नदियों के गंगा संगमों के बीच बसी हुई है। इस स्थान पर गंगा ने लगभग चार मील का दक्षिण से उत्तर की ओर घुमाव लिया है और इसी घुमाव के ऊपर इस नगरी की स्थिति है। इस नगर का प्राचीन 'वाराणसी' नाम लोक उच्चारण से 'बनारस' हो गया था, जिसे उत्तर प्रदेश सरकार ने शासकीय रूप से पूर्ववत् 'वाराणसी' कर दिया है। इसके राजा राज ऋषि राम कोल नागवंशीय थे।
विश्व के सर्वाधिक प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में काशी का उल्लेख मिलता है - 'काशिरित्ते.. आप इवकाशिनासंगृभीताः। पुराणों के अनुसार यह आद्य वैष्णव स्थान है। पहले यह भगवान विष्णु (माधव) की पुरी थी। जहाँ श्रीहरि के आनंदाश्रु गिरे थे, वहाँ बिंदुसरोवर बन गया और प्रभु यहाँ बिंधुमाधव के नाम से प्रतिष्ठित हुए। काशी में माधव गोपियों के साथ पूजे जाते हैं, इस तीर्थ का नाम गोपी गोविंद है।
इसी स्थान पर गायों को भगवान शंकर ने लिंग स्वरूप में और माँ गौरी ने मूर्ति स्वरूप में एक ही विग्रह में साथ-साथ साक्षात दर्शन दिए, गौओं को इस प्रकार शंकर और माँ गौरी के प्रत्यक्ष दर्शन से गोप्रेक्षेश्वर नाम हुआ।
काशी के प्रमुख मंदिर:
विश्वनाथ मंदिर
अन्नपूर्णा मंदिर
काल भैरव मंदिर
तुलसी मानस मंदिर
संकटमोचन मंदिर
दुर्गा मंदिर, दुर्गाकुंड
भारत माता मंदिर
रविदास मंदिर
गोप्रेक्षेश्वर (गौरी शंकर) मंदिर
गोपी गोविंद
काशी के घाट:
असी संगम घाट
दशाश्वमेध घाट
मणिकर्णिका घाट
पंचगंगा घाट
वरुणासंगम घाट
तुलसी घाट
शिवाला घाट
दंडी घाट
हनुमान घाट
हरिश्चंद्र घाट
राज घाट
केदार घाट
सोमेश्वर घाट
लालघाट (गोप्रेक्षेश्वर तीर्थ)
हनुमान गढ़ी घाट (गोप्रेक्षेश्वर तीर्थ)
गोप्रेक्षेश्वर तीर्थ घाट (गऊ घाट / गाय घाट)
मानसरोवर घाट
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वाराणसी, जिसे काशी के नाम से भी जाना जाता है, अपनी आध्यात्मिक गहराई और असंख्य मंदिरों के लिए प्रसिद्ध है। इसी पवित्र नगरी में एक ऐसा अनमोल तीर्थ है जो स्वयं भगवान कृष्ण की रास लीलाओं से जुड़ा है और जहाँ उन्होंने शिव के दर्शन किए थे – इसे "काशी का वृन्दावन" कहा जाता है – यह है *श्री गोपीगोविन्द तीर्थ।*
*गोपीगोविन्द: माया से मुक्ति का मार्ग*
यह तीर्थ एक प्राचीन मान्यता पर आधारित है, जैसा कि एक पुराने पाठ में वर्णित है: *"गोपीगोविन्द तीर्थकर गोपीगोविन्दनमसे मेरी अर्चना करतेवाला मनुष्य मेरी मायामें नहीं पडता।"* इसका सीधा अर्थ है कि जो भक्त गोपीगोविन्द, जो स्वयं को तीर्थंकर के रूप में भी प्रकट करते हैं, के नाम का स्मरण या उनकी पूजा करते हैं, वे ईश्वर की माया (भ्रम) के जाल में नहीं फँसते। यह वचन गोपीगोविन्द की उपासना के आध्यात्मिक महत्व को दर्शाता है – एक ऐसी साधना जो भक्त को सांसारिक भ्रमों से ऊपर उठाती है।
*एक प्राचीन शालिग्राम विग्रह और काशी के 18 विष्णु स्वरूप*
श्री गोपीगोविन्द का विग्रह कोई साधारण मूर्ति नहीं है। यह *आदिकाल की एक शालिग्राम शिला* से निर्मित है। शालिग्राम शिला को स्वयं भगवान विष्णु का प्रत्यक्ष रूप माना जाता है, जो इसकी पवित्रता और प्राचीनता को और भी बढ़ाता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि गोपीगोविन्द विग्रह को *काशी के 18 प्रमुख विष्णु स्वरूपों में से एक* माना जाता है, जिनका उल्लेख पुराणों में भी मिलता है। यह तथ्य इस तीर्थ के असाधारण धार्मिक और ऐतिहासिक महत्व को प्रमाणित करता है।
*काशी के अठारह विष्णु स्वरूपों का ऐतिहासिक महत्व*
काशी, जिसे मुख्य रूप से भगवान शिव की नगरी माना जाता है, वैष्णव परंपराओं का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र रही है। *काशी के अठारह विष्णु स्वरूप* इस बात का प्रमाण हैं कि प्राचीन काल से ही यहाँ शिव और विष्णु की उपासना सह-अस्तित्व में रही है। इन 18 विष्णु विग्रहों का उल्लेख विभिन्न काशी खंडों और अन्य पुराणों में मिलता है, जो इनकी प्राचीनता और धार्मिक अनुष्ठानों में इनके महत्व को दर्शाता है। ये विग्रह केवल व्यक्तिगत मंदिर नहीं हैं, बल्कि ये मिलकर *काशी विष्णु यात्रा* नामक एक महत्वपूर्ण तीर्थ परिपथ का निर्माण करते हैं। यह यात्रा भक्तों को काशी के विभिन्न कोनों में स्थित भगवान विष्णु के विविध रूपों के दर्शन का अवसर प्रदान करती है, जिससे उन्हें आध्यात्मिक पूर्णता प्राप्त होती है। प्रत्येक विष्णु स्वरूप का अपना विशिष्ट पौराणिक आख्यान और उससे जुड़ा महत्व है, और ये सभी मिलकर काशी की बहुआयामी धार्मिक विरासत को दर्शाते हैं।
काशी विष्णु यात्रा में शामिल 18 विष्णु स्वरूप निम्नलिखित हैं:
1. *श्री बिंदु माधव*
2. *श्री आदि केशव*
3. *श्री नारद केशव*
4. *श्री प्रह्लाद केशव*
5. *श्री यज्ञवराह विष्णु*
6. *श्री विदार नरसिंह*
7. *श्री गोपी गोविंद*
8. *श्री हयग्रीव केशव*
9. *श्री श्वेत माधव*
10. *श्री प्रयाग माधव*
11. *श्री गंगा केशव*
12. *श्री वैकुंठ माधव*
13. *श्री प्रचंड नरसिंह*
14. *श्री अत्युग्र नरसिंह*
15. *श्री कोलाहल नरसिंह*
16. *श्री वितंक नरसिंह*
17. *श्री कोकावराह*
18. *श्री धरणीवराह*
*गोपीगोविन्द घाट पर स्थित 'काशी का वृन्दावन'*
यह पवित्र मंदिर वाराणसी के प्रसिद्ध *गोपीगोविन्द घाट* पर, H. No. K. 4/24, बिड़ला संस्कृत विद्यालय के पास, बिड़ला हाउस के समीप स्थित है। यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि गोपीगोविन्द तीर्थ ही *गोपीगोविन्द घाट* के नाम से जाना जाता है, जो इस तीर्थ की महत्ता को सीधे तौर पर दर्शाता है। इस पवित्र स्थान की देखभाल और सेवा सदियों से की जा रही है, और वर्तमान में *8वें महंत, श्री कृष्ण कुमार मिश्रा महाराज जी, पूरी निष्ठा और भक्ति से सेवा कार्य कर रहे हैं।* यह विशेष रूप से उल्लेखनीय है कि *गोपीगोविन्द के महंत ही गोप्रेक्षेश्वर महादेव के भी महंत हैं,* जो इन दोनों पवित्र स्थलों के गहरे संबंध और एक ही आध्यात्मिक परंपरा के तहत उनके प्रबंधन को दर्शाता है। महंतों का यह योगदान इस तीर्थ की आध्यात्मिक ऊर्जा को बनाए रखने में महत्वपूर्ण है।
*भगवान कृष्ण का शिव दर्शन और रास लीला: एक पौराणिक कथा*
इस स्थान की सबसे अनोखी और पवित्र विशेषता इसकी भगवान कृष्ण से सीधी पौराणिक जुड़ाव है। मान्यता है कि भगवान विष्णु के अवतार, *श्री कृष्ण, गौ हत्या के पाप से मुक्ति और प्रायश्चित के लिए इसी गोपीगोविन्द घाट के मार्ग से आए थे।* वे यहाँ गोप्रेक्ष तीर्थ में स्थित *गोप्रेक्षेश्वर महादेव* के दर्शन के लिए पहुँचे थे। यह शिव और वैष्णव परंपराओं का एक अद्भुत संगम है, जो वाराणसी की आध्यात्मिक विविधता को दर्शाता है।
कहा जाता है कि इसी पवित्र भूमि पर श्री कृष्ण ने अपनी समस्त गोपी-गोपिकाओं के साथ रास लीला की थी। यह दिव्य रास लीला ही इस स्थान को 'काशी का वृन्दावन' की उपाधि देती है।
*विशेष पर्व और लुप्त होती परंपरा*
परंपरागत रूप से, *माघ महीने की पूर्णिमा* को श्री गोपीगोविन्द के दर्शन और तीर्थ के जल में स्नान का विशेष महत्व बताया गया है। पुराने समय में इस दिन यहाँ बड़े मेले भी लगते थे, जहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु आते थे। हालाँकि, आज की व्यस्त दिनचर्या और बदलती जीवनशैली के कारण दुर्भाग्यवश यह प्रथा धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है।
*वृन्दावन जाने का पुण्य*
इस तीर्थ से जुड़ी एक और गहरी आस्था यह है कि *गोपीगोविन्द तीर्थ के जल का स्पर्श करने मात्र से भक्त को वृन्दावन जाने का पुण्य प्राप्त होता है।* यह मान्यता इस बात का प्रतीक है कि काशी में स्थित यह छोटा सा तीर्थ धाम, वृन्दावन की पावन ऊर्जा को अपने भीतर समेटे हुए है, और यहाँ आने वाले भक्तों को उसी दिव्य अनुभव का लाभ देता है।
संक्षेप में, श्री गोपीगोविन्द तीर्थ वाराणसी का एक ऐसा छिपा हुआ रत्न है जो न केवल आध्यात्मिक मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करता है, बल्कि भगवान कृष्ण की लीलाओं और काशी के प्राचीन इतिहास से भी गहरा जुड़ा हुआ है। यह वास्तव में काशी का एक ऐसा कोना है जहाँ वृन्दावन का दिव्य अनुभव साकार होता है, जहाँ स्वयं कृष्ण ने आकर शिव का दर्शन किया था।
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काशी (वाराणसी) में विराजित गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन का अपना एक अनूठा और गहरा आध्यात्मिक महत्व है, जो वर्ष भर कई विशेष तिथियों पर और भी बढ़ जाता है। इन पवित्र अवसरों पर महादेव के दर्शन और पूजन से भक्तों को अतुलनीय पुण्य और आशीर्वाद प्राप्त होता है।
यह तिथि गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण मानी जाती है। स्कंदपुराण के काशी खण्ड जैसे प्राचीन धर्मग्रंथों में स्पष्ट रूप से वर्णित है कि इस दिन गोप्रेक्ष तीर्थ में (वर्तमान के लालघाट से गाय घाट के बीच) स्नान करने के बाद गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन करने से शरीर और मन शुद्ध होते हैं। यह विशेष स्नान और दर्शन गोहत्या के पाप का नाश करता है, अनंत गौदान का फल प्रदान करता है, कलेश/कलुष (पाप) का नाश करता है, और यहाँ तक कि पुनर्जन्म से मुक्ति भी दिलाता है। यह आध्यात्मिक उन्नति और मानसिक शांति के लिए एक अत्यंत शुभ दिन है, जिसकी प्रामाणिकता सदियों पुराने धार्मिक ग्रंथों में निहित है।
सावन (श्रावण) मास भगवान शिव को समर्पित है और इस दौरान गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।
सावन सोमवार: सावन के प्रत्येक सोमवार को भगवान शिव का विशेष पूजन होता है। इन दिनों गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन और जलाभिषेक से व्यक्ति की समस्त मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं, कष्ट दूर होते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। भक्तगण गंगाजल से अभिषेक कर भोलेनाथ का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।
सावन अमावस्या (हरियाली श्रृंगार): सावन मास की अमावस्या को हरियाली अमावस्या भी कहते हैं। इस दिन गोप्रेक्ष महादेव का विशेष हरियाली श्रृंगार किया जाता है, जो अत्यंत मनोहारी होता है। इस दिन महादेव के दर्शन से जीवन में हरियाली और समृद्धि आती है, और प्रकृति के साथ एकात्मता का अनुभव होता है।
मासिक शिवरात्रि: हर माह कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को आने वाली मासिक शिवरात्रि भी भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यंत शुभ है। इस दिन गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन और विधि-विधान से पूजा करने पर धन संबंधी समस्याएं समाप्त होती हैं और जीवन में सुख-शांति आती है।
प्रदोष व्रत: त्रयोदशी तिथि को पड़ने वाला प्रदोष व्रत भगवान शिव को समर्पित होता है। प्रदोष काल (सूर्यास्त के बाद का समय) में गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन से व्यक्ति के पापों का नाश होता है और उत्तम लोक की प्राप्ति होती है। सावन मास में पड़ने वाले प्रदोष व्रत का महत्व तो और भी अधिक होता है।
हरतालिका तीज का पर्व, जो भाद्रपद माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाता है, भगवान शिव और माता पार्वती के अटूट प्रेम और तपस्या का प्रतीक है। इस दिन सुहागिन स्त्रियाँ पति की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत रखती हैं, और कुंवारी कन्याएं मनचाहे वर की प्राप्ति के लिए। हरतालिका तीज पर गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन करने से भक्तों को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद मिलता है। इस दिन शिव-पार्वती की युगल पूजा के साथ गोप्रेक्ष महादेव का स्मरण वैवाहिक जीवन में मधुरता लाता है और सभी बाधाओं को दूर करता है।
यह भगवान शिव का सबसे बड़ा पर्व है। महाशिवरात्रि के दिन गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन का विशेष महत्व है क्योंकि ऐसी मान्यता है कि इस दिन भगवान शिव और माता गौरी स्वयं यहाँ एक साथ विराजते हैं। इस पावन अवसर पर महादेव के दर्शन और रात्रि जागरण से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं और मोक्ष की प्राप्ति होती है।
भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव, जन्माष्टमी के पावन अवसर पर गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन का भी विशेष महत्व है। चूँकि गोप्रेक्ष महादेव के परिसर में गोपी गोविंद जी का वास है, इसलिए इस दिन यहाँ विशेष धूम-धाम रहती है। भगवान शिव को वैष्णवों में श्रेष्ठ माना जाता है, और इस दिन उनके दर्शन से श्री कृष्ण और भोलेनाथ दोनों का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे जीवन में आनंद और भक्ति का संचार होता है।
जब भी अधिक मास (पुरुषोत्तम मास) आता है, तो इसे भगवान विष्णु और शिव दोनों की पूजा के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। अधिक मास में गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन और पूजन से अक्षय पुण्य की प्राप्ति होती है, क्योंकि इस मास में किए गए धार्मिक कार्य कई गुना फल प्रदान करते हैं।
माघ शुक्ल पंचमी को बसंत पंचमी मनाई जाती है, जो ज्ञान, कला और संगीत की देवी माँ सरस्वती को समर्पित है। इस दिन गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन का विशेष महत्व है क्योंकि यह दिन प्रकृति में नई ऊर्जा और सौंदर्य के आगमन का प्रतीक है। महादेव के दर्शन से जीवन में नई शुरुआत और रचनात्मकता को बढ़ावा मिलता है।
गोप्रेक्ष महादेव मंदिर में 25 दिसंबर को एक वार्षिक उत्सव मनाया जाता है। इस विशेष दिन पर मंदिर में भव्य आयोजन होते हैं और बड़ी संख्या में भक्त दर्शन के लिए आते हैं। इस उत्सव में शामिल होकर महादेव का आशीर्वाद प्राप्त करना अत्यंत शुभ माना जाता है।
फाल्गुन शुक्ल एकादशी को रंगभरी एकादशी के रूप में मनाया जाता है, जो काशी में विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। इस दिन बाबा विश्वनाथ माता पार्वती के साथ गौना करके अपने धाम लौटते हैं। इस अवसर पर गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन करने से भक्तों को शिव-पार्वती के दिव्य मिलन का आशीर्वाद प्राप्त होता है, जिससे उनके जीवन में सुख, समृद्धि और आनंद आता है।
कार्तिक पूर्णिमा को मनाई जाने वाली देव दीपावली काशी का एक भव्य और अद्वितीय पर्व है। इस दिन सभी देवी-देवता काशी में आकर दीपावली मनाते हैं। देव दीपावली के अवसर पर गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन और गंगा घाटों पर दीपदान करने से भक्तों को देवताओं का आशीर्वाद प्राप्त होता है और उनके जीवन में प्रकाश और खुशहाली आती है।
संक्षेप में, गोप्रेक्ष महादेव के दर्शन इन सभी पावन तिथियों पर भक्तों को न केवल आध्यात्मिक लाभ प्रदान करते हैं, बल्कि उनकी आस्था और विश्वास को भी सुदृढ़ करते हैं, जिससे उन्हें जीवन में सुख, समृद्धि और शांति प्राप्त होती है।
काशी (वाराणसी) में भगवान शिव के चौदह आयतनों (शिवलिंगों) की चतुर्दशायतन यात्रा एक प्राचीन और अत्यंत पुण्यदायी परिक्रमा है। विभिन्न पुराणों और ग्रंथों में इस यात्रा के महत्व और क्रम का विस्तृत वर्णन मिलता है। जहाँ लिंग पुराण में इसका एक ही प्रकार वर्णित है, वहीं काशीखण्ड के अंतिम अध्याय में इसके दो अन्य प्रकारों का भी उल्लेख मिलता है, जिससे कुल तीन प्रकार की चतुर्दशायतन यात्राएँ काशी में प्रचलित हैं।
इस पवित्र यात्रा का सामान्य विधान है कि प्रत्येक माह के कृष्ण पक्ष की प्रतिपदा से आरंभ करके चतुर्दशी तक प्रतिदिन एक-एक आयतन का दर्शन-पूजन किया जाए। यदि यह संभव न हो, तो कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी के दिन पूरी यात्रा एक साथ संपन्न करने का भी विधान है।
इतिहास में, 'त्रिस्थलीसेतु' ग्रंथ (सन् 1585 ई.) के अनुसार, शिष्ट-संप्रदाय के लोग शैलेश आदि चतुर्दश आयतनों की यात्रा चैत्र मास में, ओंकार आदि की वैशाख में, और अमृतेश आदि की ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष में करते थे।
1. शैलेश संगमेश्वर और गोप्रेक्षेश्वर आदि क्रम (वर्तमान में प्रचलित):
यह यात्रा क्रम स्कंदपुराण के काशीखण्ड और 'त्रिस्थलीसेतु' में वर्णित है, और 'कृत्यकल्पतरु' में भी इसका उल्लेख मिलता है
श्लोक: "शैलेशं संगमेशं च स्वर्लीनं मध्यमेश्वरम्।
हिरण्यगर्भमीशानं गोप्रेक्षं वृषभध्वजम्।।
उपशान्तशिवं चैवज्येष्ठस्थाननिवासिनम्।
शुक्रेश्वरं च विख्यातं व्याघ्रेशं जम्बुकेश्वरम्।।"
यह क्रम आज भी प्रचलित है और इसमें निम्न 14 शिवलिंगों के दर्शन किए जाते हैं:
शैलेश्वर (मढ़ियाघाट, वरुणा तट)
संगमेश्वर (वरुणा-गंगा संगम)
स्वर्लीनेश्वर (नया महादेव, राजघाट)
मध्यमेश्वर (मैदागिन से उत्तर)
हिरण्यगर्भेश्वर (त्रिलोचनघाट)
ईशानेश्वर (बांसफाटक सिनेमा के पीछे)
गोप्रेक्षेश्वर (लालघाट)
वृषभध्वज (कपिलधारा)
उपशान्तेश्वर (अग्नीश्वर घाट)
ज्येष्ठेश्वर (काशीपुरा)
निवासेश्वर (भूतभैरव)
शुक्रेश्वर (अन्नपूर्णा मंदिर के पीछे, कालिका गली)
व्याघ्रेश्वर (भैतभैरव)
जंबुकेश्वर (बड़े गणेश के पास)
2. ओंकार आदि क्रम (काशीखण्ड 17 के अनुसार):
काशीखण्ड में वर्णित इस क्रम में निम्नलिखित 14 शिवलिंगों के दर्शन होते हैं:
ओंकारेश्वर (कोइलाबाजार)
त्रिलोचन (प्रसिद्ध)
आदिमहादेव (त्रिलोचन के पास)
कृतिवासेश्वर (वृद्धकाल के पास)
रत्नेश्वर (कृतिवासेश्वर के पास)
केदारेश्वर (केदारघाट)
धर्मेश्वर (मीरघाट)
आत्मवीरेश्वर (संकटाघाट)
कामेश्वर (मछोदरी के पूर्व)
विश्वकर्मेश्वर (हनुमानफाटक के उत्तर)
मणिकर्णिकेश्वर (मणिकर्णिका घाट के पास)
अविमुक्तेश्वर (विश्वनाथ मंदिर में अथवा ज्ञानवापी की सीढ़ियों के सामने)
विश्वेश्वर (काशी विश्वनाथ मंदिर)
3. अमृतेश आदि क्रम (काशीखण्ड 17 के अनुसार):
यह क्रम भी काशीखण्ड में ही वर्णित है और इसमें निम्न 14 लिंगों का अर्चन-पूजन किया जाता है:
अमृतेश्वर (ब्रह्मनाल)
तारकेश्वर (ज्ञानवापी के पूर्व, गुप्त लिंग)
ज्ञानेश्वर (लाहौरी टोला, धनीराम खत्री के मकान में)
करुणेश्वर (ललिता घाट)
मोक्षद्वारेश्वर (फूटे गणेश के पास)
स्वर्गद्वारेश्वर (ब्रह्मनाल पर, स्वर्णद्वारी में)
ब्रह्मेश्वर (बालमुकुंद के चौहट्टे में)
लांगलीश्वर (खोवाबाजार)
वृद्धकालेश्वर (दारानागर)
चंडेश्वर (पुलिस लाइन में)
वृषेश्वर (गोरखनाथ के टीले पर, हरिश्चंद्र कॉलेज के पास)
मंदिकेश्वर (ज्ञानवापी के उत्तर, गुप्त लिंग)
महेश्वर (ज्ञानवापी के पास या मणिकर्णिका घाट पर)
ज्योतिरूपेश्वर (मणिकर्णिकेश्वर के पास)
यह विस्तृत जानकारी काशी की प्राचीन तीर्थ परंपराओं की गहराई और विविधता को दर्शाती है, जहाँ प्रत्येक शिवलिंग और यात्रा का अपना विशिष्ट महत्व है।