पद्मपुरापुराणम् /खण्डः _३_(स्वर्गखण्डः )/अध्यायः _३७
हिरण्यगर्भं गोप्रेक्षंतीर्थं चैवमनुत्तमम् ॥
काशी में हिरण्यगर्भ एवं गोप्रेक्ष नामक उत्तम तीर्थ है ।
स्कन्दपुरापुराणम् / खण्डः _४_(काशीखण्डः )/अध्यायः _०९७
सापूजिता प्रयत्नेन सुखवस्तिप्रदा सदा ॥
महादेवस्य पूर्वेण गोप्रेक्षंलिंगमुत्तमम् ॥ ९ ॥
तद्दर्शनाद्भवेत्सम्यग्गोदानजनितं फलम् ॥
गोलोकात्प्रेषिता गावः पूर्वंयच्छंभुना स्वयम् ॥ १० ॥
वाराणसीं समायाता गोप्रेक्षं तत्ततः स्नृतस्नृम् ॥
महादेव जी का पूर्व दिशा में एक बहुत ही अध्भुत लिंग है जिसे गोप्रेक्ष नाम से जाना जाता है, यह अर्धनारीश्वर का ऐसा स्वरूप जिसमें शिव स्वयं लिंग रूप में और मां गौरी स्वयं मूर्ति रूप में एक ही विग्रह में साथ-साथ विराजते हैं भगवान शंकर ने गायो को स्वयं गोलोक से काशी जाने का आदेश दिया, जब वे भोलेनाथ की आज्ञा से काशी पहुंचे तो भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर मां गौरी सहित दर्शन दिए, गायो को दर्शन देने के कारण गोप्रेक्ष नाम हुआ, और यहां दर्शन करने से अनंत गौ दान का फल प्राप्त होता है और दम्पत्य क्लेश नाश होता है।
लिङ्गपुरापुराणम्-पूर्वभागः /अध्यायः _९२
जन्मांतरसहस्रेषु यं न योगी समाप्नुयात् ॥ तमिहैव परं मोक्षं प्रसादान्मम सुव्रते ॥६६ ॥
गोप्रेक्षप्कमिदं क्षेत्रं ब्रह्मणा स्थापितं पुरा ॥ कैलासवनं चात्र पश्य दिव्यं वरानने ॥६७ ॥
गोप्रेक्षकमयागम्य दृष्ट्वामामत्र मानवः ॥ न दुर्गदुर्गतिमवाप्नोति कल्मषैश्च विमुच्यते ॥६८ ॥
हे प्रिये! मेरी कृपा से मनुष्य को यहाँ सहज ही मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है, जो एक योगी को हजार जन्मों में प्राप्त नहीं होती है । इस पवित्र स्थान ( गोप्रेक्ष ) पर एक तीर्थ (कुंड/जलभरी) की स्थापना ब्रह्मा द्वारा पूर्वकार्व काल में की गई थी ।
हे देवी ! यहाँ दिव्य धाम कैलास को देखो । जो मनुष्य गोप्रेक्ष जा कर मेरा दर्शन करता है, वह दुर्गति एवं कल्मष से मुक्त हो जाता है ।
नारदपुराणम्-_उत्तरार्धः /अध्यायः _५०
तस्मिन्स्थाने तु सुभगे स्वयमाविरभूच्छिवः ॥ गोप्रेक्षक: इति ख्यातः संस्तुतः सर्वदैवतैः ॥४३ ॥
गोप्रेक्षेश्वरमागत्य दृष्ट्वा भ्यर्च्य च मानवः ॥ न दुर्गदु र्गति मवा प्नो ति कल्मषैश्चषै वि मुच्यते ॥४४ ॥
सुभगे! इस शुभ स्थान पर भगवान् शिव माँ गौरी संग स्वयं प्रकट हुए थे, जो 'गोप्रेक्ष' के नाम से विख्यात इुए । सम्पूर्ण देवता उनकी स्तुति करते हैं । गोप्रेक्षेश्वर के पास आकर उनका दर्शन-पूजन करके मनुष्य कभी दुर्गति में नहीं पड़ता और सब पापों से मुक्त हो जाता है ।
स्कन्दपुरापुराणम्/म्खण्डः _४_(का शीखण्डः )/अध्या यः _०७३
॥ स्कंद उवाच ॥ अन्यान्यपि च विंध्यारे देव्यै प्रोक्ता निशंभुना ॥ स्वभक्ता नां हिताथार्य तान्यथाकर्णयाग्रज ॥५९ ॥
शैलेशः संगमेशमेश्च स्वर्लीनो मध्यमेश्वमेरः ॥ हिरण्यगर्भ ईशानो गोप्रेक्षो वृषभध्वजः ॥६० ॥
उपशांत शिवो ज्येष्ठो निवासेश्वर एव च ॥ शुक्रेशो व्याघ्रलिंगं च जंबुकेशं चतुर्दशम् ॥६१ ॥
मुने चतुर्दशैतानि महांत्याहांत्यायतनानि वै ॥ एतेषामपि सेवातो नरो मोक्षमवाप्नुयात् ॥६२ ॥
चैत्रकृष्णप्रतिपदं समारभ्य प्रयत्नतः ॥ आ चतुर्दशि पूज्यानि लिंगान्येतानि सत्तमैः ॥६३ ॥
स्कन्ददेव कहते हैं- हे द्विज! विन्ध्यपर्वत के शत्रु! भगवान् शंभु ने अपने भक्तगण के हितार्थ अन्य जिन लिङ्गों का वर्णनर्ण भगवती से किया था , मैं उसे भी कहता हूं । श्रवण करिये : शैलेश्वर, संगमेश्वर, स्वर्लिनेश्वर, मध्यमेश्वर, हिरण्यगर्भेश्वर, ईशानेश्वर, गोप्रेक्षेश्वर, वृषभध्वजेश्वर, उपशान्तेश्वर, ज्येष्ठेश्वर, निवासेश्वर, शुक्रेश्वर, व्याघ्रेश्वर, जम्बुकेश्वर नामक चतुर्दश लिङ्ग हैं । ये सभी चैत्रकृष्ण प्रति पदा से प्रारंभ करके यत्नतः पूज्य हैं ।
स्कन्दपुरापुराणम्/म्खण्डः _४_(का शीखण्डः )/अध्या यः _१००
ततः कूपमुपमुस्पृश्यस्पृ गोप्रेक्षप्रे मवलो कयेत् ॥
तत्पश्चात गोप्रेक्ष कूप में जल संस्कार करना चाहिए और गोप्रेक्षेश्वर का दर्शन करना चाहिए ।
अतः परं प्रवक्ष्यामि गौरीयात्रा मनुत्तमाम् ॥
शुक्लपक्षे तृतीयायां या यात्रा विष्वगृद्धिगृद्धिदा ॥
गोप्रेक्षतीर्थे सुस्ना य मुखनिर्मालिकां व्रजेत् ॥
इसके बाद मैं शुक्ल पक्ष की तृतीया को की जाने वाली उत्तम गौरी यात्रा का वर्णन करूंगा । यह समस्त ऐश्वर्य प्रदान करता है । गोप्रेक्षतीर्थ (गाय घाट से वर्तमान लाल घाट तक) में स्नान करके भक्त को मुखनिर्मालिका गौरी का दर्शन-पूजन करना चाहिए ।
श्री गोप्रेक्षेश्वर मोक्षलिंग: शिव-शक्ति का परमधाम - पद्म, नारद, लिंग, स्कंद पुराणों में वर्णित; कान्हा द्वारा पूजित यह सतयुगीन मोक्षलिंग, जहाँ एक दर्शन से मिटें क्लेश, गौ-हत्या पाप और मिले अनंत गौ-दान का फल एवम अनंत पुण्य!
वाराणसी के पावन गोप्रेक्ष तीर्थ घाट पर स्थित, श्री गोप्रेक्षेश्वर महादेव मंदिर एक ऐतिहासिक और आध्यात्मिक केंद्र है, जिसकी सेवा में श्री कृष्ण कुमार मिश्र अपने परिवार की छठी पीढ़ी के रूप में समर्पित हैं। यह मंदिर न केवल भगवान शिव और शक्ति के अनूठे 'मोक्षलिंग' स्वरूप के लिए विख्यात है, बल्कि स्वयं भगवान कृष्ण द्वारा गौ-हत्या के पाप से मुक्ति पाने हेतु किए गए दर्शनों के लिए भी जाना जाता है। पद्म, नारद, लिंग और स्कंद जैसे प्रमुख पुराणों में इस दिव्य स्थल की महिमा का वर्णन मिलता है।
महंत श्री कृष्ण कुमार मिश्र का परिवार सदियों से इस पवित्र धाम की सेवा में लगा हुआ है। उनका जन्म 1961 में वाराणसी में हुआ, हालांकि उनके पूर्वज मूल रूप से राजस्थान के मेहरु गांव से संबंध रखते हैं। यह परिवार भक्ति, ज्ञान और परंपरा का एक संगम रहा है, जिसने गोप्रेक्षेश्वर महादेव और गोपी गोविंद मंदिर की गरिमा को बनाए रखा है।
पांचवीं पीढ़ी के महंत: श्री कृष्ण कुमार मिश्र के पिता, श्री दुर्गा लाल मिश्रा, इस गद्दी के पांचवें महंत थे। उन्होंने अपने जीवनकाल में मंदिर की परंपराओं और पूजा-अर्चना को उसी निष्ठा से संभाला, जैसा उनके पूर्वजों ने किया था। उनकी सेवा और समर्पण ने इस मंदिर की आध्यात्मिक आभा को और प्रगाढ़ किया।
ज्योतिष के प्रकांड विद्वान: श्री कृष्ण कुमार मिश्र के दादा, स्वर्गीय श्री लक्ष्मी नारायण जी, वाराणसी के एक अत्यंत प्रसिद्ध और सम्मानित ज्योतिष विद्वान थे। उनका ज्ञान और विद्वत्ता दूर-दूर तक प्रसिद्ध थी, और उन्होंने न केवल आध्यात्मिक मार्गदर्शन प्रदान किया बल्कि ज्योतिष के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। यह दर्शाता है कि यह परिवार केवल मंदिर के प्रबंधन तक ही सीमित नहीं रहा, बल्कि विद्या और ज्ञान की परंपरा को भी आगे बढ़ाया।
वर्तमान में, श्री कृष्ण कुमार मिश्र कार्यकारी तीर्थ महंत के रूप में अपनी पारिवारिक विरासत को आगे बढ़ा रहे हैं। वैदिक परंपरा में उनकी गहरी आस्था और निपुणता उन्हें अपने पूर्वजों के समान ही बनाती है। वह प्रतिदिन त्रिकाल संध्या करते हैं और गोप्रेक्षेश्वर महादेव तथा गोपी गोविंद तीर्थ में नियमित रूप से राग भोग, श्रृंगार आरती और अन्य धार्मिक अनुष्ठान पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न करते हैं।
उनका स्थायी निवास लाल घाट स्थित के 4/24 (गोप्रेक्षेश्वर तीर्थ) पर है, जहाँ प्रतिदिन बड़ी संख्या में भक्त और शिष्य उनसे आशीर्वाद और मार्गदर्शन प्राप्त करने आते हैं। श्री कृष्ण कुमार मिश्र जी का समर्पण इस बात का प्रमाण है कि गोप्रेक्षेश्वर महादेव मंदिर केवल एक पूजा स्थल नहीं, बल्कि एक जीवंत परंपरा और आध्यात्मिक विरासत का केंद्र है, जिसकी सेवा में यह परिवार पीढ़ियों से लगा हुआ है।
श्री दुर्गा लाल मिश्रा गोप्रेक्षेश्वर महादेव और गोपी गोविंद तीर्थ व मंदिर के पांचवें महंत थे। उन्होंने अपने पुत्र, वर्तमान महंत श्री कृष्ण कुमार मिश्र से पहले इस पवित्र गद्दी को संभाला और मंदिर की सेवा की महान परंपरा को आगे बढ़ाया। उनका जीवन पूरी तरह से इन दिव्य स्थलों की पूजा-अर्चना और धार्मिक अनुष्ठानों को समर्पित था, जैसा कि उनके पुत्र आज भी उसी निष्ठा से करते हैं।
वंश, पैतृक गाँव और परोपकारी कार्य:
श्री दुर्गा लाल मिश्रा का परिवार मूल रूप से राजस्थान के मेहरु गाँव से संबंध रखता है, जहाँ से उनके पूर्वज वाराणसी आकर बसे और गोप्रेक्षेश्वर महादेव की सेवा में लीन हो गए। यह गाँव उनके परिवार की जड़ों का प्रतीक है, जहाँ से भक्ति और आध्यात्मिक ज्ञान की उनकी विरासत विकसित हुई।
श्री दुर्गा लाल मिश्रा को उनके पैतृक गाँव मेहरु में आज भी उनके परोपकारी कार्यों और लोक कल्याण के लिए याद किया जाता है। उनकी उदारता और जनसेवा की भावना इतनी गहरी थी कि गाँव में एक कुआँ है, जिसे आज भी श्रद्धापूर्वक "काशी जी के पंडित जी के कुआँ" के नाम से जाना जाता है। यह कुआँ उनके द्वारा किए गए जनहित के कार्यों का एक जीवंत प्रमाण है, जो पीढ़ियों से गाँव वालों की प्यास बुझा रहा है और उनकी स्मृति को जीवित रखे हुए है।
पिता और एक विद्वान की विरासत:
दुर्गा लाल मिश्रा स्वयं एक महान विरासत के धारक थे, क्योंकि उनके पिता, स्वर्गीय श्री लक्ष्मी नारायण जी, वाराणसी के एक प्रसिद्ध ज्योतिष विद्वान थे। श्री लक्ष्मी नारायण जी का ज्ञान और ज्योतिषीय अंतर्दृष्टि दूर-दूर तक सराही जाती थी। यह दर्शाता है कि श्री दुर्गा लाल मिश्रा का परिवार केवल मंदिर प्रबंधन तक ही सीमित नहीं था, बल्कि विद्या, ज्ञान और आध्यात्मिक मार्गदर्शन की एक समृद्ध परंपरा का भी हिस्सा था।
इस प्रकार, श्री दुर्गा लाल मिश्रा ने अपने पूर्वजों की विरासत को सम्मानपूर्वक आगे बढ़ाया और अगली पीढ़ी को एक मजबूत आध्यात्मिक नींव प्रदान की, जिसने गोप्रेक्षेश्वर महादेव मंदिर की महिमा और पवित्रता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, साथ ही अपने पैतृक गाँव में भी परोपकार की अमिट छाप छोड़ी।
पं. श्री कृष्ण कुमार मिश्र: गोप्रेक्षेश्वर महादेव के वर्तमान संरक्षक
पं. श्री कृष्ण कुमार मिश्र अपने परिवार की छठी पीढ़ी के रूप में गोप्रेक्षेश्वर महादेव और गोपी गोविंद तीर्थ व मंदिर के कार्यकारी तीर्थ महंत के रूप में सेवा दे रहे हैं। 1961 में वाराणसी में जन्मे पं. श्री मिश्र वैदिक परंपरा में गहरी आस्था और निपुणता रखते हैं। वह प्रतिदिन त्रिकाल संध्या करते हैं और गोप्रेक्षेश्वर महादेव तथा गोपी गोविंद तीर्थ में अपने पिता, स्वर्गीय पं. श्री दुर्गा लाल मिश्रा, की तरह ही नियमित रूप से राग भोग, श्रृंगार आरती और अन्य धार्मिक अनुष्ठान पूरी श्रद्धा के साथ संपन्न करते हैं।
उनका स्थायी निवास वाराणसी के लाल घाट स्थित के 4/24 (गोप्रेक्षेश्वर तीर्थ) पर है, जहाँ प्रतिदिन बड़ी संख्या में भक्त और शिष्य उनसे आशीर्वाद और मार्गदर्शन प्राप्त करने आते हैं। पं. श्री कृष्ण कुमार मिश्र जी का समर्पण इस बात का प्रमाण है कि वह अपने पूर्वजों की महान आध्यात्मिक विरासत को पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं, जिससे गोप्रेक्षेश्वर महादेव मंदिर की पवित्रता और महिमा निरंतर बनी हुई है।