8 नवंबर को पूर्वी सिंहभूम जिले के प्रत्येक गांव में माझी बाबावों की महत्वपूर्ण बैठक आयोजित किए जाने का निर्णय लिया गया था। इस निर्णय का उद्देश्य समाज की एकता, परंपराओं की रक्षा और संगठनात्मक ढांचे को और अधिक सशक्त बनाना है।
बैठक में उपस्थित सभी पारंपरिक प्रमुखों ने एक स्वर में यह संकल्प लिया कि वे समाज को मजबूत बनाने, पारंपरिक व्यवस्था को जीवित रखने तथा आपसी समन्वय और सहयोग को बढ़ाने के लिए सक्रिय भूमिका निभाएंगे।
यह पहल सामाजिक जागरूकता को बढ़ावा देने के साथ-साथ गांव स्तर पर संगठन को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम मानी जा रही है।
दिनांक 26 जून 1993 को जिला पूर्वी सिंघ्भुम बिहार (अब झारखण्ड) के बादिया पंचायत प्रांगन में पंचायत के मुखिया कन्हाई माहली की अध्यक्षता में ऑल इंडिया माहली अधिवेशन का आयोजित महाली समाज के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर सिद्ध हुआ।
इस अधिवेशन में “नौ महल महली माहाल” के अंतर्गत समाज के पारंपरिक स्वशासन तंत्र को पुनर्स्थापित और सुदृढ़ करने पर विशेष बल दिया गया। सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि महाली समाज को सुचारू, अनुशासित और व्यवस्थित रूप से संचालित करने के लिए पारंपरिक पदाधिकारी — माझी, परगना, गोडेत, पाराणिक एवं नायके को उनकी परंपरागत भूमिकाओं के अनुसार "मानत साकाम देकर जिम्मेदारी सौंपी गईं।
इस बैठक में यह स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया कि महाली जनजाति की पारंपरिक स्वशासन व्यवस्था केवल प्रशासनिक ढांचा नहीं, बल्कि सामाजिक, सांस्कृतिक और धार्मिक जीवन का आधार है।
माझी गांव स्तर का प्रमुख होता है, जो सामाजिक व्यवस्था, विवाद समाधान और सामुदायिक निर्णयों का नेतृत्व करता है।
परगना क्षेत्रीय स्तर पर कई गांवों का मार्गदर्शन करता है और बड़े मामलों में अंतिम निर्णय देने की भूमिका निभाता है।
गोडेत समाज में सूचना प्रसार, लोगों को एकत्रित करने तथा बैठक संचालन में सहयोग करता है।
पाराणिक परंपराओं, रीति-रिवाजों और सामाजिक नियमों का संरक्षक होता है, जबकि
नायके धार्मिक और आध्यात्मिक कार्यों का प्रमुख होता है, जो पूजा-पाठ और प्रकृति आधारित आस्था को जीवित रखता है।
अधिवेशन में यह भी निर्णय लिया गया कि इन सभी पारंपरिक पदाधिकारियों को सम्मानित करते हुए उन्हें समाज के संचालन की औपचारिक जिम्मेदारी सौंपी जाए, ताकि महाली समाज अपनी परंपरागत पहचान, सांस्कृतिक मूल्यों और सामुदायिक एकता को बनाए रखते हुए आगे बढ़ सके। इस पहल का उद्देश्य बाहरी प्रभावों के बीच भी समाज की मूल संरचना को सुरक्षित रखना और आने वाली पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़कर रखना था। इस प्रकार, यह अधिवेशन महाली समाज के पारंपरिक स्वशासन को पुनर्जीवित करने और उसे संगठित रूप देने की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम के रूप में स्थापित हुआ।
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