I enjoy writing Hindi poetry, where I explore my thoughts and emotions. In my free time, I often reflect on random ideas and imagine conversations with people—listening to them, speaking with them, and forming deep connections. These imagined moments inspire my poems, which express my beliefs, feelings, and inner world. At the same time, my love for poetry keeps me inspired, as I find meaning and beauty in the richness of language.
मैं भाषा में ‘अ’ लिखना चाहता था,
‘अ’ से ‘अनार’ पढ़ा था बचपन में,
पर अब ‘अ’ से ‘अँधेरा’ दिखता है
जो कभी-कभी भीतर ही बस जाता है।
मैं ‘आ’ से ‘आम’ लिखता था,
मीठा, सीधा, आसान,
अब ‘आ’ से ‘आवाज़’ लिखता हूँ,
जो कई बार खुद तक ही नहीं पहुँचती।
मैं ‘इ’ से ‘इमली’ जानता था,
खट्टी-मीठी सी,
अब ‘इ’ से ‘इंतज़ार’ लिखता हूँ,
जो वक्त के साथ लंबा होता जाता है।
मैं ‘ई’ से ‘ईख’ लिखता आया था,
मीठे एहसासों के साथ,
अब ‘ई’ से ‘ईर्ष्या’ लिखता हूँ,
कभी खुद के लिए, कभी दूसरों के लिए।
मैं ‘उ’ से ‘उल्लू’ पढ़ता था,
हँसते हुए,
अब ‘उ’ से ‘उम्मीद’ लिखता हूँ,
हँसते हुए,
जो हर बार टूटकर भी बची रहती है।
मैं ‘ऊ’ से ‘ऊन’ जानता था,
गर्माहट के लिए,
अब ‘ऊ’ से ‘ऊहापोह’ लिखता हूँ,
जहाँ फैसले अटक जाते हैं।
मैं ‘ऋ’ से कुछ खास नहीं समझता था,
अब ‘ऋ’ से ‘ऋण’ लिखता हूँ,
जो एहसानों का भी होता है।
मैं ‘ए’ से ‘एकता’ पढ़ता था,
अब ‘ए’ से ‘एकांत’ लिखता हूँ,
जहाँ आदमी खुद से मिलता है।
मैं ‘ऐ’ से ‘ऐनक’ जानता था,
अब ‘ऐ’ से ‘ऐहसास’ लिखता हूँ,
जो बिना दिखें भी दिख जाते हैं।
मैं ‘ओ’ से ‘ओखली’ पढ़ता था,
अब ‘ओ’ से ‘ओझल’ लिखता हूँ,
जो धीरे-धीरे लोग ज़िंदगी से हो जाते हैं।
मैं ‘औ’ से ‘औरत’ लिखना सीखा था,
अब ‘औ’ से ‘औकात’ लिखता हूँ,
जो लोग अक्सर याद दिलाते रहते हैं।
मैं ‘अं’ से ‘अंगूर’ पढ़ता था,
अब ‘अं’ से ‘अंदर’ लिखता हूँ,
जहाँ सबसे ज़्यादा भीड़ है।
मैं ‘अः’ को कुछ नहीं समझता था,
अब ‘अः’ से ‘अहंकार’ समझ आता है,
जो रिश्ते तोड़ देता है।
मैंने ‘क’ से ‘कबूतर’ लिखा था,
खुला आसमान और उड़ने की बातों के साथ,
अब ‘क’ से ‘कश्मकश’ लिखता हूँ,
जहाँ हर उड़ान से पहले सौ बार सोचता हूँ।
मैंने ‘ख’ से ‘खरगोश’ सीखा था,
भागते-दौड़ते बचपन के साथ,
अब ‘ख’ से ‘खामोशी’ लिखता हूँ,
जीवन की अस्थिरता के साथ
जो अंदर सबसे ज़्यादा शोर करती है।
मैंने ‘ग’ से ‘गमला’ पढ़ा था,
जिसमें छोटे-छोटे पौधे लगाए थे,
अब ‘ग’ से ‘ग़म’ लिखता हूँ,
जो बिना लगाए भी उग आते हैं।
मैंने ‘घ’ से ‘घर’ जाना था,
जहाँ लौटना सबसे आसान लगता था,
अब ‘घ’ से ‘घुटन’ लिखता हूँ,
इन शहरों के बंद कमरों में।
मैंने ‘च’ से ‘चम्मच’ पढ़ा था,
रसोई और माँ के हाथों के साथ,
अब ‘च’ से ‘चिंता’ लिखता हूँ,
जो हर रात साथ सोती है।
मैंने ‘छ’ से ‘छतरी’ सीखी थी,
बारिश से बचने के लिए,
अब ‘छ’ से ‘छूट जाना’ लिखता हूँ,
लोगों का… और कभी-कभी खुद का भी।
मैंने ‘ज’ से ‘जहाज’ पढ़ा था,
दूर जाने के सपनों के साथ,
अब ‘ज’ से ‘जिम्मेदारी’ लिखता हूँ,
जो हर कदम रोककर चलना सिखाती है।
मैंने ‘झ’ से ‘झंडा’ जाना था,
ऊँचा लहराने वाली बातों में,
अब ‘झ’ से ‘झुंझलाहट’ लिखता हूँ,
जो छोटी-छोटी बातों में निकल आती है।
मैंने ‘ट’ से ‘टमाटर’ सीखा था,
सीधी-सादी किताबों में,
अब ‘ट’ से ‘टूटना’ लिखता हूँ,
जो बिना आवाज़ के होता है।
मैंने ‘ठ’ से ‘ठेला’ पढ़ा था,
सड़क किनारे की ज़िंदगी में,
अब ‘ठ’ से ‘ठहराव’ ढूँढता हूँ,
जो कहीं मिल ही नहीं रहा।
मैंने ‘ड’ से ‘डमरू’ जाना था,
खेल और मेले के साथ,
अब ‘ड’ से ‘डर’ लिखता हूँ,
जो बिना बुलाए साथ चलता है।
मैंने ‘ढ’ से ‘ढोल’ सीखा था,
शोर और खुशियों के बीच,
अब ‘ढ’ से ‘ढोंग’ पहचानता हूँ,
जो चेहरे बदलकर मिलता है।
मैंने ‘ण’ को कभी समझा ही नहीं था,
बस किताब में देखा था,
अब ‘ण’ से ‘क्षण’ लिखता हूँ,
जो अच्छे हों या बुरे… टिकते नहीं।
मैंने सोचा ‘त’ से ‘तरबूज’ ही होता है,
गर्मी की छुट्टियों और मीठे टुकड़ों के साथ,
पर धीरे-धीरे समझ आया
‘त’ से ‘तन्हाई’ भी होती है,
जो गर्मी की छुट्टियों और भीड़ में भी मिल जाती है।
मैंने ‘थ’ से ‘थाली’ पढ़ी थी,
घर के खाने और साथ बैठने के साथ,
अब ‘थ’ से ‘थकान’ लिखता हूँ,
जो सिर्फ शरीर में नहीं… दिमाग में भी रहती है।
मैंने ‘द’ से ‘दीपक’ और ‘दवात’ जाना था,
रोशनी और स्याही के साथ,
फिर सीखा ‘द’ से ‘दुख’ लिखना,
और उससे भी ज़्यादा… उसे चुपचाप सहना।
मैंने ‘ध’ से ‘धनुष’ पढ़ा था,
कहानियों और वीरता के साथ,
अब ‘ध’ से ‘धैर्य’ सीख रहा हूँ,
जो हर दिन थोड़ा-थोड़ा टूटता भी है।
मैंने ‘न’ से ‘नल’ लिखा था,
सीधा, आसान, बिना सोचे,
फिर बड़े होते-होते समाज में ही सीखा
‘न’ से ‘नकारा’ होना,
जब ख़ुद की कोशिशें भी कम लगने लगती हैं।
मैंने गाँव में ‘प’ से ‘पतंग’ उड़ाई थी,
खुले आसमान और आज़ादी के साथ,
अब शहर में ‘प’ से ‘पछतावा’ लिखता हूँ,
कुछ बातों के लिए… जो कह नहीं पाया,
कुछ लम्हों के लिए जो गाँव में जी नहीं पाया।
मैंने ‘फ’ से ‘फल’ पढ़ा था,
मेहनत और मीठे नतीजों के साथ,
अब ‘फ’ से ‘फासले’ समझता हूँ,
जो बिना दिखे भी बढ़ते जाते हैं।
मैंने ‘ब’ से ‘बकरी’ सीखी थी,
किताबों के हल्के पन्नों में,
अब ‘ब’ से ‘बिखरना’ लिखता हूँ,
जब सब संभालते-संभालते खुद ही छूट जाता हूँ।
मैंने ‘भ’ से ‘भालू’ जाना था,
मासूम कहानियों में,
अब ‘भ’ से ‘भरोसा’ लिखता हूँ,
जो एक बार टूट जाए तो वापस नहीं आता।
मैंने ‘म’ से ‘मछली’ पढ़ी थी,
पानी में तैरती हुई,
अब ‘म’ से ‘मुस्कान’ लिखता हूँ,
जो अक्सर सिर्फ दिखाने के लिए होती है।
मैंने ‘य’ से कुछ खास नहीं लिखा था,
बस यूँ ही पढ़ लिया था,
अब ‘य’ से ‘यादें’ लिखता हूँ,
जो बिना बुलाए हर बिछड़े लोगों की रोज़ आ जाती हैं।
मैंने ‘र’ से ‘रथ’ पढ़ा था,
कहानियों और यात्राओं के साथ,
अब ‘र’ से ‘रिश्ते’ संभालता हूँ,
जो हर दिन थोड़े और नाज़ुक लगते हैं।
मैंने ‘ल’ से ‘लड्डू’ सीखा था,
मीठे और आसान दिनों में,
अब ‘ल’ से ‘लगाव’ समझता हूँ,
जो जितना गहरा हो… उतना ही दुख देता है।
मैंने ‘व’ से ‘वर्षा’ लिखा था,
गाँव के सूखे दिनों में,
पर शहर आकर जाना
‘व’ से ‘विवशता’ होती है,
उससे ना मिलने की
अपने ही घर वक्त पर न लौट पाने की।
मैंने ‘श’ से ‘शेर’ पढ़ा था,
हिम्मत और ताकत की कहानियों में,
अब ‘श’ से ‘शिकायत’ लिखता हूँ,
जो ज़ुबान तक आते-आते रुक जाती है।
मैंने ‘ष’ को कभी समझा नहीं,
बस रट लिया था,
अब ‘ष’ से ‘षड्यंत्र’ समझ आता है,
जो खामोशी में भी चल रहा होता है।
मैंने ‘स’ से ‘सूरज’ जाना था,
रोशनी और नए दिन के साथ,
अब ‘स’ से ‘सहन’ करना सीख लिया है,
बिना कुछ कहे… सब कुछ।
मैंने ‘ह’ से ‘हाथी’ पढ़ा था,
मज़बूत और बड़ा,
अब ‘ह’ से ‘हकीकत’ देखता हूँ,
जो हर दिन थोड़ी-थोड़ी साफ होती है।
मैंने ‘क्ष’ को हमेशा मुश्किल माना था,
कभी ठीक से लिखा भी नहीं,
अब ‘क्ष’ से ‘क्षमा’ सीख रहा हूँ,
दूसरों को नहीं… खुद को।
मैंने ‘त्र’ से ‘त्रिशूल’ जाना था,
ताकत और आस्था के साथ,
अब ‘त्र’ से ‘त्रासदी’ समझता हूँ,
जो बिना बताए आ जाती है।
मैंने ‘ज्ञ’ को हमेशा टाल दिया,
कभी ध्यान से देखा ही नहीं,
अब ‘ज्ञ’ से ‘ज्ञान’ नहीं लिखता,
‘ज्ञ’ से लिखता हूँ वो सब…
जो समझ तो आता है,
पर किसी को समझा नहीं पाता।
अब जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो लगता है… वर्णमाला सिर्फ अक्षर नहीं थे, वो धीरे-धीरे मेरा ही हाल लिख रहे थे। और सच कहूँ, अब किताबों वाली भाषा समझ तो आती है, पर काम… अब भी वही आती है जो मैंने खुद जीकर सीखी है।
मैंने सारी कविताएँ ख़ुद के लिए
नहीं लिखी।
कुछ उन लोगो के लिए भी लिखी
जो ख़ुद नहीं लिख पाते।
मैंने अपने उस दोस्त के लिए लिखा
जिसे अपने पसंद वाली नौकरी नहीं मिली।
उस दोस्त के लिए लिखा जो चाह कर भी
नहीं जी पाया वैसी ज़िंदगी जैसी वो जीना चाहता था।
उस संगी के लिए भी लिखा
जिसका मैं बॉयफ्रेंड था कुछेक दोस्तों की नज़रों में।
उस संगी के लिए जिसे
मैं अपना सुकून घर कहता था।
मेरी कविताएँ मेरी नहीं होती
कभी कभी वो होती है तुम्हारी।
पर मेरी कविताएँ होती है बिलकुल मेरे जैसी
बस नहीं होती है तो स्वार्थी।
#मेरी कविताएँ कही नहीं जाती
जाते है तो बस जाने वाले
और इस भागती दौड़ती ज़िंदगी में
इतवार के सुकून सी है ये कविताएँ मेरे लिये…❣️
ये बम्बई एक बड़ा शहर है,
इसमें न लोग बहुत है
फिर भी ना जाने क्यों ये मन बहुत शांत
छोटा और ख़ुद को अकेला महसूस कर रहा है
अक्सर ये मन अकेलेपन में अटक जाता है
उस कच्चे मकान में
चलने लगता है गाँव कि उन कच्ची पगडंडियों पर
तो कभी घाटो की उन यादों में
जिनको एक अरसे से सम्भाल रखा है भीतर
आज उन रंगो की याद आ रही है
जिनको ना जाने कितनो सालों तक
छिपा कर रखा था कि इक रोज़
इन्ही रंगो के साथ होली खेलेंगे
हाँ पता है होली चली गई है
पर ये भी तो जान लो
वो रंग भी फीके होते जा रहे है…❣️
#कई बार स्पर्श कितना निष्ठुर होता है
किसी की स्मृति
मन को छूती है,
और के गहरी उदासी छोड़ जाती है