आयुर्वेद का अवतरण
चरक मतानुसार (आत्रेय सम्प्रदाय)
आयुर्वेद के ऐतिहासिक ज्ञान के सन्दर्भ में, चरक मत के अनुसार, आयुर्वेद का ज्ञान सर्वप्रथम ब्रह्मा से प्रजापति ने, प्रजापति से दोनों अश्विनी कुमारों ने, उनसे इन्द्र ने और इन्द्र से भारद्वाज ने आयुर्वेद का अध्ययन किया। च्यवन ऋषि का कार्यकाल भी अश्विनी कुमारों का समकालीन माना गया है। आयुर्वेद के विकास में ऋषि च्यवन का अतिमहत्त्वपूर्ण योगदान है। फिर भारद्वाज ने आयुर्वेद के प्रभाव से दीर्घ सुखी और आरोग्य जीवन प्राप्त कर अन्य ऋषियों में उसका प्रचार किया। तदनन्तर पुनर्वसु आत्रेय ने अग्निवेश, भेल, जतू, पाराशर, हारीत और क्षारपाणि नामक छः शिष्यों को आयुर्वेद का उपदेश दिया। इन छः शिष्यों में सबसे अधिक बुद्धिमान अग्निवेश ने सर्वप्रथम एक संहिता (अग्निवेश तंत्र) का निर्माण किया- जिसका प्रतिसंस्कार बाद में चरक ने किया और उसका नाम चरकसंहिता पड़ा, जो आयुर्वेद का आधार-स्तम्भ है।
सुश्रुत मतानुसार (धन्वन्तरि सम्प्रदाय)
धन्वन्तरि ने भी आयुर्वेद का प्रकाशन ब्रह्मदेव द्वारा ही प्रतिपादित किया हुआ माना है। सुश्रुत के अनुसार काशीराज दिवोदास के रूप में अवतरित भगवान धन्वन्तरि के पास अन्य महर्षिर्यों के साथ सुश्रुत आयुर्वेद का अध्ययन करने हेतु गये और उनसे आवेदन किया। उस समय भगवान धन्वन्तरि ने उन लोगों को उपदेश करते हुए कहा कि सर्वप्रथम स्वयं ब्रह्मा ने सृष्टि उत्पादन के पूर्व ही अथर्ववेद के उपवेद आयुर्वेद को एक हजार अध्यायों तथा एक लाख श्लोकों में प्रकाशित किया और पुनः मनुष्य को अल्पमेधावी समझकर इसे आठ अंगों में विभक्त कर दिया। पुनः भगवान धन्वन्तरि ने कहा कि ब्रह्मा से दक्ष प्रजापति, उनसे दोनों अश्विनीकुमारों ने, तथा उनसे इन्द्र ने आयुर्वेद का अध्ययन किया।
आयुर्वेद का काल-विभाजन
आयुर्वेद के इतिहास को मुख्यतया तीन भागों में विभक्त किया गया है -
संहिताकाल -
संहिताकाल का समय 5वीं शती ई.पू. से 6वीं शती तक माना जाता है। यह काल आयुर्वेद की मौलिक रचनाओं का युग था। इस समय आचार्यो ने अपनी प्रतिभा तथा अनुभव के बल पर भिन्न-भिन्न अंगों के विषय में अपने पाण्डित्यपूर्ण ग्रन्थों का प्रणयन किया। आयुर्वेद के त्रिमुनि - चरक, सुश्रुत और वाग्भट, के उदय का काल भी संहिताकाल ही है। चरक संहिता ग्रन्थ के माध्यम से कायचिकित्सा के क्षेत्र में अद्भुत सफलता इस काल की एक प्रमुख विशेषता है।
व्याख्याकाल -
इसका समय 7वीं शती से लेकर 15वीं शती तक माना गया है तथा यह काल आलोचनाओं एवं टीकाकारों के लिए जाना जाता है। इस काल में संहिताकाल की रचनाओं के ऊपर टीकाकारों ने प्रौढ़ और स्वस्थ व्याख्यायें निरुपित कीं। इस समय के आचार्य डल्हण की सुश्रुत संहिता टीका आयुर्वेद जगत् में अति महत्वपूर्ण मानी जाती है।
शोध ग्रन्थ ‘रसरत्नसमुच्चय’ भी इसी काल की रचना है, जिसे आचार्य वाग्भट ने चरक और सुश्रुत संहिता और अनेक रसशास्त्रज्ञों की रचना को आधार बनाकर लिखा है।
विवृतिकाल -
इस काल का समय 14वीं शती से लेकर आधुनिक काल तक माना जाता है। यह काल विशिष्ट विषयों पर ग्रन्थों की रचनाओं का काल रहा है। माधवनिदान, ज्वरदर्पण आदि ग्रन्थ भी इसी काल में लिखे गये। चिकित्सा के विभिन्न प्रारुपों पर भी इस काल में विशेष ध्यान दिया गया, जो कि वर्तमान में भी प्रासंगिक है। इस काल में आयुर्वेद का विस्तार एवं प्रयोग बहुत बड़े पैमाने पर हो रहा है।
स्पष्ट है कि आयुर्वेद की प्राचीनता वेदों के काल से ही सिद्ध है। आधुनिक चिकित्सापद्धति में सामाजिक चिकित्सा पद्धति को एक नई विचारधरा माना जाता है, परन्तु यह कोई नई विचारधारा नहीं अपितु यह उसकी पुनरावृत्ति मात्र है, जिसका उल्लेख 2500 वर्षों से भी पहले आयुर्वेद में किया गया है जिसके सभी सिद्धांतो का प्रत्येक शब्द आज इतने सालों बाद भी अपने सूक्ष्म और स्थूल हर रूप में सही सिद्ध होता है। जैसे कुछ समय पूर्व आधुनिक वैज्ञानिकों ने कृत्रिम नाक बनाए जाने का काम किया है और उन वैज्ञानिकों के अनुसार उनका यह काम सुश्रुत संहिता के मूल सिद्धांतों को पढ़कर और उसपर आगे विस्तृत कार्य करने के बाद ही संभव हो पाया है।
· आयुर्वेद का उद्देश्य ही स्वस्थ प्राणी के स्वास्थ्य की रक्षा तथा रोगी की रोग को दूर करना है -
· प्रयोजनं चास्य स्वस्थस्य स्वास्थ्यरक्षणं आतुरस्यविकारप्रशमनं च ॥ (चरकसंहिता, सूत्रस्थान ३०/२६)
· आयुर्वेद के दो उद्देश्य हैं :
· (१) स्वस्थ व्यक्तियों के स्वास्थ्य की रक्षा करना,
· (२) रोगी (आतुर) व्यक्तियों के विकारों को दूर कर उन्हें स्वस्थ बनाना।
शरीर विवेचना
· समस्त चेष्टाओं, इंद्रियों, मन ओर आत्मा के आधारभूत पंचभौतिक पिंड को 'शरीर' कहते हैं। मानव शरीर के स्थूल रूप में छह अंग हैं; दो हाथ, दो पैर, शिर और ग्रीवा एक तथा अंतराधि (मध्यशरीर) एक। इन अंगों के अवयवों को प्रत्यंग कहते हैं-
· मूर्धा (हेड), ललाट, भ्रू, नासिका, अक्षिकूट (ऑर्बिट), अक्षिगोलक (आइबॉल), वर्त्स (पलक), पक्ष्म (बरुनी), कर्ण (कान), कर्णपुत्रक (ट्रैगस), शष्कुली और पाली (पिन्न एंड लोब ऑव इयर्स), शंख (माथे के पार्श्व, टेंपुल्स), गंड (गाल), ओष्ठ (होंठ), सृक्कणी (मुख के कोने), चिबुक (ठुड्डी), दंतवेष्ट (मसूड़े), जिह्वा (जीभ), तालु, टांसिल्स, गलशुंडिका (युवुला), गोजिह्विका (एपीग्लॉटिस), ग्रीवा (गरदन), अवटुका (लैरिंग्ज़), कंधरा (कंधा), कक्षा (एक्सिला), जत्रु (हंसुली, कालर), वक्ष (थोरेक्स), स्तन, पार्श्व (बगल), उदर (बेली), नाभि, कुक्षि (कोख), बस्तिशिर (ग्रॉयन), पृष्ठ (पीठ), कटि (कमर), श्रोणि (पेल्विस), नितंब, गुदा, शिश्न या भग, वृषण (टेस्टीज़), भुज, कूर्पर (केहुनी), बाहुपिंडिका या अरत्नि (फ़ोरआर्म), मणिबंध (कलाई), हस्त (हथेली), अंगुलियां और अंगुष्ठ, ऊरु (जांघ), जानु (घुटना), जंघा (टांग, लेग), गुल्फ (टखना), प्रपद (फुट), पादांगुलि, अंगुष्ठ और पादतल (तलवा),। इनके अतिरिक्त हृदय, फुफ्फुस (लंग्स), यकृत (लिवर), प्लीहा (स्प्लीन), आमाशय (स्टमक), पित्ताशय (गाल ब्लैडर), वृक्क (गुर्दा, किडनी), वस्ति (यूरिनरी ब्लैडर), क्षुद्रांत (स्मॉल इंटेस्टिन), स्थूलांत्र (लार्ज इंटेस्टिन), वपावहन (मेसेंटेरी), पुरीषाधार, उत्तर और अधरगुद (रेक्टम), ये कोष्ठांग हैं और सिर में सभी इंद्रियों और प्राणों के केंद्रों का आश्रय मस्तिष्क (ब्रेन) है।
इंद्रिय
शरीर में प्रत्येक अंग या किसी भी अवयव का निर्माण उद्देश्यविशेष से ही होता है, अर्थात् प्रत्येक अवयव के द्वारा विशिष्ट कार्यों की सिद्धि होती है, जैसे हाथ से पकड़ना, पैर से चलना, मुख से खाना, दांत से चबाना आदि। कुछ अवयव ऐसे भी हैं जिनसे कई कार्य होते हैं और कुछ ऐसे हैं जिनसे एक विशेष कार्य ही होता है। जिनसे कार्यविशेष ही होता है उनमें उस कार्य के लिए शक्तिसंपन्न एक विशिष्ट सूक्ष्म रचना होती है। इसी को इंद्रिय कहते हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गंध इन बाह्य विषयों का ज्ञान प्राप्त करने के लिए क्रमानुसार कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका ये अवयव इंद्रियाश्रय अवयव (विशेष इंद्रियों के अंग) कहलाते हैं और इनमें स्थित विशिष्ट शक्तिसंपन्न सूक्ष्म वस्तु को इंद्रिय कहते हैं। ये क्रमश: पाँच हैं-
श्रोत्र, त्वक्, चक्षु, रसना और घ्राण।
आत्मा पंचमहाभूत और मन से भिन्न, चेतनावान्, निर्विकार और नित्य है तथा साक्षी स्वरूप है, क्योंकि स्वयं निर्विकार तथा निष्क्रिय है। इसके संपर्क से सक्रिय किंतु अचेतन मन, इंद्रियों और शरीर में चेतना का संचार होता है और वे सचेष्ट होते हैं। आत्मा में रूप, रंग, आकृति आदि कोई चिह्न नहीं है, किंतु उसके बिना शरीर अचेतन होने के कारण निश्चेष्ट पड़ा रहता है और मृत कहलता है तथा उसके संपर्क से ही उसमें चेतना आती है तब उसे जीवित कहा जाता है
चरक ने संक्षेप में रोग और आरोग्य का लक्षण यह लिखा है-
वात, पित्त और कफ इन तीनों दोषों का सम मात्रा (उचित प्रमाण) में होना ही आरोग्य और इनमें विषमता होना ही रोग है।
सुश्रुत ने स्वस्थ व्यक्ति का लक्षण विस्तार से दिया है-
समदोषः समाग्निश्च समधातुमलक्रियः।
प्रसन्नात्मेन्द्रियमनाः स्वस्थ इत्यभिधीयते ॥
जिससे सभी दोष सम मात्रा में हों, अग्नि सम हो, धातु, मल और उनकी क्रियाएं भी सम (उचित रूप में) हों तथा
जिसकी आत्मा, इंद्रिय और मन प्रसन्न (शुद्ध) हों उसे स्वस्थ समझना चाहिए।
औषधियों के बाद भी चिकित्सा का एक बड़ा आयाम पंचकर्म है | आयुर्वेद की पाँच बड़ी उत्क्रिष्ण प्रक्रिया जिससे शरीर मे उत्पन्न होने वाले विष अनियमित असंतुलित वात , पित, कफ को उनके प्रकोप के स्थान के निकट के मार्ग से बाहर निकालने की शास्त्रीय विधि को ही पंचकर्म कहते है।
साथ साथ वहाँ उन बहुमूल्य औषधियों घृत, धातु, रत्नों को डाला जाता है, जिसके कमी से रोगी अकरान्त हुआ हो।
पंचकर्म मुख्यतः दो विशेष बिन्दुओ पर टिका हुआ है।
1. रोकथाम (prevention)
2.समूलनाश (cure)
शरीर और मन के भीतर पल रहे घातक विष शरीर के ही भिन्न भिन्न नस नाड़ियों और अंगो को नेश्त-नाबूत कर देता है, इसलिए शरीर स्वयम ही परिसंचरण विधि से इसे बाहर करते रहता है, या भीतर उत्तको toxins/ फैट के रूप में जमा करता है, तब जब की जमाव का स्तर, एक हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तब जीवनीय और मानशिक रसायनो का संतुलन बिगड़ने लगता है। जिसके फल स्वरूप शारीरिक और मानशिक रोग उत्पन होते है।
· पंचकर्म के तहत इन सारे विषो को कोष्ठ में लाया जाता है l जिसे पूर्व कर्म भी कहा जाता है
· दूसरे चरण में इक्कठे हुए विष द्रव्यों को बड़े परियोजनों से बाहर किया जाता है।
1. वमन (emesis)
2. विरेचन (pargetion)
3. वस्ति (medicated enema)
4. नस्य (nasal medication)
5. रक्त-मोक्षण (Blood letting)
पश्चात कर्म:- अब शरीर को पहले की तरह सामान्य एवं तरोताजा स्थिति मे लाने के लिए, संहिताओ में लिखे भिन्न भिन्न रोगों में भिन्न भिन्न पथ्य-अपथ्य (क्या खाये क्या न खाये) के अनुसार एक निश्चित अवधि तक आहार-विहार पालन कराया जाता है।
फिर धीरे धीरे हल्की छूट देते हुए रुग्णों (मरीजो) को सामान्य आहार विहार एवं सामान्य क्रिया कलाप पे लाया जाता है।
पंचकर्म की थेरेपी पर प्रकाश...
· अभ्यंगम:- इस थेरेपी में उष्ण औषधिये तैल को सम्पूर्ण शरीर मे एक कुशल थैरेपिस्ट के द्वारा कोशिकाओं में प्रविष्ट कराया जाता है, इस औषधीय तैल का चयन शरीर के प्रकृति एवं संगठन के मद्दे नजर होता है। अभ्यंगम शरीर मे फैले हुए विष रूपी दोषो को बहुत ही सामान्य तरिके से बाहर करता है।
· स्वेदनम:- यह एक आयुर्वेदीय एवं हर्वल स्वेद जनन (पसीना लाने वाला) थेरेपी है। जिसमे शरीरगत पड़े हुए जहरीले तत्वों को बहार किया जाता है l
· वस्ति:- यह एक बहुत ही सौम्य आयुर्वेदिक औषधीय एनिमा है। जिसके तहत रोग नासनी द्रव्यों को/योगो को गुद्दा मार्ग (per rectum) तथा मूत्र मार्ग (per vagina) से चढ़ाया जाता है।
· उद्वर्तनम:- एक ऐसा आयुर्वेदिक मसाज जिसमे रुक्ष औषधीय योगो से चर्बी युक्त दोष, कॉलेस्ट्रॉल एवं गाँठो का नाश किया जाता है।
· नस्यम:- नाशिका के छिद्रों के माध्यम से औषधीय तैल योगो को प्रवेश कराकर आँख, नाक, मुह एवं शिरो रोग संबंधित हर मानशिक विमारी का समूल चिकित्सा किया जाता है।
· पीजिच्छील (तैल धरा):- यह एक प्रकार का औषधीय उष्ण तैलों से सम्पूर्ण शरीर complete bed rest की स्थिति में मसाज टेबल पे कराया जाता है/ दिया जाता है।
· कटी बस्ति:- एक ऐसा औषधिय तैल अवगाहन जिसमें कमर दर्द जैसे रोग का सम्पूर्ण इलाज दिया जाता है।
· जानु बस्ति:- इस थेरेपी में संधि वात, जोड़ो में शोथ,/दर्द मज्जा क्षय (loss of synovial fluid) की चिकित्सा घुटनो में औषधीय तैलों को प्रविष्ट करा कर किया जाता है।
· उरो बस्ति (पूर्व कर्म) एक ऐसा rejuvenate procedure है, जिसमे हृदय एवं वक्ष सम्वन्धी हर रोगों एवं अवसाद (depression) का चिकित्सा दिया जाता है।
· शिरो वस्ति :- सम्पूर्ण शिरोरोग, मानसिक ब्याधि,अनिंद्रा का सम्पूर्ण इलाज, शिरो के छिद्रों द्वारा तैल वस्ति करा के पूरा किया जाता है।
पंचकर्म के फायदे
· शरीर को क्षय की स्थिति से उबारना।
· वात - पित - कफ को संतुलन में रखता है।
· रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है।
· शरीर के जीवनीय अंगो को स्वस्थय रखता है।
· शारीरिक एवं मानसिक अवस्था को मजबूत बनाता है।
· रोग देने वाले विषो को बाहर करता है।
· त्वचा के रंग को सुधारता है।
· मेद/वजन को कम करता है।
· वजन को बढ़ाना हो तो, बढ़ाने में भी सहायक है।
· अनिद्रा, चिड़चिड़ापन एवं मानसिक ब्याधि से बचाव।
· यौवन लौटाता है।
· जोड़ो/संधियों को मुलायम बनाता है।
· जीवन को आनंदमय बनता है l