सब्जी मंडी के कारोबार मे उपयोगी यह सोफटवेर निम्न प्रकार के उपयोग मे आ सकता है
1. कमीशन - या आडत.
2. लोडींग ( एक सेन्टर से सब्जी खरीदकर दुसरे सेन्टर पर बेचनेके लिये भेजना )
3. होलसेल सप्लायर ( मंडीसे सब्जी खरीदकर होटल - केटरर - मोल मे भेजना)
- यहा मंडीमे छोटे छोटे किसान अपनी उपज चददर या बोरीयोमे लेकर आते है.
- मंडीमे दिनमें अेक या दो बार कारोबार होता है. खरीदने वाले रीटेल या होलसेल या लोडर होते है.
- खरीदनेवाला अलग अलग किसानो का माल खरीदता है . उसका बील दिनमें अेकबार ही बनाना पडता है.
- अेक किसान का पुरा माल बिक जाये तब उसका बिल तुरंत बनाना पडता है.
- जब दुसरे सेन्टर के किसी लोडर का माल आता है तो 50 -100 बोरी आता है. जो 15-20 रीटेलर खरीदते है.
कभी अैसा माल बिकने मे 2-3 दिन लगते है. लेकीन लोडर को एक ही बील देना पडता है.
- कमीशन कितना लगाना - अलग अलग चीजो पर कमीशन अलग अलग हो सकता है - अलग अलग खरीदने वालो पर ( किसीपर 6% - तो किसीपर 7% )
- किसपर लगाना (बेचनेवालेसे वसुल करना या खरीदनेवालेसे)
--मजदुरी वसुल करना .
कभी माल लाने वाले से
तो कभी खरीदनेवाले से
कभी दोनोसे
- मंडीकर
- राउन्डीग - पुरे बीलकी रकम मे पैसे जोडकर पुरा रुपया करना या करीबी 5रु. 10 रु.
लोकल मार्केट की अन्य दुकानोसे माल खरीदकर उसे अपनी दुकानमें इकट ठा कीया जाता है.
खरीद किये माल की औसत किमत निकालनी पडती है.
गुणवत्ता के आधार पर मालकी छटाई करके बोरी में भर कर बडे सेन्टर में भेजा जाता है.
हलकी गुणवत्ताका माल लोकल मार्केट में बेचा जाता है. इस वजहसे औसत बदल जातीहै.
ये सब कागज या केलक्युलेटर से करना बहुत मुश्कील होता है.
ऐसा तैयार माल अलग अलग सेन्टर पर भेजा जाता है.
एक सेन्टर पर एक से ज्यादा आडती(कमीशन अेजन्ट) को भेजा जाता है.
जबकी भाडा कोई एक कमीशन अेजन्ट चुकाता है जो अपने बीलकी रकम से काटलेता है.
माल की छटाई एवम पेकींग करनेके लिये मजदुरी चुकानी पडती है.
सब्जीका भेजा हुआ वजन और बिक्री हुआ वजन इसमें भी बहुत फरक पडता है.
किसी सीजन में अलग अलग कमीशन अेजन्ट के साथ हुअे व्यापार में कभी फायदा तो कभी घाटा होता है.
पुरी सीजन मे फायदा हुआ या नुकसान ये जान कर अंदाजा लगा सकतेहो
कि किस कमीशन अेजन्ट के साथ व्यापार करना चाहीये.
ये सब बिना कंप्युटर सोफटवेर से करना मुश्कील है.
होलसेल सप्लायर ( मंडीसे सब्जी खरीदकर होटल - केटरर - मोल मे भेजना)