प्रस्तुत गुरु उपदेश सदगुरु श्री श्रीमत परमहंस नारायण तीर्थ देव द्वारा आसामी भाषा में विरचित - मूल विवरणिका का हिंदी अनुवाद है। इस छोटी पुस्तिका का कोई व्यापारिक उद्देश्य नहीं है। श्री गुरु ने मूल कृति में लिखा है की यह गुरु उपदेश उन्होंने अपने शिष्यों के बार बार प्रश्न पूछने और गुरु द्वारा बार बार उत्तर देने से बचने की मंशा से लिखा है। यह विवरणिका सटीक संक्षिप्त लेकिन सार गर्भित है। इसमें प्रस्तुत कुछ विषयों का सही अर्थ काफी समय तक साधना करने के पश्चात ही प्रशस्त होगा।
शांति और सुख का अनुभव या भोग करना हर जीव का प्रत्यक्ष और परोक्ष लक्ष्य रहता है। उस परम सुख को प्राप्त करने के लिए ही योग और भक्ति मार्ग का उद्बोधन हुआ है। पुस्तिका पाठ केवल मार्ग दर्शिका का स्त्रोत हुआ करता है। वास्तविक मार्ग को प्राप्त करने के लिए किसी जीवित गुरु से दीक्षित होना अनिवार्य है। वैसे तो गुरु कोई भी हो सकता है लेकिन इस गुप्त मार्ग / भेद मार्ग को जानने के लिए सदगुरु से दीक्षा लेना ही मुक्ति या शांति प्राप्ति करने के लिए अभीष्ट है। यह ध्रुव सत्य है।
सदगुरु का किसी भी साम्प्रदाय या आधुनिक युग में प्रचलित धर्मों से सम्बन्ध नहीं है। लेकिन सभी धर्मों से उसका गूढ़ सम्बन्ध है। अलग अलग समय व देशान्तर में पैदा हुए सदगुरुओं का ज्ञान ही कालांतर में धर्म साम्प्रदाय का रूप धारण किये है। मूल रूप से सभी धर्म एक है लेकिन दिखते अलग अलग है। सदगुरु किसी भी धर्म में हो सकता है लेकिन यह विषय इतना जटिल है की यथार्थ ज्ञान असत्य व काल्पनिक भासित होता है। इसलिए धार्मिक ग्रन्थ तथ्यहीन व मनगढ़त भासते है। इनकी सत्यता को पूर्ण रूप से समझने के लिए कठिन तप योग व भक्ति करनी पडती है। इसलिए कहा भी गया है की जो जानता है वह बोलता नहीं और जो बोलता है वह जनता नहीं। इसलिए परमात्मा या परम सत्य का रहस्य अधिकतर लोगों के रहस्य ही है। लेकिन आंशिक रूप से एक ही परमसत्ता क्रियाशील होकर संसार का निर्वाह कर रही है। इसलिए परम सत्य को जानने के लिए प्रयत्न करना चाहिए। इस विषय में किसी ने सत्य ही कहा है :
इश्क का खेल है यह जो जितना चाहे खेले।
गर जीत गए तो क्या कहने ,हारे भी तो बाजी मात नहीं।।
ऐसे विचारों को समझ कर अगर कोई चाहे तो इस राह पर चलने की कोशिश कर सकता है। यह भी ध्रुव सत्य है की ऐसी सत्ता निराकार है लेकिन क्रिया के माध्यम से ये कोई भी साकार रूप ले सकती है। सदगुरु में यही सत्ता साकार रूप धारण कर दिग्दर्शित होती है। भक्ति का मार्ग इसी सत्य को जानने का दूसरा नाम है। और परमसत्ता के बारे में शास्त्रों में लिखा भी है :
चिन्नमस्य अद्वितीयस्य निष्कलश्य अशरीरिण।
उपासकानाम कार्यार्थम ब्रम्हणे रूप कल्पना।।
चिन्मय, अद्वितीय, कलशरहित व अशरीरी, निराकार सत्ता की ब्रम्ह के रूप में ब्रम्हा, विष्णु, शिव, रूद्र आदि की उपासको के कार्य सिद्धि (सफलता ) के लिए कल्पना की गई है।
सर्व जन हितैषी
शेष राम ठाकुर पी.एच.डी आनुवांशिकी विज्ञान
कार्यक्रम निदेशक, अर्गवती केंद्र ,पर्वतीय संसाधन एवं जैव प्रोद्योगिका
चौ. स. कु. हि. प्र. कृषि विश्वविद्यालय, पालमपुर जिला, कांगड़ा, हि. प्र - १ ७ ६ ० ६ २
गुरु ब्रम्हा गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात् परम ब्रम्ह तस्मै श्री गुरवे नमः।।
अखण्डमंडलाकार व्याप्त येन चराचरम।
तत्पदं दर्शित येन तस्मै श्री गुरवे नमः।।
गुरु ही ब्रम्हा है, गुरु ही विष्णु है , गुरुदेव ही शिव है। गुरु ही साक्षात् साकार स्वरुप आदि ब्रम्ह है। जिसका रूप अखण्ड है, पूर्ण है, जो हर चर और अचर में व्याप्त है। जो इस सत्य के पद को दिखाते हैं में उन गुरु को नमन करता हूँ।
गांव शालबारी, महकमा धुवरी, जिला गोआलपारा, आसाम में ११ माघ १२९५ (बंगला) {२५ जनवरी १८८९ } को जन्म हुआ। बचपन में नरेन्द्र नाम था। पिताजी का नाम श्री देवेन्द्र नारायण और माताजी का नाम श्रीमती निभया देवी था। पिताजी के देहान्त के बाद परिवार का भार संभाला। बाद में माताजी का और उसके बाद पत्नी का देहान्त हो गया। एक छोटी लड़की पीछे रह गई। बहुत तलाश करने के बाद श्री मुकुन्द गोस्वामी नामक गुरू प्राप्त हुए। काफी साधना करने के बाद आदेश मिला कि किसी गुफा में जायें। दो महिने वहीं व्यतीत करें। धीरे-धीरे सारी खाद्य सामग्री समाप्त हो गई। फल और पौधों पर जीवित रहे। बरसात के दिनों में गुफा से बाहर नहीं आ सके। अंत में महा समाधि में अविर्भूत हुए और जड़ ज्ञान शून्य हुए। तीन महीने तक इसी अवस्था में रहे। तीन महीने के बाद फिर से पृथ्वी का अनुभव हुआ। शरीर दुर्बल था और गुफा से बाहर आना कठिन था। उन्होंने झरने का पानी पिया और धीरे-धीरे पहाड़ से उतर आये। उसके बाद जंगल में एक वृक्ष के नीचे आसन लगाकर बैठे रहे। एक धर्म परायण आदमी उनको देख कर मोहित हुआ और उसने वहीं एक छोटी सी झोपड़ी बना दी। धीरे-धीरे और भी शिष्य बनते चले गये और फिर वहीं चम्पा नदी के किनारे पर बहलपुर में सिद्ध योगआश्रम बना।
महासमाधि : ३० मार्च १९८०
इसी विषय में शास्त्र में लिखा है की तन मन धन और वाणी से जितना हो सके श्री गुरु के आदेश का पालन करने के लिए अपने शरीर को गुरु के चरणों में अर्पण करना ही तन अर्पण करना है। गुरु के अंदर ईश्वर देखने को मन अर्पण कहते है। गुरु की सेवा को प्रत्यक्ष या परोक्ष ईश्वर की सेवा या पूजा इत्यादि समान समझना चाहिए नही तो फल पूरा नहीं मिलेगा। गुरु अगर गृहस्थ या आश्रमी हो तो धन, वस्त्र और पशु इत्यादि गुरु के चरणों में अर्पण करने चाहिए। इसी को धन अर्पण कहते है। गुरु अगर ब्रम्हनिष्ठ हो तो शिष्य से सब कुछ लेकर भी शिष्य को गरीब नहीं बनायेगा। यदि बनाये भी तो उसे सहन करना चाहिए क्योंकि कष्ट के बिना ब्रम्हज्ञान नहीं होता। जिससे अमृत प्राप्त होता है, सदा आनंद का उपभोग होता है और पृथ्वी पर रहते हुए भी अपार्थिव बन जाता है उसे पाना इतना आसान नहीं है। शिष्य के प्राण संसार की नश्वर वस्तुओं में आसक्त होते हैं इसीलिये अपने जीवन को गुरू चरणों में अर्पित करना होगा। सारा धन अर्पण करना इसी का प्रथम अंक है। गुरू अगर सन्यासी हो तो शिष्य को भी सब कुछ त्याग कर सन्यासी बनना पड़ सकता है। बादमे अगर गुरु कहे की दोबारा गृहस्थी बन जाओ तो उसे उस आदेश का भी पालन करना होगा। हर समय गुरु का गुणगान करना ही वाणी अर्पण है। शिष्य जब सब कुछ अर्पण कर देता है तो गुरू का कर्तव्य आरम्भ होता है। पूर्ण शिष्य बनने के लिये गुरू के उपर अपनी सारी जिम्मेदारी छोड़ देनी चाहिये। यह असम्भव काम नहीं है। ब्रहनिष्ठ गुरू शिष्य से सब कुछ लेकर उसको अमृत से वंचित नहीं करेंगे। मन में इसकी आंशका न रखें। गुरू जब किसी को शिष्य बनाते हैं तो जब तक शिष्य मुक्त नहीं होता तब तक गुरू बन्धन में फंसे रहते हैं। गुरू पर यह बहुत भारी दायित्व होता है और इसीलिये गुरू के लिये विश्राम करना कठिन होता है। गुरू क्या देते हैं ।
एकम् एव अक्षरं यः तु गुरुः शिष्यं प्रबोधयेत्।
पृथिव्यां न अस्ति तत् द्रव्यं यत् दत्वा च अनृणी भवेत्।।
- अत्रिसम्हिता
गुरू शिष्य को एक अद्वितीय अक्षरपुरूष में प्रबोधित (जगाते) करते हैं। पृथ्वी में ऐसी कोई चीज नहीं जिसके विनिमय से शिष्य अपने को अऋणी बना सके। गुरू शिष्य को प्राण देते हैं। पिता अपने पुत्र को प्राण देने से कुंठित हो सकते है जबकि गुरु अपने शिष्य के अंदर अपने प्राण फेला देते है। ब्रम्हानन्द अवस्था में इस संसार को किसी चीज की आवश्यकता नहीं होती है और गुरू यही ब्रहानन्द शिष्यों में फैला देते हैं। इसीसे ब्रह्मनिष्ठ गुरू को सबसे अधिक आनन्द होता है। ब्रह्मनिष्ठ गुरू अपने या शिष्यों के सुख नहीं चाहते वे मुक्ति चाहते हैं। मुक्ति के लिये शिष्य की मलिनता, संताप और पाप इत्यादि स्वंय ग्रहण करते हैं और अपनी पवित्रता और पुण्य के उज्वल प्रकाश में शिष्य को खड़ा कर देते है। इसी लिए गुरु का त्याग भी कम नहीं होता है। ईश्वरीय ज्ञान गुरूगम्य हैं। शिव संहिता में लिखा है :
भवेत् वीर्यवती विदया गुरूवक्त्रासमुदभवा ।
अन्यथा फलहीना स्यान्निर्वीर्याप्यतिदुःखदा।
शिव संहिता, तृतीय पटल = ११
अर्थ
गुरू के मुख से सुनी हुई विद्या अवश्य ही बलवती होती है अन्यथा वह निष्पफल और अत्यन्त दुखदायिनी होती है।
तद विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिन।।
श्रीमद भगवद गीत ४-३४
अर्थ
सत्य को जानने के लिए सदगुरु की शरण में जाये, उनकी सेवा करें और विनम्र होकर प्रश्न करें। तब वे तत्वज्ञानी आपको इस ज्ञान का उपदेश करेंगे।
साधना की प्रथम अवस्था में अपना मन स्थिर न रख सके तो चिंतित नहीं होना चाहिये। मन या चित्त स्थिर करना साधना का उद्देश्य है। इसलिए आरम्भ में मन जिस विषय के बारे में विचार कर रहा है भगवद बुद्धि लेकर उसी विषय पर विचार करो। तब देखोगे की मन अपने आप इष्ट पर स्थित हो जाएगा। अगर हम मन को बल पूर्वक और चीज़ों से हटाने की कोशिश करेंगे तो मन की चंचलता में और भी वृद्धि होगी। यदि आरम्भ में ही चित्त स्थिर हो जाये तो साधना की आवश्यकता नहीं रहती।
गुरु द्वारा उद्बोधित शक्ति और गुरू के दिये हुए उपदेश के अनुसार कार्य करते जाओ। उससे मन संपूर्ण रूप से वश में आ जायेगा। तभी असली शान्ति मिलेगी। यह सिद्ध मार्ग योग का सर्वोत्कृष्ट उपाय है। इसे योग-गीता में राज-विद्या या राजयोग कहा गया है।
गुरु की दृष्टी ,स्पर्श या वाक्य द्वारा जो ज्ञान का जन्म होता है उसको हम शाम्भवी दीक्षा कहते हैं। उसी को मंगलमयी दीक्षा कहते है। गुरु की दृष्टि , स्पर्श या वाक्य द्वारा जब शिष्य प्रत्यक्ष अनुभव करता है कि उसको कोई शक्ति लाभ हुआ तो उसे शाम्भवी दीक्षा कहते है।
जो आदमी कृपा करके दर्शन, स्पर्श या शब्द मंत्र द्वारा शिष्य के चित्त में सम-भाव (मंगल मय भाव ) लाये वही गुरु है।
शक्तिपातानुसारेण शिष्योऽनुग्रहमर्हति ।
यत्र शक्तिर्न पतति तत्र सिद्धिर्न जायते ।।
।।१ ४.३८।।— कुलार्णव तन्त्र
शक्ति संचार द्वारा शिष्य गुरू कृपा लाभ करता है। सिद्धि प्राप्त करने के लिए पहले शक्ति संचार बहुत आवश्यक है। इस भेद दीक्षा द्वारा षटचक्रे भेदन सहज होता है। कुलार्णव तंत्र में इसे सिद्धाभिषेक भी कहा गया है। योग शिक्षा उपनिषद में इस साधना को सिद्ध पथ या महायोग नाम से अभेद किया गया है। उपनिषद में इस दीक्षा को योग दीक्षा भी कहा गया है।
स्थितश्च यत्र कुत्रापि मुक्तोऽसौ नात्र संशयः।
भेद दीक्षा प्राप्त करने के बाद छः अवस्थाओं का अनुभव होता है। वे हैं –
१– आनन्द
२– कम्पन
३– उद्भव (हाथ के उपर सारा शरीर उठाना या मेढक की तरह उछलना)
४– घूरना (कमर को केन्द्र करके शरीर के उपर के भाग को घुमाना)
५– निद्रा (क्रिया करने के बाद कुछ क्षणों के लिये निद्रा में निमग्न होना)
६– मूर्छा (कुछ क्षण क्रिया करने के बाद शरीर और मन को एक अचेतन और निष्चल सुखदायक अवस्था में रहना )।
भेद दीक्षा प्राप्त साधक जहाँ भी हो और जिस अवस्था में भी हो वह निश्चित रूप से शरीर और मन के लिहाज से मुक्त होगा। साधना प्राप्ति के बाद इन सभी लक्षणों का अनुभव होना निश्चित नहीं है अथवा जब भी साधना करते हो तो ये सभी प्रकाशित हो ऐसा भी कोई निश्चित नियम नहीं है। शरीर की अवस्था के अनुसार सारे साधकों के अन्दर अपने अपने समय के अनुसार ये सब प्रकाशित होगें। लेकिन भेद दीक्षा प्राप्त साधक जब भी मंत्र ध्यान करेंगे तो शरीर को कम्पन अवश्य अनुभव होगा। यह सारे शास्त्र प्रमाण याद रखते हुए आम लोगों की बातों पर कान न रख कर गुरुशक्ति पर निर्भर करे।
हर एक शिष्य को अपनी क्रिया करनी चाहिये। उससे बहुत कम समय के अन्दर वह अति अदभुत शक्ति का अधिकारी हो सकता है। धीरज और उत्साह साधक के लिये बहुत आवश्यक हैं। इन दोनों के बिना कोई आदमी सिद्धि लाभ नहीं कर सकता।
आरम्भ में साधना के समय शरीर में कम्पन हो सकता है।
बाद में हंसी, रोना या मुँह से विकृत शब्द भी निकल सकता है।
अन्त में आसन मुद्रा प्राणायाम प्रत्याहार इत्यादि अपने आप ही आयत में आ जायेंगे।
तब अपूर्व शान्ति मिलगी।
यह साधना शरीर और मन को ब्रह्म प्राप्ति के लिये तैयार करता है। इसे ब्रह्म प्राप्ति मत समझिये।
जो चाहते हो वो यदि शीघ्र न मिले तो निरूत्साह न हो। मैं यह आसन लगाउंगा, यह मुद्रा लगाउंगा, किसी को पराजित करूंगा, ऐसी कोई भावना मन में नहीं होनी चाहिये।
निष्काम भाव लेकर साधना में लगे रहें।
क्रिया के समय मन में कोई आकांक्षा न रखें।
गुरू शक्ति में अपना लक्ष्य स्थिर रख कर सर्वरूपी भगवान पर आत्म सम्पर्ण पूर्वक योग क्रिया और सारे साधना के काम करें।
गुरू की दी हुई शक्ति से सभी चीजों का अपने आप क्रम से लाभ होगा।
जल्दबाजी से नुकसान होने का डर रहता है।
कई आदमी सोचते है कि अभी तक पद्मासन अवस्था नहीं मिली, प्राणायाम नहीं कर सकता हूँ। कोई ज्योति, देवता या अदभुत चीज नहीं देख रहा हूँ तो आगे क्या मिल जायेगा। इससे गुरू शक्ति का दुरूपयोग होगा। धीरज और उत्साह के साथ हम क्रिया करते रहें तो समय पर सब कुछ प्राप्त होगा। सब कुछ प्रयोजन पर निर्भर करता है। यह जो क्रिया है मोक्ष प्राप्ति का उपाय है और यह ज्ञान मार्ग में पहुँचा देती है। इसलिये शरीर और मन को उपयुक्त बना लेना चाहिये और इसके लिये जो कार्य करने आवश्यक हो वहीं करें। अगर बहुत प्रकार के आसन या मुद्रा इत्यादि की आवश्यकता पड़ेगी तो विविध आसन या मुद्रा अपने आप होगी। बेकार के आसन मुद्रा आदि करना ज्योति या देवदर्शन के लिये हितकर नहीं है। सब को एक ही प्रकार के आसन या मुद्रा की जरूरत नहीं होती है। शिष्य बनने से पहले अपने कर्म इत्यादि के कारण हर एक आदमी के शरीर और मन की अवस्था भिन्न होती है। जिस चीज़ को आप मंगलदायक सोचते हो वह आपके लिए शुभदायक नहीं भी हो सकती है। आपके अन्दर जो कुण्डलिनी शक्ति का विकास होता है वही तुम्हारे लिये सर्वमंगलदात्री है। आपके लिये कौन सी चीज सबसे अधिक शुभकर है वो आपके गुरू ही बता सकते हैं।
बेटा, मैंने तुम लोगों के लिये असीम शक्ति का द्वार खोल दिया है और मेरा कर्तव्य यहीं समाप्त है। अब तुम्हारे अन्दर जो चैतन्य है उसे गुरू मानो और उसी पर भरोसा करो। तुम्हारा चैतन्य तुम्हें लक्ष्य पर पहुँचा देगा। तुम्हारे अन्दर जो अनन्त शक्ति है उसको जगा कर मैं तुम्हारी उत्कर्षता परिपूर्णता लाभ करने का नियमित मात्रा बना। अब तुम इस जगी हुई शक्ति को अपने स्वभाव के अनुसार नियंत्रण में लाकर उन्नति की ओर अग्रसर हो जाओ।
निमित्तम् प्रयोजकम् प्रकृतीनां
वरण भेदस्तु ततः क्षेत्रिकवत्।।
पाँतज्जल योगदर्शन, कैवल्यपाद
योग, गुरूदीक्षा और तपस्या आदि प्रकृति के प्रयोजक नहीं हैं, लेकिन यह सब प्रकृति की गतियों की बाधाओं को तोड़ देते हैं। जैसे किसान अपनी जमीन में पानी लाने के लिये जब प्रतिबंध को तोड़ देता है तो पानी अपने आप ही उसके खेत में आ जाता है। रूकावट दूर होने पर कमी पूर्ण कर देना प्रकृति का स्वभाव है। दीक्षा, योग और तपस्या द्वारा हम प्रकृति के विरूद्ध कुछ नहीं करते हैं, हम इनके द्वारा प्रकृति के गतिपथ की बाधा को तोड़ देते हैं। इस प्रकार हर मनुष्य के अन्दर सब प्रकार की उन्नति की शक्ति निहित है। कई दरवाजों के बन्द होने के कारण इन शक्तियों का विकास नहीं होता है।
सिद्धगुरू सारे प्रतिबंध को हटा देते हैं जिससे उन्नति की शक्ति अपनी स्वाभाविक गति ले लेती है और गंतव्य स्थान पर पहुँचा देती है। इस प्रकार आदमी अपनी छुपी हुई शक्ति का अनुभव कर सकता है। प्रकृति बाधामुक्त होने पर सबको पूर्णता में पहुँचा देती है। ऐसी स्थिति में पापी भी साधु बन जाता है। धर्म के लिये जो कुछ साधन और चेष्टा है वो केवल प्रकृति के प्रतिबंध को हटाना और जन्म के कारण प्राप्त अधिकार के स्वरूप में पूर्णता के द्वार खोल देना मात्रा है। जितनी थोड़ी सी भी क्रिया करोगे उसका फल अक्षय होगा। जो आदमी साधना के द्वारा सुख लाभ चाहते हैं, उनके लिये साधना विडम्बना ही है क्योंकि भोग और साधना एक साथ नहीं रह सकते। इसलिये मोक्ष प्राप्ति के लिये जितना थोड़ा सा भोग आवश्यक है उतना ही भोग करना चाहिए। जिस आदमी के सुख लाभ और भोग प्रधान उद्देश्य है उसका मेरे पास आना बेकार है ।
यह जो क्रिया है इसको आदमी उपलब्ध कर सकता है। इसको लिखकर या बोलकर मैं किसी को नहीं समझा सकता। इसलिये गुरू कृपा से प्राप्त शक्ति में हर समय विश्वास रख कर उत्साह के साथ साधना करो और भगवान से प्रार्थना करो कि भगवान जिससे मेरा मंगल हो वही तुम विधान करो, मैं अपना भला बुरा कुछ नहीं समझता।
प्रत्येक दिन प्रातः और सायं को उत्साह के साथ साधना करो। मध्य रात्रि या ब्रह्म मुहूर्त में उठकर क्रिया करना और भी अच्छा है। किसी दिन समय अतीत हो जाये तो अन्य समय भी क्रिया कर सकते हो लेकिन भर पेट या खाली पेट अर्थात आहार करने के बाद या भूख से कातिर अधीर अवस्था में क्रिया नहीं करनी चाहिये। भूख यदि बहुत अधिक है तो हल्का सा कुछ खाकर साधना में बैठो। शक्ति स्वास्थ्य और अवस्था के अनुसार अल्प या अधिक समय के लिये क्रिया करनी चाहिये। आलस के कारण साधना का समय बेकार ना बितायें लेकिन विशेष किसी कारण से किसी दिन अगर क्रिया न हो सके तो निरूत्साह न हो। साधना में थोड़ा आगे चलने के बाद चलते, हंसते, खाते और सोते समय भी क्रिया कर सकोगे।
निर्जन स्थान में क्रिया या योग साधना करना प्रशस्त है लेकिन आरम्भ में गुरू भाईयों के साथ क्रिया करना ठीक है। उससे अधिक लाभ हो सकता है। आरम्भ में अगर क्रिया करना नहीं आता है तो कीर्तन कर सकते हो। स्तवन (स्तुति),पाठ इत्यादि कर सकते हो या अभीष्ट देवता का नाम या मंत्र मन में जप कर सकते हो। भजन या नाम जप करने से मन में एकाग्रता आती है और इससे क्रिया आरम्भ करना आसान होता है। अन्य लोगों के सामने क्रिया करने से चित्त विक्षेप (चित्त की अस्थिरता) हो सकता है। तुम्हारे शरीर में जो बिजली शक्ति बनती है वह दूसरे आदमी के शरीर में जाकर उसके शरीर की बीमारी तुम्हारे शरीर में ला सकती है। अकेले में क्रिया करने से इस प्रकार की हानि की सम्भावना नहीं रहती। लेकिन आसन् में स्थिरता से बैठकर शरीर के उपर एक चादर लपेट कर ध्यान प्राणायामक करने में कोई बाध नहीं है। कई बार क्रिया किये बिना शान्ति बोध नहीं होता। इस समय और लोगों को छोड़ कर कहीं जाना भी मुश्किल होता है। इस अवस्था में चुपके से उनके सामने ही क्रिया कर लेना कोई बुरा नहीं है।
जब तक मुक्त नहीं होते अपनी चीजों की रक्षा करें। अन्य लोगों को न बताये कि आप कोई क्रिया करते हो या किसी शक्ति के आंशिक अधिकारी हो। इससे नुक्सान होने का डर रहता है। साधना स्थान के समीप आग, पानी, पत्थर या ऐसी कोई चीज जो शरीर को हानि पहुँचाने में सहायक हो न रखें। जिस बिस्तर पर क्रिया करें वो काफी चौड़ा और नरम होना चाहिये। भूमि पर बिस्तर लगाकर क्रिया करना अच्छा है। मजबूरी में अगर चारपाई पर क्रिया करनी पड़े तो ख्याल रखें कि गिर जाने का डर मन में न हो। सोच लो कि यदि तुम गिर जाते हो तो तुम्हें कोई चोट नहीं आयेगी। यदि चोट लग जाये या दर्द हो जाये तो तुम देखोगे कि तुम ऐसी क्रिया कर रहे हो जिस से तुम्हारा दर्द कम हो रहा है। क्रिया के कारण जो दर्द बनती है उसका क्रिया से ही नाश होता है।
साधना के लिये पाँच हाथ लंबी और चौड़ी जगह ठीक करें और उसी जगह पर रोज बिस्तर लगाया करें। अलग कमरे में अगर साधना कर सकते हो तो सबसे अच्छा है।
आरम्भ में जिस प्रकार बैठने में सुविधा हो वैसे ही बैठ कर साधना करनी चाहिये। इस प्रकार बैठने को ही आसान कहते हैं। कष्ट करके सिद्धआसन या पद्मासन में नहीं बैठना चाहिये। समय के साथ ऐसे आसन अपने आप ही लगने आरम्भ हो जायेगें। इसके लिये उत्सुक नहीं होना चाहिये।
आसन में बैठने के बाद गुरूदेव का स्मरण करके प्रणाम करना चाहिये। उसके बाद इष्ट देवता को प्रणाम करके अपना निजी इष्ट मंत्र मन में जप करें या गुरू के आदेश के अनुसार निर्दिष्ट विषय पर ध्यान लगायें। साथ ही साथ योग क्रिया में प्रवृत हो जायें। यह शरीर जैसे की अपना नहीं है, ऐसा भाव लेकर साधना आरम्भ करो। इससे क्रिया का फल अधिक मिलेगा। साधना के समय कोई कुवासना या ईष्या मन में नहीं होनी चाहिये। मन से उन्नत होने की चेष्टा होनी चाहिये और कोई मेरे से ज्यादा उन्नत न हो ऐसा भाव पोषण नहीं करना चाहिये।
विशेष उत्साह के साथ साधना करोगे तो बहुत शीघ्र फल मिलेगा। जिसके अन्दर उत्साह तीव्र होता है उसके लिये सिद्धि समीप होती है। आरम्भ में अनेक संदेह या निराशा हो सकती है लेकिन इसे भूलकर अपना लक्ष्य स्थिर रखना होगा। हो सकता है कोई आदमी आपको बहकाये या मजाक करे परन्तु उस पर ध्यान मत दो। जब तुम एक दो अलौकिक दृश्य देखोगे तब आपका विश्वास गहरा हो जायेगा। सामयिक बीमारी होने पर भी क्रिया बन्द मत करो। बीमारी की अवस्था में क्रिया आने में अधिक समय लगेगा या क्रिया का शारीरिक कर्म ठीक से न होगा। फिर भी ध्यान करने से पता लग जायेगा कि अन्दर क्रिया हो रही है। बाहर से अगर क्रिया न हो तो साधना बन्द करके आलस्य में मत रहो। नियमित साधना में शिथिलता न दिखाओं। यदि विश्वास हो जाये कि क्रिया द्वारा रोग दूर नहीं हो रहा है या साधना में बैठना मुश्किल हो रहा है तो चिकित्सक का आसरा लो। उसकी दवाई और पत्य ले परन्तु गुरू का दिया हुआ साधना हर वक्त अपने मन में जगा के रखें। रोगमुक्त होने पर जोर से साधना आरम्भ करो।
गुरूदेव, गुरू शक्ति, गुरू के दिये हुए मंत्र या देवता में कोई अन्तर नहीं है। इस पर हर वक्त विश्वास करो और निर्भर करो। काम करते समय अपने अन्दर की गुरू शक्ति को याद रखे। मन में ऐसा भाव लायें कि गुरू शक्ति आपके द्वारा सब काम करवा रही है। इसके उपर निर्भर करके चलने से कभी तुम्हें दुःख नहीं मिलेगा। अगर कभी कष्ट आये तो ध्यान से सोचने पर मालूम हो जायेगा कि तुम उस शक्ति को भूल गये थे और इसलिये इतना कष्ट हुआ।
योग दीक्षा लेने के दौरान मन में एक परिवर्तन आता है और उस समय यदि बीमार हो जाए तो निराश न हो। उत्साह हीनता ही नुकसान और अनर्थ का मूल कारण है। आरम्भ में शरीर के अंदर दर्द अनुभव हो सकता है। सिर में भार लग सकता है या सिर चकरा सकता है। पेट ख़राब हो सकता है। यहाँ तक की इच्छा के विरुद्ध रति पात भी हो सकता है। इन लक्षणों से न डरे क्योंकि इन से शरीर का क्लेश दूर होता है। कुछ दिन साधना करने के बाद शरीर में दुबलापन आ सकता है। इनसे भी न डरे क्योंकि यह शुभ लक्षण है। इससे आपके शरीर और मन का बल बढ़ता है।
साधना की प्रथम अवस्था में कई साधकों को कई प्रकार की डरावनी चीजों के दर्शन होते हैं। इनसे डरें ना क्योंकि इनका असली आस्तित्व नहीं होता है। इनको सामयिक योग विघ्न कहते हैं। लेकिन यह अन्त में शुभ होता है। यह प्रबुद्ध जागती कुण्डलिनी की मंगलमयी क्रिया है। साधक के शरीर और मन के अन्दर छुपा हुआ सब संस्कार निकल जाता है और उसके बाद ही साधक पूर्ण स्वच्छता और स्वस्थता को प्राप्त होता है और यही धूर्म है।
आहार की विधि सब के लिये एक सी नहीं होती है। शरीर के धातु और प्रयोजन के अनुसार खाद्य विभिन्न प्रकार का होता है। कोई शरीर वायु प्रधान कोई, कफ प्रधान और कोई पित्त प्रधान होता है और एक ही आदमी ऋतु, काल, कर्म और अवस्था के अनुसार वायु, पित या कफ में रह सकता है। इसलिये एक साधक के लिये जो ठीक है वो दूसरे के लिये अहितकर हो सकता है। यही नहीं एक आदमी का एक समय का हितकर आहर दूसरे समय अहितकर हो सकता है।
किसी शरीर में अगर कफ अधिक हो तो उसके लिये मिर्च, नमक, सरसों इत्यादि अच्छा है। वायु अधिक के लिये खट्टा और लस्सी अच्छी है और पित्त अधिक के लिये कडवा ठीक है। इसलिये किस समय क्या खाना है और किस के लिये क्या ठीक है शरीर के धातु के अनुसार ठीक करना होगा। आम लोगों के लिये यह सब करना आसान नहीं है और ठीक कर भी दे तो उसका प्रबन्ध करना मुश्किल हो जाता है। इसलिये मैं आपको साधारण उपाय बताता हूँ। यदि कोई चीज खाने की इच्छा हो रही है तो अच्छी तरह सोच लो कि वो चीज हितकार है या नहीं। अगर विचार करने के बाद भी इच्छा प्रबल रहती है तो खा लो। हो सकता है उससे शरीर सुस्त रहे। अगर उसका असर खराब हुआ तो समझ जाओगे कि इसको खाना ठीक नहीं है। इससे दोबारा इच्छा शायद ही पैदा हो। अगर मन में अविर्भाव हो भी गया तो उसे जीत सकोगे।
कई बार हमें प्रकृति (प्रवृति) के विरूद्ध कोई चीज खानी पड़ जाती है तो उसे पहले क्रिया द्वारा नष्ट करने की कोशिश करो। उससे फल न मिले तो उसे दवाई द्वारा अवश्य नष्ट करो।
हमारे प्राकृतिक प्रयोजन हम बहुत से समय समझ नहीं सकते हैं और इसलिये शास्त्रकार कुछ नियम बना गये हैं। उसी का अनुसरण करो।
अधिक मिर्च, खट्टा, नमक, कडवा अधिक मीठा और तली हुई चीजें गरिष्ठ मानी जाती है। दही और लस्सी को हम भारी भोजन मानते हैं। पका हुआ कटहल, मीठा कददू शीघ्र नहीं पचता। मसूर की दाल, सरसों और प्याज उत्तेजक खाद्य हैं। घीया या लौकी, खीरा, शराब, गांजा इत्यादि को मादक द्रव्य मानते हैं।
पौष्टिक खाद्य
शाली धन के चावल
जौ का सत्तू
उडद
चना
परवल
कच्चा कटहल
कच्चा केला
अरबी
मूली
बैंगन
सारे साग
खजूर
दूध और
घी
जो खाद्य आसानी से पच जाये वही खाना चाहिये।
गुड, पक्का केला और नारियल पाचन शक्ति देख कर खायें।
खाने के बाद मुख शुद्धि :
खाने के बाद मुख शुद्धि के लिये हरड़ (हरीतकी), लौंग ,बड़ी इलायची, खाली पान (चुना, सुपारी बिना) इस्तेमाल करें।
शाकाहारी या मांसाहारी ?
निरामिश आहार सबसे अच्छा है, लेकिन यदि शरीर के लिए आवश्यकता हो तो कभी कभी मछली खा लो परंतु लोभ के वशीभूत होकर न खायें।
हर समय याद रखें की सात्विक आहार सबसे जल्दी लक्ष तक पोहचा देता है।
आहार कभी अधिक न करें। पेट का आधा भाग खाद्यों से ,एक चौथाई पानी से और एक चौथाई हवा चलने के लिए खाली रखें। अतिरिक्त आहार कभी न करें। आहार के बाद पेट और शरीर का हल्का लगना और शरीर में काम करने की इच्छा होना आवश्यक है।
शरीर को अगर आवश्यकता हो तो पुनः-पुनः आहार कर सकते हो लेकिन ज्यादा खाकर पेट को भार से आक्रान्त और शरीर को कम के अनुपयोगी मत बनाओं। खाने के बाद काफी पानी पीना चाहिये और बाद में भी पेट में खाली जगह रहनी चाहिये। कई लोग परिमित पानी नहीं पीते हैं और इससे कब्ज हो सकती है। याद रखें प्राण धारण के लिये आहार है, आहार के लिये प्राण धारण नहीं। साधक के लिये अतिरिक्त आहार बहुत खराब है। इससे योग विघ्न होता है और बीमार भी होते हैं।
निमंत्रण खाना छोड़ देना ही अच्छा है। सामाजिक नियम की रक्षा के लिये कहीं खाना पड़े, तो खा लो लेकिन लोभ के वशीभूत होकर न खाओ। एक बात और याद रखें कि निर्जन खाना सात्विक है, बहुतों के साथ खाना राजसिक है और बहुत से आदमी जो नहीं खा रहे हों, के सामने आहार करना तामसिक है।
एकादशी या किसी व्रत के दिन न खाने से धर्म होगा ऐसा विश्वास करके शरीर को कष्ट देकर अनाहार में न रहें। अनाहार में यदि कष्ट न हो और उसकी आवश्यकता हो तो उपवास कर सकते हो। कष्ट करके और शरीर को हानि पहुँचाकर उपवास करने का कोई लाभ नहीं है। जीवात्मा और परमात्मा एक दूसरे के पास ही रहते हैं। इसी का ध्यान पूजा और उपासना करना वास्तव में उपवास के समान है। शरीर और स्वास्थ्य के लिये आवश्यक हो तो जरूर अनशन करें। कई बार बीमारी निरोध के लिए भी अनशन अच्छा होता है। एक बात और याद रखें की कमजोर शरीर से उपासना ठीक नहीं होती। इसी को ध्यान में रख कर अनशन करें। व्रत के दिन अगर पेट को विश्राम देना चाहते हो तो चावल, रोटी इत्यादि छोड़ कर हलका सा कुछ खा लें । दिन और रात को केवल एक बार भोजन करना भी ठीक नहीं है परन्तु इसका यह अर्थ नहीं है कि भूख न हो तो भी दो बार ही खाओ।
जब खाने बैठो तो देखो कि दक्षिण नासा द्वार से सॉस प्रवाह अधिक है या नहीं। अगर खाने से पहले वाम नासा प्रवाह अधिक है तो बाई और की बुखिया में तकिया लेकर लेट जाये या बैठे। इससे दक्षिण नासिका में सॉस अधिक हो जायेगा। अगर यह साँस प्रवाह आपके लिये आम बात है तो खाने के लिये बैठने का एक नियमित तरीका अपना लें। बायें घुटने को बाई बखिया के अन्दर रख कर खाने बैठ जाये। ऐसे नियमित बैठने से लाभ होगा।
खाने के बाद सुखासन में बैठ कर पेट के उपर अपना हाथ फेरें और सोचे कि पेट की भूख अब समाप्त हो गई है और जो कुछ खाया है अब वह पच रहा है।
हर समय लौकिक सदाचार का पालन करों। आहार के सबंध में शास्त्रोक्त विधि और निषेध माने और आम लौकिक नियम मान कर चलें।
योगी अपनी साधना के फलस्वरूप त्रिकालज्ञ है, इतना समर्थ है कि समुद्र तक लांघ सकता है फिर भी उसे लौकिक आचार का उल्लंघन नहीं करना चाहिये। ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने से पहले हम अगर लौकिक आचार त्याग करते हैं तो हमारी हालत बिना पत्ते के पेड़ जैसी होती है। गुरु शक्ति मिलने के बाद आप मुक्ति मार्ग पहुँचे हो लेकिन मुक्त होने के लिए काफी समय लगेगा।
गुरू शक्ति मिलने के बाद अपने आपको निष्क्रिय न बनाये। आपके कर्म दो प्रकार के है - उपासना या साधना कर्म और पारिवारिक कर्म। संध्या, उपासना और योग साधना प्रथम प्रकार के कर्म हैं। शास्त्र का अनुसरण करना, सदाचार करना और पारिवारिक कर्तव्य करना दूसरी प्रकार के कर्म हैं। पारिवारिक कर्म ऐसा सोच कर सम्पन्न करें कि यह सब गुरू शक्ति करा रही है।
कर्मफल की वासना छोड़ कर जो कर्तव्य बोध से कर्म करता है वही सन्यासी है वही योगी है। वेदोक्त अग्निहोत्र आदि नित्य कर्म करने या पारिवारिक कर्म त्याग देने से कोई सन्यासी या योगी नहीं होता है। सब लोगों द्वारा कर्म त्याग करना भगवान की इच्छा के विरूद्ध है क्योंकि सारे लोग अगर सन्यासी बन गये तो भगवान की लीला कहाँ रहेगी। निष्ठा और आंतरिकता के साथ सारे कर्म करने से एक विशेष शिक्षा मिलती है। इसलिये कर्म का त्याग नहीं करना चाहिये। योगी यज्ञवल्क्य ने गार्गी को कहा था कि ब्रह्मवीत के लिये रोज के कर्मानुष्ठान करना उसका कर्तव्य है। जो योगी योग साधना की अवस्था में यह सोच कर कि किसी काम के करने से दुखः होगा काम नहीं करता उसे नरक में भी स्थान नहीं मिलता। देह धारण के बाद कोई कर्मत्याग नहीं कर सकता। इसलिये मृत्यु तक सबको वैद्य कर्म करने चाहिये। हे गार्गी तुम भी बाकी काम त्याग कर वैध काम में रत रहो एंव योग द्वारा परमात्मा से युक्त होकर इस शरीर का त्याग करो।
पहले मैंने आहार विधि में कहा है कि हर समय सदाचार का पालन करो। कर्म विधान में भी इसका ध्यान रखें।
इसलिये रोज की उपासना, पूजा अर्चना, श्राद्ध, तर्पण और रोज का काम नियम से करो।
मल मूत्र त्याग करने के बाद हाथ पैर धो लो। इससे शरीर भी ठीक रहेगा और मन भी प्रसन्न रहेगा।
योग क्रिया गृहस्थ के लिए विशेष प्रशस्त, उत्तम और उपयोगी है।
घर में रहकर उपयुक्त भोजन लेकर योग क्रिया करना बहुत ही अछा है।
सन्यासी बनकर रास्ते में घूमते हुए भिक्षा इकट्ठा करके या जंगल में फल कंदमूल इत्यादि का आहार करना और फिर योग साधना करना दुःसाध्य है।
योगनुष्ठान के लिये जिन-जिन चीज की आवश्यकता होती है वो भी गृहों के लिए इकट्टा करना आसान है।
परिवार हमारे ज्ञान में पूर्णता लाने में शिक्षागार है।
लेकिन याद रखे की पद्मपत्र के ऊपर पानी जैसे रहता है वैसे ही अनासक्त और ममताविहीन होकर परिवार में रहें।
और इसके ज्ञान से योग साधना अधिक जोर से करे।
शिव संहिता में कहा गया है की क्रिया करने से ही सिद्धि लाभ होता है। क्रिया नहीं करे तो सिद्धि कैसे मिले इसलिए विधान अनुसार क्रिया करना योगी का कर्त्तव्य है।
जो गृही सबके अंदर रहकर भी जो कुछ मिले उसी से संतुष्ट रहकर योग साधना करते है वो बहुत शीघ्र मुक्ति पाते है।
योग क्रिया करने वाले गृहस्थ साधक, इसलिए केवल ईश्वर चिंतन द्वारा भी सिद्धि प्राप्त कर सकते है।
अतः गृहस्थ को भी योग साधना में लगना चाहिए।
घर में सबके द्वारा घिरे हुए भी, अन्दर से इनके प्रति आसक्ति त्याग कर योग मार्ग में रत रहो।
बाद में वही साधक शिव का कहा हुआ साधन करके सिद्धि के चिन्ह देखता हुआ सिद्धि प्राप्त करता है और उसके बाद एक और ही किस्म के आनन्द का अनुभव करता है।
छात्र अवस्था में जब यह साधना करें तो पढ़ाई का विशेष ध्यान रखें।
उस समय शरीर और मन का मैल दूर करने के लिए और शक्ति वृद्धि के लिये योग साधना करें।
धर्म के तत्व अनुसन्धान के लिये अधिक समय न लगाये।
छोटे बच्चों की तरह सरल व्यवहार करो। आम आदमी आपको मूर्ख कहेगा परन्तु आप उस पर ध्यान न देकर अपने आत्मविश्वास में मस्त रहें।
याद रखो पारिवारिक आदमियों से आपका उद्देश्य भिन्न है।
इसलिये परिवार के क्षेत्र में आपको कई बार लज्जित होना भी पड़ सकता है।
इस लज्जा, अपमान और दु:ख को मन में न लगायें।
गुरू शक्ति मिलने से ही अपने आप को कृतार्थ न समझे। घमण्ड पतन का मूल कारण है। तुम्हारा उद्देश्य होगा आम आदमियों का हित करना और अपने आप ब्रह्म पात्र होना।
योग्न साधना के द्वारा तुम्हारे अन्दर आश्चर्यजनक शक्ति जन्म लेगी लेकिन उसमें आसक्त होकर लक्ष्य भ्रष्ट न हो। योगसिद्ध आदमी बहुत दूर की आवाज़ सुन सकता है और बहुत दूर की चीजें देखने की क्षमता रखता है या अर्जन कर सकता है। थोड़े से समय में बहुत दूर तक जा सकता है। वाकसिद्धि लाभ भी कर सकता है अर्थात जिसे जो कहोगे वहीं सफल होगा। अपनी इच्छा के अनुसार बहुत से रूप धारण कर सकता है। बहुत लोगों के अन्दर रहकर भी अपने शरीर को अद्रुश्य कर सकता है परन्तु बुद्धिमान योगी हर समय आत्म योगसिद्धि के लिये चिंतित रहते हैं। उपयुक्त विभूति सिद्धि जिसे पर-शान्ति लाभ रूप भी कहते हैं महासिद्धि या मुक्ति के लिये प्रतिबन्धक हैं। इसलिये बुद्धिमान साधक उपयुक्त क्षमतायें न उपयोग करते हैं, न उसमें अपनी आसक्ति दिखाते हैं। पातंज्जल योग दर्शन में लिखा है:
पतंजलि योग सूत्र। साधनापाद ३-५१
इन सब सिद्धियों को भी त्याग देने से दोष का बीज नष्ट हो जाता है और उससे कैवल्य की प्राप्ति हो जाती है। -
विभूति सिद्धि की यही सार्थकता है की इन्हें ब्रम्हाप्रप्ति की पौड़ियाँ समझकर योगी अपने साधना विश्वास में और पक्का हो जाता है।
कम से कम तीन साल नियमित रूप से साधना करके काफी शक्ति अर्जित करने के बाद किसी और का रोग दूर करने के लिए या गुरु बनके अपने शिष्य की कुण्डलिनी शक्ति जागृत करने की कोशिश करो। इससे कम नहीं अन्यथा अपनी शक्ति क्षय होगी और जिसपर तुम शक्ति प्रयोग कर रहे हो उसका भी कोई विशेष लाभ नही होगा। पहली बार ऐसी शक्ति प्रयोग करने से पहले अपने गुरूदेव की अनुमति लेनी चाहिये। गुरू की अनुमति के बिना ऐसा काम न करें।
मन में निराशा आ जाये तो गुरू के दिये हुए मंत्र या अपने लक्ष्य का एकाग्रचित हो कर ध्यान करों और उसके बाद योग क्रिया में प्रवृत हो जाओ। तभी यह मन की अवस्था दूर होगी। वही आदमी आदर्श पुरूष है जो योग साधना, ईश्वर आराधना और संसार का सारा काम अनासक्त भाव से करता है।
उत्साह के साथ निर्लिप्त होकर सारा काम करो तो इससे भी काफी शान्ति प्राप्त करोगे।
अवसर समय में गुरूगीता, योग शास्त्र, रामायण, महाभारत, श्रीमद्भागवदगीता, श्रीमदभगवत, योग वशिष्ट, पातजलि योग दर्शन, उपनिषद इत्यादि सद्ग्रंथ अपनी उन्नति के अनुसार एक के बाद एक पढ़ते जाओ। जब तुम यह अनुभव करोगे कि इन किताबों में लिखा तुम्हारी स्वाभाविक योग क्रिया के साथ मिल जाता है तो तुम्हें बहुत उत्साह मिलेगा और अपने लक्ष्य की ओर शीघ्रता से बढ़ोगे। लेकिन तुम्हारे साधना में जो क्रिया स्वाभाविक ढंग से आये वही करना। अगर स्वाभाविक भाव से क्रिया नहीं आती है तो किसी किताब के अनुसार कृत्रिम कभी न करें।
१. योगकर्म कर रहा हूँ और इससे अवश्य फल मिलेगा इस विश्वास से ही सिद्धि संभव है और यह विश्वास ही योगसिद्धि का लक्षण है।
२. दूसरा लक्षण श्री है अर्थात् गुरू, वेदान्त और शास्त्र में विश्वास।
३. तृतीय लक्षण है गुरू पूजा अर्थात गुरू के प्रति एकनिष्ठ होना, गुरू सेवा ,गुरू के आदेश पालन इत्यादि।
४. चतुर्थ लक्षण है समताभाव अर्थात किसी के प्रति घृणा या द्वेष का भाव न रखना।
५. पचम लक्षण विजय अर्थात पंचेन्द्रिय समूह का नाश न करके अपने वश में रखना।
६. शठ लक्षण है परिमित भोजन।
इसके अतिरिक्त ओज सिद्धि का सातवा लक्षण नहीं है।
अब यम-नियम आदि योगाङ्ग समूह की बात बताता हूँ। यम, नियम, आसन ,प्राणायाम , प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि योग के आठ अंग हैं। इनमें से तुम्हें यम और नियम
पालन करने के लिये यथासाध्य कोशिश करनी पड़ेगी। अन्य सारे अंग साधना के समय तुम्हारे शरीर और मन में अपने आप ही आयेंगें। साधना क्रिया के फलस्वरूप बाद में यम और नियम भी तुम्हारे लिये सहज साध्य बन जायेगें।
अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह पांच यम कहलाते हैं।
मन, वाणी और शरीर से किसी प्राणी को किसी प्रकार का बिना कारण कष्ट देना हिंसा की प्रवृति है। इसके अभाव को ही अहिंसा कहते हैं। देखो साधना में जब उन्नति करोगे तब हिंसा की प्रवृति मन में नहीं आयेगी।
जोकि असली घटना उसे वैसे ही बताने को सत्य कहते हैं। इस बात का ध्यान रखें कि कभी आपके सत्य बोलने से न्यायपक्ष को नुकसान पहुँचे तो चुप रहें, लेकिन झूठ बोलने का विधान कहीं नहीं है। यथार्थ कथन को ही सत्य कहते हैं।
किसी की चीज अन्याय के साथ बिना अनुमति लेने को स्तेय कहते हैं। ऐसा न करने को अस्तेय कहते हैं। चोरी से या बलपूर्वक दूसरे की चीज को न लेने को ही अस्तेय कहते हैं।
वीर्य रक्षा का नाम ब्रह्मचर्य है। ब्रह्मचर्य पालन करने के लिये मन में काम भाव लेकर किसी स्त्री को देखना, स्पर्श करना, बातचीत करना, गुणगान करना या स्मरण करना निषेध है। स्त्री का सहवास भी छोडना चाहिये। लेकिन ग्रहस्तो के लिये शास्त्रोक्त विद्धि के अनुसार अपनी स्त्री का सहवास करना और लालचहीनता के साथ देखना ब्रह्मचर्य के लिए हानिकारक नहीं है। स्वभार्या के साथ ऋतुकाल, शास्त्रविधान के अनुसार संगम करने पर भी गृहस्थ आश्रमी ब्रह्मचर्य का पालन करता है। इसलिए इस विषय में शास्त्र विधि की जानकारी करें।
किसी प्रकार का दान न लेने को अपरिग्रह कहते हैं। अस्तेय और अपरिग्रह दोनों का अर्थ है -लोभ का त्याग करना। लेकिन अपने ग्रास और आच्छादन के लिये (अपने खाने और तन ढ़कने के लिये) या परोपकार के लिये अर्थ ग्रहण करने में कोई दोष नहीं है। परंतु यह लोभ के कारन न हो। किसी से उपकार मिलने के बाद किसी प्रकार उसका प्रति उपकार करना चाहिए। अगर किसी साधक के पास प्रति उपकार की शक्ति नहीं है तो वो साधक किसी से उपकार न ले। किसी से कुछ लेने से ह्रदय अपवित्र होता है।
शौच, संतोष, तप स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान पांच नियम हैं।
जल मतिका आदि के द्वारा शरीर, वस्त्र और मकान आदि के मल को दूर करना। शास्त्र के अनुसार सात्विक आहार करना, मन में शुद्ध भाव रखना शौच के अंतगर्त है।
प्रारब्ध के अनुसार अपने आप जो कुछ प्राप्त हो एवं जिस अवस्था और परिस्थिति में रहने का संयोग प्राप्त हो उसी में संतुष्ट रहना संतोष है।
देव, द्विज, ब्राहमण, गुरू और ज्ञानी व्यक्ति का सम्मान करना, प्रिय और हितकर सत्य वाक्य बोलना, मन को आनन्दित और नम्र रखना ,बुरी बातों की चिन्ता न करना, मन को संयम में रखना और आलस्य रहित होकर साधना करने को तप कहते हैं।
धर्म, ग्रन्थ, पाठ, इष्ट मंत्र या प्रणव जप करने को स्वाध्याय कहते हैं।
सब विषय में भगवान पर निर्भर करने और भक्ति के साथ ईश्वर उपासना करने को ईश्वर प्राणिधन कहते है।
यम नियम इत्यादि सारे योगांग साधना के समय एक दूसरे से अपेक्षा करते हैं। साधना में सिद्धि लाभ होने से यम नियम इत्यादि योगंग समूह पूर्णता प्राप्त करते हैं लेकिन साधना के साथ साथ जितना हो सके, इन सबका अभ्यास करना चाहिये। इससे साधना का फल शीघ्र मिलता है।
सबकी सुविधा के लिए शिव संहिता के पंचम पटल के सारे श्लोकों का अर्थ दिया गया है। श्री देवी ईशान से कह रही है- “ हे शंकर, मेरे पर यदि तुमको प्रीति हो तो परमार्थ ज्ञान के संबध में मनुष्यों के सामने जो विघ्न उपस्थित होते हैं मुझे बताईये”। ईश्वर कहते हैं- “हे देवी, मोक्ष प्राप्ति के मार्ग में मनुष्यों के जीवन में जो विघ्न आते हैं, उनका मैं वर्णन करता हूँ, स्मरण कीजिये। इन सारे विघ्नों में संभोग मुक्ति के रास्ते में सबसे बड़ा कांटा है”।
नारी संभोग, उत्तम बिस्तर, मनोरम आसन, रमणीय वस्त्र और धन संचय मुक्ति के पथ में
विघ्न हैं। ताम्बूल पान, यान, राजत्व (राजा का भाव या पद), ऐश्वर्य, प्रभुत्व, विभूति, समूह, स्वर्ण, चान्दी, ताम्र, रत्न, अगरू, सुगन्धित द्रव्य, गौ, सम्पति, पांडित्य प्रदर्शन, वेद आदि शास्त्रों का व्याख्यान करना, सभी कर्मकाण्ड, नृत्य, गीत, वंशी, वीणा आदि संगीत, अलंकार, श्रृंगार में अति आसक्ति, हाथी, घोड़े आदि वाहन, स्त्री, पुत्र, परिवार एंव विषय कार्य सभी मुक्ति के लिये भोगरूपी विघ्न कहे जाते हैं।
प्रातः स्नान, वेद विहित स्नान ,अधिक पूजा ,अतिथि सेवा, होम, तिथिकृत व्रतं, शोकमयी स्थिति, ध्मार्थं धन प्रदर्शन, उपवास, नियम धारण, मौन, इन्द्रिय नाश, स्थूल ध्यान, हर समय मंत्रोचारण, हर समय दान करने में आसक्ति, चारों ओर ख्याति, बावडी, कूप, तालाब, उद्यान आदि का निर्माण, यज्ञ, चन्द्रापन व्रत, क्लिश्ट साध्न, तीर्थ, पर्यटन एंव देवताओं या धर्मिक जायदाद की देखभाल धर्मरूपी विघ्न दिखाई देते हैं।
शिवजी कहते हैं कि हे श्रेष्ठ मुखवाली पार्वती, अब मैं ज्ञानरूपी विघ्न कहता हूँ। गोमुख इत्यादि आसन करके धौति यौन द्वारा नाड़ी परीक्षा, नाड़ी संचार, विज्ञान प्राप्त करना, प्रत्याहार साधना के उददेश्य से सभी इन्द्रिययों को बलपूर्वक बंद करना, लोहे की श्रृंखला द्वारा उपस्थ बांधना या कांटों द्वारा आख छेदना, उपस्थ से दूध पीना और कैवल्य नाड़ी का शोधन करना सब ज्ञानरूपी विघ्न कहे जाते है।
जिव्हा के सुख के लिये बहुत सी स्वादिष्ट चीजों को खाना भोजन रूपी विघ्न है। जिससे शरीर पीड़ा आक्रान्त और मन भी आक्रान्त हो जाता है।
योग विघ्न के सबन्ध में पांतजल योग सूत्र में रोग, मानसिक जड़ता, संशय, अनबंधनता (साधना में मन न लगना), आलस्य, अविरती (हर समय बहुत सी चीजों में चित), विनियोग, मिथ्या दर्शन, ( सत् को असत् और असत् को सत् अनुभव करना), एक अवस्था पाने के बाद उससे पतित होना, अपने रहने का डेरा बार-बार बदलना, चित के विक्षेप कहे जाते हैं।
यह सब विघ्न योग की प्रथम अवस्था में साधक के सामने खड़े हो जाते हैं। इनसे निराश न होकर साधना में मग्न होने से ये सारे विघ्न धीरे-धीरे समाप्त हो जायेंगे। इन सभी विघ्नों के आने के भी अनेक रहस्य हैं। साधना में कुछ अग्रसर होने पर यह रहस्य तुम समझ सकोगे। तब तुम देखोगे कि जो तुम्हारा अंतराय था उसी ने तुम्हारा उद्धार किया है। यह भी याद रखें कि कुछ क्रिया होने पर और न हो या काफी देर के बाद उस क्रिया का अर्विभाव हो तो यह न सोचे कि तुम अधोपतित हो गये हो।
तुम्हारे शरीर और मन के गठन अनुसार जब जिस क्रिया की आवश्यकता होगी तुम्हारा अंतर-गुरु उसी का विकास करेगा। तुम्हारे लिए यह आवश्यक की यह जाने कि क्रिया से मुझे शांति मिल रही है या नहीं। शांति का अभाव हो तो सावधान रहे। जब सब समय के लिये शांतिहारा बन जाओ ,तब समझ लेना कि तुम्हारा अधोपतन हो गया।
मैं गुरू शक्ति पाकर कृतार्थ हो गया ऐसा भाव पोषण करना भी एक विघ्न है। निर्मल शान्ति प्राप्त करने से पहले कृतार्थ नहीं हो सकते।
नियमित रूप से प्रातः स्नान न करें लेकिन कोई विशेष कार्य हो तो कर लो।
किसी के अनुरोध पर अनिच्छा से या यश की प्रत्याशा में नृत्य, गीत, वाद्य वादन इत्यादि न करें।
जब स्वाभाविक रूप से गाने की या वाद्य बजाने की इच्छा होती है तभी विधेय है परन्तु हमेशा इसी में मस्त न रहें।
कभी भी अश्लील या कलुचित भावपूर्ण नृत्य, गान इत्यादि में योगदान न करें।
अपना कर्तव्य कार्य अच्छे ढंग से समाप्त करें।
बहुत प्रकार के आसन मुद्रा और साधना करने की इच्छा ठीक नहीं है। ये योग विघ्न लाते हैं।
स्त्री संगम शास्त्र के अनुसार करें लेकिन जितना कम हो उतना ही अच्छा। शिव संहिता में उक्त कथित है -
बिन्दुपात मृत्यु का कारण है और बिन्दु धारण ही जीवन रक्षा का कारण उपाय है। इसलिये बिन्दु या शुक्र धारण के लिये सब प्रयत्न करना कर्तव्य है।
रति का सारांश बिंदु है और मैथुन से इसका नाश होता है। बिन्दुक्षय से तन और मन निस्तेज होते हैं। गृहस्थ के लिए शास्त्र के अनुसार स्त्री-गमन अधिक अनिष्टकार नहीं है। मैथुन के सम्बन्ध में कहता हूँ कि साधना द्वारा अपने अंदर के जीवात्मा और परमात्मा का मैथुन कर दें तो आत्म रति लाभ होता है। जिससे बहार के स्त्री और पुरुष के संगम रूप मैथुन में अपने आप स्पृहा नहीं रहती। उस स्थिति में स्त्री और पुरुष का मैथुन अत्यंत तुच्छ और असार मालूम होता है। परंतु ऐसा आत्मरति लाभ होने तक अगर अपनी इच्छा दमन नहीं कर सकते हो तो शास्त्र के अनुसार स्त्रीगमन कर सकते हो। इससे कोई बाधा नहीं है लेकिन याद रखो धीरे-धीरे इसके त्याग के लिए सचेष्ठ रहना होगा। बहुत अधिक मैथुन या परदार (पर स्त्री गमन) कभी न करें।
अतिरिक्त परिश्रम, बेकार घूमना और अतिरिक्त बोलना ठीक नहीं है। आवश्यकता न हो तो बोलना ही नहीं चाहिए। अधिक अग्नि सेवन न करें लेकिन ठंड के समय प्रयोजन के अनुसार अग्नि सेवन में कोई दोष नहीं है। जिनको अपना भोजन अपने आप बनाना पड़ता है उनको ध्यान रखना चाहिये कि उनके शरीर में ताप अधिक न लगे।
वेग आने पर मल त्याग कर लेना चाहिये अन्यथा इसके वेग को रोकने से बवासीर जैसी बीमारी होने की संभावना होती है। मूल शोधन का यदि अभ्यास हो तो नाखून छोटे रखने चाहिये। नही तो नासूर होने का डर रहता है।
व्याधि उपस्थित होने पर क्रिया के समय मन में ऐसा भाव लायें कि क्रिया द्वारा व्याधि निश्चय ही दूर होगी। ऐसी भावना से क्रिया करने पर, क्रिया अपने आप ही ऐसा रूप लेगी जिससे बीमारी ठीक हो जायेगी। जब भी कोई विघ्न खड़ा हो तो गुरू शक्ति का स्मरण करें। हो सके तो निर्जन स्थान पर जाकर उच्च स्वर के साथ काफी समय तक प्रणव जप करें। परन्तु जब तक साधना के द्वारा अपना प्रणव अपने आप ही प्राप्त नहीं करोगे तब तक प्रणव जप की जगह अभीष्ट मंत्र में जप करना या नाम संकीर्तन करना चाहिये।
साधु संग रखना और दुर्जन संग त्याग करना, सांस जब आये और बाहर जाये दोनों समय गुरू शक्ति को याद रखे और गुरू के दिखाये हुए लक्ष्य में मन रखें। जो आदमी पिंडस्थ देहस्थ हैं और रूप के आधार हैं, जो आदमी रूप में अवस्थान करते हैं लेकिन रूपहीन हैं वही ब्रह्म हैं। इस अवस्था में सचेत हो जाना ही मरणावस्था या समाधि है। इससे हृदय प्रशान्त होता है। यही है गुरू का प्रदर्शित लक्ष्य।
योगियों के लिये लंगोट या कौपीन पहनना आवश्यक है। कम से कम साधना के समय इसे अवश्य पहने या कपडा कस के बैठे। गृहस्थ अथवा अन्य साधक जिसका इच्छाकृत या अनिच्छाकृत रति स्खलन बन्द नहीं हुआ है गेरुआ वस्त्र पहनने का अधिकारी नहीं है। किसी का बिस्तर या कपड़ा न बरते। अकेले एक बिस्तर में सोये। मजबूरी में सतगुणधारी व्यक्ति के साथ सो सकते हैं। अपना अंगोछा और तौलिया न किसी को दें न किसी का लें।
सच बोले। इससे आपको वाक् सिद्धि प्राप्त होगी। अर्थात जो बोलोगे वही सत्य हो जायेगा। जिस उद्देश्य से कोई काम करोगे वही पूरा होगा। पतंजलि योगसूत्र में लिखा है कि सत्प्रतिष्ठा होने से आदमी क्रियाफल का आश्रय लेता है। झूठ बोलना या कपट व्यवहार करना साधना में विघ्न लायेगा। अन्त में हो सकता है कि तुम योग भ्रष्ट होकर गुरूदेव की निन्दा करो। सत्य व्यवहार से आरम्भ में तुम्हें नुकसान हो सकता है लेकिन इस नुकसान का फल आपके लिये अच्छा होगा और तुम यह अनुभव करोगे कि इष्टप्रद शास्त्र वाक्य सत्य अभ्रान्त है। कभी भी न सोचे कि सत्य कहकर तुम सब कुछ खो दोगे और कष्ट पाओगे। ईश्वर सत्य के स्वरूप है। यह स्मरण रखने से तुम्हारा कोई अनिष्ट नहीं हो सकता।
योग साधना के जितने नियम बताये गये हैं उनके अनुसार अगर क्रिया करोगे तो फल शीघ्र मिलेगा। नियम के अनुसार क्रिया नहीं करोगे तो बीमारी में पड़ोगे। दोबारा नियम पालन के साथ योग क्रिया से बीमारी दूर होगी। इसलिये बीमारी आने और हटाने में जो समय नष्ट होगा उससे लक्ष्य पर पहुँचने के लिये अधिक समय लगेगा। अनाहार, अग्नि, सैक्स, मैथुन इत्यादि के सम्बन्ध में सभी नियमों का ध्यान से पालन करें। इनके अधिक करने पर योग साधना में लाभ तो क्या होगा अपितु भारी बीमारी और भीषण चित विक्षेप जन्म ले सकते हैं इसलिये जो परम शान्ति का अधिकारी होना चाहता है, उसे चाहिये कि योग साधना की रक्षा और योग साधना के नियमों का पालन करें। यदि किसी कारण अधिक अग्नि सेवा या अनाहार करना पड़ता है तो उस समय योग साधना स्थगित रखें या सामान्य अभ्यास करें। दोबारा मौका आने पर उत्साह के साथ साधना करते रहें। इससे कुछ समय नष्ट होगा फिर भी कम होगा। कम से कम रोग दूर करने का समय बच जायेगा।
चिर शान्ति एंव ज्ञान आपके जीवन का लक्ष्य है। इसलिये आपको उनके पास रहना चाहिये जिनकी सहायता से आपके अंदर इन चीजों की वृद्धि हो सके। जैसे शिक्षा के क्षेत्र में विद्यार्थी पाठशाला के गुरू को त्याग कर उच्च से उच्चतर शिक्षक का आश्रय लेता है वैसे ही दीक्षा के क्षेत्रा में भी ज्ञानार्थी एंव धर्माथी आवश्यक हो तो गुरू परिवर्तन कर सकते हैं लेकिन पहले गुरू के सम्बंध में कोई बुरा भाव न तो मन में रखें न व्यक्त ही करें।
-गुरु गीता
मधु की खोज में मधुमक्खी जैसे एक फूल से अन्य फूल पर पहुंचती है, वैसे ही ज्ञान पिपासु शिष्य एक गुरू से दूसरे गुरू के पास जा सकता है। पहले गुरू के प्रति अश्रद्धा न रखें और न उनकी अवहेलना ही करें।
जिसने मेरे पास से साधना लिया है वह अगर अनुभव करता है कि उसे मेरे पास से ज्ञान धर्म या शान्ति लाभ नहीं हो रहा है तो मैं उसे कहूँगा कि उसके लिये अन्य गुरू का आश्रय विधेय है। आप लोग जो शक्ति और उसके कारण क्रिया पाये हो वो ठीक है या नही विचार कर सकते हो लेकिन गुरू के दोष या गुण, विचार में लाकर उत्साह हीन न हो। याद रखें कौन किस उद्देश्य से कर्म करता है, समझना सब के लिये इतना आसान नहीं है।
जब कभी मन में अशांति आये तो सारा उपदेश पढ़ें। उससे मन की अशान्ति दूर होगी। किसी विषय में आशंका पैदा हो या मन में कोई प्रश्न पैदा हो तो यह उपदेश पढ़कर देखें। बहुत सारे प्रश्नों के उत्तर मिल जायेंगे। अगर उसके बाद भी किसी प्रश्न का उत्तर नहीं मिलता तो गुरू भाईयों के साथ विचार विमर्श करें। आवश्यकता हो तो गुरू को भी पूछ सकते हो।
ॐ शांति। ॐ शांति। ॐ शांति।
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Snigdh padarth.
Dahi - Honey - Little Soonth.
Lassi
Milk.
All fresh seasonal fruits
Payasam - kheer
All prasad that are offered to dieties traditionally
Khajur, one morning one evening.
Suji Halwa
Amaranthus
Kismis
All dry fruits
Kulche Chole.
Corn sugar soup
triphala Churn - little everyday.
Jo svabhav se khane ki ichha ho
Kachi haldi roz subeh thoda
Bramhi leaves 3-4 everyday.