जो समाज अपने किसानों का सम्मान नहीं करता, वह भूख, अस्थिरता और नैतिक पतन का जोखिम उठाता है। महात्मा गांधी ने ठीक ही कहा था “धरती को खोदना और उसकी देखभाल करना भूल जाना, स्वयं को भूल जाना है।”
सभ्यता के इतिहास में मनुष्य ने ईश्वर को अनेक रूपों में देखा है कभी मंदिरों में, कभी मस्जिदों में, कभी धर्मग्रंथों और दर्शन के माध्यम से। लेकिन इन सभी आस्थाओं और विश्वासों के बीच एक ऐसा ईश्वर भी है, जो खुले आकाश के नीचे रहता है, नंगे पाँव धरती पर चलता है और पूरी मानवता का पेट भरता है। ईश्वर का एक रूप किसान भी है, जो सबको भोजन देता है। यह विचार केवल भावनात्मक अभिव्यक्ति नहीं है, बल्कि जीवन की सच्चाई, विज्ञान, नैतिकता और मानवीय अनुभव से उपजा हुआ विचार है। हर धर्म और हर नैतिक व्यवस्था में भूखे को भोजन कराना सबसे बड़ा पुण्य माना गया है। किसान यही करता है। वह यह नहीं पूछता कि उसका अन्न कौन खाएगा, किस वर्ग, धर्म या क्षेत्र का होगा। उसके खेतों में उगा अन्न शहरों में रहने वाले अनजान लोगों तक पहुँचता है, दूरदराज़ के बच्चों का पेट भरता है और आने वाली पीढ़ियों की नींव बनता है। यह निःस्वार्थ सेवा ही किसान को सामान्य श्रम से ऊपर उठाकर ईश्वरीय भूमिका प्रदान करती है।
ईश्वर की सबसे बड़ी पहचान रचना मानी जाती है। सभी धार्मिक ग्रंथ कहते हैं कि ईश्वर जीवन की रचना करता है, जबकि विज्ञान बताता है कि जीवन जैविक और पारिस्थितिक प्रक्रियाओं से जन्म लेता है। इन दोनों के बीच जो सेतु है, वह किसान है। बीज के चयन से लेकर खेत की तैयारी तक, मौसम की अनिश्चितताओं से जूझते हुए फसल की रक्षा तक किसान हर चरण में जीवन रचना की प्रक्रिया का सहभागी होता है। वह यह सब बिना किसी तालियों, बिना किसी गारंटी और बिना यह जाने करता है कि उसे उसका उचित मूल्य मिलेगा भी या नहीं।
भोजन मानव जीवन की सबसे बुनियादी आवश्यकता है। शासन प्रणालियाँ बदल सकती हैं, आर्थिक नीतियाँ बदल सकती हैं, तकनीक नई ऊँचाइयों पर पहुँच सकती है, लेकिन भोजन के बिना न समाज चल सकता है और न ही सभ्यता आगे बढ़ सकती है। प्रकाश संश्लेषण, मिट्टी के सूक्ष्मजीव, जल चक्र और जैव विविधता जैसी जटिल प्राकृतिक प्रक्रियाएँ कृषि को संभव बनाती हैं, पर इन सभी प्रक्रियाओं को मानव हित में दिशा देने का कार्य किसान करता है। इस दृष्टि से किसान केवल उत्पादक नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ तालमेल बैठाने वाला एक जीवंत वैज्ञानिक भी है।
वैज्ञानिक भी इस चमत्कार को स्वीकार करते हैं। हरित क्रांति के जनक डॉ. नॉर्मन बोरलॉग ने कहा था-
“खाली पेटों के साथ एक शांतिपूर्ण दुनिया का निर्माण नहीं किया जा सकता।”
विडंबना यह है कि जो किसान पूरी दुनिया का पेट भरता है, वही कई बार स्वयं भूखा रह जाता है। कर्ज़, अस्थिर बाज़ार, बढ़ती उत्पादन लागत और प्राकृतिक आपदाएँ उसके जीवन का स्थायी हिस्सा बन चुकी हैं। इसके बावजूद वह खेती छोड़ नहीं देता, उत्पादन बंद नहीं करता। यह स्थिति किसान की असफलता नहीं, बल्कि उस सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की विफलता है, जिसने अन्नदाता को सबसे कमज़ोर स्थिति में खड़ा कर दिया है। जहाँ समाज ईश्वर को मंदिरों और मस्जिदों में खोजता है, वहीं किसान का विश्वास मिट्टी, बीज और आसमान में बसता है। हर बुवाई उसके लिए एक प्रार्थना होती है—बारिश के लिए, जीवन के लिए और भविष्य के लिए। यह विश्वास अंधा नहीं होता, बल्कि साहस, अनुभव और परिश्रम से उपजा हुआ होता है, जो हर असफलता के बाद भी किसान को दोबारा खड़ा करता है।
जलवायु परिवर्तन के इस दौर में सबसे पहला और सबसे गहरा असर किसान पर ही पड़ता है। अनियमित वर्षा, सूखा, बाढ़, मिट्टी की गिरती उर्वरता और बढ़ती लागत के बावजूद किसान खेती छोड़ता नहीं। यदि बलिदान को ईश्वर की पहचान माना जाए, तो किसान उसका सबसे जीवंत उदाहरण है, जो बिना शिकायत किए सभ्यता को जीवित रखे हुए है।
आज शक्ति को धन, तकनीक और सत्ता से जोड़ा जाता है, लेकिन वास्तविक शक्ति वह है जो जीवन को बनाए रखे। किसान सभ्यता की निरंतरता सुनिश्चित करता है, समाज को जीवित रखता है और मानव तथा प्रकृति के बीच संतुलन बनाए रखता है। किसानों की उपेक्षा करना केवल अन्याय नहीं, बल्कि एक गंभीर सभ्यतागत भूल है, जिसकी कीमत पूरा समाज चुकाता है।
ईश्वर का एक रूप वह किसान है, जो सबको भोजन देता है—यह विचार पूजा की माँग नहीं करता, बल्कि सम्मान, न्याय और जिम्मेदारी की माँग करता है। यदि हम इस कथन को सच में मानते हैं, तो हमें किसान को उसकी उपज का उचित मूल्य देना होगा, कृषि और प्राकृतिक संसाधनों का संरक्षण करना होगा और नीति निर्माण में किसान की आवाज़ को केंद्रीय स्थान देना होगा। क्योंकि जो समाज अपने अन्नदाता को भूल जाता है, वह अंततः स्वयं को भी खो देता है।
ईश्वर स्वर्ग में हो सकता है, लेकिन धरती पर जीवन को संभालने का दायित्व किसान निभाता है। हमारी थाली में रखा चावल का हर दाना, रोटी का हर टुकड़ा और फल-सब्ज़ी का हर निवाला केवल भोजन नहीं है, बल्कि उसमें किसान के श्रम, धैर्य, आशा और अनकही प्रार्थनाएँ समाई होती हैं। यह भोजन हमें सिर्फ ऊर्जा नहीं देता, बल्कि उस अदृश्य संघर्ष की याद दिलाता है, जो खेतों में हर दिन चुपचाप लड़ा जाता है। किसान मौसम से लड़ता है, अनिश्चित बाज़ार से जूझता है, कर्ज़ और लागत का बोझ उठाता है, फिर भी समाज के सामने कभी शिकायत लेकर नहीं आता। वह जानता है कि अगर उसके खेत सूने हो गए, तो केवल उसकी ज़िंदगी नहीं रुकेगी, बल्कि पूरी सभ्यता की गति थम जाएगी। इसी कारण किसान केवल अन्नदाता नहीं, बल्कि जीवनदाता है—वह जो मानवता की नींव को हर दिन अपने हाथों से सींचता है।
जब हम भोजन करते समय उसके स्रोत को भूल जाते हैं, तब हम केवल किसान को नहीं, बल्कि उस नैतिक जिम्मेदारी को भी भूल जाते हैं जो हमें एक संवेदनशील समाज बनाती है। किसान को सम्मान देना केवल शब्दों या प्रतीकों तक सीमित नहीं होना चाहिए, बल्कि यह नीतियों, बाज़ार व्यवस्था, मूल्य निर्धारण और सामाजिक व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। उसका श्रम सस्ता नहीं, अमूल्य है। इसलिए अगली बार जब हम भोजन करें, तो एक क्षण ठहरकर यह स्मरण करें कि यह थाली किसी मशीन की नहीं, बल्कि किसी मनुष्य की मेहनत से भरी है—एक ऐसे मनुष्य की, जो अपने भविष्य की अनिश्चितता के बावजूद दूसरों के भविष्य को सुरक्षित करता है। सच यही है कि ईश्वर का एक रूप किसान भी है, जो बिना किसी भेदभाव के सबको भोजन देता है।
निष्कर्ष
किसानों का सम्मान करना, उनका समर्थन करना और उनकी रक्षा करना केवल उनका अधिकार नहीं, बल्कि समाज की सामूहिक जिम्मेदारी है। क्योंकि जिस दिन किसान सुरक्षित और समृद्ध होगा, उसी दिन मानवता सच अर्थों में सुरक्षित होगी।