उत्तर- सुखाड़ के समय जल के अभाव से न केवल मिट्टी की नमी समाप्त हो जाती है। इसके लिए जल विभाजक के विकास की योजना बहुत सहायक होती है। जल-विभाजन क्षेत्र ऐसे भौगोलिक क्षेत्र होते हैं जहाँ पानी एक सामान्य बिंदु की ओर प्रवाहित होता है। मिट्टी में उपलब्ध नमी के लिए तथा तेज धूप से बचने के लिए भूमि पर घास का आवरण रहने देना चाहिए, नदियों के जल-ग्रहण क्षेत्र में वृक्षारोपण का विकास किया जाय ।
उत्तर- भू-स्खलन से बचाव के किन्हीं दो उपाय हैं—
(i) वनों की कटाई पर रोक।
(ii) खनन और उत्खनन पर रोकथाम ।
उत्तर- भूकंपों के प्रभावों को कम करने के लिए सुरक्षित आवास-निर्माण कर भीषण क्षति को कम किया जा सकता है।
इसके लिए चार उपाय निम्नलिखित हैं—
(i) भवनों को आयताकार होना चाहिए और नक्शा साधारण होना चाहिए ।
(ii) मकान के नींव को मजबूत एवं भूकंप अवरोधी होना चाहिए ।
(iii) लम्बी दीवारों को सहारा देने के लिए ईंट-पत्थर या कंक्रीट के कलम होने चाहिए।
(iv) निर्माण के पूर्व स्थान-विशेष की मिट्टी का वैज्ञानिक अध्ययन होना चाहिए, तभी नींव तथा निर्माण कार्य होना चाहिए ।
उत्तर- भूस्खलन सामूहिक स्थानांतरण का एक प्रक्रम है जिसमें शैलें तथा शैलचूर्ण गुरुत्व के कारण ढालों पर से नीचे सरकती है।
उत्तर- भू-स्खलन के पाँच रूप अग्रलिखित हैं—
(i) वर्षा का पानी के साथ मिट्टी और कचड़े का नीचे आना
(ii) कंकड़-पत्थरों का खिसकना
(iii) कंकड़-पत्थर का गिरना
(iv) चट्टानों का खिसकना
(v) चट्टानों का गिरना ।
उत्तर- सुनामी के आशंका वाले तटीय क्षेत्रों में मकान ऊँचे स्थानों पर और तट से करीब सौ मीटर की दूरी पर बनाना चाहिए, तट से दूर बसने के लिए प्रोत्साहन करना चाहिए एवं ऐसे मकानों का निर्माण हो जो भूकंप एवं सुनामी लहरों के प्रभाव को न्यून कर सके और मकान कक्रोट अवधिक का निर्माण होना चाहिए ।
उत्तर- भू-स्खलन-जैसी प्राकृतिक विभीषिका का सामना के लिए निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखना चाहिए
(i) मिट्टी की प्रकृति के अनुरूप उपर्युक्त नींव बनाना ।
(ii) ढालवाँ स्थानों पर आवासों का निर्माण न करना ।
(iii) सामान्य एवं वैकल्पिक संचार प्रणालियों की समुचित व्यवस्था होना ।
(iv) वनस्पतिविहीन ऊपरी ढालों पर उपयुक्त वृक्ष का सघन रोपण ।
(v) सड़कों, नहरें-निर्माण, बारिश के पानी एवं सिंचाई का ध्यान दिया जाए कि प्राकृतिक जल की निकासी अवरुद्ध न हो ।
(vi) भू-स्खलन को रोकने के लिए पुख्ता दीवारों तथा निर्माण किया जाना चाहिए।
(vii) भूमि के नीचे बिछाए जाने वाले पाइप, केबल आदि लचीले होने चाहिए
ताकि भू-स्खलन से उत्पन्न दबाव का सामना कर सकें । इसके अलावे खड़ी ढलानों के तल पर बने मकानों के मालिक कुछ स्थितियों में ऐसे अवरोधक या जल-ग्रहण क्षेत्र का निर्माण कर सकते हैं। जो छोटे-छोटे भू-स्खलन को रोक सकते हैं।
उत्तर- शुष्क कृषि पद्धति अधिक लाभप्रद है।
उत्तर- सूखे के दुष्प्रभाव को कम करने के लिए स्थानीय समुदायों के सहयोग से मृदा और जल संरक्षण के सभी प्रकार के उपाय किए जा सकते हैं।
उत्तर- सूखाग्रस्त क्षेत्रों में मशरूम, औषधि पौधे, नागफणि, ज्वार, बाजरा इत्यादि फसलें लगाई जा सकती है।
उत्तर- भूकम्प रोधी-भवन का नमूना भकम्प की तीवता के स्तर पर निर्भर करता है। मकान भवन-निर्माण नियमावली को ध्यान में रखकर बनाए जाने चाहिए ताकि वे भूकम्प की तीव्रता का पूरी तरह सामना कर सके।
उत्तर- नरम मिट्टी पर नींव के निर्माण से बचना चाहिए। अथवा मिट्टी कठोर तथा सुभ्बद्ध (compact) बना कर ही निर्माण कार्य करना चाहिए।
उत्तर- भू-स्खलन के लिए जल की संतृप्तता, ढलान में बदलाव तथा भूकम्प आदि उत्तरदायी होते हैं। ये कारक शैलों पर गुरुत्वाकर्षण बल को बढ़ा देते हैं जिससे शैलें ढलान पर खिसकने लगती है।
उत्तर- कठोर मिट्टी पर नींव किसी भी प्रकार बनाई जा सकती है। बस एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि इसके आधार को सीमेंट एवं कजरी अथवा चूने से मजबूत बनाया जाए और उसकी चौड़ाई उपयुक्त हो।
उत्तर- सह-अस्तित्व की सफलता आपसी सहयोग, गैर-सरकारी संगठन, अर्द्ध-सरकारी संगठन, जैसी राष्ट्रीय सेवा योजना, होमगार्ड, नेहरू युवा केन्द्र, राष्ट्रीय कैडेट कोर एवं केन्द्र एवं राज्य सरकार के सहयोग आदि ।
उत्तर- किसी आपदा की क्षति को कम करने का सबसे प्रभावी उपाय आपदा-रोधी भवन-निर्माण है! भवन की योग्यता तथा नमूना तैयार करते समय आरंभिक स्तर पर ही आपदा-रोधी तत्त्वों को शामिल कर लिया जाना चाहिए।
उत्तर- प्राकृतिक कारक—
(i) वर्षा की अधिकता,
(ii) सीधी (तेज) ढलानें
(iii) ढलानों की कठोरता तथा
(iv) अत्यधिक आच्छादित चट्टानी सतह।
उत्तर- मानव-निर्मित कारक—
(i) वनों की कटाई तथा मृदा अपरदन,
(ii) अनुचित ढंग से की गई खुदाई,
(iii) खनन तथा
(iv) योजना रहित निर्माण कार्य।
उत्तर- भवन को भूस्खलन के खतरे से बचाने के लिए निम्नलिखित तकनीकें अपनाई जाती हैं—
(i) स्थाई ढाल का निर्माण ।
(ii) उचित जल निकास प्रणाली
(iii) धरातल पर पौधा रोपण
(iv) मिट्टी को कठोर बनाना तथा
(v) झुकती दीवारें इत्यादि।
उत्तर- बाढ के खतरे को कम करने के लिए निर्माण कार्य में निम्नलिखित तकनीकों का प्रयोग किया जाता है—
(i) भवन का उच्च स्थान पर निर्माण करें ताकि मकान का प्रथम तल बाट के जल स्तर से ऊँचा हो।
(ii) जल अवरोधक प्रवेश द्वार बनाना ।
(iii) निर्माण में ऐसी सामग्री प्रयोग में लाना आवश्यक है जो जल-रोधी हो।
उत्तर- सामान्य रेडियो संचार व्यवस्था की दो विशेषताएँ हैं—
(i) सामान्य रेडियो संचार व्यवस्था बेतार संचार व्यवस्था है। इसके संदेश को छोटी तथा लंबी दूरियों तक सुना जा सकता है। ऐसा रेडियो की विभिन्न आवृत्तियों के कारण संभव है।
(ii) किसी आपदा के समय यह एक महत्वपूर्ण वैकल्पिक संचार व्यवस्था है।
उत्तर- शुष्क कृषि-पद्धति की निम्नलिखित विधियाँ हैं—
(i) खेतों की गहरी जुताई ताकि धरातल के नीचे की नमी युक्त मिट्टी ऊपर आ जाए।
(ii) ऐसी फसलों की बोआई जो सूखे को अधिक सहन करने की क्षमता रखते हो।
(iii) सामान्य सिंचाई-विधि के स्थान पर ड्रिप तथा छिड़काव विधि से सिंचाई करना।
(iv) ऐसे बीज का प्रयोग करना चाहिए जो कम समय में फसलों का उत्पादन करता हो।
(v) जब वर्षा होती है तब उसके जल का अधिकतम उपयोग करना । छोटे-छोटे बाँध तथा जलाशय का निर्माण तथा ऐसे नहरों का निर्माण जिसके तल में कंक्रीट बिछा हो । इससे जल को रोका जा सकता है।
(vii) ढाल के समकोण पर बाँध बनाना तथा खेती को सीढ़ीनुमा बनाना जिससे जल का अधिक से अधिक उपयोग हो सके।
उत्तर- सुनामी एक विनाशकारी प्राकृतिक आपदा है। सुनामी द्वारा जान-माल की बड़ी हानि होती है। साथ ही, यह तटीय क्षेत्र के खेतों को बंजर बना देता है। स्वास्थ्य संबंधी कई समस्याएँ उत्पन्न हो जाती हैं। बंदरगाहों एवं तटीय नगरों को भी भारी क्षति पहुँचती है।
सुनामी के प्रभाव को कम करने के लिए निम्न तरीके अपनाए जा सकते हैं—
(i) जहाँ सुनामी की लहरें प्रायः आती हैं वहाँ लोगों को तटीय भाग की अपेक्षा तट से दूर बसने के लिए प्रोत्साहित करना ।
(ii) समुद्र तटीय भाग में सघन वृक्षारोपण से सुनामी लहरों की तीव्रता को कम किया जा सकता है ।
(iii) नगरों एवं पत्तनों को बचाने के लिए कंक्रीट अवरोधक का निर्माण होना चाहिए।
(iv) सनामी संभावित क्षेत्रों में ऐसे मकान का निर्माण हो जो भूकम्प एव सुनामा लहरों के प्रभाव को न्यून कर सके।
(v) ‘सुनामीटर’ द्वारा समुद्र तल में होनेवाली हलचल का सतत् पता लगाने हेतु मनामी’ रेकर्डिंग सेन्टर की स्थापना होनी चाहिए ।