उत्तर- गेहूँ उत्पादन हेतु मुख्य भौगोलिक दशाएँ निम्नलिखित है—
(i) गेहूँ की बुआई के समय औसतन तापमान 10℃ से 15℃ तक होना चाहिए।
(ii) गेहूँ पकते समय औसतन तापमान 21℃ से 26℃ तक होना चाहिए।
(iii) वर्षा 20 cm से 100 cm तक।
(iv) उपजाऊ तथा मैदानी भाग।
(v) सस्ते श्रमिक और कुशल प्रबंधन।
भारत के गेहूँ उत्पादक क्षेत्र— भारत में गेहूँ की खेती मुख्यतः सतलज के मैदान, ऊपरी और मध्य गंगा के मैदान तथा मध्यवर्ती भारत में होती है । इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं-पंजाब, पश्चिम बंगाल, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्यप्रदेश, राजस्थान और बिहार । पंजाब अब देश का सर्वाधिक गेहूँ उत्पादक राज्य है।
उत्तर- चाय के उत्पादन के लिए आवश्यक उपयुक्त दशाएँ इस प्रकार हैं—
उच्च तापमान (24°C से 30°C के बीच) यह छायापसंद पौधा है। अतः बीच-बीच में पेड़ लगाना आवश्यक होता है।
नित्य दिन अधिक वर्षा (वर्ष भर में 200 cm होनी चाहिए)।
चाय के पौधों की जड़ों में पानी का जमना हानिकारक होता है इसलिए ढाल भूमि आवश्यक होती है ताकि पानी जड़ों में जमने न पाए।
गहरी दोमट मिट्टी जिसमें लोहांश, फास्फोरस, पोटाश हो।
सस्ते श्रमिक और कुशल प्रबंधन।
भारत में उत्तर-पूर्वी राज्य, नीलगिरि पर्वतीय क्षेत्र, उत्तर-पश्चिमी हिमालय क्षेत्र तथा दक्षिण भार के केरल, तमिलनाडु, कर्नाटक आदि चाय उत्पादक क्षेत्र हैं।
उत्तर- धान मानसूनी जलवायु का फसल है जिसके लिए निम्नांकित दशाएँ उपयुक्त होती हैं—
उच्च तापमान (20°C से 30°C के बीच)।
पर्याप्त वर्षा (200 cm वार्षिक वर्षा) कम वर्षा वाले क्षेत्रों में उत्तम सिंचाई की व्यवस्था आवश्यक होती है।
समतल भूमि ताकि खेतों में पानी जमा रह सके ।
जलोढ़ दोमट मिट्टी ( चावल ) धान की खेती के लिए उपयुक्त मानी जाती है।
पर्याप्त सस्ते श्रमिक।
प्रमुख उत्पादन क्षेत्र— धान की खेती मुख्यतः गंगा, ब्रह्मपुत्र, के मैदान में और डेल्टाई तथा तटीय भागों में की जाती है। इसके प्रमुख उत्पादक राज्य हैं पश्चिम बंगाल, उत्तरप्रदेश, आंध्रप्रदेश, पंजाब, बिहार, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, उड़ीसा, असम, हरियाणा और केरल। इसकी खेती में लगी सर्वाधिक भूमि पश्चिम बंगाल और बिहार में है।
उत्तर- भारतीय कृषि के प्रकार निम्नलिखित हैं—
प्रारंभिक जीविका निर्वाह कृषि— यह अति प्राचीन काल से की जानेवाली कृषि का तरीका है। इसमें परंपरागत तरीके से भूमि पर खेती की जाती है। खेती के औजार भी काफी परंपरागत होते हैं जैसे लकड़ी का हल, कुदाल, खुरपी। कृषि में आधुनिक तकनीक के निवेश का अभाव रहता है। इसलिए उपज कम होती है और भूमि की उत्पादकता कम होने के कारण फसल का प्रति इकाई उत्पादन भी कम होता है। इसमें फसल उत्पादन जीविका निर्वाह के लिए होता है।
गहन जीविका कृषि— यह कृषि पद्धति वहाँ अपनायी जाती है जहाँ भूमि पर जनसंख्या का प्रभाव अधिक है। इसमें श्रम की आवश्यकता होती है। परंपरागत कृषि कौशल का भी इसमें भरपूर उपयोग किया जाता है। भूमि की उर्वरता को बनाए रखने के लिए परंपरागत ज्ञान, बीजों के रख-रखाव एवं मौसम संबंधी इत्यादि अनेक ज्ञान का इसमें उपयोग किया जाता है ।
व्यापारिक कृषि— इस प्रकार की कृषि में अधिक पूँजी, आधुनिक कृषि तकनीक का निवेश किया जाता है। अतः किसान अपनी लगाई गई पूंजी से अधिकाधिक लाभ प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। रत मे चाय, काफी, रबड़, गन्ना, केला आदि फसलें मुख्यतः व्यापार के लिए उपजाई जाती है । अतः इसके लिए परिवहन यातायात के साधन एवं संचार का विकसित होना परम आवश्यक है।