उत्तर- मानव के उपयोग में आने वाली सभी वस्तुएँ संसाधन हैं। संसाधन भौतिक एवं जैविक दोनों हो सकते हैं । भूमि मृदा, जल खनिज जैसे भौतिक संसाधन मानवीय आकांक्षाओं की पूर्ति संसाधन बन जाते हैं। जैविक संसाधन वनस्पति, वन्य-जीव तथा जलीय जीव जो मानवीय जीवन को सुखमय बनाते हैं।
उत्तर- प्रकृति प्रदत्त वस्तुएँ हवा, पानी, वन, वन्य जीव, भूमि, मिट्टी, खनिज सम्पदा एवं शक्ति के साधन या स्वयं मनुष्य द्वारा निर्मित संसाधन के बिना मनुष्य की जरूरतें पूरी नहीं हो सकती हैं तथा सुख-सुविधा नहीं मिल सकती है। मनुष्य का आर्थिक विकास संसाधनों की उपलब्धि पर ही निर्भर करता है। इसलिए मनुष्य के लिए संसाधन बहुत आवश्यक है, क्योंकि इसके बिना मनुष्य का जीवन एक क्षण भी नहीं चल सकता है।
उत्तर- संसाधन मनुष्य के लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होता हैं क्योंकि मनुष्य का आर्थिक विकास संसाधनों पर निर्भर है। संसाधन के बिना मनुष्य का जीवन संभव नहीं है तथा संसाधन के बिना मनुष्य की जरूरते पूरी नहीं हो सकती हैं। इसके बिना मनुष्य का जीवन एक क्षण भी नहीं चल सकता है। इसलिए संसाधनों का संरक्षण आवश्यक है।
उत्तर- संसाधन-निर्माण में तकनीक की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण होती है क्योंकि अनेक प्रकृति-प्रदत्त वस्तुएँ तब संसाधन का रूप लेती है जब विशेष तकनीक का उपयोग किया जाता है। जैसे- नदियों के बहते जल से पनबिजली उत्पन्न करना, बहती हुई वायु से पवन ऊर्जा उत्पन्न करना।
उत्तर-
संभावी संसाधन— ऐसे संसाधन जो किसी क्षेत्र विशेष में मौजूद होते हैं। जिसे भविष्य में उपयोग लाये जाने की संभावना रहती है। जिसका उपयोग अभी तक नहीं किया गया हो, उसे संभावी संसाधन कहते है। जैसे–हिमालय क्षेत्र का खनिज, राजस्थान और गुजरात क्षेत्र में पवन और सौर ऊर्जा।
संचित कोष संसाधन— ऐसे संसाधन भंडार जिसे उपलब्ध तकनीक के आधार पर प्रयोग में लाया जा सकता है, उसे संचित कोष संसाधन कहते है। जैसे- कोयला, लोहा, पेट्रोलियम इत्यादि। यह भविष्य की पूँजी होती है।
उत्तर- क्योटो सम्मेलन दिसम्बर 1997 में जापान के क्योटो शहर में हुआ। यह सम्मेलन पृथ्वी को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने के लिए आयोजित किया गया।
उत्तर- किसी देश की तट रेखा से 200 km की दूरी तक के क्षेत्र को अपवर्जक आर्थिक क्षेत्र कहा जाता है।
उत्तर- वैसे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक प्रक्रिया द्वारा नवीकृत या पुनः पाप्त किया जा सकता है। जैसे – सौर ऊर्जा, पवन ऊजा, जल ऊर्जा इत्यादि।
उत्तर- जव संसाधन की प्राप्ति जीवमंडल से होती है और इनमें जीवन व्याप्त होता है। जैसे-मनुष्य, वनस्पतिजात, प्राणिजात, मत्स्य जीवन, पशुधन आदि।
उत्तर- पर्यावरण को बिना क्षति पहँचाये भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए वर्तमान विकास को कायम रखने की धारणा को सतत् विकास कही जाती है।
उत्तर- प्रथम पृथ्वी सम्मेलन का आयोजन 3-14 जून, 1992 को रियो-डी-जेनेरो, में किया गया जिसमें विकसित एवं विकासशील देशों के लगभग प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
उत्तर- हमारे पर्यावरण में पाई जाने वाली प्रत्येक वस्तु जो हमारी जरूरतों को पूरा कर सकती है, संसाधन कहलाती है। शर्त यह है कि वस्तु तकनीकी रूप से सुगम, आर्थिक रूप से उपयोगी तथा सांस्कृति रूप से मान्य हो।
उत्तर- बहुत से लोगों का विचार है कि संसाधन प्रकृति के मुफ्त (निःशुल्क) उपहार होते हैं, परन्तु ऐसा नहीं है। सभी संसाधन मनुष्य के क्रियाकलापों के प्रतिफल होते हैं। मनुष्य प्रकृति में उपलब्ध पदार्थों को संसाधनों में बदलता है। इस दृष्टि से मनुष्य बहुत ही महत्त्वपूर्ण संसाधन हैं।
उत्तर- वैसे क्षेत्र जहाँ उच्च तकनीक होती है, और उस उच्च तकनीक के कारण किसी भी संसाधन को उपयोगी बनाया जा सकता है तथा उन संसाधनों का उपयोग मानव कर सकता है। उसे विकसित संसाधन कहते है।
उत्तर- संसाधनों के विकास में मनुष्य की भूमिका—
(i) मानव प्रौद्योगिकी द्वारा प्रकृति के साथ क्रिया करते हैं और अपने आर्थिक विकास की गति को तेज करने के लिए संस्थाओं का निमार्ण करते हैं।
(ii) मनुष्य पर्यावरण में पाए जाने वाले पदार्थों को संसाधनों में परिवर्तित करते हैं तथा उन्हें अपने उपयोग में लाते है।
उत्तर- उत्पत्ति के आधार पर संसाधन के दो प्रकार होते है—
(i) जैव संसाधन— ऐसे संसाधनों की प्राप्ति जैवमंडल से होती है । इनमें सजीव के सभी लक्षण मौजूद होते हैं, उसे जैव संसाधन कहते हैं। जैसे-मनुष्य, मत्स्य, पशुधन तथा अन्य प्राणि समुदाय।
(ii) अजैव संसाधन— निर्जीव वस्तुओं के समूह को अजैव संसाधन कहा जाता है। जैसे—चट्टानें, धातु एवं खनिज आदि।
उत्तर-
नवीकरणीय संसाधन— वैसे संसाधन जिन्हें भौतिक, रासायनिक या यांत्रिक प्रक्रिया द्वारा उसे पुनः प्राप्त किये जा सकते हैं, उसे नवीकरणीय संसाधन कहते है। जैसे- सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा, जल विद्युत आदि।
अनवीकरणीय संसाधन— ऐसे संसाधन का विकास लंबी अवधि में जटिल प्रक्रिया द्वारा होता है । जिस चक्र को पूरा होने में लाखों वर्षों लग जाते हैं, उसे अनवीकरणीय संसाधन कहते है। जैसे- जीवाश्म ईंधन, पेट्रोलियम आदि।
उत्तर- संसाधनों के वर्गीकरण के विभिन्न आधार निम्नलिखित हैं—
(i) उत्पत्ति के आधार पर— जैव और अजैव।
(ii) उपयोगिता के आधार पर— नवीकरणीय और अनवीकर
(iii) स्वामित्व के आधार पर— व्यक्तिगत, सामुदायिक, राष्ट्रीय और अंतर्राष्टीय।
(iv) विकास की स्थिति के आधार पर— संभाव्य, विकसित भंडार और संचित।
उत्तर- संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग ही संसाधन नियोजन है। वर्तमान परिवेश में संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग हमारे सामने चुनौती बनकर खड़ा है। इसलिए संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग करना संसाधन नियोजन की प्रथम प्राथमिकता है।
संसाधन नियोजन किसी भी राष्ट्र के विकास के लिए आवश्यक होता है । भारत जैसे देश के लिए तो यह अपरिहार्य है क्योंकि यहाँ की जनसंख्या बहुत ही अधिक है तथा कुछ ऐसे भी प्रदेश हैं, जहाँ एक ही प्रकार के संसाधनों का प्रचुर भंडार है और अन्य दूसरे संसाधनों में वह गरीब है। अतः राष्ट्रीय, प्रांतीय तथा अन्य स्थानीय स्तरों पर संसाधनों के समायोजन एक संतुलन के लिए संसाधन-नियोजन की अनिवार्य आवश्यकता है।
उत्तर- विकास के आधार पर संसाधन को चार भागों में वर्गीकृत किया जाता है—
(i) संभावी संसाधन— ऐसे संसाधन जो किसी क्षेत्र विशेष में मौजूद होते हैं, जिसे उपभोग में लाये जाने की संभावना रहती है तथा जिसका उपयोग अभी तक नहीं किया गया हो।
(ii) विकसित संसाधन— ऐसे संसाधन जिनका सर्वेक्षणोपरांत उसके उपयोग हेतु मात्रा एवं गुणवत्ता का निर्धारण हो चुका है।
(iii) भंडार संसाधन— ऐसे संसाधन पर्यावरण में उपलब्ध होते हैं जो मानवीय आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम हैं। किंतु उपयुक्त प्रौद्योगिकी के अभाव में इन्हें केवल भंडारित संसाधन के रूप में देखा जाता है ।
(iv) संचित कोष संसाधन— वास्तव में ऐसे संसाधन भंडार के ही अंश हैं, जिसे उपलब्ध तकनीक के आधार पर प्रयोग में लाया जा सकता है, किंतु इनका उपयोग प्रारंभ नहीं हुआ है। भविष्य की यह पूँजी है।
उत्तर- पृथ्वी पर कोयला, पेट्रोल जैसे अनेक महत्वपूर्ण अनवीकरणीय संसाधन हैं जो एक बार उपयोग होने के बाद दोबारा उपयोग में नहीं आते हैं। प्राकृतिक संसाधनों के अभाव में मनुष्य अपना विकास नहीं कर सकता। अतः विकास को लगातार जारी रखने के लिए इन संसाधनों का विवेकपूर्ण उपयोग आवश्यक है। नहीं तो इनकी प्राप्ति असंभव हो जाएगी। इसलिए संसाधनों का संरक्षण जरूरी हैं।
उत्तर- जलोढ़ मिट्टी मुख्य रूप से बिहार, आन्ध्रप्रदेश, प. बंगाल, उत्तराखंड पंजाब, हरियाणा राज्यों में मिलता है । इस मिट्टी में मुख्य रूप से चावल, जूट, तम्बाकू, गेहूँ, गन्ने आदि फसलें होती है।
उत्तर- जलों द्वारा बहाकर लायी गई मिट्टी को जलोढ़ मृदा कहते हैं।
जलोढ़ मृदा में निम्न फसलें उगाई जा सकती है- गन्ना, चावल, गेहूँ, मक्का, दलहन आदि।
उत्तर- खेतों में लगातार एक ही फसल उगाने से मिट्टी की उर्वरा शक्ति समाप्त हो जाती है। इसलिए फसल-चक्रण पद्धति अपनायी जाती है। अर्थात् एक ही खेत में अदल-बदल कर फसलें उगायी जाती है क्योंकि फसल चक्रण मृदा के पोषणीय स्तर को बनाए रखता है। इसलिए फसल-चक्रण मृदा संरक्षण में सहायक होती है।
उत्तर- नदियों के बाढ़ के मैदान की नवीन बारीक कणों वाली काँप मिट्टी को खादर एवं नदियों द्वारा जमा की गई पुरातन काँप मिट्टी को बांगर मिट्टी कहते हैं।
उत्तर- भारत के मध्य प्रदेश में चम्बल नदी की द्रोणी, उत्तर प्रदेश में आगरा, कन्याकुमारी, तिरुचिरापल्ली, चिंग्लीपुट, सलेम और कोयम्बटूर जिलों में भू-क्षरण क्षेत्र अधिक है।
उत्तर- स्थानीय मिटटी में चीका व बाल की मात्रा लगभग समान होती है और कृषि के लिए उपयुक्त होती है जबकि बाहित मिट्टी में बालू, कूड़ा-करकट व जल की मात्रा अधिक होती है और यह कृषि के लिए उपयुक्त नहीं होती है।
उत्तर- मृदा निर्माण के कारक हैं- तापमान परिवर्तन, प्रवाहित जल की क्रिया, पवन, हिमनद और अपघटन की अन्य क्रियाएँ। ये सभी मिलकर मृदा निर्माण में सहयोग करती है। मृदा निर्माण में जैव एवं अजैव दोनों कारकों की भी भूमिका रहती है।
उत्तर- पवन अपरदन वाले क्षेत्रों में पहिका कृषि (Shripharming) उपयोगी है जो फसलों के बीच घास की पट्टियाँ विकसित करके कृषि की जाती है।
उत्तर- पहाड़ी ढलानों पर जल के तेज बहाव से बचने के लिए सीढ़ीनुमा ढाल बनाकर की जाने वाली खेती को समोच्च कृषि कहते हैं। इससे मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।
उत्तर- भारत के पूर्वी तटीय मैदान स्थित महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा निर्मित नदी डेल्टा का विकास हुआ है। यहाँ की मृदा की यह विशेषता है कि इस मिट्टी में पोटाश, फास्फोरस और चूना जैसे तत्वों की प्रधानता है, जिसके कारण यह मिट्टी अधिक उपजाऊ होती है।
उत्तर- राष्ट्रीय वन नीति 1952 ई. में बनाया गया।
उत्तर- मृदा को अपने स्थान से विविध क्रियाओं द्वारा स्थानांतरित होना ही भू-क्षरण कहलाता है।
उत्तर- पहाड़ी क्षेत्रों में समोच्च जुताई (Contour ploughing) द्वारा मृदा अपरदन को रोका जा सकता है।
उत्तर- यह भारत में मुख्य रूप से महाराष्ट्र, गुजरात, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश तथा तमिलनाडु राज्य में मिलती है। यह भारत के 6.4 करोड़ हेक्टेयर भूमि पर फैली है। खास तौर पर दक्कन के लावा प्रदेश में मिलती है।
उत्तर- लाल मिट्टी सबसे अधिक तमिलनाडु, कर्नाटक, गोवा, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उड़ीसा, छोटानागपुर एवं मेघालय पठार के क्षेत्रों में मिलती है। यह मिट्टी मुख्य रूप से 100 cm. से कम वर्षा वाले क्षेत्रों में मिलती है। भारत के कुल कृषि भूमि के 7.2 करोड़ हेक्टेयर भूमि में लाल मिट्टी मिलती है।
उत्तर- लेटेराइट का शाब्दिक अर्थ ईंट’ होता है । इस प्रकार मिट्टी का विकास उच्च तापमान एवं अत्यधिक वर्षा वाले क्षेत्रों में हुआ है। अतः एल्युमीनियम और लोहे के ऑक्साइड के कारण इसका रंग लाल होता हैयह मिट्टी चाय, कहवा, काजू की खेती के लिए उपयुक्त होती है।
उत्तर- बहते पानी या हवा जैसे प्राकतिक वाहकों द्वारा मिट्टी का हटना या स्थानांतरित होना मिट्टी कटाव कहलाता है। तेज कटाव होने पर भूमि क्षतिग्रस्त हो जाती है तथा वह कृषि के लायक नहीं रह जाती है। मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, छत्तीसगढ़ एवं झारखण्ड की लगभग 40 लाख हेक्टेयर भूमि कटाव से ग्रसित है। इसलिए मिट्टी का कटाव एक गंभीर समस्या है।
उत्तर- भूमि-क्षेत्र में हास के कई कारण हैं जिसे रोकने के लिए पाँच प्रमुख उपाय या सुझाव हैं-
(i) पर्वतीय क्षेत्रों में सीढ़ीनुमा खेत बनाकर खेती करना।
(ii) मरुस्थल के सीमावर्ती क्षेत्र में झाड़ियों को लगाना।
(iii) पशुचरण एवं वन कटाव पर प्रतिबंध लगाना।
(iv) काटे गए वन के स्थान पर जंगल लगाना।
(v) मैदानी क्षेत्रों में बेकार पड़ी भूमि पर वृक्षारोपण करना।
उत्तर- प्राकृतिक अथवा मानवीय कारणों से मिट्टी का अपने मूल स्थान से हटना अथवा मिट्टी की उपजाऊ परत के कटाव एवं बहाव की प्रक्रिया को मृदा अपरदन कहा जाता है। मृदा अपरदन रोकने के तीन उपाय हैं—
(i) पर्वतीय क्षेत्रों में वन-कटाव एवं स्थानांतरी कृषि पर प्रतिबंध लगाना।
(ii) समोच्च रेखी कृषि करना।
(iii) मैदानी भागों में वृक्षारोपन के साथ-ही-साथ फसल-चक्र, पट्टी कृषि आदि पर जोर देना तथा सिंचाई द्वारा अधिक समय तक भूमि को हरा-भरा रखना।
उत्तर- वर्तमान समय में भारत की अधिकांश नदियाँ प्रदूषित है एवं छोटी नदियाँ तो अत्यंत विषैली हो गई हैं।देश की अधिकांश बडी नदियों के तट पर स्थित बड़े-नगरों तथा तटों के पास औद्योगिक प्रतिष्ठानों तथा कारखानों से विस्तृत जल के प्रवाह के कारण अधिकांश नदियाँ प्रदूषित हो गयी हैं। इसके अलावे घरेलू एवं रसायनों, कीटनाशकों, कारखानों के कचरे, एवं जीव जंतु, पेड़-पौधे, मृत शरीर के अवशेष भी नदियों के जल को प्रदूषित कर रहे हैं।
उत्तर- जल संसाधन का उपयोग पेयजल, घरेलू कार्य, सिंचाई, उद्योग, जन स्वास्थ्य, स्वच्छ जल, जलविद्युत निर्माण, मत्स्य पालन, जलकृषि, पर्यटन विकास, जल-क्रीड़ा, परमाणु संयंत्र, शीतलन, औद्योगिक क्षेत्रों में इसका उपयोग होता है।
उत्तर- भारत के पूर्वी तटीय मैदान स्थित महानदी, गोदावरी, कृष्णा और कावेरी नदियों द्वारा निर्मित डेल्टा का निर्माण हुआ है। यहाँ की मृदा में पोटाश, फॉस्फोरस और चूना जैसे तत्वों की प्रधानता है जिसके कारण यह मिट्टी अधिक उपजाऊ होती है।
उत्तर- एक क्षेत्र के अंतर्गत जल उपयोग की मांगों को पूरा करने हेतु उपलब्ध जल संसाधनों की कमी को ही ‘जल संकट’ कहते हैं। सूखा जल संकट का ही कारण है। किसान खेतों पर अपने निजी कुँए और नलकूप के द्वारा भूमि को संचित कर कृषि उत्पादन को बढ़ा रहे हैं। इससे भूमिगत जल-स्तर नीचे गिर रहा है और जल संकट उत्पन्न हो रहा है।
उत्तर- नदी घाटी परियोजना के प्रमुख उद्देश्य निम्नलिखित हैं-
(i) सिंचाई और भूमि का वैज्ञानिक उपयोग एवं प्रबन्ध।
(ii) जल विद्युत शक्ति उत्पादन में वृद्धि और औद्योगिकरण।
(iii) बाढ़ नियंत्रण और बीमारियों की रोकथाम में सहायता।
(iv) मछली फार्मिंग का विकास एवं कृत्रिम झीलों में आमोद-प्रमोद के साधन उपलब्ध कराना।
(v) भूमि कटाव रोककर उसे कृषि योग्य बनाना आदि।
उत्तर- जल संग्रहण/वर्षा की खेती का तात्पर्य आर्द्र खेती से है, जो विशेषकर काप और काली मिट्टी के क्षेत्रों में की जाती है। यहाँ 100 से 200 सेमी. वर्षा होती है । मध्यवर्ती गंगा का मैदान इसका प्रमुख क्षेत्र है जहाँ प्रायः दो फसलें पैदा की जाती है और कभी-कभी जायद की फसल भी उत्पन्न कर ली जाती है। ऐसे क्षेत्र में उन्नत सिंचाई तंत्र का भी शुष्क मौसम में प्रयोग कर लिया जाता है।
उत्तर- अंतर्राज्यीय जल-विवाद का मुख्य कारण एक नदी का कई राज्यों से होकर बहना एवं जल बँटवारे को लेकर एक राज्य से दूसरे राज्य में हमेशा टकराहट होती है जैसे-कर्नाटक, केरल, तमिलनाडू के बीच कावेरी जल-विवाद, महाराष्ट्र, कर्नाटक एवं आंध्रप्रदेश के बीच तुंगभद्रा जल विवाद।
उत्तर-
(i) सिंधु नदी क्षेत्र
(ii) गंगा-नदी क्षेत्र
(iii) ब्रह्मपुत्र नदी क्षेत्र।
उत्तर- पृथ्वी पर जल की उपस्थिति के कारण ही पृथ्वी को नीला ग्रह की संज्ञा दी जाती है।
उत्तर- वर्तमान समय में भारत में कुल विद्युत उत्पादन का लगभग 22% भाग जल-विद्युत से प्राप्त होता है।
उत्तर- वर्षा जल के धरातलीय छिद्रों से रिस-रिसकर कठोर शैलीय आवरण पर जमा जल भूमिगत जल कहलाता है।
उत्तर- जल संसाधन के दुर्लभता या संकट निवारण हेतु सरकार ने सितम्बर, 1987 में 'राष्ट्रीय जल नीति' को स्वीकृत किया।
उत्तर- नर्मदा बचाओ आंदोलन एक गैर सरकारी संगठन है जो स्थानीय लोगों किसानों, पर्यावरणविदों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को गुजरात के नर्मदा नदी पर सरदार सरोवर बाँध के विरोध के लिए प्रेरित करता है।
उत्तर- विश्व में उपलब्ध कुल जल का 96.5% भाग महासागरों में खारा पानी के रूप में है जो पीने योग्य नहीं है। शेष 2.5% जल मीठे पानी के रूप में है। इसका भी मात्र 30% भाग ही नदियों, तालाबों एवं भूमिगत जल के रूप में है। यही नहीं, इस जल का वितरण भी काफी असमान है एवं प्रदूषित भी होता जा रहा है। इसलिए, जल एक दुर्लभ संसाधन है।
उत्तर- बिहार की कोसी नदी पर विकसित कोसी परियोजना का मुख्य उद्देश्य बाढ़-नियंत्रण, सिंचाई, भूमि-संरक्षण, मलेरिया-नियंत्रण एवं जलविद्युत उत्पादन करना है। इस परियोजना की कुल विद्युत उत्पादन क्षमता 20 हजार मेगावाट है, जिसकी आधी बिजली नेपाल को दी जाती हैं इस परियोजना के तहत नेपाल स्थित हनुमाननगर में बराज का निर्माण किया गया है।
उत्तर- भारत के असमाप्त होने वाले जल संसाधन ऐसे संसाधन हैं जिन्हें हम कुँओं और नल-कूपों की सहायता से प्रयोग में ला सकते हैं, विशेषकर उन परिस्थितियों में जब भूमि को धरातल पर पाए जाने वाले जल की कमी हो जाए । भारत में भौम जल की सम्भावित क्षमता लगभग 434 अरब घन मीटर है। इस भौम जल का अधिकतर भाग भारत के मैदानी भागों में पाया जाता है। उत्तरी भारत में, क्योंकि वर्षा अधिक होती है इसलिए वर्षा का एक बड़ा भाग रिस-रिसकर भूमि के नीचे चला जाता है, इसलिए वहाँ भौम ज़ल की मात्रा बढ़ जाती है।
उत्तर- जल-प्रदूषण रोकने के प्रमुख उपाय हैं—
(i) कारखानों से निकलनेवाले अपशिष्ट रासायनिक पदार्थों को जलाशयों या नदियों में नहीं गिरने देना।
(ii) तालाबों एवं खेतों में कम-से-कम कीटनाशक दवाओं का छिडकाव करना।
(iii) महासागरों में परमाणु बम परीक्षण आदि के प्रयोग पर रोक लगाना।
(iv) जल प्रदषित न करने के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करना।
उत्तर- जल संभर वह क्षेत्र है जिसे बड़ी नदी की एक सहायक नदी सींचती हैं। इसके विपरीत एक ऐसा विशाल क्षेत्र जिसे एक नदी और उसकी सहायक नदियाँ सींचती हैं उसे द्रोणी कहा जाता है।जब एक जल संभर का विकास करने के लिए अनेक प्रयत्न किये जाते हैं तो . इसे जल संभर विकास कहते हैं। जल संभर विकास में क्षेत्र को विकसित करने के अनेक प्रयत्न किए जाते हैं जैसे जल संग्रहण, मिट्टी और आर्द्रता का संरक्षण, वृक्षारोपण, चारागाह विकास तथा सामुदायिक भूमि संसाधनों का विकास आदि सम्मिलित होता है। ऐसे कार्य में स्थानीय लोगों के सहयोग एवं सहायता की आवश्यकता पड़ती है। राज्य एवं केन्द्रीय सरकारें जल संभर विकास को सफल बनाने में हर सम्भव प्रयत्न करती हैं ताकि भूमि की क्षमता भी बनी रहे और स्थानीय लोगों की आवश्यकताएँ भी पूरी होती रहें।
उत्तर- भारत में जल संसाधन का वितरण अपर्याप्त है; क्योंकि भारत में विश्व की लगभग 16% आबादी निवास करती है और इस आबादी के लिए विश्व का लगभग 4% जल ही उपलब्ध है।आज भारत में जल भंडारण हेतु जलाशयों का निर्माण द्रुत गति से हो रहा है। जिसकी जल भंडारण की क्षमता लगभग 174 अरब घनमीटर हो गई है। भारत की स्थलाकृति स्वरूप एवं अन्य बाधाओं की वजह से केवल 690 अरब घनमीटर जल का ही उपयोग का पता है।
उत्तर- जल मनुष्य के जीवन का मुख्य आधार है। यह न केवल कृषि के लिए आवश्यक है, वरन् इससे मानव की अनगिनत अन्य समस्याएँ भी हल होती हैं। विशेषकर जब मनुष्य को निकट से भू-पृष्ठीय जल की उपलब्धि न हो सके तो उसे भूमिगत जल के उपयोग में अनेक समस्याओं का सामना करना पड़ता है।
इसमें कुछ मुख्य समस्याएँ इस प्रकार हैं—
(i) जल-स्तर का नीचे चला जाना— जब भू-पृष्ठ जल निकट उपलब्ध न हो तब मनुष्य भूमिगत जल का प्रयोग करने लगता है। ऐसा निरन्तर करते रहने से जल-स्तर काफी नीचे गिर जाता है और कई बार तो कुएँ बिल्कुल ही सूख जाते हैं।
(ii) पहाड़ी भू-भाग का बड़ी रूकावट सिद्ध होना— भूमिगत जल का प्रयोग . करने के लिए भूमि में कुएँ खोदने पड़ते हैं और यदि भूमि पहाड़ी हो तो इन कुओं का खोदना एक बड़ी विकट समस्या बन जाती है। ऐसे में भूमिगत जल तक पहुँचना ही कठिन बन जाता है तो उसका उपयोग कैसे किया जा सकता है।
(iii) महँगा सौदा— यदि पानी बहुत हो तो गहरे कुएँ खोदने में बहुत खर्च आ जाता है । न केवल खुदाई में अधिक लागत आती है, वरन् पम्प सेट तथा पाइपों आदि के खरीदने में भी काफी धन की आवश्यकता पड़ती है।
उत्तर- वन-जीवों के ह्रास के मुख्य कारक निम्नलिखित हैं—
(i) मनुष्य अपने आवास, कृषि के विस्तार तथा उद्योगों की स्थापना के लिए वनों का विनाश किया है। फलस्वरूप वन्य जीवों नष्ट हो रहे हैं या विलुप्त होते जा रहे हैं।
(ii) मनुष्य द्वारा कृषि के विशिष्टीकरण का भी वन्य जीवों पर बुरा प्रभाव पड़ा है।
(iii) कृषि में कीटनाशक रासायनिक दवाओं के छिड़काव से भी वन्य जीवों पर बुरा प्रभाव पड़ता है।
(iv) वन्य जीवों के शिकार के कारण भी बहुत सारे वन्य जीवों के ‘अस्तित्व’ समाप्त हो रहे हैं।
उत्तर- वन एवं वन्य जीव मानव जीवन के प्रमुख हमसफर हैं। वन पृथ्वी के लिए सुरक्षा कवच है। वन जैव विविधताओं का आवास होता है। यह केवल एक संसाधन ही नहीं बल्कि पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण में महत्त्वपूर्ण घटक है।
हमारा इनसे अटूट सम्बन्ध है। वन प्रकृति का एक अमूल्य धरोहर है। यह इस जीव-मंडल में सभी जीवों की संतुलित स्थिति में जीने के लिए पारिस्थितिक तंत्र के निर्माण में सर्वाधिक योगदान देता है क्योंकि सभी जीवों के लिए खाद्य ऊर्जा का प्रारंभिक स्रोत वनस्पति होता है।
भारत में वन संसाधन एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। वस्तुतः हमें वन और वन्य जीव संसाधनों को संरक्षण देना चाहिए।
उत्तर- वन पृथ्वी का सुरक्षा कवच है। यह न केवल संसाधन होता है बल्कि पारिस्थैतिक तंत्र के निर्माण में महत्वपूर्ण घटक है। वन मृदा कटाव को रोकने के साथ ही पर्यावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा को घटाते हुए जीवनदायी ऑक्सीजन की मात्रा को बढ़ाता है। यह भूमिगत जल स्तर को बढ़ाने के साथ ही वर्षा की उपलब्धता में वृद्धि करता है।
उत्तर- उत्तराखण्ड के लोगों ने गढ़वाल के पहाड़ी क्षेत्रों में 1870 के दशक में जंगलों की व्यवसायी कटाई के विरुद्ध एक आंदोलन चलाया, जो चिपको आंदोलन के नाम से प्रसिद्ध हुआ। ग्रामीण लोग पेड़ों को कटने से बचाने के लिए उनके साथ चिपक जाते थे। इस आंदोलन का नेतृत्व चण्डी प्रसाद भट्ट और कई महिलाओं एवं बच्चों ने मिलकर किया। इस आंदोलन का प्रभाव भारत के विभिन्न क्षेत्रों पर पड़ा। जिसके कारण 15 वर्षों तक हिमालय क्षेत्रों में वनों की कटाई रोक दी।
उत्तर- वनों के विनाश का एक सबसे बड़ा कारण कृषिगत भूमि का फैलाव है। बडी विकास योजनाओं तेजी से खनन कार्य के कारण भी वनों का विनाश होता रहा है एवं मानवीय हस्तक्षेप, पालतू पशुओं के द्वारा अनियंत्रित चारण एवं रेल-सड़क मार्ग और ईंधन की लकड़ियों, औद्योगिक विकास एवं नगरीकरण भी वन विनाश का मुख्य कारण है।
उत्तर- बिहार विभाजन के बाद वन विस्तार में बिहार राज्य दयनीय स्थिति में आ गया है। यहाँ मात्र 67.64.14 हेक्टेयर में वन क्षेत्र है। यह भौगोलिक क्षेत्र का मात्र 7.1% है। बिहार के 38 जिलों में से 17 जिलों से वन क्षेत्र समाप्त हो गया है। पश्चिमी चम्पारण, मुंगेर, बाँका, जमुई, नवादा, गया, रोहतास, कैमूर एवं औरंगाबाद जिले में वनों की स्थिति अच्छी है।
उत्तर- भारत के तीन राष्ट्रीय उद्यान हैं—
(i) जिम कार्बेट राष्ट्रीय उद्यान (उत्तराखण्ड)
(ii) शिवपुरी (मध्य प्रदेश)
(iii) नन्दन कानन (उड़ीसा)।
उत्तर- वन्य जीवों को उनके प्राकृतिक आवास में संरक्षित करने का प्रयास 'इन सीटू' प्रयास कहलाता है।
उत्तर-
नन्दा देवी– इसका 2,236.74 (कुल भौगोलिक क्षेत्र) वर्ग किलोमीटर है। चमौली, पिथौरागढ़ और अल्मोड़ा जिलों का भाग (उत्तराखंड) में है।
सुन्दर वन– इसका 9,630 (कुल भौगोलिक क्षेत्र) वर्ग किलोमीटर है। गंगा-ब्रह्मपुत्र नदी तंत्र के डेल्टा और इसका भाग (पश्चिम बंगाल) में है।
उत्तर- प्रदूषण जनित समस्या- बढ़ते प्रदूषणों के कारण कई समस्याओं को जन्म दिया है। उनमें वन्य जीवों की संख्या में कमी के प्रमुख कारक पराबैंगनी किरणें, अम्ल वर्षा और हरित गृह प्रवाह है। इसके अलावे वायु-जल एवं मृदा प्रदूषण के कारण वन्य-जीव का जीवन-चक्र गंभीर रूप से ग्रसित हो रही है।
उत्तर- वन्य जीव की संख्या और वन्य के शीघ्र पतन के कारण संरक्षण आवश्यक हो गया है। हमारे बहुत-से प्राचीन रीति-रिवाज भी वन और वन्य जीव संरक्षण में लाभदायक हुए हैं । उदाहरण के लिए बरगद, पीपल, तुलसी और नीम की पूजा आज भी हमारे देश में विभिन्न अवसरों पर की जाती है। अनेक समुदायों में इनकी कटाई तथा प्रयोग वर्जित है। इसी प्रकार मोर, नीलकंठ, तोते और नील गाय जैसे पशु भी संरक्षित किए जाते हैं।
उत्तर-
(i) काजीरंगा (आसाम),
(ii) चंदका (उड़ीसा) और
(iii) बांदीपुर (कर्नाटक)।
उत्तर- रूस में 809 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र है जो विश्व में वन विस्तार की दृष्टि से प्रथम है।
उत्तर- चीता, गिद्ध, गेंडा, गिर सिंह, मगर हसावर, बराहसिंगा, भेडिया, सारंग और लाल पण्डा आदि।
उत्तर- जैव भंडार में विस्तृत जंगल होता है जिसमें पौधे तथा जानवर अपने प्राकृतिक वातावरण में सुरक्षित रहते हैं।
उत्तर- प्राकृतिक वनस्पति, प्राकृतिक सुन्दरता तथा वन्य जीवन को सुरक्षित रखनेवाले स्थान को राष्ट्रीय उद्यान कहते हैं। उदाहरण-कार्बेट तथा काजीरंगा।
उत्तर- प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण नष्ट होते जा रहे जीवों को संकटग्रस्त जीव का जाता है । जैसे-सिंह, चीता, काला हिरण, मगरमच्छ इत्यादि।
दूसरी ओर, रहने के स्थानों में खोज करने पर अनुपस्थित पाए जानेवाले जीवों की प्रजातियों को विलुप्त प्रजाति के जीव कहते हैं। जैसे-एशियाई चीता, गुलाबी सिरवाली बत्तख आदि।
उत्तर- देश में वन संसाधनों पर जनसंख्या का भारी दवाब है। बढ़ती जनसंख्या के लिये कृषि के लिये भूमि की आवश्यकता होती है। जानवरों के लिये चरागाह की आवश्यकता होती है। उद्योगों की आपूर्ति के लिये वनों का तेजी से शोषण हो रहा है। इसलिये यह आवश्यक है कि वनों के संरक्षण के लिये भिन्न विधियाँ अपनाई जाएँ। वनारोपण तथा पुनर्वनारोपण कई क्षेत्रों में विकसित किया जा रहा है। घासभूमियाँ पुनः बनाई जा रही हैं। तेजी से उगनेवाले पौधे लगाये जा रहे हैं तथा वनों के क्षेत्र को बढ़ाया जा रहा है।
उत्तर- यदि हम अपने चारों ओर देखें तो कुछ जानवर, पेड़-पौधे तथा अन्य प्रजातियाँ पायेंगे जो कि हमारे क्षेत्र में अद्वितीय हैं। वास्तव में भारत विश्व का एक ऐसा देश है जहा जैव विभिन्नताए धनी हैं और विश्व की 8% (1.6 मिलियन) प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
यह संख्या दुगुनी और तिगुनी भी हो सकती है, यदि इनकी खोज की जाए। हमने भारत के वन और वन्य जीवन के प्रचार के बारे में अध्ययन कर लिया है। हमने यह स्वीकार किया होगा कि इन संसाधनों का कितना महत्व है।
उत्तर- वनस्पति जगत और प्राणी जगत में अंतर निम्नलिखित है—
उत्तर- भारत की राष्ट्रीय वन-नीति के मुख्य उद्देश्य निम्न है—
(i) पर्यावरण को संतुलित बनाना।
(ii) वन संपदा की सुरक्षा करना।
(iii) भूमि ह्रास को रोकना।
(iv) बाढ़ का नियंत्रण करना।
(v) मरुस्थलीकरण को रोकना।
(vi) जैव विविधता को बनाए रखना।
उत्तर- बाघ एक दुर्लभ प्रजाति है। बाघ परियोजना को बड़ी सफलता मिली है। वर्तमान समय में 16 बाघ परियोजनाएँ चल रही हैं।
कुछ महत्वपूर्ण बाघ परियोजनाएँ निम्नलिखित हैं—
(i) हजारीबाग राष्ट्रीय उद्यान (झारखण्ड)
(ii) कान्हा राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश)
(iii) तादोवा राष्ट्रीय उद्यान (महाराष्ट्र)
(iv) कार्बेट पार्क राष्ट्रीय उद्यान (उत्तराखण्ड)
(v) संजय राष्ट्रीय उद्यान (मध्य प्रदेश)
(vi) सरिस्का राष्ट्रीय उद्यान (राजस्थान)।
उत्तर- वन्य जीव संरक्षण के लिए उपाय निम्नलिखित हैं—
(i) शिकार पर प्रतिबन्ध लगाया जाए।
(ii) अधिक राष्ट्रीय उद्यान और वन्य जीव अभ्यारण्य स्थापित किए जाएँ ।
(iii) प्रजनन के लिए उचित दशाएँ प्रदान की जाएँ।
(iv) वन्य जीवों को स्वास्थय सुविधाएँ प्रदान की जाए।
(v) वनों की कटाई पर रोक लगाया जाए।
उत्तर- औद्योगिक क्रांति के बाद से बड़े पैमाने पर वनों का ह्रास हो रहा है।
इससे उत्पन्न दुष्परिणाम निम्न हैं—
(i) कई जीव-जंतुओं की प्रजातियों का ह्रास।
(ii) वन उत्पादों की कमी।
(iii) चारा एवं लकड़ी की कमी।
(iv) कई वनस्पतियों का विलुप्तीकरण।
(v) सूखा में बढ़ोतरी।
(vi) कई जीव-जंतुओं के आवासों में कमी।
(vii) कई जड़ी-बूटियों का खात्मा।
उत्तर- जैव-आरक्षित क्षेत्र भूमि का विशाल क्षेत्र है जो प्राकृतिक वनस्पति वन्य जीव प्रजातियों के संरक्षण के लिए उपयोग में आता है।
पहला जैव-आरक्षित क्षेत्र वर्ष 1986 में नीलगिरि जैव आरक्षित क्षेत्र, किया गया। यह 5500 वर्ग कि. मी. क्षेत्र को घेरे हुए हैं। यह तीन गोर कर्नाटक और तमिलनाडु में फैला हुआ है।
दो जैव आरक्षित क्षेत्र हैं— (i) नंदा देवी जैव आरक्षित क्षेत्र (उत्तराखण्ड) तथा (ii) नोक्रेक (मेघालय)।
उत्तर- प्रोजेक्ट टाइगर बाघ संरक्षण की दिशा में भारत में चलाई जा रही परियोजना है जिसे विश्व की बेहतरीन वन्य जीव परियेजनाओं में गिना जाता है। 1973 से शुरू हुई इस परियोजना के द्वारा देश में बाघों की संख्या बढ़ने लगी।
1973 में बाघों की संख्या मात्र 1,827 थी जो 1989 तक बढ़कर 4,334 हो गई। भारत में 37,761 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र पर फैले हुए 27 बाघ रिजर्व हैं। इस परियोजना का मुख्य उद्देश्य एक संकटग्रस्त जाति के जीव को बचाने के प्रयास के साथ-साथ बहुत बड़े आकार की जैवजाति को बचाना भी है।
उत्तर- भारत वनस्पति जगत की तरह प्राणी जगत में भी धनी है। भारतीय वन विभिन्न प्रकार के वन्य प्राणियों जो हाथी से लेकर छोटे पक्षियों तक का घर है।
भारत में 8000 पशुओं की प्रजातियाँ पाई जाती हैं। देश में 1200 से अधिक पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं। 2500 प्रजातियाँ मछलियों की पाई जाती हैं जो विश्व का 12% है। यहाँ विश्व के 5 से 8% सर्प, स्तनधारी तथा जल एवं स्थलवासी प्राणी मिलते हैं।
हाथी मुख्यतः असाम, कर्नाटक और केरल में पाये जाते हैं। एक सींग वाला गैण्डा भी आसाम और पश्चिमी बंगाल में पाया जाता है। थार मरुस्थल जंगली गधों और ऊँट का आवास है।
शेर तथा बब्बर शेर भी भारत में पाये जाते हैं। भारतीय शेर गुजरात के गिर वनों में पाया जाता है। शेर मध्य प्रदेश, पश्चिमी बंगाल में सुन्दर वन में पाया जाता है।
उत्तर- संरक्षण की दृष्टि से भारतीय वनों को तीन प्रमुख वर्गों में बाँटा गया है-
(i) सुरक्षित वन— ऐसे वन सरकारी वन हैं जहाँ पशुचारण करना एवं खेती करना या लकड़ी काटना वर्जित होता है। देश में इस प्रकार के वन मध्य प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, महाराष्ट्र, केरल, तमिलनाडु एवं पश्चिम बंगाल में पाए जाते हैं। देश के आधे से अधिक वन इस वर्ग में आते हैं।
(ii) संरक्षित वन— संरक्षित वन ऐसे सरकारी वन है जहाँ से सिफ्र लाइसेंस-प्राप्त व्यक्ति ही वन उत्पाद को प्राप्त कर सकता है। ऐसे वन बिहार, झारखण्ड, हरियाणा, पंजाब, हिमाचल प्रदेश, उड़ीसा, राजस्थान, गुजरात एवं पूर्वोत्तर राज्यों तथा अंडमान निकोबार में है।
(iii) अवर्गीकृत वन— इस प्रकार के वनों में किसी प्रकार का प्रतिबंध नहीं होता है। उपयोग करनेवाले को टैक्स देना पड़ता है।
उत्तर- हमें खनिजों के संरक्षण एवं प्रबंधन की आवश्यकता इसलिए होती है क्योंकि उद्योग और कृषि दोनों ही खनिजों पर निर्भर करते है। खनिजों के अभाव में आधुनिक ढंग से कृषि नहीं की जा सकती तथा खनिजों के बिना उद्योग धंधे स्थापित नहीं किये जा सकते। मनुष्य के विकास का मूल आधार खनिज ही है। इसलिए खनिजों का संरक्षण एवं प्रबंधन आवश्यक है।
उत्तर- सिंहभूम जिले के नोआमुंडी क्षेत्रों तथा इसके अतिरिक्त पलामू, हजारीबाग, संथाल परगना, धनबाद एवं राँची जिलों में मिलता है।
उत्तर- खनिज संसाधन के अभाव में देश के औद्योगिक विकास को गति एवं दिशा नहीं दे सकते । फलतः देश का आर्थिक विकास अवरुद्ध हो सकता है। विश्व के बहुत से देशों में खनिज सम्पदा राष्ट्रीय आय के प्रमुख स्रोत बने हुए हैं। खनिज ऐसे क्षयशील संसाधन है जिन्हें दोबारा नवीनीकृत नहीं किया जा सकता। अतः खनिजों के संरक्षण की परम आवश्यकता है।
उत्तर- पेट्रोलियम ताप प्रकाश के लिए ईंधन, मशीनों का स्नेहक, अनेक विनिर्माण उद्योगों को कच्चा माल प्रदान करता है। तेलशोधनशालाएँ-संश्लेषित वस्त्र, उर्वरक तथा असंख्य रसायन उद्योगों में इसका उपयोग होता है। इसकी उपयोग संश्लेषित वस्त्र, उर्वरक तथा रसायन उद्योगों में भी होता है।
उत्तर- बिहार और झारखण्ड में उत्तम कोटि का रूवी अभ्रक का उत्पादन होता है। यह पश्चिम गया जिले से हजारीबाग, मुंगेर होते हुए पूर्व में भागलपुर तक फैला है। इसके अतिरिक्त धनबाद, पलामू, राँची एवं सिंहभूम जिलों में भी अभ्रक भण्डार मिले हैं। बिहार झारखण्ड भारत का 80% अभ्रक का उत्पादन करता है।
इसका उपयोग इलेक्ट्रॉनिक्स उद्योगों में होता है। इसका उपयोग विद्युत उपकरण बनाने में होता है।
उत्तर- लौह एवं इस्पात उद्योग एक आधारभूत उद्योग है। इस उद्योग की बनी मशीनरी पर हल्के, मध्यम और भारी उद्योग निर्भर करते हैं। आज देश का कोई भी घर ऐसा नहीं है जहाँ लोहे की बनी चीजें न हो। इसकी स्थापना कच्चामाल वाले क्षेत्र में किया जाता है। छोटानागपुर का पठार लौह तथा कोयले के भण्डारों के लिए विख्यात है जो लौह इस्पात उद्योग चलाने के लिए आवश्यक है। इसके प्रमुख कच्चामाल लौह अयस्क, कोयला, मैंगनीज, चूना-पत्थर इत्यादि हैं।
उत्तर- लौह अयस्क चार प्रकार के होते हैं —
(i) हेमेटाइट— इसमें लोहे की मात्रा 50-70% पायी जाती है।
(ii) मैग्नेटाइट— इसमें लोहे की मात्रा 72% पायी जाती हैं।
(iii) लिमोटाइट— इसमें 10 से 40% लोहे की मात्रा होती है।
(iv) सिडेराइट— इसमें लोहे की मात्रा 48% होती है।
उत्तर- मैंगनीज का उपयोग मुख्य रूप से लौह-इस्पात उद्योग के अलावे शुष्क बैटरीयों के निर्माण, फोटोग्राफी, चमड़ा, ब्लीचिंग पाउडर, काँच, दवाएँ तथा बिजली के समान में किया जाता है।
उत्तर-
उत्तर- खनिज के प्राकृतिक संसाधन वे हैं जो शैलों से प्राप्त हैं। दूसरे शब्दों में खनिज पदार्थ भूर्पटी से प्राप्त ऐसे पदार्थ है जिनमें एक प्रकार की रासायनिक संरचना होता है।
उत्तर- धात्विक खनिज के दो प्रमुख पहचान इस प्रकार है—
(i) धात्विक खनिज को गलाने पर धातु प्राप्त होता है।
(ii) ये कठोर एवं चमकीले होते हैं।
उत्तर- खनिजों के निम्नलिखित विशेषताएं हैं—
(i) इनका वितरण असमान है।
(ii) अधिक गुणवत्ता वाले खनिज तथा कम गुणवत्ता वाले खनिज अधिक मात्रा में पाए जाते हैं।
(iii) खनिज संभाव्य संसाधन है।
(iv) एक बार उपयोग करने के बाद खनिज का पुनः उपयोग नहीं होता है।
उत्तर- चूना-पत्थर के उपयोग सीमेंट, लौह-इस्पात, रसायन का उपयोग, चीनी, कागज, उर्वरक आदि में होता है।
उत्तर- कर्नाटक, उड़ीसा, छत्तीसगढ़, गोवा, झारखण्ड, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, राजस्थान आदि लोहे के उत्पादक राज्य है।
उत्तर- इस प्रकार के खनिज में जीवाश्म होता है। ये पृथ्वी में दबे प्राणी एवं पादप जीवों के परिवर्तित होने से बनते हैं। जैसे- कोयला, पेट्रोलियम।
उत्तर- अकार्बनिक खनिज उसे कहा जाता है जिसमें जीवाश्म नहीं होता है जैसे- अभ्रक, ग्रेफाइट आदि।
उत्तर- एल्युमिनियम का उपयोग वायुयान निर्माण, विद्युत उपकरण, बर्तन, घरेलू सामान, रासायनिक वस्तुएँ आदि बनाने मे होता है।
उत्तर- ताँबा का उपयोग बिजली के तार बनाने में होता है तथा इसके अलावे बर्तन आदि बनाने में इसका उपयोग होता है। भारत में 90% तांबे का भंडार मध्य प्रदेश, राजस्थान, झारखण्ड, कर्नाटक, आन्ध्र प्रदेश में मिलता है।
उत्तर- खनिज प्रकति में स्वत: पाया जानेवाला अकार्बनिक पदार्थ है जिसकी भौतिक एवं रासायनिक संरचना निश्चित होती है। इसका आंतरिक परमाण्विक संगठन भी निश्चित होता है।
खनिज मुख्य रूप से चार प्रकार के होते हैं—
(i) धात्विक खनिज— मैगनीज, ताँबा, कोबाल्ट।
(ii) अधात्विक खनिज— कोयला, हीरा, अभ्रक।
(ii) बहुमूल्य खनिज— सोना, प्लैटिनम, हीरा।
(iv) रेडियोसक्रिय खनिज— यूरेनियम, थोरियम।
उत्तर- खनन जैसे उत्पादक कार्य से अर्थव्यवस्था मजबूत होती है, परंतु इस कार्य के कई दुष्प्रभाव भी हैं—
(i) खनन कार्य के कारण संबंधित क्षेत्र की कृषि तथा वन भूमि का ह्रास हो जाता है।
(ii) खनिजों के खनन से उनके खत्म होने की आशंका बढ़ जाती है।
(iii) खनन कार्य के दौरान कई बार दुर्घटनाएं हो जाती हैं।
(iv) यूरेनियम के खनन से रेडॉन नामक जहरीली गैस निकलती है।
(v) खनन कार्य से वायु एवं जल प्रदूषण होता है।
उत्तर- जिन खनिजों में धातु प्रमुखता से पाए जाते है, उन्हें धात्विक खनिज कहा जाता है।
यह दो प्रकार का होता है—
(क) लौहयुक्त— ऐसे खनिजों में लोहे का अंश होता है, जैसे— लौह-अयस्क, मैंगनीज, निकेल इत्यादि।
(ख) अलौहयुक्त— ऐसे खनिजों में लोहे का अंश काफी कम होता है, जैसे— टिन, सोना, चाँदी इत्यादि।
जिन खनिजों में धातु नहीं मिलते हैं, उन्हें अधात्विक खनिज कहा जाता है, जैसे— अभ्रक, कोयला आदि।
उत्तर- सूर्य से प्राप्त ऊर्जा को सौर ऊर्जा कहते है। इस ऊर्जा को फोटोवोल्टिक परिवर्तन द्वारा उतपन्न किया जाता है। जब सूर्य से निकलने वाला प्रकाश सोलर पैनल से टकराता है तो यह विद्युत् उत्पन्न करता है।
सौर ऊर्जा के उपयोग से घरेलु बिजली व वाणिज्यिक और औद्योगिक उपयोग में लाये जाने वाले पानी को गर्म करने में किया जा सकता है।
उत्तर- पेट्रोलियम से गैसोलीन, डीजन, किरासन तेल, स्नेहक, कीटनाशक दवाएँ, साबुन, कृत्रिम रेशा और प्लास्टिक का निर्माण होता है।
उत्तर- पेट्रोलियम ताप प्रकाश के लिए ईंधन, मशीनों का स्नेहक, अनेक विनिर्माण उद्योगों को कच्चा माल प्रदन करता है। तेलशोधनशालाएँ-संश्लेषित वस्त्र, उर्वरक तथा असंख्य रसायन उद्योगों में उपयोग होता है। इसकी उपयोग संश्लेषित वस्त्र, उर्वरक तथा रसायन उद्योगों में होता है, जबकि कोयला, ईंधन तथा विद्युत के रूप में ही उपयोग होता है। इसलिए पेट्रोलियम का महत्व कोयले से अधिक है।
उत्तर- परमाणु शक्ति निम्न खनिजों से प्राप्त होता है— यूरेनियम, थोरियम, ग्रेफाइट, इल्मेनाइट, एंटीमनी, ग्रेफाइट आदि।
उत्तर- कोयला चार प्रकार के होते हैं- (i) ऐंथ्रासाइट, (ii) बिटुमिनस, (iii) लिग्नाइट एवं (iv) पीट कोयला।
उत्तर- नदी घाटी परियोजना जिससे एक ही समय में बहुत से उद्देश्य पूरे किए जा सकते हैं इसलिए इसे बहुउद्देशीय परियोजना कहा जाता है जैसे-सिंचाई, विद्युत उत्पादन, बाढ़ नियंत्रण, पेयजल, पर्यटन उद्योग आदि।
उत्तर- 1973 में बंबई (मुंबई) द्वीप के निकट अरब सागर में सागर तल का वेधन कर तेल निकाला गया । यह तेल क्षेत्र मुम्बई हाई के नाम से प्रसिद्ध है जो समुद्र तट से 115 किमी की दूरी पर है । यहाँ ‘सागर सम्राट’ नामक जल मंच बनाया गया है, जिससे तेल की खुदाई में सुविधा मिलती है। यह महाराष्ट्र का एक मात्र तेल उत्पादक केन्द्र है। इसने 1974 से तेल उत्पादन शुरू किया। आज भारत के सर्वाधिक तेल उत्पादन क्षेत्र यहीं है।
उत्तर- ताप शक्ति उत्पादन करने के लिए कोयला, पेट्रोलियम, तथा प्राकृतिक गैस का उपयोग किया जाता है इनके संसाधन निकट भविष्य में समाप्त होने वाले हैं। इसलिए यह समाप्य संसाधन है इसका नवीनीकरण नहीं हो सकता है।
उत्तर-
पारम्परिक ऊर्जा स्रोत के तीन उदाहरण—
(i) कोयला (ii) पेट्रोलियम (iii) प्राकृतिक गैस
गैर-पारम्परिक ऊर्जा स्रोत के तीन उदाहरण—
(i) सौर ऊर्जा (ii) पवन ऊर्जा (iii) बायो गैस एवं जैव ऊर्जा।
उत्तर-
हीराकुंड परियोजना– उड़ीसा ।
तुंगभद्रा परियोजना– कर्नाटक एवं आंध्र प्रदेश
रिहन्द परियोजना– उत्तर प्रदेश।
उत्तर- गोंडवाना समूह के कोयला क्षेत्रों के नाम इस प्रकार हैं—
(i) दामोदर घाटी (झारखण्ड, पश्चिम बंगाल)
(ii) सोन घाटी (मध्य प्रदेश)
(iii) महानदी घाटी (छत्तीसगढ़, उड़ीसा)
(iv) गोदावरी-वर्धा घाटी (मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और आंध्र प्रदेश)।
उत्तर- मुंबई हाई, असम, गुज्रात।
उत्तर- असम में डिग्बोई, बिहार में बरौनी, मुंबई में ट्राम्बे एवं गुजरात में कोयला।
उत्तर- भारत में सन् 1897 में दार्जिलिंग में प्रथम जल विद्युत संयंत्र की स्थापना हुई।
उत्तर- 1901 में भारत का प्रथम तेल शोधक कारखाना असम के डिग्बोई में स्थापित हुआ।
उत्तर- शक्ति के साधनों का वास्तविक विकास 18वीं शताब्दी में औद्योगिक क्रान्ति के साथ शुरू हुआ।
उत्तर- ऐंथ्रासाइट सर्वोच्च कोटि का कोयला है जिसमें कार्बन की मात्रा 90% से अधिक होती है।
उत्तर- टर्शियरी भंडार मुख्यतः असम, अरूणाचल प्रदेश, मेघालय एवं नागालैण्ड में मिलता है।
उत्तर- गुजरात में मुख्य तेल उत्पादक क्षेत्र अंकलेश्वर, कलोल, नवगाँव, कोसांबा मेहसाना आदि हैं।
उत्तर- सागर सम्राट एक जलयान है जो समुद्र के भीतर अरब सागर में तेल के कँए खोदने का कार्य करता है।
उत्तर- कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस, जल विद्युत एवं आण्विक ऊर्जा स्रोतों को 'वाणिज्य ऊर्जा स्रोत' कहा जाता है।
उत्तर- कोयला, पेट्रोलियम, प्राकृतिक गैस जैसे खनिज ईंधन जो जीवाश्म ईंधन के नाम से भी जाने जाते हैं, ये सभी पारम्परिक ऊर्जा के संसाधन हैं।
उत्तर- गोंडवाना समूह में कुल उत्पादन का 99% भाग प्राप्त होता है । यहाँ के कोयले का निर्माण 20 करोड़ वर्ष पूर्व में हुआ था।
उत्तर- यहाँ झरिया, बोकारो, गिरीडीह, कर्णपुरा, रामगढ़ प्रमुख कोयला उत्पादक क्षेत्र हैं।
उत्तर- भारत के सागर तटवर्ती एवं नदियों के किनारे के भाग विशेषकर राजस्थान, गुजरात, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु पवन ऊर्जा के लिए अनुकूल परिस्थितियाँ पायी जाती है।
उत्तर- जल विद्युत उत्पादन के निम्नलिखित कारक हैं— नदियों में प्रचुर मात्रा में जलराशि, नदीमार्ग में ढाल, जल का तीव्र वेग, प्राकृतिक जलप्रपात आदि मुख्य दशाएँ हैं।
उत्तर- ऊर्जा संरक्षण की प्रमुख विधियाँ निम्नलिखित हैं-
(i) बिजली का आवश्यकतानुसार प्रयोग करना।
(ii) बिजली बल्ब की जगह LED बल्बों का प्रयोग करना।
(iii) ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों की खोज एवं उपयोग पर बल देना।
(iv) ऊर्जा की कम खपत करनेवाले उत्पादों का निर्माण करना।
(v) ऊर्जा संरक्षण के लिए लोगों को जागरूक बनाना।
उत्तर- उद्योगों के विकेंद्रीकरण तथा अन्य कई कारणों से देश में जलविद्युत का बड़ा महत्त्व है।
इसके कई कारण हैं—
(i) जलविद्युत का उत्पादन कोयले से सस्ता है।
(ii) कोयला सीमित क्षेत्र में उपलब्ध है जबकि बिजली की माँग पूरे देश में है।
(iii) जल से विद्युत उत्पादन के साथ-ही-साथ सिंचाई का काम भी किया जाता है।
(iv) उद्योगों के विकेंद्रीकरण में जलविद्युत सस्ती पड़ती है।
(v)घरेलू बिजली आपूर्ति का यह सशक्त माध्यम है।