उत्तर- "धरती कब तक घूमेगी" शीर्षक कहानी साॅंवर दइया द्वारा रचित किया गया है। यह कहानी राजस्थानी भाषा से ली गई है। इस कहानी में सीता और उसके तीन बेटे है। सीता के पति जब तक जीवित थे तब तक सब कुछ ठीक था। घर, घर के जैसा प्रतीत होता था। आँगन में खेलते-झगड़ते बच्चों की आवाजें बहुत ही सुखद प्रतीत होती थी। उसके तीनों बेटों में अपनापन का मधुर भाव था पर उसके पति के मरने के बाद सब कुछ बदल चुका है। सीता अपने बेटों पर आश्रित हो गई है। उसे दो जून की रोटी तो मिलती है लेकिन उसकी सभी आवश्यकताएँ पूरी नहीं हो पाती है। रोटी के अलावा भी जीवन में कुछ लालसाएँ होती है। यदि वें पूरी ना हो, तो जीवन का कोई अर्थ नहीं है।
सीता के तीन बेटे और बहुएँ है तथा पोते-पोतियाँ है। इन सबों के होने के बावजूद उसके जीवन में कोई र्स नहीं है। उसके तथा बेटों के बीच मधुर भाव और प्यार समाप्त हो चुका है। कोई बेटा उसके पास बैठ कर उसका हाल-चाल नहीं लेता। उसके तीनों बेटे कैलाश, नारायण और बिज्जू यह निर्णय लेते है कि वे बारी-बारी से माँ को अपने साथ एक-एक महीने के लिए रखेंगे। इस निर्णय के लिए उसके बेटों ने उसकी माँ से कोई राय भी नहीं लियें। माँ (सीता) एक के बाद दूसरे और दूसरे के बाद तीसरे बेटे के हिस्से में लुढ़कने लगती है। जब बेटे का हिस्सा बदलता है, तो पोता-पोती खुश हो जाते है कि हम दादी के साथ खेलेंगे और खायेंगे, पर हिस्से वाली बहू दुखी हो जाती है। उनके लिए सीता माँ ना हो कर आफत हो जाती है।
ऐसे करते करते पाँच वर्ष बीत चुके है। सीता को इन पाँच वर्षों में कभी सुख नसीब नहीं हुआ। माँ की रोटी का ढंग पुनः बदल दिया जाता है। तीनों पुत्र माँ को प्रति माह 50-50 रुपये देने को राजी होते है ताकि माँ अपनी रोटी बनाएगी और सुख-चैन से रहेगी और हम भी सुख-चैन से रहेंगे। बेटों के इस निर्णय से माँ के अंदर आँसुओं का समुंद्र भर जाता है। इस बात से सुखी होकर सीता अगले दिन घर से निकल जाती है। घर से निकलने के बाद उसको ऐसा लगता है कि अब उसकी आँखों के सामने कोई अंधेरा नहीं है। अब उसके चारों ओर खुली हवा है। अब वह हर बंधन से मुक्त है। अब वह दो जून की रोटी के लिए अलग-अलग बेटों के घर के चक्कर नहीं काटना पड़ेगा और अपनी बहुओं का ताना नहीं सुनना पड़ेगा।
उत्तर- "धरती कब तक घूमेगी" कहानी का शीर्षक सार्थक और सटीक है। जिस तरह धरती सूर्य के चारों-ओर घूमती रहती है, उसी तरह सीता अपने बेटों के घर पर तथा उनकी बहुओं के चारों-ओर घूमती रहती है। लेकिन एक दिन सीमा पार करने के बाद वह अपने बेटों के यहाँ चक्कर लगाना अस्वीकार कर देती है तथा अपने बेटों और बहुओं से अपमानित होने के कारण घर छोड़कर चली जाती है। अतः यह कहानी यह स्पष्ट करता है कि आखिर धरती (सीता माँ) कब तक घूमेंगी? वह भी अपने बेटों से अपमानित होकर।
उत्तर- बहुओं की आपसी लड़ाई से सीता परेशान हो उठती है। जब बहुएँ आपस में लड़ती है, तो वे अपनी सास सीता को लड़ाई में घसीट लेती है। वे एक-दूसरे से कहती है— पूछ लो! सास जी तो वही थी। अब सीता किसका पक्ष ले? बहुओं की प्रतिदिन की लड़ाई से तंग आ चुकी है। वह इस अशांत माहौल में जीना नहीं चाहती है, पर वह करे तो क्या करे?
उत्तर- माँ हर माह इधर-उधर ना लुढ़कती रहे, इसके लिए बड़े पुत्र कैलाश ने एक उपाय ढूँढा। उसने बोला कि हम तीनों भाई माँ को पचास-पचास रुपये हर महीने दे दिया करेंगे। उनको अपना गुजारा करने के लिए डेढ़-सौ रुपये काफी है। माँ को जब यह बात मालूम हुआ तो उसकी आँखों के सामने अंधेरा छा गया। उनकी आखों में आसू भर आए। उसने अपने बेटों द्वारा 50-50 रुपये प्रतिमाह देने के निर्णय को अपने स्वाभिमान के विरुद्ध माना। वह कोई मजदूरिन नहीं थी कि उनसे वह महीने में रुपये ले। अतः इस बात से उसने अपने बेटों का घर छोड़ देने का निर्णय लिया।